पहिले पान
॥ श्रीहरिः॥
श्रीएकनाथी भागवत
(मूल-पारायण प्रत)
मराठी
त्वमेव माता च पिता त्वमेव
त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव।
त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव
त्वमेव सर्वं मम देवदेव॥
गीता सेवा ट्रस्ट
॥ श्रीगणेशाय नम:॥
नम्र निवेदन
भगवान् व्यासदेवको पुराणेतिहासकी रचना करनेके बाद भी जब शान्ति नहीं मिली तब उन्होंने देवर्षि नारदके उपदेशसे श्रीमद्भागवतमहापुराणका सृजन किया। इससे श्रीमद्भागवतकी सर्वश्रेष्ठता स्वत: सिद्ध होती है। पुराणोंमें यहाँतक वर्णन है कि कलियुगमें जो अधिक पापरत मनुष्य होंगे उनके उद्धारके लिये भगवान् स्वयं ही श्रीसहित श्रीमद्भागवतमें प्रवेश कर गये। इस कारण यह भगवान् सच्चिदानन्दका वाङ्मय विग्रह ही है। असंख्य जीवोंको जब किसी अन्य साधनसे सिद्धि तथा शान्ति नहीं मिलती तब एकमात्र श्रीमद्भागवत ही उपायरूपसे बच जाता है। यह वैष्णवोंका परम धन है। वैष्णव-आचार्योंने तो प्रस्थानत्रयीमें—उपनिषद्, गीता, ब्रह्मसूत्रके साथ श्रीमद्भागवतको जोड़कर उसको ‘प्रस्थानचतुष्टय’ बना दिया है। उनके मतमें श्रीमद्भागवतके बिना प्रस्थानत्रयी अपूर्ण है।
परमहंससंहिताका गौरवप्राप्त इस पुराणपर आचार्योंने अनेक टीकाएँ लिखी हैं। उनका आस्वादन संस्कृतप्रेमी तथा विद्वान् ही कर सकते हैं। संस्कृतके अलावा संत महानुभावोंने साधारण जनको आस्वादन कराने हेतु श्रीमद्भागवतपर प्राकृत भाषाओंमें रचनाएँ कीं। महाराष्ट्रमें संत एकनाथ महाराज हुए। सदेह समाधिस्थ होनेके लगभग दो सौ चौरानबे वर्षों बाद ज्ञानेश्वर महाराजने एकनाथ महाराजको स्वप्नमें आदेश देकर ज्ञानेश्वरीके प्रचार-प्रसार हेतु प्रेरित किया। तत्पश्चात् उन्होंने ज्ञानेश्वरी ग्रंथको जन-जनतक पहुँचाया जो असंख्य जीवोंके लिये सिन्धुपोतका कार्य कर रहा है। तदुपरान्त उसी समयमें श्रीमद्भागवतके एकादश स्कन्धपर श्रीएकनाथ महाराजजीने मराठी भाषामें टीका लिखी जो जन-मन-भावन हुई।
जिस प्रकार गीतामें भगवान्ने परम भागवत अर्जुनको निमित्त बनाकर उपदेश दिया ठीक उसी प्रकार श्रीमद्भागवतके एकादश स्कन्धमें उन्होंने परम भागवत उद्धवको निमित्त बनाकर उपदेश दिया है। इसमें कुल इकतीस अध्यायोंमें—अध्याय सातसे लेकर उन्तीस तक केवल श्रीकृष्ण-उद्धव-संवाद ही है। इसको ‘उद्धव-गीता’ कहा जाता है। इसके अतिरिक्त अवधूतोपाख्यान तथा श्रीवासुदेव-नारदसंवादमें राजा निमि और नौ योगीश्वरोंका संवाद भी वर्णित है। इसमें ‘वासुदेव: सर्वम्’ (सब कुछ वासुदेव है)-के सिद्धान्तका प्रतिपादन किया गया है। संक्षेपमें यही कहा जा सकता है कि एकादश स्कन्ध आध्यात्मिक जीवनके लिये परम उपादेय है। अस्तु!
महाराष्ट्रमें सन्तवाणीके पारायण (नित्यपाठ)-की बड़ी ही सुन्दर परम्परा विद्यमान है। अनेक भक्तिपरायण महानुभाव संत ज्ञानेश्वरकी ज्ञानेश्वरी, तुकाराम महाराजकृत गाथा और एकनाथजी महाराजके एकनाथी भागवतका पारायण नित्य करते हैं, जिससे उनके जीवनमें ग्रंथका समग्र अध्ययन होता रहता है। कई विद्यार्थी तथा सज्जनोंको ग्रंथ पूरे-पूरे कण्ठस्थ हो जाते हैं तथा वे श्रवणभक्तिपरायण लोग भगवद्रस-रसिक विद्वान् महानुभावोंसे उन ग्रंथोंपर प्रवचन सुनते रहते हैं। उन्हें भगवान् अपनी असीम अनुकम्पासे अनायास ही अपनी पराभक्ति प्रदान करते हैं। विनम्र निवेदन है कि सभी भक्तिपरायण महानुभाव इस ग्रंथरत्नको जन-जनतक पहुँचाकर भगवान् के प्रिय पात्र बनें।
॥ श्री ॐ तत्सत्-श्रीकृष्ण प्रसन्न॥
अध्याय पहिला
श्रीगणेशाय नम:॥ श्रीसरस्वत्यै: नम:॥ श्रीगुरुभ्यो नम:॥ श्रीदत्तात्रेयाय नम:॥ श्रीरुक्मिणीपांडुरंगाभ्यां नम:*॥ ॐ नमो जी जनार्दना। नाहीं भवअभवभावना। न देखोनि मीतूंपणा। नमन श्रीचरणा सद्गुरुराया॥ १॥ नमन श्रीएकदंता। एकपणें तूंचि आतां। एकीं दाविसी अनेकता। परी एकात्मता न मोडे॥ २॥ तुजमाजीं वासु चराचरा। म्हणौनि बोलिजे लंबोदरा। यालागीं सकळांचा सोयरा। साचोकारा तूं होसी॥ ३॥ तुज देखे जो नरु। त्यासी सुखाचा होय संसारु। यालागीं ‘विघ्नहरु’। नामादरु तुज साजे॥ ४॥ हरुष तें वदन गणराजा। चाऱ्ही पुरुषार्थ त्याचिचाऱ्ही भुजा। प्रकाशिया प्रकाशी वोजा। तो झळकत तुझा निजदंतु॥ ५॥ पूर्वउत्तरमीमांसा दोनी। लागलिया श्रवणस्थानीं। नि:शब्दादि वाचा वदनीं। कर जोडूनि उभिया॥ ६॥ एकेचि काळीं सकळ सृष्टी। आपुलेपणें देखत उठी। तेचि तुझी देखणी दृष्टी। सुखसंतुष्टी विनायका॥ ७॥ सुखाचें पेललें दोंद। नाभीं आवर्तला आनंद। बोधाचा मिरवे नागबंद। दिसे सन्निध साजिरा॥ ८॥ शुद्ध सत्त्वाचा शुक्लांबर। कासे कसिला मनोहर। सुवर्णवर्ण अलंकार। तुझेनि साचार शोभती॥ ९॥ प्रकृतिपुरुष चरण दोनी। तळीं घालिसी वोजावुनी। तयांवरी सहजासनीं। पूर्णपणीं मिरवसी॥ १०॥ तुझी अणुमात्र झालिया भेटी। शोधितां विघ्न न पडे दृष्टी। तोडिसी संसारफांसोटी। तोचि तुझे मुष्टी निजपरशु॥ ११॥ भावें भक्त जो आवडे। त्याचें उगविसी भवसांकडें। वोढूनि काढिसी आपणाकडे। निजनिवाडें अंकुशें॥ १२॥ साच निरपेक्ष जो नि:शेख। त्याचें तूंचि वाढविसी सुख। देऊनि हरिखाचे मोदक। निवविसी देख निजहस्तें॥ १३॥ सूक्ष्माहूनि सूक्ष्म सान। त्यामाजीं तुझें अधिष्ठान। यालागीं मूषकवाहन। नामाभिधान तुज साजे॥ १४॥ पाहता नरु ना कुंजरु। व्यक्ताव्यक्तासी परु। ऐसा जाणोनि निर्विकारु। नमनादरु ग्रंथार्थीं॥ १५॥ ऐशिया जी गणनाथा। मीपणें कैंचा नमिता। अकर्ताचि जाहला कर्ता। ग्रंथकथाविस्तारा॥ १६॥; आतां नमूं सरस्वती। जे सारासारविवेकमूर्ती। चेतनारूपें इंद्रियवृत्ती। जे चाळिती सर्वदा॥ १७॥ जे वाचेची वाचक। जे बुद्धीची द्योतक। जे प्रकाशा प्रकाशक। स्वयें देख स्वप्रभ॥ १८॥ ते शिवांगीं शक्ति उठी। जैसी डोळ्ॺांमाजीं दिठी। किंवा सुरसत्वें दावी पुष्टी। फळपणें पोटीं फळाच्या॥ १९॥ जैसा साखरेअंगी स्वादु। कीं सुमनामाजीं मकरंदु। तैसा शिवशक्तिसंबंधु। अनादिसिद्धु अतर्क्य॥ २०॥ ते अनिर्वाच्य निजगोडी। चहूं वाचांमाजीं वाडी। म्हणोनि वागीश्वरी रोकडी। ग्रंथार्थीं चोखडी चवी दावी॥ २१॥ सारासार निवडिती जनीं। त्या हंसावरी हंसवाहिनी। बैसली सहजासनीं। अगम्यपणीं अगोचरु॥ २२॥ ते परमहंसीं आरूढ। तिसी विवेकहंस जाणती दृढ। जवळी असतां न देखती मूढ। अभाग्य दृढ अतिमंद॥ २३॥ तिचें निर्धारितां रूप। अरूपाचें विश्वरूप। ते आपुलेपणें अमूप। कथा अनुरूप बोलवी॥ २४॥ हा बोलु भला झाला। म्हणोनि बोलेंचि स्तविला। तैसा स्तुतिभावो उपजला। बोलीं बोला गौरवी॥ २५॥ ते वाग्विलास परमेश्वरी। सर्वांगदेखणी सुंदरी। राहोनि सबाह्यअभ्यंतरीं। ग्रंथार्थकुसरी वदवी स्वयें॥ २६॥ ते सदा संतुष्ट सहज। म्हणोनि निरूपणा चढलें भोज। परी वक्तेपणाचा फुंज। मीपणें मज येवोंच नेदी॥ २७॥ वाग्देवतेची स्तुती। वाचाचि जाहली वदती। तेथें द्वैताचिये संपत्ती। उमस चित्तीं उमसेना॥ २८॥ तिणें बोल बोलणें मोडिलें। समूळ मौनातें तोडिलें। त्यावरी निरूपण घडिलें। न बोलणें बोलें बोलवी॥ २९॥ तिसी सेवकपणें दुसरा। होऊनि निघे नमस्कारा। तंव मीपणेंसीं परा। निजनिर्धारा पारुषे॥ ३०॥ जेथें मीपणाचा अभावो। तेथें तूंपणा कैंचा ठावो। याहीवरी करी निर्वाहो। अगम्य भावो निरूपणीं॥ ३१॥ जैशा सागरावरी सागरीं। चालती लहरींचिया लहरी। तैसे शब्द स्वरूपाकारीं। स्वरूपावरी शोभती॥ ३२॥ जैशा साखरेचिया कणिका। गोडिये भिन्न नव्हती देखा। तैसें निरूपण ये रसाळसुखा। ब्रह्मरसें देखा रसवृत्ति॥ ३३॥ तेथें मीपणेंशीं सरस्वती। बैसविलें एका ताटें रसवृत्ती। तेणें अभिन्नशेष देऊनि तृप्ती। ते हे उद्गार येती कथेचे॥ ३४॥; आतां वंदूं ते सज्जन। जे कां आनंदचिद्घन। वर्षताती स्वानंदजीवन। संतप्त जन निववावया॥ ३५॥ ते चैतन्याचे अळंकार। कीं ब्रह्मविद्येचे शृंगार। कीं ईश्वराचें मनोहर। निजमंदिर निवासा॥ ३६॥ ते अधिष्ठाना अधिवासु। कीं सुखासही सोल्हासु। विश्रांतीसी विश्वासु। निजरहिवासु करावया॥ ३७॥ कीं ते भूतदयार्णव। कीं माहेरा आली कणव। ना ते निर्गुणाचे अवेव। निजगौरव स्वानंदा॥ ३८॥ ना ते डोळ्ॺांतील दृष्टी। कीं तिचीही देखणी पुष्टी। कीं संतुष्टीसी तुष्टी। चरणांगुष्ठीं जयांचे॥ ३९॥ ते पाहती जयांकडे। त्यांचें उगवे भवसांकडें। परब्रह्म डोळियांपुढें। निजनिवाडें उल्हासे॥ ४०॥ तेथें साधनचतुष्टयसायास। न पाहती शास्त्रचातुर्यविलास। एक धरिला पुरे विश्वास। स्वयें प्रकाश ते करिती॥ ४१॥ ते जगामाजीं सदा असती। जीवमात्रातें दिसती। परी विकल्पेंचि ठकिजती। नाहीं म्हणती नास्तिक्यें॥ ४२॥ मातियेचा द्रोण केला। तो कौळिका भावो फळला। म्हणौनि विश्वासेंवीण नाडला। जगु ठकला विकल्पें॥ ४३॥ एकाएकीं विश्वासतां। तरी वाणी नाहीं निजसत्ता। त्यांचे चरणीं भावार्थता। ठेवितां माथा विश्वासें॥ ४४॥ ते नमस्कारितां आवश्यक। करून ठाकती एक। परी एकपणें सेवक। त्यांचाचि देख स्वयें होआवें॥ ४५॥ त्यांचिया सेवेचिये गोडी। ब्रह्मसुखाची उपमा थोडी। जे भजती अनन्य आवडीं। ते जाणती गाढी निजचवी॥ ४६॥ ते प्रकृतीसी पर। प्रकृतिरूपीं ते अविकार। आकार-विकार-व्यवहार। त्यांचेनि साचार बाधीना॥ ४७॥ ते भोगावरी न विटती। त्यागावरी न उठती। आपुलिये सहजस्थिती। स्वयें वर्तती सर्वदा॥ ४८॥ ते ज्ञातेपणा न मिरविती। पिसेपण न दाविती। स्वरूपफुंजुविस्मृती। गिळूनि वर्तती निजांगें॥ ४९॥ प्रेमा अंगींचि जिराला। विस्मयो येवोंचि विसरला। प्रपंचुपरमार्थु एकु जाहला। हाही ठेला विभागु॥ ५०॥ स्मरण विस्मरणेंशीं गेलें। देह देहींच हारपलें। आंतुबाहेरपण गेलें। गेलें ठेलें स्मरेना॥ ५१॥ स्वप्नजागृती जागतां गेली। सुषुप्ति साक्षित्वेंसीं बुडाली। उन्मनीही वेडावली। तुर्या ठेली तटस्थ॥ ५२॥ दृश्य द्रष्टेनशीं गेलें। दर्शन एकलेपणें निमालें। तें निमणेंपणही विरालें। विरवितें नेलें विरणेनिशीं॥ ५३॥ ज्ञान अज्ञानातें घेऊनि गेलें। तंव ज्ञातेपणही बुडालें। विज्ञान अंगी घडलें। परी नवें जडलें हें न मनी॥ ५४॥ यापरी जे निजसज्जन। तिहीं व्हावें सावधान। द्यावें मज अवधान। हें विज्ञापन बाळत्वें॥ ५५॥ सूर्य सदा प्रकाशघन। अग्नि सदा दैदीप्यमान। तैसे संत सदा सावधान। द्यावें अवधान हें बालत्व माझें॥ ५६॥; तंव संतसज्जनीं एक वेळां। थोर करूनियां सोहळा। आज्ञापिलें वेळोवेळां। ग्रंथ करविला प्राकृत॥ ५७॥ एकांतीं आणि लोकांतीं। थोर साक्षेप केला संतीं। तरी सांगा जी मजप्रती। कोण ग्रंथीं प्रवर्तों॥ ५८॥ पुराणीं श्रेष्ठ भागवत। त्याहीमाजी उद्धवगीत। तुवां प्रवर्तावें तेथ। वक्ता भगवंत तुज साह्य॥ ५९॥ आम्हांसी पाहिजे ज्ञानकथा। वरी तुजसारिखा रसाळ वक्ता। तरी स्तुति सांडूनि आतां। निरूपण तत्त्वतां चालवीं॥ ६०॥ तुज संतस्तवनीं उत्सावो। हा तंव कळला भावो। तरी कथेचा लवलाहो। निजनिर्वाहो उपपादीं॥ ६१॥ या संतांचे कृपावचनें। एकाएकीं आनंदलों मनें। तेणें वाक्यपसायदानें। स्वानंदघनें उल्हासे॥ ६२॥ जैसा मेघांचेनि गर्जनें। मयूर उपमों पाहे गगनें। नाना नवेनि जीवनें। जेवीं चातक मनें उल्हासे॥ ६३॥ कां देखोनि चंद्रकर। डोलों लागे चकोर। तैसें संतवदनींचें उत्तर। आलें थोर सुखावित॥ ६४॥ थोर सुखाचा केलों स्वामी। तुमचें पुरतें कराल तुम्ही। तरी वायांचि कां मीपणें मी। मनोधर्मीं वळंगेजों॥ ६५॥ परी समर्थांची आज्ञा। दासां न करवे अवज्ञा। तरी सांगितली जे संज्ञा। ते करीन आज्ञा स्वामींची॥ ६६॥ परी तुम्हीं एक करावें। अखंड अवधान मज द्यावें। तेणें दिठिवेनि आघवें। पावेल स्वभावें निजसिद्धी॥ ६७॥ अगा तुझिया मनामाजीं मन। शब्दीं ठेविलेंसे अनुसंधान। यालागीं निजनिरूपण। चालवीं जाण सवेगें॥ ६८॥; आतां वंदूं कुळदेवता। जे एकाएकी एकनाथा। ते एकीवांचून सर्वथा। आणिक कथा करूं नेदी॥ ६९॥ एक रूप दाविलें मनीं। तंव एकचि दिसे जनीं वनीं। एकचि कानीं वदनीं। एकपणीं ‘एकवीरा’॥ ७०॥ ते शिवशक्तिरूपें दोनी। नेऊन मिरवे एकपणीं। एकपणें जाली गुर्विणी। प्रसवे एकपणीं एकवीरा॥ ७१॥ ते एकरूपें एकवीरा। प्रसवली बोध-फरशधरा। जयाचा कां दरारा। महावीरां अभिमानियां॥ ७२॥ तेणें उपजोनि निवटिली माया। आज्ञा पाळूनि सुख दे पितया। म्हणोनि तो जाहला विजया। लवलाह्यां दिग्मंडळीं॥ ७३॥ जो वासनासहस्रबाहो। छेदिला सहस्रार्जुन-अहंभावो। स्वराज्य करूनियां पहा हो। अर्पी स्वयमेवो स्वजातियां॥ ७४॥ तेणें मारूनि माता जीवविली। तेचि कुळदेवता आम्हां जाहली। परी स्वनांवें ख्याति केली। एकात्मताबोली एकनाथा॥ ७५॥ ते जैंपासोनि निवटिली। तैंपासोनि प्रकृति पालटली। रागत्यागें शांत झाली। निजामाउली जगदंबा॥ ७६॥ तया वोसंगा घेऊन। थोर दिधलें आश्वासन। विषमसंकटीं समाधान। स्वनामस्मरण केलिया॥ ७७॥ ते जय जय जगदंबा। ‘उदो’ म्हणे ग्रंथारंभा। मतीमाजी स्वयंभा। योगगर्भा प्रगटली॥ ७८॥; आतां वंदूं जनार्दनु। जो भवगजपंचाननु। जनीं विजनीं समानु। सदा संपूर्णु समत्वें॥ ७९॥ ज्याचेनि कृपापांगें। देहीं न देखती देहांगें। संसार टवाळ वेगें। केलें वाउगें भवस्वप्न॥ ८०॥ जयाचेनि कृपाकटाक्षें। अलक्ष्य लक्ष्येंवीण लक्षे। साक्षी विसरली साक्षें। निजपक्षें गुरुत्वें॥ ८१॥ तेणें जीवेंवीण जीवविलें। मृत्यूवीण मरणचि मारिलें। दृष्टि घेऊनि दाखविलें। देखणें केलें सर्वांग॥ ८२॥ देहीं देह विदेह केलें। शेखीं विदेहपण तेंही नेलें। नेलेपणही हारपलें। उरीं उरलें उर्वरित॥ ८३॥ अभावो भावेंशीं गेला। संदेह नि:संदेहेंशीं निमाला। विस्मयो विस्मयीं बुडाला। वेडावला स्वानंदु॥ ८४॥ तेथ आवडीं होय भक्तु। तंव देवोचि भक्तपणाआंतु। मग भज्यभजनांचा अंतु। दावी उप्रांतु स्वलीला॥ ८५॥ नमन नमनेंशीं नेलें। नमितें नेणों काय जाहलें। नम्यचि अंगीं घडलें। घडलें मोडलें मोडूनि॥ ८६॥ दृश्य द्रष्टा जाण। दोहींस एकचि मरण। दर्शनही जाहलें क्षीण। देखणेपण गिळूनि॥ ८७॥ आतां देवोचि आघवा। तेथें भक्तु न ये भक्तभावा। तंव देवोही मुकला देवा। देवस्वभावा विसरोनि॥ ८८॥ देवो देवपणें दाटला। भक्तु भक्तपणें आटला। दोहींचाही अंतु आला। अभेद जाहला अनंतु॥ ८९॥ अत्यागु त्यागेंशीं विराला। अभोगु भोगेंशीं उडाला। अयोगु योगेंशीं बुडाला। योग्यतेचा गेला। अहंभावो॥ ९०॥ ऐशियाहीवरी अधिक सोसू। सायुज्यामाजीं होतसे दासू। तेथील सुखाचा सौरसु। अति अविनाशु अगोचरू॥ ९१॥ शिवें शिवूचि यजिजे। हें ऐशिये अवस्थेसि साजे। एऱ्हवीं बोलचि बोलिजे। परि न पविजे निजभजन॥ ९२॥ ये अभिन्न सुखसेवेआंतु। नारद आनंदें नाचत गातु। शुकसनकादिक समस्तु। जाले निजभक्तु येणेंचि सुखें॥ ९३॥ सागरीं भरे भरतें। तें भरतें भरे तरियांतें। तैसें देवेंचि देवपणें येथें। केलें मातें निजभक्त॥ ९४॥ सागर सरिता जीवन एक। परी मिळणीं भजन दिसे अधिक। तैसें एकपणेंचि देख। भजनसुख उल्हासे॥ ९५॥ वाम सव्य दोनी भाग। परी दों नामीं एकचि अंग। तैसा देवभक्तविभाग। देवपणीं साङ्ग आभासे॥ ९६॥ तेवीं आपुलेपणाचेनि मानें। भक्त केलों जनार्दनें। परी कायावाचामनें। वर्तविजे तेणें सर्वार्थीं॥ ९७॥ तो मुखाचें जाला निजमुख। दृष्टीतें प्रकटे सन्मुख। तोचि विवेकेंकरून देख। करवी लेख ग्रंथार्थी॥ ९८॥ परी नवल त्याचें लाघव। अभंगीं घातलें माझें नांव। शेखीं नांवाचा निजभाव। उरावया ठाव नुरवीच॥ ९९॥; या वचनार्था संतोषला। म्हणे भला रे भला भला। निजभाविकु तूंचि संचला। प्रगट केला गुह्यार्थु॥ १००॥
* यापुढें कांहीं प्रतींत पुढील श्लोक आढळतात—
‘‘संतोषंचगुरुंवन्दे परं संवितदायकं।
शांतं सिंहासनारूढमानंदामृतभोगदम्॥ १॥
भक्त्या भागवतं भावमभावं काव्यपाठत:।
पठनात् पदव्युत्पत्तिर्ज्ञानप्राप्तिस्तु भक्तित:॥ २॥
हे स्तुति कीं निरूपण। ग्रंथपीठ कीं ब्रह्मज्ञान। साहित्य कीं समाधान। संज्ञाही जाण कळेना॥ १॥ तुझा बोलुचि एकएकु। सोलींव विवेकाचा विवेकु। तो संतोषासी संतोखु। आत्यंतिकु उपजवी॥ २॥ तुझेनि मुखें जें जें निघे। तें संतहृदयीं साचचि लागे। मुमुक्षुसारंगांचीं पालिंगें। रुंजी निजांगें करितील॥ ३॥ ग्रंथारंभु पडला चोख। मुक्त मुमुक्षु इतर लोक। श्रवणमात्रेंचि देख। निजात्मसुख पावती॥ ४॥ येणें वचनामृततुषारें। ग्रंथभूमिका विवेकांकुरें। अंकुरली एकसरें। फळभारें सफलित॥ ५॥ कीं निर्जीवा जीवु आला। ना तरी सिद्धा सिद्धिलाभु जाला। कीं निजवैभवें आपुला। प्रियो मीनला पतिव्रते॥ ६॥ तैसेनि हरुषानंदें॥ जी जी म्हणितलें स्वानंदें। तुमचेनि पादप्रसादें। करीन विनोदें ग्रंथार्थू॥ ७॥ श्रीरामप्रतापदृष्टीं। शिळा तरती सागरापोटीं। कीं वसिष्ठवचनासाठीं। तपे शाटी रविमंडळीं॥ ८॥ कीं याज्ञवल्कीच्या मंत्राक्षता। शुष्ककाष्ठांस पल्लवता। कीं धर्में श्वानु सरता। केला सर्वथा स्वर्गलोकीं॥ ९॥ तैसे माझेनि नांवें। ग्रंथ होती सुहावे। आज्ञाप्रतापगौरवें। गुरुवैभवें सार्थकु॥ १०॥ घटित एका आणि एकादशें। राशि-नक्षत्र एकचि असे। त्या एकामाजीं जैं पूर्ण दिसे। तैं दशदशांशें चढे अधिक॥ ११॥ मागां पुढां एक एक कीजे। त्या नांव एकादशु म्हणिजे। तरी एका एकपणचि सहजें। आलें निजवोजें ग्रंथार्थें॥ १२॥ तेथें देखणेंचि करूनि देखणें। अवघेंचि निर्धारूनि मनें। त्यावरी एकाजनार्दनें। टीका करणें सार्थक॥ १३॥ पाहोनि दशमाचा प्रांतु। एकादशाच्या उदयाआंतु। एकादशावरी जगन्नाथु। ग्रंथार्थु आरंभी॥ १४॥ म्हणौनि एकादशाची टीका। एकादशीस करी एका। ते एकपणाचिया सुखा। फळेल देखा एकत्वें॥ १५॥; आतां वंदूं महाकवी। व्यास वाल्मीक भार्गवी। जयातें उशना कवी। पुराणगौरवीं बोलिजे॥ १६॥ तिहीं आपुलिये व्युत्पत्ती। वाढवावी माझी मती। हेचि करीतसें विनंती। ग्रंथ समाप्तीं न्यावया॥ १७॥ वंदूं आचार्य शंकरू। जो ग्रंथार्थविवेकचतुरू। सारूनि कर्मठतेचा विचारू। प्रबोधदिनकरू प्रकाशिला॥ १८॥ आतां वंदूं श्रीधर। जो भागवतव्याख्याता सधर। जयाची टीका पाहतां अपार। अर्थ साचार पैं असे॥ १९॥ इतरही टीकाकार। काव्यकर्ते विवेकचतुर। त्यांचे चरणीं नमस्कार। ग्रंथा सादर तिहीं होआवें॥ २०॥ वंदूं प्राकृत कवीश्वर। निवृत्तिप्रमुख ज्ञानेश्वर। नामदेव चांगदेव वटेश्वर। ज्यांचें भाग्य थोर गुरुकृपा॥ २१॥ जयांचे ग्रंथ पाहतां। ज्ञान होय प्राकृतां। तयांचे चरणीं माथा। निजात्मता निजभावें॥ २२॥ संस्कृत ग्रंथकर्ते ते महाकवी। मा प्राकृतीं काय उणीवी। नवीं जुनीं म्हणावीं। कैसेनि केवीं सुवर्णसुमनें॥ २३॥ कपिलेचें म्हणावें क्षीर। मा इतरांचें तें काय नीर। वर्णस्वादें एकचि मधुर। दिसे साचार सारिखें॥ २४॥ जें पाविजे संस्कृत अर्थें। तेंचि लाभे प्राकृतें। तरी न मनावया येथें। विषमचि तें कायी॥ २५॥ कां निरंजनीं बैसला रावो। तरी तोचि सेवकां पावन ठावो। तेथें सेवेसि न वचतां पाहा हो। दंडी रावो निजभृत्यां॥ २६॥ कां दुबळी आणि समर्थ। दोहींस रायें घातले हात। तरी दोघींसिही तेथ। सहजें होत समसाम्य॥ २७॥ देशभाषावैभवें। प्रपंच पदार्थीं पालटलीं नांवें। परी रामकृष्णादिनामां नव्हे। भाषावैभवें पालटु॥ २८॥ संस्कृत वाणी देवें केली। तरी प्राकृत काय चोरापासोनि जाली। असोतु या अभिमानभुली। वृथा बोलीं काय काज॥ २९॥ आतां संस्कृता किंवा प्राकृता। भाषा झाली जे हरिकथा। ते पावनचि तत्त्वता। सत्य सर्वथा मानली॥ ३०॥; वंदूं ‘भानुदास’ आतां। जो कां पितामहाचा पिता। ज्याचेनि वंश भगवंता। झाला सर्वथा प्रियकर॥ ३१॥ जेणें बाळपणीं आकळिला भानु। स्वयें जाहला चिद्भानु। जिंतोनि मानाभिमानु। भगवत्पावनु स्वयें झाला॥ ३२॥ जयाची पदबंधप्राप्ति। पाहों आली श्रीविठ्ठलमूर्ति। कानीं कुंडलें जगज्ज्योति। करितां रातीं देखिला॥ ३३॥ तया भानुदासाचा ‘चक्रपाणि’। तयाचाही सुत सुलक्षणी। तया ‘सूर्य’ नाम ठेवूनी। निजीं निज होऊनि भानुदास ठेला॥ ३४॥ तया सूर्यप्रभाप्रतापकिरणीं। मातें प्रसवली रुक्मिणी। म्हणौनि रखुमाई जननी। आम्हांलागूनि साचचि॥ ३५॥ हे ग्रंथारंभकाळा। वंदिली पूर्वजमाळा। धन्य निजभाग्याची लीळा। आलों वैष्णवकुळा जन्मोनि॥ ३६॥ ते वैष्णवकुळीं कुळनायक। नारद प्रल्हाद सनकादिक। उद्धव अक्रूर श्रीशुक। वसिष्ठादिक निजभक्त॥ ३७॥ ते वैष्णव सकळ। ग्रंथार्थीं अवधानशीळ। म्हणौनि वैष्णवकुळमाळ। वंदिली सकळ ग्रंथार्थीं॥ ३८॥; उजपलों ज्याचिया गोत्रा। नमन त्या विश्वामित्रा। जो कां प्रतिसृष्टीचा धात्रा। गायत्रीमंत्रा महत्त्व॥ ३९॥ जो उपनिषद्विवेकी। तो वंदिला याज्ञवल्की। जो कविकर्तव्यातें पोखी। कृपापीयूखीं वर्षोनि॥ ४०॥ नमन भूतमात्रां अशेखां। तेणें विश्वंभरु जाहला सखा। म्हणौनि ग्रंथारंभु देखा। आला नेटका संमता॥ ४१॥ आतां नमूं दत्तात्रेया। जो कां आचार्यांचा आचार्या। तेणें प्रवर्तविलें ग्रंथकार्या। अर्थवावया निजबोधु॥ ४२॥ तो शब्दातें दावितु। अर्थु अर्थें प्रकाशितु। मग वक्तेपणाची मातु। स्वयें वदवितु यथार्थ॥ ४३॥; तो म्हणे श्रीभागवत। तें भगवंताचें हृद्गत। त्यासीचि होय प्राप्त। ज्याचें निरंतर चित्त भगवंतीं॥ ४४॥ तें हें ज्ञान कल्पादी। ‘चतु:श्लोक’ पदबंधीं। उपदेशिला सद्बुद्धी। निजात्मबोधीं विधाता॥ ४५॥ नवल तयाचा सद्भावो। शब्दमात्रें झाला अनुभवो। बाप सद्गुरुकृपा पहा हो। केला नि:संदेहो परमेष्ठी॥ ४६॥ तो चतु:श्लोकींचा बोधु। गुरुमार्गें आला शुद्धु। तेणें उपदेशिला नारदु। अतिप्रबुद्धु भावार्थी॥ ४७॥ तेणें नारदु निवाला। अवघा अर्थमयचि झाला। पूर्ण परमानंदें धाला। नाचों लागला निजबोधें॥ ४८॥ तो ब्रह्मवीणा वाहतु। ब्रह्मपदें गीतीं गातु। तेणें ब्रह्मानंदें नाचतु। विचरे डुल्लतु भूतळीं॥ ४९॥ तो आला सरस्वतीतीरा। तंव देखिलें व्यासऋषीश्वरा। जो संशयाचिया पूरा। अतिदुर्धरामाजीं पडिला॥ ५०॥ वेदार्थ सकळ पुराण। व्यासें केलें निर्माण। परी तो न पवेचि आपण। निजसमाधान स्वहिताचें॥ ५१॥ तो संशयसमुद्रांआंतु। पडोनि होता बुडतु। तेथें पावला ब्रह्मसुतु। ‘नाभी’ म्हणतु कृपाळू॥ ५२॥ तेणें एकांतीं नेऊनि देख। व्यासासि केलें एकमुख। मग दाविले चाऱ्ही श्लोक। भवमोचक निर्दुष्ट॥ ५३॥ ते सूर्यास्तें न दाखवुनी। गगनातेंही चोरूनी। कानातें परते सारूनी। ठेला उपदेशुनी निजबोधु॥ ५४॥ तें नारदाचें वचन। करीत संशयाचें दहन। तंव व्यासासि समाधान। स्वसुखें पूर्ण हों सरलें॥ ५५॥ मग श्रीव्यासें आपण। भागवत दशलक्षण। शुकासि उपदेशिलें जाण। निजबोधें पूर्ण सार्थक॥ ५६॥ तेणें शुकही सुखावला। परमानंदें निवाला। मग समाधिस्थ राहिला। निश्चळ ठेला निजशांती॥ ५७॥ तेथें स्वभावेंचि जाणा। समाधि आली समाधाना। मग परीक्षितीचिया ब्रह्मज्ञाना। अवचटें जाणा तो आला॥ ५८॥ पहावया परीक्षितीचा अधिकारु। तंव कलीसि केला तेणें मारु। तरी धर्माहूनि दिसे थोरु। अधिकारु पैं याचा॥ ५९॥ कृष्णु असतां धर्म जियाला। पाठीं कलिभेणें तो पळाला। परी हा कलि निग्रहूनि ठेला। धर्माहूनि भला धैर्यें अधिक॥ ६०॥ अर्जुनवीर्यपरंपरा निर्व्यंग। सुभद्रा मातामहीचें गर्भलिंग। तो अधिकाररत्न उपलिंग। ज्यासी रक्षिता श्रीरंग गर्भीं झाला॥ ६१॥ गर्भींच असतां ज्याच्या भेणें। स्पर्शूं न शके शस्त्र द्रौण्य। त्याचा अधिकार पूर्ण। सांगावया कोण समर्थ॥ ६२॥ जेणें रक्षिलें गर्भाप्रती। तया परीक्षी सर्वांभूतीं। यालागीं नांवें परीक्षिती। अगाध स्थिति नांवाची॥ ६३॥ तो अभिमन्यूचा परीक्षिती। उपजला पावन करीत क्षिती। ज्याचेनि भागवताची ख्याती। घातली त्रिजगतीं परमार्थपव्हे॥ ६४॥ अंगीं वैराग्यविवेकु। ब्रह्मालागीं त्यक्तोदकु। तया देखोनि श्रीशुकु। आत्यंतिकु सुखावला॥ ६५॥ बाप कोपु ब्राह्मणाचा। शापें अधिकारु ब्रह्मज्ञानाचा। तयांच्या चरणीं कायावाचा। निजभावाचा नमस्कारु॥ ६६॥ ब्रह्माहूनि ब्राह्मण थोरु। हें मीच काय फार करूं। परी हृदयीं अद्यापि श्रीधरु। चरणालंकारु मिरवितु॥ ६७॥ म्हणोनि ब्रह्माचा देवो ब्राह्मणु। हा सत्यसत्य माझा पणु। यालागीं वेदरूपें नारायणु। उदरा येऊनु वाढला॥ ६८॥ म्हणोनि ब्राह्मण भूदेव। हे ब्रह्मींचे निजावेव। येथें न भजती ते मंददैव। अति निर्दैव अभाग्य॥ ६९॥ ब्राह्मणप्रतापाचा नवलावो। तिहीं आज्ञाधारकु केला देवो। प्रतिमाप्रतिष्ठेसि पहा हो। प्रकटे आविर्भावो मंत्रमात्रें॥ ७०॥ तंव संत म्हणती काय पहावें। जें स्तवनीं रचिसी भावें। तेथें प्रमेय काढिसी नित्य नवें। साहित्यलाघवें साचार॥ ७१॥ गणेशु आणि सरस्वती। बैसविलीं ब्रह्मपंक्ती। तैशीच संतस्तवनीं स्तुती। ऐक्यवृत्ती वदलासी॥ ७२॥ पाठीं कुल आणि कुलदैवता। स्तवनीं वदलासि जे कथा। ते ऐकतांचि चित्त चिंता। विसरे सर्वथा श्रवणेंचि॥ ७३॥ जो सद्भावो संतचरणीं। तोचि भावो ब्राह्मणीं। सुखी केले गुरु स्तवनीं। धन्य वाणी पैं तुझी॥ ७४॥ तरी तुझेनि मुखें श्रीजनार्दन। स्वयें वदताहे आपण। हे बोलतांचि खूण। कळली संपूर्ण आम्हांसी॥ ७५॥ चढत प्रमेयाचें भरतें। तें नावेक आवरोनि चित्तें। पुढील कथानिरूपणातें। करीं निश्चितें आरोहण॥ ७६॥ विसरलों होतों हा भावो। परी भला दिधला आठवो। याचिलागीं सद्भावो। तुमचे चरणीं पहा हो ठेविला॥ ७७॥ उणें देखाल जें जें जेथें। तें तें करावें पुरतें। सज्जनांमाजीं सरतें। करावें मातें ग्रंथार्थसिद्धी॥ ७८॥ ते म्हणती भला रे भला नेटका। बरवी ही आया आली ग्रंथपीठिका। आतां संस्कृतावरी टीका। कविपोषका वदें वहिला॥ ७९॥; याचि बोलावरी माझा भावो। ठेवूनि पावलों पायांचा ठावो। तरी आज्ञेसारिखा प्रस्तावो। करीन पाहा हो कथेचा॥ ८०॥ तरी नैमिषारण्याआंतु। शौनकादिकांप्रति मातु। सूत असे सांगतु। गतकथार्थु अन्वयो॥ ८१॥ मागें दहावे स्कंधीं जाण। कथा जाली नव-लक्षण। आतां मोक्षाचें उपलक्षण। सांगे श्रीकृष्ण एकादशीं॥ ८२॥ जो चिदाकाशींचा पूर्णचंद्र। जो योगज्ञाननरेंद्र। तो बोलता झाला शुक योगींद्र। परिसता नरेंद्र परीक्षिती॥ ८३॥ तंव परीक्षिती म्हणे स्वामी। याचिलागीं त्यक्तोदक मी। तेचि कृपा केली तुम्हीं। तरी धन्य आम्ही निजभाग्यें॥ ८४॥ अगा हे साचार मोक्षकथा। ज्यांसि मोक्षाची अवस्था। तिहीं पाव देऊनि मनाचे माथां। रिघावें सर्वथा श्रवणादरीं॥ ८५॥ भीतरी नेऊनियां कान। कानीं द्यावें निजमन। अवधाना करूनि सावधान। कथानुसंधान धरावें॥ ८६॥ बहुतीं अवतारीं अवतरला देवो। परी या अवतारींचा नवलावो। देवां न कळे अभिप्रावो। अगम्य पहा हो हरिलीला॥ ८७॥ उपजतांचि मायेवेगळा। वाढिन्नला स्वयें स्वलीळा। बाळपणीं मुक्तीचा सोहळा। पूतनादि सकळां निजांगें अर्पी॥ ८८॥ मायेसि दाविलें विश्वरूप। गोवळां दाविलें वैकुंठदीप। परी गोवळेपणाचें रूप। नेदीच अल्प पालटों॥ ८९॥ बाळ बळियांतें मारी। अचाट कृत्यें जगादेखतां करी। परी बाळपणाबाहेरी। तिळभरी नव्हेचि॥ ९०॥ ब्रह्म आणि चोरी करी। देवो आणि व्यभिचारी। पुत्र कलत्र आणि ब्रह्मचारी। हेही परी दाखविली॥ ९१॥ अधर्में वाढविला धर्म। अकर्में तारिलें कर्म। अनेमें नेमिला नेम। अति नि:सीम निर्दुष्ट॥ ९२॥ तेणें संगेंचि सोडिला संगु। भोगें वाढविला योगु। त्यागेंवीण केला त्यागु। अति अव्यंगु निर्दोष॥ ९३॥ कर्मठां होआवया बोधु। कर्मजाडॺाचे तोडिले भेदु। भोगामाजीं मोक्षपदु। दाविलें विशदु प्रकट करूनि॥ ९४॥ भक्ति भुक्ति मुक्ति। तिन्ही केलीं एके पंक्ती। काय वानूं याची ख्याति। खाऊनि माति विश्वरूप दावी॥ ९५॥ त्याचिया परमचरित्रा। तुज सांगेन परमपवित्रा। परी निजबोधाचा खरा। या अवतारीं पुरा पवाडा केला॥ ९६॥; एकादशाच्या तात्पर्यार्थीं। संक्षेपें विस्तरे मुक्ति। बोललीसे आद्यंतीं। परमात्मस्थिति निजबोधें॥ ९७॥ तेथें नारदें वसुदेवाप्रती। संवादूनि निमि-जायंती। सांगितली कथासंगती। ‘संक्षेपस्थिति’ या नाम॥ ९८॥ तेचि उद्धवाची परमप्रीति। नाना दृष्टांतें उपपत्ति। स्वमुखें बोलिला श्रीपति। ते कथा निश्चितीं ‘सविस्तर’॥ ९९॥ दशमीं ‘निरोध’ लक्षण। मागां केलें निरूपण। जेथें धराभार अधर्मजन। निर्दळी श्रीकृष्ण नानायुक्ति॥ २००॥ ज्यांचेनि अधर्मभारें क्षिति। सदा आक्रंदत होती। जिच्या साह्यालागीं श्रीपति। पूर्णब्रह्मस्थिति अवतरला॥ १॥ दुष्ट दैत्य आणि दानव। धराभार राजे सर्व। वधिता झाला श्रीकृष्णदेव। तो गतकथाभाव शुक सांगे॥ २॥
श्रीबादरायणिरुवाच
कृत्वा दैत्यवधं कृष्ण: सरामो यदुभिर्वृत:।
भुवोऽवतारयद्भारं जविष्ठं जनयन्कलिम्॥ १॥
पूर्णब्रह्म स्वयें श्रीकृष्ण। बळी बळिराम लोकरमण। निधडे यादव मेळवूनि जाण। दैत्यनिर्दळण श्रीकृष्णें केलें॥ ३॥ जे यादवांसि न येत वधीं। तेथें श्रीकृष्ण करी बुद्धि। सखे स्वजन स्वगोत्रामधीं। कलह उत्पादी अतिघोर॥ ४॥ उतरावया धराभार। कलहमिसें शारंगधर। मारवी कौरवभार। पांडुकुमर क्षोभवूनि॥ ५॥
ये कोपिता: सुबहु पाण्डुसुता: सपत्नै-
र्दुर्द्यूतहेलनकचग्रहणादिभिस्तान्।
कृत्वा निमित्तमितरेतरत: समेतान्
हत्वा नृपान्निरहरत्क्षितिभारमीश:॥ २॥
दुष्ट अकर्मी अतिघोर। ज्यांची सेना धराभार। ते वधार्थ करावया एकत्र। कलहाचें सूत्र उपजवी कृष्ण॥ ६॥ येणें श्रीकृष्णसंकल्पोद्देशें। हों सरले कपटफांसे। तेणें कपटें बांधून कैसे। वधवी अनायासें कौरवभार॥ ७॥ जगीं द्यूत खेळिजे दुष्टें। तेंही आरंभिलें कपटें। धर्मावरी फांसे खोटे। घालिती हटें दुर्बुद्धि॥ ८॥ बाळेभोळे अज्ञान जनीं। तेही गांजिती ना धर्मपत्नी। ते साचचि धर्माची मानिनी। आणिली बांधोनी सभेमाजीं॥ ९॥ दु:शासनें धरिले वेणीकच। तेणेंचि वाढली कचकच। तें कर्म त्याचें त्यासीच। भंवलें साच त्याभोंवतें॥ १०॥ वनीं कोणी कोणा नागवी। तो नागोवा राजा आणवी। सभेसि राजा उगाणवी। तैं मृत्यूची पदवी मस्तका आली॥ ११॥ अन्यायेंवीण नागवी रावो। तैं धांवणिया धांवे देवो। द्रौपदीवस्त्रहरण पाहा हो। हा मुख्य अन्यावो कौरवां॥ १२॥ अग्निदानें गरदानें। धनदारा अपहारणें। घाला घालूनि मारणें। शस्त्रपाणी होणें वधार्थ॥ १३॥ अवज्ञा आणि हेळण। दुरुक्ती जें धर्मच्छळण। हेंचि निमित्तासी कारण। केलें संपूर्ण श्रीकृष्णें॥ १४॥ पतिव्रतेचें वस्त्रहरण। तेणें तत्काळ पावे मरण। हेंचि कलहाचें कारण। कुळनिर्दळण येणें कर्में॥ १५॥ ऐसा जो धर्माचा विरोधी। त्यासी देवो अवश्य वधी। यालागीं पांडवांचिये बुद्धी। अत्युग्र त्रिशुद्धी उपजवी कोपु॥ १६॥ भूभारहरणचरित्र। सखे-स्वजन-सुहृद-स्वगोत्र। शास्त्रविवेकी अतिपवित्र। त्यांमाजीं विचित्र उपजवी कलहो॥ १७॥ धराभार हरावया गोविंदु। कळवळियाचे सखे बंधु। करविला तेथ गोत्रवधु। साह्य संबंधु राजभारेंसीं॥ १८॥
भूभारराजपृतना यदुभिर्निरस्य
गुप्तै: स्वबाहुभिरचिन्तयदप्रमेय:।
मन्येऽवनेर्ननु गतोऽप्यगतं हि भारं
यद्यादवं कुलमहो ह्यविषह्यमास्ते॥ ३॥
ऐसे पक्षपाती राजे अपार। अमित सेना धराभार। मारविले अधर्मकर। मिषांतर कलहाचें॥ १९॥ पृथ्वीचे अधर्मसेनासंभार। शोधशोधूनि राजे मारिले अपार। तऱ्ही उतरला धराभार। हें शारंगधर न मनीचि॥ २०॥ यादव करून अतुर्बळ। नाना दुष्ट दमिले सकळ। परी यादव झाले अतिप्रबळ। हें न मनीच केवळ श्रीकृष्ण॥ २१॥ नव्हतां यादवांचें निदान। नुतरे धराभार संपूर्ण। ऐसें मानिता झाला श्रीकृष्ण। कुलनिर्दळण तो चिंती॥ २२॥ अग्नि कर्पूर खाऊनि वाढे। कापुरांतीं अग्निही उडे। तैसें यादवांचें अतिगाढें। आलें रोकडें निदान॥ २३॥ केळी फळे तंव वाढे वाढी। फळपाकें माळी झाड तोडी। तैशी यादवकुळाची शीग गाढी। चढे रोकडी मरणार्थ॥ २४॥ फळ परिपाकें परिमळी। तें घेऊन जाय माळी। तैशीं स्वकुळफळें वनमाळी। न्यावया तत्काळीं स्वयें इच्छी॥ २५॥ अनंतबाहुप्रतापें। यादव वाढले श्रीकृष्णकृपें। तोचि निधनाचेनि संकल्पें। काळरूपें क्षोभला॥ २६॥ अतुर्बळ अतिप्रबळ। वाढलें जें यादवकुळ। ते वीर देखोनि सकळ। असह्य केवळ श्रीकृष्णासी॥ २७॥
नैवान्यत: परिभवोऽस्य भवेत् कथञ्चि-
न्मत्संश्रयस्य विभवोन्नहनस्य नित्यम्।
अन्त:कलिं यदुकुलस्य विधाय वेणु-
स्तम्बस्य वह्निमिव शान्तिमुपैमि धाम॥ ४॥
मज गेलिया निजधामा। हेचि प्रवर्तती अधर्मा। श्रियोन्नत अतिगर्व महिमा। मुख्य अकर्मा निजहेतु॥ २८॥ हे मद्बळें अतिप्रबळ। अतिरथी झाले सकळ। यांसि अप्रतिमल्ल दिग्मंडळ। यांतें दमिता केवळ मी एकु॥ २९॥ हे नाटोपती इंद्रादि देवां। दैत्य-राक्षसां कां दानवां। शेखीं निर्दाळावया यादवां। मागुतें मज तेव्हां पडेल येणें॥ ३०॥ तरी आतांचि आपुले दिठी। कुळ बांधूं काळगांठीं। ऐसा विचार जगजेठी। निश्चयें पोटीं दृढ केला॥ ३१॥ यदुवंश-वंशजाळी। वाढली श्रीकृष्णकृपाजळीं। तेथें अवकृपेची इंगळी। ऋषिशापमेळीं कपटें पडली॥ ३२॥ ते मूळी पेटली श्रीकृष्णसंकल्पें। धडाडली ब्रह्मशापें। ते स्वजनविरोधरूपें। काळाग्निकोपें नाशील॥ ३३॥ ऐसें यादवकुळनिर्दळण। करूनियां स्वयें श्रीकृष्ण। निरसूनि निजधामा गमन। स्वलीला आपण करूं इच्छी॥ ३४॥
एवं व्यवसितो राजन्सत्यसंकल्प ईश्वर:।
शापव्याजेन विप्राणां संजह्ने स्वकुलं विभु:॥ ५॥
यापरी आपुलें कुळ। नासूं आदरिलें तत्काळ। हाचि विचारु अढळ। केला समूळ कुळक्षयार्थ॥ ३५॥ हेंचि कार्य होय कैसें। तें विचारिजे जगदीशें। ब्रह्मशापाचेनि मिसें। कुळ अनायासें नासेल॥ ३६॥ इतकें हें जैं सिद्धी जाय। तैं सरलें अवतारकृत कार्य। मग स्वधामा यदुवर्य। जावों पाहे स्वलीला॥ ३७॥ लीलाविग्रही सुंदरपूर्ण। गुणकर्मक्रिया अतिपावन। जगदुद्धारी श्रीकृष्ण। ब्रह्मपरिपूर्ण पूर्णावतार॥ ३८॥
स्वमूर्त्या लोकलावण्यनिर्मुक्त्या लोचनं नृणाम्।
गीर्भिस्ता: स्मरतां चित्तं पदैस्तानीक्षतां क्रिया:॥ ६॥
जो सकळ मंगळां मंगळ पूर्ण। जो कां गोकुळीं कामिनीरमण। मोक्षाचें तारूं स्वयें श्रीकृष्ण। ज्याचें बरवेपण अलौलिक॥ ३९॥ जो भक्तकामकल्पद्रुम। मनोहर मेघश्याम। ज्याचें त्रिलोकीं दाटुगें नाम। स्वयें पुरुषोत्तम शोभतु॥ ४०॥ श्रीकृष्णाचिया सौंदर्यापुढें। लक्ष्मी भुलोनि झाली वेडें। मदन पोटा आलें बापुडें। तेथ कोणीकडे इंद्र चंद्र॥ ४१॥ ज्याचें त्रैलोक्यपावन नाम। जो करी असुरांतें भस्म। तो बोलिजे अवाप्तकाम। भक्तां सुगम सर्वदा॥ ४२॥ त्रिलोकींचें बरवेपण। भुलोनि कृष्णापाशीं आलें जाण। ना कृष्णलेशें बरवेपण। शोभे संपूर्ण तिहीं लोकीं॥ ४३॥ जो सकल सौंदर्याची शोभा। जो लावण्याचा अतिवालभा। ज्याचिया अंगसंगप्रभा। आणिली शोभा जगासी॥ ४४॥ जो हरिखाचा सोलींव हरिख। कीं सुख सुखावतें परमसुख। ज्याचेनि विश्रांतीसि देख। होय आत्यंतिक विसांवा॥ ४५॥ तो अमूर्त मूर्तिधारण। कीं सकललोकलावण्य। शोभा शोभवी श्रीकृष्ण। सौभाग्य संपूर्ण साजिरा॥ ४६॥ घृत थिजलें कीं विघुरलें। परी घृतपणा नाहीं मुकलें। तेवीं अमूर्त मूर्तीं मुसावलें। परी तें संचलें परब्रह्म॥ ४७॥ तयासि देखिलियाचि पुरे। देखादेखीं देखणेंचि सरे। पहाणें पाहातेनिसीं माघारें। लाजोनि वोसरे सलज्ज॥ ४८॥ दृष्टी धाली दे ढेंकर। आपण आपुलें शेजार। होवोनियां परात्पर। सुखावे साचार श्रीकृष्णरूपीं॥ ४९॥ श्रीकृष्णाची चाखिल्या गोडी। रसस्वादु रसना सोडी। जाये चाखणेपणाची आवडी। चाखतें दवडी चाखोनि॥ ५०॥ नवल तेथींचें गोडपण। अमृतही फिकें केलें जाण। यापरी रसना आपण। हरिरसीं संपूर्ण सुखावे॥ ५१॥ लागतां श्रीकृष्णसुवावो। अवघा संसारुचि होय वावो। सेवितां श्रीकृष्णसुगंधवावो। घ्राणासि पहा वो आन नावडे॥ ५२॥ वासु सुवासु सुमन। घ्रेय घ्राता आणि घ्राण। कृष्णमकरंदें जाण। विश्रामा संपूर्ण स्वयें येती॥ ५३॥ जयाचेनि अंगस्पर्शें। देह-देही-देहपण नासे। अंगचि अंगातें कैसें। विसरे आपैसें देहबुद्धि॥ ५४॥ कठिणाचें कठिणपण गेलें। मृदूचें मृदुपणही नेलें। कृष्णस्पर्शें ऐसें केलें। स्पर्शाचें ठेलें स्पर्शत्व॥ ५५॥ तयाचेनि पठणें वाचा। ठावो वाच्यवाचकांचा। नेतिशब्दें पुसोनिसाचा। करी शब्दाचा नि:शब्दु॥ ५६॥ बोलु बोलणेंचि ठेलें। बोलतें नेणों काय झालें। कृष्णशब्दें ऐसें केलें। वाच्यानें नेलें वाचिक॥ ५७॥ चित्त चिंतितांच पाये। चित्तपणा विसरोनि जाये। मग निश्चितपणें पाहे। कृष्णचरणीं राहे निवांत॥ ५८॥ चित्त चिंता चिंतन। तिहींची नुरे आठवण। चिंतितांचि श्रीकृष्णचरण। ब्रह्मपरिपूर्ण निजचित्त॥ ५९॥ नवल तयाचा पदक्रम। पाहतां पारुषे कर्माकर्म। मग कर्म कर्ता क्रियाभ्रम। करी निर्भ्रम पदरजें॥ ६०॥ पहातां पाउलांचा माग। तुटती कर्माकर्मांचे लाग। कर्माचें मुख्य माया अंग। तिचा विभाग उरों नेदी॥ ६१॥ गाईमागिल कृष्णपाउलें। पाहतां कर्म कर्तेनिसीं गेलें। अकर्म म्हणणें नाहीं उरलें। ऐसें कर्मकेलें निष्कर्म॥ ६२॥ जयाचेनि कीर्तिश्रवणें। श्रोता नुरे श्रोतेपणें। वक्ता पारुषे वक्तेपणें। श्रवणें पावणें परब्रह्म॥ ६३॥
आच्छिद्य कीर्तिं सुश्लोकां वितत्य ह्यञ्जसा नु कौ।
तमोऽनया तरिष्यन्तीत्यगात्स्वं पदमीश्वर:॥ ७॥
यापरी उदारकीर्ती। थोर केली अवतारख्याती। जेणें जड जीव उद्धरती। श्रवणें त्रिजगती पावन होये॥ ६४॥ स्वधामा गेलिया चक्रधरु। मागां तरावया संसारु। कृष्णकीर्ति सुगम तारूं। ठेवून श्रीधरु स्वयें गेला॥ ६५॥ नवल त्या तारुवाची स्थिती। बुडवूं नेणे कल्पांतीं। श्रवणें तरले नेणों किती। पुढेंही तरती श्रद्धाळू॥ ६६॥ श्रीकृष्णकीर्तीचें तारूं। घालितां आटे भवसागरु। तेथें कोरडॺा पाउलीं उतारू। श्रवणार्थी नरु स्वयें लाहे॥ ६७॥ जे कृष्णकीर्ति करिती पठण। त्यांच्या संसारासि पडे शून्य। कीर्तिवंत ते अतिपावन। त्यांतें सुरगण वंदिती॥ ६८॥ आदरें पढतां श्रीकृष्णकीर्ति। पायां लागती चारी मुक्ति। त्यांचेनि पावन त्रिजगती। परमनिर्वृत्ति हरिनामें॥ ६९॥ श्रीकृष्णकीर्तिनामाक्षरें। रिघतांचि श्रवणद्वारें। भीतरील तम एकसरें। निघे बाहेरें गजबजोनि॥ ७०॥ तंव कृष्णकीर्तिकथागजरीं। तमासि ठावो नुरेचि बाहेरी। धाकेंचि निमे सपरिवारीं। कृष्णकीर्तिमाझारीं परमानंदु॥ ७१॥ कृष्णकीर्तिप्रतापप्रकाशें। संसार कृष्णमय दिसे। कीर्ति कीर्तिमंताऐसें। दे अनायासें निजसुख॥ ७२॥ जो देखिलिया देखणें सरे। जो चाखिलिया चाखणें पुरे। जो ऐकिलिया ऐकणें वोसरे। जो चिंतितां नुरे चित्तवृत्ति॥ ७३॥ ज्यासि झालिया भेटी। भेटीसी न पडे तुटी। ज्यासि बोलतां गोठी। पडे मिठी परमार्थीं॥ ७४॥ ज्यासि दिधलिया खेंव। खेंवाची पुरे हांव। ज्याचें घेतांचि नांव। नासे सर्व महाभय॥ ७५॥ तो सत्यसंकल्प ईश्वरु। स्वलीला सर्वेश्वरु। स्वपदासि शार्ङ्गधरु। अतिसत्वरु निघाला॥ ७६॥
राजोवाच
ब्रह्मण्यानां वदान्यानां नित्यं वृद्धोपसेविनाम्।
विप्रशाप: कथमभूद् वृष्णीनां कृष्णचेतसाम्॥ ८॥
आदरें पुसे परीक्षिती। यादव विनीत विप्रभक्तीं। त्यांसि शापु घडे कैशिया रीतीं। सांग तें मजप्रती शुकयोगींद्रा॥ ७७॥ यादव दानें अतिउदार। राजे होऊनि परम पवित्र। ब्राह्मणसेवे तत्पर। आज्ञाधर कृष्णाचे॥ ७८॥ यादव सदा कृष्णयोगेंसीं। नित्य साधु यादवांपासीं। तेथेंचि वसे नारदऋषी। शापु यादवांसी घडे कैसा॥ ७९॥ दक्षशाप न बाधी कृष्णापासीं। म्हणौनि नारद वसे द्वारकेसी। तोचि श्रीकृष्ण असतां अंगेंसीं। शापु यादवांसी घडे कैसा॥.८०॥
यन्निमित्त: स वै शापो यादृशो द्विजसत्तम।
कथमेकात्मनां भेद एतत्सर्वं वदस्व मे॥ ९॥
शापासि मूळ मुख्य संतापु। कैसेनि ब्राह्मणां आला कोपु। कोणेपरीचा दिधला शापु। संक्षेपरूपु सांगावा॥ ८१॥ यादव समस्त सखे बंधु। यांसि प्रतिपाळी स्वयें गोविंदु। एकात्मता स्वगोत्रसंबंधु। त्यांमाजीं युद्धभेदु घडे कैसा॥ ८२॥ ‘‘आत्मा वै पुत्रनामासि’’। हे श्रुति प्रमाण सर्वांसी। तेथें शाप बाधी कृष्णात्मजांसी। केवीं आलें यासी सत्यत्व॥ ८३॥ कृष्णसंकल्प कुळनाशन। तोचि ब्रह्मशापासी कारण। यालागीं बाधक जाण। होय संपूर्ण यादवां॥ ८४॥ सृष्टि स्रजी पाळी संहारी। हें कृष्ण संकल्पमात्रें करी। तो यदुकुळनिधान निर्धारी। त्याची अवतारथोरी शुक सांगे॥ ८५॥
श्रीशुक उवाच
बिभ्रद्वपु: सकलसुन्दरसन्निवेशं
कर्माचरन्भुवि सुमङ्गलमाप्तकाम:।
आस्थाय धाम रममाण उदारकीर्ति:
संहर्तुमैच्छत कुलं स्थितकृत्यशेष:॥ १०॥
कर्माणि पुण्यनिवहानि सुमङ्गलानि
गायज्जगत्कलिमलापहराणि कृत्वा।
कालात्मना निवसता यदुदेवगेहे
पिण्डारकं समगमन्मुनयो निसृष्टा:॥ ११॥
रायासी म्हणे श्रीशुकु। कर्ता करविता श्रीकृष्ण एकु। तो शापार्थ आत्यंतिकु। आत्मजां अविवेकु उपजवी स्वयें॥ ८६॥ स्वयें जावया निजधामा। थोर आवडी पुरुषोत्तमा। यालागीं अवशेषकर्मा। मेघश्यामा लवलाहो॥ ८७॥ केव्हां होईल कुलक्षयो। हेंचि मनीं धरी देवो। तो देवाचाचि भावो। शापासि पहा वो दृढ मूळ॥ ८८॥ जो कुलक्षयो चिंती। त्या कृष्णाची सुंदरमूर्ति। शुक सांगे परीक्षितीप्रति। स्वानंदस्थिति उल्हासे॥ ८९॥ सकल सौंदर्या अधिवासु। धरोनि मनोहर नटवेषु। लावण्यकलाविन्यासु। आणी जगदीशु निजांगें॥ ९०॥ नवल सौंदर्या बीक उठी। सर्वांगीं गुंतल्या जनदिठी। कृष्णस्वरूपीं पडे मिठी। होत लुलुबुटी डोळ्ॺां॥ ९१॥ जैशी गुळीं माशीवरी माशी। तेवीं दिठीवरी दिठी कृष्णरूपासी। सर्वांगीं वेढोनि चौपासीं। अहर्निशीं नोसंडिती॥ ९२॥ नयन लांचावले लोभा। दृष्टीसि निघालिया जिभा। यापरी श्रीकृष्णशोभा। स्वानंदगाभा साकार॥ ९३॥ तो श्रीकृष्ण देखिला ज्या दिठीं। ते परतोनि मागुती नुठी। अधिकाधिक घाली मिठी। देखे सकळ सृष्टी श्रीकृष्णु॥ ९४॥ ऐशी डोळ्ॺां आवडी। म्हणौनि कामिनी वरपडी। यालागीं गोपिकां गोडी। अतिगाढी गोविंदीं॥ ९५॥ कृष्ण अतिसुंदर मनोरम। म्हणाल असेल त्यासि विषयधर्म। तरी तो अवाप्तसकळकाम। आत्माराम श्रीकृष्ण॥ ९६॥ कृष्ण अवाप्तसकळकाम। त्यासि कां द्वारका गृहाश्रम। स्त्रिया पुत्र राज्यसंभ्रम। विषयकाम कां भोगी॥ ९७॥ चहूं आश्रमां प्रकाशकु। त्रिलोकीं कृष्ण गृहस्थ एकु। तोचि ब्रह्मचारी नैष्ठिकु। अतिनेटकु संन्यासी॥ ९८॥ कृष्णदेहीं नाहीं दैवबळ। लीलाविग्रही चित्कल्लोळ। त्याचीं सर्व कर्में पावनशीळ। उद्धरी सकळ श्रवणें कथनें॥ ९९॥ कृष्णकर्मांचें करी जो स्मरण। तें कर्म तोडी कर्मबंधन। ऐसें उदार कर्माचरण। आचरला श्रीकृष्ण दीनोद्धरणा॥ ३००॥ श्रीकृष्ण असेल सकाम। म्हणाल यालागीं आचरे कर्म। ज्याचें नाम निर्दळी सर्व काम। तो स्वयें सकाम घडे केवीं॥ १॥ श्रीकृष्णाचा स्मरतां काम। स्वयें संन्यासी होती निष्काम। सकामाचा निर्दळे काम। ऐसें उदार कर्म आचरला॥ २॥ तेणें अवाप्तसकळकामें। ऐशीं आचरला अगाध कर्में। मानव तारावया मनोधर्में। कीर्ति मेघश्यामें विस्तारिली॥ ३॥ कैसें कर्म सुमंगळु। कानीं पडतांचि अळुमाळु। नासोनियां कर्ममळु। जाती तात्काळु श्रवणादरें॥ ४॥ श्रवणें उपजे सद्भावो। सद्भावें प्रकटे देवो। तेणें निर्दळे अहंभावो। ऐशी उदार पहा वो हरिकीर्ति॥ ५॥ श्रीकृष्णकीर्तीचें स्मरण। कां करितां श्रवणपठण। मागें उद्धरले बहुसाल जन। पुढें भविष्यमाण उद्धरती॥ ६॥ जरी केलिया होती पुण्यराशी। तरी अवधान होये हरिकथेसी। येऱ्हवीं ऐकतां येरांसी। लागे अनायासीं अतिनिद्रा॥ ७॥ जे हरिकथेसी सादर। त्यांच्या पुण्या नाहीं पार। कृष्णें सुगमोपाव केला थोर। दीनोद्धार हरिकीर्तनें॥ ८॥ कृष्णकीर्तनें गर्जतां गोठी। लाजिल्या प्रायश्चित्तांचिया कोटी। उतरल्या तीर्थांचिया उटी। नामासाठीं निजमोक्षु॥ ९॥ ऐसा निजकीर्तिउदारु। पूर्णब्रह्म सारंगधरु। लीलाविग्रही सर्वेश्वरु। पूर्णावतारु यदुवंशी॥ १०॥ उतरला धराभार येथ। सत्य न मनी श्रीकृष्णनाथ। यादव उरले अतिअद्भुत। तेही समस्त निर्दळावे॥ ११॥ ये अवतारीं हृषीकेशी। म्हणे हेंच कृत्य उरलें आम्हांसी। निर्दळोनि निजवंशासी। निजधामासी निघावें॥ १२॥ तो यादवांमाजीं माधव। कालात्मा देवाधिदेव। जाणोनि भविष्याचा भाव। काय अपूर्व करिता झाला॥ १३॥ नारदादि मुनिगण। त्यांसि पाचारूनि आपण। करूं सांगे शीघ्र गमन। स्वयें श्रीकृष्ण साक्षेपें॥ १४॥ ज्यांपासूनि संत दूरी गेले। तेथें अनर्थाचें केलें चाले। हें यादवनिधनालागीं वहिलें। लाघव केलें श्रीकृष्णें॥ १५॥ भक्त संत साधु ज्यापासीं। तेथें रिघु नाहीं अनर्थासी। जाणे हें स्वयें हृषीकेशी। येरां कोणासी कळेना॥ १६॥ जेथें संतांचा समुदावो। तेथें जन्ममरणां अभावो। हा श्रीकृष्णचि जाणे भावो। तो करी उपावो ब्रह्मशापार्थ॥ १७॥ जेथूनि संत गेले दुरी। तेथें सद्यचि अनर्थु वाजे शिरीं। हें जाणोनियां श्रीहरी। द्वारकेबाहेरी ऋषि घाली॥ १८॥ ऋषि जात होते स्वाश्रमासी। त्यांतें लाघवी हृषीकेशी। तीर्थमिषें समस्तांसी। पिंडारकासी स्वयें धाडी॥ १९॥ पिंडारका मुनिगण। श्रीकृष्णें धाडिले कोण कोण। ज्यांचे करितांचि स्मरण। कळिकाळ आपण भयें कांपे॥ २०॥
विश्वामित्रोऽसित: कण्वो दुर्वासा भृगुरङ्गिरा:।
कश्यपो वामदेवोऽत्रिर्वसिष्ठो नारदादय:॥ १२॥
जे तपस्तेजें देदीप्यमान। जे पूर्णज्ञानें ज्ञानघन। ज्यातें सदा वंदी श्रीकृष्ण। ते ऋषीश्वर जाण निघाले॥ २१॥ जे गायत्रीमंत्रासाठीं। करूं शके प्रतिसृष्टी। जो विश्वामित्र महाहटी। तोही उठाउठीं निघाला॥ २२॥ जेथ न बाधी उष्णशीत। ते आश्रमीं वसे असित। ज्याचेनि नामें द्वंद्वें पळत। तोही त्वरित निघाला॥ २३॥ जो सूर्यासि रिघोनि शरण। अश्वाचे कर्णीं बैसोन आपण। पूर्ण केलें वेदपठण। तो कण्वही जाण निघाला॥ २४॥ जो दुर्वास अत्याहारी। आहार सेवूनि निराहारी। तोही द्वारकेबाहेरी। त्वरेंकरूनि निघाला॥ २५॥ भृगूचा श्रीचरण। हृदयीं वाहे नारायण। मिरवी श्रीवत्स भूषण। तो भृगुही जाण निघाला॥ २६॥ अंगिरा स्वयें सद्बुद्धि सृष्टीं। बृहस्पति जन्मला ज्याचे पोटीं। जो परमगुरु देवांच्या मुकुटीं। तोही उठी गमनार्थ॥ २७॥ कश्यपाची नवलगोठी। सुर नर किन्नर जन्मले पोटीं। यालागीं हे काश्यपी सृष्टी। तोही कश्यपु उठी निजगमनीं॥ २८॥ मुक्तांमाजीं श्रेष्ठ भावो। वेदीं वाखाणिला वामदेवो। तोही द्वारकेहूनि पहा हो। स्वयमेवो निघाला॥ २९॥ अत्रीची नवल परी। तीनी देव जन्मले उदरीं। श्रीदत्त वंदिजे योगेश्वरीं। हे अगाध थोरी अनसूयेची॥ ३०॥ तो स्वयें अत्रि ऋषीश्वर। श्रीकृष्णआज्ञातत्पर। पिंडारका अतिसत्वर। प्रयाण शीघ्र तेणे केलें॥ ३१॥ जो श्रीरामाचा सद्गुरु। ब्रह्मज्ञानें अतिउदारु। ज्याचे शाटीचा प्रताप थोरु। जिंकिला दिनकरु तपस्तेजें॥ ३२॥ ऐसा जो वसिष्ठ महामुनी। तोही कृष्णसंज्ञा मानुनी। निघाला द्वारकेहुनी। शीघ्र गमनीं पिंडारका॥ ३३॥ आणि देवर्षि नारदु। त्याचाही अगाध बोधु। ज्यासि सर्वदा परमानंदु। अति आल्हादु हरिकीर्तनीं॥ ३४॥ ब्रह्मवीणा स्वयें वातु। ब्रह्मपदें गीत गातु। ब्रह्मानंदें नाचतु। निघे डुल्लतु पिंडारका॥ ३५॥ इत्यादि हे मुनिवरु। श्रेष्ठ श्रेष्ठ ऋषीश्वरु। शिष्यसमुदायें सहपरिवारु। मीनले अपारु पिंडारकीं॥ ३६॥ एवं पिंडारकीं ऋषि सर्व। शापानुग्रही महानुभाव। मीनले कृष्णवैभव। अतिअपूर्व वर्णिती॥ ३७॥ बाप लाघवी वनमाळी। कुलक्षयो घडावया तत्काळीं। कुमरीं ऋषीश्वरांसि रांडोळी। कपटमेळीं मांडिली॥ ३८॥ निंदा अवज्ञा हेळण। करितां ब्राह्मणांसि छळण। जेथ ब्रह्मद्वेष वाढे पूर्ण। कुळक्षयो जाण ते ठायीं॥ ३९॥ ब्राह्मणांच्या कोपापुढें। कुळ कायसें बापुडें। महादेवाचें लिंग झडे। इंद्रपदवी पडे समुद्रीं॥ ४०॥ तो समुद्रही केला क्षार। ऐसा द्विजकोप अतिदुर्धर। हें एकएकाचें चरित्र। ते ऋषि समग्र मीनले तेथें॥ ४१॥ धरातळीं ब्रह्म ब्राह्मण। त्यांचें वचन परम प्रमाण। हें सत्य करावया श्रीकृष्ण। कुळनिर्दळण स्वयें दावी॥ ४२॥
क्रीडन्तस्तानुपव्रज्य कुमारा यदुनन्दना:।
उपसंगृह्य पप्रच्छुरविनीता विनीतवत्॥ १३॥
यदुनंदन समस्त। क्रीडाकंदुक झेलित। एकमेकांतें हाणित। ठकवून पळत परस्परें॥ ४३॥ ऐसा नाना क्रीडाविहार। करीत आले यदुकुमार। अंगीं श्रीमद अपार। औद्धत्यें थोर उन्मत्त॥ ४४॥ अतीत-अनागत-ज्ञानवंत। ऋषीश्वर मीनले समस्त। ज्यांचें वचन यथार्थभूत। त्यांसिही निश्चित ठकूं आम्ही॥ ४५॥ जैं अघडतें येऊनि पडे। तैं यांचें वचन कैसें घडे। म्हणोनि ऋषीश्वरांपुढें। मांडिलेंकुडें यदुकुमरीं॥ ४६॥
ते वेषयित्वा स्त्रीवेषै: साम्बं जाम्बवतीसुतम्।
एषा पृच्छति वो विप्रा अन्तर्वत्न्यसितेक्षणा॥ १४॥
पहिलेच श्रीमदें उद्धट। त्यावरी मांडिलें कपट। सांबास देऊनि स्त्रीनट। अतिवरिष्ठ बाणला॥ ४७॥ तो श्यामसुंदर डोळसु। अंगा शोभला स्त्रीवेषु। प्रमदावैभवविलासु। दावी विन्यासु सलज्ज॥ ४८॥ नयनीं सोगयाचें काजळ। व्यंकट कटाक्षु अतिचपल। सुंदर सुकुमार वेल्हाळ। चाले निश्चळ हंसगती॥ ४९॥ वस्त्रें बांधोनियां उदर। नावेक केलें थोर। तेणें ते गरोदर। दिसे साचार इतरांसी॥ ५०॥ हात घालूनि सखियांच्या खांदीं। चालतां उदर हालों नेदी। विसांवा घेत पदोपदीं। येतां ऋषिवृंदीं देखिली॥ ५१॥ ऐसा स्त्रीवेष दाखवूनि। नावेक अंतरें राहोनि। इतर ऋषींजवळी येऊनि। लोटांगणें घालिती॥ ५२॥ पूर्वश्लोकींचा श्लोकार्थ तेथ। व्याख्यान नव्हेच समस्त। यालागीं तेंचि येथ। वाखाणिजेत कथान्वयें॥ ५३॥ छळाचेनि मिषें जाणा। ऋषींसि करिती प्रदक्षिणा। अत्यादरें लागती चरणा। म्हणती दर्शना आम्ही आलों॥ ५४॥ ऐसे यदुकुमार समस्त। अविनीत परी विनीतवत। कर जोडोनि राहिले तेथ। मृदु विनवीत मुनीश्वरां॥ ५५॥ स्वामी पैल हे जे सुंदर। तुमच्या वचनीं भावार्थ थोर। आसन्नप्रसव गरोदर। स्वयें सुकुमार पुसों लाजे॥ ५६॥
प्रष्टुं विलज्जती साक्षात्प्रबूतामोघदर्शना:।
प्रसोष्यन्ती पुत्रकामा किंस्वित्सञ्जनयिष्यति॥ १५॥
स्वयें येऊन तुम्हांप्रती। तिचेनि न बोलवे निश्चितीं। यालागीं आम्हांहातीं। सेवेसि विनंती करविली॥ ५७॥ तुम्ही सत्यदर्शी साचार। अमोघवीर्य तुमचें उत्तर। शिरीं वंदिती हरिहर। ज्ञानें उदार तुम्ही सर्व॥ ५८॥ यालागीं हे गर्भवती। सादरें असे पुसती। पुत्रकाम असे वांछिती। काय निश्चितीं प्रसवेल॥ ५९॥ ऐसे कपटाचेनि वालभें। विनीत कर जोडूनि उभे। तैशींच फलें भावगर्भें। छळणलोभें पावती॥ ६०॥ कर्म जाणोनियां कुडें। नारदु नाचे ऋषींपुढें। मुनि म्हणे यादवांचें गाढें। निधन रोकडें वोढवलें॥ ६१॥ मुंगिये निघालिया पांख। तिसी मरण ये अचूक। तेवीं ब्राह्मणछळणें देख। आवश्यक कुळनाश॥ ६२॥ शापीत आलिया द्विजजन। त्यांसि सद्भावें करावें नमन। मारूं आलिया ब्राह्मण। मस्तक आपण वोढवावें॥ ६३॥ त्या ब्राह्मणांसि छळण। तें जाणावें विषभक्षण। विषें निमे भक्षित्याचा प्राण। कुळनिर्दळण द्विजछळणें॥ ६४॥ अविद्य सुविद्य न म्हणतां जाण। धरातळीं ब्रह्म ब्राह्मण। त्याचें करूं जातां छळण। कुळनिर्दळण आवश्यक॥ ६५॥
एवं प्रलब्धा मुनयस्तानूचु: कुपिता नृप।
जनयिष्यति वो मन्दा मुसलं कुलनाशनम्॥ १६॥
ऐकें परीक्षिति नृपवरा। यापरी यादवकुमरां। निधनाचा भरला वारा। तेणें ते ऋषीश्वरां छळूं गेले॥ ६६॥ कपट जाणोनियां साचार। थोर कोपले ऋषीश्वर। मग तिंहीं काय वाग्वज्र। अतिअनिवार सोडिलें॥ ६७॥ अरे हे प्रसवेल जें बाळ। तें होईल सकळकुळा काळ। निखळ लोहाचें मुसळ। देखाल सकळ मंदभाग्यें॥ ६८॥
तच्छ्रुत्वा तेऽतिसंत्रस्ता विमुच्य सहसोदरम्।
साम्बस्य ददृशुस्तस्मिन्मुसलं खल्वयस्मयम्॥ १७॥
ऐकूनि शापाचें उत्तर। भयभीत झाले कुमर। सोडूनि सांबाचें उदर। अतिसत्वर पाहती॥ ६९॥ तंव ते लोहमय मुसळ। देखते झाले तत्काळ। मग भयभीत विव्हळ। एकाएकीं सकळ दचकोनि ठेले॥ ७०॥ नासावें यादवकुळ। ऐसा श्रीकृष्णसंकल्प सबळ। तोचि झाला लोहाचें मुसळ। जाण तात्काळ ऋषिवाक्यें॥ ७१॥ जें जें ब्राह्मणाचें वचन। तें तें अन्यथा हों नेदी श्रीकृष्ण। ब्राह्मणाचें जें वदे वदन। तें श्रीकृष्ण स्वयें सत्यत्वा आणी॥ ७२॥ देखोनि ऋषीश्वरांचा कोप। ऐकोनि कुलक्षयाचा शाप। यदुकुमरां अतिसंताप। भयें कंप सूटला॥ ७३॥
किं कृतं मन्दभाग्यैर्न: किं वदिष्यन्ति नो जना:।
इति विह्वलिता गेहानादाय मुसलं ययु:॥ १८॥
आम्ही मंदभाग्यें करंटे। ऋषीश्वरु कोपविले शठें। निजघाता झालों पैठे। कुळक्षयो कपटें जोडिला आम्हीं॥ ७४॥ काय म्हणती नगरजन। कां छळूं गेले हे ब्राह्मण। चिंताक्रांत म्लानवदन। मुसळ घेऊन घरा आले॥ ७५॥
तच्चोपनीय सदसि परिम्लानमुखश्रिय:।
राज्ञ आवेदयाञ्चक्रु: सर्वयादवसन्निधौ॥ १९॥
सभेसि वसुदेव उग्रसेन। बळराम आणि अनिरुद्ध प्रद्युम्न। यादव बैसले संपूर्ण। एकला श्रीकृष्ण तेथ नाहीं॥ ७६॥ सभे सांबादि आले सकळ। पुढां ठेवूनि लोहमुसळ। शापु सांगितला समूळ। मुखकमळ अतिम्लान॥ ७७॥
श्रुत्वामोघं विप्रशापं दृष्ट्वा च मुसलं नृप।
विस्मिता भयसन्त्रस्ता बभूवुर्द्वारकौकस:॥ २०॥
ऐकून द्विजांचा परम कोपु। यादवां सुटला भयकंपु। मिथ्या नव्हे ब्रह्मशापु। भयें संतापु सर्वांसी॥ ७८॥ प्रत्यक्ष देखोनि मुसळ। थोर सुटली खळबळ। नगरनागरिकां हलकल्लोळ। यादवकुळ उरे कैसेनी॥ ७९॥ ऐक राया परीक्षिती। सबळ भविष्याची गती। वृत्तांतु श्रीकृष्णा न सांगती। विचार आपमतीं तिंहीं केला॥ ८०॥
तच्चूर्णयित्वा मुसलं यदुराज: स आहुक:।
समुद्रसलिले प्रास्यल्लोहं चास्यावशेषितम्॥ २१॥
आहुक राजा उग्रसेन। तेणें लावूनि लोहघण। मुसळ करोनियां चूर्ण। समुद्रीं जाण घालविलें॥ ८१॥ त्या मुसळाचा मध्यकवळ। चूर्ण नव्हेच अतिप्रबळ। उरला वज्रप्राय केवळ। तो समुद्रीं तत्काळ झुगारिला॥ ८२॥
कश्चिन्मत्स्योऽग्रसील्लोहं चूर्णानि तरलैस्तत:।
उह्यमानानि वेलायां लग्नान्यासन्किलैरका:॥ २२॥
मत्स्यो गृहीतो मत्स्यघ्नैर्जालेनान्यै: सहार्णवे।
तस्योदरगतं लोहं स शल्ये लुब्धकोऽकरोत्॥ २३॥
समुद्रलाटांचे कल्लोळ। तेणें तें लोहचूर्ण सकळ। प्रभासीं लागोनि प्रबळ। उठिलें तत्काळ येरिकारूपें॥ ८३॥ लोहकवळु मीन गिळी। त्या मीनातें समुद्रजळीं। अन्यत्र मत्स्यसहित जाळीं। मत्स्यघ्न आकळी निजलाघवें॥ ८४॥ तो मत्स्य मत्स्यघ्न विदारी। तंव लोह निघे त्याचे उदरीं। देखोनि हरिखला तो भारी। हें आंतुडे करीं तो सभाग्य॥ ८५॥ मत्स्योदरींचें लोह जाण। त्याचें अचूक संधान। अगाध पारधी साधे पूर्ण। यालागीं तो बाण लुब्धकें केला॥ ८६॥
भगवाञ्ज्ञातसर्वार्थ ईश्वरोऽपि तदन्यथा।
कर्तुं नैच्छद्विप्रशापं कालरूप्यन्वमोदत॥ २४॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायामेकादशस्कन्धे प्रथमोऽध्याय:॥ १॥
कोणी न सांगतां हें पेखणें। जाणितलें सर्वज्ञें श्रीकृष्णें। परी द्विजशापु अन्यथा करणें। हें निजमनें स्पर्शेना॥ ८७॥ म्हणाल हें नव्हेल त्यासी। पालटवेना द्विजशापासी। जो निमाल्या आणी गुरुपुत्रासी। कृष्ण कळिकाळासी नियंता॥ ८८॥ पाडूनि कळिकाळाचे दांत। देवकीचे गतगर्भ आणीत। ईश्वरा ईश्वरु श्रीकृष्णनाथ। जाणे सर्वार्थनिजसिद्धी॥ ८९॥ निद्रा न मोडितां तिळभरी। मथुरा आणिली द्वारकेभीतरी। श्रीकृष्ण काय एक न करी। तोही ममता न धरी कुळाची॥ ९०॥ निजकुळक्षयो जऱ्ही आला। तऱ्ही अन्यथा न करी ब्राह्मणबोला। ब्राह्मणें पांपरा जरी हाणितला। तो हृदयीं धरिला पदांकु॥ ९१॥ तेंचि श्रीवत्सलांछन। सकळ भूषणां भूषण। हृदयीं मिरवी श्रीकृष्ण। यालागीं पूर्ण ब्रह्मण्यदेवो॥ ९२॥ श्रीकृष्ण शिरीं वंदी ब्राह्मण। अन्यथा न करी ब्राह्मणवचन। यालागीं ‘ब्रह्मण्यदेवो’ पूर्ण। वेद बंदीजन वर्णिती॥ ९३॥ ब्राह्मणरूप स्वयें श्रीहरी। यालागीं ब्राह्मणांचा कैवारी। कुळक्षयो जाहला जरी। तरी द्विजांवरी क्षोभेना॥ ९४॥ ऐकोनि ब्राह्मणांचा शापु। न धरी मोहाचा खटाटोपु। म्हणे सिद्धी गेला कृतसंकल्पु। कुलक्षयानुरूपु संतोषे॥ ९५॥ यापरी श्रीगोविंदु। काळरूपी मानी आनंदु। कुळक्षयाचा क्षितिबाधु। अल्पही संबंधु धरीना॥ ९६॥ पूर्ण संतोष श्रीकृष्णनाथा। पुढील अध्यायीं ज्ञानकथा। अतिरसाळ स्वानंदता। अवधान श्रोतां मज द्यावें॥ ९७॥ जेथें नारद आणि वसुदेवा। संवाद होईल सुहावा। जनक आणि आर्षभदेवां। प्रश्नोत्तरीं जीवा स्वानंदु दाटे॥ ९८॥ हे रसाळ ब्रह्मज्ञानमातु। चाखवीन निजपरमार्थु। एका जनार्दना विनवितु। श्रोते कृपा करितु अर्थावबोधें॥ ९९॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे एकादशस्कंधे परमहंससंहितायां एकाकारटीकायां विप्रशापो नाम प्रथमोऽध्याय:॥ १॥ श्रीकृष्णार्पणमस्तु॥ मूळश्लोक॥ २४॥ ओव्या॥ ९९॥
॥ श्री: ॐ तत्सत्-श्रीकृष्ण प्रसन्न॥
अध्याय दुसरा
श्रीगणेशाय नम:॥ श्रीगोपालकृष्णाय नम:॥ जय जय देवाधिदेवा। भोगिसी गुरुत्वें सुहावा। विश्वीं विश्वात्मा ये सद्भावा। तूं कृपेनें जेव्हां अवलोकिसी॥ १॥ ते विश्वीं जो विश्ववासी। त्यातेंविश्वासी म्हणसी। तेणें विश्वासें प्रसन्न होसी। तैं पायांपाशीं प्रवेशु॥ २॥ त्या चरणारविंदकृपादृष्टी। अहं सोहं सुटल्या गांठी। एकसरें तुझ्या पोटीं। उठाउठी प्रवेशलों॥ ३॥ यालागीं तूं निजात्ममाये। या हेतू जंव पाहों जायें। तंव बापपण तुजमाजीं आहे। अभिनव काये सांगावें॥ ४॥ येथ मातापिता दोनी। वेगळीं असती जनीं। ते दोनी एक करोनी। एका जनार्दनीं निजतान्हें॥ ५॥ आतां उभयस्नेहें स्नेहाळा। वाढविसी मज बाळा। परी नित्य नवा सोहळा। संभ्रम आगळा निजबोधाचा॥ ६॥ शिव शक्ति गणेशु। विश्व विष्णु चंडांशु। ऐसा अलंकार बहुवसु। निजविलासु लेवविशी॥ ७॥ यापरी मज निजबाळा। लेणीं लेवविशी स्वलीळा। आणि लेइलेपणाचा सोहळा। पहाशी वेळोवेळां कृपादृष्टीं॥ ८॥ बाळका लेवविजे लेणें। तयाचें सुख तें काय जाणे। तो सोहळा मातेनें भोगणें। तेवीं जनार्दनें भोगिजे सुख॥ ९॥ आपुल्या चिद्रत्नांच्या गांठी। आवडी घालिशी माझ्या कंठीं। यालागीं मज पाठोवाठीं। निजात्मदृष्टीं सवें धांवे॥ १०॥ समर्थ जयाचा जनकु। त्यास मानिती सकळ लोकु। एका जनार्दनीं एकु। अमान्य अधिकु मान्य कीजे॥ ११॥ बाळक स्वयें बोलों नेणे। त्यासी माता शिकवी वचनें। तैशीं ग्रंथकथाकथनें। स्वयें जनार्दनें बोलविजे॥ १२॥ तेणें नवल केलें येथ। मूर्खाहातीं श्रीभागवत। शेखीं बोलविलें प्राकृत। एकादशार्थ देशभाषा॥ १३॥ परिसोनि प्रथम अध्यावो। उगाचि राहिला कुरुरावो। पुढें कथाकथनीं ठावो। कांहीं अभिप्रावो दिसेना॥ १४॥ आपण करावा प्रश्न। तंव हा सांगेल कृष्णनिधन। यालागीं राजा मौन। ठेला धरून निवांत॥ १५॥ जाणोनि त्याचा अभिप्रावो। बोलत जाहला शुकदेवो। तो म्हणे मोक्षाचा प्रस्तावो। तो हा अध्यावो परीक्षिति॥ १६॥ हा एकादश अलोकिक। श्लोकाहून श्लोक अधिक। पदोपदीं मुक्तिसुख। लगटलें देख निजसाधकां॥ १७॥ ऐसें ऐकतांचि वचन। राजा जाहला सावधान। मुक्तिसुखीं आवडी गहन। अवधानें कान सर्वांग केले॥ १८॥ ऐसें देखोन परीक्षिती। शुक सुखावे अत्यंत चित्तीं। तो म्हणे अवधानमूर्ती। ऐक निश्चितीं गुह्य ज्ञान॥ १९॥ द्वितीयाध्यायीं निरूपण। नारद-वसुदेवसंवाद जाण। निमिजायंतांचे प्रश्न। मुख्य लक्षण भागवतधर्म॥ २०॥
श्रीशुक उवाच
गोविन्दभुजगुप्तायां द्वारवत्यां कुरूद्वह।
अवात्सीन्नारदोऽभीक्ष्णं कृष्णोपासनलालस:॥ १॥
जो मुक्तांमाजीं अग्रणी। जो ब्रह्मचारियां शिरोमणी। योगी वंदिती मुकुटस्थानीं। जो भक्तमंडणीं अतिश्रेष्ठ॥ २१॥ जो ब्रह्मरसाचा समुद्र। जो निजबोधाचा पूर्णचंद्र। तो बोलता झाला शुक योगींद्र। श्रोता नरेंद्र कुरुवंशीचा॥ २२॥ तो म्हणे व्यासाचा जो निजगुरु। आणि माझाही परमगुरु। नारद महामुनीश्वरु। त्यासी अतिआदरु श्रीकृष्णभजनीं॥ २३॥ द्वारकेहूनि स्वयें श्रीकृष्ण। पिंडारका पाठवी मुनिगण। तेथूनि नारद आपण। द्वारकेसी जाण पुन: पुन: येतु॥ २४॥ हो कां जे द्वारकेआंत। न रिघे भय काळकृत। जेथ स्वयें श्रीकृष्णनाथ। असे नांदत निजसामर्थ्यें॥ २५॥ दक्षशापु नारदासी पाहीं। मुहूर्त राहों नये एके ठायीं। तो शापु हरिकीर्तनीं नाहीं। यालागीं तो पाहीं कीर्तननिष्ठु॥ २६॥ ज्याची गाइजे कीर्तनीं कीर्ती। तो द्वारकेसी वसे स्वयें श्रीपती। तेथें शापबाधेची न चले प्राप्ती। यालागीं नित्यवस्ती नारदासि तेथें॥ २७॥ नारदासी पूर्ण ब्रह्मज्ञान। त्यासी कां कृष्णमूर्तीचें ध्यान। श्रीकृष्णदेहो चैतन्यघन। यालागीं श्रीकृष्णभजन नारदा पढियें॥ २८॥ यापरी कृष्णभजन। मुक्तांसी पढियें पूर्ण। त्यासी न भजे अभागी कोण। तेंचि निरूपण शुक सांगे॥ २९॥
को नु राजन्निन्द्रियवान्मुकुन्दचरणाम्बुजम्।
न भजेत्सर्वतोमृत्युरुपास्यममरोत्तमै:॥ २॥
ऐकें बापा नृपवर्या। येऊनि उत्तमा देहा या। जो न भजे श्रीकृष्णराया। तो गिळिला माया अति-दु:खें॥ ३०॥ ज्या भगवंतालागुनी। माथा धरूनि पायवणी। सदाशिव बैसला आत्मध्यानीं। महाश्मशानीं निजवस्ती॥ ३१॥ पोटा आला चतुरानन। इतरांचा पाडु तो कोण। देहा येवोनि नारायण। न भजे तो पूर्ण मृत्युग्रस्त॥ ३२॥ त्यजूनि परमात्मा पूर्ण। नाना साधनें शिणती जन। त्यासी सर्वथा दृढबंधन। न चुके जाण अनिवार॥ ३३॥ सांडूनि श्रीकृष्णचरण। इंद्रादि देवांचें करितां भजन। ते देव मृत्युग्रस्त पूर्ण। मा भजत्याचें मरण कोण वारी॥ ३४॥ असोनि इंद्रियपाटव पूर्ण। जो न भजे श्रीकृष्णचरण। त्यासी सर्वत्र बाधी मरण। क्षणक्षण निर्दाळी॥ ३५॥ तो नारद महामुनीश्वरु। मुक्त होऊनि भजनतत्परु। द्वारके वसे निरंतरु। श्रीकृष्णीं थोरु अतिप्रीति तया॥ ३६॥
तमेकदा तु देवर्षिं वसुदेवो गृहागतम्।
अर्चितं सुखमासीनमभिवाद्येदमब्रवीत्॥ ३॥
धन्य धन्य तो नारदु। ज्यासी सर्वीं सर्वत्र गोविंदु। सर्वदा हरिनामाचा छंदु। तेणें परमानंदु सदोदित॥ ३७॥ जो श्रीकृष्णाचा आवडता। ज्यासी श्रीकृष्ण आवडे सर्वथा। ज्याचेनि संगें तत्त्वतां। नित्यमुक्तता जडजीवां॥ ३८॥ तो नारदु एके वेळां। स्वानंदाचिया स्वलीळा। आला वसुदेवाचिया राउळा। तेणें देखोनि डोळां हरिखला॥ ३९॥ केलें साष्टांग नमन। बैसों घातलें वरासन। ब्रह्मसद्भावें पूजन। श्रद्धासंपूर्ण मांडिलें॥ ४०॥ नारद तोचि नारायण। येणें विश्वासेंकरूनि जाण। हेमपात्रीं चरणक्षाळण। मधुपर्कविधिपूर्ण पूजा केली॥ ४१॥ पूजा करोनि सावधानीं। वसुदेव बैसोनी सुखासनीं। हृदयीं अत्यंत सुखावोनी। काय आल्हादोनी बोलत॥ ४२॥
वसुदेव उवाच
भगवन्भवतो यात्रा स्वस्तये सर्वदेहिनाम्।
कृपणानां यथा पित्रोरुत्तमश्लोकवर्त्मनाम्॥ ४॥
स्वलीला कृपा केली तुम्हीं। तेणें परम सभाग्य जाहलों जी मी। तुमचेनि आगमनें आम्ही। कृतकृत्य स्वामी सन्निधिमात्रें॥ ४३॥ चुकलिया निजजननी। बाळक दीन दिसे जनीं। त्यासी मातेच्या आगमनीं। संतोष मनीं निर्भर॥ ४४॥ त्याहूनि श्रेष्ठ तुमची यात्रा। नित्य सुखदाती भूतमात्रां। स्वलीला तुम्ही मही विचरां। दीनोद्धारालागुनी॥ ४५॥ मातेच्या आगमनीं निजबाळा। दृष्टिउत्संगीं नित्य नवा सोहळा। तुमची यात्रा दीनां सकळां। भोगवी स्वलीळा निजात्मसुख॥ ४६॥ माता सुख दे तें नश्वर। तुमच्या आगमनीं अनश्वर। नित्य चित्सुख चिन्मात्र। परात्पर भोगावया॥ ४७॥ तुम्ही भागवतधर्ममार्गगामी। तैंचि तुमची भेटी लाहों आम्ही। जैं पुण्यकोटी निष्कामीं। प्रयागसंगमीं केलिया॥ ४८॥ नारदा तूं भगवद्रूप। तुझी भेटी करी निष्पाप। तुवां कृपा केलिया अल्प। स्वयें चित्स्वरूप ठसावे॥ ४९॥ तुझेनि भक्तीसी महिमा अमूप। तुझेनि वाढला भक्तिप्रताप। तुझेनि भक्ति भगवद्रूप। तूं चित्स्वरूप निजनिष्ठा॥ ५०॥ तूं भक्तिप्रकाशकु दिवटा। कीं भक्तिमार्गींचा मार्गद्रष्टा। नारदा तुझा उपकार मोठा। भक्तीच्या पेठा वसविल्या तुवां॥ ५१॥ मुख्य भागवतशास्त्र पूर्ण। तुवां व्यासासी उपदेशून। प्रगट करविलें दशलक्षण। दीन जन उद्धरावया॥ ५२॥ नारदा तूं देवासमान। हेही उपमा दिसे गौण। तेचिविषयीं निरूपण। वसुदेव आपण निरूपी॥ ५३॥
भूतानां देवचरितं दु:खाय च सुखाय च।
सुखायैव हि साधूनां त्वादृशामच्युतात्मनाम्॥ ५॥
देवांपासूनि भूतसृष्टी। सुखदु:खें शिणे पोटीं। अतिवृष्टी कां अनावृष्टी। भूतकोटी आकांतु॥ ५४॥ त्या देवांपरीस साधु अधिक। हें साचचि मज मानलें देख। देवचरिते उठी सुखदु:ख। साधु निर्दोख सुखदाते॥ ५५॥ त्यांहीमाजीं तुजसारिखा। जोडल्या कृपाळू निजात्मसखा। तैं पेठ पिके परमार्थसुखा। हा महिमा लोकां कदा न कळेचि॥ ५६॥ दिधल्या सुखासी मागुती। च्युती हों नेणे कल्पांतीं। ते अच्युतात्मस्थिती। तुजपाशीं निश्चितीं नारदा॥ ५७॥ तुझिये महिमेपासीं। मुदल देवो न ये तुकासी। तेंही सांगेन मी तुजपासीं। यथार्थेंसीं नारदा॥ ५८॥ देवाचा अवतार होये। दासां सुख, दैत्यां भये। तेथही ऐसें विषम आहे। हें न समाये तुजमाजीं॥ ५९॥ तूं देवांचा आप्त होसी। दैत्यही विश्वासती तुजपासीं। रावण तुज नेऊनि एकांतासी। निजगुह्यासी स्वयें सांगे॥ ६०॥ देव रावणें घातलें बंदीं। तो रावण तुझे चरण वंदी। शेखीं रामाचा आप्त तूं त्रिशुद्धी। विषम तुजमधीं असेना॥ ६१॥ जरासंधु कृष्णाचा वैरी॥ तुझी चाल त्याच्या घरीं। आणि कृष्णाचे सभेमाझारीं। आप्तत्वें थोरी पैं तुझी॥ ६२॥ नाम घेवों नेदी देवाचें। हें बिरुद हिरण्यकशिपूचें। त्यासी कीर्तन तुझें रुचे। विषमत्व साचें तुज नाहीं॥ ६३॥ लांचुगी बुद्धि सदा देवांसी। तैशी नाहीं तुम्हां साधूंसी। ऐक त्याही अभिप्रायासी। यथार्थेंसीं सांगेन॥ ६४॥
भजन्ति ये यथा देवान् देवा अपि तथैव तान्।
छायेव कर्मसचिवा: साधवो दीनवत्सला:॥ ६॥
जे जैसे देव यागीं यजिजती। तैसतैसीं फळें देव देती। न भजत्यांतें विघ्नें सूचिती। ऐसी गती देवांची॥ ६५॥ जैसजैसा पुरुष वेंठे। तैसतैसी छाया नटे। तेवीं भजनें देव प्रसन्न मोठे। येरवीं उफराटें विघ्न करिती॥ ६६॥ जंव जंव सूर्य प्रकाशत असे। तंव तंव छाया सरिसी दिसे। निजकर्में देवही तैसे। कर्मवशें प्रसन्न॥ ६७॥ सूर्यअस्तमानीं छाया नासे। अभजनें देव क्षोभती तैसे। एवं लांचुगे देव ऐसे। तूंही अनायासें जाणसी॥ ६८॥ इतर देवांची कथा कोण। थोरला देव लांचुगा पूर्ण। तोही न भेटे जीव घेतल्याविण। भेटल्याचे आपण गर्भवास सोसी॥ ६९॥ त्याचें जीवें सर्वस्वें भजन। केल्या निजांग देऊनि होये प्रसन्न। परी न भजत्याच्या घरा जाण। विसरोनि आपण कदा न वचे॥ ७०॥ तैसी नव्हे तुमची बुद्धी। दीनदयाळ त्रिशुद्धी। तूं तंव केवळ कृपानिधी। ऐक तो विधी सांगेन॥ ७१॥ तुवां व्यास देखोनि सज्ञान। उपदेशिलें गुह्यज्ञान। ध्रुव बाळक अज्ञान। म्हणोनि जाण नुपेक्षिसी॥ ७२॥ प्रल्हाद उपदेशिला जेव्हां। दैत्यपुत्र न म्हणसी तेव्हां। तुझिया कृपेचा हेलावा। तो निजविसांवा दीनांसी॥ ७३॥ केवळ वाटपाडा देख। भजनेंवीण एकाएक। महाकवि केला वाल्मीक। अमर आवश्यक वंदिती त्यासी॥ ७४॥ देखोनि ज्याचिया ग्रंथासी। सुख वोसंडे सदाशिवासी। ऐसा तूं कृपाळू होसी। अनाथासी कुवांसा॥ ७५॥ वरिवरी दाविसी मिणधा कोप। कोपोनि सांडविशी त्याचें पाप। शेखीं सायुज्याचे दीप। दाविशी सद्रूप दयाळुवा॥ ७६॥ तुम्ही अच्युतात्मे निजनिर्धारीं। म्हणौनि देवो तुमचा आज्ञाधारी। तुम्ही म्हणाल त्यातें उद्धरी। येऱ्हवीं हातीं न धरी आनातें॥ ७७॥ ऐसा तूं दीनदीक्षागुरु। ब्रह्मज्ञानें अतिउदारु। तरी पुसेन तो विचारु। निजनिर्धारु सांगावा॥ ७८॥
ब्रह्मंस्तथापि पृच्छामो धर्मान्भागवतांस्तव।
याञ्छ्रुत्वा श्रद्धया मर्त्यो मुच्यते सर्वतो भयात्॥ ७॥
आदरें म्हणे देवऋषी। आजि सकळ पुण्यें आलीं फळासी। मायबाप तूं घरा आलासी। निजसुखासी दायक॥ ७९॥ कृपा केली मागील शिष्यां। तेचि कृपेचा घालीं ठसा। मज तुझा पूर्ण भरंवसा। सोडवीं भवपाशापासूनि॥ ८०॥ तुझेनि दर्शनें कृतकृत्यता। जऱ्ही मज जाली तत्त्वतां। तऱ्ही भागवतधर्मकथा। कृपेनें तत्त्वतां सांगावी॥ ८१॥ ऐसे सांगावे भागवतधर्म। जेणें निरसे कर्माकर्म। श्रद्धेनें ऐकतां परम। जन्ममरण हारपे॥ ८२॥ भवभय अतिदारुण। त्या भयाचें माया निजकारण। तिचें समूळ होय निर्दळण। ऐसे धर्म कृपेनें सांगावे॥ ८३॥ मज नाहीं अधिकार पूर्ण। ऐसें विचाराल लक्षण। तेविषयींची हे विनवण। सावधान अवधारीं॥ ८४॥
अहं किल पुरानन्तं प्रजार्थो भुवि मुक्तिदम्।
अपूजयं न मोक्षाय मोहितो देवमायया॥ ८॥
मज अधिकारु नाहीं पूर्ण। हें मीही जाणतों आपण। मागें म्यां केलें भगवद्भजन। तें तूं कथन अवधारीं॥ ८५॥ म्यां पूर्वीं आराधिलें देवराया। तें भजन ममता नेलें वांयां। प्रलोभविलों देवमाया। पुत्रस्नेहालागूनि॥ ८६॥ मज देव तुष्टला प्रसन्नपणें। मागसी तें देईन म्हणे। तेथें मायेनें ठकिलेंमजकारणें। माझा पुत्र होणें मी मागें॥ ८७॥ तो हा माझा पुत्र श्रीकृष्ण। परी मज न सांगे ब्रह्मज्ञान। तोचिवंदी माझे चरण। म्हणे बाळक पूर्ण मी तुझें॥ ८८॥ यापरी श्रीकृष्णापासीं। ज्ञानप्राप्ति नव्हे आम्हांसी। कृष्ण परमात्मा हृषीकेशी। हें निश्चयेंसीं मी जाणें॥ ८९॥ श्रीकृष्ण जन्मला माझिया कुशीं। म्हणौनि श्रद्धा आहे मजपाशीं। तेणेंचि तूं तुष्टलासी देवऋषी। तरी निजकृपेंसीं उद्धरीं॥ ९०॥ जे मायेनें ठकिलों वाडेंकोडें। ते माया समूळ झडे। ऐसें सांगिजे रोकडें। बहु बोलोनि पुढें काय काज॥ ९१॥
यथा विचित्रव्यसनाद्भवद्भिर्विश्वतो भयात्।
मुच्येम ह्यञ्जसैवाद्धा तथा न: शाधि सुव्रत॥ ९॥
मायाजलें भवसागरु। भरला असे अतिदुस्तरु। त्याचा उतरावया पैलपारु। होय तूं तारूं मुनिराया॥ ९२॥ याचें सकळ जळ क्षार। माजीं सावजें अनिवार। एकएकें चराचर। गिळिलें साचार निजशक्तीं॥ ९३॥ लाटांवरी अचाट लाटा। मोहाचिया अतिदुर्घटा। आदळती अविवेकतटा। धैर्याचिया कांठा पाडित॥ ९४॥ अहं-कुवावो वाजतां थोरु। अवघाचि खवळे सागरु। मी-माझेनि गजरें घोरु। अतिदुर्धरु गर्जत॥ ९५॥ नाना वासनांचा वळसा। पाहें पां भंवताहे कैसा। येथ तरावया धिंवसा। नव्हे सहसा सुरनरां॥ ९६॥ क्रोधाचें प्रबळ भरतें। भरी द्वेषाचिया तरियांतें। असूयातिरस्कारांची तेथें। चिडाणी उते अनिवार॥ ९७॥ कामपर्वताचीं शिखरें। विषमें भासती अपारें। आशेइच्छेचीं वरी थोरें। झाडें विषयांकुरें वाढलीं॥ ९८॥ संकल्पविकल्पांचे मीन। निंदेच्या सुसरी दारुण। ब्रह्मद्वेषाचे नक्र पूर्ण। सागरीं जाण तळपती॥ ९९॥ एवढाही हा भवसागरु। शोषिता तूं अगस्ती साचारु। तुझेनि भवाब्धिपैलपारु। पावों हा निर्धारु। जाहला आम्हां॥ १००॥ याचा विश्वतोभय हेलावा। तो आम्हां न बाधी तुमच्या कणवा। अप्रयासें नारददेवा। मरणार्णवा मज तारीं॥ १॥ पायी उतरून भवसागरु। साक्षात् पावें परपारु। ऐसा भागवतधर्मविचारु। तो निजनिर्धारु प्रबोधीं॥ २॥ ऐकोनि वसुदेवाची उक्ती। नारद सुखावला चितीं। तोचि अभिप्रावो परीक्षिती। शुक स्वमुखें स्थिति सांगत॥ ३॥
श्रीशुक उवाच
राजन्नेवं कृतप्रश्नो वसुदेवेन धीमता।
प्रीतस्तमाह देवर्षिर्हरे: संस्मारितो गुणै:॥ १०॥
सांगतां वसुदेवाचा प्रश्न। श्रीशुक जाहला स्वानंदपूर्णं। नारदु वोळला चैतन्यघन। चित्सुखजीवन मुमुक्षां॥ ४॥ श्रीशुक म्हणे नरदेवा। भावो मीनला नारदाच्या भावा। ऐकोनि प्रश्नसुहावा। तो म्हणे वसुदेवा धन्य वाणी॥ ५॥ परिसतां हा तुझा प्रश्न। चित्सुखें प्रगटे नारायण। ऐसें बोलतां नारद जाण। स्वानंदें पूर्ण वोसंडला॥ ६॥ रोमांच उचलले अंगीं। स्वेद दाटला सर्वांगीं। आनंदाश्रु चालिले वेगीं। स्वानंदरंगीं डुल्लतु॥ ७॥ सप्रेम मीनलिया श्रोता। जैं पूर्ण सुखावेना वक्ता। तैं तो जाणावा अवघा रिता। कथासारामृता चवी नेणे॥ ८॥ ऐकतां वसुदेवाचा प्रश्न। नारद सुखावे पूर्ण। मग स्वानंदगिरा गर्जोन। काय आपण बोलत॥ ९॥
नारद उवाच
सम्यगेतव्द्यवसितं भवता सात्वतर्षभ।
यत्पृच्छसे भागवतान्धर्मांस्त्वं विश्वभावनान्॥ ११॥
नारद म्हणे सात्वतश्रेष्ठा। वसुदेवा परमार्थनिष्ठा। धन्य धन्य तुझी उत्कंठा। तूं भावार्थी मोठा भागवतधर्मी॥ १०॥ ज्याचेनि धर्माचे प्रश्नोत्तरें। हें विश्व अवघेंचि उद्धरे। हें विचारिलें तुवां बरें। निजनिर्धारें श्रीकृष्णजनका॥ ११॥ तुझेनि प्रश्नोत्तरें जाण। साधक निस्तरती संपूर्ण। साधकांचें नवल कोण। महापापी पावन येणें होती॥ १२॥
श्रुतोऽनुपठितो ध्यात आदृतो वानुमोदित:।
सद्य: पुनाति सद्धर्मो देवविश्वद्रुहोऽपि हि॥ १२॥
भागवतधर्माचेनि गुणें। एक उद्धरती श्रवणें। एक तरती पठणें। एक निरुतरती ध्यानेंसंसारपाश॥ १३॥ एक श्रोतयां वक्तयांतें। देखोनि सुखावती निजचित्तें। सद्भावें भलें म्हणती त्यांतें। तेही तरती येथें भागवतधर्में॥ १४॥ हें नवल नव्हे भागवतधर्मा। जो कां देवद्रोही दुरात्मा। अथवा विश्वद्रोही दुष्टात्मा। तोही तरे हा महिमा भागवतधर्मी॥ १५॥ हृदयीं धरितां भागवतधर्म। अकर्म्याचें निर्दळी कर्म। अधर्म्याचें निर्दळी धर्म। दे उत्तमोत्तमपदप्राप्ती॥ १६॥ जेथ रिघाले भागवतधर्म। तेथ निर्दळे कर्माकर्मविकर्म। निंदा द्वेष क्रोध अधर्म। अविद्येचें नाम उरों नेदी॥ १७॥ ते भागवतधर्मी अत्यादर। श्रद्वेनें केला प्रश्न तुवां थोर। निजभाग्यें तूं अति उदार। परम पवित्र वसुदेवा॥ १८॥ तुझेंवानूं पवित्रपण। तरी पोटा आला श्रीकृष्ण। जयाचेनि नामें आम्ही जाण। परम पावन जगद्वंद्य॥ १९॥ तो स्वयें श्रीकृष्णनाथ। नित्य वसे तुझिया घरांत। तुझियाऐसा भाग्यवंत। न दिसे येथ मज पाहतां॥ २०॥ वसुदेव तुझिया नामतां। ‘वासुदेव’ म्हणती अनंता। तें वासुदेव नाम स्मरतां। परमपावनता जगद्वंद्यां॥ २१॥
त्वया परमकल्याण: पुण्यश्रवणकीर्तन:।
स्मारितो भगवानद्य देवो नारायणो मम॥ १३॥
ज्याचेनि श्रवणें वाढे पुण्य। ज्याचेनि नामें झडे भवबंधन। तो सद्य स्मरविला तुवां नारायण। तुझी वाचा कल्याण वसुदेवा॥ २२॥ तुझा आजि ऐकतांचि प्रश्न। पूर्ण प्रगटला नारायण। मज तुझा हा उपकार पूर्ण। तूं परम कल्याण वसुदेवा॥ २३॥ आशंका॥ ऐकोनि नारदाचें वचन। झणें विकल्प धरील मन। यासी पूर्वीं होतें विस्मरण। आतां जाहलें स्मरण वसुदेवप्रश्नें॥ २४॥ ज्यांची ऐसी विकल्पयुक्ती। ते जाणावे निजात्मघाती। तेही अर्थींची उपपत्ती। ऐक निश्चितीं शुक सांगे॥ २५॥ अग्नि कुंडामाजीं स्वयंभ असे। तो घृतावदानें अति प्रकाशे। तेवीं सप्रेम प्रश्नवशें। सुख उल्लासे मुक्तांचें॥ २६॥ सप्रेम भावार्थे मीनला श्रोता। मुक्तही उल्हासें सांगे कथा। तेथील सुखाची सुखस्वादुता। जाणे जाणता सवर्म॥ २७॥ यालागीं मुक्त मुमुक्षु विषयी जन। भागवतधर्में निवती संपूर्ण। तोचि वसुदेवें केला प्रश्न। तेणें नारद पूर्ण सुखावला॥ २८॥ जे कां पूर्वपरंपरागत। जीर्ण भागवतधर्म येथ। सांगावया नारदमुनि निश्चित। उपपादित इतिहासु॥ २९॥
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम्।
आर्षभाणां च संवादं विदेहस्य महात्मन:॥ १४॥
येच अर्थीं विदेहाचा प्रश्न। संवादती आर्षभ नवजण। ते भागवतधर्म जीर्ण। इतिहास संपूर्ण सांगेन ऐक॥ ३०॥ आर्षभ कोण म्हणसी मुळीं। त्यांची सांगेन वंशावळी। जन्म जयांचा सुकुळीं। नवांमाजीं जाहली ब्रह्मनिष्ठा॥ ३१॥
प्रियव्रतो नाम सुतो मनो: स्वायंभुवस्य य:।
तस्याग्नीध्रस्ततो नाभिर्ऋषभस्तत्सुत: स्मृत:॥ १५॥
स्वायंभु मनूचा सुतु। जाण नामें ‘प्रियव्रतु’। त्याचा ‘आग्नीध्र’ विख्यातु। ‘नाभी’ त्याचा सुतु सूर्यवंशीं॥ ३२॥ त्या नाभीपासूनि ज्ञानविलासु। ‘ऋषभ’ जन्मला वासुदेवांशु। मोक्षधर्माचा प्रकाशु। जगीं सावकाशु विस्तारिला॥ ३३॥
तमाहुर्वासुदेवांशं मोक्षधर्मविवक्षया।
अवतीर्णं सुतशतं तस्यासीद्ब्रह्मपारगम्॥ १६॥
ऋषभ वासुदेवाचा अंशु। ये लोकीं मोक्षधर्मविश्वासु। प्रवर्तावया जगदीशु। हा अंशांशु अवतार॥ ३४॥ त्याचें पंचमस्कंधीं चरित्र। सांगितलें सविस्तर। त्यासी जाहले शत पुत्र। वेदशास्त्रसंपन्न॥ ३५॥ त्यांहीमाजीं ज्येष्ठ पुत्र। अतिशयें परम पवित्र। ऐक त्याचें चरित्र। अतिविचित्र सांगेन॥ ३६॥
तेषां वै भरतो ज्येष्ठो नारायणपरायण:।
विख्यातं वर्षमेतद्यन्नाम्ना भारतमद्भुतम्॥ १७॥
जो ज्येष्ठपुत्र ‘भरत’ जाण। तो नारायणपरायण। अद्यापि ‘भारतवर्ष’ उच्चारण। त्याचेनि नांवें जाण विख्यात॥ ३७॥ जो मनसा-वाचा-कर्मणा। अखंड भजे नारायणा। असतांही राज्यधर्मीं जाणा। जो आत्मखुणा न चुके॥ ३८॥ जेवीं मार्गीं चालतां। पाउलें वक्रेंही टाकितां। दैववशें अडखुळतां। आश्रयो तत्त्वतां भूमिचाचि॥ ३९॥ तेवींचि तयासी असतां। राज्यधर्म चाळितां। यथोचित कर्म आचरतां। निजीं निजात्मता पालटेना॥ ४०॥ या नांव बोलिजे ‘अखंडस्थिती’। जे पालटेना कल्पांतीं। जेथ असतां सुखी होती। पुनरावृत्ति असेना॥ ४१॥ ऐसें करी सदाचरण। आणि नारायणपरायण। आईक त्याचेंही व्याख्यान। विशद करून सांगेन॥ ४२॥ नरांचा समुदाय गहन। त्यासी ‘नार’ म्हणती जाण। त्याचें ‘अयन’ म्हणजे स्थान। म्हणौनि म्हणती ‘नारायण’ आत्मयासी॥ ४३॥ त्याच्या ठायीं परायण। म्हणिजे अनन्यत्वें शरण। निवटूनियां आपुलें अहंपण। तद्रूपें जाण राहिला॥ ४४॥ ऐसा तो ऋषभाचा पुत्र। जयासी नांव ‘भरत’। ज्याच्या नामाची कीर्ति विचित्र। परम पवित्र जगामाजीं॥ ४५॥ तो भरतु राहिला ये भूमिकेसी। म्हणौनि ‘भारतवर्ष’ म्हणती यासी। सकळ कर्मारंभीं करितां संकल्पासी। ज्याचिया नामासी स्मरताति॥ ४६॥ ऐसा आत्माराम जऱ्ही झाला। तऱ्ही विषयसंग नव्हे भला। यालागीं त्याचा वृत्तांतु पुढिला। सांगेन सकळां आइकें॥ ४७॥ नामें ख्याती केली उदंड। यालागीं त्यातें म्हणती ‘भरतखंड’। आणीकही प्रताप प्रचंड। त्याचा वितंड तो ऐका॥ ४८॥
स भुक्तभोगां त्यक्त्वेमां निर्गतस्तपसा हरिम्।
उपासीनस्तत्पदवीं लेभे वै जन्मभिस्त्रिभि:॥ १८॥
तेणें दिग्मंडल जिंतिलें। समुद्रवलयांकित राज्य केलें। नानाविध भोग भोगिले। जे नाहीं देखिले सुरवरीं॥ ४९॥ अनुकूळ स्त्रिया पुत्र। अनुकूळ मंत्री पवित्र। अनुकूळ राज्य सर्वत्र। ते त्यागिले विचित्र नानाभोग॥ ५०॥ ऐसे भोग भोगिलियापाठीं। सांडूनि वलयांकित राज्यसृष्टी। स्वयें निघाला जगजेठी। स्वहितदृष्टी हरिभजनीं॥ ५१॥ जे राज्यवैभव भोगिती। त्यांसी कदा नव्हे गा विरक्ती। भरतें केली नवलख्याती। सेविला श्रीपती भोगत्यागें॥ ५२॥ तो तेणेंचि जन्में जाण। होआवा मोक्षासी आरोहण। परी जाहलें जन्मांतरकारण। तेंही विंदाण सांगेन॥ ५३॥ संनिहितप्रसूतिकाळीं। मृगी जळ प्राशितां जळीं। ऐकोनि पंचाननाची आरोळी। उडाली तत्काळीं अतिसत्राणें॥ ५४॥ धाकें गर्भु तिचा पडतां जळीं। भरत स्नान करी ते काळीं। देखोनि कृपाळु कळवळी। काढी तत्काळीं दयाळुत्वें॥ ५५॥ मृगी न येचि परतोन। मातृहीन हें अतिदीन। भरत पाळी भूतदयेन। मृगममता पूर्ण वाढली॥ ५६॥ स्नान संध्या अनुष्ठान। करितां मृग आठवे क्षणक्षण। आरंभिल्या जपध्यान। मृगमय मन भरताचें॥ ५७॥ आसनीं भोजनीं शयनीं। मृग आठवे क्षणक्षणीं। मृग न देखतां नयनीं। उठे गजबजोनि ध्यानत्यागें॥ ५८॥ ममता बैसली मृगापाशीं। मृग वना गेला स्वइच्छेंसीं। त्याचा खेदु करितां भरतासी। काळ आकर्षी देहातें॥ ५९॥ यालागीं साचचि जाण। ममतेपाशीं असे मरण। जो निर्मम संपूर्ण। त्यासि जन्ममरण स्पर्शेना॥ ६०॥ भरत तपिया थोर अंगें। तेथ काळ कैसेनि रिघे। ममतासंधी पाहोनि वेगें। मृत्यु तद्योगें पावला॥ ६१॥ देहासी येतां मरण। भरतासी मृगाचें ध्यान। तेणें मृगजन्म पावे आपण। जन्मांतरकारण जाहलें ऐसें॥ ६२॥ कृपेनें केला जो संगु। तोचि योगियां योगभंगु। यालागीं जो नि:संगु। तो अभंगु साधक॥ ६३॥ मृगाचेनि स्मरणें निमाला। यालागीं तो मृगजन्म पावला। जो कृष्णस्मरणें निमाला। तो कृष्णुचि जाला देहांतीं॥ ६४॥ अंतकाळीं जे मती। तेचि प्राणियांसी जाण गती। यालागीं श्रीकृष्ण चित्तीं। अहोरातीं स्मरावा॥ ६५॥ परी मृगदेहीं जाण। भरतासी श्रीकृष्णस्मरण। पूर्वी केलें जें अनुष्ठान। तें अंतर जाण कदा नेदी॥ ६६॥ मागुता तिसरे जन्में पाहें॥ तो ‘जडभरत’ नाम लाहे। तेथें तो निर्ममत्वें राहे। तेणें होय नित्यमुक्त॥ ६७॥ बहुतां जन्मींची उणीवी। येणें जन्में काढिली बरवी। निजात्मा आकळोनि जीवीं। परब्रह्मपदवी पावला॥ ६८॥ ऋषभपुत्रउत्पत्ती। शतबंधु जाण निश्चितीं। त्यांत हे ज्येष्ठाची स्थिती। उरल्यांची गती ते ऐका॥ ६९॥
तेषां नव नवद्वीपपतयोऽस्य समन्तत:।
कर्मतन्त्रप्रणेतार एकाशीतिर्द्विजातय:॥ १९॥
नव नवखंडांप्रती। ते केले खंडाधिपती। एक्यांशीं जणांची स्थिती। कर्ममार्गी होतीप्रवर्तक॥ ७०॥ उरले जे नव जण। सकळ भाग्याचें भूषण। ब्रह्मज्ञानाचें अधिष्ठान। ऐक लक्षण तयांचें॥ ७१॥
नवाभवन्महाभागा मुनयो ह्यर्थशंसिन:।
श्रमणा वातरशना आत्मविद्याविशारदा:॥ २०॥
ऋषभकुळीं कुळदीप। स्नेहसूत्रेंवीण दैदीप्य। नवही जण स्वयें सद्रूप। सायुज्यस्वरूपप्रकाशक॥ ७२॥ आत्माभ्यासीं परिश्रम। करून निरसिलें कर्माकर्म। यालागीं ते अकृताश्रम। निजनिभ्रम स्वयें जाहले॥ ७३॥ शब्दबोधें सदोदित। ब्रह्मज्ञानपारंगत। शिष्यप्रबोधीं समर्थ। परमाद्भुत अतिदक्ष॥ ७४॥ ते ब्रह्मविद्येचें चालतें डिंब। त्यांचे अवेव ते ब्रह्मकोंब। हे विद्येचें पूर्णबिंब। स्वयें स्वयंभ परब्रह्म॥ ७५॥ दशदिशा एकूचि दोरा। भरूनि पांघरुणें मुनीश्वरा। वारा वळून कडदोरा। बांधिला पुरा ग्रंथीरूप॥ ७६॥ आकाशाच्या ठायीं। अंबरत्व केलें तिहीं। ते चिदंबर पाहीं। एकचि नवांही पांघरूण॥ ७७॥ प्राणापान वळूनि दोन्ही। गांठी केली नाभीच्या ठायीं। तंव जीवग्रंथी सुटली पाहीं। तेंचि नवांही ब्रह्मसूत्र॥ ७८॥ ऐसे परब्रह्मवैभवें। निडारले निजानुभवें। त्यांचीं सांगेन मी नांवें। यथागौरवें तें ऐक॥ ७९॥ ज्यांचें नाम ऐकतां। कांपत काळ पळे मागुता। संसार नुघवी माथा। नाम स्मरतां जयांचें॥ ८०॥ त्यांचिया नामांची कीर्ती। आईक सांगेन परीक्षिती। ज्यांचेनि नामें आतुडे मुक्ती। जाण निश्चितीं भाविकां॥ ८१॥
कविर्हरिरन्तरिक्ष: प्रबुद्ध: पिप्पलायन:।
आविर्होत्रोऽथ द्रुमिलश्चमस: करभाजन:॥ २१॥
कवि हरि अंतरिक्ष। प्रबुद्ध पिप्पलायन देख। आविर्होत्र द्रुमिल सुटंक। चमस निर्दोष करभाजन॥ ८२॥ एवं नवही नांवें जाण। यांचें करितां नामस्मरण। सकळ पापा निर्दळण। हे महिमा पूर्ण तयांची॥ ८३॥ त्यांची परमहंसस्थिती। सांगेन मी तुजप्रती। ज्यांचेनि पावन होय क्षिती। त्या या नव मूर्ती पुण्य पूज्य॥ ८४॥
एते वै भगवद्रूपं विश्वं सदसदात्मकम्।
आत्मनोऽव्यतिरेकेण पश्यन्तो व्यचरन्महीम्॥ २२॥
ते वेगेळे दिसती नवांक। परी भगवद्रूपें अवघे एक। संतासंत जन अनेक। आपणांसगट देख एकत्वें पाहती॥ ८५॥ त्यांसी तंव असंतता। उरली नाहीं सर्वथा। संत म्हणावया पुरता। भेदु न ये हाता चिन्मयत्वें॥ ८६॥ जग परिपूर्ण भगवंतें। आपण वेगळा नुरे तेथें। तंव भगवद्रूप समस्तें। भूतें महाभूतें स्वयें देखे॥ ८७॥ हेंही देखतें देखणें। तेंही स्वयें आपण होणें। होणें न होणें येणें जाणें। हीं गिळूनि लक्षणें विचरती मही॥ ८८॥
अव्याहतेष्टगतय: सुरसिद्धसाध्य-
गन्धर्वयक्षनरकिन्नरनागलोकान्।
मुक्ताश्चरन्ति मुनिचारणभूतनाथ-
विद्याधरद्विजगवां भुवनानि कामम्॥ २३॥
वैकुंठ कैलास सुरसिद्धस्थानें। सप्तपाताळादि गमनें। एवं श्लोकोक्त चवदा भुवनें। स्वइच्छा विचरणें कामनारहित॥ ८९॥ त्यांसी जीवीं नाहीं विषयासक्ती। यालागीं खुंटेना त्यांची गती। इच्छामात्रें गमनशक्ती। सुखें विचरती निष्काम॥ ९०॥
त एकदा निमे: सत्रमुपजग्मुर्यदृच्छया।
वितायमानमृषिभिरजनाभेमहात्मन:॥ २४॥
जेथें मनाचा प्रवेशु नाहीं। त्यांची पायवाट ते ठायीं। ऐसे स्वइच्छा विचरतां मही। आले ते पाहीं कर्मभूमीसी॥ ९१॥ मही विचरतां वितंड। पातले ‘अजनाभ’ खंड। तंव विदेहाचा याग प्रचंड। मीनलें उदंड ऋषीश्वर॥ ९२॥ याग वेदोक्तविधी निका। कुंडमंडप वेदिका। आवो साधोनि नेटका। विधानपीठिका अतिशुद्ध॥ ९३॥ स्रुक्-स्रुवा-त्रिसंधानें। विस्तारूनि परिस्तरणें। अखंड वसुधारा दंडाप्रमाणें। ऋषिमंडणें होम करिती॥ ९४॥ होम होतां संपूर्ण। पूर्णाहुतीसमयीं जाण। येतां देखिले नवही जण। देदीप्यमान निजतेजें॥ ९५॥
तान्दृष्ट्वा सूर्यसंकाशान्महाभागवतान्नृप:।
यजमानोऽग्नयो विप्रा: सर्व एवोपतस्थिरे॥ २५॥
अमित सूर्यांचिया कोटी। हारपती नखतेजांगुष्टीं। तो भगवंत जिंहीं धरिला पोटीं। त्यांची तेजाची गोष्टी अलोलिक॥ ९६॥ त्यांचिया अंगप्रभा। सूर्य लोपताहे उभा। जिंहीं प्रभेसी आणिली शोभा। चैतन्यगाभा साकार॥ ९७॥ ते भगवद्भाववैभव। भगवंताचें निजगौरव। भक्तीचे भाग जे नव। ते हे जाण सर्व मूर्तिमंत॥ ९८॥ नवखंड पृथ्वीचे अलंकार। नवनिधींचें निजसार। नवरत्नांचेंही निजभांडार। तें हे साकार नवही जण॥ ९९॥ कीं ते नवही नारायण। स्वयें प्रगटले आपण। नवही नृसिंह जाण। देदीप्यमान पैं आले॥ २००॥ आव्हानिले तिन्ही अग्नी। उभे ठेले त्यांतें देखोनी। ते हे भागवतीं देखिले नयनीं। इतरांलागुनी दिसेना॥ १॥ येतां देखोनि तेजोमूर्ती। ऋत्विज आचार्य उभे ठाकती। साउमा धांवे विदेहनृपती। स्वानंदवृत्ती सन्मानी॥ २॥ सवेग घाली लोटांगण। मुगुट काढोनि आपण। मस्तकीं वंदूनियां चरण। पूर्णादरें जाण आणिता झाला॥ ३॥
विदेहस्तानभिप्रेत्य नारायणपरायणान्।
प्रीत: सम्पूजयाञ्चक्रे आसनस्थान्यथार्हत:॥ २६॥
त्यांतें जाणोनि भगवत्पर। विदेहा आल्हाद थोर। त्यांचे पूजेसी अत्यादर। स्वयें सादर पैं झाला॥ ४॥ श्रद्धायुक्त चरणक्षालन। धूप दीप सुमन चंदन। पूजा मधुपर्कविधान। केलें संपूर्ण यथायोग्य॥ ५॥
तान्रोचमानान्स्वरुचा ब्रह्मपुत्रोपमान्नव।
पप्रच्छ परमप्रीत: प्रश्रयावनतो नृप:॥ २७॥
निजांगींच्या निजप्रभा। अंगासी आणिली शोभा। काय ब्रह्मविद्येचा गाभा। शोभे नवप्रभा शोभायमान॥ ६॥ निजहृदयींचें ब्रह्मज्ञान। परिपाकें प्रकाशलें पूर्ण। तेंचि निजांगा मंडण। इतर भूषण त्यां नाहीं॥ ७॥ मुगुट कुंडलें कंकण। मूर्खाअंगीं बाणलीं पूर्ण। ते शोभा लोपूनि मूर्खपण। बाहेर संपूर्ण प्रकाशे॥ ८॥ तैसे नव्हती हे ज्ञानघन। ब्रह्मपूर्णत्वें विराजमान। तेंचि त्यांसी निजांगा मंडण। इतर भूषण त्यां नाहीं॥ ९॥ ब्रह्मानुभवें पूर्णत्व पूर्ण। इंद्रियद्वारा विराजमान। तें त्यांसी निजशांतिभूषण। मुगुट कंकण तें तुच्छ॥ १०॥ मागां वाखाणिले सनकादिक। त्यांसमान कीं अधिक। ऐसा विचारितां परिपाक। त्यां यां वेगळीक दिसेना॥ ११॥ त्यांची यांची एक गती। त्यांची यांची एक स्थिती। त्यांची यांची एक शांती। भेदु निश्चितीं असेना॥ १२॥ त्यांच्याऐसे हे सखे बंधु। त्यांच्याऐसा समान बोधु। त्यांच्याऐसा हा अनुवादु। सर्वथा भेदु असेना॥ १३॥ ते चौघे हे नव जण। अवघ्यां एकचि ब्रह्मज्ञान। त्यांची यांची शांती समान। हें विदेहासी पूर्ण कळूं सरले॥ १४॥ ऐसें परिपूर्णत्व जाणोनी। राजा सुखावे स्थिति देखोनी। मग अतिविनीत होऊनी। मृदु मंजुळ वचनीं विनवीत॥ १५॥
विदेह उवाच
मन्ये भगवत: साक्षात्पार्षदान्वो मधुद्विष:।
विष्णोर्भूतानि लोकानां पावनाय चरन्ति हि॥ २८॥
सार्वभौम चक्रवर्ती। देहीं असोनि विदेहस्थिती। तो जनकु आर्षभांप्रती। अतिप्रीतीं विनवितु॥ १६॥ त्यांच्या भेटीसवें उलथलें सुख। विदेहासी देहेंवीण हरिख। तेणें हरिखेंकरूनियां देख। प्रीतिपूर्वक विनवितु॥ १७॥ तुमचें सामर्थ्य पाहतां येथ। तुम्हीं ईश्वररूप समस्त। देहभावें तरी भगवद्भक्त। जैसे पार्षद हरीचे॥ १८॥ देवो आपुला आपण भक्तु। ऐसा जो कां उपनिषदर्थु। तो साच करूनि वेदार्थु। निजपरमार्थु अनुभवा॥ १९॥ ‘शिव होऊनि शिवु यजिजे’। हें लक्षण तुम्हांसीच साजे। येरीं हे बोलचि बोलिजे। परी बोलते वोजें अर्थ न लभे॥ २०॥ विष्णूनें सृष्टीं जें जें स्रजणें। तें तें तुम्हीं पवित्र करणें। मही विचरायाचीं कारणें। कृपाळूपणे दीनोद्धारा॥ २१॥ तुम्ही विचरा विश्वकणवा। परी भेटी होय प्राप्ति तेव्हां। आजि लाधलों तुमची सेवा। उद्भट दैवाथिलों मी॥ २२॥ आजि माझें धन्य दैव। आजि माझें धन्य वैभव। आजि धन्य मी सर्वीं सर्व। हे चरण अपूर्व पावलों॥ २३॥
दुर्लभो मानुषो देहो देहिनां क्षणभङ्गुर:।
तत्रापि दुर्लभं मन्ये वैकुण्ठप्रियदर्शनम्॥ २९॥
सकल देहांमाजीं पहा हो। अतिदुर्लभ मनुष्यदेहो। त्याचिया प्राप्तीचा संभवो। तो अभिप्रावो अतिदुर्गम॥ २४॥ सुकृतदुष्कृत समान समीं। तैं पाविजे कर्मभूमी। तेंचि जैं पडे विषमीं। तैं स्वर्गगामी कां नरकीं॥ २५॥ समानकर्मीं नरदेह जोडे। तरी समस्तां समबुद्धि न घडे। त्यां समांमाजीं विषम गाढें। जेणें पडे तें ऐका॥ २६॥ पापाचा एकु महाचिरा। पुण्यें जोखणीं चाराचुरा। समान आलिया तुळाभारा। येणें जन्में नरा दृढ़ पापबुद्धी॥ २७॥ वाळू आणि सुवर्ण। जोखितां झाल्याही समान। सोनियालागीं वेंचिती धन। वाळू ते जाण न घेती फुकट॥ २८॥ एकाचें पुण्य अत्यंत थोर। पाप लहानसहान एकत्र। करूनि जोखितां तुळाभार। समान साचार जैं होय॥ २९॥ ऐसेनि कर्में जे जन्मती। त्यांसी पुण्यावरी अतिप्रीती। पुण्य पाप दोनी झडती। तैं नित्यमुक्ति पाविजे॥ ३०॥ ऐशा अतिसूक्ष्म संकटीं। मनुष्यदेहीं होय भेटी। तेथेंही अभिमान अति उठी। धन दारा दिठी विषयांच्या॥ ३१॥ मनुष्यदेहींचेनि आयुष्यें। विषयीं सायास करिती कैसे। अमृत देऊनि घे जैसें। तान्हें सावकाशें मृगजळ॥ ३२॥ गंधर्वनगरींचीं ठाणीं। घेतलीं देऊनि चिंतामणी। तैशी लटिकियालागीं आटणी। विषयसाधनीं नरदेहा॥ ३३॥ तोडूनि कल्पतरूंचे उद्यान। सायासीं तें वाहोनि रान। तेथें साक्षेपें पेरिली जाण। आणूनि आपण विजया जैशी॥ ३४॥ तैसें नरदेहा येऊनि नरां। करिती आयुष्याचा मातेरा। पूर्ण व्यवसावो शिश्नोदरां। उपहास निद्रा कां निंदा॥ ३५॥ नित्य प्रपंचाची कटकट। सदा विषयांची खटपट। कदा आरायिल्या चोखट। स्वेच्छा सारीपाट खेळणें॥ ३६॥ नाना विनोद टवाळी। नित्य विषयांची वाचाळी। त्यासी जपतां रामनामावळी। पडे दांतखिळी असंभाव्य॥ ३७॥ घरा आली कामधेनु। दवडिती न पोसवे म्हणूनु। तेवीं श्रीरामनाम नुच्चारूनु। नाडला जनु नरदेहीं॥ ३८॥ करितां नरदेहीं अहंकार। तंव तो देहचि क्षणभंगुर। देहीं देहवंता भाग्य थोर। जैं भगवत्पर भेटती॥ ३९॥ ज्यांसी भगवद्भक्तीची अति गोडी। त्यांवरी भगवंताची आवडी। त्यांची भेटी तैं होय रोकडी। जैं पुण्याच्या कोडी तिष्ठती॥ ४०॥ ज्यांचिया आवडीच्या लोभा। भगवंतु पालटें आला गर्भा। दशावतारांची शोभा। जाहली पद्मनाभा ज्यांचेनि॥ ४१॥ ऐसे कृष्णकृपासमारंभे। जे भगवंताचे वालभे। त्यांची भेटी तैंचि लाभे। जैं भाग्यें सुलभें पैं होती॥ ४२॥ निष्कामता निजदृष्टी। अनंत पुण्यकोटॺनुकोटी। रोकडॺा लाभती पाठोवाठीं। तैं होय भेटी हरिप्रियांची॥ ४३॥ व्याघ्रसिंहांचें दूध जोडे। चंद्रामृतही हाता चढे। परी हरिप्रियांची भेटी नातुडे। दुर्लभ भाग्य गाढें मनुष्यां॥ ४४॥ व्याघ्रसिंहदुधासाठीं। अतिसबळता जोडे पुष्टी। परी जन्ममरणांची तुटी। दुधासाठीं कदा नव्हे॥ ४५॥ म्हणती चंद्रामृत जो आरोगी। तो होय नित्य निरोगी। मुख्य चंद्रचि क्षयरोगी। त्याचें अमृत निरोगी करी केवीं॥ ४६॥ व्याघ्रसिंहदुग्धाचे शक्तीं। प्राणी जैं अजरामर होती। तैं तेणें दुग्धें ज्यांची उत्पत्ती। ते कां मरती व्याघ्रसिंह॥ ४७॥ जैं हरिभक्तांची भेटी घडे। तैं न बाधी संसारसांकडें। जन्ममरण समूळीं उडे। त्यांची भेटी आतुडे अतिभाग्यें॥ ४८॥ आजि मी भाग्यें सभाग्य पूर्ण। लाधलों तुमचें दर्शन। तरी ‘आत्यंतिक क्षेम’ कोण। तें कृपा करून मज सांगा॥ ४९॥
अत आत्यन्तिकं क्षेमं पृच्छामो भवतोऽनघा:।
संसारेऽस्मिन्क्षणार्धोऽपि सत्सङ्ग: शेवधिर्नृणाम्॥ ३०॥
म्हणों तुम्ही निष्पाप निर्मळ। तंव तुमचेनि दर्शनें तत्काळ। नासती सकळ कलिमळ। ऐसे निजनिर्मळ तुम्ही सर्व॥ ५०॥ स्नान केलिया गंगा। पवित्र करी सकळ जगा। ते गंगाही निजपापभंगा। तुमचे चरणसंगा वांछीत॥ ५१॥ तुमची दर्शनसंग-चिद्गंगा। अत्यंत दाटुगी माजीं जगा। दर्शनमात्रें ने भव भंगा। जन्ममरण पैं गा मग कैंचें॥ ५२॥ तेथें कायसा गंगेचा पडिपाडु। नाहीं तीर्थमहिमेसी पवाडु। तीर्थां भवदोष अवघडु। त्यांचा करी निवाडु दृष्टिसंगें॥ ५३॥ ऐशी पवित्रता प्रबळ। दृष्टिउत्संगी वाढवा सकळ। आजि झालों मी अतिनिर्मळ। तुम्हीं दीनदयाळ मीनलेति॥ ५४॥ ऐसे पवित्र आणि कृपामूर्ति। भाग्यें लाधलों हे संगती। सत्संगाची निजख्याती। सांगता श्रुति मौनावल्या॥ ५५॥ ब्रह्म निर्धर्म नेणे निजधर्मा। साधुमुखें ब्रह्मत्व ये ब्रह्मा। त्या सत्संगाचा महिमा। अतिगरिमा निरुपम॥ ५६॥ सत्संग म्हणों निधीसमान। निधि जोडल्या हारपे जाण। सत्संगाचें महिमान। साधकां संपूर्ण सद्रूप करी॥ ५७॥ निधि सांपडलिया साङ्ग। अत्यंत वाढे विषयभोग। तैसा नव्हे जी सत्संग। निर्विषयें चांग सुखदाता॥ ५८॥ इंद्रियांवीण स्वानंदु। विषयांवीण परमानंदु। ऐसा करिती निजबोधु। अगाध साधुनिजमहिमा॥ ५९॥ निमिषार्ध होतां सत्संग। तेणें संगें होय भवभंग। यालागीं सत्संगाचें भाग्य। साधक सभाग्य जाणती॥ ६०॥ संतचरणीं ज्यांचा भावो। भावें तुष्टती संत स्वयमेवो। संतसन्निधिमात्रें पहावो। संसार वावो स्वयें होय॥ ६१॥ नाना विकार विषयविधी। संसारु सबळत्वें बाधीं। त्या संसाराची अवधी। जाण त्रिशुद्धी सत्संग॥ ६२॥ दीपाचिये संगप्राप्ती। नि:शेष कापुरत्वाची शांती। तेवीं झालिया सत्संगती। संसारनिवृत्ति क्षणार्धें॥ ६३॥ ते तुमची सत्संगती। भाग्यें पावलों अवचितीं। ‘आत्यंतिक क्षेम’ कैशा रीतीं। प्राणी पावती तें सांगा॥ ६४॥ आत्यंतिक क्षेमाचें वर्म। जरी म्हणाल भागवतधर्म। त्या धर्माचा अनुक्रम। साङ्ग सुगम सांगा जी॥ ६५॥
धर्मान्भागवतान्ब्रूत यदि न: श्रुतये क्षमम्।
यै: प्रसन्न: प्रपन्नाय दास्यत्यात्मानमप्यज:॥ ३१॥
परिसावया भागवतधर्मीं। श्रवणाधिकारी असों जरी आम्ही। तरी कृपा करूनि तुम्हीं। सांगावे स्वामी सकळ धर्म॥ ६६॥ नवल या धर्मांची ख्याती। सप्रेम आदरितां प्रीती। तेणें तुष्टोनियां श्रीपती। दे सेवकां हातीं आपणिया॥ ६७॥ ‘अजन्मा’ या नामाची ख्याती। वेदशास्त्रीं मिरवी श्रीपती। तो भागवतधर्माचिया प्रीती। सोशी जन्मपंक्ती भक्तांचिया॥ ६८॥ एवं भागवतधर्मीं जाण। जो कोणी अनन्य शरण। त्यासी तुष्टोनियां नारायण। निजात्मता पूर्ण स्वयें देतु॥ ६९॥ भागवतधर्मश्रवणार्थ। मज अधिकारु जरी नसेल येथ। तरी मी अनन्य शरणागत। आणि तुम्ही समस्त कृपाळू॥ ७०॥ भूतदेयेचें निडारलेपण। तुमच्या ठायीं वोसंडे पूर्ण। तुम्ही दयानिधि संपूर्ण। दीनोद्धरण तुमचेनी॥ ७१॥ जेथ तुमची कृपा पूर्ण। तेथ न राहे जन्ममरण। सर्वाधिकार संपूर्ण। सहज आपण वोळंगे॥ ७२॥ तंव तुमचे कृपेपरतें। आन सामर्थ्य नाहीं येथें। ऐसें जाणोनियां निश्चितें। शरण तुम्हांतें मी आलों॥ ७३॥ कायसी ज्ञातेपणाची लाज। येथें तुमचे कृपें माझें काज। ऐसें विदेहें प्रार्थूनिद्विज-। चरणरज वंदिलें॥ ७४॥ ऐकोनि विदेहाचा नम्र प्रश्न। संतोषले नवही जण। तेंचि श्रीमुखें नारद आपण। करी निरूपण वसुदेवा॥ ७५॥
श्रीनारद उवाच
एवं ते निमिना पृष्टा वसुदेव महत्तमा:।
प्रतिपूज्याब्रुवन्प्रीत्या ससदस्यर्त्विजं नृपम्॥ ३२॥
जो जगाची स्थिती गति जाणता। जो हरिहरांचा पढियंता। जो निजात्मज्ञानें पुरता। तो झाला बोलता नारदु॥ ७६॥ नारद म्हणे वसुदेवा। विदेहें प्रश्न केला बरवा। तेणें परमानंदु तेव्हां। त्या महानुभावां उलथला॥ ७७॥ संतोषोनि नवही मूर्ती। धन्य धन्य विदेहा म्हणती। ऋत्विजही सादर परमार्थीं। सदस्य श्रवणार्थीं अतितत्पर॥ ७८॥ ऐसें देऊनि अनुमोदन। बोलते जाहले नवही जण। तेचि कथेचें निजलक्षण। नव प्रश्न विदेहाचे॥ ७९॥ भागवतधर्म, भगवद्भक्त। माया कैसी असे नांदत। तिचा तरणोपाव येथ। केवीं पावत अज्ञानी॥ ८०॥ येथ कैसें असे परब्रह्म। कासया नांव म्हणिजे कर्म। अवतारचरित्रसंख्या परम। अभक्तां अधमगति कैशी॥ ८१॥ कोणे युगीं कैसा धर्म। सांगावा जी उत्तमोत्तम। ऐसे नव प्रश्न परम। जनक सवर्म पुसेल॥ ८२॥ ऐसे विदेहाचे प्रश्न। अनुक्रमें नवही जण। उत्तर देती आपण। तयांत प्रथम प्रश्न कवि सांगे॥ ८३॥
कविरुवाच
मन्येऽकुतश्चिद्भयमच्युतस्य
पादाम्बुजोपासनमत्र नित्यम्।
उद्विग्नबुद्धेरसदात्मभावाद्
विश्वात्मना यत्र निवर्तते भी:॥ ३३॥
रायें पुशिलें ‘आत्यंतिक क्षेम’। तदर्थीं कवि ज्ञाता परम। तो आत्यंतिक क्षेमाचें वर्म। भागवतधर्म प्रतिपादी॥ ८४॥ ऐक राया नवलपरी। आपुला संकल्प आपणा वैरी। देहबुद्धी वाढवूनि शरीरीं। अतिदृढ करी भवभया॥ ८५॥ जयापाशीं देहबुद्धी। त्यासी सुख नाहीं त्रिशुद्धी। ते बुडाले द्वंद्वसंधीं। आधिव्याधिमहार्णवीं॥ ८६॥ जे देहबुद्धीपाशीं। सकळ दु:खांचिया राशी। महाभयाचीं भूतें चौंपाशीं। अहर्निशीं झोंबती॥ ८७॥ देहबुद्धीचिया नरा। थोर चिंतेचा अडदरा। संकल्पविकल्पांचा मारा। ममताद्वारा अनिवार॥ ८८॥ देहबुद्धीमाजीं सुख। अणुमात्र नाहीं देख। सुख मानिती ते महामूर्ख। दु:खजनक देहबुद्धी॥ ८९॥ दीपाचे मिळणीपाशीं। केवळ दु:ख पतंगासी। तरी आलिंगूं धांवे त्यासी। तेवीं विषयांसी देहबुद्धी॥ ९०॥ ऐशी असंत देहबुद्धी कुडी। वाढवी विषयांची गोडी। तेथें महाभयाची जोडी। जन्ममरणकोडी अनिवार॥ ९१॥ एवढा अनिवार संताप। देहबुद्धीपाशीं महापाप। जाणोनि धरी जो अनुताप। विषयीं अल्प गुंतेना॥ ९२॥ धरितां विषयांची गोडी। भोगाव्या जन्ममरणकोडी। येणें भयें विषय वोसंडी। इंद्रियांतें कोंडी अतिनेमें॥ ९३॥ इंद्रियें कोंडितां न कोंडती। विषय सांडितां न सांडती। पुढतपुढती बाधूं येती। यालागीं हरिभक्ती द्योतिली वेदें॥ ९४॥ इंद्रियें कोंडावीं न लगती। सहजें राहे विषयासक्ती। एवढें सामर्थ्य हरिभक्तीं। जाण निश्चितीं नृपवर्या॥ ९५॥ योगी इंद्रियें कोंडती। तीं भक्त लाविती भगवद्भक्तीं। योगी विषय जे त्यागिती। ते भक्त अर्पिती भगवंतीं॥ ९६॥ योगी विषय त्यागिती। त्यागितां देह दु:खी होती। भक्त भगवंतीं अर्पिती। तेणें होती नित्यमुक्त॥ ९७॥ हें नव्हे म्हणती विकल्पक। याचिलागीं येथें देख। ‘कायेन वाचा’ हा श्लोक। अर्पणद्योतक बोलिजेला॥ ९८॥ दारा सुत गृह प्राण। करावे भगवंतासी अर्पण। हे भागवतधर्म पूर्ण। मुख्यत्वें ‘भजन’ या नांव॥ ९९॥ अकराही इंद्रियवृत्ती। कैशा लावाव्या भगवद्भक्ती। ऐक राया तुजप्रती। संक्षेपस्थिती सांगेन॥ ३००॥ ‘मनें’ करावें हरीचें ध्यान। ‘श्रवणें’ करावें कीर्तिश्रवण। ‘जिव्हेनें’ करावें नामस्मरण। हरिकीर्तन अहर्निशीं॥ १॥ ‘करीं’ करावें हरिपूजन। ‘चरणीं’ देवालयगमन। ‘घ्राणीं’ तुलसीआमोदग्रहण। जिंहीं हरिचरण पूजिले॥ २॥ नित्य निर्माल्य मिरवे शिरीं। चरणतीर्थें अभ्यंतरीं। हरिप्रसाद ज्याचे उदरीं। त्या देखोनि दुरी भवभय पळे॥ ३॥ वाढतेनि सद्भावें जाण। चढतेनि प्रेमें पूर्ण। अखंड ज्यासी श्रीकृष्णभजन। त्यासी भवबंधन असेना॥ ४॥ सकळ भयांमाजीं थोर। भवभय अतिदुर्धर। तेंही हरिभक्तीसमोर। बापुडें किंकर केवीं राहे॥ ५॥ करितां रामकृष्णस्मरण। उठोनि पळे जन्ममरण। तेथें भवभयाचें तोंड कोण। धैर्यपण धरावया॥ ६॥ जेथें हरिचरणभजनप्रीती। तेथें भवभयाची निवृत्ती। परम निर्भय भगवद्भक्ती। आमुच्या मतीं निजनिश्चयो॥ ७॥ कृतनिश्चयो आमुचा जाण। येथें साक्षी वेद-शास्त्र-पुराण। सर्वात्मना भगवद्भजन। निर्भयस्थान सर्वांसी॥ ८॥ असो वेद शास्त्र पुराण। स्वमुखें बोलिला श्रीकृष्ण। मी सर्वथा भक्तिआधीन। भक्तिप्रधान भगवद्वाक्य॥ ९॥ उभवूनियां चारी बाह्या। निजात्मप्राप्तीच्या उपाया। ‘भक्त्याहमेकया ग्राह्य:’। बोलिला लवलाह्यां श्रीकृष्ण॥ १०॥
ये वै भगवता प्रोक्ता उपाया ह्यात्मलब्धये।
अञ्ज: पुंसामविदुषां विद्धि भागवतान् हि तान्॥ ३४॥
न करितां वेदशास्त्रव्युत्पत्ती। ऐशिया अज्ञानां निजात्मप्राप्ती। सुगम जोडे ब्रह्मस्थिती। यालागीं हरिभक्ती प्रकाशिली देवें॥ ११॥ न करितां वेदशास्त्रपठण। जड मूढ म्हणाल तरले कोण। उन्मत्तगजेंद्रउद्धरण। गर्भसंरक्षण परीक्षितीचें॥ १२॥ अंबरीषगर्भनिवारण। करावया भक्तीच कारण। ‘अहं भक्तपराधीन:’। स्वमुखें नारायण बोलिला॥ १३॥ वनचर वानर नेणों किती। उद्धरले भगवद्भक्तीं। अस्वलें तारावया निश्चितीं। विवरीं जांबवती भक्तीस्तव वरिली॥ १४॥ जाण पां अविवेकी केवळ। गौळी गोधनें गोपाळ। तेही उद्धरिले सकळ। श्रीकृष्णसखे प्रबळ अनन्यप्रीतीं॥ १५॥ शास्त्रविरुद्ध अविवेकस्थिती। जारभावें श्रीकृष्णप्रीती। गोपी उद्धरिल्या नेणों किती। अनन्यभक्तिसख्यत्वें॥ १६॥ न करितां नाना व्युत्पत्ती। सुगमोपायें ब्रह्मप्राप्ती। अबळें तरावया निश्चितीं। भगवंतें निजभक्ति प्रगट केली॥ १७॥ तें हें राया भागवत जाण। मुख्यत्वें भक्तिप्रधान। भावें करितां भगवद्भजन। अज्ञान जन उद्धरती॥ १८॥ हें भागवत नव्हे नव्हे। अज्ञानालागीं निजपव्हे। भवाब्धि तरावया भजनभावें। महानाव देवें निर्माण केली॥ १९॥ भागवताचे महानावे। जे रिघाले भजनभावें। त्यांसी भवभयाचे हेलावे। भजनस्वभावें न लागती॥ २०॥ स्त्रीशूद्रादि आघवे। घालूनियां ये नावे। एकेच खेपे स्वयें न्यावे। भजनभावें परतीरा॥ २१॥ जे आवलितां भावबळें। तोडी कर्माकर्मक्रूरजळें। स्वबोधाचेनि पाणीढाळें। काढिती एक वेळे निजात्मतीरा॥ २२॥ वैराग्याचे निजनावाडे। अढळ बसले चहूंकडे। विषयांचे आदळ रोकडे। चुकवूनि धडपुडे काढिती कांठा॥ २३॥ संचितक्रियमाणांच्या लाटा। मोडोनि लाविती नीट वाटा। वेंचूनि प्रारब्धाचा सांठा। निजात्मतटा काढिती॥ २४॥ तेथ गुरुवचन साचोकारें। सांभाळीत उणेंपुरें। भूतदयेचेनि दोरें। निजनिर्धारें वोढिती॥ २५॥ तंव एकाएकीं एकसरीं। काढिली परात्परतीरीं। तंव प्रत्यावृत्ती येरझारी। आत्मसाक्षात्कारीं खुंटली॥ २६॥ येथ धरिला पुरे भावो। तैं बुडणेंचि होय वावो। मग टाकावो जो ठावो। तो स्वयमेवो आपण होय॥ २७॥ येथ पव्हणयावीणा तरणें। प्रयासेंवीण प्राप्ति घेणें। सुखोपायें ब्रह्म पावणें। यालागीं नारायणें प्रकाशिली भक्ती॥ २८॥ भागवतधर्माचिये स्थिती। बाळीं भोळीं भवाब्धि तरती। सुखोपायें ब्रह्मप्राप्ती। तेचि श्लोकार्थीं विशद सांगे॥ २९॥
यानास्थाय नरो राजन्न प्रमाद्येत कर्हिचित्।
धावन्निमील्य वा नेत्रे न स्खलेन्न पतेदिह॥ ३५॥
जो श्रुतिस्मृती नेणता। भावें भजे भगवत्पथा। त्यासी विधिनिषेधबाधकता। स्वप्नींही सर्वथा प्रमादु न घडे॥ ३०॥ सद्भावेंसीं सप्रेम। आचरितां भागवतधर्म। बाधूं न शके कर्माकर्म। भावें पुरुषोत्तम संतुष्ट सदा॥ ३१॥ श्रुतिस्मृति हे दोन्ही डोळे। येणेंवीण जे आंधळे। तेही हरिभजनीं धांवतां भावबळें। पडे ना आडखुळें सप्रेमयोगें॥ ३२॥ प्रेमेंवीण श्रुतिस्मृतिज्ञान। प्रेमेंवीण ध्यानपूजन। प्रेमेंवीण श्रवण कीर्तन। वृथा जाण नृपनाथा॥ ३३॥ माता देखोनि प्रेमभावें। बालक डोळेझांकूनि धांवे। ते धांवेसवें झेंपावे। अति सद्भावें निजमाता॥ ३४॥ तैसा सप्रेम जो भजे भक्त। त्याभजनासवें भगवंतु। भुलला चाले स्वानंदयुक्तु। स्वयें सांभाळितु पदोपदीं॥ ३५॥ ऐसे आचरितां भागवतधर्म। बाधूं न शके कर्माकर्म। कर्मासी ज्याची आज्ञा नेम। तो पुरुषोत्तम भजनामाजीं॥ ३६॥ ऐसा भागवतधर्में गोविंदु। तुष्टला चाले स्वानंदकंदु। तेथें केवीं रिघे विधिनिषेधु। भक्तां प्रमादु कदा न बाधी॥ ३७॥ जेवीं कां स्वामीचिया बाळा। अवरोधु न करवे द्वारपाळा। तेवीं भागवतधर्मभजनशीळा। कर्मार्गळा बाधूं न शके॥ ३८॥ ज्यासी भगवद्भजनीं विश्वासु। विधिनिषेधु त्याचा दासु। देखोनि निजभजनविलासु। स्वयें जगन्निवासु सुखावे॥ ३९॥ भागवतधर्में राहे कर्म। तंव तंव सुखावे पुरुषोत्तम। सप्रेमभक्ता बाधी कर्म। हा वृथा भ्रम भ्रांतांसी॥ ४०॥ कर्म करूं पावे प्रमादु। तंव प्रमादीं प्रगटे गोविंदु। यालागीं विधिनिषेधु। न शकती बाधूं हरिभक्तां॥ ४१॥ अजामिळा कर्मबाध। यमपाशीं बांधितां सुबद्ध। तेथें प्रगटोनि गोविंद। केला अतिशुद्ध नाममात्रें॥ ४२॥ स्वधर्म-कर्म हेच दोनी। निजसत्ता भोयी करूनी। जो पहुडे भजनसुखासनीं। तो पडे तैं दंडणी स्वधर्म-कर्मां॥ ४३॥ भजनप्रतापसत्तालक्षणें। स्वधर्मकर्मां ऐसें दंडणें। वर्णाश्रमांचा ठावो पुसणें। होळी करणें कर्माची॥ ४४॥ एवं भागवतधर्में जे सेवक। स्वधर्मकर्म त्यांचें रंक। तें राहों न शके त्यांसन्मुख। मा केवीं बाधक हों शकेल॥ ४५॥ कैसे कैसे भागवतधर्म। केवीं भगवंती अर्पे कर्म। अतिगुह्य उत्तमोत्तम। निजभजनवर्म ऐक राया॥ ४६॥
कायेन वाचा मनसेन्द्रियैर्वा
बुद्धॺाऽऽत्मना वानुसृतस्वभावात्।
करोति यद्यत्सकलं परस्मै
नारायणायेति समर्पयेत्तत्॥ ३६॥
हेतुक अथवा अहेतुक। वैदिक लौकिक स्वाभाविक। भगवंतीं अर्पे सकळिक। या नांव देख ‘भागवतधर्म’॥ ४७॥ उदकीं तरंग अतिचपळ। जिकडे जाय तिकडे जळ। तैसें भक्ताचें कर्म सकळ। अर्पे तत्काळ भगवंतीं॥ ४८॥ ये श्लोकींचें व्याख्यान। पहिलें मानसिक अर्पण। पाठीं इंद्रियें बुद्धि अभिमान। कायिक जाण श्लोकान्वयें॥ ४९॥ भागवतधर्माची निजस्थिती। मन बुद्धि चित्त अहंकृती। आदिकरूनि इंद्रियवृत्ती। भगवंतीं अर्पिती तें ऐक॥ ५०॥ बाधूं न शके स्वधर्मकर्म। ऐक राया त्याचें वर्म। मनीं प्रगटला पुरुषोत्तम। अतिनि:सीम निजबोधें॥ ५१॥ म्हणोनि संकल्पविकल्प। अवघे जाहले भगवद्रूप। यालागीं भक्त नित्य निष्पाप। सत्यसंकल्प हरिदास॥ ५२॥ जेवीं बुद्धिबळांचा खेळ। राजा प्रधान गजदळ। अवघे काष्ठचि केवळ। तेवीं संकल्प सकळ भगवद्रूप॥ ५३॥ जो जो संकल्प कामी कामु। तो तो होय आत्मारामु। तेथ भजनाचा संभ्रमु। अतिनि:सीमु स्वयें वाढे॥ ५४॥ जागृति सुषुप्ती स्वप्न। तिहीं अवस्थां होय भजन। तेथ अखंड अनुसंधान। निजबोधें पूर्ण ठसावलें अंगीं॥ ५५॥ मना होतां समाधान। समाधानें अधिक भजन। पूर्ण बाणलें अनुसंधान। ध्येय-ध्याता-ध्यान समरसें भजे॥ ५६॥ तुर्या साक्षी उन्मनी। याही लाविल्या भगवद्भजनीं। जंववरी अवस्थापणीं। आपआपणीं मुकल्या नाहीं॥ ५७॥ ऐसा भावनेवीण उपजे भावो। तो तो तत्काळ होय देवो। मग अर्पणाचा नवलावो। न अर्पितां पहा हो स्वयें होय॥ ५८॥ स्वरूपें मिथ्या केलें स्वप्न। जागृती सोलूनि काढिलें ज्ञान। निवडोनि सुषुप्तिसुखसमाधान। तिहींतें पूर्ण एकत्र केलें॥ ५९॥ तये स्वरूपीं सगळें मन। स्वयेंचि करी निजात्मार्पण। तेथींचें सुखसमाधान। भक्त सज्ञान जाणती स्वयें॥ ६०॥ यापरी मानसिक जाण। सहज स्वरूपीं होय अर्पण। आतां इंद्रियांचें समर्पण। होय तें लक्षण ऐक राया॥ ६१॥ दीपु लाविजे गृहाभीतरीं। तोचि प्रकाशे गवाक्षद्वारीं। तेवीं मनीं प्रगटला श्रीहरी। तोचि इंद्रियांतरीं भजनानंदु॥ ६२॥ तेचि इंद्रियव्यापार। सांगिजती सविस्तर। स्वाभाविक इंद्रियव्यवहार। भजनतत्पर परब्रह्मीं॥ ६३॥ जंव दृष्टि देखे दृश्यातें। तंव देवोचि दिसे तेथें। यापरी दृश्यदर्शनातें। अर्पीं भजनसत्ते दृष्टीचा विषयो॥ ६४॥ दृश्य द्रष्टा आणि दृष्टी। देखतां तिन्ही एकवटी। सहजें ब्रह्मार्पण ते दृष्टी। भक्त जगजेठी यापरी अर्पी॥ ६५॥ दृश्य प्रकाशी दृश्यपणें। तेंचि दृष्टीमाजीं होय देखणें। ऐसेनि अभिन्नपणें। दर्शनार्पणें भजती भक्त॥ ६६॥ हे एकपणीं तीनही भाग। तिन्हीमाजीं एक अंग। ऐसें जें देखणें चांग। त्याचि अर्पणें साङ्ग सहजें अर्पी॥ ६७॥ नाना पदार्थ प्रांजळे। नीच नवे देखती डोळे। परी अर्पणाचे सोहळे। निजात्ममेळें अर्पिती स्वयें॥ ६८॥ यापरी दृष्टीचें दर्शन। भक्त करिती ब्रह्मार्पण। आतां श्रवणाचें अर्पणा। अर्पी तें लक्षण ऐक राया॥ ६९॥ जो बोलातें बोलविता। तोचि श्रवणीं झाला श्रोता। तोचि अर्थावबोधु जाणता। तेथें ब्रह्मार्पणता सहजेंचि॥ ७०॥ शब्दु शब्दत्वें जंव उठी। तंव शब्दविता प्रगटे पाठींपोटीं। तेणें अकृत्रिम भजन उठी। ब्रह्मार्पणमिठी श्रवणीं पडे॥ ७१॥ शब्दबोलासवें अर्थवाढी। तंव शब्दविता घे शब्दार्थगोडी। तेणें हरिभजनीं आवडी। स्वयें उठी गाढी श्रवणार्पणेंसीं॥ ७२॥ शब्द जंव कानीं पडे। तंव शब्दार्थें भजन वाढे। बोलवित्याच्या अंगा घडे। अर्पण उघडें करितांचि॥ ७३॥ बोलासी जो बोलविता। त्यासीं दृढ केली एकात्मता। तें भजन चढे श्रवणाच्या हाता। ब्रह्मार्पणता निजयोगें॥ ७४॥ सद्गुरुवचन पडतां कानीं। मनाचें मनपण विरे मनीं। तेंचि श्रवण ब्रह्मार्पणीं। भगवद्भजनीं सार्थकता॥ ७५॥ श्रवणेंचि यापरी श्रवण। करितां उठिलें ब्रह्मार्पण। हेतुरहित भगवद्भजन। स्वभावें जाण स्वयें होत॥ ७६॥ भजनें तुष्टला जगन्निवास। होय वासाचा निजवास। मग घ्राणद्वारा परेश। भोगी सुवास ब्रह्मार्पणेंसीं॥ ७७॥ जो सुमना सुमनपण जोडी। तो घ्राणाचेंही घ्राण होय आवडी। मग नाना सुवासपरवडी। ब्रह्मार्पणप्रौढीं निजभोग अर्पी॥ ७८॥ वासाचा अवकाश होय आपण। घ्राणीं ग्राहकपणें जाण। तो भोगुचि स्वयें संपूर्ण। कृष्णार्पण सहज होतु॥ ७९॥ रसना रस सेवूं जाये। तंव रसस्वादु देवचि होये। मग रसनेमाजीं येऊनि राहे। ब्रह्मार्पणें पाहे रसभोगवृत्ती॥ ८०॥ जे जे रसना सेवी गोडी। ते ते हरिरूपें धडफुडी। स्वादा येऊनि रोकडी। ब्रह्मार्पणपरवडी निजभोग अर्पी॥ ८१॥ रस-रसना-रसस्वादु। त्रिविधभेदें निजअभेदु। रससेवनीं परमानंदु। स्वानंदकंदु वोसंडे॥ ८२॥ कटु मधुर नाना रस। रसना सेवी सावकाश। परी तो अवघा ब्रह्मरस। स्वादीं सुरस परमानंदु॥ ८३॥ यापरी रसीं रसना। भोगें रतली कृष्णार्पणा। आतां स्पर्शविषयरचना। अर्पे ब्रह्मार्पणा तें ऐक राया॥ ८४॥ स्पर्श घेइजे निजदेहीं। तंव देहींच प्रगटे विदेही। मग स्पर्शी जें जें कांहीं। तो तो भोगु पाहीं ब्रह्मार्पणें उठी॥ ८५॥ स्पर्शास्पर्शें जें स्पर्शिजे। तंव स्पर्शावया नाडळे दुजें। तेणें एकपणाचेनि व्याजें। कृष्णार्पणवोजें भजन प्रगटे॥ ८६॥ तेथ जो जो घेईजे पदार्थु। तो तो पदार्थु होय समर्थु। तेणेंचि भजनें परमार्थु। निजस्वार्थु निजभक्तां॥ ८७॥ द्यावया कांहीं देवा जाये। तंव देतां भजन कैसें होये। देतें घेतें दान स्वयें। देवोचि होये निजांगें॥ ८८॥ जेउतें जेउतें चालवी पाये। तो तो मार्गु देवोचि होये। मग पाउलापाउलीं पाहे। निजभजन होये ब्रह्मार्पणेंशीं॥ ८९॥ चरणा चरणा निजगती। तोचि निजांगें क्षितीची क्षिती। चालतां तैशिया युक्ती। सहज ब्रह्मस्थिति निजकर्में अर्पी॥ ९०॥ बोल बोलवितिया वदनीं भेटी। बोलणें लाजे त्याचिया दृष्टी। ते लाज गिळून बोलणें उठी। निजभजनपुष्टी ब्रह्मार्पणेंसी॥ ९१॥ शब्द मावळे नि:शब्दीं। नि:शब्दचि बोलिजे शब्दीं। तोचि अर्पणाचा विधी। जाण त्रिशुद्धी समर्पितेनिशीं॥ ९२॥ बोलु बोलविता बोलाआंतु। तो बोलु अर्पणेंसींच येतु। ऐसा शब्देंचि भजनार्थु। प्रकटे परमार्थु ब्रह्मार्पणेंसीं॥ ९३॥ ऐसा मनें-कर्में-वचनें। जो दृढावला भगवद्भजनें। तेंचि भजन अभिमानें। निजनिर्वाणें दृढ धरी॥ ९४॥ तरंग समुद्राआंतौता। म्हणे माझेनि मेघु तत्त्वतां। जगातें निवविता जीवविता। तृषा हरिता चातकांची॥ ९५॥ माझेनि सस्यें पिकतीं। माझेनि सरिता उसळती। मागुती मजमाजीं मिळती। समरसती सिंधुत्वें॥ ९६॥ तेवीं मुळींचें पूर्णपण। पावोनि भजे अभिमान। त्याचे भजनाचें लक्षण। सावधान अवधारीं॥ ९७॥ म्हणे मी सकललोककर्ता। कर्म करोनि अकर्ता। मी सर्वभोगभोक्ता। नित्य अभोक्ता मी एकु॥ ९८॥ सकळ लोकीं माझी सत्ता। सकळीं सकळांचा नियंता। सकळां सकळत्वें मी प्रकाशिता। होय मी शास्ता सकळिकांचा॥ ९९॥ सकळां भूतीं मी एकु। मीचि व्याप्य व्यापकु। जनिता जनयिता जनकु। न होनि अनेकु जगद्रूप मी॥ ४००॥ मी देवांचा आदिदेवो। देवीं देवपणा माझाचि भावो। व्ययामाजीं मी अज अव्ययो। अक्षरीं अक्षरभावो माझेनि अंगें॥ १॥ ईश्वरीं जे जे सत्ता। ते ते माझी सामर्थ्यता। भगवंतीं भगवंतता। जाण तत्त्वतां माझेनि॥ २॥ मी आपरूपीं आपु। मी प्रकृतिपुरुषांचा बापु। सृष्टिरचनेचा संकल्पु। निर्विकल्पु पैं माझा॥ ३॥ मी आदीची अनादि आदी। मी समाधीची निजसमाधी। निजशुद्धीसी माझेनि शुद्धी। यापरी त्रिशुद्धी अभिमानार्पण॥ ४॥ मी अजन्मा न जन्मोनि जन्में। मी अकर्मा न करोनि करीं कर्में। माझेनि योगें पुरुषोत्तमें। पाविजे महिमे उत्तमत्वाचे॥ ५॥ सच्छब्दें माझें अंग। चिच्छब्दें मीचि चांग। न होनियां तिन्ही भाग। आनंद निर्व्यंग तोचि मी॥ ६॥ माझेनि सूर्यदृष्टी डोळस। मजमाजीं चिदाकाशाचा अवकाश। माझेनि अंगें जगन्निवास। सावकाश नांदतु॥ ७॥ अजा अजपणें मी अज। नि:शेष निर्बीजां मी बीज। माझेनि निजांगें निज। निजभोज स्वयें नाचे॥ ८॥ अधिष्ठाना मजमाजीं अधिवासु। मी जगदीशाचा पूर्ण ईशु। मी परम पुरुषाचाही पुरुषु। परेशा परेशु मीच स्वयें॥ ९॥ असंत माझेनि संत होये। अचित् माझेनि चिदत्व लाहे। निजानंदासीही पाहें। आनंदु निर्वाहे माझेनि॥ १०॥ मी सकळ सिद्धींची निजसिद्धी। मी सर्वांगदेखणी बुद्धीची बुद्धी। मोक्ष म्हणणें तोही उपाधी। जाण त्रिशुद्धी माझेनि॥ ११॥ मी साचार निजधर्म। मजमाजीं ब्रह्म विसरे कर्म। ब्रह्मसमाधीचें परब्रह्म। निजनि:सीम मीच मी॥ १२॥ हरि-हर-ब्रह्मा निजनिर्धारीं। हेही माझे अंशांशधारी। मी दशावतारांचा अवतारी। माझी निजथोरी मीही नेणें॥ १३॥ ऐसिया नाना विवंचना। अभिमानें भजे भगवद्भजना। ‘ब्रह्माहमस्मि’ दृढ भावना। आपण आपणा पूर्णत्वें अर्पी॥ १४॥ जीव घालूनि पूर्णत्वाआंतु। जें जें अभिमान कल्पितु। तें तें साचचि स्वयें होतु। तेंही पूर्णत्व अर्पितु निजपूर्णत्वीं॥ १५॥ ‘ब्रह्माहमस्मि’ नुसधें वचन। ये अहंते नाम भगवद्भजन। मा हा तंव तद्रूप होऊन। भजे अभिमान ब्रह्मार्पणेंसीं॥ १६॥ सांडूनि देहबुद्धीचा केरु। भजनें उठिला अहंकारु। तो अपरोक्ष निजसाक्षात्कारु। पावूनि पूर्ण निर्धारु पूर्णत्वें वर्ते॥ १७॥ म्हणौनि मनना मीचि मनन। स्मरणा मीचि नित्य स्मरण। चित्तासी मी निजचिंतन। चिंत्यधर्मेंवीण सर्वदा॥ १८॥ ज्याची सहसा प्राप्ति नव्हे। तें निजचित्तेंचि चिंतावें। तंव अप्राप्तीची प्राप्ति पावे। चित्त निजानुभवें सहज भजतां॥ १९॥ तेव्हां निश्चितें जें जें चिंती चित्त। तें तें स्वयेंचि होय समस्त। या प्रतीतीं चित्त भजत। ब्रह्मार्पणयुक्त निजबोधें॥ २०॥ नाथिलें चिंती ते ‘अतिचिंता’। आथिलें चिंती ते ‘निश्चिंतता’। आथी नाथी सांडिली चिंता। सहजें न भजतां भजन होये॥ २१॥ चित्त चिंत्य आणि चिंतन। यापरी तिहींस जाहलें समाधान। तें समाधानही कृष्णार्पण। सहजीं संपूर्ण स्वयें होये॥ २२॥ ऐसिया भगवद्भजनविधीं। भजनशील झाली बुद्धी। तैं सकळ कर्मीं समाधी। जाण त्रिशुद्धी स्वयें झाली॥ २३॥ कर्माचरणीं समाधी। एक म्हणती न घडे कधीं। ते पावले नाहीं निजात्मबोधीं। जाण त्रिशुद्धी विदेहा॥ २४॥ ताटस्थ्या नांव समाधी। म्हणे त्याची ठकली बुद्धी। ते समाधी नव्हे त्रिशुद्धी। जाणावी नुसधी मूर्च्छा आली॥ २५॥ ताटस्थ्यापासूनि उठिला। तैं तो समाधीस मुकला। तेव्हां एकदेशी भावो आला। मंदही या बोला न मानिती सत्य॥ २६॥ समाधी आणि एकदेशी। बोलतां बोलणें ये लाजेसी। सत्य मानी ते शब्दपिशी। शुद्ध स्वरूपासी अनोळख॥ २७॥ येथें प्राचीन अतिसमर्थ। तें मूर्च्छा आणोनि करी तटस्थ। वांचूनि चालते बोलते समाधिस्थ। जाण पां निश्चित वसिष्ठादिक॥ २८॥ पाहें पां देवर्षि नारदु। विनोदें न मोडे समाधिबोधु। याज्ञवल्क्याचा समाधिसंबंधु। ऋषिप्रसिद्धु परीक्षा केली॥ २९॥ स्वरूप देखोनि मूर्च्छित जाहला। तो आपणियां आपण तरला। स्वयें तरूनि जन उद्धरिला। तो बोधु प्रकाशिला शुकवामदेवीं॥ ३०॥ यालागीं समाधि आणि व्युत्थान। या दोनी अवस्थांसहित जाण। बुद्धी होये ब्रह्मार्पण। अखंडत्वें पूर्ण परमसमाधि॥ ३१॥ अर्जुना देऊनि निजसमाधी। सवेंचि घातला महायुद्धीं। परी तो कृष्ण कृपानिधी। ताटस्थ्य त्रिशुद्धी नेदीच स्पर्शों॥ ३२॥ सकळ कर्मीं समाधी। हे सद्गुरूचि बोधी बुद्धी। तरी युद्धींही त्रिशुद्धी। निजसमाधी न मोडे॥ ३३॥ बुद्धीं आकळलें परब्रह्म। तैं अहैतुक चाले कर्म। हेंचि बुद्धीचें अर्पण परम। इतर तो भ्रम अनुमानज्ञान॥ ३४॥ स्वरूपीं दृष्टी निवधी। अनवच्छिन्न समानबुद्धी। कर्माकर्मीं अज्ञान न बाधी। ‘परमसमाधी’ तिये नांव॥ ३५॥ नि:शेष गेलिया देहबुद्धी। स्वरूपपणें फुंज न बाधी। कर्माकर्मीं अज्ञान न बाधी। ते ‘परमसमाधी’ निर्दुष्ट॥ ३६॥ ते स्वरूपीं निरवधी। भजनशीळ झाली बुद्धी। ते सकळ कर्मीं समाधी। निजार्पणविधी स्वयें जाहली॥ ३७॥ जेथें शमली मनाची आधी। ते जाणावी ‘परमसमाधी’। समाधी घेणें ते देहबुद्धी। काष्ठ तें त्रिशुद्धी मूर्च्छितप्राय॥ ३८॥ मनासी ठाउकें नसे। इंद्रियीं व्यापारु तरी दिसे। कर्म निपजे जें ऐसें। तें जाणिजे आपैसें ‘कायिक’॥ ३९॥ श्वासोच्छ्वासांचे परिचार। कां निमेषोन्मेषांचे व्यापार। तेही नारायणपर। केले साचार निजस्वभावें॥ ४०॥ तरी देहगेहवर्णाश्रमें। स्वभागा आलीं जीं जीं कर्में। तीं तीं आचरोनि निजधर्में। पूर्वानुक्रमें अनहंकृती॥ ४१॥ साकरेचें कारलें प्रौढ। तें देठू-कांटेनशीं सर्वही गोड। तेवीं इंद्रियकर्मगूढ। स्वादिष्ठ सदृढ ब्रह्मार्पणें ब्रह्मीं॥ ४२॥ कर्मकलापु आघवा। आचरोनि आणी गौरवा। परी कर्तेपणाचिया गांवा। अहंभावा स्पर्शेना॥ ४३॥ मजपासून झालें सत्कर्म। माझा आचार अति उत्तम। म्यां निरसिलें मरणजन्म। हा स्वभावें देहधर्म उठोंचि नेणे॥ ४४॥ देहसंगें तरी वर्तणें। परी देहधर्म धरूं नेणे। देहस्वभाव लक्षणें। ब्रह्मार्पणें विचरती॥ ४५॥ देहधर्माचा नुठे फांटा। ज्ञानगर्वाचा न चढेचि ताठा। यालागीं सहज भजनामाजिवटा। झाला तो पैंठा अनहंकृती॥ ४६॥ त्यापासूनि जें जें निपजे। तें तें देवो म्हणे माझें खाजें। यालागीं ब्रह्मार्पणवोजें। त्याचे स्वभाव सहजें नार्पितां अर्पिती॥ ४७॥ परिसाचे कसवटीवऱ्हें। जें जें लागे तें तें साडेपंधरें। तेवीं निपजे जें जें शरीरें। तें तें खरें परब्रह्म॥ ४८॥ त्याचा खेळु तेंचि महापूजन। त्याची बडबड तेंचि प्रिय स्तवन। त्याचे स्वभावीं स्वानंदपूर्ण। श्रीनारायण सुखावे॥ ४९॥ तो जेउती वास पाहे। आवडीं देवो तेउता राहे। मग पाहे अथवा न पाहे। तरी देवोचि स्वयें स्वभावें दिसे॥ ५०॥ तयासी चालतां मार्गें। तो मार्गु होईजे श्रीरंगें। तो देवाचिया दोंदावरी वेगें। चाले सर्वांगें डुल्लत॥ ५१॥ जें जें कर्म स्वाभाविक। तें तें ब्रह्मार्पण अहेतुक। या नांव भजन निर्दोख। ‘भागवतधर्म’ देख या नांव॥ ५२॥ स्वाभाविक जें वर्तन। तें सहजें होय ब्रह्मार्पण। या नांव शुद्ध आराधन। भागवतधर्म पूर्ण जाण राया॥ ५३॥ यापरी भगवद्भजनपथा। भय नाहीं गा सर्वथा। ‘अभय’ पुशिलें नृपनाथा। तें जाण तत्त्वतां भजनें होय॥ ५४॥ येथें भयाचें कारण। राया तूं म्हणशील कोण। तेंही सांगों सावधान। ऐक श्रवणसौभाग्यनिधी॥ ५५॥
भयं द्वितीयाभिनिवेशत: स्या-
दीशादपेतस्य विपर्ययोऽस्मृति:।
तन्माययातो बुध आभजेत्तं
भक्त्यैकयेशं गुरुदेवतात्मा॥. ३७॥
आत्मा पूर्णत्वें सर्वत्र एक। तेथ जो म्हणे मी वेगळा देख। तेंचि अज्ञान भयजनक। दु:खदायक अतिद्वंद्वें॥ ५६॥ भयाचें मूळ दृढ अज्ञान। त्याचें निवर्तक मुख्य ज्ञान। तेथ कां लागलें भगवद्भजन। ऐसा ज्ञानाभिमान पंडितां॥ ५७॥ ऐक राया येचि अर्थी। ज्ञानासी कारण मुख्य भक्ती। हा कृतनिश्चयो आमुच्या मतीं। तेही उपपत्ती अवधारीं॥ ५८॥ अज्ञानाचें मूळ माया। जे ब्रह्मादिकां न ये आया। गुणमयी लागली प्राणियां। जाण ते राया अति दुस्तर॥ ५९॥ त्या मायेचें मुख्य लक्षण। स्वस्वरूपाचें आवरण। द्वैतांचें जें स्फुरे स्फुरण। ‘मूळमाया’ जाण तिचें नांव॥ ६०॥ ब्रह्म अद्वयत्वें परिपूर्ण। ते स्वरूपीं स्फुरे जें मीपण। तेंचि मायेचें जन्मस्थान। निश्चयें जाण नृपनाथा॥ ६१॥ ते मायेच्या निजपोटीं। भयशोकदु:खांचिया कोटी। ब्रह्माशिवादींचे लागे पाठी। इतरांची गोठी ते कोण॥ ६२॥ ते महामायेची निवृत्ती। करावया दाटुगी भगवद्भक्ती। स्वयें श्रीकृष्ण येचि अर्थीं। बोलिला अर्जुनाप्रती गीतेमाजीं॥ ६३॥
(भगवद्गीताश्लोकार्ध)—‘‘मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते॥’’ (अ० ७, श्लो० १४)
माया म्हणिजे भगवच्छक्ती। भगवद्भजनें तिची निवृत्ती। आन उपाय तेथें न चलती। भक्त सुखें तरती हरिमाया॥ ६४॥ हरीची माया हरिभजनें। हरिभक्तीं सुखेंचि तरणें। हें निजगुह्य अर्जुनाचेनि कारणें। स्वयें श्रीकृष्णें सांगितलें॥ ६५॥ मायेची हेच निजपुष्टी। स्वरूपीं विमुख करी दृष्टी। द्वैतभावें अत्यंत लाठी। भ्रमाची त्रिपुटी वाढवी सदा॥ ६६॥ भयाचें जनक द्वैतभान। द्वैतजनक माया जाण। मायानिवर्तक ब्रह्मज्ञान। हें संत सज्ञान बोलती॥ ६७॥ ऐसें श्रेष्ठ जें ब्रह्मज्ञान। तें भक्तीचें पोसणें जाण। न करितां भगवद्भजन। ब्रह्मज्ञान कदा नुपजे॥ ६८॥ जरी जाहले वेदशास्त्रसंपन्न। तिहीं न करितां भगवद्भजन। मायानिवर्तक ब्रह्मज्ञान। तयांसीही जाण कदा नुपजे॥ ६९॥ शब्दज्ञानाची व्युत्पत्ती। दाटुगी होय लौकिक स्थिती। मायानिवर्तक ज्ञानप्राप्ती। न करितां हरिभक्ती कदा नुपजे॥ ७०॥ हरिगुणांची रसाळ कहाणी। ते ब्रह्मज्ञानाची निजजननी। हरिनामाचेनि गर्जनीं। जीव घेऊनि माया पळे॥ ७१॥ माया पळतां पळों न लाहे। हरिनामधाकें विरोनि जाये। यालागीं हरिमाया पाहें। बाधूं न लाहे हरिभक्तां॥ ७२॥ नामाची परम दुर्धर गती। माया साहों न शके निजशक्ती। हरिभक्त माया सुखें तरती। यालागीं श्रीपती बोलिला स्वयें॥ ७३॥ सायुज्यादि चारी मुक्ती। अंकीं वाढवी भगवद्भक्ती। ते न करितां अनन्यगती। शास्त्रज्ञां मुक्ती न घडे कदा॥ ७४॥ हरिभजनीं जे विमुख। त्यांसी सदा द्वैत सन्मुख। महाभयेंसीं दु:खदायक। प्रपंचु देख दृढ वाढे॥ ७५॥ जेवीं एकाएकीं दिग्भ्रमु पडे। तो पूर्व म्हणे पश्चिमेकडे। तैसी वस्तुविमुखें वाढे। अतिगाढें मिथ्या द्वैत॥ ७६॥ द्वैताचिये भेदविहिरे। सुटती संकल्पविकल्पांचे झरे। तेथ जन्ममरणांचेनि पूरें। बुडे एकसरें ब्रह्मांडगोळ॥ ७७॥ जन्ममरणांचिया वोढी। नाना दु:खांचिया कोडी। अभक्त सोशिती सांकडीं। हरिभक्तांतें वोढी स्वप्नींही न लगे॥ ७८॥ भक्तीचें अगाध महिमान। तेथें रिघेना भवबंधन। तें करावया भगवद्भजन। सद्गुरुचरण सेवावे॥ ७९॥ निजशिष्याची मरणचिंता। स्वयें निवारी जो वस्तुतां। तोचि सद्गुरु तत्त्वतां। येर ते गुरुता मंत्रतंत्रोपदेशें॥ ८०॥ मंत्रतंत्र उपदेशिते। घरोघरीं गुरु आहेत आइते। जो शिष्यासी मेळवी सद्वस्तूतें। सद्गुरु त्यातें श्रीकृष्ण मानी॥ ८१॥ गुरु देवो गुरु माता पिता। गुरु आत्मा ईश्वर वस्तुतां। गुरु परमात्मा सर्वथा। गुरु तत्त्वतां परब्रह्म॥ ८२॥ गुरूचे उपमेसमान। पाहतां जगीं न दिसे आन। अगाध गुरूचें महिमान। तो भाग्येंवीण भेटेना॥ ८३॥ निष्काम पुण्याचिया कोडी। अगाध वैराग्य जोडे जोडी। नित्यानित्यविवेकआवडी। तैं पाविजे रोकडी सद्गुरुकृपा॥ ८४॥ सद्गुरुकृपा हातीं चढे। तेथें भक्तीचें भांडार उघडे। तेव्हां कळिकाळ पळे पुढें। कायसें बापुडें भवभय॥ ८५॥ गुरूतें म्हणों मातापिता। ते एकजन्मीं सर्वथा। हा सनातन तत्त्वतां। जाण पां वस्तुता मायबापु॥ ८६॥ अधोद्वारें उपजविता। ते लौकिकीं मातापिता। अधोद्वारा आतळों नेदिता। तो सद्गुरु पिता सत्यत्वें शिष्यां॥ ८७॥ गुरूतें म्हणों कुळदेवता। तिची कुळकर्मीच पूज्यता। हा सर्व कामीं अकर्ता। पूज्य सर्वथा सर्वार्थीं॥ ८८॥ गुरु म्हणों देवासमान। तंव देवांसी याचेनि देवपण। मग त्या सद्गुरूसमान। देवही जाण तुकेना॥ ८९॥ गुरु ब्रह्म दोनी समान। हेही उपमा किंचित न्यून। गुरुवाक्यें ब्रह्मा ब्रह्मपण। तें सद्गुरूसमान अद्वयत्वें॥ ९०॥ यालागीं अगाध गुरुगरिमा। उपमा नाहीं निरुपमा। ब्रह्मीं ब्रह्मत्व-प्रमाण-प्रमा। हे वाक्यमहिमा गुरूची॥ ९१॥ ब्रह्म सर्वांचें प्रकाशक। सद्गुरु तयाचाही प्रकाशक। एवं गुरूहूनि अधिक। नाहीं आणिक पूज्यत्वें॥ ९२॥ यालागीं गुरूतें मनुष्यबुद्धीं। पाहों नये गा त्रिशुद्धी। ऐशिये भावार्थबुद्धी। सहजें चित्तशुद्धी सच्छिष्यां॥ ९३॥ ज्यांचा गुरुचरणीं नि:सीम भावो। त्यांचा मनोरथ पुरवी देवो। गुरुआज्ञा देवो पाळी पहा हो। गुरुवाक्यें स्वयमेवो जड मूढ तारी॥ ९४॥ ब्रह्मभावें जे गुरुसेवक। देवो त्यांचा आज्ञाधारक। त्यांसी नित्य पुरवी निजात्मसुख। हे गुरुमर्यादा देख नुल्लुंघी देवो॥ ९५॥ देवो गुरुआज्ञा स्वयें मानी। तंव गुरु देवासी पूज्यत्व आणी। एवं उभयतां अभिन्नपणीं। भावार्थियांलागोनी तारक॥ ९६॥ सद्भावो नाहीं अभ्यंतरीं। बाह्य भक्ति भावेंचि करी। ते भावानुसारें संसारीं। नानापरी स्वयें ठकती॥ ९७॥ ठकले ते मनुष्यगती। ठकले ते निस्वार्थी। ठकले ते ब्रह्मप्राप्ती। दंभें हरिभक्ती कदा नुपजे॥ ९८॥ येथ भावेंवीण तत्त्वतां। परमार्थु न ये हाता। सकळ साधनांचे माथां। जाण तत्त्वतां सद्भावो॥ ९९। कोरडिये खांबीं धरितां सद्भावो। तेथेंचि प्रगटे देवाधिदेवो। मा सद्गुरु तंव तो पहा वो। स्वयें स्वयमेवो परब्रह्म॥ ५००॥ यालागीं गुरुभजनापरता। भजावया मार्गु नाहीं आयता। ज्ञान-भक्ति जे तत्त्वतां। ते जाण सर्वथा सद्गुरुभक्ति॥ १॥ गुरूहूनि श्रेष्ठ ब्रह्म। म्हणतां गुरुत्वा आला कनिष्ठ धर्म। ऐसा भाव धरितां विषम। ब्रह्मसाम्य शिष्यां नुपजे॥ २॥ आम्हां सद्गुरु तोचि परब्रह्म। ऐसा नित्य निजभाव सप्रेम। हेचि गुरुसेवा उत्तमोत्तम। शिष्य परब्रह्म स्वयें होये॥ ३॥ ऐशिये गुरुसेवेआंत। प्रल्हाद झाला द्वंद्वातीत। नारद स्वानंदें गात नाचत। ब्रह्मसाम्यें विचरत सुरासुरस्थानें॥ ४॥ ऐसीचि गुरुसेवा करितां। चुकली अंबरीषाची गर्भव्यथा। ते गर्भ जाहला देवोचि साहता। भक्तां भवव्यथा बाधों नेदी॥ ५॥ ऐशिया अभिन्न भावना। सुबुद्धी भजती गुरुचरणां। ते पढियंते जनार्दना। त्यांसी भवभावना शिवों नेदी॥ ६॥ गुरु ब्रह्म दोनी एक। शिष्यही असे तदात्मक। जे भेदें मानिती वेगळिक। तेही मायिक कविसांगे॥ ७॥
अविद्यमानोऽप्यवभाति हि द्वयो-
र्ध्यातुर्धिया स्वप्नमनोरथौ यथा।
तत्कर्मसङ्कल्पविकल्पकं मनो
बुधो निरुन्ध्यादभयं तत: स्यात्॥ ३८॥
पुरुषासी जो प्रपंचु दिसे। तो नसतांचि मिथ्या आभासे। जेवीं कां एकला निद्रावशें। स्वप्नीं निजमानसें जग कल्पी॥ ८॥ असोनि निद्रावश दिसे स्वप्न। जो जागा होवोनि आपण। करूं बैसे मनोरथध्यान। तो नसतेंचि जन वन एकत्वीं देखे॥ ९॥ हो कां घालोनि आसन। जो करी मूर्तिचिंतन। त्यासी ध्येय-ध्याता-उपचार-ध्यान। नसतेंच जाण कल्पित भासे॥ १०॥ जेवीं धनलोभ्याचें हारपे धन। परी वासना न सांडी धनधान्य। धनातें आठवितां मन। धनलोभें पूर्ण पिसें होये॥ ११॥ मन स्वयें जरी नव्हे धन। तरी धनकोश आठवी मन। तंव स्मृती वळघे वन। व्यामोहें पूर्ण पिसें होय॥ १२॥ तेवीं व्यामोहाचें पूर्ण भरित। मिथ्या भासे देहादि द्वैत। तें अहंभावें मानितां आप्त। भवभय निश्चित आदळे अंगीं॥ १३॥ भवभयाचें कारण। मन:कल्पना मुख्य जाण। त्या मनाचें करावया निरोधन। सद्गुरुवचननिजनिष्ठा॥ १४॥ हें जाणोनि सच्छिष्य ज्ञाते। गुरुवाक्यें विश्वासयुक्तें। विवेकवैराग्याचेनि हातें। निजमनातें आकळिती॥ १५॥ तेचि आकळती हातवटी। संक्षेपें राया सांगेन गोष्टी। सद्गुरुवाक्य परिपाटी। जे मनातें थापटी निजबोधें॥ १६॥ चंचळत्वें विषयध्यान। करितां देखे जें जें मन। तें तें होय ब्रह्मार्पण। सद्गुरुवचननिजनिष्ठा॥ १७॥ धरूनियां विषयस्वार्थु। मनें जो जो घेइजे अर्थु। तो तो होय परमार्थु। हा अनुग्रहो समर्थु गुरुकृपेचा॥ १८॥ जो भुईभेणें पळों जाये। तो जेथें पळे तेथें भू ये। मग येणेंजाणें स्वयें राहे। ठायीं ठाये पांगुळला॥ १९॥ तैसें मनासी लाविजे वर्म। जें जें देखे तेंचि ब्रह्म। जें जें करूं बैसे कर्म। तेथ पुरुषोत्तम स्वयें प्रगटे॥ २०॥ एवं इंद्रियवृत्तिउल्लाळे। मोडिले गुरुवाक्यप्रतीतिबळें। निजाधिष्ठानमेळें। कळासलें येके वेळे अखंड कुलुप॥ २१॥ ऐसें नेमितां बाह्य कर्म। मनाचा मोडे द्वैतभ्रम। तंव बाह्य परब्रह्म। पूर्ण चिव्द्योम कोंदाटे॥ २२॥ ऐसें भजनें मन नेमितां स्वयें। न रिघे कल्पांतकाळभये। भक्त होऊनियां निर्भयें। विचरती स्वयें नि:शंक॥ २३॥ हे अगाध निष्ठा परिपूर्ण। भोळ्ॺाभाळ्ॺा न टके जाण। यालागीं सुगम साधन। सांगेन आन तें ऐक॥ २४॥
शृण्वन् सुभद्राणि रथाङ्गपाणे-
र्जन्मानि कर्माणि च यानि लोके।
गीतानि नामानि तदर्थकानि
गायन्विलज्जो विचरेदसङ्ग:॥ ३९॥
तरावया भाळेभोळे जन। मुख्य चित्तशुद्धीच कारण। जन्मकर्म हरीचे गुण। करावे श्रवण अत्यादरें॥ २५॥ चुकल्या पुत्राची शुद्धिवार्ता। जेणें सादरें ऐके माता। तेणें सादरें हरिकथा। सार्थकता परिसावी॥ २६॥ हरीचीं जन्मकर्में अनंत गुण। म्हणाल त्यांचें नव्हेल श्रवण। लोकप्रसिद्ध जें जें पुराण। तें श्रद्धा संपूर्ण ऐकावें॥ २७॥ बहु देव बोलिले पुराणीं। तेही लागती ज्याचे चरणीं। तो समर्थ चक्रपाणि। जो वेदपुराणीं वंदिजे॥ २८॥ त्याचीं जीं जीं जन्में अतिअद्भुत। जीं जीं कर्में परमार्थयुक्त। स्वमुखें बोलिला भगवंत। तीं तीं ज्ञानार्थ परिसावीं॥ २९॥ जें जें केलें पुराणश्रवण। तें तें व्यर्थ होय मननेंविण। यालागीं श्रवण-मनन। सावधान करावें॥ ३०॥ मोलें घेतली जे गाये। दुभतें खातां विषय होये। तेचि दान देतां लवलाहें। दुभती होये परमामृतें॥ ३१॥ तेवीं केलें जें श्रवण। तें मननें परम पावन। तेंचि उपेक्षितां जाण। परिपाकीं पूर्ण वांझ होय॥ ३२॥ हरिनाम पडतां श्रवणीं। एकां गळोनि जाये वदनीं। एकां ये कानींचें ते कानीं। जाय निघोनि हरिनाम॥ ३३॥ हरिनाम पडतां श्रवणीं। ज्याचे रिघे अंत:करणीं। सकळ पापा होवोनि धुणी। हरिचरणीं तो विनटे॥ ३४॥ यापरी श्रवणीं श्रद्धा। मननयुक्त करितां सदा। तैं विकल्प बाधीना कदा। वृत्ति शुद्धा स्वयें होये॥ ३५॥ ऐसें मननयुक्त श्रवण। करितां वोसंडे हर्ष पूर्ण। तेणें हर्षें हरिकीर्तन। करी आपण स्वानंदें॥ ३६॥ हरिचरित्रें अगाध। ज्ञानमुद्रा-पदबंध। कीर्तनीं गातां विशद। परमानंद वोसंडे॥ ३७॥ वानिती अजन्मयाचीं जन्में। वानिती अकर्मियाचीं कर्में। स्मरती अनामियाचीं नामें। अतिसप्रेमें डुल्लत॥ ३८॥ साधावया निजकाज। सांडूनि लौकिकाची लाज। कीर्तनीं नाचती भोज। अतिनिर्लज्ज नि:शंक॥ ३९॥ कीर्तनें निर्दळिले दोष। जप तप ठेले निरास। यमलोक पाडिला वोस। तीर्थाची आस निरास जाहली॥ ४०॥ यमनियमां पडती उपवास। मरों टेंकले योगाभ्यास। कीर्तनगजरें हृषीकेश। निर्दळी दोष नाममात्रे॥ ४१॥ कीर्तनाचा घडघडाट। आनंदु कोंदला उद्भट। हरुषें डोले वैकुंठपीठ। तेणें सुखें नीलकंठ तांडवनाचें नाचतु॥ ४२॥ यापरी हरिकीर्तन। देत परम समाधान। हा भक्ति-राजमार्ग पूर्ण। ये मार्गीं स्वयें रक्षण चक्रपाणि कर्ता॥ ४३॥ चक्र घेऊनि भक्तांचे ठायीं। म्हणे तुझें कार्य कायी। मज जगीं वैरीचि नाहीं। भक्तद्वेषी पाहीं निजशस्त्रें नाशी॥ ४४॥ चक्रें अभिमानाचा करी चेंदा। मोहममता छेदी गदा। शंखें उद्बोधी निजबोधा। निजकमळें सदा निजभक्त पूजी॥ ४५॥ जेथें चक्रपाणि रक्षिता। तेथें न रिघे भवभयाची कथा वार्ता। यापरी कीर्तिवंता। हरि सर्वथा स्वयें रक्षी॥ ४६॥ ज्यांसी न करवे कथाश्रवण। अथवा न टके हरिकीर्तन। तिंहीं करावें नामस्मरण। ‘राम-कृष्ण-गोविंद’॥ ४७॥ ‘अच्युत’-नामाची निजख्याती। चेवल्या कल्पांतीं हों नेदी च्युती। त्या नामातें जे नित्य स्मरती। ते जाण निश्चितीं अच्युतावतार॥ ४८॥ रामकृष्णादि नामश्रेणी। अखंड गर्जे ज्यांची वाणी। त्यांसी तीर्थें येती लोटांगणीं। सुरवर चरणीं लागती स्वयें॥ ४९॥ बाप नामाचें निजतेज। यम वंदी चरणरज। नामापाशीं अधोक्षज। चतुर्भुज स्वयें तिष्ठे॥ ५०॥ नामाचेनि पडिपाडें। कायिसें भवभय बापुडें। कळिकाळाचें तोंड कोणीकडे। नामापुढें रिघावया॥ ५१॥ जेवढी नामाची शक्ति। तेवढें पाप नाहीं त्रिजगतीं। नामापाशीं चारी मुक्ति। जाण निश्चितीं विदेहा॥ ५२॥ ऐक राया सावधान। नामापरतें सुगम साधन। सर्वथा नाहीं नाहीं आन। निश्चय जाण नेमस्त॥ ५३॥ जन्म-नाम-कर्में श्रीधर-। श्रवणें उद्धरती पामर। यालागीं हरिलीला सुभद्र। शास्त्रज्ञ नर वर्णिती॥ ५४॥ ऐसा बाणल्या भक्तियोग। न धरी जाणपणाचा फूग। त्यजूनि अहंममतापांग। विचरती नि:संग हरिकीर्तनें॥ ५५॥ करितांश्रवण स्मरण कीर्ति। तेणें वाढे सप्रेम भक्ति। भक्त विसरे देहस्फूर्ति। ऐक तेही स्थिति सांगेन राया॥ ५६॥
एवंव्रत: स्वप्रियनामकीर्त्या
जातानुरागो द्रुतचित्त उच्चै:।
हसत्यथो रोदिति रौति गाय-
त्युन्मादवन्नृत्यति लोकबाह्य:॥ ४०॥
हरिनामगुणकीर्तनकीर्ती। अखंड आवडे जागृतीं। स्वप्नींही तेचि स्थिती। दृढ हरिभक्ती ठसावे॥ ५७॥ ऐशियापरी भक्तियुक्त। दृढतर जाहलें ज्याचें व्रत। तंव तंव होय आर्द्रचित्त। प्रेमा अद्भुत हरिनामकीर्ती॥ ५८॥ आत्मा परमप्रिय हरी। त्याचे नामकीर्तीचा हर्ष भारी। नित्य नवी आवड वरी। सबाह्याभ्यंतरीं हरि प्रगटे॥ ५९॥ चुकल्या मायपूतां संकटीं। एकाकीं बहुकाळें जाहली भेटी। तेणें वोरडे घालोनि मिठी। चाले जेवीं पोटीं अनिवार रुदन॥ ६०॥ तेवीं जीवशिवां अवचटी। भक्तीचे पेठे जाहली भेटी। आत्मसाक्षात्कारें पडे मिठी। ते संधीमाजीं उठी अनिवार रुदन॥ ६१॥ परमात्मयासी आलिंगन। तेणें अनिवार स्फुंदन। रोमांचित रुदन। सप्रेम पूर्ण उसासोनि करी॥ ६२॥ सवेंचि गदगदोनि हांसे। मानी मजमाजींच मी असें। चुकलों भेटलों हें ऐसें। देखोनि आपुलें पिसें हांसोंचि लागे॥ ६३॥ मी अखंडत्वें स्वयें संचलों। अभेदपूर्णत्वें अनादि रचलों। तो मी अव्ययो म्हणे जाहलों मेलों। येणें आठवें डोलडोलों हांसोंचि लागे॥ ६४॥ पळतां दोराच्या सर्पाभेण। पडे अडखळे भयें पूर्ण। तोच दोरातें वोळखोन। आपणियां आपण स्वयें हांसे॥ ६५॥ तेवीं संसाराचा अभावो। देहभाव समूळ वावो। तेथें नाथिली ममता अहंभावो। मज होता पहा वो म्हणूनि हांसे॥ ६६॥ बाप गुरुवाक्य निजनिर्वाहो। देहीं असतां विदेहभावो। माझे चारी देह झाले वावो। येणें अनुभवें पहा वो गर्जों लागे॥ ६७॥ म्हणे धन्य धन्य भगवद्भक्ती। जिणें मिथ्या केल्या चारी मुक्ती। मी परमात्मा निजनिश्चितीं। येणें उल्हासें त्रिजगती गर्जवी गजरें॥ ६८॥ धन्य भगवंताचें नाम। नामें केलों नित्य निष्काम। समूळ मिथ्या भवभ्रम। गर्जोनि नि:सीम हाक फोडी॥ ६९॥ आतां दुजें नाहींच त्रिलोकीं। दिसे तें तें मीच मी कीं। मीच मी तो एकाकी। येणें वाक्यें अलोलिकी हाक फोडी॥ ७०॥ दुर्धर भवबंध ज्याचेनि। नि:शेष गेला हारपोनी। त्या सद्गुरूच्या निजस्तवनीं। गर्जवी वाणी अलौलिक॥ ७१॥ म्हणे संसार झाला वावो। जन्ममरणांचा अभावो। कळिकाळासी नाहीं ठावो। म्हणोनियां पहा वो हाक फोडी॥ ७२॥ ऐशा हाकांवरी हाका। फोडूं लागे अलौलिका। सवेंचि गाये निजात्मसुखा। स्वानंदें देखा डुल्लतु॥ ७३॥ परम सख्याची गोड कथा। तृप्ती न बाणे स्वयें सांगतां। तेवीं निजानुभवें हरि गातां। धणी सर्वथा पुरेना॥ ७४॥ त्याचें गाणें ऐकतां। सुखरूप होय सज्ञान श्रोता। मुमुक्षां होय परमावस्था। जरी तो अवचिता गावों लागे॥ ७५॥ गातां पदोपदीं निजसुख। कोंदाटे अधिकाधिक। वोसंडतां परम हरिख। स्वानंदें अलौलिक नाचों लागे॥ ७६॥ सारूनि दुजेपणाचें काज। निरसोनि लौकिकाची लाज। अहंभावेंविण सहज। आनंदाचे भोजें अलौलिक नाचे॥ ७७॥ जो मोलें मदिरा खाये। तो मदिरानंदें नाचे गाये। जेणें ब्रह्मानंदु सेविला आहे। तो केवीं राहे आवरला॥ ७८॥ यालागीं तो लोकबाह्यता। स्वये नाचे ब्रह्मउन्मादता। लोक मानिती तया पिशाचता। हा बोधु पंडितां सहजा न कळे॥ ७९॥ त्याचिया निजबोधाची कथा। ऐक सांगेन नृपनाथा। एक भगवंतावांचून सर्वथा। त्यासी लौकिकता दिसेना॥ ८०॥
खं वायुमग्निं सलिलं महीं च
ज्योतींषि सत्त्वानि दिशो द्रुमादीन्।
सरित्समुद्रांश्च हरे: शरीरं
यत्किञ्च भूतं प्रणमेदनन्य:॥ ४१॥
ब्रह्मउन्मादपरमानंदें। जंव जंव पाहे स्वानंदबोधें। तंव तंव चराचर पूर्णानंदें। देखे स्वानंदकंदें दुमदुमित॥ ८१॥ पृथ्वी आप तेज वायु नभ। देखे हरिरूप स्वयंभ। भूतां महाभूतांचें डिंभ। न देखे भिन्न कोंभ अभिन्नत्वें॥ ८२॥ जेवीं न मेळवितां मेळा। पाहतां जैसा केळीचा कळा। स्वयें विकासे फळां दळां। तेवीं वस्तु हे पांचाला भूतभौतिकात्मक॥ ८३॥ जेवीं कांतोनियां रंध्रसळे। स्फटिकदीपगृह-अंगमेळें। चितारिलीं अश्वगजदळें। तीं भासती सोज्ज्वळें आंतुलेनि दीपें॥ ८४॥ तेवीं सोमसूर्यादि तेजशक्ती। कां वन्हि नक्षत्रें जे लखलखिती। जननयनादि निजदीप्ती। देखे आत्मज्योती सतेज॥ ८५॥ युक्तीं मेळवितां द्रव्यांतर। अग्नि परी भासे पुष्पाकार। तेवीं वस्तु स्वलीला साचार। रविचंद्राकार नानात्वें भासे॥ ८६॥ पृथ्वी गंधरूपें स्वयें असे। तो गंधु कस्तूर्यादिकीं भासे। तेवीं भगवत्सत्ता सर्वत्र असे। परी सात्त्विकीं दिसे अतिप्रगट॥ ८७॥ यालागीं सात्त्विकाठायीं सत्त्व। तेथ देखे भगवत्तत्त्व। सत्त्वें सत्त्वंतां महत्त्व। अति मान्यत्व हरिरूपें॥ ८८॥ पृथ्वीसी जळावरण आहे। तेंचि चतु:समुद्र नांव लाहे। तैसें देवाचेंचि अंग पाहे। दिशात्वें वाच्य होये दशदिशां॥ ८९॥ पूर्वपश्चिमादि योग। दशदिशांचे दिग्विभाग। तेही देवाचेंचि अंग। तद्रूप श्रीरंग स्वयें भासे॥ ९०॥ तृण दूर्वा दर्भ द्रुम। देखोनि म्हणे हेही हरीचे रोम। अनोळखा हें अतिविषम। निजांगीं सर्व सम हरिरूप पाहतां॥ ९१॥ जैशा आपुल्या अंगोळिया। गणितां दिसती वेगळालिया। परी असती लागलिया। स्वयें सगळिया अखंड अंगीं॥ ९२॥ तेवीं वन-वल्ली-दर्भ-दांग। देखोनि म्हणे हें हरीचें अंग। अनन्यभावें लगबग। भिन्नभाग देखेना॥ ९३॥ म्हणे दूर्वा-द्रुम-वन-वल्ली। हेचि अनंत कोटी रोमावळी। हरीचेनि अंगें असे वाढली। त्या निजशोभा शोभली हरिरूपत्वें॥ ९४॥ जेवीं वटाच्या पारंबिया। लोंबोनि वाढती वेगळालिया। त्याही वटरूपें संचलिया। वटत्वा मुकलिया म्हणों नये॥ ९५॥ तेवीं चैतन्यापासोनि वोघ। निघाले सरितारूप अनेग। तेही चैतन्यघन चांग। चिद्रूपें साङ्ग सदा वाहती॥ ९६॥ हो कां चंद्रबिंबीं अमृत जैसें। बिंबीं बिंबरूप होऊनि असे। तेवीं भगवंतीं संसारु भासे। भजनविश्वासें भगवद्रूप॥ ९७॥ ऐसे वेगवेगळे भाग। पाहतां उल्हासे जंव चांग। तंव अवघें उघडें जग। देवोचि साङ्ग स्वयें झाला॥ ९८॥ यालागीं सर्व भूतांचे ठायीं। अनन्यशरण कैसा पाहीं। लवण जैसें सागरापायीं। ठायीं ठायीं जडोनि ठाके॥ ९९॥ तेथ मुंगीही देखोनि जाण। हरिरूपीं वंदी आपण। मशकासही अनन्यशरण। घाली लोटांगण भगवद्रूपें॥ ६००॥ गो-खर-चांडाळ-श्वान। अतिनिंद्य जे हीन जन। ते भगवद्रूप देखोनि पूर्ण। घाली लोटांगण अनन्यभावें॥ १॥ हरिरूपें देखे पाषाण। भगवद्रूपें वंदी तृण। जंगमस्थावरादिकां शरण। घाली लोटांगण चिदैक्यभावें॥ २॥ करितां हरिनामस्मरणकीर्त्ति एकाएकीं एवढी प्राप्ति। झाली म्हणसी कैशा रीति। ऐकें नृपती तो भावो॥ ३॥ करितांपूजाविधिविधान। कां श्रवण स्मरण कीर्तन। सर्वदा चिदैक्यभावना पूर्ण। ‘पूर्ण प्राप्ति’ जाण त्यातेंचि वरी॥ ४॥
भक्ति: परेशानुभवो विरक्ति-
रन्यत्र चैष त्रिक एककाल:।
प्रपद्यमानस्य यथाश्नत: स्यु-
स्तुष्टि: पुष्टि: क्षुदपायोऽनुघासम्॥ ४२॥
आइकें विदेहा चक्रवर्ती। ऐशी जेथें भगवद्भक्ति। तीपाशीं विषयविरक्ति। ये धांवती गोवत्सन्यायें॥.५॥ हें असो जेवीं जावळीं फळें। हों नेणें येरयेरां वेगळें। तेवीं भक्ति विरक्ति एके काळें। भक्त तेणें बळें बळिष्ठ होती॥ ६॥ जेथ भक्ति आणि विरक्ती। नांदों लागती सहजस्थिती। तेथेंचि पूर्णप्राप्ती। दासीच्या स्थितीं सर्वदा राबे॥ ७॥ यापरी भगवद्भक्ती। पूर्ण दाटुगी त्रिजगतीं। भक्तांघरीं नांदे प्राप्ती। भक्तिविरक्तिनिजयोगें॥ ८॥ भक्ति विरक्ति अनुभवप्राप्ती। तिन्ही एके काळें होती। ऐक राया तेही स्थिती। विशदोक्तीं सांगेन॥ ९॥ जैसी कीजे भगवद्भक्ती। तैसीच होय विषयविरक्ती। तदनुसारें अनुभवस्थिती। ती भक्त पावती तेचि क्षणीं॥ १०॥ जेवीं कां भुकेलियापाशीं। ताट वाढिलें षड्रसीं। तो पुष्टि तुष्टि क्षुधानाशासी। जेवीं ग्रासोग्रासीं स्वयेंचि पावे॥ ११॥ जितुका जितुका घेइजे ग्रास। तितुका तितुका क्षुधेचा नाश। तितुकाचि पुष्टिविन्यास। सुखोल्हास तितुकाचि॥ १२॥ पुष्टि तुष्टि क्षुधानाशनी। जेवीं एके काळें येती तिनी। भोक्ता पावे स्वयें भोजनीं। तेवीं भगवद्भजनीं भक्त्यादि त्रिकुट॥ १३॥ सद्भावें करितां भगवद्भक्ती। भक्ति-विरक्ति-भगवत्प्राप्ती। तिनी एके काळें होती। ऐशिया युक्तीं जाणिजे राया॥ १४॥ ‘भक्ति’ म्हणजे सर्व भूतीं। सप्रेम भजनयुक्ती। ‘प्राप्ति’ म्हणिजे अपरोक्षस्थिती। भगवत्स्फूर्ती अनिवार॥ १५॥ ‘विरक्ति’ म्हणिजे ऐशी पहा हो। स्त्रीपुत्रदेहादि अहंभावो। समूळ जेथें होय वावो। विरक्ति निर्वाहो या नांव राया॥ १६॥ यापरी भजनाचे पोटीं। भक्ति-विरक्ति-प्राप्ति त्रिपुटी। ऐक्यभावें सद्भक्तां उठी। हरिभजनदिठी एकेचि काळीं॥ १७॥ यालागीं राया निजहितार्थी। आदरें करावी हरिभक्ती। तेणें अवश्य भगवत्प्राप्ती। उपसंहारार्थी कवि सांगे॥ १८॥
इत्यच्युताङ्घ्रिं भजतोऽनुवृत्त्या
भक्तिर्विरक्तिर्भगवत्प्रबोध:।
भवन्ति वै भागवतस्य राजं-
स्तत: परां शान्तिमुपैति साक्षात्॥ ४३॥
यापरी अनन्य भक्ती। जे सर्वदा सर्वभूतीं करिती। ते भक्ती-विरक्ती-भगवत्प्राप्ती। सहजें पावती अनायासें॥ १९॥ राया हरिभक्तिदिव्यांजन। तें लेऊनि भक्त सज्जन। साधिती भगवन्निधान। निजभजनमहायोगें॥ २०॥ करितां ऐक्यभावें निजभक्ती। उत्कृष्ट उपजे पूर्ण शांती। तेणें होये असतांची निवृत्ती। भक्तां ‘पूर्णप्राप्ति’ परमानंदें॥ २१॥ यालागीं धन्य भगवद्भक्त। इंद्रियीं वर्ततां विषयीं विरक्त। देहीं असोनि देहातीत। नित्यमुक्त हरिभजनें॥ २२॥ भावें करितां भगवद्भक्ती। भक्त मुक्तीही न वांछिती। तरी त्यांपाशीं चारी मुक्ती। दास्य करिती सर्वदा॥ २३॥ हा भागवतांचा निजमहिमा। अनुपम नाहीं उपमा। भावें भजोनि पुरुषोत्तमा। परमात्मगरिमा पावले॥ २४॥ अगाध भगवंताची भक्ती। भक्तांची उत्कृष्ट प्राप्ती। ऐकतां विदेहचक्रवर्ती। आश्चर्यें चित्तीं चमत्कारला॥ २५॥ म्हणे धन्य धन्य भगवद्भजन। हरिखें कवीस लोटांगण। घालितां चालिलें स्फुंदन। रोमांचित नयन अश्रुपूर्ण जाहले॥ २६॥ आनंदस्वेदें कांपत। नावेक राहिला तटस्थ। सवेंचि जाहला सावचित्त। म्हणे झणीं महंत न पुसतां जाती॥ २७॥ ऐशिया अतिकाकुलतीं। नेत्र उघडोनि पाहे नृपती। बैसली देखोनि मुनिपंक्ती। अतिशयें चित्तीं सुखावला॥ २८॥ तेणें संतोषें डोलत। म्हणे ‘पूर्णप्राप्त’ भगवद्भक्त। जगीं कैसे कैसे विचरत। तीं चिन्हें समस्त पुसों पाहों॥ २९॥
राजोवाच
अथ भागवतं ब्रूत यद्धर्मो यादृशो नृणाम्।
यथा चरति यद्ब्रूते यैर्लिङ्गैर्भगवत्प्रिय:॥ ४४॥
भक्तां ‘पूर्णप्राप्ति’ सुगम। ऐकतां राजा निवाला परम। तो भक्तचिन्हानुक्रम। समूळ सवर्म पूसत॥ ३०॥ विदेह म्हणे स्वामी मुनी। पूर्ण प्राप्ति आकळोनी। ते भक्त कैसे वर्तती जनीं। तीं लक्षणें श्रवणीं लेववा मज॥ ३१॥ भक्तलक्षणभूषण। तेणें मंडित करा श्रवण। सावध ऐकतां संपूर्ण। होईजे आपण भगवत्प्रिय॥ ३२॥ त्यांचा कोण धर्म कोण कर्म। कैसे वर्तती भक्तोत्तम। हृदयीं धरोनि पुरुषोत्तम। त्यांचें बोलतें वर्म तें कैसें॥ ३३॥ कोणेपरी कैशा स्थितीं। हरिभक्त हरीस प्रिय होती। ऐशिया लक्षणांचिया पंक्ती। समूळ मजप्रती सांगिजे स्वामी॥ ३४॥ विदेहाच्या प्रश्नावरी। संतोषिजे मुनीश्वरीं। कविधाकुटा जो कां हरी। तो बोलावया वैखरी सरसावला॥ ३५॥
हरिरुवाच
सर्वभूतेषु य: पश्येद्भगवद्भावमात्मन:।
भूतानि भगवत्यात्मन्येष भागवतोत्तम:॥ ४५॥
हरि म्हणे रायाप्रती। अमित भक्तलक्षणस्थिती। एक दिगंबरत्वें वर्तती। एक स्वाश्रमस्थिती निजाचारें॥ ३६॥ एक सदा पडले असती। एकांची ते उन्मादस्थिती। एक सदा गाती नाचती। एक ते होती अबोलणे॥ ३७॥ एक गर्जती हरिनामें। एक निर्दाळिती निजकर्में। एक भूतदयाळू दानधर्में। एक भजननेमें राहती॥ ३८॥ ऐशा अनंत भक्तस्थिती। सांगतां सांगावया नाकळे वृत्ती। त्यांमाजीं मुख्य संकलितीं। राया तुजप्रती सांगेन॥ ३९॥ पूर्णप्राप्तीचा मुख्य ठावो। सर्वां भूतीं भगवद्भावो। हाचि पूर्णभक्तीचा निजगौरवो। तोचि अभिप्रावो हरि सांगे॥ ४०॥ सर्व भूतीं मी भगवंत। सर्व भूतें मजआंत। भूतीं भूतात्मा मीचि समस्त। मीचि मी येथ परमात्मा॥ ४१॥ ऐसें जें पूर्णत्वाचें मीपण। तेणें वाढे आत्माभिमान। सहजें निजनिरभिमान। तें शुद्ध लक्षण ऐक राया॥ ४२॥ शुद्ध भक्तांचें निजलक्षण। प्रत्यगात्मयाचें जें मीपण। तेंही मानूनियां गौण। भावना पूर्ण त्यांची ऐसी॥ ४३॥ सर्वां भूतीं भगवंत। भूतें भगवंतीं वर्तत। भूतीं भूतात्मा तोचि समस्त। मी म्हणणें तेथ मीपणा न ये॥ ४४॥ सर्व भूतीं भगवंत पाहीं। भूतें भगवंताचे ठायीं। हें अवघें देखे जो स्वदेहीं। स्वस्वरूप पाहीं स्वयें होय॥ ४५॥ तो भक्तांमाजीं अतिश्रेष्ठ। तो भागवतांमाजीं वरिष्ठ। त्यासी उत्तमत्वाचा पट। अवतार श्रेष्ठ मानिती॥ ४६॥ तो योगियांमाजीं अग्रगणी। तो ज्ञानियांचा शिरोमणी। तो सिद्धांमाजीं मुगुटमणी। हें चक्रपाणी बोलिला॥ ४७॥ जैशा घृताचिया कणिका। घृतेंसीं नव्हती आणिका। तेवीं भूतें भौतिकें व्यापका। भिन्न देखा कदा नव्हती॥ ४८॥ हे ‘उत्तम’ भक्तांची निजस्थिती। राया जाणावी सुनिश्चितीं। आतां ‘मध्यम’ भक्त कैसे भजती। त्यांची भजनगती ऐक राया॥ ४९॥
ईश्वरे तदधीनेषु बालिशेषु द्विषत्सु च।
प्रेममैत्रीकृपोपेक्षा य: करोति स मध्यम:॥ ४६॥
ईश्वर मानी उत्तमोत्तम। तद्भक्त मानी मध्यम। अज्ञान ते मानो अधम। द्वेषी ते परम पापीमानी॥ ५०॥ ईश्वरीं ‘प्रेम’ पवित्र। भक्तांसी ‘मैत्री’ मात्र। अज्ञानी तो कृपापात्र। ‘उपेक्षा निरंतर द्वेषियांची॥ ५१॥ हे मध्यम भक्तांची भक्ती। राया जाण ऐशिया रीतीं। आतां ‘प्राकृत’ भक्तांची स्थिती। तेही तुजप्रती सांगेन॥ ५२॥
अर्चायामेव हरये पूजां य: श्रद्धयेहते।
न तद्भक्तेषु चान्येषु स भक्त: प्राकृत: स्मृत:॥ ४७॥
पाषाणप्रतिमा हाचि देवो। तेथेंचि ज्याचा पूर्ण भावो। भक्त-संत-सज्जनांसी पहा वो। अणुमात्र देहो लवों नेदी॥ ५३॥ ते ठायीं साधारण जन। त्याची वार्ता पुसे कोण। त्यांसी स्वप्नींही नाही सन्मान। यापरी भजन प्राकृताचें॥ ५४॥ ऐशिया स्थितीं जो जड भक्तु। तो जाणावा मुख्य ‘प्राकृतु’। प्रतिमाभंगें अंतु। मानी निश्चितु देवाचा॥ ५५॥ यापरी त्रिविध भक्त। सांगितले भजनयुक्त। परी उत्तमांचीं लक्षणें अद्भुत। तीं सांगावया चित्त उदित माझें॥ ५६॥
गृहीत्वापीन्द्रियैरर्थान्यो न द्वेष्टि न हृष्यति।
विष्णोर्मायामिदं पश्यन् स वै भागवतोत्तम:॥ ४८॥
इंद्रियें विषयांतें सेविती। परी सुखदु:ख नुमटे चित्तीं। विषय मिथ्यात्वें देखती। ते जाण निश्चितीं उत्तम भक्त॥ ५७॥ मृगजळीं जेणें केलें स्नान। तो नाहतां कोरडाचि जाण। तेवीं भोगीं ज्यांसी अभोक्तेपण। ते भक्त पूर्ण उत्तमोत्तम॥ ५८॥ ‘उत्तम भक्त विषय सेविती’। हा बोलु रूढला प्राकृतांप्रती। त्यांसी विषयीं नाहीं विषयस्फूर्ती। त्यागिती भोगिती दोनी मिथ्या॥ ५९॥ स्वप्नींचें केळें रायभोगें। जागा होऊनि खावों मागे। तेणें हातु माखे ना तोंडी लागे। तेवीं विषयसंगें हरिभक्त॥ ६०॥ येथवरी मिथ्या विषयभान। तरी सेवावया त्यांसी काय कारण। येथ प्रारब्ध बळी पूर्ण। तें अवश्य जाण भोगवी॥ ६१॥ परी मी एक विषयभोक्ता। ही स्वप्नींही त्यास नुमटे कथा। यालागीं उत्तम भागवतता। त्यासीच तत्त्वतां बाणली॥ ६२॥ यापरी विषयासक्तीं। वर्तिजे उत्तम भक्तीं। याहूनि अगाध स्थिती। सांगेन तुजप्रती ते ऐक॥ ६३॥
देहेन्द्रियप्राणमनोधियां यो
जन्माप्ययक्षुद्भयतर्षकृच्छ्रै:।
संसारधर्मैरविमुह्यमान:
स्मृत्या हरेर्भागवतप्रधान:॥ ४९॥
देह-इंद्रिय-मन-बुद्धि-प्राण। हेंचि बंधाचें पंचायतन। क्षुधा तृषा भय क्लेश पूर्ण। जन्ममरण इत्यादि॥ ६४॥ या पांचां स्थानीं अपार श्रम। या नांव म्हणिजे ‘संसारधर्म’। निजभक्तां प्रसन्न आत्माराम। त्यांसी भवभ्रम स्वप्नींही नाहीं॥ ६५॥ क्षुधा लागलिया दारुण। अन्नआकांक्षें पीडे प्राण। भक्तां क्षुधेची नव्हे आठवण। ऐसें अगाध स्मरण हरीचें॥ ६६॥ भावें करितां भगवद्भक्ती। क्षुधेतृषेची नव्हे स्फूर्ती। एवढी पावले अगाध प्राप्ती। ते भवभयें निश्चितीं डंडळतीना॥ ६७॥ मनामाजीं भवभयभरणी। तें मन रातलें हरिचरणीं। आतां भयातें तेथ कोण मानी। मन मनपणीं असेना॥ ६८॥ मनीं स्फुरे द्वैताची स्फूर्ती। तेथ भवभयाची दृढस्थिती। ते मनीं जाहली हरीची वस्ती। यालागीं भवभयनिवृत्ती द्वैतेंसीं॥ ६९॥ देहबुद्धीमाजीं जाणा। नानापरी उठती तृष्णा। ते बुद्धि निश्चयें हरीच्या स्मरणा। करितां परिपूर्णा विनटली स्वयें॥ ७०॥ जेथें जें जें स्फुरे तृष्णास्फुरण। तेथें स्वयें प्रगटे नारायण। तेव्हां तृष्णा होय वितृष्ण। विरे संपूर्ण पूर्णामाजीं॥ ७१॥ यापरी गा तृष्णारहित। हरिस्मरणें भगवद्भक्त। इंद्रियक्लेशां भक्त अलिप्त। तोही वृत्तांत ऐक राया॥ ७२॥ मुख्य कष्टाचें अधिष्ठान। इंद्रियकर्मीं राया जाण। ते इंद्रियकर्मीं ब्रह्मस्फुरण। हरिभक्तां पूर्ण हरिभजनें॥ ७३॥ दृष्टीनें घेऊं जातां ‘दर्शन’। दृश्यमात्रीं प्रगटे नारायण। श्रवणीं ‘शब्द’ घेतां जाण। शब्दार्थीं पूर्ण विराजे वस्तु॥ ७४॥ घ्राणीं घेतां नाना ‘वासु’। वासावबोधें प्रगटे परेशु। रसना सेवी जो जो ‘रसु’। रसीं ब्रह्मरसु निजस्वादें प्रगटे॥ ७५॥ देहीं लागतां शीत-उष्ण। अथवा कां मृदु-कठिण। तेथें ‘स्पर्श ज्ञानें जाण। चिन्मात्र पूर्ण प्रगटे स्वयें॥ ७६॥ आतां कर्मेंद्रियप्रवृत्ती। तेथही स्फुरे ब्रह्मस्फूर्ती। घेणें देणें गमनस्थिती। इंद्रियां गती आत्मारामें॥ ७७॥ ऐसे करितां इंद्रियें कष्ट। ते कष्टीं होय निजसुख प्रगट। तेणें इंद्रियां विश्रांति चोखट। पिकली स्वानंदपेठ हरिभक्तां॥ ७८॥ जेणें इंद्रियां कष्ट होती। तेणेंचि इंद्रियां सुखप्राप्ती। हे भगवद्भजनीं निजयुक्ती। भोगिजे हरिभक्ती हरीचेनि स्मरणें॥ ७९॥ जन्म आणि मरण। हें देहाचे माथां जाण। भक्त देहीं विदेही पूर्ण। ध्यातां हरिचरण हरिरूप जाहले॥ ८०॥ यालागीं देहाची अहंता। कदा नुपजे भगवद्भक्तां। ते भक्तपूर्णतेची कथा। ऐक नृपनाथा सांगेन॥ ८१॥ देह धरिल्या पंचाननें। भक्त न डंडळी जीवें प्राणें। वंध्यापुत्र सुळीं देणे। देहाचें मरणें तेवीं देखे॥ ८२॥ छाया पालखीं बैसावी। ऐसें कोणी चिंतीना जीवीं। तैशी देहासी पदवी यावी। हा नुठी सद्भावीं लोभ भक्तां॥ ८३॥ देहासी आलिया नाना विपत्ती। भक्तां खेदु नुमटे चित्तीं। जेवीं आकाश शस्त्रघातीं। न ये काकुळती तैसे ते॥ ८४॥ जननीजठरीं देहो जन्मला। भक्तु न म्हणे मी जन्मा आला। रवि थिल्लुरीं प्रतिबिंबला। थिल्लुर मी जाहला कदा न म्हणे॥ ८५॥ सांयप्रात: सूर्य प्रकाशे। अभ्रीं गंधर्वनगर आभासे। देह प्रतिपाळी अदृष्ट तैसें। म्यां केलें ऐसें स्फुरेना॥ ८६॥ भक्तदेहासी येतां मरण। हेतुरहित हरीचें स्मरण। यालागीं देह निमाल्या आपण। न मरतां पूर्ण पूर्णत्वें उरे॥ ८७॥ थिल्लुरा समूळ नाशु झाला। तरी रवि न म्हणे मी निमाला। तेवीं देहो गेलिया भक्त उरला। सद्रूपें संचला हरिस्मरणें॥ ८८॥ आधीं काय सर्पु मारावा। मग दोरातें दोरु करावा। तो न पालटतां निजगौरवा। दोरूचि अघवा दोररूपें॥ ८९॥ तेवीं हरिभक्तां देहाचा अभावो। मा काळ कवणा घालील घावो। आतां आम्ही ते आम्हीच आहों। तें आम्हीपणही, वावो आमुचेनि आम्हां॥ ९०॥ इत्यादि संसारदेहधर्म। ज्यासी स्पर्शों न शके कर्माकर्म। मोहें नव्हेचि भवभ्रम। तो भक्तोत्तम प्रधानत्वें॥ ९१॥ राया आणिकही एक खूण। तुज मी सांगेन संपूर्ण। ज्याचा काम होय नारायण। तें भक्तलक्षण अवधारीं॥ ९२॥
न कामकर्मबीजानां यस्य चेतसि सम्भव:।
वासुदेवैकनिलय: स वै भागवतोत्तम:॥ ५०॥
हृदयीं चिंतितां आत्माराम। तद्रूप जाहला हृदयींचा काम। त्यासी सर्व कर्मीं पुरुषोत्तम। देवदेवोत्तम तुष्टोनि प्रगटे॥ ९३॥ तेथें ज्या ज्या वासना हृदयवासी। त्याही पडकल्या हरिसुखासी। एवं वासना जडल्या हरिरूपाशीं। हरि आश्रयो त्यांसी दृढ जाहला॥ ९४॥ तेथ जो जो भक्तांसी कामु। तो तो होय आत्मारामु। वासनेचा निजसंभ्रमु। पुरुषोत्तमु स्वयें होये॥ ९५॥ जगीं हरिभक्ति उत्तमोत्तम। भक्त कामेंचि करी निष्काम। चाळितां वासना-अनुक्रम। निर्वासन ब्रह्म प्रकाशे स्वयें॥ ९६॥ ग्रासोग्रासीं रामस्मरण। तें अन्नचि होय ब्रह्म पूर्ण। भक्त भोगी मुक्तपण। या रीतीं जाणविदेहा॥ ९७॥ ऐसा जो निष्कामनिष्ठ। तोचि भागवतांमाजीं श्रेष्ठ। त्यासीच प्रधानत्वपट। जाण तो वरिष्ठ उत्तमत्वें॥ ९८॥ उत्तम भक्त कैसे विचरती। त्या भक्तांची विचरणस्थिती। ते सांगितली राया तुजप्रती। यथानिगुती तीं श्लोकीं॥ ९९॥ उत्तम भक्त कोणें लिंगेंसी। आवडते जाहले भगवंतासी। तें लक्षण सांगावयासी। अतिउल्हासीं हरि बोले॥ ७००॥
न यस्य जन्मकर्मभ्यां न वर्णाश्रमजातिभि:
सज्जतेऽस्मिन्नहंभावो देहे वै स हरे:प्रिय:॥ ५१॥
प्राकृतां देहीं देहाभिमान। तेणें गुरुकृपा करितां भजन। पालटे अभिमानाचें चिन्ह। अहं नारायणभावनायुक्त॥ १॥ ‘अहं देह’ हें समूळ मिथ्या। ‘अहं नारायण’ हें सत्य सत्त्वतां। ऐशी भावना दृढ भावितां। ते भावनाआंतौता अभिमान विरे॥ २॥ अभिमान हरिचरणीं लीन। तेव्हां भक्त होय निरभिमान। तेंचि निरहंतेचें लक्षण। हरि संपूर्ण सांगत॥ ३॥ निरहंकाराचीं लक्षणें। तो जन्मोनि मी जन्मलों न म्हणे। सुवर्णाचें केलें शुनें। तरी सोनें श्वान हों नेणे तदाकारें असतां॥ ४॥ तेवीं जन्मादि अहंभावो। उत्तम भक्तां नाहीं पहा हो। कर्मक्रियेचा निर्वाहो। ‘अहंकर्ता’ स्वयमेवो मानीना॥ ५॥ तो कर्म करी परी न म्हणे ‘मी कर्ता’। जेवीं गगनीं असोनि सविता। अग्नि उपजवी सूर्यकांता। तेवीं करोनि अकर्ता निजात्मदृष्टीं॥ ६॥ सूर्ये सूर्यकांतीं अग्निसंग। तेणें होतु याग कां दाघ। तें बाधूं न शके सूर्याचें अंग। तेवीं हा चांग करूनि अकर्ता॥ ७॥ अचेतन लोह चुंबकें चळे। लोहकर्में चुंबक न मैळे। तेवीं हा कर्में करूनि सकळें। अनहंकृतिबळें अकर्ता॥ ८॥ देहींचीं कर्में अदृष्टें होती। मी कर्ता म्हणतां तीं बाधती। भक्तां सर्व कर्मीं अनहंकृती। परमात्मप्रतीती भजनयोगें॥ ९॥ एवं देहींचीं कर्में निपजतां। पूर्णप्रतीती भक्त अकर्ता। कर्माकर्माची अवस्था। नेघे तो माथां अनहंकृती॥ १०॥ जरी जाहला उत्तम वर्ण। तरी तो न म्हणे ‘मी ब्राह्मण’। स्फटिक कुंकुमें दिसे रक्तवर्ण। ‘मी लोहीवा पूर्ण’ स्फटिक न म्हणे॥ ११॥ ज्यासी नाहीं देहाभिमान। तो हातीं न धरी देहाचा वर्ण। तैसाचि आश्रमाभिमान। भक्त सज्ञान न धरी कदा॥ १२॥ अंगीं बाणला संन्यासु। परी तो न म्हणे मी परमहंसु। जेवीं नटाअंगीं राजविलासु। तो राजउल्हासु नट न मानी॥ १३॥ तेवीं आश्रमादि अवस्था। भक्त न धरीच सर्वथा। तैशीच जातीचीही कथा। न घे माथां भक्तोत्तम॥ १४॥ जाति उंच नीच असंख्य। परी तो न म्हणे हे माझीचि एक। जेवीं गंगातीरीं गांव अनेक। परी गंगा माझा एक गांव न म्हणे॥ १५॥ तेवीं जन्म-कर्म-वर्णा-श्रम-जाती। पूर्ण भक्त हातीं न धरिती। चहूं देहांची अहंकृती। स्वप्नींही न धरिती हरिभक्त॥ १६॥ आशंका॥ तरी काय वर्णाश्रम-जाती। भक्त नि:शेष सांडिती। त्यांत असोनि नाहीं अहंकृती। ते हे उपपत्ति बोलिलों राया॥ १७॥ तो जेव्हां पावे जन्मप्राप्ती। तेव्हां त्यासवें नाहीं वर्णाश्रम-जाती। जन्मअभिमानें माथां घेती। हे कुळगोत-जाति पैं माझी॥ १८॥ ऐशा नाथिल्या अहंकृती। ब्रह्मादिक गुंतले ठाती। वाढवितां वर्णाश्रम जाती। सज्ञान गुंतती निजाभिमानें॥ १९॥ ऐशी अहंतेची अतिदुर्धर गती। ब्रह्मादिकां नव्हे निवृत्ती। सोडूं नेणे गा कल्पांतीं। सज्ञान ठकिजेती निजाभिमानें॥ २०॥ येथें भक्तांच्या भाविक स्थितीं। अभिमान तुटे भगवद्भक्तीं। ते निरभिमान भक्तस्थिती। राया तुजप्रती दाविली स्वयें॥ २१॥ समूळ देहाभिमान झडे। तो देहीचि देवासी आवडे। ते भक्त जाण वाडेकोडें। लळेवाडे हरीचे॥ २२॥ ते जें जें मागती कौतुकें। तें देवोचि होय तितुकें। त्यांचेनि परम संतोखें। देव सुखावला सुखें दोंदिल होये॥ २३॥ तो जिकडे जिकडे जाये। देव निजांगें तेउता ठाये। भक्त जेउती वास पाहे। देव ते ते होय पदार्थ॥ २४॥ त्यासी झणीं कोणाची दृष्टी लागे। यालागीं देवो त्या पुढें मागें। त्यासभोंवता सर्वांगें। भक्तीचेनि पांगें भुलला चाले॥ २५॥ निरभिमानाचेनि नांवें। देव निजांगें करी आघवें। जेवीं कां तान्हयाचेनि जीवें। जीवें भावें निजजननी॥ २६॥ एवं राखतां निजभक्तांसी। तरी देव धाके निजमानसीं। जरी हा मजसीं आला ऐक्यासी। तरी हे प्रीति कोणासीं मग करावी॥ २७॥ कोणासी पाहों कृपादृष्टीं। कोणापें सांगों निजगोष्टी। कोणासी खेवें देवों मिठी। ऐशी आवडी मोठी प्रेमाची॥ २८॥ या काकुळतीं श्रीअनंतु। ऐक्यभावें करी निजभक्तु। मग देवो भक्त देाहींआंतु। देवोचि नांदतु स्वानंदें॥ २९॥ एवं आपुली आपण भक्ती। करीतसे अनन्यप्रीतीं। हेंचि निरूपण वेदांतीं। ‘अद्वैतभक्ति’ या नांव॥ ३०॥ त्यासी चहूं भुजीं आलिंगितां। हांव न बाणेचि भगवंता। मग रिघोनियां आंतौता। परमार्थता आलिंगी॥ ३१॥ ऐसें खेंवाचें मीस करी। तेणें भक्त आणी आपणाभीतरीं। मग आपण त्याआंतबाहेरी। अतिप्रीतीवरी कोंदाटे॥ ३२॥ नवल आवडीचा निर्वाहो। झणीं यासी लागे काळाचा घावो। यालागीं निजभक्तांचा देहो। देवाधिदेवो स्वयें होये॥ ३३॥ ऐसा जो पढियंता परम। तो भागवतांमाजीं उत्तमोत्तम। यापरी भागवतधर्म। पुरुषोत्तम वश्य करी॥ ३४॥ ऐशिया उत्तम भक्ता। भेदाची समूळ नुरे वार्ता। हेचि अभेदभक्तकथा। ऐक नृपनाथा सांगेन॥ ३५॥
न यस्य स्व: पर इति वित्तेष्वात्मनि वा भिदा।
सर्वभूतसम: शान्त: स वै भागवतोत्तम:॥ ५२॥
अद्वैतभजनाचे वोजें। मी माझें तूं आणि तुझें। ज्यासी नुरेचि सहज निजें। तो भक्त मानिजे उत्तमत्वें॥ ३६॥ यापरी ज्याचे चित्ताचे ठायीं। भेदु नि:शेष उरला नाहीं। तेथ माझें तुझे हें कांहीं। तें निमालें पाहीं जेथींच्या तेथें॥ ३७॥ जेवीं अग्नीशीं जें जें टेंके। तें तें अग्नीचि होऊनि ठाके। तेवीं अभेदभक्त जें जें देखे। तें तें यथासुखें स्वस्वरूप होये॥ ३८॥ निजवित्त आणिकापाशीं देतां। आवांकू नुपजे त्याचिया चित्ता। न देखे परकेपणाची वार्ता। विकल्प घालितां तरी उपजेना॥ ३९॥ डावे हातींचे पदार्था। उजवे हातीं स्वयें देतां। येथें कोण देता कोण घेता। तेवीं एकात्मता सर्वभूतीं॥ ४०॥ आपणासकट सर्व देहीं। भक्तां भगवंतावांचूनि नाहीं। यालागीं शांति त्याचे ठायीं। स्वानंदें पाहीं नि:शंक नांदे॥ ४१॥ ऐशिया निजसमशांतीं। भगवद्भक्त क्रीडा करिती। यालागीं उत्तमत्वाची प्राप्ती। सुनिश्चितीं पावले॥ ४२॥ हरिभक्तांची ‘निरपेक्षता’। ऐक सांगेन नृपनाथा। उत्तम भक्तांची सांगतां कथा। अतिउल्हासता हरीसी॥ ४३॥ निरपेक्ष तो मुख्य ‘भक्त’। निरपेक्ष तो अति ‘विरक्त’। निरपेक्ष तो ‘नित्यमुक्त’। सत्य भगवंत निरपेक्षी॥ ४४॥
त्रिभुवनविभवहेतवेऽप्यकुण्ठ-
स्मृतिरजितात्मसुरादिभिर्विमृग्यात्।
न चलति भगवत्पदारविन्दा-
ल्लवनिमिषार्धमपि य: स वैष्णवाग्रॺ:॥ ५३॥
सप्रेमभावें करितां भक्ती। हरिचरणीं ठेविली चित्तवृत्ती। निजस्वार्थाचिये स्थितीं। अतिप्रीतीं निजनिष्ठा॥ ४५॥ तेथें त्रिलोकींच्या सकल संपत्ती। कर जोडूनि वरूं प्रार्थिती। तरी क्षणार्ध न काढी चित्तवृत्ती। भक्त परमार्थी अतिलोभी॥ ४६॥ क्षणार्ध चित्तवृत्ती काढितां। त्रिभुवनविभव ये हाता। एवढिया सांडूनि स्वार्था। म्हणाल हरिभक्तां लाभ कोण॥ ४७॥ हरिचरणीं अपरोक्षस्थिति। तेथील क्षणार्धाची जे प्राप्ती। त्यापुढें त्रिभुवनविभवसंपत्ती। भक्त मानिती तृणप्राय॥ ४८॥ सकळ जगाचा स्रजिता। ब्रह्मा पितामहो तत्त्वतां। त्रैलोक्यराज्यसमर्थता। वोळगे वस्तुतां अंगणीं ज्याचे॥ ४९॥ त्रिभुवनवैभाचे माथां। ब्रह्मपदाची समर्थता। तो ब्रह्माही निजस्वार्था। होय गिंवसिता हरिचरण॥ ५०॥ त्यागोनि ब्रह्मवैभवसंपत्ती। ब्रह्मा बैसोनि एकांतीं। अहर्निशीं हरिचरण चिंती। तरी त्या प्राप्तिसहसा नव्हे॥ ५१॥ सहसा न पवे हरिचरण। यालागीं ब्रह्मा साभिमान। तेणें अभिमानेंचि जाण। नेलीं चोरून गोपाल-वत्सें॥ ५२॥ तेथें न कष्टतां आपण। न मोडतां कृष्णपण। गोपाल-वत्सें जाहला संपूर्ण। पूर्णत्वें पूर्ण स्वलीला॥ ५३॥ अगाध हरिलीला पूर्ण। पाहतां वेडावलें ब्रह्मपण। तेव्हां सांडोनि पदाभिमान। अनन्यशरण हरिचरणीं॥ ५४॥ कैलासराणा शूलपाणी। ब्रह्मा लागे ज्याचे चरणीं। तोही निजराज्य सांडोनी। महाश्मशानीं हरिचरण चिंती॥ ५५॥ कौपीनभस्मजटाधारी। चरणोदक धरोनि शिरीं। हरिचरण हृदयामाझारीं। शिव निरंतरीं चिंतीत॥ ५६॥ एवं ब्रह्मा आणि शंकर। चरणांचे न पवती पार। तेथें त्रैलोक्यवैभव थोर। मानी तो पामर अतिमंदभाग्य॥ ५७॥ हरिचरणक्षणार्धप्राप्ती। त्रैलोक्यराज्यसंपत्ती। भक्त ओंवाळूनि सांडिती। जाण निश्चितीं निंबलोण॥ ५८॥ हरिचरणसारामृतगोडी। क्षणार्ध जैं जोडे जोडी। तैं त्रैलोक्यवैभवाच्या कोडी। करी कुरवंडी निजभक्त भावें॥ ५९॥ एवं हरिचरणांपरतें। सारामृत नाहीं येथें। यालागीं चित्तें वित्तें जीवितें। जडले सुनिश्चितें चरणारविंदीं॥ ६०॥ निमिषार्ध त्रुटी लव क्षण। जे न सोडिती हरिचरण। ते वैष्णवांमाजीं अग्रगण। राया ते जाण ‘उत्तम भक्त’॥ ६१॥ जे त्रिभुवनविभवभोग भोगिती। तेही पावले अनुतापवृत्ती। त्यांच्या तापाची निजनिवृत्ती। हरिचरणप्राप्ती तें ऐक॥ ६२॥
भगवत उरुविक्रमाङ्घ्रिशाखा-
नखमणिचन्द्रिकया निरस्ततापे।
हृदि कथमुपसीदतां पुन: स
प्रभवति चन्द्र इवोदितेऽर्कताप:॥ ५४॥
थोर हरिचरणाचा पराक्रम। पदें त्रैलोक्य आवरी त्रिविक्रम। ब्रह्मांड भेदोनि पदद्रुम। वाढला परमसामर्थ्यें॥ ६३॥ ते पदद्रुमींचिया दशशाखा। त्याचि दशधा दशांगुलिका। अग्रीं अग्रफळचंद्रिका। नखमणि देखा लखलखित॥ ६४॥ ते नखचंद्रिकेचे चंद्रकांत। चरणचंद्रामृतें नित्य स्रवत। भक्तचकोर ते सेवित। स्वानंदें तृप्त सर्वदा॥ ६५॥ त्यांसी कामादि त्रिविधतापप्राप्ती। सर्वथा बाधूं न शके पुढती। जेवीं सूर्याची संतप्त दीप्ती। चंद्रबिंबाआंतौती कदा न रिघे॥ ६६॥ जे हरिचरणचंद्र-चकोर। स्वप्नींही संसारताप न ये त्यांसमोर। ऐसा चरणमहिमा अपार। हरि मुनीश्वर हर्षें वर्णी॥ ६७॥ ‘देहे वै स हरे: प्रिय:’। येणें श्लोकें गा विदेह्या। दाविली भक्तिलिंगक्रिया। जाण तूं राया सुनिश्चित॥ ६८॥ ‘न यस्य स्व: पर इति’। येणें त्याची धर्मस्थिती। राया सांगितली तुजप्रती। यथानिगुतीं यथार्थ॥ ६९॥ ‘यादृश’ म्हणिजे कैसे असती। भगवद्भजनें स्वानंदतृप्ति। त्रिविध तापांची निवृत्ती। करोनि असती हरिभक्त॥ ७०॥ आतां त्यांची बोलती परी। नामें गर्जती निरंतरीं। तेचि ते संक्षेपाकारीं। उपसंहारीं हरि सांगे॥ ७१॥ सकळ लक्षणांची सारस्थिती। प्रेमळाची परमप्रीती। उल्लंघूं न शके श्रीपती। तेही श्लोकार्थीं हरि सांगे॥ ७२॥
विसृजति हृदयं न यस्य साक्षा-
द्धरिरवशाभिहितोऽप्यघौघनाश:।
प्रणयरशनया धृताङ्घ्रिपद्म:
स भवति भागवतप्रधान उक्त:॥ ५५॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायामेकादशस्कन्धे द्वितीयोऽध्याय:॥ २॥
अवचटें तोंडा आल्या ‘हरी’। सकळ पातकें संहारी। तें हरिनाम निरंतरीं। जे निजगजरीं गर्जती॥ ७३॥ ऐसें ज्यांचे जिव्हेवरी। नाम नाचे निरंतरीं। ते धन्य धन्य संसारीं। स्वानंदें हरि गर्जतु॥ ७४॥ सप्रेम सद्भावें संपूर्ण। नित्य करितां नामस्मरण। वृत्ति पालटती आपण। तेंही लक्षण ऐक राया॥ ७५॥ नामासरिसाच हरी। रिघे हृदयामाझारीं। तेणें धाकें अभ्यंतरीं। हों लागे पुरी हृदयशुद्धी॥ ७६॥ तेव्हां प्रपंच सांडोनि ‘वासना’। जडोनि ठाके जनार्दना। ‘अहं’ कारु सांडोनि अहंपणा। ‘सोहं’ सदनामाजीं रिघे॥ ७७॥ ‘चित्त’ विसरोनि चित्ता। जडोनि ठाके भगवंता। ‘मनाची’ मोडली मनोगतता। संकल्प-विकल्पता करूं विसरे॥ ७८॥ कृतनिश्चयेंसीं ‘बुद्धी’। होऊनि ठाके समाधी। ऐशी देखोनि हृदयशुद्धी। तेथोनि त्रिशुद्धी न रिघे हरी॥ ७९॥ हरिनामप्रेमप्रीतीवरी। हृदयीं रिघाला जो हरी। तो निघों विसरे बाहेरी। भक्तप्रीतिकरीं कृपाळू॥ ८०॥ भक्तें प्रणयप्रीतीची दोरी। तेणें चरण धरोनि निर्धारीं। निजहृदयीं बांधिला हरी। तो कैशापरी निघेल॥ ८१॥ भगवंत महा अतुर्बळी। अदट दैत्यांतें निर्दळी। तो कोंडिला हृदयकमळीं। हे गोष्टी समूळीं मिथ्या म्हणती॥ ८२॥ जो शुष्क काष्ठ स्वयें कोरी। तो कोंवळ्ॺा कमळामाझारीं। भ्रमर गुंतला प्रीतीवरी। केसर माझारीं कुचंबो नेदी॥ ८३॥ तेवीं भक्ताचिया प्रेमप्रीतीं। हृदयीं कोंडिला श्रीपती। तेथ खुंटल्या सामर्थ्यशक्ती। भावार्थाप्रती बळ न चले॥ ८४॥ बाळ पालवीं घाली पिळा। तेणें बाप राहे थोकला। तरी काय तो निर्बळ जाहला। ना तो स्नेहें भुलला ढळेना॥ ८५॥ तेवीं निजभक्त लळेवाड। त्याचें प्रेम अत्यंत गोड। निघावयाची विसरोनि चाड। हृदयीं सुरवाड हरि मानी॥ ८६॥ ऐसें ज्याचें अंत:करण। हरि न सांडी स्वयें आपण। तैसेचि हरीचे श्रीचरण। जो सांडीना पूर्ण प्रेमभावें॥ ८७॥ हरीचे ठायीं प्रीति ज्या जैशी। हरीची प्रीति त्या तैसी। जे अनन्य हरीपाशीं। हरि त्यांसी अनन्य सदा॥ ८८॥ ऐसे जे हरिचरणीं अनन्य। तेचि भक्तांमाजीं प्रधान। वैष्णवांत ते अग्रगण। राया ते जाण ‘भागवतोत्तम’॥ ८९॥ गौण करूनि चारी मुक्ती। जगीं श्रेष्ठ भगवद्भक्ती। त्या उत्तम भक्तांची स्थिती। संक्षेपें तुजप्रती बोलिलों राया॥ ९०॥ पूर्ण भक्तीचें निरूपण। सांगतां वेदां पडलें मौन। सहस्रमुखाची जिव्हा पूर्ण। थकोनि जाण थोंटावे॥ ९१॥ ते भक्तीची एकांशता। तुज म्यां सांगितली हे कथा। यावरी परिपूर्णता। राया स्वभावतां तूं जाणशी॥ ९२॥ हरीसारिखा रसाळ वक्ता। सांगतां उत्तमभक्तकथा। तटस्थ पडिलें समस्तां। भक्तभावार्थता ऐकोनी॥ ९३॥ तंव रावो रोमांचित जाहला। रोममूळीं स्वेद आला। श्रवणसुखें लांचावला। डोलों लागला स्वानंदें॥ ९४॥ पूर्ण संतोषोनि मनीं। म्हणे भलें केलें मुनी। थोर निवालों निरूपणीं। श्रवणाची धणी तरी न पुरे॥ ९५॥ ऐकोनि हरीचें वचन। राजा म्हणे हे अवघे जण। अपरोक्षज्ञानें ज्ञानसंपन्न। वक्ते पूर्ण अवघेही॥ ९६॥ भिन्न भिन्न करोनि प्रश्न। आकर्णूं अवघ्यांचें वचन। ऐशिया श्रद्धा राजा पूर्ण। अनुपम प्रश्न पैं करील॥ ९७॥ रायासी कथेची पूर्ण चाड। पुढां प्रश्न करील गोड। जे ऐकतांचि पुरे कोड। श्रोते वाड सुखावती॥ ९८॥ त्या प्रश्नाचें गुह्य ज्ञान। श्रवणीं पाववीन संपूर्ण। वदनीं वक्ता श्रीजनार्दन। यथार्थ पूर्ण अर्थवी॥ ९९॥ पांवा नाना मधुर ध्वनी गाजे। परी तो वाजवित्याचेनि वाजे। तेवीं एका जनार्दनीं साजे। ग्रंथार्थवोजें कवि कर्ता॥ ८००॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे एकादशस्कंधे निमिजायंतसंवादे एकाकारटीकायां द्वितीयोऽध्याय:॥ २॥ श्रीकृष्णार्पणमस्तु॥ मूळश्लोक॥ ५५॥ ओव्या॥ ८००॥
॥ श्री ॐ तत्सत्-श्रीकृष्ण प्रसन्न॥
अध्याय तिसरा
श्रीगणेशाय नम:॥ श्रीकृष्णाय नम:॥ ओं नमो जी श्रीगुरुराया। म्हणोनि सद्भावें लागें पायां। तंव मीपण गेलें वायां। घेऊनियां तूंपणा॥ १॥ नवल पायांचें कठिणपण। वज्रें न तुटे लिंगदेह जाण। त्याचेंही केलें चूर्ण। अवलीळा चरण लागतां॥ २॥ पायीं लागतांचि बळी। तो त्वां घातला पाताळीं। पायीं लवणासुरा रवंदळी। अतुर्बळी निर्दाळितां॥ ३॥ पाय अतिशयेंसीं तिख। काळियासी लागतां देख। त्याचें शोषोनियां विख। केला निर्विख नि:शेष॥ ४॥ पाय अतिशय दारुण। शकटासी लागतां जाण। त्याचें तुटलें गुणबंधन। गमनागमन खुंटलें॥ ५॥ पायांचा धाक सबळां। पायें उद्धरिली अहल्या शिळा। पाय नृगें देखतां डोळां। थित्या मुकला संसारा॥ ६॥ आवडी पाय चिंतिती दास। त्यांच्या मनुष्यधर्मा होय नाश। पायें यमलोक पाडिला वोस। पायें जीवास जीवघात॥ ७॥ पायवणी शिरीं धरिलें शिवें। तो जगातें घेतु उठिला जीवें। त्यासी राख लाविली जीवेंभावें। शेखीं नागवा भंवे श्मशानीं॥ ८॥ ऐसें पायांचें करणें। शिवासी उरों नेदी शिवपणें। मा जीवांसी कैंचें जीवें जिणें। हें मानितें मानणें उरों नेदी॥ ९॥ ऐसा जाणोनियां भावो। एका एकपणीं ठेला ठावो। तेथेंही पायांचा नवलावो। केला एकपणा वावो वंदनमात्रें॥ १०॥ तेथें कवणें कवणासी वानणें। कवणें कवणासी विनविणें। कवणें कवणासी देणें घेणें। मीतूंचें जिणें जीवें गेलें॥ ११॥ तेव्हां देव आणि भक्तु। जाहलासी मा तूंच तूं। तेथें मीपणाची मातु। कोणें कोणांतु मिरवावी॥ १२॥ ऐशिया पदीं वाऊनि तत्त्वतां। करवितोसी ग्रंथकथा। तेव्हां माझेनि नांवें कवि कर्ता। तूंचि वस्तुतां सद्गुरुराया॥ १३॥ माझें नामरूप आघवें एक। तेंही जनार्दनु झाला देख। ऐसें एकपणाचें कौतुक। आत्यंतिक श्रीजनार्दना॥ १४॥ तेणें कौतुकेंचि आतां। माझेनि नांवें कवि कर्ता। होऊनि स्वयें रची ग्रंथा। यथार्थता निजबोधें॥ १५॥ तेथें द्वितीयाध्यायाचे अंतीं। दूस्तर माया उत्तम-भक्तीं। निरसोनियां भजनस्थिती। भगवत्प्राप्ती पावले॥ १६॥ कैशी दुस्तर हरीची माया। पुसावया सादरता झाली राया। अत्यादरेंकरोनियां। म्हणे मुनिवर्या अवधारीं॥ १७॥
राजोवाच
परस्य विष्णोरीशस्य मायिनामपि मोहिनीम्।
मायां वेदितुमिच्छामो भगवन्तो ब्रुवन्तु न:॥ १॥
तृतीयाध्यायीं निरूपण। राजा करील चारी प्रश्न। ‘माया’ आणि तिचें ‘तरण’। ‘ब्रह्म’ तें कोण, ‘कर्म’ तें कैसें॥ १८॥ तेथें प्रथम मायेचा प्रश्न। रायें पुशिला आपण। तेचि अर्थींचें निरूपण। मायेचें लक्षण राजा बोले॥ १९॥ सुरांमाजीं श्रेष्ठ हृषीकेशी। ब्रह्मादि शिवु वंदिती ज्यासी। त्या श्रीविष्णूची माया कैसी। जे मायिकांसी व्यामोही॥ २०॥ कैशी मायिकां माया मोही येथें। ब्रह्मा शिवु मानिती चित्ते। आम्ही पूर्ण मायेचे नियंते। शेखीं माया मयांतें निजमोहें मोही॥ २१॥ ब्रह्मा मोहिला शिवाचे लग्नीं। वीर्य द्रवे पार्वती देखोनी। महादेवो महाज्ञानी। देखतांचि मोहिनी निजवीर्य द्रवलें॥ २२॥ जे सज्ञाना छळी लवलाह्या। जीतें श्रुति म्हणती ‘अजया’। ते हरीची दुर्धर माया। विवंचूनियां मज सांगा॥ २३॥ म्हणाल दुर्धर मायेची बाधकता। ते बाधूं न शके अनन्य भक्तां। तुवांही भजावें भगवंता। मिथ्या मायेची कथा कां पुसशी॥ २४॥ तेचि अर्थींचें निरूपण। राजा साक्षेपेंसीं आपण। मुनींचें ऐकावया गुह्य ज्ञान। विदग्ध प्रश्न आदरें पुसतु॥ २५॥
नानुतृप्ये जुषन्युष्मद्वचो हरिकथामृतम्।
संसारतापनिस्तप्तो मर्त्यस्तत्तापभेषजम्॥ २॥
सेवितां तुमचें वचनामृत। पुरे न म्हणे माझें ‘चित्त’। आस्वादितां शब्दीं शब्दार्थ। ‘श्रवण’ क्षुधार्त अधिक जाहले॥ २६॥ अद्भुत कथा अतिसुरस। श्रवणीं श्रवणा अधिक सोस। ‘रसना’ म्हणे हा अतिगोड रस। ‘डोळ्ॺां’ उल्हास हें अपूर्व रूप॥ २७॥ ‘घ्राण’ म्हणे हा निजगंधु। सुमनीं सुमना अतिसुगंधु। ‘वाचा’ म्हणे हा शब्दु। परमानंदु अनुवादे॥ २८॥ नवल निरूपणाचा यावा। ‘भुजां’ स्फुरण ये द्यावया खेवा। आलिंगन जीवींच्या जीवा। निजसद्भावा होतसे॥ २९॥ तुमच्या कथा सुनिश्चितीं। दिव्यौषधि भवरोग छेदिती। त्रिविध तापांची निवृत्ती। जड मूढ प्राकृतीं ऐकता भावें॥ ३०॥ राजा परमार्थें साकांक्ष। देखोनि सार्थक कथेंचें लक्ष। हरिधाकुटा ‘अंतरिक्ष’। निरूपणीं दक्ष बोलता झाला॥ ३१॥
अन्तरिक्ष उवाच
एभिर्भूतानि भूतात्मा महाभूतैर्महाभुज।
ससर्जोच्चावचान्याद्य: स्वमात्रात्मप्रसिद्धये॥ ३॥
अंतरिक्ष म्हणे राया। तुवां पुशिली हरीची माया। तो प्रश्नच गेला वायां। बोलणें न ये आया बोलक्याचे॥ ३२॥ वंध्यापुत्राचा जन्मकाल। रायें आणविला तत्काल। राशिनक्षत्र-जाति-कुल। सांगों जातां विकल वाचा होय॥ ३३॥ मृगजळाची पव्हे बरवी। गंधर्वनगरीं घालावी। वारा वळूनि सूत्रस्वभावीं। वाती लावावी खद्योततेजें॥ ३४॥ निजच्छायेचें शिर फोडा। आकाशाची त्वचा काढा। शिंपीं आंधारु खरवडा। बागुलाचा रांडवडा निजशस्त्रें कीजे॥ ३५॥ वांझेचे सुने पुत्र झाला। तेथ भीष्मस्त्रियेसी पान्हा आला। तेणें पय:पानें तो मातला। घरभंगु केला दिगंबराचा॥ ३६॥ जातीं लहान दळावा वारा। अश्वशृंगें आकाश चिरा। नपुंसकाचीं नातोंडें घरा। सूर्योदयीं अंधारा लपों आलीं॥ ३७॥ गुंजेचे निजतेजें दिवी। हनुमंतलग्नीं लावावी। या सोहळियालागीं विकावी। वोसगांवीं निजच्छाया॥ ३८॥ आकाशाचीं सुमनें। सुवासें कीं वासहीनें। हें विवंचिती जे देखणे। ते मायेचें सांगणें सांगोत सुखें॥ ३९॥ एवं मायेचें जें बोलणें। तें सांगतांचि लाजिरवाणें। नुपजत्याचें श्राद्ध करणें। तैशी सांगणें महामाया॥ ४०॥ ‘माया’ म्हणवी येणें भावें। जे मी कदा विद्यमान नव्हें। यालागीं ‘अविद्या’ येणें नांवें। वेदानुभवें गर्जती शास्त्रें॥ ४१॥ भ्रम तो मायेचें निजमूळ। भ्रांति हेंचि फूल सोज्ज्वळ। भुली तें इचें साजुक फळ। विषय रसाळ सदा फळित॥ ४२॥ हे नसतेनि रूपें रूपा आली। सत्यासत्यें गरोदर जाहली। तेथें असत्याचीं पिलीं। स्वयें व्याली असंख्य॥ ४३॥ वासनाविषयगुणीं। गुंफिली मिरवे वेणी। मीपणाच्या तरुणपणीं। मदनमोहिनी चमके॥ ४४॥ मृगजळींच्या मुक्ताफळीं। मस्तकीं बाणली जाळी। गगनाच्या चांपेकळीं। मिरवे वेल्हाळी अतिसौंदर्यें॥ ४५॥ रज्जुसर्पमाथ्याचा मणी। काढूनि लेईली ते लेणीं। शुक्तिकारजत-पैंजणीं। चाले रुणझुणी खळखळत॥ ४६॥ शशविषाणपादुका। लेऊनि ते चाले देखा। तिसी तो ‘अहंकारु’ सखा। अतिनेटका ज्येष्ठपुत्र॥ ४७॥ कुळविस्तारालागीं पाहीं। ‘ममता’ व्याली ठायीं ठायीं। ‘मोहो’ उपजवूनि देहीं। घरजांवयी त्या केला॥ ४८॥ अहंमोहममतायोगें। जग विस्तारले अंगें। स्थूळ सबळ प्रयोगें। ममता निजअंगें वाढवी॥ ४९॥ संकल्पविकल्पांचीं कांकणें। बाणोनि ‘मन’ दिधलें आंदणे। घालोनि त्रिगुणाचें ठाणें। माया पूर्णपणें थोरावे॥ ५०॥ ऐशी मिथ्या मूळमाया। वाढली दिसे राया। ते कैसेनि ये आया। सांगावया अनिरूप्य॥ ५१॥ ‘संत’ म्हणों तरी ते नासे। ‘असंत’ म्हणों तरी आभासे। आधीं असे पाठीं नासे। ऐसीही नसे निजांगें॥ ५२॥ जैसें मृगजळाचें ज्ञान। दिसे तरी तें मिथ्या पूर्ण। तैसें आभासे भवभान। ते माया जाण नृपनाथा॥ ५३॥ श्रुतिशास्त्रां मायामाग। पुसतां आरोगिती मूग। मायेसी साचाचें अंग। पाहतां चांग दिसेना॥ ५४॥ मृगजळाची महानदी। कोण गिरिवर उद्बोधी। हें सांगावया नाकळे बुद्धी। तेवीं मायासिद्धी अनिर्वाच्य॥ ५५॥ आरसां काय प्रतिबिंब असे। जो पाहे तोचि आभासे। तेवीं आपुलेनि संकल्पवशें। माया उल्हासे नसतीचि॥ ५६॥ रज्जुसर्प जीत धरिला। त्याचें कौतुक पाहों चला। ऐसे बोलती जे बोला। ते मायेचा सोहळा सांगोत सुखें॥ ५७॥ उडवों जातां आपुली छाया। सर्वथा न उडवे ज्याची तया। तेवीं तरतां दुस्तर माया। जाण राया निश्चितीं॥ ५८॥ अग्निसंकल्पु सूर्यीं नसे। शेखीं सूर्यकांतींही न दिसे। तळीं धरिलेनि कापुसें। अग्नि प्रकाशे तद्योगें॥ ५९॥ तेवीं शुद्ध ब्रह्मीं संकल्पु नाहीं। शेखीं न दिसे केवळ देहीं। माझारीं वासनेच्या ठायीं। देहाभिमानें पाहीं संसारु भासे॥ ६०॥ जागृतिदेहाचा विसरु पडे। सवेंचि स्वप्नदेह दुजें जोडे। तेणें मिथ्या प्रपंच वाढे। स्वप्नीं स्वप्न कुडें कदा न मने॥ ६१॥ सुषुप्तीं देहाचा असंभवो। तेथ नाहीं भवभावो। जन्ममरण तेंही वावो। संसारसंभवो देहाभिमानें॥ ६२॥ तेवीं आत्मत्वाचा विसरू। तेणें मी देह हा अहंकारू। तेणें अहंकारें संसारू। अतिदुस्तरू थोरावे॥ ६३॥ जेवीं मृगजळीं मिथ्या मासे। तेवीं ब्रह्मीं प्रपंचु नसे। तो निरसावया कैसें। साधनपिसें पिशाचा॥ ६४॥ दोनीच अक्षरें ‘माया’। जंव गेलों सांगावया। तंव श्लोकार्थ दुरी ठेला राया। वाढला वायां ग्रंथु सैरा॥ ६५॥ माया पाहों जातां हर्षें। सज्ञानही झाले पिसे। नांवारूपांचिये भडसें। कल्पनावशें माया वाढे॥ ६६॥ मायेचें मुख्य लक्षण। राया तुज मी सांगेन खूण। आपली कल्पना संपूर्ण। ते माया जाण नृपवर्या॥ ६७॥ निजहृदयींची निजआशा। तेचि माया गा मुख्य क्षितीशा। जो सर्वथा नित्य निराशा। तों पूज्य जगदीशा पूर्णत्वें॥ ६८॥ आतां कांहीं एक तुझ्या प्रश्नीं। माया सांगों उपलक्षणीं। सर्गस्थित्यंतकारिणी। त्रिविधगुणीं विभागे॥ ६९॥ जेवीं सूर्यासी संकल्पु नसे। तरी नसतां त्याच्या ठायीं दिसे। जेव्हां कां निजकिरणवशें। अग्नि प्रकाशे सूर्यकांतीं॥ ७०॥ तेवीं शुद्धस्वरूपीं पाहीं। संकल्पमात्र कांहीं नाहीं। नसतचि दिसे ते ठायीं। ते जाण विदेही ‘मूळमाया’॥ ७१॥ स्वरूप निर्विकल्प पूर्ण। तेथ ‘मी’ म्हणावया म्हणतें कोण। ऐसेही ठायीं स्फुरे मीपण। ते मुख्यत्वें जाण ‘मूळमाया’॥ ७२॥ तया मीपणाच्या पोटीं। म्हणे मजचि म्यां पहावें दिठीं। मजसीं म्यां सांगाव्या गोठी। अत्यादरें भेटी माझी मज होआवी॥ ७३॥ मज माझी अतिप्रीती। माझी मज होआवी रती। माझ्याचि म्यां घेऊनि युक्ती। मज माझी प्राप्ति मद्बोधें व्हावी॥ ७४॥ म्हणे मज मियां आलिंगावें। मज मियांचि संभोगावें। मज मियांचि संयोगावें। नियोगावें स्वामिसेवकत्वें सर्वदा॥ ७५॥ ऐकें आजानुबाहो नृपनाथा। ऐसें आठवलें भगवंता। तो आठवो जाला स्रजिता। महाभूतां भौतिकां॥ ७६॥ चारी वर्ण चारी खाणी। चारी युगें चारी वाणी। चारी पुरुषार्थ चहूं लक्षणीं। मुक्तीची मांडणी मांडली चतुर्धा॥ ७७॥ उभारूनि
तिन्ही गुण। आठवो रची त्रिभुवन। तेणें मांडूनि त्रिपुटीविंदान। कर्मही संपूर्ण त्रिधा केलें॥ ७८॥ एवं एकपणीं बहुपण। रूपा आणी मूळींची आठवण। परी बहुपणीं एकपण। अखंडत्वें पूर्ण तें कदा न भंगे॥ ७९॥ जीं जीं कुंभार भांडीं करी। आकाश सहजेंचि त्यांभीतरीं। तेवीं महाभूतें भौतिकाकारीं। समन्वयें हरि सर्वदा सर्वीं॥ ८०॥ राया जाण येचि अर्थीं। बोलिलें उपनिषदांप्रती। ‘एकाकी न रमते’ या श्रुती। द्वैताची स्फूर्ति भगवंतीं स्फुरली॥ ८१॥ किंबहुना एकपणें समस्तें। रूपा आलीं महाभूतें। तीचि ‘हरीची माया’ येथें। जाण निश्चितें नृपनाथा॥ ८२॥ भूत-भौतिक स्फुरे जे स्फूर्ती। ते प्रकाशूं न शके माया स्वशक्तीं। मायाप्रकाशकु चिन्मूर्ती। अखंडत्वें भूताकृतीं प्रवेशला भासे॥ ८३॥ मुख्य मायेचें निजलक्षण। प्रकाशी परमात्मा चिद्धन। तोचि भूतीं भूतात्मा आपण। प्रवेशलेपण नसोनि दावी॥ ८४॥
एवं सृष्टानि भूतानि प्रविष्ट: पञ्चधातुभि:।
एकधा दशधाऽऽत्मानं विभजञ्जुषते गुणान्॥ ४॥
ऐशीं स्रजिलीं भूतें महाभूतें। जीं जड मूढ अचेतें। त्यांसी वर्तावया व्यापारार्थें। विभागी आपणातें तत्प्रवेशीं॥ ८५॥ पंचधा पंचमहाभूतें। तें कार्यक्षम व्हावया येथें। पंचधा विभागें श्रीअनंतें। प्रवेशिजे तेथें तें ऐक राया॥ ८६॥ ‘गंध’ रूपें पै पृथ्वीतें। प्रवेशोनि श्रीअनंतें। पूर्ण क्षमा आणोनि तीतें। चराचरभूतें वाहवी स्वयें॥ ८७॥ पृथ्वीं प्रवेशला भगवंतु। यालागीं ते आवरण-जळांतु। उरलीसे न विरतु। जाण निश्चितु मिथिलेशा॥ ८८॥ धरा धरी धराधर। यालागीं विरवूं न शके समुद्र। धराधरें पृथ्वी सधर। भूतभार तेणें वाहे॥ ८९॥ ‘स्वाद’ रूपें उदकांतें। प्रवेशोनि श्रीअनंतें। द्रवत्वें राहोनियां तेथें। जीवनें भूतें जीववी सदा॥ ९०॥ जीवनीं प्रवेशे जगज्जीवन। याकारणें आवरण तेंचि जाण। न शोषितां उरे जीवन। हें लाघव पूर्ण हरीचें॥ ९१॥ तेजाचे ठायीं होऊनि ‘रूप’। प्रवेशला हरि सद्रूप। यालागीं नयनीं तेज अमूप। जठरीं देदीप्य जठराग्नि जाहला॥ ९२॥ रूपयोगें लवलाहीं। हरि प्रवेशे तेजाच्या ठायीं। तें आवरण-वायूमाजीं पाहीं। न मावळे कांहीं यालागीं राया॥ ९३॥ वायूमाजीं ‘स्पर्श’ योगें। प्रवेशु कीजे श्रीरंगें। यालागीं प्राणयोगें। वर्तती अंगें अनेक जीव॥ ९४॥ वायूच्या ठायीं हृषीकेश। स्पर्शरूपें करी प्रवेश। यालागीं वायूचा ग्रास। सर्वथा आकाश करूं न शके॥ ९५॥ ‘शब्द’ गुणें हृषीकेश। आकाशीं करी प्रवेश। यालागीं भूतांसी अवकाश। सावकाश वर्तावया॥ ९६॥ शब्दगुणें गगनीं। प्रवेशला चक्रपाणी। यालागीं तें निजकारणीं। लीन होऊनि जाऊं न शके॥ ९७॥ महाभूतीं निरंतर। स्वाभाविक नित्य वैर। येरांतें ग्रासावया येर। अतितत्पर सर्वदा॥ ९८॥ जळ विरवूं पाहे पृथ्वीतें। तेज शोषूं पाहे जळातें। वायु प्राशूं धांवे तेजातें। आकाश वायूतें गिळूं पाहे॥ ९९॥ तेथ प्रवेशोनि श्रीधर। त्यांतें करोनियां निर्वैर। तेचि येरामाजीं येर। उल्हासें थोर नांदवी॥ १००॥ एवं पंचभूतां साकारता। आकारली भूताकारता। तेथें जीवरूपें वर्तविता। जाहला पैं तत्त्वता प्रकृतियोगें॥ १॥ त्यासी ब्रह्मांडीं ‘पुरुष’ हें नांव। पिंडीं त्यातें म्हणती ‘जीव’। हा मायेचा निजस्वभाव। प्रतिबिंबला देव जीवशिवरूपें॥ २॥ शिवीं जे ‘योगमाया’ विख्याती। जीवीं तीतें ‘अविद्या’ म्हणती। हेचि मायेची मुख्यत्वें भ्रांती। स्वप्नस्थिती संसारू॥ ३॥ ज्यातें म्हणती ‘दीर्घस्वप्न’। तो हा मायावी संसार संपूर्ण। निद्रेमाजीं दिसे जें भान। तें जीवाचें स्वप्न अविद्यायोगें॥ ४॥ येथ जागा जाहल्या मिथ्या स्वप्न। बोध जाहलिया मिथ्या भवभान। हें अवघें मायेचें विंदान। राया तूं जाण निश्चित॥ ५॥ आतां जीवाची विषयावस्था। विषयरसीं विषयभोक्ता। एकधा दशधा विभागता। आईक नृपनाथा सांगेन॥ ६॥ एकधा भागें अंत:करण। स्वयें झाला जनार्दन। मन-बुद्धि-चित्त-अहंस्फुरण। चतुर्धा जाण विभागें॥ ७॥ जीव आपुल्या परिपूर्णता। ‘अहं’ म्हणे निजात्मसत्ता। तेथ मायेची अतिलाघवता। देहात्मता दृढ केली॥ ८॥ अहंकारु वाढवितां देहात्मता। विसरे आपुली चिद्रूपता। तो विसरू वाढवी विषयचिंता। तेचि ‘चित्त’ तत्त्वतां महामाया॥ ९॥ देहअहंता अतिचपळ। तीतेंच म्हणती ‘मन’ चंचळ। नाना संकल्पविकल्पजाळ। वाढवी प्रबळ भय-शोक-दु:ख॥ १०॥ देहअहंतेचें शहाणपण। तिये नांव गा ‘बुद्धि’ जाण। ते बुद्धीनें निश्चय केला पूर्ण। आम्हां जन्ममरण अनिवार॥ ११॥ एवं देहाभिमानाचे माथां। चित्तचतुष्टयअवस्था। मुख्य संसाराचा कर्ता। जाण तत्त्वतां देहाभिमानु॥ १२॥ अहंकार धरी सोहंपण। तैं चित्तीं प्रगटे चैतन्यघन। तेव्हां मनही होय उन्मन। बुद्धीचा निश्चयो पूर्ण परब्रह्मीं॥ १३॥ समूळ मावळल्या अभिमान। कैंची बुद्धि कैंचें मन। बुडे चित्ताचें चित्तपण। ब्रह्म परिपूर्ण कोंदाटे॥ १४॥ ‘एकधा’ विभाग अंत:करण। त्याची उणखूण निजलक्षण। राया सांगितलें संपूर्ण। आतां ‘दशधा’ लक्षण तें ऐक॥ १५॥ दशधा इंद्रियें अचेतन। तयांतें चेतविता नारायण। दशधारूपें प्रवेशोन। इंद्रियवर्तन वर्तवी॥ १६॥ दृष्टीमाजीं झाला ‘देखणें’। दृश्य प्रकाशी दृश्यपणें। ऐसेनि प्रकाशकपणें। दृश्याभरणें दाखवी॥ १७॥ श्रवणीं झाला तो ‘ऐकणें’। शब्द प्रकाशी शब्दलक्षणें। मग अर्थावबोधकपणें शब्दविंदानें ऐकवी॥ १८॥ रसीं ‘रसस्वादु’ नारायण। रसने तोचि रसस्वादन। यापरी नानारससेवन। करवी जनार्दन जनांमाजीं॥ १९॥ सुमनीं श्रीहरि ‘सुगंध’। घ्राणीं तोचि जाणे गंधावबोध। यापरी सुमनमकरंद। भोगवी गोविंद निजांगयोगें॥ २०॥ शीत-उष्ण-मृदु-कठिण। ‘स्पर्श’ प्रकाशिता नारायण। त्वचेमाजीं तोचि स्पर्शज्ञ। यापरी जगजीवन भोगवी स्पर्श॥ २१॥ वाचेचा ‘वाचकु’ कमळापती। तोचि प्रकाशी शब्दपंक्ती। नाना शब्दार्थव्युत्पत्ती। वदवी निश्चितीं वाचाळपणें॥ २२॥ करांच्या ठायीं ‘देती घेती’। अकर्तेनि कर्तव्यशक्ती। चरणा आचरणें निगुती। ‘गमनस्थिती गोविंदें’॥ २३॥ उपस्थसुखाची ‘सुखप्राप्ती’। तेणें सुखें सुखावे श्रीपती। स्त्रीपुरुषमैथुनव्युत्पत्ती। प्रकाशी अतिप्रीतीं पुरुषोत्तमु॥ २४॥ गुदाचे ठायीं जें का ‘क्षरण’। तेंही अक्षरें होय जाण। यापरी निजात्मा परिपूर्ण। दशधा आपण विभागला देहीं॥ २५॥ यापरी गा देहयोगें। विलासे विषयसंभोगें। भोग्य भोक्ता उभय भागें। प्रकाशूनि अंगें स्वयें भोगी॥ २६॥ जेवीं साळईच्या रुखा। साळईचि बीज देखा। साळईचि शाखोपशाखा। न विकारतां असका वृक्ष होये॥ २७॥ जेवीं कां ऊंस बीजीं पडे। तो बाहेर ऊंसपणेंचि वाढे। जरी भिन्न भिन्न कांडें चढे। तरी मागें पुढें रस एकु॥ २८॥ तेवीं विषय आणि करणें। प्रकाशूनि एकपणें। मग विषयरस सेवणें। जीवपणें स्वयें सेवी॥ २९॥
गुणैर्गुणान् स भुञ्जान आत्मप्रद्योतितै: प्रभु:।
मन्यमान इदं सृष्टमात्मानमिह सज्जते॥ ५॥
इंद्रियां आणि विषयांसी। सहजें अंतर्यामी प्रकाशी। जीव सेवूनि त्या विषयांसी। पावे आसक्तीसी अहंभावें॥ ३०॥ म्हणे हे विषय कैसे गोड। माझ्या देहाचें पुरे कोड। तंव इंद्रियांची खवळे चाड। विषय वाड भोगावया॥ ३१॥ इंद्रियां विषयांची आसक्ती। देहाभिमानें वाढे वृत्ती। मावळोनि मूळींची स्फूर्ती। मोहममतास्थिति दृढ वाढे॥ ३२॥ मग मी म्हणे देहातें। देहसंबंधीं जें तें आप्तें। विषयांचिये लोलुपते। उसंतु चित्तें असेना॥ ३३॥ प्रकृतिस्वभावें कर्म जाहलें। तें तें म्हणे म्यां केलें। देहअहंतेचें नाथिलें। काविरें चढलें अनिवार॥ ३४॥ देहअहंता अतिउद्भट। तेथें मोहममता अतिदुर्घट। तेणें जन्ममरणांची वाट। घडघडाट प्रवाहे॥ ३५॥
कर्माणि कर्मभि: कुर्वन् सनिमित्तानि देहभृत्।
तत्तत्कर्मफलं गृह्णन् भ्रमतीह सुखेतरम्॥ ६॥
मनीं धरोनि विषयकाम। कर्मेंद्रियीं करितां कर्म। तेथें निपजती धर्माधर्म। बाधक परम पुरुषातें॥ ३६॥ कल्पिला फळभोग घडे। त्यासारिखें देह धरणें पडे। देहें देहाची खाणी उघडे। मरणही वाढे तैसेंचि॥ ३७॥ फळाशा कर्म अतिदारुण। अमरां आणी अमित मरण। अजन्म्या अंगीं जन्म पूर्ण। पुन: पुन: जाण आदळती॥ ३८॥ एवं स्वर्ग आणि संसारा। जन्ममरणांच्या येरझारा। नाना योनि अपारा। निजकर्मद्वारा स्वयें भोगी॥ ३९॥ डोळे बांधोनि जुंपिला घाणा। तेलियाचा ढोरु जाणा। करकरीतु परिभ्रमणा। अविश्राम जाणा भोंवतसे॥ ४०॥ तेवीं बांधोनि ज्ञानाचे डोळे। भोगूं जातां निजकर्मफळें। तंव जन्ममरणांचे सोहळे। भोगी आगळे अनिवार॥ ४१॥ उदोअस्तांचेनि प्रमाणें। जैसें सूर्यासी पडे भंवणें। तैशीं हीं जन्ममरणें। अतिदारुणें स्वयें सोशी॥ ४२॥ शिणशिणों जंव जन्म कंठी। सवेंच मरण ये त्यापाठीं। जैसीं जावळीं फळें एक देठीं। तैशा जन्ममरणकोटी भोगी स्वयें॥ ४३॥
इत्थं कर्मगतीर्गच्छन् बह्वभद्रवहा: पुमान्।
आभूतसम्प्लवात्सर्गप्रलयावश्नुतेऽवश:॥ ७॥
होता पूर्णत्वें जो स्वतंत्र। तो झाला कर्मपरतंत्र। नानाकर्मगतिपात्र। दु:खसुखक्षेत्र सदा वाहे॥ ४४॥ मानोनि विषयांचें सुख। देखतदेखतां घेतलें विख। त्याचें अगणित असुख। जन्मकोटी दु:ख सोशितां न सरे॥ ४५॥ दु:खावरी दु:खांचे आवर्त। मोहशोकांचे गर्तीं पडत। अतियातनेमाजीं बुडत। सदा उकडत काळाग्नीं॥ ४६॥ ऐसे सोशितां दु:ख-शोक। पुढें अवचितां एकाएक। महाप्रळयाचा भडका देख। निकट सन्मुख अंगी वाजे॥ ४७॥ तेथें मागें न वचे काढिला पावो। पुढें निघावया नाहीं वावो। निजकर्में बांधिला पहा वो। प्रळयाचा घावो मस्तकीं वाजे॥ ४८॥ उत्पत्तिस्थितिप्रकरण। तुज सांगितलें संपूर्ण। आतां प्रळयाचें लक्षण। सावधान अवधारीं॥ ४९॥
धातूपप्लव आसन्ने व्यक्तं द्रव्यगुणात्मकम्।
अनादिनिधन: कालो ह्यव्यक्तायापकर्षति॥ ८॥
सूर्योदयेंसीं दिवसस्थिती। लोटल्या अवश्य पावे राती। तेवीं झालिया उत्पत्तिस्थिती। प्रळयाची प्राप्ती अवश्य पावे॥ ५०॥ एवं पावल्या प्रळयवेळु। खवळे अनादिनिधन काळु। तो महाभूतेंसीं भूगोळु। नाशार्थ प्रबळु प्रताप मांडी॥ ५१॥ तेथ जें जें स्थूळाकारें व्यक्त। तें तें करूं लागे अव्यक्त। जेवीं पेरिलें पिकोनि शेत। स्वये वाळत उष्णकाळीं॥ ५२॥ तृणादि नाना बीजें क्षितीं। स्वभावें वार्षिये विरूढती। तेचि शारदीये नानाव्यक्ती। सफळितें होती सुपुष्ट॥ ५३॥ तेचि ग्रीष्माच्या अंतीं। फळमूळ मोडोनि व्यक्ती। बीजें लीन होती क्षितीं। तैशी काळगती संसारा॥ ५४॥ जेवीं वसंताचे ऐलीकडी। वृक्षांसी होय पानझडी। तेवीं ब्रह्मादिकांची परवडी। काळ झोडी निजसत्ता॥ ५५॥ जेवीं कां वाळलिया शेत। कृषीवळु मळुं लागे समस्त। तेवीं व्यक्ताचें अव्यक्त। काळ त्वरित करूं लागे॥ ५६॥ तेच अव्यक्त करिती स्थिती। राया सांगेन तुजप्रती। काळाची क्षोभक शक्ती। प्रळयाचे प्राप्तीपूर्वीं पावे॥ ५७॥
शतवर्षा ह्यनावृष्टिर्भविष्यत्युल्बणा भुवि।
तत्कालोपचितोष्णार्को लोकांस्त्रीन्प्रतपिष्यति॥ ९॥
काळक्षोभाचिये दृष्टि। शतवर्षें अनावृष्टी। तेणें अत्युल्बणें आटे सृष्टी। पृथ्वीच्या पोटीं कांही नुरे॥ ५८॥ प्राणिमात्र निमाले देख। वनें वाळूनि जाहली राख। बिंदुमात्र न मिळे उदक। यापरी लोक आटिले काळे॥ ५९॥ तंव द्वादशादित्यमेळा। मंडळीं झाला एकवेळा। तेथींच्या किरणीं प्रबळा। त्रैलोक्या सकळा संतप्त केलें॥ ६०॥ येती उष्णाचिया आह्या। होती पर्वतांच्या लाह्या। तेणें धरातळ लवलाह्या। भस्म झालें राया महाउष्णें॥ ६१॥
पातालतलमारभ्य सङ्कर्षणमुखानल:।
दहन्नूर्ध्वशिखो विष्वग्वर्धते वायुनेरित:॥ १०॥
उष्णें तापलें पृथ्वीतळ। पोळलें शेषफणामंडळ। तैं सहस्रमुखें विषानळ। अग्निकल्लोळ वमिता झाला॥ ६२॥ पाताळतळींहूनि देखा। ऊर्ध्वमुख अग्निशिखा। जाळीतचि तिहीं लोकां। उठिला भडका अनिवार॥ ६३॥ क्षोभें दिधला फूत्कारा। सहस्रमुखें सुटला वारा। तो साह्य झाला त्या वैश्वानरा। जाळीत दिगंतरा वाढला वणवा॥ ६४॥
सांवर्तको मेघगणो वर्षति स्म शतं समा:।
धाराभिर्हस्तिहस्ताभिर्लीयते सलिले विराट्॥ ११॥
स्वर्ग आणि पाताळतळा। कवळूनि उठिल्या अग्निज्वाळा। तंव प्रळयकर्त्या मेघमाळा। क्षोभल्या त्या काळा अतिदुर्धरा॥ ६५॥ म्हणाल तेथ मोठमोठे। वर्षों लागले थेंबुटे। तैसें नव्हे गा कडकडाटें। एकी धार सुटे अनिवार॥ ६६॥ इतर पर्जन्याच्या धारा। त्या तैशा नव्हती नृपवरा। ऐक प्रमाणाच्या निर्धारा। तो समयो महावीरा अतिदुस्तर॥ ६७॥ जैसी कां मदगजाची सोंड। तैशा धारा अतिप्रचंड। शत वर्षेंवरी अखंड। पर्जन्य वितंड पैं वर्षे॥ ६८॥ विजु निजतेजें नभ जाळी। कडकडाटे दे आरोळी। काळाची बैसे दांतखिळी। ऐसा प्रलयकाळीं मेघ खवळे॥ ६९॥ तेणें उलथलें जळ सैंघ। जेथोनि वर्षत होते मेघ। त्यांतेंही विरवूनि सांग। जळमय चांग त्रैलोक्य झालें॥ ७०॥ अनिवार वर्षतां वेग। जेथें मेघांचेंही विरे अंग। या नांव ‘सांवर्तक’ मेघ। अतिअमोघ वर्षावो॥ ७१॥ तीर्थ क्षेत्र पवित्रोदक। सरिता समुद्र झाले एक। हारपले चंद्रसूर्यादिक। तिनी लोक बुडाले॥ ७२॥ ऐशिया एकार्णवाचे ठायीं। विराट विराला गा पाहीं। साकार उरे ऐसें कांहीं। उरलें नाहीं नृपनाथा॥ ७३॥
ततो विराजमुत्सृज्य वैराज: पुरुषो नृप।
अव्यक्तं विशते सूक्ष्मं निरिन्धन इवानल:॥ १२॥
प्रळयकाळीं अतिगहिंसु। अगाध उसळे जळोल्हासु। स्थूळाचा करितां नाशु। विरे नि:शेषु विराटु॥ ७४॥ विराटाचा वैराज पुरुषु। तो अव्यक्तीं करी प्रवेशु। जेवीं इंधननाशें हुताशु। करी रहिवासु निजकारणीं॥ ७५॥ जे ब्रह्मलोकनिवासी होती। त्यांसी महाप्रळयाचे अंतीं। ब्रह्मयासवें सर्वांसी ‘क्रममुक्ती’। ऐसें स्मृति-श्रुतींचें दृढ वाक्य॥ ७६॥ ‘वैराजपुरुष’ नाम वदंती। हिरण्यगर्भातें म्हणती। त्यासी प्रळयीं प्रवेशु अव्यक्तीं। तैं इतरांची गति श्रुतिवाक्यें कैसी॥ ७७॥ विदेहें पुशिली मायेची स्थिती। ते मायेची ऐशी दुर्धर शक्ती। जे न करिती भगवद्भक्ती। त्यां ब्रह्म्यासवें मुक्तीं घडों नेदी॥ ७८॥ जालिया ब्रह्मसदनप्राप्ती। न करितां भगवद्भक्ती। अतिशयें दुर्लभ मुक्ती। भक्तीपाशीं मुक्ती दासी जैसी॥ ७९॥ न करितां भगवद्भजन। ब्रह्मॺासीही मुक्ति नव्हे जाण। मा इतरांचा ज्ञानाभिमान। पुसे कोण परमार्थीं॥ ८०॥ ज्यासी जेथ पदाभिमान। त्यासी तेंचि दृढ बंधन। यालागीं दुर्लभपण। मोक्षासी जाण तिहीं लोकीं॥ ८९॥ सांडोनियां पदाभिमान। अंगें सदाशिवु आपण। नित्य वसवी महाश्मशान। भगवद्भजनीं निजनिष्ठा॥ ८२॥ यालागीं ज्यांसी ब्रह्मलोकपदप्राप्ती। तेथही जे करिती भगवद्भक्ती। त्यांसीच प्रळयाच्या अंतीं। परममुक्ती नृपवर्या॥ ८३॥ ब्रह्मलोकीं ज्यां नाहीं हरिभक्ती। तेही पावती पुनरावृत्ती। ऐशी मायेची दुर्धर शक्ती। न करितां भक्ती मुक्ति कैंची॥ ८४॥ येचि अर्थीं ब्रह्मॺाचें वचन। दों श्लोकीं बोलिला आपण। ज्ञानाभिमानियां पतन। भक्तां भवबंधन कदा न बाधी॥ ८५॥
(ब्रह्मादिकृतगर्भस्तुतिश्लोकौ) येऽन्येऽरविन्दाक्ष विमुक्तमानिनस्त्वय्यस्तभावादविशुद्धबुद्धय:।
आरुह्य कृच्छ्रेण परं पदं तत: पतन्त्यधोऽनादृतयुष्मदङ्घ्रय:॥ ३२॥
तथा न ते माधव तावका:क्वचिद् भ्रश्यन्ति मार्गात्त्वयि बद्धसौहृदा:।
त्वयाभिगुप्ता विचरन्ति निर्भया विनायकानीकपमूर्धसु प्रभो॥ ३३॥
—(भागवत, द. स्कं. पूर्वार्ध, अ. २)
न करितां भगवद्भक्ती। सज्ञानाही नातुडे मुक्ती। तेचि अर्थींच्या दृष्टांतीं। ब्रह्मॺाची उक्ती दाविली येथें॥ ८६॥ जन्मामाजीं ब्राह्मणपण। तेही वेदशास्त्रसंपन्न। न करितां भगवद्भजन। अचूक पतन तयांसी॥ ८७॥ भक्तां सर्वभूतीं भगवद्भावो। तेथ विघ्नांसी नाहीं ठावो। तयां अपावचि होय उपावो। भावार्था देवो सदा साह्य॥ ८८॥ भक्तीवीण मुक्तीचा सोसु। करितां प्रयत्न पडे वोसु। असो हें वैराजपुरुषु। करी प्रवेशु अव्यक्तीं॥ ८९॥ अव्यक्तीं वैराजाचा प्रवेशु। होतांचि महाभूतविलासु। हों लागे भूतां ऱ्हासु। तो अनुप्रवेशु ऐक राया॥ ९०॥
वायुना हृतगन्धा भू: सलिलत्वाय कल्पते।
सलिलं तद्धृतरसं ज्योतिष्ट्वायोपकल्पते॥ १३॥
हृतरूपं तु तमसा वायौ ज्योति: प्रलीयते।
हृतस्पर्शोऽवकाशेन वायुर्नभसि लीयते॥ १४॥
प्रळयवायूचा क्षोभक क्रोधु। तेणें पृथ्वीचा हरिला गंधु। तंव तेही विरोनियां प्रसिद्धु। एकवदु जळ जाहलें॥ ९१॥ क्षोभला वायु असमसाहस। तो हरी जळाचा जळरस। तेव्हां जळाचा होय ऱ्हास। सावकाश प्रळयमहातेजीं॥ ९२॥ त्या तेजाचा निजसंभ्रम। वायुबळें ग्रासीत तम। तेव्हां प्रळयवायु परम। भरोनि व्योम कोंदाटे॥ ९३॥ त्या प्रळयवायूचा स्पर्श। चपळतेसी सर्व ग्रास। करूनि ठाके अवकाश। तेव्हां वायूतें आकाश नि:शेष ग्रासी॥ ९४॥
कालात्मना हृतगुणं नभ आत्मनि लीयते॥
इन्द्रियाणि मनो बुद्धि: सह वैकारिकैर्नृप।
प्रविशन्ति ह्यहङ्कारं स्वगुणैरहमात्मनि॥ १५॥
आकाशाचा जो शब्दगुण। तो प्रळयकाळु गिळी संपूर्ण। तंव क्षोभला तामसाभिमान। तो करी प्राशन गगनाचें॥ ९५॥ दश इंद्रियांचा गोंदळा। राजसाभिमानीं रिघाला। चित्तचतुष्टयाचा मेळा। तोही प्रवेशला सात्त्विकाभिमानीं॥ ९६॥ इंद्रियअधिष्ठात्रीं दैवतें। तींही मिळोनियां समस्तें। प्रवेशलीं सात्त्विकातें। जाण निश्चितें नृपनाथा॥ ९७॥ ते तिनी अहंकार त्रिगुणेंसीं। प्रवेशती महत्तत्त्वासीं। महत्तत्त्व मिळे मायेसी। जेवीं कन्या संततीसीं माहेरा ये॥ ९८॥ जेवीं कुकडीचीं पिलीं। कुकडी पांखांतळीं घाली। मग ते स्वयें दिसे एकली। तेवीं माया उरली कल्पांतीं॥ ९९॥ एवं उत्पत्तिस्थितिप्रळयांत। त्रिविध भागें दाविली येथ। ते गुणमयी माया निश्चित। मिथ्याभूत आभासे॥ २००॥ जेवीं लेंकुरें खेळतां खेळासी। दिवसा म्हणती जाहली निशी। तेवींचि पूर्णस्वरूपापाशीं। देखती मायेसी त्रिविध कल्पना॥ १॥
एषा माया भगवत: सर्गस्थित्यन्तकारिणी।
त्रिवर्णा वर्णितास्माभि: किं भूय: श्रोतुमिच्छसि॥ १६॥
उत्तम मध्यम अधम जन। तिन्ही अवस्था त्रिभुवन। त्रिविध कर्में तीन गुण। हें जाण विंदान मायेचें॥ २॥ ध्येय ध्याता आणि ध्यान। पूज्य पूजक पूजन। ज्ञेय ज्ञाता आणि ज्ञान। हेही त्रिपुटी पूर्ण मायेची॥ ३॥ दृश्य द्रष्टा आणि दर्शन। कर्म कर्ता क्रियाचरण। भोग्य भोक्ता भोजन। हे त्रिपुटी जाण मायेची॥ ४॥ शब्द श्रोता आणि श्रवण। घ्रेय घ्राता आणि घ्राण। रस रसना रसस्वादन। हे त्रिपुटी जाण मायेची॥ ५॥ कर क्रिया आणि कर्ता। चरण चाल चालता। बोल बोलणें बोलता। हे त्रिविधावस्था मायेची॥ ६॥ अहं सोहं जडमूढता। साधक साधन साध्यता। देवी देवो परिवारदेवता। हेही त्रिविधता मायेची॥ ७॥ देह देही देहाभिमान। भव भय भवबंधन। मुक्त मुमुक्षु अज्ञान। हेंही विंदान मायेचें॥ ८॥ सुख दु:ख जडत्व पूर्ण। आधी समाधी व्युत्थान। उत्पत्ति स्थिति निधन। इंहीं लक्षणीं संपूर्ण माया विलसे॥ ९॥ नभीं नीळिमा पूर्ण भासे। शेखीं नीळिमेचा लेशही नसे। तेवीं स्वरूपीं माया आभासे। मिथ्यावेशें मायिक॥ २१०॥ जेवीं प्रत्यक्ष दिसे मृगजळ। परी तें निदाघचि केवळ। तेवीं स्वरूपीं माया प्रबळ। मुळीं निर्मूळ आभासे॥ ११॥ हे मिथ्या माया कल्पनावशें। प्रबळ बळें भासली दिसे। नासूं जातां नाशिजे ऐसें। सत्यत्वें नसे निजांग॥ १२॥ नांवरूपाचिया भडसें। ब्रह्मादिक केले पिसे। मिथ्या त्रिपुटीविन्यासें। ज्या बांधिलें दिसे त्रैलोक्य॥ १३॥ जेवीं रूपासवें दिसे छाया। नाशितां नातुडे नाशावया। तेवीं स्वरूपीं मिथ्या माया। अतिदुर्जया देवांसी॥ १४॥ जेवीं देहासवें मिथ्या छाया। तेवीं ब्रह्मीं मिथ्या माया। कल्पनायोगें वाढली वायां। यालागीं ‘अजया’ वेदशास्त्रें म्हणती॥ १५॥ राया कल्पना वाढे जे ठायीं। तेंचि मायेचें दृढ मूळ पाहीं। जो निर्विकल्प निजदेहीं। त्यासी माया नाहीं तिहीं लोकीं॥ १६॥ कल्पिती कल्पना जे राया। तेचि जाण मुख्य माया। आणीक रूपकें सांगावया। नातुडे माया निरूपणीं॥ १७॥ तेचि त्रिविध मुख्यलक्षणीं। माया सांगितली विवंचोनी। आतां कोण्या अर्थींचे श्रवणीं। अत्यादरु मनीं वर्ते राया॥ १८॥ माया दुस्तर दारुण। ऐकूनि ऋत्विज ब्राह्मण। थरारले सभाजन। राजाही पूर्ण विस्मित जाहला॥ १९॥ नवल मायेचें रूपक। नाशूं न शकतीच ज्ञाते लोक। जिया गोंविले ब्रह्मादिक। इतरांचा देख पाडु कोण॥ २०॥ मायाआक्रमूनि शिवासी। तोही आणिला जीवत्वासी। ते माया तरवे दीनासी। तो उपावो यासी पुसों पां॥ २१॥ सुखोपायें दीन जन। दुस्तर माया तरती पूर्ण। तदर्थीं राजा आपण। अत्यादरें प्रश्न श्रद्धेनें पुसे॥ २२॥
राजोवाच
यथैतामैश्वरीं मायां दुस्तरामकृतात्मभि:।
तरन्त्यञ्ज: स्थूलधियो महर्ष इदमुच्यताम्॥ १७॥
अतिदुस्तर हरीची माया। आइकोनि हांसें आलें राया। लटकीच परी देहाभिमानियां। बांधावया दृढ जाहली॥ २३॥ माया दुस्तर शास्त्रप्रसिद्धी। तेथ बाळेभोळे स्थूळबुद्धी। सुखें तरती कोणे विधीं। तो सांग त्रिशुद्धी उपावो॥ २४॥ ज्यासी वश्य नाहीं निजमन। आणि भवाब्धि तरावया भाव पूर्ण। ऐसे भोळे भाविक जन। त्यांसी मायातरण सुगम सांगा॥ २५॥ मागां कवी बोलिला संकलितीं। ‘तन्माययाऽतो बुध आभजेति’। गुरु-ब्रह्म अभेदस्थिती। करितां भक्ती माया तरिजे॥ २६॥ तें भक्तीचें स्पष्ट लक्षण। विशद होआवया श्रवण। पुढती मायेचें तरण। पुसावया कारण मुख्य हेंचि॥ २७॥ तो मायातरणोपायविधी। सुगम सांगावया त्रिशुद्धी। अंतरिक्षाधाकुटा सुबुद्धी। ‘प्रबुद्ध’ प्रज्ञानिधी बोलता जाहला॥ २८॥
प्रबुद्ध उवाच
कर्माण्यारभमाणानां दु:खहत्यै सुखाय च।
पश्येत्पाकविपर्यासं मिथुनीचारिणां नृणाम्॥ १८॥
मुख्य मायेचें तरण। प्रबुद्धचिजाणेपूर्ण। प्रबुद्ध जाहलिया आपण। मायेचें विंदान न तरतां तरती॥ २९॥ मनीं विषयाचा छंदु। तो केवळ महाबाधु। विषयत्यागी तो प्रबुद्धु। तोचि विशदु भावो आइका॥ ३०॥ विषयीं लोभलें अत्यंत मन। तेथ नव्हतां वैराग्य पूर्ण। कदा नव्हे मायेचें तरण। वैराग्यार्थ जाण विषय निंदी॥ ३१॥ केवळ नश्वर विषय देख। तेंचि मानिती परम सुख। तें सुखचि दु:खदायक। स्त्रीकामें मुख्य माया बाधे॥ ३२॥ वेंचूनि धनाचिया गांठी। सुखार्थीं स्त्री बैसविली पाटीं। तेचि भोगवी दु:खकोटी। जगीं माया लाठी स्त्रीकामें॥ ३३॥ स्त्रीकामें प्रपंचु सबळ। स्त्रीकामें दु:ख प्रबळ। स्त्रीकामें मायेसी बळ। स्त्रीकामें सकळ मोहिलें जग॥ ३४॥ आवडीं स्त्री बैसवितां पाटीं। ते प्रपंचाच्या वाढवी कोटी। महामोहाच्या पाडूनि गांठी। दु:खसागरीं लोटी स्त्रीकामु॥ ३५॥ जे नवमास वाहे उदरांत। ते माता करूनि अनाप्त। स्त्रियेसी मानिती अतिआप्त। ऐशी माया समर्थ स्त्रीकामें॥ ३६॥ जे तोंडींचें पोटींचें खाववित। जे सदा सोशी नरकमूत। ते मातेहूनि स्त्री आप्त। जाहली जगांत मायामोहें॥ ३७॥ स्त्रिया मेळवितां असंख्य मिळती। परी माता न मिळे त्रिजगतीं। ऐसें जे सज्ञान जाणती। तेही आप्त मानिती स्त्रियेतें॥ ३८॥ मातेतें भजतां भुक्तिमुक्ती। स्त्रियेतें भजतां नरकप्राप्ती। ऐसें जे शास्त्रज्ञ जाणती। तेही माता उपेक्षितीस्त्रीकामें॥ ३९॥ एवं स्त्रीकामाचिया व्याप्ती। माया व्यापिली त्रिजगतीं। सज्ञानही पाडले भ्रांतीं। स्त्रीकामासक्ती महामाया॥ ४०॥ मानूनि विषयांचें सुख। काम्य कर्म करितां देख। तेणें अति-दु:खी होती लोक। दु:खदायक काम्य कर्म॥ ४१॥ कामिनीकामें गृहासक्ती। प्राणी प्राणांतें स्वयें शिणविती। त्या श्रमाची निदानस्थिती। सांगेन तुजप्रती राजाधिराजा॥ ४२॥ निर्मळ जळें भिंती धुतां। जळाचीच नासे निर्मळता। हात माखती धुतले म्हणतां। भिंतीही तत्त्वतां निदळ केली॥ ४३॥ तेवीं विषयांचेनि सुखें सुख। न पावतीच ब्रह्मादिक। विषयाचा जे मानिती हरिख। ते परममूर्ख पशुदेही॥ ४४॥
नित्यार्तिदेन वित्तेन दुर्लभेनात्ममृत्युना।
गृहापत्याप्तपशुभि: का प्रीति: साधितैश्चलै:॥ १९॥
रातिदिवसु निजनिकटें। मरणेंसीं घेतां झटें। कवडीची प्राप्ती न भेटे। प्राणांतकष्टें द्रव्य जोडे॥ ४५॥ एवं कष्टें जोडलें धन। तें महादु:खाचें जन्मस्थान। अर्थ अनर्थाचें अधिष्ठान। निजात्ममरण निजमूळ॥ ४६॥ द्रव्य नसतां उपायें शिणवी। जाहलिया संरक्षणीं आधी लावी। रात्रिदिवस हृद्रोग जीवीं। अविश्वासें नांदवीं धनलोभु॥ ४७॥ मायबापांशीं चोरी करवी। स्त्रीपुत्रांसी कलहो लावी। सुहृदांतें दूरी दुरावी। हे द्रव्याची पदवी स्वाभाविक॥ ४८॥ द्रव्यापाशीं आधिव्याधी। द्रव्यापाशीं दुष्ट बुद्धी। द्रव्यापाशीं सलोभ क्रोधी। असत्य निरवधी द्रव्यापाशीं॥ ४९॥ द्रव्यापाशीं अतिविकल्प। द्रव्यापाशीं वसे पाप। द्रव्यापाशीं अतिसंताप। पूर्ण दु:खरूप तें द्रव्य॥ ५०॥ हें दानें त्यागितां फळ गोमटें। लोभियां नरका ने हटेंतटें। द्रव्याऐसे गा वोखटें। आन न भेटे तिहीं लोकीं॥ ५१॥ नळिया चणियांचे आशा। वानरें मुठीं धरणें तोचि फांसा। तेवीं द्रव्यदाराभिलाषा। नरदेहदशा अध:पातीं॥ ५२॥ द्रव्य सहसा न मिळे पाहीं। मिळे तरी अनीति अपायीं। यालागीं द्रव्याच्या ठायीं। सुख नाहीं त्रिशुद्धी॥ ५३॥ धन वेचोनि फाडोवाडें। घर करिती वाडेंकोडें। तें अध्रुवत्वें सवेंचि पडे। थितें द्रव्य बुडे आयुष्येंसीं॥ ५४॥ करूनि आयुष्याचा मातेरा। मुद्दलसिंचने जोडिलें पुत्रा। त्या पुत्राच्या मरणद्वारा। दु:खदुर्धरामाजीं बुडती॥ ५५॥ प्रपंचींचे सुहृद समस्त। जंव स्वार्थ तंव होती आप्त। स्वार्थविरोधें तें अनाप्त। होऊनि घात सुहृदां करिती॥ ५६॥ करोनियां अतिहव्यासु। मेळविती नाना पशु। त्यांचा सवेंचि होय नाशु। तेणें दु:खें त्रासु गृहस्थांसी॥ ५७॥ निजदेहोचि नश्वर येथ। त्यासि प्रपंच नव्हे गा शाश्वत। अवघें जगचि काळग्रस्त। इहलोकीं समस्त ठकिले विषयीं॥ ५८॥ मनुष्यदेहो कर्मभूमीं प्राप्त। तो लोक म्हणती ‘कर्मजित’। हा जैसा नश्वर येथ। तैसाच निश्चित नश्वर स्वर्गु॥ ५९॥
एवं लोकं परं विद्यान्नश्वरं कर्मनिर्मितम्।
सतुल्यातिशयध्वंसं यथा मण्डलवर्तिनाम्॥ २०॥
मनीं धरोनी विषयभोग। इहलोकीं करिती याग। पुण्य जोडोनियां साङ्ग। पावती स्वर्ग निजपुण्ययोगें॥ २६०॥ स्वर्गसुखा इंद्र अधिपती। तोही पतनार्थ धाके चित्तीं। विघ्नें सूची तापसांप्रती। स्वर्गस्थिति अपायी॥ ६१॥ यापरी निजपुण्यें स्वर्गप्राप्ती। त्या लोकातें ‘पुण्यजित’ म्हणती। तेही पुण्यक्षयें क्षया जाती। तेणें धाकें धाकती स्वर्गस्थ श्रेष्ठ॥ ६२॥ गांठीं पुण्य असतां चोख। स्वर्गभोगीं असेल सुख। हेही वार्ता समूळ लटिक। स्वर्गींचें दु:ख ऐक राया॥ ६३॥ समान पुण्यें समपदप्राप्ती। त्यांसी स्पर्धाकलहो करिती। आपणाहूनि ज्यां अधिक स्थिति। त्यांचा द्वेष चित्तीं अहर्निशीं॥ ६४॥ जैसे राजे मंडळवर्ती। राज्यलोभें कलहो करिती। तैशी स्वर्गस्थां कलहस्थिती। द्वेषें होती अतिदु:खी॥ ६५॥ पतनभयें कलह-द्वेष वोढी। क्षयातें पावे पुण्यजोडी। अधोमुख पडती बुडीं। याज्ञिकें बापुडीं चरफडती॥ ६६॥ एवं स्वर्गसुखउल्हासु। मानिती ते केवळ पशु। प्रत्यक्ष तेथ द्वेष नाशु। असमसाहसु नित्य कलहो॥ ६७॥ सेविलाचि विषयो नित्य सेविती। परी कदा नव्हे मानसीं तृप्ती। तरी मिथ्या म्हणौनि नेणती। हे मोहक शक्ती मायेची॥ ६८॥ जैसें वेश्येचें सुख साजणें। वित्त घेऊनि वोसंडणें। तेवीं विषयाचा संगु धरणें। तंव तंव होणें अतिदु:खी॥ ६९॥ यालागीं उभयभोगउपाया। जे जे प्रवर्तले गा राया। ते ते जाण ठकिले माया। थितें गेलें वायां उत्तम आयुष्य॥ ७०॥ कर्मभूमीं नरदेह प्राप्त। हे पूर्ण निजभाग्याचें मथित। देव नरदेह वांछित। ते देव केले व्यर्थ विषयार्थीं॥ ७१॥ एवं विषयाची आसक्ती। माया ठकिले नेणों किती। यालागीं विषयाचे विरक्ती। करावी गुरुभक्ती तेंचि सांगों॥ ७२॥
तस्माद्गुरुं प्रपद्येत जिज्ञासु: श्रेय उत्तमम्।
शाब्दे परे च निष्णातं ब्रह्मण्युपशमाश्रयम्॥ २१॥
जाणोनि विषयांचे नश्वरपण। पावावयालागीं ब्रह्म पूर्ण। सद्गुरूसी अनन्यशरण। रिघावें संपूर्ण श्रद्धायुक्त॥ ७३॥ सद्गुरुवचनमात्रें माया। तरेन हा निश्चयो राया। येणें सद्भावें लागतो पायां। पावावया निजस्वार्थु॥ ७४॥ ‘गुरु’ ऐसें जें म्हणणें। तेंही आहे बहुसालपणें। ऐक राया तीं लक्षणें। तुज कारणें सांगेन॥ ७५॥ एक वेदाध्ययन गुरु। एक व्याख्यानदानीं उदारु। एक ज्योतिषज्ञानीं गंभीरु। परी तो सद्गुरु न म्हणती ज्ञाते॥ ७६॥ एक आगमोक्त मंत्र उपासिती। जप करावा विधानयुक्ती। मग कैं होईल निजप्राप्ती। हें नकळे निश्चितीं गुरुशिष्यां॥ ७७॥ एक वायुधारणा लाविती। एक नाना लक्ष्यें दाविती। एक हठयोगें गोंविती। एक बैसविती महामुद्रा॥ ७८॥ एक ब्रह्मानुवादें चोखटु। तत्त्वनिरूपणीं उद्भटु। वैराग्यबोलिका वरिष्ठु। उपजवी विटु उभयभोगांचा॥ ७९॥ कैंसे निरूपी शुद्ध ब्रह्म। ऐकोनि सात्त्विकां येत प्रेम। परी निजहृदयींचा भ्रम। निरसे तें वर्म नेणेचि॥ २८०॥ जेवीं गुळ-उसांचा घाणा। तोंडींचा रसु भरे भाणा। शब्दचोपटें भरोनि वदना। करी परिभ्रमणा करकरितु॥ ८१॥ ऐसा जो कां शब्दज्ञानी। उत्तम व्याख्याता ज्ञानगुणीं। तो जन रंजवी निरूपणीं। स्वयें कोरडेपणीं करकरितु॥ ८२॥ योगक्षेम चाले गोमटा। लौकिकीं थोर प्रतिष्ठा। तेथें निजप्राप्तीची उत्कंठा। न वचे वरिष्ठा शिष्यांची॥ ८३॥ जेवीं अमृत म्हणतां। चवी न लभे गा सर्वथा। तेवीं शाब्दिक ज्ञानयोग्यता। अनुभववार्ता स्वयें नुपजे॥ ८४॥ जेणें स्वयें चाखिली नाहीं चवी। तो दुजयातें गोडी केवीं लावी। यालागीं जो पूर्णानुभवी। तो तारी सद्भावें सच्छिष्यासी॥ ८५॥ एवं गुरुपणाची वदंती। असे बहुपणें नांदती। जो करी अपरोक्षप्राप्ती। त्यातें म्हणती सद्गुरुस्वामी॥ ८६॥ ज्याचेनि वाक्यें असंतता। नि:शेष मावळे तत्त्वतां। त्यासीचि गा सद्गुरुता। वेदशास्त्रार्थां प्रतिपाद्य॥ ८७॥ जे उपदेशिती मंत्रतंत्र। तेही पूज्यत्वें अतिसधर। जेथें नुरे पूज्यपूजकताविचार। तोचि साचार सद्गुरुस्वामी॥ ८८॥ एकाचें शुद्ध ब्रह्मज्ञान। वस्तु देखोनि विरालें मन। मावळलें द्वैताचें भान। पडिलें मौन चहूं वाचां॥ ८९॥ इंद्रियें टंवकारिलीं समस्त। प्राण पांगुळला जेथींचा तेथ। वस्तु देखोनियां परमाद्भुत। पडलें ताटस्थ्य देहभावा॥ २९०॥ ऐसा जो आत्मानुभवी। त्यातें सद्भावें शिष्यु विनवी। तंव तो पुसे ना समजावी। ताटस्थ्यभावीं अबोलणा॥ ९१॥ एका अनुभवा आलें ब्रह्म। फिटला बाध्यबाधकतेचा भ्रम। मोडलें द्वैतभावाचें कर्म। जगीं विषम असेना॥ ९२॥ परी अचुंबित वर्तणें। अघटमान कर्म करणें। अत्यंत उग्रता मिरवणें। दुर्धरपणें भयानकु॥ ९३॥ आपण आपणियामाजीं हंसत। ध्वनितें बोले परमार्थ। तेथें बोधेना शिष्याचें चित्त। पडे दुश्चित ते ठायीं॥ ९४॥ ऐसा जो वर्ते ब्रह्मज्ञानी। त्याची ब्रह्मस्थिती न मने जनीं। मा कोण जाईल भाव धरोनी। बोधालागोनी त्यापाशीं॥ ९५॥ आतां सद्गुरूचीं जीं निजलक्षणें। राया सांगेन तुजकारणें। जे ऐकतां अंत:करणें। सुखी होणें सद्भावें॥ ९६॥ तरी जो कायावाचामनें। अतिकृपाळू दीनाकारणें। तोडी शिष्याचीं भवबंधनें। उठवी ठाणें अहंकाराचें॥ ९७॥ जो शब्दज्ञानें पारंगतु। ब्रह्मानंदें सदा डुल्लतु। शिष्यप्रबोधनीं समर्थु। यथोचितु निजभावें॥ ९८॥ ज्याचा जैसा जैसा भावो। तैसा तैसा करी अनुभवो। तरी गुरुत्वाचा अहंभावो। अणुमात्र पहा हो धरीना॥ ९९॥ शिष्यापासूनि सेवा घेणें। हें स्वप्नींही न स्मरे मनें। शिष्याची सेवा स्वयें करणें। पूज्यत्वें पाहणें निजशिष्यां॥ ३००॥ शिष्य देखावा पुत्रासमान। हें स्मृतिवाक्य असे प्रमाण। दृष्टीं देखों नेणे गौण। शिष्या देखे पूर्ण ब्रह्मत्वें॥ १॥ शिष्य सेवा करी निजभावार्थें। परी तो सेवक न म्हणे त्यातें। ज्यासी भगवद्रूप सर्व भूतें। शिष्य वेगळा तेथें सेवकत्वें नुरे॥ २॥ ऐसा मी एक महायोगी। हेंही न मिरवी तो जगीं। गुरुत्वाचा ताठा अंगीं। सर्वथा शिगीं लागों नेदी॥ ३॥ आपुल्या योगक्षेमाचें सांकडें। स्वप्नींही न घाली शिष्याकडे। शिष्यसंकट अतिगाढें। निवारी रोकडें निजांगें जो॥ ४॥ मी एक अकर्ता निजात्मयोगी। म्हणौनि विषयांतें न भोगी। अथवा विषयो नि:शेष त्यागी। हाही आग्रहो अंगीं असेना॥ ५॥ तो विषय भोगी ना स्वयें त्यागी। तो अदृष्टाच्या निजविभागीं। लावूनियां देहाच्या अंगीं। परब्रह्मयोगीं विचरत॥ ६॥ देह दैवें पालखीमाजीं चढे। अथवा विष्ठेमाजीं पडे। तें दोहींचें सुखदु:ख त्याकडे। मी म्हणौनि पुढें कदा न रिघे॥ ७॥ देहीं असोनि नाहीं अहंकृती। गेहीं असोनि नाहीं गृहासक्ती। शेखीं लोकांमाजीं लौकिकस्थिती। सुखें वर्तती लोकांसरिसें॥ ८॥ त्यासी स्त्री म्हणे माझा भर्ता। पुत्र म्हणे माझा पिता। शिष्य म्हणती गुरु तत्त्वतां। तो त्यांहूनि परता त्यांमाजीं वर्ते॥ ९॥ ऐशिया पूर्णप्रतीती। आचरोनि दावी भक्ती। हरि भजावा सर्वां भूतीं। हेंच शिष्यांप्रती उपदेशी॥ ३१०॥ हीं सद्गुरूचीं निजलक्षणें। पंडितां न कळती ज्ञातेपणें। पूर्णानुभवी जाणती खुणे। इतरांचें जाणणें पांगुळे तेथ॥ ११॥ त्याचे गुरुत्वाची वोळखण। अंगीं निजशांति पूर्ण। हेंचि सद्गुरुत्वाचें लक्षण। मुख्य भूषण हेंचि राया॥ १२॥ जगीं शांति जाली परदेशी। कोठेंही ठावो न मिळे तिशीं। ते आली सद्गुरुपायांपाशीं। सुखवासासी वसावया॥ १३॥ यापरी सद्गुरुपाशीं शांती। स्वयें आली सुखवासवस्ती। जेवीं कां माहेराआंतौती। स्वानंदें क्रीडती कन्या जैशी॥ १४॥ जाणोनि वेदशास्त्र निश्चितीं। जो न मिरवी गा व्युत्पत्ती। ज्यासी अपरोक्षें पूर्ण शांती। तो सद्गुरुमूर्ति निश्चयें राया॥ १५॥ झणीं श्रोते कोपती येथ। म्हणतील ग्रंथ वाढविला व्यर्थ। ‘निष्णात’ या पदाचा अर्थ। काढितां तेथ स्फुरलें हो॥ १६॥ हे माझे गांठीची नव्हे युक्ती। सद्गुरु आपण आपली स्थिती। बोलवीतसे ग्रंथार्थीं। पदपदार्थीं साधूनि॥ १७॥ तरी सद्गुरूचीं लक्षणें। न वर्णवती अगाधपणें। वेद वेडावले मुकेपणें। तेथें माझें बोलणें सरे केवीं॥ १८॥ येथ आश्चर्य कैसें देखा। श्रीभागवत देशभाखा। परमार्थु साधिला नेटका। तुष्टला निजसखा जनार्दनस्वामी॥ १९॥ एका जनार्दना शरण। त्याची जैं होय कृपा परिपूर्ण। त्या देहीं असतां देहबंधन। नातळे जाण गुरुभक्तां॥ ३२०॥ ज्याचे सेवितां निजचरण। देहीं न बाधी देहबंधन। त्यासी जाहलिया अनन्य शरण। दे अगाध कोण हें न कळे वेदां॥ २१॥ न करितां सद्गुरुभक्ती। कदा नव्हे परमार्थप्राप्ती। यालागीं सद्गुरुभक्ती। बोलिली ग्रंथीं शिष्यहितार्थ॥ २२॥ यालागीं पूर्ण सद्गुरूपाशीं। अनन्य शरण होतां त्यासी। तो सद्भावें निववी शिष्यासी। निजबोधेंसीं यथार्थ॥ २३॥ सद्गुरुस्थितीचें निरूपण। राया सांगितलें संपूर्ण। आतां शिष्याचें लक्षण। सावधान अवधारीं॥ २४॥
तत्र भागवतान् धर्मान् शिक्षेद् गुर्वात्मदैवत:।
अमाययानुवृत्त्या यैस्तुष्येदात्माऽऽत्मदो हरि:॥ २२॥
वरीवरी दिसती सात्त्विक। भीतरीं विकल्पी शिष्य एक। एक ते केवळ दांभिक। एक ज्ञानठक अतिधूर्त॥ २५॥ एक ते केवळ प्रतिष्ठाकाम। एकासी पूज्यतेचा संभ्रम। एकासी जाणिवेचा आक्रम। एकाचे पोटीं भ्रम महासिद्धीचा॥ २६॥ एक वाग्वादी वाजट। एक अतिशयेंसीं कर्मठ। एक केवळ कर्मनष्ट। आम्ही ब्रह्मनिष्ठ अभिमानें॥ २७॥ एका आवडे वायुधारण। एका आसनजयाभिमान। एकाचें संशयी मन। विश्वास पूर्ण दृढ नाहीं॥ २८॥ एक आदरें उपदेशु घेती। मग होय नव्हे विकल्प चित्तीं। ऐशा अनेक शिष्यपंक्ती। ते जाण निश्चितीं मायिक॥ २९॥ आतां जे कां अमायिक। शोधितसत्त्वाचे सात्त्विक। मुख्य परमार्था साधक। जे अवंचक सर्वंस्वें॥ ३३०॥ जे गुरुचरणाचे अंकिले। जे गुरुवाक्या जीवें विकले। सद्गुरूलागीं वहिलें। सर्वस्व आपुलें वोवाळिती॥ ३१॥ जो सद्गुरूच्या बोलावरी। जीविताची कुरवंडी करी। जो गुरुआज्ञेबाहेरी। तिळभरी हों न शके॥ ३२॥ सद्गुरूतें मनुष्यबुद्धी। पाहोंचि नेणे जो त्रिशुद्धी। सेवेलागीं निरवधी। हर्षानंदीं तत्पर॥ ३३॥ निजभावार्थें सादर। सेवेलागीं अतितत्पर। शरीर आठही प्रहर। अणुमात्र वंचीना॥ ३४॥ उंच अथवा नीच काम। म्हणो नेणे मनोधर्म। गौण करोनि नित्यकर्म। मानी उत्तमोत्तम गुरुसेवा॥ ३५॥ सेवेलागीं निष्कपट। नित्य निजभावें चोखट। जंव जंव सेवा पडे सदट। तंव तंव उद्भट उल्हासु॥ ३६॥ सच्छिष्य असच्छिष्य समुदावो। सद्गुरूसी सारिखेचि पहा वो। ज्याचे हृदयीं जैसा भावो। तैसा पहा हो फळभोग॥ ३७॥ ‘भावेषु* विद्यते देवो’। हा उपदेशीं मुख्य निर्वाहो। आपुला आपणया भावो। फळभोग पहा हो भोगवी॥ ३८॥ चुकवावया मृत्यूचा ठावो। जाणिवे आणितां निजभावो हिरण्यकशिपु नाडला पहा हो। संधी साधोनि देवो निर्दळी त्यासी॥ ३९॥ तेथेंचि प्रल्हादाचा भावो। मज रक्षिता देवाधिदेवो। त्यासी साक्षेपें मारितां रावो। मरणचि वावो भावार्थें केलें॥ ३४०॥ परमार्थीं जें जाणपण। ते जाणावी नागवण। यालागीं सद्भावें जो संपूर्ण। तो जन्ममरणछेदकु॥ ४१॥ मी शिष्यपरीक्षकु ज्ञाता। हे सद्गुरूसी नाहीं अहंता। तेथें जैशी त्याची भावार्थता। तैशा तैशा अर्था तो पावे॥ ४२॥ हें असो सच्छिष्याचा सद्भावो। राया अभिनव कैसा पहा हो। गुरु ब्रह्म ऐक्यभावो। निजनिर्वाहो निष्टंक॥ ४३॥ माझ्या इंद्रियवृत्ती चाळिता। सद्गुरु ‘निजात्मा’ मजआंतौता। बाह्य सेवेलागीं सर्वथा। ‘ब्रह्ममूर्ति’ तत्त्वतां सद्गुरु मानी॥ ४४॥ सद्गुरुचरणीं आपण। चित्त-वित्त-जीवितेंसीं पूर्ण। करूनि घाली आत्मार्पण। सर्वस्वें संपूर्ण सर्वभावें॥ ४५॥ तेथें संतुष्टला स्वामी पूर्ण। तोही सर्वस्वें भुलोन। आवडी निजांगें आपण। सेवका आधीन स्वामी होये॥ ४६॥ आत्मार्पण करितां बळी। द्वारीं द्वारपाळ जाहला वनमाळी। ऐसी भजनभावाची नवाळी। सेवकाजवळी स्वामी तिष्ठे॥ ४७॥ एवढी ये अगाध प्रीती। उत्तम भक्त स्वयें पावती। भाळ्ॺाभोळॺां हेचि स्थिती। कैशा रीती आतुडे॥ ४८॥ याचिलागीं सद्गुरूपाशीं। शरण रिघावें सर्वस्वेंशीं। तो संतोषोनियां शिष्यासी। भजनधर्मासी उपदेशी॥ ४९॥ जेणें भजनें भगवंत। भजोनि जाहले उत्तम भक्त। ते भागवतधर्म समस्त। शिकावे निश्चित सद्भावेंसीं॥ ३५०॥ मुख्य भागवतधर्मस्थिती। अवश्य करावी सत्संगती। हेंचि सद्गुरु उपदेशिती। असत्संगतित्यागार्थ॥ ५१॥
* ‘‘न काष्ठे विद्यते देवो न पाषाणे न मृण्मये। भावे तु विद्यते देवस्तस्माद्भावो हि कारणम्॥’’—(ना.पुराण)
सर्वतो मनसोऽसङ्गमादौ सङ्गं च साधुषु।
दयां मैत्रीं प्रश्रयं च भूतेष्वद्धा यथोचितम्॥ २३॥
सर्वांपासोनि नि:संग। जरी मनीं होणें आहे चांग। तैं अवश्य धरावा सत्संग। असत्संग त्यागावा॥ ५२॥ मुख्य असत्संग देहसंगती। त्याची समूळ करावी निवृत्ती। जगीं दाटुगी सत्संगती। जाण निश्चितीं नृपनाथा॥ ५३॥ जेथें दया मैत्री प्रश्रयो पूर्ण। मुख्यत्वें हें त्रिविध लक्षण। अवश्य करावें आपण। सत्संग प्रमाण स्वहितासी॥ ५४॥ सांडोनियां थोरपण। साधूसी लीन होआवें संपूर्ण। सांडोनियां देहाभिमान। त्यासी लोटांगण घालावें॥ ५५॥ साधूपरता पूज्य पहा हो। जगीं नाहीं आन देवो। संतपूजनें देवाधिदेवो। स्वयमेवो संतुष्टे॥ ५६॥ संतपदींचे रज:कण। शिरीं वंदावे श्रद्धेने पूर्ण। संतांपुढें जाणपण। सर्वथा आपण न मिरवावें॥ ५७॥ देखोनि संतसमुदावो। अनन्यगती भगवद्भावो। भगवद्भावें नम्र स्वभावो। ‘प्रश्रयो’ पहा हो या नांव॥ ५८॥ नम्रता सेवितां संतचरण। येथें भूतदया वाढे पूर्ण। हें दयेचें निजलक्षण। सावधान अवधारीं॥ ५९॥ भूतांसी कठिणपण। देखतां निघों पाहे प्राण। मा स्वयें करील आपण। हें सर्वथा जाण स्वप्नीं न घडे॥ ३६०॥ जेणें आपणासी होय दु:ख। तें भूतांसी करीना नि:शेख। जेणें आपणासी होय सुख। तें आवश्यक करी दीना॥ ६१॥ सर्व भूतीं दया समान। कदा न बोले कठिणपण। भूतांची पीडा निवारण। करोनि आपण सुखोपाय चिंती॥ ६२॥ जीवमात्रीं दुरुक्ती बोलतां। जिव्हेच्या घेवों पाहे जीविता। भूतीं दुष्टपण चाळितां। समूळ निजचित्ता निर्दाळूं पाहे॥ ६३॥ भूतांसी जेथ पीडा पावे। त्यातळीं जीव घालूं धांवे। जीवापरीस भूतें सर्वें। दयागौरवें पढियंतीं॥ ६४॥ ऐसें जें कारुण्य पूर्ण। त्या नांव ‘दया’ संपूर्ण। आतां मैत्रीचें लक्षण। असाधारण तें ऐका॥ ६५॥ सर्व भूतांचे ठायीं। सुहृदावांचोनि दुजें नाहीं। तरी न करितांचि मैत्री पाहीं। ठायींचे ठायीं अलोलिक॥ ६६॥ जे विषयवियोगें न विटे। नाना विकल्पीं न तुटे। आलिया परम संकटें। ‘मैत्री’ नेटेंपाटें सदा ग्राह्य॥ ६७॥ या नांव गा मित्रभावो। प्राण गेलिया न तुटे पहा हो। देखतां कल्पांतकाळघावो। निजमित्रसमुदावो एकवटे कीं॥ ६८॥ ऐसी आचरतां निजस्थिती। श्रद्धा उपजे सर्वां भूतीं। त्या श्रद्धेची व्युत्पत्ती। यथानिगुती सांगेन॥ ६९॥ नवल श्रद्धेचें लक्षण। ब्रह्मा मुंगी समसमान। तरी यथोचित विधान। सर्वथा जाण चुकेना॥ ३७०॥ अर्घ्यपाद्यादि पूजन। सकळ दान आणि सन्मान। हे श्रद्धा ब्राह्मणीं संपूर्ण। एकासी तें जाण अन्नमात्रचि॥ ७१॥ एका अन्न आच्छादन। एकासी ते कोरडे कण। तृण आणि जीवन। एका पय:पान यथोचित॥ ७२॥ जेणें ज्यासी सुख संपूर्ण। तें तें करी उचित श्रद्धें जाण। अनुचित श्रद्धेचें विंदाण। दु:खकारी संपूर्ण सर्वार्थीं॥ ७३॥ जेवीं ब्राह्मणा वाढिलें तृण। गाईस वाढिलें मिष्टान्न। श्वानासी बैसणें सिंहासन। साधूसी आसन थारोळा॥ ७४॥ व्याघ्रासी पडिल्या लंघन। त्यासी अर्पूं नये गोदान। गाय गादल्या संपूर्ण। तैलाभ्यंजन करूं नये॥ ७५॥ हो कां देह-इंद्रियें जरी एकें। तरी जिव्हाकर्म नव्हे नाकें। तेवीं एक भूतात्मा भूतवेखें। उचितोन्मुखें यजावा॥ ७६॥ करितां यथोचित अर्पण। जरी क्रिया दिसे भिन्न भिन्न। तरी अंतरश्रद्धा अभिन्न। हें मुख्य लक्षण भागवतधर्मीं॥ ७७॥ भूतीं भूतात्मा अभिन्नस्थिती। दया मैत्री साधूंची भक्ती। हेच आतुडे कैशा रीतीं। प्रबुद्ध तदर्थीं उपाव सांगे॥ ७८॥ तेचि नवश्लोकीं श्लोकोक्ती। समूळ भागवतधर्मस्थिती। प्रबुद्ध सांगे रायाप्रती। साधकां निजप्राप्ती साधावया॥ ७९॥
शौचं तपस्तितिक्षां च मौनं स्वाध्यायमार्जवम्।
ब्रह्मचर्यमहिंसां च समत्वं द्वन्द्वसंज्ञयो:॥ २४॥
मुख्य साधावया परमार्था। अवश्य पाहिजे गा ‘शुचिता’। शुचित्वावांचोनि तत्त्वता। न लाभे हाता निजस्वार्थु॥ ३८०॥ यालागीं गा नृपनाथा। शुद्ध शौचाची आइक कथा। आंतर मळ न क्षाळितां। न लाभे हाता बाह्यशुद्धी॥ ८१॥ मन मळिण वासनामळें। तें न करितां सोंवळें। बाह्य पवित्रता अहंबळें। तें जाण आंधळें न्याहाळी जैसें॥ ८२॥ मन मळिण वासनामळें। तें प्रक्षाळूनि सोंविळें। करावें गा भावबळें। गुरुवाक्यमेळें निजनिष्ठा॥ ८३॥ सोनें जेवीं पुटीं पडे। मळ तुटे वाणीं चढे। तेवीं गुरुसेवा जडत्व मोडे। चित्तशुद्धी जोडे निर्दुष्ट॥ ८४॥ आरशासी सहाणीं तोडिजे। तेणें स्वमुखा शुद्धत्व जोडिजे। तेवीं चित्तशुद्धी उघडिजे। सहजीं सहजें निजशुद्धी॥ ८५॥ लोहें परिसु झांकिजे। तंव लोहत्वा मुकिजे। तेवीं अंतरशुद्धीनें कीजे। महा निर्बुजे स्थूळबुद्धि॥ ८६॥ सूर्यासन्मुख सूर्यकांत। जाहलिया शुद्धत्वें होय दीप्त। ते प्रभा बाह्य प्रकाशत। अग्निहोत्रार्थ महायागा॥ ८७॥ तेवीं गुरुवाक्यें अंतरशुद्धता। सबाह्य आली शुचिता। हे न करिती जे पवित्रता। ते जाण तत्त्वतां अतिभंडिमा॥ ८८॥ अल्प जळ शौचाप्रती। तेणें हात करकटले ठाती। शेवटीं गिरबडे बृहती। तेवीं विकल्पी होती अपवित्र॥ ८९॥ भरलें काळकूट जीवीं। वरी टवटव अतिबरवी। तें इंद्रावण कोणीही न सेवी। अंतरस्वभावीं अतिमळिण॥ ३९०॥ तीर्थीं धुतला रजकराजु। तो काय होईल शुद्ध द्विजु। नटें घेतला राजध्वजु। तो नव्हे पूज्यु बाह्यक्रियावशें॥ ९१॥ सुंदरी सुकुमार साजिरी। वोठीं कुष्ठता तिळभरी। जाहलिया तीतें कोणी न वरी। वरीवरी बरी दिसतांही॥ ९२॥ नागवी माथा मोत्यांची जाळी। शिंबरी सुपाणीदाणा ल्याली। तेवीं बाह्य पवित्रता दाविली। ते ते केली निजभंडिमा॥ ९३॥ दहें माखला वायसु। तो काय होईल राजहंसु। दहीं म्हणोनि मथितां कापुसु। तृप्ती नव्हे उपहासु जगीं प्रगटे॥ ९४॥ तेवीं अंतरीं विकल्पु असतां। बाह्य जे जे पवित्रता। ते ते क्रिया नृपनाथा। जाण तत्त्वतां अतिभंडिमा॥ ९५॥ अंतर क्षाळिलें गुरुप्रतीतीं। बाह्य क्षाळिलें शास्त्रयुक्तीं। ऐसें शुचित्व निजनिश्चितीं। अद्वैत स्थिती तेथें नांदे॥ ९६॥ अंतरी शुचित्व पूर्ण वसे। तें बाह्यकर्मीं स्वयें प्रकाशे। तें शुचित्वचि अनायासें। परमार्थदशे प्रकाशी॥ ९७॥ ईश्वरभावाचें निजवर्म। ज्याचे पोटीं रिघालें सप्रेम। त्याचें कर्मचि होय ब्रह्म। त्या देहभ्रम बाधीना॥ ९८॥ या नाम ‘शुचिष्मता’। सत्य जाण गा नृपनाथा। तपाचीही स्थिती आतां। ऐक तत्त्वतां सांगेन॥ ९९॥ शरीरशोषणा नांव तप। तें प्रारब्ध-भोगानुरूप। हृदयीं वाहणें कृष्णस्वरूप। तो शुद्ध साक्षेप तपाचा॥ ४००॥ जेवीं धूरसूनि दिठी। शूर रणामाजीं उठी। तेवीं ईश्वर धरोनि पोटीं। वर्ते तो सृष्टीं तपिया शुद्ध॥ १॥ हेंचि तपाचें निजस्वरूप। याचि नांव शुद्ध ‘तप’। यावरतें न चढे रूप। व्यर्थ वाग्जल्प कां करावे॥ २॥ द्वंद्वसहिष्णुता मुमुक्षा। या नांव म्हणिजे ‘तितिक्षा’। तेही आणावया लक्षा। नृपाध्यक्षा अवधारीं॥ ३॥ सुखदु:ख उभय भोग। दोंमाजीं अखंड आपुलें अंग। जेवीं चित्रींची वाघीण आणि वाघ। दोहींमाजीं साङ्ग निजत्वें भिंती॥ ४॥ जेवीं दावाग्नी कां उन्हाळे। आकाश जैसें न पोळे। असोनि त्यांचेनि मेळें। त्यांवेगळें अलिप्त॥ ५॥ शीतळ जळ कां हींव पडे। पृथ्वी निजक्षमा न कांकुडे। तेवी निजस्वरूपसुरवाडें। द्वंद्वा नातुडे निजसाधु॥ ६॥ शरीर जरी हिंवे कांपे। तेणें देह कांपे साधु न कांपे। शरीर अतिउष्णें तापे। परी साधु न तापे देहतापामाजीं॥ ७॥ सुख देखोनि दिठी। ज्या गोडिया घाली मिठी। दु:खही त्याचि आवडी घोंटी। ‘द्वंद्वसहिष्णुता’ मोठी या नांव राया॥ ८॥ गोफणगुंडा सन्मुख। लागतां अवश्य उठे दु:ख। तोच सुवर्णाचा जाहलिया देख। दु:ख लोपोनि सुख अनिवार वाढे॥ ९॥ सुखदु:खप्रकाशक। निजवस्तु असे एक। त्या एकात्मता देख। द्वंद्वें साधक सुखें साहती॥ ४१०॥ तेवीं द्वंद्वाचें जाणपण। जाणवीत असे जें ज्ञान। तें जाणितल्या आपण। द्वंद्वें संपूर्ण निर्द्वंद्वें होती॥ ११॥ रसउसीं कठिणपण। त्यामाजीं गोडी अखंड पूर्ण। तेवीं द्वंद्वामाजीं वस्तु चिद्घन। अखंडदंडायमान स्वयें देखे॥ १२॥ ऐशी हे अखंडता। जंव न ये साधकाचे हाता। तंव द्वंद्वाची सहनता। नव्हे नृपनाथा निश्चयेंसीं॥ १३॥ या नांव ‘द्वंद्वसहन’। निजनिश्चयें जाण पूर्ण। आतां मौनाचें लक्षण। सावधान अवधारीं॥ १४॥ वाग्वादु करावा जनीं। तैं दृढ व्हावें देहाभिमानी। सांडविला तो सद्गुरूंनी। नि:शेष धोउनी शब्देंसीं॥ १५॥ सद्गुरुवचन पडतां कानीं। स्तुति निंदा गिळोनि दोन्ही। बोल बोलणें निरसुनी। हृदयभुवनीं परिपक्व केलें॥ १६॥ तेव्हां ज्याचे बोलावे अवगुण। तेथें दिसे हृदयस्थ आपण। यालागीं बोलतां पैशुन्य। पडे मौन गुरुवाक्यें॥ १७॥ गुण देखोनियां स्तवन। करितां पडे दृढ मौन। मीचि स्तव्य स्तविता स्तवन। मज म्यां वानितां पूर्ण मूर्खत्व माझें॥ १८॥ निजात्मा नि:शेष नसे। ऐसा रिता ठाव न दिसे। तेथें जें जें कांहीं दिसे। तें आत्मप्रकाशें सदोदित॥ १९॥ ऐशी सद्गुरूंनी दाखविली युक्ती। ती विश्वासें स्थिरावली चित्तीं। यालागीं निंदा आणि स्तुती। वाचेप्रती बोलेना॥ ४२०॥ संवाद करावा निजस्वार्थी। तंव सद्गुरूच्या वचनोक्तीं। खुंटल्या वेदशास्त्रांच्या युक्ती। त्यावरी स्थिती चढेना॥ २१॥ एवं स्तुति निंदा वाग्वाद। करितां खुंटला संवाद। महामौनें अतिशुद्ध। परमानंद साधकां॥ २२॥ ऐसें साधावया दृढ मौन। सद्गुरु शिकवी वेदाध्ययन। उपनिषदर्थ विवंचून। पढवी संपूर्ण अर्थावबोधें॥ २३॥ अथवा अतिशयें दृढ मौन। श्रीरामकृष्णनामस्मरण। अखंड नामें गर्जतां पूर्ण। वेदार्थ जाण तिष्ठती पुढें॥ २४॥ नित्य रामनाम गर्जे वाणी। त्या तीर्थें येती लोटांगणीं। सुरवर लागती चरणीं। यम पायवणी स्वयें वंदी॥ २५॥ रामनामाचें जें स्मरण। या नांव गा ‘महामौन’। वेदें नाम स्तविलें पूर्ण। शुद्ध अध्ययन हरिनाम॥ २६॥ वेदु अथवा नामस्मरण। या नांव गा ‘स्वाध्यायो’ जाण। आतां आर्जवाचें लक्षण। ऐकें संपूर्ण महाराजा॥ २७॥ आतां आर्जव तें ऐसें। सर्वा जीवां जीवन जैसें। कां तंतु जैसा निजविलासें। अविरोधें असे पटामाजीं॥ २८॥ साखरेचें इंद्रावण। केलिया न वचे गोडपण। तैसें विषमांही जीवां जाण। आर्जवें पूर्ण रंजवी स्वभावें॥ २९॥ वक्र चंद्राची चंद्रिका। परी अमृत वक्र नव्हे देखा। तैसें देखोनि विषमां लोकां। मनोवृत्ति देखा पालटेना॥ ३०॥ निपराद न देखे कोणासी। जिवलग सोयरा सर्वांशीं। वोळखी जीवमात्रांशीं। जैशी तैशी जुनाट॥ ३१॥ न्यहा संतप्ता आधार देत। वरूनि घणघाय घेत। सांडस घायातळीं सूत। तें आघवेंचि आप्त लोहत्वें लोहा॥ ३२॥ यापरी जयासी आप्त सर्व। ऐसा जो कां निजस्वभाव। तया नांव गा ‘आर्जव’। अतिअपूर्व गुरुदीक्षा॥ ३३॥ असुर सुर नर ऋषीश्वर। मदनें केले निजकिंकर। कंदर्पाचा मार थोर। अतिदुर्धर अनंगु॥ ३४॥ अंतरीं कामाचें दृढ ठाणें। वरीवरी दांत चावूनि साहणें। त्याचें मनचि निष्काम न म्हणे। चाळवणें लौकिकु॥ ३५॥ तैसी नव्हे सद्गुरूची युक्ती। कामाची पालटे कामनावृत्ती। अभंग ब्रह्मचर्यस्थिती। शिष्यांप्रती उपदेशी॥ ३६॥ कंदर्पराणिवेस्त्रीपुरुष। तेथें गुरुदीक्षा अलोलिक। मिथ्या स्त्रीपुरुष मायिक। विषयसुख भ्रम मात्र॥ ३७॥ ‘आनंदाचें उपस्थ एकायतन’। हें काय मिथ्या वचन। ते अर्थीं पूर्ण वेदज्ञ। वेदविवंचन दाविती ऐसें॥ ३८॥ पुसतां साखरेची गोडी कैशी। तो स्वादु न ये सांगावयासी। तेथें चाखों देती अणुमात्रेंशीं। तेचि गोडपण राशीं जाणती जाण॥ ३९॥ तेवीं परमानंदसुखप्राप्ती। उपस्थद्वारा नर चाखिती। आनंद एकायतनस्थिती। बोलिली उपस्थीं या हेतु वेदें॥ ४४०॥ त्या उपस्थसुखाची नित्यस्थिती। संभोगेंवीण जे वाढविती। तेथ मिथ्या स्त्रीपुरुषव्यक्ती। सहजें होती सज्ञान॥ ४१॥ चाखिली गोडी तेचि साखर। परमानंद मैथुनमात्र। मानूनियां मैथुनपर। जाहले पामर विषयांध॥ ४२॥ उपस्थीं परमानंदगोडी। यालागीं स्त्रीकामाची अतिवोढी। सदा सोसिजे महामूढीं। ताडातोडी जीविताच्या॥ ४३॥ साखरेचें केलें नारियेळ। तेथ त्वचा गर्भ साखरचि केवळ। तेवीं विषयद्वारा सुखकल्लोळ। उठती सकळ परमानंदें॥ ४४॥ नाना पक्वान्नपरवडी। गुळाच्या गोडीनें ते चवी गाढी। तेवीं विषयाची जे जे आवडी। ते ते गोडी निजानंदें॥ ४५॥ हे नेणोनि मूळींची निजगोडी। सोशिती विषयांच्या अतिवोढी। बाप सद्गुरुकृपा गाढी। विषयांची आवडी एकत्वा आणी॥ ४६॥ यालागीं विषयांची आस्था। न चढे सच्छिष्याचे माथां। स्त्रीभोगाची आसक्तता। मिथ्या तत्त्वतां गुरुवाक्यनिष्ठा॥ ४७॥ हा आत्मा हे आत्मी पाहीं। ऐसें मिथुन मुळीं नाहीं। तें निजमूळ पाडितां ठायीं। ब्रह्मचर्य पाहीं अभंग॥ ४८॥ या नांव गा निज नैष्ठिक्य। ‘ब्रह्मचर्य’ अतिसुटंक। सद्गुरूंनी बोधिलें निष्टंक। अलोलिक अभंग॥ ४९॥ आतां अहिंसेची स्थिती। ऐकें राया चक्रवर्ती। भंवई उचलणें नाहीं भूतीं। स्वप्न-सुषुप्ती-जागतां॥ ४५०॥ पावो आदळतां देख। झणीं पृथ्वी पावेल दु:ख। या काकुलती आवश्यक। पाउलें अलोलिक हळुवार ठेवी॥ ५१॥ आकाश दचकेल देख। यालागीं नेदी सैरा हांक। वाचा परिपक्व पीयूख। वचनें परम सुख सर्वांसी देतु॥ ५२॥ त्याचा शब्दु जैं गगनीं भरे। तेणें शब्दानंदचमत्कारें। गगनचि निजसुखें भरे। येणें सुखोद्गारें वचनोंक्ती॥ ५३॥ जळामाजीं घालितां उडी। झणीं उदक दडपे बुडीं। तरंगन्यायें देणें बुडी। जीवनाची दुथडी न हेलावतां॥ ५४॥ त्यासी जळीं होतां निमग्न। जळाचा तापु शमे संपूर्ण। यापरी करी स्नान। जीवना जीवन निववितु॥ ५५॥ झणीं दु:ख पावेल वारा। म्हणौनि श्वासु न घाली सैरा। नेमूनि प्राणसंचारा निजशरीरा वागवी॥ ५६॥ निजदेहा करावया घातु। सर्वथा जेवीं नुचले हातु। तेवीं भूतावरी निघातु। ज्याच्या पोटांतु उपजेना॥ ५७॥ अत्यंत न्याहारें पाहतां। वचकु पडेल प्राण्यांच्या चित्ता। यालागीं बाह्यदृष्टीं क्रूरता। न पाहे भूतां भूतभावें॥ ५८॥ रोम रगडतील संपूर्ण। यालागीं न करी अंगमर्दन। एवं स्वदेहाचें देहपण। भूतहिंसाभेण अहंत्वा नाणी॥ ५९॥ भूतां देतां दु:खलेशु। भूतीं दुखवेल भूतेशु। ऐसा ज्याचा
दृढ विश्वासु। तेथ रहिवासु अहिंसेचा॥ ४६०॥ कायिक-वाचिक-मानसिक। भूतां उपजे त्रिविध दु:ख। तें जेथें निमालें नि:शेख। अहिंसा देख ते ठायीं॥ ६१॥ या नांव गा शुद्ध ‘अहिंसा’। सत्य जाण नृपवरेशा। आतां द्वंद्वसाम्याची दशा। आइक क्षितीशा सांगेन॥ ६२॥ सुख दु:ख अदृष्टाधीन। तें अदृष्ट देहाचे माथां पूर्ण। ऐसें जाणोनि आपण। निर्द्वंद्व संपूर्ण सद्गुरुवाक्यें॥ ६३॥ अदृष्टें देह सुखदु:ख भोगी। मूर्ख तेथ रागी विरागी। शिष्यु लागों नेदी निजांगीं। गुरुवाक्यरंगीं रंगला॥ ६४॥ देहींचेनि सुखें सुखावतां। सवेंचि दु:ख चढे माथां। हें गुरूनें जाणोनि तत्त्वतां। देहअहंता सांडविली॥ ६५॥ निरभिमान्याच्या अंगीं। दु:ख नुरेचि दु:खनियोगीं। सुख नुरेचि सुखसंभोगीं। तो उभयभागीं अलिप्त॥ ६६॥ छाया उष्णामाजीं तापली। ते छाया छायेंचि निवाली। तेवीं सुखदु:खें मिथ्या जाहलीं। स्थिति सुखावली यथानुलाभें॥ ६७॥ अदृष्टें देहीं वर्ततां देख। बाधूं न शके सुखासुख। हें गुरुगम्य अलोलिक। शिष्य विश्वासिक पावती॥ ६८॥ विश्वासेंवीण सर्वथा। गुरुगम्य न ये हाता। गुरुगम्येंवीण तत्त्वतां। द्वंद्वसमता कदा न घडे॥ ६९॥ देहीं दृढता जंव मीपण। तंव तंव द्वंद्वबाधा दारुण। जे गुरुवाक्यें निरभिमान। त्यांसी द्वंद्वें जाण अतिमिथ्या॥ ४७०॥ स्वप्नींचें दरिद्र-समर्थता। जेवीं दोनी मिथ्या जागृता। तेवीं द्वंद्वबाधेची वार्ता। न बाधे गुरुभक्तां अपरोक्षबोधें॥ ७१॥ लेंकुरांच्या खेळापाशीं। पारणें तैशी एकादशी। द्वंद्वाची दशा तैशी। गुरुवाक्यासरिसी समूळ उडे॥ ७२॥ जेवीं चंदनाचिया द्रुतीं। आरीबोरी चंदन होती। तेवीं गुरुवाक्यप्रतीती। सकळ द्वंद्वें येती निजसाम्या॥ ७३॥ चंदनासभोंवतीं झाडें। तींही कोरडीं लांकडें। देवद्विजांचे मस्तकीं चढे। भाग्य एवढें सत्संगीं॥ ७४॥ सद्गुरु तोचि सत्संगती। तत्संगें शिष्य पालटती। स्वयें ब्रह्मरूप होती। तेव्हां द्वंद्वें येतीं निर्द्वंद्वा॥ ७५॥ एवं गुरुवाक्यीं विश्वासतां। द्वंद्वसाम्य चढे हाता। तें गुरुवाक्यही तत्त्वतां। ऐक आतां सांगेन॥ ७६॥
सर्वत्रात्मेश्वरान्वीक्षां कैवल्यमनिकेतताम्।
विविक्तचीरवसनं सन्तोषं येन केनचित्॥ २५॥
सद्गुरुवचनविश्वासें। मानीं सर्वत्र परमात्मा ऐसें। तेचि निजबुद्धी निश्चयवशें। निजमानसें विवंची॥ ७७॥ मजमाजीं परमात्मा वसे। तेणें स्थूळदेहो वर्ततसे। त्याचेनि पूर्ण चित्प्रकाशें। जग भासे जगद्रूपें॥ ७८॥ तेणें निजात्मप्रकाशें। माझें दृष्टीसी दृश्य दिसे। दृश्यद्रष्ट्टदर्शनविलासें। विलसतसे परमात्मा॥ ७९॥ दृश्य दृश्यपणें जें जें उठी। तें तें निजात्मता पाठींपोटीं। तेणें अन्वयें देवो देखे दृष्टी। आहाळबाहाळ सृष्टि दुमदुमित॥ ४८०॥ तेव्हां जें जें देखे भूताकृती। तेथ परमात्मा ये प्रतीती। मी नियंता ईश्वर त्रिजगतीं। हेही स्फूर्ती स्फुरों लागे॥ ८१॥ जग वर्ते माझिया सत्ता। मी कळिकाळाचा नियंता। मी उत्पत्तिस्थितिप्रलयकर्ता। हे मूळ अहंता स्वभावें स्फुरे॥ ८२॥ येणें पूर्वान्वयें जंव पाहे। तंव सर्वीं सर्व मीचि आहें। तें पाहतें पाहणें पाहों ठाये। तेथें ‘अहं’ जाये विरोनि॥ ८३॥ तेथें परब्रह्मैक प्रसिद्ध। कोंदला ठाके सच्चिदानंद। ऐसा गुरुवाक्यें प्रबोध। शिष्य अतिशुद्ध पावती॥ ८४॥ तेव्हां वैकुंठीं देवो आहे। हें बोलणें त्या आहाचि होये। क्षीरसागरीं देवो राहे। हें ऐकतांचि पाहें अनिवार हांसे॥ ८५॥ देवावांचोनि तत्त्वतां। तिळभरी ठावो नाहीं रिता। त्यातें एकदेशी नेमितां। न मने वस्तुतां सच्छिष्यासी॥ ८६॥ वैकुंठ आणि क्षीराब्धी। ज्याचेनि प्रकाशे ज्यामधीं। तो वैकुंठवासी अथवा क्षीराब्धीं। हे बोल सोपाधी शबलत्वाचे॥ ८७॥ जेथ सर्वीं सर्व परमात्मा। तेथ एकदेशी न सरे महिमा। तो पूर्णब्रह्म अनाश्रमा। वैकुंठादि आश्रमा वश नव्हे॥ ८८॥ अखंडातें आवाहन। अधिष्ठानातें आसन। सर्वगता सिंहासन। कल्पिती स्थान निजकल्पना॥ ८९॥ तेही कल्पिती निजवृत्ती। जे ब्रह्मरूप नित्य पाहती। त्यांची परब्रह्मस्थिती। कदा कल्पांतीं भंगेना॥ ४९०॥ ऐशी परब्रह्मआवाप्ती। साधकीं पावावया निश्चितीं। नित्य बसावें एकांतीं। द्वैताची स्फूर्ती त्यागोनी॥ ९१॥ साधितां परमार्थनिधान। साधकां आडवी वस्त्रअन्न। निमोली वल्कलें परिधान। कां त्यागिलीं अतिजीर्ण वस्त्रें घ्यावीं॥ ९२॥ शाकफलमूलकंदभोजन। येणें करावें जठरतर्पण। सांडूनि परमार्थसाधन। जोडावया अन्नधन न वचावें कदा॥ ९३॥ चौपालवी बांधोनि करीं। भीक मागावी दारोदारीं। परी अन्नआच्छादनावरी। आयुष्य तिळभरी न वेंचावें॥ ९४॥ मेळवावया अन्नआच्छादन। न शिणती साधक सज्ञान। देह अदृष्टाधीन। तें सहजें जाण प्रतिपाळी॥ ९५॥ स्वयें शिणतां अहोराती। अदृष्टावेगळी अणुभरी प्राप्ती। कदा न चढे कोणाचे हातीं। हें साधक जाणती सज्ञान॥ ९६॥ यालागीं अदृष्टें जें प्राप्त। तेणें निर्वाहें सदा निश्चिंत। साधक परमार्थ साधित। संतोषयुक्त गुरुवाक्यें॥ ९७॥ देहअदृष्टपरवडी। होती सुख-दु:खघडामोडी। साधकां संतोषु चढोवढी। गुरुवाक्य गोडी दृढ लागली॥ ९८॥ जैसें देहाचें प्राक्तन। तैसें होय अशन-वसन। परी गुरुवाक्यसुख सांडून। देहावरी मन ममत्वें न ये॥ ९९॥ याञ्चेवीण यथाकाळें। यदृच्छया जें जें मिळे। तें तें सेवी सकळ मंगळें। गुरुवाक्यमेळें स्वानंदें॥ ५००॥ शरीरनिर्वाहाविखीं। कोठें कांहीं नाभिलाखी। जें जें मिळे तेणेंचि सुखी। निजात्मतोखीं संतुष्ट॥ १॥ प्रारब्धें सुख-दु:ख भोगितां। संतोष साधकांच्या चित्ता। हें गुरुवाक्यें विश्वासतां। चढे हाता शिष्याच्या॥ २॥ त्याच्या दृढ विश्वासासीं। भागवतशास्त्र गुरूपाशीं। अभ्यासावें आदरेंसीं। दृढ-निश्चयेंसीं प्रबोधक॥ ३॥
श्रद्धां भागवते शास्त्रेऽनिन्दामन्यत्र चापि हि।
मनोवाक्कर्मदण्डं च सत्यं शमदमावपि॥ २६॥
सगुण अथवा निर्गुण। जेथ भगवत्स्वरूपवर्णन। कां भगवंत बोलिला आपण। अथवा भगवद्गुणकीर्ति जेथें॥ ४॥ तें तें राया शास्त्र जाण। आवडे जैसें जीवुप्राण। विशेषेंसीं ज्ञान-कथन। सप्रेम पूर्ण पढियंतें॥ ५॥ गुरुमुखें ज्ञानकथा गोड। तेणें श्रीभागवतीं श्रद्धा दृढ। श्रवणें पुरे जीवाचें कोड। वोसरे चाड विषयांची॥ ६॥ जीवीं नाहीं विषयकौतुक। तरी विषय आवश्यक। साधकां होती बाधक। तेणें आत्यंतिक अनुतापु॥ ७॥ अनिवार विषयावस्था। त्यागिली न वचे निजसत्ता। तेणें मुमुक्षूच्या चित्ता। अत्यंत व्यथा अनुतापें॥ ८॥ नसतां विषयांची अतिप्रीति। स्वतां नव्हे विषयनिवृत्ति। ऐशिया साधकांप्रती। निर्णीत शास्त्रार्थीं नेमिला नेमु॥ ९॥ नाहीं विषयांची आसक्ति। ना नव्हे विषयनिवृत्ति। ऐशी जे कां साधकस्थिति। नेमू त्याप्रती शास्त्रें केला॥ ५१०॥ जो कां केवळ विषयासक्त। तो कदा न मानी शास्त्रार्थ। कां जो झाला जीवन्मुक्त। तोही शास्त्रार्थ मानूनि न मानी॥ ११॥ जैसी मृगजळाची भासे स्थिति। तैसे विषय मुक्तांप्रती। त्या विषयांचिये निवृत्ती। कोणते शास्त्रार्थीं मानावा नेमु॥ १२॥ एवं अत्यासक्त अतिविरक्त। त्यांसी नेमु न चले येथ। मुमुक्षूंसीच शास्त्रार्थ। नेमी निश्चित निजनेमे॥ १३॥ तेथ गुरुशिष्यसंवाद। करितां ज्ञानार्थबोध। ते बोधीं बाधी विषयबाध। तत्त्यागीं प्रसिद्ध शास्त्रार्थनेमु॥ १४॥ मनसा-वाचा-कर्मावरोधु। येणें विषयांचा त्रिविध बाधु। त्या तिहींसही त्रिविधु। शास्त्रें अतिशुद्धु नेमिला नेमु॥ १५॥
(पूर्वश्लोकोत्तरार्धम्)—‘मनोवाक्कर्मदण्डं च सत्यं शमदमावपि’।
मनासी नेमु उपशमाचा। इंद्रियां नेमु तो दमाचा। सत्यें नेमिली वाचा। तिहींसही तिहींचा निजनेमु॥ १६॥ विषयकाम गज दारुण। अहंमदें उन्मत्त पूर्ण। देहतारुण्यें अतिघूर्ण। तोडी बंधन विधीचें॥ १७॥ रवंदी सुहृद राजा गुरु। सोंडां कवळी स्वर्गशिखरु। नरकनदीमाजीं अपारु। अतिदुस्तरु बुडॺा देत॥ १८॥ धर्मजळें क्षाळे अवचिता। सवेंचि सलोभ धुळी घाली माथां। घोळसी ब्रह्मादिकां समस्तां। अहंममता गर्जतु॥ १९॥ त्यासी विवेकमहावत जाण। माथां चढों जाणे आपण। शास्त्रविधि-अंकुशें पूर्ण। धरिला आवरून करकरितु॥ ५२०॥ त्यासी उपशमाचें संरक्षण। वैराग्ययुक्त ठेवूनि जाण। दमाचे शृंखळीं आकळून। सत्याचे स्तंभीं पूर्ण विवेकु बांधे॥ २१॥ मनसा—वाचा—कायिक कर्म। येणें विषयबाधा बाधी परम। त्या तिहींसी केला त्रिविध नेम। त्या नेमाचें वर्म ऐक राया॥ २२॥ आतां शमाची ऐशी स्थिती। मनबुद्धॺादि चित्तवृत्ती। सांडवूनि विषयासक्ती। लावी परमार्थीं प्रबोधूनि॥ २३॥ पूर्वे उगवतां गभस्ती। आंधारु सांडी त्रिजगती। तेवीं गुरुवाक्यें शमाची प्राप्ती। विषयनिवृत्ति मानसिक॥ २४॥ बाह्य इंद्रियप्रवृत्ती। ‘दमें’ दमोनि गुरुवाक्यस्थिती। मग शमाची संगति। आणी निवृत्ती इंद्रियकर्मे॥ २५॥ कन्या प्रतिपाळूनि जैसी। दान देतां जांवयासी। त्यागी बापाचे कुळगोत्रासी। दमें इंद्रियें तैशीं विषयार्था॥ २६॥ झणीं वाचा जाईल विकळ। तिसी ‘सत्याचा’ महामोकळ। देऊनि केली निखळ। अतिअढळ सत्यधूत वाणी॥ २७॥ ‘‘सत्यवादिया ब्रह्मादि वंदिती। असत्या होय अधोगती’’। ऐसें व्याख्यान जे करिती। तेही वदती असत्य॥ २८॥ कां रामनामाच्या आवृत्तीं। वाचा धूतली स्मरणोक्तीं। ते असत्यामाजीं पुढती। कदा कल्पांतीं बुडेना॥ २९॥ मंथूनि काढिलें नवनीत। तें पुढती न बुडे ताकांत। तेवीं नामें वाचा निर्धूत। असत्य तेथ स्पर्शेना॥ ५३०॥ जेवीं लागलेनि रविकरें। घृतकणिका स्वयें विरे। तेवीं सत्याचेनि निजनिर्धारें। असत्य चमत्कारें समूळ उडे॥ ३१॥ चंदनाचिया चौफेरीं। काष्ठत्वा मुकती खैर बोरी। तेवीं नामाच्या निजगजरीं। वाचेमाझारीं निजसत्य प्रगटे॥ ३२॥ झालेनि अर्कप्रकाशें। खद्योत हारपती जैसे। तेवीं रामनामसौरसें। लोपे अनायासें असत्य॥ ३३॥ अंवसेसी प्रतिपदे कुहु। गेलिया बिंब सांडी राहु। तेव्हां प्रकाशाचा समूहु। प्रगटे बहु जगामाजीं॥ ३४॥ तेवीं असत्याचेनि आक्रमें। वाचा प्रकाशे सत्यसंभ्रमें। जेवीं राजाज्ञाअनुक्रमे। प्रजा स्वधर्में वर्तती॥ ३५॥ सत्यापरतें नाहीं तप। सत्यापरता नाहीं जप। सत्यें पाविजे सद्रूप। सत्यें निष्पाप साधक होती॥ ३६॥ एवं काया वाचा आणि मनें। शमदमादिसत्यलक्षणें। जो नेमिला त्रिविधविंदानें। त्याचे विषयाचें धरणें तत्काळ उठी॥ ३७॥ ऐसिया स्वार्थालागीं जीवीं। भगवच्छास्त्रीं आवडी करावी। परी आणिकां शास्त्रां न लावी। द्वेषभावीं निंदेचें बोट॥ ३८॥ एका स्तुती एका निंदा। करितां आदळे अंगींबाधा। यालागीं निंदानुवादा। साधक कदा नातळती॥ ३९॥ अर्धांगींची लक्ष्मी वंदावी। मा चरणींची गंगा काय निंदावी। निजजननी नमस्कारावी। काय येरां द्यावी पांपर॥ ५४०॥ तरी भज्य भजावें भजनीं। परी निंदा स्तुति सांडूनि दोनी। जो निजसत्यें होय मौनी। तैं ब्रह्मज्ञानीं अधिकारु॥ ४१॥ ऐशी न करितां व्युत्पत्ति। न सोशितां हे कष्टस्थिति। भावें करितां भगवद्भक्ति। फुकाची मुक्ति हरिभक्तां॥ ४२॥ ते भक्तीची निजस्थिति। राया सांगेन तुजप्रती। सुगमत्वें परमात्मप्राप्ति। हरिभक्त पावती तें ऐक॥ ४३॥
श्रवणं कीर्तनं ध्यानं हरेरद्भुतकर्मण:।
जन्मकर्मगुणानां च तदर्थेऽखिलचेष्टितम्॥ २७॥
मुख्य भक्तीचें कारण। हरीचे जन्म-कर्म-गुण। पूर्ण श्रद्धा करावे श्रवण। हरिकीर्तन स्वानंदें॥ ४४॥ हरिकीर्तनाचिया जोडी। सकळ साधनें केलीं बापुडीं। अद्भुत कर्में हरीचीं गाढीं। गातां अतिआवडी उल्हासे॥ ४५॥ शिळा तारिल्या सागरीं। गोवर्धन धरिला करीं। निद्रा न मोडितां सकळ नगरी। द्वारकेमाझारीं आणिली मथुरा॥ ४६॥ निमाला गुरुपुत्र दे आणूनि। मुखें प्राशिला दावाग्नि। गत गर्भ आला घेऊनि। निजजननीतोषार्थ॥ ४७॥ अजन्म्या जन्में नेणों किती। अकर्म्याचीं कर्में गाती। अगुणाचे गुण वर्णिती। तेणें श्रीपति सुखावे॥ ४८॥ जो सुखैकमूर्ति निजस्वभावें। तोही जन्म-कर्म-गुणवैभवें। गातां कीर्तनीं अतिसुखावे। स्वानंदगौरवें डुल्लतु॥ ४९॥ ऐशी कीर्तनीं गातां कीर्ति। निर्मळ होय चित्तवृत्ति। तेथें ठसावे ध्यानस्थिति। ऐक ते नृपती सांगेन॥ ५५०॥ मुकुट कुंडलें मेखळा। कांसे कसिला सोनसळा। आपाद रुळे वनमाळा। घनसांवळा घवघवित॥ ५१॥ ऐशी मूर्ती सुरेख सगुण। कां निरसून रूप नाम गुण। ध्यानीं ठसावे निजनिर्गुण। ब्रह्म परिपूर्ण पूर्णत्वें॥ ५२॥ ऐसें ठसावतां ध्यान। भक्तांची सबाह्य क्रिया पूर्ण। ते ते होय कृष्णार्पण। स्त्रीपुत्रादि जाण सर्वस्वें॥ ५३॥
इष्टं दत्तं तपो जप्तं वृत्तं यच्चात्मन: प्रियम्।
दारान्सुतान्गृहान्प्राणान्यत्परस्मै निवेदनम्॥ २८॥
अग्निहोत्रादि ‘याग’ होम। ग्रहणादि ‘दान’ अनुत्तम। ‘तप’ म्हणिजे स्वधर्म। जो वर्णाश्रम यथोचित॥ ५४॥ आगमोक्त यथाशास्त्र। आवरणविधि-विधानतंत्र। गुरुदीक्षा शुद्ध मंत्र। अथवा नाममात्र जो ‘जपु’ कीजे॥ ५५॥ तें यज्ञ दान क्रिया तप। दीक्षामंत्र कां नामजप। तेथें न घालितां संकल्प। करी निर्विकल्प कृष्णार्पण॥ ५६॥ हरीशीं जाहले जे अनन्य शरण। ते हरीचे लडिवाळ पूर्ण। त्यांचें हरि करी प्रतिपाळण। जेवीं जननी जाण तानुलेया॥ ५७॥ यालागीं जें जें जीविकावर्तन। तेंही करावें कृष्णार्पण। ‘हें माझें’ म्हणोनि अभिमान। भक्त सज्ञान न धरिती कदा॥ ५८॥ ज्याची आवडी अतिशयें चित्तीं। ज्याची आपणिया अतिप्रीति। तें तें कृष्णार्पण करिती। गुरुवाक्यस्थिती विश्वासें॥ ५९॥ यालागीं आठही प्रहर। सेवेसी वेंचिती निजशरीर। निमिषार्धही व्यापार। विषयाकार करिती ना॥ ५६०॥ अन्नालागीं होऊनि वेडें। सधनांच्या पायां न पडे। आयुष्याचे तीन कवडे। विषयाचे चाडे कदा न करी॥ ६१॥ आयुष्याची अर्ध घडी। वेंचितां न मिळे लक्ष कोडी। तेणें आयुष्यें परमार्थ जोडी। विषयांच्या कोडी थुंकोनि सांडी॥ ६२॥ त्यागोनियां राज्यसंपत्ती। राजे जाऊनि वनाप्रती। स्वयें परमार्थ साधिती। विषयासक्ति थुंकोनि॥ ६३॥ कैशी भक्तीची गोडी संपूर्ण। रिता जावों नेदी अर्ध क्षण। अवघें जीवितचि जाण। करी कृष्णार्पण सर्वस्वें॥ ६४॥ आणि पुत्रदारादिक जें जें घरीं। तें तें भगवत्सेवेवारीं। स्वयें कृष्णार्पण करी। माझी म्हणोनि न धरी ममता जीवीं॥ ६५॥ दारा पुत्र देह गेह प्राण। यांसी आत्मा सबाह्य पूर्ण। तेथें संकल्पेंवीण जाण। ब्रह्मार्पण सहजचि॥ ६६॥
एवं कृष्णात्मनाथेषु मनुष्येषु च सौहृदम्।
परिचर्यां चोभयत्र महत्सु नृषु साधुषु॥ २९॥
एवं दारा गेह देह संपदा। आत्मार्पणें शुद्ध श्रद्धा। भजले सर्वकाळीं सर्वदा। ते भक्त गोविंदा पढियंते॥ ६७॥ जो सर्व भूतीं हृदयस्थु। परमात्मा श्रीकृष्णनाथु। त्याचे ठायीं जो भक्तु। साधावया निजस्वार्थु सर्वस्वें भजे॥ ६८॥ त्या हृदयस्थाचे ठायीं। दृढ दृष्टी जंव बसली नाहीं। तंव सगुणमूर्ती हृदयीं। भजावी पाहीं सर्वात्मभावें॥ ६९॥ सगुणमूर्ती नातुडे ध्यानीं। तरी भजावें प्रतिमेच्या स्थानीं। तेथें ही चलाचल दोनी। भजाव्या गुरुवचनीं समसाम्यभावें॥ ५७०॥ ज्या उपासक पूजिती। त्या जाणाव्या ‘चला’ मूर्ति। ज्या पांडुरंगादि द्वारावती। त्या ‘स्थावरा’ मूर्ति पुराणोक्त॥ ७१॥ त्यामूर्तीहूनि श्रेष्ठ स्थान। पूर्ण पूज्यत्वें ब्राह्मण। तेथें करावें गा भजन। सर्वस्वें जाण सर्वदा॥ ७२॥ त्या ब्राह्मणामाजीं अतिश्रेष्ठ। श्रोत्रिय सदाचारनिष्ठ। त्यांतही वेदशास्त्रार्थीं प्रविष्ट। ते अतिवरिष्ठ पूज्यत्वें॥ ७३॥ त्यांहीमाजीं जे भागवत। भागवतधर्मीं नित्य निरत। जे निष्कर्मेंसीं भगवद्भक्त। ज्यांचा भावार्थ श्रीकृष्णीं॥ ७४॥ ज्यांसी आत्मा श्रीकृष्ण हृदयस्थ। ज्यांचा अनन्य स्वामी श्रीकृष्णनाथ। ऐसे जे भगवद्भक्त। ते पूज्य निश्चित निजभक्तां॥ ७५॥ अतिमहत्त्वें पूज्य गहन। ज्याचे सुर नर वेद बंदीजन। तो सद्गुरु श्रेष्ठ पूज्य स्थान। शिष्यासी जाण सर्वस्वें॥ ७६॥ गुरु ब्रह्म दोनी समान। हेंही वचन दिसे गौण। गुरुवाक्यें ब्रह्मा ब्रह्मपण। तेथें व्हावया समान भिन्नत्व नुरे॥ ७७॥ जैसा देवाचे ठायीं भावो। तैसाचि गुरुचरणीं सद्भावो। गुरुदेवांमाजीं पहा हो। भिन्नत्वभावो असेना॥ ७८॥ देवो पूजिल्या गुरु तोषे। गुरु पूजिल्या देवो संतोषे। दों नांवांचेनि हरुषें। स्वरूपें एकें वर्तती॥ ७९॥ सुवर्ण आणि कांकण। दों नांवीं एक सुवर्ण। तेवीं गुरु-ब्रह्मांमाजीं जाण। भिन्नपण असेना॥ ५८०॥ त्या सद्गुरूचें निजभजन। चित्तवित्तें अवंचन। गुरुचरणीं आत्मार्पण। करावें आपण सर्वस्वेंसीं॥ ८१॥ तैसेचि साधु श्रोते सज्ञान। तेही मानावे सद्गुरूसमान। त्यांचेनि संवादें आपण। श्रवण कथन करावें॥ ८२॥
परस्परानुकथनं पावनं भगवद्यश:।
मिथो रतिर्मिथस्तुष्टिर्निवृत्तिर्मिथ आत्मन:॥ ३०॥
तेथ करितां कथानुवादु। परस्परें निजात्मबोधु। करितां गुह्यज्ञानसंवादु। परमानंदु वोसंडे॥ ८३॥ एवं हरिकथेच्या आवडीं। परस्परें श्रद्धा गाढी। सुखसंवादपरवडी। निजसुखगोडी चाखिती॥ ८४॥ चाखतां निजसुखगोडी। हारपती दु:खकोडी। उभवूनि भक्तिसाम्राज्यगुढी। स्वानंदजोडी जोडावी॥ ८५॥ भावें करितां अभेदभजन। भक्त पावती स्वानंद पूर्ण। त्या स्वानंदाचें निजचिन्ह। ऐक सांगेननृपनाथा॥ ८६॥
स्मरन्त: स्मारयन्तश्च मिथोऽघौघहरं हरिम्।
भक्त्या सञ्जातया भक्त्या बिभ्रत्युत्पुलकां तनुम्॥ ३१॥
क्वचिद्रुदन्त्यच्युतचिन्तया क्वचि-
द्धहसन्ति नन्दन्ति वदन्त्यलौकिका:।
नृत्यन्ति गायन्त्यनुशीलयन्त्यजं
भवन्ति तूष्णीं परमेत्य निर्वृता:॥ ३२॥
हरिकथेची महिमा कैसी। आदरें पुसत्या-सांगत्यासी। होती पुण्याचिया राशी। पाप वोखदासी मिळेना॥ ८७॥ ज्याचिया नामस्मरणकरीं। सकळ पातकातें हरि हरी। तो स्वयें प्रगटला अंतरीं। पातकां उरी उरे कैंची॥ ८८॥ साधनरूपभक्तीच्या युक्तीं। पूर्ण सप्रेम उपजे भक्ती। ते भक्तीची निजस्थिती। ऐक चक्रवर्ती सज्ञाना॥ ८९॥ सद्भावें निजभजनकरीं। हृदयीं प्रगटतां श्रीहरी। तंव देहींचीं चिन्हें बाहेरी। क्षणामाझारीं पालटती॥ ५९०॥ परस्परें निजसंवादु। करितां जाहला स्वरूपावबोधु। नेत्रीं जळ अंगीं स्वेदु। प्राणस्पंदु पांगुळे॥ ९१॥ चित्तचैतन्यां होतां भेटी। हर्षे बाष्प दाटे कंठीं। पुलकांकित रोमांच उठी। उन्मीलित दृष्टी पुंजाळे॥ ९२॥ करितां अच्युतचिंतन। सप्रेम गहिंवरे मन। अट्टाहासें करी रुदन। अनिवार स्फुंदन ऊर्ध्वश्वासें॥ ९३॥ त्या रुदनासवेंचि हर्ष प्रगटे। त्या हर्षाचेनि नेटेंपाटें। हांसों लागे कडकडाटें। सुखोद्भटें गदगदौनी॥ ९४॥ मीपणाचेनि अनुरोधें। गिळिलों होतों मोहमदें। तो सुटलों गुरुकृपावबोधें। तेणें परमानंदें डुल्लत॥ ९५॥ मी-माझेनि भवभानें। मज मी चुकलों मीपणें। मज मी भेटलों सद्गुरुवचनें। आनंदें तेणें उल्हासें॥ ९६॥ कैसें सद्गुरुवचन अलोलिक। म्यांचि माझें भोगिजे निजसुख। येणें आश्चर्यें देख। स्वानंदोन्मुख उल्हासे॥ ९७॥ संसारबागुलाचें। भय लागलें नेणों कैंचें। तें गुरुवाक्यें दवडिलें साचें। म्हणोनि नाचे निर्लज्ज॥ ९८॥ जेवीं माउली देखोनि डोळां। बालक नाचे नानाकळा। तेवीं गुरुवाक्याचा सोहळा। देखोनि स्वलीळा निजभक्त नाचे॥ ९९॥ तेणें निजनृत्यविनोदें। फावलेनि निजबोधें। नानापरीचीं भगवत्पदें। सुखानुवादें स्वयें गातु॥ ६००॥ तेणें कीर्तनकीर्तिगजरें। त्रैलोक्य सुखें सुभरे। परमानंदुही हुंबरे। सुखोद्गारें तुष्टोनी॥ १॥ तेंही सांडोनियां गाणें। गर्जो लागे अतिसत्राणें। दुजें नाहीं नाहीं म्हणे। गाणें ऐकणें म्यां माझें॥ २॥ मीचि गाता मीचि श्रोता। माझें गाणें मीचि तत्त्वतां। जगीं मीचि एकुलता। द्वैताची कथा असोनि नाहीं॥ ३॥ सद्भावें भगवत्परिचर्या। करितां पारुषे कर्मक्रिया। अहं-सोऽहं निरसोनियां। वृत्तिही लया जाय तेथें॥ ४॥ एवं सप्रेम भक्तिसंभ्रमु। तेणें निरसे साधनश्रमु। फिटे नि:शेष भवभ्रमु। वाचेसी उपरमु इंद्रियां होय॥ ५॥ जेथें एक ना दुसरें। सन्मुख ना पाठिमोरें। जेथ सुखही निजसुखामाजीं विरे। तें स्वरूप निर्धारें निजशिष्य होती॥ ६॥ जेवीं बाळाचे लळे पाळणें। हे व्यालीचि वेदना जाणे। कां शिष्यांसी पूर्ण बोध करणें। तेथील कळवळणें सद्गुरु जाणे॥ ७॥ बाळका लेवविल्या लेणें। जेवीं माउली निवों जाणे। कां शिष्यसुखें सुखावणें। हें सद्गुरु जाणे परिपूर्णबोधें॥ ८॥ इंद्रियें नेणती ज्याचें घर। जें मना वचना अगोचर। बुद्धीसि न कळे ज्याची मेर। ऐसी निर्विकार निजवस्तु॥ ९॥ दृष्टीं दाविजे साक्षात। हातीं देइजे पदार्थ। तैसा नव्हे गा परमार्थ। तोही सद्गुरुनाथ प्रबोधी शिष्यां॥ ६१०॥ शिष्यासी करावया प्रबोध। बोधिता सद्गुरु अगाध। यालागीं शिष्यसुखें स्वानंद। भोगी परमानंद गुरुरावो॥ ११॥ शिष्यासी आकळे परब्रह्म। तंव तंव निरसे त्याचा भ्रम। तेणें सद्गुरूसी परम। सुखसंभ्रम उल्हासे॥ १२॥ सेवकु परचक्र विभांडी। तंव राजा उभारी यशाची गुढी। शिष्य परमानंदीं दे बुडी। तेणें गुरूसी गाढी सुखावस्था॥ १३॥ ऐसी शिष्यकृपेची कळवळ। ज्या सद्गुरूमाजीं प्रबळ। तेथें भागवतधर्म हे सकळ। शिकावे अविकळ अनन्यश्रद्धा॥ १४॥
इति भागवतान् धर्मान् शिक्षन् भक्त्या तदुत्थया।
नारायणपरो मायामञ्जस्तरति दुस्तराम्॥ ३३॥
ऐशी हे भागवतधर्मस्थिति। शरण जाऊनि सद्गुरूप्रति॥ अभ्यासावी भगवद्भक्ति। तैं मायेची शक्ति बाधूं न शके॥ १५॥ माया वेदशास्त्रां अनावर। ब्रह्मादिकां अतिदुस्तर। ते सुखें तरती भगवत्पर। हरिनाममात्र-स्मरणार्थें॥ १६॥ हरिनामाच्या गजरापुढें। माया पळे लवडसवडें। यालागीं तरणोपावो घडे। सुख सुरवाडे हरिभक्तां॥ १७॥ परात्पर नारायणाची माया। भजतां नारायणाच्या पायां। सुखेंचि तरिजे गा राया। त्या भजनउपाया सांगितलें॥ १८॥ मायातरणोपायस्थिति। राया तुवां पुशिली होती। तदर्थीं मुख्य भगवद्भक्ति। जाण निश्चितीं नृपनाथा॥ १९॥ भक्तीपाशीं नित्य तृप्ति। भक्तीपाशीं नित्यमुक्ति। भक्तीपाशीं भगवत्प्राप्ति। मायानिवृत्ति हरिभजनें॥ ६२०॥ हरिनामभजनकल्लोळें। माया जीवित्व घेऊन पळे। भक्त तरती बाळेभोळे। हरिभजनबळें महामाया॥ २१॥ करितां नारायणाची भक्ती। निजभक्त सुखें माया तरती। ते नारायणाची मुख्य स्थिती। स्वयें चक्रवर्ती पुसतु॥ २२॥
राजोवाच
नारायणाभिधानस्य ब्रह्मण: परमात्मन:।
निष्ठामर्हथ नो वक्तुं यूयं हि ब्रह्मवित्तमा:॥ ३४॥
सर्वां भूतीं भगवद्भावो। हा मुख्य मायातरणोपावो। आइकोनि सुखावला रावो। तेणें आनंदें पहा हो परब्रह्म पुसे॥ २३॥ करितां नारायणाची भक्ति। उत्तम भक्त माया तरती। ते नारायणाची निजस्थिति। साक्षेपें नृपति पुसतु॥ २४॥ ‘ब्रह्म-परमात्मा-नारायण’। वस्तूसीच म्हणणें जाण। ते वस्तुनिष्ठा परिपूर्ण। राजा आपण पुसतु॥ २५॥ सकळांमाजीं अधिष्ठान। सबाह्य ज्याचेनि परिपूर्ण। त्या स्वरूपातें ‘नारायण’। स्वयें वेदज्ञ बोलती॥ २६॥ तुम्हांऐसे ज्ञाननिधि। भाग्यें जोडलेति त्रिशुद्धी। तुमच्या वचनामृतबोधीं। अहंबुद्धि उपजेना॥ २७॥ तुमचिया वचनोक्तीं। वोसंडली स्वानंदस्फूर्ति। लांचावली चित्तवृत्ति। श्रवणें तृप्ति कदा न मनीं॥ २८॥ ऐकोनियां रायाचा श्रेष्ठ प्रश्न। प्रबुद्धाधाकुटा पिप्पलायन। तो बोलावया आपण। स्वानंदें पूर्ण सरसावला॥ २९॥
पिप्पलायन उवाच
स्थित्युद्भवप्रलयहेतुरहेतुरस्य
यत्स्वप्नजागरसुषुप्तिषु सद्बहिश्च।
देहेन्द्रियासुहृदयानि चरन्ति येन
सञ्जीवितानि तदवेहि परं नरेन्द्र॥ ३५॥
अगा ज्याचेनि उपजे उत्पत्ति। ज्याचेनि अंगें स्थितीसी स्थिति। ज्याचेनि प्रळया प्रळयशक्ति। ऐसा जो त्रिजगतीं मुख्य हेतु॥ ६३०॥ यापरी जो जगाचा हेतु। स्वयें स्वसत्ता हेतुरहितु। सच्चिदानंदें सदोदितु। तो जाण निश्चितु नारायणु॥ ३१॥ जेवीं सांयप्रातर्मध्यान्ह। तिहीं काळीं अलिप्त गगन। तेवीं उत्पत्तिस्थितिप्रळयीं जाण। अलिप्त नारायण परमात्मा॥ ३२॥ उत्पत्तिस्थितिप्रळयान्त। म्हणसी कोण देखे येथ। तेचि अर्थींचा दृष्टांत। स्फुरदर्थ अवधारीं॥ ३३॥ जागृति स्वप्न आणि सुषुप्ति। तिन्ही व्यापूनि समाधीही परती। ज्याची साक्षित्वें स्फुरे स्फूर्ति। तो जाण निश्चितीं नारायण॥ ३४॥ जागृतीचें जाणपण। स्वप्नाचें मिथ्या भान। सुषुप्तीचा साक्षी पूर्ण। तो नारायण निश्चित॥ ३५॥ एवं परमात्मा परंज्योति। आत्मा हृदयस्थ त्रिजगतीं। त्यातें ‘नारायण’ म्हणती। जाण निश्चितीं नृपनाथा॥ ३६॥ ऐसी सांगतां ब्रह्मस्फूर्ति। अगम्य वाटेल ब्रह्मप्राप्ति। सहजें ब्रह्म आतुडे हातीं। ऐक ते उपपत्ति सांगेन॥ ३७॥ तरी परमात्मा ब्रह्म पूर्ण। तुझे हृदयीं नांदे आपण। ज्याचेनि मन बुद्धि प्राण। इंद्रियें जाण वर्तती॥ ३८॥ नयनें तेणें तेजें देखणें। रसना तेणें स्वादें चाखों जाणे। श्रवण तेणें अवधानें। शब्दज्ञानेंप्रबोधती॥ ३९॥ तेणें अहंकारा अहंभाव। तेणेंचि मनासी मंतव्य। तेणेंचि चित्तासी चेतव्य। बुद्धीसि बोद्धव्य तेणें ब्रह्मावबोधें॥ ६४०॥ तेणें जड देह सचेतन। तेणेंचि कळे मृदु कठिण। तेणेंचि चरणाच्या ठायीं गमन। करी कर ग्रहण त्याचिये सत्ता॥ ४१॥ त्याचेनि प्राण परिचरती। त्याचेनि निमिषोन्मेषस्फूर्ति। त्याच्या आनंदलेशस्थितीं। आनंद उपस्थीं भोगिती प्राणी॥ ४२॥ एवं चाळकु जो त्रिजगतीं। जो स्वानंदें नांदे हृदयस्थितीं। त्यातें ‘नारायण’ म्हणती। तोचि निश्चितीं परमात्मा॥ ४३॥ ज्याचेनि मन बुद्धि प्राण। इंद्रियें विचरतीं संपूर्ण। तो तूं म्हणसी त्यांआधीन। हें कल्पांतीं जाण कदा न घडे॥ ४४॥ तेथ जाणपणें जाणों जासी। तैं जाणावें तेंचि नेणसी। तेथ ज्ञातेपणें ज्ञानासी। स्वरूपापाशीं रिगू नाहीं॥ ४५॥ जाणीव आणि नेणीव। हे सोडूनि सर्व भाव। जैं उपजे ‘सद्भाव’। तैं ब्रह्म स्वयमेव पाविजे॥ ४६॥
नैतन्मनो विशति वागुत चक्षुरात्मा
प्राणेन्द्रियाणि च यथानलमर्चिष: स्वा:।
शब्दोऽपि बोधकनिषेधतयाऽऽत्ममूल-
मर्थोक्तमाह यदृते न निषेधसिद्धि:॥ ३६॥
वैकुंठ कैलास क्षीराब्धी। मन कल्पी कल्पनाविधी। परी आत्मा कल्पावया त्रिशुद्धी। मनबुद्धॺादी सरेना॥ ४७॥ स्वयें कल्पीं त्रिभुवन। तें स्वरूपीं रिघों न शके मन। बुद्धि निश्चयात्मक पूर्ण। तीसही जाण अगम्य वस्तु॥ ४८॥ जें मनबुद्धिअगोचर। तें वाचेसी अति दुस्तर। वस्तु नव्हे शब्दगोचर। परात्पर परब्रह्म॥ ४९॥ मोटे बांधतां आकाशातें। चारी पालव पडती रिते। तेवीं शब्दें बोलावें वस्तूतें। तंव शब्द शब्दार्थें निर्धर्म॥ ६५०॥ प्राणाचेनि निज ढाळें। जे कां क्रियाशक्ति चळे। ते क्रियेसी वस्तु नातळे। मा इंद्रियां आकळे कैसेनी॥ ५१॥ जेवीं थिल्लुराआंतौता। बिंबोनि वोला नव्हे सविता। तेवीं मनबुद्धिइंद्रियांपरता। जाण तत्त्वतां परमात्मा॥ ५२॥ जो मनाचें अनादि मन। जो बुद्धीची बुद्धि सज्ञान। जो नयनाचें आदि नयन। जो श्रवणाचें श्रवण सावधानत्वें॥ ५३॥ जो घ्राणाचें निजघ्राण। जो रसनेची रसना आपण। जो त्वचेची निजत्वचा पूर्ण। जीवाचा जो जाण जीवु स्वयें॥ ५४॥ जो इंद्रियांचा प्रकाशिता। जो कर्म करोनि अकर्ता। तो इंद्रियीं इंद्रियार्था। विषयी सर्वथा हों नेणे॥ ५५॥ जेथ बुद्धीची दृष्टि न वळंघे। तेथ मन मनपणें केवीं रिघे। मा श्रवणनयनघ्राणयोगें। विषयसंयोगें केवीं भेटे॥ ५६॥ जेथ प्राणशक्ति न चले पुढें। जेथ वाचा स्वयें लाजिली मुरडे। मा कर्मेंद्रियांसी कोणीकडे। पवाडु पुढें जोडेल॥ ५७॥ अग्नीपासूनि आह्या अनेग। क्षणक्षणां निघती चांग। परी आह्यांमाजीं अग्नीचें अंग। सर्वथा साङ्ग प्रगटेना॥ ५८॥ कां सूर्यापासून सूर्यकांत। प्रकाशती असंख्यात। परी सूर्यकांताआंत। कदा भास्वत प्रगटेना॥ ५९॥ जेवीं सिंधूपासूनि तरंग। प्रकाशति अति अनेग। परी तरंगीं सिंधूचें अंग। सर्वथा साङ्ग प्रगटेना॥ ६६०॥ तेवीं ब्रह्मापासोनि करणें। प्रकाशती अनेकपणें। तरी त्या इंद्रियां ब्रह्म जाणणें। हें जीवें प्राणें घडेना॥ ६१॥ जरी केळापासूनि केळी निपजे। कां साखरेपासूनि ऊंस उपजे। तरी इंद्रियीं ब्रह्म जाणिजे। हें न ये निजवोजें ब्रह्मादिकां॥ ६२॥ आशंका॥ इंद्रियीं नव्हे ब्रह्मज्ञान। तैं जीवाचें भवबंधन। कदा काळीं न तुटे जाण। जन्ममरण अनिवार॥ ६३॥ ‘शब्दादेवापरोक्षमति’। ऐशी श्रुतिशास्त्र-उपपत्ति। तेही मिथ्या वाटे वदंती। ऐसें तूं निश्चितीं मानिसी राया॥ ६४॥ तेही अर्थींचें निरूपण। ऐक राया सावधान। शब्द निमोनि आपण। दे ब्रह्मज्ञान जीवासी॥ ६५॥
(पूर्वील श्लोकार्ध)—‘शब्दोऽपि बोधकनिषेधतयाऽऽत्ममूलमर्थोक्तमाह यदृते न निषेधसिद्धि:’।
जीवु सोडवावया होडा। शब्दें सवेग उचलिला विडा। तेणें घेतां तत्त्वांचा झाडा। आपणही पुढां निमाला॥ ६६॥ श्रुति ‘नेति नेति’ येणें शब्दें। अतव्द्यावृत्तिनिषेधबोधें। परी साक्षात् वेदानुवादें। निज वस्तु शब्दें न बोलवे॥ ६७॥ शब्दासी जें वाच्य नोहे। तेंचि परब्रह्म जाणावें। तेथील जो खुणे पावे। तो ब्रह्म सद्भावें स्वयें होय॥ ६८॥ श्रुति ‘नेति नेति’ येणें वचनें। शब्द निषेधूनि वस्तु दावणें। शब्दीं नि:शब्द जो लक्षूं जाणे। तेणें पावणें परब्रह्म॥ ६९॥ शब्दु निजनिषेधें जें बोधी। तेथ समरसे ज्याची बुद्धि। तेंचि परब्रह्म गा त्रिशुद्धि। निषेधावधि तो ठावो॥ ६७०॥ शब्द निमोनि सर्वशक्तीं। जीवासी दे ब्रह्मप्राप्ति। ‘शब्दादेवापरोक्षेति’। जाण निश्चितीं या नांव॥ ७१॥ वाचा नि:शेष निवर्ते। मन बुद्धि न पवे जेथें। तेचि अवधि निषेधातें। ‘परब्रह्म’ त्यातें बोलिजे॥ ७२॥ जें वाचेचें वदवितें। परी वाचा वदों न शके ज्यातें। जें मनबुद्धॺादिकां जाणतें। परी मन बुद्धि ज्यातें नेणती॥ ७३॥ जें नयनातें दाखवितें। परी नयन न देखती ज्यातें। जें श्रवणघ्राणांतें चेतवितें। परी श्रवण घ्राण ज्यातें नेणती॥ ७४॥ एवं सर्वांचें जाणतें। परी सर्व सर्वथा नेणे ज्यातें। ज्यासी जाणावयालागीं येथें। आणिक जाणतें असेना॥ ७५॥ ऐसें स्वसंवेद्य निजज्ञातें। ज्यासी दुजें नाहीं जाणतें। शब्द रिघावया तेथें। रिगमु त्यातें असेना॥ ७६॥ जें कृश ना पुष्कळ। जें वक्र ना वर्तुळ। जें सूक्ष्म ना नव्हे स्थूळ। वस्तु केवळ निर्विकार॥ ७७॥ ज्यासी नाहीं रूपगुण। ज्यासी नाहीं आश्रमवर्ण। ज्यासी नाहीं मीतूंपण। ज्यासी जन्म-मरण असेना॥ ७८॥ जें हळुवट ना गहिंस। जें चिवळ ना सपोस। जें वसतें ना वोस। जें का नि:शेष निर्धर्म॥ ७९॥ जें ऱ्हस्व ना मोठें। जें वडील ना धाकुटें। जें विचारितां विवेकवाटे। विवेकुही आटे नि:शेष॥ ६८०॥ ज्यासी आदि ना अंतु। जें मध्यस्थितीरहितु। जें गुण ना गुणातीतु। अच्युतानंतु अद्वयत्वें॥ ८१॥ त्या स्वरूपाचा वचनपाठ। करावया वेदें केली खटपट। तेथ श्रुतीचाही बोभाट। लाजिला करूनि कष्ट नेतिनेतिवादें॥ ८२॥ वेदु काय नेणोनि परतला। जाणोनि न बोलिवेचि बोला। याचिलागीं तो मौनावला। तटस्थ ठेला नि:शब्दें॥ ८३॥ वेदें धरितां दृढ मौन। शास्त्रें भांबावलीं जाण। तिहीं धरोनि मताभिमान। करिती वल्गन अतिवादें॥ ८४॥ ‘शब्दांतीं ब्रह्मज्ञान’। हे वेदें पावोनि पूर्ण खूण। शब्दें शब्द निषेधून। दृढ मौन तेणें धरिलें॥ ८५॥ वेदरायें धरितां मौन। शास्त्रें भांबावलीं जाण। शोधितां शब्दांचें रान। निजसमाधान न पावती॥ ८६॥ ज्यासी शब्दांतीं ब्रह्मप्राप्ति। त्यासी दर्शनें ऐक्या येती। शास्त्रें स्वयेंचि समजतीं। ऐक्यें त्रिजगती आभासे॥ ८७॥ ब्रह्म एकाकी अद्वय स्थिति। तुवांचि दाविली उपपत्ति। तेथें ऐक्यरूपें त्रिजगती। म्हणसी कवणाप्रती आभासे॥ ८८॥ ज्याची तुटली वासनाफांसोटी। विराली अहंकाराची गांठी। प्रारब्ध उतरलें देहाचे तटीं। त्यासी ऐक्यें सृष्टी आभासे॥ ८९॥ त्याच्या अनुभवाची गोड गोष्टी। सांगावया उल्हास पोटीं। पिप्पलायनु स्वानंदतुष्टी। ब्रह्मैक्यें सृष्टी वाखाणी॥ ६९०॥
सत्त्वं रजस्तम इति त्रिवृदेकमादौ
सूत्रं महानहमिति प्रवदन्ति जीवम्।
ज्ञानक्रियार्थफलरूपतयोरुशक्ति
ब्रह्मैव भाति सदसच्च तयो: परं यत्॥ ३७॥
ब्रह्मनिजऐक्यपरिपाटी। प्रपंचु ब्रह्मत्वेंचि उठी। संतासंत सकळ सृष्टी। देखती दृष्टीं ब्रह्मरूप॥ ९१॥ जेवीं नभीं नीळिमेचें भान। तेवीं ब्रह्मीं माया नांदे संपूर्ण। नवल तियेचें विंदान। नपुंसका जाण पुरुषत्व केलें॥ ९२॥ अगाध तिचा पतिव्रताधर्म। नपुंसकीं उपजवी काम। अनाम्या ठेवी नाम। कीं निष्कर्मा कर्म तिचेनी॥ ९३॥ ते नि:संगसंगा रातली। स्पर्शेंवीण गुर्विणी झाली। प्रधान-महत्तत्त्वें गर्भा आली। तेथ त्रिगुणातें व्याली विकारयुक्त॥ ९४॥ विद्याअविद्या निजस्वभावीं। जीवशिवांची भेदपदवी। प्रिया पुरुषातें भोगवी। ज्ञाना-ज्ञानगांवीं वसोनियां॥ ९५॥ जेवीं सुवर्णीं अलंकार। तंतूमाजीं पटाकार। भिंतीवरी भासे चित्र। तेवीं माया साकार ब्रह्मीं भासे॥ ९६॥ मृत्तिकेची गोकुळें केलीं। नाना नामाकारीं जरी पूजिलीं। तरी मृत्तिकाचि संचलीं। तेवीं ब्रह्मीं भासली जगद्रूपें माया॥ ९७॥ जैशा घृताच्या कणिका। घृतेंसीं नव्हतीं आणिका। तेवीं ब्रह्मीं मायाशक्ति देखा। दावी अनेका अर्थांतें॥ ९८॥ ब्रह्म पूर्वीं एकाकी एक। तेंचि केवीं झालें अनेक। तो मायायोगपरिपाक। विशद अर्थ देख पिप्पलायनु सांगे॥ ९९॥ मुळीं मुख्य ब्रह्म ‘ओंकार’। तें एकचि झालें त्रिप्रकार। आकार-उकार-मकार। सत्त्वादि विकार गुणत्रयात्मक॥ ७००॥ गुणत्रय समसमान। त्या नांव बोलिजे ‘प्रधान’। तेंचि क्रियाशक्तिसूत्र जाण। तेथें प्रगटल्या ज्ञान ‘महत्तत्त्व’ म्हणती॥ १॥ ‘अहंब्रह्म’ हे पूर्णस्फूर्ति। तें ‘अहं’ आलें देहाकृती। देहाभिमानें निश्चितीं। ‘जीव’ म्हणती वस्तूतें॥ २॥ ‘क्रिया’ म्हणिजे दशधा करणें। ‘ज्ञान’ शब्दें देवताधिष्ठानें। ‘अर्थ’ ऐसें विषयांसी म्हणणें। तेथ ‘फळ’ जाणणें सुखदु:ख॥ ३॥ गुण-भूतें-विषय-करणें। जीव भोक्ता सुखदु:खपणें। ज्ञान क्रिया कर्माचरणें। हें सर्वही जाणणें पूर्ण ब्रह्म॥ ४॥ साखरेचा फणस प्रबळ। तेथें कांटे त्वचा बीजगोळ। अवघी साखरचि केवळ। तेवीं ब्रह्मचि सकळ जगदाकारें॥ ५॥ जेवीं पाटाऊ पुतळीकृत। तेथ विषमावयवीं समान सूत। तेवीं जगदाकारें आकारवंत। दिसे अविकृत परब्रह्म॥ ६॥ ‘जग-विश्व-प्रपंचु’ नाम। परी ते निखळ परब्रह्म। हा उपनिषदार्थ उत्तम। वेदांती परम परमार्थु तो हा॥ ७॥ जगदाकारें ब्रह्म निश्चित। जग अवघें विकारवंत। तैं ब्रह्मासही विकार प्राप्त। म्हणती तो अर्थ न घडे राया॥ ८॥
नात्मा जजान न मरिष्यति नैधतेऽसौ
न क्षीयते सवनविद् व्यभिचारिणां हि।
सर्वत्र शश्वदनपाय्युपलब्धिमात्रं
प्राणो यथेन्द्रियबलेन विकल्पितं सत्॥ ३८॥
ब्रह्मासी नाहीं माता पिता। यालागीं न घडे जन्मकथा। आत्मा एकदेशी होता। तरी जन्मा येता जननीजठरा॥ ९॥ आत्म्यावेगळा कांहीं। तिळभरी ठावो रिता नाहीं। यापरी पूर्णत्वें पाहीं। ‘जन्म’ ते ठायीं स्पर्शेना॥ ७१०॥ जन्मापूर्वीं बाळाचें नास्तिक्य। जन्मापाठीं मानिती आस्तिक्य। या अस्तिनास्तीची भाख। आत्म्यासी देख असेना॥ ११॥ आतां आहे पूर्वीं नाहीं। ऐसें ‘आस्तिक्य’ आत्म्याचे ठायीं। कदाकाळीं न रिघे कांहीं। तो नित्य पाहीं निरंतर॥ १२॥ देहीं जन्मल्या बाळकासी। वाढी दिसे दिवसदिवसीं। तो बाळजन्म नाहीं आत्म्यासी। यालागीं ‘वृद्धि’ त्यासी घडेना॥ १३॥ ज्यासी वृद्धि नाहीं तत्त्वतां। त्यासी न ये ‘विपरिणमता’। बाल्य तारुण्य वृद्धावस्था। आत्म्यासी सर्वथा असेना॥ १४॥ जो मी बाळत्वें होतों धाकुटा। तोचि मी तारुण्यें जाहलों मोठा। तो मी वृद्ध जाहलों कटकटा। ऐसा त्रिकाळद्रष्टा परमात्मा॥ १५॥ द्रष्टा साक्षी जो अवस्थातीत। तो कदा नव्हे अवस्थाभूत। देहीं असोनि अवस्थारहित। जाण तो निश्चित परमात्मा॥ १६॥ निरवस्थ आत्मा अविकारी पूर्ण। त्यासी कदा न ये ‘क्षीणपण’। ज्यासी जन्मचि नाहीं जाण। त्यासी ‘मरण’ असेना॥ १७॥ जो अविकारी निरवस्थ पूर्ण। ज्यासी नाहीं जन्ममरण। ऐसा तूं आत्मा म्हणशील कोण। तरी जाण सर्वज्ञ ज्ञानस्वरूप॥ १८॥ म्हणसी ज्ञानही क्षणिक असे। घटज्ञानें पटज्ञान निरसे। तेथ इंद्रियार्थवृत्तिचि नासे। ज्ञान जैसें तैसें अविनाशी॥ १९॥ तेच अर्थींचा पूर्ण दृष्टांत। जेवीं प्राण देहातें वाढवीत। तों देहोचि होय अवस्थाभूत। प्राण निरवस्थ जैसा तैसा॥ ७२०॥ प्राणु देहातें चाळितां। त्यासी न बाधी देहावस्था। आत्मा प्राणातें चेतविता। त्यासी देहावस्था असेना॥ २१॥ येणेंचि प्राणदृष्टांतें साधूनि घ्यावें परब्रह्मातें। देहेंद्रियावेगळें आत्म्यातें। पुढील श्लोकार्थें प्रबोधी॥ २२॥
अण्डेषु पेशिषु तरुष्वविनिश्चितेषु
प्राणो हि जीवमुपधावति तत्र तत्र।
सन्ने यदिन्द्रियगणेऽहमि च प्रसुप्ते
कूटस्थ आशयमृते तदनुस्मृतिर्न:॥ ३९॥
अंडज स्वेदज जारज। चौथें जाण गा उद्भिज। त्यांचे ठायीं प्राणु सहज। आत्मयोगें सदा वर्ते॥ २३॥ प्राणयोगें आत्मा वर्ततां। त्यासी ‘जीव’ म्हणती तत्त्वतां। त्या प्राणासी न बाधिती देहावस्था। मा जीवाचे माथां त्या कैंच्या॥ २४॥ देहेंद्रियामाजीं वर्ततां। आत्मा अलिप्त देहावस्था। तो कैसा म्हणती आतां। ऐक त्याही दृष्टांता सांगेन॥ २५॥ आत्मा जागृतिदेहीं वर्ते। तैं सविकार मानिती त्यातें। तोचि सांडूनि देहेंद्रियांतें। स्वप्नीं वर्ते पूर्वानुध्यासें॥ २६॥ देहेंद्रियाविहीन। केवळ ‘लिंगदेह’ जाण। निजात्मा देखे स्वप्न। जागृत्यभिमानसंकल्पें॥ २७॥ तें उपरमल्या स्वप्न। देहाभिमान झालिया लीन। सर्वविकारविहीन। सुषुप्तिकाळीं पूर्ण परमात्मा उरे॥ २८॥ देहेंद्रियासीं अभिमान लीन। कोणीही स्फुरेना स्फुरण। तरी तें झालें सर्व शून्य। आत्मा चिद्घन नाहीं म्हणसी॥ २९॥ जरी सुषुप्तीसी आत्मा नाहीं। तरी सुखें निजेलों होतों पाहीं। हें उपजे ज्याच्या ठायीं। तो सर्वथा नव्हे कहीं शून्य॥ ७३०॥ जो मी जागृतीं जागता। तोचि मी स्वप्नातें देखता। तोचि मी सुषुप्तीं सुखभोक्ता। एवं तिहीं अवस्था साक्षी जो॥ ३१॥ जो अवस्थात्रयीं साक्षी पूर्ण। तो सर्वथा नव्हे शून्य। तोचि परमात्मा परिपूर्ण। शुद्ध चिद्घन तो राया॥ ३२॥ सुषुप्तीं ब्रह्मानुभवो आहे। तरी कां पुढतीं संसारु पाहे। तेथ अविद्येसीं अहं लीन राहे। यालागीं होये भवभ्रमु॥ ३३॥ ते अविद्या अहंकारेंसीं नाशे। तैं जगद्रूपें ब्रह्मचि भासे। जन्ममरणांचा ठावोचि पुसे। जीव समरसे परब्रह्मीं॥ ३४॥ तेथ हेतुमातु दृष्टांत। प्रमाण-प्रमेयविवर्जित। परमात्मा सदोदित। परब्रह्म निश्चित परमानंदें॥ ३५॥ तेथ सुखावरी सुख नांदे। आनंदु भोगिजे आनंदें। जग दुमदुमी परमानंदें। स्वानंद बोधें संपूर्ण॥ ३६॥ निरसोनियां निजमाया। ऐसा अनुभवो मुनिवर्या। कैं होईल म्हणसी राया। तैं भजावें यदुवर्या निष्कामभावें॥ ३७॥
यर्ह्यब्जनाभचरणैषणयोरुभक्त्या
चेतोमलानि विधमेद्गुणकर्मजानि।
तस्मिन् विशुद्ध उपलभ्यत आत्मतत्त्वं
साक्षाद्यथामलदृशो: सवितृप्रकाश:॥ ४०॥
निर्विकारस्वरूपप्राप्ति। अवश्य पावणें आहे चित्तीं। तैं करावी भगवद्भक्ति। उत्कटा प्रीति अविश्रम॥ ३८॥ त्यजूनि पुत्रवित्तेषणेचें काज। जिणौनि लौकिकाची लाज। पद्मनाभभजनें भोज। अतिनिर्लज्ज नाचावें॥ ३९॥ पुत्रवित्तलोकेषणा। त्यजूनि भजतां हरिचरणां। तंव तंव चित्ताचे चैत्यमळ जाणा। क्षणक्षणां नासती॥ ७४०॥ रजतमादि कर्मज मळ। चित्तीं बैसले जे सबळ। ते प्रक्षाळती सकळ। भक्तिप्रेमजळक्षाळणें॥ ४१॥ जंव जंव थोरावे सप्रेम भक्ति। तंव तंव पाया लागे विरक्ति। स्वयें विरमे विषयासक्ति। होय चित्तवृत्ति निर्मळ॥ ४२॥ निर्मळ जाहलिया चित्तवृत्ति। परमात्मया सर्व भूतीं। भजों लागे अनन्यप्रीतीं। हे ‘चौथी भक्ति’ उदार॥ ४३॥ हे भक्ति अतिशयें उदार। निर्दाळी भक्तांचा अहंकार। उद्धरी सुर नर स्त्रिया शूद्र। आनंदनिर्भर करी जीवु॥ ४४॥ हे भक्ति जैं लागे हातीं। तैं भवभयाची नि:शेष शांति। पायां लागती चारी मुक्ती। ऐशी उदार भक्ति हरीची॥ ४५॥ जेवीं डोळां असतां पडळ। सविता उगवे सर्व काळ। तो सन्मुख न देखे रविमंडळ। मा पदार्थ सकळ त्या कैंचे॥ ४६॥ तेंचि फिटलिया पडळ। दृष्टी होय अतिनिर्मळ। देखों लागे पदार्थ सकळ। रविमंडळसमन्वयें॥ ४७॥ तेवीं निजात्मा हृदयीं वसे। परी चित्तवृत्ति मळिण असे। तंव परब्रह्म न प्रकाशे। चित्त वासनादोषें दूषित॥ ४८॥ तेथ करितां भगवद्भक्ति। निर्मळ होय चित्तवृत्ति। तेव्हां निर्विकारस्वरूपप्राप्ति। भक्त पावती निजभजनें॥ ४९॥ पावावया परमप्राप्ति। जगीं दाटुगी भगवद्भक्ति। ते म्यां सांगितली तुजप्रती। यथानिगुतीं नृपनाथा॥ ७५०॥ जेवीं डोळ्ॺांचें पडळ फिटे। तेथ प्रकाशेंसीं सविता भेटे। तेवीं कल्पनालोपें प्रगटे। नेटेपाटें परब्रह्म॥ ५१॥ जेथ निर्विकल्प समान। निश्चयेंसीं जाहलें मन। त्यासी देहीं वर्ततांही जाण। भवबंधन स्पर्शेना॥ ५२॥ ऐसें गर्जोनिया जाण। हर्षें बोले पिप्पलायन। तंव राजा सुखावला संपूर्ण। जीवींची खूण बाणली॥ ५३॥ ऐकतां ब्रह्मनिरूपण। राजा लांचावला पूर्ण। पुढें वाढावया निरूपण। अन्वयें प्रश्न पुसतसे॥ ५४॥ जेणें तुटे कर्मबंधन। त्या कर्मयोगाचें लक्षण। समूळ ऐकावया जाण। राजा आपण सादरें पुसतु॥ ५५॥
राजोवाच
कर्मयोगं वदत न: पुरुषो येन संस्कृत:।
विधूयेहाशु कर्माणि नैष्कर्म्यं विन्दते परम्॥ ४१॥
राजा निजश्रद्धासंपन्न। अतिविनीत करी प्रश्न। जेणें तुटे कर्मबंधन। तो कर्मयोग संपूर्ण सांगा स्वामी॥ ५६॥ कोणें कर्में कर्म तुटे। नैष्कर्म्यसिद्धि स्वयें प्रगटे। पुरुषा पुरुषोत्तम भेटे। हें मज गोमटें वर्म सांगा॥ ५७॥
एवं प्रश्नमृषीन्पूर्वमपृच्छं पितुरन्तिके।
नाब्रुवन् ब्रह्मण: पुत्रास्तत्र कारणमुच्यताम्॥ ४२॥
पूर्वीं हाचि प्रश्नु सनकादिकां। पित्यासन्निध पुशिला देखा। ते उत्तर नेदितीचि कां। हेही आशंका फेडावी स्वामी॥ ५८॥ रायाचे प्रश्न अतिपवित्र। त्यांचें द्यावया प्रतिउत्तर। हरिखावला ‘आविर्होत्र’। तो कर्मवैचित्र्य निरूपी॥ ५९॥
आविर्होत्र उवाच
कर्माकर्मविकर्मेति वेदवादो न लौकिक:।
वेदस्य चेश्वरात्मत्वात्तत्र मुह्यन्ति सूरय:॥ ४३॥
कर्माकर्मविकर्म जाणा। सामान्य नव्हे नृपनंदना। करितां विभागविवंचना। नुगवे सज्ञानां स्मृतिकारांसी॥ ७६०॥ जे स्वयें प्रतिसृष्टिकारी। तेही भुलले कर्मविभागावरी। जे समुद्र घोंटिती चुळेकरीं। तेही कर्मसागरीं बुडाले॥ ६१॥ येचि कर्मविवंचनेसाठीं। ऋषिमहर्षींचिया कोटी। मताभिमानें झाले हिंपुटी। त्यांसीही शेवटीं नुगवेचि॥ ६२॥ कर्माकर्मविभाग जाणा। स्वयें नुगवेचि चतुरानना। इतरांची कोण गणना। कर्मविवंचना करावया॥ ६३॥ कर्म वेदमूळ जाण। वेदु स्वयें नारायण। वेदवादविवंचन। करितां मौन श्रुतिशास्त्रां॥ ६४॥ कर्म-अकर्म-विकर्म जाण। एकचि परी त्रिविध भिन्न। तेंही विभागविवंचन। सावधान अवधारीं॥ ६५॥ श्वेत मृदु मधुर। त्रिविधभेदें एक साखर। तेवीं एकचि त्रिप्रकार। कर्मठ नर मानिती कर्म॥ ६६॥ भिन्न करितां मधुरता। तीमाजीं ये मृदु-श्वेतता। श्वेतताचि भिन्न करितां। मृदु-मधुरता तीमाजीं॥ ६७॥ तेवीं भिन्न करितां ‘कर्म’। कर्मा सर्वांगीं ‘अकर्म’। कर्म अकर्मामाजीं ‘विकर्म’। मिरवे परम सौभाग्यें॥ ६८॥ मुख्य मूळीं जें कां निपजे। ‘कर्म’ ऐसें त्यातें म्हणिजे। विहिताविहितक्रिया जे जे। ‘विकर्म’ म्हणिजे तिये नांव॥ ६९॥ कर्म अकर्मयोगें चळे। ऐसें विकर्मीं ज्यासी विवळे। त्यास ‘निष्कर्मता’ आकळे। गुरुकृपाबळें तत्काळ॥ ७७०॥ कर्मावरी कर्म विशेष वाढे। ‘विकर्म’ त्यातें म्हणणें घडे। जेथें कर्म रिघों न शके पुढें। ‘अकर्म’ चोखडें या नांव॥ ७१॥ ऐशी कर्मविवंचना अटक। हा प्रश्न केला तैं तूं बाळक। त्याचिलागीं गा राया देख। सनकादिक न सांगतीचि॥ ७२॥ कर्माकर्मविवंचना। अधिकारेंवीण कोणा। सांगों नये नृपनंदना। कर्म सज्ञाना अतिदुर्बोध॥ ७३॥
परोक्षवादो वेदोऽयं बालानामनुशासनम्।
कर्ममोक्षाय कर्माणि विधत्ते ह्यगदं यथा॥ ४४॥
जेवीं रोगु जावया निश्चित। बापु बाळा भेषज देत। तेथें साखर घाली हातांत। तत्सेवनार्थ प्रलोभें॥ ७४॥ तेवीं वेदांचा परोक्षवाद। सत्य मानिती बुद्धिमंद। कर्में छेदवी कर्मबाध। हा वेदानुवाद मुख्यत्वें॥ ७५॥ वेदु बोले स्वर्गादि फळ। तो प्रवृत्तिलोभ केवळ। परी कर्में छेदी कर्ममूळ। हें मुख्यत्वें फळ वेदोक्तीं॥ ७६॥ लोहाची बेडी पडली पायीं। ते तोडावया घणु आणिला पाहीं। तो घणुचि विकून खादला जिहीं। त्यांचें बंधन कहीं तुटेना॥ ७७॥ तेवीं कर्में छेदावें कर्मबंधन। तें कर्म वेंचिती विषयीं पूर्ण। त्यांचें कदा न तुटे भवबंधन। जन्ममरण सरेना॥ ७८॥ आम्ही स्वर्गफळा विरक्त। म्हणोनि नाचरे जो वेदोक्त। त्याचें ज्ञान जालें विपरीत। अति अनर्थ पावे तो॥ ७९॥
नाचरेद्यस्तु वेदोक्तं स्वयमज्ञोऽजितेन्द्रिय:।
विकर्मणा ह्यधर्मेण मृत्योर्मृत्युमुपैति स:॥ ४५॥
आम्ही जितेंद्रिय म्हणवीत। म्हणोनि नाचरे जो वेदोक्त। त्यासी नातुडे गा परमार्थ। अतिअनर्थ अंगीं वाजे॥ ७८०॥ जरी शास्त्रज्ञ ज्ञाता झाला। आणि वेदोक्ता विमुख ठेला। तरी तो जाणपणेंचि नागवला। जाण बुडाला दु:खार्णवीं॥ ८१॥ नाचरे जो वेदोक्त कर्म। त्यक्तकर्में मानी निष्कर्म। त्यासी थोर पडला भ्रम। नाडला परम अभिमानें॥ ८२॥ जरी विषयो निग्रहिला। आणि वेदोक्ता जो दुरावला। तो निजघाता प्रवर्तला। स्वयें बुडाला नरकार्णवीं॥ ८३॥ वेद निजमूळ परमार्था। तें वेदोक्त नाचरतां। जें जें करणें नृपनाथा। तें तें तत्त्वतां अध:पाती॥ ८४॥ डोळे देखणे तत्त्वतां। ते काढोनि पाहों जातां। न देखे आपुली डोळसता। मा इतर पदार्था कोण देखे॥ ८५॥ तैसा नाचरोनि वेदार्थु। जो जो मानिला परमार्थु। तेणें आंवतूनियां अनर्थु। जाण निश्चितु आणिला घरा॥ ८६॥ तेणें आचार अनर्थपाटें। वाहावले जन्ममरणवाटे। तेथ नानायोनिगर्भसंकटें। सोसितां न सुटे कल्पांतीं॥ ८७॥ तेथें जन्मजन्मों जन्म न टके। मरमरों मरण न चुके। जैं वेदविहित चुके। तैं अतिदु:खें दु:खभोगु॥ ८८॥ ‘विकर्मणा ह्यधर्मेण’। हें मूळींचें पदनिरूपण। तेणें विकर्मामाजीं अधर्म पूर्ण। परी अकर्म तें जाण अधर्म नव्हे॥ ८९॥ ज्यासी लावितां न लागे कर्म। या नांव मुख्य निष्कर्म। निष्कर्मलक्षण हाचि धर्म। येणेंचि परम मुक्त साधु॥ ७९०॥ ज्यासी शुद्ध आकळे अकर्म। तो तत्काळ होय निष्कर्म। अकर्माचें कळल्या वर्म। मुक्तता परम पायां लागे॥ ९१॥
वेदोक्तमेव कुर्वाणो नि:सङ्गोऽर्पितमीश्वरे।
नैष्कर्म्यां लभते सिद्धिं रोचनार्था फलश्रुति:॥ ४६॥
दासी स्वामीची आज्ञाधारी। कां राजमुद्रा प्रजांवरी। तैसी वेदाज्ञा जो शिरीं धरी। स्वधर्माचारी निष्काम॥ ९२॥ मी एकु कर्मकर्ता। ऐशी उठों नेदी अहंता। तें कर्मचि स्वभावतां। अर्पीं श्रीअनंता ईश्वरातें॥ ९३॥ एवं ईश्वरीं जें अर्पे कर्म। तें कर्म होय निर्धर्म। याचि नांव परम। ‘नैष्कर्म्य’ निजसिद्धी॥ ९४॥ वेदें बोलिलें कर्मफळ। ज्याची वासना निष्काम निर्मळ। त्यासि वेदोक्त फळ प्रबळ। भोगावया केवळ स्वप्नीं न दिसे॥ ९५॥ ऐसें असतां कर्मफळ। वांछितां नाडिजे केवळ। जेवीं परिसु देऊनि सोज्ज्वळ। मागिजे पोफळ तांबूलासी॥ ९६॥ कर्मा निष्कामता नित्य फळ। तेथ फळाशा नाडले सकळ। चंदन सर्वांगीं सफळ। तेथ मागतां फळ नाडिजे स्वयें॥ ९७॥ हातीं आंतुडावया मासा। गळीं लाविजे अल्प आमिषा। तेवीं निष्काम करावया मानसा। वेदु फळाशा प्रलोभी॥ ९८॥ आमिष घालूनि मासे पाळी। कीं तद्योगें जळाबाहेर गाळी। तेवीं कर्म कर्मातें निर्दाळी। हें नेणिजे मुळीं फळकामीं॥ ९९॥ हो कां फळाचिये चाडे। स्वधर्मकर्मीं प्रवृत्ति घडे। तेणें नैष्कर्म्यसिद्धि आंतुडे। हें वेदाचें फुडें निजगुह्य॥ ८००॥ कर्म ब्रह्मत्वें सदा सफळ। फळ वांच्छी त्यातें निष्फळ। हें जाणोनि कर्मकुशळ। फळाशा समूळ छेदिती॥ १॥ ऐसें आचरतां वैदिक कर्म। तेणें कर्में पाविजे नैष्कर्म्य। याहोनियां अति सुगम। सांगेन वर्म तें ऐक॥ २॥
य आशु हृदयग्रन्थिं निर्जिहीर्षु: परात्मन:।
विधिनोपचरेद्देवं तन्त्रोक्तेन च केशवम्॥ ४७॥
जेणें वासनेचें जाळ तुटे। अहंकाराची गांठी सुटे। जीवीं परमात्मा स्वयें प्रगटे। तें तांत्रिक गोमटें ऐक राया॥ ३॥ जया तांत्रिक महापूजा। संतोष होय गरुडध्वजा। तें तांत्रिक विधान वोजा। महाराजा अवधारीं॥ ४॥ वैदिक मंत्र तांत्रिक तंत्र। हे मिश्रपूजा अतिपवित्र। शीघ्र निष्काम करी नर। तो पूजाप्रकार अतिउत्तम॥ ५॥ वैदिक अथवा तांत्रिक। गुरुमार्गें सिद्धिदायक। यालागीं गा आवश्यक। सद्गुरूसी देख शरण जावें॥ ६॥
लब्धानुग्रह आचार्यात्तेन संदर्शितागम:।
महापुरुषमभ्यर्चेन्मूर्त्याभिमतयाऽऽत्मन:॥ ४८॥
प्रवृत्तिनिवृत्तिकृत कार्या। अवश्य पाहिजे आचार्या। आपमतीं भजतां राया। अनेक अपायांमाजीं पडे॥ ७॥ भोयी पाय सिद्ध आहेती। भोयाळेंवीण वृथा भ्रमती। तेवीं गुरूवीण जे जे करिती। ते ते अहंमती दृढ भ्रमले॥ ८॥ गुरु ब्रह्म दोनी एक। ऐशिया भावना आवश्यक। सेवा करूनि भावपूर्वक। संतोषवूनि देख अनुग्रहो घ्यावा॥ ९॥ तेथ निजाधिकारप्राप्तें। जे मूर्ति आवडेल आपणियातें। तेचि मंत्रविद्या तेथें। श्रद्धासंभरितें अंगीकारावी॥ ८१०॥ तेव्हां गुरुमुखें मिश्र वोजा। पुरुषोत्तममहापूजा। शिकोनियां निजकाजा। भजावें अधोक्षजा शिक्षिता मतीं॥ ११॥ तेचि भजती हातवटी। आगमोक्त निजपुष्टी। राया सांगेन गोमटी। सावधानदृष्टीं अवधारीं॥ १२॥
शुचि: सम्मुखमासीन: प्राणसंयमनादिभि:।
पिण्डं विशोध्य संन्यासकृतरक्षोऽर्चयेद्धरिम्॥ ४९॥
विध्युक्त करितां संध्यास्नान। तेथचि आहे ब्रह्मज्ञान। आचमनीं होय हरिरूप आपण। हें नेणोनि अज्ञान आगमीं भरती॥ १३॥ केशवादि नामीं जाण। अंगप्रत्यंगीं न्यासितां पूर्ण। तेव्हां हरिरूप होय आपण। हें नेणोनि अज्ञान आगमीं भरती॥ १४॥ करूनि आगमोक्त संध्यास्नान। मूर्तीपासीं येऊन जाण। संमुख घालावें आसन। चैलाजिनकुशयुक्त॥ १५॥ रेचक-पूरक-कुंभकें जाण। प्राणायामें प्राणसंयमन। भूतशुद्धॺादिकीं जाण। शरीरशोधन करावें॥ १६॥ भूतविलय भूतशुद्धी। प्राणप्रतिष्ठा पिंडादिशुद्धी। मूळमंत्रें न्यास प्रबुद्धीं। गुरुदीक्षाविधी विध्युक्त कीजे॥ १७॥ हृदय कवच शिखा शिर। नेत्र अस्त्रादि फट्कार। एवंविधान अनुकार। आगमोक्तप्रकार करावे न्यास॥ १८॥ यापरी मूळमंत्रदीक्षा। करोनि दिग्बंधादि संरक्षा। मग मूर्तिपूजनपक्षा। नृपाध्यक्षा अवधारीं॥ १९॥
अर्चादौ हृदये चापि यथालब्धोपचारकै:।
द्रव्यक्षित्यात्मलिङ्गानि निष्पाद्य प्रोक्ष्य चासनम्॥ ५०॥
प्रयोगछंद संपूर्ण। पूर्वान्वया विपरीत जाण। द्रव्यशुद्धि क्षितिमार्जन। हें मागील निरूपण पुढां आलें॥ ८२०॥ द्रव्यशुद्धि मुख्यशोधन। भूमिशुद्धि संमार्जन। आत्मशुद्धि सावधान। काढिल्या अनुलेपन मूर्तिशुद्धी॥ २१॥ पूजासंभार सिद्ध करून। समस्त शंखतोयें प्रोक्षून। निजासनीं सावधान। एकाग्र जाण बैसावें॥ २२॥ ज्यासी ध्यानीं मूर्ति न ये संपूर्ण। तेणें प्रतिमामूर्ति अधिष्ठान। तेथेंचि करावें पूजन। लब्धोपचारें जाण आगमोक्त॥ २३॥ ज्यासी ध्याना मूर्ति ये अतिसंकटीं। तेणें बाह्योपचारआटाटी। सांडूनियां ध्यानदृष्टीं। करावी गोमटी मानसपूजा॥ २४॥ ज्याचे हृदयींचें न विकरे ध्यान। बाह्यमूर्तिपूजेसी सावधान। तेणें उभयतां पूजन। करावें संपूर्ण आगमोक्त॥ २५॥
पाद्यादीनुपकल्प्याथ सन्निधाप्य समाहित:।
हृदादिभि: कृतन्यासो मूलमन्त्रेण चार्चयेत्॥ ५१॥
सकळ पूजासंभार। निकट ठेवूनि उपचार। मग मूर्तीसी न्यासप्रकार। उक्तशास्त्र करावा॥ २६॥ जैसेचि न्यास आपणास। तैसेचि करावे मूर्तीस। हा आगमोक्त गुरुसौरस। मूळमंत्रें न्यास मूर्तीसी॥ २७॥ आगमोक्त करितां न्यास। अंगप्रत्यंगीं विन्यास। तेणें कर्ता होय हृषीकेश। हा अर्थसौरस दृढ करावा॥ २८॥ दृढ करोनि अनुसंधान। मूळमंत्रें मूर्तिपूजन। हृदयीं आणि प्रतिमेसी जाण। पूजाविधान दोंही ठायीं॥ २९॥
साङ्गोपाङ्गां सपार्षदां तां तां मूर्तिं स्वमन्त्रत:।
पाद्यार्घ्याचमनीयाद्यै: स्नानवासोविभूषणै:॥ ५२॥
करचरणादि अव्यंग। मूर्ति चिंतावी सुंदर साङ्ग। श्याम मनोहर श्रीरंग। उल्हास चांग निजध्यानीं॥ ८३०॥ मूर्ति चतुर्भुज वेल्हाळ। शंख चक्र गदा कमळ। सुनंदादि पार्षदमेळ। चिंतावे सकळ आयुधादिक॥ ३१॥ यथोक्त मधुपर्कविधान। अर्घ्यपाद्यादि आचमन। पुरुषसूक्तमंत्रें जाण। करावें स्नान निर्मळ जळें॥ ३२॥ मुकुट कुंडलें कटी मेखला। कांसे मिरवे सोनसळा। आपाद रुळे वनमाळा। कौस्तुभ तेजाळा कंठीं झळके॥ ३३॥ पाद पद्मांकित सुकुमार। ऊर्ध्वरेखा ध्वज वज्र। वांकी अंदुवांचा गजर। चरणीं तोडर गर्जतु॥ ३४॥
गन्धमाल्याक्षतस्रग्भिर्धूपदीपोपहारकै:।
साङ्गं संपूज्य विधिवत्स्तवै: स्तुत्वा नमेद्धरिम्॥ ५३॥
निढळीं शुद्ध श्यामकळा। टिळकु रेखिला पिंवळा। त्यावरी अक्षता सोज्ज्वळा। आरक्त तेजाळा कुंकुमाक्त॥ ३५॥ सुमनें गुंफिली वीरगुंठी। त्यांवरी मधुकरांची घरटी। तुळसीकमळमाळा कंठीं। चंदनाची उटी श्यामांगीं शोभे॥ ३६॥ धूप दीपं उपहार। तांबूल अर्पावा सकर्पूर। निरंजनें जयजयकार। मंत्रावसर अर्पावा॥ ३७॥ स्तुति करावी वेदोक्त मंत्रें। कां पुराणोक्त नाना स्तोत्रें। अथवा प्राकृत नामोच्चारें। नाना प्रकारें गद्यपद्यें॥ ३८॥ स्तवनें संतोष अधोक्षजा। ऐसें भावावें महाराजा। मग साष्टांगें अतिवोजा। गरुडध्वजा नमस्कारावें॥ ३९॥
आत्मानं तन्मयं ध्यायन् मूर्तिं सम्पूजयेद्धरे:।
शेषमाधाय शिरसि स्वधाम्न्युद्वास्य सत्कृतम्॥ ५४॥
द्वैतभावें भजनविधि। ते जाणावी स्थूल बुद्धि। भजनाची भजनसिद्धि। जाण त्रिशुद्धी तन्मय होणें॥ ८४०॥ मूर्तिध्यानें तन्मय स्थिति। ऐक्यत्वें राहे निश्चळ वृत्ति। याचि नांव मुख्य भक्ति। उठलिया पुढती नमावें हरी॥ ४१॥ ऐशी पूजा करूनि हरी। शेष प्रसादु धरोनि शिरीं। मग देवो आपणियाभीतरीं। हृदयमंदिरीं निजविजे॥ ४२॥ एवं पूजेचें उद्वासन। ध्यानमूर्ति हृदयीं शयन। प्रतिमा पर्यंकीं निजवून। विधिविधानसमाप्ति॥ ४३॥ जाहलिया पूजाविसर्जन। विसर्जूं नये अनुसंधान। अखंड हरीचें स्मरण। सर्वस्वें आपण सर्वदा कीजे॥ ४४॥ या नांव गा आगमविधि। राया जाण त्रिशुद्धि। सदा पाळिती सद्बुद्धि। परमात्मसिद्धिप्रापक॥ ४५॥ आगमोक्त विधिलक्षण। प्रतिमाचि मुख्य नव्हे जाण। ज्यासी जेथ श्रद्धा पूर्ण। तेथ हें विधान सुखें कीजे॥ ४६॥
एवमग्न्यर्कतोयादावतिथौ हृदये च य:।
यजतीश्वरमात्मानमचिरान्मुच्यते हि स:॥ ५५॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायामेकादशस्कन्धे तृतीयोऽध्याय:॥ ३॥
हे पूजा नव्हे एकदेशी। बहुत स्थानें ये पूजेसी। त्यांत शीघ्रतर जें प्राप्तीसी। तें मी तुजपासीं सांगेन राया॥ ४७॥ येणेंचि विधानें यथाकाळीं। साङ्ग पूजा कीजे ‘जळीं’। अथवा ‘सूर्यमंडळीं’। पूजा सोज्ज्वळी हरिध्यानें कीजे॥ ४८॥ ‘अग्नीच्या’ ठायीं होय दीप्ति। पूजा कीजे कमळापति। अवघ्यापरीस शीघ्रप्राप्ति। पूजावा ‘अतिथि’ भगवद्भावें॥ ४९॥ आलिया वैश्वदेवाचे अंतीं। तो भलता हो भलते याती। त्यासी जे भगवद्भावें पूजिती। त्यांचे घरा पूर्ण प्राप्ति वोरसोनि ये॥ ८५०॥ पूर्वीं अनोळखु निश्चितीं। आलिया वैश्वदेवाचे अंतीं। त्यातें ब्रह्मभावें जे पूजिती। त्यांसी भुक्तिमुक्ती आंदणी॥ ५१॥ त्या वैश्वदेवाचे अंतीं जाण। निजभाग्यें आलिया शुद्ध ब्राह्मण। तया श्रद्धेनें पूजितां आपण। ते घरीं नारायण स्वानंदें वसे॥ ५२॥ राया वैश्वदेवाचे अंतीं। अतिथीसवें ये भुक्तिमुक्ति। विमुख जाहल्या त्या लाभा नाडती। पूजकां सुखप्राप्ति परमानंदें॥ ५३॥ अतिथीच्या ठायीं मूर्तिध्यान। सर्वथा करणें न लगे जाण। तो स्वरूपें स्वयें नारायण। पूजितां संपूर्ण सर्वार्थसिद्धि॥ ५४॥ एवं अतिथीसी जें अर्पे। तें भगवंतमुखीं समर्पे। यालागीं अतिसाक्षेपें। अतिथि ब्रह्मरूपें पूजिजे सदा॥ ५५॥ जें जें बोलिलें पूजास्थान। तेथें निजश्रद्धाचि प्रमाण। श्रद्धेवेगळें राया जाण। प्राप्ति संपूर्ण कदा न लभे॥ ५६॥ निजश्रद्धेचें ‘हृदय’ स्थान। ते हृदयीं विध्युक्त पूजन। करितां श्रद्धेनें आपण। प्राप्ति संपूर्ण उद्बोधे स्वयें॥ ५७॥ येऱ्हवीं तरी आपुल्या देहीं। चाळक ईश्वरु आहे हृदयीं। श्रद्धेनें भजतां त्याचे ठायीं। निजप्राप्ति पाहीं सहजें लाभे॥ ५८॥ जें जें आपण सेविजे। तें तें भागवन्मुखीं भाविजे। येणें निजभजनें पाविजे। जाण सहजें परमात्मा॥ ५९॥ सांडोनि देहींची अहंता। सकळ भोग ईश्वर भोक्ता। ऐसी दृढ भावना भावितां। पाविजे परमार्था अपरोक्षसिद्धी॥ ८६०॥ देह जड मूढ अचेतन। सकळभोगभोक्ता ईश्वर पूर्ण। तेथ वाढवूनि देहाभिमान। भोगिती अज्ञान अनेक दु:खें॥ ६१॥ ते सांडूनि देहअहंता। हृदयस्था शरण जातां। पाविजे पूर्ण परमार्था। जाण तत्त्वतां नृपवर्या॥ ६२॥ नि:शेष सांडिजे मीपण। याचि नांव हृदयस्था शरण। तूं सहजें परब्रह्म परिपूर्ण। मिथ्या देहाभिमान धंरू नको॥ ६३॥ राया येणेंचि कर्में जाण। तुटे कर्माचें कर्मबंधन। पाविजे पूर्ण समाधान। तें हें मुख्य लक्षण नृपनाथा॥ ६४॥ आगमोक्त निजभजन। कर्मयोगाचें मुख्य लक्षण। ऐकतां राजा समाधान। परमानंदें पूर्ण निवाला॥ ६५॥ जंव जंव रायाचें पुरे कोड। तंव तंव कथा लागे गोड। अतिशयें श्रवणाची चाड। विशेषें वाड थोरावली॥ ६६॥ राजा निवालेनि परमानंदें। सुखावलेनि निजबोधें। लांचावलेनि स्वानंदें। पुढां प्रश्न विनोदें पुसेल॥ ६७॥ उगें राहतां आपण। उठून जाती मुनिगण। यालागीं प्रश्नावरी प्रश्न। विचित्रविंदान पुसतु॥ ६८॥ स्वानंदें लोधली चित्तवृत्ती। इंद्रियें वेधलीं सुखस्थितीं। राजा निवाला निश्चितीं। तरी प्रश्नोक्ती पुसत॥ ६९॥ पुसेल हरीचे अवतार। ते कथा सुंदर मनोहर। निरूपण अतिअरुवार। निजजिव्हार निववील॥ ८७०॥ त्या प्रश्नाचें प्रत्युत्तर। कथाकौतुक सनागर। एका जनार्दनाचा किंकर। उपानहधर संतांचा॥ ७१॥ संत सज्जन कृपास्थिती। श्रीजनार्दन वरदमूर्ती। पुढील कथेची व्युत्पत्ती। सांगेन यथार्थी अर्थुनी॥ ७२॥ श्रीभागवताचे राशीवरी। एकाजनार्दन केला मापारी। तो निजबोधाचे कुडवावारीं। भरीलवखारी श्रवणाच्या॥ ८७३॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे एकादशस्कन्धे निमिजायंतसंवादे मायाकर्मब्रह्मनिरूपणं नाम तृतीयोऽध्याय:॥ ३॥ श्रीकृष्णार्पणमस्तु॥ मूळश्लोक॥ ५५॥ ओव्या॥ ८७३॥
॥ श्री ॐ तत्सत्-श्रीकृष्ण प्रसन्न॥
अध्याय चौथा
श्रीगणेशाय नम:॥ श्रीकृष्णाय नम:॥ ओं नमो श्रीगुरु शिवशिवा। नमनें जीवत्व जीवा। नुरविसी तेथें देहभावा। कैसेनि रिघावा होईल॥ १॥ जीवें घेऊनि जीवा। देहत्व मोडूनि देहभावा। याहीवरी करविसी सेवा। हें लाघव देवा नवल तुझें॥ २॥ जीव घेऊनि शंखासुरा। त्याच्या वागविसी कलेवरा। तो तूं रिघोनि मजभीतरा। माझिया शरीरा वागविसी॥ ३॥ शंख मधुर ध्वनी गाजे। तो वाजवित्याचेनि वाजे। तेवीं म्यां जें जें बोलिजे। तें तें बोलणें साजे तुझेनि॥ ४॥ आतां माझें ‘शरीर’ जें चळे। तें तुझेनि आंगिकें मेळें। ‘कर्में’ निपजतीं सकळें। सत्ताबळें तुझेनि॥ ५॥ माझे देहींचें जें ‘मीपण’। तें तूंचि झालासी आपण। तुझेनि प्राणें ‘प्राण’। माझाही जाण चळे देवा॥ ६॥ ‘दृष्टी’ जें जें काहीं देखे। तें तें तुझेनि ज्ञानउन्मेखें। ‘श्रवणीं’ जें जें कांहीं ऐकें। तें तें नेटकें अवधान तुझें॥ ७॥ ‘रसना’ जें जें कांहीं चाखे। तें तें तुझेनि स्वादमुखें। ‘बुद्धि’ जाणपणें तोखे। तेंही अतिनिकें वेदकत्व तुझें॥ ८॥ ‘मन’ मनपणें अतिचपळ। तेंही तुझेंचि आंगिक बळ। विवेका ‘विवेकु’ प्रबळ। अतिसोज्ज्वळ तुझेनि॥ ९॥ ‘वाचा’ जें जें कांहीं वदे। तें वाचिकत्व तुझेनि शब्दें। ‘बोधु’ जेणें उद्बोधे। तो तुझेनि प्रबोधें प्रबोधु॥ १०॥ ‘जागृती’ जागे तुझेनि हरिखें। ‘स्वप्न’ स्वप्ना तुझेनि देखे। ‘सुषुप्ती’ सुखावे जेणें सुखें। पूर्ण संतोखें तुझेनि॥ ११॥ मी जे जे ‘विषय’ भोगीं। तें भोक्तेपण तुझे अंगीं। तुझेनि निजसंयोगीं। मीपणें जगीं वर्तविशी मज॥ १२॥ माझें करूनि खांबसूत्र। तूं झालासी सूत्रधार। हालवूनियां निजसूत्र। कर्में विचित्र करविशी॥ १३॥ ऐशिया श्रीजनार्दना। जग चेतवित्या चिद्घना। कृपाळुवा जगज्जीवना। नमन श्रीचरणा तुझेनि तुज॥ १४॥ यापरी मजमाजीं तूं जाळिता। चाळकत्वें करविसी ग्रंथा। तेथें मी एक कवित्वकर्ता। हे जाणावी तत्त्वतां स्थूळबुद्धी॥ १५॥ एका एकु जनार्दनीं। कीं जनार्दनु एकपणीं। इये पृथक् नामांचीं लेणीं। लेऊनि एकपणीं मिरविसी तूं॥ १६॥ जेवीं कनकाचें भूषण। कीं भूषणीं कनकसंपूर्ण। तेवीं एका आणि जनार्दन। एकत्वें जाण जनार्दनचि॥ १७॥ ऐशी ऐकोन विनवणी। सद्गुरु तुष्टला संतोषोनी। येथें भिन्न भिन्न सोसणी। न लगे निरूपणीं करणें तुज॥ १८॥ जेव्हां कापुरा आगी झगटे। तेव्हांचि कापुरत्व खुंटे। सच्छिष्यासी सद्गुरु भेटे। तेव्हांचि फिटे भिन्नभेदु॥ १९॥ जेणें फिटे भिन्नभेदु। तो श्रीभागवतीं निजबोधु। वसुदेवाप्रती नारदु। सांगत संवादु इतिहासाचा॥ २०॥ ज्या इतिहासाचा अर्थ। परिसतां प्रगटे परमार्थ। स्वानंदबोध हृदयांत। श्रवणें सदोदित श्रोते होती॥ २१॥ तंव श्रोते संतसमुदावो। म्हणती कैसा नवलावो। सद्गुरुस्तवनीं ब्रह्मभावो। साधिला आवो अभेदत्वें॥ २२॥ हे सद्गुरूची विनवणी। कीं ब्रह्मसुखाची खाणी। परिसतां सप्रेम बोलणीं। रिझली आयणी सज्जनांची॥ २३॥ या देशभाषा वाणी। उघडिली परमार्थाची खाणी। बोल नव्हती हे स्पर्शमणी। लागतां श्रवणीं पालटे जीव॥ २४॥ यापरी श्रीभागवतीं। अनुपम अगाध स्थिति। ते कथेची संगति। लावी सुनिश्चितीं अर्थावबोधें॥ २५॥ ऐकोनि संतांचें वचन। शिरीं वंदोनि त्यांचे चरण। पुढील कथानिरूपण। श्रोतीं सावधान परिसावें॥ २६॥ येथें तृतीय अध्यायाचे अंतीं। निरूपितां तांत्रिक भक्ति। भजावें आवडेल ते मूर्ति। रायासी तदर्थीं प्रश्न स्फुरला॥ २७॥ देवो एकचि त्रिजगतीं। त्याच्या किती अवतारमूर्ति। जन्म कर्म अनेक व्यक्ती। हेंचि मुनीप्रति पुसतु॥ २८॥
राजोवाच
यानि यानीह कर्माणि यैर्यै: स्वच्छन्दजन्मभि:।
चक्रे करोति कर्ता वा हरिस्तानि ब्रुवन्तु न:॥ १॥
मुनीश्वरांचें अगाध ज्ञान। त्याहीवरी रसाळ निरूपण। तेणें रायाचें वेधलें मन। प्रश्नावरी प्रश्न यालागीं पुसे॥ २९॥ तो म्हणे देवाधिदेवो हरि। स्वलीला कैसीं जन्में धरी। स्वेच्छा जीं जीं कर्में करी। ते अगाध थोरी मज सांगा॥ ३०॥ म्हणती देवा नाहीं जन्म। तेथें कैंचें पुसशी कर्म। देवो अरूप अनाम। त्यासी जन्म कर्म असेना॥ ३१॥ तो ‘अजन्मा’ परी जन्म धरी। ‘अकर्मा’ परी कर्में करी। ‘विदेही’ तो देहधारी। होऊनि संसारीं स्वधर्म पाळी॥ ३२॥ त्याच्या अवतारांची स्थिति। कवण जन्म कवण व्यक्ति। किती अवतार किती मूर्ति। कृपेनें मजप्रती सांगा स्वामी॥ ३३॥ जे कां अतीत अनागत। वर्तमान जे प्रस्तुत। ते अवतार समस्त। इत्थंभूत सांगावे॥ ३४॥ हरिचरित्र अवतारगुण। प्रतिपादन करावयाचा प्रश्न। तो सांगावया जयंतीनंदन। स्वानंदें पूर्ण ‘द्रुमिल’ सांगे॥ ३५॥
द्रुमिल उवाच
यो वा अनन्तस्य गुणाननन्ता-
ननुक्रमिष्यन् स तु बालबुद्धि:।
रजांसि भूमेर्गणयेत् कथञ्चित्
कालेन नैवाखिलशक्तिधाम्न:॥ २॥
ज्याची लीलाशक्ति अपरिमित। ऐशा अनंत शक्ति ज्याच्या नखांत। यालागीं तो ‘अनंत’ म्हणत। त्याचे गुण समस्त गणवती कोणा॥ ३६॥ त्या अनंताची गुणसमृद्धी। गणूं म्हणे तो बालबुद्धि। जेवीं का आकाशाची वृद्धी। मुंगिये त्रिशुद्धी न करवी माप॥ ३७॥ सागरींचें जळ संपूर्ण। केवीं गणूं शके लवण। तेवीं अनंताचे अनंत गुण। आकळी कवण निजसत्ता॥ ३८॥ पर्जन्याचिया धारा। गणितां येतील नृपवरा। पृथ्वीचिया दूर्वांकुरां। सुखें महावीरा गणितां येती॥ ३९॥ वारा अफाट धांवे। तोही गणितातें पावे। निमेषोन्मेषांचे यावे। त्यांसीही संभवे गणित राया॥ ४०॥ पृथ्वीचिया परिमाणा। काळें काळें होय गणना। परी भगवंताचिया गुणां। वेदांसहि जाणा गणित नव्हे॥ ४१॥ भगवंताचें नाम एक। घेतां वेद झाले मूक। त्याचे गुण गणितां सकळिक। शेषाचें मुख दुखंड झालें॥ ४२॥ त्या अनंताचे अनंत गुण। येथ गणूं शके कवण। कांहीं एक संक्षेपें जाण। सांगेन लक्षण अवतारांचें॥ ४३॥
भूतैर्यदा पञ्चभिरात्मसृष्टै:
पुरं विराजं विरचय्य तस्मिन्।
स्वांशेन विष्ट: पुरुषाभिधान-
मवाप नारायण आदिदेव:॥ ३॥
अवतारांमाजीं प्रथमतां। ‘पुरुषावतारांची’ कथा। द्रुमिल झाला सांगता। ऐक तत्त्वतां महाराजा॥ ४४॥ नारायणें आत्मशक्तीं। पंचमहाभूतें भूताकृती। सृजूनियां यथानिगुतीं। ब्रह्मांडाची स्थिति निर्माण केली॥ ४५॥ ‘विराजपुर’ ब्रह्मांडा नाम। तेथ लीला प्रवेशे देवोत्तम। यालागीं ‘पुरुष’ हें नाम। पुरुषोत्तम स्वांशें पावे॥ ४६॥ त्याचेनि अंशयोगें प्रकृति। झाली प्रजांतें प्रसवती। यालागीं ‘पुरुष’ नामस्थिति। जाण निश्चितीं पावला॥ ४७॥ तो अकर्तात्मयोगयुक्तीं। जग चेतवी चिच्छक्तीं। ज्याचेनि जगा जगत्वें स्फूर्ति। त्याची गुणकीर्ति दों श्लोकीं सांगों॥ ४८॥
यत्काय एष भुवनत्रयसन्निवेशो
यस्येन्द्रियैस्तनुभृतामुभयेन्द्रियाणि।
ज्ञानं स्वत: श्वसनतो बलमोज ईहा
सत्त्वादिभि: स्थितिलयोद्भव आदिकर्ता॥ ४॥
त्रैलोक्य वसे जें कांहीं। तेंचि शरीर त्याचें पाहीं। ज्याचेनि योगें देही। ठायींच्या ठायीं वर्तती॥ ४९॥ ब्रह्मादिक जे तनुधारी। त्यांच्या ज्ञानकर्मेंद्रियांची थोरी। ज्याचेनि इंद्रियेंकरीं। निजव्यापारीं वर्तती॥ ५०॥ जो जगाचे नयनांचा नयन। जो जगाच्या घ्राणांचें घ्राण। जो जगाच्या श्रवणांचें श्रवण। रसनेची जाण रसना जो कां॥ ५१॥ जो जगाच्या हातांचे हात। ज्याचे पाय जगाच्या पायांत। जो वाचेची वाचा निश्चित। एवं उभय इंद्रियांआंत इंद्रियें ज्याचीं॥ ५२॥ जीवाच्या ठायीं जें कां ज्ञान। तेंही त्याचेनि ज्ञानें जाण। त्यासी ज्ञानदाता नाहीं आन। स्वयें ज्ञानघन स्वभावतांचि॥ ५३॥ ज्याचेनि प्राणें जाण। जगाचा चळे प्राण। बळ तेज क्रियाचरण। जगासी संपूर्ण ज्याचेनि॥ ५४॥ रजतमसत्त्वादिगुणयुक्त। उत्पत्तिस्थितिप्रळयान्त। मूळीं आदिकर्ता भगवंत। जाण तो निश्चित ‘पुरुषावतार’॥ ५५॥ सत्त्वादि त्रिगुणावस्था। उत्पत्तिस्थितिलयकर्ता। तेही गुणावतारकथा। ऐक नृपनाथा सांगेन॥ ५६॥
आदावभूच्छतधृती रजसास्य सर्गे
विष्णु: स्थितौ क्रतुपतिर्द्विजधर्मसेतु:।
रुद्रोऽप्ययाय तमसा पुरुष: स आद्य
इत्युद्भवस्थितिलया: सततं प्रजासु॥ ५॥
तोचि आदिकल्पीं उत्पत्ति। रजोगुणें राजसा शक्तीं। स्वयें झाला शतधृती। ‘ब्रह्मा’ म्हणती जयातें॥ ५७॥ एवं ब्रह्मरूपें उत्पत्ति। सृजिता झाला राजसा शक्तीं। तेथें प्रतिपाळावया स्वधर्मस्थिति। सत्त्वगुणें निश्चितीं ‘श्रीविष्णु’ जाहला॥ ५८॥ तो द्विजधर्मप्रतिपाळणु। यज्ञभोक्ता श्रीविष्णु। देखतां धर्माचा अवगुणु। अवतरे नारायणु नानावतारीं॥ ५९॥ तोचि ये सृष्टीचे प्रांतीं। तमोगुणें तामसा शक्तीं। स्वयें जाहला ‘रुद्रमूर्ति’। सकळ कल्पांतीं निर्दाळितु॥ ६०॥ जो शेताची पेरणी करी। तोचि राखे देखे सोकरी। तोचि वाळलियावरी। संवगणी करी सर्वांची॥ ६१॥ तेवीं उत्पत्तिकाळीं तोचि ब्रह्मा। स्थितिकाळीं तोचि विष्णुनामा। प्रळयकाळींही रुद्रप्रमा। ये पुरुषोत्तमा तेचि नामें॥ ६२॥ यालागीं तो आदिकर्ता। श्रुतिशास्त्रीं दृढ वार्ता। दक्षकश्यपादिकां कर्तव्यता। त्यांसी समर्थता याचेनि॥ ६३॥ यापरी विचारितां। हाचि एक सकळ कर्ता। यावांचून कर्तव्यता। अणुमात्रता नव्हे आना॥ ६४॥ जो सृष्टीपूर्वीं स्वयंभ असे। जेणें उत्पत्तिस्थितिप्रळयो भासे। तोचि आदिकर्ता अनायासें। तोचि निजांशें पुरुषावतारु॥ ६५॥ ऐक राया अतिविचित्र जें परिसतां पुण्य पवित्र। तो नारायणाचा अवतार। ज्याचें चरित्र अलोलिक॥ ६६॥
धर्मस्य दक्षदुहितर्यजनिष्ट मूर्त्यां
नारायणो नर ऋषिप्रवर: प्रशान्त:।
नैष्कर्म्यलक्षणमुवाच चचार कर्म
योऽद्यापिचास्त ऋषिवर्यनिषेविताङ्घ्रि:॥ ६॥
जो अजन्मा नित्य त्रिभुवनीं। जो न जन्मोनि जन्मला योनीं। तेणें धर्माची धर्मपत्नी। केली जननी दक्षकन्या ‘मूर्ती’॥ ६७॥ ते मूर्तिमातेच्या उदरीं। नर-नारायण अवतारी। एकचि दोंरूपेंकरीं। धर्माच्या घरीं अवतरले॥ ६८॥ तेणें नारदादिकांसी जाण। निरूपिलें नैष्कर्म्यलक्षण। स्वयें आचरला आपण। तें कथन ऐक राया॥ ६९॥ ‘नारायण’ म्हणसी कोणे देशीं। तो बदरिकाश्रमीं आश्रमवासी। नारद सनकादिक ऋषि। अद्यापि त्यापासीं सेवेसी असती॥ ७०॥ त्यासी स्वस्वरूपाचें लक्ष। सहजीं असे प्रत्यक्ष। ते स्वरूपनिष्ठेचा पक्ष। अलक्ष्याचें लक्ष्य प्रबोधी स्वयें॥ ७१॥ तया स्वरूपाचा निजबोध। स्वयें पावावया विशद। अद्यापवरी ऋषिवृंद। नित्य संवाद करिताति त्यासीं॥ ७२॥ जें स्वरूप लक्षेना जनीं। तें विशद करूनि दे वचनीं। तेंचि अनुग्रहेंकरूनी। अनुभवा आणी तत्काळ॥ ७३॥ ज्ञाते बहुसाल ऋषीश्वर। त्यांमाजीं नारायणअवतार। तेथ वर्तलें जें चरित्र। अतिविचित्र ऐक राया॥ ७४॥
इन्द्रो विशङ्कॺ मम धाम जिघृक्षतीति
कामं न्ययुङ्क्त सगणं स बदर्युपाख्यम्।
गत्वाप्सरोगणवसन्तसुमन्दवातै:
स्त्रीप्रेक्षणेषुभिरविध्यदतन्महिज्ञ:॥ ७॥
ऐसा नारायणाचा प्रताप। देखोनि निष्ठा दृढ तप। तेणें इंद्रासी आला कंप। म्हणे स्वर्ग निष्पाप घेईल माझा॥ ७५॥ त्याचें तप देखोनि परम। म्हणे गेलें गेलें स्वर्गधाम। इंद्रें कोपें प्रेरिला काम। अप्सरासंभ्रमसमवेत॥ ७६॥ कामसमवेत अप्सरा। सवें वसंतही दुसरा। क्रोधु अवघियां पुढारा। जो तापसांतें पुरा नागवी सदा॥ ७७॥ तीर्थोतीर्थींच्या अनुष्ठाना। क्षमा नुपजे अंत:करणा। कोपु येतांच जाणा। करी उगाणा तपाचा॥ ७८॥ क्रोधु तापसांचा उघड वैरी। तापसां नागवी नानापरी। तोही नारायणावरी। अवघ्यां अग्रीं चालिला॥ ७९॥ ऐशीं मिळोनि बिरुदायितें। आलीं बदरिकाश्रमा समस्तें। नारायणु तप करी जेथें। उठावलीं तेथें अतिआक्रमेंसीं॥ ८०॥ वसंतें शृंगारिलें वन। कोकिळा कलरवें गायन। सुगंध शीतळ झुळके पवन। पराग संपूर्ण वरुषती सुमनें॥ ८१॥ तेथ भ्रमरांचें झणत्कार। कामिनीगायन कामाकार। हावभाव कटाक्षविकार। कामसंचार चेतविती॥ ८२॥ नव्हेचि कामिनीकामबाधा। पराक्रमु न चलेचि क्रोधा। तोही सांडोनियां बिरुदा। परतला नुसधा म्लानवदनें॥ ८३॥ मग मदनें मांडूनियां ठाण। विंधी कामिनीकटाक्षबाण। तेणें घायें नारायण। अणुप्रमाण न डंडळेचि॥ ८४॥ शस्त्रें तोडितां आकाशासी। आकाश स्वयें सावकाशी। तेवीं कामें छळितां नारायणासी। तो निजसंतोषीं निर्द्वंद्व॥ ८५॥ आग्या निजतेजसत्ता। अग्नितेज प्राशूं जातां। तोंड जळे चवी चाखितां। तेवीं कामिनीकामता नारायणदृष्टीं॥ ८६॥ नेणतां नारायणमहिमे। धांवोनि घाला घातला कामें। तेव्हां अवघींच पराक्रमें। स्वनिंद्य धर्में लाजलीं॥ ८७॥ तेथ अवघीं झालीं पराङ्मुखें। पाठमोरीं निघालीं अधोमुखें। तेव्हां त्यांची गति नि:शेखें। नारायण देखे खुंटिली॥ ८८॥ इंद्रियनियंता नारायण। नेणोनि छळूं गेलीं आपण। त्यापुढोनि पुनरागमन। सर्वथा जाण करवेना॥ ८९॥ मागें न निघवे निश्चितें। ऐसें जाणोनि समस्तें। थोर गजबजिलीं तेथें। भयचकितें व्याकुळें॥ ९०॥ जाणोनि नारायणप्रताप। आतां कोपून देईल शाप। येणें धाकें म्लानरूप। अतिसकंप भयभीतें॥ ९१॥ ऐशी देखोनि त्यांची स्थिति। कृपेनें तुष्टला कृपामूर्ति। अणुमात्र कोपु नये चित्तीं। अभिनव शांति नारायणाची॥ ९२॥
विज्ञाय शक्रकृतमक्रममादिदेव:
प्राह प्रहस्य गतविस्मय एजमानान्।
मा भैष्ट भो मदन मारुत देववध्वो
गृह्णीत नो बलिमशून्यमिमं कुरुध्वम्॥ ८॥
इंद्रें केला अपराध। तरी नारायणासी न येचि क्रोध। बापु निजशांति अगाध। न मनी विरुद्ध कामादिकांचे॥ ९३॥ न येचि कामादिकांवरी कोप। इंद्रासही नेदीच शाप। नारायणाच्या ठायीं अल्प। कदा विकल्प नुपजेचि॥ ९४॥ अपकाऱ्यावरी जो कोपला। तो तत्काळ कोपें नागविला। अपकाऱ्या जेणें उपकार केला। तोचि दादुला परमार्थी॥ ९५॥ अपकाऱ्यां उपकार करिती। त्याचे नांव गा परम शांति। ते शांतीची निजस्थिति। दावी लोकांप्रती आचरोनि॥ ९६॥ परमार्थाची मुख्यत्वें स्थिति। पाहिजे गा परम शांति। ते शांतीची उत्कट गति। दावी लोकांप्रती आचरोनि॥ ९७॥ भयभीत कामादिक। अप्सरागण साशंक। त्यातें अभयदानें सुख। देऊनियां देख नारायण बोले॥ ९८॥ अहो कामवसंतादिक स्वामी। कृपा करूनि आलेति तुम्ही। तुमचेनि पदाभिगमीं। आश्रमभूमी पुनीत झाली॥ ९९॥ तुमचें झालिया आगमन। अवश्य करावें आम्हीं पूजन। हेंचि आमुचें अनुष्ठान। कांहीं बळिदान अंगीकारा माझें॥ १००॥ अवो अप्सरा देवकांता। तुम्ही भेवों नका सर्वथा। येथ आलिया समस्तां। पूज्य सर्वथा तुम्ही मज॥ १॥ आश्रमा आलिया अतिथि। जे कोणी पूजा न करिती। त्यांची शून्य पुण्यसंपत्ति। आश्रमस्थिति शून्य होये॥ २॥ तुम्हीं नांगीकारितां पूजन। कांहीं न घेतां बळिदान। गेल्या हा आश्रम होईल शून्य। यालागीं कृपा करून पूजा घ्यावी॥ ३॥ आश्रमा आलिया अतिथी। तो पूज्य सर्वांस सर्वार्थीं। अतिथि आश्रमीं जे पूजिती। ते आश्रमकीर्ति शिव वानी॥ ४॥ व्याही रुसलिया पायां पडती। तेवीं विमुख जातां अतिथि। जे वंदोनियां सुखी करिती। ते सुख पावती स्वानंदें॥ ५॥ व्याही रुसलिया कन्या न धाडी। अतिथि रुसलिया पुण्यकोडी। पूर्वापार जे कां जोडी। तेही रोकडी क्षयो पावे॥ ६॥ वैकुंठीं ज्याची निजस्थिति। तो त्या आश्रमा ये नित्य वस्ती। जे आश्रमीं अतिथि। पूजिती प्रीतीं ब्रह्मात्मभावें॥ ७॥ ऐसें बोलिला तयांप्रती। परी माझी हे अगाध शांति। हेही नारायणाचे चित्तीं। गर्वस्थिति असेना॥ ८॥ ऐक राया अतिअपूर्व। असोनि निजशांतिअनुभव। ज्याच्या ठायीं नाहीं गर्व। तोचि देवाधिदेव निश्चयेंसीं॥ ९॥ जो नित्य नाचवी सुरनरांसी। ज्या भेणें तप सांडिजे तापसीं। त्या अभय देवोनि कामक्रोधांसी। आपणापासीं राहविलीं॥ ११०॥
इत्थं ब्रुवत्यभयदे नरदेव देवा:
सव्रीडनम्रशिरस: सघृणं तमूचु:।
नैतद्विभो त्वयि परेऽविकृते विचित्रं
स्वारामधीरनिकरानतपादपद्मे॥ ९॥
एवं अभय देत नारायण। स्वमुखें बोलिला आपण। तेणें कामादि अप्सरागण। लाजा विरोन अधोमुख झालीं॥ ११॥ देखोनि निर्विकार पूर्ण क्षमा। श्रीनारायण हा परमात्मा। कळों सरलें वसंतादि कामा। त्याचाचि महिमा वर्णिती स्वयें॥ १२॥ ऐकें नरदेव चक्रवर्ती। विदेहा सार्वभौमा भूपती। त्या नारायणाची निजस्तुती। कामादि करिती सद्भावेंसीं॥ १३॥ जे सदा सर्वांतें छळिती। त्यांहीं देखिली पूर्ण शांति। तेचि शांतीची स्तुति करिती। नारायणाप्रती कामक्रोध॥ १४॥ जेणें संतोषे श्रीनारायण। त्यासी कृपा उपजे पूर्ण। ऐशिया परीचें स्तवन। मांडिलेंसेंपूर्ण परमार्थबुद्धीं॥ १५॥ जयजय देवाधिदेवा। तुझिया अविकारभावा। पाहतां न देखों जी सर्वां। देवांमानवांमाझारीं॥ १६॥ मज कामाचेनि घायें। ब्रह्मा कन्येसी धरूं जाये। पराशरा केलें काये। भोगिली पाहें दिवा दुर्गंधा॥ १७॥ ज्यातें योगी वंदिती मुगुटीं। जो तापसांमाजी धूर्जटी। तो शिवु लागे मोहिनीपाठीं। फिटोनि लंगोटी वीर्य द्रवलें॥ १८॥ विष्णु वृंदेच्या श्मशानीं। धरणें बैसे विषयग्लानीं। अहल्येची काहणी। वेदीं पुराणीं वर्णिजे॥ १९॥ नारदु नायके माझी गोष्टी। त्यासी जन्मले पुत्र साठी। माझी साहों शके काठी। ऐसा बळिया सृष्टीं असेना॥ १२०॥ जो ब्रह्मचाऱ्यांमाजीं राजा। हनुमंतु मिरवी पैजा। तयास्तव मकरध्वजा। संगेंवीण वोजा जन्मविला म्यां॥ २१॥ कलंकिया केला चंद्र। भगांकित केला इंद्र। कपाटीं घातला षण्मुख वीर। जो लाडका कुमर महेशाचा॥ २२॥ मज मन्मथाचा यावा। न साहवे देवां दानवां। मा तेथ इतरां मानवां। कोण केवा साहावयासी॥ २३॥ मज जाळिलें महेशें। त्यासी म्या अनंगें केलें पिसें। नवल धारिष्ट तुझ्या ऐसें। पाहतां न दिसे तिहीं लोकीं॥ २४॥ त्या मज कामा न सरतें केलें। शांतीचें कल्याण पाहालें। हें तुवांचि एकें यश नेलें। स्वभावा जिंकलें निजशांतियोगें॥ २५॥ तो मी न सरता केला काम। क्रोधा आणिला उपशम। वासनेचा संभ्रम। नित्य निर्भ्रम त्वां केला॥ २६॥ हे नारायणा तुझी निष्ठा। न ये आणिकां तपोनिष्ठां। केला अनुभवाचा चोहटा। शांतीचा मोठा सुकाळु केला॥ २७॥ मागें तपस्वी वाखाणिले। म्हणती कामक्रोधां जिंकिलें। त्यांसीही आम्हीं पूर्ण छळिलें। ऐक तें भलें सांगेन॥ २८॥ कपिलाऐसा तेजोराशी। क्रोधें तत्काळ छळिलें त्यासी। शापु देतांचि सगरासी। तोही क्रोधासी वश्य झाला॥ २९॥ कोपु आला नारदासी। वृक्ष केलें नलकूबरांसी। गौतमें अहल्येसी। कोपें वनवासी शिळा केली॥ १३०॥ जो सर्वदा विघ्नातें आकळी। त्या विघ्नेशातें क्रोध छळी। तेणें अतिकोपें कोपानळीं। चंद्रासी तत्काळीं दिधला शाप॥ ३१॥ कोपु आला दुर्वासासी। शाप दिधला अंबरीषासी। देवो आणिला गर्भवासासी। क्रोधें महाऋषी छळिले ऐसे॥ ३२॥ जे दुजी सृष्टी करूं शकती। तेही कामक्रोधें झडपिजेती। सागरीं पडे इंद्रसंपत्ती। हे क्रोधाची ख्याति पुराणप्रसिद्ध॥ ३३॥ इतरांची गोठी कायसी। क्रोधें छळिलें ईश्वरासी। तेणें दीक्षिता द्विजदक्षासी। शिरच्छेदासी करविता झाला॥ ३४॥ जेथ मी कामु स्वयें वसें। तेथ क्रोध वसे सावकाशें। काम क्रोध असतचि नसे। नारायणा ऐसें तुवां केलें॥ ३५॥ हें परमाद्भुत तुझें वीर्य। आणिकां एवढें नाहीं धैर्य। यालागीं तुझें परिचर्य। सदा मुनिवर्य सेविती चरण॥ ३६॥ शांतीच्या चाडें देवाधिदेवा। जे नित्य करिती तुझी सेवा। ते कामक्रोधादिस्वभावा। स्मरतां तव नांवा जिंकिती सुखें॥ ३७॥ जेथ सन्मानें काम पुरत। तेथ आदरें अनुग्रहो करित। काम सन्मानें जेथें अतृप्त। तेथें शाप देत अतिक्रोधें॥ ३८॥ यालागीं शापानुग्रहसमर्थ। ते सर्वदा कामक्रोधयुक्त। परी नवल तुझें सत्त्वोचित। केले अंकित कामक्रोध॥ ३९॥ मज गर्व नाहीं सर्वथा। हेही तुज नाहीं अहंता। छळवाद्यां द्यावी लघुता। अथवा उपेक्षता न करिसी॥ १४०॥ पृथ्वी दु:खी करिती नांगरीं। ते पिकोनि त्यांतें सुखी करी। तेवीं अपकाऱ्यां जो उपकारी। तो मोक्षाच्या शिरीं मुगुटु॥ ४१॥ तुजमाजीं निर्विकार शांति। हें नवल नव्हे कृपामूर्ति। तुझ्या स्वरूपाची स्थिति। आजि निश्चितीं कळली आम्हां॥ ४२॥ तूं निर्गुण निरुपम। मायातीत पूर्ण ब्रह्म। तुझें स्वभावें स्मरतां नाम। सकामाही काम स्पर्शों न शके॥ ४३॥ जो नित्य स्मरे तुझें नाम। त्यासी मी कामचि करीं निष्काम। क्रोधचि करी क्रोधा शम। मोहो तो परम प्रबोध होय॥ ४४॥ जे धीर वीर निजशांतीं। ज्यांसी परमानंदें नित्य तृप्ति। ऐशियांचिया अमित पंक्ति। पायां लागती तुझिया॥ ४५॥ तुज करावया नमस्कारु। पुढें सरसे महासिद्धांचा संभारु। त्यांसही न लभे अवसरु। तूं परात्परु परमात्मा॥ ४६॥ तुझिया सेवकांकडे। विघ्न रिघतां होय बापुडें। तें रिघावया तुजपुढें। कोण्या परिपाडें रिघेल॥ ४७॥
त्वां सेवतां सुरकृता बहवोऽन्तराया:
स्वौको विलङ्घ्य परमं व्रजतां पदं ते।
नान्यस्य बर्हिषि बलीन् ददत: स्वभागान्
धत्ते पदं त्वमविता यदि विघ्नमूर्ध्नि॥ १०॥
तापसां बहु विघ्नअपावो। आम्हीं करावा अंतरावो। हा आमुचा निजस्वभावो। नव्हे नवलावो नारायणा॥ ४८॥ हृदयींचा गुप्त करोनि काम। बाह्य जप-तप-भक्तिसंभ्रम। ऐसे जे का शठ परम। विघ्नांचा आक्रम त्यांवरी चाले॥ ४९॥ ते आमची विघ्नस्थिति। न चले तुझिया भक्तांप्रती। तूं रक्षिता भक्तपति। तेथें विघ्नांची गति पराङ्मुख सदा॥ १५०॥ माझिया निजभक्तांसी। विघ्नें कैंचीं म्हणसी त्यांसी। ऐक त्याही अभिप्रायासी। सांगेन तुजपासीं देवाधिदेवा॥ ५१॥ पावावया निजपदातें। लाता हाणून स्वर्गभोगातें। जे नित्य निष्काम भजती तूंतें। नाना विघ्नें त्यांतें सुरवर रचिती॥ ५२॥ उल्लंघूनियां आमुतें। हे पावती अच्युतपदातें। यालागीं सुरवर त्यातें। अतिविघ्नांतें प्रेरिती॥ ५३॥ बळी नेदूनि आम्हांसी। हे जाऊं पाहती पूर्णपदासी। येणें क्षोभें इंद्रादिक त्यांपासीं। नाना विघ्नांसी मोकलिती॥ ५४॥ या लागीं त्यांच्या भजनापासीं। विघ्नें छळूं धांवतीं आपैसीं। विघ्नीं अभिभव नव्हे त्यांसी। तू हृषीकेशी रक्षिता॥ ५५॥ सांडूनि सकाम कल्पना। जे रतले तुझ्या चरणा। त्यांस आठही प्रहर जाणा। तूं नारायणा रक्षिसी॥ ५६॥ भक्त विघ्नीं होती कासाविसी। धांव धांव म्हणती हृषीकेशी। तेव्हां तूं धांवण्या धांवसी। निष्ठुर नव्हसी नारायणा॥ ५७॥ विघ्न न येतां भक्तांपासीं। आधींच भक्तसंरक्षणासी। तूं भक्तांचे चौंपासीं। अहर्निशीं संरक्षिता॥ ५८॥ विघ्न छळूं धांवे सकोप। तंव विघ्नीं प्रगटे तुझें स्वरूप। यालागीं भक्तांसी अल्प। विघ्नप्रताप बाधूं न शके॥ ५९॥ कामें छळावें हरिभक्तांसी। तंव हरि कामाचा हृदयवासी। तेव्हां विघ्नचि निर्विघ्न त्यांसी। भय भक्तांसी स्वप्नीं नाहीं॥ १६०॥ विघ्न उपजवी विरोधु। तंव विरोधा सबाह्य गोविंदु। मग विरोध तोचि महाबोधु। स्वानंदकंदु निजभक्तां॥ ६१॥ ज्यासी तुझ्या चरणीं भावार्थु। त्यासी विघ्नीं प्रगटे परमार्थु। ऐसा भावबळें तूं समर्थु। साह्य सततु निजभक्तां॥ ६२॥ यापरी समर्थ तूं संरक्षिता। ते जिणोनि विघ्नां समस्तां। पाय देऊनि इंद्रपदमाथां। पावती परमार्था तुझिया कृपें॥ ६३॥ देवो संरक्षिता ज्यासी। विघ्नें छळूं धांवती त्यासी। मा सकामाची गती कायसी। विदेहा म्हणसी तें ऐक॥ ६४॥ विषयकाम धरोनि मनीं। इंद्रादि देवां बळिपूजनीं। जे भजले यागयजनीं। देव त्यांलागोनी न करिती विघ्न॥ ६५॥ इंद्र याज्ञिकांचा राजा। सकाम याज्ञिक देवांच्या प्रजा। यज्ञभाग अर्पिती वोजा। पावल्या बळिपूजा न करिती विघ्न॥ ६६॥ म्हणसी कामादिक विटंबिती। ते निष्काम कदा नातळती। सहज कामा वश असती। सदा कर्में करिती सकाम॥ ६७॥ जे मज कामासी वश होती। ते तप वेंचोनि भोग भोगिती। जे आतुडले क्रोधाच्या हातीं। ते वृथा नागवती तपासी॥ ६८॥
क्षुत्तृट्त्रिकालगुणमारुतजैह्वॺशैश्न्या-
नस्मानपारजलधीनतितीर्य केचित्।
क्रोधस्य यान्ति विफलस्य वशं पदे गो-
र्मज्जन्ति दुश्चरतपश्च वृथोत्सृजन्ति॥ ११॥
प्राणायामें प्राणापानीं। निजप्राणातें आकळोनी। वात वर्ष शीत उष्ण साहोनी। जे अनुष्ठानीं गुंतले॥ ६९॥ क्षुधे तृषेतें नेमूनी। जिव्हा शिश्न आकळोनी। मज कामातें जिंतिलें मानूनी। निष्कामाभिमानी उन्मत्त॥ १७०॥ अल्प अपमानाहातीं। जे क्रोधासी वश होती। ते शाप देऊनि तपसंपत्ती। व्यर्थ नागविती निजनिष्ठा॥ ७१॥ सकामाच्या अनुष्ठाना। मज कामसंगें स्रक्चंदना। भोग भोगिती स्वर्गांगना। अमृतपाना प्राशिती॥ ७२॥ त्या मज कामातें उपेक्षिती। आणि क्रोधासी वश होती। ते निजतपा नागवती। शापदीप्तिअनुवादें॥ ७३॥ जे अपार सागर तरती। ते गोष्पदोदकीं बुडती। तेवीं मज कामातें जिणोनि जाती। तेही नागविजेति जिनक्रोधें॥ ७४॥ मज कामाची अपूर्ण कामवृत्ति। तेचि क्रोधाची दृढ स्थिति। काम क्रोध अभक्तां बाधिती। हरिभक्तांप्रती तें न चले॥ ७५॥ तुझ्या भक्तांप्रती जाण। न चले कामक्रोधादि बंधन। तो तूं भक्तपति नारायण। तुज आमुचें कामपण केवीं बाधी॥ ७६॥ नेणतां तुझा महिमा। आम्ही करूं आलों निजधर्मा। तुजपासीं नित्य निजक्षमा। पुरुषोत्तमा कृपाळुवा॥ ७७॥
इति प्रगृणतां तेषां स्त्रियोऽत्यद्भुतदर्शना:।
दर्शयामास शुश्रूषां स्वर्चिता: कुर्वतीर्विभु:॥ १२॥
अपकाऱ्यां उपकार करिती। या नांव ‘निर्विकार निजशांति’। तेचि शांतीची परिपाकस्थिति। विघ्नकर्त्याप्रती हरि दावी॥ ७८॥ सांगोनियां आपुली स्थिती। कामादिक स्तुति करिती। तंव परमाश्चर्य देखती। स्त्रिया अत्यद्भुती अकस्मात॥ ७९॥ स्वरूप वैभव अळंकार। श्रियेहूनियां सुंदर। सेवेलागीं अतितत्पर। सदा सादर सावधानें॥ १८०॥ नवल लाघव नारायणा। कैसें यां दाखविलें विंदाना। तया स्त्रियांखालीं स्वर्गांगना। दिवा खद्योत जाण तैशा दिसती॥ ८१॥
ते देवानुचरा दृष्ट्वा स्त्रिय: श्रीरिव रूपिणी:।
गन्धेन मुमुहुस्तासां रूपौदार्यहतश्रिय:॥ १३॥
या स्त्रिया देखोनि दिठीं। कामु मूर्च्छित पडिला सृष्टीं। वसंत घटघटां लाळ घोंटी। क्रोधाची दृष्टी तटस्थ ठेली॥ ८२॥ भ्रमर विसरले झणत्कार। कोकिळा विसरल्या पंचम स्वर। प्राण विसरला संचार। देवानुचर भुलले॥ ८३॥ देखोनि त्यांचिया स्वरूपासी। अप्सरा दिसती जैशा दासी। अत्यंत लज्जा झाली त्यांसी। काळिमेसी उतरल्या॥ ८४॥ त्यांचे अंगींचा सुगंध वातु। तेणें भुलला वसंतु। मलयानिल झाला भ्रांतु। त्यांचा अंगवातु लागतां॥ ८५॥ नारायणाची विद्या कैसी। जे भुलवूं आले आपणासी। भुली पाडिली तयांसी। योगमायेसी दावूनि॥ ८६॥ सुंदरत्वें रंभा तिलोत्तमा। जिया मंदरमथनीं जिंतिलिया रमा। रमेहूनियां उत्तमा। उत्तमोत्तमा अतिरूपें॥ ८७॥
तानाह देवदेवेश: प्रणतान्प्रहसन्निव।
आसामेकतमां वृङ्ध्वं सवर्णां स्वर्गभूषणाम्॥ १४॥
तें अतिआश्चर्य देखोन। झाले कामादिक मूर्च्छापन्न। तयांप्रति नारायण। काय हांसोन बोलिला॥ ८८॥ आम्हीं अवश्य पूजावें तुम्हांसी। कांहीं अर्पावें बलिदानासी। संतोषावया इंद्रासी। यांतील एकादी दासी अंगीकारा तुम्हीं॥ ८९॥ यांचें सौंदर्य अतिथोर। म्हणाल होईल अपमानकर। तुम्हांसमान जे सुंदर। तिचा अंगीकार करावा तुम्हीं॥ १९०॥ म्हणाल यांत नाहीं हीन। अवघ्या सौंदर्यें संपूर्ण। कोणी न दिसे आम्हांसमान। केवीं आपण अंगीकारावी॥ ९१॥ जरी नाहीं तुम्हांसमान। सकळ सौंदर्यें अतिसंपन्न। तरी एकीचें करावें वरण। होईल भूषण स्वर्गासी॥ ९२॥ ऐसें नारायणाचें वचन। ऐकोनि हरिखलीं संपूर्ण। करूनियां साष्टांग नमन। मस्तकीं वचन वंदिलें॥ ९३॥
ओमित्यादेशमादाय नत्वा तं सुरवन्दिन:।
उर्वशीमप्सर: श्रेष्ठां पुरस्कृत्य दिवं ययु:॥ १५॥
इन्द्रायानम्य सदसि शृण्वतां त्रिदिवौकसाम्।
उचुर्नारायणबलं शक्रस्तत्रास विस्मित:॥ १६॥
ऐकोनि नारायणवचन। मस्तकांबुजी करूनियां नमन। उर्वशी पुढां सून। कामादि गण निघाले वेगीं॥ ९४॥ नारायणाचे ऊरूस्पर्शी। उभी होती नारायणापाशीं। तेंचि नांव झालें तिसी। म्हणती ‘उर्वशी’ स्वर्गांगना॥ ९५॥ ते देवांचे देवदूत। स्वर्गा पावले समस्त। मग शक्राचे सभेआंत। सांगती अद्भुत नारायणशक्ति॥ ९६॥ तिहीं नारायणाचें चरित्र। सांगितलें अतिपवित्र। तेणें अवघेचि सुरवर। झाले थोर विस्मित पैं॥ ९७॥ इंद्रें देखोनि उर्वशी। तिसी भुलला अहर्निशीं। बाहेर यावें सभेसी। हें वर्षानुवर्षीं नाठवे॥ ९८॥ हे प्रथमावतारवार्ता। जे कां नारायणाची कथा। पुढील अवतार आतां। नृपनाथा अवधारीं॥ ९९॥ ऐक राया अतिअपूर्व। छळवादियां पूजा सर्व। करून दाखवी स्वयमेव। ‘पूर्णानुभव’ या नांव॥ २००॥ (आशंका)॥ भावें करितां भगवद्भजन। यापरी इंद्र करी विघ्न। नारायण चैतन्यघन। तेणें विघ्नें संपूर्ण पराभविलीं॥ १॥ मा बाळ्ॺाभोळ्ॺां करितां भक्ति। ऐशीं विघ्नें जैं छळूं येती। तैं कदा नव्हे भगवत्प्राप्ति। ऐसा विकल्प चित्तीं झणीं धरिशी॥ २॥ ब्रह्मादिकां सर्व भूतां। भ्रुकुटिमात्रें जो नियंता। त्या भगवंतातें भजतां। विघ्नें सर्वथा बाधूं न शकती॥ ३॥ ज्याचेनि इंद्रा इंद्रपण। तो भावें भजतां श्रीनारायण। भक्तांसी विघ्न करी कोण। हरि रक्षण निजभक्तां॥ ४॥ इंद्रमुख कामादिक। विघ्नें छळिती सकळ लोक। त्यांचाहीं नारायण चाळक। तो भक्तांसी देख स्पर्शों नेदी॥ ५॥ विघ्नांसी भुलविलें जेणें संपूर्ण। तो नित्य स्मरतां नारायण। आपधाकें विघ्ने पळतीं जाण। भक्तसंरक्षण हरिनामें॥ ६॥ करावया निजभक्तकैवार। देवो धरी नानावतार। त्याच्या अवतारांचें चरित्र। अतिविचित्र अवधारीं॥ ७॥
हंसस्वरूप्यवददच्युत आत्मयोगं
दत्त: कुमार ऋषभो भगवान् पिता न:।
विष्णु: शिवाय जगतां कलयावतीर्ण-
स्तेनाहृता मधुभिदा श्रुतयो हयास्ये॥ १७॥
सनकादिक ब्रह्मनंदन। तिहीं पित्यासी केला प्रश्न। प्रश्नखंडणमिसेंजाण। केलें ब्रह्मज्ञान ‘हंसावतारें’॥ ८॥ नित्य स्मरतां हरीचें नाम। महाविघ्नें होतीं भस्म। त्याचे अवतारसंभ्रम। उत्तमोत्तम अवधारीं॥ ९॥ ज्याचेनि नामें पळे कृतांतु। ज्याचेनि नामें जन्ममरणां घातु। तो अवतारु ‘श्रीदत्तु’। मूर्तिमंतु परब्रह्म॥ २१०॥ नैष्ठिक ब्रह्मचारी निश्चितीं। ज्यासी स्वप्नीं नाहीं वीर्यच्युति। यालागीं ‘कुमार’ म्हणती। अवतारमूर्ति सनकादिक॥ ११॥ आणि आमुचा जो कां पिता। ‘ऋषभ’ नारायण ज्ञाता। तोही अवतार नृपनाथा। जाण तत्त्वतां भगवन्मूर्ति॥ १२॥ इहीं नामीं-रूपीं संपूर्ण। अवतारीं अवतरे नारायण। जो जगाचा प्रतिपाळण। स्वांशें श्रीकृष्ण अवतरे॥ १३॥ तोचि स्वयें गा श्रीकृष्ण। मधुकैटभ निर्दाळून। नामें जो कां ‘मधुसूदन’। तोचि अवतरून ‘हयग्रीव’ झाला॥ १४॥ तेणें शंख मर्दून पुढती। उद्धरिल्या बुडाल्या श्रुती। आणोनि दिधल्या ब्रह्मयाहातीं। जाण निश्चितीं वेदरक्षणा॥ १५॥
गुप्तोऽप्यये मनुरिलौषधयश्च मात्स्ये
क्रौडे हतो दितिज उद्धरताम्भस: क्ष्माम्।
कौर्मे धृतोऽद्रिरमृतोन्मथने स्वपृष्ठे
ग्राहात्प्रपन्नमिभराजममुञ्चदार्तम्॥ १८॥
तेणेंचि ‘मत्स्यावतारें’। प्रलयकालांबुमहाभारें। मनू सगट रक्षिलें धरे। निजनिर्धारे औषधींसीं॥ १६॥ तेणेंचि ‘कमठावतारा’। स्वपृष्ठीं धरूनि गिरिवरा। मंथोनियां क्षीरसागरा। अमृत सुरवरां अर्पिलें॥ १७॥ श्वेतवाराह महामूर्ति। धरेनें केली पूर्ण भक्ति। तिसी उद्धरोनि कृपामूर्ति। अभिनव शांति अर्पिली॥ १८॥ तेणे आर्तत्राणा तांतडी। वैकुंठींहून घालोनि उडी। ‘गजाचें ग्राहबंधन तोडी’। उद्धरिलें आवडीं गजेंद्रातें॥ १९॥
संस्तुन्वतोऽब्धिपतिताञ्छ्रमणानृषींश्च
शक्रं च वृत्रवधतस्तमसि प्रविष्टम्।
देवस्त्रियोऽसुरगृहे पिहिता अनाथा
जघ्नेऽसुरेन्द्रमभयाय सतां नृसिंहे॥ १९॥
मार्कंडेयो एके वेळीं। बुडतां अकाळप्रळयजळीं। तेणें स्मरतां वनमाळी। तारी तत्काळीं ‘वटपत्रशायी’॥ २२०॥ शाळिग्राम पूजितां ऋषीश्वरीं। नळ वानरु ते अवसरीं। देवपूजा टाकी सागरीं। चेष्टा वानरी स्वभावें॥ २१॥ तें देखोनि ऋषीश्वरीं। ‘शिळा न बुडोत तुझ्या करीं’। ऐसा शाप ते अवसरीं। क्षोभेंकरीं दिधला॥ २२॥ तैं शाळिग्राम सागरोदरीं। तरतां देखिले ऋषीश्वरीं। काढावया रिघतां भीतरीं। लहरीकरीं निर्बुजले॥ २३॥ ते काळीं ऋषीश्वरीं। ‘आर्तिहरण’ स्तविला हरि। तेथ अवतरोनि श्रीहरि। ऋषीतें तारी पूजेसहित॥ २४॥ वृत्र वधिला वज्रघातें। ते ब्रह्महत्या इंद्रातें। तेणें दोषें तो अंध तमातें। जाण पां निश्चितें बुडत होता॥ २५॥ तेथ अवतरोनि श्रीअनंतें। चतुर्धा वांटूनि ते हत्येतें। शुद्ध केलें इंद्रातें। कृपावंतें कृपाळुवें॥ २६॥ जिणोनियां अमरपुरें। हिरोनि देवांचीं अंतौरें। तीं कोंडोनियां समग्रें। मुरें महा असुरें एकंदर केलें॥ २७॥ तो मुरमर्दन श्रीहरि। यालागीं नांवें ‘मुरारि’। देवस्त्रिया काढोनि बाहेरी। देवांच्या करीं अर्पिता झाला॥ २८॥ जो असुरांमाजीं चूडामणी। जो द्वेषियांमाजीं अग्रगणी। तो हरिनाम ऐकतां कानीं। अतिक्षोभें मनीं प्रज्वळों लागे॥ २९॥ जो पूर्ण क्रोधाचा उदधि। जो अविवेकाचा महानिधि। जो हरि स्मरे त्या पुत्रातें बाधी। गर्वमदीं उन्मत्त॥ २३०॥ तो हिरण्यकशिपु नखधारीं। स्वयें निवटी ‘नरकेसरी’। जो निजभक्तांचा कैवारी। अभयकारी साधूंचा॥ ३१॥
देवासुरे युधि च दैत्यपतीन् सुरार्थे
हत्वान्तरेषु भुवनान्यदधात्कलाभि:।
भूत्वाथ वामन इमामहरद्बले: क्ष्मां
याच्ञाछलेन समदाददिते: सुतेभ्य:॥ २०॥
समुद्रमंथनाच्या शेवटीं। क्षीरसागराचे तटीं। सुरां असुरां कळी मोठी। अमृतासाठीं मांडली॥ ३२॥ तेव्हां अमृत विटे जें देखोनि। तो अवतारु घेतला मोहिनी। तेणें असुरां सुरापानी। अमृतदानी देवांसी॥ ३३॥ तेथ चोरूनि घेतां अमृतग्रासा। निवटिला राहूचा घसा। त्याच्या कबंधावरी म्हाळसा। वास नेवासा स्वयें केला॥ ३४॥ सुरसाह्य नारायणु। द्वारके कुश निर्दाळूनु। का लवणासुरमर्दूनु। अवतरे आपणु ‘कुमार’ रूपें॥ ३५॥ ऐसा मन्वंतरामन्वंतरीं। निजभक्तकाजकैवारी। सुरकार्यार्थ श्रीहरि। नाना अवतारीं अवतरे स्वयें॥ ३६॥ तो सुरसाह्य जगज्जीवन। स्वयें कुब्ज झाला ‘वामन’। अंगें याचक होऊन। देवांचा अपमान उतरला जेणें॥ ३७॥ दानें दाटुगा बळी। त्यासी देवांचेनि नव्हे कळी। मग त्रिविक्रमरूपें आकळी। याञ्चाछळें बळी छळिला जेणें॥ ३८॥ तरी भावबळें बळी प्रबळु। तेणें देवो केला द्वारपाळु। विष्णु सत्त्व पाहे छळछळूं। शेखीं दासांचा दयाळु दास्य करी स्वयें॥ ३९॥ यापरी बळीचा छळ। करूनि घेतलें दिङ्मंडल। तेणें अमरगण सकळ। अर्पूनि तत्काळ सुखी केले॥ २४०॥
नि:क्षत्रियामकृत गां च त्रि:सप्तकृत्वो
रामस्तु हैहयकुलाप्ययभार्गवाग्नि:।
सोऽब्धिं बबन्ध दशवक्त्रमहन् सलङ्कं
सीतापतिर्जयति लोकमलघ्नकीर्ति:॥ २१॥
तो देवाधिदेवोत्तमु। स्वयें झाला ‘परशुरामु’। तेणें क्षत्रियांचा पराक्रमु। केला निर्धर्मु निजप्रतापें॥ ४१॥ तो गोब्राह्मणकैवारी। सहस्रार्जुनातें संहारी। सहस्र भुजांची कांडोरीं करी। केली बोहरी दानवकुळा॥ ४२॥ जमदग्नीचा कोपाग्नि। परशुरामतेजें प्रज्वळूनि। हैहयकुळ जाळूनि। आहाळिली अवनी क्षत्रियांची॥ ४३॥ तेणें तीन सप्तकें वीररसु। देऊनि क्षत्रियमद बहुवसु। त्या रोगाचा केला नाशु। धरेचे ईशु धरामर केले॥ ४४॥ जो अवतारांचें मूळ पीठ। जो वीरवृत्ति अतिउद्भट। तो अवतारांमाजीं श्रेष्ठ। अतिवरिष्ठ ‘श्रीराम’॥ ४५॥ पापें पळती रामनामें। नामांकित वंदिजे यमें। गणिकेचीं कर्माकर्में। श्रीरामनामें निर्दळिलीं॥ ४६॥ नामें कळिकाळासी धाक। यमदूतां न मिळे भीक। रामनामगजरें देख। पळे नि:शेख जन्ममरण॥ ४७॥ जो देवांचे बंद सोडी। नवग्रहांची बेडी तोडी। जेणें रामराज्याची रोकडी। उभविली गुढी तिन्ही लोकीं॥ ४८॥ ज्याचेनि शिळा तरती सागरीं। असुर मारिले वानरीं। जेणें सुवर्णाची नगरी। वोपिली पुरी शरणागतासी॥ ४९॥ जो प्रतापाचा मरिगळा। जेणें सेतु बांधिला अवलीळा। चरणीं उद्धरिली शिळा। जो निजजिव्हाळा निजभक्तां॥ २५०॥ तो अवतार मूर्तिमंत। राया अद्यापि असे वर्तत। हा संवाद त्रेतायुगांत। द्रुमिल सांगत विदेहासी॥ ५१॥ यालागीं श्रीराम राम। नित्य जपे जो हें नाम। तो पुरुषांमाजीं पुरुषोत्तम। कर्माकर्म-अतीत तो॥ ५२॥ तें रामनाम अवचटें। भीतरीं रिघे कर्णपुटें। तैं कळिमळांचीं मळकटें। नामोद्धाटें नासती॥ ५३॥ ऐशी रामनामाची ख्याती। जगदुद्धारें केली कीर्ती। धन्य धन्य जे परिसती। धन्य जे गाती रामचरित॥ ५४॥
भूमेर्भरावतरणाय यदुष्वजन्मा
जात: करिष्यति सुरैरपि दुष्कराणि।
वादैर्विमोहयति यज्ञकृतोऽतदर्हान्
शूद्रान् कलौ क्षितिभुजो न्यहनिष्यदन्ते॥ २२॥
आतां भावी अवतारवार्ता। तुज मी सांगेन नृपनाथा। श्रीकृष्णावतारकथा। परमाद्भुता विचित्र॥ ५५॥ जो परेहून परात्परु। जो कां अजन्मा अक्षरु। जो श्रुतिशास्त्रां अगोचरु। तो पूर्णावतारु ‘श्रीकृष्ण’॥ ५६॥ जेथें नाममात्र रिघों न लाहे। जेथें रूपाची न लभे सोये। ज्या ब्रह्मत्व अंगीं न साहे। तो अवतार पाहें श्रीकृष्ण॥ ५७॥ जो वर्णाश्रमांसी नातळे। ज्यासी ईश्वरत्वही वोंविळें। जो अज अव्यय स्वानंदमेळें। तो अवतारु स्वलीलें श्रीकृष्णनाथु॥ ५८॥ ऐसा गुणधर्मकर्मातीतु। तो अवतारु श्रीकृष्णनाथु। प्रगटला यदुवंशाआंतु। स्वयें जगन्नाथु स्वइच्छें॥ ५९॥ जैसें खळाळ कल्लोळ चंचळ। भासे परी तें केवळ जळ। काळी भरडी पांढरी चोळ। परी ते केवळ वसुधाचि॥ २६०॥ जे गोडी नाबदरासीं। तेचि वेगळी रवेयासी। तैसा अवतार यदुवंशीं। पूर्णांशेंसीं श्रीकृष्ण॥ ६१॥ जैसा दीपु लावितां तत्क्षणीं। सवेंचि प्रगटे तेजाची खाणी। तैसा उपजतांचि बाळपणीं। अभिनव करणी स्वयें केली॥ ६२॥ जें ब्रह्मादिक देवां नव्हे। तें बाळलीलास्वभावें। करूनि दाविलें आघवें। देवाधिदेवें श्रीकृष्णें॥ ६३॥ वणवा गिळिला मुखें। पर्वत उचलिला नखें। पूतनेचें स्तन विखें। प्याला निजमुखें जीवासगट॥ ६४॥ जेणें वत्सहरणमिसें। स्रष्टॺासही लाविलें पिसें। जो वत्सवत्सपवेशें। झाला सावकाशें एकाकी एक॥ ६५॥ अघ चिरिला जाभाडा। काळियाच्या कुटिल्या फडा। यमलोकीं घेऊनि झाडा। आणिला रोकडा गुरुपुत्र जेणें॥ ६६॥ जे प्रजा पीडूनि कर घेती। जयां नावडे धर्मनीती। ऐसे राजे भारभूत क्षितीं। नेणों किती निर्दाळिले॥ ६७॥ एकां सैन्यें एकां स्वांगें। एकां वधवी आन प्रयोगें। एकां गोत्रकलहप्रसंगें। अग्रपूजायोगें एकांसी॥ ६८॥ अधर्मा लावील सीक। धर्माचें वाढवील बिक। हें अवतारकौतुक। राया तूं आवश्यक देखशील पुढां॥ ६९॥ जैं जैं लोटेल अहोरात्र। तैं तैं करील नवें चरित्र। तया कृष्णसुखासी पात्र। भक्त पवित्र होतील॥ २७०॥ साधूंसी स्वानंदसोहळा। नित्य नवा होईल आगळा। ते श्रीकृष्णाची लीला। देखसी डोळां नृपनाथा॥ ७१॥ तोचि बौद्धरूपें जाण। पुढां धरील दृढ मौन। तेव्हां कर्माकर्मविवंचन। सर्वथा जाण कळेना॥ ७२॥ तो तटस्थपणें सदा। प्रवर्तवील महावादा। तेणें वादमिसें सदा। वाढवील मदा महामोहातें॥ ७३॥ मोह उपजवील दुर्घट। एक कर्मीं करील कर्मठ। एक होतील कर्मभ्रष्ट। न कळे चोखटनिजात्महित॥ ७४॥ कैसें माजवील मत। वेद मिथ्या मानित। वेदविहिता नातळत। तो जाण निश्चित महामोहो॥ ७५॥ मोहें केला सर्वांसी छळ। एकां ज्ञानाभिमान प्रबळ। ते कर्म निंदिती सकळ। त्यागिती केवळ जाडॺ म्हणौनी॥ ७६॥ ऐशिये वर्ततां मोहस्थिती। पूर्ण कळीची होय प्रवृत्ती। तेव्हां नीच ते राजे होती। प्रजा नागविती चोरप्राय॥ ७७॥ शूद्राहूनि अतिकनिष्ठ। राजे होती परम श्रेष्ठ। वर्णावर्ण करिती भ्रष्ट। अतिपापिष्ठ अधर्मी॥ ७८॥ अपराधेंवीण वितंड। भलेत्यांसी करिती दंड। मार्गस्थांचा करिती कोंड। करिती उदंड सर्वापहरण॥ ७९॥ अबळांचें निजबळ राजा। तो राजाचि स्वयें नागवी प्रजा। ऐसा अधर्म उपजे क्षितिभुजां। तें गरुडध्वजा न साहवे॥ २८०॥ जेव्हां स्वधर्माचें जिणें। अधर्में निलाग गांजणें। यालागीं श्रीनारायणें। अवतार धरणें ‘कल्की’ नामा॥ ८१॥ तो शस्त्रधारा प्रबळ। नष्ट राजे निर्दाळील सकळ। महामोहाचें मूळ। स्वयें समूळ उच्छेदील॥ ८२॥ तेव्हां धर्माची पाहांट फुटे॥ सत्यासी सत्त्व चौपटे। तेव्हां वेदोक्त विधान प्रगटे। स्वधर्मराहाटें राहटती सर्व॥ ८३॥
एवंविधानि कर्माणि जन्मानि च जगत्पते:।
भूरीणि भूरियशसो वर्णितानि महाभुज॥ २३॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायामेकादशस्कन्धे चतुर्थोऽध्याय:॥ ४॥
जयाचीं गा अनंत नामें। अनंत अवतार अनंत जन्में। अनंत चरित्रें अनंत कर्में। अनंतोत्तमें हरिकीर्ती॥ ८४॥ अगाध भगवंताचा महिमा। त्याच्या पार नाहीं जन्मकर्मा। त्याचा अनुष्टुप् हा महिमा। तुज म्यां नरोत्तमा निरूपिला येथें॥ ८५॥ ऐशीं अवतारचरित्रनामें। परिसतां विचित्र कर्में। राजा अत्यंत सप्रेमें। मनोधर्में निवाला॥ ८६॥ जे जे अवतारीं देवो सगुण। जाहला परी निर्गुणाचे गुण। प्रकट करीतचि आपण। कर्माचरण स्वयें दावी॥ ८७॥ धन्य धन्य ते हरिगण। जे वर्णिती भगवद्गुण। ज्यांचेनि वचनें संपूर्ण। निवे अंत:करण श्रोत्यांचें॥ ८८॥ श्रोत्यांचें अवधान निवे। तेथ वक्ता स्वानंदसुख पावे। ग्रंथ वोसंडे स्वभावें। साहित्यगौरवें रसाळ॥ ८९॥ जेवी चंद्रकरें साचा। मुखबंध सुटे चकोरांचा। तेवीं एका जनार्दनाचा। संतकृपा वाचा फुटली त्यासी॥ २९०॥ जेवीं सूर्यकिरणस्पर्शें। कमळकळी स्वयें विकासे। तेवीं संतकृपासौरसें। ग्रंथु विकासे अर्थावबोधें॥ ९१॥ तेचि कृपेनें तत्त्वतां। अर्थिलें श्रीभागवता। आतां पंचमाध्यायीं कथा। सावध श्रोतां अवधारिजे॥ ९२॥ राजा प्रश्न करील गोड। जो परिसतां पुरेल कोड। साधकांची उपशमेल चाड। होय निवाड धर्माधर्माचा॥ ९३॥ जेथ भजना भजनहातवटी। प्रश्नोत्तरें कथा गोमटी। अतिशयें रसाळ गोठी। जेणें सुटे गांठी अधर्माची॥ ९४॥ तें उत्तमोत्तम निरूपण। भरीत संतांचे श्रवण। जनार्दनकृपा पूर्ण। एका जनार्दन सांगेल॥ ९५॥ अंगीं वारियाचेन संचरणें। घुमारा घुमों लागे तेणें। तेवीं एकाजनार्दनें। कविता करणें निजांगें॥ २९६॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे एकादशस्कन्धे निमिजायंतसंवादे एकाकारटीकायां चतुर्थोऽध्याय:॥ ४॥ श्रीकृष्णार्पणमस्तु॥ मूळश्लोक॥ २३॥ ओव्या॥ २९६॥
॥ श्री ॐ तत्सत्-श्रीकृष्ण प्रसन्न॥
अध्याय पांचवा
श्रीगणेशाय नम:। श्रीकृष्णाय नम:॥ ओं नमो सद्गुरु देवा उदारा। म्हणतां कृपण तूं खरा। मागतें आपुलिया घरा। दुजेपणें दारा येवों नेदिसी॥ १॥ अवचटें मागतयासी। जैं भेटी होय तुजसी। तैं घोट भरूं धांवसी। देखतांचि घेसी जीवें त्यातें॥ २॥ जे जे मागों येती तुजपासीं। ते बांधोन ऐक्यतेमाजीं सूदसी। शेखीं त्यांचे सोडवणेसी। भेटी दुसऱ्यासी स्वप्नींही नव्हे॥ ३॥ अणुमात्र तुझी प्राप्ती। अवचटें चढे ज्याचे हातीं। त्याचिये संसारसंपत्ती। सर्वस्वें निश्चितीं नाडिसी तूं॥ ४॥ मैंदाचा विडा घेतां। तो प्रवर्ते आपुले घाता। तेवीं तुझी प्रसन्नता। झालिया जीविता स्वयें नाशी॥ ५॥ जे जे तुजपें मागों आले। ते ते सर्वस्वें नागवले। शेखीं नागवे तुवां केले। निर्लज्ज झाले तिहीं लोकीं॥ ६॥ ऐशी तुझी निर्वाणगती। त्या तुझी उदार कीर्ती। घडे म्हणशी कैशा रीतीं। ते अगाध स्थिति अवधारीं॥ ७॥ मागें उदार वाखाणिले। तेही आपणियांऐसे केले। मग सर्वस्व आपुलें। दान दिधलें दातृत्वें॥ ८॥ षड्गुणैश्वर्यवैभवेंसीं। आपणियातें दाना देसी। दिधलें तें घेवों नेणसी। कदाकाळेंसीं कल्पांतीं॥ ९॥ आपणियां दिधलें दान। यालागीं तूं दासां अधीन। मग त्यांचेनि छंदें जाण। सर्वस्वें आपण नाचसी॥ १०॥ बळीनें सर्वस्व केलें दान। शेखीं तूं झालासि त्याअधीन। त्याचें द्वारपाळपण। अद्यापि आपण चालविसी॥ ११॥ धर्में अर्पिलें अग्रपूजेसी। शेखीं तूं त्याची सेवा करिसी। नाना संकटें स्वयें सोशिसी। अंगें काढिसी उच्छिष्टें॥ १२॥ तुझा निजभक्तु अंबऋषी। त्याचे गर्भवास तूं सोशिसी। तुज गौळिये राखिती हृषीकेशी। शेखीं त्या गोपाळांसी रक्षिलें॥ १३॥ एवं स्वस्वरूप द्यावयासी। उदारत्व तुजपासीं। हें न ये गा आणिकांसी। हृषीकेशी कृपाळुवा॥ १४॥ तो तूं परम उदार ऐसा। राया रंका समभावें सरिसा। भावो तेथ भरंवसा। तूं आपैसा आतुडसी॥ १५॥ त्या तुझिया प्राप्तीलागीं। कपाटें सदा सेविती योगी। एक ते झाले भोगविरागी। एक ते त्यागी सर्वस्वें॥ १६॥ एक हिंडती दशदिशे। एक तुजलागीं झाले पिसे। परी तुझी भेटी स्वप्नींही दिसे। ऐसा न दिसे क्षण एक॥ १७॥ ऐशियाही तुझी प्राप्ती। सुलभ असे एके रीतीं। जरी संतचरणीं रंगती। अतिप्रीतीं सप्रेम॥ १८॥ संतचरणीं जो विनटला। तो निजप्राप्तीसी पावला। संतस्वरूपें अवतरला। स्वयें संचला परमात्मा॥ १९॥ यालागीं जीं जीं संतांची रूपें। तीं तीं श्रीहरीचीं स्वरूपें। म्हणौनि संतांचिये कृपे। अतिसाक्षेपें अर्जावें॥ २०॥ ते ज्ञानार्थाचे परम पिसे। यालागीं ग्रंथाचेनि मिसें। त्यांचे चरण अनायासें। सावकाशें वंदीन॥ २१॥ संतकरुणावलोकन। तें मज नेत्रींचें अंजन। चरणकृपा पाहतां जाण। श्रीजनार्दन प्रकाशे॥ २२॥ तया जनार्दनाचिये सेवे। गुरुत्वाचेनि आडनांवें। रिघालों निजस्वभावें। जीवेंभावें भजनासी॥ २३॥ भज्य-भजक-भजना। एके अंगीं त्रिविध भावना। दावूनियां जगज्जीवना। जनीं जनार्दना निजभक्ती॥ २४॥ हे अभेदभक्ती चोखडी। परम ऐक्यें भजनगोडी। अधिकाधिक चढोवढी। वाढे आवडी निजभक्तां॥ २५॥ देवो आपली सर्वस्वजोडी। वेंची भक्तांचिये वोढी। ऐशी अभेदभक्तीची गोडी। पढिये गाढी गोविंदा॥ २६॥ यालागीं भक्तांचा शरीरभार। स्वयें वागवी श्रीधर। आपुलेनि अंगें परपार। पाववी साचार निजभक्तां॥ २७॥ ‘निजभक्तांचा देहभावो। निजांगें वागवी देवाधिदेवो। तरी अभक्तांचा देहो। वागवावया पहा हो काय आन आहे’॥ २८॥ भक्तां नाहीं देहअहंता। यालागीं देवो वागविता। पूर्ण देहाभिमान अभक्तां। त्यांसी अतिबद्धता या हेतू॥ २९॥ यालागीं जो निरभिमान। तोचि भगवद्भक्त संपूर्ण। ज्याच्या अंगीं देहाभिमान। त्यासी भक्तपण कदा न घडे॥ ३०॥ निजभक्त तारितां कौतुकें। त्याची रोमावळी केवीं दुखे। निर्भय करोनि पूर्ण हरिखें। देवो निजमुखें निजभक्तां तारी॥ ३१॥ यालागीं निरभिमानता। जे विनटले भक्तिपंथा। ते पावो देवोनि विघ्नांचे माथां। पावती तत्त्वतां भगवत्पद॥ ३२॥ भक्तांची ऐशी स्थिती। तरी अभक्तां कवण गती। तेंचि पुसावया नृपती। प्रश्नार्थी प्रवर्ते॥ ३३॥ पंचमामाजीं निरूपण। अभक्तांची गति लक्षण। युगीं युगीं पूजाविधान। सांगेल पावन हरीचें॥ ३४॥ अवतारचरितपुरुषार्थु। सांगोन संपला चतुर्थु। आतां अभक्तांचा वृत्तांतु। राजा पुसतु मुनीसी॥ ३५॥
राजोवाच
भगवन्तं हरिं प्रायो न भजन्त्यात्मवित्तमा:।
तेषामशान्तकामानां का निष्ठाविजितात्मनाम्॥ १॥
राजा म्हणे जी मुनिवरा। जो भगवद्भजनीं पाठिमोरा। ऐशिया अभक्ता नरा। कोण दातारा गति त्यासी॥ ३६॥ जे कामालागीं अतिउद्भट। जे सक्रोध क्रोधें तेजिष्ठ। ते अतिलोभें लोभिष्ठ। जे परम श्रेष्ठ प्रपंचीं॥ ३७॥ जे गर्वाचे अग्रगणी। जे अहंकाराचे चूडामणी। जे विकारांची प्रवाहश्रेणी। जे उघडली खाणी विकल्पांची॥ ३८॥ ज्यांचे सद्बुद्धिआड आभाळ। महामोहाचें सदा सबळ। जे छळणार्थीं अतिकुशळ। जे अतिप्रबळ प्रलोभें॥ ३९॥ दिवसा न देखती निश्चितें। ते अंधारीं देखणीं दिवाभीतें। तेवीं नेणोनि परमार्थातें। जे अतिज्ञाते प्रपंचीं॥ ४०॥ जे नेणती आत्महित। ज्ञान विकूनि काम पोसित। ऐसे जे कां अभक्त। त्यांची गति निश्चित सांग मज॥ ४१॥ तुम्हांऐसे सद्बुद्धी। चालते बोधाचे उदधी। भाग्यें लाधलों ज्ञाननिधी। हा प्रश्न त्रिशुद्धी सांगावा॥ ४२॥ राजा साक्षेपें बहुवस। पुसे अभक्तगतिविन्यास। तो सांगावया ‘चमस’। सावकाश सरसावला॥ ४३॥
चमस उवाच
मुखबाहूरुपादेभ्य: पुरुषस्याश्रमै: सह।
चत्वारो जज्ञिरे वर्णा गुणैर्विप्रादय: पृथक्॥ २॥
जो कां जगाचा जनकु। मुख्य गुरुत्वें तोचि एकु। त्यासी न भजे जो अविवेकु। तो नाडला लोकु सर्वस्वें॥ ४४॥ पुरुषापासूनि जन्मले जाण। चाऱ्ही आश्रम चाऱ्ही वर्ण। त्यांचे उत्पत्तीचेंस्थान। ऐक संपूर्ण नृपनाथा॥ ४५॥ मुखीं वेदविद ब्राह्मण। बाहूं जन्मले राजन्य। उरूं जन्मले वैश्यवर्ण। चरणीं जन्मस्थान शूद्रवर्णा॥ ४६॥ मूळीं अवघे तीन गुण। गुणयोगें वर्ण जाण। त्रिगुणीं चारी वर्ण। जन्मलक्षण घडे कैसें॥ ४७॥ सत्त्वगुणें शुद्ध ब्राह्मण। सत्त्वरजमिश्रें राजे जाण। रजतमें वैश्यवर्ण। केवळ तमोगुण शूद्रवर्ण॥ ४८॥ क्षत्रिय वैश्य आणि ब्राह्मण। द्विजन्मे हे तिन्ही वर्ण। त्यांसी गायत्री वेदाध्ययन। शूद्र ते जाण संस्काररहित॥ ४९॥ ब्रह्मचर्य आणि गार्हस्थ्य। तिहीं वर्णां अवश्य प्राप्त। चहूं आश्रमां आश्रयभूत। जाण निश्चित ब्राह्मण॥ ५०॥ गार्हस्थ्य पुरुषाच्या चरणीं। ब्रह्मचर्य हृदयस्थानीं। वक्ष:स्थळीं वसती वनी। शिरोमणी संन्यास॥ ५१॥
य एषां पुरुषं साक्षादात्मप्रभवमीश्वरम्।
न भजन्त्यवजानन्ति स्थानाद् भ्रष्टा: पतन्त्यध:॥ ३॥
हे ब्राह्मणादि वर्ण पहा हो। ज्यापासोनि जन्मप्रभवो। तो न भजतां देवाधिदेवो। उत्तमदेहो अध:पाती॥ ५२॥ पूर्वोत्तरमीमांसा दोनी। नानाशास्त्रार्थकडसणी। स्वरूप बोलती निर्वचूनी। एवं शब्दज्ञानीं अतिचतुर॥ ५३॥ यापरी जे पंडित। ज्ञानाभिमानें अतिउन्मत्त। तेणें अभिमानेंचि येथ। भजनीं निश्चित विमुख केले॥ ५४॥ एक अज्ञानी सर्वथा। स्वप्नीं नेणती परमार्था। ते नेणपणेंचि तत्त्वतां। श्रीजगन्नाथा न भजती॥ ५५॥ शेळी उंसाची चवी गाढी। नेणोनि पाचोळा करांडी। तेवीं नेणोनि हरिभक्तीची गोडी। अज्ञानें बापुडीं विषयलुब्ध॥ ५६॥ आलोडूनि वेदशास्त्रार्थ। ज्ञातपणें जे पंडित। गर्वें हेळसिती भक्तिपंथ। अतिउन्मत्त ज्ञातृत्वें॥ ५७॥ जेवीं ज्वरिताचें मुख। दूध मानी कडू विख। तेवीं ज्ञानगर्वें पंडित देख। ठेले विमुख हरिभजनीं॥ ५८॥ यापरी ज्ञानाभिमानी। विमुख झाले हरिभजनीं। ते जरी वर्णामाजीं अग्रगणी। तरी अध:पतनीं पडतील॥ ५९॥ हो कां वर्णांमाजीं अग्रगणी। जो विमुख हरिचरणीं। त्याहूनि श्वपच श्रेष्ठ मानीं। जो भगवद्भजनीं प्रेमळु॥ ६०॥ आम्ही मुक्त हें मानुनी। जे विमुख भगवद्भजनीं। ते पचिजती अध:पतनीं। तिर्यग्योनीं जन्ममरणें॥ ६१॥ मनुष्यदेहीं जे भजननष्ट। ते होती गा स्थानभ्रष्ट। अध:पातें भोगिती कष्ट। अतिउद्भट यातना॥ ६२॥ ज्ञानाभिमानें जे न भजती। ते प्रौढपतनीं पचिजती। अज्ञानांही तेचि गती। सर्वथा नृपती म्हणों नये॥ ६३॥
दूरेहरिकथा: केचिद्दूरेचाच्युतकीर्तना:।
स्त्रिय: शूद्रादयश्चैव तेऽनुकम्प्या भवादृशाम्॥ ४॥
एका पित्याचे दोघे अर्भक। एक प्रबुद्ध एक बाळक। पित्यासी अवमानितां देख। ताडी जनक प्रबुद्धासी॥ ६४॥ बाळक पित्याचे माथां चढे। जरी लाता हाणे तयाकडे। तरी त्यासी दोषु न घडे। दोषांचें सांकडें सज्ञानासी॥ ६५॥ ज्ञात्यांपासोनि भजन ठाके। ते कवळिजती महादोखें। अज्ञानें तरती भाविकें। साधुकृपामुखें अनुगृहीतां॥ ६६॥ अज्ञाना नाहीं विशेष बाधु। तो साधुविश्वासें होय शुद्धु। ज्ञानाभिमानियां भाव विरुद्धु। यालागीं सुबुद्धु दोष बाधी॥ ६७॥ अज्ञानी विश्वासें साधु वंदी। ज्ञानाभिमानीं दोहोंतें निंदी। यालागीं त्यातें त्रिशुद्धी। अवश्य बाधी अतिदोष॥ ६८॥ साधुविश्वासें अज्ञान फिटे। ज्ञानाभिमानियां विकल्प मोठे। त्यांसी विश्वास कदा न घटे। अभिमानहटें अध:पात॥ ६९॥ एवं विचारितां नेटेंपाटें। अहंतेचें बंधन मोठें। अभिमानऐसें नाहीं खोटें। दुजें वोखटें त्रिलोकीं॥ ७०॥ अभिमानु ईश्वरा बाधी। तोहो शबळ कीजे सोपाधी। अभिमानें देहबुद्धी। बाधक त्रिशुद्धी सुरनरांसी॥ ७१॥ यालागीं जे अज्ञान जन। ज्यांसी नाहीं ज्ञानाभिमान। तेही विश्वासल्या संपूर्ण। साधु सज्जन अनुग्रहो करिती॥ ७२॥ ज्यासी म्हणती नीच वर्ण। स्त्रीशूद्रादि हीन जन। ज्यासी कां दूरी शास्त्रश्रवण। ज्यासी दूरी श्रवण वेदोक्त॥ ७३॥ त्यांसी जाहलिया सद्भाव संपूर्ण। ते होतु कां हीन जन। परी संतकृपेसी आयतन। विश्वासें पूर्ण अधिकार झाला॥ ७४॥ ऐसे पूर्ण भावार्थी। त्यांसी तुम्हांऐशा साधुसंतीं। अनुग्रहोनि तारिती। कृपामूर्ती कृपाळु॥ ७५॥ अज्ञानी यापरी तरती। परी ज्ञानाभिमान ज्यांच्या मतीं। ते ब्रह्मादिकां न तरती। त्यांचीही स्थिति मुनि सांगे॥ ७६॥
विप्रो राजन्यवैश्यौ च हरे: प्राप्ता: पदान्तिकम्।
श्रौतेन जन्मनाथापि मुह्यन्त्याम्नायवादिन:॥ ५॥
अज्ञान जे नीच वर्ण। भावें धरोनि संतचरण। निजविश्वासें संपूर्ण। जन्ममरण निरसिती॥ ७७॥ येर द्विजन्मे जे कां तिन्ही। स्वभावें प्राप्त हरिचरणीं। आम्ही अधिकारी वेदज्ञानी। जन्माभिमानी अतिगर्वी॥ ७८॥ जन्माभिमान कर्माभिमान। अग्रपूज्यत्वें पूज्याभिमान। अल्पमात्र वेदींचें ज्ञान। तो वेदाभिमान वाढविती॥ ७९॥ ज्यासी प्राप्त उपनयन। ज्यासी प्राप्त गायत्री पूर्ण। ज्यासी हरीचें आवडे भजन। त्याचे धरितां चरण हरि भेटे॥ ८०॥ ऐसे उत्तम जे ब्राह्मण। त्यांसी वेदवादें ज्ञानाभिमान। तेणें गर्वें पडे मोहन। तेंचि निरूपण विशद सांगे॥ ८१॥
कर्मण्यकोविदा: स्तब्धा मूर्खा: पण्डितमानिन:।
वदन्ति चाटुकान्मूढा यया माध्व्या गिरोत्सुका:॥ ६॥
न कळे विधिविधानमंत्र। कोणे कर्मीं कैसें तंत्र। नेणोनियां गर्व थोर। ताठा अपार ज्ञातृत्वाचा॥ ८२॥ गारोडियासी विद्या थोडी। परी सर्वांगीं बिरुदें गाढीं। कां जाणी जाणपणें जोडी। कडोविकडीं आसनपूजा॥ ८३॥ देऊनि पतंगाचे ढाळ। स्फटिकाअंगीं माणिक कीळ। तैसे मूर्खही केवळ। मिरविती प्रबळ ज्ञानाभिमानें॥ ८४॥ आपण विधान नेणती। शेखीं सज्ञानाही न पुसती। कर्म आपमतीं करिती। लौकिकीं स्फिती वाढवावया॥ ८५॥ मिथ्या मधुर शब्दें चाटुक। जे भोगीं अणुमात्र नाहीं सुख। तरी इहामुत्र भजविती लोक। अप्सरादिक भोगलिप्सा॥ ८६॥ येथ भोग भोगावे चोखडे। आणि पुढें स्वर्गभोग जोडे। येणें वचनें बापुडे। यागाकडे धांवती॥ ८७॥ कर्ता सर्वस्वें नागवो। परि आचार्यत्व आम्हां येवो। ऐशी यांची बुद्धि पहा हो। यागप्ररोहो आरंभिती॥ ८८॥ पावावया अतिप्रतिष्ठा। नाना कर्मांच्या कर्मचेष्टा। करूनि दाविती खटपटा। कर्मारंभु मोठा आरंभुनी॥ ८९॥ ना तरी जैसा मद्यपानी। मद्यरसा अमृत मानी। या वचनगोडिया मद्यपानीं। प्रवर्तिजे जनीं स्वादलिप्सा॥ ९०॥ तें सेविलिया काय जोडे। थिती सावधानता बुडे। मग दुर्भगत्व रोकडें। पिशाचत्व गाढें अंगीं वाजे॥ ९१॥ तैसें केवळ पतनात्मक। त्या नांव म्हणती स्वर्गसुख। जाणोनि प्रवर्तती ते मूर्ख। फळकामुक अभिलाषी॥ ९२॥ उंडणी लंघू न शके भिंतीसी। तरी चढों रिघते सायासीं। चढतां पडे आपैसी। तेवीं स्वर्गसुखासी दृढ पतन॥ ९३॥ कर्माभिनिवेशपडिपाडें। कामलोभ दृढ वाढे। तेणें दांभिक करणें घडे। क्रोधाचें चढे महाभरितें॥ ९४॥
रजसा घोरसङ्कल्पा: कामुका अहिमन्यव:।
दाम्भिका मानिन: पापा विहसन्त्यच्युतप्रियान्॥ ७॥
ते काय करितील बापुडे। शुद्ध सत्त्वें सांडिलें फुडें। मग रजोगुणें कामाकडे। झाले धडफुडे अतिकामी॥ ९५॥ तेव्हां उर्वशीच्या अतिआवडी। स्वर्गभोगाची अतिगोडी। यालागीं यागपरवडी। पुण्याची जोडी जोडूं धांवे॥ ९६॥ तेथ मंत्रतंत्रद्रव्यशुद्धी। नाहीं यागयजनविधी। तेणें स्वर्ग नव्हेचि त्रिशुद्धी। ठकले दुर्बुद्धी अविहिताचारें॥ ९७॥ तया अलब्ध कामासाठीं। सर्वांगीं क्रोधु उठी। जेवीं परिपाकापाठीं। धरी कडुवटी आंबिलकांजी॥ ९८॥ जंव जंव पिकिजे कोरिफडें। तंव तंव कडूपण गाढें। तैसा कामनाशापुढें। क्रोध वाढे अत्युग्र॥ ९९॥ क्रोध काळिया-नाग खरा। देतु द्वेषाचा फुंफारा। घाली पूज्यतेच्या आकारा। धुधु:कारा साधुनिंदेचा॥ १००॥ ऐसा क्रोधाचा वसौटा। होय तमाचा चोहटा। मग दंभाचे नाणवठां। हीनकसाचा खोटा विकरा मांडी॥ १॥ मग जो जो भेटे प्राणिया। त्यासी अभिचांरयोगक्रिया। लावूनि बाहेर मुद्रिया। पापाचारें पापिया प्रवृत्ति मांडी॥ २॥ स्वधर्माचा फाडोवाडें। प्रतिपदीं पाडा पढे। अधर्माची खाणी उघडे। समूळ कुडें कर्माचरण॥ ३॥ तेणें पापाचार पिके। गगनचुंबित जाहलीं टेंकें। मग अधमोत्तम एकें तुकें। घालिती यथासुखें अधर्मघालणी॥ ४॥ तेथ ठाणें देऊनि अभिमाना। वाढविती ज्ञानाभिमाना। मग निंदिती साधुजना। विपुळाती सज्जना उपहासयुक्त॥ ५॥ जगीं सर्वत्र पाहती दोष। तथापि देखिल्याही निर्दोष। तरी करूनियां उपहास। करिती सावकाश असदारोपणें॥ ६॥ यापरी अभिमानविदां। पापबुद्धीची दृढ बाधा। सहजानुवादें सदा। साधुनिंदा अनुवादती॥ ७॥ जे कां हरीतें आवडती। जे सदा करिती हरिभक्ती। त्यांतें सदा उपहासिती। अनुवादती गुणदोष॥ ८॥ द्विज स्मरती हरिनाम। त्या नांव म्हणती अधर्म। ऐकोनि हरिकीर्तनसंभ्रम। म्हणती हें परम महापाप॥ ९॥ ऐसा जो हरिनामातें निंदी। हरिकीर्तनीं दुर्बुद्धी। तो खळ जाणावा त्रिशुद्धी। भजनापवादी दुर्जन॥ ११०॥
वदन्ति तेऽन्योन्यमुपासितस्त्रियो
गृहेषु मैथुन्यपरेषु चाशिष:।
यजन्त्यसृष्टान्नविधानदक्षिणं
वृत्त्यै परं घ्नन्ति पशूनतद्विद:॥ ८॥
स्त्रीकामें अतिकामुक। मैथुनापरतें नाहीं सुख। येणें भ्रमें काममूर्ख। स्त्रिया आवश्यक उपासिती॥ ११॥ यापरी मंदबुद्धी। कैसे संवादती शब्दीं। मनुष्यजन्में हेचि सिद्धी। नाना भोगविधी भोगाव्या स्त्रिया॥ १२॥ जें स्त्रीभोगीं सद्यसुख। तें त्यागविती ते अतिमूर्ख। वैराग्यमिसें लोक। ठकिले देख महामूढीं॥ १३॥ सांडूनि गृहभोग अंगना। जयां वैराग्यें उद्भट भावना। ते निजकर्में दंडिले जाणा। नागवूनि वना दवडिले दैवें॥ १४॥ काय गृहाश्रमीं देव नसे। मन वना धांवताति पिसे। साचचि देव वनीं वसे। तरी कां मृग ससे न तरती व्याघ्र॥ १५॥ घालोनियां आसनें। देवो भेटता जरी ध्यानें। तरी बकाचीं पाळिंगणें। कां पां तत्क्षणें नुद्धरती॥ १६॥ एकान्त रहिवास विवरीं। तेथचि भेटता श्रीहरी। तरी न तरोनियां उंदिरीं। कां पां घरोघरीं चिंवताती॥ १७॥ देवो सर्वज्ञ चोखडा। तेणें पशुपक्षियां केला जोडा। तोही लोकीं मानूनियां वेडा। त्यागाचा गाढा पाडिला मोळा॥ १८॥ ‘आनंदा उपस्थ एकायतन’। हें देवाचें वेदवचन। तेंही न मानूनि अज्ञान। त्यागाचें संपूर्ण मांडिती बंड॥ १९॥ मैथुनीं परम सुख। देवेंचि रचिलें देख। तेंही त्यागोनियां मूर्ख। वीतरागें लोक संन्यासी होती॥ १२०॥ जे जगामाजीं केवळ पिशी। ते स्वयें होती संन्यासी। देवें दंड देऊनि त्यांसी। लाविलें भिकेसी दारोदारीं॥ २१॥ त्यागोनियां निजस्त्रियेसी। कर्मत्यागें होती संन्यासी। तो स्त्रीशाप बाधी त्यांसी। मागतां भिकेसी पोट न भरे॥ २२॥ हातावरी पावले दंड। खांडमिशा केलें मुंड। हिंडती भगवीं गुंडगुंड। हा स्त्रीशापें वितंड विटंबु केला॥ २३॥ घेऊनियां दोहीं हातीं। उदंड गांडीसी लाविती माती। त्रिकाळ जळीं बुडविजती। ऐसी स्त्रीशापें ख्याती लाविली त्यांसी॥ २४॥ लंगोटी लाविली गांडीसी। झोळीं लाविली हातासी। त्याहीवरी दंड देऊनि त्यासी। स्त्रीशापें संन्यासी लाविले भिके॥ २५॥ स्त्रीसुखापरतें नाहीं सुख। स्त्रीत्यागापरता नाहीं दोख। हेंचि नेणोनियां मूर्ख। दंडिले अनेक वैराग्य त्यागें॥ २६॥ स्त्रीसंगेंवीण विविध भोग। ते जाणावे अतिउद्वेग। निजभाग्यें जे सभाग्य साङ्ग। ते स्त्रीयोगें भोग भोगिती नाना॥ २७॥ हेंचि देवाचें प्रसन्न होणें। जे सदा इष्ट भोग भोगणें। ते भोग जेणें त्यागणें। तेंचि क्षोभणें देवाचें॥ २८॥ स्त्रियादि भोग त्यागिले रोकडे। पुढें निजमोक्ष हें वचन कुडें। यापरी भोळे लोक बापुडे। वैराग्यवादें फुडें नाडिले येथ॥ २९॥ ऐसऐसिया अनुवादा। करिती परस्परें संवादा। म्हणती त्यागाची बुद्धि कदा। आम्हांसी गोविंदा देऊं नको॥ १३०॥ त्याग करोनि भीक मागणें। यापरीस भलें मरणें। मुक्ति देखिली नाहीं कोणें। आपदा भोगणें जग देखे॥ ३१॥ कोणासी तरी मुक्ती। कोठें तरी देखिजेती। तरी ते साच मानूं येती। मिथ्या वदंती वैराग्यत्यागा॥ ३२॥ ऐशी सदा त्यागाची करूनि निंदा। भोग भोगावे म्हणती सदा। ऐसऐशिया आशीर्वादा। देती सदा स्वाध्यायासी॥ ३३॥ स्त्रीसुख परम मानून। स्वयें सदा होती स्त्रैण। मग जागृती सुषुप्ति स्वप्न। स्त्रियेचें ध्यान अहर्निशीं॥ ३४॥ नाहीं सद्गुरूचें भजन। नाहीं वृद्धासी पूजन। नाहीं अतिथींसी अन्न। स्त्रीआधीन सर्वस्वें॥ ३५॥ स्त्रियेचें दुखवूं नेदी मन। कदा नुल्लंघी स्त्रियेचें वचन। नित्य स्त्रियेचें अनुसंधान। सद्भावें उपासन स्त्रियेचें सदा॥ ३६॥ नाहीं कुळदेवता कुळवृत्ती। नाहीं पिता-माता-सद्गुरुभक्ती। संपत्ति वोपी स्त्रियेहातीं। आपण सर्वार्थीं ती अधीन वर्ते॥ ३७॥ ते स्त्रीभोग भोगावयासी। धनार्जन अर्जावयासी। यागु आरंभी जीविकेसी। केवळ दंभेंसीं उदरार्थ॥ ३८॥
(पूर्वश्लोकार्ध) ‘यजन्त्यसृष्टान्नविधानदक्षिणं वृत्त्यै परं घ्नन्ति पशूनतद्विद:।’
यागें व्हावी सर्वसिद्धि। हेही नाहीं दृढ बुद्धि। रोकडिये जीविकावधि। उपाय त्रिशुद्धी हाचि केला॥ ३९॥ यज्ञदीक्षेची प्रतिष्ठा। तेणें पूज्य होईन वरिष्ठां। अग्रपूजा माझा वांटा। ऐशिया उत्कंठा आदरी यागु॥ १४०॥ ऐशिया नाना विवंचना। आधीं संकल्पूनि मना। मग प्रवर्ते यागयजना। जोडावया धना कृतनिश्चयो॥ ४१॥ न पाहे विधिविधाना। नाहीं आदरु मंत्रोच्चारणा। न करी अन्नसंपादना कोरडे कणां हवन मांडी॥ ४२॥ मी यज्ञ करितों अंगें। ऐसें जगापासीं सांगे। आणि तेणें यागयोगें। चालवी प्रसंगें जीविकायोगु॥ ४३॥ स्वयें नेणती विधिविधाना। आणि न पुसती सज्ञाना। परी पशूंचिया हनना। प्रवर्तती जाणा शठ नष्ट दंभें॥ ४४॥ मग तेथींचा पुरोडाश। सेविती यथासावकाश। आम्ही पवित्र झालों निर्दोष। ऐसाही उल्हास लागती करूं॥ ४५॥ गौणता आवाहनविसर्जना। तेथ कैंची पूजा दक्षिणा। सत्पात्राची अवगणना। करिती हेळणा ज्ञानगर्वें॥ ४६॥ केवळ जीविकेच्या आशा। करूं लागती पशुहिंसा। आम्ही याज्ञिक या आवेशा। पिटिती ठसा तिहीं लोकीं॥ ४७॥ केवळ जीविकेचिया दुराशा। अविधी करिती पशुहिंसा। मज दोष होईल ऐसा। कंटाळा मानसा कदा नुपजे॥ ४८॥
श्रिया विभूत्याभिजनेन विद्यया
त्यागेन रूपेण बलेन कर्मणा।
जातस्मयेनान्धधिय: सहेश्वरान्
सतोऽवमन्यन्ति हरिप्रियान् खला:॥ ९॥
यापरी वर्ततां स्थिती। त्याहीवरी झालिया संपत्ती। तैं गर्वाचा भद्रजाती। तैशिया उन्नतीं डुलों लागे॥ ४९॥ कां लेंडिये आला लोंढा। वाहवी वाळलिया लेंडा। कां मर्कटाचिया तोंडा। मदिरेचा भांडा सांपडे जैसा॥ १५०॥ तैसा मी एकु ज्ञाता फुडा। म्हणौनि नाचे तडतडां। सज्ञान आम्हांपुढां। कवण बापुडा आन आहे॥ ५१॥ ऐशियाहीवरी अदृष्टता। रत्नें मोतिलगा वस्तुजाता। गजवाजिनृयानप्राप्तता। तेणें गर्वें इंद्रमाथां मोचे फेडी॥ ५२॥ यज्ञीं यागस्वाहाकारीं। इंद्र आमुची आशा करी। त्याची आम्हांहूनि थोरी। कैशापरी मानावी॥ ५३॥ मग शिष्य-सुहृत् -सज्जनीं। परिवारिल्या सेवकजनीं। मजसमान त्रिभुवनीं। समर्थ कोणी असेना॥ ५४॥ जैशी कां कांटीभोंवतीं हरळी। तैशी शिष्यांची मांदियाळी। ते महिमेच्या गर्वमेळीं। मानी पायांतळीं ध्रुवमंडळ॥ ५५॥ जैसें विंचुवा विष थोडें। परी प्रबळ वेदनेसी चढे। तेवीं विद्या थोडी परी गाढें। गर्वाचें फुडें अतिभरितें॥ ५६॥ तो अज्ञानामाजीं सर्वज्ञता। मिरवी आपुली योग्यता। जेवीं अंधारीं खद्योता। सतेजता झगमगी॥ ५७॥ अल्पज्ञाता विद्येसाठीं। वाचस्पती नाणी दृष्टीं। जेवीं मुंगी पांखासाठीं। गरुडाचे पृष्ठीं पाय देवों पाहे॥ ५८॥ निखळ तांबियाचें नाणें। देवों रिघे दामोक्यायेसणें। तेणें आपुलेनि दातेपणें। मानी ठेंगणें बळीतें॥ ५९॥ कर्ण दातृत्वें मानिजे फुडा। तोही न मांडे आम्हांपुढां। प्रत्यहीं भारसुवर्णहुडा। उपजे तेणें गाढा दाता कर्णु॥ १६०॥ आम्ही निजार्जितें वित्तें। दान देवों सत्पात्रातें। मा दातृत्वें कर्णातें। विशेषु येथें तो कायी॥ ६१॥ सदा अपकारुचि जोडे। त्यासीही अल्प उपकारु घडे। इतुकियासाठीं न उकल पडे। सर्वस्व रोकडें बुडवी-सदा॥ ६२॥ एवं अल्प दानासाठीं। दातृत्वाचे त्रिकुटीं। मेघाच्यापरी अतिउद्भटीं। स्वमुखें उठी गर्जतु॥ ६३॥ बरवेपणाचेनि पांगें। मदनासी विटावों लागे। सौंदर्य माझेनि अंगें। दुजें मजजोगें असेना॥ ६४॥ कीं कावळा बरवेपणासाठीं। राजहंसा नाणी दिठीं। कां आस्वली मानी पोटीं। मीही गोमटी सीतेपरीस॥ ६५॥ तेवीं बरवेपणाचा जाण। थोर चढे देहाभिमान। जेवीं देखोनि हिरवें रान। म्हैसा संपूर्ण उन्मादे॥ ६६॥ यावरी कांहीं एक पराक्रम। केलिया न मानी तीनही राम। जेवीं गोग्रहणीं संग्राम। शौर्यधर्म उत्तराचा॥ ६७॥ कां अंगींचेनि माजें। रानसोरु न मानी दुजें। तैसा बळाचेनि फुंजें। स्वयें गर्जे मुसमुसितु॥ ६८॥ ते आधींच म्हणविती सज्ञान। त्याहीवरी ‘याज्ञिक’ हें महिमान। तें याज्ञिक कर्माचरण। दाविती आपण लोकांप्रती॥ ६९॥ आलिया धनिक जनांप्रती। आपुली स्तविती कर्मस्थिती। मग कर्ममुद्रा नानायुक्ती। स्वयें दाविती लौकिका॥ १७०॥ ऐशियाही कर्माचारा। ज्ञातृत्वाचा गर्व पुरा। जेवीं दिवाभीतु अंधारा। निघे बाहेरा घुंघातु॥ ७१॥ अजांचें लेंडोरें पेटे। तेथ ज्योतिज्वाळा कदा नुमटे। परी धुरकटलें धुपधुपी मोठें। धुवें थिकटे दिग्मंडळ॥ ७२॥ यापरी नाना दंभोपाधीं। अतिगर्वाच्या उन्मादीं। अंध जाहली सद्बुद्धी। तो साधूतें निंदी हरिहरांसहित॥ ७३॥ जेवीं दाटलेनि काविळें। दृष्टीतें करी पिंवळें। मग देखों लागे सकळें। आचूडमूळें पीतवर्ण॥ ७४॥ तेवीं निंदोपाधी अतिगर्वीं। मंद जाहली प्रज्ञाछवी। मग निर्दुष्टीं दोष लावी। शुद्धातें भावी अतिमलिन॥ ७५॥ जो योगियांच्या मुगुटीं। ज्यातें म्हणती धूर्जटी। त्याची पाहतां राहाटी। दिसे शेवटीं अतिमंद॥ ७६॥ रागें उमा घेतली आगी। यालागीं याज्ञिकाचें शिर भंगी। सकामु तरी मोहिनीलागीं। नग्न लागवेगीं पाठीं लागे॥ ७७॥ विष्णु सदाचा कपटी। कांहीं न देखों शुद्ध दृष्टीं। वृंदा पतिव्रता गोमटी। तेणें केली शेवटीं व्यभिचारिणी॥ ७८॥ जेथ विष्णु व्यभिचारवासी। ते वृंदेच्या वृंदावनापाशीं। जटॺाळ गांठॺाळ मिळती राशी। केवीं साधुत्व त्यांसी मानूं आम्ही॥ ७९॥ साधु मानूं सनत्कुमार। त्यांसीही वैकुंठीं क्रोध थोर। शब्दासाठीं हरिकिंकर। जयविजय वीर शापिले॥ १८०॥ श्रेष्ठ मानूं चतुरानन। तोही निलागचि हीन। उमा नोवरी देखोन। म्हणतां ‘सावधान’ वीर्य द्रवलें॥ ८१॥ नारद ब्रह्मचारी निजांगें। तोही कृष्णदारा स्वयें मागे। तो कृष्णें ठकविला तत्प्रसंगें। साठी पुत्र वेगें स्नानीं व्याला॥ ८२॥ ज्यातें म्हणती सत्य ‘धर्म’। तोही केवळ अधर्म। गोत्रवधाचा संभ्रम। हा पूर्ण अधर्म धर्मासी॥ ८३॥ व्यास तरी तो जारपुत्र। तेणेंचि कर्में पराशर। द्वेषिया वसिष्ठ-विश्वामित्र। अतिमत्सर परस्परें॥ ८४॥ साधु म्हणों दुर्वास ऋषी। तो छळूं गेला अंबरीषासी। पितृद्रोह प्रल्हादासी। साधुत्व त्यासी केवीं मानूं॥ ८५॥ एवं वाखाणिले पुराणीं। तेही साचे न मानती मनीं। मा आतांचे वर्तमानीं। साधु कोणी असेना॥ ८६॥ ऐकोनियां अचाट गोष्टी। येरें धांवती येरांपाठीं। एक करिती तोंडपिटी। अतिचावटी उदरार्थ॥ ८७॥ एक मुद्रावंत आसनीं। एक बसती बकध्यानी। परी सत्य माने मनीं। ऐसा साधु कोणी असेना॥ ८८॥ ऐशी आपुलियाचि युक्तीं। साक्षेपें साधूंतें निंदिती। साधु असती हे वस्ती। अणुमात्र चित्तीं असेना॥ ८९॥ जे जे हरीचे पढियंते। ते ते नावडती तयांतें। जेवीं दाखवितां दर्पणातें। क्षोभे निजचित्तें निर्नासिक॥ १९०॥ ज्या ईश्वराचेनि वर्तिजती। तो ईश्वरु आहे हें न मानिती। तो ईश्वर आहे कोणे स्थिती। ऐक तुजप्रती सांगेन राया॥ ९१॥
सर्वेषु शश्वत्तनुभृत्स्ववस्थितं
यथा खमात्मानमभीष्टमीश्वरम्।
वेदोपगीतं च न शृण्वतेऽबुधा
मनोरथानां प्रवदन्ति वार्तया॥ १०॥
जो सर्व भूतांचे ठायीं। निरंतर अंतर नाहीं। समसाम्यें सर्वदा पाहीं। उणापुरा कदाहीकल्पांतीं नव्हे॥ ९२॥ जो सर्वांमाजीं असे सर्वदा। परी सर्वपणा नातळे कदा। जेवीं पद्मपत्र जलस्पंदा। अलिप्त बुद्बुदा असोनि संगें॥ ९३॥ तेवीं असोनि सकळ जनीं। घसवटेना जनघसणीं। नभ जैसें अलिप्तपणीं। नरचूडामणी सबाह्य॥ ९४॥ तैसें अलिप्तपण न मोडे। परी रची अनंत ब्रह्मांडें। तें ब्रह्मांड अंडें प्रचंडें। वागवी उदंडें अकर्तात्मयोगें॥ ९५॥ यालागीं तो ‘अंतर्यामी’। अभिधान बोलिजे नित्य निगमीं। जो सर्वांच्या हृदयग्रामीं। चेतनानुक्रमीं लक्षिजे॥ ९६॥ त्या ईश्वरातें नित्य ध्यातां। कां आवडीं नाम मुखीं गातां। तरी अभीष्ट मनोरथां। होय वर्षता अखंडधारीं॥ ९७॥ त्या ईश्वराच्या गातां गोष्टी। सर्व अनिष्टां होय तुटी। जो देखतांचि दृष्टीं। स्वानंदसृष्टि तुष्टला वर्षे॥ ९८॥ एवं सुखदाता तोचि शास्ता। जो कां अंतकाचा नियंता। अकाळें काळही सत्ता। ज्या भेणें सर्वथा करूं न शके॥ ९९॥ श्वासोच्छ्वासांचिया परिचारा। ज्या भेणें नेमस्त वाजे वारा। ज्याचेनि धाकें धरा। न विरवे सागरा जळीं असतां॥ २००॥ ज्याचे आज्ञेवरी जाण। सूर्य चालवी दिनमान। ज्याचे पुरातन आज्ञेभेण। समुद्र आपण रेखा नुल्लंघी॥ १॥ ज्यातें सदा गायिजे वेदीं। जो वाखाणिजे उपनिषदीं। ज्याची पवित्र कीर्ति दुर्बुद्धी। स्वयें त्रिशुद्धी नायकती कदा॥ २॥ ज्याचें नाम स्मरतां जाण। सकळ दोषां निर्दळण। ज्याचे कृतांत वंदी चरण। जन्ममरण विभांडी॥ ३॥ ज्याची कथा कर्णपुटीं। पडतां विकल्पांचिया कोटी। निर्दळूनि उठाउठी। पाडी मिठी परब्रह्मीं॥ ४॥ यापरी जो पवित्र मूर्ती। ज्यालागीं वेद सदा वर्णिती। अभाग्य नायकती त्याची कीर्ती। वार्ता करिती मनोरथांच्या॥ ५॥ अस्वल आपुलिया गुणगुणा। नायके वाजतिया निशाणा। तेवीं नायकोनि हरीच्या गुणा। विषयसंभाषणा आदरें वदती॥ ६॥ यालागीं ते अतिमंद। अविनीत सदा स्तब्ध। विषयांलागीं विषयांध। अतिलुब्ध लोलुप्यें॥ ७॥
लोके व्यवायामिषमद्यसेवा
नित्यास्तु जन्तोर्न हि तत्र चोदना।
व्यवस्थितिस्तेषु विवाहयज्ञ-
सुराग्रहैरासु निवृत्तिरिष्टा॥ ११॥
वेदें न करितां प्रेरणा। विषयांवरी सहज वासना। स्वभावें सकळ जनां। सदा जाण सर्वांसी॥ ८॥ मांससेवना मद्यपाना। मिथुनीभूत मैथुना। ये अर्थीं सर्व जनां। तीव्र वासना सर्वदा॥ ९॥ तेथें सेव्यासेव्यपरवडी। विवंचना कोण निवडी। लागली विषयांची गोडी। ते अनर्थकोडी करितील॥ २१०॥ आगी लागलिया कापुसा। विझवितां न विझे जैसा। तेवीं विषयवंता मानसा। विवेकु सहसा उपजेना॥ ११॥ झाल्या लोलिंगत बडिशा। निजमरण विसरे मासा। कां मुठी चणियांच्या आशा। नळीमाजीं आपैसा वानरू अडके॥ १२॥ दूध मिळालिया मांजर। न म्हणे द्विजअंत्यजघर। तेवीं विषयउन्मत्त नर। न करिती विचार सेव्यासेव्य॥ १३॥ कां खवळल्या विषयचाडें। योनिसंकरु घडेल पुढें। यालागीं वेदें चोखडे। वर्णाश्रमपाडें विभाग केले॥ १४॥ जैसें अफाट पृथ्वीचें अंग। तेथें सप्तद्वीपें करूनि विभाग। मग भिन्नाधिकारें चांग। धरा साङ्ग आक्रमिली॥ १५॥ कां अनावृत मेघजळा। धरणें धरूनि घालिजे तळां। मग नेमेंचि ढाळेढाळां। पिकालागीं जळा काढिजे पाट॥ १६॥ आणि पवना नादाकारा। साधूनि कीजे वाजंतरा। मग जेवीं नाना ध्वनि मधुरा। वाजविजे यंत्रा सप्त स्वरें॥ १७॥ तैसें उच्छृंखळां विषयांसी। वेदें नेमिलें नेमेंसीं। तेचि वेदाज्ञा ऐशी। ऐक तुजपासीं सांगेन॥ १८॥ आवरावया योनिभ्रष्टां। मैथुनीं विवाहप्रतिष्ठा। लावूनियां निजनिष्ठा। वर्णवरिष्ठा नेमिले॥ १९॥ ब्राह्मण जातां रजकीपासीं। ते तंव कडू न लगे त्यासी। रजक जातां ब्राह्मणीपाशीं। तिखट त्यासी ते न लगे॥ २२०॥ भलती स्त्री भलता नर। मैथुनीं होय वर्णसंकर। तो चुकवावया प्रकार। विवाहनिर्धार नेमिला वेदें॥ २१॥ धर्मपत्नीपाणिग्रहण। विवाह नेमिला सवर्ण। तेथें सप्तम पंचम त्यजून। स्वगोत्रीं लग्न करूं नये॥ २२॥ तीन्ही वेद तीन्ही वर्ण। वेदें सांडूनियां जाण। सवेद आणि सवर्ण। पाणिग्रहण नेमिलें॥ २३॥ कन्या सवेद सवर्ण। जीसी नाहीं रजोदर्शन। तेही पित्यापासीं याचून। करावें लग्न विधानोक्त॥ २४॥ धर्म-अर्थ-कामाचरण। अन्यत्र न करावें आपण। ऐशी वाहूनियां आण। पाणिग्रहण वेदोक्त॥ २५॥ करितां वधूवरां पाणिग्रहण। साक्षी द्विज-देव-हुताशन। इतर स्त्रिया मातेसमान। स्वदारागमन नेमिलें वेदें॥ २६॥ एवं नेमूनियां विवाहासी। वेदरायें दिली आज्ञा ऐशी। सांडूनि सकळ स्त्रियांसी। स्वदारेपाशीं मैथुन॥ २७॥ दिवा मैथुन नाहीं स्त्रियांसी। रात्रीं त्यजूनि पूर्वापर प्रहरांसी। मैथुन स्त्रियेपासीं। मध्यरात्रीसी नेमस्त॥ २८॥ नेमिलें स्वदारामैथुन। तेंही अहोरात्र नाहीं जाण। प्रजार्थ स्त्रीसेवन। ऋतुकाळीं गमन नेमस्त॥ २९॥ ऋतुकाळीं ज्यां स्त्रीगमन। ते पुरुष ब्रह्मचारी पूर्ण। वेद निवृत्तिपर जाण। त्यारूपें आपण भोगातें नेमी॥ २३०॥ ‘आत्मा वै पुत्रनामासि’। पुत्र झालिया स्त्रियेसी। संग करूं नये स्त्रीपासीं। शनै: शनै: विषयांसी त्यागवी वेद॥ ३१॥ सेवावया आमिषा। वेदें नेमु केला कैसा। न घडावया पशुहिंसा। संकट आयासा स्वयें द्योता॥ ३२॥ आवडीं खावया मांसा। अथवा स्वर्गाचिया आशा। जे करिती पशुहिंसा। तयां पुरुषां अध:पतन॥ ३३॥ निष्काम कर्मीं पशुहिंसा। करी तरी तो निष्काम कैसा। तेथ निगमाचा नेमु ऐसा। मुख्य अहिंसा सर्व धर्मीं॥ ३४॥ नित्य न करावया मांसभक्षण। यज्ञीं पुरोडाशसेवन। तेंही परिमित जाण। स्वेच्छा मांसादन वारिलें वेदें॥ ३५॥ याग करूनि ‘सौत्रामणी’। प्रवर्तावें सुरापानीं। हे वेदाज्ञा जो सत्य मानी। तो स्वधर्माचरणीं नागवला॥ ३६॥ जे कर्मीं मद्यपान घडे। तो स्वधर्म म्हणतां जीभ झडे। लोलुपते भुलले बापुडे। वेद विषयांकडे वोढिती॥ ३७॥ यागु करितां सोत्रामणी। स्वयें न व्हावें मद्यपानी। तें यज्ञशेष अवघ्राणीं। परी सर्वथा वदनीं घालूं नये॥ ३८॥ हे विषयांचें त्रिविध विंदान। मैथुन-मांसभक्षण-सुरापान। यदर्थीं निवृत्तीचि प्रमाण। हें मनोगत पूर्ण वेदाचें॥ ३९॥ विषयांपासूनि निवृत्ती। वेद विभागें हेंचि द्योती। परी धरावी विषयासक्ती। हे वेदोक्ति सर्वथा न घडे॥ २४०॥ वेंचोनियां निजधन। करोनियां विवाह यज्ञ। सेवावें मद्य-मांस-मैथुन। हें वेदवचन कदा न घडे॥ ४१॥
धनं च धर्मैकफलं यतो वै
ज्ञानं सविज्ञानमनुप्रशान्ति।
गृहेषु युञ्जन्ति कलेवरस्य
मृत्युं न पश्यन्ति दुरन्तवीर्यम्॥ १२॥
नायकोनि भगवत्कथा। ज्ञानाभिमानी नाडले तत्त्वतां। धनें परमार्थ यावा हाता। तोही स्वधर्मता न लाविती धर्मीं॥ ४२॥ विषयांचिया कामना। सर्वस्वें वेंचिती धना। तेंचि धर्मार्थ वेंचितां जाणा। सांडिती प्राणा कवडीसाठीं॥ ४३॥ जया धनाचेनि पांगें। हा धर्मचि आलासे निजांगें। जेवीं पायाळाचेनि योगें। महानिधि वेगें आतुडे हातीं॥ ४४॥ बीज तेथें सद्रुम फळ। चंदन तेथें परिमळ। जळाचे ठायीं केवळ। नांदती सकळ रसस्वाद॥ ४५॥ देह तेथ असे कर्म। रूप तेथ वसे नाम। धन तेथ उत्तमोत्तम। सकळ धर्म सदा वसती॥ ४६॥ जेवीं एकादशीव्रतयोगें। जागरीं गीतनृत्यपांगें। तुष्टला देवो लागवेगें। आतुडे धनयोगें निजभक्तां करीं॥ ४७॥ तेवीं धनाचिया पाठोवाठीं। परम धर्मेंसी पडे गांठी। धर्म तेथ उठाउठी। ज्ञानाची भेटी विज्ञानेंसीं॥ ४८॥ चंद्रास्तव वाढती कळा। जीवनास्तव जिव्हाळा। तेवीं धनास्तव सोज्ज्वळा। धर्माचा सोहळा धार्मिकां घरीं॥ ४९॥ धर्म तेथ शुद्ध ज्ञान। ज्ञान तेथ विज्ञान। विज्ञान तेथ समाधान। शांति संपूर्ण नांदे तेथ॥ २५०॥ एवढें फळ ज्या धनापासीं। तें मूर्ख वेंचिती विषयांसी। देहलोभें भुललीं पिसीं। अंगीच्या मृत्यूसी विसरले॥ ५१॥ जळते घरीं ठेवा ठेवणें। मरत्या देहा सुरवाड करणें। तो नागवला वेदु म्हणे। तें वेदाचें बोलणें नायके कोणी॥ ५२॥ उपजलेनि दिवस-दिवसें। देहातें काळु ग्रासीतसे। हें नित्य नवें मरण कैसें। देहलोभवशें विसरले॥ ५३॥ ज्याचे त्या देखतां कैसा। काळु गळी बाळवयसा। मग तारुण्याची दशा। मुरडूनि घसा ग्रासी काळ॥ ५४॥ गिळोनियां तारुण्यपण। आणी वार्धक्य कंपायमान। ऐसें काळाचें विंदान। दुर्धर पूर्ण ब्रह्मादिकां॥ ५५॥ जयाचेनि चपेटघातें। मरण आणी अमरांतें। मा मूर्ख तेथें जीवितातें। अक्षय चित्तें दृढ मानिती॥ ५६॥ मूळीं देहचि तंव अनित्य। मा तेथींचे भोग काय शाश्वत। परी धन वेंचूनि विषयार्थ। भुलले जाणा भ्रांत स्त्रीलोभें॥ ५७॥ ऐसे नश्वर भोग जगीं। ते भोगावया रिघावें स्वर्गीं। तदर्थ प्रवर्तती यागीं। लागवेगीं भोगेच्छा॥ ५८॥ सुख भोगावया वेगीं। पतंगु जेवीं उडी घाली आगीं। तेवीं इहामुत्रभोगीं। पतनालागीं पावती॥ ५९॥ स्त्री-आमिष-मद्यपान। हे वेदोक्त भोग जाण। तेथ केवीं घडे पतन। तें वेदविधान नेणती मूर्ख॥ २६०॥
यद् घ्राणभक्षो विहित: सुराया-
स्तथा पशोरालभनं न हिंसा।
एवं व्यवाय: प्रजया न रत्या
इमं विशुद्धं न विदु: स्वधर्मम्॥ १३॥
वेदविहित कर्माचरण। तेथ सर्वदा नव्हे पतन। जेथ चुुके वेदविधान। तेथें पावे पतन सज्ञान॥ ६१॥ वेदींच्या अर्थवादासरिसा। मनीं बांधोनि भोगाशा। यज्ञमिषें पशुहिंसा। भोगलिप्सा करूं धांवती॥ ६२॥ वेदें बोलिलें ‘आलभन’। त्या नांव म्हणती पशुहनन। हें सकाम मानिती विधान। निष्कामा हनन कदा न घडे॥ ६३॥ निष्कामासी यागयजन। स्वधर्मार्थ करावे यज्ञ। तेथ पशूचें आलभन। सर्वथा हनन करूं नये॥ ६४॥ पशूचें करूं नये हनन। देवतोद्देशें अंगस्पर्शन। या नांव बोलिजे ‘आलभन’। हें यज्ञाचरण निष्काम॥ ६५॥ हरिश्चंद्राच्या यागीं। शुन:शेप-पशुप्रसंगीं। तेणें घावो लागों नेदितां अंगीं। वेदोक्त प्रयोगीं यज्ञसिद्धी केली॥ ६६॥ वेदोक्त मंत्रभागार्थ। देव सुखी करोनि समस्त। आपण झाला निर्मुक्त। हा ऋग्वेदार्थ ब्राह्मणीं॥ ६७॥ यापरी पशुघात। यज्ञीं न लगे निश्चित। तो हरिश्चंद्र यागार्थ। पशुघात निवारी॥ ६८॥ तेथ मीमांसकांचें मत। देवतोद्देशें जो पशुघात। या नांव ‘आलभन’ म्हणत। स्वर्गफलार्थ आवश्यक॥ ६९॥ केवळ मांसभक्षणार्थ। जे करिती पशुघात। हिंसादोष तेथें प्राप्त। ऐसें बोलत मीमांसक॥ २७०॥ देवतोद्देशें पशूंचा घात। तेणें स्वर्गभोग होय प्राप्त। तोही भोगक्षयें क्षया जात। तेणें हिंसा प्राप्त याज्ञिकां॥ ७१॥ याग करितां ‘सौत्रामणी’। पुरोडाश घ्यावा अवघ्राणीं। परी प्रवर्तावें सुरापानीं। हें वेदविधानीं असेना॥ ७२॥ एवं जेथें पशुहनन। तें कर्म सदोष पूर्ण। यालागीं तेथ अध:पतन। बोलिलें जाण याज्ञिकांसी॥ ७३॥ वेदें विहिलें पाणिग्रहण। तें प्रजार्थ स्वदारागमन। परी रत्यर्थ नित्य मैथुन। हे वेदाज्ञा जाण असेना॥ ७४॥ मद्य-मांस-मैथुनप्रसंग। स्वइच्छा न करावया भोग। वेदें द्योतिला विवाह याग। भोगत्यागनियमार्थ॥ ७५॥ नेणोनि ऐसिया शुद्ध धर्मा। यागमिषें अधर्मा। प्रवर्तोनि काम्य-कर्मा। भोग संभ्रमा भोगिती मूर्ख॥ ७६॥
ये त्वनेवंविदोऽसन्त: स्तब्धा: सदभिमानिन:।
पशून्द्रुह्यन्ति विस्रब्धा: प्रेत्य खादन्ति ते च तान्॥ १४॥
नेणोनि शुद्ध वेदविधानातें। अतिगर्वाचेनि उद्धतें। आपणियां मानूनि ज्ञाते। अविधी पशूतें घातु करिती॥ ७७॥ केवळ अभिचारमतें। पावोनि सकळ भोगातें। ऐशिया मानोनि विश्वासातें। स्वेच्छा पशूतें घात करिती॥ ७८॥ अविधी पशूतें वधिती। त्या याज्ञिकांचे देहांतीं। मारिले पशू मारूं येती। झळकत काती घेऊनियां॥ ७९॥ एवं निमालिया याज्ञिकांसी। भक्षिले पशु भक्षिती त्यांसी। जैसें सेविलें विष प्राणियांसी। ग्रासी प्राणांसी समूळ॥ २८०॥
द्विषन्त: परकायेषु स्वात्मानं हरिमीश्वरम्।
मृतके सानुबन्धेऽस्मिन्बद्धस्नेहा: पतन्त्यध:॥ १५॥
परमात्मा जो श्रीहरी। तो अंतर्यामी सर्व शरीरीं। तेथ पराचा जो द्वेषु करी। तेणें द्वेषिला हरि निजात्मा॥ ८१॥ परासी जो करी अपघातु। तेणें केला निजात्मघातु। त्यासी सकुटुंब अध:पातु। रौरवांतु ते बुडती॥ ८२॥
ये कैवल्यमसम्प्राप्ता ये चातीताश्च मूढताम्।
त्रैवर्गिका ह्यक्षणिका आत्मानं घातयन्ति ते॥ १६॥
सज्ञानी स्वतां तरती। अज्ञानी सज्ञानां शरण येती। तेणें त्यांसी कैवल्यप्राप्ती। त्यांच्या वचनोक्तिविश्वासें॥ ८३॥ जे अज्ञान ना सज्ञान। ज्यांसी केवळ ज्ञानाभिमान। ज्यांचें विषयीं लोलुप मन। ते पुरुष जाण आत्मघाती॥ ८४॥ साधावया अर्थ काम। जे करिती अभिचारधर्म। हें त्रैवर्णिक घोर कर्म। आत्मघाती परम ज्याचें त्यासी॥ ८५॥ देहाचिया गोमटिया। जे करिती अभिचारक्रिया। तेणें कर्में आपआपणियां। सृजिला राया निजघातु॥ ८६॥ जो स्वयें बैसली खांदी तोडी। तो खांदीसहित पडे बुडीं। तेवीं काम्यकर्माच्या वोढी। क्रियेसी रोकडीं अध:पात॥ ८७॥
एत आत्महनोऽशान्ता अज्ञाने ज्ञानमानिन:।
सीदन्त्यकृतकृत्या वै कालध्वस्तमनोरथा:॥ १७॥
काम क्रोधी अतिअद्भुत। क्रूरकर्मी जे अशांत। तिहीं आपआपणिया अनहित। निजात्मघात जोडिला॥ ८८॥ स्वयें कर्म करिती अविधी। तेचि म्हणती शुद्ध विधी। अज्ञान तेंचि प्रतिपादी। ज्ञान त्रिशुद्धी म्हणोनियां॥ ८९॥ ते काम्यकर्मीं छळिले। कां महामोहें आकळिले। गर्वदंभादि भेदें खिळिले। काळसर्पें गिळिले सद्बुद्धीसीं॥ २९०॥ गर्वादिज्वरितमुखें। गोडपणीं कडू ठाके। विषप्राय विषयसुखें। अतिहरिखें सेविती॥ ९१॥ ऐशा विषयांलागीं पहाहो। आप्त मानूनि निजदेहो। रचूनि नाना उपावो। अर्थसंग्रहो स्वयें करिती॥ ९२॥
हित्वात्यायासरचिता गृहापत्यसुहृच्छ्रिय:।
तमो विशन्त्यनिच्छन्तो वासुदेवपराङ्मुखा:॥ १८॥
मरणेंसी झटें घेत। श्री मेळविती श्रीमंत। गृह दारा पुत्र वित्त। नाना वस्तुजातसंग्रहो॥ ९३॥ ऐसे भोग आयासयुक्त। सांडूनि ज्ञानगर्वी समस्त। ज्ञानाभिमानें नेइजेत। अंधतमांत अतिगर्वें॥ ९४॥ जेथ अंधाराचे डोळे। होऊनि ठाकती आंधळे। तेथ मोहरात्रीचें काळें। अंधतममेळें अधिक कांटे॥ ९५॥ जया अंधारातें प्रकाशूं येतां। निखिळ काळा होय सविता। जेथ गाढ मूढ अवस्था। अतिमौढॺता स्वयें पावे॥ ९६॥ जेथ सुषुप्तीसी झोंप लागे। आळसु आळसिजे सर्वांगें। तेथ घर बांधोनि निजांगें। निंदा क्रोध दोघे सदा वसती॥ ९७॥ तेथ भजनविमुख नरां। अध:पतन अभिमानद्वारा। जेवीं अथावीं पडिला चिरा। तेवीं बाहेरा निघों न शके॥ ९८॥ जे वासुदेवीं सदा विमुख। ज्यांसी हरिभजनीं नाहीं हरिख। त्यांची दशा हे अधोमुख। अतिदु:खें दु:ख भोगिती॥ ९९॥ ऐशी अभक्तांची गति। सांगितली आहाच स्थिति। वांचूनि त्यांची दुर्गति। वाग्देवता भीती स्पष्ट वदतां॥ ३००॥ अभक्तांची गति बोलणें। यापरीस चांग मुकें होणें। प्राणु जावो कां सर्व प्राणें। परी ते दोष कोणें बोलावे॥ १॥ राया तुझिया प्रश्नकाजीं। हे दशा बोलणें पडे आजी। येऱ्हवीं अभक्तवादें आम्हांमाजीं। वाचेची पांजी विटाळली नाहीं॥ २॥ यावरी आतां नृपनाथा। वक्ता आणि समस्त श्रोतां। राम-स्मरणें तत्त्वतां। वाचेसी प्रायश्चित्ता सवें कीजे॥ ३॥ ऐकोनि अभक्तांची गती। अतिशयेंसीं दु:खप्राप्ती। राजा कंटाळला चित्तीं। यालागीं निश्चितीं हरिनाम स्मरे॥ ४॥ ज्या स्मरविलें हरीतें। तोचि यासी पुसों येथें। युगायुगीं भक्त त्यातें। कोणे विधीतें भजन करिती॥ ५॥
राजोवाच
कस्मिन्काले स भगवान् किं वर्ण: कीदृशो नृभि:।
नाम्ना वा केन विधिना पूज्यते तदिहोच्यताम्॥ १९॥
ज्याचेनि स्मरणें तत्त्वतां। कर्माकर्में नुधविती माथा। त्या भगवंताची कथा। माझिया हितालागीं सांगा॥ ६॥ जो परमात्मा श्रीहरी। तो सृष्टॺादि युगयुगांतरीं। कोणें नामें रूपें वर्णाकारीं। भक्त कैशापरी पूजिती॥ ७॥ आणि ते काळींच्या प्रजा। कैसेनि यजिती अधोक्षजा। कवणे विधीं करिती पूजा। तें योगिराजा सांगिजे॥ ८॥ तुमचे मुखींचें कृपावचन। त्यापुढें अमृतही गौण। वचनें परमानंद पूर्ण। जन्ममरण उच्छेदी॥ ९॥ त्याहीमाजीं भगवद्गुण। युगानुवर्ती नारायण। त्याचें भजनपूजनविधान। कृपा करून सांगिजे स्वामी॥ ३१०॥ ऐकोनि रायाचें वचन। संतोषले अवघे जण। जाणोनि हरिगुणांचा प्रश्न। कनिष्ठ ‘करभाजन’ बोलता झाला॥ ११॥
करभाजन उवाच
कृतं त्रेता द्वापरं च कलिरित्येषु केशव:।
नानावर्णाभिधाकारो नानैव विधिनेज्यते॥ २०॥
नाना वर्ण नानाकारें। नाना नाम नानोपचारें। कृता-त्रेता-द्वापरें। भक्त निर्धारें केशवु यजिती॥ १२॥ ‘क’ कार ब्रह्मा ‘व’ कार विष्णु। ‘श’ कार स्वयें त्रिनयनु। केशव तो गुणविहीनु। प्रकाश पूर्ण तिहींचा॥ १३॥ केशव केवळ अर्धमात्रा। न ये व्यक्ताव्यक्त उच्चारा। व्याप्येंवीण व्यापकु खरा। सबाह्याभ्यंतरा एकत्वें॥ १४॥ तोचि युगपरत्वें रूप नाम। भजनविधि क्रियाधर्म। भक्त पूजिती पुरुषोत्तम। तो अनुक्रम अवधारीं॥ १५॥
कृते शुक्लश्चतुर्बाहुर्जटिलो वल्कलाम्बर:।
कृष्णाजिनोपवीताक्षान् बिभ्रद्दण्डकमण्डलू॥ २१॥
कृतयुगीं श्वेतवर्णधर। जटिल चतुर्भुज वल्कलांबर। दंडकमंडल्वंकित कर। अजिन ब्रह्मसूत्र अक्षमाला हातीं॥ १६॥ ब्रह्मचर्यें दृढव्रत। ये चिन्हीं चिन्हांकित। परमात्मा मूर्तिमंत। भक्त यापरी यजिती॥ १७॥
मनुष्यास्तु तदा शान्ता निर्वैरा: सुहृद: समा:।
यजन्ति तपसा देवं शमेन च दमेन च॥ २२॥
ते काळींचे सकळ नर। सदा शांत निर्वैर। समताबुद्धी निरंतर। सुहृन्मित्र परस्परें॥ १८॥ तैं तपें करावें देवयजन। त्या तपाचें मुख्य लक्षण। शम-दम साधूनि संपूर्ण। भगवद्भजन स्वयें करिती॥ १९॥ तैं देवाचें नामोच्चरण। दशधा नामीं नामस्मरण। तेंचि नाम कोण कोण। ऐक सावधान नृपनाथा॥ ३२०॥
हंस: सुपर्णो वैकुण्ठो धर्मो योगेश्वरोऽमल:।
ईश्वर: पुरुषोऽव्यक्त: परमात्मेति गीयते॥ २३॥
हंस सुपर्ण वैकुंठ। धर्म योगेश्वर श्रेष्ठ। अमल ईश्वर वरिष्ठ। पुरुष अव्यक्त नामपाठ परमात्मा म्हणती॥ २१॥ ते काळींचे भक्त श्रेष्ठ। या नामांचा नामपाठ। गायन करिती घडघडाट। भवसंकट निर्दाळिती॥ २२॥ हें कृतयुगींचें यजन। तुज सांगितलें संपूर्ण। आतां त्रेतायुगींचें भजन। मूर्तीचेंध्यान तें ऐक॥ २३॥
त्रेतायां रक्तवर्णोऽसौ चतुर्बाहुस्त्रिमेखल:।
हिरण्यकेशस्त्रय्यात्मा स्रुक्स्रुवाद्युपलक्षण:॥ २४॥
त्रेतीं यज्ञमूर्तिं पुरुषोत्तमु। रक्तवर्ण ज्वलनोपमु। पिंगटकेश निर्धूमु। देवदेवोत्तमुचतुर्बाहू॥ २४॥ तया यज्ञपुरुषा निर्मळा। त्रिगुणांची त्रिमेखळा। वेदत्रयीचा पूर्णमेळा। मूर्तीचा सोहळा तदात्मकचि॥ २५॥ स्रुक-स्रुवा-पाणिग्रहण। हेंचि तयाचें उपलक्षण। त्रेतायुगीं नारायण। येणें रूपें जाण निजभक्त ध्याती॥ २६॥
तं तदा मनुजा देवं सर्वदेवमयं हरिम्।
यजन्ति विद्यया त्रय्या धर्मिष्ठा ब्रह्मवादिन:॥ २५॥
तैंचे जे मनुष्य जाण। त्रिवेदीं करिती भजन। सर्वदेवस्वरूप हरि पूर्ण। यापरी यजन त्रेतायुगीं॥ २७॥ त्रेतायुगीं सर्वही नर। वेदोक्तीं नित्य सादर। सर्वही भजनतत्पर। धर्मिष्ठ समग्र अतिधार्मिक॥ २८॥ ते धर्मिष्ठ धार्मिक जन। अष्टधा नामीं नामस्मरण। गजरें करिती सदा पठण। तें नामाभिधान ऐक राया॥ २९॥
विष्णुर्यज्ञ: पृश्निगर्भ: सर्वदेव उरुक्रम:।
वृषाकपिर्जयन्तश्च उरुगाय इतीर्यते॥ २६॥
विष्णु यज्ञ पृश्निजन्म। सर्वदेव उरुक्रम। वृषाकपि जयंतनाम। उरुगाय परम नामें स्मरती॥ ३३०॥ द्वापरीं भगवद्धॺान। ते युगींचें पूजाविधान। भक्त कैसें करिती भजन। नामस्मरण तें ऐक॥ ३१॥
द्वापरे भगवान् श्याम: पीतवासा निजायुध:।
श्रीवत्सादिभिरङ्कैश्च लक्षणैरुपलक्षित:॥ २७॥
द्वापरीं घनश्यामवर्ण। अतसीपुष्पप्रभासमान। पीतांबरपरिधान। श्रीवत्सचिन्हअंकित॥ ३२॥ शंख-चक्र-पद्म-गदा। चारी भुजा सायुधा। इहीं लक्षणीं गोविंदा। लक्षिती सदा निजभक्त॥ ३३॥
तं तदा पुरुषं मर्त्या महाराजोपलक्षणम्।
यजन्ति वेदतन्त्राभ्यां परं जिज्ञासवो नृप॥ २८॥
शशांकछत्र मणि चामर। राजलक्षणीं राजोपचार। यापरी द्वापरींचे नर। अतिसादर पूजेसी॥ ३४॥ शीघ्र पावावया परात्पर। वैदिक तांत्रिक पूजा मिश्र। तत्त्वजिज्ञासु करिती नर। भजनतत्पर या रीतीं॥ ३५॥ ते काळीचें नामस्मरण। जेणें होई कलिमलदहन। त्या नामांचें अभिधान। ऐक सांगेन नृपनाथा॥ ३६॥
नमस्ते वासुदेवाय नम: सङ्कर्षणाय च।
प्रद्युम्नायानिरुद्धाय तुभ्यं भगवते नम:॥ २९॥
‘वासुदेवा’ तुज लोटांगण। ‘संकर्षणा’ तुज नमन। ‘प्रद्युम्ना’ प्रणाम पूर्ण। अभिनंदन ‘अनिरुद्धा’॥ ३७॥
नारायणाय ऋषये पुरुषाय महात्मने।
विश्वेश्वराय विश्वाय सर्वभूतात्मने नम:॥ ३०॥
‘नारायणा’ ऋषिवरा। ‘महापुरुषा’ सुरेंद्रा। ‘विश्वरूपा’ विश्वेश्वरा। महात्म्या श्रीवरा नमन तुज॥ ३८॥ ‘सर्व भूतीं तूं भूतात्मा’। तुज नमो पुरुषोत्तमा। द्वापरीं ऐशिया नामां। नृपोत्तमा सदा स्मरती॥ ३९॥ त्या नामांच्या पाठा। तेणें देवासी संतोष मोठा। वेगीं सांडोनि वैकुंठा। धावे अवचटा कीर्तनामाजीं॥ ३४०॥
इति द्वापर उर्वीश स्तुवन्ति जगदीश्वरम्।
नानातन्त्रविधानेन कलावपि यथा शृणु॥ ३१॥
यांहीं नामीं स्तुतिस्तवन। द्वापरींचे करिती जन। आतां कलियुगींचें भजन। तंत्रोक्त विधान ऐक राया॥ ४१॥
कृष्णवर्णं त्विषाकृष्णं साङ्गोपाङ्गास्त्रपार्षदम्।
यज्ञै: सङ्कीर्तनप्रायैर्यजन्ति हि सुमेधस:॥ ३२॥
कलियुगीं श्रीकृष्णदेवो। वर्णूं कृष्णवर्णप्रभावो। प्रभा इंद्रनीळकीळ-समुदावो। मूर्ती तशी पहा हो शोभायमान॥ ४२॥ मूूर्ति सर्वावयवीं साङ्ग। वेणुविषाणादि उपांग। चारी भुजा पराक्रमी चांग। आयुधें अव्यंग शंखचक्रादिक॥ ४३॥ पृष्ठभागीं निजपार्षद। नंदसुनंदादि सायुध। कलियुगीं प्रज्ञाप्रबुद्ध। यापरी गोविंद चिंतिती सदा॥ ४४॥ मधुपर्कादिक विधान। साङ्ग केलें जें पूजन। तेंही मानोनियां गौण। आवडे कीर्तन कलियुगीं कृष्णा॥ ४५॥ नवल कैसें राजाधिराजा। कीर्तन तेचि महापूजा। ऐशी आवडी अधोक्षजा। कीर्तनें गरुडध्वजा उल्हासु सदा॥ ४६॥ कीर्तन पढियें गोविंदा। यालागीं सन्मानी नारदा। तो कृष्णकीर्ती पढे सदा। नामानुवादा गर्जतु॥ ४७॥ कीर्तन करितां नामानुवाद। संकटीं रक्षिला प्रल्हाद। कीर्तनें तुष्टे गोविंद। छेदी भवबंध दासांचा॥ ४८॥ गजेंद्रें नामस्मरण। करितां पावला नारायण। त्याचें तोडोनि भवबंधन। निजधामा आपण स्वयें नेला॥ ४९॥ अधमाधम अतिवोखटी। तोंडा रामु आला अवचटीं। ते गणिका कीं वैकुंठीं। कृष्णें नामासाठीं सरती केली॥ ३५०॥ महादोषांचा मरगळा। अतिनष्ट अजामेळा। तोही नामें निर्मळ केला। प्रतापु आगळा नामाचा॥ ५१॥ नामें विनटलीं गोविंदीं। ते संकटीं राखिली द्रौपदी। नाम तोडी आधिव्याधी। जाण त्रिशुद्धी दासांची॥ ५२॥ अंतरशुद्धीचें कारण। मुख्यत्वें हरिकीर्तन। नामापरतें साधन। सर्वथा आन असेना॥ ५३॥ कीर्तनीं हरीची आवडी कैशी। वत्सालागीं धेनु जैशी। कां न विसंबे जेवीं माशी। मोहळासी क्षणार्ध॥ ५४॥ तेवीं नाम स्मरतया भक्ता। अतिशयें आवडी अच्युता। दासांची अणुमात्र अवस्था। निजांगें सर्वथा निवारी स्वयें॥ ५५॥ यालागी हरिकीर्तनीं गोडी। जयासी लागली धडफुडी। त्यासी नाना साधनांच्या वोढी। सोसावया सांकडीं कारण नाहीं॥ ५६॥ ज्यासी कीर्तनीं कथाकथनीं। चौगुण आल्हाद उपजे मनीं। तो उद्धरला सर्व साधनीं। पवित्र अवनी त्याचेनी॥ ५७॥ एकचि जरी नाम वाचे। सदा वसे श्रीरामाचें। तरी पर्वत छेदोनि पापाचे। परमानंदाचें निजसुख पावे॥ ५८॥ आवडीं करितां हरिकीर्तन। हृदयीं प्रगटे श्रीजनार्दन। त्याहोनि श्रेष्ठ साधन। सर्वथा आन असेना॥ ५९॥ थोर कीर्तनाचें सुख। निष्ठा तुष्टे यदुनायक। कीर्तनें तरले असंख्य। साबडे लोक हरिनामें॥ ३६०॥ यालागीं कीर्तनाहूनि थोर। आन साधन नाहीं सधर। मा कवण हेतू पामर। कीर्तन नर निंदिती॥ ६१॥ एवं नामकीर्तनीं विमुख। ते स्वप्नींही न देखती सुख। कीर्तनद्वेषें मूर्ख। अतिदु:ख भोगिती॥ ६२॥ ज्यांचे हृदयीं द्वेषसंचार। जळो जळो त्याचा आचार। सर्व काळ द्वेषी नर। दु:ख दुस्तर भोगिती॥ ६३॥ कलियुगीं जे बुद्धिमंत। ते नामकीर्तनीं सदा निरत। गौरवूनि नाम स्मरत। हर्षयुक्त सप्रेम॥ ६४॥ नाना अवतार अतिगहन। त्यांत श्रीराम कां भगवान् कृष्ण। यांचें चरित्र अतिपावन। त्यांचें चरणवंदनसांगत॥ ६५॥
ध्येयं सदा परिभवघ्नमभीष्टदोहं
तीर्थास्पदं शिवविरिञ्चनुतं शरण्यम्।
भृत्यार्तिहं प्रणतपाल भवाब्धिपोतं
वन्दे महापुरुष ते चरणारविन्दम्॥ ३३॥
लय लक्षें ध्यानलक्षणें। देव देवी ध्येय ध्यानें। तृणप्राय केलीं जेणें। हरिचरणस्मरणें तत्काळ॥ ६६॥ यालागीं ध्यानासी तें वरिष्ठ। ध्यातां छेदी कल्पनादि कष्ट। भक्तांचें अतिअभीष्ट। मनोरथ इष्ट सदा पुरवी॥ ६७॥ नित्य ध्यातां हरीचे चरण। करी भक्तदेहरोगदु:खहरण। इतुकेंच राया नव्हे जाण। करी निर्दळण भवरोगा॥ ६८॥ भक्तांचे पुरवी मनोरथ। ते तूं म्हणसी विषययुक्त। परमानंदें नित्य तृप्त। निववी निजभक्त चरणामृतें॥ ६९॥ वानूं चरणांची पवित्रता। शिवु पायवणी वाहे माथां। जे जन्मभूमी सकळ तीर्थां। पवित्रपण भक्तां चरणध्यानें॥ ३७०॥ अवचटें लागल्या चरण। पवित्र झाले पाषाण। मा जे जाणोनि करिती ध्यान। त्यांचें पवित्रपण काय वानूं॥ ७१॥ जो सदा शत्रुत्वें वर्ततां। जेणें चोरून नेली निजकांता। त्याच्या बंधू शरणागता। दिधली आत्मता निजभावें॥ ७२॥ कोरडी आत्मतेची थोरी। तैशी नव्हे गा नृपकेसरी। देऊनि सुवर्णाची नगरी। अचळतेवरी स्थापिला॥ ७३॥ यालागीं शरणागतां शरण्य। सत्य जाण हरीचे चरण। यापरतें निर्भय स्थान। नाहीं आन निजभक्तां॥ ७४॥ भक्तांची अणुमात्र व्यथा। क्षण एक न साहवे भगवंता। प्रल्हादाची अतिदु:खता। होय निवारिता निजांगें॥ ७५॥ दावाग्नि गिळूनि अंतरीं। गोपाळ राखिले वनांतरीं। पांडव जळतां जोहरीं। काढिले बाहेरी विवरद्वारें॥ ७६॥ करूनि सर्वांगाचा वोढा। नित्य निवारी भक्तांची पीडा। जो कां भक्तांचिया भिडा। रणरंगीं फुडां वागवी रथु॥ ७७॥ ते चरण वंदितां साष्टांगीं। भक्तां प्रतिपाळी उत्संगीं। ऐसा प्रणतपाळु कृपावोघीं। दुसरा जगीं असेना॥ ७८॥ तरावया भवाब्धि प्रबळ। चरणांची नाव अडंडळ। अनन्यशरण सकळ। तारी तत्काळ चरणानुरागें॥ ७९॥ ते महापुरुषाचे श्रीचरण। शरणागता निजशरण्य। ज्यांचें सनकादिक ध्यान। करिती अभिवंदन सद्भावें॥ ३८०॥ अगाध चरणांचें महिमान। वानितां वेदां पडिलें मौन। ब्रह्मा सदाशिव आपण। करितां स्तवन तटस्थ ठेले॥ ८१॥ अगम्य अतर्क्य श्रीचरण। जाणोनि ब्रह्मादिक ईशान। साष्टांगें अभिवंदन। करूनियां स्तवन करिती ऐसें॥ ८२॥
त्यक्त्वा सुदुस्त्यजसुरेप्सितराज्यलक्ष्मीं
धर्मिष्ठ आर्यवचसा यदगादरण्यम्।
मायामृगं दयितयेप्सितमन्वधावद्
वन्दे महापुरुष ते चरणारविन्दम्॥ ३४॥
जे राज्यश्रियेकारणें। अमर लोलंगत मनें। तें राज्य श्रीरामें त्यागणें। वचनाकारणें पित्याच्या॥ ८३॥ श्रीराम धर्मिष्ठ चोख। पितृवचनप्रतिपाळक। उद्भट राज्य सांडोनि देख। निघे एकाएक वनवासा॥ ८४॥ वनवासा चरणीं जातां। सवें घेतली प्रिया सीता। येणें बोलें स्त्रीकामता। श्रोतीं सर्वथा न मानावी॥ ८५॥ तरी केवळ स्त्री नव्हे सीता। ते निजभक्त जाण तत्त्वतां। सांडूनि राजभोगासमस्तां। सेवेच्या निजस्वार्था वना आली॥ ८६॥ राज्यीं असतां रघुवीरें। दास्य दासां वांटलें अधिकारें। ते मी एकली एकसरें। सेवा वनांतरीं अवघीचि करीन॥ ८७॥ ते सेवा यावया हाता। सकळ सेवेच्या निजस्वार्था। चरणचालीं चालोनि सीता। आली तत्त्वतां वनवासासी॥ ८८॥ कैसें श्रीरामसेवेचें सुख। चरणीं चालतां नाठवे दु:ख। विसरली मायामाहेरपक्ष। अत्यंत हरिखसेवेचा॥ ८९॥ ऐशिया मनोगत-सद्भावा। वना आली करावया सेवा। श्रीराम जाणे भक्तभावा। येरां देवां दानवां कळेना॥ ३९०॥ निजभक्तांचें मनोगत। जाणता एक रघुनाथ। कां श्रीरामसेवेचा स्वार्थ। जाणती निजभक्त भजनानंदें॥ ९१॥ भगवद्भजनाचें सुख। भक्त जाणती भाविक। भावेंवीण भजनसुख। अनोळख अभाविकां॥ ९२॥ पूर्ण भाविक भक्त सीता। हें कळलेंसे रघुनाथा। यालागीं तिचिया वचनार्था। होय धांवता मृगामागें॥ ९३॥ मायिक मृगाचें सुवर्णभान। जरी जाणे रघुनंदन। तरी भक्तलळे पाळण। करी धावन मृगामागें॥ ९४॥ बाळकाचेनि छंदें जाण। जेवीं माउली नाचे आपण। तेवीं मायामृगापाठीं धावन। करी रघुनंदन निजभक्तवाक्यें॥ ९५॥ जो राम वानरांच्या गोष्टी। ऐकतां विकल्प न धरीं पोटीं। तो सीतेच्या वचनासाठीं। धांवे मृगापाठीं नवल कायी॥ ९६॥ भलतैसें भक्तवचन। मिथ्या न म्हणे रघुनंदन। यालागीं निजचरणीं धावन। करी आपण मृगामागें॥ ९७॥ एवं भक्तवाक्यें उठाउठी। जो पायीं धांवे मृगापाठीं। ज्याचे चरणरेणु अणुकुटी। वंदिती मुकुटीं शिवादि सर्व॥ ९८॥ तो मृगामागें धांवतां जाण। पावन केले पाषाण। त्याच्या चरणां अनन्य शरण। अभिवंदन सद्भावें॥ ९९॥ एवं महापुरुषाचे चरण। अभिवंदनें करिती स्तवन। कलियुगीं कीर्तनें जन। परम पावन नित्ययुक्त॥ ४००॥
एवं युगानुरूपाभ्यां भगवान् युगवर्तिभि:।
मनुजैरिज्यते राजन् श्रेयसामीश्वरो हरि:॥ ३५॥
एवं कृतादि-कलियुगवरी। इहीं नामीं रूपीं अवतारीं। सद्भावें तैंच्या नरीं। भजिजे श्रीहरी श्रेयार्थ॥ १॥ त्यांमाजीं कलियुगाची थोरी। वानिजे सद्भावें ऋषीश्वरीं। येथें हरिकीर्तनावरी। मुक्ती चारी वोळगण्या॥ २॥
कलिं सभाजयन्त्यार्या गुणज्ञा: सारभागिन:।
यत्र सङ्कीर्तनेनैव सर्व: स्वार्थोऽभिलभ्यते॥ ३६॥
अवधारीं राया सर्वज्ञा। धन्य धन्य कलियुग जाणा। जेथ सर्व स्वार्थ हरिकीर्तना-। नामस्मरणासाठीं होती॥ ३॥ कलियुगीं दोष बहुत। केवीं कीर्तनें होय स्वार्थ। तेथें दोषत्यागें जे गुण घेत। ते नित्यमुक्त हरिकीर्तनीं॥ ४॥ हरिकीर्तनें शुद्ध चित्त। दोषत्यागें गुण संग्रहीत। ऐसे सारभागी कलियुगांत। परममुक्त हरिकीर्तने॥ ५॥ कलीच्या गुणांतें जाणते। नामें मोक्ष जोडणें येथें। जाणोनि करिती कीर्तनातें। ते जाण निश्चितें नित्यमुक्त॥ ६॥ कलियुगीं हेंचि सार। नाम स्मरावें निरंतर। करिती नामाचा निजगजर। ते मुक्त नर नृपनाथा॥ ७॥
(संमत श्लोक) ध्यायन्कृते यजन्यज्ञैस्त्रेतायां द्वापरेऽर्चयन्।
यदाप्नोति तदाप्नोति कलौ संकीर्त्य केशवम्॥ १॥
कृतयुगीं शमदमादिसाधन। त्रेतायुगीं वेदोक्त यज्ञ। द्वापरीं आगमोक्त पूजन। तंत्रविधान विधियुक्त॥ ८॥ यापरी त्रियुगीं जना। परम संकट साधना। करितांही परी मना। अणुमात्र जाणा उपरमु नव्हे॥ ९॥ तीं अवघींच साधनें। कलीनें लाजविलीं कीर्तनें। जेथ गातां नाचतां आपणें। वश्य करणें परमात्मा॥ ४१०॥ आखरीं हुंबळी गुणें। ऐकतां गोवळांचें गाणें। देव भुलला जीवेंप्राणें। त्यांसवें नाचणें स्वानंदें॥ ११॥ कृष्णा कान्हो गोपाळा। या आरुष नामांचा चाळा। घेऊन गर्जती वेळोवेळां। तेणें घनसांवळा सुखावे॥ १२॥ तेणें सुखाचेनि संतोषें। देवो परमानंदें उल्हासे। एवं कलियुगीं कीर्तनवशें। भक्त अनायासें उद्धरती॥ १३॥ कीर्तनआवर्तनमेळीं। जळती पापांच्या वडवाळी। भक्त उद्धरती तत्काळीं। हरिनामें कलि दाटुगा॥ १४॥ कलियुगीं हेचि थोरी। नामसंकीर्तनावारी। चहूं वर्णां मुक्त करी। तेथ न विचारी स्त्री शूद्र॥ १५॥ वेदु अत्यंत कृपणु जाला। त्रिवर्णांचे कानीं लागला। स्त्रीशूद्रादिकांसी अबोला। धरूनि ठेला अद्यापि॥ १६॥ तें वेदाचें अतिन्यून। उद्धरीं हरिनामकीर्तन। स्त्री शूद्र अंत्यज जन। उद्धरण हरिनामें॥ १७॥ कीर्तनें स्वधर्मु वाढे। कीर्तनें स्वधर्मु जोडे। कीर्तनें परब्रह्म आतुडे। मुक्ति कीर्तनापुढें लाजोनि जाय॥ १८॥ कीर्तनानंदें चारी मुक्ति। हरिभक्तांतें वरूं येती। भक्त त्यांतें उपेक्षिती। तरी पायां लागती दास्यत्वें॥ १९॥ एवढी कलियुगीं प्रचीती। कीर्तनाची परम ख्याती। राया जाण गा निश्चितीं। विकल्प चित्तीं झणें धरिसी॥ ४२०॥ कृतत्रेताद्वापारासी। निषेधु नाहीं नामासी। कलियुगीं नामापाशीं। चारी मुक्ती दासी स्वयें होती॥ २१॥
न ह्यत: परमो लाभो देहिनां भ्राम्यतामिह।
यतो विन्देत परमां शान्तिं नश्यति संसृति:॥ ३७॥
जे जन्ममरणांच्या आवर्तीं। पडिले संसारीं सदा भ्रमती। त्या प्राणियां कलियुगाप्रती। कीर्तनें गती नृपनाथा॥ २२॥ कलियुगीं कीर्तनासाठीं। संसाराची काढूनि कांटी। परमशांतिसुखसंतुष्टीं। पडे मिठी परमानंदीं॥ २३॥ ऐसा कीर्तनीं परम लाभु। शिणतां सुरनरां दुर्लभु। तो कलियुगीं झाला सुलभु। यालागी सभाग्यां लोभु हरिकीर्तनीं॥ २४॥ ‘कीर्तनास्तव चारी मुक्ती। भक्तांपासीं वोळंगती। हें न घडे’ कोणी म्हणती। ऐक ते स्थिती नृपनाथा॥ २५॥ कीर्तनीं हरिनामाचा पाठा। तेणें देवासी संतोष मोठा। वेगीं सांडोनि वैकुंठा। धांवे अवचटा कीर्तनामाजीं॥ २६॥ हरिकीर्तना लोधला देवो। विसरला वैकुंठा जावों। तोचि आवडला ठावो। भक्तभावो देखोनी॥ २७॥ जेथ राहिला यदुनायक। तेथचि ये वैकुंठलोक। यापरी मुक्ति ‘सलोक’। कीर्तनें देख पावतीभक्त॥ २८॥ नामकीर्तन-निजगजरीं। भक्तां निकट धांवे श्रीहरी। तेचि ‘समीपता’ मुक्ति खरी। भक्तांच्या करीं हरिकीर्तनें॥ २९॥ कीर्तनें तोषला अधोक्षज। भक्ता प्रत्यक्ष गरुडध्वज। श्याम पीतवासा चतुर्भुज। तें ध्यान सहज ठसावे॥ ४३०॥ भक्तु कीर्तन करी जेणें ध्यानें। तें ध्यान दृढठसावें मनें। तेव्हां देवाचीं निजचिन्हें। भक्तें पावणें संपूर्ण॥ ३१॥ श्याम चतुर्भुज पीतांबरधारी। शंखचक्रादि आयुधें करीं। हे ‘सरूपता’ भक्तातें वरी। कीर्तनगजरीं भाळोनी॥ ३२॥ तेव्हां देवभक्त समसमान। समान अवयव सम चिन्ह। भावें करितां हरिकीर्तन। एवढें महिमान हरिभक्तां॥ ३३॥ दोघां एकत्र रमा देखे। देवो कोण तेंही नोळखे। ब्रह्मा नमस्कारीं चवके। देवो तात्त्विकें न कळे त्यासी॥ ३४॥ भावें करितां हरिकीर्तन। तेणें संतोषे जनार्दन। उभयतां पडे आलिंगन। मिठी परतोन सुटेना॥ ३५॥ तेव्हां सबाह्यांतरीं। देवो प्रगटे चराचरीं। दुजें देखावया संसारीं। सर्वथा उरी उरेना॥ ३६॥ वृत्ति स्वानंदीं निमग्न। परतोनि कदा नव्हे भिन्न। ‘सायुज्यमुक्ति’ या नांव पूर्ण। जेणें दुजेपण असेना॥ ३७॥ ऐशी लाहूनि पूर्ण सायुज्यता। तो जैं करी हरिकथा। ते कथेची तल्लीनता। जीवां समस्तां अतिप्रिय॥ ३८॥ यापरी हरिकीर्तनापासीं। चारी मुक्ती होती दासी। भक्त लोधले हरिभजनासी। सर्वथा मुक्तीसी न घेती॥ ३९॥ एवं योगयागादि तपसाधनें। पोरटीं केलीं हरिकीर्तनें। कलियुगीं नामस्मरणें। जड उद्धरणें हरिकीर्तनीं॥ ४४०॥
कृतादिषु प्रजा राजन् कलाविच्छन्ति संभवम्।
कलौ खलु भविष्यन्ति नारायणपरायणा:॥ ३८॥
कीर्तनासाठीं चारी मुक्ति। हेचि कलियुगीं मुख्य भक्ति। यालागीं इंद्रादि देवपंक्ति। जन्म इच्छिती कलियुगीं॥ ४१॥ स्वर्ग नव्हे भोगस्थान। हें विषयाचें बंदिखान। कलियुगीं सभाग्य जन। जन्मोनि कीर्तन हरीचें करिती॥ ४२॥ जेथींच्या जन्मा देव सकाम। तेथ कृतादि युगींचे उत्तमोत्तम। प्रजा अवश्य वांछिती जन्म। कीर्तनधर्म निजभजना॥ ४३॥ कृतयुगींचे सभाग्य जन। यागीं पावले स्वर्गस्थान। तेही कलियुगींचें जाण। जन्म आपण वांछिती॥ ४४॥ कृत त्रेता आणि द्वापर। तेथीलही मुख्य नर। कलियुगीं जन्म तत्पर। निरंतर वांछिती॥ ४५॥ तैंचे लोक करिती गोष्टी। चारी पुरुषार्थ कीर्तनासाठीं। कलियुगीं हे महिमा मोठी। धन्य धन्य सृष्टीं कलियुग॥ ४६॥ जे असती धन्यभागी। ते जन्म पावती कलियुगीं। ऐसें कलीच्या जन्मालागीं। नर-सुर-उरगीं उत्कंठा॥ ४७॥ तरावया दीन जन। कलीमाजीं श्रीनारायण। नामें छेदी भवबंधन। तारी हरिकीर्तन सकळांसी॥ ४८॥ यालागीं कलिमाजीं पाहीं। श्रद्धा हरिकीर्तनाच्या ठायीं। जन तरती सुखोपायीं। संदेहो नाहीं नृपनाथा॥ ४९॥ कलियुगीं बहुसाल नर। होतील नारायणीं तत्पर। भक्तीचें भोज विचित्र। स्त्रीशूद्र माजविती॥ ४५०॥
क्वचित् क्वचिन्महाराज द्रविडेषु च भूरिश:।
ताम्रपर्णी नदी यत्र कृतमाला पयस्विनी॥ ३९॥
कावेरी च महापुण्या प्रतीची च महानदी।
ये पिबन्ति जलं तासां मनुजा मनुजेश्वर।
प्रायो भक्ता भविष्यन्ति वासुदेवेऽमलाशया:॥ ४०॥
विशेषें द्रविड देशाचे ठायीं। अतिशयें भक्ति वाढेल पाहीं। तेथेंही तीर्थविशेष भुयी। ते ते ठायीं अतिउत्कट॥ ५१॥ ताम्रपर्णीच्या तीरीं। हरिभक्तीची अगाध थोरी। कृतमालेच्या परिसरीं। उत्साहेंकरीं हरिभक्ति नांदे॥ ५२॥ निर्मळजळा पयस्विनी। जीचिये पय:प्राशनीं। वृत्ति वाढे हरिचरणीं। दृढ भगवद्भजनीं बुद्धी॥ ५३॥ देखतां कावेरीची थडी। पळती पापांचिया कोडी। जेथ श्रीरंगु वसे आवडीं। तेथें भक्ति दुथडी उद्भट नांदे॥ ५४॥ प्रतीचीमाजीं देतां बुडी। चित्तशुद्धि जोडे रोकडी। भजन वाढे चढोवढी। भक्तीची गुढी वैकुंठीं उभारे॥ ५५॥ ऐकें नरवरचूडामणी। या पंचनदींचिया तीर्थस्नानीं। अथवा पय:प्राशनीं। भगवद्भजनीं दृढ बुद्धी॥ ५६॥ या तीर्थांचें केल्या दर्शन। होय कलिमलक्षालन। केल्या स्नान पय:प्राशन। भगवद्भजन उल्हासे॥ ५७॥ दर्शन स्पर्शन स्नान। या तीर्थींचें करितां जाण। वासुदेवीं निर्मळ भजन। नित्य नूतन दृढ वाढे॥ ५८॥ यापरी जे भगवद्भक्त। ते ऋणत्रयासी निर्मुक्त। सुरनरपितरां पंगिस्त। हरिभक्त कदा नव्हती॥ ५९॥
देवर्षिभूताप्तनृणां पितॄणां
न किङ्करो नायमृणी च राजन्।
सर्वात्मना य: शरणं शरण्यं
गतो मुकुन्दं परिहृत्य कर्तम्॥ ४१॥
शरणागता निजशरण्य। मुकुंदाचे श्रीचरण। सद्भावें रिघाल्या शरण। जन्ममरण बाधीना॥ ४६०॥ जेथ बाधीना जन्ममरण। तेथें देव-ऋषि-आचार्य-पितृगण। यांच्या ऋणांचा पाड कोण। ते झाले उत्तीर्ण भगवद्भजनें॥ ६१॥ जो विनटला हरिचरणीं। तो कोणाचा नव्हे ऋणी। जेवींपरिसाचिये मिळणीं। लोह काळेपणीं निर्मुक्त॥ ६२॥ सकळ पापांपासूनी। सुटिजे जेवीं गंगास्नानीं। तेवीं विनटल्या हरिचरणीं। निर्मुक्त त्रैऋणीं भगवद्भक्त॥ ६३॥ भावें करितां भगवद्भक्ती। सकळ पितर उद्धरती। ऋषीश्वरां नित्य तृप्ती। भगवद्भक्ति-स्वानंदें॥ ६४॥ स्वानंदें भगवद्भक्ती। तेणें सर्व भूतें सुखी होती। पुत्रें केल्या भगवद्भक्ती। आप्त उद्धरती मातापितरें॥ ६५॥ सकळ देवांचा नियंता। अतिउल्हासें त्यातें भजतां। देवऋणाची वार्ता। भगवद्भक्तां बाधीना॥ ६६॥ ज्यांसी अनन्य भगवद्भजन। ते कदा नव्हती कर्माधीन। कर्म ज्याचे आज्ञाधीन। त्या हरीसी शरण जो झाला॥ ६७॥ तो नव्हे कर्माचा सेवक। नव्हे देवांचा पाइक। नव्हे प्राकृताचा रंक। अनन्य भाविक हरिभक्त॥ ६८॥ जो हरीचा शरणागत। तो कोणाचा नव्हे अंकित। कर्माकर्मीं तो अलिप्त। नित्यमुक्त ऋणत्रयासी॥ ६९॥ वासुदेव सर्वां भूतीं। हे दृढ ठसावे प्रतीती। यालागीं अलिप्त कर्मगती। सकळ ऋणनिर्मुक्ती भगवद्भक्तां॥ ४७०॥
स्वपादमूलं भजत: प्रियस्य
त्यक्तान्यभावस्य हरि: परेश:।
विकर्म यच्चोत्पतितं कथञ्चिद्
धुनोति सर्वं हृदि सन्निविष्ट:॥ ४२॥
सांडूनि देहाच्या अभिमाना। त्यजूनि देवतांतरभजना। जे अनन्य शरण हरिचरणां। ते कर्मबंधना नातळती॥ ७१॥ यापरी जे अनन्य शरण। तेचि हरीसी पढियंते पूर्ण। हरिप्रियां कर्मबंधन। स्वप्नींही जाण स्पर्शों न शके॥ ७२॥ राया म्हणसी ‘भगवद्भक्त। विहितकर्मीं नित्यनिर्मुक्त’। ते जरी विकर्म आचरत। तरी प्रायश्चित्त न बाधी त्यांसी॥ ७३॥ जेवीं पंचाननाचें पिलें। न वचे मदगजांचेनि वेढिलें। तेवीं हरिप्रियीं विकर्म केलें। त्यांसी न वचे बांधिलें यमाचेनि॥ ७४॥ स्मरतां एक हरीचें नाम। महापातक्यां वंदी यम। मा हरीचे पढियंते परम। तयां विकर्में यम केवीं दंडी॥ ७५॥ आशंका॥ ‘वेदाज्ञा विष्णूची परम। वेदें विहिलें धर्माधर्म। भक्त आचरतां विकर्म। केवीं वेदाज्ञानेम न बाधी त्यांसी’॥ ७६॥ जेवीं रायाचा सेवक आप्त। तो द्वारपाळां नव्हे अंकित। तेथ रायाचा पढियंता सुत। त्यांचा पंगिस्त तो केवीं होय॥ ७७॥ हरिनामाचें ज्यासी स्मरण। वेद त्याचे वंदी चरण। मा जो हरीचा पढियंता पूर्ण। त्यासी वेदविधान कदा न बाधी॥ ७८॥ भक्तापासूनि विकर्मस्थिती। कदा न घडे गा कल्पांतीं। अवचटें घडल्या दैवगतीं। त्या कर्मा निर्मुक्ति अच्युतस्मरणें॥ ७९॥ बाधूं न शके कर्माकर्म। ऐसा कोण भागवतधर्म। ते भक्तीचें निजवर्म। उत्तमोत्तम अवधारीं॥ ४८०॥ त्यजूनि देहाभिमानवोढी। सर्वां भूतीं हरिभक्ति गाढी। तो कर्माकर्में पायीं रगडी। मुक्ति पाय झाडी निजकेशीं॥ ८१॥ तो ज्याकडे कृपादृष्टीं पाहे। त्याचें निर्दळे भवभये। तो जेथ म्हणे राहें। तेथें लाहे मुक्तिसुख॥ ८२॥ त्याचेनि अनुग्रहकरीं। देव प्रगटे दीनाच्या अंतरीं। त्याच्या कर्माकर्माची बोहरी। स्वयें श्रीहरी करूं लागे॥ ८३॥ जेवीं प्रगटल्या दिनमणी। अंधार जाय पळोनी। राम प्रगटल्या हृदयभुवनीं। कर्माकर्मधुणी सहजचि॥ ८४॥ भगवंताची नामकीर्ति। याचि नामें परम भक्ति। भक्तीपाशीं चारी मुक्ति। दासीत्वें वसती नृपनाथा॥ ८५॥ ऐकोनि भक्तीची पूर्ण स्थिती। रोमांचित झाला नृपती। आनंदाश्रु नयनीं येती। सुखावलिया वृत्तीं डुल्लतु॥ ८६॥ सांगतां वैदेहाची स्थिती। नारदु सुखावे निजचित्तीं। तो उल्हासें वसुदेवाप्रती। सांगे समाप्ति इतिहासाची॥ ८७॥
नारद उवाच
धर्मान् भागवतानित्थं श्रुत्वाथ मिथिलेश्वर:।
जायन्ते यान् मुनीन् प्रीत: सोपाध्यायो ह्यपूजयत्॥ ४३॥
नारद इतिहास सांगतु। तेवींच आनंदे डुल्लतु। तेणें आनंदें बोलतु। भक्तीचें मथितुवसुदेवाप्रती॥ ८८॥ यापरी जयंतीसुतीं। भगवंताची उद्भट भक्ती। सांगितली परम प्रीतीं। मिथिलेशाप्रती निजबोधें॥ ८९॥ ऐकोनि त्यांचिया वचना। सुख जाहलें विदेहाचिया मना। मग अतिप्रीतीं पूजना। जयंतीनंदनां पूजिता झाला॥ ४९०॥ श्रवणें जाहली अतिविश्रांती। तेणें पूजेलागीं अतिप्रीती। विदेहा उल्हासु चित्तीं। स्वानंदस्थितीं पूजिता झाला॥ ९१॥ पूजेचा परम आदरु। जयंतीनंदना केला थोरु। उपाध्याय जो अहल्याकुमरु। तेणेंही अत्यादरु पूजेसी केला॥ ९२॥
ततोऽन्तर्दधिरे सिद्धा: सर्वलोकस्य पश्यत:।
राजा धर्मानुपातिष्ठन्नवाप परमां गतिम्॥ ४४॥
यापरी ते भागवतश्रेष्ठ। नवही जण अतिवरिष्ठ। समस्तां देखतांचि स्पष्ट। झाले अदृष्ट ऊर्ध्वगमनें॥ ९३॥ ते भागवतधर्मस्थितीं। अनुष्ठूनि भगवद्भक्ती। राजा पावला परम गती। पूर्णप्राप्ती निजबोधें॥ ९४॥ भावें करितां भगवद्भक्ती। देहीं प्रगटे विदेहस्थिती। ते पावोनि नृपती। परमविश्रांती पावला॥ ९५॥
त्वमप्येतान्महाभाग धर्मान् भागवताञ्छ्रुतान्।
आस्थित: श्रद्धया युक्तो नि:सङ्गो यास्यसे परम्॥ ४५॥
सकळ भाग्यांचिया पंक्ती। जेथें ठाकल्या येती विश्रांती। ते वसुदेवा भाग्यस्थिती। तुझ्या घराप्रती क्रीडत॥ ९६॥ वसुदेवा तुझेनि नांवें। देवातें ‘वासुदेव’ म्हणावें। तेणें नामाचेनि गौरवें। जनांचे आघवे निरसती दोष॥ ९७॥ येवढॺा भाग्याचा भाग्यनिधि। वसुदेवा तूंचि त्रिशुद्धि। तुवां भागवतधर्माचा विधि। आस्तिक्यबुद्धीं अवधारिला॥ ९८॥ श्रद्धेनें केलिया वस्तुश्रवणा। मननयुक्त धरावी धारणा। तैं नि:संग होऊनियां जाणा। पावसी तत्क्षणा निजधामासी॥ ९९॥ जया निजधामाच्या ठायीं। कार्य कारण दोन्ही नाहीं। त्या परम पदाचे ठायीं। निजसुखें पाहीं सुखरूप होसी॥ ५००॥
युवयो: खलु दम्पत्योर्यशसा पूरितं जगत्।
पुत्रतामगमद्यद्वां भगवानीश्वरो हरि:॥ ४६॥
तुम्हां दांपत्याचिये कीर्ती। यशासी आली श्रीमंती। तुमचे यशें त्रिजगती। परमानंदें क्षिती परिपूर्ण झाली॥ १॥ ज्यालागीं कीजे यजन। ज्यालागीं दीजे दान। ज्यालागीं कीजे तपाचरण। योगसाधन ज्यालागीं॥ २॥ जो न वर्णवे वेदां शेषा। जो दुर्लभ सनकादिकां। त्या पुत्रत्वेंयदुनायका। उत्संगीं देखा खेळविसी॥ ३॥ जो कळिकाळाचा निजशास्ता। जो ब्रह्मादिकांचा नियंता। जो संहारकाचा संहर्ता। जो प्रतिपाळिता त्रिजगती॥ ४॥ जो सकळ भाग्याचें भूषण। जो सकळ मंडणां मंडण। षडूगुणांचें अधिष्ठान। तो पुत्रत्वें श्रीकृष्ण सर्वांगीं लोळे॥ ५॥
दर्शनालिङ्गनालापै: शयनासनभोजनै:।
आत्मा वां पावित: कृष्णे पुत्रस्नेहं प्रकुर्वतो:॥ ४७॥
परब्रह्ममूर्ति श्रीकृष्ण। सादरें करितां अवलोकन। तेणें दृष्टि होय पावन। डोळ्यां संपूर्ण सुखावबोधु॥ ६॥ कृष्णमुखींचीं उत्तरें। प्रवेशतां कर्णद्वारें। पवित्र झालीं कर्णकुहरें। कृष्णकुमरें अनुवादें॥ ७॥ आळवितां श्रीकृष्ण कृष्ण। अथवा कृष्णेंसीं संभाषण। तेणें वाचा झाली पावन। जैसें गंगाजीवन संतप्तां॥ ८॥ नाना यागविधीं यजिती ज्यातें। तेथ न घे जो अवदानातें। तो वारितांही दोंहीं हातें। बैसे सांगातें भोजनीं कृष्ण॥ ९॥ दुर्लभु योगयागीं। तो वेळ राखे भोजनालागीं। मुखींचें शेष दे तुम्हांलागीं। लागवेगीं बाळलीला॥ ५१०॥ तेणें संतप्त संतोखी। तोही ग्रास घाली तुम्हां मुखीं। तुम्हां ऐसें भाग्य त्रिलोकीं। नाहीं आणिकीं अर्जिलें॥ ११॥ तेणें कृष्णशेषामृतें। रसना विटों ये अमृतातें। मा इतर रसा गोड तेथें। कोण म्हणतें म्हणावया॥ १२॥ तेणें श्रीकृष्णरसशेषें। अंतरशुद्धि अनायासें। जें नाना तपसायासें। अतिप्रयासें न लभे कदा॥ १३॥ देतां कृष्णाशीं चुंबन। तेणें अवघ्राणें घ्राण पावन। चुंबितांचि निवे मन। स्वानंद पूर्ण उल्हासे॥ १४॥ तुम्हां बैसले देखे आसनीं। कृष्ण सवेग ये धांवोनी। मग अंकावरी बैसोनी। निजांगमिळणीं निववी कृष्णु॥ १५॥ तेणें श्रीकृष्णाचेनि स्पर्शें। सर्वेंद्रियीं कामु नासे। तेणें कर्मचि अनायासें। होय आपैसें निष्कर्म॥ १६॥ सप्रेमभावें संलग्न। देतां श्रीकृष्णासी आलिंगन। तेणें देहाचें देहपण। मीतूंस्फुरण हारपे॥ १७॥ शयनाच्या समयरूपीं। जना गाढ मूढ अवस्था व्यापी। ते काळीं तुम्हांसमीपीं। कृष्ण सद्रूपीं संलग्न॥ १८॥ योगी भावना भावून। कर्म कल्पिती कृष्णार्पण। तुमचीं सकळ कर्में जाण। स्वयें श्रीकृष्ण नित्यभोक्ता॥ १९॥ पुत्रस्नेहाचेनि लालसें। सकळ कर्में अनायासें। स्वयें श्रीकृष्ण सावकाशें। परम उल्हासें अंगीकारी॥ ५२०॥ तुमची पवित्रता सांगों कैसी। पवित्र केलें यदुवंशासी। पुत्रत्वें पाळूनि श्रीकृष्णासी। जगदुद्धारासी कीर्ति केली॥ २१॥ नाम घेतां ‘वसुदेवसूनु’। स्मरतां ‘देवकीनंदनु’। होय भवबंधच्छेदनु। ऐसें पावनु नाम तुमचें॥ २२॥ तुम्ही तरा अनायासीं। हें नवल नव्हे विशेषीं। केवळ जे का कृष्णद्वेषी। ते वैरी अनायासीं विरोधें तरती॥ २३॥
वैरेण यं नृपतय: शिशुपालपौण्ड्र-
शाल्वादयो गतिविलासविलोकनाद्यै:।
ध्यायन्त आकृतधिय: शयनासनादौ
तत्साम्यमापुरनुरक्तधियां पुन: किम्॥ ४८॥
शिशुपाल दंतवक्र। पौंड्रक-शाल्वादि महावीर। कृष्णासीं चालविती वैर। द्वेषें मत्सरें ध्यान करिती॥ २४॥ घनश्याम पीतांबर कटे। विचित्रालंकारीं कृष्णु नटे। गदादि आयुधीं ऐसा वेठे। अतिबळें तगटे रणभूमीसी॥ २५॥ ऐसें वैरवशें उद्भट। क्रोधें कृष्णध्यान उत्कट। ते वैरभावें वरिष्ठ। तद्रूपता स्पष्ट पावले द्वेषें॥ २६॥ कंसासी परम भयें जाण। अखंड लागलें श्रीकृष्णध्यान। अन्नपान शयनासन। धाकें संपूर्ण श्रीकृष्ण देखे॥ २७॥ कंसासुर भयावेशें। शिशुपाळादिकमहाद्वेषें। सायुज्य पावले अनायासें। मा श्रद्धाळू कैसे न पावती मोक्ष॥ २८॥ तुम्ही तरी परमप्रीतीं। चित्तें वित्तें आत्मशक्तीं। जीवें वोवाळां श्रीपति। पायां ब्रह्मप्राप्ति तुमच्या लागे॥ २९॥ पूर्ण प्राप्ति तुम्हांपासीं। ते तुमची न कळे तुम्हांसी। बालक मानितां श्रीकृष्णासी। निजलाभासी नाडणें॥ ५३०॥
मापत्यबुद्धिमकृथा: कृष्णे सर्वात्मनीश्वरे।
मायामनुष्यभावेन गूढैश्वर्ये परेऽव्यये॥ ४९॥
तुम्ही बाळकु माना श्रीकृष्ण। हा भावो अतिकृपण। तो परमात्मा परिपूर्ण। अवतरला निर्गुणा कृष्णावतारें॥ ३१॥ यासी झणें म्हणाल लेकरूं। हा ईश्वराचा ईश्वरु। सर्वात्मा सर्वेश्वरु। योगियां योगींद्रु श्रीकृष्ण॥ ३२॥ हा अविकारु अविनाशु। परात्परु परमहंसु। इंद्रियनियंता हृषीकेशु। जगन्निवासु जगदात्मा॥ ३३॥ मायामनुष्यवेषाकृती। हा भासताहे सकळांप्रती। गूढऐश्वर्य महामूर्ती। व्यापक त्रिजगतीं गुणातीतु॥ ३४॥
भूभारासुरराजन्यहन्तवे गुप्तये सताम्।
अवतीर्णस्य निर्वृत्यै यशो लोके वितन्यते॥ ५०॥
काळयवनादि असुर। कां जरासंधादि महावीर। अथवा राजे अधर्मकर। अतिभूभार सेना ज्यांची॥ ३५॥ तो उतरावया धराभार। धर्म वाढवावया निर्विकार। संतसंरक्षणीं शार्ङ्गधर। पूर्णावतार श्रीकृष्ण॥ ३६॥ प्रतिपाळावया निजभक्तांसी। सुख द्यावया साधूंसी। अवतरला यदुवंशीं। हृषीकेशी श्रीकृष्ण॥ ३७॥ तो असुरगजपंचाननु। सज्जनवनआनंदघनु। तुमच्या उदरीं श्रीकृष्णु। अवतार पूर्णु पूर्णांशेंसीं॥ ३८॥ उद्धरावया त्रिजगती। थोर उदार केली कीर्ती। ज्याच्या अवताराची ख्याती। पवाडे पढती ब्रह्मादिक॥ ३९॥ तरावया अतिदुस्तर। ज्याची कीर्ति गाती सुरनर। परमादरें ऋषीश्वर। कृष्णचरित्र सर्वदा गाती॥ ५४०॥ ज्याचें नाम स्मरतां भक्त। कळिकाळ नागवत। तो अवतार श्रीकृष्णनाथ। तुम्हांआंत प्रगटला॥ ४१॥ श्रीकृष्ण परब्रह्मैकनिधी। त्यासी पाहूं नका बाळबुद्धीं। इतुकेन तुम्ही भवाब्धी। जाणा त्रिशुद्धी तरलेती॥ ४२॥ ऐशी श्रीकृष्णअवतारकथा। नारद वसुदेवा सांगतां। शुक म्हणे गा नृपनाथा। विस्मयो समस्तां थोर झाला॥ ४३॥
श्रीशुक उवाच
एतच्छ्रुत्वा महाभागो वसुदेवोऽतिविस्मित:।
देवकी च महाभागा जहतुर्मोहमात्मन:॥ ५१॥
निमिजायंत मुनिगण। इतिहास पुरातन जीर्ण। कृष्ण परमात्मा ब्रह्म पूर्ण। नारद आपण निरूपी हर्षें॥ ४४॥ शुक म्हणे परीक्षिती। ऐकोनि नारदवचनोक्ती। देवकीवसुदेवो चित्तीं। अतिविस्मितीं तटस्थ॥ ४५॥ तया नारदाचेनि वचनें। कृष्ण परमात्मा बोलें येणें। देवकी वसुदेव निजमनें। दोघें जणें विस्मित॥ ४६॥ तीं परम भाग्यवंत दोन्ही। जो पुत्रस्नेहो होता श्रीकृष्णीं। तो सांडोनियां तत्क्षणीं। कृष्णपरब्रह्मपणीं निश्चयो केला॥ ४७॥ श्रीकृष्णीं ब्रह्मभावो। धरितां नि:शेष मोहस्नेहो। हृदयींचा निघोनि गेला पहा हो। बाप नवलावो भाग्याचा॥ ४८॥
इतिहासमिमं पुण्यं धारयेद् य: समाहित:।
स विधूयेह शमलं ब्रह्मभूयाय कल्पते॥ ५२॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायामेकादशस्कन्धे पंचमोऽध्याय:॥ ५॥
जो निमिजायंतसंवादु। वसुदेवा सांगे नारदु। हा इतिहास अतिशुद्धु। जीवशिवभेदुच्छेदकु॥ ४९॥ सावधानपणें श्रोता। तल्लीन होऊनि तत्त्वतां। हे इतिहासाची कथा। सादरता जो परिसे॥ ५५०॥ तेणें सकळ पुण्यांचिया राशी। श्रवणें जोडिल्या अहर्निशीं। तो गा पुरुषु अवश्यतेसी। ब्रह्मप्राप्तीसी सत्पात्र॥ ५१॥ सार्थक एक एक पद। परिसतां होय अंतर शुद्ध। यालागीं पावे ब्रह्मपद। परमानंद निजबोधें॥ ५२॥ हे ‘पंचाध्यायी’ म्हणणें घडे। पंचवक्त्र चंद्रचूडें। एकादशाचें ज्ञान गाढें। वर्णावया फुडें ध्वज उभविला॥ ५३॥ हे पंचाध्यायी नव्हे जाण। एकादशाचे पंचप्राण। उपदेशावया शुद्ध ज्ञान। सामोरे आपण स्वभक्तां आले॥ ५४॥ हे पंचाध्यायी नव्हे केवळ। पंचम आलापे शुककोकिळ। एकादश वसंतकाळ। भक्त-अलिकुळ आलापवी स्वयें॥ ५५॥ हाही नव्हे प्रकार। हे शर्करा पंचधार। चाखों धाडिली सत्वर। ज्ञानगंभीर निजभक्त॥ ५६॥ हे पंचाध्यायी नव्हे सिद्ध। एकादशाचे पंच गंध। भक्त आंवतावया शुद्ध। धाडिली प्रसिद्ध गंधाक्षता॥ ५७॥ एकादश अतिविवेकी यावया पंचाध्यायी पालखी। पुढें धाडिली कवतुकीं। निजभक्तविखीं कृपाळुवें॥ ५८॥ हे कृष्ण-उद्धवअर्धमात्रा। अर्धोदयो महायात्रा। ते यात्रेलागीं हांकारा। पंचाध्यायी खरा साधकां करी॥ ५९॥ श्रीकृष्णउद्धवमेळा। देखोनि ब्रह्मसुखाचा सोहळा। तो सांगों आली कळवळा। भक्तांजवळां पंचाध्यायी॥ ५६०॥ अहंकाराचें मेट होतें। तें उठवूनि श्रीकृष्णनाथें। केलें आत्मतीर्थें मुक्तें। अभयहस्तें उद्धवासी॥ ६१॥ ते मुक्ततीर्थनवाई। पुढें सांगों आली पंचाध्यायी। संसारश्रांत जे जे कांहीं। ते धांवा लवलाहीं विश्रांतीसी॥ ६२॥ कृष्णउद्धवगोडगोष्टी। हे निर्विकल्प कपिलाषष्ठी। ते पर्वकाळकसवटी। सांगों उठाउठीं पंचाध्यायी आली॥ ६३॥ उद्धवालागीं भवसागरीं। उतरावया पायउतारीं। भागवतमिषें श्रीहरी। सुगम सोपारी पायवाट केली॥ ६४॥ पव्हणियाहूनि पायउतारा। भागवतमार्ग अतिसोपारा। तो मार्गु दावावया पुरा। हांकारी स्त्रीशूद्रां पंचाध्यायी॥ ६५॥ पुढील निरूपणआवडी। अतिशयें वाढे चढोवढी। ते कृष्णवाक्यरसगोडी। पंचाध्यायी फुडी साधावया सांगे॥ ६६॥ कृष्णउद्धवसंवादीं। होईल परब्रह्म-गवादी। साधकमुमुक्षांची मांदी। धांवे त्रिशुद्धी निजसुखार्थ॥ ६७॥ परब्रह्म झालें सावेव। स्वरूपसुंदर ज्ञानगौरव। मनोहर रूपवैभव। स्वर्गींचे देव पाहों येती॥ ६८॥ तो देवांचा स्तुतिवादु। सवेंचि उद्धवाचा निर्वेदु। कृष्णउद्धवमहाबोधु। जेणें परमानंदु वोसंडे॥ ६९॥ ते पुढील अध्यायीं कथा। रसाळ सांगेन आतां। अवधान द्यावें श्रोतां। ग्रंथार्था निजबोधें॥ ५७०॥ स्वयें वावडी करूनि पूर्ण। तिसी उडविजे जेवीं आपण। मग उडालेपणें जाण। आपल्या आपण संतोषिजे॥ ७१॥ तेवीं मज नांवें कविता। करूनि स्वयें सद्गुरु वक्ता। एवं वदवूनियां ग्रंथार्था। श्रोतेरूपें सर्वथा संतोषे स्वयें॥ ७२॥ तो एकपणेंवीण एकला एका। दुजेनवीण जनार्दनु सखा। तेणें पुढील ग्रंथआवांका। विशदार्थें देखा विवंचिला॥ ७३॥ नातळोनि दुजेपण। एका जनार्दना शरण। धरोनि श्रोत्यांचे चरण। पुढील अनुसंधान पावेल॥ ७४॥ एका जनार्दन नांवें देख। दों नांवीं स्वरूप एक। हें जाणे तो आवश्यक। परम सुख स्वयें पावे॥ ७५॥ एका जनार्दना शरण। त्याची कृपा परिपूर्ण। पंचाध्यायी निरूपण। झाली संपूर्ण जनार्दनकृपा॥ ५७६॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे एकादशस्कंधे वसुदेवनारदसंवादे एकाकारटीकायां पंचमोऽध्याय:॥ ५॥ श्रीकृष्णार्पणमस्तु॥ मूळश्लोक॥ ५२॥ ओव्या॥ ५७६॥
॥ श्री ॐ तत्सत्-श्रीकृष्ण प्रसन्न॥
अध्याय सहावा
श्रीगणेशाय नम:॥ श्रीकृष्णाय नम:। ओं नमो श्रीजनार्दना। भावार्थें नमितां चरणा। जनेंसहित मीपणा। नाहींच जाणा स्वयें केलें॥ १॥ लिंगदेहाचें मर्दन। तेंचि जनाचें अर्दन। यालागीं नामें जनार्दन। प्रगट जाण प्रसिद्धी॥ २॥ तुझी ऐशीच करणी। कर्म कर्ता नुरवूनि। सुखें नांदविसी जनीं। समाधानीं जनार्दना॥ ३॥ सुखेंचि तुझें नाम घेतां। घातु करिसी जीविता। जीवु घेऊनि तत्त्वतां। होसी सर्वथा कृपाळू॥ ४॥ तुझे नामाचें प्रबळ बळ। माथा नुधविती कळिकाळ। चारी मुक्ति केवळ। होती निश्चळ निजदासी॥ ५॥ नामें एवढें ढसाळ देणें। त्या तुझें स्वरूप कवण जाणे। सांडूनि जाणणें नेणणें। निवांत राहाणें तत्त्वतां॥ ६॥ तुझा स्तुतिवादु करणें। तंव परतलीं श्रुति पुराणें। तेथ माझें आरुष बोलणें। कोठें कोणें सारावें॥ ७॥ तुझा स्तुतिवादु तें मौन। तुझा कळवळा तें कीर्तन। कांहीं न करणें तें अनुसंधान। साचार जाण श्रीकृष्णा॥ ८॥ ऐशियाही तुझे ठायीं। अचाट हांव उठिली पाहीं। तेचि अर्थीं चित्त देई। कृपानिर्वाही गुरुराया॥ ९॥ खद्योत प्रकाशूं पाहे चांदा। मशक गरुडासी घे खांदां। तैसा मी एकादशस्कंधा। मूर्ख नुसधा टीकार्थी॥ १०॥ येचि विषयीं गुरुनाथा। कृपा करावी सर्वथा। ग्रंथरचना ग्रंथार्था। सार्थकता करावी॥ ११॥ ऐशी विनवणी ऐकतां। कृपापद्मकरु ठेविला माथां। तंव उद्योत्कार जाहला ग्रंथा। यथार्थता निजदीपें॥ १२॥ नवल कृपेची करणी। अर्थचिंतामणीची खाणी। उघडली तत्क्षणीं। पदार्थश्रेणी कविमुद्रा॥ १३॥ लेतां सिद्ध अलंकारा। कवण सांकडें लेणारा। ताल राखतां खांबसूत्रा। लेपाच्या करा प्रयास काय॥ १४॥ बापाचीं पक्वान्नें घेउनी। बाळ घाली बापाचे वदनीं। तेणें साचचि तो संतोषोनी होय मनीं सुखाचा॥ १५॥ तैशीच हेही कथा। तूंचि ग्रंथु तूंचि कविता। तेथें कोणीं घ्यावी अहंता। ‘मी कर्ता’ म्हणौनी॥ १६॥ गुरूनें सांडविली ‘अहंता’। शेखीं राहों नेदीच ‘सोहंता’। तेथ मी एकु कवि-कर्ता। हेंही सर्वथा न सरे पैं॥ १७॥ सूचितां अहंकाराचा झाडा। सूचनाचि होय त्याचा जोडा। जो आपणियातें म्हणवी वेडा। तोचि गाढा अतिचतुर॥ १८॥ तैशीच हेही होईल वार्ता। यालागीं श्रीगुरुनाथा। चरणीं ठेविला माथा। कर्ता करविता तूंचि तूं॥ १९॥ मागील ग्रंथसंगती। पंचमाध्यायाचे अंतीं। नारद वसुदेवाप्रती। बोलिला उपपत्ति ते ऐशी॥ २०॥ हा परमात्मा श्रीहरी। लीलाविग्रहें देहधारी। अवतरला तुमचे घरीं। भाग्यें करी नटनाटॺ॥ २१॥ हा ईशाचाही निजईशु। वैकुंठींचा निजवासु। परमात्मा परेशु। जगदीशु श्रीकृष्णु॥ २२॥ तेंचि नारदवचनप्रमाण। प्रार्थावया श्रीकृष्ण। मिळवोनियां देवगण। द्वारकेसी जाण स्वयें आले॥ २३॥
श्रीशुक उवाच
अथ ब्रह्माऽऽत्मजैर्देवै: प्रजेशैरावृतोऽभ्यगात्।
भवश्च भूतभव्येशो ययौ भूतगणैर्वृत:॥ १॥
शुक म्हणे परीक्षिती। पहावया श्रीकृष्णमूर्ती। सुरवर द्वारकेसी येती। विचित्र स्तुति तिंहीं केली॥ २४॥ श्रीकृष्णमूर्तीचें कवतिक। पहावया देव सकळिक। चतुर्मुख पंचमुख। वेगें षण्मुख पातले॥ २५॥ करावयास प्रजाउत्पत्ती। पूर्वीं नेमिला प्रजापती। तोही आला द्वारकेप्रती। कृष्णमूर्ती पहावया॥ २६॥ सनकादिक आत्माराम। अवाप्तसकळकाम। तेही होऊनि आले सकाम। मेघश्याम पहावया॥ २७॥ भूतनायक रुद्रगण। आले अकराही जण। पहावया श्रीकृष्ण। भूतगणसमवेत॥ २८॥ पहावया श्रीकृष्णरावो। घेऊनि गणांचा समुदावो। द्वारके आला महादेवो। भूतभविष्यांचा पहा हो त्रिकाळज्ञाता॥ २९॥ श्रीकृष्णदर्शनाची उत्कंठा। थोर लागली नीलकंठा। धांवतां मोकळ्ॺा सुटल्या जटा। कृष्णवरिष्ठा पहावया॥ ३०॥
इन्द्रो मरुद्भिर्भगवानादित्या वसवोऽश्विनौ।
ऋभवोऽङ्गिरसो रुद्रा विश्वे साध्याश्च देवता:॥ २॥
गन्धर्वाप्सरसो नागा: सिद्धचारणगुह्यका:।
ऋषय: पितरश्चैव सविद्याधरकिन्नरा:॥ ३॥
द्वारकामुपसंजग्मु: सर्वे कृष्णदिदृक्षव:।
एकुणपन्नास मरुद्गण। तेणेंसीं इंद्र आला आपण। पहावया श्रीकृष्ण। स्वयें जाण सादर॥ ३१॥ सांडोनियां रविमंडळ। बारा आदित्यांचा मेळा। पहावया कृष्णसोहळा। तृषित डोळां होऊनि आले॥ ३२॥ सूर्य अधिष्ठिला डोळां। देखे पदार्थां सकळां। कृष्ण न देखतां आंधळा। सूर्यो पावला अंधत्व॥ ३३॥ पाहतां श्रीकृष्णाचें मुखकमळ। फिटलें सूर्याचें पटळ। मग देखणा झाला केवळ। सर्वांगें सकळ स्वयें रवि॥ ३४॥ तिन्ही अग्नी तेजाळे। परी ते धूमें झांकोळले। कृष्ण देखतांच उजळले। निर्धूम जाहले निजतेजें॥ ३५॥ आठां वसूंचा मेळा। पाहों आला कृष्णलीला। म्हणे मदनाचा पुतळा। तंव तो खेळे लीला कृष्णांकीं॥ ३६॥ अश्विनीकुमार धन्वंतरी। तेही भवरोगें पीडिले भारी। कृष्णदर्शनामृतकरीं। निरुज क्षणावरी ते जाहले॥ ३७॥ ऋषभदेव अंगिरस। रुद्र मीनले असमसाहस। विश्वे-साध्यदेव बहुवस। देवीं आकाश दाटलें॥ ३८॥ आमुची गायनकळा मोठी। होतें गंधर्वांच्या पोटीं। ते कृष्णवेणुगीतासाठीं। जाहली शेवटीं न सरती॥ ३९॥ यालागीं दर्शनाची आस। क्षणक्षणां पाहती वास। त्यांसी गायनकळा सावकाश। दिधली सुरस कृपामात्रें॥ ४०॥ अप्सरा म्हणती आम्ही नाचणी। तंव काळियाच्या फणारंगणीं। एकेचि तालें लाजवूनी। तत्क्षणीं सांडिल्या॥ ४१॥ त्या दीनवदना कामिनी। आल्या दर्शनालागोनी। नाचों शिकविल्या नाचणी। रासरंगणीं भृकुटिमात्रें॥ ४२॥ पहावया श्रीरंग। आले पाताळींचे पन्नग। सिद्ध चारण अनेग। विद्याधर साङ्ग समुदायें॥ ४३॥ कश्यपादि ऋषीश्वर। अर्यमादि पितर। गुह्यक आणि किन्नर। आले अपार स्वगणेंसीं॥ ४४॥ एवं विमानांचिया पंक्तीं। दाटलिया द्वारकेप्रती। पहावया कृष्णमूर्ती। आले सुरपती स्वानंदें॥ ४५॥
वपुषा येन भगवान्नरलोकमनोरम:।
यशो वितेने लोकेषु सर्वलोकमलापहम्॥ ४॥
जेणें शरीरें श्रीहरी। नाना चरित्रांतें करी। यश विस्तारिलें संसारीं। दुराचारी तरावया॥ ४६॥ ऐकतां श्रीकृष्णकीर्ती। चतुर्विध प्रायश्चितांची गती। खुंटली जी निश्चितीं। श्रवणार्थीं सादर जाहलिया॥ ४७॥ भावें घेतलिया श्रीकृष्णनाम। सकळ पातकां करी भस्म। देवीं देखिला पुरुषोत्तम। विश्रामधाम जगाचें॥ ४८॥ ठाणठकारें अतिउत्तम। सुरनरांमाजीं मनोरम। डोळ्ॺां जाहला विश्राम। मेघश्याम देखोनी॥ ४९॥ मुकुटकुंडलें मेखला। कांसे कसिला सोनसळा। कंठीं रुळे वनमाळा। घनसांवळा शोभतु॥ ५०॥ लावण्यगुणनिधान। अवतारमाळे मुख्य रत्न। देवींदेखिला श्रीकृष्ण। निवासस्थान द्वारका॥ ५१॥
तस्यां विभ्राजमानायां समृद्धायां महर्द्धिभि:।
व्यचक्षतावितृप्ताक्षा: कृष्णमद्भुतदर्शनम्॥ ५॥
कृष्णें अधिष्ठिली पुरी। कनककळसांचिया हारी। रत्नें जडिलीं नाना कुसरीं। तेज अंबरीं न समाये॥ ५२॥ जे द्वारकेभीतरीं। कामधेनु घरोघरीं। कल्पद्रुमांचिया हारी। खेळणीं द्वारींचिंतामणींचीं॥ ५३॥ द्वारकाजननिवासियांसी। घरीं नवरत्नांचिया राशी। ऋद्धिसिद्धि करूनिदासी। हृषीकेशी नांदतु॥ ५४॥ कृष्णरूपाचिया लालसे। डोळ्ॺां तेणें लाविलें पिसें। आवडी जाहले मोरपिसें। अतिडोळसें हरिअँगीं॥ ५५॥ कैसी बरवेपणाची शोभा। पाहतां नयनीं निघती जिभा। रसाळपणें तो वालभा। उपनिषद्गाभा साकारला॥ ५६॥ कृष्ण पहावया आवडी। होताहे देवांसी वरपडी। डोळ्ॺां थोर लागली गोडी। अर्ध घडी न विसंबती॥ ५७॥ कृष्णरूपाचें कवतुक। पाहतां नयनां लागली भूक। अंतरीं निबिड दाटलें सुख। तरी अधिकाधिक भुकेले॥ ५८॥ अवलोकितां श्रीकृष्णासी। दृष्टीसी दाटणी होतसे कैशी। मुंडपघसणी न्याहारासी। हृषीकेशी पहावया॥ ५९॥ मागें पुढें श्रीकृष्णासी। देखणेनि वेढिलें चौंपाशीं। भाग्य उपजलें डोळ्ॺांसी। पूर्णपुरुषासी देखती॥ ६०॥ श्रीकृष्ण घनमेघ सांवळा। निजात्मभावें पाहतां डोळां। सहजें श्यामता आली बुबुळा। कृष्णकळा ठसावली॥ ६१॥ जो न कळेचि वेदविवंचना। योगियांच्या न ये ध्याना। त्या प्रत्यक्ष देखोनि कृष्णा। भाग्यगणना अपूर्व॥ ६२॥ ऐसा देखोनियां श्रीहरी। देव सुमनांच्या शतधारीं। बहु वरुषले पै अंबरीं। राहोनि वरी विमानीं॥ ६३॥
स्वर्गोद्यानोपगैर्माल्यैश्छादयन्तो यदूत्तमम्।
गीर्भिश्चित्रपदार्थाभिस्तुष्टुवुर्जगदीश्वरम्॥ ६॥
मांदार पारिजात संतान। कल्पद्रुम हरिचंदन। ऐशिया वृक्षांचीं सुमनें जाण। कृष्णावरी संपूर्ण वरुषले॥ ६४॥ श्रीकृष्णासी चहूंकडां। दिव्य सुमनांचा जाहला सडा। समस्त देवीं सन्मुख पुढां। केला पैं गाढा जयजयकारु॥ ६५॥ सार्थ पदबंधरचना। नाना गद्यपद्यविवंचना। स्तवूं आदरिलें यदुनंदना। अमरसेना मिळोनी॥ ६६॥
देवा ऊचु:
नता: स्म ते नाथ पदारविन्दं
बुद्धीन्द्रियप्राणमनोवचोभि:।
यच्चिन्त्यतेऽन्तर्हृदि भावयुक्तै-
र्मुमुक्षुभि: कर्ममयोरुपाशात्॥ ७॥
विवेकयुक्त प्राणधारणा। मनसा वाचा कर्मणा। नमस्कारु तुझिया चरणां। सच्चिद्धना श्रीकृष्णा॥ ६७॥ इंद्रियउपरमालागीं जाणा। सांडूनि विषयवासना। दश इंद्रियीं लागलों चरणां। नमन श्रीकृष्णा निजभावें॥ ६८॥ विषयीं होऊनियां उदास। सांडोनि संसाराची आस। चरण चिंतिती तापस। कर्मपाश छेदावया॥ ६९॥ ऐसे मुक्तीचिया वासना। मुमुक्षु चिंतिती चरणां। त्यांसी अर्धक्षण न येसी ध्याना। दृढ भावना करितांही॥ ७०॥ ते प्रत्यक्ष तुझे चरण। आम्हांसी झालें जी दरुषण। देव आपुल्या भाग्या आपण। अतिस्तवन करिताति॥ ७१॥ देखूनि सगुण स्वरूपासी। एवढी श्लाघ्यता कां म्हणसी। जें आलें आकारासी। तें निश्चयेंसी मायिक॥ ७२॥ जैसे तुम्ही शरीरधारी। तैसाच मीही एकु शरीरी। त्या माझेनि दर्शनेंकरीं। तुम्ही कैशापरी तराल॥ ७३॥ ऐसें न म्हणावें जी अनंता। तूं मायेचा नियंता। हेंही कळलें असे तत्त्वतां। समूळ कथा परियेसीं॥ ७४॥
त्वं मायया त्रिगुणयाऽऽत्मनि दुर्विभाव्यं
व्यक्तं सृजस्यवसि लुम्पसि तद्गुणस्थ:।
नैतैर्भवानजित कर्मभिरज्यते वै
यत्स्वे सुखेऽव्यवहितेऽभिरतोऽनवद्य:॥ ८॥
झोंप लागल्या झोंप न दिसे पाहीं। जागें जाहल्या दिसतचि नाहीं। तैसी माया अतर्क्य देहीं। न पडे ठायीं सुरनरां॥ ७५॥ मूळींच तुझी अतर्क्य माया। तिसी गुणक्षोभु जाहला साह्या। ते ब्रह्मादिकां न येचि आया। देवराया श्रीकृष्णा॥ ७६॥ तूं धरोनि दैवीमायेसी। ब्रह्मादिकांतें सृजिसी। प्रतिपाळोनि संहारिसी। तूं त्या कर्मासी अलिप्त॥ ७७॥ स्वप्नीं स्वयें सृष्टि सृजिली। प्रतिपाळूनि संहारिली। ते क्रिया कर्त्यासी नाहीं लागली। तेवीं सृष्टि केली त्वां अलिप्तत्वें॥ ७८॥ मृगजळाची भरणी। सूर्य करी निजकिरणीं। शोषूनि ने अस्तमानीं। अलिप्तपणीं तैसा तूं॥ ७९॥ समूळ धर्माची वाढी मोडे। अधर्माची शीग चढे। तैं तुज अवतार धरणें घडे। आमुचें सांकडें फेडावया॥ ८०॥ करोनि अधर्माचा घातु। धर्म वाढविशी यथास्थितु। देवांसी निजपदीं स्थापितु। कर्मातीतु तूं श्रीकृष्णु॥ ८१॥ तुज अखंडदंडायमान। आत्मसुखाचें अनुसंधान। तें आम्हांसी नाहीं अर्ध क्षण। दीनवदन यालागीं॥ ८२॥ ज्यासी आत्मसुख निरंतर। तो देहधारी परी अवतार। त्याचे चरण पवित्रकर। गंगासागर आदि तीर्थांसी॥ ८३॥ तो जरी वर्ते गुणांआंतु। तरी तो जाणावा गुणातीतु। त्याचा चरणरेणु करी घातु। त्रैलोकयांतु महापापां॥ ८४॥ ऐशी तुझ्या दासांची कथा। त्या तुझे चरण वंदूं माथा। असो चरणांची हे कथा। कीर्ति ऐकतां निजलाभु॥ ८५॥ चरण देखती ते भाग्याचे। त्यांचें महिमान न वर्णवे वाचे। पवित्रपण तुझिये कीर्तीचें। परिस साचें स्वामिया॥ ८६॥ अग्निशिखा समसमानीं। इंधन घालितां वाढे अग्नी। आशा वाढे देहाभिमानीं। श्रवणकीर्तनीं ते त्यागवी॥ ८७॥
शुद्धिर्नृणां न तु तथेडॺ दुराशयानां
विद्याश्रुताध्ययनदानतप:क्रियाभि:।
सत्त्वात्मनामृषभ ते यशसि प्रवृद्ध-
सच्छ्रद्धया श्रवणसम्भृतया यथा स्यात्॥ ९॥
कृष्णस्तवनें स्तविता तरे। श्रवणद्वारें ऐकता उद्धरे। यालागीं स्तव्य तूंचि निर्धारे। स्तवनद्वारें तारकु॥ ८८॥ एवं तुझे कीर्तीचें श्रवण। तेंचि परम शुद्धीसी कारण। यावेगळें जें साधन। तें केवळ जाण प्रयास॥ ८९॥ ऐकें गा सुरवरिष्ठा। तुझिया श्रवणाची उत्कंठा। अंतरीं पापाचा मळकटा। धुवोनि चोखटा करी वृत्ती॥ ९०॥ तुझ्या श्रवणीं होऊनि उदास। तपें तपतां तापस। नाना साधनीं कर्कश। जाहल्या निरस मती त्यांच्या॥ ९१॥ ‘मंत्रविद्याग्रहण’। विकळ उच्चारितां वर्ण। शुद्धी नव्हे परी दारुण। पातक पूर्ण अंगीं वाजे॥ ९२॥ करितां ‘शास्त्रश्रवण’। चौगुणां गर्व चढे पूर्ण। तो ज्ञातेपणाचा अभिमान। न निघे जाण चतुर्मुखा॥ ९३॥ करितां ‘वेदाध्ययन’। विस्वर गेलिया उच्चारण। शुद्धी नव्हेचि परी मरण। अवश्य जाण वृत्रासुराऐसें॥ ९४॥ ‘दान’ देतां नृग बहुवस। कृपीं जाला कृकलास। प्राप्ती दूरी परी नाश। असमसाहस रोकडा॥ ९५॥ ‘तप’ करितां ऋष्यशृंगासी। तो वश जाहला वेश्यांसी। श्रद्धा श्रवणाचिया ऐशी। शुद्धी आणिकांसी पैं नाहीं॥ ९६॥ ‘कर्म’ करावें यथानिगुती। तंव त्या कर्माची गहन गती। प्राचीनबर्ह्याची कर्मस्थिती। नारदोक्तीं सांडविली॥ ९७॥ कर्मीं आचमन करावें। तेथ माषमात्र जळ घ्यावें। न्यूनाधिकत्वासवें। दोष पावे सुरापानसम॥ ९८॥ एवं दुष्टहृदय ज्यासी। तपादिक साधनें त्यासी। शुद्धि नव्हे हृषीकेशी। श्रवणें कीर्तीसी नायकतां॥ ९९॥ श्रवणें परीक्षिती तरला। श्रवणें क्रौंच उद्धरिला। मकरोदरीं श्रवण पावला। सिद्ध जाहला मत्स्येंद्र॥ १००॥ तुझें श्रवण दोपरी। एक तें चित्तशुद्धी करी। दुसरें जीवब्रह्मऐक्य करी। दोंहीपरी उद्धारु॥ १॥ प्रत्यक्ष पाहतां वाराणसी। श्रवणीं तारक ब्रह्म उपदेशी। मुक्तिक्षेत्र जाहली काशी। श्रवणें जीवासी उद्धारु॥ २॥ तूं अवाप्तसकळकाम। निष्कामाचें निजधाम। ऐशिया तुज करणें कर्म। भक्तभ्रम छेदावया॥ ३॥ नाना चरित्रांची करणी। करिता झालासी चक्रपाणी। मोक्षमार्गाची निजश्रेणी। दिधली रचूनि जनासी॥ ४॥ चित्तशुद्धीसी कारण। प्रेमयुक्त कीर्तिश्रवण। येथ सच्छ्रद्धाचि प्रमाण। अकारण साधनें॥ ५॥ अपेक्षा जें जें साधन साधिलें। तें तें अपेक्षेनेंचि फोल केलें। निरपेक्षाचें हृदय भलें। वेगीं गेलें परमार्थीं॥ ६॥ हृदयाचे सखोल आळा। स्वधर्मबीजें अंकुरला। श्रद्धेचा वेल उगवला। कोंभ निघाला तरितरितु॥ ७॥ सच्छ्रवणप्रबळजळें। रुतलीं वैराग्यदृढमूळें। वेगीं गेलीं निजबळें। श्रद्धामेळें चिदाकाशीं॥ ८॥ ते चिदाकाशींचा चंद्रमा। स्वप्रकाश तूं पुरुषोत्तमा। साधक शिणती मेघश्यामा। तुझी प्रतिमा पहावया॥ ९॥ त्यां तुझे श्रीचरण। प्रत्यक्ष जाहलें दर्शन। घालोनियां लोटांगण। चरणस्तवन करिताती॥ ११०॥
स्यान्नस्तवाङ्घ्रिरशुभाशयधूमकेतु:
क्षेमाय यो मुनिभिरार्द्रहृदोह्यमान:।
य: सात्वतै: समविभूतय आत्मवद्भि-
र्व्यूहेऽर्चित: सवनश: स्वरतिक्रमाय॥ १०॥
आमुच्या अशुभाशयाचा घातु। करिता चरणधूमकेतु। तुझाचि जी विख्यातु। त्रैलोक्यांतु श्रीकृष्णा॥ ११॥ पापइंधनाचा मेळु। तेथ तुझा चरण वडवानळु। लागतां तो अतितेजाळु। तिळेंतिळु जाळितु॥ १२॥ ऐसा पापियांतें कांपविता। प्रेमळांतें अभयदाता। तुझा चरण जी अनंता। हृदयीं सर्वथा वाहताति॥ १३॥ तेंचि हृदय जी कैसें। वोळलें भक्तिप्रेमरसें। तेथ तुझे चरण सावकाशें। अतिउल्हासें वाहताति॥ १४॥ करितां चरणाचें ध्यान। जे विसरले भूकतहान। त्यांसी द्यावया अभयदान। चरणध्वजु जाण पैं तुझा॥ १५॥ तोचि चरण सात्वतीं। पावावया समविभूती। पूजिला जी श्रीपती। चतुर्मूर्ती व्यूहरूपें॥ १६॥ ‘वासुदेव’ ‘संकर्षण’। ‘अनिरुद्ध’ आणि ‘प्रद्युम्न’। हाचि चतुर्व्यूह जाण। पूजास्थान भक्तांचें॥ १७॥ भिन्न-भिन्न चारी व्यक्ती। चहूं रूपीं एक मूर्ती। ऐसें जाणोनि पूजिजे भक्तीं। ‘व्यूहस्थिति’ त्या नांव॥ १८॥ ‘सात्वत’ म्हणिपती ते भक्त। भगवत्पदऐश्वर्यातें वांछित। चतुर्व्यूहरूपें पूजित। ऐश्वर्यीं चित्त ठेवूनी॥ १९॥ जन्ममरणप्रवाहस्थिती। नासावया एक भक्तीं। पूजा कीजे चतुर्मुर्ती। आत्मवंतीं सज्ञानीं॥ १२०॥ त्रिषवण* त्रिकाळ। पूजा करितां अविकळ। भजोनि जिंतिला कळिकाळ। जन्ममूळ छेदावया॥ २१॥ आणिकही भक्तजन। तुझें करिताति भजन। यज्ञद्वारा होमहवन। विधि विधान वेदोक्त॥ २२॥
* ‘त्रिसवन’ म्हणजे सोमरस गाळून देवांस अर्पण करण्याचे मंत्र म्हणण्याचे प्रकार-प्रात:स्तवन, मध्यंदिनसवन व तृतीयवन असे तीन आहेत, त्यांचें स्वरूप पुढें लिहिल्याप्रमाणें:—‘‘प्रात:पठेन्नित्यमुर:स्थितेन स्वरेण शार्दूलरुतोपमेन। मध्यंदिनं कंठगतेन चैव चक्राह्वसंकूजितसन्निभेन॥ तारं तु विद्यात् सवनं तृतीयं शिरोगतं तच्च सदा प्रयोज्यम्। मयूरहंसान्यभृतस्वराणां तुल्येन नादेन शिर:स्थितेन॥’’—(पाणिनीय शिक्षा)
यश्चिन्त्यते प्रयतपाणिभिरध्वराग्नौ
त्रय्या निरुक्तविधिनेश हविर्गृहीत्वा।
अध्यात्मयोग उत योगिभिरात्ममायां
जिज्ञासुभि: परमभागवतै: परीष्ट:॥ ११॥
दीक्षाग्रहणीं अतिसादर। यज्ञद्वार भजनतत्पर। क्रियेपासोनि नेमिले कर। हस्तव्यापार न करिती॥ २३॥ तेथ वेदत्रयीची विधानकळा। बाहेर त्रिगुणांची त्रिमेखळा। आंत यज्ञपुरुष आव्हानिला। चैतन्यतेजाळा सर्वात्मा॥ २४॥ तेथ ओंकार वषट्कार। लक्षणोक्त मंत्रउच्चार। द्रव्यें अर्पिती अपार। अतिपवित्र अवदानीं॥ २५॥ आणिक एक योगयुक्त। योगधारणा तूतें भजत। प्राणापानांची समता देत। आसनस्थ होऊनियां॥ २६॥ वज्रासनीं दृढ बंध। भेदोनि षट्चक्रांचे भेद। कुंडलिनीचा स्कंध। अतिसुबद्ध थापटिला॥ २७॥ ते खवळली महाशक्ती। वेगें चालिली। ऊर्ध्वगती। पवन प्राशूनि ग्रासिती। योगस्थिती गगनातें॥ २८॥ शोषूनि सहस्रदळाचे पाट। आटपीठ आणि गोल्हाट। क्रमोनियां श्रीहाट। आली अतिउद्भट ब्रह्मस्थाना॥ २९॥ तेथ परमानंदाचा भोग। शिवशक्तींचा संयोग। यापरी अभ्यासोनि योग। हा भजनमार्ग योग्यांचा॥ १३०॥ तुझी जाणावया माया। एक भजों लागले तुझिया पाया। सर्वथा अतर्क्य तुझी माया। देवराया श्रीकृष्णा॥ ३१॥ माया न लक्षेचि लक्षितां। तोचि मायामोह जाहला चित्ता। मग ते सिद्धीलागीं तत्त्वतां। चरण भगवंता पूजिती॥ ३२॥ आणिकही एक पक्ष। तुज भजावया मुमुक्ष। जाले गा अतिदक्ष। अध्यात्मपक्षनिजयोगें॥ ३३॥ आत्ममायेचा नाशु। करावया जिज्ञासु। निजात्मबोधें सावकाशु। अतिउल्हासु पूजेचा॥ ३४॥ विवेकाचिया भावना। नित्यानित्याची विवंचना। करूनि आणितां अनुसंधाना। सर्वत्र जाणा तूंचि तूं॥ ३५॥ जें अनित्यपणें वाळिलें। मायिकत्वें मिथ्या जाहलें। मग चिन्मात्रैक उरलें। निर्वाळिलें निजरूप॥ ३६॥ एवं पाहतां चहूंकडे। तुझेंचि स्वरूप जिकडे तिकडे। मग पूजिती वाडेंकोडें। निजसुरवाडें सर्वत्र॥ ३७॥ जें जें देखती जे जे ठायीं। तें तें तुजवांचूनि आन नाहीं। ऐसा सर्वत्र चरण पाहीं। ठायींचा ठायीं पूजिला॥ ३८॥
पर्युष्टया तव विभो वनमालयेयं
संस्पर्धिनी भगवती प्रतिपत्निवच्छ्री:।
य: सुप्रणीतममुयार्हणमाददन्नो
भूयात्सदाङ्घ्रिरशुभाशयधूमकेतु:॥ १२॥
ऐसे सर्वत्र तूतें पूजिती। भक्त पढियंते होती। त्यांची पूजा तेही अतिप्रीतीं। स्वयें श्रीपती मानिसी॥ ३९॥ रानींची रानवट वनमाळा। भक्तीं आणूनि घातली गळां। रमा सांडोनि उताविळा। स्वयें भाळला माळेसी॥ १४०॥ भक्तीं अर्पिली आवडीं। म्हणौनि तियेची अधिक गोडी। शिळी जाहली तरी न काढी। अर्धघडी गळांची॥ ४१॥ भक्तीं भावार्थें अर्पिली। देवें सर्वांगीं धरिली। यालागीं सुकों विसरली। टवटवीत सर्वदा॥ ४२॥ तिचा आस्वादितां गंधु। भावें भुलला मुकुंदु। श्रियेसी उपजला क्रोधु। सवतीसंबंधु मांडिला॥ ४३॥ मज न येतां आधीं। भक्तीं अर्पिली नेणों कधीं। मी तरुण सांडोनि त्रिशुद्धी। ते वृद्ध खांदीं वाहातसे॥ ४४॥ देव नेणे भोगाची खूण। ती वृद्ध मी तरुण। परी तिशींच भुलला निर्गुण। गुणागुण हा नेणे॥ ४५॥ मज चरण सेवा एकादे वेळां। हे सर्वकाळ पडली गळां। मजहूनि स्नेह आगळा। नेला वनमाळा सर्वथा॥ ४६॥ मातें डावलूनि वेगीं। हे बैसली दोहीं अंगीं। इसीं बोलतो श्रीशार्ङ्गीं। मजचिलागीं त्यागील॥ ४७॥ मज दीधली चरणांची सेवा। इचा मत्सरु किती सहावा। आपाद आवरिलें यादवा। माझी सेवा हरितली॥ ४८॥ मी कुळात्मजा क्षीराब्धीची। हे रानट रानींची। खांदीं बैसली देवाची। भीड भक्तांची म्हणवूनि॥ ४९॥ हे भक्तिबळें बैसली खांदीं। कंहीं नुतरेचि त्रिशुद्धी। रमा वनमाळेतें वंदी। द्वेषबुद्धी सांडोनी॥ १५०॥ ऐशी भक्तांची पूजा। तुज आवडे गरुडध्वजा। सुप्रणीत भावो वोजा। चरणीं तुझ्या अर्पिल्या॥ ५१॥ तो चरणधूमकेतु तुझा। आमुच्या पापांतें नाशू वोजा। पुन:-पुन: गरुडध्वजा। पापसमाजानिर्दळू॥ ५२॥ करितां चरणांचें वर्णन। न धाये देवांचें मन। पुढतपुढतीं चरणस्तवन। ध्वजलक्षण वर्णिती॥ ५३॥
केतुस्त्रिविक्रमयुतस्त्रिपतत्पताको
यस्ते भयाभयकरोऽसुरदेवचम्वो:।
स्वर्गाय साधुषु खलेष्वितराय भूमन्
पाद: पुनातु भगवान् भजतामघं न:॥ १३॥
बलिबंधनीं अनंता। त्रिविक्रमचरणु वाढतां। सत्यलोकाही वरुता। दिसे झळकता श्रीचरणु॥ ५४॥ चरणु वाढला सर्वांवरी। तो ‘केतु’ बोलिजे कवीश्वरीं। पताका झळकत कवणेपरी। सुरसरी निजगंगा॥ ५५॥ बलिबंधनीं आवेश। चरण उचलिला दुराश। नखें भेदला आवरणाकोश। जळ बहुवस चालिलें॥ ५६॥ चरणस्पर्शें भगवंता। जाहली जीवनासी पवित्रता। ब्रह्मा कमंडलीं धरितां। शिवें माथां वाहिली॥ ५७॥ चरणध्वजीं पताका ते गंगा। त्रिवाहिनी त्रिपथगा। चरणशोभा श्रीरंगा। नयनभृंगा उल्हासु॥ ५८॥ केतु झळकलिया पाठीं। आसुरी सेनेसी भय उठी। दैवी संपत्तीचे पोटीं। अत्यंत उठी आल्हादु॥ ५९॥ आणिक चरणाची कथा। देवांसी स्वर्गसुखदाता। तोच चरणु अधर्मवंतां। होय तत्त्वतां नरकहेतु॥ १६०॥ एक तरले चरण पूजितां। एक तरले चरण ध्यातां। चरण उपेक्षिती सर्वथा। अध:पाता ते जाती॥ ६१॥ चरण वंदिती कां निंदिती। ते निजपदाप्रती जाती। सर्वथा जे उपेक्षिती। अधोगती तयांसी॥ ६२॥ चरण वंदितां तरली शिळा। निंदितां उद्धरिलें शिशुपाळा। जे उपेक्षिती चरणकमळा। तयां खळां रौरव॥ ६३॥ ऐकें स्वामिया व्यापका। ऐसा तुझा चरण निका। आमुच्या सकळ पातकां। क्षणार्धें देखा उद्धारु॥ ६४॥ जेथ पापाचा जाहला उद्धारु। तेथ सहजचि खुंटला दुराचारु। ऐसा तरावया संसारु। चरण साचारु पैं तुझा॥ ६५॥
नस्योतगाव इव यस्य वशे भवन्ति
ब्रह्मादयस्तनुभृतो मिथुरर्द्यमाना:।
कालस्य ते प्रकृतिपूरुषयो: परस्य
शं नस्तनोतु चरण: पुरुषोत्तमस्य॥ १४॥
निजसुखातें विस्तारिता। तुझा चरण जी अच्युता। काळादिकर्माचा शास्ता। आत्मा नियंता देवाचा॥ ६६॥ तूं काळाचा निजनियंता। काळासी अकाळें न करवे सत्ता। देवांसी अधिकारीं स्थापिता। देवनियंता तूं कृष्णा॥ ६७॥ कर्मस्वामी तूं कृष्णनाथा। इंद्रियक्रिया समस्ता। कोणा न करवे अन्यथा। कर्मनियंता श्रीकृष्णा॥ ६८॥ ब्रह्मादि शरीरधारी। तुज आधीन गा श्रीहरी। जैसे नाथिले बैल नांगरीं। कृषीवळू धरी स्वामित्वें॥ ६९॥ तेथ जो राहे मागें पुढें। तो झोडिजे आसुडें। तुझे आज्ञेवरी रोकडे। वर्तती गाढे कळिकाळादिक॥ १७०॥ संसारलक्षण शेतासी। अधिकारीं जुंपोनि सर्वांसी। निजकर्में क्षेत्रासी। तूं वाहविसी निजाज्ञा॥ ७१॥ रोंवोनि अहंकाराची मेढी। महत्तत्त्वांचें खळें झाडी। त्रिगुणदोरें बापुडीं। बांधिशी कडोविकडी जीवपशूंतें॥ ७२॥ उदोअस्तांचेनि झणत्कारें। देतां निजकर्मांचे फेरे। जो खांदा चुकवोनि वोसरे। तोचि मारें मारिजे॥ ७३॥ हा बोल जरी म्हणसी वायां। ‘सृष्टिकर्त्रीधरिती माया। मजसी संबंध नाहीं यया’। देवराया हें न म्हणें॥ ७४॥ मायेसी तूं अधिष्ठान। यालागीं तूं परम कारण। तुझिये मांडीवरी जाण। क्रीडास्थान प्रकृतिपुरुषां॥ ७५॥ तूं मायेहूनि अपारु। प्रकृतिपुरुषांहूनि परु। काळाचा काळ तूं दुर्धरु। सर्वसंहारुकर्ता तूं॥ ७६॥ आमुच्या निजसुखा उत्तमा। तुझा चरणविस्तार मेघश्यामा। हेंचि मागों पुरुषोत्तमा। कृपा आम्हांवरी कीजे॥ ७७॥
अस्यासि हेतुरुदयस्थितिसंयमाना-
मव्यक्तजीवमहतामपि कालमाहु:।
सोऽयं त्रिणाभिरखिलापचये प्रवृत्त:
कालो गभीररय उत्तमपूरुषस्त्वम्॥ १५॥
जगाची उत्पत्ति स्थिति। तुजचिपासोनि श्रीपति। सकळ संहारिता अंतीं। तूंचि निश्चितीं महाकाळु॥ ७८॥ क्षोभलिया तामसी शक्ती। सृष्टीचा प्रळय करी अंतीं। तेथें बीजरूपीं अव्यक्तीं। जीव राहती सूक्ष्मत्वें॥ ७९॥ मग उत्पत्तीचे काळवेळे। तींच बीजें विरूढती सकळें। पाल्हेजती स्थितिकाळें। पुष्पफळें सफळित॥ १८०॥ ‘हे गुणक्षोभाची अवस्था। तेथ मी नव्हें प्रळयकर्ता’। ऐसें म्हणसी जरी कृष्णनाथा। तरी हे कथा परियेसीं॥ ८१॥ तुझा साचार जाहलिया भावो। माया महत्तत्त्व आणि जीवो। नासोनियां दास पाहा हो। निजपदीं निर्वाहो भोगिती॥ ८२॥ त्या तुज सकळ संहारितां। कोण दुर्घटता कृष्णनाथा। कारणेंसी प्रळयकर्ता। तूंचि सर्वथा महाकाळु॥ ८३॥ कळों नेदिसी संसारस्थिती। अतिसूक्ष्म काळगती। नाश करिसी अंतीं। निजप्रकृतिविकार॥ ८४॥ प्रळयासी प्रमाण मूळ। लव निमेष घटिका पळ। अहोरात्र त्रिकाळ। ‘त्रिनाभी’ केवळ जो म्हणिये॥ ८५॥ ऐसिये गंभीर गतीसीं। मायामहत्तत्त्व नाशिसी। तो तूं ‘महाकाळ’ होसी। हृषीकेशी श्रीकृष्णा॥ ८६॥
त्वत्त: पुमान् समधिगम्य ययाऽस्यवीर्य
धत्ते महान्तमिव गर्भममोघवीर्य:।
सोऽयं तयानुगत आत्मन आण्डकोशं
हैमं ससर्ज बहिरावरणैरुपेतम्॥ १६॥
पुढतीं सृष्टीचा सृजिता। तूंचि होशी गा अनंता। ते उत्पत्तीची अवस्था। मूळकर्ता तूंचि तूं॥ ८७॥ तुझी लाहोनि वीर्यशक्ती। होये पुरुषासी पुरुषत्वप्राप्ती। तेणें अंगीकारूनि प्रकृती। केलें उत्पत्ती गर्भाधान॥ ८८॥ तेचि ते वेळीं प्रकृती। महत्तत्त्वीं होय गर्भवती। पंचतत्त्वेंसी गर्भीं धरिती। हिरण्यवर्ण अंडातें॥ ८९॥ तें अमोघ वीर्य प्रबळ। गर्भीं विश्वाकार बाळ। धरिती जाहली वेल्हाळ। ब्रह्मांड सकळ अंडामाजीं॥ १९०॥ जैसें गर्भासी उल्ब जाण। तैसें अंडासी बहिरावरण। सप्तधा नेमस्त प्रमाण। तूं निर्माण करविता॥ ११॥ पृथ्वी जल अनल अनिल। नभ आणि अहंकार स्थूळ। सातवें तें अतिसबळ। जाण केवळ क्रियासूत्र॥ ९२॥ त्या गर्भासी जतनेवरी। तूंचि आंतु आणि बाहेरी। रिघालासी सूत्रधारी। खांबसूत्री जैसा कां॥ ९३॥ ऐसें जग जाहलें दोघांपासूनी। परी तिसरें न देखों कोणी। अवघी सृष्टी दोघीजणीं। दुमदुमुनी भरलीसे॥ ९४॥ वाती लावूनि पाहतां। तिसरें न लगेचि हाता। दुसरी प्रकृती निर्धारितां। तेही सर्वथा टवाळ॥ ९५॥ ऐसा दुजेनवीण एकला। एकलाचि विश्व जाहला। आकळीत कौशल्यकळा। मल्लमर्दना श्रीकृष्णा॥ ९६॥ एवं एकलेपणें तूं कर्ता। त्यालागीं लेपु न लगे सर्वथा। कर्म करूनि तूं अकर्ता। तेचि कथा परियेसीं॥ ९७॥
तत्तस्थुषश्च जगतश्च भवानधीशो
यन्माययोत्थगुणविक्रिययोपनीतान्।
अर्थाञ्जुषन्नपि हृषीकपते न लिप्तो
येऽन्ये स्वत: परिहृतादपि बिभ्यति स्म॥ १७॥
चरें आणि अचरें। जंगमें आणि स्थावरें। या जगाचा स्वामी तूं निर्धारें। केलें खरें गतश्लोकीं॥ ९८॥ तेंचि स्वामित्व कैसें घडे। हें जरी पुससी धडफुडें। तरी तेहीविखीं रोकडें। वचन गाढें अवधारीं॥ ९९॥ निजमायेचेनि योगें। नाना विषय भोगिसी अंगें। तें भोगिलेपण अंगीं न लगे। अकर्तात्मसंगें अलिप्त॥ २००॥ तोचि अकर्तात्मबोधु कैसा। जरी म्हणशी हृषीकेशा। ते आगमनिगमां अतर्क्य दशा। परम पुरुषा परियेसीं॥ १॥ भोग्य-भोग-भोक्ता। या तिहींतें तूं प्रकाशिता। जेवीं घटीं बिंबोनि सविता। अलिप्तता स्वभावें॥ २॥ घट-जळ-प्रति-बिंबासी। स्वयें सविता प्रकाशी। प्रकाशूनि अलिप्त त्यांसी। तेवीं तूं भोगासी श्रीकृष्णा॥ ३॥ अथवा कर्म-कार्य-कर्ता। या तिहींमाजीं निजात्मता। देखे तो अभोक्ता। भोगोनि तत्त्वतां निजभोग॥ ४॥ दर्पणींच्या प्रतिबिंबासीं। जो प्रवर्तला भोगासी। व्यभिचाराचा आळ त्यासी। केवीं अंगासी लागेल॥ ५॥ जगचि हें अवघें। जो होऊनि ठाके अंगें। त्यासी बाधावें कोणें भोगें। निजात्मयोगें योगिया॥ ६॥ ऐशिया बोधाचेनि बळें। तो विषयावरी जरी लोळे। तरी विषयाचेनि विटाळें। बोधु न मैळे तयांचा॥ ७॥ तो घेणें देणें करी। पाहतां दिसे व्यवहारी। नांदतांही घरदारीं। त्यामाझारीं तो नाहीं॥ ८॥ नेणोनि बोधाची मागी। भोगत्याग केला योगीं। तरी कांपताति सर्वांगीं। वासना अंगीं उरलीसे॥ ९॥ स्वप्नीं विषय देखती। जागे जाहल्या प्रायश्चित घेती। नाहीं मावळली अहंकृती। यालागीं भीती सर्वदा॥ २१०॥ ऐशिया जी विषयभेडा। नाहीं निजबोधु धडफुडा। तैसा नव्हेसी तूं निधडा। दिसे रोकडा निजबोधु॥ ११॥
स्मायावलोकलवदर्शितभावहारि-
भ्रूमण्डलप्रहितसौरतमन्त्रशौण्डे:।
पत्न्यस्तु षोडशसहस्रमनङ्गबाणै-
र्यस्येन्द्रियं विमथितुं करणैर्न विभ्व्य:॥ १८॥
मी निधडा निजबोधें संपूर्ण। म्हणशी देखों न शके कवण। ये अर्थींचें उपलक्षण। ऐक ते खूण स्वामिया॥ १२॥ सोळा सहस्र पत्न्या घरीं। आणि गोकुळींच्या परनारी। कुब्जादि मथुरेमाझारीं। कर्णकुमारी भोगिल्या॥ १३॥ मुंजी नव्हतां आधीं। भोगिली त्वां गोंवळी पेंधी। धरोनियां सांदीबिदीं। नदोनदीं असंख्य॥ १४॥ अविधी भोगितां नारी। बोध न मैळेचि श्रीहरी। अंगें रिघालासी क्षीरसागरीं। अर्जुना करीं धरोनी॥ १५॥ शेषशायी नारायणा। उत्कंठा तुझिया दर्शना। तेणें उपावो केला जाणा। हरूनि ब्राह्मणाचीं बाळें॥ १६॥ जेवीं आपुलें स्वरूप आपण। पहावया कीजे दर्पण। तेवीं पहावया कृष्णार्जुन। स्वयें नारायण अपत्यें आणी॥ १७॥ ‘तूं अवतार नर-नारायण। तुझें घ्यावया दरुषण। ब्राह्मणअपत्यें जाण। म्यां आपण आणिलीं’॥ १८॥ ऐसे नारायणाचे बोल। सप्रेम अतिसखोल। आम्हीं ऐकिले गा सकळ। तुझा बोध अकळ श्रीकृष्णा॥ १९॥ तीं ब्राह्मणाचीं अपत्यें। जीं बहु काळ जाहलीं होतीं मृतें। तुवां आणोनि दिधलीं श्रीअनंतें। तीं देखिलीं समस्तें चरितें आम्हीं॥ २२०॥ तुझी नारायणासी आस्था। तेथ आमुची कवण कथा। पार न कळे जी अच्युता। गुणातीता श्रीकृष्णा॥ २१॥ मागां अवतार जाहले। परी ऐसें चरित्र नाहीं केलें। विधिवेदां लाजविलें। व्यभिचारियां दिधलें निजपद॥ २२॥ जें म्यां भोगिलें स्त्रियांसी। तें तूं उदासीनत्वें म्हणसी। तेणें बाध न पवे बोधासी। हृषीकेशी तें न घडे॥ २३॥ हावभावविलासेंसीं। अंगें दाविती चपळतेसी। तुज लक्षोनि पुरुषोत्तमासी। कामबाणासी योजिती॥ २४॥ वाऊनि भ्रुमंडलाचे वेढे। व्यंकट कटाक्षें बाण गाढे। सुरतमंत्रीं रोकडे। केले धडफुडे सतेज॥ २५॥ ज्या बाणांचे घायीं। इंद्र खोंचला सहस्रां ठायीं। शिव लोळविला पाहीं। मोहिनीव्यामोहीं महाबाणें॥ २६॥ ज्या बाणाचा पिसारा। लागतांचि पैं भेदरा। तापसीं घेतला पुरा। सोडोनि घरदारा पळाले॥ २७॥ ऐसें सोळा सहस्र बाण। अखंड तुजचिवरी संधान। करितां न मैळे बोधु जाण। अतिविंदान हें तुझें॥ २८॥ घरींच्या स्त्रिया सहस्र सोळा। गोकुळादि मथुरेच्या अबळा। तुज विषयी करावया गोपाळा। नव्हती सकळा समर्था॥ २९॥ त्यांचेनि तुज न करवे विषयी। परी त्या त्वां केल्या निर्विषयी। ऐसा तूं त्रैलोक्याचे ठायीं। स्वामी पाहीं श्रीकृष्णा॥ २३०॥ ऐशी तुझी कीर्ति ऐकतां। अथवा चरणतीर्थ घेतां। याचि दोंही तीर्थांची समर्थता। पवित्रता जगासी॥ ३१॥
विभ्व्यस्तवामृतकथोदवहास्त्रिलोक्या:
पादावनेजसरित: शमलानि हन्तुम्।
आनुश्रवं श्रुतिभिरङ्घ्रिजमङ्गसङ्गै-
स्तीर्थद्वयं शुचिषदस्त उपस्पृशन्ति॥ १९॥
तुझिये कीर्तीचें श्रवण। आंतरमलाचें क्षालन। करूनियां वृत्ति जाण। परम पावन कीर्तनें॥ ३२॥ तुझिया चरणींची गंगा। सकळ पातकें ने भंगा। ते पायवणी श्रीरंगा। पवित्र जगातें करी॥ ३३॥ या दोंही तीर्थांचें सेवन। अखंड करिती साधुजन। तेणें होऊनि परम पावन। समाधाननिजवृत्ती॥ ३४॥ अवतारांचे अंतीं। ये दोनी तीर्थीं अतिविख्याती। प्रगट केली तुवां क्षिती। तारावया श्रीपती निजदासां॥ ३५॥ एक श्रवणें एक स्नानें। दोनी तीर्थें परम पावनें। प्रगट केलीं जगज्जीवनें। मलिन जनें तरावया॥ ३६॥
बादरायणिरुवाच
इत्यभिष्टूय विबुधे: सेश: शतधृतिर्हरिम्।
अभ्यभाषत गोविन्दं प्रणम्याम्बरमाश्रित:॥ २०॥
शुक म्हणे परीक्षिती। यापरी देवीं समस्तीं। स्तविला स्वानंदें श्रीपती। परमभक्तिभावार्थें॥ ३७॥ ऐसा करूनि स्तुतिवादु। संतोषविला गोविंदु। देवांसी होत असे आल्हादु। परम विनोदुसर्वांसी॥ ३८॥ स्तुति करावया अग्रणी। ब्रह्मा शिव पुढें येऊनी। तिंहीं जय-जयकार करूनी। लोटांगणें घातलीं॥ ३९॥ देव राहूनियां गगनीं। हात जोडोनि विमानीं। विनंती करावयालागोनी। ब्रह्मा पुढें राहोनी बोलतु॥ २४०॥
ब्रह्मोवाच
भूमेर्भारावताराय पुरा विज्ञापित: प्रभो।
त्वमस्माभिरशेषात्मंस्तत्तथैवोपपादितम्॥ २१॥
उतरावया धराभारा। पूर्वीं प्रार्थिलासी यदुवीरा। अभय द्यावया सुरवरां। आम्हीं श्रीधरा विनविलें॥ ४१॥ आम्हीं विनविलें जैसें। तुवां कार्य केलें म्हणों तैसें। त्याहूनियां विशेषें। केली निजविन्यासें धर्मवृद्धी॥ ४२॥ तूं सर्वेश्वरु सर्वात्मा। जें कार्य न कळेचि आम्हां। तेंही तुवांपुरुषोत्तमा। घनश्यामा संपादिलें॥ ४३॥
धर्मश्च स्थापित: सत्सु सत्यसन्धेषु वै त्वया।
कीर्तिश्च दिक्षु विक्षिप्ता सर्वलोकमलापहा॥ २२॥
सत्यवादी साधु जे कांहीं। ज्यांचा संकल्प तुझ्या पायीं। धर्म स्थापिला त्यांच्या ठायीं। तुवांपाहीं यथास्थित॥ ४४॥ आणिक दश दिशांप्रती। विस्तारिली उदार कीर्ती। तेणें पावन त्रिजगती। होय निश्चितीं श्रवणद्वारें॥ ४५॥
अवतीर्य यदोर्वंशे बिभ्रद्रूपमनुत्तमम्।
कर्माण्युद्दामवृत्तानि हिताय जगतोऽकृथा:॥ २३॥
पूर्णपुरुषा हृषीकेशी। तूं अवतरलासी यदुवंशीं। सीमा तुझिया रूपासी। बरवेपणासी न करवे॥ ४६॥ तूं सर्वांमाजीं सर्वोत्तम। देखतां वृत्तींसी उपरम। लीलाविग्रही पुरुषोत्तम। मनोरम सकळिकां॥ ४७॥ कर्में केलीं परमाद्भुतें। गोवर्धन धरिला वाम हस्तें। मुखें प्राशूनि वणव्यातें। गोपाळांतें वांचविलें॥ ४८॥ मृता आणिलें गुरुपुत्रासी। गत गर्भ भेटविले देवकीसी। गोपालवत्सेंतूं जाहलासी। विधात्यासी भुलविलें॥ ४९॥ जगाचिया परम हिता—। लागीं नाना चरित्रकथा। करिता जालासी श्रीअनंता। कृष्णनाथा निजजनका॥ २५०॥
यानि ते चरितानीश मनुष्या: साधव: कलौ।
शृण्वन्त: कीर्तयन्तश्च तरिष्यन्त्यञ्जसा तम:॥ २४॥
कथाकौतुकें विचित्रें। नाना परींचीं चरित्रें। परम पावन पवित्रें। येणें अवतारें त्वां केलीं॥ ५१॥ कलियुगीं साधुजन। या चरित्रांचें श्रवण कीर्तन। करितां तरले जाण। मायामोह त्रिगुणेंसीं॥ ५२॥
यदुवंशेऽवतीर्णस्य भवत: पुरुषोत्तम।
शरच्छतं व्यतीयाय पञ्चविंशाधिकं प्रभो॥ २५॥
अवतरल्या यदुवंशीं। पुरुषोत्तमा हृषीकेशी। संख्या या अवतारांसी। जाहली ते तुजपाशीं सांगेन॥ ५३॥ मृत्युलोकीं मनुष्यमर्यादा। शत वर्षें जी गोविंदा। ते अतिक्रमोनि आवदा। अधिक मुकुंदा पंचवीस जाहलीं॥ ५४॥
नाधुना तेऽखिलाधार देवकार्यावशेषितम्।
कुलं च विप्रशापेन नष्टप्रायमभूदिदम्॥ २६॥
आतां पुढें येथ कांहीं। देवकार्य उरलें नाहीं। यादवकुळ म्हणसी तेंही। नष्टप्राय पाहीं उरलेंसे॥ ५५॥ उठवणी आलें हतिरूं। कां पांख उपडिल्या पांखरूं। तैसा यादवांचा दळभारू। भूमिये भारु उरला असे॥ ५६॥ निवणाचा फुटका डेरा। कां क्षयो लागल्या राजकुमरा। वणवा आहाळल्या अजगरा। यादववीरां ते दशा॥ ५७॥ दारुण ब्राह्मणाचा शाप। नाशला वीर्यशौर्यप्रताप। गळाला वाढिवेचा दर्प। केवळ प्रेतरूप दिसताती॥ ५८॥
तत: स्वधाम परमं विशस्व यदि मन्यसे।
सलोकाँल्लोकपालान्न: पाहि वैकुण्ठ किङ्करान्॥ २७॥
यालागीं जी यादवराया। आम्ही वांछूं तुझ्या पायां। वेगु कीजे स्वधामा यावया। सुरवर्या श्रीकृष्णा॥ ५९॥ ऐकें देवकींनंदना। जरी मानेल तुझिया मना। तरी निघिजो जी याचि क्षणा। सुरसेना तिष्ठत॥ २६०॥ सलोक लोकपाळ जे जे। त्यांवरी तुवां कृपा कीजे। आम्ही किंकर गा तुझे। वचन मानिजे दासांचें॥ ६१॥ ऐकें जी वैकुंठनाथा। तुझी थोर आम्हां अवस्था। आदिकरूनि उमाकांता। आणि समस्तां देवांसी॥ ६२॥
श्रीभगवानुवाच
अवधारितमेतन्मे यदात्थ विबुधेश्वर।
कृतं व: कार्यमखिलं भूमेर्भारोऽवतारित:॥ २८॥
जो योगज्ञाना मुकुटमणी। मेघगंभीरया वाणी। ब्रह्मयाप्रती चक्रपाणी। हास्यवदनींबोलिला॥ ६३॥ नादब्रह्म मुसावलें। कीं निजानंदाचें फळ पिकलें। तैसें श्रीमुखें बोलों आदरिलें। भाग्य उदेलें श्रवणांचें॥ ६४॥ गौरवें म्हणे ‘ब्रह्मदेवा। संतोषलों तुझिया भावा’। पुत्रस्नेहेंकरूनि तेव्हां। उद्यत खेवा हरि जाला॥ ६५॥ आवडीं म्हणे विबुधेंद्रा। सत्य तुझी वाङ्मुद्रा। तुझेनि वचनें ब्राह्मणेंद्रा। धराभारा उतरिलें॥ ६६॥ सकळ कार्य नि:शेख। म्यां संपादिलें देख। तरी उरलेंअसे एक। थोर अटक मजलागीं॥ ६७॥
तदिदं यादवकुलं वीर्यशौर्यश्रियोद्धतम्।
लोकं जिघृक्षद् रुद्धं मे वेलयेव महार्णव:॥ २९॥
यद्यसंहृत्य दृप्तानां यदूनां विपुलं कुलम्।
गन्तास्म्यनेन लोकोऽयमुद्वेलेन विनङ्क्षॺति॥ ३०॥
हें यादवकुळ येथ। वीर्यशौर्यश्रियोद्धत। धर्म नाशावया उद्यत। अतिदृप्त निजबळें॥ ६८॥ हे छेदूं पाहती धर्ममूळें। म्यां आवरिले असती योगबळें। जेवीं समुद्रातें मर्यादवेळें। असे राखिलें नेमूनी॥ ६९॥ सांडोनि ऐशियांसी। मज गेलिया निजधामासी। हे प्रवर्ततील अधर्मासी। कोण यांसी वारील॥ २७०॥ जैसा निर्मर्याद सागरू। खवळल्या सर्वसंहारकरू। त्यासी कोण शकेल आवरूं। तैसा विचारू होईल॥ ७१॥ हे अधर्मपर होतील गाढे। तुम्हांसी पडेल सांकडें। सांगों धांवाल मजपुढें। यांचें रोकडें गाऱ्हाणें॥ ७२॥ हे नाटोपती देवां। नाकळती दैत्यां दानवां। हें अधर्म करिती जेव्हां। तुम्हीच मज तेव्हां सांगों याल॥ ७३॥
इदानीं नाश आरब्ध: कुलस्य द्विजशापत:।
यास्यामि भवनं ब्रह्मन् एतदन्ते तवानघ॥ ३१॥
यालागीं कुळनाशासी त्वरित। आजिपासोनि सुमुहूर्त। केला असे गा निश्चित। यथोचितयादवां॥ ७४॥ ऐकें सखया प्रजापती। या कुळनाशाचिया अंतीं। तुझिया भुवनावरूनि निश्चितीं। निजधामाप्रती येईन॥ ७५॥ ऐसें बोलिला प्रभू। ऐकोनि शंभु स्वयंभू। आनंदला देवकदंबू। समारंभू मांडिला॥ ७६॥ जयजयकारु केला सकळीं। परमानंदें पिटिली टाळी। चरण वंदूनि वनमाळी। पुष्पांजळी अर्पिल्या॥ ७७॥
श्रीशुक उवाच
इत्युक्तो लोकनाथेन स्वयम्भू: प्रणिपत्य तम्।
सह देवगणैर्दैव: स्वधाम समपद्यत॥ ३२॥
शुक म्हणे परीक्षिती। ऐकोनि कृष्णवदंती। सुरवर आनंदले चित्तीं। आल्हादें करिती अभिवंदनें॥ ७८॥ धाता सविता शूळपाणी। मिळोनियां देवगणीं। कृष्णासी घातल्या लोटांगणीं। चरण वंदूनी निघाले॥ ७९॥ एवं वंदूनी श्रीपती। आपुलिया स्थानाप्रती। निघाल्या जी देवपंक्ती। पवनगती विमानें॥ २८०॥
अथ तस्यां महोत्पातान् द्वारवत्यां समुत्थितान्।
विलोक्य भगवानाह यदुवृद्धान् समागतान्॥ ३३॥
कुळनाशु करणें रोकडें। ऐसें कृष्णें नेमिलें धडफुडें। तंव द्वारकेसी येरीकडे। महोत्पात गाढे उठिले॥ ८१॥ गगनीं निघाले त्रिकेतु। धुमकेतु दंडकेतु। शिखेसहित शिखाकेतु। गगनाआंतु उगवले॥ ८२॥ माध्यान्हीं वाजला आघात। दिवसा उल्कापात होत। होत भूतें नागवीं नाचत। गगनाआंत रुदती॥ ८३॥ वृक जंबुक नगराआंत। दिवसा चौबारा कुंकात। नगरीं भालुवा भुंकत। जन कांपत देखोनी॥ ८४॥ नगरा आंतुबाहेरी। श्वानांचीं रडणीं भारीं। मार्जारकलहो नगरीं। घरोघरीं होतसे॥ ८५॥ गाई आरडती मध्यरात्रीं। लेंकुरें खेळती झुंझारीं। माणसांतें झडपिती घारी। घुंघाती घरोघरीं दिवाभीतें॥ ८६॥ वागीश्वरी क्षोभली गाढी। बोलीं म्हणती आली यमधाडी। कां रे धांवतां तांतडी। आगीं उडी घालूं पाहतां॥ ८७॥ भूस्फोट भूमिकंप। अग्निकरणीं तपे आतप। वारेनि सोडिला अहा कंप। लागे झडप खरस्पर्शें॥ ८८॥ धुळोरा उधळत नगरीं। रज भरे डोळ्ॺांमाझारीं। डोळा नुघडवे नरनारीं। दिशा चारी धुमधुमित॥ ८९॥ ऐसे नाना परींचे उत्पात। नगरीं रुधिरवृष्टि होत। देखोनि यादव समस्त। भयचकित पैं जाहले॥ २९०॥ यादव मिळोनि थोर थोर। वृद्ध वृद्ध करिती विचार। ये चिन्हें अरिष्टकर। विघ्न थोर दिसतसे॥ ९१॥ अवघे आले कृष्णापाशीं। वृत्तांत सांगती तयासी। उद्विग्न देखोनि यादवांसी। हृषीकेशी बोलिला॥ ९२॥
श्रीभगवानुवाच
एते वै सुमहोत्पाता व्युत्तिष्ठन्तीह सर्वत:।
शापश्च न: कुलस्यासीद्ब्रलाह्मणेभ्यो दुरत्यय:॥ ३४॥
कृष्ण यादवांसी सांगत। दिवि-भू-अंतरिक्षगत। उठिले जे महोत्पात। सर्वगत सर्वदा॥ ९३॥ देखोनियां चिन्हांसी। मजही आठवलें मानसीं। ब्राह्मणशाप यदुकुळासी। चिन्हें त्यासी सूचकें॥ ९४॥ ब्राह्मणांचा शापु खरा। नुल्लंघवे हरिहरां। तुम्ही आतांचि विचार करा। नगराबाहिरा जनु काढा॥ ९५॥
न वस्तव्यमिहास्माभिर्जिजीविषुभिरार्यका:।
प्रभासं सुमहत्पुण्यं यास्यामोऽद्यैव मा चिरम्॥ ३५॥
येथोनि द्वारकेची वस्ती। आम्हीं सांडावी समस्तीं। जीवें जियावयाची चाड चित्तीं। तरी प्रभासाप्रती निघावें॥ ९६॥ वेगीं करा रे तांतडी। आजचि निघा लवडसवडी। सांडा घरदारांची गोडी। येथ अर्धघडी न रहावें॥ ९७॥
यत्र स्नात्वा दक्षशापाद्गृहीतो यक्ष्मणोडुराट्।
विमुक्त: किल्बिषात्सद्यो भेजे भूय: कलोदयम्॥ ३६॥
ऐका समस्त यादवश्रेष्ठ। प्रभासतीर्थ महावरिष्ठ। जेथिंचेनि स्नानें उडुराट। निस्तरला कष्ट क्षयाचे॥ ९८॥ दक्षें निजकन्या चंद्रासी। सत्तावीस दिधल्या त्यासी। तो रतला रोहिणीसीं। येरां सर्वांसी उपेक्षुनी॥ ९९॥ दक्षें शापिलें चंद्रासी। क्षयरोग लागला त्यासी। तेणें येऊनि प्रभासासी। स्नानदानासी पैं केलें॥ ३००॥ स्नानमात्रें केवळ। क्षयरोग गेला तत्काळ। कळा पावला सकळ। शोभे निर्मल निजतेजें॥ १॥
वयं च तस्मिन्नाप्लुत्य तर्पयित्वा पितॄन् सुरान्।
भोजयित्वोशिजो विप्रान्नानागुणवतान्धसा॥ ३७॥
आम्हीही तेथ स्नान दान। पितृतर्पण देवतार्चन। करूं ब्राह्मणापूजन। जे संपन्न श्रुति शास्त्रीं॥ २॥ नाना परींचीं पक्वान्ने। गुणाधिक्यें मिष्टान्ने। देवां ब्राह्मणांसी भोजनें। नाना दानें विधानोक्त॥ ३॥
तेषु दानानि पात्रेषु श्रद्धयोप्त्वा महान्ति वै।
वृजिनानि तरिष्यामो दानैर्नौभिरिवार्णवम्॥ ३८॥
श्रद्धेचेनि नेटेंपाटें। पाहूनि दानपात्रें चोखटें। दान द्यावें गोमटें। भूमी वोलटे जेवीं बीज॥ ४॥ ब्राह्मणाचें मुख तें क्षेत्र। पालवियेपेढीवीण पवित्र। ऐसें पाहूनि सुक्षेत्र। दानें विचित्र पेरावीं॥ ५॥ विनीततेची सेल वोल। श्रद्धेचें चाडें निर्मळ। शमदमादि बैल सबळ। ते तात्काळ जुंपोनी॥ ६॥ ऐशिया वोजा परी। बीज पेरिलिया क्षेत्रीं। पीक पिकेल घुमरीं। पुरुषार्थ चारी लगटोनी॥ ७॥ त्या पिकाचेनि सबळें। पापें तरोनि पै सकळें। जेवीं नावेचेनि बळें। समुद्रजळें तरिजेती॥ ८॥
श्रीशुक उवाच
एवं भगवताऽऽदिष्टा यादवा: कुलनन्दन।
गन्तुं कृतधियस्तीर्थं स्यन्दनान् समयूयुजन्॥ ३९॥
शुक म्हणे कौरवनंदना। ऐकें परीक्षिति सज्ञाना। कृष्णें दिधली अनुज्ञा। तीर्थविधानाप्रभासा॥ ९॥ यादव उठिले गाढे। रथीं जुंपिले जी घोडे। येर धांवती येरांपुढें। चहूंकडे लगबग॥ ३१०॥
तन्निरीक्ष्योद्धवो राजन् श्रुत्वा भगवतोदितम्।
दृष्ट्वारिष्टानि घोराणि नित्यं कृष्णमनुव्रत:॥ ४०॥
थोर वीरांचे बोभाट। गजरथांचे घडघडाट। द्वारकेमाजीं न फुटे वाट। प्रयाण उद्भट प्रभासासी॥ ११॥ हडबडली देखोनि द्वारावती। ऐक राया परीक्षिती। उद्धवास आठवलें चित्तीं। कृष्णवदंती देवांसी॥ १२॥ कुळनाशासी त्वरित। आजीपासूनि सुमुहूर्त। तोचि देवें प्रस्तुत। कार्यार्थ निश्चित मांडिला॥ १३॥ उद्धव कृष्णासवें संतत। कृष्णानुमतें तो वर्तत। सुरसंवाद निश्चित। होता श्रुत तयासी॥ १४॥ असतां येथ कृष्णनाथ। द्वारकेमाजीं अतिउत्पात। उठिले तें मनोगत। जाण निश्चित कृष्णाचें॥ १५॥ यादव नेऊनि प्रभासासी। अर्धक्षणें नाशीलयांसी। जावया निजधामासी। हृषीकेशी उद्यत॥ १६॥ म्हणाल ‘कां नेले इतुके दुरी। नाशु न करीच द्वारकापुरी’। तरी तो सर्वज्ञ श्रीहरी। सूत्रधारी जाणता॥ १७॥ यादव देवांश निश्चितीं। सातवी पुरी द्वारावती। येथ निमाल्या सायुज्यमुक्ती। हें जाणोनि श्रीपति न नाशी॥ १८॥ यांसी आहे पदाभिमान। द्वारकेमाजीं न घडे निधन। हें जाणोनि जगज्जीवन। करवी प्रयाण प्रभासासी॥ १९॥ ब्रह्मशापाचें मूळ देखा। प्रभासासी निघाली ते येरिका। हें कळलेंसे यदुनायका। तेथ सकळिकां धाडिलें॥ ३२०॥ स्वकुळ ग्रासोनि श्रीपती। निघेल निजधामाप्रती। हें जाणोनि उद्धव चित्तीं। बहुतां रीतीं कळवळला॥ २१॥ बाष्पें कंठ निरोधला। नेत्रीं अश्रूंचा पूर लोटला। स्वेदु र्स्वांगीं चालिला। हृदयीं दाटला हुंदका॥ २२॥ कृष्णवियोग अर्ध क्षण। तेणें निघों पाहे प्राण। विसरला कार्य आठवण। कृष्णवदन निरीक्षी॥ २३॥ वियोगप्राप्तीचे बाण प्रबळ। हृदयीं रुतले अतिसबळ। बुद्धि धैर्येंसीं होती विकळ। जीवीं तळमळ लागली॥ २४॥ एकांत देखोनि श्रीकृष्णासी। धांवोनि लागला पायांसी। मिठी घालोनि चरणेंसीं। उकसाबुकसीं स्फुंदत॥ २५॥
विविक्त उपसङ्गम्य जगतामीश्वरेश्वरम्।
प्रणम्य शिरसा पादौ प्राञ्जलिस्तमभाषत॥ ४१॥
जो जगाचा नियंता। त्या काळाचा कृष्ण कळिता। त्याचे चरणीं ठेवूनि माथा विनीतता बोलतु॥ २६॥
उद्धव उवाच
देवदेवेश योगेश पुण्यश्रवणकीर्तन।
संहृत्यैतत्कुलं नूनं लोकं सन्त्यक्ष्यते भवान्।
विप्रशापं समर्थोऽपि प्रत्यहन्न यदीश्वर:॥ ४२॥
उद्धव म्हणे यादवेंद्रा। देवेंद्राच्या आदिइंद्रा। योगियांच्या प्रबोधचंद्रा। अकळ मुद्रा पैं तुझी॥ २७॥ देवांमाजीं इंद्र ईशु। त्या इंद्राचा तूं जगदीशु। योगियांमाजीं श्रेष्ठ महेशु। त्याचाही ईशु तूं श्रीकृष्णा॥ २८॥ तुझें जें श्रवणकीर्तन। तें पुण्यासी करी पावन। छेदी संसारबंधन। समाधान कीर्तनें॥ २९॥ संहारूनि निजकुळासी। सांडोनियां या लोकासी। निजधामा जावों पाहसी। हृषीकेशी निश्चित॥ ३३०॥
नाहं तवाङ्घ्रिकमलं क्षणार्धमपि केशव।
त्यक्तुं समुत्सहे नाथ स्वधाम नय मामपि॥ ४३॥
अन्यथा विप्रशापासी। करावया समर्थ होसी। तें न करूनि कुळ संहारिसी। निजधामासी जावया॥ ३१॥ ऐसें बोलतां आलें रुदन। न धरत चालिलें स्फुंदन। आसुवीं पूर्ण झाले नयन। धांवोनि चरण धरियेले॥ ३२॥ माथा ठेविला चरणांवरी। सखा स्वामी तूं श्रीहरी। आम्हांसी सांडूनियां दुरी। कैशापरी जासील॥ ३३॥ तुझिया प्रयाणाची वार्ता। ऐकतांचि गा अच्युता। उभड सांठवेना चित्ता। वियोग सर्वथा न व्हावा॥ ३४॥ जळावेगळी मासोळी। तैसा जीवु तळमळी। निष्ठुर जाहलासी अंतकाळीं। वनमाळी मजलागीं॥ ३५॥ तुज गेलियापाठीं। मी दीनवदन ये सृष्टीं। कोणासी सांगों गोड गोष्टी। श्वासु पोटीं न समाये॥ ३६॥ निघोनि गोलिया आत्मा। प्रेतरूप उरे प्रतिमा। तुवां गेलियां निजधामा। तैसें आम्हां होईल॥ ३७॥ तूंचि आम्हां जनक जननी। हा दृढ विश्वास आमुचे मनीं। केवीं जातोसी सांडोनि। म्हणोनि लोळणी घातली॥ ३८॥ तूं निघालासी निजधामा। कोणासी निरविलें जी आम्हां। कां रुसलासी पुरुषोत्तमा। बोलु निजकर्मा आमुच्या॥ ३९॥ मुकें बाळ सांडोनि क्षितीं। माता रिघों पाहे सती। तें जेवीं ये काकुळती। तैसी गती उद्धवा॥ ३४०॥ गोडु गिळी आमिषकवळु। सवेंचि पारधी आंसुडी गळु। त्या मीनाऐसा विकळु। होय प्रेमळु उद्धव॥ ४१॥ तुज गेलियावरी देवा। म्यां कोणाची करावी सेवा। कां रुसलासी गा यादवा। आमच्या दैवा निश्चित॥ ४२॥ कांटवणे आड क्षितीं। आंधळें सांडूनि जाये सांगाती। तें ग्लानी करी वनांतीं। तैसी गती उद्धवा॥ ४३॥ धांवधावों पायां पडे। धाय मोकलोनि रडे। मज सांडोनि तूंचि पुढें। कोणीकडे जातोसी॥ ४४॥ मी नव्हें पायांवेगळा। क्षण नोसंडीं चरणकमळा। तुझें प्रयाण जी गोपाळा। अंतकाळा मज काळु॥ ४५॥ तुझी थोर लागली सवे। मज न्यावें आपणासवें। हेंचि प्रार्थीतसे जीवेंभावें। कृपा यादवें मज कीजे॥ ४६॥ तूं गरुडारूढ होसी। तेव्हां कृपेनें बैसवीं पाठीसीं। सांडों नको हृषीकेशी। निजधामासी मज नेईं॥ ४७॥ सलगी दिधली जन्मवरी। अंतीं का त्यागिसी दुरी। कृपाळुवा श्रीहरी। कृपा करीं सर्वथा॥ ४८॥ म्हणसी मी निजकुळासी काळु। तो तुज केवीं होईन कृपाळु। हें न म्हणें तूं दीनदयाळु। अतिस्नेहाळु भक्तासी॥ ४९॥ तुझी कृपा भक्तांवरी। यालागीं मी सलगी करीं। मातें उद्धरीं श्रीहरी। झणें संसारीं सांडिसी॥ ३५०॥
तव विक्रीडितं कृष्ण नृणां परममङ्गलम्।
कर्णपीयूषमास्वाद्य त्यजत्यन्यस्पृहां जन:॥ ४४॥
तुझी क्रीडा नाना खेळ। प्राणियांसी परम मंगळ। कर्णद्वारें वेल्हाळ। निजनिर्मळ सेविती॥ ५१॥ तुझे कीर्तिश्रवणाचे आवडीं। लागली कर्णपीयूषीं गोडी। तेथ अमृताची चवी थोडी। होय अर्ध घडी न लागतां॥ ५२॥ ऐशी ऐकतां तुझी कीर्ती। सवासना स्पृहा नासती। ते भक्तु तुज न विसंबती। हृदयीं वाहती सर्वदा॥ ५३॥ त्या तुज प्रत्यक्ष श्रीकृष्णासीं। मज न साहवे वियोगासी। सवे लाविली आम्हांसी। सौजन्येंसीं स्वामित्वें॥ ५४॥
शय्यासनाटनस्थानस्नानक्रीडाशनादिषु।
कथं त्वां प्रियमात्मानं वयं भक्तास्त्यजेमहि॥ ४५॥
तूं तंव आमुचा स्वामी होसी। मज अर्धांसनीं बैसविसी। मजवेगळें हृषीकेशी। निजगुजासी तुज नाहीं॥ ५५॥ अचाट कार्य पडे थोर। तेव्हां मज पुससी विचार। मी सांगें जो जो मंत्र। तो साचार मानिसी॥ ५६॥ जेव्हां भोजन करूं रिघसी। माझें ताट ताटेंसीं मांडिसी। जेवितां नाना विनोद करिसी। निजशेष देसी मजलागीं॥ ५७॥ ब्रह्मादिकां न लभे पंक्ती। तो मी जेवीं तुझिया पांतीं। शेषविभागी जी श्रीपती। केलें निश्चितीं त्वां मज॥ ५८॥ मातें धरोनियां हातीं। एकला बैससी एकांतीं। ब्रह्मादिकांची विनंती। तुजप्रती मी सांगें॥ ५९॥ कळों नेदितां कोणासी। तुवां केलें रासक्रीडेसी। तें गुह्य सांगोनि मजपाशी। गोकुळासी धाडिलें॥ ३६०॥ सेजेचे उठवूनि भीमकीसी। मज आपणाजवळ निजविशी। ते निद्रेचिया सुखासी। समाधि कायसी बापुडी॥ ६१॥ ऐशिया तुझे संगतीं। रात्री भोगिल्या नेणों कितीं। त्या मज सांगोनि श्रीपती। जाणें निश्चितीं करितोसी॥ ६२॥ वेळु न गमे चक्रपाणी। मज बोलवूं धाडिसी रुक्मिणी। सारीपाटु आम्हीं दोघीं जणीं। एकासनीं खेळिजे॥ ६३॥ जेव्हां व्याहाळिये निघसी। मज आपुले रथीं बैसविशी। दोघां गमन एके रथेंसीं। आजि उबगलासी सांघाता॥ ६४॥ जळक्रीडा करितां जळीं। करितां गोपिकांसी रांडोळी। तेव्हांही मी तुजजवळी। स्नानकाळीं सर्वदा॥ ६५॥ ऐसें सांगों मी किती। तुजगेवळा श्रीपती। नाहीं झालों अहोरातीं। केवीं म्यां अंतीं सांडावें॥ ६६॥ तूं स्वामी सखा सर्वात्मा। जीवाचा जीव पुरुषोत्तमा। तुझा वियोगु मेघश्यामा। केवीं आम्हां साहवेल॥ ६७॥ आमुचा जीवु आणि प्राण। ते तुझे गा श्रीचरण। ते वियोगदु:ख साहावया जाण। समर्थपण मज नाहीं॥ ६८॥ आमुचा हाचि लाभु अव्यंग। जे तुझिया पायांचा संयोग। त्यांचा न साहवे वियोग। देहभंग झालिया॥ ६९॥ देह राहेल तरी राहो। अथवा जाईल तरी जावो। तुझ्या चरणांचा वियोग पहा हो। न शके साहों सर्वथा॥ ३७०॥ थोर दुस्तर तुझी माया। ब्रह्मादिकां न ये आया। मज सुगम जाली तरावया। यादवराया निजशेषें॥ ७१॥
त्वयोपभुक्तस्रग्गन्धवासोऽलङ्कारचर्चिता:।
उच्छिष्टभोजिनो दासास्तव मायां जयेमहि॥ ४६॥
तुझें गंधशेष आणि माळा। धरितां कपाळीं आणि गळां। मी नागवें कळिकाळा। दास गोपाळा पैं तुझा॥ ७२॥ तुझे कांसेचा पिंवळा। येऊनि माझे कांसे लागला। तैंचि कामु म्यां जिंतिला। दृढ जाहला निजकांसे॥ ७३॥ तुवां आपुले हृदयींचें पदक। जेव्हां मज दिधलें देख। तेव्हांचि माया जाहली विमुख। दासां सन्मुख न राहे॥ ७४॥ मायेसी असतें मुख। तरी हों लाहती सन्मुख। ते मिथ्या गा नि:शेख। वृथा लोक भ्रमलें पैं॥ ७५॥ तुझें उच्छष्ट सेवितां देख। लाजोनि जाये समाधिसुख। निडारला निजात्मतोख। शेषें प्रत्यक्ष निजलाभु॥ ७६॥ ऐसा तुझेनि दास्यें सरता जाहला। तुझेनि निजशेषें चर्चिला। तुझी माया मी तरला। जिया धाकु लाविला योगियां॥ ७७॥
वातरशना य ऋषय: श्रमणा ऊर्ध्वमन्थिन:।
ब्रह्माख्यं धाम ते यान्ति शान्ता: संन्यासिनोऽमला:॥ ४७॥
मिथ्या मायेच्या धाकासाठीं। योगी रिघाले कपाटीं। जरी सांडिली लंगोटी। तरी पोटीं धाकती॥ ७८॥ आसनस्थ होऊनि जाणा। आकळावया प्राणापाना। मूळबंधें आकोचना। दृढ धारणा ते करिती॥ ७९॥ अंगुलें बारा बारा। जिणावया जी वारा। रात्रंदिवस शरीरा। अभ्यासद्वारा आटिती॥ ३८०॥ क्षुधेनें खादली भूक। तृषा तहान प्याली देख। जिणोनियां सुखदु:ख। अतिनेटक निधीं॥ ८१॥ सुबुद्धि धरूनियां हातीं। आकळूनि इंद्रियवृत्ती। वैराग्यें करित ख्याती। ऊर्ध्वगती निघाले॥ ८२॥ भेदोनि मणिकर्णिका वोवरी। उसळले जी ब्रह्मरंध्रीं। जिणोनियां ब्रह्मगिरी। निशाणभेरी लाविल्या॥ ८३॥ तेथ शांतीचेनि योगें। विलसत सर्वांगें। संकल्पत्यागवेगें। जाहले अंगें चिद्ब्रह्म॥ ८४॥ ऐसे योगबळें योगी। माया जिणती अंगोअंगीं। त्याहोनि अतिसुगम मार्गीं। आम्हांलागीं त्वां केली॥ ८५॥
वयं त्विह महायोगिन् भ्रमन्त: कर्मवर्त्मसु।
त्वद्वार्तया तरिष्यामस्तावकैर्दुस्तरं तम:॥ ४८॥
भजावें तुझिया निजभक्तां। ऐकावी तुझी कथावार्ता। इतुकेनि तरलों जी सर्वथा। कृष्णनाथा निजमाया॥ ८६॥ आम्हां कर्ममार्गींचिया कर्मठां। तुवां उपकारु केला मोठा। तुझ्या कथेचा श्रवणपाठा। मुक्त दारवंठा मोक्षाचा॥ ८७॥ असो मोक्षाची कथा। चाड नाहीं गा सर्वथा। तुझ्या भक्तांसी तुझी कथा। करितां भवव्यथा न बाधीचि॥ ८८॥ तुझे अभेद भक्तीचें कोड। आम्हां संसारुचि गोड। ठेंचूनि त्रिगुणांचें तोंड। भक्त प्रचंड भजताति॥ ८९॥
स्मरन्त: कीर्तयन्तस्ते कृतानि गदितानि च।
गत्युत्स्मितेक्षणक्ष्वेलि यन्नृलोकविडम्बनम्॥ ४९॥
तुझ्या चरित्राचें श्रवण। आवडीं करितां कीर्तन। त्यांचा भवबंधच्छेदन। बळेंचि जाण तूं करिशी॥ ३९०॥ पुसोनिया संसारभावो। निजपदीं देसी ठावो। हा श्रवणकीर्तनलाभ पाहा हो। आम्ही सहजें लाहों निजभक्त॥ ९१॥ स्वभावें कीर्तन करितां। एवढा लाभु होये तत्त्वतां। या तुझिये मुखींच्या कथा गातां। आपणियां देता तूं होशी॥ ९२॥ तुझीं गोकुळींचीं गमनपदें। आवडीं वर्णिती जे आनंदें। त्यांसी खांदीं वाऊनि निजबोधें। कीर्तनच्छंदें नाचशी॥ ९३॥ तुवां जे केली लीला। ते आवडी गातां जी गोपाळा। नित्य त्या सेवकांजवळा। अंगें अंगवळा तूं होशी॥ ९४॥ तुझें वर्णिती जे हास्यवदन। त्या भक्ताचें तूं करिशी ध्यान। त्यांचेनि बोलें समाधान। स्त्रीशूद्रां जाण तूं देशी॥ ९५॥ तुझें दृष्टीचें दर्शन। दृश्यातीत निरीक्षण। सर्वत्र देखणेंपण। कीर्तनीं गान जे गाती॥ ९६॥ त्यांच्या पाउलांपाउलांसी। आपुलें सर्वांग तूं वोवाळिसी। अंग टाकूनि तिष्ठसी। त्यांपाशीं सर्वदा॥ ९७॥ आपुली गुह्य ज्ञानमुद्रा। त्यांसी अर्पिसी तूं ज्ञानीनरेंद्रा। निजबोधें प्रबोधचंद्रा। त्यांच्या निजभद्रा तूं करिशी॥ ९८॥ रासक्रीडादि नाना छंद। अंगनामंगनादि प्रबंध। कीर्ति अतिशयें विशद। भावार्थें शुद्ध जे गाती॥ १९॥ कां ठकूनियां ब्रह्मयासी। गोपाळवत्सें तूं जाहलासी। ऐसऐसिया विनोदांसी। हृषीकेशी जे गाती॥ ४००॥ तयांसी सर्वांभूतीं निजात्मता। देशी तूं आपुली सत्ता। त्यांच्या बोलांमाजी वर्तता। कृष्णनाथा तूं होशी॥ १॥ मनुष्यनाटॺाचेनि योगें। जें जें केलें तुवां अंगें। तें गातां ऐकतां अनुरागें। तरले वेगें निजभक्त॥ २॥ मियांचि केली जे जे आळी। ते त्वां पुरविली सर्व काळीं। त्या मज उपेक्षूनि वनमाळी। अंतकाळीं कां जाशी॥ ३॥
श्रीशुक उवाच
एवं विज्ञापितो राजन् भगवान्देवकीसुत:।
एकान्तिनं प्रियं भृत्यमुद्धवं समभाषत॥ ५०॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायामेकादशस्कन्धे षष्ठोऽध्याय:॥ ६॥
एवं यापरी देवकीसुत। पूर्ण पूर्णांशें भगवंत। विनविला श्रीकृष्णनाथ। निजभृत्य-उद्धवें॥ ४॥ ‘निजभृत्य’ म्हणणें। उद्धवासी याकारणें। निजगुज श्रीकृष्णें। त्यासीं बोलणें सर्वदा॥ ५॥ जेथ रिगमु नाहीं रुक्मिणीसी। ठावो नाहीं वसुदेवदेवकीसी। बळिभद्रा प्रद्युम्नासी। अनिरुद्धासी जे ठायीं॥ ६॥ ते ठायीं कृष्णाप्रती। उद्धव असे अहोरातीं। यालागीं पैं ‘एकांती’। ज्ञाते म्हणती तयासी॥ ७॥ श्रीकृष्णासी वाडेंकोडें। जीवापरीस जें जें आवडे। तें उद्धवासी देणें घडे। प्रेम गाढें भक्तांचें॥ ८॥ देतां तो जरी नेघे। तरी धांवोनि आलिंगी वेगें। न घेतां देवो पायां लागे। भक्तपांगें पांगिला॥ ९॥ यालागीं कृष्णासी प्रियकर। उद्धवुचि साचार। याहूनि प्रेम थोर। नाहीं सधर आनाचें॥ ४१०॥ यालागीं ‘प्रिय-भृत्य-एकांती’। ये बिरुदें उद्धवासी साजती। तेणें निजस्वामीस विनंती। निजप्रीतीं पैं केली॥ ११॥ ऐकोनि उद्धवाचें वचन। चातकांलागीं जेवीं घन। तेवीं वोळला जगज्जीवन। स्वानंदघन निजबोधें॥ १२॥ चातकाची तहान किती। तृप्त करूनि निववी क्षिती। उद्धवउद्देशें श्रीपती। त्रिजगती निववील॥ १३॥ ऐकतां उद्धवाचे बोल। येताति श्रीकृष्णासी डोल। भक्तभाग्य जी सखोल। जाहली वोल प्रेमाची॥ १४॥ ते वोळले भक्तभूमीसी। निजबीज पेरील हृषीकेशी। तें पीक पुरेल जगासी। मुक्तराशी मुमुक्षां॥ १५॥ धेनु वत्साचेनि वोरसें। घरा दुभतें पुरवी जैसें। तेवीं उद्धवाचेनि उद्देशें। जग हृषीकेशें निवविजे॥ १६॥ घरीं पाहुणयालागीं। कीजती परवडी अनेगी। तेथ बालकें जेवीं विभागी। होतीं वेगीं न मागतां॥ १७॥ पक्वान्न सेवूं नेणतीं बाळें। तरी माता मुखीं घाली बळें। तैसें जनार्दनें आम्हां केलें। स्वयें दिधलें निजशेष॥ १८॥ नवल कृपा केली कैशी। कृष्ण उद्धवातें उपदेशी। तोचि अर्थ दिधला आम्हांसी। देशभाषीं अर्थितां॥ १९॥ एका जनार्दनु म्हणे। श्रोतां सावधान होणें। हें मी तोंडें बोलों कवणें। तिंहीं मज करणें सावध॥ ४२०॥ निजभक्तें केली विनंती। निजज्ञान बोलेल भक्तपती। श्रवणाची सावध पंक्ती। बैसवा वृत्ति तब्दोधें॥ २१॥ येथ मुक्तांचें कोड। पुरे मुमुक्षांची चाड। येचिविषयीं कथा गोड। श्रवणकवाड उघडेल॥ २२॥ उद्धवें श्रीकृष्ण विनविला। ना तो श्रवणीं डांगोरा पिटिला। मुमुक्षां म्हणे चला चला। कृष्ण वोळला निजबोधें॥ २३॥ मोक्षमार्गींचे कापडी। अर्थतृषातृषितें बापुडीं। प्रबोधबोधाची पव्हे गाढी। उद्धवें रोकडी घालविली॥ २४॥ भक्तिजननी माझी तेथ। कडे घेवोनि होती नेत। जनार्दन परमामृत। जाहलें प्राप्त तिचेनीं॥ २५॥ ते तुझी भक्ति तत्त्वतां। आम्हांसी असावी सर्वथा। तुज मागावी मुक्तता। तंव ते मूर्खता भक्तांची॥ २६॥ साच असावी बद्धता। तरी म्यां मागावी मुक्तता। तेचि नाहीं गा तत्त्वतां। मिथ्या मागतां मूर्खत्व॥ २७॥ मीतूंपणेंवीण सहजस्थिती। तुझी असो अभेद-भक्ती। हेचि मागणें पुढतपुढतीं। संतांप्रती सर्वदा॥ २८॥ उद्धवासी ज्ञान गुप्त। उपदेशील कृष्णनाथ। एका जनार्दना विनवित। दत्तचित्त तुम्ही दीजे॥ ४२९॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे एकादशस्कंधे एकाकारटीकायां देवस्तुत्युद्धवविज्ञापनं नाम षष्ठोऽध्याय:॥ ६॥ श्रीकृष्णार्पणमस्तु॥ मूळश्लोक॥ ५०॥ ओव्या॥ ४२९॥
॥ ॐ तत्सत् -श्रीकृष्ण प्रसन्न॥
अध्याय सातवा
श्रीगणेशाय नम:॥॥ श्रीकृष्णाय नम:॥॥ ॐ नमो सद्गुरु चतुरक्षरा। चतुरचित्तप्रबोधचंद्रा। ‘जनार्दना’ सुरेंद्रइंद्रा। ज्ञाननरेंद्रा निजबोधा॥ १॥ तुझी करितांचि गोठी। प्रगटसी पाठींपोटीं। सन्मुख ठसावसी दृष्टी। हृदयगांठी छेदूनी॥ २॥ छेदूनि विषयवासना। स्वयें प्रगटसी जनार्दना। भवअभवभावना। नेदिसी मना आतळों॥ ३॥ आतळतां तुझे चरण। आकळलें राहे मन। सहज देशी समाधान। आनंदघन अच्युता॥ ४॥ ऐशिया जी गुरुनाथा। समसाम्यें चरणीं माथा। पुढील परिसावी जी कथा। जेथ वक्ता श्रीकृष्णु॥ ५॥ उद्धवें विनविलियावरी। कृपा कळवळला श्रीहरी। निजज्ञान अतिविस्तारीं। बोधकुसरीं सांगतु॥ ६॥ होतें कृष्णाचे मानसीं। ‘मज गेलिया निजधामासी। माझें निजज्ञान कोणापासीं। अतियत्नेंसीं ठेवावें’॥ ७॥ तंव देखिली उद्धवाची अवस्था। सुख जाहलें श्रीकृष्णनाथा। वैराग्ययुक्त उपदेशिता। होय सर्वथा निजज्ञान॥ ८॥ एवं वांचवावया उद्धवासी। कृष्ण ब्रह्मज्ञान उपदेशी। शाप न बाधी ब्रह्मवेत्त्यांसी। हें हृषीकेशी जाणतु॥ ९॥ ब्रह्मउपदेशाची हातवटी। उपदेशूं जाणे जगजेठी। वैराग्य उपजवी उठाउठीं। जेणें पडे मिठी निजतत्त्वीं॥ १०॥ नव्हतां वैराग्य दारुण। उपदेशु केला तो वृथा जाण। हे श्रीकृष्णचि जाणे खूण। वैराग्यविंदान बोलतु॥ ११॥ पहिलें उद्धवाच्या बोलासी। अनुमोदन दे हृषीकेशी। तेणें अन्वयें सावकाशीं। ज्ञानवैराग्य त्यासी बोलतु॥ १२॥
श्रीभगवानुवाच
यदात्थ मां महाभाग तच्चिकीर्षितमेव मे।
ब्रह्मा भवो लोकपाला: स्वर्वासं मेऽभिकाङ्क्षिण:॥ १॥
जो वेदांचा वेदवक्ता। जो ज्ञानियांचा ज्ञानदाता। तो श्रीकृष्णु म्हणे भाग्यवंता। ऐकें निजभक्ता उद्धवा॥ १३॥ जें तूं बोलिलासी भावयुक्त। तें वचन तुझें सत्य सत्य। तेचिं माझें मनोगत। जाण निश्चित निर्धारें॥ १४॥ माझी अवस्था जाश्वनीळा। ब्रह्मादिदेवां सकळां। येथ आले होते मिळोनि मेळा। लोकपाळांसमवेत॥ १५॥ येऊनि माझी घेतली भेटी। अपेक्षा जे होती पोटी। पुशिली माझ्या प्रयाणाची गोठी। जेणें तुज मोठी अवस्था॥ १६॥ म्यां वेगीं यावें वैकुंठा। हे समस्तांसी उत्कंठा। आदिकरून नीळकंठा। सुरवरिष्ठां झालीसे॥ १७॥
मया निष्पादितं ह्यत्र देवकार्यमशेषत:।
यदर्थमवतीर्णोऽहमंशेन ब्रह्मणार्थित:॥ २॥
ज्यालागीं ब्रह्मेनि प्रार्थिलें। तें देवकार्य म्यां संपादिलें। अवतार नटनाटॺ धरिलें। ज्येष्ठत्व दिधलें बळिभद्रा॥ १८॥ ज्येष्ठकनिष्ठभावना। दोघांमाजीं नाहीं जाणा। कृष्णा आणि संकर्षणा। एकात्मता निजांशें॥ १९॥
कुलं वै शापनिर्दग्धं नङ्क्षॺत्यन्योन्यविग्रहात्।
समुद्र: सप्तमेऽहन्यतां पुरीं च प्लावयिष्यति॥ ३॥
उरलें असे आमुचें कुळ। शापनिर्दग्ध केवळ। अन्योन्यविग्रहें सकळ। कलहमूळनासेल॥ २०॥ भूमि मागोनि समुद्रापाशीं। म्यां रचिलें द्वारकेसी। मज गेलिया निजधामासी। तो सातवे दिवसीं बुडवील॥ २१॥
यर्ह्येवायं मया त्यक्तो लोकोऽयं नष्टमङ्गल:।
भविष्यत्यचिरात्साधो कलिनापि निराकृत:॥ ४॥
ऐकें उद्धवा हितगोष्टी। म्यां सांडलिया हे सृष्टि। थोडियाचि काळापाठीं। नष्टदृष्टी जन होती॥ २२॥ अधर्म वाढेल प्रबळ। लोक होतील नष्ट अमंगळ। ते अमंगळतेचें मूळ। ऐक समूळ सांगेन॥ २३॥ मज नांदतां ये सृष्टीं। कलि उघडूं न शके दृष्टी। मज गेलियापाठीं। तो उठाउठीं उठेल॥ २४॥ कलि वाढेल अतिविषम। ब्राह्मण सांडितील स्वधर्म। स्वभावें नावडे दानधर्म। क्रियाकर्म दंभार्थ॥ २५॥
न वस्तव्यं त्वयैवेह मया त्यक्ते महीतले।
जनोऽधर्मरुचिर्भद्र भविष्यति कलौ युगे॥ ५॥
म्यां सांडिलिया महीतळी। प्रबळ बळें वाढेल कळी। आजीच तुवां निघिजे तत्काळीं। जंव तो कळी नातळे॥ २६॥ कळी आतळेल जेव्हां। जनीं अधर्मु वाढेल तेव्हां। कुविद्येच्या उठती हांवा। सैंघ धांवा निंदेच्या॥ २७॥ न लभे स्वार्थाची कवडी। तरी करिती निंदेच्या कोडी। ऐसी कलियुगीं वस्ती कुडी। तुवां अर्ध घडी न रहावें॥ २८॥
त्वं तु सर्वं परित्यज्य स्नेहं स्वजनबन्धुषु।
मय्यावेश्य मन: सम्यक् समदृग्विचरस्व गाम्॥ ६॥
उद्धवा तूं यालागीं। येथोनि निघावें वेगीं। एकलाचि आंगोवांगीं। हितालागीं सर्वथा॥ २९॥ धनधान्यसमृद्धीसीं। सांडावें स्वजनगोत्रजांसी। भ्रातादुहितानिजभगिनींसी। स्त्री-पुत्रासी त्यजावें॥ ३०॥ स्नेहो ठेवूनि घरदारीं। अंगें तूं जरी निघालासि बाहेरी। तरी तो त्यागूचि कठिण भारी। अनर्थकारी होईल॥ ३१॥ आधीं समूळ स्नेहो सांडावा। पाठीं अभिमानुही दंडावा। वासनाजटाजूट मुंडावा। मग सांडावा आश्रमु॥ ३२॥ ‘स्नेहो कैसेनि सांडे। अभिमानु कैसेनि दंडे’। हें तुज वाटेल सांकडें। तरी रोकडें परियेसीं॥ ३३॥ माझें स्वरूप जें सर्वगत। तेथ ठेवोनियां चित्त। सावधानें सुनिश्चित। राहावें सतत निजरूपीं॥ ३४॥ तये स्वरूपीं चित्ता। निर्धारेंसीं धारणा धरितां। निजभावें तन्मयता। तद्रूपता पावेल॥ ३५॥ भृंगी जड कीटी मूढ। ध्यानें तद्रूप होय दृढ। अभ्यासीं कांहीं नाहीं अवघड। तो अभ्यास गूढ विशद केला॥ ३६॥ माझें स्वरूप ज्ञानघन। ध्याता जीवु स्वयें सज्ञान। या स्थितीं करितां ध्यान। सहजें जाण तद्रूप॥ ३७॥ तेथ समसाम्यें समस्त। समत्व पावेल चित्त। तेणें समभावें निश्चित। तेथींचा तेथ रहावें॥ ३८॥ आधीं गृहाश्रमातें त्यागावें। मग म्यां म्हणसी कोठें राहावें। ऐसें मानिसील स्वभावें। तेविखीं बरवें परियेसीं॥ ३९॥ स्वरूपसाम्यें समदृष्टी। समभावें विचरें सृष्टीं। निवासस्थानांची आटाटी। सर्वथा पोटीं न धरावी॥ ४०॥ जेथ अल्प काळ वसती घडे। त्या ठायाचा अभिमान चढे। वसतिस्थान ऐसें कुडें। वस्तीचें सांकडें सर्वथा न धरीं॥ ४१॥ तूं सर्वीं सर्वगत होसी। सर्वाधार सर्वदेशी। ऐसा मी होऊन मज पावसी। न हालतां येसी निजधामा॥ ४२॥ ‘मज निजधामा न्यावें’। होतें पुशिलें उद्धवें। तें निजबोधस्वभावें। स्वयें केशवें सांगितलें॥ ४३॥ न करितां हे उपायस्थिती। सर्वथा न घडे माझी प्राप्ती। मग तूं निजधामाप्रती। कैशा गती येशील॥ ४४॥ गरुडीं वाऊनि वेगेंसीं। न्यावें निजधामा म्हणसी। गति तेथ नाहीं पाखांसी। गम्य गरुडासी तें नव्हे॥ ४५॥ सांडूनि उभय पक्षांसी॥ साधक पावती मद्रूपासी। पक्षाभिमान असे गरुडासी। गमन त्यासी तेणें नव्हे॥ ४६॥ म्हणसी न्यावें घेवोनि खांदीं। मज खांदाचि नाहीं त्रिशुद्धी। तुज न सांडितांअहंबुद्धी। गमनसिद्धी तेथ नाहीं॥ ४७॥ न त्यागितां अहंभावस्थिती। केल्या नाना उपाययुक्ती। तेणें निजधामाप्रती। नव्हे गती सर्वथा॥ ४८॥ जें जें देखसी साकार। तें तें जाण पां नश्वर। तेचि विखींचा निर्धार। करीं साचार निजबोधें॥ ४९॥
यदिदं मनसा वाचा चक्षुर्भ्यां श्रवणादिभि:।
नश्वरं गृह्यमाणं च विद्धि मायामनोमयम्॥ ७॥
जें जें ‘दृष्टीं’ देखिलें। तें तें दृश्यत्वें वाळिलें। जें जें ‘श्रवणा’ गोचर झालें। तेंही वाळिलें शब्दत्वें॥ ५०॥ जें जें ‘वाचा’ वदे। तें तें वाळिजे जल्पवादें। वाचिक सांडविलें वेदें। ‘नेति’ शब्दें लाजिला॥ ५१॥ जें जें ‘संकल्पें’ आकळिलें। तें तें कल्पित पैं झालें। जें जें ‘अहंकारा’ आलें। तें तें वाळिलें विजातीय॥ ५२॥ जें जें ‘इंद्रियां’ गोचरें। तें तें जाण पां नश्वरें। हें नित्यानित्यविचारें। केलें खरें निश्चित॥ ५३॥ तोही ‘नित्यानित्यविवेक’। जाण पां निश्चित मायिक। एवं मायामय हा लोक। करी संकल्प सृष्टीतें॥ ५४॥ जेव्हडा देखसी संसार। तेव्हडा मायिक व्यवहार। हा वोळख तूं साचार। धैर्यनिर्धार धरोनी॥ ५५॥ जैशी स्वप्नींची राणीव। केवळ भ्रमचि जाणीव। तैसेंचि जाण हें सर्व। भववैभवविलास॥ ५६॥
पुंसोऽयुक्तस्य नानार्थो भ्रम: स गुणदोषभाक्।
कर्माकर्मविकर्मेति गुणदोषधियो भिदा॥ ८॥
परमात्मेंसीं जो विभक्त। तो पुरुष बोलिजे ‘अयुक्त’। त्यासी नानात्वें भेदु भासत। निजीं निजत्व विसरोनी॥ ५७॥ त्या विसराचेनि उल्हासें। मिथ्या भेदु सत्यत्वें भासे। त्या भेदाचेनि आवेशें। अवश्य दिसे गुणदोषु॥ ५८॥ जरी भेदूचि नाहीं। तरी गुणदोष कैंचा पाहीं। दिसावया ठावोचि नाहीं। शुद्धाचे ठायीं सर्वथा॥ ५९॥ यालागीं भेदाच्या उद्भटीं। गुणदोषदृष्टी उठी। तेथें कर्माकर्मत्रिपुटी। भेददृष्टी ठसावे॥ ६०॥ भेदें थोर केलें विषम। कर्म अकर्म विकर्म। जन्ममरणादि धर्म। निजकर्म प्रकाशी॥ ६१॥ कर्में विकर्में नरकयातना। काम्यकर्में स्वर्गु जाणा। कर्मेंचि करूनि कर्ममोचना। समाधाना पाविजे॥ ६२॥ येथ म्हणती ‘कर्म’ कोण। ‘अकर्माचें’ काय लक्षण। ‘विकर्माचा’ कवण गुण। तेंही संपूर्ण परिस पां॥ ६३॥ काया वाचा अथवा मन। करिजे तितुकें ‘कर्म’ जाण। सूक्ष्म स्फूर्तीचें जें भान। तें मूळ जाण कर्माचें॥ ६४॥ मनसा वाचा देहीं। सर्वथा कर्मबीज नाहीं। ‘अकर्म’ म्हणिजे तें पाहीं। न पडे ठायीं देहवंता॥ ६५॥ जें कर्मावेगळें सर्वांगें। जेथ कर्म लावितांही न लगे। जें नव्हे कर्मठाजोगें। तें जाण सवेगें ‘अकर्म’॥ ६६॥ विधिनिषेधजोडपाडें। जेथ विशेष कर्म वाढे। ‘विकर्म’ त्यातें म्हणणें घडें। थोर सांकडें पैं याचें॥ ६७॥ कर्म सर्वसाधारण। तेंचि विकारातें पावलें जाण। उठिले विधिनिषेध दारुण। ‘विकर्म’ जाण तें म्हणिपें॥ ६८॥ जें विधीसी नातुडे। तें निषेधाचे अंग चढे। करितां चुके ठाके विकळ पडे। तेंही रोकडें ‘निषिद्धचि’॥ ६९॥ ऐसें कर्म विकारलें। तें ‘विकर्म’ पदें वाखाणिलें। एवं कर्माकर्म दाविलें। विभाग केले तुजलागीं॥ ७०॥ जीवासी आविद्यक उत्पत्ती। त्याचीं कर्में आविद्यकें होतीं। श्रीधरव्याख्यानाची युक्ती। तेही उपपत्ती परियेसीं॥ ७१॥ अविद्यायुक्त जीव परम। त्यासी नित्यक्रिया तेंचि ‘कर्म’। नित्य न करणें तें ‘अकर्म’। ‘विकर्म’ तें निषिद्ध॥ ७२॥ ऐशी कर्माकर्मविकर्मत्रिपुटी। भेदानुरूपें वाढली सृष्टीं। तेथ गुण-दोषबुद्धीच्या पोटीं। भेददृष्टी वाढती॥ ७३॥ अभेदीं भेदु कैसा उठी। जेणें गुणदोषीं नांदे दृष्टी। विधिनिषेधीं पाडी गांठी। तेही गोठी परियेसीं॥ ७४॥ पुरुष एकला एकु असे। तोचि मनोरथपूजेबैसे। ध्येय-ध्याता-ध्यानमिसें। वाढवी पिसें भेदाचें॥ ७५॥ तेथे नानापरीचे उपचार। पूजासामग्रीसंभार। ऐसा एकपणीं अपार। भेदु साचार वाढवी॥ ७६॥ तेथ ‘ध्येय’ उत्तम म्हणे जाण। ‘ध्याता’ नीच होये आपण। तदंगें ‘ध्यान’ गौण। गुणदोष जाण वाढवी॥ ७७॥ ध्यानीं गुणदोष विचित्र। ध्येय म्हणे परम पवित्र। ध्याता आपण होये अपवित्र। शौचाचारदोषत्वें॥ ७८॥ एवं ध्यानाचिये दृष्टीं। आपणचि आपुल्या पोटीं। गुणदोषांची त्रिपुटी। भेददृष्टी वाढवी॥ ७९॥ ध्येय-ध्याता-ध्यान। आघवाची आहे आपण। तें सांडोनियां जाण। गुणदोषलक्षण वाढवी॥ ८०॥ उद्धवा हे अवघी सृष्टी। वाढली असे भेददृष्टीं। तेणें भेदें उठाउठी। कर्मत्रिपुटी वाढविली॥ ८१॥ जंव जंव भेदाचा जिव्हाळा। जंव जंव विषयांचा सोहळा। पाळिजे इंद्रियांचा लळा। तंव तंव आगळा संसारु॥ ८२॥ सापा पाजिजे पीयूख। तेंचि परतोनि होय विख। तैसें इंद्रियां दीजे जंव जंव संतोख। तंव तंव दु:ख भोगिजे॥ ८३॥
तस्माद्युक्तेन्द्रियग्रामो युक्तचित्त इदं जगत्।
आत्मनीक्षस्व विततमात्मानं मय्यधीश्वरे॥ ९॥
यालागीं इंद्रियांच्या द्वारीं। विषयो नेदावा चतुरीं। जेवीं विषें रांधिली क्षीरधारी। सांडिजे दुरी न चाखतां॥ ८४॥ घमघमित अमृतफळें। वरी सर्पें घातलिया गरळें। तें न सेविती काउळे। सेवनीं कळे निजघातु॥ ८५॥ तैसें सेवितां विषयांसी। कोण गोडी मुमुक्षासी। प्रतिपदीं। आत्मघातासी। अहर्निशीं देखती॥ ८६॥ आत्मघातु न देखती। ते विषयी विषयो सेविती। जैशी दिवाभीता मध्यराती। असतां गभस्ति मध्यान्हीं॥ ८७॥ तैसेंचि विषयसेवन। मुमुक्षांसी घडे जाण। तेणें न चुके जन्ममरण। आत्मपतन तयांचें॥ ८८॥ म्हणसी ‘प्राणियांची स्थिती। विषयावरी निश्चितीं। विषयत्यागें केवीं राहती’। ते सुगम स्थिती अवधारीं॥ ८९॥ असतां इंद्रियांचा नेमु। करी चित्ताचा उपरमु। ऐसा दोंहीपरी सुगमु। उत्तमोत्तमु हा त्यागु॥ ९०॥ इंद्रियें असोतु विषयांवरी। मन रिघों नेदी त्यांभीतरी। हाही त्यागु सर्वांपरी। योगेश्वरीं बोलिजे॥ ९१॥ मनासी विषयांचें बळ। विषयध्यासें तें चपळ। नव्हे म्हणती तें निश्चळ। ऐक समूळ तो उपावो॥ ९२॥ माझें स्वरूप सर्वगत। मनाबाहेरी आणि आंत। जेथ जेथ जाईल चित्त। तेथ तेथ तें असे॥ ९३॥ मजवेगळें जावयासी। ठावो नाहीं पैं चित्तासी। स्वदेशीं हो परदेशीं। अहर्निशीं मज आंतु॥ ९४॥ ऐसें निजरूप संतत। पाहतां थोरावेल चित्त। त्या चित्तामाजीं आद्यंत। पाहें समस्त हें जग॥ ९५॥ अथवा जीवस्वरूप तुझें चांग। त्यामाजीं पाहतां हें जग। जगचि होईल तुझें अंग। अतिनिर्व्यंग निश्चित॥ ९६॥ चरें आणि अचरें। लहानें कां थोरें। जीवरूपीं सविस्तरें। पाहें निर्धारें हें जग॥ ९७॥ म्हणसी जीवु तो एकदेशी। त्यामाजीं केवीं पहावें जगासी। त्यासी ऐक्यता करीं मजसीं। जेवीं कनकेंसीं अळंकार॥ ९८॥ चिंतितां कीटकी भिंगुरटी। तेचि ते होऊन उठी। तैसा तूं उठाउठीं। होईं निजदृष्टीं निजतत्त्व॥ ९९॥ हो कां सैंधवाचा खडा। पडल्या सिंधूमाजिवडा। तो होवोनि ठाके त्याएवढा। तैसा तूं रोकडा मी होसी॥ १००॥ जेथ मीतूंपणाचा भेद। फिटोनि जाईल विशद। परमानंदें शुद्धबुद्ध। मुक्त सिद्ध तूं होसी॥ १॥
ज्ञानविज्ञानसंयुक्त आत्मभूत: शरीरिणाम्।
आत्मानुभवतुष्टात्मा नान्तरायैर्विहन्यसे॥ १०॥
शास्त्रश्रवणें दृढ ‘ज्ञान’। मननाभ्यासें होय ‘विज्ञान’। या दोंहींची जाणोनि खूण। ब्रह्मसंपन्न तूं होसी॥ २॥ ऐसिया स्वार्थाचेनि लवलाहें। अविश्रम भजावे तुझे पाये। म्हणसी ‘वोढवतील अंतराये। त्यासी काये करावें’॥ ३॥ सांडोनि दांभिक लौकिक। त्यजोनियां फळाभिलाख। जो मज भजे भाविक। विघ्न देख त्या कैंचें॥ ४॥ त्याच्या विघ्ननाशासी देख। करीं चक्राची लखलख। घेऊनि पाठीसी अचुक। उभा सन्मुख मी असें॥ ५॥ यापरी गा उद्धवा। जो मज भजे निजभावा। त्यासी विघ्न करावया देवां। नव्हे उठावा मज असतां॥ ६॥ एवं ब्रह्मसंपन्न जाहलियावरी। आत्मा तूंचि चराचरीं। जंगमीं आणि स्थावरीं। सुरासुरीं तूंचि तूं॥ ७॥ तुजहूनि कांहीं। अणुभरी वेगळें नाहीं। तेथ विघ्न कैंचें कायी तुझ्या ठायीं बाधील॥ ८॥ ब्रह्मादिकांसी जो ग्रासी। त्या काळाचा तूं आत्मा होसी। पाठी थापटून हृषीकेशी। उद्धवासी सांगतु॥ ९॥ ऐशी बाध्यबाधकता फिटली। संकल्पकल्पना तुटली। ब्रह्मानंदें पाहांट फुटली। वाट मोडली कर्माची॥ ११०॥ ऐसा ब्रह्मानुभवी जो देख। कर्म तेथ होय रंक। वेद तयाचे सेवक। विधिविवेक कामारी॥ ११॥ हेंचि किती सांगों कायी। मी त्याचा आज्ञाधारक पाहीं। प्रतिष्ठिती जे जे ठायीं। तेथ पाहीं प्रगटतु॥ १२॥ वचनमात्रासाठीं। प्रगटलों कोरडे काष्ठीं। दुर्वासा वाहिला पाठीं। त्वांही दिठीं देखिलें॥ १३॥ म्हणसी ‘देव ज्याचा आज्ञाधारु। कर्म त्याचें होय किंकरु। तरी ज्ञाते यथेष्टाचारु। विषयीं साचारु विचरती’॥ १४॥ ज्ञात्यासी स्वेच्छा विषयाचरण। सर्वथा न घडे गा जाण। तेही विषयींचें लक्षण। सावधान परियेसीं॥ १५॥ ज्यासी दग्धपटअभिमान। मिथ्या प्रपंचाचें भान। मृषा विषयांचें दर्शन। विषयाचरण त्या नाहीं॥ १६॥ जयासी प्रपंचाची आवडी। विषयाची अतिगोडी। यथेष्टाचरणाची वोढी। पडे सांकडी तयासी॥ १७॥ ज्ञातयाच्या ठायीं। सत्यत्वें विषयो नाहीं। मा भोगावया कायी। अभिलाषी पाहीं तो होईल॥ १८॥ आतां ज्ञातयाचें कर्म। ऐक सांगों त्याचें वर्म। नातळतां मनोधर्म। क्रियाकर्म आचरती॥ १९॥
दोषबुद्धॺोभयातीतो निषेधान्न निवर्तते।
गुणबुद्धॺा च विहितं न करोति यथार्भक:॥ ११॥
गुणदोषातीत ज्ञाता। तो निषेधीं न वर्ते सर्वथा। परी भ्यालेपण चित्ता। नाहीं तत्त्वतां तयासी॥ १२०॥ तो विहितही कर्म करी। तेथ गुणत्वें बुद्धि न धरीं। कुलालचक्राचियेपरी। पूर्वसंस्कारीं वर्तत॥ २१॥ संकल्पु नाहीं वृत्तीं। हेतु स्फुरेना चित्तीं। ऐसीं कर्में ज्ञाते करिती। शरीरस्थितीं केवळ॥ २२॥ तेथ सत्कर्म सिद्धी गेलें। तेणें फुगेना म्यां हें केलें। अथवा माझारींविकळ पडिलें। तेणें तगमगिलेंपण नाहीं॥ २३॥ निद्रितामागें बैसला वाघु। अथवा पुढें आला स्वर्गभोगु। त्यासी नाहीं रागविरागु। तैसा लागु ज्ञात्याचा॥ २४॥ गुणदोषीं चित्तवृत्ती। सांडोनियां सहजस्थिती। बाळकें जेवीं क्रीडती। तैशी स्थिति ज्ञात्याची॥ २५॥ ‘अभिमानें कर्मप्राप्ती। त्या अभिमानातें त्यागिती। मग निरभिमानें केवीं वर्तती। कर्मस्थिति त्यां न घडे’॥ २६॥ ऐसा विकल्पु जरी करिसी। ते स्थिति न कळे इतरांसी। निरभिमानता स्वानुभवेंसीं। केवीं येरासी कळेल॥ २७॥ देह प्रारब्धाचेनि मेळें। स्वभावें सर्व कर्मीं चळे। तेथ अज्ञानाचेनि बळें। अभिमानु खवळे ‘मी कर्ता’॥ २८॥ तेथ गुरुवाक्य-अनुवृत्ती। अभ्यासूनि यथा निगुतीं। अज्ञानेंसहित निरसिती। अभिमानस्थिति निजबोधें॥ २९॥ शेष-प्रारब्धाचेनि मेळें। निरभिमानें देह चळे। ज्ञाते कर्में करिती सकळें। जाण केवळें शरीरें॥ १३०॥ केवळ शरीरें कर्में होतीं। तींच ‘अहेतुक’ बोलिजेती। अर्भकदृष्टांतें उपपत्ती। हेचि स्थिति सांगितली॥ ३१॥ निरभिमानाचीं लक्षणें। कृष्ण उद्धवातें ऐक म्हणे। येरु आनंदला अंत:करणें। सादरपणें परिसतु॥ ३२॥
सर्वभूतसुहृच्छान्तो ज्ञानविज्ञाननिश्चय:।
पश्यन्मदात्मकं विश्वं न विपद्येत वै पुन:॥ १२॥
पहिलें शास्त्रश्रवणें ‘ज्ञान’। तदनुभवें होय ‘विज्ञान’। ऐसा ज्ञानविज्ञानसंपन्न। निरभिमान तो होय॥ ३३॥ साचचि निरभिमानता। जरी आली होय हाता। तरी ‘शांति’ तेथ सर्वथा। उल्हासता पैं पावे॥ ३४॥ दाटूनि निश्चळ होणें। कां दांत चावूनि साहणें। ते ‘शांति’ ऐसें कोण म्हणे। आक्रोशपणें साहातु॥ ३५॥ ‘शांति’ म्हणिजे ते ऐशी। सागरीं अक्षोभ्यता जैसी। चढ वोहट नाहीं तिसी। सर्वदेशी सर्वदा॥ ३६॥ नाना सरितांचे खळाळ। आणूनि घालिती समळ जळ। तो तिळभरी नव्हे डहुळ। अति निर्मळ निजांगें॥ ३७॥ तैशी नानाभूतविषमता। स्वार्थविरोधें अंगीं आदळतां। पालटू नव्हे ज्याच्या चित्ता। ते जाण सर्वथा ‘निजशांति’॥ ३८॥ ऐसी शांति ज्यासी देखा। तोचि सर्वभूतांचा सखा। आवडता सर्व लोकां। ‘सुहृद’ तो कां सर्वांचा॥ ३९॥ नवल सख्यत्वाची परी। सर्वस्व दे निजमैत्रीं। स्वार्थीं वंचनार्थ न करी। कृपापात्रीं उपदेशु॥ १४०॥ अतर्क्य त्याची पाहती दिठी। मद्रूपें देखे सकळ सृष्टी। जगासी मज अभिन्न गांठी। निजदृष्टीं बांधली॥ ४१॥ मग तो जेउतें पाहे। तेउता मीचि तया आहें। तो जरी मातें न पाहे। तें न पाहणेंही होये मीचि त्याचें॥ ४२॥ त्याची पाहती जे दिठी। ते मीचि होये जगजेठी। ऐशी तया मज एक गांठी। सकळ सृष्टीसमवेत॥ ४३॥ अवघें जगचि मी होये। तेव्हां ‘तो मी’ हे भाष जाये। ऐसा तो मजमाजीं समाये। समसाम्येंसमत्वें॥ ४४॥ सांडोनियां मनोधर्म। ऐसा ज्यासी मी झालों सुगम। त्यासी पुढती कैंचें जन्म। दु:ख दुर्गम ज्याचेनीं॥ ४५॥ मातेच्या उदरकुहरीं। रजस्वलेच्या रुधिरामाझारीं। पित्याचेनि रेतद्वारीं। गर्भसंचारी संसरण॥ ४६॥ जे मातेच्या उदरीं। जंतु नाकीं तोंडीं उरीं शिरीं। विष्ठामूत्राचे दाथरीं। नवमासवरी उकडिजे॥ ४७॥ जठराग्नीच्या तोंडीं। घालूनि गर्भाची उंडी। उकडउकडूनि पिंडीं। गर्भकांडीं घडिजेति॥ ४८॥ ते गर्भींची वेदना। नानापरींची यातना। नको नको रघुनंदना। चिळसी मना येतसे॥ ४९॥ अवघ्यांच्या शेवटीं। प्रसूतिवातु जो आटी। सर्वांगीं वेदना उठी। योनिसंकटीं देहजन्म॥ १५०॥ ऐसें अपवित्र जें जन्म। तें न पवतीच ते नरोत्तम। जींहीं ठाकिलें निजधाम। ते पुरुषोत्तम समसाम्यें॥ ५१॥ मी असतां पाठीपोटीं। त्यांसी काइशा जन्मगोठी। कळिकाळातें नाणिती दिठी। आले उठाउठी मद्रूपा॥ ५२॥ जेथ जन्म नाहीं जाहलें। तेथ मरण न लागतांचि गेलें। ऐसे भजोनि मातें पावले। भजनबळें मद्भक्त॥ ५३॥ कृष्ण उद्धवातें थापटी। म्हणे वेगें उठीं उठीं। हेचि हातवशी हातवटी। जन्मतुटी तेणें होय॥ ५४॥ जैसें मेघमुखींचें उदक। वरिच्यावरी झेलिती चातक। तैसें कृष्णवचनांसी देख। उद्धवें मुख पसरिलें॥ ५५॥ कां चंद्रकिरणीं चकोर। जेवीं अत्यंत सादर। तेवीं उद्धवाचा आदर। दिसे थोर हरिवचनीं॥ ५६॥ हो कां पक्षिणी देखोनि पिलें। जाणोनि चाऱ्याचे वेळे। सांडोनियां आविसाळें। मुख कोंवळें जेवीं पसरी॥ ५७॥ तेवीं देखोनि कृष्णमुख। उद्धवासी अत्यंत हरिख। श्रवणाचे मुखें देख। कृष्णपीयूख सेवित॥ ५८॥
श्रीशुक उवाच
इत्यादिष्टो भगवता महाभागवतो नृप।
उद्धव: प्रणिपत्याह तत्त्वजिज्ञासुरच्युतम्॥ १३॥
शुक म्हणे कौरवनाथा। कृपा उपजली भगवंता। उपदेशिलें महाभागवता। ज्ञानकथा निजबोधु॥ ५९॥ तें ऐकोनि उद्धव। श्रवणीं थोर उठी हांव। कैसें बोलिला ज्ञानगौरव। अतिअपूर्व श्रीकृष्ण॥ १६०॥ श्रीकृष्ण श्रीमुखें सांगे कोड। तें निरूपण अतिगोड। जीवीं उठली श्रवणचाड। नुल्लंघी भीड देवाची॥ ६१॥ आवडीं कळवळे चित्त। घाली साष्टांग दंडवत। हात जोडोनि पुसत। प्रेमळ भक्त उद्धव॥ ६२॥
उद्धव उवाच
योगेश योगविन्यास योगात्मन्योगसम्भव।
नि:श्रेयसाय मे प्रोक्तस्त्याग: संन्यासलक्षण:॥ १४॥
ऐकें योगियांच्या योगपती। योग्यांचा ठेवा तूं श्रीपती। योगीं प्रगट तूं योगमूर्ती। योग उत्पत्ती तुजपासीं॥ ६३॥ मज मोक्षासी कारण। त्यागु संन्यासलक्षण। बोलिलासी तो अति कठिण। परम दारुण हा त्यागु॥ ६४॥
त्यागोऽयं दुष्करो भूमन् कामानां विषयात्मभि:।
सुतरां त्वयि सर्वात्मन्नभक्तैरिति मे मति:॥ १५॥
पाहतां या त्यागाची रीती॥ मज तंव दुर्धरु गा श्रीपती। मग इतरांची येथ मती। कवण्या स्थितीं होईल॥ ६५॥ कामु जयाच्या चित्तीं। विषयीं आसक्त मती। त्यासी या त्यागाची गती। नव्हें श्रीपति सर्वथा॥ ६६॥ तुझी कृपा जंव नव्हे। तंव तो अभक्तां केवीं करवे। त्यागु बोलिला जो देवें। तो सर्वांसी नव्हे सर्वथा॥ ६७॥ तूं सर्वात्मा असतां हृदयीं। चित्त प्रवेशेना तुझे ठायीं। तें आवरिलें असे विषयीं। नवल कायी सांगावें॥ ६८॥ ऐसे प्रपंचीं आसक्त। यालागीं विमुख झाले अभक्त। त्यांसी त्यागु नव्हे हा निश्चित। चित्त दुश्चित सर्वदा॥ ६९॥ त्यागु कां नव्हे म्हणसी। तें परिस गा हृषीकेशी। कठिणत्व जें त्यागासी। तें तुजपाशीं सांगेन॥ १७०॥
सोऽहं ममाहमिति मूढमतिर्विगाढ-
स्त्वन्मायया विरचितात्मनि सानुबन्धे।
तत्त्वञ्जसा निगदितं भवता यथाहं
संसाधयामि भगवन्ननुशाधि भृत्यम्॥ १६॥
तुझी माया विचित्र उपाधी। शरीरीं केली आत्मबुद्धी। आत्मीयें शरीरसंबंधीं। विपरीत सिद्धी वाढली॥ ७१॥ ‘मी-माझें’ वाढलें गाढ। तेणें मति झाली मूढ। गृहासक्ति लागली दृढ। त्यागु अवघड यालागीं॥ ७२॥ ऐशी ही बुद्धि विवळे। अप्रयासें तत्त्व आकळे। तैशी कृपा कीजे राऊळें। दास गोपाळें तारावया॥ ७३॥ ऐकें गा पुरुषोत्तमा। निजदासां आपुल्या आम्हां। सोडवी गा संसारश्रमा। आत्मयारामा श्रीकृष्णा॥ ७४॥ तुज सांडोनि हृषीकेशी। पुसों जावें आणिकांपासीं। तें नये माझिया मनासी। विषयीं सर्वांसी व्यापिलें॥ ७५॥
सत्यस्य ते स्वदृश आत्मन आत्मनोऽन्यं
वक्तारमीश विबुधेष्वपि नानुचक्षे।
सर्वे विमोहितधियस्तव माययेमे
ब्रह्मादयस्तनुभृतो बहिरर्थभावा:॥ १७॥
पुसों जावें ब्रह्मयासी। तो गुंतला सृष्टिकर्मासी। प्रजाउत्पत्ति मानसी। अहर्निशीं चिंतितु॥ ७६॥ जो आपुल्या निजस्वभावीं। सदा संसारु वाढवी। तो केवीं संसारु तोडवी। केलें न बुडवीसर्वथा॥ ७७॥ वाढों नेदी संसारासी। कोपु आला प्रजापतीसी। शापु दिधला नारदासी। ब्रह्म उपदेशी म्हणौनी॥ ७८॥ ऐसे संसारीं आसक्त। नित्य संसारयुक्त। त्यांसी पुसों न मनी चित्त। जाण निश्चित श्रीकृष्णा॥ ७९॥ पुसों जावें ऋषींप्रती। तंव ते सदा आपमती। आपुलें मत प्रतिष्ठिती। अन्यथा देती शापातें॥ १८०॥ जीवीं धरोनि अर्थासक्ती। शिष्यांतें उपदेशिती। विषयो धरोनियां चित्तीं। जीविकावृत्तीं उपदेशु॥ ८१॥ गुरूसीच विषयासक्ती। तेथ शिष्यासी कैंची विरक्ती। ऐशियासी जे पुसती। ते भ्रंशती स्वार्थातें॥ ८२॥ सत्यस्वरूप स्वप्रकाश। आत्मा तूं अविनाश। युक्तिप्रयुक्तीं उपदेश। विकल्पनिरास जाणसी॥ ८३॥ ब्रह्मज्ञानाचा वक्ता। तुजवेगळा श्रीकृष्णनाथा। न दिसे गा सर्वथा। मज पाहतां त्रिलोकीं॥ ८४॥ एवं आत्मा तूं तत्त्वतां। तूंचि आत्मज्ञानदाता। आत्मबोधीं संस्थापिता। कृष्णनाथा तूं एकु॥ ८५॥
तस्माद्भवन्तमनवद्यमनन्तपारं
सर्वज्ञमीश्वरमकुण्ठविकुण्ठधिष्ण्यम्।
निर्विण्णधीरहमु ह वृजिनाभितप्तो
नारायणं नरसखं शरणं प्रपद्ये॥ १८॥
यालागीं जी यादवपती। नित्य शुद्ध पवित्र मूर्ती। तुज मायामोहो नातळती। पवित्र ख्याती यालागीं॥ ८६॥ गोंवळांचे उच्छिष्टकवळें। ज्याची पवित्रता न मैळे। तेणेंचि उच्छिष्टबळें। गोंवळें सकळें तारिलीं॥ ८७॥ प्राणें शोषिलें पूतनेसी। तरी पवित्रता अधिक कैशी। तेणेंचि उद्धरिलें तिसी। दोषें दोषांसी तारकु॥ ८८॥ करूनि कालीयमर्दन। मर्दिला त्याचा अभिमान। तरी मैळेना पवित्रपण। निर्विषें जाण तारिला॥ ८९॥ रजक अपवित्र अत्यंत। आतळे तया अध:पात। त्यासी मारूनियां निश्चित। केला पुनीत सायुज्या॥ १९०॥ करूनि गोपिकांसी निंद्य काम। तेणें त्या केल्या नित्य निष्काम। तेचि पवित्रता अनुत्तम। सायुज्यधाम पावल्या॥ ९१॥ करितां सुकर्मकुकर्म। ज्याची पवित्रता अनुत्तम। यालागीं नामें ‘पुरुषोत्तम’। अकर्तात्म निजबोधें॥ ९२॥ जो आकळे गुणांआंतु। त्यासी ते गुण करिती प्रांतु। त्या गुणांसी तुजमाजीं अंतु। यालागीं तूं ‘अनंतु’ सर्वथा॥ ९३॥ देशत: कालत: पार। तुज न करवेचि साचार। यालागीं अनंत तूं अपार। श्रुतींसी पार न कळेचि॥ ९४॥ तुज म्यां करावी विनंती। किती यावें काकुळती। तूं हृदयस्थ ज्ञानमूर्ती। जाणता त्रिजगतीं तूं एकु॥ ९५॥ ज्ञान अज्ञान मायाशक्ती। ईश्वराआधीन गा असती। त्या ईश्वराची तूं ईश्वरमूर्ती। सत्यकीर्ति तूं श्रीकृष्णा॥ ९६॥ तूं सर्वांचा नियंता। सर्व करूनि अकर्ता। ऐसा ‘ईश्वरु’ तूं कृष्णनाथा। भोगूनि अभोक्ता तूं एकु॥ ९७॥ देशत: कालत: स्वभावेंसीं। नाशु न पावे ज्या स्थानासी। तेथींचा तूं निवासवासी। पूर्ण पूर्णांशी अवतारु॥ ९८॥ नराचें अविनाशस्थान। यालागी तूं ‘नारायण’। तुझेनि जीवासी चळणवळण। चाळकपण तुजपाशीं॥ ९९॥ ऐसा ईश्वर तूं आपण। ‘नरसखा-नारायण’। युद्धसमयीं अर्जुनासी जाण। ब्रह्मज्ञान त्वां दिधलें॥ २००॥ दारुण होतां संग्रामासी। पावडा पावो युद्धासी। तेव्हां ब्रह्मज्ञान सांगसी। निज सख्यासी अर्जुना॥ १॥ ऐसाकृपाळू तूं नारायण। यालागीं तुज आलों शरण। त्रिविधतापें तापलों जाण। दु:ख दारुण संसारु॥ २॥ संसार म्हणजे अंधकूप। माजीं कामक्रोधादि दुष्ट सर्प। निंदा स्पर्धा कांटे अमूप। दु:खरूप मी पडिलों॥ ३॥ तेथ पडीलियापाठीं। ब्रह्मद्वेषाचा शूळ पोटीं। भरला जी उठाउठी। तेणें हिंपुटी होतुसें॥ ४॥ तेथून निघावया त्रिशुद्धी। उपावो न दिसे गा निजबुद्धी। कृपाळुवा कृपानिधी। आत्मबोधीं मज काढीं॥ ५॥
श्रीभगवानुवाच
प्रायेण मनुजा लोके लोकतत्त्वविचक्षणा:।
समुद्धरन्ति ह्यात्मानमात्मनैवाशुभाशयात्॥ १९॥
भूत संचरलियापाठीं। सुटती जल्पवादगोठी। त्यातें गुणिया पाहोनि दिठीं। अक्षता त्राहाटी मंत्रोनी॥ ६॥ पाहतां पांचभौतिक संसारु। सहजें झाला असे थोरु। माजीं झोंबलासे कृष्णवियोगखेचरु। उद्धव लेंकरूं झडपिलें॥ ७॥ मिसें उद्धवाची झडपणी। अहं-म्हैसासुर लागला जनीं। त्यासी करावया झाडणी। कृष्ण गुणी चालिला॥ ८॥ तेथ झाडणीलागीं आतां। यदुअवधूतसंवाद कथा। त्याचि मंत्रूनि मंत्राक्षता। होय झाडिता श्रीकृष्णु॥ ९॥ श्रीकृष्ण म्हणे उद्धवासी। सावध होईं निजमानसीं। येऊनियां मनुष्यलोकासी। आपआपणांसी उद्धरिती॥ २१०॥ पाहतां यया परमार्था। साह्य नव्हे माता पिता। पुत्र भ्राता दुहिता कांता। साह्य सर्वथा हे नव्हती॥ ११॥ साह्य परमार्था नव्हे व्याही। शेखीं साह्य नव्हे जांवयी। आपणिया आपण साह्य पाहीं। जो निजदेहीं विवेकी॥ १२॥ मुमुक्षुमार्गींचे सज्ञान। लोक तत्त्वविचक्षण। विचारूनि कार्याकारण। स्वबुद्धीं जाण उद्धरले॥ १३॥ नित्यानित्यविवेकें। अनित्य सांडिती त्यागमुखें। नित्य तें यथासुखें। हित संतोखें अंगीकारिती॥ १४॥ नित्यत्वें जें उरलें जाण। तें स्वरूप माझें चिद्धन। तेंचि साधकांचे साधन जाण। अनन्यपणें चिंतिती॥ १५॥ भावितां माझी दृढ भावना। मीचि ते होती जाणा। कीटकी-भृंगीचिया खुणा। आपआपणियां उद्धरिती॥ १६॥
आत्मनो गुरुरात्मैव पुरुषस्य विशेषत:।
यत्प्रत्यक्षानुमानाभ्यां श्रेयोऽसावनुविन्दते॥ २०॥
पश्वादि योनींच्या ठायीं। हिताहितज्ञान असे पाहीं। मा पुरुषाच्या पुरुषदेहीं। ज्ञान पाहीं स्फुरद्रूप॥ १७॥ जें कर्म करितों मी देहीं। तेणें तरेन कीं नाहीं। हें ज्याचे त्याचे ठायीं। स्फुरद्रूप पाहीं कळतसे॥ १८॥ सांडूनि अशुभ वासना। जो न करी विषयकल्पना। तो आपुला गुरु आपण जाणा। नरकयातना चुकविली॥ १९॥ जो कंटाळला जन्मगर्भासी। मरमरों उबगला मरणासी। आधि लागली मानसीं। जन्ममरणासी नासावया॥ २२०॥ आवडी नुपजे स्त्रीपुत्रांसी। निद्रा न लागे अहर्निशीं। काळें ग्रासिलें आयुष्यासी। निजहितासी न देखिजे॥ २१॥ तुझीच तुजचि देखतां। काळें गिळिली बाल्यावस्था। तारुण्याचा ग्रासिला माथा। वार्धक्याभंवता लागला असे॥ २२॥ केवळ वार्धक्याचा जरंगा। त्यासीही काळु लागला पैं गा। आयुष्य व्यर्थ जातसे वेगा। हा निजनाडु जगा कळेना॥ २३॥ क्षणक्षणा काळु जातसे व्यर्थ। कांही न साधे जी परमार्थ। जन्ममरणांचा आवर्त। पुढें अनर्थ रोकडा॥ २४॥ स्वर्ग नरक कर्म ब्रह्म। चहूं प्राप्तींसी मनुष्यधर्म। यालागीं त्यजूनि पापकर्म। मोक्षधर्म धरावा॥ २५॥ नरदेह मोक्षाचा वांटा। वृथा जातसे कटकटा। हृदयीं आधी लागला मोठा। विषयचेष्टा विसरला॥ २६॥ ‘प्रत्यक्ष’ लक्षणें अनित्य। संसारु दिसे नाशवंत। यालागीं तो नव्हे आसक्त। होय विरक्त इहभोगीं॥ २७॥ याचिपरी ‘अनुमाना’। परलोकभोगभावना। आतळों नेदी मना। नश्वर पतना जाणोनि॥ २८॥ कैं कृपा करील गोविंद। कैं तुटेल भवबंध। कैं देखेन तो निजबोध। परमानंद जेणें होय॥ २९॥धावं पाव गा श्रीहरी। कृपा करीं दीनावरी। मज उद्धरीं भवसागरीं। भक्तकैवारी श्रीकृष्णा॥ २३०॥ जैसी जीवनावेगळी मासोळी। तैसा बोधालागीं तळमळी। प्रेमपडिभराच्या मेळीं। देह न सांभाळी सर्वथा॥ ३१॥ एक नेणोनि नरदेहा मुकले। एकीं नव्हे म्हणोनि उपेक्षिले। एक ज्ञानगर्वे गिळिले। एक भुलले विषयार्थी॥ ३२॥ एक साधनाभिमानें ठकिले। एक करूं करूं म्हणतां गेले। एक करितां अव्हाटां भरले। करणें ठेलें तैसेंचि॥ ३३॥ जरी विवेक कळला मना। तरी न तुटती विषयवासना। तेणें संतप्त होऊनि जाणा। नारायणा चिंतितु॥ ३४॥ कृष्ण म्हणे उद्धवासी। सविवेक वैराग्य असे ज्यासी। तोचि आपुला गुरु आपणासी। विशेषेंसीं जाणावा॥ ३५॥ त्याचिये निजबुद्धीसी। मीचि विवेकु प्रकाशीं। तो स्वयें जाणे निजबोधासी। निजमानसीं विवेकें॥ ३६॥ ज्यासी जैसा भावो। त्यासी मी तैसा देवो। ये अर्थी संदेहो। उद्धवा पहा हो न धरावा॥ ३७॥ उद्धवा येथ केवळ। पाहिजे निजबुद्धि निर्मळ। तरी आत्मबोध तत्काळ। होय सफळ सर्वथा॥ ३८॥
पुरुषत्वे च मां धीरा: सांख्ययोगविशारदा:।
आविस्तरां प्रपश्यन्ति सर्वशक्त्युपबृंहितम्॥ २१॥
एवं वैराग्यें पूर्ण भरित। धीर पुरुष विवेकयुक्त। सांख्ययोग विवंचित। निजीं निज प्राप्त तत्काळ॥ ३९॥ नरदेहीं विवेक वसे। निजरूप पावले कैसे। जें सर्वशक्तियुक्त असे। तें सावकाशें देखती॥ २४०॥ जें प्रसवे सर्वशक्तींतें। तें सर्वशक्ति-शक्तिदातें। जें नातळे सर्वशक्तीतें। त्या स्वरूपातें पाहताति॥ ४१॥ उद्धवा काय सांगों गोष्टी। बहुत शरीरें सृजिलीं सृष्टीं। मज नरदेहीं आवडी मोठी। उठाउठीं मी होती॥ ४२॥
एकद्वित्रचतुष्पादो बहुपादस्तथापद:।
बह्वॺ: सन्ति पुर: सृष्टास्तासां मे पौरुषी प्रिया॥ २२॥
केलीं एकचरणी शरीरें। दोंपायांची अपारें। तींपायांचीं मनोहरें। अतिसुंदरें चतुष्पदें॥ ४३॥ सर्पादि योनींच्या ठायीं। म्यां चरणचि केले नाहीं। एकें चालती बहु पायीं। केलीं पाहीं शरीरें॥ ४४॥ ऐशीं शरीरें नेणो किती॥ म्यां निर्माण केलीं ये क्षितीं। मज कर्त्यातें नेणती। मूढमति यालागीं॥ ४५॥ मज कर्त्याची प्राप्ति। होआवयालागीं निश्चितीं। स्वांशें प्रकाशोनि ज्ञानशक्ती। पौरुषी प्रकृति म्यां केली॥ ४६॥ जेणें देहें मज पावती। त्या देहाची मज अतिप्रीति। यालागीं श्रुति नरदेह वर्णिती। देव वांछिती नरदेहा॥ ४७॥ ऐशी नरदेहाची प्रीति। कृष्ण सांगे उद्धवाप्रती। येणें शरीरें मज पावती। नाना युक्तिविचारें॥ ४८॥
अत्र मां मार्गयन्त्यद्धा युक्ता हेतुभिरीश्वरम्।
गृह्यमाणैर्गुणैर्लिङ्गैरग्राह्यमनुमानत:॥ २३॥
येऊनि नरदेहाप्रती। कर्त्याची गवेषणा जे करिती। जो मी ईश्वर त्रिजगतीं। उत्पत्तिस्थितिसंहर्ता॥ ४९॥ बुद्धियुक्तीं विवेक करणें। ते जडें प्रकाशपणें। त्याचाही मी प्रकाशकु म्हणे। येणें लक्षणें लक्षिती॥ २५०॥ ऐशा नानापरींच्या अनुमानां। मी तंव वश नव्हें जाणा। जे लक्षिती सांडोनि अभिमाना। साक्षात्पणा ते येती॥ ५१॥ ज्याची आशा होय निराश। तोचि ब्रह्म पावे सावकाश। तेणें कळीकाळावरी कांस। जाण अवश्य घातली॥ ५२॥ मुख तंव स्वत:सिद्ध असे। तें निर्मळ आरिसां दिसे। तेवीं बुद्धीचेनि विवेकवशें। आत्मा भासे नरदेहीं॥ ५३॥ येचिविखींचा इतिहास जाण। तुज मी सांगेन पुरातन। यदुअवधूतसंवादलक्षण। ज्ञानसाधन साधकां॥ ५४॥
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम्।
अवधूतस्य संवादं यदोरमिततेजस:॥ २४॥
हरिखें म्हणतसे गोविंदु। उद्धवा आमुचा पूर्वज यदु। तेणें ब्रह्मज्ञानासी संवादु। केला विशदु अवधूतासीं॥ ५५॥ राजा यदु म्हणसी कैसा। क्षात्रसृष्टीचा सूर्यो जैसा। राजा चंद्राच्या प्रकाशा। निजतेजवशा लोपितु॥ ५६॥ तेणें गुरूचीं लक्षणें ऐकतां। सायुज्यमुक्ति आली हाता। ते हे पुरातन कथा। तुज मी आतां सांगेन॥ ५७॥
अवधूतं द्विजं कञ्चिच्चरन्तमकुतोभयम्।
कविं निरीक्ष्य तरुणं यदु: पप्रच्छ धर्मवित्॥ २५॥
कोणी एक अवधूतु। निजतेजें प्रकाशवंतु। ब्रह्मानंदें डुल्लतु। यदूनें येतु देखिला॥ ५८॥ त्या अवधूताचें लक्षण। यदु निरीक्षी आपण। देखिलें ब्रह्मसूत्रधारण। होय ब्राह्मण ब्रह्मवेत्ता॥ ५९॥ ऐसा तो अवधूतु। निर्भय नि:शंक वर्ततु। यदु व्याहाळिये होता जातु। देखिला वनांतु सन्मुख॥ २६०॥ आंतुला प्राण तत्त्वतां। बाहेर रिघों नेदी सर्वथा। स्वभावें प्राणापानसमता। झाली न धरितांधारणा॥ ६१॥ नवल तयाचें पाहणें। दृश्य दृश्यत्वें देखों नेणे। झाला सर्वांगें देखणें। देखणेंपणें पाहातसे॥ ६२॥ मी एकु वनीं वसता। हेंही नाठवे त्याचिया चित्ता। झाली सर्वत्र सर्वगतता। समसाम्यता समत्वें॥ ६३॥ कर्म कार्य कर्ता जाण। अवघा जाहला तो आपण। क्रियेनेंवाहूनियां आण। निंबलोण जीवें केलें॥ ६४॥ देहाचिया माथां। ठेविली होती अहंता। तें देहमिथ्यात्व पावतां। समूळ अहंता पळाली॥ ६५॥ नित्यानित्य होमद्वारें। ब्रह्माग्नि प्रज्वळला एकसरें। जाळूनि आश्रमांची चारी घरें। केलें खरें निराश्रमी॥ ६६॥ त्या आश्रमामाजीं होती। शास्त्रश्रवणविधिवादपोथी। ते जळाली जी निश्चितीं। भस्म हातीं न लगेचि॥ ६७॥ विधिनिषेधपैजा। जळाली पंचायतनदेवपूजा। होता संचितक्रियमाण पुंजा। तोही वोजा जळाला॥ ६८॥ यापरी तो अवधूतु। ब्रह्मानंदें जी डुल्लतु। निजसुखें वेल्हावतु। देखिला येतु यदुरायें॥ ६९॥ संकल्पविकल्परहित। शुद्ध सर्वांगीं विभूत। यालागीं बोलिजे ‘अवधूत’। येऱ्हवीं विख्यात ब्राह्मणु॥ २७०॥ सभोंवता समस्तु। प्रपंच निजबोधें असे धूतु। यालागीं बोलिजे ‘अवधूतु’। येऱ्हवीं विख्यातु ब्राह्मणु॥ ७१॥ अहं धुई तो ‘अवधूतु’। तोचि योगी तोचि पुनीतु। जो का अहंकारग्रस्तु। तोचि पतितु जन्मकर्मी॥ ७२॥ वार्धक्य यावें देहासी। तंव देहपण नाहीं देहापासीं। रिगमु नव्हेच जरेसी। तारुण्यासी तें मूळ॥ ७३॥ आणिकही त्याचीं लक्षणें। निच नवा बोधु मैळों नेणें। भोगिजे नित्य नूतनपणें। परम तारुण्यें टवटवला॥ ७४॥ निजबोधाचिया सत्ता। द्वैत जिंतिलें तत्त्वतां। ऐसा नि:शंकु विचरतां। भय सर्वथा त्या नाहीं॥ ७५॥ ऐशीं लक्षणें निर्धारितां। अवधूत निजबोधें पुरता। यदूसी उपजली विनीतता। श्रद्धा सर्वथा अनिवार॥ ७६॥ करूनि साष्टांग दंडवत। अतिनम्रश्रद्धायुक्त। हात जोडूनि पुसत। प्रसन्न चित्त रायाचें॥ ७७॥
यदुरुवाच
कुतो बुद्धिरियं ब्रह्मन्नकर्तु: सुविशारदा।
यामासाद्य भवाँल्लोकं विद्वांश्चरति बालवत्॥ २६॥
अपूर्व बुद्धि हे स्वामी। तुमचे ठायीं देखों आम्ही। जे न लभे यमनियमीं। कर्मधर्मीं आचरतां॥ ७८॥ दिसतोसी सर्वार्थी कुशळ। परी कांही न करूनि निश्चळ। अकर्तात्मबोधें तूं केवळ। जैसें बाळ अहेतुक॥ ७९॥ तूं बालाऐसा वर्तसी। परी बालबुद्धि नाहीं तुजपासीं। सर्वज्ञ सर्वथा होसी। ऐसें आम्हांसी दिसतसे॥ २८०॥ येवोनियां या लोकासी। पावोनियां नरदेहासी। सार्थकता तुझ्याऐसी। आणिकापाशीं न देखों॥ ८१॥
प्रायो धर्मार्थकामेषु विवित्सायां च मानवा:।
हेतुनैव समीहन्ते आयुषो यशस: श्रिय:॥ २७॥
प्रायशा ये लोकीं लोक। धर्मअर्थकामकामुक। येचिविखीं ज्ञान देख। आवश्यककरिताति॥ ८२॥ आम्ही स्वधर्म करितों म्हणती। स्नानसंध्येची कीर्ति मिरविती। शेवटीं गायत्रीचें फळ देती। अर्थप्राप्तीलागोनी॥ ८३॥ वेदोक्त आम्ही करितों याग। संस्थापितों वेदमार्ग। शेखीं तो करिती जीविकायोग। स्वर्गभोग वांछिती॥ ८४॥ एक म्हणती आम्ही स्वकर्मक। कुश मृत्तिका नाशिती उदक। समयीं आलिया याचक। इवलीसी भीक न घालिती॥ ८५॥ दांभिक वाढवावया स्फीती। वैष्णवदीक्षा अवलंबिती। देवपूजा झळफळीत दाविती। शंख लाविती दों हातीं॥ ८६॥ आयुष्यदानी पुण्यपुरुष। आम्ही चिकित्सक अहिंस। स्थावर जंगम जीव अशेष। मारूनियां यश मिरविती॥ ८७॥ यश वाढवावयाकारण। तुळापुरुष करिती दान। देहो मूत्रविष्ठें परिपूर्ण। धन त्यासमान जोखिती॥ ८८॥ परी परमार्थाचिया चाडा। कोणी वेंचीना कवडा। भूल कैशी पडली मूढां। स्वार्थ रोकडा विसरले॥ ८९॥ पूर्वीं अदृष्टीं नाहीं प्राप्ती। ते श्रीकामा उपास्ती करिती। श्रियेचा स्वामी श्रीपती। त्यातें न भजती अभाग्य॥ २९०॥ लक्ष्मी विश्वगुरु हरीची पत्नी। तीतें जो तो राखे अभिलाषूनी। नेदिती हरीची हरिलागोनी। त्यातें पतनीं हरि पचवी॥ ९१॥ रोगत्यागेंआयुष्य मागती। यालागीं सविता उपासिती। देहो नश्वर हें नाठवे चित्तीं। पडली भ्रांती निजपदा॥ ९२॥ एवं आयुष्य-यश-श्रीकामीं। समस्त भजतां देखों आम्ही। परी नवल केलें तुवां स्वामी। परब्रह्मीं निजबोधु॥ ९३॥ विषयबळ अलोलिक। मिथ्या भ्रमें भ्रमले लोक। ज्ञानसाधनें साधोनि देख। विषयसुख वांछिती॥ ९४॥ वेदांतवार्तिकवाक्स्फूर्ती। अद्वैत ब्रह्म प्रतिपादिती। शेखीं पोटासाठीं विकिती। नवल किती सांगावें॥ ९५॥ एक म्हणविती योगज्ञानी। वायुधारणा दाविती जनीं। टाळी लावूनि बैसती ध्यानीं। जीविका मनीं विषयांची॥ ९६॥ ऐसे विविदिषा लोक। साधनेंसाधूनि झाले मूर्ख। तुवां केलें जी अलोलिक। आत्मसुख साधिलें॥ ९७॥ ऐसें स्वामी अवधूता। तुवां तृणप्राय केलें जीविता। तुच्छ करोनि लोकां समस्तां। निजात्महिता मीनलासी॥ ९८॥ निजानंदें निवालासी। अंतरी शीतळ झालासी। ऐसें दिसताहे आम्हांसी। उपलक्षणेंसी परियेसीं॥ ९९॥
त्वं तु कल्प: कविर्दक्ष: सुभगोऽमृतभाषण:।
न कर्ता नेहसे किञ्चिज्जडोन्मत्तपिशाचवत्॥ २८॥
सर्वज्ञज्ञाता तूं होसी। तें ज्ञातेपण दिसों नदेसी। कांहीं करिसी ना वांछिसी। जडत्वें दाविसी निजशांती॥ ३००॥ सर्वथा उगा अससी। परी तूं अंगें विकळ नव्हसी। अंगीं अव्यंगु दिसतोसी। स्वरूपरूपेंसीं शोभितु॥ १॥ ज्ञान एकलेपणें ठेलें। दुजेनिवीण परदेशी झालें। तें तुजमाजीं सामावलें। यालागीं आलें ‘कवि’ पद॥ २॥ करूनि झालासी अकर्ता। हेचि तुझी थोर ‘दक्षता’। ब्रह्मरसें ‘रसाळ’ बोलतां। चवी अमृता तें कैंची॥ ३॥ ब्रह्मरस तू प्यालासी। ब्रह्मानंदें मातलासी। जगीं ‘उन्मत्त’ झालासी। दृष्टीं नाणिसी कोणातें॥ ४॥ सदा सावध निजरूपेंसी। यालागीं ‘माझें-तुझें’ न म्हणसी। तेंचि ‘पिसेंपण’ तुजपाशीं। दिसे जगासी सर्वथा॥ ५॥ निजबोधें तृप्त झालासी। परमानंदें निवालासी। तीं हीं लक्षणें तुजपासीं। निर्धारेंसीं दिसताती॥ ६॥
जनेषु दह्यमानेषु कामलोभदवाग्निना।
न तप्यसेऽग्निना मुक्तो गङ्गांभ:स्थ इव द्विप:॥ २९॥
कामलोभदावाग्नी-। माजीं जळतां लोक तीन्ही। देखत असों जी नयनीं। वेगळा कोणी दिसेना॥ ७॥ ते दावाग्नीमाजीं असतां। तूं न पोळसी गा अवधूता। नवल तुझी अक्षोभ्यता। नकळे सर्वथा आम्हांसी॥ ८॥ वणवा जळे दोंही थडीं। गजें गंगाजळीं दिधली बुडी। त्यासी न लागती तापाच्या वोढी। तैसें निरवडीं तुज देखों॥ ९॥ ऐशीं द्वंद्वें तुज नातळती। दृढ राहिलासी ब्रह्मस्थितीं। कांही एक करीन विनंती। कृपामूर्ति दयाळुवा॥ ३१०॥
त्वं हि न: पृच्छतां ब्रह्मन्नात्मन्यानन्दकारणम्।
ब्रूहि स्पर्शविहीनस्य भवत: केवलात्मन:॥ ३०॥
तूं ब्रह्मवेत्ता ब्राह्मण। निजानंदें परिपूर्ण। त्या आनंदाचें कारण। विशद करून सांगावें॥ ११॥ तूं देहीं वर्तसी विदेहस्थिती। तुज विषय आतळूं न शकती। हे अलिप्तपणाची प्राप्ती। कवण्या रीतीं तुज झाली॥ १२॥ तुज नाहीं रायाची भीड। न करिसी धनवंताची चाड। दीनवचन मानिसी गोड। पुरविसी कोड निजबोधें॥ १३॥ ऐसा केवळ तूं कृपाळू। आर्तबंधु दीनदयाळु। निजात्मभावें तूं केवळु। भक्तवत्सलु भावार्थे॥ १४॥ ऐसा यदूचा संवादु। आवडीं सांगे गोविंदु। उद्धवासी म्हणे सावधु। हृदयीं बोधु धरावा॥ १५॥
श्रीभगवानुवाच
यदुनैवं महाभागो ब्रह्मण्येन सुमेधसा।
पृष्ठ: सभाजित: प्राह प्रश्रयावनतं द्विज:॥ ३१॥
श्रीमुखें श्रीकांत। यदूचें भाग्य वर्णित। ब्राह्मणभक्त सत्त्वयुक्त। बुद्धिमंत श्रद्धाळु॥ १६॥ भगवद्भाग्यें भाग्यंवतु। यदूसी भेटला तो अवधूतु। त्यासी होऊनि अतिविनीतु। असे विनवितु निजहिता॥ १७॥ मृदु मंजुळ वचनीं प्रार्थिला। मधुपर्कविधानें पूजिला। अवधूत अतिसंतोषला। बोलता झाला निजमुखें॥ १८॥
ब्राह्मण उवाच
सन्ति मे गुरवो राजन् बहवो बुद्धॺुपाश्रिता:।
यतो बुद्धिमुपादाय मुक्तोऽटामीह ताञ्छृणु॥ ३२॥
क्षीरसागर उचंबळला। कीं कृपेचा मेघ गर्जिन्नला। निजसुखाचा वाधावा आला। तैसें बोलिला ब्राह्मणु॥ १९॥ ऐकें राजया चूडामणी। यदुकुळदीप दिनमणी। धन्य धन्य तुझी वाणी। निजगुणीं निवविलें॥ ३२०॥ राजा आणि सात्त्विकु। सिद्धलक्षणें लक्षकु। पृथ्वीमाजीं तूचि एकु। न दिसे आणिकु सर्वथा॥ २१॥ सुंदर आणि सगुण। उत्तमोत्तम केला प्रश्न। पुसिलें निजानंदकारण। तें यथार्थ जाण सांगेन॥ २२॥ गूरूविण आत्मप्राप्ती। सर्वथा न घडे गा नृपती। ते गुरूही मी तुजप्रती। यथानिगुतीं सांगेन॥ २३॥ निजबुद्धीच्या विवेकस्थितीं। बहुत गुरु म्यां केले असती। जे जे सद्गुण म्यां देखिले भूतीं। ते ते स्थितीं तो गुरु॥ २४॥ बुद्धीनें अंगिकारिलें गुणा। निजधैर्यें धरिली धारणा। तेणें मी मुक्त झालों जाणा। स्वेच्छा अटणा करीतसें॥ २५॥ संसारु तरावया। मुख्य ‘सद्बुद्धि’ गा राया। रिगमू नाहीं आणिका उपाया। व्यर्थ कासया शिणावें॥ २६॥ सद्बुद्धि नाहीं ज्यापासीं। तो संसाराची आंदणी दासी। उसंत नाहीं अहर्निशीं। दु:खभोगासी अनंत॥ २७॥ सद्बुद्धि नाहीं हृदयभुवनीं। तेथ वैराग्य नुपजे मनीं। मा तो तरेल कैसेनीं। विवेक स्वप्नीं न देखे॥ २८॥ वैराग्याचेनि पडिपाडें। ज्यासी सद्बुद्धि सांपडे। तेथ संसार कोण बापुडें। घायें रोकडें विभांडी॥ २९॥ आधीं संसारु एकु असावा। मग तो खटाटोपें नासावा। जो रिघाला विवेकगांवा। त्यासी तेव्हां तो नाहीं॥ ३३०॥ संसारनाशासी मूळ। शिष्य-प्रज्ञाचि केवळ। तिचें झाल्या अढळ बळ। होये मृगजळ संसारु॥ ३१॥ जे मी गुरु सांगेन म्हणे। तें निजप्रज्ञेचेनि लक्षणें। हेयादेयउपायपणें। घेणें त्यजणें सविवेकें॥ ३२॥ हेचि मऱ्हाठिया भाखा। सांगेन तें सावध ऐका। जेणें शिष्याचा आवांका। पडे ठाउका प्रत्यक्ष॥ ३३॥ ऐक प्रज्ञेचीं लक्षणें। सांगेन दृष्टांतपणें। सूप चाळणी रांधणें। घेणें त्यजणें विवेकें॥ ३४॥ चाळणीमाजीं जें जें पडे। सूक्ष्म निजतत्त्व तळीं सांडे। उरती गुणदोषांचे खडे। करिती बडबडे खडबडित॥ ३५॥ ऐसी जे अवस्था। ते त्यागावी सर्वथा। भ्रंशु होईल स्वार्था। हे राखतां त्रिशुद्धी॥ ३६॥ सुपाची दशा ते ऐशी। त्यजी रज:कण भुसासी। निडारल्या निजबीजासी। निजहृदयेंसीं राखत॥ ३७॥ स्वयें वैराग्यें तापणें। ते दशा ‘रांधणें’ म्हणें। अपक्वासी परिपक्व करणें। निजगुणें निजांगें॥ ३८॥ एवं या दोनी दशा। दृढ धराव्या वीरेशा। तेणें परमार्थु होये आपैसा। जेवी आरिसा हातींचा॥ ३९॥ यदूसी म्हणे ब्राह्मण। जें म्यां सांगितलें लक्षण। तेथें ठेवूनियां मन। सावधान परियेसीं॥ ३४०॥ जो जो जयाचा घेतला गुण। तो तो गुरु म्यां केला जाण। गुरूसी आलें अपारपण। जग संपूर्ण गुरु दिसे॥ ४१॥ ज्याचा गुण घेतला। तो सहजें गुरुत्वा आला। ज्याचा गुण त्यागरूपें घेतला। तोही गुरु झाला अहितत्यागें॥ ४२॥ एवं त्यागात्यागसमतुकें। दोहींसी गुरुत्व आलें निकें। राया तूं पाहें पां विवेकें। जगचि असकें गुरु दिसे॥ ४३॥ ऐसें पाहतां सावकाशीं। गुरुत्व आलें जगासी। हेंचि साधन जयापासीं। तोचि परमार्थासी साधकु॥ ४४॥ ऐसें सांगतां अचाट। तुज वाटेल हें कचाट। तरी गुरु सांगों श्रेष्ठ श्रेष्ठ। मानिले वरिष्ठ निजबुद्धीं॥ ४५॥
पृथिवी वायुराकाशमापोऽग्निश्चन्द्रमा रवि:।
कपोतोऽजगर: सिन्धु: पतङ्गो मधुकृद्गज:॥ ३३॥
मधुहा हरिणो मीन: पिङ्गला कुररोऽर्भक:।
कुमारी शरकृत्सर्प ऊर्णनाभि: सुपेशकृत्॥ ३४॥
गुरु सांगेन अशेष। संख्याप्रमाण ‘चोवीस’। त्यांचीं नांवें तूं परिस। सावकाश सांगेन॥ ४६॥ पृथ्वी वायु आकाश। अग्नि आप सीतांश। सातवा तो चंडांश। कपोता परिस आठवा॥ ४७॥ अजगर सिंधु पतंग। मधुमक्षिका गज भृंग। हरिण मीन वेश्या साङ्ग। नांवें सुभग ‘पिंगला’॥ ४८॥ टिटवी आणि लेंकरूं। कुमारी आणि शरकारु। सर्प कातणी पेशस्करु। इतुकेन गुरु चोवीस॥ ४९॥ पावावया तत्त्व पंचविसावें। चोविसां गुरूंसी उपासावें। विवेकयुक्तिस्वभावें। गुरु भजावे निजबुद्धीं॥ ३५०॥ ठाकावया निजबोधासी। निजविवेकें अहर्निशीं। गुरुत्व देऊनि अनेकांसी। निजहितासी गुरु केले॥ ५१॥ कोण युक्ति कोण विचारु। कोणें लक्षणें कोण गुरु। केला तोही निजनिर्धारु। सविस्तारु परियेसीं॥ ५२॥
एते मे गुरवो राजंश्चतुर्विंशतिराश्रिता:।
शिक्षा वृत्तिभिरेतेषामन्वशिक्षमिहात्मन:॥ ३५॥
ऐकें राजवर्य नृपती। विवेकधवलचक्रवर्ती। गुरुसंख्या तुजप्रती। यथानिगुतीं सांगितली॥ ५३॥ यांचिया शिक्षिता वृत्ती। शिकलों आपुलिया युक्तीं। मग पावलों आत्मस्थिती। विकल्पभ्रांती सांडूनी॥ ५४॥
यतो यदनुशिक्षामि यथा वा नाहुषात्मज।
तत्तथा पुरुषव्याघ्र निबोध कथयामि ते॥ ३६॥
नहुषाचा पुत्र ययाती। ययातीचा यदु निश्चितीं। ‘नाहुषनंदन’ यदूसी म्हणती। मूळ व्युत्पत्ती तेणें योगें॥ ५५॥ यालागीं म्हणे ‘नाहुषनंदना’। पुरुषांमाजीं पंचानना। सांगेन गुरूंच्या लक्षणा। विचक्षणा परियेसीं॥ ५६॥ ज्या गुरूचें जें शिक्षित। मी शिकलों सुनिश्चित। तें ते सांगेन समस्त। सावध चित्त करीं राया॥ ५७॥ ऐकावया गुरुलक्षण। यदूनें सर्वांग केलें श्रवण। अर्थीं बुडवूनियां मन। सावधान परिसतु॥ ५८॥ शब्द सांडोनियां मागें। शब्दार्थामाजीं रिगे। जें जें परिसतु तें तें होय अंगें। विकल्पत्यागें विनीतु॥ ५९॥
भूतैराक्रम्यमाणोऽपि धीरो दैववशानुगै:।
तद्विद्वान्न चलेन्मार्गादन्वशिक्षं क्षितेर्व्रतम्॥ ३७॥
परमार्थी मुख्य शांती। साधकांसी पाहिजे निश्चितीं। यालागीं प्रथम गुरु क्षिती। निजशांतीलागूनी॥ ३६०॥ ‘पृथ्वी’ गुरु त्रिविध पाहीं। पर्वत वृक्ष आणि मही। यांचीं लक्षणें धरितां देहीं। गुरुत्व पाहीं पृथ्वीसी॥ ६१॥ अंतरनिग्रहो ते ‘शांती’। बाह्येंद्रियनिग्रहो ते ‘दांती’॥ उभयसहिष्णुता ते ‘क्षांती’। क्षांतीसी क्षिति गुरु केली॥ ६२॥ पृथ्वीते नानाभूतीं। माझी माझी म्हणौनि झोंबती। नाना भेदीं भिन्न करिती। निजवृत्तिव्यवहारें॥ ६३॥ त्या भूतांचें भिन्न वर्तन। पृथ्वी संपादी आपण। मोडों नेदी अभिन्नपण। अखंड जाण सर्वदा॥ ६४॥ तैसें योगियांचे लक्षण। करितां कर्म भिन्नभिन्न। वृत्ति अखंडदंडायमान। सर्वदा जाण असावी॥ ६५॥ देहासी अदृष्टयोगें गती। भूतें अदृष्टयोगें आक्रमिती। भूतीं निजात्मता भाविती। द्वंद्वें न बाधिती साधकां॥ ६६॥ येथ भूतीं पृथ्वी पूजिली। नातरी विष्ठामूत्रीं गांजिली। हर्षविषादा नाहीं आली। निश्चल ठेली निजक्षांतीं॥ ६७॥ भूतें पार्थिवेंचि तंव झालीं। तिंहीं पृथ्वी पूजिली ना गांजिली। ऐक्यें द्वंद्वभावा मुकलीं। निश्चळ झाली निजरूपें॥ ६८॥ तैसाचि योगियाही जाणा। भूतवैषम्यें डंडळेना। सर्वभूती निजात्मभावना। विषमीं समाना भावितां॥ ६९॥ आतां पृथ्वीची अभिनव शांती। ते सांगेन राया तुजप्रती। जे शांति धरोनि संती। भगवद्भक्ती पावले॥ ३७०॥ पृथ्वी दाहेंकरूनि जाळिली। नांगर घालूनि फाळिली। लातवरीं तुडविली। तोडिली झाडिली पैं भूतीं॥ ७१॥ तो अपराधु न मनूनि क्षिती। सवेंचि भूतांतें प्रसन्न होती। तेथेंचि पिकवूनि नाना संपत्ती। तृप्ति देती भूतांतें॥ ७२॥ ऐसऐशिया निजशांती-। लागीं गुरु म्यां केली क्षिती। ऐक सभाग्या भूपती। शांतीची स्थिति अभिनव॥ ७३॥ एकें अपराधु केला। दुजेनि उगाचि साहिला। इतुकेनि शांतु केवीं झाला। उपेक्षिला अपराधी॥ ७४॥ ऊंसु मोडी त्या गोड भारी। छेदितें शस्त्र गोड करी। पिळिलियाआळिलियावरी। स्वादाचिया थोरी अपकाऱ्यां देतु॥ ७५॥ अपराध साहोनु अंगी। त्याच्या प्रवर्ते हितालागीं। तेचि ‘शांती’ पैं जगीं। होय दाटुगी निर्द्वंद्व॥ ७६॥ अपराध साहोनि अंगावरी। अपराध्या होइजे उपकारी। हें शिकलों पृथ्वियेवरी। परोपकारीं पर्वत॥ ७७॥
शश्वत्परार्थसर्वेह: परार्थैकान्तसम्भव:।
साधु: शिक्षेत भूभृत्तो नगशिष्य: परात्मताम्॥ ३८॥
पृथ्वीपासोनि झाले। ते पर्वतही म्यां गुरु केले। त्यांपासोनि जें जें शिकलें। तेंही वहिलें परियेसीं॥ ७८॥ रत्न-निकर समस्त। पर्वत परार्थचि वाहत। तृण जळ नाना अर्थ। तेही परार्थ धरितसे॥ ७९॥ कोणासी नेमी ना निवारी। उबगोनि न घाली बाहेरी। याचकाचे इच्छेवरी। परोपकारीं देतसे॥ ३८०॥ ग्रीष्माअंतीं सर्व सरे। परी तो देतां मागें न सरे। सवेंचि भगवंते कीजे पुरें। वर्षोनि जळधरें समृद्धी॥ ८१॥ जंव जंव उल्हासें दाता देतु। तंव तंव पुरवी जगन्नाथु। विकल्प न धरितां मनाआंतु। देता अच्युतु अनिवार॥ ८२॥ सत्य अच्युत दाता। हें न मनेचि तत्त्वतां। यालागीं दरिद्रता। विकल्पवंता लागली॥ ८३॥ एवं पर्वताची जे उत्पत्ती। ते परोपकारार्थ एकांतीं। उपकारावांचूनि चित्तीं। दुजी वृत्ति जाणेना॥ ८४॥ त्या पर्वताऐशी तत्त्वतां। असावी साधकासी उदारता। काया वाचा आणि चित्ता। सर्वस्व देतां उल्हासु॥ ८५॥ चेष्टामात्रें परोपकारता। सर्वदा करावी समस्तां। कोटिलाभा हाणोनि लाता। उपकारीं तत्त्वतां उद्यतु॥ ८६॥ परमार्थाचिया चाडा। स्वार्थ सांडोनि रोकडा। परोपकारार्थ अवघडा। रिघे सांकडा परार्थें॥ ८७॥ उपकारुचि साकारला। कीं परोपकारु रूपा आला। तैसा जन्मोनि उपकारी झाला। उपकारला सर्वांसी॥ ८८॥ ऊंसु जैसा अवधारीं। सर्वासी गोडपणें उपकारी। तैसाचि योगिया संसारीं। परोपकारी मधुरत्वें॥ ८९॥ जैसे पर्वतीं निर्झर। तैसे उपकाराचे पाझर। सुकों नेणती निरंतर। कृतोपकार जग केलें॥ ३९०॥ सांडोनि कृपणवृत्तीची संगती। उपकारी पर्वत एकांतीं। राहिलासे उपकारमूर्ती। धैर्यवृत्ति निर्धारें॥ ९१॥ परोपकारालागीं निश्चित। गुरु केला म्यां पर्वत। आतां वृक्षापासोनि जें शिक्षित। तेंही समस्त परियेसीं॥ ९२॥ सर्वांगें सर्वभावेंसी। सर्वकाळ सर्वदेशीं। पराधीन होआवें सर्वांसी। हें वृक्षापाशीं शिकलों॥ ९३॥ वृक्ष जेणें प्रतिपाळिला। तो त्या आधीन जाहला। कां जो छेदावया रिघाला। त्याही झाला स्वाधीनु॥ ९४॥ योगिया पालखीसी घातला। तेव्हां त्याचिया आधीन झाला। एकीं झूळीं द्यावया चालविला। तेव्हां त्याच्याही बोला आधीनु॥ ९५॥ सांडूनि देहींची अहंता। योगियासी झाली पराधीनता। विश्व माझा आत्मा सर्वथा। सर्वांच्या वर्तता बोलाआंतु॥ ९६॥ सर्वं तें मीचि आहें। यालागीं साधक बाधक न पाहे। त्याच्या बोलामाजीं राहे। वर्तता होये संतोषें॥ ९७॥ प्राप्त जें जें सुखदु:ख। तें तें अदृष्टाआधीन देख। आत्मा मानुनी सकळ लोक। पराधीन देख वर्तत॥ ९८॥ सकळ लोकीं निजात्मता। देखता जाहली पराधीनता। हें वृक्षापासोनि तत्त्वतां। ‘परात्मता’ शिकलों॥ ९९॥ आणीक एक लक्षण। वृक्षापासोनि शिकलों जाण। अतिथीचें पूजाविधान। तें सावधान परियेसीं॥ ४००॥ अतिथि आल्या वृक्षापासीं। वंचनार्थु न करी त्यासी। पत्रपुष्पफलमूळच्छायेसीं त्वचाकाष्ठांसी देतसे॥ १॥ जो वृक्षासी प्रतिपाळी। कां जो घावो घालूं ये मूळीं। दोंहीसीही सममेळीं। पुष्पीं फळीं संतुष्टी॥ २॥ जैसा वृक्ष समूळ सगळा। अर्थियांलागीं सार्थक जाहला। तैसा चित्तें वित्तें देहें बोला। साधु संतुष्टला अर्थ्यांसी॥ ३॥ अतिथीसी नव्हे पराङ्मुख। हा साधूसी गुण अलोलिक। अन्न धन उदक। यथासुखें देतुसे॥ ४॥ अर्थी आल्या अर्थावयासी। विमुख न व्हावें सर्वस्वेंसीं। हें शिकलों वृक्षापासीं। विवेकेंसीं निजबुद्धीं॥ ५॥ एवं पृथ्वी गुरु झाली ऐसी। दुजें गुरुत्व तें वायूसी। आलें जें जें युक्तीसी। तें तें परियेसीं नरदेवा॥ ६॥ गुरुत्व जें वायूसी। तें दों प्रकारीं परियेसीं। एक तें प्राण वृत्तीसीं। बाह्य वायूसी दुसरें॥ ७॥
प्राणवृत्त्यैव सन्तुष्येन्मुनिर्नैवेन्द्रियप्रियै:।
ज्ञानं यथा न नश्येत नावकीर्येत वाङ्मन:॥ ३९॥
प्राणाचियेपरी। जो विषयीं आसक्ती न धरी। विषय सेविलियाही वरी। नव्हे अहंकारी प्राणु जैसा॥ ८॥ प्राणाभ्यासें क्षुधा अद्भुत। तेव्हां प्राणासीच क्षोभ येत। तेणें काया वाचा चित्त। विकळ पडत इंद्रियें॥ ९॥ तया प्राणासी आधारु। भलतैसा मिळो आहारु। परी धडगोडांचा विचारु। न करी साचारु पैं प्राणु॥ ४१०॥ तैसाचि योगिया पाहीं। तो अभिमान न धरी देहीं। विषयो सेवी परी कांही। आसक्ति नाहीं तयासी॥ ११॥ क्षुधेचिया तोंडा। मिळे कोंडा अथवा मांडा। परी रसनेचा पांगडा। न करी धडफुडा तयासी॥ १२॥ ज्ञानधारणा न ढळे। इंद्रियें नव्हती विकळें। तैसा आहार युक्तिबळें। सेविजे केवळें निजधैर्यें॥ १३॥ प्राणास्तव इंद्रियें सबळें। प्राणयोंगें देह चळे। त्या देहकर्मा प्राणु नातळे। अलिप्त मेळें वर्ततु॥ १४॥ त्या प्राणाच्या ऐसी स्थिती। योगियाची वर्तती वृत्ती। सर्व करूनि न करी आसक्ती। देहस्थिति नातळे॥ १५॥ ब्रह्मादिकांचा देह पाळूं। कां सूकरादिकांचा देह टाळूं। ऐसा न मानीच विटाळू। प्राणु कृपाळु समभावें॥ १६॥ तैसेंच योगियाचें कर्म। न धरी उंच नीच मनोधर्म। कदा न देखे अधमोत्तम। भावना सम समभावें॥ १७॥ आवडीं प्रतिपाळावा रावो। रंकाचा टाळावा देहो। ऐसा प्राणासी नाहीं भावो। शुद्ध समभावो सर्वत्र॥ १८॥ प्राण अपान समान उदान। सर्व संधी वसे व्यान। इतुकीं नामें स्थानें पावोनि जाण। न सांडी प्राण एकपणा॥ १९॥ तैसे उंच नीच वर्णावर्ण। अधमोत्तमादि गुणागुण। देखोनियां योगी आपण। भावना परिपूर्ण न सांडी॥ ४२०॥ प्राणु असोनि देहाभीतरीं। बाह्य वायूसी भेद न धरी। तैशी योगिया भावना करी। बाह्याभ्यंतरीं ऐक्यता॥ २१॥
विषयेष्वाविशन्योगी नानाधर्मेषु सर्वत:।
गुणदोषव्यपेतात्मा न विषज्जेत वायुवत्॥ ४०॥
पार्थिवेष्विह देहेषु प्रविष्टस्तद्गुणाश्रय:।
गुणैर्न युज्यते योगी गन्धैर्वायुरिवात्मदृक्॥ ४१॥
ऐक्यता साधावी चतुरीं। ते वायूच्या ऐशी दोंहीपरी। बाह्य आणि अंतरीं। ऐक्यकरीं वर्तावें॥ २२॥ प्राणवृत्तीचीं लक्षणे। तुज सांगितलीं संपूर्णें। आतां बाह्य वायूचीं चिन्हें। सावधानें परियेसीं॥ २३॥ वायु सर्वांतें स्पर्शोनि जाये। परी अडकला कोठें न राहे। तैसें विषय सेवितां पाहे। आसक्तु नव्हे योगिया॥ २४॥ असोनि इंद्रियांचेनि मेळें। तो विषयांमाजी जरी खेळे। तरी गुणदोष आसक्ति मेळें। बोधु न मळे तयाचा॥ २५॥ वस्त्र चंदन वनिता माळा। सदा भोगितां विषयसोहळा। वायु नातळे जेवीं जाळा। तेवीं योगी वेगळा विषयांसी॥ २६॥ जैसें वारेनीं जाळ उडे। परी जाळीं वारा नातुडे। तेवीं भोग भोगितां गाढे। भोगीं नातुडे योगिया॥ २७॥ जातया वायूचे भेटी। सुगंध कोटी घालिती मिठी। त्यांची आसक्ती नाहीं पोटीं। उठाउठीं सांडितु॥ २८॥ तैसा आत्मत्वें योगिया पाहीं। प्रवेशलासे सर्वां देहीं। देह गुणाश्रयो पाहीं। ठायींच्या ठायीं तोचि तो॥ २९॥ निजात्मदृष्टीचेनि बळें। तो देहगुणांसी नातळे। जैसा गंधावरी वारा लोळे। परी नाकळे गंधासी॥ ४३०॥ तेचि परिपूर्ण आत्मस्थिती। राया मी सांगेन तुजप्रती। जैसी आकाशाची प्रतीती। सर्व पदार्थीं अलिप्त॥ ३१॥
अन्तर्हितश्च स्थिरजङ्गमेषु
ब्रह्मात्मभावेन समन्वयेन।
व्याप्त्याव्यवच्छेदमसङ्गमात्मनो
मुनिर्नभस्त्वं विततस्य भावयेत्॥ ४२॥
सर्व पदार्थी समत्व। यालागीं आकाशासी गुरुत्व। असंगत्व अभेदत्व। निर्मळत्व जाणोनी॥ ३२॥ विषमीं असोनि समत्व। संगीं असोनि असंगत्व। भेदु करितां अभेदत्व। यालागीं गुरुत्वआकाशा॥ ३३॥ वैर सर्पामुंगुसांसी। आकाश दोंहीचे हृदयवासी। वैर निर्वैरता आकाशासी। ते स्थिती योगियासी पाहिजे॥ ३४॥ तेणें आकाशदृष्टांतें। ब्रह्मभावें आपणियातें। योगी देखिजे पुरतें। व्यापकत्वें आपुल्या॥ ३५॥ ब्रह्मसमन्वयें पाहतां पाहीं। स्थावरजंगमांच्या ठायीं। तिळभरी वाढीरिती नाहीं। आपण पैं पाहीं कोंदला॥ ३६॥ आकाश सर्व पदार्थीं असे। परी असे हें सर्वांसी न दिसे। तेवीं दृश्य-द्रष्टा-अतीतदशें। सर्वत्र असे योगिया॥ ३७॥ नभ न खोंचे सांबळें। जळेना वणव्याचेनि जाळें। नव्हतां ज्वाळांवेगळें। असे सगळें टवटवित॥ ३८॥ तैसीं योगियासी द्वंद्वेसकळें। बाधूं न शकतीं कवणे काळें। नव्हतां द्वंद्वावेगळें। स्वरूप सगळें शोभत॥ ३९॥ योगिया छेदावया लवलाहें। सोडिले शस्त्रांचे समुदाये। तो शस्त्रांमाजीं अपणियातें पाहे। न रुपती घायेजेवीं गगना॥ ४४०॥ जें जें द्वंद्व बाधूं आलें। तें तें स्वरूप देखे आपुलें। सहजें द्वंद्वभावा मुकलें। अबाधित उरलें निजरूप॥ ४१॥ गगन बुडालें दिसे डोहीं। परी तें उदकें भिजलेंचि नाहीं। तैसा असोनियां सर्व देहीं। अलिप्त पाहीं योगिया॥ ४२॥ आकाश चिखल माखूं जातां। तें न माखे माखे लाविता। तैसा योगिया दोषी म्हणतां। दोषु सर्वथा म्हणत्यासी॥ ४३॥ गगन असोनियां जनीं। मैळेना जनघसणीं। तैसा योगिया सकळ कर्में करूनी। कर्मठपणीं न मैळे॥ ४४॥ मोटे बांधितां आकाशातें। चारी पालव पडती रिते। तेवीं कर्मी बांधितां योगियातें। कर्म तेथें निष्कर्म॥ ४५॥ घटामाजीं आकाश असे। तें वाच्य कीजे घटाकाशें। पाहतां घटा सबाह्य समरसें। आकाश असे परिपूर्ण॥ ४६॥ तैसा आत्मा म्हणती देहीं। तंव तो देहा सबाह्य पाहीं। देह मिथ्यात्वें ठायींचेठायीं। चिन्मात्र पाहीं परिपूर्ण॥ ४७॥
तेजोऽबन्न्मयैर्भावैर्मेघाद्यैर्वायुनेरितै:।
न स्पृश्यते नभस्तद्वत्कालसृष्टैर्गुणै: पुमान्॥ ४३॥
नभ पृथ्वीरजें न गदळे। उदकेंकरीं न पघळे। अग्नीचेनि ज्वाळें न जळे। वायुबळें उडेना॥ ४८॥ कडकडीत आभाळें। येऊनि आकाश झांकोळे। त्या समस्तां नभ नातळे। अलिप्त बळें संस्थित॥ ४९॥ तैसेंचि योगियासी। असतां निजात्मसमरसीं। काळें सृजिलिया गुणांसी। वश्य त्यांसी तो नव्हे॥ ४५०॥ काळाचें थोर सामर्थ्य जाण। देहासी आणी जरामरण। योगी देहातीत आपण। जन्ममरण न देखे॥ ५१॥ स्वप्नीं चिंतामणी जोडला। सवेंचि अंधकूपीं पडला। जागा जाहल्या न म्हणे नाडला। तैसा घडला देहसंगु॥ ५२॥ जो ब्रह्मादि देहांसी खाये। तो काळु वंदी योगियाचे पाये। जो काळाचाही आत्मा होये। निधडा पाहें महाकाळु॥ ५३॥ विजू कडकडूनि आकाशीं। तेजें प्रकाशी गगनासी। गगन नातळे ते विजूसी। असोनि तिशीं सबाह्य॥ ५४॥ तैसा सत्त्वगुण प्रकाशी ज्ञान। त्यासी योगिया नातळे जाण। ज्ञानस्वरूप निखळ आपण। वृत्तिज्ञान मग नेघे॥ ५५॥ झालिया सूर्यउदयासी। दीपप्रभा नये उपेगासी। तेवीं ‘सहज’ आलिया हातासी। वृत्तिज्ञानासी कोण पुसे॥ ५६॥ सत्त्वें प्रकाशिलें ज्ञान। तें आवडोनि नेघे जाण। अथवा खवळल्या रजोगुण। कर्मठपण त्या न ये॥ ५७॥ हो कां तमोगुणाचेनि मेळें। क्रोधमोहांसी नातळे। गुणातीत झाला बळें। बोधकल्लोळें स्वानंदें॥ ५८॥ उदकासी गुरुपण। आलें तें ऐक लक्षण। अवधूत म्हणे सावधान। नृपंनदन यदुवीरा॥ ५९॥
स्वच्छ: प्रकृतित: स्निग्धो माधुर्यस्तीर्थभूर्नृणाम्।
मुनि: पुनात्यपां मित्रमीक्षोपस्पर्शकीर्तनै:॥ ४४॥
लक्षणें पाहतां जळ। स्वभावें अतिनिर्मळ। प्रकृतीस्तव कोमळ। मधुर केवळ सर्वांसी॥ ४६०॥ पवित्र व्हावया प्राणियांसी। तीर्थीं तीर्थत्व उदकासी। इतुकीं लक्षणें योगीयासी। अहर्निशीं असावीं॥ ६१॥ उदकीं रिघाले जे समैळ। ते स्वभावें करी निर्मळ। परी न धरी अहंबळ। जे म्यां हे मळ क्षाळिले॥ ६२॥ तैसें योगियासी भजनशीळ। भावें भाविक जे केवळ। त्यांचे निरसूनि कळिमळ। न धरी बळ गुरुत्वें॥ ६३॥ प्राणु गेला तरी प्राणियांसी। कठिणत्व उपजेना मानसीं। जें जें भेटे तयासी। मृदुता कैसी वर्तत॥ ६४॥ जेवीं चंद्रकिरण चकोरांसी। पांखोवा जेवीं पिलियांसी। जीवन जैसें कां जीवांसी। तेवीं सर्वांसी मृदुत्व॥ ६५॥ जळ वरिवरी क्षाळी मळ। योगिया सबाह्य करी निर्मळ। उदक सुखी करी एक वेळ। योगी सर्वकाळ सुखदाता॥ ६६॥ उदकाचें सुख तें किती। सवेंचि क्षणें तृषितें होती। योगिया दे स्वानंदतृप्ती। सुखासी विकृती पैं नाहीं॥ ६७॥ उदकाची जे मधुरता। ते रसनेसीचि तत्त्वतां। योगियांचें गोडपण पाहतां। होय निवविता सर्वेंद्रियां॥ ६८॥ लागल्या योगियाची गोडी। अमृताची चवी थोडी। ब्रह्मेंद्रादि पदें बापुडीं। अर्धघडीमाजीं करीत॥ ६९॥ तापले आले उदकापाशीं। अंगस्पर्शे निववी त्यांसी। तैसीचि दशा योगियासी। स्पर्शें तापासी निवारी॥ ४७०॥ उदकें निवविलें ज्यासी। परतोनि ताप होये त्यासी। योगी कृपेनें स्पर्शें ज्यासी। त्रिविधतापांसीं निर्मुक्त॥ ७१॥ योगी ज्यासी निववी जिवेंभावें। त्यासी जीवु गेलियाही तापु नव्हे। निवालेपणें तो वोल्हावे। स्वानुभवें डुल्लत॥ ७२॥ मेघमुखें अध:पतन। उदकाचें देखोनि जाण। अध:पातें निवती जन। अन्नदान सकळांसी॥ ७३॥ तैसें योगियासी खालुतें येणें। जे इहलोकीं जन्म पावणें। जन निववी श्रवणकीर्तनें। निजज्ञानें उद्धरी॥ ७४॥ पर्जन्योदक देखतां जाण। जेवीं निवती सकळही जन। कां गंगादिकांचें दर्शन। करी मोचन पापाचें॥ ७५॥ तैसें योगियाचें दर्शन। भाग्येंवीण नव्हे जाण। ज्याने देखिले त्याचे चरण। करी मोचन भवरोगा॥ ७६॥ न घडे दर्शन स्पर्शन। तरी करावें त्याचें नामस्मरण। इतुकेनि भवमूळ जाण। करी छेदन तें नाम॥ ७७॥ सांडूनि भगवंताचें कीर्तन। केल्या भक्ताचें नामस्मरण। केवीं तुटेल भवबंधन। ऐसें न म्हणा सर्वथा॥ ७८॥ देवासी पूर्वी नामचि नाहीं। त्यासी भक्तीं प्रतिष्ठूनि पाहीं। नामरूपादि सर्वही। नानाविलासही अर्पिले॥ ७९॥ ऐसा भक्तीं देव थोर केला। आणूनि वैकंठीं बैसविला। भक्तउपकारें दाटला। मग त्याच्या बोलामाजीं वर्ते॥ ४८०॥ देवो भक्तवचनेंकरीं। झाला नर ना केसरी। प्रगटला खांबामाझारीं। शब्द करी भक्ताचा॥ ८१॥ आतांही प्रत्यक्ष प्रमाण। दासांचेनि वचनें जाण। पाषाणप्रतिमे देवो आपण। आनंदघन प्रगटे पैं॥ ८२॥ भक्तभावें आभारला। देवो उपकारें दाटला। यालागीं नुलंघवे बोला। पांगें पांगला भक्तांच्या॥ ८३॥ एवं जेथ भक्तांचें नाम घेणें। तेथ अवश्य देवें धांवणें। भक्त उपकारा उत्तीर्ण होणें। वेगें पावणें यालागीं॥ ८४॥ यालागीं भक्ताचें नाम घेतां। तुटती भवबंधनव्यथा। ऐसें सांगतां अवधूता। प्रेम सर्वथा न संडे॥ ८५॥ आतां अग्नि गुरु जो करणें। त्याचीं सांगेन लक्षणें। काना मना एक करणें। सावधपणें परियेसीं॥ ८६॥
तेजस्वी तपसा दीप्तो दुर्धर्षोदरभाजन:।
सर्वभक्षोऽपि युक्तात्मा नादत्ते मलमग्निवत्॥ ४५॥
अग्नि निजतेजें देदीप्यमान। साक्षात हातीं न धरवे जाण। उदरमात्रीं सांठवण। सर्व भक्षण निजतेजें॥ ८७॥ तैसाचि योगियाही जाण। भगवद्भावें देदीप्यमान। त्यासी धरावया आंगवण। नव्हे जाण सुरनरां॥ ८८॥ हातीं न धरवे खदिरांगारु। तैसा योगिया अतिदुर्धरु। तयासी न शके आवरूं। मायाव्यवहारु गुणेंसीं॥ ८९॥ अग्नीसी जेवीं मुखचि पात्र। तैसें योगियासी उदर मात्र। ठेवा ठेवणें विचित्र। नाहीं पात्र गांठीसी॥ ४९०॥ अग्नीनें जें जें सेवणें। तें जाळूनि आपुल्याऐसें करणें। यापरी सर्व भक्षणें। नाहीं स्पर्शणें मळासी॥ ९१॥ चंदन सुवासे दुर्गंध धुरे। निंब कडू ऊंस गोडिरे। तें जाळूनि आकारविकारें। कीजे वैश्वानरें आपणाऐसीं॥ ९२॥ तैसा योगी जें अंगीकारी। तें आत्मदृष्टीं निर्धारी। दोष दवडूनियां दूरी। मग स्वीकारी निजबोधें॥ ९३॥ भोग्य जें भोगूं जाये। तेथ आत्मप्रतीति पाहे। भोक्ता तद्रूपचि होये। हा भोगु पाहे योगिया॥ ९४॥ अग्नींत पडिलें जें समळ। तें अग्निमुखें होय निर्मळ। योगिया जें सेवी अळुमाळ। परम मंगळ तें होय॥ ९५॥ अग्निमुखीं यागु घडे। तेणें अदृष्टें स्वर्ग जोडे। योगियाचे मुखीं जें पडे। तेणें जोडे निजपद॥ ९६॥ आणिक अग्नीचें चिन्ह। ऐक राया सावधान। तेंचि साधकासी साधन। सिद्ध लक्षण सिद्धाचें॥ ९७॥
क्वचिच्छन्न: क्वचित्स्पष्ट उपास्य: श्रेय इच्छताम्।
भुङ्क्ते सर्वत्र दातॄणां दहन् प्रागुत्तराशुभम्॥ ४६॥
भीतरीं तेजस्वी वरी झांकिला। होमकुंडीं अग्नि पुरिला। कां यज्ञशाळे प्रज्वळला। याज्ञिकीं केला महायागु॥ ९८॥ जो जो उपासका भावो जीवीं। त्या त्या श्रेयातें उपजवीं। पूर्वोत्तर अशुचित्वें आघवीं। जाळूनि हवी सेवितु॥ ९९॥ तैशीचि योगियाची लीळा। भाविकां प्रकट दिसे डोळां। एकां गुप्तचि होऊनि ठेला। न दिसे पाहिला सर्वथा॥ ५००॥ ऐशियाच्याही ठायीं। भावबळ भाविक पाहीं। अर्पिती जें जें कांहीं। तेणें मोक्ष पाहीं मुमुक्षां॥ १॥ तें पडतांचि योगियांच्या मुखीं। संचित क्रियमाणें असकीं। जाळोनियां एकाएकीं। करी सुखी निजपदीं॥ २॥ आणीकही अग्नीचें लक्षण। राया तुज मी सांगेन जाण। जेणें सगुण आणि निर्गुण। दिसे समान समसाम्यें॥ ३॥
स्वमायया सृष्टमिदं सदसल्लक्षणं विभु:।
प्रविष्ट ईयते तत्तत्स्वरूपोऽग्निरिवैधसि॥ ४७॥
अग्नि सहजें निराकार। त्यासी काष्ठानुरूपें आकार। दीर्घ चक्र वर्तुळ थोर। नानाकार भासतु॥ ४॥ तैसीचि भगवंताची भगवद्गती। स्वमायाकल्पित कल्पनाकृती। तेथ प्रवेशला सहज स्थितीं। बहुधा व्यक्ती तो भासे॥ ५॥ जैसें गंगेचें एक जळ। भासे भंवरे लहरी कल्लोळ। तैसा जगदाकारें अखिल। भासे सकळ जगदात्मा॥ ६॥ कां छायामंडपींच्या चित्रासी। दीप प्रभा भासे जैसी। राम रावण या नांवेंसीं। दावी जगासी नटनाटॺ॥ ७॥ तैशा नानाविधा व्यक्ती। नाना मतें नानाकृती। तेथ प्रवेशोनि श्रीपती। सहजस्थितीं नाचवी॥ ८॥ तैशी योगियाची स्थिती। पाहता नानाकार व्यक्ती। आपणियातें देखे समवृत्ती। भेदभ्रांति त्या नाहीं॥ ९॥ तेथ जें जें कांहीं पाहे। तें तें आपणचि आहे। या उपपत्ती उभवूनि बाहे। सांगताहे अवधूतु॥ ५१०॥ या देहासी जन्म नाशु। आत्मा नित्य अविनाशु। हा दृढ केला विश्वासु। गुरु हिमांशु करूनि॥ ११॥
विसर्गाद्या: श्मशानान्ता भावा देहस्य नात्मन:।
कलानामिव चन्द्रस्य कालेनाव्यक्तवर्त्मना॥ ४८॥
शुक्लकृष्णपक्षपाडी। चंद्रकळांची वाढीमोडी। ते निजचंद्रीं नाहीं वोढी। तैशी रोकडी योगियां॥ १२॥ जन्मनाशादि षड्विकार। हे देहासीच साचार। आत्मा अविनाशी निर्विकार। अनंत अपार स्वरूपत्वें॥ १३॥ घटु स्वभावें नाशवंतु असे। त्यामाजीं चंद्रमा बिंबलासे। नश्वरीं अनश्वर दिसे। विकारदोषें लिंपेना॥ १४॥ घटासवें चंद्रासी उत्पत्ती। नाहीं नाशासवें नाशप्राप्ती। चंद्रमा आपुले सहजस्थितीं। नाशउत्पत्तिरहितु॥ १५॥ तैसा योगिया निजरूपपणें। देहासवें नाहीं होणें। देह निमाल्या नाहीं निमणें। अखंडपणें परिपूर्ण॥ १६॥ काळाची अलक्ष्य गती। दाखवी नाश आणि उत्पत्ति। ते काळसत्ता देहाप्रती। आत्मस्थिती नातळे॥ १७॥ एवं काळाचें बळ गाढें। म्हणती ते देहाचिपुढें। पाहतां आत्मस्थितीकडे। काळ बापुडें तेथ नाहीं॥ १८॥ सूक्ष्म काळगती सांगतां। वेगें आठवलें अवधूता। सिंहावलोकनें मागुता। अग्निदृष्टांता सांगतु॥ १९॥
कालेन ह्योघवेगेन भूतानां प्रभवाप्ययौ।
नित्यावपि न दृश्येते आत्मनोऽग्नेर्यथार्चिषाम्॥ ४९॥
काळनदीचा महावेगु। सूक्ष्मगती वाहतां वोघू। तेथ भूततरंगा जन्मभंगु। देखतांचि जगु न देखे॥ ५२०॥ जराजर्जरित जाण। वाहतां नदीमाजीं वोसण। षड्विकार तेचि परिपूर्ण। भंवरे दारुण भंवताति॥ २१॥ बाल्य-तारुण्यांचें खळाळ। वार्धक्याचें मंद जळ। जन्ममरणांचे उसाळ। अतिकल्लोळ उठती॥ २२॥ वोघवेगाच्या कडाडी। पडत आयुष्याची दरडी। स्वर्गादि देउळें मोडी। शिखरींचे पाडी सुरेंद्र॥ २३॥ तळीं रिचवितां घोगें। पाताळादि विवरें वेगें। नाशूनियां पन्नगें। अंगभंगें अडिमोडी करी॥ २४॥ ऐशिया जी काळवोघासीं। घडामोडी भूततरंगांसी। होतसे अहर्निशीं। तें कोणासी लक्षेना॥ २५॥ जैं महाप्रळयीं मेघु गडाडी। तैं पूर चढे कडाडी। ब्रह्मादिक तरुवर उपडी। समूळ सशेंडी वाहविले॥ २६॥ जैं आत्यंतिक पुरु चढे। तैं वैकुंठ कैलासही बुडे। तेथ काळा रिगू न घडे। हें अवचट घडे एकदां॥ २७॥ अनिवार काळनदीची गती। सूक्ष्म लक्षेना निश्चितीं। ते सूक्ष्मगतीची स्थिती। अतिनिगुतीं परियेसीं॥ २८॥ दीपू तोचि तो हा म्हणती। परी शिखा क्षणक्षणा जाती। ते लक्षेना सूक्ष्मगती। अंतीं म्हणती विझाला॥ २९॥ प्रत्यक्ष प्रवाहे गंगाजळ। ते काळींचे म्हणती बरळ। तैशी काळगती अकळ। लोक सकळ नेणती॥ ५३०॥ प्रत्यक्ष पाहतां देहासी। काळ वयसेतें ग्रासी। बाल्य-कौमारतारुण्यांसी। निकट काळासी न देखती॥ ३१॥ अलक्ष्य काळाची काळगती। यालागीं गुरु केला गभस्ती। त्यापासोनि शिकलों स्थिति। तेही नृपति परियेसीं॥ ३२॥
गुणैर्गुणानुपादत्ते यथाकालं विमुञ्चति।
न तेषु युज्यते योगी गोभिर्गा इव गोपति:॥ ५०॥
सूर्य काळें निजकिरणीं। रसेंसहित शोषी पाणी। तोचि वर्षाकाळीं वर्षोनी। निववी जनीं सहस्रधा॥ ३३॥ सर्व शोषूनि घे किरणीं। तें शोषितें लक्षण नेणे कोणी। देतां मेघमुखें वरुषोनी। निववी अवनी जनेंसीं॥ ३४॥ तैसीचि योगियाची परीं। अल्प ज्याचें अंगीकारी। त्याचे मनोरथ पूर्ण करी। सहस्र प्रकारी हितत्वें॥ ३५॥ ज्यांचें सेविती योगी आत्माराम। त्यांचे पुरती सकळ काम। अंतीं करोनियां निष्काम। विश्रामधाम आणिती॥ ३६॥ एवं योगी आपुले योगबळें। विषयो सेविती इंद्रियमेळें। जे देती त्यांसी यथाकाळें। कृपाबळें निवविती॥ ३७॥ त्यांसी विषयो देतां कां घेतां। आसक्ति नाहीं सर्वथा। रसु चोखूनि घेतां देतां। अलिप्त सविता तैसे ते॥ ३८॥
बुध्यते स्वेन भेदेन व्यक्तिस्थ इव तद्गत:।
लक्ष्यते स्थूलमतिभिरात्मा चावस्थितोऽर्कवत्॥ ५१॥
सूर्यो थिल्लरामाजीं बिंबला। मूढ म्हणती थिल्लरीं बुडाला। त्याचेनि कंपें कंपु मानिला। डहुळें डहुळला म्हणती तो॥ ३९॥ त्या थिल्लरातें नातळतां। गगनीं अलिप्त जेवीं सविता। तैसीच योगियांची योग्यता। देहातीतता देहकर्मीं॥ ५४०॥ त्यासी देहबुद्धीचेनि छंदें। म्हणती योगिया देहीं नांदे। त्या देहाचेनि नाना बाधें। स्वबुद्धिभेदें बांधिला म्हणती॥ ४१॥ त्यासी देहाचेंबाधितभान। हें न कळें त्याचें गुह्यज्ञान। दोराचेनि सापें जाण। डसोनि कोण मारिला॥ ४२॥ एवं आत्मा तो चिदाकाशीं। मिथ्या देहीं मिथ्यात्वेंसीं। बिंबोनि दावी देहकर्मासी। नव्हे तें त्यासी बाधक॥ ४३॥ देखे आपणातें जळीं बिंबला। परी न म्हणे मी जळीं बुडाला। तैसा देहातीतुबोधु झाला। नाहीं भ्याला देहकर्मा॥ ४४॥ देखोनि मृगजळाचा पूरु। मूर्ख करूं धांवती तारूं। तैसा मिथ्या हा संसारु। भयंकरु मूर्खासी॥ ४५॥ यालागीं दारागृहपुत्रप्राप्ती। तेथ न करावी अतिप्रीती। येचिविषयीं रायाप्रती। कथा कपोती सांगतु॥ ४६॥
नातिस्नेह: प्रसङ्गो वा कर्तव्य: क्वापि केनचित्।
कुर्वन्विन्देत सन्तापं कपोत इव दीनधी:॥ ५२॥
संसारदु:खाचें मूळ। स्त्रीआसक्तीच जाण केवळ। स्त्रीलोभाचें जेथ प्रबळ बळ। दु:ख सकळ त्यापासीं॥ ४७॥ स्त्रीपासाव झाले पुत्र। त्याचे ठायीं स्नेह विचित्र। करितां दु:खासी पात्र। संसारी नर होताति॥ ४८॥ आसक्ति आणि स्नेहसूत्र। या दोन्हीपासाव दु:ख विचित्र। पदोपदीं भोगिती नर। अस्वतंत्र होऊनि॥ ४९॥ यालागीं भलतेनि भलते ठायीं। आसक्ति स्नेहो न करावा पाहीं। अतिस्नेहो मांडिजे जिंहीं। दु:ख तिंही भोगिजे॥ ५५०॥ स्नेहदु:खाची वार्ता। कपोता-कपोतीची कथा। तुज सांगेन नृपनाथा। स्वस्थचित्ता परियेसीं॥ ५१॥
कपोत: कश्चनारण्ये कृतनीडो वनस्पतौ।
कपोत्या भार्यया सार्धमुवास कतिचित्समा:॥ ५३॥
कपोतीचें स्नेह गोड। धरोनी स्त्रीसुखाची चाड। वनीं वृक्ष पाहोनियां गूढ। करी नीड कपोता॥ ५२॥ तेणें वनचरें वनस्थळीं। नीडामाजीं स्त्रीमेळीं। वासु केला बहुकाळीं। भार्येजवळी भूलला॥ ५३॥
कपोतौ स्नेहगुणितहृदयौ गृहधर्मिणौ।
दृष्टि दृष्टॺाङ्गमङ्गेन बुद्धिं बुद्धॺा बबन्धतु:॥ ५४॥
कपोता आणि कपोती। परस्परें दोघां अतिप्रीती। स्नेहो वाढलासे चित्तीं। हृदयीं आसक्ती नीच नवी॥ ५४॥ हावभाव विलासस्थिती। येरेयेरांकडे पाहती। परस्परें कुरवाळिती। वोठंगिती येरयेरां॥ ५५॥ येरयेरां वेगळें होणें। नाहीं जीवें अथवा मनें। दोघें वर्तती एकें प्राणें। खाणें जेवणें एकत्र॥ ५६॥
शय्यासनाटनस्थानवार्ताक्रीडाशनादिकम्।
मिथुनीभूय विस्रब्धौ चेरतुर्वनराजिषु॥ ५५॥
सेवितां ज्याची अतिगोडी। तें घालिती येरयेरांच्या तोंडीं। जीवेंप्राणें शिणोनी जोडी। तें दे आवडीं स्त्रियेसी॥ ५७॥ स्त्रियेसी सांडूनि दुरी। पाऊल न घाली बाहेरी। हात धरोनि परस्परीं। आंतबाहेरी हिंडती॥ ५८॥ सदा एकांतां बसती। एके स्थानीं दोघें असती। दोघें क्रीडाविहार करिती। खेळ खेळती विनोदें॥ ५९॥ एकांतीं गोड बोली। सासुसासऱ्यांचा विकल्पु घाली। दिराभावांच्या मोडी चाली। बोलाच्या भुलीं भुलवित॥ ५६०॥ एके आसनीं बैसती। येरयेरांतें टेंकती। एके शय्ये निद्रा करिती। अहोरातीं एकत्र॥ ६१॥ मैथुनसुखाचेनि वैभवें। विश्वासोनि जीवेंभावें। हिताहित कांही नाठवे। गृहिणीगौरवें नाचतु॥ ६२॥ खेंडकुलिया आराम। त्यामाजीं दोघां समागम। नाममात्रें गृहाश्रम। विषयसंभ्रम वनराजीं॥ ६३॥
यं यं वाञ्छति सा राजंस्तर्पयन्त्यनुकम्पिता।
तं तं समनयत्कामं कृच्छ्रेणाप्यजितेन्द्रिय:॥ ५६॥
जीवितापरीस समर्थ। जे जे मागे ते ते अर्थ। जीवेंप्राणें शिणोनि देत। काममोहित होऊनि॥ ६४॥ जाणोनि जीवींचे खुणे। न मागतां अर्थ देणें। त्याहीवरी जरी त्या मागणें। तरी विकूनि देणें आपणियातें॥ ६५॥ धर्माची वेळ नाठवणें। दीनावरी दया नेणे। कृपा स्त्रियेवरी करणें। जीवेंप्राणें सर्वस्वें॥ ६६॥ बैसली साकरेवरी माशी। मारितांही नुडे जैशी। तैसा भोगितां विषयांसी। जरामरणासी नाठवी॥ ६७॥ जैशी पूर्वजांची भाक। पाळिती सत्यवादी लोक। तैसा स्त्रियेचेंचि सुख। पाळी देख सर्वस्वें॥ ६८॥ जैसी आत्मउपासकासी। एकात्मता होये त्यासी। तैसें स्त्रीवांचोनि दृष्टीसी। जगीं आणिकासी न देखे॥ ६९॥
कपोती प्रथमं गर्भं गृह्णती काल आगते।
अण्डानि सुषुवे नीडे स्वपत्यु: सन्निधौ सती॥ ५७॥
आधींचि प्रिया पढियंती। तेही झाली गर्भवती। जैशी लोभियाचे हातीं। सांपडे अवचितीं धनलोभे॥ ५७०॥ तैसें तिच्या गर्भाचें कोड। अधिकाधिक वाढवी गोड। जैसें मदिरा पिऊनि माकड। नाचे तडतड डुल्लतु॥ ७१॥ तैसे गर्भाचे सोहळे। सर्वस्वें पुरवी डोहळे। तिचे लीळेमाजी खेळे। प्राप्तकाळें प्रसूती॥ ७२॥ स्वनीडा-आंतौती। जाहली अंडांतें प्रसवती। प्रसूतिवाधा वासांगति। ऐकोनि पति उल्हासे॥ ७३॥
तेषु काले व्यजायन्त रचितावयवा हरे:।
शक्तिभिर्दुर्विभाव्याभि: कोमलाङ्गतनूरुहा:॥ ५८॥
अघटित घटी हरीची माया। अलक्ष लक्षेना ब्रह्मया। अवेव अंडामाजीं तया। देवमाया रचियेले॥ ७४॥ रसें भरलीं होतीं अंडें। त्यांमाजीं नख पक्ष चांचुवडें। उघडिलीं डोळॺांची कवाडें। करी कोडें हरिमाया॥ ७५॥ अंडे उलोनि आपण। कोंवळी पिलीं निघालीं जाण। पितरें दृष्टींदेखोन। जीवेंप्राणें भुललीं॥ ७६॥
प्रजा: पुपुषतु: प्रीतौ दम्पती पुत्रवत्सलौ।
शृण्वन्तौ कूजितं तासां निर्वृतौ कलभाषितै:॥ ५९॥
अत्यंत कोंवळीं बाळें। दोघें जणें पुत्रवत्सलें। शांतविती मंजुळें। अतिस्नेहाळें प्रजांसी॥ ७७॥ जे समयीं जैसें लक्षण। तैसें प्रजांचें पोषण। अंगें करिताति आपण। दोघें जण मिळोनि॥ ७८॥ गोड गोजिरे बोल। ऐकोनि दोघां येती डोल। धांवोनियां वेळोवेळ। निंबलोण उतरिती॥ ७९॥
तासां पतत्रै: सुस्पर्शै: कूजितैर्मुग्धचेष्टितै:।
प्रत्युद्गमैरदीनानां पितरौ मुदमापतु:॥ ६०॥
त्यांचेनि आलिंगनचुंबनें। मृदु मंजुळ कलभाषणें। दों पक्षांचेनि स्पर्शनें। दोघे जणें निवताति॥ ५८०॥ माता पिता दोघें बैसति। सन्मुख अपत्यें धांवती। लोल वक्र विलोकिती। वेगें दाविती येरयेरां॥ ८१॥ मग देवोनियां खेवे। दूरी जाती मुग्धभावें। तेथूनि घेऊनियां धांवे। वेगें यावें तयांपासीं॥ ८२॥ मायबापांच्या पाखोव्यापासीं। हीनदीनता नाहीं बाळांसी। जे जन्मोनि त्यांचे कुशीं। त्या दोघांसी सभाग्यता॥ ८३॥ लाडिकीं लळेवाडें बाळें। लाडें कोडें पुरविती लळे। देखोनि निवती दिठी डोळे। स्नेह आगळें येरयेरां॥ ८४॥ ऐसीं खेळतां देखोनि बाळें। दोघें धांवती एकवेळे। उचलूनियां स्नेहबळें। मुख कोवळें चुंबिती॥ ८५॥
स्नेहानुबद्धहृदयावन्योन्यं विष्णुमायया।
विमोहितौ दीनधियौ शिशून्पुपुषतु: प्रजा:॥ ६१॥
अजाची जे अजा माया। त्या कैसी भुलवी गा राया। अन्योन्यस्नेह बांधोनि हृदया। पिलीं पोसावया उद्यत॥ ८६॥ स्त्रीपुत्रांचा मोह गहन। त्यांचें करावया पोषण। चिंतातुर अतिदीन। करी भ्रमण अन्नार्थ॥ ८७॥
एकदा जग्मतुस्तासामन्नार्थं तौ कुटुम्बिनौ।
परित: कानने तस्मिन्नर्थिनौ चेरतुश्चिरम्॥ ६२॥
एवं टणकीं जालीं बाळें। कुटुंब थोर थोरावलें। अन्न बहुसाल पाहिजे झालें। दोघे विव्हळेंगृहधर्मे॥ ८८॥ यापरी कुटुंबवत्सलें। पुत्रस्नेहें स्नेहाळें। दोघें जणें एके वेळे। अन्न बहुकाळें अर्थिती॥ ८९॥ सहसा मिळेना अन्न। यालागीं हिंडती वनोपवन। बहुसाल श्रमतांही जाण। पूर्ण पोषण मिळेना॥ ५९०॥ बहुसाल मेळवूनि चारा। दोघे जणें जाऊं घरा। मग आपुल्या लेंकुरां। नाना उपचारां प्रतिपाळूं॥ ९१॥ ऐसऐशिया वासना। मेळवावया अन्ना। दोघें जणें नाना स्थानां। वना उपवना हिंडती॥ ९२॥
दृष्ट्वा ताँल्लुब्धक: कश्चिद्यदृच्छातो वनेचर:।
जगृहे जालमातत्य चरत: स्वालयान्तिके॥ ६३॥
माता पिता गेलीं दुरी। उडतीं पिलें नीडाभीतरीं। क्षुधेनें पीडिलीं भारी। निघालीं बाहेरी अदृष्टें॥ ९३॥ ते वनीं कोणी एक लुब्धक। पक्षिबंधनीं अतिसाधक। तेणें ते कपोतबाळक। अदृष्टें देख देखिले॥ ९४॥ तेणें पसरोनियां काळजाळें। पाशीं बांधिलीं तीं बाळें। कपोतकपोतींचे वेळे। राखत केवळें राहिला॥ ९५॥
कपोतश्च कपोती च प्रजापोषे सदोत्सुकौ।
गतौ पोषणमादाय स्वनीडमुपजग्मतु:॥ ६४॥
बाळकांच्या अतिप्रीतीं। कपोता आणि कपोती। चारा घेऊनि येती। नीडाप्रति लवलाहें॥ ९६॥ स्त्रीसुखाची आसक्ती। तेचि वाढत्या दु:खाची सूती। स्त्रीसंगें दु:खप्राप्ती। सांगों किती अनिवार॥ ९७॥ पुरुषासी द्यावया दु:ख। स्त्रीसंगूचि आवश्यक। पुत्रपौत्रद्वारा देख। नानादु:ख भोगवी॥ ९८॥
कपोती स्वात्मजान्वीक्ष्य बालकाञ्जालसंवृतान्।
तानभ्यधावत्क्रोशन्ती क्रोशतो भृशदु:खिता॥ ६५॥
तंव काळजाळीं एके वेळें। कपोती बांधली देखे बाळें। तोंड घेऊनि पिटी कपाळें। आक्रोशें लोळें दु:खित॥ ९९॥ बाळें चरफडितां देखे जाळीं। आक्रंदोनि दे आरोळी। बाळांसन्मुख धावें वेळोवेळीं। दुखें तळमळी दु:खित॥ ६००॥
सासकृत्स्नेहगुणिता दीनचित्ताजमायया।
स्वयं चाबध्यत शिचा बद्धान्पश्यन्त्यपस्मृति:॥ ६६॥
दु:ख द्यावया भ्रतारासी। आक्रंदें कपोती चालिली कैसी। शतगुणें स्नेहो वाढला तिसी। मृतपुत्रांसी देखोनि॥ १॥ पुत्रस्नेहें केलें वेडें। गुण आठआठवूनि रडे। हिताहित न देखे पुढें। बळेंचि पडे जाळांतु॥ २॥ मायामोहें भुलली कैशी। जेथ बांधलें देखे पुत्रांसी। ते जाळीं घाली आपणासी। मोहें पिशी ते केली॥ ३॥
कपोतश्चात्मजान् बद्धानात्मनोऽप्यधिकान्प्रियान्।
भार्यां चात्मसमां दीनो विललापातिदु:खित:॥ ६७॥
अंतरला स्त्रीबाळकीं। कपोता तो एकाएकीं। रुदन करी अधोमुखीं। अतिदु:खीं विलपतु॥ ४॥ जीवाहोनि प्रिय अधिक। ते निर्जीव देखिले बाळक। अनुकूल अनुरूपक। भार्या देख अंतरली॥ ५॥
अहो मे पश्यतापायमल्पपुण्यस्य दुर्मते:।
अतृप्तस्याकृतार्थस्य गृहस्त्रैवर्गिको हत:॥ ६८॥
धर्म अर्थ आणि काम। या तिहींचा आश्रयो गृहाश्रम। तो भंगला मी अनाश्रम। अतृप्त काम सांडूनि॥ ६॥ पूर्वपापाचा आवर्तु। मज सांडूनि अकृतार्थु। माझा कामु नव्हतां तृप्तु। धर्मकामार्थु भंगला॥ ७॥ गृहीं त्रैवर्गुचि भंगला। चौथा पुरुषार्थ असे उरला। तो साधूनि घेऊं वहिला। आश्रमु भंगल्या क्षिती काय॥ ८॥ ऐसें म्हणसी जरी निगुतीं। ये अर्थीं मी दुर्मती। विषयवासना नोसंडिती। कैसेनि मुक्ति साधेल॥ ९॥ म्यां पूर्वी अल्प पुण्य होतें केलें। यालागीं अंतरायीं घर घेतलें। माझें परलोकसाधन ठेलें। विधुर केलें मजलागीं॥ ६१०॥ हो कां गृहीं असतां गृहस्थां। काय परलोकसाधे समस्तां। इतरांची असो कथा। मज साधनता तंव होती॥ ११॥
अनुरूपानुकूला च यस्य मे पतिदेवता।
शून्ये गृहे मां सन्त्यज्य पुत्रै: स्वर्याति साधुभि:॥ ६९॥
स्त्रीपुरुषांची चित्तवृत्ती। अनुकूल वर्ते धर्मप्रवृत्तीं। तरीच परलोक साधिती। इतरां प्राप्ती ते नाहीं॥ १२॥ एकांच्या भार्या त्या तोंडाळा। एकांच्या त्या बहु वोढाळा। एकांच्या त्या अतिचांडाळा। एकी दु:शीला दुर्भगा॥ १३॥ एकीचा तो क्रोध गाढा। एकी अत्यंत खादाडा। एकी सोलिती दांत दाढा। आरिसा पुढां मांडूनि॥ १४॥ एकीं वोंगळा आळसिणी। एकी त्या महाडाकिनी। एकी सुकुमार विलासिनी। बरवेपणीं गर्वित॥ १५॥ तैशी नव्हे माझी पत्नी। सदा अनुकूळ मजलागुनी। मजसी वर्ते अनुरूपपणीं। धर्मपत्नी धार्मिक॥ १६॥ मी जेव्हां धर्मीं तत्पर। तेव्हां धर्मासी ते अतिसादर। मज कामीं जेव्हां आदर। तेव्हां कामचतुर कामिनी॥ १७॥ मजवांचोनि तत्त्वतां। न भजे आणिकां देवां देवतां। मज सांडूनि न वचे तीर्था। माझें वचनसर्वथा नुल्लंघी॥ १८॥ एवं रूपगुणकुलशील। मजसी सदा अनुकूल। पतिव्रता जे केवळ। पत्नीनिर्मळ पैं माझी॥ ९९॥ मज सांडूनि शून्यगृहीं। पुत्रेंसहित साध्वी पाहीं। जातसे स्वर्गाच्या ठायीं। मज अपायीं घालूनि॥ ६२०॥
सोऽहं शून्ये गृहे दीनो मृतदारो मृतप्रजा:।
जिजीविषे किमर्थं वा विधुरो दु:खजीवित:॥ ७०॥
नाशिली स्त्री नाशिल्या प्रजा। येथ म्यां रहावें कवण्या काजा। दु:खें प्राण जाईल माझा। लोकलाजा निंदित॥ २१॥ एवढें अंगीं वाजलें दु:ख। काय लौकिकीं दाखवूं मुख। भंगलें संसाराचें सुख। जितां मूर्ख म्हणतील॥ २२॥ जळो विधुराचें जिणें। सदा निंद्य लाजिरवाणें। न ये श्राद्धींचें आवतणें। सदा वसणें एकाकी॥ २३॥ ऐसेनीं वसतां ये लोकीं। शून्य गृहीं एकाकी। धडगोड न मिळे मुखीं। परम दु:खी मी होईन॥ २४॥
तांस्तथैवावृताञ्छिग्भिर्मृत्युग्रस्तान्विचेष्टत:।
स्वयं च कृपण: शिक्षु पश्यन्नप्यबुधोऽपतत्॥ ७१॥
ऐसें बोलोनि केलें काये। मृतस्त्रीपुत्रांकडे पाहे। काळपाशीं बांधिली आहे। चेष्टा राहे नि:शेष॥ २५॥ ऐसें देखतांही अबुद्धी। विवेकें न धरीचि बुद्धी। आपण जाऊनि त्रिशुद्धी। जाळामधीं पडियेला॥ २६॥ मेल्या मागें मरणें। देखों हेंचि सर्वांसी करणें। परी जन्ममृत्यु निवारणें। हा स्वार्थु कवणें न धरिजे॥ २७॥ पहा पां स्त्रीपुत्राकरणें। आपुलाही जीवु देणें। परी भगवत्पदवी साधणें। हें न मने मनें सर्वथा॥ २८॥
तं लब्ध्वा लुब्धक: क्रूर: कपोतं गृहमेधिनम्।
कपोतकान्कपोतीं च सिद्धार्थ: प्रययौ गृहम्॥ ७२॥
जाळीं पडला कपोता दुर्बुद्धी। झाली लुब्धकाची कार्यसिद्धी। सहकुटुंब घेऊनि खांदीं। निघे पारधी निजस्थाना॥ २९॥ ऐसा जो कोणी गृहमेधी। त्यासी सर्वथा काळु साधी। जैशी कपोत्याची बुद्धी। तैसी बुद्धी गृहमेध्या॥ ६३०॥ बाळकांच्या काकुळतीं। मरण पावली कपोती। ऐसें देखत देखतां दुर्मती। तेथ निश्चितीं उडी घाली॥ ३१॥ यापरी तो कपोता। कुटुंबाची मेधा वाहतां। मरण पावला सर्वथा। विवेकु चित्ता न धरीचि॥ ३२॥
एवं कुटुम्ब्यशान्तात्मा द्वन्द्वाराम: पतत्त्रिवत्।
पुष्णन्कुटुम्बं कृपण: सानुबन्धोऽवसीदति॥ ७३॥
ऐसा कुटुंबी गृहस्थु। कुटुंबपोषणीं आसक्तु। विषयवासना अशांतु। पावे घातु सकुटुंब॥ ३३॥ गृहासक्ती गृहाश्रमु। तो केवळ द्वंद्वाचा आरामु। कपोत्या ऐसा पडे भ्रमु। वृथा जन्मु दवडावा॥ ३४॥
य: प्राप्य मानुषं लोकं मुक्तिद्वारमपावृतम्।
गृहेषु खगवत्सक्तस्तमारूढच्युतं विदु:॥ ७४॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायामेकादशस्कन्धे सप्तमोऽध्याय:॥ ७॥
येवोनियां कर्मभूमीसी। जो पावला उत्तम देहासी। त्याहीमाजीं उत्तमता कैशी। अग्रवर्णासी पैं जन्म॥ ३५॥ आलिया मनुष्यदेहासी। मुक्तीचा दारवंटा मुक्त त्यासी। लव निमिष येकु दिशीं। यावज्जन्मेंसीं मोकळा॥ ३६॥ इतरां वर्णांची हे गती। मा ब्राह्मण तरी पुण्यमूर्ती। ते सदा मुक्तचि असती। वृथा आसक्तीं गुंतले॥ ३७॥ विद्वांस आणि वैराग्य। तें ब्रह्मादिकां न लभे भाग्य। वृथा आसक्तीं केले अभाग्य। शिश्नोदरा साङ्ग वेंचले॥ ३८॥ मनुष्यदेहीं गृहासक्तु। तो बोलिजे ‘आरूढच्युतु’। कपोत्याचे परी दु:खितु। सिद्ध स्वार्थु नाशिला॥ ३९॥ विषयीं सर्वथा नाहीं तृप्ति। ऐसें श्रुतिपुराणें बोलती। करितां विषयाची आसक्ती। थित्या मुकती नरदेहा॥ ६४०॥ नवल नरदेहाची ख्याती। रामनामाच्या आवृत्तीं। चारी मुक्ती दासी होती। तो देहो वेंचिती विषयासी॥ ४१॥ विषयसुखाचिये आसक्ती। कोणा नाहीं झाली तृप्ती। मृगजळाचिये प्राप्ती। केवीं निवती तृषार्त॥ ४२॥ यालागीं जाणतेनि मनुष्यें। नरदेहींचेनि आयुष्यें। विषयांचेनि सायासें। व्यर्थ कां पिसे कष्टती॥ ४३॥ नरदेहाऐसें निधान। अनायासें लाधलें जाण। सांडीं सांडीं अभिमान। तेणें समाधान पावसी॥ ४४॥ पुढती नरदेहाची प्राप्ती। होईल येथ नाहीं युक्ति। यालागीं सांडूनि विषयासक्ती। भावें श्रीपति भजावा॥ ४५॥ कलियुगीं सुगम साधन। न लगे योग याग त्याग दान। करितां निर्लज्ज हरिकीर्तन। चारी मुक्ति चरण वंदिती॥ ४६॥ इटेसाठीं परीस पालटे। येतां कां मानिती वोखटें। तैसा कीर्तनाचेनि नेटेंपाटें। देवो भेटे प्रत्यक्ष॥ ४७॥ एका जनार्दनु म्हणे। नश्वर देहाचेनि साधनें। जनीं जनार्दनु होणें। हे मुद्रा तेणें लाविली॥ ४८॥ एका जनार्दना शरण। तंव जनार्दनु झाला एक एकपण। जैसें सुवर्ण आणि कंकण। दों नांवीं जाण एक तें॥ ४९॥ तोचि एका एकादशीं। श्रीकृष्ण सांगे उद्धवासी। अवधूत सांगे यदूसी। गुरुउपदेशीं उपदेशु॥ ६५०॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे एकादशस्कंधे श्रीकृष्णोद्धवसंवादे यदूअवधूतेतिहासे एकाकारटीकायां सप्तमोऽध्याय:॥ ७॥ श्रीकृष्णार्पणमस्तु॥ मूळश्लोक॥ ७४॥ ओव्या॥ ६५०॥
॥ श्री ॐ तत्सत्-श्रीकृष्ण प्रसन्न॥
अध्याय आठवा
श्रीगणेशाय नम:॥ श्रीकृष्णाय नम:॥ ॐ नमो सद्गुरु तूं ज्योतिषी। एकात्मतेचें घटित पाहसी। चिद्ब्रह्मेंसी लग्न लाविशी। ॐ पुण्येंसीं तत्त्वतां॥ १॥ वधूवरां लग्न लाविती। हें देखिलें असे बहुतीं। आपुली आपण लग्नप्राप्ती। हे अलक्ष्य गती गुरुराया॥ २॥ लग्न लाविती हातवटी। पांचां पंचकांची आटाटी। चुकवूनि काळाची काळदृष्टी। घटिका प्रतिष्ठी निजबोधें॥ ३॥ चहूं पुरुषार्थांचें तेलवण। लाडू वळिजे संपूर्ण। अहंभावाचें निंबलोण। केलें जाण सर्वस्वें॥ ४॥ साधनचतुष्टयाचा सम्यक। यथोक्त देऊन मधुपर्क। जीवभावाची मूद देख। एकाएक सांडविली॥ ५॥ विषयसुख मागें सांडे। तेंचि पायातळीं पायमांडे। सावधान म्हणसी दोंहीकडे। वचन धडफुडें तें तुझें॥ ६॥ व्यवधानाचें विधान तुटे। सहजभावें अंत्रपटु फिटे। शब्द उपरमोनि खुंटे। मुहूर्त गोमटे पैं तुझें॥ ७॥ अर्धमात्रा समदृष्टी। निजबिंबीं पडे गांठी। ऐक्यभावाच्या मीनल्या मुष्टी। लग्नकसवटी अनुपम॥ ८॥ तेथ काळा ना धवळा। गोरा नव्हे ना सांवळा। नोवरा लक्षेना डोळां। लग्नसोहळा ते ठायीं॥ ९॥ परी नवल कैसें कवतिक। दुजेनवीण एकाएक। एकपणीं लग्न देख। लाविता तूं नि:शेख गुरुराया॥ १०॥ तुज गुरुत्वें नमूं जातां। तंव आत्मा तूंचि आंतौता। आंतु कीं बाहेर पाही जातां। सर्वीं सर्वथा तूंचि तुं॥ ११॥ तुझें तूंपण पाहतां। माझें मीपण गेलें तत्त्वतां। ऐसे-करूनियां गुरुनाथा। ग्रंथकथा करविसी॥ १२॥ मागील कथासंगती। सप्तमाध्यायाचे अंतीं। अवधूतें यदूप्रती। कथा कपोती सांगीतली॥ १३॥ पृथ्वी-आदिअंतीं चोखट। कपोतापर्यंत गुरु आठ। सांगितले अतिश्रेष्ठ गुरु वरिष्ठ निजबोधें॥ १४॥ उरल्या गुरूंची स्थिती। अवधूत सांगेल यदूप्रती। तेथें सावधान ठेवा चित्तवृत्ती। श्रवणें स्थिति तद्बोधें॥ १५॥
ब्राह्मण उवाच
सुखमैन्द्रियकं राजन् स्वर्गे नरक एव च।
देहिनां यद्यथा दु:खं तस्मान्नेच्छेत तद्बुध:॥ १॥
श्रवणीं सादरता यदूसी। देखोनि सुख जालें ब्राह्मणासी। तेणें सुखें निरूपणासी। उल्हासेंसीं करीतसे॥ १६॥ तो म्हणे राया सावधान। विषयसुखाचें जें सेवन। तें स्वर्गनरकीं गा समान। नाहीं अनुमान ये अर्थी॥ १७॥ भोगितां उर्वशीसी। जें सुख स्वर्गीं इंद्रासी। तेंचि विष्ठेमाजीं सूकरासी। सूकरीपासीं निश्चित॥ १८॥ हें जाणोनि साधुजन। उभय भोगीं न घालिती मन। नेदवे प्रेतासी आलिंगन। तेवीं साधूजन विषयांसी॥ १९॥ जीत सापु धरावा हातीं। हें प्राणियांसी नुपजे चित्तीं। तेवीं विषयांची आसक्ती। साधु न धरिती सर्वथा॥ २०॥ जैसें न प्रार्थितां दु:ख। प्राणी पावताति देख। तैसें न इच्छितां इंद्रियसुख। भोगवी आवश्यक अदृष्ट॥ २१॥ मज दु:खभोगु व्हावा। हेंनावडे कोणाच्या जीवा। तें दु:ख आणी अदृष्ट तेव्हां। तेवीं सुखाचा यावा अदृष्टें॥ २२॥ ऐसें असोनि उद्योगु करितां। तेणें आयुष्य नाशिलें सर्वथा। यालागीं सांडूनि विषयआस्था। परमार्था भजावें॥ २३॥ केवळ झालिया परमार्थपर। म्हणसी आहारेंवीण न राहे शरीर। येच निर्धारीं साचार। गुरु ‘अजगर’ म्यां केला॥ २४॥
ग्रासं सुमृष्टं विरसं महान्तं स्तोकमेव वा।
यदृच्छयैवापतितं ग्रसेदाजगरोऽक्रिय:॥ २॥
उद्योगेंवीण आहारु। अयाचित सेवी अजगरु। डंडळोनि न सांडी धीरु। निधडा निर्धारु पैं त्याचा॥ २५॥ स्वभावें तो मुख पसरी। सहजें पडे जें भीतरीं। सरस नीरस विचारु न करी। आहार अंगीकारी संतोषें॥ २६॥ तैशीचि योगियांची गती। सदा भाविती आत्मस्थिती। यदृच्छा आलें तें सेविती। रसआसक्ती सांडूनि॥ २७॥ योगियांचा आहारु घेणें। काय सेविलें हें रसना नेणे। रसना-पंगिस्त नाहीं होणें। आहारु सेवणें निजबोधें॥ २८॥ आंबट तिखट तरी जाणे। परी एके स्वादेंअवघें खाणें। सरस नीरस कांहीं न म्हणे। गोड करणें निजगोडियें॥ २९॥ मुख पसरिलियानिर्धारा। स्वभावें रिघालिया वारा। तोचि आहारु पैं अजगरा। तेणेंचि शरीरा पोषण॥ ३०॥ तैशीचि योगियांची स्थिति। वाताशनें सुखें वर्तती। आहारालागुनी पुढिलांप्रती। न ये काकुलती सर्वथा॥ ३१॥ थोडें बहु सरसनिरसासी। हें कांहीं म्हणणें नाहीं त्यासी। स्वभावें जें आलें मुखासी। तें सावकाशीं सेवितु॥ ३२॥
शयीताहानि भूरीणि निराहारोऽनुपक्रम:।
यदि नोपनमेद् ग्रासो महाहिरिव दिष्टभुक्॥ ३॥
अजगरासी बहु काळें। यदृच्छा आहारु न मिळे। तरी धारणेसी न टळे। पडिला लोळे निजस्थानीं॥ ३३॥ तैसें योगियासी अन्न। बहुकाळें न मिळे जाण। तरी करूनियां लंबासन। निद्रेंविण निजतु॥ ३४॥ निद्रा नाहीं तयासी। परी निजे निजीं अहर्निशीं। बाह्य न करी उपायासी। भक्ष्य देहासी अदृष्टें॥ ३५॥ अदृष्टीं असेल जें जें वेळें। तें तें मिळेल तेणें काळें। यालागीं त्याचेंज्ञान न मैळे। धारणा न ढळें निजबोधें॥ ३६॥
ओज:सहोबलयुतं बिभ्रद्देहमकर्मकम्।
शयानो वीतनिद्रश्च नेहेतेन्द्रियवानपि॥ ४॥
अजगरासी बळ उदंड। देहो पराक्रमें प्रचंड। परी न करी उद्योगाचें बंड। पसरूनि तोंड पडिलासे॥ ३७॥ तैसाचि योगिया केवळ। शरीरीं असे शारीर बळ। बुद्धिही असे अतिकुशळ। इंद्रियबळ पटुतर॥ ३८॥ आहारालागीं सर्वथा। हेतु स्फुरों नेदी चित्ता। कायावाचा तत्त्वतां। नेदी स्वभावतां डंडळूं॥ ३९॥ स्वप्नजागृती मुकला। सुषुप्ती सांडोनि निजेला। शून्याचा पासोडा झाडिला। निजीं पहुडला निजत्वें॥ ४०॥
मुनि: प्रसन्नगम्भीरो दुर्विगाह्यो दुरत्यय:।
अनन्तपारो ह्यक्षोभ्य:स्तिमितोद इवार्णव:॥ ५॥
‘समुद्र’ जो गुरु करणें। त्याचीं परिस पां लक्षणें गंभीरत्व पूर्णपणें। निर्मळ असणें इत्यादि॥ ४१॥ समुद्र सदा सुप्रसन्न। योगी सदा प्रसन्नवदन। केव्हांही धुसमुशिलेंपण। नव्हें जाण निजबोंधें॥ ४२॥ मीनल्या सरितांचें समुळ जळ। समुद्र डहुळेनी अतिनिर्मळ। तैसीं नाना कर्में करितां सकळ। सदा अविकळ योगिया॥ ४३॥ जळें गंभीर सागर। योगिया स्वानुभवें गंभीर। वेळा नुल्लंघी सागर। नुल्लंघी योगीश्वर गुरुआज्ञा॥ ४४॥ समुद्रीं न रिघवे भलत्यासी। तो बुडवी जळकल्लोळेंसीं। योगिया बुडवी संसारासी। भावें त्यापासीं गेलिया॥ ४५॥ जो रिघणें निघणे जाणें जळीं। तो समुद्रीं करी आंघोळी। येरांसी लाटांच्या कल्लोळीं। कासाकुळी करीतसे॥ ४६॥ तैसीचि योगियासी। सलगी न करवे भलतियासी। आपभयें भीती आपैसी। तो भाविकांसी सुसेव्य॥ ४७॥ जाहल्या धनवंतु वेव्हारा। उपायीं नुल्लंघवे सागरा। तैसें नुल्लंघवे योगीश्वरा। नृपां सुरनरां किन्नरां॥ ४८॥ मळु न राहे सागरीं। लाटांसरिसा टाकी दुरी। तैसाचि मळु योगियाभीतरीं। ध्यानें निर्धारीं न राहे॥ ४९॥ समुद्रीं मीनली ताम्रपर्णी। तेथ जाहली मुक्ताफळांची खाणी। योगिया मिनली श्रद्धा येऊनी। तेथ मुक्तखाणी मुमुक्षां॥ ५०॥ जो समुद्रामाजीं रिघोनि राहे। तो नानापरीचीं रत्ने लाहे। योगियांमाजीं जो सामाये। त्याचे वंदिती पाये चिद्रत्नें॥ ५१॥ जैशी समुद्राची मर्यादा। कोणासी न करवे कदा। तैशी योगियांची मर्यादा। शास्त्रां वेदां न करवे॥ ५२॥ प्रवाहेंवीण जळ। समुद्रीं जेवीं निश्चळ। मृत्युभयेंवीण अचंचळ। असे केवळ योगिया॥ ५३॥ समुद्रीं प्रवाहो नव्हे कांहीं। सदा पूर्ण ठायींच्या ठायीं। तैसे योगिया जन्ममरण नाहीं। परिपूर्ण पाहीं सर्वदा॥ ५४॥ समुद्रलक्षणें साधितां। अधिक दशा आली हातां। ते योगियाची योग्यता। परिस तत्त्वतां सांगेन॥ ५५॥ समुद्रामाजीं जळ। लाटांखालीं अतिचंचळ। योगिया अंतरी अतिनिश्चळ। नाहीं तळमळ कल्पना॥ ५६॥ समुद्र क्षोभे वेळोवेळे। योगिया क्षोभेना कवणें काळें। सर्वथा योगी नुचंबळें। योगबळें सावधु॥ ५७॥ समुद्रीं भरतें पर्वसंबंधें। योगिया परिपूर्ण सदानंदें। समुद्रीं चढूवोहटू चांदें। योगिया निजबोधें सदा सम॥ ५८॥ समुद्र सर्वांप्रति क्षार। तैसा नव्हे योगीश्वर। तो सर्वां जीवांसी मधुर। बोधु साचार पैं त्याचा॥ ५९॥ जयासी बोधु नाहीं पुरता। अनुभव नेणे निजात्मता। त्यासी कैंची मधुरता। जेवीं अपक्वता सेंदेची॥ ६०॥ सागरीं वरुषल्या घन। वृथा जायें तें जीवन। तैसा योगिया नव्हे जाण। सेविल्या व्यर्थपण येवों नेदी॥ ६१॥ अल्पही योगिया होये घेता। तेणें निवारी भवव्यथा। यालागीं मुमुक्षीं सर्वथा। भगवद्भक्तां भजावें॥ ६२॥
समृद्धकामो हीनो वा नारायणपरो मुनि:।
नोत्सर्पेत न शुष्येत सरिद्भिरिव सागर:॥ ६॥
वर्षाकाळीं सरिता सकळ। घेऊनि आल्या अमूप जळ। तेणें हरुषेजेना प्रबळ। न चढे जळ जळाब्धीं॥ ६३॥ ग्रीष्मकालाचिये प्राप्ती। सरितांचे यावे राहती। ते मानूनियां खंती। अपांपती वोहटेना॥ ६४॥ तैसेंचि योगियांच्या ठायीं। नाना समृद्धि आलिया पाहीं। अहंता न धरी देहीं। गर्वु कांहीं चढेना॥ ६५॥ समृद्धि वेंचिलिया पाठीं। खंती नाहीं योगिया पोटीं। तो नारायणपरदृष्टीं। सुखसंतुष्टी वर्ततु॥ ६६॥ संपत्तीमाजीं असतां। मी संपन्नु हें नाठवे चित्ता। दरिद्र आलिया दरिद्रता। नेणे सर्वथा योगिया॥ ६७॥ दरिद्र आणि संपन्नता। दोन्ही समान त्याचिया चित्ता। नाहीं प्रपंचाची आसक्तता। नारायणपर तत्त्वतां निजबोधें॥ ६८॥ या प्रपंचाचा कठिण लागु। नाशासी मूळ स्त्रीसंगु। येचिविषयीं गुरु पतंगु। केला चांगु परियेसीं॥ ६९॥
दृष्ट्वा स्त्रियं देवमायां तद्भावैरजितेन्द्रिय:।
प्रलोभित: पतत्यन्धे तमस्यग्नौ पतङ्गवत्॥ ७॥
दैवी गुणमयी जे माया। तिचें सगुणस्वरूप त्या स्त्रिया। तेथ प्रलोभ उपजला प्राणियां। भोग भोगावया स्त्रीसुखें॥ ७०॥ हावभावविलासगुणीं। व्यंकट कटाक्षांच्या बाणीं। पुरुषधैर्य कवच भेदोनी। हृदयभुवनीं संचरती॥ ७१॥ दारुण कटाक्षांच्या घायीं। पुरुषधैर्य पाडिलें ठायीं। योषिताबंदीं पाडिले नाहीं। भोग-कारागृहीं घातले॥ ७२॥ स्त्रीभोगाचें जें सुख। तें जाण पां केवळ दु:ख। तोंडीं घालितां मधुर विख। परिपाकीं देख प्राणांतु॥ ७३॥ दीपाचिया अंगसंगा। कोण सुख आहे पतंगा। वळें आलिंगूं जातां पैं गा। मरणमार्गा लागले॥ ७४॥ पुढिला पतंग निमाला देखती। तरी मागिल्या दीपीं अतिआसक्ती। तेवीं स्त्रीकामें एक ठकती। एकां अतिप्रीती पंतगन्यायें॥ ७५॥ तेवीं विवेकहीन मूर्खा। लोलुप्य उपजे स्त्रीसुखा। तत्संसर्गें मरण लोकां। न चुके देखा सर्वथा॥ ७६॥ दीप-रूपाचेनि कोडें। पतंग जळोनि स्नेहीं बुडे। तेवीं स्त्रीसंगे अवश्य घडे। पतन रोकडें अंधतमीं॥ ७७॥
योषिद्धिरण्याभरणाम्बरादि-
द्रव्येषु मायारचितेषु मूढ:।
प्रलोभितात्मा ह्युपभोगबुद्धॺा
पतङ्गवन्नश्यति नष्टदृष्टि:॥ ८॥
पहा पां कांता आणि सोनें। वस्त्रें आभरणें रत्ने। मायेनें रचिलीं पडणें। पतनाकारणें जनांच्या॥ ७८॥ एकली योषिता नरकीं घाली। सुवर्णलोभे नरकु बळी। रत्नें भूषणें तत्काळीं। नरकमेळीं। घालिती॥ ७९॥ ते अवघेचि अनर्थकारी। मीनले योषिताशरीरीं। ते देखतांचि पुरंध्री। जनांसी उरी मग कैंचेनि॥ ८०॥ अंगीं वेताळसंचारा। त्यावरी पाजिलिया मदिरा। मग डुल्लत नाचतां त्या नरा। वोढावारा पैं नाहीं॥ ८१॥ कां भांडाचे तोंडीं भंडपुराण। त्यावरी आला शिमग्याचा सण। मग करितां वाग्विटंबन। आवरी कोण तयासी॥ ८२॥ हो कां मोहक मदिरा सर्वांसी। त्यांतु घातलें उन्मादद्रव्यासी। सेवन करितां त्या रसासी। पारु भ्रमासी पैं नाहीं॥ ८३॥ तैसें सोलीव मोहाचें रूप। तें जाण योषितास्वरूप। त्याहीवरी खटाटोप। वस्त्रें पडप भूषणें॥ ८४॥ काजळ कुंकूं अलंकार। लेऊनि विचित्र पाटांबर। वनिता शोभत सुंदर। मायेचे विकार विकारले॥ ८५॥ माया अजितेंद्रिया बाधी। दासांसंमुख नव्हे त्रिशुद्धी। ज्याची अतिप्रीती गोविंदीं। त्यासी कृपानिधि रक्षिता॥ ८६॥ कैसा रीतीं रक्षी भक्त। मूळीं अत्मा आत्मी नाहीं तेथ। स्त्रीरूपें भासे भगवंत। भक्त रक्षित निजबोधें॥ ८७॥ वनिता देखोनि गोमटी विवेकाची होय नष्ट दृष्टी। प्रलोभें उपभोगा देती मिठी। ते दु:खकोटी भोगिती॥ ८८॥ देखोनि दीपरूपीं झगमगी। उपभोगबुद्धि पतंगीं। उडी घालितांवेगीं। जळोनि आगीं नासती॥ ८९॥ एवं योषितारूपें माया। उपभेागबुद्धि भुलवी प्राणियां। जे विमुख हरीच्या पायां। त्यांसीच माया भुलवितु॥ ९०॥ मधुकरीचेनि विंदाणें। ‘मधुकर’ म्यां गुरु करणें। दु:ख नेदितां कार्य साधणें। तींहि लक्षणें परिस पां॥ ९१॥
स्तोकं स्तोकं ग्रसेद् ग्रासं देहो वर्तेत यावता।
गृहानहिंसन्नातिष्ठेद् वृत्तिं माधुकरीं मुनि:॥ ९॥
भ्रमरु रिघोनि पुष्पामधीं। फूल तरी कुचुंबों नेदी। आपुली करी अर्थसिद्धी। चोखट बुद्धि भ्रमराची॥ ९२॥ तैसीच योगियाची परी। ग्रासमात्र घरोघरीं। भिक्षा करूनि उदर भरी। पीडा न करी गृहस्थां॥ ९३॥ प्राणधारणेपुरतें। योगी मागे भिक्षेतें। समर्थ दुर्बळ विभागातें। न मनूनि चित्तें सर्वथा॥ ९४॥ रिघोनि कमळिणीपाशीं। भ्रमरु लोभला आमोदासी। पद्म संकोचे अस्तासी। तेंचि भ्रमरासी बंधन॥ ९५॥ जो कोरडें काष्ठ भेदोनि जाये। तो कमळदळीं गुंतला ठाये। प्रिया दुखवेल म्हणौनि राहे। निर्गमु न पाहे आपुला॥ ९६॥ तैसाचि जाण संन्यासी। एके ठायीं राहिल्यालोलुप्येंसीं। तेंचि बंधन होये त्यासी। विषयलोभासी गुंतला॥ ९७॥
अणुभ्यश्च महद्भ्यश्च शास्त्रेभ्य: कुशलो नर:।
सर्वत: सारमादद्यात्पुष्पेभ्य इव षट्पद:॥ १०॥
अतिलहान सुमन जें कांहीं। भ्रमरा तेथ उपेक्षा नाहीं। रिघोनि त्याच्याही ठायीं। आमोद पाहीं सेवितु॥ ९८॥ थोराथोरा ज्या कमळिणी। विकासल्या समर्थपणीं। त्यांच्याही ठायीं रिघोनी। सारांश सेवुनी जातसे॥ ९९॥ तैसाचि योगिया नेटकु। शास्त्रदृष्टी अतिविवेकु। न करी लहान थोर तर्कु। सारग्राहकु होतसे॥ १००॥ वेदांतीं ब्रह्मस्थिती। बोलिली मानी यथानिगुतीं। इतर स्तोत्रीं ब्रह्मव्युत्पत्ती। तेही अतिप्रीतीं मानितु॥ १॥ पंडितांचें वचन मानी। साधारणु बोलिला हितवचनीं। तेहीं अतिआदरें मानूनी। सार निवडूनि घेतसे॥ २॥ प्रीति होआवी पतीच्या मानसीं। कुळवधू मानी सासुसासऱ्यांसी। मान देतसे त्यांच्या दासासी। तेचि प्रीतीसी लक्षूनि॥ ३॥ भेसळल्या क्षीरनीरासी। निवडुनि घेईजे राजहंसीं। तैसा विवेकयुक्त मानसीं। सारभागासी घेतसे॥ ४॥ सर्वभूतीं भगवद्भावो। हा सारभागु मुख्य पहा हो। हे निष्ठा ज्यासी महाबाहो। त्यासी अपावो स्वप्नीं नाहीं॥ ५॥ भरलेया जगाआंतु। सारभागी तो योगयुक्तु। यदूसि अवधूत सांगतु। गुरुवृत्तांतु लक्षणें॥ ६॥ गुरुत्वें म्यां मानिली ‘माशी।’ ऐक राया दो प्रकारेंसीं। एक ते मोहळमासी। ग्रामवासी दूसरी॥ ७॥
सायन्तनं श्वस्तनं वा न संगृह्णीत भिक्षितम्।
पाणिपात्रोदरामत्रो मक्षिकेव न सङ्ग्रही॥ ११॥
पहा पां घरींची माशी। बैसल्या साखरेचे राशीं। हातीं धरोनि घाली मुखाशी। संग्रहो तिसी पैं नाहीं॥ ८॥ हे होईल सायंकाळा। हे भक्षीन प्रात:काळां। ऐसा संग्रहो वेगळा। नाहीं केला मक्षिका॥ ९॥ तैशी योगसंन्यासगती। प्राप्तभिक्षा घेऊनि हातीं। तिसी निक्षेपु मुखाप्रती। संग्रहस्थिति त्या नाहीं॥ ११०॥ भिक्षेलागीं पाणिपात्र। सांठवण उदरमात्र। या वेगळें स्वतंत्र। नाहीं घरपात्र सांठवणें॥ ११॥
सायन्तनं श्वस्तनं वा न संगृह्णीत भिक्षुक:।
मक्षिका इव सङ्गृह्णन् सह तेन विनश्यति॥ १२॥
सायंकाळ-प्रात:काळासी। भक्ष्यसंग्रहो नसावा भिक्षूसी। संग्रहें पावती नाशासी। येविषीं ‘मधुमाशी’ गुरु केली॥ १२॥ रिघोनि नाना संकटस्थानांसी। मधुसंग्रहो करी मधुमाशी। तो संग्रहोचि करी घातासी। मधु न्यावयासी जैं येती॥ १३॥ संग्रहो यत्नाचिया चाडा। मोहळ बांधिती अवघडां कडां। ते दुर्गमीं रिगु करिती गाढा। अर्थ-चाडा मधुहर्ते॥ १४॥ कां झाडितां मोहळासी। नाशु होतसे मासियांसी। संग्रहाची जाती ऐशी। जीवघातासी करवितु॥ १५॥ ऐसें देखोनिया जनीं। भक्त-भिक्षु-योगी-सज्जनीं। संग्रहो न करावा भरंवसेनी। नाशु निदानीं दिसतुसे॥ १६॥ आचारावें सत्कर्म। संग्रहावा शुद्ध धर्म। हेंचि नेणोनियां वर्म। धनकामें अधम नाशती॥ १७॥ अर्थ विनाशाचें फळ। दुसरें एक नाशाचें मूळ। विशेष नाशाचें आहळबाहळ। स्त्री केवळ वोळख पां॥ १८॥ मूळ नाशासि जीविता। कनक आणि योषिता। जंव जंव यांची आसक्तता। तंव तंव चढता भवरोगु॥ १९॥ कनक आणि कामिनी। ज्यासी नावडे मनींहुनी। तोचि जनार्दनु जनीं। भरंवसेंनी ओळख पां॥ १२०॥ जो सुख इच्छील आपणासी। तेणें नातळावें स्त्रियेसी। येचिविषयीं ‘मदगजासी’। गुरु विशेषीं म्यां केला॥ २१॥
पदापि युवतीं भिक्षुर्न स्पृशेद्दारवीमपि।
स्पृशन्करीव बद्धॺेत करिण्या अङ्गसङ्गत:॥ १३॥
पहा पां षष्टिहायन भद्रजाती। त्यांपुढें मनुष्य तें किंती। ते हस्तिणीचे अंगसंगतीं। बंधन पावती मनुजांचें॥ २२॥ जो दृष्टीं नाणी मनुष्यांसी। तो स्त्रियां वश केला मानवांसी। त्यांचेनि बोलें उठी बैसी। माथां अंकुशीं मारिजे॥ २३॥ एवं जिणावया संसारासी। जे स्वधर्मनिष्ठ संन्यासी। तिंही देखोनि योषितांसी। लागवेगेंसी पळावें॥ २४॥ नको स्त्रियांची भेटी। नको स्त्रियांसी गोष्टी। स्त्री देखतांचि दिठीं। उठाउठीं पळावें॥ २५॥ पळतां पळतां पायांतळी। आल्या काष्ठाची पुतळी। तेही नातळावी कुशळीं। निर्जीव स्त्री छळी पुरुषातें॥ २६॥ अनिरुद्धें स्वप्नीं देखिली उखा। तों धरूनि नेला चित्ररेखा। बाणासुरें बांधिला देखा। कृष्ण सखा जयाचा॥ २७॥ त्यासी सोडवणेलागीं हरी। धांवतां आडवा आला कामारी। युद्ध जाहलें परस्परीं। शस्त्रास्त्री दारुण॥ २८॥ एवं हरिहरां भिडतां। जो बांधला स्वप्नींचिया कांता। तो सहसा न सुटेची सोडवितां। इतरांचीकथा कायसी॥ २९॥ पहा पां स्वप्नींचिया कांता। अनिरुद्धासी केली निरुद्धता। मा साचचि स्त्री हाती धरितां। निर्गमता त्या कैची॥ १३०॥ ‘पुरुष’ आपणया म्हणविती। सेखीं स्त्रियांचे पाय धरिती। त्यांसी कैसेनि होईल मुक्ती। स्त्रीसंगतीं अध:पात॥ ३१॥
नाधिगच्छेत्स्त्रियं प्राज्ञ: कर्हिचिन्मृत्युमात्मन:।
बलाधिकै: स हन्येत गजैरन्यैर्गजो यथा॥ १४॥
क्रीडतां गजींमाजीं गजपती। त्यावरी सबळ भद्रजाती। येऊनियां युद्ध करिती। निजबळें मारिती तयातें॥ ३२॥ तो मारोनियां हस्ती। त्या हस्तिणी समस्ती। सबळ भोगी भद्रजाती। नाशप्रती स्त्री मूळ॥ ३३॥ अहल्येचिया संगतीं। गौतमें विटंबिला अमरपती। भस्मासुरासी नाशप्राप्ती। स्त्रीसंगतीस्तव जाली॥ ३४॥ देखोनि तिलोत्तमा उत्तम वधू। सुंद उपसुंद सखे बंधु। स्त्रीअभिलाषें चालिला क्रोधु। सुहृदसंबंधू विसरले॥ ३५॥ मग स्त्रीविरहेंयुद्धाचे ठायीं। दोघे निमाले येरयेरांचे घायीं। शेखीं स्त्रीभोगुही नाहीं। मरणमूळ पाहीं योषिता॥ ३६॥ ऐसीच पूर्वकल्पींची कथा। अवतारी श्रीकृष्ण नांदतां। तेणें शिशुपाळ गांजोनि सर्वथा। हिरोनि कांता पैं नेली॥ ३७॥ एवं सुरनरपशूंप्रती। नाशासी मूळ स्त्रीसंगती। तिचेनि संगें गृहासक्ती। कलहप्राप्ती स्त्रीमूळ॥ ३८॥ ग्राम्य स्त्रियांचे संगतीं जाणें। तो बैसला मरणाधरणें। मरण आल्याही न करणें। जीवेंप्राणें स्त्रीसंगु॥ ३९॥ वेश्येचे संगतीं जातां। बळाधिक्य करी घाता। निरंतर स्वपत्नी भोगितां। नाहीं बाधकता हें न म्हण॥ १४०॥ अविश्रम स्त्री सेवितां। कामु पावे उन्मत्तता। उन्मत्त कामें सर्वथा। अध:पाता नेईजे॥ ४१॥ एवं हा ठावोवरी। स्त्रीसंग कठिण भारी। क्वचित्संगु जाहल्यावरी। नरकद्वारीं घालील॥ ४२॥ नरकीं घालील हे वार्ता। उद्धाराची कायसी कथा। नरकरूप ग्राम्य योषिता। पाहें सर्वथा निर्धारें॥ ४३॥ स्त्री आणि दुसरा अर्थु। हाचि ये लोकीं घोर अनर्थु। येणें अंतरला निजस्वार्थु। शेखीं करी घातु प्राणाचा॥ ४४॥
न देयं नोपभोग्यं च लुब्धैर्यद्दु:खसञ्चितम्।
भुङ्क्ते तदपि तच्चान्यो मधुहेवार्थविन्मधु॥ १५॥
स्वयें खाये ना धर्मु न करी। घरच्यांसी खाऊं नेदी दरिद्री। मधुमक्षिकेच्या परी। संग्रहो करी कष्टोनि॥ ४५॥ माशा मोहळ बांधिती बळें। माजीं सांचले मधाचे गोळे। तें देखोनि जगाचे डोळे। उपायबळें घेवों पाहाती॥ ४६॥ मग झाडींखोडीं अरडींदरडीं। जेथिच्या तेथ जगु झोडी। भरती मधाचिया कावडी। ते सेविती गोडी श्रीमंत॥ ४७॥ माशा मधु न खाती काकुळतीं। झाडित्याचे हात माखती। स्वादु श्रीमंत सेविती। ज्यांसी लक्ष्मीपती प्रसन्न॥ ४८॥ तैसेंचि कृपणाचें यक्षधन। नाहीं दान धर्मसंरक्षण। त्यातें तस्कर नेती मारून। त्यांसही दंडून राजा ने॥ ४९॥ जे शिणोनि संग्रह करिती। त्यांसी नव्हे भोगप्राप्ती। ते द्रव्यें अपरिग्रही सेविती। दैवगती विचित्र॥ १५०॥ प्रयासेंगृहस्थ करवी अन्न। तें संन्यासी न शिणतां जाण। करूनि जाय भोजन। अदृष्ट प्रमाण ये अर्थीं॥ ५१॥ यालागीं दैवाधीन जो राहे। तो संग्रहाची चाड न वाहे। तें अदृष्टचि साह्य आहे। कृपणता वायें करिताति॥ ५२॥
सुदु:खोपार्जितैर्वित्तैराशासानां गृहाशिष:।
मधुहेवाग्रतो भुङ्क्ते यतिर्वै गृहमेधिनाम्॥ १६॥
दु:खें उपार्जूनि वित्त। गृहसामग्री नाना पदार्थ। त्याचे पाक करवी गृहस्थ। निजभोगार्थ आवडीं॥ ५३॥ तेथ समयीं आला अतिथ। संन्यासी ब्रह्मचारी अन्नार्थ। गृहस्थाआधीं तो सेवित। तोंड पाहत गृहमेधी॥ ५४॥ जैसें दवडून मोहळमाशियांसी। मधुहर्ता मधु प्राशी। तैसें होय गृहस्थासी। नेती संन्यासी सिद्धपाकु॥ ५५॥ समयीं पराङ्मुख झालिया यती। सकळ पुण्यें क्षया जाती। यथाकाळीं आलिया अतिथी। स्वधर्मु रक्षिती सर्वथा॥ ५६॥ अर्थ संग्रहाची बाधकता। तुज म्यां सांगितली तत्त्वतां। ‘मृग’ गुरु केला सर्वथा। तेही कथा परियेसी॥ ५७॥
ग्राम्यगीतं न शृणुयाद्यतिर्वनचर: क्वचित्।
शिक्षेत हरिणाद्बद्धान्मृगयोर्गीतमोहितात्॥ १७॥
ग्राम्यजनवार्ता। कां ग्राम्य स्त्रियांच्या गीता। ऐके जो कां तत्त्वतां। बंधन सर्वथा तो पावे॥ ५८॥ अखंड पाहतां दीपाकडे। घंटानादें झालें वेंडें। मृग पाहों विसरला पुढें। फांसीं पडे सर्वथा॥ ५९॥ ग्राम्य योषितांचे गीत। ऐकतां कोणाचें भुलेना चित्त। मृगाच्या ऐसा मोहित। होय निश्चित निजस्वार्था॥ १६०॥ जो बोलिजे तापसांचा मुकुटी। ज्यासी स्त्रियांसी नाहीं भेट गोष्टी। तो ऋष्यशृंग उठाउठी। स्त्रीगीतासाठीं भुलला॥ ६१॥
नृत्यवादित्रगीतानि जुषन् ग्राम्याणि योषिताम्।
आसां क्रीडनको वश्य ऋष्यशृङ्गो मृगीसुत:॥ १८॥
मधुर वीणागुणाक्वणित। ग्राम्य स्त्रियांचें गीत नृत्य। देखतां पुरुष वश्य होत। जैसें गळबंधस्थ वानर॥ ६२॥ जो तपसांमाजीं जगजेठी। जो जन्मला मृगीच्या पोटीं। जो नेणे स्त्रियांची भेटीगोठी। न पाहे दृष्टीं योषिता॥ ६३॥ तो ऋष्यशृंग स्त्रीदृष्टीं। वश्य जाहला उठाउठी। धांवे योषितांचे पाठोवाठीं। त्यांचे गोष्टीमाजीं वर्ते॥ ६४॥ गारुडॺाचें वानर जैसें। स्त्रियांसंगें नाचे तैसें। प्रमदादृष्टीं जाहला पिसें। विवेकु मानसें विसरला॥ ६५॥ विसरला तपाचा खटाटोपु। विसरला विभांडक बापु। विसरला ब्रह्मचर्यकृत संकल्पु। स्त्रियानुरूपु नाचतु॥ ६६॥ स्त्रीबाधे एवढा बाधु। संसारीं आणिक नाहीं गा सुबुद्धु। नको नको स्त्रियांचा विनोदु। दु:खसंबंधु सर्वांसी॥ ६७॥ वारिलें नाइकावें ग्राम्य गीता। हे सत्य सत्य गा सर्वथा। तेथ हरिकीर्तन कथा। जाहल्यापरमार्थतां ऐकावें॥ ६८॥ रामनामें विवर्जित। ग्रामणीं बोलिजे तें ‘ग्राम्यगीत’। तें नाइकावें निश्चित। कवतुकें तेथ न वचावें॥ ६९॥ ‘मीन’ गुरु करणें। तेंही अवधारा लक्षणें। रसनेचेनि लोलुप्यपणें। जीवेंप्राणे जातसे॥ १७०॥
जिह्वयातिप्रमाथिन्या जनो रसविमोहित:।
मृत्युमृच्छत्यसद्बुद्धिर्मीनस्तु बडिशैर्यथा॥ १९॥
अर्थ-संग्रहें जीवघातु। स्त्रिया-आसक्तीं अध:पातु। रसनालोलुप्यें पावे मृत्यु। विविध घातु जीवासी॥ ७१॥ ज्यासी रसनालोलुप्यता गाढ़ी। त्यासी अनर्थुचि जोडे जोडी। दु:खाच्या भोगवी कोडी। रसनागोडी बाधक॥ ७२॥ रसना आमिषाची गोडी। लोलुप्यें मीनु गिळी उंडी। सवेंचि गळु टाळू फोडी। मग चरफडी अडकलिया॥ ७३॥ पाहतां रस उत्तम दिसत। भीतरीं रोगांचे गळ गुप्त। रस आसक्तीं जे सेवित। ते चडफडित भवरोगें॥ ७४॥ गळीं अडकळा जो मासा। तो जिता ना मरे चरफडी जैसा। तेवीं रोगु लागल्या माणसा। दु:खदुर्दशा भोगित॥ ७५॥ जो रसनालोलुप्यें प्रमादी। त्यासी कैंची सुबुद्धी। जन्ममरणें निरवधी। भोगी त्रिशुद्धी रसदोषें॥ ७६॥ रस सेविलियासाठीं। भोगवी जन्मांचिया कोटी। हें न घडे म्हणसी पोटीं। राया ते गोठी परियेसीं॥ ७७॥ इंद्रियांची सजीवता। ते रसनेआधीन सर्वथा। रसनाद्वारें रस घेतां। उन्मत्तता इंद्रियां॥ ७८॥ मातली जे इंद्रियसत्ता। ते नेऊन घाली अध:पाता। रसना न जिणतां सर्वथा। भवव्यथा चुकेना॥ ७९॥ आहारेंवीण देह न चले। सेविल्या इंद्रियवर्गु खवळे। रसनाजयाचें मूळ कळे। तैं दु:खें सकळें मावळतीं॥ १८०॥
इन्द्रियाणि जयन्त्याशु निराहारा मनीषिण:।
वर्जयित्वा तु रसनं तन्निरन्नस्य वर्धते॥ २०॥
आहार वर्जूनि साधक। इतर इंद्रियें जिंतिलीं देख। तंव तंव रसना वाढे अधिक। ते अजिंक्य न जिंकवे॥ ८१॥ इंद्रियांसी आहाराचें बळ। तीं निरहारें झालीं विकळ। तंव तंव रसना वाढेप्रबळ। रसनेचें बळ निरन्नें॥ ८२॥
तावज्जितेन्द्रियो न स्याद्विजितान्येन्द्रिय: पुमान्।
न जयेद्रसनं यावज्जितं सर्वं जिते रसे॥ २१॥
निरन्नें इंद्रियें जिंतिली। तीं जिंतिली हे मिथ्या बोली। अन्न घेतांचि सरसावलीं। सावध जाहलीं निजकर्मी॥ ८३॥ जंव रसना नाहीं जिंकिली। तंव ‘जितेंन्द्रिय’ मिथ्या बोली। जैं साचार रसना जिंकिली। तैं वाट मोडिली विषयांची॥ ८४॥ विषयाआंतील गोडपण। रसने-आंतील जाणपण। दोंहीसी ऐक्या केल्या जाण। रसना संपूर्ण जिंतिली॥ ८५॥ सर्वां गोडियांचें गोड आहे। ते गोडीस जो लागला राहे। त्यासीचि रसना वश्य होये। रस-अपाये न बाधिती॥ ८६॥ रसनाजिताचें वाधावणें। तेणें ब्रह्मसायुज्यीं पडे ठाणें। सोहळा परमानंदें भोगणें। रसना जेणें जिंतिली॥ ८७॥
पिङ्गला नाम वेश्याऽऽसीद्विदेहनगरे पुरा।
तस्या मे शिक्षितं किञ्चिन्निबोध नृपनन्दन॥ २२॥
अवधूप म्हणे नृपनंदना। ‘वेश्या’ गुरु म्यां केली जाणा। तिच्या शिकलों ज्या लक्षणां। विचक्षणा अवधारीं॥ ८८॥ पूर्वी विदेहाचे नगरीं। ‘पिंगला’ नामें वेश्या वासु करी। तिसी आस निरासेंवरी। वैराग्य भारी उपजलें॥ ८९॥
सा स्वैरिण्येकदा कान्तं सङ्केत उपनेष्यती।
अभूत्काले बहिर्द्वारि बिभ्रती रूपमुत्तमम्॥ २३॥
ते स्वैरिणी स्वेच्छाचारी। सायंकाळीं उभी द्वारीं। नाना अळंकार-अंबरीं। शृंगारकुसरी शोभत॥ १९०॥ आधींच रूप उत्तम। वरी शृंगारिली मनोरम। करावया ग्राम्यधर्म। पुरुष उत्तम पहातसे॥ ९१॥
मार्ग आगच्छतो वीक्ष्य पुरुषान्पुरुषर्षभ।
ताञ्छुल्कदान्वित्तवत: कान्तान्मेनेऽर्थकामुका॥ २४॥
सगुण सुरूप धनवंत। कामकौशल्यें पुरवी आर्त। अर्थ देऊनि करी समर्थ। ऐसा कांत पहातसे॥ ९२॥ ऐक गा पुरुषश्रेष्ठा। पुरुष येतां येतां देखे वाटा। त्यासी खुणावी नेत्रवेंकटा। कामचेष्टा दावूनि॥ ९३॥
आगतेष्वपयातेषु सा संकेतोपजीविनी।
अप्यन्यो वित्तवान्कोऽपि मामुपैष्यति भूरिद:॥ २५॥
येत्या पुरुषास हाणी खडा। एकासी म्हणे घ्या जी विडा। डोळा घाली जात्याकडा। एकापुढां भंवरी दे॥ ९४॥ ठेवूनि संकेतीं जीवित। ऐसे नाना संकेत दावित। पुरुष तिकडे न पाहात। येत जात कार्यार्थी॥ ९५॥ गेल्या पुरुषातें निंदित। द्रव्यहीन हे अशक्त। रूपें विरूप अत्यंत। उपेक्षित धिक्कारें॥ ९६॥ आतां येईल वित्तवंत। अर्थदानीं अतिसमर्थ। माझा धरोनियां हात। कामआर्त पुरवील॥ ९७॥
एवं दुराशया ध्वस्तनिद्रा द्वार्यवलम्बती।
निर्गच्छन्ती प्रविशती निशीथं समपद्यत॥ २६॥
ऐसें दुराशा भरलें चित्त। निद्रा न लगे उद्वेगित। द्वार धरोनि तिष्ठत। काम वांछित पुरुषांसीं॥ ९८॥ रिघों जाय घराभीतरीं। सांचल ऐकोनि रिघे बाहेरी। रिघतां निघतां येरझारी। मध्यरात्री पै झाली॥ ९९॥ सरली पुरषाची वेळ। रात्र झाली जी प्रबळ। निद्रा व्यापिले लोक सकळ। पिंगला विव्हळ ते काळीं॥ २००॥
तस्या वित्ताशया शुष्यद्वक्त्राया दीनचेतस:।
निर्वेद: परमो जज्ञे चिन्ताहेतु: सुखावह:॥ २७॥
तुटला आशेचा जिव्हाळा। सुकले वोंठ वाळला गळा। कळा उतरली मुखकमळा। खेदुआगळा चिंतेचा॥ १॥ वित्त न येचि हाता। तेणें ते झाली दीनचित्ता। वैराग्यें परम वाटलीचिंता। सुखस्वार्था ते हेतु॥ २॥
तस्या निर्विण्णचित्ताया गीतं शृणु यथा मम।
निर्वेद आशापाशानां पुरुषस्य यथा ह्यसि:॥ २८॥
न ह्यङ्गाजातनिर्वेदो देहबन्धं जिहासति।
यथा विज्ञानरहितो मनुजो ममतां नृप॥ २९॥
कैसें वैराग्य उपजलें तिसी। जे चिंतीत होती विषयासी। त्या विटली विषयसुखासी। छेदक आशेसी वैराग्य॥ ३॥ तेणें वैराग्यें विवेकयुक्त। पिंगलेनें गाइलें गीत। तें आइक राया समस्त। चित्तीं सुचित्त होऊनि॥ ४॥ ऐक राया विवेकनिधी। वैराग्य नाहीं ज्याचे बुद्धीं। त्यासी जन्ममरणाची आधिव्याधी। प्रतिपदीं बाधकु॥ ५॥ अनुतापु नाहीं ज्यासी। विवेक नुपजे मानसीं। तो संसाराची आंदणी दासी। आशापाशीं बांधिजे॥ ६॥ त्यासी मोहममतेची गाढी। घालिजे देहबुद्धीची बेडी। अहोरात्र विषय भरडी। अर्ध घडी न राहे॥ ७॥ जराजर्जरित वाकळे। माजीं पडले अखंड लोळे। फुटले विवेकाचे डोळे। मार्गु न कळे विध्युक्त॥ ८॥ त्यासी अव्हासव्हा जातां। अंधकूपीं पडे दुश्चिता। तेथूनि निघावया मागुता। उपावो सर्वथा नेणती॥ ९॥ तेथ काया-मनें-वाचें। निघणें नाहीं जी साचें। तंव फणकाविला लोभविंचें। चढणें त्याचें अनिवार॥ २१०॥ तेथ निंदेचिया तिडका। आंत बाहेर निघती देखा। वित्तहानीचा थोर भडका। जळजळ देखा द्वेषाची॥ ११॥ अभिमानचे आळेपिळे। मोहउमासे येती बळें। तरी विषयदळणें आगळें। दु:खें लोळे गेहसेजे॥ १२॥ ऐशीं अवैराग्यें बापुडीं। पडलीं देहाचे बांदवडीं। भोगितां दु:खकोडी। सबुडबुडीं बुडालीं॥ १३॥ पहा पां नीच सर्व वर्णांसी। निंद्य कर्में निंदिती कैशीं। वैराग्य उपजलें वेश्येसी। देहबंधासी छेदिलें॥ १४॥ देहबंध छेदी त्या उक्ती। वेश्या बोलिली नाना युक्ती। झाली पिंगलेसी विरक्ती। चक्रवर्ती परीस पां॥ १५॥
पिङ्गलोवाच
अहो मे मोहविततिं पश्यताविजितात्मन:।
या कान्तादसत: कामं कामये येन बालिशा॥ ३०॥
मिथ्या मोहाचा विस्तार। म्यां वाढविला साचार। माझ्या मूर्खपणाचा पार। पाहतां विचार पांगुळे॥ १६॥ नाहीं अंत:करणासी नेम। अपार वाढविला भ्रम। असंतपुरुषांचा काम। मनोरम मानितां॥ १७॥ जरी स्त्रीसी पुरुष पाहिजे। तरी जवळील पुरुष न लाहिजे। हेंचि मूर्खपण माझें। सदा भुंजे असंतां॥ १८॥
सन्तं समीपे रमणं रतिप्रदं
वित्तप्रदं नित्यमिमं विहाय।
अकामदं दु:खभयादिशोक-
मोहप्रदं तुच्छमहं भजेऽज्ञा॥ ३१॥
संतपुरुषाची प्राप्ती। जवळी असतां नेणें आसक्ती। ज्यासी केलिया रती। कामनिवृत्ती तत्काळ॥ १९॥ काम निवर्तवूनि देख। अनिवार पुरवी नित्यसुख। चित्तदाता तोचि एक। अलोलिक पैं देणें॥ २२०॥ सकळ ऐश्वर्य निजपदेंसीं। संतोषोनि दे रतीसी। रमवूं जाणे नरनारींसीं। रमणु सर्वांसी तो एकु॥ २१॥ सांडोनि ऐशिया कांतासी। माझी मूढता पहा कैशी। नित्य अकामदा पुरुषासी। कामप्राप्तीसी भजिन्नलें॥ २२॥ आपुला पूर्ण न करवे काम। ते मज केवीं करिती निष्काम। त्यांचेनि संगें मोहभ्रम। दु:ख परम पावलें॥ २३॥ त्यांचेनि सुख नेदवेच मातें। परी झाले दु:खाचेचि दाते। भय-शोक-आधि-व्याधींतें। त्यांचेनि सांगातें पावलें॥ २४॥
अहो मयाऽऽत्मा परितापितो वृथा
साङ्केत्यवृत्त्यातिविगर्ह्यवार्तया।
स्त्रैणान्नराद्यार्थतृषोऽनुशोच्यात्
क्रीतेन वित्तं रतिमात्मनेच्छती॥ ३२॥
जारपुरुषापासोनि सुख। इच्छितें ते मी केवळ मूर्ख। वृथा परितापु केला देख। मज असुख म्यां दीधलें॥ २५॥ स्त्रैण पुरुष ते नराधम। वेश्यागामी त्याहूनि अधम। त्यांत कृपणु तो अधमाधम। तयांचा संगम मी वांच्छीं॥ २६॥ जितुक्या अतिनिंदका वृत्ती। मज आतळतां त्या भीती। योनिद्वारें जीविकास्थिती। नीच याती व्यभिचारु॥ २७॥ अल्प द्रव्य जेणें देणें। त्याची जाती कोण हें नाहीं पाहणें। याहोनि काय लाजिरवाणें। निंदित जिणें पैं माझें॥ २८॥ जया पुरुषासी देह विकणें। तें अत्यंत हीनदीनपणें। काय सांगों त्याची लक्षणें। सर्वगुणें अपूर्ण॥ २९॥ वित्त ने दवे कृपणता। काम न पुरवे पुरता। प्रीति न करवे तत्त्वतां। भेटी मागुता तो नेदी॥ २३०॥ ऐशिया पासाव सुख। वांछितां वाढे परम दु:ख। जळो त्याचें न पाहें मुख। वोकारी देख येतसे॥ ३१॥ एवं जारपुरुषाची स्थिती। आठवितां चिळसी येती। पुरे पुरे ते संगती। चित्तवृत्ति वीटली॥ ३२॥
यदस्थिभिर्निर्मितवंशवंश्य-
स्थूणं त्वचारोमनखै: पिनद्धम्।
क्षरन्नवद्वारमगारमेतद्
विण्मूत्रपूर्णं मदुपैति कान्या॥ ३३॥
नरशरीर गृह सांकडें। आढीं पाखाडॺा नुसधीं हाडें। अस्थींच्या मेढी दोंहीकडे। वोलेनि कातडें मढियेलें॥ ३३॥ त्यासी सर्वांगीं सगळे। दिधले रोमावळिचे खिळे। घालूनि नखाचे खोबळे। अग्रीं आंगवळे बूजिले॥ ३४॥ अस्थि-मांस-चर्मबांधा। सर्वांगीं आवळूनि दिधला सांदा। रंगीत चर्मरसना स्वादा। पुढिले बांधा बांधिली॥ ३५॥ वायुप्रसरणपरिचारें। केलीं प्राणापानरंध्रें। वरिले डळमळीत शिखरें। बालांकुरें लाविलीं॥ ३६॥ बुजूनि भीतरील सवडी। बांधाटिलें नवनाडीं। विष्ठामूत्रांची गाढी। नित्य परवडी सांठवण॥ ३७॥ भीतरिले अवकाशीं। दुर्गंधि ऊठली कैशी। तेचि प्रवाह अहर्निशीं। नवद्वारांसी वाहताति॥ ३८॥ अखंड पऱ्हवे वाहती मळें। देखोनि ज्याचें तो कांटाळे। अहर्निशीं धुतां जळें। कदा निर्मळे ते नव्हती॥ ३९॥ सांगतांचि हे गोष्टी। ओकारी येतसे पोटीं। ऐशियास मी भुलल्यें करंटी। विवेक दृष्टीं न पाहें॥ २४०॥ अस्थिमांसाचा कोथळा। विष्ठामूत्राचा गोळा। म्यां आलिंगिला वेळोवेळां। जळो कंटाळा न येचि॥ ४१॥
विदेहानां पुरे ह्यस्मिन्नहमेकैव मूढधी:।
यान्यमिच्छन्त्यसत्यस्मादात्मदात्काममच्युतात्॥ ३४॥
ये विदेहाचे नगरीं। मूर्ख मीचि एक देहधारी। हृदयस्थ सांडूनि श्रीहरी। असंतां नरीं व्यभिचारु॥ ४२॥ असंत पुरुष नेणों किती। म्यां भोगिले अहोरातीं। सुख न पवेंची निश्चितीं। रति भगवंतीं जंव नाहीं॥ ४३॥ जो निकटवर्ती हृदयस्थु। पुरुषीं पुरुषोत्तम अच्युतु। वीर्यच्युतीवीण रमवितु। संतोषें देतु निजात्मना॥ ४४॥ अच्युतें ज्यासि निजसुख दिधलें। ते सुख च्यवेना कांहीं केलें। ऐशिया हृदयस्था विसरलें। आणिक भुललें अकामदा॥ ४५॥ अकामद ते नाशवंत। त्यांसी संग केलिया दु:खचि देत। कैसें माझें मूर्ख चित्त। त्यासी आसक्त पैं होतें॥ ४६॥ त्या आसक्तीची झाली तडातोडी। लागली अच्युतसुखाची गोडी। ज्याचें सुख भोगितां चढोवढी। घडियाघडी वाढतें॥ ४७॥
सुहृत्प्रेष्ठतमो नाथ आत्मा चायं शरीरिणाम्।
तं विक्रियात्मनैवाहं रमेऽनेन यथा रमा॥ ३५॥
जो सोयरा माझा हृदयस्थु। सुख प्रीति प्रिय अच्युतु। तोचि अंतरात्मा सर्वगतु। नाथ कांतु तो माझा॥ ४८॥ त्यासीच आपुले संवसाटी। विकत घेईन उठाउठी। परमानंदें देईन मिठी। गोठी चावटी सांडोनी॥ ४९॥ रमा झाली पायांची दासी। मी भोगीन अनारिसी। सर्वकाळ सर्वदेशीं। सर्वरूपेसीं सर्वस्वें॥ २५०॥
कियत्प्रियं ते व्यभजन् कामा ये कामदा नरा:।
आद्यन्तवन्तो भार्याया देवा वा कालविद्रुता:॥ ३६॥
सांडूनि हृदयस्था अच्युतातें। वरावें वरां निर्दैवांतें। तंव तो द्वैतभये भयचकिते। काळग्रस्ते सर्वदा॥ ५१॥ जे निजभयें सर्वदा दु:खी। ते भार्येसी काय करिती सुखी। अवघीं पडलींकाळमुखीं। न दिसे ये लोकीं सुखदाता॥ ५२॥ असो नराची ऐशी गती। वरूं अमरांमाजींअमरपती। विळांत ते चौदा निमती। पदच्युति अमरेंद्रा॥ ५३॥ एवं सुर नर लोक लोकीं। आत्ममरणें सदा दु:खी। ते केवीं भार्येसी करिती सुखी। भजावें मूर्खीं ते ठायीं॥ ५४॥ धन्य माझी भाग्यप्राप्ती। येचि क्षणीं येचि रातीं। झाली विवेकवैराग्यप्राप्ती। रमापति तुष्टला॥ ५५॥
नूनं मे भगवान्प्रीतो विष्णु: केनापि कर्मणा।
निर्वेदोऽयं दुराशाया यन्मे जात: सुखावह:॥ ३७॥
ये जन्मींचें माझें कर्म। पाहतां केवळ निंद्य धर्म। मज तुष्टला पुरुषोत्तम। पूर्वजन्मसामग्रीं॥ ५६॥ मज कैंचे पूर्वजन्मीं साधन। ज्याचें नाम ‘पतितपावन’। कृपाळु जो जनार्दन। त्याचे कृपेन हें घडलें॥ ५७॥ दुष्ट दुराशा व्यभिचारु। भगद्वारा चालवीं संसारु। तिसी मज वैराग्ययुक्त विचारु। विष्णु साचारु तुष्टला॥ ५८॥ जरी असतें पूर्वसाधन। तरी निंद्य नव्हतें मी आपण। योनिद्वारा कर्माचरण। पतित पूर्ण मी एकी॥ ५९॥ यापरी मी पूर्ण पतित। पतितपावन जगन्नाथ। तेणें कृपा करून येथ। केलें विवेकयुक्त वैरागी॥ २६०॥ तेणें वैराग्यविचारें देख। दुष्ट दुराशेचें फिटलें दु:ख। मज झालें परम सुख। निजसंतोख पावलें॥ ६१॥ दु:ख आदळतां अंगासी। वैराग्य नुपजे अभाग्यासी। भगवंतें कृपा केली कैशी। दु:खें निजसुखासी दीधलें॥ ६२॥
मैवं स्युर्मन्दभाग्याया: क्लेशा निर्वेदहेतव:।
येनानुबन्धं निर्हृत्य पुरुष: शममृच्छति॥ ३८॥
अंगीं आदळतां दु:खद्वंद्व। अभाग्यासी ये सबळ क्रोध। थिता विवेक होय अंध। भाग्यमंद ते जाणा॥ ६३॥ दु:ख देखतांचि दृष्टी। ज्यासी वैराग्य विवेकेंसीं उठी। तेणें छेदूनि स्नेहहृदयगांठी। पावे उठाउठी निजसुख॥ ६४॥ पुरुषांसी परमनिधान। विवेकयुक्त वैराग्य जाण। तेणें होऊनियां प्रसन्न। समाधान पावती॥ ६५॥ मी पूर्वी परम अभाग्य। महापुरुषांचे जें निजभाग्य। तें भगवंतें दिधलें वैराग्य। झालें श्लाघ्य तिहीं लोकीं॥ ६६॥
तेनोपकृतमादाय शिरसा ग्राम्यसङ्गता:।
त्यक्त्वा दुराशा: शरणं व्रजामि तमधीश्वरम्॥ ३९॥
कृपा करोनि भगवंते। निजवैराग्य दिधलें मातें। तेणें सांडविलें दुराशेतें। ग्राम्य विषयातें छेदिलें॥ ६७॥ तो उपकार मानूनियां माथां। त्यासी मी शरण जाईन आतां। जो सर्वाधीश नियंता। तथा कृष्णनाथा मी शरण॥ ६८॥
सन्तुष्टा श्रद्दधत्येतद्यथालाभेन जीवती।
विहराम्यमुनैवाहमात्मना रमणेन वै॥ ४०॥
शरण गेलियापाठीं। सहज संतुष्ट मी ये सृष्टीं। स्वभावें सत् श्रद्धा पोटीं। जीविका गांठी अदृष्ट॥ ६९॥ मुनीश्वर भोगिती निजात्मा। त्या मी भोगीन आत्मयारामा। जो का पुरवीनिष्कामकामा। तो परमात्मा वल्लभु॥ २७०॥ ब्रह्मादिक समर्थ असती। ते सांडूनियां निश्चितीं। भगवद्भजनाची स्थिती। अतिप्रीती कां म्हणसी॥ ७१॥ मजसारिखिया दुराचारी। जड जीवांतें उद्धरी। तारकु तोचि भवसागरीं। स्वामी श्रीहरि कृपाळु॥ ७२॥
संसारकूपे पतितं विषयैर्मुषितेक्षणम्।
ग्रस्तं कालाहिनाऽऽत्मानं कोऽन्यस्त्रातुमधीश्वर:॥ ४१॥
संसारलक्षण कूप अंध। तेथ विषयदृष्टीं विषयांध। पडोनि गेले अंधांध। बुद्धिमंद उपायीं॥ ७३॥ ते कल्पनाजळीं बुडाले। वासनाकल्लोळीं कवळले। दंभमदादि जळचरीं तोडिले। तृष्णेच्या पडले कर्दमीं॥ ७४॥ दु:खाच्या खडकीं आदळले। स्वर्गपायरीसी अडकले। तेथूनिही एक पडले। निर्बुजले भवदळें॥ ७५॥ नास्तिकें गेलीं सबुडबुडीं। कर्मठीं धरिल्या कर्मदरडी। वेदबाह्य तीं बापुडीं। पडलीं देव्हडीतळवटीं॥ ७६॥ निंदेचे शूळ कांटे। फुटोनि निघाले उफराटे। द्वेषाचे पाथर मोठे। हृदय फुटे लागतां॥ ७७॥ कामाची उकळी प्रबळ। भीतरूनि बाहेरी ये सबळ। तेणें उहुळलें तें जळ। होय खळबळ जीवासी॥ ७८॥ सुटले क्रोधाचे चिरे। वरी पडिल्या उरी नुरे। वनितामगरीं नेलें पुरें। विवरद्वारें आंतौतें॥ ७९॥ तेथ अवधियांसी एकसरें। गिळिलें काळेंकाळअजगरें। विखें घेरिलें थोरें घोरें। ज्ञान पाठिमोरें सर्वांसी॥ २८०॥ सर्प चढलिया माणुसा। गूळ कडू लागे कैसा। निंब खाये घसघसां। गोड गूळसा म्हणौनि॥ ८१॥ केवळ विषप्राय विषयो कडू। तो प्रपंचिया जाला गोडु। अमृतप्राय परमार्थ गोडु। तो जाहला कडू विषयिकां॥ ८२॥ कूपाबाहेर वासु ज्यांसी। ते न देखती कूपाआंतुलांसी। कूपांतले बाहेरिलांसी। कदाकाळेंसीं न देखती॥ ८३॥ ऐसिया पीडतयां जीवांसी। काढावया धिंवसा नव्हे कोण्हासी। तुजवांचोनि हृषीकेशी। पाव वेगेंसीं कृपाळुवा॥ ८४॥ एवं दु:खकूपपतितां। हृदयस्थु भगवंतुचि त्राता। धांव पाव कृष्णनाथा। भवव्यथा निवारीं॥ ८५॥ ऐसें जाणोनि तत्त्वतां। त्याच्या चरणा शरण आतां। शरण गेलिया सर्वथा। सहज भवव्यथा निवारे॥ ८६॥
आत्मैव ह्यात्मनो गोप्ता निर्विद्येत यदाखिलात्।
अप्रमत्त इदं पश्येद् ग्रस्तं कालाहिना जगत्॥ ४२॥
ऐसें कळलें जी तत्त्वतां। येथ आपणचि आपणिया त्राता। सर्व पदार्थीं सर्वथा। निर्वेदता दृढ जाहल्या॥ ८७॥ दृढ वैराग्यता ते ऐशी। विषयो टेंकल्या अंगासी। चेतना नव्हें इंद्रियांसी। निद्रितापासीं जेवीं रंभा॥ ८८॥ अथवा वमिलिया अन्ना। जेवीं वांछीना रसना। तेवीं विषय देखोनि मना। न धरी वासना आसक्ती॥ ८९॥ तें वैराग्य कैसेनि जोडे। तरी सावधान पाहतां रोकडें। जग काळें गिळिलें चहूंकडे। वेगळें पडे तें नाहीं॥ २९०॥ पिता-पितामह काळें नेले। पुत्रपौत्रां काळें गिळिलें। वैराग्य नुपजे येणें बोलें। तरी नागवले नरदेहा॥ ९१॥ मृत्युलोक याचें नांव। अनित्य स्वर्गाची काइसी हांव। वैराग्येंवीण निर्दैव। झाले सर्व सर्वथा॥ ९२॥
ब्राह्मण उवाच
एवं व्यवसितमतिर्दुराशां कान्ततर्षजाम्।
छित्त्वोपशममास्थाय शय्यामुपविवेश सा॥ ४३॥
अवधूत म्हणे यदूसी। धन्य भाग्य तये वेश्येसी। वैराग्य उपजलें तिसी। विवेकेंसी निजोत्तम॥ ९३॥ एवं विवंचूनि निजबुद्धी। परपुरुषदुराशा छेदी। ज्याचेनि संगें आधिव्याधी। बहु उपाधी बाधक॥ ९४॥ जे उपाधीचेनि कोडें। जन्ममृत्यूचा पुरु चढे। दु:खभोगाचें सांकडें। पाडी रोकडें जीवासी॥ ९५॥ येणें वैराग्यविवेकबळें। छेदूनि दुराशेचीं मूळें। उपरमु पावली एके वेळे। निजात्मसोहळे ते भोगी॥ ९६॥ नित्यसिद्धसुखदाता। तो हृदयस्थ कांत आश्रितां। विकल्प सांडूनि चित्ता। वेगीं हृदयस्था मीनली॥ ९७॥ त्यासी देखतां अनुभवाचे दिठीं। ऐक्यभावें घातली मिठी। निजसुख पावली गोरटी। उठाउठीं तत्काळ॥ ९८॥ बोलु घेऊनि गेला बोली। लाज लाजोनियां गेली। दृश्य-द्रष्टा दशा ठेली। वाट मोडिली विषयांची॥ ९९॥ सुखें सुखावलें मानस। तें सुखरूप जालें नि:शेष। संकल्पविकल्प पडिले वोस। दोघां सावकाश निजप्रीती॥ ३००॥ नाबद पडलिया उदकांत। विरोनि तया गोड करित। तेवीं निराशीं पावोनि भगवंत। समरसत स्वानंदें॥ १॥ तेथ हेतूसी नाहीं ठावो। निमाला भावाभावो। वेडावला अनुभवो। दोघां प्रीती पाहा हो अनिवार॥ २॥ सांडूनि मीतूंपणासी। खेंव दिधलें समरसीं। मग समाधीचिये सेजेशी। निजकांतेंसी पहुडली॥ ३॥ झणें मायेची लागे दिठी। यालागीं स्फूर्तीचिया कोटी। निंबलोण गोरटी। उठाउठी वोवाळी॥ ४॥ ऐसी समाधिशेजेशीं। पिंगला रिघे निजसुखेंसीं। अवधूत म्हणे यदूसी। वैराग्यें वेश्येसी उपरमु॥ ५॥ वैराग्ये छेदिले आशापाश। पिंगला जाहली गा निराश। निराशासी असमसाहस। सुखसंतोष सर्वदा॥ ६॥
आशा हि परमं दु:खं नैराश्यं परमं सुखम्।
यथा सञ्छिद्य कान्ताशां सुखं सुष्वाप पिङ्गला॥ ४४॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायामेकादशस्कंधेऽष्टमोऽध्याय:॥ ८॥
आशा तेथ लोलुप्यता। आशेपाशीं असे दीनता। आशा तेथ ममता। असे सर्वथा नाचती॥ ७॥ आशेपाशीं महाशोक। आशा करवी महादोख। आशेपाशीं पाप अशेख। असे देख तिष्ठत॥ ८॥ आशेपाशीं अधर्म सकळ। आशा मानीना विटाळ। आशा नेणे काळवेळ। कर्म सकळ उच्छेदी॥ ९॥ आशा अंत्यजातें उपासी। नीचसेवन आशेपाशीं। आशा न सांडी मेल्यासी। प्रेतापाशीं नेतसे॥ ३१०॥ आशा उपजली अनंतासी। नीच वामनत्व आलें त्यासी। आशें दीन केलें देवांसी। कथा कायसी इतरांची॥ ११॥ जगाचा जो नित्य दाता। तो आशेनें केला भिकेसवता। वैऱ्याचे द्वारीं झाला मागता। द्वारपाळता तेणें त्यासी॥ १२॥ आशा तेथ नाहीं सुख। आशेपाशीं परम दु:ख। आशा सर्वांसी बाधक। मुख्य दोष ते आशा॥ १३॥ ज्याची आशा नि:शेष जाये। तोचि परम सुख लाहे। ब्रह्मादिक वंदिती पाये। अष्टमा सिद्धि राहे दासीत्वें॥ १४॥ निराशांचा शुद्ध भावो। निराशांपाशीं तिष्ठे देवो। निराशांचें वचन पाहा हो। रावो देवो नुल्लंघी॥ १५॥ निराश तोचि सद्बुद्धि। निराश तोचि विवेकनिधी। चारी मुक्ती पदोपदीं। नैराश्य आधीं वंदिती॥ १६॥ निराशा तीर्थांचें तीर्थ। निराशा मुमुक्षूचा अर्थ। निराशेपाशीं परमार्थ। असे तिष्ठत निरंतर॥ १७॥ जाण नैराश्यतेपाशीं। वैराग्य होऊन असे दासी। निराश पहावया अहर्निशीं। हृषीकेशी चिंतितु॥ १८॥ निराश देखोनि पळे दु:ख। निराशेमाजीं नित्यसुख। निराशेपाशीं संतोख। यथासुखें क्रीडतु॥ १९॥ नैराश्याचे भेटीसी पाहाहो। धांवे वैकुंठीचा रावो। नैराश्याचा सहज स्वभावो। महादेवो उपासी॥ ३२०॥ निराशेपाशीं न ये आधी। निराशेपाशीं सकळ विधी। सच्चिदानंदपदीं। मिरवे त्रिशुद्धी निराशु॥ २१॥ ऐकोनि निराशेच्या नावां। थोरला देवो घेतसे धांवा। त्या देवोनियां खेंवा। रूपनांवा विसरला॥ २२॥ ते निराशेचा जिव्हाळा। पावोनि वेश्या पिंगला। जारपुरुषाशेच्या मूळा। स्वयें समूळा छेदिती झाली॥ २३॥ जें आशापाशांचें छेदन। तेंचि समाधीचें निजस्थान। ते निज समाधी पावोन। पिंगला जाण पहुडली॥ २४॥ सर्व वर्णामाजीं वोखटी। कर्म पाहतां निंद्य दृष्टीं। ते वेश्या पावन झाली सृष्टीं। माझे वाक्पुटीं कथा तिची॥ २५॥ यालागीं वैराग्यापरतें। आन साधन नाहीं येथें। कृष्ण थापटी उद्धवातें। आल्हादचित्तें प्रबोधी॥ २६॥ अवधूत सांगे यदूसी। प्रत्यक्ष वेदबाह्यता वेश्येसी। निराश होतां मानसीं। निजसुखासी पावली॥ २७॥ यालागीं कायावाचाचित्तें। उपासावें निराशेतें। यापरतें परमार्थातें। साधन येथें दिसेना॥ २८॥ इतर जितुकीं साधनें। तितुकीं आशा-निराशेकारणे। ते निराशा साधिली जेणें। परमार्थ तेणें लुटिला॥ २९॥ कृपा जाकळिलें अवधूतासी। यदूसी धरोनियां पोटासी। निराशता हे जे ऐसी। अवश्यतेसीं साधावी॥ ३३०॥ एका जनार्दना शरण। त्याची कृपा परिपूर्ण। तोचि आशापाश छेदून। समाधान पाववी॥ ३३१॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे एकादशस्कंधे यद्ववधूतसंवादे एकाकारटीकायां अष्टमोऽध्याय:॥ ८॥॥ श्रीकृष्णार्पणमस्तु॥ मूळश्लोक॥ ४४॥ ओव्या॥ ३३१॥
॥ श्री ॐ तत्सत्-श्रीकृष्ण प्रसन्न॥
अध्याय नववा
श्रीगणेशाय नम:॥ श्रीकृष्णाय नम:॥ ॐ नमो सद्गुरु अमरपती। अनुभवु तोचि ऐरावती। स्वानंदमदें भद्रजाती। उन्मत्तीस्थितीं डुल्लत॥ १॥ उपदेशाचें वज्र तिख। छेदी संकल्पविकल्पपांख। जडजीव ते पर्वत देख। निजस्थानीं सम्यक स्थापिसी॥ २॥ विवेकाचे पारिजात। वैराग्यसुमनीं घमघमित। मुमुक्षभ्रमर रिघोनि तेथ। आमोद सेविती चित्सुख॥ ३॥ उपशम तोचि बृहस्पती। विश्वासें तुझा निकटवर्ती। त्यासी मानिसी अतिप्रीतीं। तो सभेप्रती सदस्य॥ ४॥ कृपाकामधेनूंचीं खिल्लारें। श्रद्धावत्साचेनि हुंकारें। वोळल्या वोरसाचेनि भरें। तें दुभतें पुरे भागवतां॥ ५॥ सतेज चिंतामणीचे खडे। सभोंवतीं लोळती चहूंकडे। भक्त न पाहती तयांकडे। चरणसुरवाडें सुखावले॥ ६॥ स्वर्गांगना अष्टमा सिद्धी। तुजपुढें नाचती नाना छंदीं। त्यांतें दास न पाहती त्रिशुद्धी। मंदबुद्धि भाळले॥ ७॥ समसाम्यें समान। अढळ तुझें सिंहासन। सच्चिदानंदाची गादी जाण। तेथें सुखासन पैं तुझें॥ ८॥ पावावया तुझिया पदाप्रती। साधनचतुष्टयसंपत्ती। जोडोनियां याजक यजिती। प्रत्यगावृत्तीचेनि यागें॥ ९॥ जे मन होमिताति सावधानीं। ऐसें भक्तभजन देखोनि। तेणें भावार्थयोगें संतोषोनी। निजपददानी तूं होशी॥ १०॥ त्यांसी निजात्मता देऊनी। बैसविसी निजासनीं। मरणेंवीण अमर करूनी। अपतनीं स्थापिसी॥ ११॥ इंद्रा अहल्येशीं व्यभिचारु। तुज वृंदेशीं दुराचारु। इंद्र जाहला सहस्रनेत्रु। तूं सर्वांगें सर्वत्रु देखणा॥ १२॥ इंद्रासी दैत्य करिती दीन। त्याचें पद घेती हिरोन। तुज भक्त करिती प्रसन्न। पद चिद्धन ते घेती॥ १३॥ ककुत्स्थ बैसला इंद्राचे स्कंधीं। दुर्वास बैसला तुझ्या खांदीं। इंद्र वर्ते विष्णूचे बुद्धीं। तूं भक्तच्छंदीं। वर्तसी॥ १४॥ रावणें बंदीं घातलें इंद्रासी। तुज बळीनें राखिलें द्वारासी। इंद्र याची याग अवदानासी। तूं भूमिदानासी याचिता॥ १५॥ इंद्रासी अग्निमुखें प्राप्ती। तुज विश्वतोमुखीं तृप्ती। ऐसा सद्गुरु तूं कृपामूर्तीं। अमरचक्रवर्ती गुरुराया॥ १६॥ तुझी करावी विनवणी। तंव तेथें न रिघे वाणी। वाणीप्रकाश तुझेनी। वक्ता वदनीं तूं सत्य॥ १७॥ एकाएक जनार्दनीं। तो जनार्दन वक्ता वदनीं। ऐसा वचनामाजीं प्रवेशोनी। ग्रंथकरणी करविता॥ १८॥ तेथें मूळीं निमाली अहंता। अहं दवडूनि तूं कवि कर्ता। एका जनार्दनु अभंगी सूता। अभंगता गुरुचरणीं॥ १९॥ त्या गुरुचरणप्रसादें। गुरूचीं लक्षणें विनोदें। वाखाणिलीं यथाबोधें। यदुसंवादें अवधूतें॥ २०॥ मागें अष्टमाध्यायाच्या अंतीं। असतां पिंगलेसी एकांतीं। विवेक-वैराग्य-निवृत्तीं। निजसुखप्राप्ती पावली॥ २१॥ जंव जंव अपरिग्रह होणें। तंव तंव निजसुख पावणें। हेंचि प्रस्तुत बोलणें। तेणें ब्राह्मणें बोलिजे॥ २२॥
ब्राह्मण उवाच
परिग्रहो हि दु:खाय यद्यत्प्रियतमं नृणाम्।
अनन्तं सुखमाप्नोति तद्विद्वान्यस्त्वकिञ्चन:॥ १॥
ब्राह्मण म्हणे रायासी। परिग्रहो जयापाशीं। वाढतें दु:ख तयासी। अहर्निशीं चढोवढी॥ २३॥ कुटुंबपरिग्रहाचे आसक्ती। कपोता निमाला दुर्मती। आतां एकाकी परिग्रहो करिती। तेही पावती दु:खातें॥ २४॥ गृहपरिग्रहें गृहस्था। पाषाणमृत्तिकेची ममता। काडीकारणें कलहो करितां। सुहृदता सांडिती॥ २५॥ नि:संगा परिग्रहो लागला कैसा। शिष्यसंप्रदायें घाली फांसा। शास्त्रपुस्तकसंग्रहवशा। वाढवी आशा मठाची॥ २६॥ त्या मठशिष्यांचें सांत्वन। करितां अत्यंत होय दीन। मग परिग्रहाचें उपशमन। अपरिग्रही जाण करिताति॥ २७॥ त्या मठाचिया आशा। शिष्यसंप्रदायवशा। कलहो लागे आपैसा। विरोधु संन्यासा परिग्रहें॥ २८॥ परिग्रहो जिणोनि गाढा। लंगोटी त्यजूनि जाहला उघडा। नागवे माथां घेऊनि घडा। लाविल्या झाडा शिंपित॥ २९॥ त्या वृक्षाचें कोणी पान तोडी। त्यासी आक्रोशें कलह मांडी। थोर परिग्रहाची सांकडी। दु:खें पीडी सर्वांतें॥ ३०॥ आवडीं केला जो परिग्रहो। तो तो उपजवी दु:खकलहो। हा होतांही अनुभवो। वैराग्य पहा हो उपजेना॥ ३१॥ ऐशी परिग्रहाची कथा। देखोनि देखणा जो ज्ञाता। आसक्ती सांडोनि सर्वथा। अकिंचनपंथा लागला॥ ३२॥ प्रपंच अनित्य नाशवंत। तेथील संग्रह काय शाश्वत। ऐसें विवंचूनि समस्त। अकिंचनचित्त ते जाहले॥ ३३॥ परिग्रहामाजीं गाढा। देहपरिग्रहाचा खोडा। मिथ्यात्वें फोडी रोकडा। तो विवेकें गाढा ज्ञाता पैं॥ ३४॥ जेथ देहपरिग्रह मिथ्या जाहला। तो अनंत सुखाच्या घरा आला। ज्या सुखासी अंत न वचे केला। त्या पावला निजसुखा॥ ३५॥ परिग्रहो दु:खवंतु। हा ‘कुररी’ गुरुत्वें वृत्तांतु। तुज सांगेन साद्यंतु। उपहासें अवधूतु बोलिला॥ ३६॥ तंव राजा मनीं चमत्कारला। म्हणे मी राज्यपरिग्रहें गुंतला। देहपरिग्रहें बंदी पडला। पाहिजे केला हा त्यागु॥ ३७॥ ऐसा राजा सवैराग्यु। करूं पाहे सर्वत्यागु। श्रवणें जाहला तो सभाग्यु। होय योग्यु निजज्ञाना॥ ३८॥ कुररी-गुरुत्वें जाणा। परिग्रहत्यागविवंचना। आणावया जी मना। सादर श्रवणा करीतसे॥ ३९॥
सामिषं कुररं जघ्नुर्बलिनो ये निरामिषा:।
तदामिषं परित्यज्य स सुखं समविन्दत॥ २॥
‘कुरर’ बोलिजे टिटवा। पावला आमिषकवळु बरवा। तेणें तेथेंची भक्षावा। तो लोभस्वभावा ठेविला॥ ४०॥ तें आमिष देखोनियां फार। बळी जे निरामिष कुरर। ते धांविन्नले अतिसत्वर। लहान थोर मिळोनि॥ ४१॥ हिरोनि घेऊं पाहती बळें। हें जाणोनियां तो पुढें पळे। पाळतां देखोनि एक वेळे। त्वरें तत्काळें वेढिला॥ ४२॥ त्या आमिषाचिया चाडा। थोर मांडला झगडा। मारूं लागले फडफडां। चहूंकडा निष्ठुर॥ ४३॥ एक झडपिती पांखीं। एक चपेटे हाणिती नखीं। एक विदारिती मुखीं। परम दु:खी होतसे॥ ४४॥ आमिष-कवळें गुंतलें मुख। मारितां देऊं न शके हाक। खस्तावेस्त करितां देख। बोलावया मुख त्या नाहीं॥ ४५॥ हे माझे स्वजाती पहा हो। सांडोनियां सुहृदभावो। मज कां करूं आले अपावो। तो अभिप्रावो विवंची॥ ४६॥ म्हणे माझिया दु:खासी मूळ। मजपाशील आमिष-कवळ। तो त्यजोनियां तत्काळ। सुखी सुनिश्चळ बैसला॥ ४७॥ जेथ आमिषकवळु पडे। तेथ कलहाचा गोंधळ मांडे। परस्परें फुटती मुंडें। ठेंचिती तोंडे येरयेरां॥ ४८॥ आमिष त्यजोनि बैसला देख। तो पाहे कलहाचें कौतुक। मूळ परिग्रहो तेथें दु:ख। परम सुख त्यागितां॥ ४९॥ माडॺा गोपुरें धवळारा। धनधान्य नाना अंबरा। रत्नें प्रवाळ धन-पुत्र-दारा। हा समुदायो खरा परिग्रहो॥ ५०॥ या समस्त परिग्रहाचें मूळ। देहबुद्धि गा केवळ। तेहीं अभिमानें सबळ। एवं सर्वांस मूळ अभिमानु॥ ५१॥ तो अभिमानु जैं सांडे। तैं प्रपंचाचें मूळ खंडे। मूळ छेदिल्या जेवीं उलंडे। अतिप्रचंडे तरुवर॥ ५२॥ अभिमान देहबुद्धिजीवन। देहबुद्धि संगास्तव गहन। उभयसंगु तो आयतन। निवासस्थान परिग्रहो॥ ५३॥ एवं अन्योन्य सापेक्षक। येरयेरा आवश्यक। याचे त्यागीं परम सुख। अतिदु:ख तो परिग्रहो॥ ५४॥ परिग्रहत्यागाचें मूळ जाण। आधीं त्यजावा अभिमान। तेणेंवीण त्यागु तो विटंबन। केल्या जाण होईल॥ ५५॥ अभिमानसहित सकळ सांडे। तैं पडती सुखाचे पायमांडे। तें सुख न बोलवे तोंडें। शब्द मुरडे लाजोनि॥ ५६॥ अभिमान जाऊन वर्तन। कैसें राया म्हणसी जाण। तें अर्भक-गुरुत्वलक्षण। तुज संपूर्ण सांगेन॥ ५७॥
न मे मानावमानौ स्तो न चिन्ता गेहपुत्रिणाम्।
आत्मक्रीड आत्मरतिर्विचरामीह बालवत्॥ ३॥
बाल माझें तुझें न म्हणे। उंच नीच कांहीं नेणे। यालागीं मानापमान तेणें। सुखें साहणें सर्वथा॥ ५८॥ तिमासांचेनि बाळकें। मानु कोण हें नोळखे। अपमानु तोही न देखे। आपुलेनि सुखें क्रीडत॥ ५९॥ दुजेपणातें नातळे। बालक आपुलियाचि लीळें। आपआपणिाशींच खेळें। आपुलेनि मेळें आपण॥ ६०॥ देहगेहांची चिंता। बाळासी नातळे सर्वथा। स्वभावेंचि निश्चिंतता। चिंताकथा त्या नाहीं॥ ६१॥ न देखतां दुजी स्थिती। बाळका आपुली आपणिया प्रीती। आपुली आपणिया अतिरती। तैसी गती योगिया॥ ६२॥ योगियासी प्रपंचाचें भान। सत्यत्वें नाहीं जाण। यालागीं मानापमान। दोन्ही समान तयासी॥ ६३॥ चित्रींचेनि सापें खादला। तो चित्रींचेनि अमृतें वांचला। तेवीं जिण्या मरण्या मुकला। निश्चळ ठेला निर्द्वंद्वें॥ ६४॥ गृहदारापुत्रचिंता। हे समूळमिथ्या वार्ता। स्वदेहो सत्यत्वें असता। तरी करूं लाहता चिंतेतें॥ ६५॥ भवमूळ कल्पना जाण। ते कल्पना मनाआधीन। तें मन स्वरूपीं जाहलिया लीन। तेव्हां वस्तु-चिद्धन सर्वत्र॥ ६६॥ तेणें स्वरूपानुसंधानें। सुखें क्रीडतु चिद्धनें। क्रीडा दैवयोगें करणें। देहाभिमानें विरहित॥ ६७॥ पावोनि निजसुखप्राप्ती। मनआदि इंद्रियें उपरमती। अणुभरी स्फुरेना वृत्ती। ‘समाधि’ बोलती या नांव॥ ६८॥ तेचि स्वरूपीं ठेवूनि मन। बाह्यस्फूर्तीचें स्फुरे भान। ते दशा गा ‘व्युत्थान’। साधुजन बोलती॥ ६९॥ उंबऱ्यावरी ठेविला दिवा। तो जेवीं देखे दोंही सवा। तैसी व्युत्थानदशा जीवभावा। उभय स्वभावा देखणी॥ ७०॥ लवण-जळा समरसता। तेवीं स्वरूपीं विरवूनि चित्ता। समाधिव्युत्थाना हाणी लाथा। निजीं निजस्वरूपता पावोनि॥ ७१॥ त्यासी कोणाचा मानापमान। गृहपुत्रचिंता करी कोण। स्वरूपीं हारपलें मन। निजसमाधान पावला॥ ७२॥ मनेंवीण जें विहरण। तें बालकाच्याऐसें जाण। दैवयोगें चलनवलन। वृत्तिशून्य वर्तत॥ ७३॥
द्वावेव चिन्तया मुक्तौ परमानन्द आप्लुतौ।
यो विमुग्धो जडो बालो यो गुणेभ्य: परं गत:॥ ४॥
थोर चिंतेचा आवर्त। जेथ ब्रह्मादिक बुडत। ते आवर्तीं दोघे मुक्त। परीस निश्चित यदुवीरा॥ ७४॥ दोघां नाहीं द्वैतभान। दोघे नेणती मानापमान। दोघे सुखें सुखसंपन्न। दोघे मनेंवीण वर्तती॥ ७५॥ एकासी पुढे भेटेल दु:ख। दुजेनि जिंतिलें सुखदु:ख। एकासी मुग्धतेचें सुख। दुज्या देख निजज्ञान॥ ७६॥ पाहतां बाळकाचे ठायीं। गुप्तवासना असे देहीं। ते अंकुरीजोनि पाही। अवश्य अपायीं घालील॥ ७७॥ तैसा नव्हे योगिया गुणातीत। जो पूर्णानंदें पूर्णभरित। त्यासी सुखदु:खाची मात। नाहीं जगांत सर्वथा॥ ७८॥ देहीं दिसे जीव वर्तत। तो केवीं झाला गुणातीत। ऐसे म्हणसी तो वृत्तांत। ऐक साद्यंत सांगेन॥ ७९॥ साधकें सेवूनि साधुजन। वाढविला सत्त्वगुण। वाढलेनि सत्त्वें जाण। ज्ञानसाधन साधिलें॥ ८०॥ साधिलेनि ज्ञानसाधनें। छेदी रजतमांचीं विंदानें। जें मोहममतेचीं दारुणें। उभय भोगजन्यें कर्मठां॥ ८१॥ एवं वाढलेनि सत्त्वोत्तमें। निर्दळलीं रजतमें। सत्त्व एकलेपणें निमे। स्वयें उपशमें तें जाणा॥ ८२॥ जंव जंव काष्ठसंभार असे। तंव तंव अग्नि जाळी उल्हासें। सरलेनि काष्ठलेशें। अग्नि प्रवेशे निजतेजां॥ ८३॥ ऐसी जिणोनि गुणावस्था। योगी पावला गुणातीतता। त्यासी न बाधी भवव्यथा। प्रलयकल्पता झालिया॥ ८४॥ ज्या सुखासी नाहीं अंत। तें सुख स्वरूपें झालें प्राप्त। ते देहीं वर्ततां देहातीत। चिंताआवर्त त्यां नाहीं॥ ८५॥ एकाकी जाहल्यावीण तत्त्वतां। ते अवस्था न चढे हाता। येचिविशीं नृपनाथा। ‘कुमारी’ गुरुकथा सांगेन॥ ८६॥
क्वचित्कुमारी त्वात्मानं वृणानान्गृहमागतान्।
स्वयं तानर्हयामास क्वापि यातेषु बन्धुषु॥ ५॥
कोणी एके कुमारीसी। घरीं राखण ठेवूनि तिसी। पिता माता स्वगोत्रेसीं। गेली यात्रेसी कुळदेवा॥ ८७॥ ते कुमारीचें विवाहलग्न। पूर्वीं नेमिलें होतें जाण। त्या निश्चयालागीं ब्राह्मण। घरा संपन्न पैं आले॥ ८८॥ पुसती घरीं आहे कोण। लाजे नोवरी धरी मौन। त्यांसी न देतां दर्शन। पूजाविधान ते मांडी॥ ८९॥ वातायनद्वारा आसनें। दिधलीं समस्तांकारणें। गंधाक्षता सुमनें पानें। दिधले मौनें उपचार॥ ९०॥ देखोनि पूजेचें विधान। जाणों सरले ते ब्राह्मण। घरीं नोवरीचि आहे जाण। हें चतुरलक्षण तियेचें॥ ९१॥ त्यांच्या पाहुणेराची चिंता। उशिरां येईल माझी माता। ते काळीं साळीं सडितां। विलंबु सर्वथा होईल॥ ९२॥
तेषामभ्यवहारार्थं शालीन् रहसि पार्थिव।
अवघ्नन्त्या: प्रकोष्ठस्थाश्चक्रु: शङ्खा: स्वनं महत्॥ ६॥
ऐसें विचारूनि जाण। साळी कांडूं रिघे आपण। ते कांडणकाळींचें विंदान। चतुरलक्षण परियेसीं॥ ९३॥ घावो घालितां कांडणा। उठी झणत्कार करकंकणा। तेणें नादें लाजोनि जाणा। विचारु मनामाजीं करी॥ ९४॥
सा तज्जुगुप्सितं मत्वा महती व्रीडिता तत:।
बभञ्जैकैकश: शङ्खान् द्वौ द्वौ पाण्योरशेषयत्॥ ७॥
या शंखवलयांचा ध्वनि। पडेल पाहुण्यांचें कानीं। ते अत्यंत लाज मजलागुनि। नववधुकांडणीं बैसली॥ ९५॥ त्यांच्या कानीं ध्वनि न पडे। कांडण तरी चाले पुढे। ऐसें विचारोनि रोकडें। कंकणाकडे पाहिलें॥ ९६॥ पाहतां दिसे ते अबला। विचार वृद्धाहोनि आगळा। करीचा कंकण खळाळा। युक्तीं वेल्हाळा विभागी॥ ९७॥ जरी कंकण फोडूं आतां। तरी ते मुहूर्तींच अशुभता। शतायु हो माझा भर्ता। न फोडी सर्वथा या हेतु॥ ९८॥ अति बुद्धिमंत ते कुमारी। हळूचि कंकणें उतरी। ते ठेवी जतनेवरी। राखे दों करीं दोनी॥ ९९॥ दोनी कंकणें उरवूनी। कांडूं बैसली कांडणीं। दोंहीमाजीं उठे ध्वनी। ऐकोनि कानीं लाजिली॥ १००॥
उभयोरप्यभूद् घोषो ह्यवघ्नन्त्या: स्म शङ्खयो:।
तत्राप्येकं निरभिददेकस्मान्नाभवद् ध्वनि:॥ ८॥
म्हणे दोघांचा संगु एके स्थानीं। तेथें सर्वथा न राहे ध्वनी। दोंतील एक वेगळें काढोनी। बसे कांडणीं कुमारी॥ १॥ एकपणीं कांडितां। ध्वनि नुठेचि तत्त्वतां। तो उपदेशु नृपनाथा। झालों शिकता मी तेथ॥ २॥
अन्वशिक्षमिमं तस्या उपदेशमरिन्दम।
लोकाननुचरन्नेतान्लोकतत्त्वविवित्सया॥ ९॥
जिणोनि प्रतिस्पर्धी भूपाळ। किंकर केले राजे सकळ। तूं अरिमर्दन सबळ। मिथ्या केवळ तो गर्व॥ ३॥ कामक्रोधादि अरिवर्ग। न जिणतां सकळ साङ्ग। ‘अरिमर्दन’ हा बोल व्यंग। होईल चांग ये अर्थी॥ ४॥ कामादिक सहा वैरी। येणें उपदेशशस्त्रधारीं। जिणोनि घालितां तोडरीं। मग संसारीं अरि नाहीं॥ ५॥ लोकांवेगळा अवधूतु। म्हणसी कुमारी ते घराआंतु। तो एकांतींचा वृत्तांतु। कैसेनि प्राप्तु तुज झाला॥ ६॥ राहोनियां विजनस्थानीं। विश्वासोनि गुरुवचनीं। दृढ बैसोनि आसनीं। निजतत्त्व ध्यानीं आकळिलें॥ ७॥ त्याचि तत्त्वनिश्चयालागुनी। मी विचरतसें ये मेदिनी। निजात्मभावो जनीं वनीं। दृढ करोनि पाहतसें॥ ८॥ होतां दृश्येंसीं भेटी। दृश्य दृश्यत्वें न पडे मिठी द्रष्टेपणही घालोनि पोटीं। ऐशिया दृष्टीं विचरत॥ ९॥ अंगीकारितां गुरुत्वगुण। देखतां जगाचेंदर्शन। मज होतसे चैतन्यभान। ऐसेन जाण मी विचरत॥ ११०॥ ऐशिया निजदृष्टीं वीरा। मज विचरतां चराचरा। अवचटें कुमारीमंदिरा। त्याचि अवसरा मी आलों॥ ११॥ करितां कंकणविवंचना। निजस्वार्थाचिया खुणा। पाहोनि घेतलें ज्या लक्षणा। ते विचक्षणा परियेसीं॥ १२॥
वासे बहूनां कलहो भवेद्वार्ता द्वयोरपि।
एक एव चरेत्तस्मात्कुमार्या इव कङ्कण:॥ १०॥
जेथ होय बहुतांची वस्ती। तेथ अनिवार कलहप्राप्ती। दोघे बैसल्या एकांतीं। वार्ता करिती बहुविधा॥ १३॥ जेथें गोष्टीखालीं काळु जाये। तेथें निजस्वार्थु हों न लाहे। यालागीं मी पाहें। विचरत आहें एकाकी॥ १४॥ एकाकी एकाग्रता। साधिल्या थोर लाभु ये हाता। येचविषयीं शरकर्ता। गुरु तत्त्वतां म्यां केला॥ १५॥
मन एकत्र संयुज्याज्जितश्वासो जितासन:।
वैराग्याभ्यासयोगेन ध्रियमाणमतन्द्रित:॥ ११॥
वैराग्येंवीण अभ्यासु घडे। तेथ विषयचोर उठती गाढे। कामाचा घाला पडे। मुद्दल बुडे निजज्ञान॥ १६॥ विवेकदीप करूनि धुरे। निरसी अज्ञानाचें अंधारें। वैराग्याचें बळ पुरें। महामुद्रेचेनि योगें॥ १७॥ प्राणापानाची चुकामुकी। झाली होती बहुकाळ कीं। ते अभ्यासबळें एकाएकीं। केली वोळखी दोघांसी॥ १८॥ वोळाखीसवेंचि जाण। पावली जुनाट पहिली खूण। दोघां पडिलें आलिंगन। समाधान समसाम्यें॥ १९॥ दृढ बैसोनि आसनीं। ऐशी प्राणापान मिळणी। करूनि लाविली निशाणी। ब्रह्मस्थानीं रिघावया॥ १२०॥ ब्रह्मगिरीचिया कडा। शमदमें घालोनियां वेढा। प्रत्याहाराचा झगडा। पुढिले कडां लाविला॥ २१॥ प्राणापानांच्या विवरीं। पहिली ओळखी होती खरी। माळ लाविली अभेदकरीं। मन एकाग्रीं राखोनि॥ २२॥ एकाग्रतेचेनि कल्लोळें। पुढारें न ढळवे चालिले बळें। उल्हाटयंत्राचेनि मेळें। षट्चक्रपाळें भेदिलें॥ २३॥ वैराग्याचीं वज्रकवचें। निधडे वीर लेऊनि साचे। एकाग्रताबळें बळाचें। झळके ध्यानाचें करीं खड्ग॥ २४॥ नवल खङ्गाचा वाहो। लहान थोर निवटी पहा हो। संमुख आलिया संदेहो। न लगतां घावो छेदित॥ २५॥ निर्दाळूनि आळसासी। दासी केलें निद्रेसी। ऐसें सावधान अहर्निशीं। योगदुर्गासी झोंबती॥ २६॥ रणरंगींचे वीर गाढे। निजबळें चालिले पुढें। सत्रावीचें पाणीयाडें। जिंतिलें रोकडें महावीरीं॥ २७॥ तेथ युद्ध झालें चांग। कामादिक अरिषड्वर्ग। रणीं पाडिले अमोघ। सतेज खड्ग झळकत॥ २८॥ ऐसे वैरी पाडूनि रणीं। प्राशिलें सत्रावीचें पाणी। तंव अनुहताची सुडावणी। दुर्गामधोनिऊठली॥ २९॥ तेथ सोहंवीराची एकाग्रता। होतां भीतरील भेदु आला हाता। दुर्गराखती अहंममता। मरों सर्वथा टेंकली॥ १३०॥
यस्मिन्मनो लब्धपदं यदैत-
च्छनै: शनैर्मुञ्चति कर्मरेणून्।
सत्त्वेन वृद्धेन रजस्तमश्च
विधूय निर्वाणमुपैत्यनिन्धनम्॥ १२॥
कामक्रोधादि महाशूर। पुत्र रणीं पडले थोर। तेणें दु:खें अतिजर्जर। मरणतत्पर दिसताति॥ ३१॥ ऐसी ऐकोनि दुर्गाची वार्ता। उल्हासु वीरांचिया चित्ता। उठावा दीधला मागुता। दुर्ग सर्वथा घ्यावया॥ ३२॥ निजधैर्ये वीर अदट। निजसत्त्वें अतिउद्भट। पुढें निर्धारितां वाट। थोर अचाट देखिलें॥ ३३॥ कर्मरेणूंचे दुर्धर घाट। विधिवादें अवघड वाट। हळूहळू उल्लंघितां अचाट। समूळ सपाट तो केला॥ ३४॥ पुढां रजतमाचें आगड। खोलपणें अत्यंत गूढ। घालूनि निवृत्तीचे दगड। सत्त्वें सुदृढ बूजिलें॥ ३५॥ सांचलू नव्हतां बाहेरी। जिणोनि मनकर्णिकावोवरी। माळ* नचढविली ब्रह्मगिरी। ब्रह्मरंध्रीं उसळले॥ ३६॥ तेथ चैताची एक घायी। अनुहत निशाण लागलेंपाहीं। शोधितां पारखें कोणी नाहीं। केलें ठायीं स्ववश॥ ३७॥ तेथ रजतमाच्या वाटा। सहजें झाल्या सपाटा। हरिखें रामराज्याचा चोहटा। धेंडे दारवंटा पीटिले॥ ३८॥ पारिखें कोणी न पडे दृष्टी। ध्यानखड्गाची सोडिली मुष्टी। वैराग्यकवचाचिया गांठी। समदृष्टीं सोडिल्या॥ ३९॥ ध्येय ध्यान ध्याता। त्रिपुटी न दिसे पाहतां। ध्यानखड्ग तत्त्वतां। न धरी सर्वथा या हेतू॥ १४०॥ दारुण युद्धसामग्री। सत्त्वें केली होती भारी। ते साधने सांडिलीं दुरी। कोणी वैरी असेना॥ ४१॥ तन्मयतेचें छत्र धरूनी। समसाम्यसिंहासनीं। बैसला सहज समाधानी। त्यागी वोंवाळुनी जीवभावो॥ ४२॥ शोधित वाढला सत्त्वगुण। तेणें सर्वस्वें केलें निंबलोण। पायां लागोनि आपण। स्वयें जाण उपरमला॥ ४३॥ जैसा अग्नि असे काष्ठांच्या मेळीं। मंथिल्या काष्ठाची करी होळी। काष्ठ नाशूनि तत्काळीं। त्यजूनि इंगळीं उपशमे॥ ४४॥ तैसें वाढोनि सत्त्व उत्तम। नाशूनि सांडी रजतम। पाठीं सत्त्वाचाही संभ्रम। स्वयें उपरम पावला॥ ४५॥ तेथें निमालें जीवाचें जीवपण। ज्ञातृत्वेंसीं निमालें ज्ञान। निमालें प्रपंचाचें भान। चिन्मात्र पूर्ण कोंदलें॥ ४६॥
* ‘माळ’ (चढविणें) म्ह० किल्ला चढून जावयाच्या उपयोगाकरितां केलेली ‘दोराची शिडी’ लावणें (म. श. को.)
तदैवमात्मन्यवरुद्धचित्तो
न वेद किञ्चिद्बहिरन्तरं वा।
यथेषुकारो नृपतिं व्रजन्त-
मिषौ गतात्मा न ददर्श पार्श्वे॥ १३॥
ऐसी चिन्मात्र परिपूर्णता। तेथ निरोधूनि आणितां चित्ता। चित्ता पावे चैतन्यता। जाण सर्वथा नरवीरा॥ ४७॥ तेव्हां अंतरीं चैतन्यघन। बाह्य चिन्मात्र परिपूर्ण। आणिक न दिसे गा जाण। वृत्तीनें आण वाहिली॥ ४८॥ पाहतां ध्येय ध्याता ध्यान। जेथ उल्हासें विगुंतलें मन। ते ‘संप्रज्ञातसमाधी’ जाण। गुणेंवीण भोगिती॥ ४९॥ तेथ नि:शेष समरसे मन। झाला सुखरूप चिद्घन। ते समाधी परम कारण। विचक्षण बोलती॥ १५०॥ ब्रह्म इंद्रियां गोचर नसे। गुण गेलिया डोळां दिसे। हे अनुभव्यासीचि भासे। बोलावें ऐसें तें नव्हे॥ ५१॥ येथ शास्त्रें विषम झालीं वादें। ‘नेति नेति’ म्हणितलें वेदें। थोटावलीं योगिवृंदें। अनुभवी निजबोधें जाणती॥ ५२॥ तेथ हेतु-मातु-दृष्टांतु। समूळ बुडाला समस्तु। अद्वैतवादाची मातु। ज्या ठायांतु लाजिली॥ ५३॥ सबाह्य समदर्शन। हे अनुभवाची निर्वाणखूण। ‘शरकार’ गुरु केला जाण। हेंचि लक्षण लक्षूनि॥ ५४॥ तावूनि उजू करितां बाण। दृढ लागलें अनुसंधान। इतुकेन प्रपंचाचें भान। खुंटलें जाण तयाचें॥ ५५॥ निशाण भेरी वाजंतरें। रथ गज सैन्य संभारें। राजा गेला अतिगजरें। नेणिजे शरकारें शरदृष्टीं॥ ५६॥ मागूनि रायाचा हडपी आला। तो पुसे ये मार्गी राजा गेला। येरू म्हणे नाहीं देखिला। गेला कीं न गेला कोण जाणे॥ ५७॥ तो शरकारू देखिला दृष्टीं। हे ऐकोनि तयाची गोष्टी। जगीं एकाग्रता मोठी। प्रपंच दृष्टीं येवों नेदी॥ ५८॥ हेंचि साधावया साधन। गृहारंभेंवीण एकपण। ‘सर्प’ गुरु केला जाण। हेंचि लक्षण देखोनि॥ ५९॥
एकचार्यनिकेत: स्यादप्रमत्तो गुहाशय:।
अलक्ष्यमाण आचारैर्मुनिरेकोऽल्पभाषण:॥ १४॥
सर्प सांघातु न साहे। एकाकी सुखें विचरत जाये। सदा सावधान राहे। श्वासु वाये जावों नेदी॥ १६०॥ तैसीच योगियाची गती। न साहे द्वैताची संगती। एकाकी वसे एकांतीं। जनाप्रती अलक्ष्य॥ ६१॥ विषमाचा संगु न करी। परी समाचाही संगु न धरी। निघे देह संगाबाहेरी। त्वचेचे परी सर्पाचे॥ ६२॥ सदा सावधानबुद्धी। लवनिमेष वायां जावों नेदी। अनुसंधान त्रिशुद्धी। तुटोंनेदी सर्वथा॥ ६३॥ सर्प बिळामाजीं रिघें बळें। मार्गीं मागू देखती सकळें। धाला भुकेला हें त्यां न कळे। गेला कळे सर्वांसी॥ ६४॥ तैसाचि योगियाही योगबळें। न राहे जनांमाजीं जनमेळें। गुहेमाजीं पडिला लोळे। एकला खेळे एकपणीं॥ ६५॥ हो का योगियांचा आचार। करितां देखती लहान थोर। सविकल्पनिर्विकल्प विचार। न कळे साचार कोणासी॥ ६६॥ एक म्हणती कर्मठ। एक म्हणती कर्मभ्रष्ट। एक म्हणती आत्मनिष्ठ। कळेना स्पष्ट कोणासी॥ ६७॥ सर्पास बोलणेंचि नाहीं। बोले तरी अल्प कांहीं। तैसाच योगिया पाहीं। वाग्वादीं नाहीं सादर॥ ६८॥ आंतुले कृपेचेनि बळें। बोले मृदु मंजुळ कोंवळें। श्रवणासी दोंदें एकवेळे। तेणें वचनमेळें निघालीं॥ ६९॥ बोलणें तरी अतिअल्प। परी छेदी संकल्पविकल्प। त्याच्या बोलाचें स्वरूप। सत्यसंकल्प जाणती॥ १७०॥ जो एकाकी उदास। ज्याचें परमाथीं मानस। तेणें गृहारंभाची आस। वृथा प्रयास न करावे॥ ७१॥
गृहारम्भोऽतिदु:खाय विफलश्चाध्रुवात्मन:।
सर्प: परकृतं वेश्म प्रविश्य सुखमेधते॥ १५॥
मूळीं गृहांरभ तें दु:ख। कष्ट करितां दु:खकारक। निपजविलें त्रिमाळिक। तें अध्रुव देख सर्वथा॥ ७२॥ जेथें संसारचि नाशवंत। देह प्रत्यक्षाकारें असंत। तेथींचें गृह काय शाश्वत। मूर्खमानित सत्यत्वें॥ ७३॥ जें गर्भीच निमालें। तें उपजतां जातक केलें। मृताचें जन्मनांव ठेविलें। तैसें गृह केलें असंत॥ ७४॥ तोही असंतु आरंभ कुडा। मृत्तिकेसाठीं लावी झगडा। भांडवी दगडासाठीं कां लांकुडा। सुहृदभिडा सांडोनि॥ ७५॥ वोळंबा घर करी सायासें। त्यामाजीं सर्प राहे सावकाशें। न शिणतां अप्रयासें। परघरवासें संतुष्ट॥ ७६॥ तैसाचि योगियाही जाण। न धरी देहगेह अभिमान। परगृहीं वसे निरभिमान। सुखसंपन्न सर्वदा॥ ७७॥ एकही गृह न करावें। हें सत्य मानिलें जीवें। एवढी सृष्टि केली देवें। बाधुं न पवे त्या केवीं॥ ७८॥ सृष्टि रचिली कैसेनी। निपजली कोणापासूनी। येचि अर्थी गुरु कांतिणी। लक्षण लक्षुनी म्यां केली॥ ७९॥
एको नारायणो देव: पूर्वसृष्टं स्वमायया।
संहृत्य कालकलया कल्पान्त इदमीश्वर:॥ १६॥
नरांचे आश्रयस्थान। यालागीं बोलिजे ‘नारायण’। जीवाचें तोचि जीवन। स्वामी नारायण सर्वांचा॥ १८०॥ ऐसा एक नारायण। तेणें पूर्वी जग सृजिलें जाण। उपकरणसामग्रीवीण। केलें निर्माण जगाचें॥ ८१॥ एकलेनि सामग्रीवीण। केवीं केलें जग संपूर्ण। स्वमायाक्षोभवूनि जाण। करी निर्माण जगाचें॥ ८२॥ ते निजमायेच्या पोटीं। असंख्य जीवसामग्रीच्या कोटी। ते माया अवलोकिली दृष्टीं। तोचि उठाउठी निजकाळु॥ ८३॥ ऐसी निजमाया अवलोकिली। ते निजांगावरी नांदविली। परी अंगीं लागों नाहीं दिधली। हे अलिप्तता केली तो जाणे॥ ८४॥ धुई दाटली आकाशीं। आकाश नातळे धुईसी। तैसी निजांगे वाढवूनि मायेसी। अलिप्त तियेसी वर्ततु॥ ८५॥ उदकें कमळिणी वाढविली। ते जळ आवरी निजदळीं। तैसी माया आनंद आकळी। चित्सत्ता मोकळी सदंशेंसीं॥ ८६॥ स्वमायेसी जो अधिष्ठान। मायेसी नांदावया तोचि भुवन। एवंमायानियंता नारायण। सत्य जाण सर्वथा॥ ८७॥ रजोगुण सृजी सृष्टीसी। सत्त्वगुण प्रतिपाळीतिसी। कल्पांतीं क्षोभवोनि तमोगुणासी। काळरूपेंसीं संहारी॥ ८८॥ हे मायेची क्षोभक शक्ती। असे नारायणाचे हातीं। यालागीं संहारिता अंतीं। ईश्वरु म्हणती या हेतू॥ ८९॥
एक एवाद्वितीयोऽभूदात्माधारोऽखिलाश्रय:।
कालेनात्मानुभावेन साम्यं नीतासु शक्तिषु।
सत्त्वादिष्वादिपुरुष: प्रधानपुरुषेश्वर:॥ १७॥
परावराणां परम आस्ते कैवल्यसंज्ञित:।
केवलानुभवानन्दसन्दोहो निरुपाधिक:॥ १८॥
एवं संहारोनि कार्यकारण। एक अद्वितीय नारायण। एकापणें परिपूर्ण। गुणागुण निरसोनि॥ १९०॥ एकला एकु नारायण। हेंही तेथ म्हणे कोण। हें अद्वितीय लक्षण। भेदशून्य अवस्था॥ ९१॥ ‘विजातीयभेद’ ते ठायीं। नसे ‘सजातीयभेद’ कांहीं। ‘स्वगतभेदु’ तोही नाहीं। भेदशून्य पाहीं ये रीतीं॥ ९२॥ ऐसा अभेदु जो साचारु। तोचि प्रकृतिपुरुषांचा ईश्वरु। नियंता तो परावरु। तोहि निर्धारु परियेसीं॥ ९३॥ प्रकृति पुरुष हे दोन्ही। कल्पिलीं जेणें अमन-मनीं। तो ईश्वर होय भरंवसेनी। त्याचे सामर्थ्येंकरूनि वर्तती॥ ९४॥ प्रकृतीतें चेतविती सत्ता। तेचि याची पुरुषता। यालागीं प्रकृतीचा भर्ता। होय सर्वथा हाचि एकु॥ ९५॥ ‘पर’ जे अज-प्रमुख। ‘अवर’ मनुमुख्य स्थावरांतक। यांचा नियंता तो देख। सर्वचाळक सर्वांचा॥ ९६॥ ज्याचे आज्ञेवरी पाहें। सैरा वायु जाऊं न लाहे। समुद्र वेळेमाजीं राहे। सूर्य वाहे दिनमान॥ ९७॥ ज्याची आज्ञा करूनि प्रमाण। बारा अंगुळें विचरे प्राण। परता जाऊं न शके जाण। आज्ञेभेणें सर्वथा॥ ९८॥ आज्ञा जाणोनि धडफुडी। मेरु बैसका न सोडी। चेतना आज्ञा करी गाढी। अचेतन कुडी चेतवी॥ ९९॥ तो स्वयें तंव निराधार। परी झाला विश्वासी आधार। जेवीं सर्पाभासा दोर। दिसे साचार आश्रयो॥ २००॥ सत्त्वादिका ज्या गुणशक्ती। आवरूनि निजकाळगती। समत्वा आणिल्या स्थिती। निजप्रकृतीमाझारीं॥ १॥ तेहि प्रकृती उपरमोनी। राहिलो असे निर्गुणस्थानीं। जेवीं वट बीजीं सामावोनी। केवळपणीं राहिला॥ २॥ तैसा उपाधि गिळूनि सकळ। निरुपाधिक केवळ। जेवीं काढिलिया मंदराचळ। राहे निश्चळ क्षीराब्धी॥ ३॥ नाना अलंकार ठसे। घातलिया जेवीं मुसे। पूर्वरूप सोनें जैसें। होय तैसें केवळ॥ ४॥ नाना नक्षत्रावलोकु। निजतेजें लोपी अर्कु। तैसा उपाधि गिळूनि एकु। निरुपाधिकु उरलासे॥ ५॥ हो कां ग्रीष्माच्या अंतीं। बीजें लीन होतीं क्षितीं। तैशी लीन होऊनि प्रकृति। केवळ सुखमूर्ती उरलासे॥ ६॥ ऐसा निरुपाधिक केवळ। सुखस्वरूपानंदकल्लोळ। चिन्मात्रतेजें बहळ। नित्यनिर्मळ सदंशें॥ ७॥ तेणें ज्ञानस्वरूपें अनंतें। सृजनकाळ अवस्थेतें। सृजिता झाला सृष्टीतें। तेंही निरुतें अवधारीं॥ ८॥
केवलात्मानुभावेन स्वमायां त्रिगुणात्मिकाम्।
संक्षोभयन् सृजत्यादौ तया सूत्रमरिन्दम॥ १९॥
तामाहुस्त्रिगुणव्यक्तिं सृजन्तीं विश्वतोमुखम्।
यस्मिन्प्रोतमिदं विश्वं येन संसरते पुमान्॥ २०॥
तेणें निजात्मकाळसत्तें। अवलोकिलें निजमायेतें। ते क्षोभोनियां तेथें। निजसूत्रातें उपजवी॥ ९॥ तेचि बोलिली ‘क्रियाशक्ती’। करिती झाली त्रिगुणव्यक्ती। अहंकारद्वारा सृजीति। जगउत्पत्तीतें मूळ॥ २१०॥ तेथें गुणागुणविभाग। सुर नर आणि पन्नग। अध ऊर्ध्व मध्यभाग। रचिलें जग तत्काल॥ ११॥ ब्रह्मांडीं सूत्र जाण। पिंडू वर्तवी प्राण। पिंडब्रह्मांडविंदान। कर्त्री जाण ‘क्रियाशक्ति’॥ १२॥ जीव करावया संसारी। षड्विकार वाढवी शरीरीं। षडूर्मी त्यामाझारीं। जीव संसारीं संचरवी॥ १३॥ एवढी संसारउत्पत्ती। करावया इची व्युत्पत्ती। यालागीं नांवें ‘क्रियाशक्ती’। सांख्यसंमतीं बोलिजे॥ १४॥ या क्रियाशक्तिसूत्राचे ठायीं। जग ओतिलें असेपाहीं। आडवेतिडवे ठायींचे ठायीं। गोंवून लवलाहीं वाढत॥ १५॥ दृढबंध देहाभिमाना। देऊन संसारी करी जना। उपजवी अनिवार वासना। योनीं नाना जन्मवी॥ १६॥ पित्याचेनि रेतमेळें। रजस्वलेचेनि रुधिरबळें। उकडतां जठराग्निज्वाळें। बहुकाळे गोठलें॥ १७॥ तेथ निघाले अवयवांकुर। करचरणादिक लहान थोर। देह झाला जी साकार। तरी अपार यातना॥ १८॥ जठरीं गर्भाची उकडतां उंडी। नाना दु:खांची होय पेंडी। रिघे विष्ठा कृमी नाकींतोंडी। तेणें मस्तक झाडी पुरे पुरे॥ १९॥ थोर गर्भींची वेदना। आठवितां थरकांपु मना। भगद्वारें जन्म जाणा। परम यातना जीवासी॥ २२०॥ ऐसें जन्मवूनि जनीं। घाली स्वर्गाच्या बंदीखानीं। कां पचती अध:पतनीं। देहाभिमानेंकरूनियां॥ २१॥ ऐसी सुखदु:खांची कडी। घालोनि त्रिगुणीं दृढ बेडी। भोगवी दु:खांच्या कोडी। तरी न सोडी अविद्या॥ २२॥ हा थोर मायेचा खटाटोपु। राया तुज नाहींभयकंपु। तुवां दृढ धरोनि अनुतापु। अभिमानदर्पु छेदिला॥ २३॥ तुझी पालटली दिसे स्थिती। हृदयीं प्रगटली चिच्छक्ती। मावळली अविद्येची राती। बोधगभस्ति उगवला॥ २४॥ जेथ छेदिला अभिमान। तेथें कामादि वैरी निमाले जाण। जेवीं शिर छेदिल्या करचरण। सहजें जाण निमाले॥ २५॥ यापरी तूं ‘अरिमर्दन’। बोलिलों तें सत्य जाण। ऐकोनि अवधूतवचन। सुखसंपन्न नृप झाला॥ २६॥ म्हणे धन्य धन्य मी सनाथ। मस्तकीं ठेविला हस्त। प्रेमें वोसंडला अवधूत। हृदयीं हृदयांत आलिंगी॥ २७॥ दोघां निजात्मबोधें जाहली भेटी। यालागीं खेवा पडली मिठी। तेणें आनंदें वोसंडे सृष्टी। सभाग्यां भेटी सद्गुरूसी॥ २८॥ बालका कीजेति सोहळे। तेणें निवती जननीचे डोळे। शिष्यासी निजबोधु आकळे। ते सुखसोहळे सद्गुरूसी॥ २९॥ करितां दोघांसीसंवादु। वोसंडला परमानंदु। पुढील कथेचा संवादु। अतिविशदु सांगत॥ २३०॥
यथोर्णनाभिर्हृदयादूर्णां सन्तत्य वक्त्रत:।
तया विहृत्य भूयस्तां ग्रसत्येवं महेश्वर:॥ २१॥
‘ऊर्णनाभि’ म्हणजे कांतिणी। हृदयतंतु मुखेंकरूनी। विस्तारी बाहेर काढूनी। निजगुणीं स्वभावे॥ ३१॥ त्या विस्तारिल्या तंतूंवरी। तळीं आणि उपरी। आपणचि क्रीडा करी। नानापरी स्वलीला॥ ३२॥ तंतुविस्तारें खेळती लीला। प्रत्यक्ष देखतांचि डोळां। ग्रासूनि ने हृदयकमळा। अद्वैतकळा दाखवी॥ ३३॥ याचि रीतीं सर्वेश्वरु। एकला रची संसारु। अंतीं करूनि संहारु। उरे निर्विकारु निजात्मा॥ ३४॥ या लक्षणाचा निर्धारु। धरूनि ऊर्णनाभी केला गुरु। आतांसारूप्यतेचा विचारु। पेशस्कारु गुरु म्यां केला॥ ३५॥
यत्र यत्र मनो देही धारयेत् सकलं धिया।
स्नेहाद् द्वेषाद् भयाद्वापि याति तत्तत्सरूपताम्॥ २२॥
काया वाचा आणि मन। पुरुषें एकाग्र करून। जे जे वस्तूचें करी ध्यान। तद्रूप जाण तो होय॥ ३६॥ स्नेहें द्वेषें अथवा भयें। दृढ ध्यान जेणें होय। तेणेंचि तद्रूपता लाहे। उभवूनि बाहे सांगतु॥ ३७॥ देह गेलिया तद्रूपता। होईल हें वचन वृथा। येणेंचि देहें येथ असतां। तद्रूपता पाविजे॥ ३८॥
कीट: पेशस्कृतं ध्यायन् कुडॺां तेन प्रवेशित:।
याति तत्सात्मतां राजन् पूर्वरूपमसंत्यजन्॥ २३॥
भिंगुरटी कीटकीतें धरी। कोंडी भिंतीमाजिले घरीं। ते मरणभयें ध्यान करी। निरंतरीं भ्रमरीचें॥ ३९॥ तेणें तीव्रध्यानें ती कीटी। होऊनि ठाके भिंगुरटी। गगनीं चढे उठाउठी। प्रत्यक्षदृष्टीं देखिजे॥ २४०॥ भिंगुरटी जड असंत। मूढ कीटी तिचें ध्यान करीत। तेणें तद्रूपता प्राप्त। तैसा भगवंत तंव नव्हे॥ ४१॥ तो अजड चिद्रूप सुखदाता। ज्ञाता अधिकारी ध्यान करिता। तेथ तद्रूपता पावतां। विलंबू सर्वथा पैं नाहीं॥ ४२॥ कीटकीस भ्रमरत्व जोडे। हें ‘तीव्रध्यानें’ न घडतें घडे। विचारितां दोन्ही मूढें। जड जडें वेधिलें॥ ४३॥ भगवद्धॺान नव्हे तैसें। ध्याता भगवद्रूपचि असे। ध्याने भ्रममात्र नासे। अनायासें तद्रूप॥ ४४॥ येणें देहें याचि वृत्तीं। आपुली आपण न जाणे मुक्ती। नेघवे भगवत्पदप्राप्ती। तैं वृथा व्युत्पत्ती नरदेहीं॥ ४५॥ वृथा त्याचें ज्ञान ध्यान। वृथा त्याचें यजन याजन। वृथा त्याचें धर्माचरण। चैतन्यघन जरी नोहे॥ ४६॥
एवं गुरुभ्य एतेभ्य एषा मे शिक्षिता मति:।
स्वात्मोपशिक्षितां बुद्धिं शृणु मे वदत: प्रभो॥ २४॥
अवधूत म्हणे यदूसी। इतुकिया गुरूंपाशीं। मी शिकलों जें जें मतीशीं। तें तुजपाशीं सांगितलें॥ ४७॥ निजबुद्धीचिया व्युत्पत्ती। कांहींएक शिकलों युक्ती। तेंही सांगेन तुजप्रती। अनन्यप्रीती-स्वभावे॥ ४८॥ चोवीस गुरूंचाही गुरु। विवेकवैराग्यविचारु। हा नरदेहीं लाधे सधरु। यालागीं मुख्य गुरु नरदेहो॥ ४९॥
देहो गुरुर्मम विरक्तिविवेकहेतु-
र्बिभ्रत् स्म सत्त्वनिधनं सततार्त्युदर्कम्।
तत्त्वान्यनेन विमृशामि यथा तथापि
पारक्यमित्यवसितो विचराम्यसङ्ग:॥ २५॥
देहासी जें गुरुत्व जाणा। तें दों प्रकारीं विचक्षणा। सांगेन त्याच्या लक्षणा। संरक्षणा परमार्था॥ २५०॥ देहाऐसें वोखटें। पृथ्वीमाजीं नाहीं कोठें। देहाऐसें गोमटें। पाहतां न भेटे त्रिलोकीं॥ ५१॥ वोखटें म्हणोनि त्यागावें। तैं मोक्षसुखासी नागवावें। हो कां गोमटें म्हणोनि भोगावें। तैं अवश्य जावें नरकासी॥ ५२॥ तरी हें त्यागावें ना भोगावें। मध्यभागें विभागावें। आत्मसाधनीं राखावें। निजस्वभावें हितालागीं॥ ५३॥ जैसें भाडियाचें घोंडें। आसक्ति सांडोनि पुढें। पेणेंवरी नेणें घडे। स्वार्थचाडेलागूनि॥ ५४॥ हेतू ठेवूनि परमार्था। गेहीं वस्तीकरू जेवीं उखिता। देहआसक्तीची कथा। बुद्धीच्या पंथा येवों नेदी॥ ५५॥ देहाची नश्वर गती। नश्वरत्वें उपजे विरक्ती। नाशवंताची आसक्ती। मुमुक्षु न करिती सर्वथा॥ ५६॥ जेणें उपजे विरक्ती। तो विवेक जाणावा निश्चितीं। एवं विवेकवैराग्यप्राप्ती। निजयुक्तीं नरदेहीं॥ ५७॥ इतर देहांच्या ठायीं। हा विचारूचि नाहीं। केवळ शिश्नोदर पाहीं। व्यवसावो देहीं करिताति॥ ५८॥ यालागीं नरदेह निधान। जेणें ब्रह्मसायुज्यीं घडे गमन। देव वांच्छिती मनुष्यपण। देवाचें स्तवन नरदेहा॥ ५९॥ म्हणसी नरदेह पावन। परी तो अत्यंत निंद्य जाण। योनिद्वारें ज्याचें जनन। पाठींच मरण लागलेंसे॥ २६०॥ जंव जन्मलेंचि नाहीं। तंव मरण लागलें पाहीं। गर्भाच्याचि ठायीं। मरणघायीं धाकती॥ ६१॥ एवं या देहासरिसा। नित्य मृत्यु लागला कैसा। पोषूनियां बालवयसा। तारुण्यासरिसा लागला॥ ६२॥ विसरोनियां आत्ममरण। तारुण्य चढलें जी दारुण। चतुर शाहणा सज्ञान। बळें संपूर्ण मी एकु॥ ६३॥ त्या तारुण्याची नवाळी। देंठ न फेडितां काळ गिळी। मग जरा जर्जरित मेळी। मरणकाळीं पातली॥ ६४॥ धवलचामरेंसीं आलें जाण। जरा मृत्यूचें प्रस्थान। मागूनि यावया आपण। वेळा निरीक्षण करीतसे॥ ६५॥ सर्वांगीं कंपायमान। तो आला मृत्युव्यजन। मान कांपे तो जाण। डोल्हारा पूर्ण मृत्यूचा॥ ६६॥ दांत पाडूनि सपाट। काळें मोकळी केली वाट। मृत्युसेनेचा घडघडाट। वेगीं उद्भट रिघावया॥ ६७॥ पाठी झाली दुणी। तेचि मृत्यूची निशाणी। दोनी कानीं खिळे देउनी। सुबद्ध करूनि बांधिली॥ ६८॥ येतिया मृत्यूसी पुढारें। नयनतेज धांवे सामोरें। मग न्याहाळतीना अक्षरें। अंजनोपचारें शिणतांही॥ ६९॥ उभळीचा उजगरा। उबगु सेजारिल्या घरा। म्हणती न मरे हा म्हातारा। बाळाची निद्रा मोडितो॥ २७०॥ देखोनि मृत्यूची धाडी। पायां वळतसे वेंगडी। जिव्हेसी चालली बोबडी। तुटल्या नाडी सर्वांगीं॥ ७१॥ मरण न येतां जाण। थोर जरेचें विटंबन। विमुख स्त्रीपुत्रजन। अतिदीन ते करी॥ ७२॥ जन्मवरी सायासीं। प्रतिपाळिलें जयांसी। तींचि उबगलीं त्यासी। जरेनें देहासी कवळिल्या॥ ७३॥ जरा लागलिया पाठीं। कोणी नाइके त्याची गोष्टी। विटावों लागलीं धाकुटीं। कुतरीं पाठीं भुंकती॥ ७४॥ शाहणीं सांगती अबलांसी। ‘बागुल’ आला म्हणती वृद्धासी। निसुर पडों नेदी ढांसी। कासाविसी होतसे॥ ७५॥ ‘म्हातारा हो’ हा आशीर्वाद। दीधला तेहीं केलें द्वंद्व। जरे एवढें विरुद्ध। आणि द्वंद्व तें नाहीं॥ ७६॥ ऐसी जरेची जाचणी। देखोनियां तरुणपणीं। हेचि दशा मजलागूनी। हात धरूनि येईल॥ ७७॥ देहो तितुका षड्विकारी। कोटि अनर्थ एकेके विकारीं। षडूर्मी लागल्या त्या भीतरी। जेवीं अग्नीवरी घृतधारा॥ ७८॥ या दु:खाचें जें मूळ। तें देहाचें आळवाळ। देहो वाढवितां दु:ख प्रबळ। उत्तरफळमहादु:ख॥ ७९॥ एवं देहाची जे संगती। ते निरंतर दु:खप्राप्ती। यापरी सांडावी आसक्ती। या हेतुविरक्ती देहगुरु॥ २८०॥ या देहाचेनि साधनें। अविनाश पद पावणें। याहीपरी येणें गुणें। गुरुत्व म्हणणे देहासी॥ ८१॥ देह उपकारी अपकारी। यासी गुरुत्व दोन्हीपरी। येथ विवंचूनि चतुरीं। निजहित करी तो धन्य॥ ८२॥ करितां तत्त्वविवंचन। देहाचें मूळ तें अज्ञान। निजरूपाचें अदर्शन। तेंचि भान प्रकृतीचें॥ ८३॥ प्रकृतीस्तव त्रिगुणसूत्र। त्रिगुणीं त्रिविध अहंकार। येथूनि महद्भूतविकार। इंद्रियव्यापार देहेंसीं॥ ८४॥ एवं पिंडब्रह्मांडखटाटोप। हा अवघाचि ‘आरोप’। दोरु जाहला नाहीं साप। भ्रमें सर्पतो म्हणती॥ ८५॥ पाहतां देहाचें मूळ। भासे जैसें मृगजळ। भ्रमाची राणीव प्रबळ। हा आरोपचि केवळ वस्तूचे ठायीं॥ ८६॥ नसतें देह आभासे जेथें। ‘आरोपु’ म्हणणें घडे त्यातें। आतां सांगेन ‘अपवादाते’। सावचित्ते परियेसीं॥ ८७॥ देह पांचभौतिक प्रसिद्ध। तो ‘मी’ म्हणणें हें अबद्ध। देहो मलिन मी शुद्ध। अतिविरुद्ध या आम्हां॥ ८८॥ पृथ्वी मी नव्हे जडत्वें। जळ मी नव्हे द्रवत्वें। तेज मी नव्हें दाहकत्वें। चंचलत्वें नव्हें वायु॥ ८९॥ नभ मी नव्हे शून्यत्वें। अहं मी नव्हें दृश्यत्वें। जीव नव्हें मी परिच्छिन्नत्वें। माया मिथ्यात्वें मी नव्हें॥ २९०॥ देह नव्हें मी नश्वरत्वें। विषय नव्हे मी बाधकत्वें। या तत्त्वां आणि मातें। संबंधू येथें असेना॥ ९१॥ ‘ब्रह्माहमस्मि’ अभिमान। हंसपरमहंसांसी मान्य। तें सत्त्वावस्थेचें साधन। तोही अभिमान मी नव्हें॥ ९२॥ जितुका तत्त्वांचा अनुवादु। तितुका मजवरी ‘अपवादु’। हा माझा बुद्धीचा बोधु। तुज म्यां यदु सांगितला॥ ९३॥ हें माझें गुप्त ज्ञान। तुझें देखोनि अनन्यपण। केलें गा निरूपण। भावें संपूर्ण तूं भावार्थी॥ ९४॥ येरवीं करावया हे कथा। मज चाड नाहीं सर्वथा। परी बोलवीतसे तुझी आस्था। नृपनाथा सभाग्या॥ ९५॥ ऐशिया संवादाच्या मेळीं। अद्वैतबोधें पिटिली टाळी। दोघे आनंदकल्लोळीं। ब्रह्मसुकाळीं मातले॥ ९६॥ ऐसा उपकारी देखा। या देहासारिखा नाहीं सखा। म्हणसी राखावा नेटका। तंव तो पारका मुळींचि॥ ९७॥ यासी अत्यंतकरितां जतन। दिसे विपरीत निदान। श्वानशृगालांचें भोजन। कां होय भक्षण अग्नीचें॥ ९८॥ या दोंही गतींवेगळें पडे। तरी सुळबुळीत होती किडे। चौथी अवस्था यासी न घडे। हें तूंही रोकडें जाणशी॥ ९९॥ यालागीं देहाची आसक्ती। मी न धरींच गा नृपती। नि:संगु विचरतसें क्षितीं। आत्मस्थितीचेनि बोधें॥ ३००॥ देहासी उपभोगसाधनें। तितुकीं जाण पां बंधनें। दृढ वासना तेणें। अनिवारपणें वाढते॥ १॥
जायात्मजार्थपशुभृत्यगृहाप्तवर्गान्
पुष्णाति यत् प्रियचिकीर्षया वितन्वन्।
स्वान्ते सकृच्छ्रमवरुद्धधन: स देह:
सृष्ट्वास्य बीजमवसीदति वृक्षधर्मा॥ २६॥
देहभोगीं मुख्य गोडी। स्त्रीभोगाची अतिआवडी। सर्वस्व वेंचोनि जोडी। आणी रोकडी योषिता॥ २॥ स्त्री हातीं धरितां देख। वाढे प्रपंचाचें थोर दु:ख। गृह पाहिजे आवश्यक। भोगार्थ देख स्त्रियेच्या॥ ३॥ त्या गृहाचे गृहसिद्धीं। पाहिजे धनधान्यसमृद्धी। झाली प्रजांची वृद्धी। तेणें अतिआधी अनिवार॥ ४॥ त्या प्रजांचा अतिलालसु। दासदासी मेळवी पशु। थोर कष्टांचा पडे सोसु। सुखलेशु पैं नाहीं॥ ५॥ व्याही जांवयांच्या वोढी। आप्तवर्गाचिया कोडी। पडे उचिताचिया सांकडीं। सोशितां कोरडी देहाची॥ ६॥ पोसावया पोष्यांसी। रची नाना उपायराशी। हिंडे स्वदेशीं परदेशीं। अहर्निशीं व्याकुळ॥ ७॥ देहासी द्यावया सुख। शतधा वाढवी दु:ख। देहाभिमानें जनमूर्ख। वृथाभिलाख वाढविती॥ ८॥ देहसुखाचिया चाडा। पडे परिग्रहाचे खोडां। दारागृहलोभें केला वेडा। न देखे पुढां निजस्वार्थु॥ ९॥ देहें वाढविली प्रीती। गृह दारा पुत्र संपत्ती। तेचि वासना होय देहांतीं। देहांतराप्रती निजबीज॥ ३१०॥ जैसा जोंधळा कणिसा चढे। कणसींचा क्षितीवरी झडे। वाढी वाढलें झाड मोडे। तें बीज गाढें उरलेंसे॥ ११॥ तेंचि बीज जलभूमीचे संगतीं। सवेंचि झाड वाढे पुढतीं। तैसी वासना उरे देहांतीं। देहांतराप्रती न्यावया॥ १२॥ त्या वृक्षाचिया परी। वासनाबीज शरीरीं। उरवूनि स्वर्गसंसारीं। योनिद्वारीं जन्मवी॥ १३॥ देहीं वासना केवीं वाढे। तेंही सांगेन तुज पुढें। विषय सेवितां वाडेंकोडें। वासना वाढे अनिवार॥ १४॥
जिह्वैकतोऽमुमपकर्षति कर्हि तर्षा
शिश्नोऽन्यतस्त्वगुदरं श्रवणं कुतश्चित् ।
घ्राणोऽन्यतश्चपलदृक् क्व च कर्मशक्ति-
र्बह्वॺ: सपत्न्य इव गेहपतिं लुनन्ति॥ २७॥
जिव्हा रसाकडे वोढी। तृषा प्राशनालागीं तोडी। शिश्नासी रतिसुखाची गोडी। तें चरफडी रमावया॥ १५॥ त्वचा पाहे मृदुपण। उदर वांछी पूर्ण अन्न। श्रवण मागती गायन। मधुरध्वन आलापु॥ १६॥ घ्राण उद्यत परिमळा। रूप पहावया वोढी डोळा। हस्त वांछिती खेळा। नाना लीळा स्वभावें॥ १७॥ पाय वांछिती गती। ऐशीं इंद्रियें वोढा वोढिती। जेवीं एका गेहपती। बहुतां सवती तोडिती॥ १८॥ एवं इंद्रियांसी विषयासक्ती। तेणें वासना दृढ होती। त्या देहदेहांतराप्रती। पुरुषासी नेती सर्वथा॥ १९॥ यालागीं करावया विषयत्यागु। अवश्य छेदावा देहसंगु। इये अर्थी मनुष्यदेह चांगु। ज्ञानविभागु ये देहीं॥ ३२०॥
सृष्ट्वा पुराणि विविधान्यजयाऽऽत्मशक्त्या
वृक्षान् सरीसृपपशून् खगदंशमत्स्यान्।
तैस्तैरतुष्टहृदय: पुरुषं विधाय
ब्रह्मावलोकधिषणं मुदमाप देव:॥ २८॥
हेचि जाणावया निजरूपातें। पूर्वीं तेणें श्रीअनंतें। निजमायेचेनि हातें। केलीं बहुतें शरीरें॥ २१॥ एकें केलीं भूचरें। एकें तें केलीं खेचरें। एकें केली जळचरें। चरें अचरें तीं एकें॥ २२॥ वृक्ष सर्प पशु दंश। राक्षस पिशाच बक हंस। मत्स्यकच्छादि अशेष। सृजी बहुवस योनिंतें॥ २३॥ ऐशा चौऱ्यांशीं लक्ष योनी। सृजूनि पाहे परतोनी। तंव निजप्राप्तीलागोनी। न देखे कोणी अधिकारी॥ २४॥ ऐशिये देखोनि सृष्टीतें। सुख न वाटेचि देवातें। मग मानवी प्रकृतीतें। आदरें बहुतें निर्मिलें॥ २५॥ बाहुल्यें मनुष्यदेहीं। निजज्ञान घातलें पाहीं। जेणें ज्ञानें देहीं। विदेह पाहीं पावती॥ २६॥ आहार-निद्रा-भय-मैथुन। सर्वा योनींसी समसमान। मनुष्यदेहींचें ज्ञान। अधिक जाण सर्वांशीं॥ २७॥ देखोनि मनुष्यदेहासी। सुख झालें भगवंतासी। अधिकार ब्रह्मज्ञानासी। येणें देहेंसीं मत्प्राप्ती॥ २८॥ पावोनियां मनुष्यपणा। जो न साधी ब्रह्मज्ञाना। तो दाढीचा मेंढा जाणा। विषयाचरणा विचरतु॥ २९॥ मनुष्यदेहींचेनि ज्ञानें। सच्चिदानंदपदवी घेणें। एवढा अधिकार नारायणें। कृपावलोकनें दीधला॥ ३३०॥ मनुष्यदेहीं ब्रह्मज्ञान। पुढील जन्मीं मी करीन। म्हणे तो नागवला जाण। सोलींव अज्ञान त्यापासीं॥ ३१॥
लब्ध्वा सुदुर्लभमिदं बहुसम्भवान्ते
मानुष्यमर्थदमनित्यमपीह धीर:।
तूर्णं यतेत न पतेदनुमृत्यु याव-
न्नि:श्रेयसाय विषय: खलु सर्वत: स्यात्॥ २९॥
चौऱ्यांशीं लक्षयोनींप्रती। जैं कोटिकोटि फेरे होती। तैं नरदेहाची प्राप्ती। अवचटें लाहती निजभाग्यें॥ ३२॥ जो मनुष्यदेही जन्मला। तो परमार्थासी लिगटला। एवढा अलभ्य लाभ झाला। पितरीं मांडिला उत्साहो॥ ३३॥ झालिया मनुष्यदेहप्राप्ती। परमार्थ साधूं भोगाअंतीं। एवढी येथ नाहीं निश्चिती। मृत्युप्राप्ति अनिवार॥ ३४॥ मृत्यु न विचारी गुण-दोष। न म्हणे देश-विदेश। न पाहे रात्र-दिवस। करीत नाश तत्काळ॥ ३५॥ देह जैंपासोनि झाला। तैंपासूनि मृत्यु लागला। जेवीं सापें बेडूक धरिला। गिळूं लागला लवनिमिषें॥ ३६॥ साप बेडुकातें गिळी। बेडूक मुखें माशातें कवळी। तैशीं मृत्युमुखीं पडलीं। विषयभुलीं झोंबतीं॥ ३७॥ येथ आळसु जेणें केला। तो सर्वस्वें नागवला। थिता परमार्थ हातींचा गेला। आवर्ती पडला भवचक्रीं॥ ३८॥ ऐसें जाणोनि यदुराया। देहाचिया लवलाह्या। परमार्थ साधावया। ब्रह्मोपाया उद्यत व्हावें॥ ३९॥ छेदोनियां आळसासी। दवडूनियां निद्रेसी। आत्मचिंतन अहर्निशीं। अविश्रमेंसीं साधावें॥ ३४०॥ रणीं रिघालिया शूरासी। न जिणतां परचक्रासी। विसांवा नाहीं क्षत्रियांसी। तेणें वेगेंसीं साधावें॥ ४१॥ साधावया आत्मलग्न। सावधान बिजवराचें मन। तेणें साक्षेपें आपण। सायुज्यलग्न साधावें॥ ४२॥ रायाचें एकुलतें एक। चुकल्या अवचटेंबाळक। तो जेवीं शोधी सकळ लोक। तेवीं निजसुख साधावें॥ ४३॥ काळाचा चपेटघात। जंव वाजला नाहीं येथ। तंव साधावया परमार्थ। आयुष्य व्यर्थ न करावें॥ ४४॥ नरदेहींचेनि आयुष्यें। प्रपंचाचेनि आवेशें। विषयाचेनि विलासें। भोगपिसे नर झाले॥ ४५॥ पश्वादियोनींच्या ठायीं। विषयांवांचोनि आन नाहीं। तेचि विषयो नरदेहीं। वाढविल्या कायी हित झालें॥ ४६॥ विचारितां विवेकदृष्टीं। विषयांसी प्रारब्धें भेटी। वृथा करितां आटाटी। मुद्दलतुटी नरदेहा॥ ४७॥ नरदेह परम पावन। पावोनि न साधी ब्रह्मज्ञान। तो लांडा गर्दभ जाण। पुच्छेंवीण दुपायी॥ ४८॥ अपरोक्षज्ञानेंवीण वांझट। उदरार्थ दंभ खटपट। जेवीं मदिरापानी मर्कट। उडे उद्भट तडतडां॥ ४९॥ ब्रह्मज्ञानेंवीण शास्त्रज्ञ। ते अंधारींचे खद्योत जाण। अज्ञाननिशीमाजीं तेज गहन। सूर्योदयीं कोण त्यां देखे॥ ३५०॥ ब्रह्मज्ञानेंवीण संन्यासी। नटाच्या ऐसें मुंडण त्यांसी। सोकले मिष्टान्नभिक्षेसी। वृथा गेरूसी नाशिलें॥ ५१॥ मनीं विषयांचें अभिलाषण। धरूनि करिती वेदाध्ययन। ते वर्षाकाळींचे दर्दुर जाण। कर्दमपानें जल्पती॥ ५२॥ विषयप्राप्तीलागीं मौन। तें बकाचें बकध्यान। विषयबुद्धी जें गायन। तें खरी देखोन खर भुंके॥ ५३॥ विषयालागीं उपन्यास। नाना युक्तींचे विलास। जेवीं पिंड देखोनिवायस। करिती बहुवस अतिशब्द॥ ५४॥ पोट भरावया भांड। सैरा वाजविती तोंड। तैसें विषयांलागीं वितंड। शास्त्रपाखंड बोलती॥ ५५॥ विषयवासना धरूनि थोर। बाह्य मिरविती आचार। जेवीं कागाचा शौचाचार। विष्ठातत्पर मानसीं॥ ५६॥ हृदयीं धरूनि जीविका चांग। करिती अग्निहोत्रयाग। जेवीं वेश्या विकोनि अंग। चालवी साङ्ग संसारा॥ ५७॥ नरदेहींचा हाचि स्वार्थ। साधावा चौथा पुरुषार्थ। तो न करितां जो का अर्थ। तो अनर्थ जाणावा॥ ५८॥ साधीना देहीं ब्रह्मज्ञान। तो श्वानसूकरांसमान। अथवा त्याहोनि हीन। तें विवेचन परियेसीं॥ ५९॥ पशूसी हाणिल्या लाथा। द्वेष न धरी सर्वथा। मनुष्यासी ‘तूं’ म्हणतां। जीवघाता प्रवर्ते॥ ३६०॥ पशूसी लोभ नाहीं संग्रहता। एक आहार होय भक्षिता। मग उरलिया अर्था। त्यागी सर्वथा तत्काळ॥ ६१॥ मनुष्याचें लोभिष्ठपण। गांठीं असल्या कोटि धन। पोटा न खाय आपण। मा त्यागितां प्राण त्यजील॥ ६२॥ सायंप्रातर्चिंता। पशूसी नाहीं सर्वथा। मनुष्याची चिंता पाहतां। जन्मशतां न राहे॥ ६३॥ अमित धन असतां गांठीं। तरी चिंता अनिवार मोठी। नाथिलेंचि भय घे पोटीं। अविश्वासी सृष्टीं नरदेही॥ ६४॥ जरी मरोंटेंकलें शरीर। तरी व्यवहारीं साधी वृत्तिक्षेत्र। पाया शोधोनि बांधी घर। पुत्रपौत्र नांदावया॥ ६५॥ ऐसी दुस्तर चिंता। पशूसी नाहीं सर्वथा। आतां मैथुनाची कथा। ऐक तत्त्वतां सांगेन॥ ६६॥ पशूसी ऋतुकाळीं मैथुन। मग स्त्रियेसी नातळे आपण। पुरुषासी नित्य स्त्रीसेवन। गरोदरही जाण न सोडी॥ ६७॥ काम क्रोध सलोभता। चिंता निंदा अतिगर्वता। हें मनुष्याचेचि माथां। पशूसी सर्वथा असेना॥ ६८॥ न साधितां आत्मज्ञान। केवळ जे विषयी जन। ते श्वानसूकरांपरीस हीन। माणुसपण त्यां नाहीं॥ ६९॥ विषयाचें जें सुख जाण। तें स्वर्गी नरकीं समान। जें इहलोकीं भोगी श्वान। तें स्वर्गी जाण इंद्रासी॥ ३७०॥ मनुष्यदेहावांचोनी। पशुपक्ष्यादि नाना योनी। त्या विषयभोगालागोनी। विषयच्छेदनीं नरदेह॥ ७१॥ तो नरदेह कैसेनि जोडे। ते प्राप्तीचें कठिण गाढें। तें सांगेन तुजपुढें। परिस निवाडें विभागु॥ ७२॥ अत्यंत सुकृतें स्वर्गा चढे। अत्यंत पापें अधोगती घडे। पापपुण्य नि:शेष झडे। तैं आतुडे निजमुक्ति॥ ७३॥ जैं पापपुण्य समान समीं। तैं मनुष्यदेह आक्रमी। जन्म पावे कर्मभूमीं। आश्रमधर्मी सुमेधा॥ ७४॥ साक्षेपें मनुष्यदेह जोडे। ऐसें करितां तंव न घडे। अवचट हाता चढे। भाग्य चोखडें जयाचें॥ ७५॥ मोलें अनर्घ्य रत्नें येती। तैसा चिंतामणी न ये हातीं। बहुत योनिये जन्म होती। परी मनुष्यदेहप्राप्ती दुर्लभ॥ ७६॥ ऐसा नरदेह पावोनि देख। जो न साधीचि ब्रह्मसुख। तो जनांमाजीं परम मूर्ख। विश्वासघातक देवाचा॥ ७७॥ निजात्मप्राप्तीलागोनी। देवें केली मनुष्ययोनी। तो देवाचा विश्वास बुडवूनी। विषयसेवनीं निजपतन॥ ७८॥ होतें पितरांचें मनोगत। पुत्र होईल हरिभक्त। कुळ उद्धरील समस्त। विषयीं प्रतिहत तें केलें॥ ७९॥ हो का सकळ भाग्याचें फळ। मनुष्यदेह गा केवळ। तें करावया सफळ। वैराग्य अढळ म्यां केलें॥ ३८०॥
एवं सञ्जातवैराग्यो विज्ञानालोक आत्मनि।
विचरामि महीमेतां मुक्तसङ्गोऽनहङ्कृति:॥ ३०॥
देहो निजात्मसाधनीं साधक। तोचि विषयभोगीं बाधक। ऐसें देखोनियां देख। केलें निष्टंक वैराग्य॥ ८१॥ त्या वैराग्याचेनि बळें। गुरुकृपावचनमेळें। विषयइंद्रियांचे पाळे। एकेचि वेळेंविभांडिले॥ ८२॥ अविद्या जंव घ्यावी जीवें। तंव ‘अविद्या’ येणें नांवें। स्वांगें मी विद्यमान नोहे। हेंही अनुभवें जाणितलें॥ ८३॥ ऐशी मिथ्यात्वें अविद्या आतां। चित्प्रकाश पूर्ण लाभे हाता। तेणेंस्वदेहस्थ अहंता। गेली सर्वथा नि:शेष॥ ८४॥ ज्ञानसाधन जो निजदेहो। तयाच्या ठायीं वैराग्य पहा हो। मा देहसंबंधाचा स्नेहो। कैसेनि राहों शकेल॥ ८५॥ ऐसेनि अनुभवें पाहीं। नि:संग मी विचरें मही। अहंता स्वदेहीं नाहीं। पुशिलें तें पाहीं सांगितलें राया॥ ८६॥ जैं पुरुषाची अहंता गळे। तैं देह अदृष्टयोगें चळे। जेवीं सुकलें पान वायुबळें। पडिलें लोळे सर्वत्र॥ ८७॥ यालागीं ब्रह्मसाक्षात्कारा। वृत्ति लय पावे जंव वीरा। तंववरी जो वैराग्यें खरा। अभंग पुरा पुरुषार्थी तो॥ ८८॥ म्हणसी एका गुरूचे ठायीं। तुज सर्वथा विश्वास नाहीं। ये अर्थीं सावध होईं। विशद पाहीं सांगेन॥ ८९॥ गुरूनें सांगतांचि कानीं। ज्याची वृत्ति जाय विरोनी। जेवीं मिळतां लवणपाणी। अभिन्नपणीं समरसे॥ ३९०॥ केल्यासी साधकबाधकताबाध। हें बोलणें अतिअबद्ध। जेवीं निमालियासी वोखद। न पाजवे दुग्ध गर्भस्था॥ ९१॥ यापरी त्यासी कर्तव्यता। नाहीं नाहीं गा सर्वथा। परी ऐसी हे अवस्था। ज्यासी तत्त्वतां न लभेचि॥ ९२॥ गुरूनें सांगितलें कानीं। स्वरूपाबोध झाला मनीं। परी तें न राहेचि निश्चळपणीं। बाह्यदर्शनीं विक्षेपु॥ ९३॥ आसनीं बैसल्या स्वरूपस्थितीं। आसन सोडिल्या प्रपंचस्फूर्ती। ऐशी एकदेशी स्थिती। नातळती निजयोगी॥ ९४॥ देह आसनीं निश्चळ। अथवा कर्मीं हो चंचळ। परी वृत्ति सर्वदा निश्चळ। तेचि निर्मळ निजयोगी॥ ९५॥ परशुरामेंसीं रणांगणीं। भीष्म भिडला निर्वाणबाणीं। तोडरीं घातिला जिणोनी। वृत्ति समाधानीं अचंचळ॥ ९६॥ करितां निर्वाणयुद्धीं। ज्याची न मोडे समाधी। हेंचि साधावया त्रिशुद्धी। चोवीस गुरु विधीं वंदिलें म्यां॥ ९७॥ देहनिश्चळत्वें वृत्ति निश्चळ। देहचंचळत्वें वृत्ति चंचळ। तरी ते देहबुद्धीचि सबळ। नव्हे केवळ निजबोधु॥ ९८॥ होतां प्रपंचदर्शन। वृत्तीसी विक्षेप होय जाण। तो विक्षेप करावया छेदन। बहुगुरुसाधन म्यां केलें॥ ९९॥ निजगुरूंनीं सांगितल्या अर्था। त्या साधावया परमार्था। नाना प्रपंचपदार्था। गुरुसंस्था म्यां केली॥ ४००॥ जेथोनिया विक्षेपता। तेचि लाविली गुरुत्वपथा ऐसेनि साधनें साधितां। जग स्वभावतां परब्रह्म॥ १॥ पूर्वी गुरूंनीं बोधिलें नाहीं। तरी पृथ्व्यादिकें बोधितील कायी। तोचि निजार्थ साधावया पाहीं। गुरुउपायीं प्रवर्तलों॥ २॥
न ह्येकस्माद्गुरोर्ज्ञानं सुस्थिरं स्यात्सुपुष्कलम्।
ब्रह्मैतदद्वितीयं वै गीयते बहुधर्षिभि:॥ ३१॥
गुरूनें सांगितलें निजज्ञान। हृदयीं प्रकाशलें चिद्भान। तें विद्युत्प्राय चंचळ जाण। स्थैर्यपण त्या नाहीं॥ ३॥ जें मूळींचि चंचळ। तें कदा नव्हे पुष्कळ। क्षणां भासे क्षणां चपळ। तेणें तळमळ साधका॥ ४॥ जैसें मुखींचें आमिष जाये। तेणें सर्प डंवखाइला राहे। तैसी वेदना साधकां होये। वियोगु न साहे सर्वथा॥ ५॥ येरवीं ब्रह्म अद्वितीय नित्य। हें सकळ ऋषींचें संमत। त्यांसीही पुसों जातां बहुत। विक्षेप तेथ उठती॥ ६॥ एक म्हणती ब्रह्म सगुण। एक म्हणती तें निर्गुण। ऐसे वाद करिती दारुण। युक्तिखंडण अभिमानें॥ ७॥ एक म्हणती ब्रह्म सप्रपंच। एक म्हणतीनिष्प्रपंच। मिळोनियां पांचपांच। शब्दकचकच वाढविती॥ ८॥ प्रपंचदर्शनें विक्षेपता। तेथ साधावया निजऐक्यता। सुबुद्धीनें नाना पदार्था। गुणग्राहकता गुरुरूपें॥ ९॥ तेथ साधकांचे प्रश्न। सहसा न पवती समाधान। यालागीं पुसावया मन। न रिघे जाण ते ठायीं॥ ४१०॥ जेथूनि विक्षेपता वाढे। तेथेंचि ऐक्यता जोडे। तें नानागुरुत्वें रोकडें। साधन चोखडें योजिलें॥ ११॥ जीं जीं सांगितलीं गुरुलक्षणें। तीं तीं निजबुद्धीचीं साधनें। समूळ विक्षेपु तेणें। तीव्र धारणें छेदिला॥ १२॥ तेणें चंचलत्वें निश्चल। फावलें निजबोधाचें मूळ। दृश्य देखतां केवळ। भासे सकळ चिन्मात्र॥ १३॥ जें माझ्या निजगुरूंनीं। पूर्वी दिधलें होतें बोधुनी। तेंचि नाना गुरुत्वें साधूनी। विक्षेप छेदुनी पावलों॥ १४॥ निजगुरु तो एकुचि जाण। इतर गुरु साधकत्वें साधन। हें यथातथ्य लक्षण। तुज निरूपण म्यां केलें॥ १५॥ येथ प्रपंचाचें भानाभान। कर्म करितां न कळे जाण। लाधली निजबोधाची खूण। समदर्शन सर्वदा॥ १६॥ दृश्य देखतां दृष्टीं। नव्हे दृश्येंसीं भेटी। हारपली कर्मत्रिपुटी। बोधकसवटी अभिनव॥ १७॥ यथेष्ट करितां भोजन। उष्टेना निराहारलक्षण। जगेंसीं वागतां जाण। एकलेपण मोडेना॥ १८॥ तरंग सागरामाजीं क्रीडतां। न मोडे उदकाची एकात्मता। तेवीं जगामाजीं वर्ततां। दुजी वार्ता मज नाहीं॥ १९॥ नवल सद्गुरूची नवायी। सर्वी सर्व तोचि पाहीं। गुरूवेगळें रितें कांहीं। उरलें नाहीं सर्वथा॥ ४२०॥ आतां माझें जें मीपण। तें सद्गुरु झाला आपण। बोलतें तुझें जें तूंपण। तेंही जाण सद्गुरुचि॥ २१॥ याहीपरी पाहतां। माझा गुरु एक एकुलता। तेथें दुजेपणाची वार्ता। नाहीं सर्वथा यदुराया॥ २२॥ ऐशी सद्गुरुकथा। तुज सांगितली परमार्था। हरिखें आलिंगिलें नृपनाथा। दोघां ऐक्यता निजबोधें॥ २३॥ जीवीं जीवा पडली मिठी। आनंदें वोसंडली सृष्टी। तेणें वाचेसी पडली बेलवटी। बोलों उफराटी विसरली॥ २४॥ हरिखु नसांठवे हृदयभवनी। बाहेर वोसंडे स्वेदेजोनी। आनंदघन वोळला नयनीं। स्वानंदजीवनीं वर्षतु॥ २५॥ तुटली अहंकाराची बेडी। पावलों भवार्णवपरथडी। म्हणौनि रोमांची उभविली गुढी। जिंतिलीगाढी अविद्या॥ २६॥ समूळ देह भावो पळाला। यालागीें गात्रकंपु चळचळा। संकल्पविकल्प निमाला। मनेंसीं बुडाला मनोरथु॥ २७॥ जीवभावो उखिता। यदूनें अर्पिला गुरुनाथा। तें चिह्नबाहेरीं तत्त्वतां। दावी सर्वथा निजांगीं॥ २८॥ तो अवधूत जाण दत्तात्रेया। तेणें आलिंगूनि यदुराया। निजरूपाचा बोधु तया। अनुभवावया दीधला॥ २९॥ दत्तात्रेयशिष्यपरंपरा। सहस्रार्जुनयदु दुसरा। तेणें जनार्दनु तिसरा। शिष्य केला खरा कलियुगीं॥ ४३०॥ गुरुप्राप्तीलागीं सर्वथा।थोर जनार्दनासी चिंता। विसरला तिन्ही अवस्था। सद्गुरु चिंतितां चिंतनीं॥ ३१॥ देवो भावाचा भोक्ता। दृढ जाणोनि अवस्था। येणें जाहलें श्रीदत्ता। तेणें हातु माथां ठेविला॥ ३२॥ हातु ठेवितांचि तत्काळ। बोधु आकळिला सकळ। मिथ्या प्रपंचाचें मूळ। स्वरूप केवळ स्वबोधें॥ ३३॥ कर्म करूनि अकर्ता। तोचि अकर्तात्मबोधु जाहला देता। देहीं असोनि विदेहता। तेही तत्त्वतां आकळिली॥ ३४॥ गृहाश्रमु न सांडितां। कर्मरेखा नोलांडितां। निजव्यापारीं वर्ततां। बोधु सर्वथा न मैळे॥ ३५॥ तो बोधु आकळतां मना। मन मुकलें मनपणा। अवस्था नावरेचि जनार्दना। मूर्च्छापन्न पडियेला॥ ३६॥ त्यासी सावध करूनि तत्त्वतां। म्हणे प्रेमा आहे सत्त्वावस्था। तोही गिळोनि सर्वथा। होयीं वर्तता निजबोधें॥ ३७॥ पूजाविधी करोनियां। जंव जनार्दनु लागला पायां। तंव अदृश्य जाहला दत्तात्रेया। योगमायाचेनि योगें॥ ३८॥ कथेसी फांकलों सर्वथा। तो कोपु न मनावा श्रोतां। प्रसंगें गुरुविवंचना होतां। मीही गुरुकथा बोलिलों॥ ३९॥ मज तंव चुकी पडिली मोठी। चुकूनि सांगितली गुरुगोठी। तेही संस्कृत नव्हे मराठी। वृथा चावटी न म्हणावी॥ ४४०॥ जो असेल गुरुभक्त। तो हें जाणेल मनोगत। जो गुरुस्मरणीं सदोदित। त्यासी हें हृद्गत कळेल॥ ४१॥ ज्यांसी गुरुचरणीं श्रद्धा गाढी। ज्यांसी गुरुभजनीं अतिआवडी। जिंहीं गुरुप्रेम जोडिलें जोडी। हे गोडी जाणती॥ ४२॥ ज्या सद्गुरूचें नांव घेतां। चारी मुक्ती वोडविती माथा। मुक्ति नावडे गुरुभक्तां। नित्यमुक्तता गुरुचरणीं॥ ४३॥ ज्याचें घेतां चरणतीर्थ। चारी मुक्ती पवित्र होत। पायां लागती पुरुषार्थ। धन्य गुरुभक्त त्रिलोकीं॥ ४४॥ चैतन्य नित्य निराधार। निर्धर्मक निर्विकार। त्याचा केला जीर्णोद्धार। सत्य साचार जगद्गुरु॥ ४५॥ सद्गुरुकृपा नव्हतां। नव्हती देवाचीकथावार्ता। देवासी देवपणीं स्थापिता। सत्य सर्वथा सद्गुरु॥ ४६॥ सद्गुरु कृपेवीण पाहीं। देवो असतुचि झाला होता नाहीं। त्यासी देवपणीं ठेवूनि ठायीं। भजविता पाहीं गुरुरावो॥ ४७॥ त्या सद्गुरूची कथा। चुकोनि झालों बोलता। थोर अपराधु हा माझे माथां। क्षमा श्रोतां करावी॥ ४८॥ वृथा बोलिलों नाहीं जाण। झालें बोलावया कारण। दत्तात्रेयशिष्यकथन। करितां जनार्दनआठवला॥ ४९॥ मी जरी नाठवीं जनार्दनासी। परी तो विसरों नेदीच आपणासी। हटें देतुसे आठवणेंसी। अहर्निशीं सर्वदा॥ ४५०॥ जिकडे मी विसरों जायें। तिकडेचि तो येऊनि राहे। मी जरी त्याजकडे न पाहें। तें न पाहणें होये तो माझें॥ ५१॥ घटु सांडूं पाहे आकाशासी। तंवआकाश न सांडी घटासी। तेवीं जनार्दनु आम्हांसी। अहर्निशीं लागला॥ ५२॥ मी न करीं त्याची कथा। तंव तोचि होये मुखीं वक्ता। ऐसेंनि बलात्कारें बोलविता। काय म्यां आतां करावें॥ ५३॥ दृश्य मी देखावया बैसें। तंव दृश्या सबाह्य जनार्दनु दिसे। श्रवणीं ऐकतां सौरसें। शब्दीं प्रवेशे जनार्दनु॥ ५४॥ आतां नाइकें न पाहें। म्हणौनि मी उगा राहें। तंव उगेपणाचेनि अन्वयें। जनार्दनु पाहे लागला॥ ५५॥ ऐसा अडकलों त्रिशुद्धी। जनार्दनु उगंडूं नेदी। श्रोता सांगावी जी बुद्धी। मी अपराधी सर्वथा॥ ५६॥ श्रोते म्हणती नवलावो। येथ न देखों अहंभावो। पाहतां बोलाचाअभिप्रावो। प्रेम पहा हो लोटत॥ ५७॥ येथील विचारितां बोल। क्षीराब्धीहून सखोल। नवलप्रेमाची वोल। येताति डोल स्वानंदें॥ ५८॥ जें त्वां केलें गुरुनिरूपण। तें सप्रेम ब्रह्मज्ञान। थोर निवविलों जाण। नाहीं दूषण निरूपणा॥ ५९॥ नित्य करावें गुरुस्मरण। तें गुरूनें केलें निजकथन। करितां अमृताचें आरोगण। पुरे कोण म्हणेल॥ ४६०॥ जनार्दनीं दृढ भावो। हाही कळलाअभिप्रावो। निरूपणाचा नवलावो। रसाळ पहा हो वोडवला॥ ६१॥ तूं मूळकथा निरूपिसी। अथवा आडकथा सांगसी। परी गोडी या निरूपणाऐसी। न देखों आणिकांसी सर्वथा॥ ६२॥ शुद्ध निरूपणें गुरु वर्णिसी। वर्णूनि अपराधी म्हणविसी। ऐक्यें घोळली बुद्धी कैसी। मानुश्रोत्यांसी वाढविला॥ ६३॥ तुझी जे अपराधबुद्धी। ते प्रवेशली भगवत्पदीं। जाहली अपराधाची शुद्धी। देखणा त्रिशुद्धी तूं होसी॥ ६४॥ गुरुस्तवनीं रतसी। तेव्हां मूळकथा विसरसी। प्रेमाचीजाती ऐसी। कळलें आम्हांसी सर्वथा॥ ६५॥ श्रोते म्हणती आतां। विस्मयो दाटला चित्ता। वेगीं चालवावें ग्रंथा। पूर्वकथा मूळींची॥ ६६॥ हें संतवचन मानूनि माथां। चरण वंदूनि तत्त्वतां। सावधान व्हावें चित्ता। पुढील कथा सांगेन॥ ६७॥ यापरी तो अवधूतु। यदूसी सांगे परमार्थु। संवादें निवाला परमाद्भुतु। मग निवांतु राहिला॥ ६८॥
श्रीभगवानुवाच
इत्युक्त्वा स यदुं विप्रस्तमामन्त्र्य गभीरधी:।
वन्दितोऽभ्यर्थितो राज्ञा ययौ प्रीतो यथागतम्॥ ३२॥
उद्धवासी म्हणे श्रीकृष्ण। रायासी सांगोनि ब्रह्मज्ञान। जाहलें देखोनि समाधान। मग पुसोन निघाला॥ ६९॥ राजा धांवोनि लागला चरणां। परम प्रेमें करी पूजना। करोनियां प्रदक्षिणा। मागुता चरणां लागला॥ ४७०॥ ‘जाय’ ऐसें न बोलवे सर्वथा। ‘राहे’ म्हणतां दिसे स्वामिता। वियोगु न साहवे तत्त्वतां। बोलु सर्वथा खुंटला॥ ७१॥ ते देखोनि अवस्था। कृपा उपजली श्रीदत्ता। हात ठेवूनि माथां। प्रसन्नता उपजली॥ ७२॥ ‘येथून तुज मज आतां। वियोगु नाहीं सर्वथा’। ऐसें आश्वासोनि नृपनाथा। होय निघता श्रीदत्त॥ ७३॥ जेणें सुखें होता आला। तेणेंचि सुखें निघता झाला। राजा अतिप्रीतीं निवाला। सुखी झाला निजबोधें॥ ७४॥
अवधूतवच: श्रुत्वा पूर्वेषां न: स पूर्वज:।
सर्वसङ्गविनिर्मुक्त: समचित्तो बभूव ह॥ ३३॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायामेकादशस्कन्धे नवमोऽध्याय:॥ ९॥
पाहोनि उद्धवा उजू। बोलता जाला अधोक्षजु। म्हणे आमचे पूर्वजांचा पूर्वजु। राजध्वजु यदुवीरु॥ ७५॥ म्हणसी मी नेणें त्याचें नांव। तूं सांगतोसी हें अपूर्व। परी ज्याचेनि नामें आम्हीसर्व। वीर ‘यादव’ म्हणवितों॥ ७६॥ हरिखें म्हणे नंदनंदु। तो आमचा पूर्वज यदु। ब्रह्मज्ञानाचा संवादु। दत्तात्रेयेंसीं पैं केला॥ ७७॥ श्रीदत्तात्रेयाच्या वचनार्था। विश्वासोनि जाहला घेता। तेणें सर्वसंगविनिर्मुक्तता। आली हाता यदूच्या॥ ७८॥ जो संगु सांडूनि दूर गेला। तेणें ‘संगत्यागु’ चि केला। संगीं असोनि स्नेह सांडिला। ‘संगमुक्त’ झाला तो जाण॥ ७९॥ आकाश सर्व पदार्थासी। मिळालें असे सर्व देशीं। परी नातळेचि सर्वसंगासी। ‘संगमुक्तता’ त्यासी बोलिजे॥ ४८०॥ याहूनि विशेष संगमुक्तता। आली यदूचिया हाता। तेही सांगेन कथा। परिसें तत्त्वतां उद्धवा॥ ८१॥ दत्तात्रेयबोधें तत्त्वतां। सर्वसंगामाजी असतां। न देखे संगाची कथावार्ता। ‘विशेषमुक्तता’ या नांव॥ ८२॥ ‘मज पूर्वी द्वैतसंगु होता। तो जाऊनि नि:संग झालों आतां’। या दोनी समूळ मिथ्या वार्ता। विनिर्मुक्तता पावलों॥ ८३॥ दोर सापु नाहीं झाला। परी सापुपणाचा आळ आला। तोही दोरें नाहींसा केला। भ्रांतीं कल्पिला निजभ्रमु॥ ८४॥ दोरु दोरपणें असे। सर्पु तो भ्रांतामनीं वसे। ऐसें सांडूनि द्वैतपिसें। रायासी सावकाशें समाधी॥ ८५॥ समसाम्यें समानबुद्धी। ते बोलिजे ‘निजसमाधी’। ते समाधी पावोनि त्रिशुद्धी। राजा निजपदीं पावला॥ ८६॥ कृष्ण म्हणे उद्धवासी। ‘तुं जन्मूनि ऐशिये वंशीं। जरी ब्रह्मज्ञान न साधिशी। तरी उणें पूर्वजांसी येईल’॥ ८७॥ यापरी हृषीकेशी। तिरस्कारोनि उद्धवासी। झोंबावया अद्वैतासी। पुट बुद्धीसी देतुसे॥ ८८॥ आधींचि विखारू काळियाणा। त्याचेंही पुच्छ रगडिल्या जाणा। मग झोंबिन्नल्या सत्राणा। नावरे कोणा सर्वथा॥ ८९॥ आधींचि अनुताप उद्धवासी। वरी तिरस्कारिला हृषीकेशीं। तो गिळावया चिद्ब्रह्मासी। निजमानसी खवळला॥ ४९०॥ पुढिले अध्यायीं निरूपण। कृष्णउद्धवसंवाद जाण। सांगेल गुरुशिष्यलक्षण। श्रोते विचक्षण परिसतु॥ ९१॥ एका जनार्दनु म्हाणे। अगाध कृष्णमुखींचेंबोलणें। तें मी जरी निरोपूं नेणें। परी तें गोडपणें निववित॥ ९२॥ साखरेचा बोळू केला। परी कडूपणा नाहीं आला। तैसा ग्रंथु प्राकृतभाषा झाला। असे संचला स्वानंदु॥ ९३॥ जरी सोन्याचें पेंडुकें केलें। परी तें दगडमोला नाहीं आलें। तैसें भागवत प्राकृत झालें। परी नाहीं चुकलें निजज्ञाना॥ ९४॥ मुक्ताफळालागीं सागरीं। बुडॺा देती नानापरी। तें सांपडलिया घरींच्या विहिरीं। जो अव्हेरी तो मूर्ख॥ ९५॥ तैशी संस्कृत व्याख्यानआटाटी। अतिकष्टें परमार्थीं भेटी। तें जोडिल्या मराठीसाठीं। उपेक्षादृष्टि न करावी॥ ९६॥ धनवंतु रत्नपारखी पुरा। तेणें धुळीमाजीं देखिल्या हिरा। गांठीं बांधोनि आणी घरा। पारखी खरा निजज्ञानें॥ ९७॥ तैसें ज्ञाते विद्वज्जन। ग्रंथु मराठी देखोन। उपेक्षा न करितां करावा यत्न। पारखोनि चिद्रत्न साधावया॥ ९८॥ क्षुद्रदृष्टीं पाहणें पाहतां। बोलु लागेल व्यासाचे ग्रंथा। मा हे तरी मराठी कविता। सांडूनि कुटिलता पाहावी॥ ९९॥ ज्यांसी निजसुखाची आवडी। ते प्राकृतीं न काढिती खोडी। घेतील ज्ञानगर्भाची गोडी। अवस्था गाढी परमार्थी॥ ५००॥ जे साचार परमार्थी। ते अधिकारी ये ग्रंथीं। ज्यांसी भागवतीं भक्ती। ते पावती निजसुख॥ १॥ ज्यासी भागवतीं नाहीं भक्ती। कोरडी व्युत्पत्ती मिरविती। तेही जरी निंदा न करिती। तरी पुढें पावती भक्तीतें॥ २॥ निंदा वसे ज्याचे चित्ता। त्यास गति नाहीं सर्वथा। निंदा सकळ पापांचे माथां। दोष ईपरता असेना॥ ३॥ निंदकाचें नांव घेतां। दोष वाचेसी होय लागता। तिशीं द्यावया प्रायश्चित्ता। ‘रामराम’ सर्वथा म्हणावें॥ ४॥ निंदेमाजीं देखिलें स्वार्था। निंदक प्रवर्तले भक्तहिता। बुडवूनि आपुले स्वार्था। परदोष सर्वथा क्षाळिले॥ ५॥ सांडूनियां गुणदोष। श्रोतां होआवें सावकाश। जेथ वक्ता हृषीकेश। अतिसुरस तें ज्ञान॥ ६॥ कृष्ण-उद्धवांचे ज्ञान। तत्काळ निरसी अज्ञान। एकाविनवी जनार्दन। सावधान परियेसा॥ ५०७॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे एकादशस्कंधे श्रीकृष्णोद्धवसंवादे एकाकारटीकायां नवमोऽध्याय:॥ ९॥ श्रीकृष्णार्पणमस्तु॥ मूळश्लोक॥ ३३॥ ओव्या॥ ५०७॥
॥ श्री ॐ तत्सत्-श्रीकृष्ण प्रसन्न॥
अध्याय दहावा
श्रीगणेशाय नम:॥ श्रीकृष्णाय नम:॥ ॐ नमो सद्गुरु धन्वंतरी। ज्याची दृष्टीचि निरुज करी। त्यावांचोनि संसारीं। भवरोगु दुरी न करवे॥ १॥ ज्या भवरोगाचेनि दर्पें। फुंफात तापलींत्रिविधतापें। ‘मी माझें’ येणें संकल्पें। वाग्जल्पें जल्पती॥ २॥ पडिलीं द्वैताचिया दुखणा। तोंडींची चवी गेली जाणा। मुखा आला कडवटपणा। कटु वचना बोलतु॥ ३॥ जेथें व्याधीचेनि सन्निपातें। विवेक हाणोनियां लातें। उमरुडूनि धैर्य हातें। वासनावनातें हिंडती॥ ४॥ मनोरथकर्दमीं चरफडित। संकल्पमृगजळीं बुडत। वेगीं निसरोनियां पडत। टेंक चढतां स्वर्गाचें॥ ५॥ वोरबडत स्नेहाची आराटी। गोंवीत लोभाची बोरांटी। खिळिला प्रपंचाचिया कंठीं। मारितां नुठी तेथूनि॥ ६॥ भवरोगभ्रमें भ्रमले कैसे। खावों नये तें खावों बैसे। करूं नये तें करितां दिसे। योषितांसरिसें धांवत॥ ७॥ तेथ धनभयाचे शारे येत। तेणें थरथरां कांपत। धाकें धाकें घामेजत। दडी देत गुप्तत्वें॥ ८॥ भोगाभिमानु चढे देहीं। तेव्हां न राहे खाटे भुईं। विधीचें पांघरूण टाकी पाहीं। डोळा ठायीं लागेना॥ ९॥ उभें न राहवे ऐक्यवृत्ती। क्षीण झाली ज्ञानशक्ती। पडलीं जडत्वें लोळती। पाणी मागती विषयांचे॥ १०॥ अल्पअल्प देतां तें जळ। कडकडूनि झोंबती प्रबळ। ‘आम्हांसी फार द्या गा जळ। तृषा केवळ वोळेना’॥ ११॥ कुपथ्य करितां निरंतर। तंव तो झाला जीर्णज्वर। क्षयो लागला जी थोर। क्षीण शरीर पडियेलें॥ १२॥ क्षणाक्षणां अतिक्षीणता। विकार संचरले जीविता। तेणें प्रबळ वाढली चिंता। सुख सर्वथा बुडालें॥ १३॥ नवल रोगाचा पडिपाडु। गोड परमार्थ तो जाला कडू। केवळ विषप्राय विषय कडू। तोचि गोडु पैं झाला॥ १४॥ ते व्याधीचिया उफाडा। देतां सत्कथाकाढा। श्रवणमुखींच्या भावार्थदाढा। पाडी पुढां दांतखिळी॥ १५॥ देतां तुलसीमकरंद नसू। वरता जावों नेदी श्वासु। मस्तक झाडी मानी त्रासु। रोगें बहुवसु व्यापिला॥ १६॥ ऐसा रोग देखोनियां गाढा। वैद्य आचार्य धडफुडा। कृपा पाहे जयाकडा। तो रोकडा वांचवी॥ १७॥ निधडा वैद्य तो सुबुद्धि। जीवु गेलिया मरों नेदी। जीवेंवीण वांचवी त्रिशुद्धि। अगाध सिद्धि तयाची॥ १८॥ शुद्धभाग्येंकरूनि जाण। तो करी कृपाकूर्मावलोकन। तेंचि रोगिया अमृतपान। होय सावधान तत्काळ॥ १९॥ एवं झालिया सावधान। रोगी आपणिया आपण। नित्यानित्याचें पाचन। करी सेवन साक्षेपें॥ २०॥ तेणें न फिटेचि जीर्णज्वरु। न तुटे क्षयाचा महामारु। हे देखोनियां वैद्यसद्गुरु। रसोपचारु मांडिला॥ २१॥ तेणें अक्षररस-अर्धमात्रा। देतां क्षयाचा थारा। मोडूनियां शरीरा। पूर्वपरंपरा अक्षय केलें॥ २२॥ दारुण चुकवावया कुपथ्य। वैराग्य राखणठेविलें नित्य। लावूनि अनुसंधानाचें पथ्य। निर्दाळिला तेथ भवरोगु॥ २३॥ रोगी उपचारिल्यावरी। प्रबळ क्षुधा खवळे भारी। चित्तचिंतेच्या लाह्या करी। क्षणामाझारीं खादल्या॥ २४॥ काळे गोरे चतुर्वर्णचणे। आश्रमेंसीं भाजिले फुटाणे। ‘अहं-सोहं’ गुळेंसीं तेणें। नि:शेष खाणें तत्काळ॥ २५॥ फळाभिलाषेंसीं आशा-। बोंडें भरलीं होतीं खसखसा। तींही खादलीं घसघसां। न लगतां घांसा गिळियेलीं॥ २६॥ गूळ साखरेचा पडिपाडु। खादले कर्माकर्माचे लाडू। खातां न म्हणे गोड कडू। लागला झोडूं स्वइच्छा॥ २७॥ ‘ब्रह्माहमस्मी’ चीं गोमटीं। पक्कान्नें देखिलीं दिठीं। तींही खाऊनि उठाउठी। मायेपाठीं लागला॥ २८॥ ते धाकें धाकेंचि निमाली। मिथ्यात्वें नासोनि गेली। स्वानंदेंपुष्टि आली। झाडी केली भवरोगा॥ २९॥ ऐसा सद्गुरु वैद्य गाढा। जेणें उपचारोनि केलों निधडा। शरण रिघावें तुजपुढां। तंव चहूंकडां तूंचि तूं॥ ३०॥ तुजवेगळें आपणियातें। देखोनि शरण यावें तूतें। तंव मीतूंपण हारपलें थितें। कैसेनि तूतें भजावें॥ ३१॥* ज्यांच्या सुटल्या जीवग्रंथी। झाले आत्माराम निश्चितीं। तेही अहेतुक भक्ति करिती। प्राप्तांची स्थिति हे जाणा॥ ३२॥ गुरुभजनापरतें सुख। मोक्ष मानिती तेही मूर्ख। मोक्ष गुरुचरणींचा रंक। विरळा लोक हें जाणती॥ ३३॥ आम्हां सद्गुरुदृष्टीं परमारोग्य। आम्ही सद्गुरुकृपा सदा श्लाघ्य। गुरुसेवें आम्ही सभाग्य। परम योग्य गुरुस्तवनें॥ ३४॥ सद्गुरूचें नाममात्र। तेंचि आम्हां वेदशास्त्र। सकळ मंत्रावरिष्ठ मंत्र। नाम सर्वत्र गुरूचें॥ ३५॥ सद्गुरूचें तीर्थमात्र। सकळ तीर्थां करी पवित्र। गुरुचरण तें आमचें क्षेत्र। वृत्ति स्वतंत्र ते आम्हां॥ ३६॥ तूं पुरे पुरे म्हणसी स्तवन। परी वर्णितां तुझे उदार गुण। अतृप्त सर्वथा नुठी मन। तुझी आण वाहातसें॥ ३७॥ तुझे गुण वर्णावया तत्त्वतां। मी प्रवर्तलों श्रीभागवता। त्वां मजलाविलें भक्तिपंथा। निजकथाकीर्तनीं॥ ३८॥ जय जय सद्गुरु जनार्दना। भवगजपंचानना। एकाकी शरण आलों जाणा। तुझ्या श्रीचरणा पावलों॥ ३९॥ पावलों शास्त्र श्रीभागवत। अवधारा तेथींचा मथितार्थ। उद्धवासी श्रीकृष्णनाथ। परम परमार्थ सांगेल॥ ४०॥ यदुअवधूतसंवादेंसीं। लक्षणोक्त चोविसां गुरूंसी। परिसोनियां उद्धवासी। भावना ब्रह्मेंसीं लिगटली॥ ४१॥ ब्रह्म सर्वगत सत्य होये। मज सबाह्य कोंदलें आहे। तेंचि माझें मज ठाउकें नोहे। कोण उपाये करावा॥ ४२॥ ऐसीउद्धवाची चिंता। कळों सरली कृष्णनाथा। तोचि उपावो सर्वथा। होय सांगता अविरोधें॥ ४३॥
* ‘‘आत्मारामाश्च मुनयो निर्ग्रंथा अप्युरुक्रमे।
कुर्वंत्यहैतुकीं भक्तिं इत्थंभूतगुणो हरि:॥’’
(भागवत) ए० भा० २३
श्रीभगवानुवाच
मयोदितेष्ववहित: स्वधर्मेषु मदाश्रय:।
वर्णाश्रमकुलाचारमकामात्मा समाचरेत्॥ १॥
पूर्वीं वेदरूपें वर्णाश्रम। मीचि बोलिलों स्वधर्म। पंचरात्रादि वैष्णवधर्म। हें उपासनावर्म गुह्य माझें॥ ४४॥ जो वर्ण जो आश्रम। तेणेंचि ते करावे स्वधर्म। आचरतां परधर्म। दु:ख परम पाविजे॥ ४५॥ उद्धवा येथ जाण। कर्ता पाहिजे सावधान। ते सावधानतेचें लक्षण। अतिविचक्षण जाणती॥ ४६॥ कर्म चतुर्विध येथ। ‘नित्य’ आणि ‘नैमित्त’। ‘काम्य’ आणि ‘प्रायश्चित्त’। जाण निश्चित विभाग॥ ४७॥ येथ कर्म आचरती स्थिती। सावधान राखावी वृत्ती। आचरावयाचीव्युत्पत्ती। विचित्र स्थिती सांगेन॥ ४८॥ नित्य आणि नैमित्तिक। हें कर्म जाण आवश्यक। सांडोनियां फलाभिलाख। विधिप्रमुख आचरावें॥ ४९॥ नित्यकर्म अधिक वाढे। तैं नैमित्तिकाचे अंगा चढे। काम्य उचंबळलें विषयचाडें। तैंचि पडे ‘निषिद्धी’॥ ५०॥ फलाभिलाषेंविण। नित्य नैमत्तिक जाण। करावें गा कृष्णार्पण। अर्पिती खूण जाणोनि॥ ५१॥ काम्य कर्म आवश्यक। त्यजावें गा नि:शेख। जेवीं कां वमिलें वमक। परतोनि लोक न पाहती॥ ५२॥ समूळीं कामनेतें दंडावें। तैंचि काम्य कर्म सांडावें। येऱ्हवीं काम्यत्यागु न संभवे। कामना जीवें राखतां॥ ५३॥अंतरीं अनिवार कामना। बाह्य विरक्ती दावी जना। ते सविया विटंबना। त्यागु विचक्षणा तो नव्हे॥ ५४॥ कामनेचेनि अधिक मदें। कर्में निपजती निषिद्धें। समूळ कामनेचेनि छेदें। सर्व निषिद्धें मावळती॥ ५५॥ अथवा देखतांचि निषिद्ध दिठीं। जो हरिनामें गर्जत उठी। निषिद्ध पळे बारावाटीं। प्रायश्चित्तकोटी हरिनामें॥ ५६॥ जेथ हरिनामाचे उमाळे। तेथ निषिद्ध तत्काळ जळे। निषिद्ध अभक्तां आदळे। भक्तांजवळें तें न ये॥ ५७॥ काम्यनिषिद्धाची कथा। भक्तांसी नातळे सर्वथा। भगवंतु रक्षी निजभक्तां। दोषु तत्त्वतां त्यां नाहीं॥ ५८॥ नामें प्रायश्चित्तांच्या कोटी। हे म्यांसांगितली गुह्य गोठी। प्रकट न करावी सृष्टीं। गुप्त पोटीं राखावी॥ ५९॥ काम्यनिषिद्धाचे त्याग। तुज म्यां सांगीतले साङ्ग। नित्यनैमित्तविभाग। तोही विनियोग परियेसीं॥ ६०॥ मदर्पणेंआवश्यक। करावें नित्यनैमित्तिक। तेंचि चित्ताचें शोधक। साधन मुख्य परमार्थी॥ ६१॥ एक म्हणती स्वधर्म निर्फळ। वर्म नेणतीच ते बरळ। स्वधर्में होय जन्म सफळ। परमार्थफळ स्वधर्मीं॥ ६२॥ किडाळ झाडावया दृष्टीं। रज देऊनि पाठींपोटीं। सुवर्ण घालितां पुटीं। झळकत उठी निजतेजें॥ ६३॥ तैसा मज अर्पितां स्वधर्म। त्याचें सफळ होय निजकर्म। ऐसें नेणोनियां निजवर्म। कर्मभ्रम कर्मठां॥ ६४॥ मज अर्पिती हातवटी। अवघड वाटेल जगजेठी। ज्यासी आवडी माझी मोठी। त्याची दृष्टी मदर्पण॥ ६५॥ कृष्णीं निश्चळ ज्याचें मन। त्याचें कर्म तितुकें कृष्णार्पण। त्यासी न अर्पितांही जाण। सहजें मदर्पण होतसे॥ ६६॥ जो रथीं निश्चळ होऊनियां बैसे। तो न चळतांही चालतु दिसे। जाण स्वकर्म त्याचें तैसें। अनायासें मज अर्पे॥ ६७॥ यापरी होऊनि अकामात्मा। सुखें आचरावें स्वधर्मा। तेणें सांडूनि रजतमा। सत्त्वें पुरुषोत्तमा पावती॥ ६८॥ वर्णाश्रमसमुद्भवा। मूळ आश्रयो मी वोळखावा। कुळकर्मनिजस्वभावा। उपासावा मी एकु॥ ६९॥ वर्णासी आश्रयोमी प्रसिद्ध। जे जन्मले मुखबाहूरुपाद। आश्रमा आश्रयो मी विशद। गर्जती वेद ये अर्थीं॥ ७०॥ देवो देवी कुळाचार। यांचें वस्तीचें मी घर। एवं मी सर्वाधार। हा कर्मी विचार देखावा॥ ७१॥ गुज परियेसीं उद्धवा। कर्माकर्माध्यक्षु मी जाणावा। कर्मी मीचि अभिलाषावा। क्रियेनें धरावा मी एकु॥ ७२॥ एवं आदि-मध्य-अंतीं। मी अविनाशु धरितां चित्तीं। तीं कर्मेंचि निष्कर्में होतीं। जाण निश्चितीं उद्धवा॥ ७३॥
अन्वीक्षेत विशुद्धात्मा देहिनां विषयात्मनाम्।
गुणेषु तत्त्वध्यानेन सर्वारम्भविपर्ययम्॥ २॥
यापरी स्वधर्मे जाण। ज्यांचें विशुद्ध अंत:करण। ते विषयीं उदासीन। हें वोळखण तयांचें॥ ७४॥ तयांसी विषयाची आस्था। नाहीं नाहीं गा सर्वथा। परी सर्वार्थविपरीतता। विषयासक्तता देखती॥ ७५॥ भरलीं मृगजळाचीं तळीं। तेणें न पिकती साळी केळी। तैसीविषयबुद्धी जवळी। स्वसुखफळीं फळेना॥ ७६॥ पाहें पां विषयासक्त। कर्मारंभीं संकल्प करित। आयु:कामार्थ क्षेमार्थ। धनधान्यार्थसमृद्धी॥ ७७॥ या हेतू कर्म आरंभित। तें स्वकर्म नव्हेनिश्चित। स्वधर्ममिषें मनोरथ। उपासित सर्वदा॥ ७८॥ बैलाची कांस दुहितां। शिंपीभरी दूध नये हाता। तेवीं मनोरथ उपासितां। न लभे सर्वथा ‘निजसुख’॥ ७९॥ एवं कर्मचि तें कर्म नव्हे। केल्याही सिद्धी न पवे। तें विघ्नबाहुल्यें नाश पावे। विघ्न संभवे देवांचें॥ ८०॥ विषयसेवनीं आहे सुख। या बुद्धीं शिणशिणोनि मूर्ख। पावले परम दु:खें दु:ख। मुख्य याज्ञिक घालूनि॥ ८१॥ वेदत्रयी जाणूनि सकळ। यज्ञकर्मी अतिकुशळ। वांछितां स्वर्गादिक फळ। पतन केवळ अधोमुखें॥ ८२॥ ऐसेनि विवेकें निपुणदृष्टी। जो स्वर्गु नेघे तृणासाठीं। वैराग्य लागे त्यापाठीं। उठाउठी घर रिघे॥ ८३॥ तो वैराग्याचें माहेर। विश्रांतीचें विसावतें घर। तो नररूपें साचार। ‘विवेकु’ साकार पैं झाला॥ ८४॥ ऐसेनि विवेकें विवेकदृष्टी। स्वर्गादि विषय मिथ्या सृष्टी। ते मिथ्यात्वाची गोठी। ऐक जगजेठी उद्धवा॥ ८५॥
सुप्तस्य विषयालोको ध्यायतो वा मनोरथ:।
नानात्मकत्वाद्विफलस्तथा भेदात्मधीर्गुणै:॥ ३॥
स्वप्न आणि मनोरथ। मनोमात्र-विलसित। ते निद्रितासी सत्य पदार्थ। मिथ्या होत। जागृतीं॥ ८६॥ तैसें कामनेचेनि उल्हासें। इंद्रियांचेनि सौरसें। उभय भोगपिसें। नाथिलें वसे बुद्धीसी॥ ८७॥ शिंपी शिंपपणें असे। धनलोभ्या रुपें भासे। तेवीं विषयाचेनि अभिलाषें। भेदपिसें नसतेंचि॥ ८८॥ स्वप्नीं देखिलें आत्ममरण। जागृतीं मिथ्या म्हणे आपण। तैसा स्वरूपीं जागा झाल्या जाण। जन्ममरण त्या नाहीं॥ ८९॥ जंववरी भेदाची भेदसिद्धी। तंववरी जन्ममरण बाधी। भेदु मिथ्या झालिया त्रिशुद्धी। अभेदीं बाधी तें नाहीं॥ ९०॥ तो भेदु कैसेनि तुटे। निजस्वरूप कैसेनि भेटे। ते अर्थी साधन गोमटें। ऐक चोखटें विभागें॥ ९१॥
निवृत्तं कर्म सेवेत प्रवृत्तं मत्परस्त्यजेत्।
जिज्ञासायां सम्प्रवृत्तो नाद्रियेत्कर्मचोदनाम्॥ ४॥
चित्तीं वासनांचे मळ। तेणें भेदु भासे सबळ। तो नाशावया चित्तमळ। कर्म निर्मळ सेवावें॥ ९२॥ मागां सांगीतलें निश्चित। जें कां नित्यनैमित्य। तेंचि कर्म गा ‘निवृत्त’। साधकीं प्रस्तुत सेवावें॥ ९३॥ जो प्रवर्तला माझ्या भजनीं। तेणें ‘काम्य’ सांडावें निपटूनी। हें मागां सांगितलें विवंचूनि। कामना मनीं न धरावी॥ ९४॥ धरोनि मदर्पणाचें बळ। ‘नित्य’ आचरतां निर्मळ। चित्ताचे चैत्य-मळ। जाती तत्काळ नासोनि॥ ९५॥ कृषीवळु करी शेतासी। यथार्थ द्रव्य दे राजयासी। तो न भी ग्रामकंटकांसी। तेवीं कृष्णार्पणेंसीं होतसे॥ ९६॥ जाहल्या चित्तमळक्षाळणें। नित्यविवेकु उपजे तेणें। इहामुत्रां लाता हाणे। अनित्य त्यजणें वैराग्यें॥ ९७॥ एवं वैराग्य झालिया अढळ। तेणें सत्त्व होय प्रबळ। तेव्हां मज जाणावया केवळ। वृत्ति निर्मळ ते काळीं॥ ९८॥ करितां माझीं चिंता। कामक्रोध नाठवती चित्ता। थोर लागली माझी अवस्था। न राहे सर्वथा अणुभरी॥ ९९॥ हो कां ऐशिये अवस्थेसी। कर्मक्रिया नावडे ज्यासी। तेणें संन्यासूनि सर्व कर्मांसी। ब्रह्मज्ञानासी रिघावें॥ १००॥ श्रवण मनन करितां। कर्मासी झालिया विगुणता। बाधक नव्हे माझ्या भक्तां। कर्मकिंकरता त्यां नाहीं॥ १॥ स्वधर्म केलिया फळ काये। चित्ताचा मळमात्र जाये। भक्तु भजनें निर्मळ आहे। बाधूं न लाहे स्वकर्म॥ २॥ एवं कर्माची चोदना। मद्भक्तासी नाहीं जाणा। करितां श्रवणकीर्तना। कर्मबंधना नातळती॥ ३॥ ऐशिया जिज्ञासावस्थेसी। कर्मबाधा नाहीं त्यासी। मुख्य तात्पर्य ब्रह्मज्ञानासी। हेंचि उद्धवासी सांगतु॥ ४॥
यमानभीक्ष्णं सेवेत नियमान्मत्पर: क्वचित्।
मदभिज्ञं गुरुं शान्तमुपासीत मदात्मकम्॥ ५॥
होआवया वृत्तीचा उपरम। अहिंसा-सत्यादि धर्म। आचरावे अविश्रम। बाह्य नेम अविरोधें॥ ५॥ आचरतां अहिंसा-सत्यादिकांसी। तंव तंव दशा उजळे कैसी। अतिप्रीति गुरुभक्तीसी। अहर्निशीं गुरु चिंती॥ ६॥ सद्गुरूवीण ब्रह्मज्ञान। सर्वथा नव्हे नव्हे जाण। हें उपनिषदर्थें प्रमाण। परम निर्वाण साधिलें॥ ७॥ डोळा देखणाचि आहे। त्यासी सूर्य नव्हतां साह्ये। सिद्ध पदार्थ देखों न लाहे। स्तब्ध राहे अंधारीं॥ ८॥ नाव तारी हे साचार। माजीं बैसले थोर थोर। परी तारकेंवीण परपार। समर्थ नर न पावती॥ ९॥ पर्जन्यें भूमी मार्दवा आली। बीजें कणिंग असे भरली। परीज्ञातेन पेरणी नाहीं केली। तंव पिकाची बोली पोंचट॥ ११०॥ रत्न सांपडलें अवचितें। परी खरेंखोटें संशय तेथें। रत्नपारखी करी मोलातें। अतियत्न त्यातें मग करिती॥ ११॥ तैसें निजस्वरूपआइतें। श्रद्धा-सद्गुरूचेनि हातें। खरें करूनियां ज्ञाते। निजसुखातें पावले॥ १२॥ साधावया निजज्ञान। करितां सद्गुरूचें सेवन। निवाले संत सज्जन। आनंदघन सद्गुरु॥ १३॥ म्हणसी साधनें केलीं अनेक। तैसें सद्गुरूही साधन एक। म्हणतां मुमुक्षु झाला मूर्ख। निजात्मसुख बुडालें॥ १४॥ सद्गुरु केला तो साधन। त्याहूनि परतें साध्य आन। म्हणतां आली नागवण। नागवला जाण सर्वस्वें॥ १५॥ जो चित्सुखें सदा संपन्न। चिद्रूपें ज्यासी समाधान। तो चिन्मात्राहोनि भिन्न। नव्हे जाण सर्वथा॥ १६॥ लवण सागरीं रिघालें। तेव्हांचि तें समुद्र झालें। दीपें वणवया आलिंगिलें। वणवाचि झालें तें तेज॥ १७॥ एवं चिद्रूपाचें ज्यासी ज्ञान। तो चिद्रूपचि सत्य संपूर्ण। गुरु ब्रह्म अभिन्न जाण। ये अर्थीं प्रमाण उपनिषदें॥ १८॥ हो कां घृताची पुतळी। नव्हतां घृतपणावेगळी। घृतरूपें रूपा आली। तैसी मूर्ती झाली सद्गुरूची॥ १९॥ तो चित्सुखाचा पुतळा। कीं सच्चिदानंदाचा सोहळा। प्रत्यक्ष देखावया डोळां। धरी लीलाविग्रहो॥ १२०॥ त्याची होआवया भेटी। पाहिजेति भाग्याचिया कोटी। हे बोलणेंवरी दिसे दिठी। तैसी गोठी ते नाहीं॥ २१॥ सद्गुरु जेउती वास पाहे। तेउती सुखाचीसृष्टी होये। तो म्हणे तेथ लवलाहें। महाबोधु राहे स्वानंदें॥ २२॥ त्या सद्गुरूचे देखिल्या पाये। तहानभूक तत्काळ जाये। कल्पना उठोंचि न लाहे। निजसुख आहे गुरुचरणीं॥ २३॥ त्या सद्गुरूचें लक्षण। सांगतां शब्दुं थोंटावे जाण। जो सनातन ब्रह्म पूर्ण। ऊणखूण त्या नाहीं॥ २४॥ तऱ्हीस्फुरली एकी स्फूर्ती। त्यासी सर्वार्थी दिसे शांती। शांतीवेगळी उपपत्ती। प्रमाण निश्चिती रिघेना॥ २५॥ शांति तेचि समाधान। शांति तेचि ब्रह्मज्ञान। शांती तेचि ब्रह्म पूर्ण। सत्य जाण उद्धवा॥ २६॥ ऐसी सद्गुरूची स्थिती। ऐकोनि शिष्याच्या चित्तीं। वाढली अतिप्रीती। गुरुभक्तीलागोनी॥ २७॥ यालागीं गुरुगवेषणा। उसंतु घेवों नेदी अंत:करणा। अष्टौ प्रहर विचक्षणा। गुरुलक्षणा लक्षितु॥ २८॥ कैं तो स्वामी देखेन ऐसा। कैं हा माझा फिटेल फांसा। कैं उपरमु होईल मानसा। सद्गुरुपिसा तो झाला॥ २९॥ आयुष्य वेंचतें उठाउठी। अझूनि नव्हे सद्गुरूसी भेटी। झाल्या मनुष्यदेहासी तुटी। सर्वस्व शेवटीं बुडेल॥ १३०॥ ऐकतां गुरूचें नांव। मनापुढें घेत धांव। ते गोठीसीच देत खेंव। येवढी हांव जयाची॥ ३१॥ सद्गुरु प्रत्यक्ष न भेटतां। मनेंचि पूजी गुरुनाथा। परमादरें पूजा करितां। प्रेम तत्त्वतां न संटे॥ ३२॥ सद्गुरु भेटावयाकारणें। हिंडे तीर्थें तपोवनें। गुरु न विसंबे मनें। नित्यविधानें आचरतां॥ ३३॥ सद्गुरुप्राप्तीचिया काजा। लहानथोरांची करी पूजा। अत्यादरें मानी द्विजा। गुरुमज माझा भेटावा॥ ३४॥ अस्वलाचिया परी। गुरुनामाचा जप करी। गुरुवांचोनि निरंतरीं। चिंता न करी आनाची॥ ३५॥ आसनीं भोजनीं शयनीं। गुरूतें न विसंबे मनीं। जागृतीं आणि स्वप्नीं। निदिध्यासनीं गुरु केला॥ ३६॥ गुरुस्मरण करितां देख। स्मरणें विसरे तहानभूक। विसरला देहगेहसुख। सदा संमुख परमार्था॥ ३७॥ ऐसी सद्गुरूची आवडी। ज्याची आस्था चढोवढी। त्यासी गुरुरूपें तांतडी। भेटी रोकडी मी देतों॥ ३८॥ जंव जंव आस्था अधिक। तंव तंव भेटीची जवळिक। साधनांमाजीं हें साधन मुख्य। आस्थाचि एक विशेष॥ ३९॥ करितां वरिष्ठसाधनकोडी। बोधाची जोडेना कवडी। सद्गुरुभजनाची अर्ध घडी। जोडी कोडी बोधाच्या॥ १४०॥ सद्गुरुभजनीं लागवेगें। मोक्ष येऊनि पायां लागे। गुरुभक्त तोही नेघे। चरणरंगें रंगला॥ ४१॥ श्रीगुरुचरणाची गोडी। विसरवी मोक्षसुखाच्या कोडी। गुरुभजनीं जयां अनावडी। ते संसार बांदवडीं पडियेले॥ ४२॥ छेदावया संसारबंधन। करावें सद्गुरुसेवन। सद्गुरुसेवा तें माझें भजन। गुरु-आम्हां भिन्नभावो नाहीं॥ ४३॥ गुरुभक्तांची श्रद्धा गाढी। आणि गुरुभजनाची गोडी। ते सांगितली आवडीं। प्रत्यक्ष उघडी करूनि॥ ४४॥ सहज प्रसंगें येणें। शिष्यांचींही लक्षणें। सांगेन तुजकारणें। कृष्ण म्हणे उद्धवा॥ ४५॥
अमान्यमत्सरो दक्षो निर्ममो दृढसौहृद:।
असत्वरोऽर्थजिज्ञासुरनसूयुरमोघवाक्॥ ६॥
मान देखोनि सहसा। शिष्य सांकडों लागे कैसा। जेवीं गळीं लागला मासा। चरफडी तैसा सन्मानें॥ ४६॥ नांवें ऐकोनि बागुलातें। बाळ सांडूं पाहे प्राणातें। तेवीं ऐकतांचि सन्मानातें। भयें प्राणांतें सांकडें॥ ४७॥ चंडवातें जेवीं केळी। समूळ कांपे चळवळी। कां लहरींच्या कल्लोळीं। कांपे जळीं रविबिंब॥ ४८॥ सन्मानु तेणें पाडें। दृष्टीं देखोनि नावडे। महत्त्वें थोर सांकडें। अंगाकडे येवों नेदी॥ ४९॥ आदरें घेतां सन्मान। दृढ होईल देहाभिमान। सांडोनि मानाभिमान। हीनदीन होऊनि असे॥ १५०॥ समूळ नामरूप जाये। मज कोणी देखों न लाहे। ऐसी दशा जेणें होये। ते ते उपाये करीतसे॥ ५१॥ लौकिक देखोनि उद्वेगु। देहगेहांचा उबगु। एकलेपणीं अतिचांगु। न धरी संगु द्वैताचा॥ ५२॥ मज कोणीं न देखावें। मज कोणीं न वोळखावें। मज कोणीं न लाजावें। ऐसें जीवें वांछितु॥ ५३॥ मान देखोनियां दिठीं। लपे देह उपेक्षेच्या पोटीं। जेवीं चोर लागलियापाठीं। लपे संकटीं धनवंतु॥ ५४॥ मी एकु लौकिकीं आहें। ऐसें कोणा ठावें नोहे। ऐशी ऐशीदशा पाहे। मानु न साहे यालागीं॥ ५५॥ सांडावया अहंममता। मानु न पाहे सर्वथा। लौकिकीं सन्मानु घेतां। दृढ अहंता होईल॥ ५६॥ ज्याचें पोटीं दृढ अभिमान। ते सदा वांछिति सन्मान। जो सांडूं निघे अभिमान। तो मानापमान न पाहे॥ ५७॥ जेणें घेतला सन्मान। त्यासी नेघवे अपमान। तेथ सहजें आला देहाभिमान। यालागीं सन्मान नावडे॥ ५८॥ सन्मानु घ्यावया तत्त्वतां। ज्ञातेपण मिरवी ज्ञाता। ते संधीं वसे ममता। अर्थस्वार्थाचेनि लोभें॥ ५९॥ एवं नापेक्षी सन्मान। हें प्रथम शिष्याचें लक्षण। आतां ‘निर्मत्सरत्व’ संपूर्ण। तें सुलक्षण परियेसीं॥ १६०॥ सज्ञानामाजीं वैर। ज्ञातृत्वाचाचि मत्सर। तेथें देहाभिमानें केलें घर। अतिदुस्तर जीवासी॥ ६१॥ ज्ञानाभिमानाचीगोष्टी। वेंचुनी तपाचिया कोटी। दुजी करीत होता सृष्टी। अभिमान पोटीं ज्ञानाचा॥ ६२॥ ज्ञानाभिमानु दुर्वासासी। व्यर्थ शापिलें अंबरीषासी। म्यां सोशिलें गर्भवासासी। ज्ञानाभिमानासी भिऊनि॥ ६३॥ ज्ञानाभिमानु ब्रह्मयासी। नेलें गोपालवत्सांसी। मज होणें पडिलें त्या वेषांसी। ज्ञानाभिमानासी भिऊनि॥ ६४॥ उद्धवा ज्ञानाभिमान। सर्वां अभिमानांमाजीं कठिण। वसिष्ठ विश्वामित्र जाण। ज्ञानाभिमानें भांडती॥ ६५॥ एवं ज्ञानाभिमानांभेण। म्यां घेतलें गोवळेपण। मज मूर्ख म्हणती याज्ञिक ब्राह्मण। त्यांसी ज्ञानाभिमान कर्माचा॥ ६६॥ मुख्य माझीच हे ऐशीदशा। तेथें इतरांचा पाडु कायसा। ज्ञानाभिमानाचा दृढ फांसा। नुगवे सहसा ज्ञात्यासी॥ ६७॥ ज्ञानाभिमानाची जाती कैशी। उभा न ठाके मूर्खापाशीं। वैर लावी सज्ञानासी। समत्सरेंसीं वर्तवी॥ ६८॥ एवं निर्मत्सर होणें ज्यासी। तेणें सांडावें ज्ञानाभिमानासी। येरवीं तो ज्ञातयासी। समत्सरेंसीं नांदवी॥ ६९॥ ऐक मत्सराची सामग्री। देहीं देहाभिमान दृढ करी। तोही ज्ञातेपणाचेंबळ धरी। लोभ माझारीं अर्थस्वार्थे॥ १७०॥ इतुकी सामग्री जेथें होये। तोचि समत्सर द्वेषु वाहे। शुद्ध शिष्य हें न साहे। त्यागोनि जाये मत्सरु॥ ७१॥ मत्सराची जाती कैशी। अवश्य वसे ज्ञात्यापाशीं। मत्सर थोर पंडितांशीं। यावज्जन्मेंसीं न संडिती॥ ७२॥ पंडित भेटती समत्सर। लवणभंजन अतिनम्र। बोलती अतिमधुर। समत्सर छळणोक्तीं॥ ७३॥ मत्सरें पंडित येती क्रोधा। असदारोपणें करिती निंदा। एवढी मत्सराची बाधा। नातळे कदा सच्छिष्यु॥ ७४॥ मत्सरु ज्ञात्यातें न सोडी। मा इतर काइसी बापुडीं। शिष्य द्वेषाची गोष्टी सोडी। मत्सरु तोडी सर्वस्वें॥ ७५॥ मत्सर सांडूनि तत्त्वतां। शिष्यें रहावें सर्वथा। निर्मत्सरतेची कथा। ऐक आतां सांगेन॥ ७६॥ पुढूनि स्वार्थु नेतां। द्वेष उपजों नेदी चित्ता। भूतीं भगवंतु भावितां। द्वेषु सर्वथा येवों नेदी॥ ७७॥ निंदेचिया वाग्बाणीं। दारुण विंधिल्या दुर्जनीं। द्वेषु उपजों नेदी मनीं। हित मानीं निंदेचें॥ ७८॥ जेणें जेणें निजनिंदा केली। तो तो मानी हित माउली। पापमळांची क्षाळणता झाली। शुद्धकेली माझी वृत्ति॥ ७९॥ ऐसऐशिया विवंचना। द्वेषु आळों नेदी मना। निर्मत्सरता ते हे जाणा। दुसरी लक्षणा शिष्याची॥ १८०॥ यावरी जे ‘दक्षता’। तेही तुज सांगों आतां। शिष्याचीप्रागल्भ्यता। निजस्वार्थालागोनि॥ ८१॥ उगवल्या सावधान-भास्करा। नाशी निद्रेतंद्रेच्या अंधारा। होय धारणेचा दिवसु खरा। धृतीच्या दुपारा वर्ततु॥ ८२॥ त्या दिवसाचेनि लवलाहें। शमदमादि समुदायें। भक्तिपंथें चालताहे। मार्गीं न राहे क्षणभरी॥ ८३॥ तेथ उचलतां पाउलीं। निजबोधाची पव्हे ठाकिली। जेथ पांथिकांची निवाली। तृषा हरली तृष्णेची॥ ८४॥ तेथ निजग्रामींचे भेटले। सोहंसांगाती एकवटले। तेथूनि चुकणया मुकले। नीट लागले निजपंथीं॥ ८५॥ ऐकें बापा विचक्षणा। आळस विलंबु नातळे मना। त्या नांव ‘दक्षता’ जाणा। ‘तिसरी’ लक्षणा शिष्याची॥ ८६॥ जुनाट संग्रहो सवें होता। ते सर्व सांडिली ममता। सांडिल्याची क्षिती मागुता। न करी सर्वथा निजबोधें॥ ८७॥ देहीं दृढ धरावी अहंता। तेणें देहसंबंधीयांची ममता। देहाभिमानु नातळेचित्ता। गेली ममता न लगतां॥ ८८॥ देह नश्वरत्वें देखिला। विष्ठामूत्रांचा मोदळा। यालागींअहंकारु गेला। ‘सोहं’ लागला दृढभावो॥ ८९॥ दृढ वाढवूनि सोहंता। तेणें सांडविली अहंममता। हे ‘चौथी’ गा अवस्था। जाण तत्त्वतां शिष्याची॥ १९०॥ गुरु माता गुरु पिता। गुरु गणगोत तत्त्वतां। गुरु बंधु सुहृदता। निजस्वार्था शिष्याच्या॥ ९१॥ गुरुपरिचर्या नित्यकर्म। गुरुसेवा हाचि स्वधर्म। गुरु तोचि आत्माराम। सुहृदसंभ्रम सद्गुरूसी॥ ९२॥ ऐसें सद्गुरूसी ‘सुहृद’ पण। असावें शिष्यासीं संपूर्ण। हें ‘पांचवें’ गा लक्षण। सत्य जाण उद्धवा॥ ९३॥ चंचळत्वें चळु चित्ता। येवों नेदीच सर्वथा। निजीं निजरूपनिश्चळता। साधी सर्वथा सर्वस्वें॥ ९४॥ जऱ्ही चंचळ झालेंअंग। चित्त गुरुचरणीं निश्चळ चांग। अंगीं वाजतां लगबग। वृत्ति अभंग गुरुचरणीं॥ ९५॥ शरीर वर्ततां व्यापारा। ज्याचे हृदयीं नाहीं त्वरा। गुरुचरणीं धरिला थारा। हा शिष्यु खरा परमार्थी॥ ९६॥ ज्यासी हृदयीं चंचळता। तो शिष्य नव्हे निजस्वार्था। ज्याचे अंतरीं ‘निश्चळता’। तोचि परमार्था साधकु॥ ९७॥ ऐसी साधूनि निश्चळता। ज्यासी निजस्वार्थीं जिज्ञासुता। तोचि क्षणार्धे परमार्था। पावे तत्त्वतां गुरुवाक्यें॥ ९८॥ जैसा दीपु दीपें लाविला। लावितांचि तत्समान झाला। तैसानिश्चळास गुरु भेटला। तो तत्काल झाला तद्रूप॥ ९९॥ एवं अंतरीं जें निश्चळपण। तें शिष्याचेंश्रेष्ठ लक्षण। तो ‘सहावा’ गा गुण जाण। तेणें निर्दळण षड्विकारां॥ २००॥ षड्विकार देहावरी। शिष्यु देहबुद्धी हातीं न धरी। यालागीं मावळिजे विकारीं। गुरुवाक्येंकरीं वर्ततां॥ १॥ ऐसीसाध्य करूनि ‘निश्चळता’। साधूं रिघे जो परमार्था। धरोनियां अर्थजिज्ञासुता। होये भजता गुरुचरणीं॥ २॥ ज्यासी अर्थजिज्ञासा नाहीं। तो भजेना गुरुच्या ठायीं। जरी भजेल कहींबहीं। तरी स्वार्थें पाहीं विषयाच्या॥ ३॥ सांडोनियां विषयस्वार्था। इत्थंभूत जाणावया अर्था। जो भजे परमार्था। ‘जिज्ञासता’ त्या नांव॥ ४॥ ऐशी धरोनि जिज्ञासता। चढती आवडी परमार्था। आराणुक नाहीं चित्ता। निजस्वार्थाचेनि लोभें॥ ५॥ अतिप्रीती परमार्था। चढती वाढती आस्था। हे ‘सातवी’ लक्षणता। जाण तत्त्वतां शिष्याची॥ ६॥ हें सातवें लक्षण। परमार्थाचें अंगण। पावलें असे जाण। जिज्ञासुपणाचेनि नेटें॥ ७॥ गुरु बहुतांची साउली। शिष्यवर्गांची माउली। तेथ असूया जेणें केली। त्याची बुडाली निजप्राप्ती॥ ८॥ यालागीं गुरूचा जो जो अंकित। तो तो गुरुत्वेंचि मानित। असूया नाठवे मनांत। अतिविनीत सर्वांसी॥ ९॥ गुरुबंधु कनिष्ठ दीन। त्याच्या ठायीं उत्तम गुण। जाणोनि न मनीं आपण। असदारोपण तेथें करी॥ २१०॥ पुढिलांचा उत्तम गुण। त्यासी मिथ्या लावूनिदूषण। लटिकें म्हणे त्याचें ज्ञान। ‘असूया’ जाण त्या नांव॥ ११॥ प्रत्यक्ष भेटल्या वर्णी गुण। नम्र होवोनि वंदी चरण। सवेंचि मागें करी छळण। ‘असूया’ संपूर्ण या नांव॥ १२॥ सच्छिष्यु ये अर्थीं निर्मळ। हों नेदी असूयेचा विटाळ। उत्तम-मध्यम-प्राकृतमेळ। वंदी परी छळ करूं नेणे॥ १३॥ गुरूनें शिकविली वस्तुसमता। तेथ निरंतर ठेवूनि चित्ता। समभावें वंदी समस्तां। छळूं सर्वथा तो नेणे॥ १४॥ यापरी गा उद्धवा। छळूं नेणे कोणा जीवा। हा ‘अनसूयु’ म्हणावा। गुण आठवा शिष्याचा॥ १५॥ हे अष्टौमहामणिमाळी। अखंड ज्याच्या हृदयकमळीं। तो पावे सद्गुरूजवळी। नवी नव्हाळी भेटीची॥ १६॥ यावरी नववें लक्षण। तें जाण नवविधान। सत्यधूत संभाषण। वाग्विलापन सांडूनि॥ १७॥ सद्गुरूप्रति जाण। मृदु विनीत करी प्रश्न। सत्याचें सत्य तें गुरुवचन। मानी जाण निजभावें॥ १८॥ युक्ति वाढवून उदंड। नाना मतें अकांडतांड। साह्य संचरूनि पाखांड। गर्जत तोंड महावादें॥ १९॥ साधका बाधका युक्ती। माजीं संचरूनि छळणोक्ती। आपुली मिरवावी युक्ती। हें नाहीं चित्तीं शिष्याचे॥ २२०॥ सद्गुरूपुढें अतिजल्प। करणें तेंचि महापाप। जाणूनि सांडीवृथालाप। मिथ्या जल्प बोलेना॥ २१॥ शिष्याचें बोलणें कैसें। वाचा परिपक्क अमृत जैसें। बोल घोळले प्रेमरसें। प्रश्न पुसे एकांतीं॥ २२॥ मिथ्यावादाचीं अपक्व फळें। तुरटें तिखटें तोंडाळें। सदेठीं झडलीं पूर्वकाळें। बोले प्रांजळें परिपक्व॥ २३॥ बोलों नेणे छळ छद्म। स्पर्शों नेणें परवर्म। बोलीं नुपजवीं अधर्म। मनोधर्मक्षोभक॥ २४॥ व्यर्थ न करी आशंका। निंदेलागीं तो मुका। झकवूं नेणे लोकां। बाळां मूर्खां पंडितां॥ २५॥ बोलों नेणे अतिकर्कश। करूं नेणे उपहास। बोलामाजीं नधरी आस। बोले नैराश्य वैराग्य॥ २६॥ बोलीं बोलूं नेणे आटू। छळणोक्तीं नव्हे शठू। बहुबोलतां मानी विटू। मौननिष्ठु होऊनि राहे॥ २७॥ वादविवाद अतिवाद। नावडे कोणाचासंवाद। न करी बोलाचा विनोद। लौकिक शब्द न बोले॥ २८॥ वक्रोक्ति नाहीं जाण। बोलीं न बोले विंदाण। करूं नेणे प्रतारण। मिथ्या वचन न बोले॥ २९॥ पोटीं कार्य नाहींकरणें। हो हो म्हणवूनि झकविणें। हेंही नाहीं तया बोलणें। सदा पठणें हरिनाम॥ २३०॥ पश्चिमद्वारीचें कवाड। सदा वारेनि करी खडखड। तैशी न करी बडबड। वृथा तोंड पिटीना॥ ३१॥ करितां शब्दब्रह्मसंवादु। युक्तिबाधें विद्वांसा क्रोधु। अनिवार देखोनि बाधु। न बोले शब्दु शाब्दिक॥ ३२॥ न मिरवी शब्दज्ञान। न दाखवी आत्ममौन। न धरी वचनाभिमान। सदा स्मरण गुरूचें॥ ३३॥ बोलें नुपजवी उद्वेग। बोलावया न करी उद्योग। बोलीं नुठवी महावेग। अनुद्वेग बोलणें॥ ३४॥ सत्य आणि अतिमधुर। आइकतां आल्हादकर। सर्वांसी हितत्वें साचार। बोलेसनागर हरिकथा॥ ३५॥ प्रार्थूनियां सद्गुरूसी। बहु बोलणें नाहीं त्यासी। पुसणें एकाक्षरासी। निजसुखासी सेवावया॥ ३६॥ एवं शिष्याचीं नव लक्षणें। नवखंड पृथ्वीची आभरणें। निजकृपेनें नारायणे। भक्ताकारणें दीधलीं॥ ३७॥ हे नवरत्नमाळा गोमटी। जो घाली सद्गुरूच्या कंठीं। तो बैसे सायुज्याच्या पाटीं। उठाउठीं तत्काळ॥ ३८॥ या नवरत्नांचें पदक! ज्या शिष्याचे हृदयीं देख। तो सद्गुरूचा आवश्यक। विश्वासिक सर्वार्थीं॥ ३९॥ या नवरत्नांची अभिनव गांठी। जो सद्गुरूसीआणी भेटी। तो स्वराज्याच्या मुकुटीं। झळकत उठी महामणी॥ २४०॥ उद्धवा येथें आशंका धरिसी। ‘नांदतां स्त्रीपुत्रधनधान्येंसीं। निर्ममता शिष्यासी। कैसेनि त्यासी उपजली’॥ ४१॥
जायापत्यगृहक्षेत्रस्वजनद्रविणादिषु।
उदासीन: समं पश्यन् सर्वेष्वर्थमिवात्मन:॥ ७॥
येविखीं सादर ऐक। शिष्य निरसावया निजदु:ख। पावावया आत्मसुख। साधीविवेकसाधनें॥ ४२॥ विचारितां आत्मसुख। सर्व देहीं समान देख। विजातीय स्त्रीपुरुषवेख। सुखविशेख तेथ नाहीं॥ ४३॥ पाहें पां स्त्रीपुरुषदेहीं। आत्मा आत्मी हें तंव नाहीं। आत्मसुख आपुल्या ठायीं। असे पाहीं स्वत:सिद्ध॥ ४४॥ सुखाचिलागीं सर्वथा। झोंबती प्रपंचपदार्थां। ज्यासी गुरुवाक्य आलें हातां। अद्वैतता निजसुख॥ ४५॥ एकपणीं निजात्मसुख। हातां आलें नित्यनिर्दोख। आतां द्वैत वांछी तो अतिमूर्ख। थितें सुख नासावया॥ ४६॥ प्रपंचामाजीं असतें सुख। तरी कां त्यजिते सनकादिक। द्वैत तितुकें केवळ दु:ख। परम सुख अद्वैतीं॥ ४७॥ हेंचि साधकीं साधूनि ज्ञान। स्त्री पुत्र स्वजन धन। त्यांसी झाले उदासीन। अद्वैतीं मन लागलें॥ ४८॥ तेथ कोणाचें गृह क्षेत्र। कोण पुसे कलत्र पुत्र। धनधान्यसमृद्धि विचित्र। माझें स्वतंत्र देह न म्हणे॥ ४९॥ ऐकें उद्धवा यापरी। माझे भक्त संसारी। उदास झाले घरदारीं। तत्त्वविचारीं लिगटोनि॥ २५०॥ लिगटोनियां गुरुचरणीं। केली प्रपंचाची झाडणी। मग अत्यादरें गुरुभजनीं। निजसुखदानी गुरुरावो॥ ५१॥ गुरुसेवेसी अत्यादर। न राहे आठौ प्रहर। ठेविलें गुरुचरणीं अंतर। निरंतर निजभावें॥ ५२॥ उद्धवा येथ आशंका धरिसी। ‘जे देहावेगळें कोणे वस्तूसी। देखोनि पावला निजसुखासी। विदेहत्वासी अनुभवु’॥ ५३॥ देहीं असोनि विदेहता। प्रपंचीं असोनि अद्वैतता। आली शिष्याचिया हातां। तेही कथा परियेसीं॥ ५४॥
विलक्षण: स्थूलसूक्ष्माद्देहादात्मेक्षितास्वदृक्।
यथाग्निर्दारुणो दाह्याद्दाहकोऽन्य: प्रकाशक:॥ ८॥
स्थूलसूक्ष्मदेहांहून। आत्मा तो सर्वदा भिन्न। तेणें वेगळेपणें जाण। करी वर्तन प्रपंचीं॥ ५५॥ जीव उभय देहीं वर्ततां। प्राणियांसी देहातीतता। स्फुरत असे सर्वथा। तोचि तत्त्वतां नेणती॥ ५६॥ म्हणे ‘माझा डोळा दुखों लागला’। परी न म्हणे ‘मीचि दुखों आला’। माझा पावोचि मोडला’। परी ‘मी मोडला’ हें न म्हणे॥ ५७॥ यापरी देहीं वर्ततां। प्रत्यक्ष सांगे देहातीतता। हे आपुली आपणां अवस्था। न कळे भ्रांता देहभ्रमें॥ ५८॥ द्रष्टा दृश्य नव्हे सर्वथा। तें जड तो चेतविता। एवं आत्म्यासी विलक्षणता। जाण तत्त्वतां या हेतू॥ ५९॥ विलक्षणता दों प्रकारेंसीं। एक ते जाण द्रष्टेपणेंसीं। दुसरी ते स्वप्रकाशेंसीं। देहद्वयासी विलक्षण॥ २६०॥ द्रष्टा दृश्याहूनि भिन्न। तरी ‘तो म्हणसी झाला मन’। तें चार्वाकमत जाण। मनपण त्या नाहीं॥ ६१॥ अकरा इंद्रियांमाजीं जाण। मन तेंही एक करण। करणत्वें त्या जडपण। आत्मा नव्हे जाण या हेतू॥ ६२॥ प्रपंचीं मनाची दक्षता। तें मनपणेंचि नव्हे तत्त्वतां। जेवीं प्राणेंवीण नृपनाथा। न दिसे सर्वथा निजभाग्य॥ ६३॥ शस्त्राचेनि एकें घायें। छेदिले लोहार्गळसमुदाये। तें शस्त्राचें सामर्थ्यनोहे। बळ पाहें शूराचें॥ ६४॥ लोहाचा लोहगोळ। अग्निसंगें झाला इंगळ। धडधडां निघती ज्वाळ। तें नव्हे बळ लोहाचें॥ ६५॥ त्या लोखंडाऐसें जड मन। त्यासी चित्प्रभा प्रकाशून। प्रकृतीमाजीं प्रवर्तन। करवी जाण श्रेष्ठत्वें॥ ६६॥ पाव्यामाजीं रागज्ञान। केल्या अतिमधुर गायन। तो पाव्याचा नव्हे गुण। कळा जाण गात्याची॥ ६७॥ तैसा मनाचा जो व्यापार। तो जाण पां परतंत्र। नव्हे याचा तो स्वतंत्र। जड विचार मनाचा॥ ६८॥ सूर्याचेनि किरणसंगें। सूर्यकांतीं अग्नि निघे। तैसेंआत्म्याचेनि प्रकाशयोगें। मन सवेगें वर्तत॥ ६९॥ मन जडत्वें जड जाण। आत्मा स्वप्रकाशें प्रकाशघन। मन तें आत्म्याआधीन। आत्मा स्वाधीन आत्मत्वें॥ २७०॥ प्रत्यक्ष म्हणे ‘माझें मन’। परी ‘मीचि मन’ न म्हणे जाण। यालागीं मनाहूनि आत्मा भिन्न। वेगळेपणें साक्षित्वें॥ ७१॥ देहद्वयाहूनि भिन्न। दृढ साधूनि आत्मज्ञान। देहात्मबुद्धीचें छेदन। केलें जाण शिष्याचें॥ ७२॥ यालागीं देहात्मवादी। जे सत्य मानिती उपाधी। ते मिथ्या केली त्रिशुद्धी। शुद्ध बुद्धि ते नव्हे॥ ७३॥ मनावेगळा साधिला पाहा हो। तो तुं म्हणसी पितामहो। तो देवांमध्यें श्रेष्ठ देवो। हाही संदेहो न धरावा॥ ७४॥ हो का कल्पाचिये आदी। ब्रह्मयासी मौढॺ होतें आधीं। करूं न शके सृजनविधी। जड बुद्धि तयाची॥ ७५॥ त्यासी करूनि सावधान। म्यांचि प्रकाशिलें निजज्ञान। तेव्हां तो झाला ज्ञानसंपन्न। सृष्टिसृजन करावया॥ ७६॥ नाभिकमळीं जन्मलें केवळ। ब्रह्मा माझे पोटींचें बाळ। माझ्या दोंदावरी खेळे खेळ। आत्मा केवळ तो नव्हे॥ ७७॥ जितुका देवांचा समुदावो। तितुका प्रकाश्यचि पाहा हो। मी प्रकाशकु अनादि देवो। स्वप्रकाशस्वभावो आत्मा तो मी॥ ७८॥ देहद्वय आणि मन। त्यांहूनि आत्मा विलक्षण। हिरण्यगर्भाहूनि जाण। विलक्षणपण आत्म्याचें॥ ७९॥ हिरण्यगर्भचि परमात्मा। हेंही न घडे गा भक्तोत्तमा। मी हिरण्यगर्भाचाही आत्मा। माझी महिमा त्या कैंची॥ २८०॥ एवं हिरण्यगर्भउपासना। ते साधनरूपेंचि सेवना। परी केवळ आत्मपणा। न ये जाणा मायिकत्वें॥ ८१॥ तेचि विलक्षणता। आणोनियां दृष्टांता। साधीतसें तत्त्वतां। भक्तांच्या हाता चढे जेणें॥ ८२॥ अग्नि काष्ठामाजीं वसे। परी तो काष्ठचि होऊनि नसे। मथिल्या काष्ठीं प्रकट दिसे। जाळी उल्हासें काष्ठातें॥ ८३॥ तैसा आत्मा देहीं असे। तो देहोचि होऊनि नसे। ब्रह्मज्ञानें जेव्हां प्रकाशे। जाळी अनायासें देहभाव॥ ८४॥ असोनि एके ठायीं जाण। दाह्याहूनि दाहक भिन्न। तैसें प्रकाश्याहूनि जाण। भिन्नपण स्वप्रकाशा॥ ८५॥ अग्निदृष्टांतें निश्चित। आत्मयाचें निजतत्त्व। नित्यत्व आणि विभुत्व। असे साधित निजबोधें॥ ८६॥ काष्ठाचेनि योगें अग्नीसी। जन्मनिरोधुनामरूपांसी। पावे तेवीं आत्मयासी। विकारता तैसी देहयोगें॥ ८७॥
निरोधोत्पत्त्यणुबृहन्नानात्वं तत्कृतान्गुणान्।
अन्त:प्रविष्ट आधत्त एवं देहगुणान्पर:॥ ९॥
नाना काष्ठांच्या संयोगीं। काष्ठांचे गुण अग्नीच्या अंगीं। आले दिसती प्रत्यक्ष जगीं। अग्नि ते संगीं अलिप्त॥ ८८॥ काष्ठमथनें अग्नि प्रकटला। त्या नांव म्हणती ‘उपजला’। काष्ठाकारींआकारला। लहान थोर झाला तद्योगें॥ ८९॥ अग्नि काष्ठविकारवशें। त्रिकोण वर्तुळ वक्रआभासे। काष्ठाचेनि नि:शेष नाशें। ‘नाशला’ ऐसें मानिती॥ २९०॥ तैसा अज नित्य अव्ययो। त्यासी आकार-विकार जन्म-लयो। हा देहादिसंबंधस्वभावो। मिथ्या पहा हो मानिती॥ ९१॥ जें साधिलें अग्निदृष्टांतें। तें उद्धवासी न मनेल चित्तें। यालागीं निरूपण मागुतें। श्रीअनंतें मांडिलें॥ ९२॥ उद्धवा तूं ऐसें म्हणसी। ‘मूळीं सिद्धसंयोगु अग्निकाष्ठासी। तो काष्ठधर्मु लागला अग्नीसी। हे आम्हांसी मानलें॥ ९३॥ आत्मा नित्यसिद्धु अविकारी स्वांगें। जो गगनासी नातळे अंगें। त्यासी देहसंगु केवीं लागे। मग तद्योगें विकारी॥ ९४॥ आत्म्यासी देहसंगु घडे। हें बोलणेंचि तंव कुडें। ऐसें न घडतेंही जरी घडे। तरी तो सांपडे देहबुद्धीं॥ ९५॥ जो देहबुद्धीमाजीं आला। तो केवळ देहधारी झाला। पुढें केवीं जाय त्यागु केला।’ ऐसा उपजला संदेहो॥ ९६॥ कृष्ण म्हणे उद्धवासी। ऐसी शंका झणें धरिसी। मन घालोनि मनाचे मानसीं। या अर्थासी परियेसीं॥ ९७॥ हे शब्दचातुर्यासाठीं। हाता न ये गा जगजेठी। हे माझ्या गुप्ताचीही गुप्त गोठी। तुजसाठीं बोलतों॥ ९८॥
योऽसौ गुणैर्विरचितो देहोऽयं पुरुषस्य हि।
संसारस्तन्निबन्धोऽयं पुंसोविद्याच्छिदात्मन:॥ १०॥
ऐकें पुरुष जो पुरुषोत्तम। ज्या आधीन मायागुणग्राम। ज्यासी ‘ईश्वर’ ऐसा नामधर्म। शास्त्रानुक्रम बोलती॥ ९९॥ त्या ईश्वराची जे माया। ज्या उपजविलें नाना कार्या। जीव संसारी करावया। भ्रमु वायां वाढविला॥ ३००॥ तेथें चैतन्य जें प्रतिबिंबलें। तेंचि ‘जीव’ पणें वाच्याझालें। जेवीं थिल्लरीं चंद्रबिंब बुडालें। दिसे नाथिलें मूर्खासी॥ १॥ त्या थिल्लरासी नातळत। चंद्रमा असे गगनीं अलिप्त। तैसा आत्मा अविद्यातीत। अविद्या नातळत प्रतिबिंबाला॥ २॥ ‘अहमिति’ प्रथमाध्यासें। सूक्ष्म लिंगदेह मायावशें। नाना अनर्थकारी कैसें। वासनासौरसें उपजलें॥ ३॥ जरी लिंगदेह झालें सबळ। विषयभोगा दृढ मूळ। तरी भोगु नव्हे स्थूळ। सूक्ष्म भूतगोळ स्थूळावला॥ ४॥ स्थूळापासोनि स्थूळ देहो। पांचभौतिक घडला पहा हो। एवं उभयदेह अभिप्रावो। झाला निर्वाहो या रीतीं॥ ५॥ ऐसा उभय देहीं वर्ततां। दृढ लागली देहात्मता। तेणें वाढली अहंममता। मी कोण हें तत्त्वतां विसरला॥ ६॥ न कळे निजसुखाची गोडी। पडला विषयांचिये वोढी। पापपुण्यांचिया जोडी कोडी। पडिली बेडी सुबुद्धा॥ ७॥ देहाध्यासें देहधर्म। सत्य मानी वर्णाश्रम। मग आचरोंलागे कर्म। फळसंभ्रम वांछूनि॥ ८॥ राजा चक्रवर्ती निजमंदिरीं। निजेला सुमनशेजेवरी। तो स्वप्नीं होऊनि भिकारी। अंत्यजाघरीं अन्न मागे॥ ९॥ तेथ कुटका एकु यावया हाता। नीचासी म्हणे राजा रे तूं तत्त्वतां। परी मी राजा हें नाठवे चित्ता। स्वप्नीं भिक्षुकता दृढ झाली॥ ३१०॥ तैसी विसरोनि निजात्मता। फळें मागे देवां देवतां। मी देवांचा देवो तत्त्वतां। हें त्यासी सर्वथा नाठवे॥ ११॥ त्या स्वप्नाचेनि अतिअध्यासें। राजा वोसणावे ‘मी भिकारी’ ऐसें। ऐकोनि सेवकां येत हांसें। राजा स्वप्नवशें जल्पतु॥ १२॥ येथ गाढ मूळ अवस्थाघोरें। सर्वांग गडबडी निदसुरें। नागवें उघडें न स्मरे। निद्राभरें घोरत॥ १३॥ त्यासी थापटी पुरोहितु। जागा होतां होय विस्मितु। मग नागवेपणा आच्छादितु। सांगों लाजतु भिक्षुकता॥ १४॥ तेवीं अविद्या निद्रा उद्भटा। जल्पे मी देही मी करंटा। मी संपन्नु मी ज्ञाता मोठा। देहात्मनिष्ठा बडबडी॥ १५॥ तेणें निदसुरपणाचे लाहें। कर्माकर्मांचेपसरी पाये। हिताहित कोण पाहे। देहमोहें मोहितु॥ १६॥ तो गाढमूढ अवस्थेआंतु। होतादीर्घसंकल्पें लोळतु। लोभें अतिजल्पें जल्पतु। वोसणतु ‘मी माझें’॥ १७॥ तेथें दैवयोगें गडबडितु। अवचटें गुरुचरणीं आदळतु। निकटता देखोनि कृपावंतु। थापटितु निजबोधें॥ १८॥ ‘ब्रह्माहमस्मि’ ऐसी वाणी। एक वेळ पडली कानीं। अविद्या निद्रा गेली पळोनी। तो तत्क्षणीं जागिन्नला॥ १९॥ जागतांचि होय विस्मित। ‘मी देह’ म्हणतां लाजत। देहकर्म देखे निंदित। कर्मातीत ब्रह्म मी॥ ३२०॥ होआवया संसारबंधन। यासी अविद्याचि गा कारण। तिसी छेदावया जाण। खड्ग तीक्ष्ण ब्रह्मविद्या॥ २१॥ अविद्या निरसी ब्रह्मज्ञान। ते अवश्य ब्रह्माहोनि भिन्न। मोडलें म्हणसी अद्वैतपण। तें नव्हे जाण सिद्धांतीं॥ २२॥ प्रपंचु अज्ञानें लाठा। ज्ञानअज्ञानाच्या सत्त्ववाटा। फेडिजे कांटेन कांटा। मग खटपटा निमाल्या॥ २३॥ अविद्या जीवबंधनी। ब्रह्मविद्या बंधच्छेदनी। यासमूळ तुजलागुनी। सांगितल्या दोनी सविस्तर॥ २४॥ तेचि ब्रह्मविद्या जाणा। कैसेनि प्राप्त होय आपणा। ते पूर्वपीठविवंचना। सावधमना परियेसीं॥ २५॥
तस्माज्जिज्ञासयाऽऽत्मानमात्मस्थं केवलं परम्।
सङ्गम्य निरसेदेतद्वस्तुबुद्धिं यथाक्रमम्॥ ११॥
उद्धवा याचिलागीं नित्य। जिज्ञासें बैसवावें चित्त। तिसी विवेक उपजवित। सत्यासत्यविभागें॥ २६॥ तेथ असत्य तितकी ‘अविद्या’। जिचेनि जीवासी परम बाधा। तिच्या समूळ करावया छेदा। ‘सद्विद्या’ साधावी॥ २७॥ सद्विद्या साधिलिया पाहीं। केवळ वस्तु ते दूरी नाहीं। असे आपुल्याचि ठायीं। येचि देहीं कूटस्थ॥ २८॥ कार्यकारणसंघात। यामाजीं वस्तु असे व्याप्त। व्यापूनियां अलिप्त। नित्यमुक्त स्वभावें॥ २९॥ करूनि सद्विद्यासाधन। धरूनि आत्मानुसंधान। देहद्वयाचें निरसन। साधकें जाणसाधावें॥ ३३०॥ स्थूल नश्वरत्वे मिथ्या झालें। सूक्ष्म वासनामय कल्पिलें। ते कल्पनेसी मिथ्यात्व आलें। ब्रह्म उरलें निर्विकल्प॥ ३१॥ जैशा गगनीं नाना मेघपंक्ती। निजबळें त्या वर्षती। त्याचिशारदियेचे अंतीं। हरपोनि जाती आकाशीं॥ ३२॥ तैसी देहीं देहात्मबुद्धी। दृढ केली होती त्रिशुद्धी। तेचि विवेकाचिया प्रबोधीं। नास्तिकसिद्धी पावली॥ ३३॥ देह-असद्भावाची पदवी। ब्रह्मविद्येच्या सद्भावीं। खद्योततेजाची दिवी। सूर्ये देखावी कैसेनि॥ ३४॥ दोर भासला होता विखार। त्याचाकरितां निजनिर्धार। हारपोनियां सर्पाकार। उरे दोर निजरूपें॥ ३५॥ पाहतां विवेकाचेनि निवाडें। दोराचें सर्पत्व जेवीं उडे। तेवीं ब्रह्मसद्भावीं रोकडें। देह नातुडे सत्यत्वें॥ ३६॥ ‘नरदेह आश्रयून। ब्रह्मविद्या वाढली जाण। तें आपुलें जन्मस्थान। देहनिर्दळण केवीं करी’॥ ३७॥ उद्धवा तूं ऐसऐसी। आशंका झणीं धरिसी। ते अग्निउत्पत्तिदृष्टांतेंसीं। तुजपाशीं सांगेन॥ ३८॥
आचार्योऽरणिराद्य: स्यादन्तेवास्युत्तरारणि:।
तत्सन्धानं प्रवचनं विद्यासन्धि: सुखावह:॥ १२॥
दों काष्ठांचिया घसणीं। अग्नि काढिला मंथोनि। तो काष्ठें काष्ठ जाळूनी। अग्नि अग्निपणीं प्रज्वळला॥ ३९॥ तैसी ब्रह्मविद्या जाण। गुरुशिष्यसंवादमंथन। त्या मंथनाचें निरूपण। सावधान परियेसीं॥ ३४०॥ येथ आचार्य आद्य अरणी। शिष्य तो झाला उत्तरारणी। उपदेश तो मंथास्थानीं। संवादमंथानीं मंथावे॥ ४१॥ ये मंथनी जरी आळसु केला। तरी ज्ञानाग्नीचा अविर्भाव गेला। आपणिया आपण वंचला। थित्या मुकला साधना॥ ४२॥ धरितां आळसाची मागी। येव्हडा अनर्थु वाजे अंगीं। आठही प्रहर शिणताति योगी। या योगालागीं साधावया॥ ४३॥ निजस्वार्थालागीं सावधान। गुरुवचनाचें अनुसंधान। अविश्रम करितां मंथन। ब्रह्मज्ञान तैं प्रकटे॥ ४४॥ प्रकटलें ब्रह्मज्ञान। उरों नेदी देहाचें भान। दृश्य द्रष्टा दर्शन। करी प्राशन तात्काळ॥ ४५॥ कार्य कर्म आणि कर्ता। ज्ञान ज्ञेय आणि ज्ञाता। हें उरों नेदी सर्वथा। निजात्मता निजबोधें॥ ४६॥ निजबोधें संसार-दु:ख। निरसूनि दिधलें निजसुख। निजात्मसुखीं नि:शेख। मायागुण देख नासिले॥ ४७॥
वैशारदी सातिविशुद्धबुद्धि-
र्धुनोति मायां गुणसम्प्रसूताम्।
गुणांश्च सन्दह्य यदात्ममेतत्
स्वयं च शाम्यत्यसमिद्यथाग्नि:॥ १३॥
नाशावया निजमायागुण। शिष्य विशारद बुद्धिनिपुण। दैवी संपदेचें अधिष्ठान। सद्गुणीं संपन्न सर्वदा॥ ४८॥ ऐसा मुमुक्षु अधिकारवंतु। त्यासी शाब्दपरनिष्णातु। गुरूंनीं माथां ठेविला हातु। निजबोधु प्राप्तु तत्काळें॥ ४९॥ निजबोधीं बैसतां दृष्टी। गुणकार्य रिघे गुणांच्या पोटीं। तेव्हां गुणुचि गुणातें आटी। तमातें घोंटी मध्यमु॥ ३५०॥ तम खाऊन रजोगुण। अत्यंत उन्मत्त झाला जाण। त्याचें देखोनि उन्मत्तपण। सत्त्वें सत्त्वगुण खवळला॥ ५१॥ जेव्हां खवळला सत्त्वगुण। त्यासी न साहे दुजेपण। रजोगुणांचें प्राशन। केलें जाण तत्काळ॥ ५२॥ केवळ सत्त्वाचा स्वभावो। तेणें निजसुखाचा अनुभवो। क्षणक्षणां नीच नवा पहावो। अतिनवलावो अनुभवीं॥ ५३॥ तेणें सुखानुभवें देखा। रजतमाच्या बीजकणिका। ज्या सृष्टिसृजनीं उन्मुखा। त्याही नि:शेखा जाळिल्या॥ ५४॥ तेव्हां गुण प्रसवती माया। शोधित सत्त्वें आणिली लया। ते सत्त्ववृत्ति एकलिया। अद्वैततया उरलीसे॥ ५५॥ तेव्हां ‘ब्रह्माहमस्मि’ लक्षण। तेंही हों लागलें क्षीण। सोहंहंसाची बोळवण। ते संधी जाण होतसे॥ ५६॥ तेथ देहींचें गेलें देहपण। जन्ममरणा आलें मरण। विश्वाचें न दिसे भान। आनंदघन कोंदला॥ ५७॥ तेणें सुखस्वरूप झाली दृष्टी। आनंदमय झाली सृष्टी। परमानंदें चढली पुष्टी। स्वानंदे मिठी घातली॥ ५८॥ त्या सुखाची मर्यादा। काइसेनिही नव्हे कदा। जेथ मौन पडिलें वेदां। वृत्ति तत्पदा पावली॥ ५९॥ द्वैत सर्वथा नाहीं पुढें। यालागीं वृत्तीची वाढी मोडे। तेव्हा तेही सुखस्वरूपीं बुडे। पुढें वाढे तें नाहीं॥ ३६०॥ जैसा निरिंधन अग्नी। जाय निजतेजीं मिळूनी। तैशी वृत्ति अद्वैतपणीं। मिळे मिळणीं सुखरूपीं॥ ६१॥ गंगा सागर मीनली। ते समुद्रचि होऊनि ठेली। कां लवणजळां भेटी झाली। मिठी पडली जळत्वें॥ ६२॥ दीपीं दीपु एकवटला। मिळणीं एकुचि होऊनि ठेला। तैसा वृत्तीचा लयो झाला। निर्व्यंग पावला निजसुख॥ ६३॥ तेव्हां आत्मा एक अद्वैत। तेंही म्हणणें नाहीं तेथ। एवं द्वैताद्वैतातीत। नित्य निश्चित निजात्मा॥ ६४॥ तो ज्ञानस्वरूप स्वप्रकाश। अविकारी अविनाश। अकर्ता अभोक्ता उदास। निर्विशेष निजरूप॥ ६५॥ तो अदेही अगोत्र। अचक्षु अश्रोत्र। अमनस्क अमंत्र। सर्व मंत्र-मंत्रार्थ जो॥ ६६॥ जो अज आद्य अप्रमेय। अतर्क्य अलक्ष्य अव्यय। नामरूपादि अभाव्य। भावना भाव ते शून्य॥ ६७॥ जो भोग्य भोग नव्हे भोक्ता। जो कार्य कर्म नव्हे कर्ता। कर्ता अकर्ता या वार्ता। जेथ सर्वथा निमाल्या॥ ६८॥ जो अविनाशी अभंग। जो शुद्ध बुद्ध असंग। देहद्वयाचा संग। ज्यातें अंग स्पर्शेना॥ ६९॥ आत्म्यावेगळें तें अनित्य। हा पूर्वनिश्चय होतां सत्य। आतां बुडाले नित्यानित्य। सबराभरित निजात्मा॥ ३७०॥ नेणपण निमालें सर्वथा। बुडाली जाणपणाची अवस्था। गुणगुणीगुणातीतता। हेही तत्त्वतां तेथ नाहीं॥ ७१॥ उद्धवा परमात्मा तो तत्त्वतां। हा माझा निश्चयो सर्वथा। तोचि उपनिषदर्थें अर्थितां। निजात्मता प्रतिपाद्य॥ ७२॥ येथ पावलियाहि वृत्ति। होय संसारनिवृत्ति। हाचि वेदांतीं सिद्धांतीं। निश्चयो निश्चितीं केला असे॥ ७३॥ येथूनि कार्य-कर्मकर्तव्यता। नि:शेष खुंटली सर्वथा। निजीं निजरूप निजात्मता। जाण तत्त्वतां पावल्या॥ ७४॥ हे अद्वैतश्रुतिसुरवाडें। सद्गुरुकृपा-उजियेडें। वृत्ति निजात्मपदा चढे। भाग्य केव्हडें पाहें पां॥ ७५॥ मी वंद्य देवादिदेवां। त्या माझाही निजज्ञानठेवा। परम कृपेनें उद्धवा। तुज म्यां आघवा दीधला॥ ७६॥ तुज होआवया निवृत्ती। हाचि अर्थु नानासंमतीं। सांगितला परम प्रीतीं। जाण निश्चितीं उद्धवा॥ ७७॥ आतां देहादिक जे असंत। अतिनिंद्यत्वें कुत्सित। तेथ आतळों नेदीं चित्त। होई अलिप्त परमार्थीं॥ ७८॥ हे तुज झाली अलभ्य प्राप्ती। परी यत्न करावा अतिनिगुतीं। येथ मतांतरें छळूं येती। तेही उपपत्ती परियेसीं॥ ७९॥
अथैषां कर्मकर्तॄणां भोक्तॄणां सुखदु:खयो:।
नानात्वमद्य नित्यत्वं लोककालागमात्मनाम्॥ १४॥
नाना फळें अभिलाषिते। कर्माचे जे कर्मकर्ते। सुखदु:खांचे जे भोक्ते। अनेकत्वें येथें अनंत॥ ३८०॥ म्हणती जे मानिती एकात्मता। तरी एकाचेनि सुखें सुख समस्तां। कां एकाचेनि पापें पापता। न घडे सर्वथा सकळांसी॥ ८१॥ ऐसें कर्मवादियांचें मत। जीव नित्य आणि अनंत। मुख्य ईश्वरचि नाहीं म्हणत। कर्तें येथ निजकर्म॥ ८२॥ मीपणें जें स्फुरे स्फुरण। ते प्रतिशरीरीं जीव भिन्न। त्यांच्या स्वरूपाचें प्रमाण। कर्ता भोक्ता जाण म्हणताति॥ ८३॥ ऐकें विवंचना सावचित्त। लोक काळ श्रुति जीवित। अनेकत्वें अनित्य। हें वेदांतमत पैं माझें॥ ८४॥ उद्धवा कर्मवाद्यांचें ऐसें मत। सत्य मानील तुझें चित्त। तरी बुडवील निजस्वार्थ। अंगीं अनर्थ वाजेल॥ ८५॥ तोचि अनर्थ म्हणसी कैसा। तरी कर्मवाद्यांचा भावो ऐसा। हा पूर्वपक्षाचा ठसा। अभिप्रावो ऐसा परियेसीं॥ ८६॥ परमात्मा निर्विकाररूप। एक न मानिती सर्वस्वरूप। संन्यासु ऐकतां म्हणती पाप। मतजल्प मतवाद्यां॥ ८७॥ त्यागसंन्यास जे करिती। त्यांतें अनधिकारी म्हणती। कर्म मुख्यत्वें मानिती। वैराग्य निंदिती निजमतें॥ ८८॥ कर्म करोनि भोगिजे सुख। तें कर्म त्यजिती नि:शेख। निष्कर्मासी कैंचें सुख। परम दु:ख तो त्यागु॥ ८९॥ वैराग्य न घडावया कारण। चौं प्रकारीं बोलती जाण। तेंही सांगेन मी लक्षण। सावधान परियेसीं॥ ३९०॥ म्हणती अनित्य असते कांहीं। तरी वैराग्य घडतें ते ठायीं। येथ अनित्यचि नाहीं। वैराग्यें कायीं त्यजावें॥ ९१॥ वैराग्य होये चौं प्रकारीं। मीमांसक नित्य मानिती चारी। निजमताचा गर्व भारी। चाऱ्ही खरीं नित्यत्वें॥ ९२॥ कर्मप्रकाशक वेद मूळ। तो आगम नित्य मानी अढळ। जीव नित्यचि म्हणे सकळ। भोगकाळ तोही नित्य॥ ९३॥ स्वर्गादि लोक भोगस्थान। वेदु बोलिला आपण। मिथ्या नव्हे वेदवचन। चाऱ्ही प्रमाण नित्यत्वें॥ ९४॥ उद्धवा यापरी पाहीं। म्हणती अनित्य येथ नाही। वैराग्यें करावें कायी। मिथ्या पाहीं वैरागी॥ ९५॥ हो कां भोग्य जरी नश्वर होतें। अथवा मायिक कांहीं असतें। तरी वैराग्य संभवतें। तें तंव येथें असेना॥ ९६॥
मन्यसे सर्वभावानां संस्था ह्यौत्पत्तिकी यथा।
तत्तदाकृतिभेदेन जायते भिद्यते च धी:॥ १५॥
जीवाच्या भोग्यपदार्था। स्रक-चंदनादि-वनिता। त्यांसी प्रवाहरूपें नित्यता। म्हणती तत्त्वतां स्वमतें॥ ९७॥ आत्मा आहे जग नाहीं। हें घडलेंचि नाहीं कांहीं। जळेंवीण समुद्र पाहीं। उरला नाहीं सर्वथा॥ ९८॥ सृष्टि प्रवाहरूपें नित्य। पितृपुत्रत्वें अखंड वाहत। कर्मास्तव यातायात। सृष्टि अनित्य हें न घडे॥ ९९॥ नित्यासी ईश्वर कर्ता। हेंही न घडे गा तत्त्वतां। नित्याचा कोण नव्हेकर्ता। ईश्वरु सर्वथा येथ नाहीं॥ ४००॥ वेदांती स्वरूपभूत। आत्मा ज्ञानस्वरूप म्हणत। हेंही नघडे गा येथ। ऐसें स्वमत बोलती॥ १॥ घटपटाकार पाहातां। ज्ञानासी त्रिक्षणावस्था। आत्मा ज्ञास्वरूप म्हणतां। लाज सर्वथा त्यां न ये॥ २॥ एवं वेदांत्याच्या ठायीं। आत्मनिश्चयो दृढनाहीं। ‘मोक्ष’ म्हणती जो कांहीं। तोही पाहीं मिथ्याचि॥ ३॥ इंद्रियसुखेंवीण सुख। मोक्ष म्हणती ते अविवेक। इंद्रियद्वारा जीवांसी हरिख। भोगितांही मूर्ख न मानिती॥ ४॥ देहेंवीण विदेही। सुख भोगिजे कोणें कंहीं। अद्वैतवादी जल्पती कांहीं। तें सत्य नाहीं सर्वथा॥ ५॥ जीवासी जेणें सुखप्राप्ती। ते इंद्रियेंचि नाहीं म्हणती। डोळे फोडूनि देखणे होती। तैसी वदंती वेदांत्यां॥ ६॥ येथ ईश्वरुचि नाहीं फुडा। मा तो फळ देईल हा बोल कुडा। अद्वैतवादी मूर्ख गाढा। नागवी मूढां वैराग्यें॥ ७॥ गांव ठावो ना पदवी। तो मिथ्या ईश्वरु धरोनि जीवीं। कर्मफळीं नैराश्य करवी। अथवा सांडवी कर्मातें॥ ८॥ नरदेहीं ज्ञान उपजलें। तेणें देहचि नाशिलें। फळें वृक्षमूल छेदिलेंकोणीं देखिलें कोठेंही॥ ९॥ ज्ञानाचे परिपाकदशें। म्हणती अवघा संसारुचि नाशे। सृष्टिप्रवाहरूपें नित्य असे। नित्य नासे कैसेनि॥ ४१०॥ मनुष्याचे हृदयींचें ज्ञान। तेणें संसाराचेंनिर्दळण। तरी खद्योततेजें जाळिले जाण। ग्रहगण शशी सूर्य॥ ११॥ एवं करूं जातां निवृत्ति। केले कष्ट ते मिथ्या होती। इंद्रियेंवीण सुखप्राप्ति। नव्हे निश्चितीं जीवासी॥ १२॥ यालागीं निवृत्ति ते वृथा कष्ट। सर्वांसी प्रवृत्तिच अतिश्रेष्ठ। कर्में करोनियां उद्भट। फळें वरिष्ठ भोगावीं॥ १३॥ संसार म्हणती मायिक। ते जाणावे केवळ मूर्ख। संसारावेगळें सुख। नाहीं देख जीवासी॥ १४॥ मनुष्याधिकारें सुखप्राप्ति। यालागीं देव मनुष्यत्व वांछिती। वेदांती मनुष्यत्व निंदिती। केवीं ते युक्ती मानावी॥ १५॥ वेदें अधिकारु बोलिला। तो वेदुचि इंहीं वेडा केला। यांचे लागला जो बोला। तो नागवला सर्वस्वें॥ १६॥ वेदाचें वेदवचन। सर्वार्थीं तें प्रमाण। मिथ्या म्हणतो तें वेदवचन। थोर सज्ञान हे झाले॥ १७॥ ऐशी मीमांसकांची वदंती। नानापरींच्या चाळिती युक्ती। आपुलें मत स्थापिती। तें मिथ्या निश्चितीं उद्धवा॥ १८॥ लापनिका ऐसें मिथ्या त्यांचें मत। अंगीकरूनिप्रस्तुत। प्रपंचअनर्थता दावित। दृढ स्थापित वैराग्य॥ १९॥
एवमप्यङ्ग सर्वेषां देहिनां देहयोगत:।
कालावयवत: सन्ति भावा जन्मादयोऽसकृत्॥ १६॥
म्हणें आइकें बापा उद्धवा। हा मिथ्या मतवादु आघवा। म्हणसी कैसेनि जाणावा। विवेक करावा मतांचा॥ ४२०॥ निवृत्ति ते केवळ कष्ट। म्हणती प्रवृत्ति अतिश्रेष्ठ। प्रवृत्तीमाजीं परम कष्ट। मरण अरिष्ट अनिवार॥ २१॥ धरोनियां जन्ममूळ। अखंड लागलासे काळ। लवनिमिष पळपळ। काळ वेळ साधित॥ २२॥ जैसें संवचोराचें साजणें। तैसें काळाचें जोगवणें। वेळ आल्याजीवेंप्राणें। नाहीं राखणें सर्वस्वें॥ २३॥ काळु न म्हणे हाट घाट। न म्हणे अवसी पहांट। न म्हणे देश विदेश वाट। नाशी उद्भट निजतेजें॥ २४॥ करितां प्रवृत्तीचे कष्ट। अवचितां मृत्यूचा चपेट। अंगीं वाजे जी उद्भट। अहा कटकट ते काळीं॥ २५॥ जीवीं वासनेच्या थोर हांवा। म्हणे गेलोंमेलों धांवा पावा। कोण निवारी मृत्युप्रभावा। उपावो तेव्हां चालेना॥ २६॥ काळु मारोनि नोसंडी। यातना भोगवी गाढी। सवेंचि गर्भवासीं पाडी। जेथ दु:खकोडी अनिवार॥ २७॥ मातेच्या जठरकुहरीं। विष्ठामूत्रांच्या दाथरीं। अधोमुख नवमासवरी। उकडी भारी जठराग्नी॥ २८॥ विष्ठालेपु चहूंकडे। नाकीं तोंडीं कृमी किडे। गर्भवासींचे कष्ट गाढे। कोणापुढें सांगेल॥ २९॥ कट्वम्ललवणमेळें। गर्भवतीचे पुरती डोहळे। त्वचेवीण गर्भांग पोळे। तेणें दु:खें लोळे अतिदु:खी॥ ४३०॥ ते गर्भोदरींची व्यथा। नेणती माता आणि पिता। तेथ नाहीं कोणी सोडविता। जीवींची व्यथा जीव जाणे॥ ३१॥ ज्या ठायाची करूं नये गोठी। प्रकट दावूं नये दिठी। ते योनिद्वारें अतिसंकटीं। जन्म शेवटीं जीवासी॥ ३२॥ जे नित्य मूत्राची न्हाणी। कीं नविया नरकाची खाणी। जे रजस्वलारुधिराची श्रेणी। जन्म तेथोनी पावती॥ ३३॥ अपवित्र विटाळशीचें रुधिर। तें गोठोनि झालें जी शरीर। निंद्यद्वारें जन्मोनि नर। आम्ही पवित्र म्हणविती॥ ३४॥ गर्भवासाहूनि गाढें। दु:खकोण आहे पुढें। मतवादी बोले तें कुडें। सुख नातुडे प्रवृत्तीं॥ ३५॥ एके जन्में जन्म न सरे। एकें मरणें मरण नोसरे। कोटि कोटि जन्मांचे फेरे। काळ योनिद्वारें करवितु॥ ३६॥ पुढतीं जन्म पुढतीं मरण। अनिवार लागलें जाण। प्रवृत्तीमाजीं सुख कोण। दु:ख दारुण भोगवी॥ ३७॥ जन्ममरणांमाजिले संधीं। आणिकही थोर दु:ख बाधी। त्या दु:खाची दु:खसिद्धी। ऐक त्रिशुद्धी सांगेन॥ ३८॥ धाडीभेणें पळतां थोर। आडवे नागवती चोर। तैसें जन्ममरणांचें अंतर। षड्विकार राखती॥ ३९॥ षड्विकारांच्या पतिव्रता। षडूर्मी लागल्या जीविता। एवं प्रवृत्तीमाजीं परम व्यथा। सुख सर्वथा असेना॥ ४४०॥ कर्मवादियांच्या मतां। जीवु स्वतंत्र कर्मकर्ता। म्हणती ते मिथ्या वार्ता। परतंत्रता प्रत्यक्ष॥ ४१॥
अत्रापि कर्मणां कर्तुरस्वातन्त्र्यं च लक्ष्यते।
भोक्तुश्च दु:खसुखयो: कोन्वर्थो विवशं भजेत्॥ १७॥
जीवासी असती स्वतंत्रता। तरी तो दु:खभोगु न भोगिता। सदा सुखीचि असता। पापें न करिता अळुमाळु॥ ४२॥ जीवु बापुडें सदा दीन। कर्में करूनि कर्माधीन। कर्मफळदाता तो भिन्न। सुखदु:खें जाण तो भोगवी॥ ४३॥ यालागीं ईश्वराची सत्ता। तो कर्मफळाचा दाता। जीवु सुखदु:खांचा भोक्ता। स्वतंत्रता त्या नाहीं॥ ४४॥ ऐसें लक्षितां लक्षण। जीवु तितका पराधीन। पराधीनपणें जाण। भोगी दारुण सुखदु:ख॥ ४५॥ मजलागीं दु:ख होआवें। ऐसें कोणी भावीना जीवें। न वांछितां दु:ख पावे। येणें न संभवे स्वतंत्रता॥ ४६॥ श्रुतिस्मृतींतें विचारितां। जीवासी नाहीं स्वतंत्रता। पराधीनपणें वर्ततां। भोगी अप्रार्थितां सुखदु:ख॥ ४७॥ वादी परिहार करिती। साङ्ग कर्म जे नेणती। ते ते जीव दु:खी होती। सुख पावती कर्मज्ञ॥ ४८॥ जे सदाचार श्रोत्री। जे याज्ञिक अग्रिहोत्री। जे उभयलोकव्यापारी। साङ्ग करी कर्मातें॥ ४९॥ जे अविकळ अव्यंग। कर्में करूनियां साङ्ग। उभय लोकीं सुखभोग। कर्मयोग भोगिती॥ ४५०॥ कर्मीं ज्याची योग्यता। तो सुखभोगाचा भोक्ता। हेंहि न घडे गा सर्वथा। ऐक आतां सांगेन॥ ५१॥
न देहिनां सुखं किञ्चिद्विद्यते विदुषामपि।
तथा च दु:खं मूढानां वृथाहङ्करणं परम्॥ १८॥
कर्माचे जे तत्त्वतां ज्ञाते। तेही दु:खी देखों येथें। सुखी देखिजे मूर्खातें। जे कर्मातें नातळती॥ ५२॥ चुकोनि यज्ञपुरुषा अच्युतातें। अग्रिहोत्री करिती यागातें। तें स्वकर्मचि त्यांचेंत्यांतें। विपरीतार्थें फळतसे॥ ५३॥ अग्नि तो तंव स्वरूप माझें। श्रुतिमंत्र ते तंव माझीं बीजें। आणिहोमद्रव्य जें जें। तेंही माझें स्वरूप॥ ५४॥ ऐशिया मज सर्वगतातें। नास्तिक्य देवोनि निजचित्तें। अनीश्वरवादी करिती यागातें। तोचि त्यांतें बद्धक॥ ५५॥ स्रुक स्रुवा आणि प्रणीतापात्र। मांडूं शिकले कर्मतंत्र। मज निजात्मयाचें चुकलें सूत्र। तेणेंचि अपवित्र तो यागु॥ ५६॥ सकळ हें सर्वमुखीं। मज अर्पितसे यज्ञपुरुखीं। हें न मनिजे याज्ञिकीं। बुद्धी अल्प कीं सकाम॥ ५७॥ मज न अर्पितां जें सुकृत। तेंचि जाण दु:ख दुरित। विषा नांव अमृत म्हणत। तैसें सुकृत सकाम॥ ५८॥ मातें न पवतां जो स्वर्ग। तो जाणावा उपसर्ग। तेथींचा भोग तो महारोग। मूढ उद्योग याज्ञिकां॥ ५९॥ कर्मीं कर्म विगुण होत। तेथ स्मरावा मी अच्युत। नामें न्यून तें संपूर्ण होत। हें सामर्थ्य नामाचें॥ ४६०॥ तो मी अंगें आपण। याज्ञिकां मागों गेलों अन्न। मज नेदितीच ते ब्राह्मण। कर्मठपण तें कर्माचें॥ ६१॥ मज यज्ञपुरुषातें सांडून। करिती इंद्रादिकांचें भजन। ते इंद्रादिक मजअधीन। कर्मवैगुण्य हें त्यांसी॥ ६२॥ जे कर्म न करिती कृष्णार्पण। त्यांचें मळिण प्राक्तन। तेणें इहलोकीं दरिद्रता जाण। पडे विघ्न परलोकीं॥ ६३॥ चुकवूनियां निजमुख। सर्वांगीं खिरीसाकरेचा देख। लेपु देतां न वचे भूक। अधिक दु:ख तेणें होय॥ ६४॥ तैसें मज चुकवूनि यज्ञपति। जे यागातें आचरती। बाळविधवे गर्भप्राप्ती। तैशीं फळें येती त्या यागा॥ ६५॥ कर्मउद्देशें द्रव्य मागतां। यज्ञफळ ने द्रव्यदाता। याज्ञिक तो राहे रिता। मी कर्ता हा अभिमानु॥ ६६॥ जैसा चाटू खिरीआंतु। चाटुवेंचि खिरी वाढिजेतु। चाटू खरकटल्या सांडितु। भोक्ते भोगितुपरमान्न॥ ६७॥ सरस ऊंस घालिजे घाणा। रस पिळूनि भरे भाणा। रिता चोपटीं करकरी घाणा। ते गती जाणा याज्ञिकां॥ ६८॥ तैसे याज्ञिक यज्ञ आचरत। द्रव्यदात्यासी तें फल होत। पशुहिंसा याज्ञिकां प्राप्त। दोषी होत अभिमानें॥ ६९॥ एवं कर्मकुशळ याज्ञिक। यापरी ते भोगिती दु:ख। कर्म नेणती जे मूर्ख। ते परम सुख भोगिती॥ ४७०॥ नेणती कर्माच्या घडामोडी। परी माझी श्रद्धा पोटीं गाढी। तेणें उल्लंघोनि दु:खकोडी। निजात्मगोडी भोगिती॥ ७१॥ कर्मीं कर्मादरु नेणत। माझ्या ठायीं श्रद्धायुक्त। भाळे भोळे माझे भक्त। सुख अनंत पावले॥ ७२॥ काय कर्म केलें गोपाळीं। जे अखंड मजसवें गोकुळीं। भोगिली निजसुखनव्हाळी। करोनि होळी कर्मांची॥ ७३॥ पाहतां गोपिकांचें कर्म। कर्ममार्गीं निंद्य धर्म। पावल्या माझें परम धाम। जीवीं पुरुषोत्तमआवडला॥ ७४॥ खग-मृग-गो-सर्पादि समस्त। माझे निजपदीं झाले प्राप्त। याज्ञिकां कर्माभिमान बहुत। दु:ख भोगित निजकर्में॥ ७५॥ केवळ कर्मठ कर्मजड। आम्ही सर्वज्ञ ज्ञाते दृढ। हा अभिमान धरिती मूढ। दु:ख वाड तयांसी॥ ७६॥ दीपीं पतंगा मरण देख। तो उडी घालितां मानी सुख। तैसें कर्मठां कर्म केवळ दु:ख। मानिती सुख अभिमानें॥ ७७॥ अभिमानेंचि सर्वथा। नसती जीवासी म्हणे स्वतंत्रता। तेंही न घडे विचारितां। ऐक आतां सांगेन॥ ७८॥
यदि प्राप्तिं विघातं च जानन्ति सुखदु:खयो:।
तेऽप्यद्धा न विदुर्योगं मृत्युर्न प्रभवेद्यथा॥ १९॥
दु:ख निरसूनि सुखप्राप्ती। यालागीं कर्मे आचरती। कर्मवादी ज्ञाते म्हणविती। तेही नेणती दु:खनाशु॥ ७९॥ कर्में करितां नाशु नोहे। ऐसें दु:ख कोण आहे। पुसशील तरी पाहें। यथान्वयें सांगेन॥ ४८०॥ मरणांवरतें दु:ख चढे। ऐसें दु:ख तंव नाहीं पुढें। तें निवारूं नेणती बापुडे। अति बळ गाढें मृत्युचें॥ ८१॥ आंतु घालितां हातु पोळे। तेणें उन्हवणेंन घर न जळे। तैसा कर्में मृत्यु न टळे। प्रबळबळें अनिवार॥ ८२॥ मारिता मृत्यु जेणें मारिजे। तो उपावो कर्मठीं नेणिजे। कर्मांमाजीं जेणें असिजे। अचुक पाविजे तेणें मृत्यु॥ ८३॥ अंतीं येईल मरणदु:ख। जंव जीजे तंव भोगिजेल सुख। हें बोलेणे बोलती मूर्ख। जितां सुख त्यां कैंचें॥ ८४॥
कोन्वर्थ: सुखयत्येनं कामो वा मृत्युरन्तिके।
आघातं नीयमानस्य वध्यस्येव न तुष्टिद:॥ २०॥
जितांही सुखाची वार्ता। कर्मठां नाहीं सर्वथा। तेही सांगेन मी कथा। ऐक आतां उद्धवा॥ ८५॥ विखे रांधिलें मिष्टान्न। तें गोड न म्हणती सज्ञान। पुढें देखोनियां मरण। नि:शेष तें अन्न सांडिती॥ ८६॥ आगी लागलिये घरीं। क्षण न राहिजे चतुरीं। मरण नादळतां उरीं। सांडूनिदूरी पळताति॥ ८७॥ धाडी आल्या निजद्वारीं। गोड न लगे साखरखिरी। तैसा मृत्यु जाणितलिया शरीरीं। विषयाकारीं सुख कैंचें॥ ८८॥ दाढीसी लागलिया आगी। तो शृंगारु न मनी मुखालागीं। तैसा नीच नवा मृत्यु अंगीं। विषयसंगीं सुख कैंचें॥ ८९॥ उठिल्या मरणान्त व्यथा। जन धन अन्न आणि कांता। सुख नेदितीच सर्वथा। झालीं वृथा समूळ॥ ४९०॥ अंतकाळीं स्त्री धन। झालीं दु:खासीच कारण। त्यांसी सांडूनि न निघती प्राण। तळमळी जाण प्राणांतीं॥ ९१॥ जैसा सुळीं द्यावया जो नेईजे। त्यासी नाना समारंभु कीजे। मुखीं घालिती पंचखाजें। तेणें तो नव्हिजे सुखिया कीं॥ ९२॥ तैसें संमुख असतां मरण। विषयसुखें सुखावे कोण। विषय त्यागिती सज्ञान। मूर्खासी जाण आसक्ती॥ ९३॥ देहदु:खाची अर्धघडी। नाशी विषयसुखाची कोडी। विषयालागीं शिणती वेडीं। अविनाश गोडी निर्विषयीं॥ ९४॥ एवं या लोकांच्या ठायीं। सुख सर्वथैव नाहीं। लोकांतरीं म्हणती कांही। न घडे तेंही उद्धवा॥ ९५॥
श्रुतं च दृष्टवद्दुष्टं स्पर्धासूयात्ययव्ययै:।
बह्वन्तरायकामत्वात्कृषिवच्चापि निष्फलम्॥ २१॥
जैसा देखिला हा लोक। तैसाचि श्रुत स्वर्गादिक। अनादि दोषयुक्त देख। सदोष मूर्ख वांछिती॥ ९६॥ स्वर्गीं म्हणसी दोष कोण। ऐक तयांचें लक्षण। स्पर्धा असूया नाश जाण। तप क्षीण दिविभोगें॥ ९७॥ तपसंपत्ति समान पाही। स्पर्धा मांडी त्याच्या ठायीं। मज समान भोगुपाही। तैं सुख नाहीं मानसीं॥ ९८॥ आपणाहोनि अधिक पदीं। त्यासी दोष आरोपोनि निंदी। तेथही ऐसी विषमबुद्धी। सुख त्रिशुद्धी तेथें कैंचें॥ ९९॥ यालागीं स्वर्गभोगें जें सुख। सकळां सारिखेंनाहीं देख। तपानुसारें न्यूनाधिक। भोगिती लोक निजकर्में॥ ५००॥ एक उर्वशी भोगूं लागला। एक काळी विद्रूप पावला। भोगें तपक्षयो झाला। नाशु आला अनिवार॥ १॥ जंव जंव स्वर्गभोग भोगिती। तंव तंव तपाची क्षीणशक्ती। तपक्षयें क्षया जाती। नाशु पावती स्वर्गस्थ॥ २॥ स्वर्गप्राप्तीचिये विधी। कर्में करितां विघ्न बाधी। तेणें नव्हे स्वर्गसिद्धी। जाण त्रिशुद्धी उद्धवा॥ ३॥ जें गर्भींच सटवलें। त्याचें बारसे न वचे केलें। तेवीं कर्मींचि विघ्न उद्भवलें। पावणें ठेलें स्वर्गाचें॥ ४॥ म्हणसी विघ्न करी कोण। कर्म करितां होय विगुण। तें कर्मचि कर्मासि जाण। विघ्न दारुणउपजवी॥ ५॥ कर्मचि कर्मासी साधक। कर्मचि कर्मासी बाधक। कर्मचि कर्मासी मोचक। हें नेणोनि लोक गुंतले॥ ६॥ काम्य कर्मी विघ्न विचित्र। देश काळ मंत्र तंत्र। द्रव्य दक्षिणा विधिपात्र। शुद्धि सर्वत्र पाहिजे॥ ७॥ जैसे क्षयरोगाचे रोगियासी। अल्प कुपथ्य बाधी त्यासी। तैसे जाण काम्य कर्मासी। अल्पदोषी सविघ्न॥ ८॥ प्रचंड दुधाचें भांडें। माजीं थेंबु एकु कांजी पडे। तेणें दहीं दूध ना तूप जोडे। करी खवडे दुधाचे॥ ९॥ तैसें काम्य कर्म जाण। अल्पही होतां विगुण। फळ नव्हे परी दारुण। तें कर्मचि विघ्न उपजवी॥ ५१०॥ कष्टोनियां बारा मासीं। जैसा कृषीवळु करी कृषी। त्याच्या फलाआड विघ्नें कैशीं। केल्या कष्टासी नाशक॥ ११॥ भूमि शुद्ध शुद्ध बीज। काळीं पर्जन्य कर्ता निरुज। उपकरण सामग्रीसमाज। पहिलें हें वोज पाहिजे॥ १२॥ पेरणी झालियापाठीं। देखणें राखणें कूपकांटी। सोंकरावें आवशीं पाहाटीं। आळसु पोटीं सांडूनी॥ १३॥ पीक येतयेतां कणशीं। आभाळें हिंसळा पडे त्यासी। कां कान्ही पडे पिकासी। घाली शेतासी निंदणें॥ १४॥ गर्वाचा तांबारा पडे। कां अहंतेचा रोग पडे। कीं अधर्माची आळी वाढे। पीक बुडें तेणेंही॥ १५॥ सबळ सोंकरणें न घडी। तरी आशेतृष्णेच्या भोरडी। कीजे पिकाची ओरबडी। दाणा बुडीं उरेना॥ १६॥ दंभाची घांटी पडिल्या ठायीं। घांटा दिसे परी दाणा नाहीं। कामक्रोधांच्याउंदरीं पाहीं। मूळाच्या ठायीं करांडिलें॥ १७॥ आल्या विकल्पाची धाडी। शेतामाजीं नुरे काडी। कुवासना टोळांची पडे उडी। समूळ सशेंडी खुराट॥ १८॥ एवं कृषीवळाचे परी। सकामासी विघ्नें भारी। फळ अंतरलें दूरी। विघ्नसागरीं बुडाले॥ १९॥ स्वर्ग एकु याज्ञिक बहुत। यागीं देव विघ्नें करित। मुख्य इंद्रचि विघ्ना प्रवर्तत। स्वर्ग राखत निजभोग॥ ५२०॥ एकी वेश्या एकी राती। येथ सकाम बहुत येती। ते जैसे कलहो करिती। तैशी गती याज्ञिकां॥ २१॥ कां शुनि जैसी ऋतुस्नात। तिसी भोगूं येती श्वान बहुत। परस्परें गुरगुरित। तैसा स्वर्ग भोगत सकाम॥ २२॥ तेथ ज्यासी भोग घडे। भोगूं जातां अडकोनि पडे। भंडिमा होये जगापुढें। सज्ञान तोंडें थुंकिती॥ २३॥ जिचें भोगूं जाय सुख। अडकल्या ते होय विमुख। मैथुनद्वारें गुंतल्या देख। थुंकिती लोक मुखामुखीं॥ २४॥ तैशी याज्ञिकां स्वर्गप्राप्ती। भोगें होय तपच्युति। स्वर्गभोगीं गुंतली आसक्ती। विमुख पडती इहलोकीं॥ २५॥ एवं कृषीवळाचिया परी। स्वर्गप्राप्तीसी विघ्नें भारी। केले कष्ट वृथा करी। भोगु कैशापरी घडेल॥ २६॥ एक म्हणती कर्मकुशळ। आम्ही कर्म हों नेदूं विकळ। अच्छिद्र साधूनि सकळ। स्वर्गसुखफळ भोगूं॥ २७॥ उद्धवा ऐसेंही न घडे। तें मी सांगेन तुज पुढें। पंचश्लोकीं फाडोवाडें। विशद निवाडें परियेसीं॥ २८॥
अन्तरायैरविहतो यदि धर्म: स्वनुष्ठित:।
तेनापि निर्जितं स्थानं यथा गच्छति तच्छृणु॥ २२॥
जेणें अंतराय न पवती। ऐशीं अच्छिद्र कर्में नव्हतीं। जरी झालीं दैवगतीं। तरी स्थान प्राप्ती ते नश्वर॥ २९॥ कर्में ज्या स्थानाप्रति जाये। तेथ गेलिया जें जें लाहे। तें तें सांगेन मी पाहें। सावध होयें उद्धवा॥ ५३०॥
इष्ट्वेह देवता यज्ञै: स्वर्लोकं याति याज्ञिक:।
भुञ्जीत देववत्तत्र भोगान् दिव्यान्निजार्जितान्॥ २३॥
पावोनि कर्मभूमि उत्तम। वर्णवरिष्ठ ब्राह्मणजन्म। ज्योतिष्टोमादिक करिती कर्म। नित्य काम्य अग्निहोत्र॥ ३१॥ त्रयीविद्या जाणती सकळ। कर्मकलापीं अतिकुशळ। ऐसे सज्ञान मूर्ख केवळ। स्वर्गफळ वांछिती॥ ३२॥ जेणें पुण्यें मी न जोडें। तें पुण्य म्हणतां वाचा रडे। याज्ञिक विषयासक्त गाढे। स्वर्गभोगाकडे धांविन्नले॥ ३३॥ यजूनि इंद्रादि देवासी। जेणें अंतर पडे मजसी। त्या पावले स्वर्गलोकासी। दिव्य भोगांसी भोगावया॥ ३४॥ बहुतीं चघळिलें जुनें हाड। तें श्वान स्वलाळा करी गोड। तैसें याज्ञिकां स्वर्गकोड। स्वपुण्यें गोड करिताति॥ ३५॥ कां स्मशानबळींचें अन्न। कलहें श्वानशेष खाय श्वान। तैसाचि स्वर्गभोग जाण। शेष भाजन बहुतांचे॥ ३६॥ गांठीचें वेंचून शुद्ध सुकृत। उच्छिष्ट भोग विकत घेत। याज्ञिक पवित्र म्हणवित। मोलें सेवित बहुशेष॥ ३७॥ केवळ वायसाचें मांस। तेंही श्वानमुखींचें शेष। मोलें न मिळेचि बहुवस। तैसी रसकस याज्ञिकां॥ ३८॥ स्वर्ग उच्छिष्ट बहुतांचें। त्यासी मोल वेंचे अतिकष्टांचें। तेंही न मिळेचि धणीचें। भय पतनाचें अहर्निशीं॥ ३९॥ स्वर्गभोग भोगिती देव। तेही म्हणताति आम्ही निर्दैव। याज्ञिकांठायीं थोर हांव। दिव्य वैभवभोगार्थ॥ ५४०॥ एवं झालिया स्वर्गप्राप्ती। तेथ जे जे भोग भोगती। ते मी सांगेन तुजप्रती। ऐक निश्चितीं उद्धवा॥ ४१॥ स्वर्गीं समान भोगु समस्तां। नाही जाण गा सर्वथा। ज्यासी जैसी पुण्यअवस्था। तैशी प्राप्तता तयासी॥ ४२॥
स्वपुण्योपचिते शुभ्रे विमान उपगीयते।
गन्धर्वैर्विहरन्मध्ये देवीनां हृद्यवेषधृक्॥ २४॥
आपुले पुण्याचेनि मोलें। चंद्रप्रभ विमान आलें। त्यामाजीं आरूढले। भोगूं लागले दिव्य भोगु॥ ४३॥ तेथें दिव्य देहाची प्राप्ती। मनोहर वेषातें धरिती। अतिमधुर गंधर्व गाती। स्वेच्छाक्रीडती स्त्रियांसीं॥ ४४॥ त्या स्वर्गींच्या स्वर्गांगना। देखतां भुली पडिली मना। त्यांचेनि छंदेंजाणा। नाना स्थानां क्रीडतु॥ ४५॥
स्त्रीभि: कामगयानेन किङ्किणीजालमालिना।
क्रीडन्न वेदात्मपातं सुराक्रीडेषु निर्वृत:॥ २५॥
त्या स्त्रियांसमवेत आपण। विमानीं करोनि आरोहण। स्वेच्छागामी गमन। शोभे विमान तें कैसें॥ ४६॥ घंटाघंटिका-जाळमाळा। क्षुद्रघंटिका रत्नमेखळा। किंकिणी लाविलिया सकळा। विमानलीळा विचित्र॥ ४७॥ इच्छिल्या ठाया ने विमाना। चैत्रवना कां नंदनवना। भोगावया स्वर्गांगना। आसक्त जाणा झालासे॥ ४८॥ वनीं सुमनांचे संभार। पराग उधळत सुंदर। कोकिळांचे मधुर स्वर। झणत्कार भ्रमरांचे॥ ४९॥ मंद सुगंध सुशीतळ। झळकतसे मलयानिळ। स्वर्गांगनांसीं गदारोळ। कामसुकाळ सकामां॥ ५५०॥ आगी कापुरा होतां भेटी। एकवेळे भडका उठी। तैसेंपुण्य वेंचलें उठाउठी। भोगासाठीं सकामां॥ ५१॥ मज पतन होईल येथ। भोग जातील समस्त। हेंही नाठवी त्याचें चित्त। कामासक्त झालासे॥ ५२॥ दीपासी देतां आलिंगन। पतंगा नाठवे निजमरण। तैसें नाठवे आत्मपतन। भोगी मन विगुंतलें॥ ५३॥
तावत्प्रमोदते स्वर्गे यावत्पुण्यं समाप्यते।
क्षीणपुण्य: पतत्यर्वागनिच्छन्कालचालित:॥ २६॥
जंव असे पुण्यसंपत्ती। तंव स्वर्गभोग भोगिती। क्षीण झाल्या पुण्यशक्ती। पतन पावती तत्काळ॥ ५४॥ जंववरी गांठीं असे धन। तंववरी वेश्येचें सौजन्य। नि:शेष वेंचल्या धन। मुखपरतोन पाहेना॥ ५५॥ तैशीच स्वर्गीची वस्ती। निजपुण्यें भोग भोगिती। पुण्यक्षयें क्षया जाती। पतन पावती अनिच्छा॥ ५६॥ कष्ट करूनियां याज्ञिकीं। स्वर्गु साधिला होआवया सुखी। ते झालेचि परम दु:खी। पतन अधोमुखीं पावले॥ ५७॥ उडालें स्वर्गभोगाचें सुख। आलें गर्भवासाचें दु:ख। जळो सकामाचें सुख। ठकले याज्ञिक सुखलोभें॥ ५८॥ उद्धवा जे म्हणती स्वर्गसुख। ते या रीतीं पावले दु:ख। स्वर्गसुख मानिती मूर्ख। नव्हे निर्दोख तो मार्गु॥ ५९॥ विधियुक्त आचरतां याज्ञिक। पुढती पावले थोर दु:ख। तरी अविधीनें होईल सुख। झणीं देख म्हणशील॥ ५६०॥ येथ कर्ममार्गींची प्रवृत्ती। दों प्रकारें असे वर्तती। एकी विधिरूपें आचरती। दुजी स्थिती अविधीनें॥ ६१॥ आतां सांगितली तुजप्रती। ते वेदोक्त विधानस्थिती। जे विधीनें स्वर्गप्राप्ती। हे प्रवृत्ती उत्कट॥ ६२॥ पुण्यक्षयें स्वर्गपतन। तेंही सांगीतलें कथन। आतां अविधीं जें आचरण। तेंही लक्षण परियेसीं॥ ६३॥ वेदउल्लंघनें कुमती। कुश्चित जनांचे संगती। अप्रवृत्तीची प्रवृत्ती। अधर्मस्थिती अवधारीं॥ ६४॥
यद्यधर्मरत: सङ्गादसतां वाजितेन्द्रिय:।
कामात्मा कृपणो लुब्ध: स्त्रैणो भूतविहिंसक:॥ २७॥
सहज प्राणी कामासक्त। प्राप्तकामें अतिलुब्ध होत। काम न पवतां दीनचित्त। स्वभावो नित्य जीवांचा॥ ६५॥ ऐशिया स्वभावनिष्ठासी। जरी संग होय असंत पुरुषेंसीं। तरी रति वाढे अधर्मासी। अकर्मासी प्रवर्ते॥ ६६॥ चंचलत्वें मर्कट मन। त्यासी असत्संग-मदिरापान। कामवृश्चिकें दंशिलें जाण। तेव्हां वर्तन यद्वातद्वा॥ ६७॥ पिशाहातें धेंडेवाळी। दीधल्या तो सर्वत्र जाळी। तेवीं असत्संगें करी होळी। स्वधर्म समूळीं जाळिती॥ ६८॥ बाळकाहातीं दीधलें शस्त्र। खोंचितां न म्हणे आप पर। छेदी आपुलेंचि शरीर। हितविचार तें नेणे॥ ६९॥ जेवीं जानी अवतरे देव्हारा। तिच्या तोंडा नाहीं वाढावारा। कां बहुरूप्याच्या दिगंबरा। नाहीं थारा वैराग्या॥ ५७०॥ तैसा असत्संगें खरा। घाली दंभाचा पसारा। नाहीं विवेकाचा थारा। कामशास्त्रा प्रवर्ते॥ ७१॥ कामशास्त्रें अतिसकाम। कामास्तव योजी अधर्म। अधर्मास्तव अकर्म। निंद्य धर्म आचरे॥ ७२॥ निंद्य धर्माचा संयोग। यासी मुद्दल लुब्धभोग। लुब्धभोगामाजीं चांग। अधर्म साङ्ग सविस्तर॥ ७३॥ अधर्म वाढतां उभारा। परद्रव्य आणि परदारा। याचिलागीं शरीरा। उपायद्वारा कष्टवी॥ ७४॥ अंगनेलागीं अति दीन। स्त्रीध्यानें होय स्त्रैण। स्त्री साधावया जाण। भूतहनन आरंभी॥ ७५॥
पशूनविधिनाऽऽलभ्य प्रेतभूतगणान् यजन्।
नरकानवशो जन्तुर्गत्वा यात्युल्बणं तम:॥ २८॥
विधि म्हणे तें न करावें। वेदु बोले तें नाइकावें। स्मृतिशास्त्र नावडे जीवें। कर्म करावें स्वेच्छा॥ ७६॥ जारण मारण उच्चाटन। स्तंभन मोहन वशीकरण। असाध्य साधूनि अंजन। करी लागवण स्त्रियांसी॥ ७७॥ लोण राई आणि बिबवे। मधुरसीं कालवी आघवे। शाबरी मंत्राचेनि वैभवें। होम करूं धांवे तामस॥ ७८॥ कर्म करावया अभिचार। मेष जंबूक वानर। सरड बेडूक मत्स्य मगर। गीध घार होमिती॥ ७९॥ नग्न भैरव वेताळ। झोटिंग पिशाच कंकाळ। मारको मेसको मैराळ। भूतें प्रबळ उपासी॥ ५८०॥ काळी चिडी टोंकण घारी। काग बक उलूक मारी। आवंतूनि काळी मांजरी। शाबरमंत्रीं होमिती॥ ८१॥ वाहत्या घाण्याचें तेल चोरी। प्रदोषसंधीं न्हाये शनिवारीं। शाकिनी डाकिनी मध्यरात्रीं। होमामाझारीं चेतवी॥ ८२॥ मद्याचे घट पूर्ण भरी। मातंगीची पूजा करी। रुधिर घाली प्रेतयात्रीं। मोहनीमंत्रीं मंत्रूनी॥ ८३॥ घेती हळदीची उटी। सेंदूर लाविती ललाटीं। काम साधावया हटीं। अंजन कष्टी साधिती॥ ८४॥ होमपात्रें करावया तांतडी। समूळ अश्वत्थातें तोडी। फळित पुष्पित ओषधी उपडी। आसनाबुडीं घालावया॥ ८५॥ बीज जपावया मंत्राचें। वोलें कातडें प्रेताचें। आणवी मृगअस्वलांचें। भय पापाचें मानीना॥ ८६॥ खेचर भूचर जळचर। जीव पीडिती अपार। घेऊनि ब्राह्मणाचें रुधिर। अभिचार आचरती॥ ८७॥ गायीब्राह्मणांसी जाण। पीडा करिती दारुण। क्षेत्रवित्तदाराहरण। स्वार्थें प्राण घेताति॥ ८८॥ देवालयींचें देवलेश। कां शिवालयींचें शिवशेष। घेतां न करिती आळस। वासना असोस अधर्मीं॥ ८९॥ एवं कर्म करितां ऐसें। तेणें अकर्म कर्मवशें। अंधतमीं तो प्रवेशे। जेवीं कां अवसे चंद्रमा॥ ५९०॥ अकर्म जाण अतुर्बळी। जीवाचें निजज्ञान छळी। अतिमूढ करूनि ते काळीं। निरयकल्लोळीं घालित॥ ९१॥ ते नरकींची नवल कथा। कोटि वर्षें तळीं जातां। ठाव न लगे गा सर्वथा। केवीं वरुता येईल॥ ९२॥ त्यातें ‘अंधतम म्हणती। जें देखतां अंध होय वृत्ती। निघतां निर्गमु विसरती। नरकीं वसती मूढत्वें॥ ९३॥ जंव होय कर्मभोगान्त। तंव नरक भोगी आकल्पान्त। मग स्थावरत्व पावत। वृक्ष होत कां पाषाण॥ ९४॥ ऐशी अवस्था गाढमूढ। केवळ जाडॺ झालें जड। स्वप्नीं सुख नेणती गोड। दु:ख दुर्वाड भोगिती॥ ९५॥ एवं अधर्मवृत्तीं वर्ततां। सुखलेश न लभे सर्वथा। दु:ख अनिवार भोगितां। निर्गमता त्यां नाहीं॥ ९६॥
कर्माणि दु:खोदर्काणि कुर्वन्देहेन तै: पुन:।
देहमाभजते तत्र किं सुखं मर्त्यधर्मिण:॥ २९॥
ऐकें बापा उद्धवा। मरणधर्मात्मका जीवा। सुख न भेटे त्याच्या भावा। दु:खप्रभवामाजीं वासु॥ ९७॥ नरदेहा येवोनि केवळ। क्रूर कर्में करिती प्रबळ। ज्यांसी उत्तरोत्तर दु:खफळ। यातना सबळ भोगवी॥ ९८॥ मरमरों दु:ख भोगी दारुण। उपजोनि कर्में करी हीन। दु:खावर्तीं पडे जाण। आपणिया आपण घातक॥ ९९॥ जे संतचरणीं विमुख। त्यांसी स्वप्नींहि नाहीं सुख। क्रूर कर्में करी कामुक। चढतें दु:ख सकामा॥ ६००॥ एवं प्रवृत्तीमाजीं असतां। सकाम कर्में आचरतां। सविधि कर्में करितां। दु:ख सर्वथा अनिवार॥ १॥ सविधि काम्यें स्वर्गपतन। अविधि काम्यें नरक दारुण। एवं प्रवृत्तीमाजीं जाण। सुख कोण सकामा॥ २॥ म्हणशी लोकपाळांच्या ठायीं। नित्य सुख असेल पाहीं। त्यांसी जन्ममरण नाहीं। अमरत्व आम्हींही साधावें॥ ३॥ लोकपाळांचे नित्य लोक। लोकपाळही नित्य देख। तेथें असेल नित्य सुख। ऐसें मूर्ख कल्पिती॥ ४॥
लोकानां लोकपालानां मद्भयं कल्पजीविनाम्।
ब्रह्मणोऽपि भयं मत्तो द्विपरार्धपरायुष:॥ ३०॥
लोकपाळामाजीं अमरेंद्र। मरुद्गणांचा राजा इंद्र। ज्यासी मानिती सूर्यचंद्र। वरुण कुबेर यमादि॥ ५॥ ज्या अमरावती सिंहासन। ऐरावताचें आरोहण। उच्चै:श्रवा अश्व जाण। पुढें आपण खोलणिये॥ ६॥ ज्यासी उर्वशी भोगपत्नी। रंभामुख्य विलासिनी। जेथ तिलोत्तमा नाचणी। चिंतामणी लोळती॥ ७॥ अष्टमासिद्धींचीं भांडारें। रत्नजडित धवळारें। मर्गजाचे डोल्हारे। सुवर्णसूत्रें लाविले॥ ८॥ वैदूर्याचे शाहाडे। कामधेनूंचे वाडे। कल्पद्रुमांचे मांदोडे। चहूंकडे शोभती॥ ९॥ लोकपाळ आज्ञेचे। सुरसेना सैन्य ज्याचें। एवढें ऐश्वर्य जयाचें। राज्य स्वर्गीचें भोगित॥ ६१०॥ त्यासी माझी काळशक्ती। ब्रह्मयाचे दिनांतीं। चौदा इंद्र क्षया जाती। येरांची गति कायशी॥ ११॥ ब्रह्यायु म्हणती समता। जो द्विपरार्ध आयुष्यवंता। जंव न पवे माझी काळसत्ता। तंव श्लाघ्यता आयुष्याची॥ १२॥ ज्यासी अग्रपूजेची मान्यता। जो लोकलोकपाळांचा कर्ता। त्या ब्रह्मयासीमाझी काळसत्ता। ग्रासी सर्वथा सलोकें॥ १३॥ मी काळात्मा दंडधरु। शास्ता नियंता ईश्वरु। अंतर्यामी सर्वेश्वरु। अतिदुर्धरु व्यापकु॥ १४॥ माझा काळक्षोभ दारुण। त्यातें आवरूं शके कोण। धर्मअर्थकामें जाण। निवारण त्या नव्हे॥ १५॥ प्रळयकर्त्या महाकाळासी। माझीकाळसत्ता ग्रासी। माझें महाभय सर्वांसी। लोकपाळांसी सुख कैंचें॥ १६॥ लवनिमेष-पळपळें। माझेनि भयें सूर्य चळे। माझेनि भयें प्राण खेळे। वायु चळे माझेनि भेणें॥ १७॥ माझे आज्ञेवरी अग्नि जाण। वसवीतसे जठरस्थान। मद्भयें नव्हे अधिक न्यून। पचवी अन्न चतुर्विध॥ १८॥ यथाकाळीं पर्जन्यधारीं। इंद्र वर्षे मद्भयेंकरीं। मृत्यु स्वकाळें प्रळय करी। भय भारी त्या माझें॥ १९॥ माझेनि भयेंकरीं देखा। समुद्र नोलांडी निजरेखा। माझिया भयाची थोर शंका। तिंही लोकां कांपवी॥ ६२०॥ तिंही लोकांचा शास्ता। ईश्वर तो मी नियंता। येणें कर्मजडाची वार्ता। अनीश्वरता छेदिली॥ २१॥ प्रवृत्तीसी अनर्थता। मागां दाविली तत्त्वतां। वैराग्य स्थापिलें सदृढता। निवृत्तिसर्वथा अतिश्रेष्ठ॥ २२॥ आपुल्या ऐश्वर्याच्या आविष्कारें। साधूनि ईश्वरत्व केलें खरें। मीमांसकमत-निराकारें। निरूपण पुढारें चालवी॥ २३॥ मीमांसकमतवार्ता। बोलिले जीवासी अनेकता। तोचि कर्ता आणि भोक्ता। हेचि सर्वथा निराकारी॥ २४॥
गुणा: सृजन्ति कर्माणि गुणोऽनुसृजते गुणान्।
जीवस्तु गुणसंयुक्तो भुङ्क्ते कर्मफलान्यसौ॥ ३१॥
कृष्ण म्हणे उद्धवातें। एकादश इंद्रियें समस्तें। करिती नानाविध कर्मांतें। आत्मा तो येथें सर्वसाक्षी॥ २५॥ दीपु उजळलिया घरीं। लोक वर्तती व्यापारीं। तो नेमी ना निवारी। तैैशापरी जीवु येथें॥ २६॥ जीवु प्रेरोनि इंद्रियांतें। म्हणाल करवितसे कर्मांतें। जेवीं कुऱ्हाडी घेऊनि हातें। छेदी वृक्षातें कृषीवळु॥ २७॥ ऐशी इंद्रियांची प्रेरकता। जीवासी न घडे सर्वथा। ते न घडायाची ऐक कथा। तुज तत्त्वतां सांगेन॥ २८॥ इंद्रियां कर्मीं प्रेरण। करिते सत्त्वादिक गुण। जीवुउभयसाक्षी जाण। कर्मकारण त्या नाहीं॥ २९॥ अंगें नातळतां आपण। चुंबक संनिधिमात्रेंकारण। अचेतन लोहा करी चळण। तैसा जाण जीव येथें॥ ६३०॥ कां उगवल्या दिवाकर। सुष्टुदुष्टु लोकव्यापार। तो सूर्यासी नातळे कर्मभार। साक्षी साचार कर्मांचा॥ ३१॥ तैसी जीवासी कर्तव्यता। सत्य नाहीं गा सर्वथा। दिसे जें कांहीं आपाततां। ते आध्यासिकता मिथ्यात्वें॥ ३२॥ कवळें अध्यासिला डोळा। तो चंद्रमा देखे पिंवळा। तेवीं आत्मा कर्ता भासे स्थूळा। केवळनिश्चळा नेणती॥ ३३॥ सवेग चालतां आभाळें। बाळें म्हणती चंद्रमा पळे। तेवीं आत्मा कर्ता मानिती स्थूळें। उपाधिमेळें अध्यासु॥ ३४॥ देह मी कर्म माझें। हें आत्मेनि स्वप्नीं नेणिजे। मृगजळीं बुडाले राजे। सत्य मानिजे तैसें हें॥ ३५॥ एवं आत्म्यासी कर्तव्यता। सत्य नाहीं गा सर्वथा। त्यासी म्हणताती फळभोक्ता। तेही वार्ता मिथ्यात्वें॥ ३६॥ स्वप्नीं जोडिल्या सहस्र गायी। जागृतीं त्यांचें दुभतें नाहीं। आत्मा भोक्ता तैसा पाहीं। उपाधीच्या ठायीं मिथ्यारूपें॥ ३७॥ डबकीं प्रतिबिंबला रवी। तो जै तेथील कर्दम सेवी। तैं भोक्ता आत्मा देहगांवीं। सत्य मानवीं मानावा॥ ३८॥ मृगजळामाजिलेनि मत्स्यें। बिंबला चंद्र गिळिजे आवेशें। तैसा आत्मा देहाभिनिवेशें। भोगविशेषें भोगिता॥ ३९॥ एवं आत्मा जो भोक्ता। ते सोपाधिक वार्ता। उपाधि मिथ्या गा तत्त्वतां। आत्मा भोक्ता कैसेनि॥ ६४०॥ आत्मा अकर्ता अभोक्ता। सदृढ साधिलें तत्त्वतां। जीवासी बोलिली अनेकता। ते मिथ्या आतां साधितु॥ ४१॥
यावत्स्याद्गुणवैषम्यं तावन्नानात्वमात्मन:।
नानात्वमात्मनो यावत्पारतन्त्र्यं तदैव हि॥ ३२॥
सत्त्व-रज-तमांचा। अंतरीं धुमाडू गुणकर्मांचा। तंव जीवासी अनेकत्वाचा। आभासु साचा मानला॥ ४२॥ अहंकारादि देहपर्यंत। जंव जीवासी मीपण भासत। तंव नानात्व मानी सत्य। तें मिथ्या निश्चित उद्धवा॥ ४३॥ जैसें आपुलेंचि मुख। आरिसा करी आपणासन्मुख। तैसें अविद्यायोगें मायिक। द्वैत देख दाखवी॥ ४४॥ आरिशामाजीं आपुला। जो द्वैतप्रभावो स्वयें देखिला। तेणें आपण नाहीं द्विधा झाला। मिथ्या भासला आभासु॥ ४५॥ तो आभास झालिया समोर। त्रिगुण गुणांचे विकार। एकचि दावी नानाकार। दिसे साचार गुणक्षोभें॥ ४६॥ जैसें आपुलेंचि मुख केवळ। शस्त्र आदर्श आणि जळ। लांब निश्चळ चंचळ। करी प्रबळ विकारी॥ ४७॥ एवं त्रिप्रकार कार्यविशेखें। मुखचि देखिजे निजमुखें। तैसें तें नानात्व लटिकें। गुणक्षोभकें भासतु॥ ४८॥ सूत्रचि विणिलें पटाकारीं। पटावरी तंतूंच्या हारी। दिसती तेवीं चराचरीं। नानाकारीं एकुचि॥ ४९॥ साकरेचा केला ऊंसु। परी कठिण आंत बा कसु। मधील पिळून घ्यावा रसु। हा त्रिगुण दोषु त्या नाहीं॥ ६५०॥ तैसा परमात्मा श्रीहरी। अद्वितीय एकु चराचरीं। त्यासी अनेकत्वाची परी। सत्त्वादि करी गुणक्षोभु॥ ५१॥ जैसा बहुरूपी आपुल्या ठायीं। नाना सोंगें धरी देहीं। तितुकीं रूपें त्यासी नाहीं। एकला पाही अद्वैत॥ ५२॥ तैसा सच्चिदानंद श्रीहरी। आत्मा एक चराचरीं। नांदताहेनानाकारीं। द्वैतामाझारीं अद्वैत॥ ५३॥ ‘अद्वैत’ साधिलें जीवासी। सत्य मानिलें आम्हांसी। परी एक आशंका ऐसी। निजमानसीं वर्तत॥ ५४॥ तूंचि म्हणसी ‘जीव परतंत्र’। आतां अद्वैतपणें ‘स्वतंत्र’। बोलसी बोलणें विचित्र। केवीं साचार मानावें॥ ५५॥ अद्वैतपण संपादिसी। माझें भय लोकपाळां म्हणसी। हें न मने गा आम्हांसी। अद्वैतासी भय कैंचें’॥ ५६॥ ऐशिया रीतीं उद्धवा। झाल्या संदेहासी रिघावा। तो तूं आतळों नेदीं जीवा। ऐक बरवा निर्धारु॥ ५७॥ जीवासी उपाधीसी तादात्म्यता। तंव तंव आभासे नानात्मता। नानात्वीं परतंत्रता। ईश्वरसत्ता नियामक॥ ५८॥ अमित मीनलिया दळ। सेनापतीवीण विकळ। आंबा पिकलिया रसाळ। राखण सबळ त्यापासीं॥ ५९॥ तैसी जीवासी जंव अनेकता। तंव सृष्टीसी कर्ता हर्ता नियंता। जाण ईश्वरचि सर्वथा। परतंत्रता ते जीवासी॥ ६६०॥ अनेकत्वें परतंत्रता। यालागीं ईश्वर नियंता। ऐसी देखोनि ईश्वरसत्ता। भय समस्तां जीवांसी॥ ६१॥ माझे ईश्वरी सत्तेचे भयें। देखोनि अंतकुही भीताहे। इंद्रादिकांचा पाडु काये। भय वाहे विधाता॥ ६२॥ माझी अत्यंत प्रळयींची सत्ता। वाजे हरिहरांचे माथां। अनेकत्वाचा संहर्ता। मीचि सर्वथा निजकाळु॥ ६३॥ यालागीं अनेकत्व जंव आहे। तंववरी दुस्तर काळभये। जेव्हां अनेकत्व नाहीं होये। तेव्हां काळू काये नाशील॥ ६४॥ एवं अनेकत्वाचे माथां। ईश्वरभयाची काळसत्ता। अनेकत्वें परतंत्रता। जाण सर्वथा उद्धवा॥ ६५॥ तें अनेकत्व जैं जाये। तैं काळ नाहीं मा कैंचें भये। पर नसतां परतंत्र न होये। एकत्वीं आहे स्वानंद॥ ६६॥ जेथ द्वैताचा मळु नुठी। ऐक्य देखे सकळ सृष्टीं। तेव्हां स्वानंदाचिया कोटी। भोगी उठाउठी निजबोधें॥ ६७॥ ज्या सुखाची मर्यादा। देशें काळें न करवे कदा। त्या सुखाची सुखसंपदा। भोगिती सदा अद्वैतें॥ ६८॥ निजात्मज्ञानें अलोलिक। दुजेनवीण अद्वैतसुख। तें सांडूनि कर्मवादी परम मूर्ख। नाना लोक वांछिती॥ ६९॥ मागां कर्मवादी कर्मठ। बोलिले प्रवृत्ति अतिश्रेष्ठ। कर्में करूनियां उद्भट। भोग वरिष्ठ भोगावे॥ ६७०॥ तेंचि निरसोनि आतां। पुढारीं चालविली कथा। उद्धवासी अद्वैतता। दृढ सर्वथा सांगत॥ ७१॥
यावदस्यास्वतन्त्रत्वं तावदीश्वरतो भयम्।
एतत्समुपासीरंस्ते मुह्यन्ति शुचार्पिता:॥ ३३॥
गुणवैषम्य ज्याचे ठायीं। ते नर भोगासक्त पाहीं। यागादि कर्में करूनि देहीं। भोगस्थान तिहीं ठाकिलें॥ ७२॥ जे जे ठाकूनि गेले लोक। तेथूनि याज्ञिकां पतनधाक। तंव दु:खी देखे लोकनायक। अनित्य लोक देखोनि॥ ७३॥ पदच्युती लोकच्युती। भोगकर्मे भोगच्युती। केले कष्ट वृथा जाती। दु:खी होती निजपतनें॥ ७४॥ घायाळा कीजे तरटमार। तैसें ओतप्रोत दु:ख फार। भंवे जन्ममरणव्यवहार। भोगी अघोर गर्भवास॥ ७५॥ राहाटमाळेचे करे। पुढती रिता पुढतीं भरे। तैसा अविश्रम फिरे। गर्भद्वारें मरणांतीं॥ ७६॥ विंचें खादिल्या दु:खितासी। दाढीसी आग लागे त्यासी। तेवीं भोगक्षयें पतितासी। गर्भवासीं पीडा होय॥ ७७॥ लोकांची अनित्यता नेणती। यालागीं परमदु:खी होती। कष्टांचें फळ दु:खप्राप्ती। संसारावर्तीं अडकले॥ ७८॥ केवळ लोकभोग अनित्य। हेंही न घडे गा येथ। भोगलोक होत सत्य। तरी अनित्य म्हणावे॥ ७९॥ जेवीं दोरीं सर्पाभास। तेवीं लोक चतुर्दश। केवळ मायामय विलास। सुखलेश तेथ कैंचा॥ ६८०॥ केवळ जें कां मायिक। सत्यामाजीं कैंचें भोगसुख। कर्मठ ते केवळ मूर्ख। विषय मायिक वांछिती॥ ८१॥ भरलें मृगजळाचें तळें। तेणें जैं पिकती साळीकेळें। तैं विषयभोगीं सुख फळें। हें न कळे भ्रांतासी॥ ८२॥ जग दुमदुमित भरलें दिसे। तें तूं मायिक म्हणसी कैसें। हेंचि कळे अनायासें। तुज मी तैसें सांगेन॥ ८३॥
काल आत्माऽऽगमो लोक: स्वभावो धर्म एव च।
इति मां बहुधा प्राहुर्गुणव्यतिकरे सति॥ ३४॥
केवळ मायामय कल्पित। संसार तो अज्ञानजनित। एकातें अनेक म्हणत। चित्तें दुश्चित्त होउनी॥ ८४॥ कनकबीजसेवनें जैसें। शहाणें माणूस होय पिसें। मग त्यासी नसतेंचि आभासे। ससे मासे गो सर्प॥ ८५॥ तैसें मायावशें अतिभ्रांता। नसतें अनेकत्व भासे चित्ता। नभीं गंधर्वनगर पाहतां। दिसे शोभिता पुरदुर्गु॥ ८६॥ कां अंधारीं दोरु दिसे डोळां। म्हणे सर्प दंड कीं सुमनमाळा। नाना एकावळी मुक्ताफळां। कोणी अबळा विसरली॥ ८७॥ तेवीं निजात्मा मी पुरुषोत्तम। त्या मज नानारूपें नानाकर्म। काळु आत्मा आगम। स्वभावधर्म मज म्हणती॥ ८८॥ ‘काळु’ म्हणती प्रकृतिक्षोभकु। ‘आत्मा’ म्हणती प्रकृतिनियामकु। ‘वेद’ म्हणती कर्मबोधकु। अदृष्टद्योतकु ‘धर्म’ म्हणती॥ ८९॥ अदृष्ट दृष्ट करूनि भोगविजे। यालागीं ‘धर्म तो म्हणिजे। आतां ‘स्वभावो’ जेणें बोलिजे। तेंही सहजें परियेसीं॥ ६९०॥ आत्मा भोक्ता हा ‘स्वभावो’। जेणें परिणामें देवाधिदेवो। इत्यादिका हेतु पहा हो। मजचि ‘स्वभावो’ म्हणताति॥ ९१॥ अदृष्टाचें फळ नाना लोक। ‘लोक’ म्हणावया हेतु हे देख। एवं मज एकातें अनेक। मिथ्या मूर्ख मानिती॥ ९२॥ नानारंगांचिया वृत्ती। चित्र लिहिलें यथानिगुती। तेंही नानाकारें दिसे भिंतीं। सर्वव्यक्तिद्योतक॥ ९३॥ तैसे नानाकारनाना धर्म। नाना नामें नाना कर्म। तें मी अवघा आत्माराम। सर्वोत्तम सर्वथा॥ ९४। मजवेगळा रिता कांहीं। अणुभरी ठाव उरला नाहीं। मी सर्वात्मा सर्व देहीं। सर्वगत पाहीं सर्वदा॥ ९५॥ जैसे सागरामाजीं तरंग। तैसें मजमाजीं दिसे जग। जग नव्हे तें मीचि चांग। सुख अव्यंग मजमाजीं॥ ९६॥ मी शुद्ध-बुद्ध-मुक्तस्वभाव। त्या मज नानात्वें ठेविती नांव। उद्धवा ज्यासी जैसा भाव। तैसा मीदेव तयासी॥ ९७॥ नास्तिक्य वसे ज्याचे ठायीं। त्यासी मी सर्वथा कोठें नाहीं। आस्तिक्यवंतालागीं पाहीं। मी सर्वांठायीं तिष्ठतु॥ ९८॥ भावार्थे जो मज जेथें पाहे। त्यासी मी तेव्हांचि तेथें आहें। मज पावावया उपाये। बहुत पाहें न लगती॥ ९९॥ मी सर्वात्मा सर्वगत एकु। ऐसा जयाचा भाव निष्टंकु। तोचि पढियंता मज एकु। ज्ञानतिलकु तो माझा॥ ७००॥ तो आत्मा मी त्याचें देह। मी ध्याता तो माझें ध्येय। मी ज्ञाता तो शुद्ध ज्ञेय। ऐसा पढिये तो आम्हां॥ १॥ उद्धवा हे एकात्मताभक्ती। सज्ञान ज्ञातें येणें भजती। तयां मज अभेदप्रीती। तुवांही या रीती भजावें॥ २॥ परमात्मा एक नित्य शुद्ध। त्यासी मायामय संसारबंध। मिथ्या जाण देहसंबंध। हा ‘निजात्मबोध’ पैं माझा॥ ३॥ हा मिथ्यासंबंध पडे जीवासी। आत्मज्ञानें मुक्ति त्यासी। हें मागें बोलिलों तुजपाशीं। तेंचि मतनिरासीं दृढ केलें॥ ४॥ धरोनि श्लोक चौदावा। अंतीं श्लोक चौतिसावा। मीमांसकमताचा आघवा। निरासु बरवा येणें केला॥ ५॥ एवं निरसोनि मतांतर। अद्वैत स्थापिलें दृढतर। हेंचि निजज्ञानसाचार। चराचरवरिष्ठ॥ ६॥ अद्वैतज्ञान शुद्ध चोख। ऐकोनि उद्धवा जाहलें सुख। हृदयीं दाटलाजी हरिख। पाहे श्रीमुख कृष्णाचें॥ ७॥ चालिलें सात्त्विकाचें भरितें। चित्त विसरलें चिंतनातें। लोटले जी तेथें। आपआपणियातें विसरला॥ ८॥ उद्धवासी नावेक। पडोनि ठेलें जी टक। सावध होऊनियां देख। कृष्णसंमुख तो झाला॥ ९॥ अद्वैतभजनें जे भजते। ते भक्त कृष्णासी आवडते। तें केवीं प्राप्त होय मातें। यालागीं हरीतें पुसतु॥ ७१०॥
उद्धव उवाच
गुणेषु वर्तमानोऽपि देहजेष्वनपावृत:।
गुणैर्न बद्धॺते देही बद्धॺते वा कथं विभो॥ ३५॥
उद्धव म्हणे कृष्णनाथा। आत्मा देहामाजीं असतां। बंधन पावे जी तत्त्वतां। कीं सर्वथा पावेना॥ ११॥ गुण असतां मुक्ति घडे। कीं गुण गेलिया मुक्ति जोडे। हेंचि सांगावें मज पुढें। अतिनिवाडें निश्चित॥ १२॥ गुण असतां मुक्ति घडे। हें सर्वथा बोलणें कुडें। ज्वर असतां आरोग्य न घडे। वृक्ष न वाढे भिरुंडेंसीं॥ १३॥ बाहीं बांधोनि पाषाण। समुद्रामाजीं तरे कोण। तैसें देहीं असतां त्रिगुण। मुक्तपण कैसेनि॥ १४॥ गुण जे रजतमादिक। त्यांचें कार्य देह देख। गुणासारिखीं आवश्यक। कर्मे अनेक आचरे॥ १५॥ कर्माचें फळ सुखदु:ख। भोगणें पडे गा अचुक। गुणांसी मुक्ति न घडे देख। हें ज्ञाते लोक म्हणताति॥ १६॥ गुण गेलिया मुक्ती। हेंही न घडे गा श्रीपती। येहीविषयीं विनंती। कृपामूर्ती अवधारीं॥ १७॥ गुणांचें कार्य देहेंद्रियें। ते गुण जाऊनि देह राहे। भूमीविण वृक्ष होये। हें अबद्ध पाहें बोलणें॥ १८॥ कारण जाऊनि कार्य राहे। हें बोलणें घडे काये। गुण जातां देहोचि जाये। मुक्त वर्तताहे कैसेनि॥ १९॥ एवं गुण असतां नसतां। मुक्ति न घडे गा सर्वथा। येचिविषयीं कृष्णनाथा। तुज मी तत्त्वतां पुसतु॥ ७२०॥ आणिक एक जगन्नाथा। तुज मी विनंती करीन आतां। गुण आत्म्यासी एकत्रता। न घडे सर्वथा निश्चित॥ २१॥ भरलें मृगजळाचें तळें। चंद्रमा बिंबेना तेणें जळें। तेवीं आत्मा गुणांसी नाकळे। स्वभावें नातळे गुणांतें॥ २२॥ गुण ते अज्ञानाची राती। आत्मा स्वप्रकाश गभस्ती। त्यासमोर ते कैंचे येती। मग बाधिती आत्म्यातें॥ २३॥ अंधार सूर्यातें गिळी। काउळा कैलास आतळी। बागुल हनुमंतातें सळी। मशक गिळी गजातें॥ २४॥ माशीपांखें गगन उडे। सगळा मेरु थिल्लरीं बुडे। मृगजळीं जैं तारूंपडे। तैं आत्मा सांपडे गुणांत॥ २५॥ जेवीं आकाश नातुडे जाळीं। तेवीं आत्मा नाकळे गुणमेळीं। मा सुखद:खांची नवाळी। गुणकल्लोळीं कां भोगी॥ २६॥ यापरी न घडे गा बद्धता। मा मुक्ताची कायसी कथा। कैसेनि बद्धमुक्तव्यवस्था। घडे कृष्णनाथा तें सांग॥ २७॥ येथ बद्धासी काय कारण। आणि मुक्ताची कोण खूण। एवं बद्धमुक्तलक्षण। मज संपूर्ण सांगावें॥ २८॥
कथं वर्तेत विहरेत्कैर्वा ज्ञायेत लक्षणै:।
किं भुञ्जीतोत विसृजेच्छयीतासीत याति वा॥ ३६॥
आतां बद्धमुक्तांची स्थिती। मज सांगावी श्रीपती। कोणें लक्षणें जाणिजेती। दोघे कळती कैसेनि॥ २९॥ पावोनियां विदेहावस्था। देहीं कैसेनि वर्तता। वश करूनि गुणातीतता। गुणींक्रीडता कैसेनि॥ ७३०॥ पावोनियां मुक्तदशा। देहीं भोग भोगी कैसा। त्यासी त्यागाचा कोण ठसा। हृषीकेशा सांगिजे॥ ३१॥ त्याचे निद्रेचें कोण लक्षण। कोण बैसका कोण आसन। वस्तु जाणोनि संपूर्ण। गमनागमन त्या कैसें॥ ३२॥ ऐशीं मुक्तांचीं लक्षणें। त्याहोनि बद्धांची विलक्षणें। कृपा करोनि नारायणें। मजकारणें सांगिजे॥ ३३॥
एतदच्युत मे ब्रूहि प्रश्नं प्रश्नविदां वर।
नित्यमुक्तो नित्यबद्ध एक एवेति मे भ्रम:॥ ३७॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायामेकादशस्कन्धे दशमोऽध्याय:॥ १०॥
या प्रश्नोत्तरांची उत्कंठा। थोर वर्ततसे वैकुंठा। प्रश्नवेत्त्यांमाजीं श्रेष्ठा। अतिवरिष्ठा गोविंदा॥ ३४॥ अनादि असे गुणसंबंधु। तेणें आत्मा झाला नित्यबद्धु। नित्यमुक्त हा शब्दु। असंबद्धु सर्वथा॥ ३५॥ जरी आत्म्यासी नित्यमुक्तता। तरी बोलोंचि नये बद्धता। एकुचि बद्धमुक्त म्हणतां। भ्रम अच्युता वाटत॥ ३६॥ आत्मा एकचि तत्त्वतां। त्यासी बद्धता आणिमुक्तता। एकासीच दोनी अवस्था। कृष्णनाथा कैसेनि॥ ३७॥ तो धाला तोचि भुकेला। जागता तोचि निजेला। जो जिता तोचि मेला। सत्यत्व या बोला कैसेनि॥ ३८॥ काळें तेंचि धवळें। देखणें तेंचि आंधळें। अर्धें तेंचि सगळें। कुहिऱ्या केळें केवीं होती॥ ३९॥ लोण तेंचि अलवणी। कोरडें तें पाणी। अतिशीतळ तो दारुण अग्नि। मुकें पुराणीं बोलिगडें॥ ७४०॥ लुगडें नागीवपणें लाजाळु। अन्न भुकेलेपणें भुकाळू। मुक्तीसी मुक्तीचा दुकाळू। कापुरा परिमळू मिळेना॥ ४१॥ तैसे संत तेचि असंत। अद्वैत तेंचि होय द्वैत। तेव्हां हित तेंचि अनहित। दिसे प्रस्तुत आम्हांसी॥ ४२॥ आत्मा नित्यमुक्त-शुद्ध-बुद्ध। ऐसा तुवांचि मज केला बोध। तो गुणसंगें म्हणसी बद्ध। भ्रमु अगाध येणें मज॥ ४३॥ एकासचि बद्धमुक्तता। कैसेनि घडे कृष्णनाथा। कृपाळुवा जी अनंता। हें मज तत्त्वतां सांगावें॥ ४४॥ म्हणसी मुक्तीसी आगंतुकता। तेणें मोक्षासि आली अनित्यता। बद्धआगंतुक म्हणतां। त्यासी सादिता येऊं पाहे॥ ४५॥ पूर्र्वीं बद्धचि नव्हता। येथूनि उपजला आतां। ऐशी सादिता बोलतां। होईल शास्त्रार्था विरुद्ध॥ ४६॥ श्रुतिस्मृतिशास्त्रसिद्ध। अनादि मुक्तिअनादि बद्ध। आत्मा एक अवस्था द्विविध। त्याही विरुद्ध परस्परें॥ ४७॥ उठिली बद्धता मुक्तीतें छळी। खवळली मुक्ती बद्धता गिळी। ऐशा विरुद्धता आत्म्याजवळीं। केवीं वनमाळी राहताति॥ ४८॥ जैं सांजवेळे भेटे पाहांट। तै विद्या अविद्या होय एकवट। सूर्य अंधाराची बांधे मोट। तैंआत्म्यानिकट अवस्था॥ ४९॥ हिंगासी कापुराचा वासु जोडे। तैं अविद्या विद्येमाजीं पडे। ससा सिंहावरी जैं चढे। तैं आत्म्यापुढें अवस्था॥ ७५०॥ उद्धव म्हणे कृष्णनाथा। या जैं कळल्या दोनी अवस्था। तैंचि मुक्ति आली हाता। मज सर्वथा मानलें॥ ५१॥ मग म्हणे श्रीअनंता। विशदसांगाव्या अवस्था। म्हणोनि चरणीं ठेविला माथा। मोक्षदाता तूं मज॥ ५२॥ सखोल उद्धवाचाप्रश्न। ऐकोन सुखावला नारायण। माझा उद्धवु जाहला सज्ञान। हरिखें जगज्जीवन डोलतु॥ ५३॥ परमार्थी अवस्था गाढी। देखोनि प्रश्नाची अतिगोडी। उद्धवासी ओंवाळावया आवडीं। जीवकुरवंडी करूं पाहे॥ ५४॥ नुल्लंघी भक्ताचें उत्तर। फोडिलें गुह्य ज्ञानभांडार। भक्तकृपा जी अपार। हरि साचार तुष्टला॥ ५५॥ उद्धवाचा प्रश्न गहन। कृपा द्रवला जगज्जीवन। एका विनवी जनार्दन। आनंदघन वोळला॥ ५६॥ त्या आनंदाचा महापूरु। शिष्यसरितेसी येईल थोरु। तेणें चिद्गंगासागरु। शिष्य सत्वरु ठाकील॥ ५७॥ टाकोनियां संसारआस्था। जो लागला भक्तिपंथा। तोचि अधिकारी भागवता। परमार्था ग्राहकु॥ ५८॥ ज्याचे पोटीं संसारचिंता। तो कथा ऐकतांचि दुश्चिता। चित्तचिंती ज्या ज्या अर्था। तो सर्वथा तेथें असे॥ ५९॥ चित्त जंव नाहीं सुचित। तंव न कळे श्रीभागवत। गुरुवांचूनि श्रीभागवतार्थ। नव्हे प्राप्त प्राण्यासी॥ ७६०॥ जो संसारापासोनि विरक्त। गुरुचरणीं अतिअनुरक्त। त्यासी फावला एक परमार्थ। फळे भागवत तयासी॥ ६१॥ देखतां कृष्णाचें श्रीमुख। उद्धवा नीच नवें समाधिसुख। तरी श्रवणाची श्रद्धा अधिक। आवडी देख अनिवार॥ ६२॥ जो श्रुतिप्रतिपाद्य चिद्धन। त्या श्रीकृष्णाचें गुह्य ज्ञान। पुढतपुढतीं होआवया श्रवण। करी प्रश्न अतियोग्य॥ ६३॥ विद्याअविद्येचा निरासु। श्रीकृष्ण सांगेल परेशु। पुढील अध्याय अतिसुरसु। श्रोतां अवकाशु मज द्यावा॥ ६४॥ तो कृष्णउद्धवसंवादु। पुढिले कथेचा अतिविनोदु। एकाजनार्दनीं महाबोधु। परमानंदु प्रकटेल॥ ७६५॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे एकादशस्कन्धे श्रीकृष्णोद्धवसंवादे परमहंससंहितायां एकाकारटीकायां दशमोऽध्याय:॥ १०॥ श्रीकृष्णार्पणमस्तु॥ मूळश्लोक॥ ३७॥ ओव्या॥ ७६५॥
॥ श्री ॐ तत्सत्-श्रीकृष्ण प्रसन्न॥
अध्याय अकरावा
श्रीगणेशाय नम:॥ श्रीकृष्णाय नम:॥ ॐ नमो सद्गुरु सच्चिद्घन। वर्षताहे स्वानंदजीवन। मुमुक्षुमयूरकूळें जाण। हरिखें उड्डाण करिताति॥ १॥ तो सजल देखोनि मेहो। ‘सोहंभावें’ फोडिती टाहो। रोमांचपिसीं पसरूनि पहा हो। सत्त्वें लवलाहो नृत्याचा॥ २। नाचती स्वानंदाचेनि मेळें। तेणें सर्वांगीं निघाले डोळे। पिसें देखणीं जाहलीं सकळें। तें शिरीं गोपाळें वाहिलीं॥ ३॥ तो मेघ देखोनि संमुख। आर्त चातक पसरिती मुख। बिंदुमात्रें पावले सुख। नित्य निर्दोख ते जाहले॥ ४॥ आर्ततृषा तत्काळ वोळे। निवाले तेणें स्वानंदजळें। मग हरिखाचेनि कल्लोळें। सुखसोहळेभोगिती॥ ५॥ सुभूमि देखोनि निर्मळ। जाणोनि वर्षती काळवेळ। वर्षों लागले जी प्रबळ। जळकल्लोळ अनिवार॥ ६॥ तेणें वोळलेनि कृपाभरें। शिष्यसरितेसी पूरु भरे। विकल्पवोसणेंएकसरें। महापूरें वाहविलीं॥ ७॥ तेणें प्रवाहनिर्मळजळें। चिदैक्यसागरीं सरिता मिळे। मग समरसोनि तेणें जळें। राहे निश्चळें निजरूपें॥ ८॥ वैराग्यराबें शुद्ध केली। पृथ्वी निजवोला वोळली। कठिणत्वेंवीण मार्दवा आली। नाहीं अंकुरली बहुबीजें॥ ९॥ अखंड वर्षतां जळमेळीं। वासनेचीं ढेपें विरालीं। सद्भावाची वोल जाहली। वाफ लागली बोधाची॥ १०॥ तेथें न पेरितांचि जाण। सहज निजबीजें परिपूर्ण। अंकुरलीं आपणिया आपण। सिद्ध संपूर्ण स्वभावें॥ ११॥ ते परमकृपेचिये पुष्टीं। स्वानंदें पिकली समदृष्टी। परमानंदें कोंदली सृष्टी। ऐक्यें संवसाटी जीवशिवां॥ १२॥ फिटला दु:खदुष्काळु। पाहला सुखाचा सुकाळु। वोळळा सद्गुरु कृपाळु। आनंदकल्लोळु सच्छिष्यां॥ १३॥ वर्षतां निजपर्जन्यधारा। वर्षला नाना अवतार-गारा। कार्यानुरूपें तदाकारा। विरोनि निराकारा त्या होती॥ १४॥ त्या पर्जन्याचा वोसडा। दैवें लागल्या जडमूढां। तो सरता होय संतांपुढां। अवचटें शिंतोडा जैं लागे॥ १५॥ तो महामेघ श्रीहरी। सद्गुरुकृपा वोळे जयावरी। तोचि धन्य चराचरीं। पूज्य सुरनरीं तो कीजे॥ १६॥ गुरुनामें अति घनवटु। शिष्य तारूनि अति हळुवटु। ज्याचा आदि-मध्य-शेवटु। न कळे स्पष्टु वेदांसी॥ १७॥ तो सद्गुरु श्रीजनार्दनु। वोळलासे आनंदघनु। तेणें एका एकु केला पावनु। सांडवोनु एकपण॥ १८॥ एक तेंचि अनेक। अनेक तेंचि एक। हेंही केलें निष्टंक। स्वबोधें देख बोधोनि॥ १९॥ बोधोनियां निजऐक्यता। ऐक्यें लाविलें भक्तिपंथा। मज प्रवर्तविलें श्रीभागवता। निज कथा गावया॥ २०॥ तेचि श्रीभागवतींची कथा। दशमाध्यावो संपतां। ते बद्धमुक्तांची व्यवस्था। उद्धवें कृष्णनाथा पूशिली॥ २१॥ सखोल उद्धवाचा प्रश्न। ऐकोनियां श्रीकृष्ण। निजहृदयींचें गुह्यज्ञान। उद्धवासी जाण सांगेल॥ २२॥ येणें प्रश्नोत्तरश्रवणें। उठेजन्ममरणांचे धरणें। संसाराचें खत फाडणें। फिटलें लाहणें विषयांचें॥ २३॥ मोक्षमार्गींचे कापडी। साधनीं शिणती बापुडीं। तिहीं शीघ्र यावें तांतडी। जिणावया वोढी बंधमोक्षांच्या॥ २४॥ जे कष्टती जपतप साधनें। शिणती ध्येय-ध्यान-अनुष्ठानें। ते ते शीघ्र या विंदानें। ज्ञानाज्ञानें जिणावया॥ २५॥ ऐशी कथा आहे गहन। श्रोतीं व्हावें सावधान। एका विनवी जनार्दन। स्वानंदघन तुष्टला॥ २६॥ अकरावे अध्यायीं जाण। इतुकें सांगेल श्रीकृष्ण। बद्धमुक्तांचें वैलक्षण्य। आणिक लक्षण साधूचें॥ २७॥ तेणेंच प्रसंगें जाण। सांगेल भक्तीचें लक्षण। अकराही पूजेसी अधिष्ठान। इतुकें निरूपण हरि बोले॥ २८॥
श्रीभगवानुवाच
बद्धो मुक्त इति व्याख्या गुणतो मे न वस्तुत:।
गुणस्य मायामूलत्वान्न मे मोक्षो न बन्धनम्॥ १॥
उद्धवा बद्ध-मुक्त-अवस्था। जरी सत्य म्हणसी वस्तुतां। तरी न घडे गा सर्वथा। ऐक आतां सांगेन॥ २९॥ बद्ध-मुक्त-अवस्था। माझे स्वरूपीं नाहीं तत्त्वतां। हे गुणकार्याची वार्ता। संबंधुतत्त्वतां मज नाहीं॥ ३०॥ माझ्या निजस्वरूपाच्या ठायीं। बद्धमुक्तता दोनी नाहीं। बद्धता मुक्तता गुणांच्या ठायीं। आभासे पाहीं गुणकार्यें॥ ३१॥ गुण ते समूळ मायिक। मी गुणातीत अमायिक। सत्यासी जैं बाधे लटिक। तैं मृगजळीं लोक बुडाले॥ ३२॥ चित्रींचेनि हुताशनें। जैं जाळिजती पुरें पट्टणें। कां स्वप्नींचेनि महाधनें। वेव्हारा होणें जागृतीं॥ ३३॥ सूर्यासी प्रतिबिंब गिळी। छाया पुरुषातें आकळी। समुद्र बुडे मृगजळीं। तैं मज गुणमेळीं बद्धता॥ ३४॥ जैं जिभेसी केंसु निघे। जैं तळहातीं वृक्ष लागे। डोळ्ॺांमाजीं पर्वत रिगे। तैं मी गुणसंगें अतिबद्धु॥ ३५॥ आकाश खोंचे सांबळीं। काजळ लागे वारया निडळीं। कां विजूचे कपाळीं बाशिंग सबळी बांधावें॥ ३६॥ गगन तुटोनि समुद्रीं बुडे। सपर्वत धरा वारेनि उडे। सूर्य अडखळोनि अंधारीं पडे। तरी मी सांपडें गुणांत॥ ३७॥ अंतरिक्षगगनीं सरोवर। त्यामाजीं कमळें मनोहर। तो आमोद सेविती भ्रमर। ऐसें साचार जैं घडे॥ ३८॥ तैं मी आत्मा गुणसंगे। नानाविषयभोगसंभोगें। मग त्या विषयांचेनि पांगें। होईन अंगें गुणबद्धु॥ ३९॥ त्रिगुण-अंगीकारें वर्ततां। गुणकार्य-तदात्मता। तेणें बद्ध-मुक्त-अवस्था। भासे वृथा भ्रांतासी॥ ४०॥ गुणा आत्म्यासी भिन्नता। म्हणसी मानली तत्त्वतां। परी गुणसंगें आत्मा असतां। अवश्य विकारिता येईल॥ ४१॥ अग्निसंगें पात्र तप्त। पात्रतापें जळ संतप्त। जळतापें धान्यपाकु होत। तेवीं विकारवंत नव्हे आत्मा॥ ४२॥ अग्नितापाआंत। आकाश नव्हे संतप्त। तेवीं गुणसंगा आंत। विकारवंत नव्हे आत्मा॥ ४३॥ नट अंधत्वें अवगला। परी तो आंधळा नाहीं जाहला। तैसा आत्मा गुणसंगें क्रीडला। तरी असे संचला निर्गुणत्वें॥ ४४॥ नटु अंधत्वें नव्हे अंधु। आत्मा गुणसंगें नव्हे बद्धु। गुण मायिक आत्मा शुद्धु। या त्या संबंधु असेना॥ ४५॥ आत्मा व्यापक गुण परिच्छिन्न। याही हेतु न घडे बंधन। सकळ समुद्राचें प्राशन। केवीं रांजण करूं शके॥ ४६॥ मोहरीमाजीं मेरु राहे। पशामाजीं पृथ्वी समाये। मुंगी गज गिळोनि जाये। खद्योत खाये सूर्यातें॥ ४७॥ मशकु ब्रह्मांडातें आकळी। पतंगु प्रळयानळ गिळी। तरी आत्मा गुणाचे मेळीं। गुणकल्लोळीं बांधवे॥ ४८॥ यापरी न संभवे बद्धता। बद्धतेसवें गेली मुक्तता। बद्धमुक्तअवस्थांपरता। जाण तत्त्वतां आत्मा मी॥ ४९॥ स्वप्नींचा अत्यंत सुकृती। अथवा महापापी दुष्कृती। दोन्ही मिथ्या जेवीं जागृतीं। तेवीं बद्धमुक्ती आत्मत्वीं॥ ५०॥ हो कां जीवात्म्यासीची बद्धता। सत्य नाहीं गा तत्त्वतां। मा मज परमात्म्यासी अवस्था। बद्धमुक्तता ते कैंची॥ ५१॥ बिंबीं प्रतिबिंबी नाहीं। मध्येंचि आरिशाचे ठायीं। मळ बैसले ते पाहीं। प्रतिबिंबाचे देहीं लागले दिसती॥ ५२॥ तो मळु जैं पडे फेडावा। तैं आरिसाची साहणें तोडावा। परी प्रतिबिंब त्या साहणे धरावा। हें सद्भावा मिळेना॥ ५३॥ तेवीं जीवीं शिवीं दोष नाहीं। दोष अंत:करणाच्या ठायीं। तें चित्त शुद्ध केल्या पाहीं। बंधमोक्षां दोंही बोळवण॥ ५४॥ तैसें आविद्यक हें सकळ। गुणकार्य नानामळ। जीवा अंगीं प्रबळ। मूढमती स्थूल स्थापिती॥ ५५॥ जैं सत्त्वें गुण निरसे सबळ। तैं आविद्यक फिटती मळ। तेचि सद्विद्या होय निर्मळ। जीवचि केवळ शिव होये॥ ५६॥ तेव्हां जीवशिव हीं नामें दोनी। जातीं मजमाजीं समरसोनी। तैं मीच एकवांचूनी। आन जनीं वनीं असेना॥ ५७॥ जीवभावनें मीचि जीवु। शिवभावनें मीचि शिवु। मी एकला ना नव्हे बहु। माझा अनुभवु मीचि जाणें॥ ५८॥ झणीं आशंका धरिशी येथ। ‘जरी जीव शिव तूंचि समस्त। तरी ते शुकवामदेवचिकां मुक्त। येरां म्हणत जड जीव॥ ५९॥ जरी तूचिं जीवरूपें तत्त्वतां। तरी हे ऐशि कां विषमता। शुकवामदेवांची अवस्था। वेदशास्त्रार्था सम्मत॥ ६०॥ तींही लोकांमाजीं जाण। वेदवचन तंव प्रमाण। हें बोलणें विलक्षण। अप्रमाण जैं मानिशी’॥ ६१॥ हो कां वेद म्हणे जें निश्चित। तें बोलणें माझें नि:श्वसित। तो मी स्वमुखीं जे बोलत। तें तूं अयुक्त म्हणतोसी॥ ६२॥ जो मी वेदांचा वेदवक्ता। सकळ शास्त्रांचा मूळकर्ता। त्या माझें वचन म्हणसी वृथा। अतियोग्यता तुज आली॥ ६३॥ वेदांचें जाण त्रिविध बंड। त्रिकांडीं केला तो त्रिखंड। वेदबळें बा पाखंड। वाजवी तोंड अव्हासव्हा॥ ६४॥ भासले बहुसाल मतभेद। वेदबळें नाना वाद। तो वेद माझा परोक्षवाद। तेणें तत्त्वावबोध केवीं होय॥ ६५॥ शब्दज्ञान ब्रह्मज्ञान। बाह्यदृष्टीं समसमान। जेवीं वाल आणि वालभर सुवर्ण। तुकितां पूर्ण समता आली॥ ६६॥ परी वाला सुवर्णा समता। मोलें कदा नव्हे तत्त्वतां। तेवीं वेदवादयोग्यता। ब्रह्मानुभविता सम नव्हे॥ ६७॥ जो मी हरिहरां प्रमाण। त्या माझें वचन अप्रमाण। तूं म्हणसी हा ज्ञानाभिमान। हेंही जाणपण सांडावें॥ ६८॥ माझें वचन सत्याचें सत्य। सत्य मानूनि निश्चित। येणें भावें साधे परमार्थ। हें ब्रह्मलिखित मद्वाक्य॥ ६९॥ उद्धवा मज पाहतां। वसिष्ठवामदेवादि समस्तां। न देखे बद्ध आणि मुक्तता। हा माझा तत्त्वतां निजबोधु॥ ७०॥ मुक्तांचिये दृष्टीं। मुक्तच दिसे सकल सृष्टी। तेथें शुकवामदेवांची गोष्टी। वेगळी पाठीं केवीं राहे॥ ७१॥ बद्धमुक्तांहूनि भिन्न। परमात्मा मी चिद्घन। जरी म्हणसी जीवासी बंधन। तेहीं सत्यत्वें जाण घडेना॥ ७२॥
शोकमोहौ सुखं दु:खं देहापत्तिश्च मायया।
स्वप्ने यथाऽऽत्मन: ख्याति: संसृतिर्न तु वास्तवी॥ २॥
दोन मुहूर्त स्वप्नवृत्ती। त्यामाजीं देखे जन्मपंक्ती। तेथें पावला नाना याती। तेवीं मिथ्या प्रतीती भवभावा॥ ७३॥ नसता आभासु मावळे ठायीं। त्यालागीं हाहाकारु उठे देहीं। गेले मेले नाहीं नाहीं। ‘शोक’ पाहीं त्या नांव॥ ७४॥ भग्नपात्रीं भरिलें जळ। तेथें बिंबलें चंद्रमंडळ। तें पात्र पोटेंशीं धरीबाळ। रत्न प्रबळ हें माझें॥ ७५॥ जळ गळोनि जाय सकळ। चंद्रमा हरपे तत्काळ। त्यालागी तळमळीतें बाळ। ‘शोकु’ केवळ या नांव॥ ७६॥ अथवा घटचंद्र धरूं जातां। तो न ये बालकाचे हाता। यालागीं करी जे जे व्यथा। ‘शोक’ सर्वथा या नांव॥ ७७॥ काढावया आरशांतील धन। करीदर्पणामाजीं खनन। फुटल्या नागवलों म्हणे जाण। ‘शोक’ दारुण या नांव॥ ७८॥ नसते वस्तूच्या ठायीं जाण। मी माझें हा अभिमान। तेंचि ‘मोहाचें’ लक्षण। ममता दारुण ते संधी॥ ७९॥ देखोनि मृगजळाचें तळें। येणें पिकती रायकेळें। यालागीं मृगतृष्णेचीं जळें। आठै काळें राखतु॥ ८०॥ मृगजळाकडे कोणी भंवे। त्यासी सक्रोधें भांडू धांवे। अतिमोहित मोहस्वभावें। विवेकु न करवे सत्याचा॥ ८१॥ तेवीं पुत्रा पासोन सुखप्राप्ती। माता पिता होईल म्हणती। शेखीं पुत्र अंगोठा दाविती। केवळ भ्रांति पुत्रमोहो॥ ८२॥ गंधर्वनगरींची रचना। देखोनि अभिलाष होय मना। ते घ्यावया मेळवी सेना। नानासूचनाउपायें॥ ८३॥ तैसा मिथ्या देहीं अभिमान। देहसंबंधाची ममता गहन। हेंचि मोहाचें मूळ लक्षण। ममताभिमान प्राणियां॥ ८४॥ एवं अहं आणि ममता। हेचि मोहाची मातापिता। त्याचेनि उत्तरोत्तर वाढतां। जनमोहिता व्यामोह॥ ८५॥ प्रियविषयीं आसक्ति देख। त्याची नित्यप्राप्ती अनेक। त्याचि नांव म्हणती ‘सुख’। जेवीं चाखितां विख अति मधुर॥ ८६॥ विषयप्राप्तीं जो हरिख। तया नांव म्हणती ‘सुख’। विषयविनाश तेंचि ‘दु:ख’। परम असुख त्या नांव॥ ८७॥ शोक-मोह-सुख-दु:ख। येणेंचि ‘देहाची प्राप्ती’ देख। देहाभिमानें देह अनेक। दु:खदायक भोगवी॥ ८८॥ जे जेणें तीव्रध्यानें मरे। तो तेंचि होऊनि अवतरे। कां जो निमे अतिद्वेषाकारें। तो द्वेषानुसारें जन्मतु॥ ८९॥ सर्प मुंगुस पूर्ववृत्ती। वैराकारें जन्म पावती। जे जे वासना उरे अंतीं। ते ते गती प्राण्यासी॥ ९०॥ यालागीं हृदयामाजीं निश्चितीं। जे सबळ वासना उठे अंतीं। तो तो प्राणी पावे तिये गती। श्रुति बोलतीं पुराणें॥ ९१॥ पुरुषासवें वृथा छाया। तैशी ब्रह्मीं मिथ्या माया। ते उपजवी गुणकार्या। देह भासावया मूळ ते॥ ९२॥ जेवीं का स्वप्नीं एकलें मन। नानाकार होय आपण। तेवीं चैतन्याचें अन्यथाभान। तें हें जाण चराचर॥ ९३॥ एवं वस्तुतां संसार नाहीं। तेथें सुखदु:ख कैंचें कायी। देहेंवीण छाया पाहीं। कोणें ठायीं उपजेल॥ ९४॥ जें उपजलेंच नाहीं। तें काळें गोरें सांगों कायी। अवघें स्वप्नप्राय पाहीं। वस्तुतां नाहीं संसारु॥ ९५॥ इहीं दोहीं श्लोकीं अगाधु। परिहरिला वस्तुविरोधु। आतां प्रतीतीनें जो अनुरोधु। तो सत्यासी बाधु करूं न शके॥ ९६॥ डोळां अंगुळी लाविती। तेणें दोन चंद्र आभासती। गगनीं दों चंद्रा नाहीं वस्ती। मिथ्या प्रतीती निराकारीं॥ ९७॥
विद्याविद्ये मम तनू विद्धॺुद्धव शरीरिणाम्।
मोक्षबन्धकरी आद्ये मायया मे विनिर्मिते॥ ३॥
निजबोधें येत बोधा। ‘ब्रह्माहमस्मि’ स्फुरे सदा। ते जाण शुद्ध ‘विद्या’। जें अविद्याछेदक॥ ९८॥ मी पापी मी सदा निर्दैवो। ऐसा नित्य स्फुरे भावो। तेचि सबळ ‘अविद्या’ पहा हो। जे नाना संदेहो उपजवी॥ ९९॥ एकी जीवातें घाली बंदी। एकी जीवाचें बंधन छेदी। या दोनी माझ्या शक्तिअनादी। जाण त्रिशुद्धी उद्धवा॥ १००॥ ‘तूं चिन्मात्र चैतन्यघन। चित् स्वरूपें वृत्तिशून्य। तुज शक्ती कैंच्या जाण। निर्धर्मकपण सर्वदा’॥ १॥ उद्धवा हे आशंका वाया। कारण नाहीं करावया। याशक्ती जन्मवी माझी माया। जे न ये आया सुरनरां॥ २॥ ‘सत् ’ म्हणों तरी तत्काळ नासे। ‘असत् ’ म्हणों तरी आभासे। जिणें नामरूपांचें पिसें। लाविलें असे जगासी॥ ३॥ नातुडे संतासंतबोली। माया ‘अनिर्वचनीय’ झाली। तिणें विद्या-अविद्या इये पिलीं। वाढविलीं निजपक्षीं॥ ४॥ आजि काळींच्या केल्या नव्हती। विद्या अविद्या अनादि शक्ती। बंधमोक्षातें भासविती। या दोनी वृत्ती मायेच्या॥ ५॥ ते ‘माया’ तूं म्हणसी कोण। तुझी ‘कल्पना’ ते माया पूर्ण। बद्धमुक्तता-स्फुरण। तीमाजीं जाण स्फुरताति॥ ६॥ बंधमोक्षांची राहती स्थिती। ते मी सांगेन तुजप्रती। ऐक उद्धवा निश्चितीं। यथानिगुतीं निवाडें॥ ७॥ स्वप्नीं न देखे आराधन। ज्यासी नाहीं माझें भजन। अविद्या त्यामाजीं संपूर्ण। प्रबळजाण वाढत॥ ८॥ तो माझ्या ठायीं अतिसादर। भजनशीळ आठौ प्रहर। तेंचि ब्रह्मविद्येचें घर। तेथें निरंतर ते वाढे॥ ९॥ जेथ माझ्या भजनाचा उल्हासु। तेथ अविद्येचा निरासु। तोचि ब्रह्मविद्येचाप्रवेशु। हा अतिविश्वासु भक्तांचा॥ ११०॥ येथ बद्धाचें कारण। आणि मोक्षाचें साधन। भक्तीचेंदृढ स्थापन-। अर्थास्तव जाण बोलिलों॥ ११॥ ‘ज्या बंधमोक्ष दोनी वृत्ती। त्या तूं मायेच्या म्हणसी शक्ती। तेव्हां माया झाली मोक्षदाती। हें केवीं श्रीपति घडेल॥ १२॥ जरी माया झाली मोक्षदाती। तरी कां करावी तुझी भक्ती। हेंचि सत्य काय श्रीपती। सांग निश्चितीं निवाडु’॥ १३॥ कृष्ण म्हणे उद्धवासी। स्वयें चलन नाहीं छायेसी। तेवीं सामर्थ्य नाहीं मायेसी। केवीं मोक्षासी ते देईल॥ १४॥ जो मायेचा नियंता। तो विष्णु मोक्षाचा दाता। तोडूनि जीवाची बद्धता। सायुज्यता देतसे॥ १५॥ म्हणशी अविद्या-कामकर्मादृष्टें। जीवासी बंधन लागे मोठें। तें ब्रह्मविद्या-निष्कर्में तुटे। हा बोध करी नेटें गुरु श्रुतिद्वारा॥ १६॥ ‘येथ विष्णु काय झाला कर्ता। मा तो होईल मोक्षदाता’। हे विकल्पाची वार्ता। न घडे सर्वथा उद्धवा॥ १७॥ गुरुरूपें विष्णु जाण। श्रुत्यर्थ विष्णुचि आपण। शमदमादि साधन। तेंही जाण विष्णुचि॥ १८॥ शिष्यबुद्धीसी बोधकता। विष्णुचि जाण तत्त्वतां। यापरी गा निजभक्तां। मोक्षदाता श्रीविष्णु॥ १९॥ त्या मोक्षाचा जो परिपाक। ते समाधि श्रीविष्णुचि देख। समाधीचें समाधिसुख। आवश्यक श्रीविष्णु॥ १२०॥ परमात्मा परिपूर्ण। तो मी विष्णु ब्रह्मसनातन। भक्तभवपाशमोचन। कृपाळू जाण करीतसें॥ २१॥ गत श्लोकींचेनि अनुवादें। ‘शरीरिणाम्’ येणेंपदें। जीवासी बद्धपण उद्बोधे। तेंही विनोदें निवारितसे॥ २२॥ एकाशीच बद्धमुक्तता। घडे न घडे तत्त्वतां। या उद्धवाच्या प्रश्नार्था। विशद आतां करीतसे॥ २३॥
एकस्यैव ममांशस्य जीवस्यैव महामते।
बन्धोऽस्याविद्ययानादिर्विद्यया च तथेतर:॥ ४॥
रितीवाढी असे अग्नीशी। तेथ फुणगे उसळले आकाशीं। रितीवाढी नाहीं स्वरूपासी। अंश भासावयासी ठावो कैंचा॥ २४॥ जेणें पाविजे निजबोधातें। ते बुद्धी उद्धवापाशीं वर्ते। यालागींकृष्ण म्हणे ‘महामते’। उद्धवातें अतिप्रीतीं॥ २५॥ अतिप्रीतीं पुरस्करून। उद्धवासी म्हणे सावधान। ये श्लोकींचा अर्थ गहन। ते धारणा जाण धरावी॥ २६॥ यालागीं कृष्णजगजेठी। उद्धवाची पाठी थापटी। अतिगुह्याची गुह्य गोष्टी। तुझे कृपेसाठीं मी बोलतों॥ २७॥ पाठी थापटावयामिसें जाण। करीत स्वशक्तिसंचरण। तेणें अद्वयबोधलक्षण। उद्धवासी जाण प्रकाशी॥ २८॥ जीव एकचि त्रिजगतीं। हें जाण उद्धवा निश्चितीं। जेवीं नाना दीपांचिया दीप्ती। तेजाची ज्योति अभिन्न॥ २९॥ दोनी दीप एक होती। तैशी टिवळीं ऐक्या न येती। जडत्वापाशीं भेदप्राप्ती। ऐक्यवृत्ती अजडत्वीं॥ १३०॥ चंदनकुटके बहुवस। परी सर्वीं एकुचि सुवास। तेवीं जीवरूपें मी अविनाश। परमपरेश आभासे॥ ३१॥ ‘जीवरूपें तूं श्रीकृष्ण। हें सत्य मानावें वचन। तैं भवपाशादि बंधन। तुजचि जाण आदळलें’॥ ३२॥ ऐशी कल्पिशी जरी वार्ता। ते मज न घडे गा सर्वथा। जेवीं शरीरासी प्राण चाळिता। शरीरअवस्था त्या नाहीं॥ ३३॥ लिंगशरीरीं स्वयंभ। जीव तो मदंशें प्रतिबिंब। त्यासी देहादि बंधनभांब। मिथ्या विडंब आभासे॥ ३४॥ घटें आवरिला अवकाश। त्या नांव म्हणती ‘घटाकाश’। घटभंगें त्या नव्हे नाश। तेवीं मी अविनाश जीवत्वीं॥ ३५॥ थिल्लरीं प्रतिबिंबला सविता। तो गगन सांडोनि थिल्लराआंतौता। नाहीं रिघाला तत्त्वतां। तेंवीं मी जीवत्वा अलिप्त॥ ३६॥ रवि थिल्लरीं बिंबला दिसे। तेवीं मी लिंगदेहीं आभासें। मिथ्या तेथींचें भोगपिसें। तें बंधन कैसें मज लागे॥ ३७॥ येथें बोलणें न लगे बहु। प्रतिबिंबा नांव ‘जीवु’। मुख्य बिंब तो मी ‘शिवु’। विशद उगवु हा जाण॥ ३८॥ तळाव विहिरीं नाना थिल्लुरीं। सूर्यु प्रतिबिंबे त्यांमाझारीं। तितुकीं रूपें दिवाकरीं। पाहतां अंबरीं तंव नाहीं॥ ३९॥ तैसें एकासी जें अनेकत्व। तें मिथ्या जाण जीवत्व। हें भागवताचें निजतत्त्व। शुद्ध सत्त्वज्ञानाचें॥ १४०॥ थिल्लरीं प्रतिबिंबला सविता। चंचल निश्चल मळिनता। हे थिल्लराचे गुण तत्त्वतां। प्रतिबिंबमाथां मानिती॥ ४१॥ तेवीं शिवासी बाधकता। पाहतां नाहीं गा सर्वथा। हें अविद्याकार्य तत्त्वतां। जीवाचे माथां मानिती॥ ४२॥ एवं मिथ्या जीवभेद सर्वथा। त्यासी बद्धता आणि मुक्तता। विद्या अविद्या निजपक्षपाता। दावी तत्त्वतां निजकर्में॥ ४३॥ त्या जीवअभासासी प्रस्तुत। नित्यबद्ध नित्यमुक्त। एकासी दोनी अवस्था येथ। असे दावित विद्या अविद्या॥ ४४॥ जेवीं जळीं बिंबलासविता। त्या जळाची चंचळनिश्चळता। या प्रतिबिंबासीच अवस्था। मुख्य सविता ते नेणें॥ ४५॥ तेवीं जीवांची बद्धमुक्तता। परमात्म्यासी नलगे सर्वथा। जेवीं का अंधारींच्या खद्योता। न देखे सविता कल्पांती॥ ४६॥ जळीं आकाश दिसे बुडालें। परी तें कांही नाहीं झालें वोलें। तेवीं अविद्येसीअलिप्त ठेलें। असें संचलें निजरूप॥ ४७॥ एक बद्ध एक मुक्त। हें जीवामाजीं भासत। तेंही मीसांगेन निश्चित। सावचित्त परियेसीं॥ ४८॥ सहस्रघटीं जळ भरितां। एकचि सहस्रधा दिसे सविता। तेथ ये घटींची जी अवस्था। त्या घटस्था लागेना॥ ४९॥ तेथ जो घट होय चंचळु। त्यांतील प्रतिबिंब लागे अंदोळूं। परी दुजे घटीं जें निश्चळु। तें नव्हें चंचळु याचेनि॥ १५०॥ तेथ एकें दैवबळें। सूक्ष्म छिद्रें घटजळ गळे। तें प्रतिबिंब निजबिंबीं मिळे। येर सकळें तैसींचि॥ ५१॥ तेवीं गुरुकृपाउजियेडें। ज्याचें लिंगदेह विघडे। त्यासी परमात्म्यासी ऐक्य घडे। येर ते बापुडे देहबंदीं॥ ५२॥ हेंचि निरूपण पुढें। श्लोकसंगती सुरवाडें। तें मी सांगेन वाडेंकोडें। अतिनिवाडें निश्चित॥ ५३॥
अथ बद्धस्य मुक्तस्य वैलक्षण्यं वदामि ते।
विरुद्धधर्मिणोस्तात स्थितयोरेकधर्मिणि॥ ५॥
येणेंचि प्रसंगें जाण। मागील तुझे जे प्रश्न। बद्धमुक्तांचें लक्षण। तेहीं निरूपण सांगेन॥ ५४॥ दोघांही देहीं असतां। दिसे विरुद्ध धर्म स्वभावतां। एक तो सदा सुखी सर्वथा। एक दु:खभोक्ता अहर्निशीं॥ ५५॥ येथ विलक्षणता दों प्रकारीं। एक ते जीव-ईश्वरामाझारीं। एक ते जीवांसी परस्परी। बद्ध मुक्त निर्धारीं निश्चित॥ ५६॥ पहिली जीवेश्वरांची कथा। तुज मी सांगेन विलक्षणता। मग जीवाची बद्धमुक्तता। विशद व्यवस्था सांगेन॥ ५७॥ जीवेश्वरांचें वैलक्षण्य। अडीच श्लोकींनिरूपण। स्वयें सांगताहे नारायण। भाग्य पूर्ण उद्धवाचें॥ ५८॥
सुपर्णावेतौ सदृशौ सखायौ
यदृच्छयैतौ कृतनीडौ च वृक्षे।
एकस्तयो: खादति पिप्पलान्न-
मन्यो निरन्नोऽपि बलेन भूयान्॥ ६॥
‘सुपर्ण’ म्हणिजे पक्षी। ये वृक्षींचा जाय ते वृक्षीं। तैसा देही देहांतरातें लक्षी। यालागीं ‘पक्षी’ म्हणिजेत॥ ५९॥ पक्ष्यांच्या ऐशी यांची गती। हा देह सांडूनि त्या देहा जाती। ‘पक्षी’ म्हणावया हे उपपत्ती। जाण निश्चितीं उद्धवा॥ १६०॥ एवं आत्मा देहाहूनि भिन्न। तें सांगितलें उपलक्षण। देहात्मवादाचें खंडन। प्रसंगी जाण दाखविलें॥ ६१॥ आत्मा देह सर्वथा न घडे। देहबुद्धी धरणें तें तंव कुडें। हें उद्धवासी फाडोवाडें। निजनिवाडें दावित॥ ६२॥ देहबुद्धीचियापोटी। जन्ममरणांचिया कोटी। स्वर्गनरकांची आटाटी। देहबुद्धि गांठी जीवशिवपणें॥ ६३॥ दोघेही चिद्रूपें सारखे। कधी न होती आनासारिखे। अनादि हे दोघे सखे। अति नेटके जिवलग॥ ६४॥ काळें अकाळें सकाळें। नव्हती येरयेरांवेगळे। एकत्र वर्तती खेळेमेळें। निजप्रांजळें सख्यत्वें॥ ६५॥ प्रभा दीपु दवडिना वेगळा। दीपु प्रभेसी नव्हे निराळा। तेवीं जीवशिवांचा मेळा। एकत्र स्वलीळा नांदती स्वयें॥ ६६॥ जीवु इच्छी जें जें कांहीं। तें तें वासनेसरिसें पाहीं। ईश्वर पुरवी सर्वही। विमुख कांही हों नेणे॥ ६७॥ अंतकाळीं जें जीव मागे। तें अलोट ईश्वर देवों लागे। आणि ईश्वरआज्ञेचेनि योगें। जीवु सर्वांगें वर्तत॥ ६८॥ ईश्वरआज्ञा त्रिशुद्धी। जीवें जीव सर्वस्वें वंदी। होय नव्हे न म्हणे कधीं। अभिनव सिद्धी सखेपणाची॥ ६९॥ नवल सख्यत्वाची परी। ईश्वर जैसें जैसें प्रेरी। जीवु तैसें तैसें करी। निमेषभरी ढळेना॥ १७०॥ निमेष आरंभोनि जन्मवरी। जीवु ईश्वराचीआज्ञा करी। ईश्वरु जीवाचा साहाकारी। परस्परीं निजसखे॥ ७१॥ जीवु अत्यंत अडलेपणें। ईश्वरासी धांव धांव म्हणे। तो तत्काळ पावे धांवणें। करी सोडवणें जीवाचें॥ ७२॥ एवं शिवाचे आज्ञे जीवु राहे। जीवपण गेलिया शिवीं समाये। जीवालागीं हा शिवपणा वाहे। येरवीं राहे सांडूनि॥ ७३॥ ऐसें सखेपण यांचें। केवीं अनुवादवे वाचें। उद्धवा हें मीचि जाणें साचें। या सखेपणाचें सौजन्य॥ ७४॥ जीव ईश्वराआधीन। हें दृढ केलें संस्थापन। अनीश्वरवादाचें। खंडण। प्रसंगें जाण दाविलें॥ ७५॥ अनीश्वरवादु खंडितां। खंडिली कर्मपाखंडवार्ता। कर्मपाखंडाच्यामता। ईश्वरता न मानिती॥ ७६॥ म्हणती चित्तधर्म ईश्वरासी। तंव चिद्रूपता स्थापूनि त्यासी। निराकरिलें चित्तधर्मासी। अनायासीं चिद्रूपें॥ ७७॥ नाना परीचें अतिचिंतन। त्याचि नांव ‘चित्त’ जाण। चित्तेंवीण निश्चळपण। तेंचि ‘चैतन्य’ उद्धवा॥ ७८॥ धर्माधर्म न विचारितां। म्हणती ईश्वरु मोक्षदाता। हे भक्तपाखंडी कथा। स्थापूनि चिद्रूपता निवारी॥ ७९॥ टिळे-माळा-मुद्राधारणें। लावूनि संतांसीं निंदिलें जेणें। पाप राहटे भक्तपणें। त्यासी नारायणें नुद्धरिजे॥ १८०॥ अंतरींचें सर्व जाणता मी। यालागीं नांवें ‘अंतर्यामी’। तो शाब्दिकवचनधर्मी। चाळविला अधर्मी केवींजाये॥ ८१॥ मी ज्ञानस्वरूप तत्त्वतां। सर्वद्रष्टा सर्वज्ञाता। तो मी धर्माधर्म न विचारतां। मोक्षदाता हें न घडे॥ ८२॥ धरोनियां भक्तभावो। पाप राहाटे जो स्वयमेवो। याचि नामीं ‘दांभिक’ पहा हो। त्यातें देवो नुद्धरी॥ ८३॥ ‘सदृशौ’ आणि ‘सखायौ’। धरोनि या पदांचा अन्वयो। पाखंडमात्रातेंपहा हो। स्वयें देवो उच्छेदी॥ ८४॥ निरसोनि नाना मतांतरें। स्वमत करावया खरें। श्लोकींचीं पदें अतिगंभीरें। शार्ङ्गधरें वर्णिलीं॥ ८५॥ ते दोनी मिळोनियां पक्षी। नीड केळें देहवृक्षीं। वृक्ष म्हणिजे कोणे पक्षीं। तीहीं लक्षीं लक्षणें॥ ८६॥ जननीउदर तेंचि आळ। पित्याचें रेत बीज सकळ। गर्भाधान पेरणी केवळ। संकल्पजळ वृद्धीसी॥ ८७॥ सोहंभावाचा गुप्त अंकुरु। त्रिगुणभूमीं तिवणा डीरु। कोहंभावें वाढला थोरु। वृक्ष साकारु तेणें झाला॥ ८८॥ करचरणादि नाना शाखा। प्रबळबळें वाढल्या देखा। अधऊर्ध्व नखशिखा। वृक्षाचा निका विस्तारु॥ ८९॥ तया देहबुद्धीचीं दृढ मूळें। विकल्प-पारंब्या तेणें मेळें। भूमी रुतल्या प्रबळबळें। कामाचे कोंवळे फुटती कोंब॥ १९०॥ तेथ कर्मांचीं पानें। निबिड दाटलीं अतिगहनें। मोहममतेचे घोंस तेणें। सलोभपणें दाटले॥ ९१॥ ज्या उंचावल्या थोर शाखा। त्या फळीं फळोनि सुखदु:खां। उतरल्या जी अधोमुखा। अध:पतनें देखा लोळती॥ ९२॥ ऐशिया वृक्षामाजीं जाण। अतिगूढ गुप्त गहन। नीड केलें हृदयस्थान। जीवशिव आपण बैसावया॥ ९३॥ जेथ जीव परमात्मा वसती। तरी देहाची जाहली सत्य प्राप्ती। ऐसें कोणी कोणी म्हणती। तें मत श्रीपति निराकरी॥ ९४॥ पुरुषासवें लटकी छाया। तोडितां मोडितां नये घाया। तैशी अनिर्वचनीय माझी माया। तेणें यदृच्छया नीड केलें॥ ९५॥ जेवीं स्वप्नीं गृहाचारु निद्रिता। तेवीं जीवात्मा नीडीं वसता। हें मायामय सर्वथा। नव्हे वस्तुतां साचार॥ ९६॥ येणें निरूपणें गोविंदु। नैयायिक मताचा कंदु। समूळ केला त्याचा उच्छेदु। देहसंबंधु मिथ्यात्वें॥ ९७॥ ऐशियाही या वृक्षासी। जन्मादि निमेषोन्मेषीं। काळु छेदीतसे अहर्निशीं। बाळादि वयसांसी छेदकु॥ ९८॥ तया वृक्षाचीं फळें। तुरटें तिखटें तोडाळें। पक्वे अपक्वे सकळें। ज्यांसी ‘पिप्पलें’ म्हणताति॥ ९९॥ त्या दों पक्ष्यांमाजीं तत्त्वतां। जो जीवपणें बोलिजेता। तो या कर्मफळांचा भोक्ता। जीं नाना व्यथादायकें॥ २००॥ जीं फळें खातां पोट न भरे। खादल्या दारुण दुर्जरें। जेणें भवचक्रीं पडोनि फिरे। तरी अत्यादरें सेवितु॥ १॥ दुजा फळें खातां खुणा वारी। जीवासी त्या फळाची गोडी भारी। अखंड जाहला फळाहारी। वारिलें न करी शिवाचें॥ २॥ फळें सेविता अहर्निशीं। तिळभरी शक्ति नाहीं जीवासी। अशक्त देखोनियां त्यासी। काळ पाशीं बांधितु॥ ३॥ जो इयें सेवी कर्मफळें। तो तत्काळ बांधिजे काळें। दुजा कर्मफळा नातळे। त्यातें देखोनि पळे कळिकाळु॥ ४॥ जो कर्मफळातें न सेवितु। तो ज्ञानशक्तीनें अधिक अनंतु। सदा परमानंदें तृप्तु। असे डुल्लतु स्वानंदें॥ ५॥ उद्धवासी होय निजबोधु। यालागीं जीवशिवाचा भेदु। अत्यादरें सांगें गोविंदु। निजात्मबोधु प्रांजळु॥ ६॥
आत्मानमन्यं च स वेद विद्वा-
नपिप्पलादो न तु पिप्पलाद:।
योऽविद्यया युक् स तु नित्यबद्धो
विद्यामयो य: स तु नित्यमुक्त:॥ ७॥
जो कर्मफळातें न सेविता। जो स्वरूपाचा जाणता। द्रष्टा जीव-प्रपंचांचा तत्त्वतां। अलिप्तता निजज्ञानें॥ ७॥ जीवु प्रपंचाचा ज्ञाता। परी परमात्मा नेणे तत्त्वतां। यालागीं भोगी भवव्यथा। कर्मफळें खातां अतिबद्धु॥ ८॥ जो कर्मफळें सेवी बापुडा। तो अंधपंगु झाला वेडा। मी कोण हें नेणे फुडा। पाडिला खोडां देहाचे॥ ९॥ देहसंबंधाआंतु। प्रतिपदीं होय आत्मघातु। नाहीं जन्ममरणांसी अंतु। दु:खी होतु अतिदु:खें॥ २१०॥ नश्वर विषयांचा छंदु। तेणें जीवु जाहला अतिबद्धु। हा अविद्येचा संबंधु। लागला सुबद्धु देहवंतां॥ ११॥ जितुकी विषयाची अवस्था। तितुकी जीवासी ‘नित्यबद्धता’। जो विषयातीत सर्वथा। ‘नित्यमुक्तता’ ते ठायीं॥ १२॥ जो विद्याप्राधान्यें नित्यमुक्तु। जो ज्ञानशक्तीनें शक्तिमंतु। सर्वव्यापकु सर्वीं अलिप्तु। तो ‘नित्यमुक्तु’ बोलिजे॥ १३॥ सांगितली जीवाची नित्यबद्धता। प्रगट केली शिवाची मुक्तता। जीवाची जे बद्धमुक्तता। तेही आतां सांगतु॥ १४॥ उद्धवाप्रतीश्रीकृष्ण। बद्धमुक्तांचें लक्षण। दोघांचीही ऊणखूण। विचित्र जाण सांगेल॥ १५॥
देहस्थोऽपि न देहस्थो विद्वान् स्वप्नाद्यथोत्थित:।
अदेहस्थोऽपि देहस्थ: कुमति: स्वप्नदृग्यथा॥ ८॥
बद्धमुक्तांचें मिश्र लक्षण। तीं श्लोकीं सांगेल जाण। केवळ मुक्ताचें सुलक्षण। गोड निरूपण सात श्लोकीं॥ १६॥ देहीं असोनि देहबुद्धि नाहीं। हें मुक्ताचें ‘मुक्तलक्षण’ पाहीं। यालागीं देंही असोनि ‘विदेही’। म्हणिपे पाहीं या हेतू॥ १७॥ स्वप्नींचें राज्य आणि भीक। जागृतीं मिथ्या दोन्ही देख। तैसें देहादि जें सुखदु:ख। तें मिथ्या देख मुक्तासी॥ १८॥ जो स्वप्नीं मरोनि जाळिला। तो जागृतीं नाहीं राख जाहला। तैसा प्रपंच मिथ्या जाणितला। ‘मुक्त’ बोलिला त्या नांव॥ १९॥ स्वप्नींचें साधकबाधक। जागृतीं आठवे सकळिक। त्याचें बाधीना सुखदु:ख। तैसें संसारिक मुक्तासी॥ २२०॥ आतां ऐक बद्धाची स्थिती। तो वस्तुतां असे देहातीतीं। परी ‘मी देह’ हें मानी कुमती। दु:खप्राप्ती तेणें त्यासी॥ २१॥ जळीं देखे प्रतिबिंबातें। मी बुडालों म्हणोनि कुंथे। कोणी काढा काढा मातें। पुण्य तुमतें लागेल॥ २२॥ स्वप्नीं घाय लागले खड्गाचे। तेणें जागृतीं म्हणेमी न वांचें। ऐसें निबिड भरितें भ्रमाचें। तें बद्धतेचें लक्षण॥ २३॥ स्वप्नींचें सुखदु:ख नसतें। तें स्वप्नभ्रमें भोगितां कुंथे। तेवीं ‘देह मी’ म्हणोनि येथें। नाना दु:खांते भोगितु॥ २४॥ स्वस्वरूपाचेंविस्मरण। तेणें विषयासक्ति दृढ जाण। संकल्प विकल्प अतिगहन। तेंचि लक्षण बद्धाचें॥ २५॥ आणिकें लक्षणें त्याचीं आतां। सांगतु असें तत्त्वतां। भोग भोगोनि अभोक्ता। ते ‘मुक्तावस्था’ परियेसीं॥ २६॥
इन्द्रियैरिन्द्रियार्थेषु गुणैरपि गुणेषु च।
गृह्यमाणेष्वहं कुर्यान्न विद्वान्यस्त्वविक्रिय:॥ ९॥
अवशेष प्रारब्धस्थितीं। मुक्तांची देहीं दिसे वस्ती। परी जागृतीं स्वप्न-सुषुप्तीं। देहस्थिती नातळे॥ २७॥ छाया पुरुषाचेनि चळे। ते छायेसी पुरुष नातळे। तेवीं मिथ्या देह मुक्ताजवळें। कल्पांतकाळें येवों न शके॥ २८॥ आपुले छायेसी जाण। जेवीं बैसों न शके आपण। तेवीं मायादि तिन्ही गुण। जवळी असोन स्पर्शेना॥ २९॥ इंद्रियद्वारा यथानिगुतीं। प्राप्त विषयांतें सेविती। परी सेविलें ऐसेंही नेणती। विषयस्फूर्ती स्फुरेना॥ २३०॥ गुण पोखिती गुणावस्था। इंद्रियें घेतीं इंद्रियार्थां। मी उभयसाक्षी अकर्ता। चिन्मात्रतां अलिप्त॥ ३१॥ तो इंद्रियाचेनि खेळेमेळें। सुखें विषयामाजीं जरी लोळे। तरी विकाराचेनि विटाळें। कदाकाळें मैळेना॥ ३२॥ जेथ कामाची अतिप्रीती। तेथ लोभाची दृढ वस्ती। अथवा कामाची जेथ अप्राप्ती। तेथ महाख्याती क्रोधाची॥ ३३॥ मुक्त जाहला नित्य निष्काम। क्रोधलोभेंसी निमाला काम। तो स्वयें जाहला ‘आत्माराम’। विश्रामधाम जगाचें॥ ३४॥ एवं मुक्ताच्या ठायीं जाण। उपजों न शके पापपुण्य। कामक्रोधादिवृत्तिशून्य। जाहला परिपूर्ण चिद्ब्रह्म॥ ३५॥ मुक्ताची विषयस्थिती। विषयीं स्फुरे ब्रह्मस्फूर्ती। यालागीं पापपुण्यें नुपजती। नित्यमुक्ति तेणें त्यासी॥ ३६॥ ऐशी मुक्ताची हे कथा। ऐक बद्धाचीही वार्ता। अकर्ताचि म्हणे मी कर्ता। येणेंचि सर्वथा गुंतला॥ ३७॥
दैवाधीने शरीरेऽस्मिन् गुणभाव्येन कर्मणा।
वर्तमानोऽबुधस्तत्र कर्तास्मीति निबद्धॺते॥ १०॥
अदृष्टाअधीन जें शरीर। तेथ आलियाहि हरिहर। अन्यथा न करवे अणुमात्र। हें वेद शास्त्रसंमत॥ ३८॥ देहीं ज्या गुणाचें प्राधान्य। तैसेंचि कर्म निपजे जाण। इंद्रियें तीं गुणाधीन। तदनुसारें जाण वर्ततीं॥ ३९॥ एवं दैवगुणें देहवर्तन। तेथ मी कर्ता म्हणवी आपण। तेंचि त्यासी दृढ बंधन। आपणा आपण घातक॥ २४०॥ नळीमाजिल्या चण्यांच्या आशां। वानरें मुठीं धरणें तोचि फांसा। तेवीं देहींच्या विषयविलासा। अभिमानें तैसा गुंतला॥ ४१॥ जी देहातीत वस्तुतां। जो गुणकर्माचा अकर्ता। तो म्हणे ‘मी देह’ ‘मी कर्मकर्ता’। अहंममता भूलला॥ ४२॥ जो न करितांचि चोरी। मी चोरु म्हणे राजद्वारीं। तो मारिजे लहानथोरीं। तैशीपरी जडजीवां॥ ४३॥ प्रकृतीचें कर्म आपुले माथां। घेऊनि नाचे अहंममता। तेणें अभिमानें दृढ बद्धता। आकल्पांता अनिवार॥ ४४॥ तळीं मांडूनि काजळा। वरी ठेविला स्फटिकु सोज्ज्वळा। श्वेतता लोपूनि दिसे काळा। तेवीं आंधळा जीवु झाला॥ ४५॥ कां आंधळें मातलें हातिरूं। नेणे निजपतन निर्धारु। तैसा जीवु लागे कर्म करूं। पतनविचारु तो न देखे॥ ४६॥ ‘मी देह मी कर्मकर्ता। मी ज्ञाता मी विषयभोक्ता’। ऐशी जे कां देहात्मता। ‘दृढबद्धता’ तिये नांव॥ ४७॥ एवं बद्ध-मुक्त-वर्तन। विशद केलें निरूपण। आतां केवळमुक्ताचें लक्षण। आवडीं श्रीकृष्ण सांगतु॥ ४८॥ ‘ज्ञानिया तो तंव आत्मा माझा’। हे अतिप्रीती गरुडध्वजा। हें गुह्य सांगितलें कपिध्वजा। रणसमाजा रणरंगीं॥ ४९॥ तेंचि आतां उद्धवाप्रती। अत्यादरें सांगे श्रीपती। ज्ञानियांची मुक्तस्थिती। यथानिगुतीं निजगुह्य॥ २५०॥ ज्ञानलक्षणें सांगतां। धणी नपुरे श्रीकृष्णनाथा। निरोपणमिसें ज्ञानकथा। मागुतमागुतां सांगतु॥ ५१॥ यालागीं ज्ञानभक्तांची गोडी। श्रीकृष्णचि जाणे फुडी। कृष्णभजनाची आवडी। भक्त ते गोडी जाणती॥ ५२॥ आधींच तंव हे मुक्ताचीकथा। वरी श्रीकृष्णासारिखा वक्ता। उद्धवाचें भाग्य वर्णितां। न वर्णवे सर्वथा शेषादिकां॥ ५३॥ उद्धव अर्जुनासमान। त्याहूनि हा दिसे गहन। ते परस्परें नरनारायण। गुह्य ज्ञान बोलिले॥ ५४॥ तेचि उलथूनि ज्ञानकथा। उद्धवासी होय सांगता। उद्धवा ऐसें भाग्य तत्त्वतां। न दिसे सर्वथाआनासी॥ ५५॥ जाणें सांडूनि निजधामा। मागें ठेवूनि आपल्या कामा। उद्धव आवडलापुरुषोत्तमा। त्याचिया प्रेमा विगुंतला॥ ५६॥ यालागीं उद्धवाचें शुद्ध पुण्य। जगीं उद्धवुचि धन्य धन्य। जयालागीं स्वयें नारायण। स्वानंदघन वोळला॥ ५७॥ जो नातुडे योगयागसंकटीं। तो उद्धवाच्या बोलासाठीं। जेवीं व्याली धेनु वत्सा चाटी। तेवीं गुह्य गोठी सांगतु॥ ५८॥ जो निजकुळासी काळु। तो उद्धवासी अतिस्नेहाळु। बापु भक्तकाजकृपाळु। ज्ञानकल्लोळु तुष्टला॥ ५९॥ यालागीं उद्धवाचें नांव घेतां। श्रीकृष्ण निवारी भवव्यथा। ऐसी भक्तप्रीती भगवंता। भक्तातें स्मरतां हरि तारी॥ २६०॥ मुक्ताचीं लक्षणें निर्धारितां। लाभे आपुली निजमुक्तता। एका जनार्दनु विनवी संतां। मुक्तकथा हरि बोले॥ ६१॥ कृष्णु उद्धवासी म्हणे मी तुज। सांगेन आपुलें निजगुज। मुक्तलक्षणाचें भोज। नवल चोज परियेसीं॥ ६२॥
एवं विरक्त: शयने आसनाटनमज्जने।
दर्शनस्पर्शनघ्राणभोजनश्रवणादिषु ॥ ११॥
ऐकें मुक्ताचें लक्षण। आसन भोज शयन। दर्शन स्पर्शन घ्राण। अटन मज्जन करी कैसें॥ ६३॥ मागील श्लोकार्थु संपतां। प्रकृतिकर्म अभिमानता। तेणें लागली दृढबद्धता। तो अहंकारु ज्ञाता नातळे॥ ६४॥ सर्वकर्मीं स्वभावतां। ज्ञात्याची निरभिमानता। ते मी समूळ सांगेन कथा। सावधानता अवधारीं॥ ६५॥ जेवीं छायेचा मानापमान। पुरुषा न बाधी अणुप्रमाण। तेवीं देहाचें कर्माचरण। निरभिमान मुक्तासी॥ ६६॥ स्वाधिष्ठान तेंचि ‘आसन’। अखंड त्यावरी आरोहण। तेथें येवोंचि नेणे अभिमान। बैसलें मन उठेना॥ ६७॥ नवल आसनाचें महिमान। हारपोनि गेलें विस्मरण। कदा एकांतु न मोडे जाण। हें ‘सहजासन’ मुक्ताचें॥ ६८॥ जें आसनींचें समाधान। समाधि आणि व्युत्थान। करी दोंहीची बोळवण। हें चालतें ‘आसन’ मुक्ताचें॥ ६९॥ जें बैसल्या आसनीं समाधान। त्याचि स्थिति ‘गमनागमन’। उठिलों बैसलों नाठवे जाण। चालतेंपण स्फुरेना॥ ७०॥ चालतांही चपळ पदीं। मी चालतो हे नाठवे बुद्धी। चालतां न मोडे समाधी। हे लक्षणसिद्धी मुक्ताची॥ ७१॥ जरी त्रैलोक्य हिंडला। तरी ठायींहूनि नाहीं हालला। ऐसा न चलोनि मुक्तु चालला। जेवीं अभ्रें धांवला दिसे चंद्र॥ ७२॥ कुलालचक्रीं बैसली माशी। ते न हालतां भंवे चक्रासरसीं। मुक्तांची गमनसिद्धी तैशी। देहगमनेंसीं आभासे॥ ७३॥ देहो प्रारब्धास्तव हिंडे। बैसका स्वस्वरूपींची न संडे। जेवीं रथीं धांवतां सवेग घोडे। निद्रा न मोडे रथस्थाची॥ ७४॥ ऐसें न चळतां जें चळण। तें जाण मुक्ताचें ‘गमन’। आतां ऐक त्याचें ‘स्नान’। निमज्जन निजरूपीं॥ ७५॥ स्नान करी गंगाजळें। परी गंगोदकातें नातळे। मन ‘चित्स्वरूपीं’ केलें सोवळें। तें वोवळें हों नेणे॥ ७६॥ त्यासी निजस्वरूपीं नाहतां। जाहली परम पवित्रता। तीर्थे मागती चरणतीर्था। ऐशी सुस्नातता मुक्ताची॥ ७७॥ तो चिन्मात्रचि देखे जीवन। अखंड चिद्रुपीं अवगाहन। इतर म्हणती केलें स्नान। त्यासी निमज्जन निजरूपीं॥ ७८॥ त्याचेचरणींचे रज:कण। लाहोनि धरा परम पावन। त्याचेनि प्राणसंगें जाण। पवित्रपण वायूसी॥ ७९॥ त्याचेनि चरणस्पर्शे तत्त्वतां। पवित्र झाल्या गंगादि सरिता। त्याचेनि जठरसंगे सर्वथा। अतिपवित्रता अग्नीसी॥ २८०॥ त्याच्या हृदयावकाशीं आकाश। सगळें राहिलें सावकाश। तेणें पवित्र जाहलें आकाश। अलिप्त उदास सर्वत्र॥ ८१॥ जे चढोनि बैसले वैकुंठीं। ते सदा वांछिती त्याची भेटी। वेदु ऐकों धांवे गोठी। तो पहावया दिठीं देव येती॥ ८२॥ एवं चित्स्वरूपीं करूनि स्नान। जाहला सर्ववंद्य अतिपावन। हें मुक्ताचें स्नानलक्षण। आतां ‘निरीक्षण’ तें ऐक॥ ८३॥ अवघें चराचर देखतां। तो देखोनीचि न देखता। दृष्टीसी दृश्यासी अलिप्तता। दृश्य देखतां हरि दिसे॥ ८४॥ दृश्यें दुमदुमितदिसे सृष्टी। परी दृश्य न पडे त्याचे दृष्टीं। होतांही दृश्येंसीं भेटी। पडे मिठी अदृश्यीं॥ ८५॥ दृष्टिप्रकाशे देखणेपणीं। तें देखणें देखे दृश्यस्थानीं। जेवीं डोळॺां डोळा दर्पणीं। निज दर्शनीं देखतु॥ ८६॥ डोळेनि दर्पणु प्रकाशे। त्यामाजीं डोळेनि डोळा दिसे। मुक्ताचें देखणें तैसें। आपणयाऐसें जग देखे॥ ८७॥ दृश्य-द्रष्टा-दर्शनीं। त्रिपुटी गेली हारपोनी। देखणें देखे देखणेनी। देखणा होउनी सर्वांगें॥ ८८॥ होतां नाना पदार्थेंसीं भेटी। तें देखणेपणा दृश्य लोटी। दृश्यातीत निजदृष्टीं। सुखेंसृष्टी देखतु॥ ८९॥ मुक्ताची हे देखती स्थिती। देखणेपणें यथानिगुतीं। उद्धवा ये दृष्टीची ज्यासीप्राप्ती। तोचि त्रिजगतीं पावन॥ २९०॥ या दृष्टीं जे नित्य वर्तत। ते जाण पां परम मुक्त। या दृष्टींजे मज पाहत। परम भागवत प्रिय माझे॥ ९१॥ परादिवाचांमाजीं वचन। उपजे तेथ याचें ‘श्रवण’। श्रोता वक्ता कथा कथन। अवघें आपण होऊनि ऐके॥ ९२॥ शब्दजातेंसीं कान। अखंड जडले सावधान। श्रवणामाजीं हारपे गगन। परम समाधान श्रवणाचें॥ ९३॥ ऐकतां लौकिक शब्द। कां नारायण-उपनिषद। परिसतां नाम हरि-गोविंद। अर्थावबोध समत्वें॥ ९४॥ बोलातें जो बोलविता। तोचि श्रवणामाजीं श्रोता। येणें अन्वयें श्रवण करितां। शब्दीं नि:शब्दता अतिगोड॥ ९५॥ जो जो श्रवणीं पडे शब्दु। तो तो होत जाय नि:शब्दु। यापरी श्रवणीं परमानंदु। स्वानंदबोधु मुक्ताचा॥ ९६॥ अकारादि वर्णत्रिपुटी। प्रणवु मूळशब्द सृष्टीं। तो ओंकार ब्रह्मरूपें उठी। हे श्रवणसंतुष्टी मुक्ताची॥ ९७॥ श्रवणीं पडतां शब्दज्ञान। सहजें शाब्दिक जाय उडोन। श्रवणीं ठसावे ब्रह्म पूर्ण। स्वानंदश्रवण मुक्ताचें॥ ९८॥ परिसतां उपनिषद। कां लौकिकादि नाना शब्द। मुक्ताचा पालटेना बोध। श्रवणीं स्वानंद कोंदला॥ ९९॥ एक अद्वितीय ब्रह्म। हें वेदशास्त्राचें गुह्य वर्म। तें मुक्तांसी जाहलें सुगम। शब्दी परब्रह्म कोंदलें॥ ३००॥ लौकिक वैदिक शब्द जाण। शब्दमात्रीं ब्रह्म पूर्ण। ऐसें मुक्ताचें हें श्रवण। ‘घ्राणलक्षण’। परियेसीं॥ १॥ घ्राणासी येतां सुगंधु। मुक्तासी नोहे विषयबोधु। गंधमिसें स्वानंदकंदु। परमानंदु उल्लासे॥ २॥ घ्राण-सुमन-चंदन। अवघें तो होय आपण। यापरी गंध भोगी जाण। भोक्तेंपण सांडोनी॥ ३॥ घ्राणा येतांचि सुवासु। सुवासीं प्रकटे परेशु। तेव्हां सुवासु आणि दुर्वासु। हा विषयविलासु स्फुरेना॥ ४॥ मलयानिलसंगें जाण। जेथ जेथ गंधाचें गमन। तेथ तेथमुक्ताचें घ्राण। अगम्यपण या भोगा॥ ५॥ जितुका चळता वायु जाण। तितुकें मुक्ताचें घ्राण। यापरी गंधग्रहण। स्वभावें जाण होतसे॥ ६॥ यापरी जाण तत्त्वतां। होय तो गंधाचा भोक्ता। हे घ्राणक्रिया जाण मुक्ता। ‘रसभोग्यता’ अवधारीं॥ ७॥ रस-रसना-भोजन। तो स्वयेंचि आहे आपण। हातु न माखितां सर्वापोशन। रसनेविण सेवितु॥ ८॥ षड्रसांचा स्वादु जाणे। परी एकीचि चवीं अवघेंखाणें। भोक्तेपणा आतळों नेणे। ऐसेनि भोजनें नित्यतृप्तु॥ ९॥ भूक उपजोंचि नेणे। जेवूं बैसल्यापुरे न म्हणे। सर्वभक्षी न खातेपणें। उच्छिष्ट होणें त्या नाहीं॥ ३१०॥ ताट अन्न आणि आपण। तो न देखे भिन्नपण। रसमिसें स्वानंदपूर्ण। सर्वांगें जाण सेवित॥ ११॥ जंव रसना घेवों जायरसस्वादु। तंव तेथें प्रकटे परमानंदु। करूनि रसरसने उच्छेदु। निजानंदु सेवितु॥ १२॥ सकळगोडियांची मूळ गोडी। तेथ बैसली निजआवडी। सेवितां नाना परवडी। तेचि गोडी गोडपणें॥ १३॥ सकळ गोडियां जें गोड आहे। ते गोडीच तो झाला स्वयें। आतां जो जो रसविषयो खाये। तेथतेथ आहे ते गोडी॥ १४॥ कैसा मुक्ताचा निजबोधु। घेवों जातां रसस्वादु। रसत्व लोपूनिस्वानंदकंदु। परमानंदु वोसंडे॥ १५॥ यालागीं जो जो रस सेवूं जाये। तो तो ब्रह्मरसुच होये। मुक्ताची रसना यापरी पाहें। घेत आहे रसातें॥ १६॥ एवं मुक्ताचें जें भोजन। ते करिती क्रिया ऐशी जाण। आतां तयाचें जें ‘स्पर्शन’। तेंही लक्षण परियेसीं॥ १७॥ मुक्ता शीत लागातांचि जाण। शीत सांडी शीतळपण। स्पर्शे उष्णत्वा मुकलें उष्ण। स्पर्शलक्षण हें त्याचें॥ १८॥ जेवीं कां टेंकितां अग्नीशी। घुरें आणी चंदनाशी। जाळूनि त्यांच्या विकाराशी। आपणाऐशीं करी वन्ही॥ १९॥ तेवीं मुक्तासीद्वंद्वें आदळतां। द्वंद्वांची बुडाली द्वंद्वता। तो सर्वी सर्वपणें असतां। सहजे द्वंद्वता निमाली॥ ३२०॥ तेथ कैंचे मृदु कैंचेंकठिण। कैंचें शीत कैंचें उष्ण। सर्वीं सर्वात्मा तो जाण। द्वंद्वाचें भानस्पर्शेना॥ २१। आगीसी पोळीना उन्हाळा। हींव पीडीना हिमाचळा। तैशी द्वंद्वांची हे माळा। मुक्ताचे गळां पडेना॥ २२॥ सुवर्णाचे अलंकार भले। सुवर्णपेटीमाजी झांकिले। झांकिले म्हणतां उघडे ठेले। तेवीं द्वंद्वें सकळ परब्रह्म॥ २३॥ अंगीं जें जें आदळें। तें अंगचि होय तत्काळें। कांहींनुरे त्यावेगळें। द्वंद्वे सकळें निमालीं॥ २४॥ त्यासी हातीं लीलाकमळ सांपडे। तंव कमळींकमळत्वचि उडे। कमळजन्मा तोही बुडे। करी रोकडे निजरूप॥ २५॥ स्पर्श-स्पर्शतें-स्पर्शावें। हेही त्रिपुटी न संभवे। किंबहुना आपणचि आघवें निजस्वभावें होऊनि ठेला॥ २६॥ तो देवपूजा हातींधरी। तरी मीचि ते देवपूजेभीतरीं। अथवा खेळों रिघाल्या पाथरीं। त्याहीमाझारीं मी त्यासी॥ २७॥ भिंती नानावर्ण चित्राकृती। तेथें जें जें स्पर्शे तें तें भिंती। तेवीं मुक्ताची स्पर्शनस्थिती। पूर्ण अद्वैतीं निजबोधु॥ २८॥ यापरीं गा तत्त्वतां। स्पर्शलक्षण वर्ते मुक्ता। त्याचें ‘बोलणें’ जें सर्वथा। ऐक आतां सांगेन॥ २९॥ सुरस कथा सांगे वाडेंकोडें। अथवा लौकिक बोलणें घडे। परी त्याची समाधिमुद्रा न खंडे। मौन न मोडे बोलतां॥ ३३०॥ बोलतांही न मोडे मौन। हेचि अनुभवाची आंतुली खूण। शब्दामाजीं नि:शब्दगुण। सज्ञान जाण जाणती॥ ३१॥ स्त्रीपुरुषें अबोला चालती। तो अबोला कीं अतिप्रीती। तेवीं मुक्ताची बोलती स्थिति। शब्द शब्दार्थी नि:शब्द॥ ३२॥ जयाचीं बोलतीं अक्षरें। अक्षररूपेंचि साचारें। त्याचीं ऐकतां उत्तरें। चमत्कारें मन निवे॥ ३३॥ मी एकु चतुर बोलका। हाही नाहीं आवांका। अथवा रंजवावें लोका। हेंही देखा स्मरेना॥ ३४॥ नि:शब्दीं उठती शब्द। शब्दामाजीं ते नि:शब्द। यापरी करितांही अनुवाद। बोलोनि शुद्ध अबोलणा॥ ३५॥ जळामाजीं उपजे तरंग। जळ तंरगाचें निजांग। तेवीं नि:शब्दीं शब्द साङ्ग। शब्दाचें सर्वांग नि:शब्द॥ ३६॥ वाच्य-वाचा-वाचकता त्रिपुटी। लोपूनि सांगे गोड गोठी। करितां सैराट चावटी। न सुटे मिठी मौनाची॥ ३७॥ म्यां सत्यचि बोलावें। हेंही त्यासी जीवें नाठवे। मिथ्या बोलों लोभस्वभावें। हेंही न संभवे मुक्तासी॥ ३८॥ सत्य मिथ्या जीं बोलणीं। नि:शेष प्राशूनि नेलीं दोनी। मूळींच्या मौनें जाहला मौनी। नाना वचनीं बोलतां॥ ३९॥ तेथ सैराट हाक देतां। कां सिंहनादें गर्जतां। शब्दीं ठसावली नि:शब्दता। मौन सर्वथा मोडेना॥ ३४०॥ जरी तो माझें स्तवन करी। तरी मी त्याच्या स्तवना माझारीं। तोजरी सैरा बडबड करी। त्याही माझारीं मी त्यासी॥ ४१॥ जरी त्यासी येऊनि भांडण पडे। तरी भांडणही करणें घडे। त्या कळहामाजीं मागेंपुढें। चहूंकडे मज देखे॥ ४२॥ त्याचे वांकुडे तिकुडे व्यंग बोल। ते जाण ब्रह्मचि केवळ। तया आम्हां अभिन्न मेळ। निजात्मसाल वस्तीसी॥ ४३॥ अवचटें ये त्याच्या मुखाबाहेरीं। ज्यासी म्हणे ‘तुज देवो तारी’। त्यासी मी वाउनियां शिरीं। ब्रह्मसाक्षात्कारीं पाववीं॥ ४४॥ यालागीं त्याच्या वचनाऽधीन। मी सर्वथा असें जाण। त्याचें वचन तें प्रमाण। सर्वस्वें जाण मी मानीं॥ ४५॥ आतां ‘तो’ ‘मी’ हे ऐशी बोली। बाहेरसवडी वाढिन्नली। ‘मी तोचि तो’ हे किली। मागीं चोजवली मद्भक्तां॥ ४६॥ यालागीं तो माझा जीवप्राण। मी त्याचें निजजीवन। तयासीं मज भिन्नपण। कल्पांतीं जाण असेना॥ ४७॥ एवं तो सगळामजभीतरीं। मी तया आंतुबाहेरीं। ऐसेनि अभिन्नपणेंकरीं। सुखें संसारीं नांदतु॥ ४८॥ त्याचेमुखींचे जे जे बोल। ते मीचि बोलता सकळ। मुक्ताचें बोलणें केवळ। तुजप्रती विवळ म्यां केलें॥ ४९॥ ‘हातीं’ कांही घेवों जाये। तंव घेणें देवोचि होये। देतां कांहीं देवो पाहे। तेंही होयेतद्रूप॥ ३५०॥ तेव्हां दान आणि देते-घेते। भिन्नपणें न देखे तेथें। यालागीं करोनियां अकर्ते। यापरी करांतें वर्तवी॥ ५१॥ निजस्वभावें ते कर। जो कांहीं करिती व्यापार। तेथ न केलेपणाचें सूत्र। सहजीं साचार ठसावे॥ ५२॥ करीं पडलिया शस्त्र। करूं जाणे तो व्यापार। परी ‘मी कर्ता’ हा अहंकार। अणुमात्र असेना॥ ५३॥ पुढें वोढवलें अवचितें। तरी खेळों जाणे द्यूतकर्मातें। हारी जैत नाठवे चित्तें। निजस्वभावें तें खेळतु॥ ५४॥ वोडवल्या ब्राह्मणपूजा। करूं जाणे अतिवोजा। पूज्यपूजकत्वें भावो दुजा। न मनूनि द्विजां पूजितु॥ ५५॥ धनुषीं काढूं जाणे वोढी। अनुसंधानें बाण सोडी। अलक्ष्य लक्षूनि भेदी निरवडी। परी न धरी गोडी श्लाघेची॥ ५६॥ कैसें कर्म निपजे करीं। जैशा समुद्रामाजीं लहरी। तैसा निजस्वरूपामाझारीं। नाना व्यापारीं निश्चळु॥ ५७॥ सूर्य मृगजळातें भरी। तैसा व्यापारु निजनिर्विकारीं। परी केलेंपण शरीरीं। तिळभरी असेना॥ ५८॥ सूर्यकांतीं अग्नि खवळे। तें कर्म म्हणती सूर्यें केलें। तैसें हस्तव्यापारें जें जें जाहलें। नाहीं केलें तें त्याणें॥ ५९॥ सूर्यकांतीं पाडावाअग्नी। हें नाहीं सूर्याचे मनीं। तेवीं मुक्त निरभिमानी। क्रियाकरणीं विचरतु॥ ३६०॥ त्यासी चालवूं जातां ‘पायें’। तळीं पृथ्वी नाहीं होये। आपण आपणियावरी पाहे। चालतु जाये स्वानंदें॥ ६१॥ जळींचा जळावरी तरंग। अभिन्नपणें चाले चांग। तैसा तो निजरूपीं साङ्ग। चालवी अंग चिद्रूपें॥ ६२॥ तयासी असतांही चरण। आवडीं चाले चरणेंविण। करी सर्वांगें गमन। सर्वत्र जाण झालासे॥ ६३॥ जेवीं अखंडदंडायमान। पायेंवीण चाले जीवन। तेवीं चरणेंवीण गमन। नित्य सावधान मुक्ताचें॥ ६४॥ सर्वथा पायेंविण। वायूचें सर्वत्र गमन। तैसेंच मुक्ताचें लक्षण। स्वरूपीं जाण सर्वत्र॥ ६५॥ यापरी न हालतां जाण। त्याचें सर्वत्र ‘गमन’। नाठवे चालतेंपण। ऐसेंच लक्षण मुक्ताचें॥ ६६॥ मूळीं आत्मा आत्मी नाहीं जाणा। यालागीं स्त्रीपुरुषभावना। त्यासी सर्वथा आठवेना। दैवें ‘अंगना’ तो भोगी॥ ६७॥ नटु नाटकु अवगमला। पुरुष स्त्रीवेषें दिसों आला। स्त्रीपुरुषभावो संपादिला। तेवीं हा जाहला गृहस्थु॥ ६८॥ कां अर्धनारीनटेश्वरीं। जो पुरुष तोचि नारी। मुक्तासी जाण तैशापरी। स्त्रीपुरुषाकारीं निजबोधु॥ ६९॥ जेवीं कां आपुली साउली। आवडीं आपण आलिंगिली। तेवींमुक्तें स्त्री भोगिली। द्वैताची भुली सांडोनी॥ ३७०॥ छाया कोठें असे कोठें वसे। सरशी असतां ज्याची तो न पुसे। मुक्तासी जाण तैसें। लोलुप्य नसे स्त्रियेचें॥ ७१॥ एवं स्त्रीपुरुषविकारप्राप्ती। त्याची न मोडे आत्मस्थिती। दैवें जाहलिया संतती। आत्मप्रतीति तेथेंही॥ ७२॥ ‘आत्मा वै पुत्रनामासि’। सत्यत्व आलें ये श्रुतीसी। पुत्रत्वें देखे आपणासी। निजरूपेंसीं सर्वदा॥ ७३॥ स्वयें जनकु स्वयें जननी। स्वयें क्रीडे पुत्रपणीं। आपणावांचूनि जनींवनीं। आणिक कोणी देखेना॥ ७४॥ एवं स्त्रीपुत्रसंतती। जेवीं आकाशी मेघपंक्ती। काळें येती काळें जाती। तैशी स्थिती मुक्ताची॥ ७५॥ स्त्रीसंभोगीं जें होय सुख। तें सुख मुक्तासी सदा देख। यालागी स्त्रीकामअभिलाख। नाही विशेख मुक्तासी॥ ७६॥ जैसे राजहंसापाशीं शेण। तैसें मुक्तापाशीं जाण ‘धन’। त्यावरी त्याचें नाहीं मन। उदासीन सर्वदा॥ ७७॥ व्याघ्रासी वाढिलें मिष्टान्न। तें त्यासी जैसें नावडे जाण। तैसें मुक्तासी नावडे धन। धनलोभीपण त्या नाहीं॥ ७८॥ पोतास कापुराचा डला। जेवीं नातळे काउळा। तेवीं अनर्घ्यरत्नमाळा। मुक्तें सांडिल्या थुंकोनि॥ ७९॥ ज्यासी धनलोभाची आस्था। त्यासी कल्पांतीं न घडे मुक्तता। तैसें स्त्रीकामिया सर्वथा। नव्हे परमार्थता निजबोधु॥ ३८०॥ मुक्ताचिये निद्रेपाशीं। समाधि ये विश्रांतीसी। शिणली धांवे माहेरा जैशी। तैसी विसाव्यासी येतसे॥ ८१॥ जागृतिस्वप्नसुषुप्तीसी। नातळोनि तींही अवस्थांसी। निजीं निजे निजत्वेंसीं। अहर्निशीं निजरूपें॥ ८२॥ निजीं निजों जातां निर्धारा। तळीं हरपली धरा। वरी ठावो नाहीं अंबरा। ऐशिया सेजारामाजीं निजे॥ ८३॥ नवल निजती त्याची वोज। चालतां बोलतां न मोडे नीज। खातां जेवितां अखंड नीज। सहजीं सहज निजरूप॥ ८४॥ निजवितें कां उठवितें। दोनी तोचि आहे तेथें। कोण कोणा जागवितें। निजे सुचित्तें निजरूपें॥ ८५॥ जागतां निजेशीं वागे। वागतांही नीज लागे। एवं नीजरूप जाहला अंगें। निद्रेचेनि पागें पांगेना॥ ८६॥ शय्या-शयन सेजार। अवघे तोचि असे साचार। आपुल्या निजाचें आपण घर। नित्य निरंतरनिजीं निजे॥ ८७॥ ऐसें जें जें करूं जाय कर्म। तेथ तेथ प्रकटे परब्रह्म। मुक्तासी एकुही नाहीं नेम। हें मुख्य वर्म मुक्ताचें॥ ८८॥ मुक्तासी नेमबंधन। तैं अंगीं लागलें साधन। साधन असतां मुक्तपण। न घडे जाण सर्वथा॥ ८९॥ मुक्तासी तंव आसक्ती। सर्वदा नाहीं सर्वार्थी। शेष प्रारब्धाचे स्थितीं। कर्में निफजतीं निरपेक्ष॥ ३९०॥ ज्याचा निमाला अहंकारु। तो माझें स्वरूप साचारु। ये अर्थी न लगे विचारु। वेदशास्त्र-संमत॥ ९१॥ जो नित्यमुक्त निर्विकारी। तो वर्ततां वर्ते मजमाझारीं। मी तया आंतुबाहेरीं। जेवीं सागरीं कल्लोळ॥ ९२॥ यापरी झाला जो परब्रह्म। त्यासी स्वप्नप्राय धर्माधर्म। बाधूं न शके इंद्रियकर्म। हें त्याचें वर्म तो जाणे॥ ९३॥
न तथा बद्धॺते विद्वांस्तत्र तत्रादयन् गुणान्।
प्रकृतिस्थोऽप्यसंसक्तो यथा खं सवितानिल:॥ १२॥
जिंहीं इंद्रियीं कर्म करितां। मूर्खासी झाली दृढबद्धता। तिंहीं इंद्रियीं वर्ततां ज्ञाता। नित्यमुक्तता अनिवार॥ ९४॥ मूर्खासी कर्मीं अभिमान। ज्ञाता सर्व कर्मीं निरभिमान। बंधमोक्षाचें कारण। अहंकारु जाण जीवांसी॥ ९५॥ ‘अहं कर्ता’ ‘अहं भोक्ता’। हेचि मूर्खाची दृढबद्धता। तें प्रकृतिकर्म आपुले माथां। नेघे ज्ञाता अभिमानें॥ ९६॥ तेचि ज्ञात्याची निरभिमानता। तुज म्यां सांगितली आतां। इंद्रियां विषयो भोगवितां। आपुली अभोक्तृता तो जाणे॥ ९७॥ आपुली छाया विष्ठेवरी पडे। अथवा पालखीमाजीं चढे। तो भोगु आपणियां न घडे। तैसेंचि देह रोकडें मुक्तासी॥ ९८॥ मज होआवी विषयप्राप्ती। हेंही ज्ञाते न वांछिती। विषय मिथ्यात्वें देखती। जेवीं कां संपत्ती चित्रींची॥ ९९॥ यालागीं असोनियां देहीं। तो नित्यमुक्त विदेही। त्यासी प्रकृतिगुणांच्या ठायीं। अभिमानु नाहीं सर्वथा॥ ४००॥ म्हणसी ‘असोनियां देहीं। कोण्या हेतु तो विदेही’। उद्धवा ऐसें कल्पिशी कांहीं। तो दृष्टांतु पाहीं सांगेन॥ १॥ आकाश सर्वांमाजीं असे। सर्व पदार्थीं लागलें दिसे। परी एकेंही पदार्थदोषें। मलिन कैसें हों नेणे॥ २॥ त्या गगनाचेपरी पाहीं। ज्ञाता असोनियां देहीं। देहकर्माच्या ठायीं। अलिप्त पाहीं सर्वदा॥ ३॥ प्रचंड आणोनि पाषाणीं। आकाश न चेंपे। चेंपणीं। तेवीं क्षोभलियाही प्रकृतिगुणीं। ज्ञाता जडपणीं न बंधवे॥ ४॥ आकाश असोनियां जनीं। कदा रुळेना जनघसणीं। तैसा प्रकृतिकर्मी वर्तोनी। प्रकृतिगुणीं अलिप्त॥ ५॥ गगन जळीं बुडालें दिसे। परी तें जळामाजीं कोरडें असे। तेवीं पुत्रकलत्रीं ज्ञाता वसे। तेणें दोषें अलिप्त॥ ६॥ आकाशा मसी लावूं जातां। मसीं माखे तो लाविता। तेवीं मुक्तासी दोषी म्हणतां। दोष सर्वथा म्हणत्यासी॥ ७॥ शीत उष्ण पर्जन्यधारा। अंगीं न लागती अंबरा। तेवीं नाना द्वंद्वसंभारा। मुक्ताचा उभारा निर्द्वंद्व॥ ८॥ येऊनि नाना मेघपटळें। गडगर्जनें गगन झांकोळे। त्यामाजीं असोनियां वेगळें। गगन नातळे मेघातें॥ ९॥ तेवीं मोहममतेच्या कडाडी। मुक्तासी करिती ताडातोडी। ते तंव त्यास न लगे वोढी। परापर थडी अलिप्तु॥ ४१०॥ गगनासी आगी लावूं जातां। अग्नि विझोनि जाय सर्वथा॥ तेवीं त्रिगुणीं मुक्तासी बांधतां। गुणीं सगुणता निमाली॥ ११॥ प्रळयवायूचेनि झडाडें। आकाश निजस्वभावें नुडे। सगळा वायु गगनीं बुडे। पाहतां नातुडे गगनींही॥ १२॥ तेवीं अविद्या निजस्वभावतां। मुक्तासी न करवेचि बद्धता। ‘अविद्या’ नांवें मिथ्या वार्ता। मुक्त तत्त्वतां देखेना॥ १३॥ गगनाच्या ऐशी अलिप्तता। सर्व कर्मीं वर्ते ज्ञाता। जनीं अलिप्त वर्ते सविता। तेवीं मुक्तता अवधारीं॥ १४॥ घृतमद्यजळां आंतौता। बिंबोनि अलिप्त सविता। तेवीं बाल्य-तारुण्य-वृद्धता। वयसा चाळितां अलिप्त॥ १५॥ नातरी सूर्याचेनि प्रकाशें। शुभाशुभ कर्म वाढलें असे। सविताअलिप्त तेणें दोषें। निजप्रकाशें प्रकाशकु॥ १६॥ तेवीं आश्रमधर्मीं असतां। नित्यादि कर्में आचरितां। मुक्तासी नाहीं कर्मबद्धता। अकर्तात्मता निजबोधें॥ १७॥ सूर्यकांतीं सविता। अग्नि उपजवूनि अकर्ता। तैसा निजतत्त्वाचा ज्ञाता। करोनि अकर्ता कर्मांचा॥ १८॥ जळीं सविता प्रतिबिंबला। परी तो नाहीं वोला झाला। तैसा स्त्रीसंगें प्रजा व्याला। नाही मुकला ब्रह्मचर्या॥ १९॥ सवित्याचें अलिप्तपण। तें निरूपिलें निरूपण। आतां देहीं असोनि अलिप्तपण। तेंही लक्षण अवधारीं॥ ४२०॥ जेवीं देहामाजीं असे प्राण। प्राणास्तव देहचलन। परी देहदोषा नातळे प्राण। अलिप्त जाण सुखदु:खां॥ २१॥ तैसा मुक्त असोनि संसारी। संसारव्यवहार सर्व करी। परी संसारदोषु अंगावरी। तिळहीभरी लागेना॥ २२॥ वायु सर्वांतें स्पर्शतु। परी स्पर्शदोषांसी अलिप्तु। तेवीं अहंममता नातळतु। मुक्त वर्ततु देहगेहीं॥ २३॥ वायूसी जेवीं सर्वत्र गमन। परी कोठेंही आसक्त नव्हे जाण। तेवीं विषयी नहोनि आपण। विषयसेवन मुक्ताचें॥ २४॥ वायूसी एके ठायीं नाहीं वस्ती। मुक्तासी देहगेहींनाहीं आसक्ती। वायूसी नभामाजीं विश्रांती। मुक्तासी गुणातीतीं विश्राम॥ २५॥ एवढें जें अगाधपण। तें मुक्ताचें मुक्तिकारण। उद्धवासी म्हणे श्रीकृष्ण। प्रथम जाण विवेकु॥ २६॥
वैशारद्येक्षयासङ्गशितया छिन्नसंशय:।
प्रतिबुद्ध इव स्वप्नान्नानात्वाद्विनिवर्तते॥ १३॥
विवेंकें बुद्धि अतिसंपन्न। तिसी उपजे नित्यानित्यज्ञान। परी तें खिरंगटलें असे जाण। वैराग्येंवीण वाढेना॥ २७॥ विवेकेंवीण वैराग्य गहन। तें केवळ आंधळें जाण। नेणें आपुलें निजात्मपतन। अंधकूपीं जाण तें पडे॥ २८॥ मातलें हातिरूं अंध। सैरा धांवे सुबद्ध। नेणें निजात्मपतनबाध। तेवीं वैराग्य मंद विवेकेंवीण॥ २९॥ जेथ विवेकवैराग्यसंयोग। तेथ नित्यसंग्रहो अनित्यत्याग। तेंचि ‘सद्विद्यालक्षण’ खड्ग। झळकत चांग नैराश्यें॥ ४३०॥ तेंचि गुरु वचनसहाणेसी। लावूनि अतितीक्ष्ण केलें त्यासी। घायें छेदिलें संशयासी। संकल्पविकल्पेंसीं समूळ॥ ३१॥ असंभावना विपरीतभावना। नि:शेष तुटलिया वासना। निजस्वरूपीं तेव्हां जाणा। जागेपणा तो आला॥ ३२॥ जो अविद्यालक्षण दीर्घ स्वप्न। नानात्वें भोगिता आपण। तो अद्वैतीं जागा झाला जाण। कृपा थापटून गुरुवचनें॥ ३३॥ तेव्हां नानात्वासीं नाहीं ठावो। ‘मी माझें’ हें झालें वावो। फिटला अविद्याभेदसंदेहो। आत्मानुभवो तो भोगी॥ ३४॥ जागा झाल्या स्वप्न भासे। परी तें मिथ्या झालें अनायासें। मुक्तासी जग तैसें दिसे। यालागीं तेणें दोषें अलिप्त॥ ३५॥ एवं मुक्ताचें जें जें वर्तन। तें अलिप्तपणें ऐसें जाण। ‘कथं वर्तेत’ हा प्रश्न। प्रसंगें लक्षण सांगितलें॥ ३६॥ ‘कथं विहरेत्’ या प्रश्नाचें। उत्तर ऐकावया साचें। उदित मन उद्धवाचें। जाणोनि जीवींचें हरि बोले॥ ३७॥
यस्य स्युर्वीतसंकल्पा: प्राणेन्द्रियमनोधियाम्।
वृत्तय: स विनिर्मुक्तो देहस्थोऽपि हि तद्गुणै:॥ १४॥
विद्यमान देहीं असतां। देहस्थ गुण नातळती मुक्ता। पापपुण्यादि हे कथा। सुखदु:खवार्ता तो नेणे॥ ३८॥ सांडिल्या संकल्पविकल्पांसीं। कल्पांतींही नातळे त्यासीं। जेवीं कां ओकिल्याओकासी। परतोनि कोणासी न घेववे॥ ३९॥ यालागीं मन बुद्धि इंद्रिय प्राण। मुक्ताचीं जाहलीं संकल्पशून्य। याचिलागीं पापपुण्य। न लगे जाण मुक्तासी॥ ४४०॥ इंद्रियीं विषयक्रीडन। करितां संकल्पशून्य। मुक्तासी मनपणें नाहीं मन। वृत्तिशून्य यालागीं॥ ४१॥ बाळक लेणया प्रमाणनेणे। तरी अंगीं शोभे लेइलेपणें। तेवीं कर्में विगुंतलीं करणें। मुक्त अकर्तेपणें अलिप्त॥ ४२॥ संकल्पविरहित विहार। तोचि मुक्त जाण पां साचार। ‘कथं विहरति’ हें उत्तर। थोडेनि फार सांगितलें॥ ४३॥ म्यां सांगितलीं जीं जीं लक्षणें। तीं तीं मुक्ताचीं मुक्तचि जाणे। आणिकासी व्युत्पत्तिपणें। मुक्त जाणणें हें न घडे॥ ४४॥ सकळ देहशास्त्रसंपन्न। त्यासीही मुक्त न कळे जाण। देहीं असे ज्यासी देहाभिमान। त्यासी मुक्तलक्षण कळेना॥ ४५॥ म्यां बोलिले लक्षणांची पोथी। साक्षेपें घेऊनि हातीं। जऱ्ही हिंडिन्नला त्रिजगतीं। तऱ्ही मुक्ताची स्थिति कळेना॥ ४६॥ जेणें साचार मुक्त जाणितला। तोही सत्य जाण मुक्त झाला। अनुमानयोग्यतेच्या बोला। मुक्त जाणवला हें मिथ्या॥ ४७॥ जेणें सूर्य देखिला यथार्थता। तो जग देखे तत्प्रकाशता। जेणें मुक्त जाणितलातत्त्वतां। तो नित्यमुक्तता जग देखे॥ ४८॥ तेथ हा मुक्त हा बद्ध। देखणें हें अतिअबद्ध। ऐसें देखती ते महामंद। अज्ञानांध अज्ञानी॥ ४९॥ मुक्त न कळे सर्वथा। ऐसें बोलणें ऐकतां। उद्धवासी होलागली चिंता। तें कृष्णनाथा कळों सरलें॥ ४५०॥ मागां सांगितलीं मुक्तलक्षणें। तीं मुक्ताचींमुक्तचि जाणे। लौकिकीं मुक्त कळे जेणें। तींही लक्षणें परियेसीं॥ ५१॥ आश्वासावया उद्धवाचें मन। मुक्ताचें जाणतें लक्षण। सांगेन म्हणे श्रीकृष्ण। येरू सावधान सर्वस्वें॥ ५२॥ कळतीं मुक्ताचीं लक्षणें। उद्धवु ऐकावया उदित मनें। तें जाणोनियां श्रीकृष्णें। विचित्र निरूपणें निरूपी॥ ५३॥
यस्यात्मा हिंस्यते हिंस्रैर्येन किंचिद्यदृच्छया।
अर्चते वा क्वचित्तत्र न व्यतिक्रियते बुध:॥ १५॥
ज्याचिया देहासी जाण। हिंसा करिती हिंसक जन। छेद भेद दंड मुंडण। गर्जन तर्जन जऱ्ही केलें॥ ५४॥ तऱ्ही ते देहाची व्यथा। मुक्तासी नाहीं सर्वथा। नाना उपचारीं पूजितां। नेघे श्लाघ्यता सन्मानें॥ ५५॥ देहीं वर्तमान असतां। देहबुद्धी नाहीं सर्वथा। त्यासीच बोलिजे जीवन्मुक्तता। यालागीं देहव्यथा त्या नाहीं॥ ५६॥ जैसी पुरुषांसवें छाया असे। पुरुषयोगें चळती दिसे। ते छायेची अहंममता नसे। निजमानसें पुरुषासी॥ ५७॥ तैसाचि मुक्ताचा देहो। मुक्तासवें वर्ते पहा हो। परी त्यासी नाहीं अहंभावो। हा नित्यस्वभावो मुक्ताचा॥ ५८॥ त्यासी चोरु हेरु कातरु। म्हणौनि दंडु केला थोरु। कां पूजिला ईश्वरु। पुरुष श्रेष्ठतरु म्हणौनि॥ ५९॥ परी पूजितां कां गांजितां। त्याची डंडळीना समता। जेवीं छायेची मानापमानता। न करी व्यथा पुरुषासी॥ ४६०॥ देहो व्याघ्रामुखीं सांपडला। कां दैवें पालखीमाजीं चढला। तो हरुषविषादा नाहीं आला। समत्वें झाला निर्द्वंद्व॥ ६१॥ देहो द्यावया नेतां सुळीं। मी मरतों ऐसें न कळवळी। कां गजस्कंधीं पूजिला सकळीं। तेणेंसुखावली वृत्ति नव्हे॥ ६२॥ सुखदु:खादि नाना व्यथा। आगमापायी आविद्यकता। देहाचें मिथ्यात्व जाणता। यालागीं व्यथा पावेना॥ ६३॥ अतिसन्मानु जेथ देखे। तेथ न राहे तेणें सुखें। अपमानाचिये आडके। देखोनि न फडके भयभीतु॥ ६४॥ देहासी नाना विपत्ति होये। तोही त्या देहाचें कौतुक पाहे। देह माझें मज व्यथा आहे। हें ठावें नोहे मुक्तासी॥ ६५॥ येथवर देहातीतता। दृढ बाणली जीवन्मुक्ता। यालागीं देहदु:खाची व्यथा। त्यासी सर्वथा बाधीना॥ ६६॥ नाना जनपदवार्ता। अतिस्तवनें स्तुति करितां। कां पारुष्यवचनें निंदितां॥ मुक्तासी व्यथा उपजेना॥ ६७॥
न स्तुवीत न निन्देत कुर्वत: साध्वसाधु वा।
वदतो गुणदोषाभ्यां वर्जित: समदृङ्मुनि:॥ १६॥
निंदेच्या तिखट बाणीं। दृढ विंधिल्या दुर्जनीं। हे असाधु हें नुपजे मनीं। न बोले वचनीं ते दोष॥ ६८॥ भाविक सात्त्विक साधु। मिळोनि करिती स्तुतिवादु। तूं ईश्वरी पुरुष शुद्धु। हा गुणानुवादु ऐकोनि॥ ६९॥ मी उत्तम हें नुपजे मनीं। उंच नीच न देखे जनीं। हे साधु लोक भले गुणी। हे मुक्ताची वाणी वदेना॥ ४७०॥ साधु असाधु पाहतां जनीं। तो ब्रह्मरूप देखे दोनी। देखतें देखे तद्रूपपणीं। निजात्मदर्शनीं निजबोधु॥ ७१॥ तेथ कोणाची करावी निंदा। कोणाच्या करावें गुणानुवादा। मीचि विश्व हें आलें बोधा। स्तुतिनिंदा निमाली॥ ७२॥ त्यासी आत्मसाक्षात्कारीं विश्राम। नित्य निजात्मपदीं आराम। साधु असाधु हा फिटला भ्रम। स्वयें आत्माराम तो जाहला॥ ७३॥ असाधुत्वें निंदावे ज्यासी। तंव आत्मस्वरूपें देखे त्यासी। साधु म्हणौनि वर्णितां गुणासी। देखे त्यासी निजरूपें॥ ७४॥ उजव्या वंद्यत्वें शुद्धभावो। डाव्या निंद्यत्वें निजनिर्वाहो। पुरुषासी दोंहीचा समभावो। वंद्य निंद्य पहा हो समत्वें तैसे॥ ७५॥ तेथ साधु असाधु अनुवादा। वर्जिली स्तुति आणि निंदा। समत्वें पावला समपदा। सुखस्वानंदाचेनि बोधें॥ ७६॥ मुक्ताची हे वोळखण। यापरी उद्धवा तूं जाण। आतां आणिकही लक्षण। तुज मी खूण सांगेन॥ ७७॥ प्रकट मुक्ताचें लक्षण। म्यां तुज सांगितलें जाण। तें लौकिकीं मानी कोण। विकल्प गहन जनाचे॥ ७८॥ प्रारब्धवशास्तव जाण। एकादें अवचटे दिसे चिह्न। इतुक्यासाठीं मुक्तपण। मानी कोण जगामाजीं॥ ७९॥ मुक्त मुक्तपणाची पदवी। सर्वथा जगामाजीं लपवी। जो आपुली मुक्तता मिरवी। तो लोभस्वभावी दांभिकु॥ ४८०॥ शुक वामदेव मुक्त म्हणतां। सर्वांसी न म्हणवे सर्वथा। मा इतरांची काय कथा। माझीही मुक्ततान मानिती॥ ८१॥ म्यां गोवर्धनु उचलिला। दावाग्नि प्राशिला। अघ बक विदारिला। प्रत्यक्षनाशिला काळिया॥ ८२॥ जों जों हा देहाडा। तों तों नीच नवा पवाडा। निजसुखाचा उघडा। केला रोकडा सुकाळु॥ ८३॥ त्या माझें मुक्तपण। न मानिती याज्ञिक ब्राह्मण। इतरांची कथाकोण। विकल्प दारुण लौकिकीं॥ ८४॥ यालागीं मुक्ताचें मुक्तपण। मुक्तचि जाणे आपण। इतरांसी न कळे तें लक्षण। अतिविचक्षण जऱ्ही झाला॥ ८५॥ मुक्त लौकिकीं वर्तत। जड-मूक-पिशाचवत। तींही चिन्हें समस्त। ऐक निश्चित सांगेन॥ ८६॥
न कुर्यान्न वदेत्किञ्चिन्न ध्यायेत्साध्वसाधु वा।
आत्मारामोऽनया वृत्त्या विचरेज्जडवन्मुनि:॥ १७॥
कायिक-वाचिक-मानसिक। उद्देशें कर्म न करी एक। जें निफजे तें स्वाभाविक। ‘अहेतुक’त्या नांव॥ ८७॥ हेतु ठेवूनि गुणागुणीं। स्तुतिनिंदेचीं बोलणीं। सांडोनिया झाला मौनी। परी मौनाभिमानीं हेतु नाहीं॥ ८८॥ जरी तो झाला मौनाभिमानी। तरी मुक्त पडला बंधनीं। यालागीं बोलणें न बोलणें दोन्ही। सांडूनि मौनी तो झाला॥ ८९॥ अतद्व्यावृत्तीनें जाण। करावें असंतनिरसन। मग सद्वस्तूचें ध्यान। अखंड जाण करावें॥ ४९०॥ तंव पावली सद्गुरूची खूण। उडालें ध्येय-ध्याता-ध्यान। बुडालें भेदाचें भेदभान। चैतन्यघन कोंदलें॥ ९१॥ मेळवूनि शास्त्रसंभारा। बांधला संतासंतबंधारा। तो चैतन्याच्या महापुरा—। माजीं खरा विराला॥ ९२॥ तेव्हां बुडालें संतासंतभान। निबिड दाटलें चैतन्यघन। मोडलें मनाचें मनपण। वृत्तिशून्य अवस्था॥ ९३॥ मनें ध्यावें चैतन्यघन। तंव चैतन्यचि जाहलें मन। सहजेंचि खुंटलें ध्यान। हें मुख्य लक्षण मुक्ताचें॥ ९४॥ चैतन्यीं हरपलें चित्त। जड-मूक-पिशाचवत। लौकिकीं वर्ततां दिसे मुक्त। जाण निश्चित उद्धवा॥ ९५॥ मुक्त लौकिकीं वर्तत। जड-मूक-पिशाचवत। म्हणौनि कळे इत्थंभूत। तेहीं चिन्ह यदर्थ सांगेन॥ ९६॥ नैष्कर्म्य ब्रह्म पावला दृढु। अंतरीं निजबोधें अतिगोडु। बाह्य लौकिकीं दिसे जडु। अचेतन दगडु होऊनि असे॥ ९७॥ उठीबैसी करितें मन। तें स्वरूपीं झालें लीन। पडलें ठायींहूनि नुठी जाण। यालागीं ‘जडपण’ आभासे॥ ९८॥ शब्दब्रह्म गिळोनि वेगें। नि:शब्द वस्तु झाला अंगें। निंदास्तुतीचें नांव नेघे। ‘मुका’ सर्वांगें सर्वदा॥ ९९॥ ब्रह्म सर्वथा न बोलवे कोणा। जरीं सांगे तरी दावी खुणा। यालागीं मुका म्हणती जाणा। अबोलणा स्तुतिनिंदा॥ ५००॥ द्रव्यलोभ नाहीं चित्तीं। कदा द्रव्य नातळती। यालागीं लोक ‘पिशाच’ म्हणती। जाण निश्चितीं उद्धवा॥ १॥ नवल त्याचें पिसेपण। जगास न करवे जें प्राशन। ते वस्तूचें करी अपेयपान। अभक्ष्य जाण भक्षितु॥ २॥ जेथ जगासी गमन नव्हे जाण। तेथ हा करी अगम्यागमन। जगाचें जेथ न रिघे मन। तेथ सर्वांगें जाण हा वेंघे॥ ३॥ न धरी विधिनिषेधविभाग। न करी कर्माकर्मांचा पांग। स्वानंदें नाचवी सर्वांग। यालागीं जग ‘पिसे’ म्हणे॥ ४॥ एवं जड-मूक-पिशाच। समूळ लक्षणीं तोचि साच। मिथ्या नव्हे अहाचवहाच। वृथा कचकच तो नेणे॥ ५॥ जाण पां मुक्ताच्या ठायीं। कोणे विषयीं आग्रह नाहीं। जो अतिशयेंसीं आग्रही। तो बद्ध पाहीं निश्चित॥ ६॥ जीं बोलिलीं मुक्ताचीं लक्षणें। तींचि साधकांची साधनें। सिद्धासी असती सहजगुणें। साधकें करणें दृढनिष्ठा॥ ७॥ बोलिलिया लक्षणां। सिद्धचि भोक्ता जाणा। साधकुहि येथ लाहाणा। जो या साधनां साधूं जाणे॥ ८॥ इतर जे पंडिताभिमानी। आम्ही शास्त्रज्ञ ज्ञाते म्हणौनी। ते वाळिले येथूनि। जेवीं सज्जनीं दुर्बुद्धी॥ ९॥ जो न साधी येथींच्या साधना। कोरडा शास्त्राभिमानी जाणा। सदा वांच्छिता धनमाना। तो येथींच्या ज्ञाना अलिप्त॥ ५१०॥ आम्ही कर्मकुशळ याज्ञिक। शास्त्रसंपन्न वेदपाठक। सदा अर्थकामकामुक। त्यांसी हें सुख अप्राप्त॥ ११॥ तिंहीं जे कष्ट केले सर्वथा। ते समस्त जाण झाले वृथा। उद्धवा तेहीविखीं तत्त्वतां। ऐक आतां सांगेन॥ १२॥
शब्दब्रह्मणि निष्णातो न निष्णायात्परे यदि।
श्रमस्तस्य श्रमफलो ह्यधेनुमिव रक्षत:॥ १८॥
शब्दब्रह्म वेदशास्त्रार्थ। पढोनि वाचोनि अति पंडित। चारी वेद मूर्तिमंत। सदा तिष्ठत वाचेसी॥ १३॥ संहिता पद क्रम स्वरयुक्त। अरण ब्राह्मण सूत्र निरुक्त। जटावळी ध्वज रथ। पढों जाणत वर्णपूर्वक॥ १४॥ आयुर्वेद धनुर्वेद। गांधर्ववेदींचा जाणे भेद। काव्यनाटकीं अतिशुद्ध। वेद उपवेद तो जाणे॥ १५॥ व्याकरणीं अतिनेटक। सांख्य पातंजळ जाणे तर्क। शास्त्र जाणे वैशेषिक। कर्ममीमांसक यज्ञान्त॥ १६॥ विवर्ण वाचस्पति वेदान्त। शास्त्र जाणे वार्तिकान्त। तिन्ही प्रस्थानें मूर्तिमंत। पुढां तिष्ठत योग्यत्वें॥ १७॥ शिल्पशास्त्रीं अतिनिपुण। सुपशास्त्रामाजीं प्रवीण। रत्नपरीक्षालक्षण। जाणे आपण वाजिवाह॥ १८॥ आगमीं नेटका मंत्रतंत्री। शैवी वैष्णवी दीक्षेची परी। सौर शाक्त अभिचारी। नाना मंत्रीं प्रवीण॥ १९॥ कोकशास्त्रींची अधिष्ठात्री। अतिप्रवीण संगीतशास्त्रीं। प्रबंध करूं जाणे कुसरी। राजमंत्रीं राजसु॥ ५२०॥ निघंटु वसे प्रज्ञेपुढां। चमत्कारु जाणे गारुडा। पंचाक्षरी अतिगाढा। वैद्य धडफुडा रसज्ञ॥ २१॥ रसौषधी साधावी तेणें। भूतभविष्य ज्योतिष जाणे। अमरकोश अभिधानें। अठरा पुराणें मुखोद्गत॥ २२॥ प्रश्नावली पाहों जाणे। स्वप्नाध्यावो सांगावा तेणें। इतिहासादि प्रकरणें। जाणे लक्षणें गर्भाचीं॥ २३॥ शब्दज्ञानाची व्युत्पत्ती। जाणे साधक-बाधक युक्ती। समयींची समयीं स्फुरे स्फूर्ती। अपर बृहस्पतिबोलावया॥ २४॥ जेवीं तळहातींचा आंवळा। तेवीं ब्रह्मज्ञान बोले प्रांजळा। परी अपरोक्षसाक्षात्कारीं आंधळा। नेणे जिव्हाळा तेथींचा॥ २५॥ मोराअंगीं अतिडोळसें। अंगभरी भरलीं पिसें। एके दृष्टीवीण आंधळे जैसें। जाहलें तैसें विद्वांसा॥ २६॥ जेथूनि क्षीर स्रवती सड। तेथेंचि लागोनि गोचिड। अशुद्ध सेविताति मूढ। तेवीं विद्वांस दृढ विषयांसी॥ २७॥ गोचिडाचे मुखीं क्षीर रिघे। तो अशुद्धावांचोनि तें नेघे। तेवीं ज्ञान विकूनि अंगें। विद्वांसु मागे विषयांतें॥ २८॥ सांडूनि सुगंधचंदनासी। आवडीं दुर्गंधा धांवे माशी। तेवीं सांडूनि निजात्मज्ञानासी। पंडित विषयांसी झोंबत॥ २९॥ असोनि कमळआमोदापाशीं। दर्दुर सेविती कर्दमासी। तेवीं सांडूनि निजात्मज्ञानासी। पंडित विषयांसी लोलुप॥ ५३०॥ करूनि अद्वैतव्युत्पत्ती। तें ज्ञान विकूं देशांतरा जाती। मूर्खज्ञात्यातें उपहासिती। तऱ्ही वांछिती सन्मानु॥ ३१॥ सांगतां ब्रह्मनिरूपण। सात्त्विकाचें परमार्थींमन। व्याख्याता तो वांछी धन। विपरीत ज्ञान विद्वांसा॥ ३२॥ सांगे आन करी आन। तेथें कैंचें ब्रह्मज्ञान। जेथ वसे धनमान। तेथ आत्मज्ञान असेना॥ ३३॥ दृढ धनमान धरोनि पोटीं। सांगतां ब्रह्मज्ञानगोठी। त्यास आत्मसाक्षात्कारभेटी। नव्हे कल्पकोटी गेलिया॥ ३४॥ नाना पदव्युत्पत्तिविंदान। एके श्लोकीं दशधा व्याख्यान। पोटीं असतां मानाभिमान। ब्रह्मज्ञान त्या कैंचें॥ ३५॥ मी पंडितु अतिज्ञाता। ऐशिया नागवले अहंता। जेवीं आंधळें नोळखे पिता। नित्य असतां एकत्र॥ ३६॥ तैशी गति विद्वांसासी। नित्य असती आत्मसमरसीं। तेंचि वाखाणिती अहर्निशीं। परी त्या स्वरूपासी नेणती॥ ३७॥ करावया विषयभरण। केलें शास्त्रव्युत्पत्तिव्याख्यान। ते वृथा कष्ट गेले जाण। जेवीं वंध्याधेनु पोशिली॥ ३८॥ जे कधीं वोळे ना फळे। सुटली तरी सैरां पळे। नित्य वोढाळी राजमळे। तें दु:ख आदळे स्वामीसी॥ ३९॥ तैशी गति पंडितंमन्यासी। व्युत्पत्तीं पोशिलें वाचेंसी। ते वोढाळ झाली विषयांसी। ज्याची त्यासी नावरे॥ ५४०॥ जेवीं का निर्दैवाहातीं। कनकपडलें तें होय माती। तेवीं पंडितंमन्याची व्युत्पत्ती। विषयासक्तीं नाशिली॥ ४१॥ द्विजा दीधला भद्रजाती। त्यासी न पोसवे तो निश्चितीं। मग फुकासाठीं विकिती। तेवीं व्युत्पत्ती विद्वांसा॥ ४२॥ अद्वैतशास्त्राची व्युत्पत्ती। हे त्यासी झाली अलभ्यप्राप्ती। जे विषयालागीं विकिती। ते मूर्ख निश्चितीं विद्वांस॥ ४३॥ मुखीं ऊंस घालिजे घाणा। तो रस पिळूनि भरे भाणा। फिका चोपटीं करकरी घाणा। ते गति जाणा विद्वांसा॥ ४४॥ विद्वांस करिती ज्ञानकथन। सारांश सात्त्विकीं नेला जाण। शब्दसोपटी करकरी वदन। गोडपण तेथें कैंचें॥ ४५॥ जेवीं का नपुंसकाच्या करीं। वोपिलीपद्मिणी सुंदरी। ते अखंड रडे जयापरी। तेवीं विद्वांसाघरीं व्युत्पत्ती॥ ४६॥ पाहे पां ब्रह्मज्ञानेंवीण। शब्दज्ञानें संन्यासग्रहण। केलें तेंही वृथा जाण। जरी धारणाध्यान करीना॥ ४७॥ जैसी जैसी शब्दज्ञानव्युत्पत्ती। तैशी तैशी न करितां स्थिती। वर्तणें जैं विषयासक्ती। तैं निज मुखीं माती घातली॥ ४८॥ वेदशास्त्रसंपन्न झाला। त्यावरी पोट भरूं लागला। तरी तो उदमी थोर झाला। परी थित्या मुकला मुदलासी॥ ४९॥ रत्न देऊनि कोंडा घेतला। कां अमृत देऊनि कांजी प्याला। तैसा परिपाकु पंडितांचा झाला। थित्या नागवला निजज्ञाना॥ ५५०॥ शब्दज्ञान जोडिलें कष्टे। तेणेंचि साधनें परब्रह्म भेटे। इटेसाठीं परीस पालटे। मूर्ख वोखटें मानिती॥ ५१॥ पोट भरावयाचिया युक्ती। आपुली मिरवाया व्युत्पत्ती। पत्रावलंबनें करिती। द्वाराप्रती सधनाच्या॥ ५२॥ जेवीं पोट भरावया भांड। नानापरी वाजवी तोंड। तेवीं नाना व्युत्पत्ती वादवितंड। करिती अखंड उदरार्थ॥ ५३॥ करूनि व्युत्पत्ती शब्दब्रह्म। जरी न साधीचि परब्रह्म। तरी त्या श्रमाचें फळही श्रम। जेवीं रत्नें उत्तम घाणा गाळी॥ ५४॥ तेथें तेल न पेंडी। झाली रत्नांची राखोंडी। तैशीं विद्वांसें झालीं वेडीं। श्रमें श्रमकोडी भोगिती॥ ५५॥ श्रमें श्रमुचि पावती। दु:खें दु:खचि भोगिती। हेंचि कथन बहु दृष्टांतीं। उद्धवाप्रती हरि बोले॥ ५६॥
गां दुग्धदोहामसतीं च भार्यां
देहं पराधीनमसत्प्रजां च।
वित्तं त्वतीर्थीकृतमङ्ग वाचं
हीनां मया रक्ष्ति दु:खदु:खी॥ १९॥
दुग्धाचिया लोलुप्यता। ‘भाकड गाय’ दोहूं जातां। शिंपीभरी दूध न ये हाता। हाणे लाता तत्काळ॥ ५७॥ जे कुडी कुचर डीवरी। विषयमेळवणा अतिखाइरी। अधर्मशीळ लातरी। सर्वांपरी अनाड॥ ५८॥ सुटली राजागारीं भरे। धर्मदंडें मागें न सरे। सद्बुद्धि धरितां न धरे। सैर चरे सुनाट॥ ५९॥ जिचें कधीं नव्हे दुभतें। जे धरूं नेणे गर्भातें। पोषितां ऐशा गायीतें। पावे दु:खातें पोषकु॥ ५६०॥ गृहिणी लागला गृहाचार। ते स्त्री अनुकूल नसतां नर। अतिदु:खे थोर। सदा करकर कपाळीं॥ ६१॥ निंदा अवज्ञा हेळण। भ्रताराचें करी जाण। स्वयें भक्षी मिष्टान्न। हें ‘असंतलक्षण स्त्रियांचे’॥ ६२॥ खातां जेवितां द्रव्य देतां। गोड गूळसी बोले सर्वथा। धर्म देखोनि फोडी माथा। तेही सर्वथा असतीचि॥ ६३॥ जे न विचारी पापपुण्य। कामाचारी धर्मशून्य। हें असतीचें लक्षण। उद्धवा जाण निश्चित॥ ६४॥ असतीचिये संगतीं। कैंची होईल सुखप्राप्ती। अति दु:खें दु:खी होती। जाण निश्चितीं ते नर॥ ६५॥ ज्याचें देह ‘पराधीन’। तो जीवें जितां सदा दीन। पराधीना समाधान। नव्हे जाण कल्पांतीं॥ ६६॥ सांडोनि आपली निजसत्ता। ज्यासी लागली पराधीनता। तो स्वप्नींही सुखाचीवार्ता। न देखे सर्वथा निश्चित॥ ६७॥ ‘पर’ म्हणिजे माया जाण। जो झाला तिचे आधीन। त्यासी सुखाचें न दिसे स्वप्न। दु:ख संपूर्ण सर्वदा॥ ६८॥ पराधीनासी सुख। आहे म्हणे तो केवळ मूर्ख। सोलीव दु:खाचें दु:ख। अवश्य देख पराधीना॥ ६९॥ ऐक ‘प्रजांचा विवेक’। एक पुत्र एक लेंक। एक ते केवळ मूर्ख। दु:खदायक पितरांसी॥ ५७०॥ जो नरकापासोनि तारी। जो पूर्वजांतें उद्धरी। जो मातापित्यांची भक्ति करी। अव्यभिचारी हरिरूपें॥ ७१॥ जो सांडोनियां मातापिता। जाऊं नेणे अणिके तीर्था। त्याचेनि चरणतीर्थें पवित्रता। मानिती सर्वथा अनिवार॥ ७२॥ जैशीं रमा आणि नारायण। तैशीं मातापिता मानी जाण। चढत्या आवडीं करी भजन। नुबगे मन सेवेसी॥ ७३॥ जो अतिसत्त्वें सात्त्विकु। जो पितृवचनपाळकु। जाणे धर्माधर्मविवेकु। हा नैसर्गिकु स्वभावो॥ ७४॥ जो मातापित्यांचे सेवेवरी। आपआपणियातें तारी। सकळ पूर्वजांतें उद्धरी। तो संसारीं सुपुत्र॥ ७५॥ ऐशिया पुत्रासी प्रतिपाळितां। सुख पावे मातापिता। पूर्वजांतें उद्धरिता। स्वयें तरता पितृभक्तीं॥ ७६॥ झालिया सुपुत्रसंतति। एवढी होय सुखप्राप्ती। आतां असत्प्रजांची स्थिती। ऐक तुजप्रती सांगेन॥ ७७॥ मूळींचें पद ‘असत्प्रज’। त्यांचे वर्तणुकेची वोज। सांगतां अत्यंत निर्लज्ज। तेही मी तुज सांगेन॥ ७८॥ पोटीं उपजले जे लेंक। त्यांची वर्तणुक ऐशी देख। आवडे कांता आणि कनक। उपेक्षिती नि:शेख माता-पिता॥ ७९॥ जे कुडे कुचर कुलट। जे का अत्यंत शठ नष्ट। जे अनाचारी कर्मभ्रष्ट। अतिदुष्ट दुर्जन॥ ५८०॥ त्यांसी भांडवल लटिक। लटकी द्यावी आणभाक। माता-पिता ठकावीं देख। सात्त्विक लोक नाडावे॥ ८१॥ आपण नरका जावें ते जाती। परी पूर्वज नेले अधोगती। ऐशियां प्रजांतें प्रतिपाळिती। ते दु:खी होती अतिदु:खें॥ ८२॥ पोटामाजीं उठिला फोडू। त्यासी करितां नये फाडू। तैसा असत्प्रजीं संसार कडू। दु:ख दुर्वाडु भोगवी॥ ८३॥ ऐशिया पुत्रांचें जितां दु:ख। मेल्यापाठीं देती नरक। असत्प्रजांचें कवतिक। दुखें दु:ख अनिवार॥ ८४॥ गांठीं असोनियां ‘धन’। जो सत्पात्रीं न करी दान। तें सर्व दु:खाचें मूळ जाण। दु:ख दारुण धन लोभ्या॥ ८५॥ धन अर्जावया अनेक। उपाय अपाय करिती लोक। नाना क्लेश भोगोनि दु:ख। द्रव्य देख सांचिलें॥ ८६॥ प्रथम दु:ख द्रव्य संचितां। दूसरें दु:ख द्रव्य रक्षितां। स्त्रीपुत्र प्रवर्ते घाता। इतर कथा ते भिन्न॥ ८७॥ सत्पात्रीं न करितां दान। जेणें रक्षिलें यक्षधन। तेथें दु:खबाहुल्यें उठी विघ्न। धर्मरक्षण तेथ नाहीं॥ ८८॥ ऐसेंही धन गेलियासाठीं। अतिदु:खें भडका उठी। धनवंता जन्मसाटी। दु:खकोटी भोगिती॥ ८९॥ येवोनियां नरदेहासी। अविकळ वाचा असे ज्यासी। जो नुच्चारी हरिनामासी। पाप त्यापाशीं खतेलें॥ ५९०॥ पुरिले लोहा माती खाये। तें उपेगा न ये वायां जाये। तैशी नामेंवीण वाचा पाहें। वृथा जाये सर्वथा॥ ९१॥ आसनध्यानपरिश्रम। न करूनि म्हणे जो राम राम। तेणें कोटि जन्मांचा हरे श्रम। उत्तमोत्तम ते वाणी॥ ९२॥ जो नित्य जपे रामनाम। तो जाणावा मजचिसम। तेणेंचिकेले सकळही नेम। पुरुषीं पुरुषोत्तम तो जाण॥ ९३॥ चतुर्वर्णांमाजीं जो कोणी। अविश्रम रामूजपे वाणीं। तोचि पढियंता मजलागुनी। आन त्रिभुवनीं नावडे॥ ९४॥ ऐसें रामनाम नावडे ज्यासी। तैं पापमुखरोग आला मुखासी। तो स्वयें मुकला निजसुखासी। आप आपणासी घातकू॥ ९५॥ रामनामेंवीण जें तोंड। तें जाणावें चर्मकुंड। भीतरी जिव्हा तें चामखंड। असत्यकांड काटली॥ ९६॥ हो कां हरिनामेंवीण जे वाणी। ते गलितकुष्ठे जाली कोढिणी। असत्यकुष्ठाचें गळे पाणी। उठी पोहणी निंदेची॥ ९७॥ ऐशिये वाचेसी रोकडे। पडती अधर्माचे किडे। सुळबुळीत चहूंकडे। मागेंपुढें वळवळित॥ ९८॥ ते वाचा होय ज्यासमोर। देखे तो पाठिमोरा ठाके नर। नाक झांकूनि म्हणे हरहर। लहान थोर थुंकिती॥ ९९॥ ते वाचेची जे दुर्गंधी। मजही न सहावे त्रिशुद्धी। हे वाचा वाहे तो दुर्बुद्धी। अनर्थसिद्धि अतिदु:ख॥ ६००॥ सोलींव दु:खाचें अतिदु:ख। त्या नराची वाचा देख। केवळ निरय तें त्याचें मुख। नामीं विन्मुख जे वाणी॥ १॥ हो कां वेदशास्त्रसंपन्न वाणी। करूनि निंदकू नामकीर्तनीं। तो पापी महापाप्याहूनी। त्याचेनि अवनी अतिदु:खी॥ २॥ नामकीर्तनें धन्य वाणी। येचि अर्थी सारंगपाणी। प्रवर्तला निरूपणीं। विशद करूनी सांगावया॥ ३॥
यस्यां न मे पावनमङ्ग कर्म
स्थित्युद्भवप्राणनिरोधमस्य।
लीलावतारेप्सितजन्म वा स्याद्
वन्ध्यां गिरं तां बिभृयान्न धीर:॥ २०॥
जगातें पवित्र करिती। महादोषांतें हरिती। माझीं नामकर्में गुणकीर्ती। जड उद्धरती हरिनामें॥ ४॥ म्हणसी तूं बोलिलासी निजवर्म। मी विद्याविद्यातीत ब्रह्म। त्या तुज कैंचे गुण नाम कर्म। कीर्तनधर्म केवीं घडे॥ ५॥ उद्धवा हें मनीं न धरीं। मी स्वलीला स्वमायें करीं। नाना अवतारांतें धरीं। नकरूनि करीं स्थित्यंतू॥ ६॥ त्रिगुणगुणी गुणावतार। ब्रह्मा आणि हरिहर। तिहीं रूपीं मीच साचार। चराचर करीं हरीं॥ ७॥ स्रष्टारूपें मी स्रजिता। विष्णुरूपें मी प्रतिपाळिता। रुद्ररूपें मी संहर्ता। जाण तत्त्वतां मी एकू॥ ८॥ बाल्यतारुण्यवार्धक्यांसी। एक पुरुष तिहीं अवस्थांसी। तेवीं उत्पत्तिस्थितिप्रळयांसी। गुणकर्मांसी मी कर्ता॥ ९॥ मी कर्ताचि अकर्ता अकर्तेपणे कर्ता। हें माझें मीचि जाणें तत्त्वतां। आणिकासी सर्वथा कळेना॥ ६१०॥ हींचि माझीं नामकर्में गातां। माझीपदवी लाभे वक्ता। माझे लीलावतार कीर्तितां। कीर्तिमंतां निजलाभू॥ ११॥ अवतारांमाजीं उत्तमोत्तम। श्रीरामकृष्णादिजन्मकर्म। नाना चरित्रें संभ्रम। अविश्रम जे गाती॥ १२॥ सेतु बांधिला अवलीळा। सागरीं तारिल्या शिळा। गोवर्धनु उचलिला हेळा। दावानळा प्राशिलें॥ १३॥ ताटिका वधिली एके बाणीं। पूतना शोखिली तानेपणीं। अहल्या तारिली चरणीं। यमलार्जुन दोन्ही उद्धरिले॥ १४॥ रावणू आदळला धनुष्य वाहतां। तें भंगोनि पर्णिली सीता। मथूनि चैद्यादि समस्तां। भीमकदुहिता आणिली॥ १५॥ मारिला सुबाहु खर दूषणू। अघ बक केशिया मारी श्रीकृष्णू। सुग्रीवू स्थापिला राज्य देऊनू। येरें उग्रसेनू स्थापिला॥ १६॥ मेळवूनि वानरांचा पाळा। वधू केला राक्षसकुळा। मेळवून बाळां गोपाळां। मल्लां सकळां मर्दिलें॥ १७॥ रावणकुंभकर्णां केला मारू। मारिला कंस चाणूरू। रामें ठकिला वाली वानरू। ठकिला महावीरू काळयवनू॥ १८॥ रामें बिभीषणस्थापिला। कृष्णें धर्म संस्थापिला। एक पितृवचनें वना गेला। एक घेऊनि आला गतपुत्र॥ १९॥ हीं अवतारचरित्रें वर्णितां। चोरटा वाल्मीकि झाला तत्त्वतां। व्यास जारपुत्र सर्वथा। केला सरता तिहीं लोकीं॥ ६२०॥ या दोहीं अवतारांची पदवी। वर्णितां दोन्ही झाले महाकवी। व्यास वाल्मीकि वंदिजे देवीं। कीर्तिगौरवीं गौरविले॥ २१॥ त्या महाकवींची कवित्वकथा। शेष नेत्रद्वारें श्रवण करितां। दोन सहस्र नयनीं आइकतां। धणी सर्वथा बाणेना॥ २२॥ हेचि कथा स्वर्गाच्या ठायीं। श्रवण करावया पाहीं। इंद्र लागे बृहस्पतीचे पायीं। कीर्ति लोकत्रयीं वर्णिती॥ २३॥ असो कथेचें महिमान। माझेनि नाममात्रें जाण। तारिला अजामिळ ब्राह्मण। गजेंद्रउद्धरण हरिनामें॥ २४॥ पक्ष्याचे मिषेंकरूनी। रामु या दों अक्षरस्मरणीं। महादोषांची श्रेणी। तत्काळ कुंटिणी तारिली॥ २५॥ माझिया नामासमान। नव्हे वेदशास्त्रशब्दज्ञान। वेदशास्त्रांचा बोधु कठिण। तैसें जाण नाम नव्हे॥ २६॥ पठणमात्रें वेदशास्त्रवक्ता। नव्हे मजमाजीं येणेंचि सरता। स्वभावें माझें नाम घेतां। अतिपढियंता मज होये॥ २७॥ वेदशास्त्रीं अधिकारी ब्राह्मण। नामासी अधिकारी चाऱ्ही वर्ण। जग उद्धरावया कारण। नाम जाण पैं माझें॥ २८॥ जेथ नित्य नामाचा उच्चार। तेथ मी असें साचार। येथ करणें न लगे विचार। नाम सधर तारावया॥ २९॥ ते माझे जन्म नाम कीर्ति गुण। जे वाचेसी नाहीं पठण। ते वाचा पिशाचिका जाण। वृथालापन वटवटी॥ ६३०॥ माझे कीर्तीवीण जें वदन। तें केवळ मद्याचें भाजन। त्या उन्मादविटाळाभेण। नाम जाण तेथ न ये॥ ३१॥ जेथ उच्चारू नाहीं नामाचा। ते जाणावी वांझ वाचा। गर्भ न धरी हरिकथेचा। निष्फळ तिचा उद्योगू॥ ३२॥ उद्धवासी म्हणे श्रीरंगू। आइकें बापा उपावो चांगू। माझा नाममार्ग सुगमू सांगू। न पडे पांगू आणिकांचा॥ ३३॥ हरिनामेंवीण वाणी। कदा न राखावी सज्जनीं। हाचि अभिप्रावो चक्रपाणीं। प्रीतिकरोनि सांगीतला॥ ३४॥ करूनियां शब्दज्ञान। अतियोग्यतां पंडितपण। तेणें माझी प्राप्ति नव्हे जाण। वैराग्येंवीण सर्वथा॥ ३५॥ अथवा वैराग्यही जालें। परी तें विवेकहीन उपजलें। जैसें धृतराष्ट्रा ज्येष्ठत्व आलें। नेत्रेंवीण गेलें स्वराज्य॥ ३६॥ तैसें वैराग्य विवेकेंवीण। केवळ आंधळें अनधिकारी जाण। नाहीं सन्मार्गदेखणेपण। वृथा परिभ्रमण तयाचें॥ ३७॥ जो विवेकें पूर्ण भरित। त्यावरी वैराग्य वोसंडत। माझी जिज्ञासा अद्भुत। तेंचि निश्चित सांगतू॥ ३८॥
एवं जिज्ञासयापोह्य नानात्वभ्रममात्मनि।
उपारमेत विरजं मनोमय्यर्प्य सर्वगे॥ २१॥
नित्यमुक्त अव्ययो। स्वरूप जाणावया पहा हो। ज्याचा लागला दृढ भावो। आन आठवो नाठवे॥ ३९॥ ऐशी मज जाणावयाची अवस्था। त्या नांव बोलिजे जिज्ञासता। माझे प्राप्तीलागीं सर्वथा। पांडित्य मान्यता ते नेघे॥ ६४०॥ देहादि अध्यासू आपुल्या ठायीं। श्रवणें मननें मिथ्या केला पाहीं। दृढ विश्वास गुरूच्या पायीं। पूर्णब्रह्माच्या ठायीं निर्धारू॥ ४१॥ तेथ पुढारीं चालावया वाट। भगवद्भजनीं अतिउद्भट। कां सांडोनि कर्मकचाट। ध्याननिष्ठ तो होय॥ ४२॥ तेथ ध्येय ध्याता ध्यान। न दिसे त्रिपुटीचें भान। कोंदलें चैतन्यघन। वस्तु सनातन तो पावे॥ ४३॥ तेथ कैंचा कर्ता क्रिया कर्म। फिटला नानात्वाचा भ्रम। सबाह्य कोंदलें परब्रह्म। जाला उपरम गुरुकृपा॥ ४४॥ सर्वगत सर्वकाळ। सर्वदेशीं सर्वीं सकळ। वस्तु असे जें केवळ। तेथ निश्चळ निजबोधू॥ ४५॥ ऐशिये वस्तूची धारणा। ज्याचेनि न करवे जाणा। तरी सुगम उपाया आना। एक विचक्षणा सांगेन॥ ४६॥
यद्यनीशो धारयितुं मनो ब्रह्मणि निश्चलम्।
मयि सर्वाणि कर्माणि निरपेक्ष: समाचर॥ २२॥
स्वभावतां मन चंचळ। विषयवासना अतिचपळ। निर्गुण ब्रह्मीं केवळ। नाहीं बळ प्रवेशावया॥ ४७॥ तरी सांख्य योग संन्यासू। हा न करावया आयासू। माझिया भक्तीचा विलासू। अतिउल्हासू करावा॥ ४८॥ मागें बद्धमुक्तांचें निरूपण। सांगीतलें मुक्तांचें लक्षण। वृथा शाब्दिकांचें शब्दज्ञान। तेंही व्याख्यान दाविलें॥ ४९॥ आतां आपुली निजभक्ती। सांगावया उद्धवाप्रती। अतिआदरें श्रीपती। भक्तीची स्थिति सांगतु॥ ६५०॥ उद्धवा चढत्या आवडीं मत्कर्म। जे भक्तीसी विकावा मनोधर्म। माझें स्मरावें गुणकीर्तिनाम। नाना संभ्रमविनोदें॥ ५१॥ माझेनि भजनें कृतकृत्यता। दृढ विश्वास धरोनि चित्ता। भजनीं प्रवर्तावें सर्वथा। अविश्रमताअहर्निशीं॥ ५२॥ माझ्या भजनाच्या आवडीं। नुरेचि आराणुकेसी वाडी। वायां जावो नेदी अर्धघडी। भजनपरवडी या नांव॥ ५३॥ माझ्या भजनीं प्रेम अधिक। न सांडावें नित्यनैमित्तिक। वैदिक-लौकिक-दैहिक। भक्तांसी बाधक नव्हे कर्म॥ ५४॥ आचरतां सकळ कर्म। न कल्पावा फळसंभ्रम। हेंचि भक्तीचें गुह्य वर्म। उत्तमोत्तम अधिकारू॥ ५५॥ उबगू न मनूनि अंतरीं। माझ्या प्रीतीं सर्व कर्मांतें करी। जो फळाशेतें कंहीं न धरी। भक्तीचा अधिकारी तो जाणा॥ ५६॥ पिंपुरें खावयाचे चाडें। न लाविती पिंपळाचीं झाडें। तेंवीं कर्में करितां वाडेंकोडें। फळाशा पुढें उठेना॥ ५७॥ माझें भजन करितां। न पडे ज्ञानाची पंगिस्तता। माझे भजनें नित्यमुक्तता। जाण मद्भक्तां मद्भावें॥ ५८॥ ज्ञानेंवीण भक्ति न घडे। म्हणती तें शब्दज्ञान धडफुडें। भक्तीस्तव जाण रोकडें। ज्ञान जोडे अपरोक्ष॥ ५९॥ यालागीं माझें भजन करितां। ज्ञानाचा पांग न पडे भक्तां। देहगेहांमाजीं वर्ततां। बंधन मद्भक्तां लागेना॥ ६६०॥ ज्याच्या मुखीं माझें नाम। ज्यासी माझा भजनसंभ्रम। ज्याच्या मनीं मी आत्माराम। त्याचें दासीकाम मुक्ति करी॥ ६१॥ मुक्तीमाजीं विशेष कायी। वृत्ति निर्विषय असे पाहीं। भक्तांसी सर्व कर्मांच्या ठायीं। स्फुरण नाहीं विषयांचें॥ ६२॥ भक्तांचें विषयीं नाहीं चित्त। त्यांचा विषय तो मी भगवंत। ते सदा मजमाजीं लोलुप्त। नित्यमुक्त यालागीं॥ ६३॥ भक्त विषयो सेविती। ते ग्रासोग्रासीं मज अर्पिती। तेणेंचि त्यांसी वंदी मुक्ती। सर्व भूतीं मद्भावो॥ ६४॥ यालागीं कर्मबंधन। मद्भक्तांसी न लगे जाण। करितां माझें स्मरण कीर्तन। जगाचें बंधन छेदिती॥ ६५॥ माझ्या भक्तांचें वसतें घर। तें जाण माझें निजमंदिर। मुक्ति तेथें आठौ प्रहर। वोळगे द्वार तयांचे॥ ६६॥ माझें भजन करितां। कोण्या अर्थाची नाहीं दुर्लभता। चहूं पुरुषार्थांचे माथां। भक्ति सर्वथा मज पढियंती॥ ६७॥ ज्ञान नित्यानित्यविवेक। भक्तीमाजीं माझेंप्रेम अधिक। तैसें प्रेमळाचे मजलागीं सुख। चढतें देख अहर्निशीं॥ ६८॥ जेवीं एकुलतें बाळक। जननीसी आवडे अधिक। तैसें प्रेमळाचें कौतुक। चढतें सुख मजलागीं॥ ६९॥ यालागीं आपुलिये संवसाटीं। मी प्रेमळ घें उठाउठी। वरी निजसुख दें सदेंठीं। न घे तैं शेवटीं सेवकू होयें॥ ६७०॥ प्रेमाचिया परम प्रीतीं। जेणें मज अर्पिली चित्तवृत्ती। तेव्हांचि त्याचे सेवेची सुती। जाण निश्चितीं म्यां घेतली॥ ७१॥ प्रेमळाचें शेष खातां। मज लाज नाहीं घोडीं धूतां। शेखीं उच्छिष्ट काढितां। लाज सर्वथा मज नाहीं॥ ७२॥ मज सप्रेमाची आस्था। त्याचे मोचे मी वाहें माथां। ऐशी प्रेमळाची सांगतां कथा। प्रेम कृष्णनाथा चालिलें॥ ७३॥ कंठ जाला सद्गदित। अंग झालें रोमांचित। धांवोनि उद्धवासी खेंव देत। प्रेम अद्भुत हरीचें॥ ७४॥ सजल जाहले लोचन। वरुषताती स्वानंदजीवन। भक्तिसाम्राज्यपट्टाभिषिंचन। उद्धवासी जाण हरि करी॥ ७५॥ सहजें प्रेमळाची करितां गोठी। संमुख उद्धव देखिला दृष्टीं। धांवोनियां घातली मिठी। आवडी मोठी भक्तांची॥ ७६॥ आवडींपडिलें आलिंगन। विसरला कार्यकारण। विसरला स्वधामगमन। मीतूंपण नाठवे॥ ७७॥ नाठवे देवभक्तपण। नाठवे कथानिरूपण। नाठवे उद्धवा उद्धवपण। कृष्णा कृष्णपण नाठवे॥ ७८॥ प्रेमळाचे गोठीसाठीं। परात्पर परतटीं। दोघां ऐक्यें पडली मिठी। आवडी मोठी प्रेमाची॥ ७९॥ आजि भक्तीचें निजसुख। उद्धवासी फावलें देख। भक्तीचें प्रेम अलोलिक। उद्धवें सम्यक विस्तारिलें॥ ६८०॥ श्रीकृष्ण निजधामासी जातां। उद्धव जरी हें न पुसता। तरी ज्ञानवैराग्यभक्तिकथा। कां सांगता श्रीकृष्ण॥ ८१॥ विशेष भक्तिप्रेम अचुंबित। उद्धवें काढिलें निश्चित। उद्धवप्रश्नेंश्रीभागवत। झालें सनाथ तिहीं लोकीं॥ ८२॥ यालागीं तनुमनप्राणें। उद्धवू जीवें ओंवाळणें। याहून अधिक वानणें। तें बोलणें न साहे॥ ८३॥ जे बोला बुद्धी न ये सहज। तें भक्तिप्रेम निजगुज। उद्धवा द्यावया गरुडध्वज। केलें व्याज खेंवाचें॥ ८४॥ भक्तीचें शोधित प्रेम। उद्धवासी अतिउत्तम। देता झाला पुरुषोत्तम। मेघश्याम तुष्टला॥ ८५॥ प्रेमळाची गोठी सांगतां। विसरलों मी श्लोकार्था। कृष्णासी आवडली प्रेमकथा। ते आवरितां नावरे॥ ८६॥ प्रेमाची तंव जाती ऐशी। आठवू येऊंनेदी आठवणेशीं। हा भावो जाणवे सज्जनांसी। ते भक्तिप्रेमासी जाणते॥ ८७॥ हो कां ऐसेंही असतां। माझा अपराधू जी सर्वथा। चुकोनि फांकलों श्लोकार्था। क्षमा श्रोतां करावी॥ ८८॥ तंव श्रोते म्हणती राहें। जेथें निरूपणीं सुख आहे। त्यावरी बोलणें हें न साहे। ऐसें रहस्य आहे अतिगोड॥ ८९॥ आधींच भागवत उत्तम। तेथें हें वाखाणिलें भक्तिप्रेम। तेणें उल्हासलें परब्रह्म। आमुचे मनोधर्म निवाले॥ ६९०॥ श्लोकसंगतीची भंगी। दूर ठेली कथेची मागी। हे प्रार्थना न लगे आम्हांलागीं। आम्ही हरिरंगीं रंगलों॥ ९१॥ ऐकतां भक्तिप्रेमाचा जिव्हाळा। श्रवणसुखाचा पूरू आला। झाडा न सूची उगला। निरूपण वहिला चालवीं॥ ९२॥ सांगतां प्रेमळांची गोठी। कृष्णउद्धवां एक गांठी। प्रेमें पडली होती मिठी। ते कृष्ण जगजेठी सोडवी॥ ९३॥ म्हणे हें अनुचित सर्वथा। आतांचि उद्धवू ऐक्या येता। तरी कथेचा निजभोक्ता। ऐसा श्रोता कैंचा मग॥ ९४॥ माझिया भक्तिज्ञानविस्तारा। उद्धवूचि निजांचा सोयरा। यालागीं ब्रह्मशापाबाहिरा। काढितू खरा निजबोधें॥ ९५॥ जितुकी गुह्यज्ञानगोडी। भक्तिप्रेमाची आवडी। ते उद्धवाचिकडे रोकडी। दिसते गाढी कृष्णाची॥ ९६॥ भक्तिप्रेमाचा कृष्णचि भोक्ता। कृष्णकृपा कळलीसे भक्तां। हे अनिर्वचनीय कथा। न ये बोलतां बोलासी॥ ९७॥ कृष्ण उद्धवासी म्हणे आतां। सावधू होईं गा सर्वथा। पुढारीं परियेसीं कथा। जे भक्तिपथा उपयोगी॥ ९८॥ सर्व कर्में मदर्पण। फळत्यागें न करवे जाण। तरी अतिसोंपें निरुपण। प्रेमलक्षण सांगेन॥ ९९॥
श्रद्धालुर्मे कथा: शृण्वन्सुभद्रा लोकपावनी:।
गायन्ननुस्मरन्कर्म जन्म चाभिनयन्मुहु:॥ २३॥
करितां माझी कथा श्रवण। काळासी रिगमू नाहीं जाण। इतरांचा पाडू कोण। कर्मबंधन तेथें कैंचें॥ ७००॥ जो हरिकथेनें गेला क्षण। तो काळासी नव्हे प्राशन। काळसार्थकता त्या नांव जाण। जैं श्रद्धाश्रवण हरिकथा॥ १॥ परीस कथेचें महिमान। श्रद्धायुक्त करितां श्रवण। तिहीं लोकींचे दोषदहन। अक्षरें जाण होतसे॥ २॥ ऐक श्रद्धेचें लक्षण। करितां हरिकथाश्रवण। ज्याचें अर्थारूढमन। श्रद्धाश्रवण त्या नांव॥ ३॥ श्रवण ऐकोनि नास्तिक। देवोचि नाहीं म्हणती देख। आहे म्हणती ते पोटवाईक। आम्हांसी नि:शेख ठाकेना॥ ४॥ या नास्तिका देवोनि तिळोदक। ज्याचें वाढलें आस्तिक्य देख। श्रद्धा त्या नांव अलोलिक। अगाध सुख तीमाजीं॥ ५॥ श्रवणीं ध्यानीं अंतराय। लय विक्षेप कषाय। कां रसस्वादुही होय। हे चारी अपाय चुकवावे॥ ६॥ ऐकताहीं हरिकथा। विषयचिंतनीं गोडी चित्ता। ते श्रद्धा नव्हे गा सर्वथा। मुख्य विक्षेपता ती नांव॥ ७॥ हावभावकटाक्षगुण। सुरतकामनिरूपण। तेथ ज्याचें श्रद्धाश्रवण। रसस्वादन त्या नांव॥ ८॥ हरिकथेपाशीं बैसला दिसे। परी कथेपाशीं मनही नसे। चित्त भंवे पिसें जैसें। तो मर्कटवेषें विक्षेपु॥ ९॥ नातरी नाना उद्वेगें। ऐकतां कथा मनीं न लगे। कां कथेमाजीं झोंप लागे। तो जाणावा वेगें लयविक्षेपू॥ ७१०॥ श्रवणीं ध्यानीं बैसल्यापाठीं। सगुण निर्गुण कांहीं नुठी। निळें पिंवळें पडे दिठी। गुणक्षोभ त्रिपुटीं कषाय॥ ११॥ श्रवणीं ध्यानीं हे अवगुण। तैसाचि त्रिविध प्रेमा जाण। तो वोळखती विचक्षण। ऐक लक्षण सांगेन॥ १२॥ महावीरांचें शौर्यपण। ऐकोनि युद्ध दारुण। अत्यंत हरिखें उल्हासे मन। तो प्रेमा जाण राजस॥ १३॥ दु:खशोकांची अवस्था। कां गेल्यामेल्यांची वार्ता। अत्यंत विलापाची कथा। ज्यासी ऐकतां न संठे॥ १४॥ नेत्रीं अश्रूंचिया धारा। स्फुंदनें कांपे थरथरां। प्रेमविलापअवसरां। तो जाण खरा तामसू॥ १५॥ सगुणमूर्तीची संपदा। शंख चक्र पद्म गदा। पीतांबरधारी गोविंदा। ऐकोनि आनंदा जो भरे॥ १६॥ नेत्रीं आनंदजीवन। हृदयीं न संठें स्फुंदन। कृष्णमय जालें मन। तो प्रेमा जाण सात्त्विक॥ १७॥ यावरी जो प्रेमा चौथा। अतर्क्य तर्केना सर्वथा। उद्धवा तूं मजलागीं पढियंता। तोही आतां सांगेन॥ १८॥ तुझ्या भावार्थाची अवस्था मोठी। ते बोलविते गुह्य गोठी। तुजवेगळा पाहतां दृष्टी। अधिकारी सृष्टी दिसेना॥ १९॥ श्रीकृष्ण म्हणे सावधान। ऐकोनि निर्गुणश्रवण। ज्याचें चिन्मात्रीं बुडे मन। उन्मज्जन होऊं नेणे॥ ७२०॥ जेवीं कां सैंधवाचा खडा। पडला सिंधूमाजिवडा। तो झाला सिंधूचियेवढा। तेवीं तो धडफुडा ब्रह्म होय॥ २१॥ चित्तचैतन्यां पडतां मिठी। सुटतां लिंगदेहाची गांठी। नेत्रीं अश्रूंचा पूर दाटी। रोमांच उठी सर्वांगीं॥ २२॥ जीवभावाची दशा आटे। अनिवार बाष्प कंठीं दाटे। कांहीं केल्या शब्द न फुटे। पुरु लोटे स्वेदाचा॥ २३॥ नेत्र झाले उन्मीलित। पुंजाळले जेथींचे तेथ। विस्मयाचें भरतें येत। वोसंडत स्वानंदें॥ २४॥ हा जाण पां प्रेमा चौथा। उत्तम भागवत अवस्था। तुज म्यां सांगीतली तत्त्वतां।इचा जाणता मी एकू॥ २५॥ निर्गुणीं जो प्रेमा जाण। तें शोधितसत्त्वाचें लक्षण। हे मी जाणें उणखूण। कां ब्रह्मसंपन्न जाणती॥ २६॥ उद्धवा श्रद्धायुक्त श्रवण। तेणें येवढी प्राप्ती आहे जाण। श्रद्धाश्रवणाचें महिमान। अतिगहन तिहीं लोकीं॥ २७॥ सविवेकनैराश्य वक्ता। जोडल्या श्रद्धेनें ऐकावी कथा। कां सज्ञान मीनलिया श्रोता। स्वयें कथा सांगावी॥ २८॥ जैं श्रोता वक्ता दोन्ही नाहीं। तैं रिघावें मनाच्या ठायीं। कां माझीं जन्मकर्में जें कांहीं। एकलाही विचारीं॥ २९॥ सांडूनि विषयांची आस। घांलोनि कळिकाळावरी कांस। माझ्या कीर्तनीं न होनि उदास। अतिउल्हास करावा॥ ७३०॥ त्यजूनियां कामाचें बीज। सांडूनि लौकिकाची लाज। कीर्तनीं नाचावें भोज। गरुडध्वज स्मरोनि॥ ३१॥ रामकृष्ण हरि गोविंद। ऐशिया नामांचे प्रबंध। गातां नाना पदें छंदबंध। करावा विनोद कीर्तनीं॥ ३२॥ जेणें आत्मतत्त्व जोडे जोडी। ऐशिया पदांची घडीमोडी। कीर्तनींगावी गा आवडी। संतपरवडी बैसवूनी॥ ३३॥ श्रुति मृदंग टाळ घोळ। मेळवूनि वैष्णवांचा मेळ। कीर्तनीं करावा गदारोळ। काळवेळ न म्हणावा॥ ३४॥ दशमीं दिंडी जागरणें। आळस सांडूनि गावें वाणें। हावभावो दाखवणें। कर्मस्मरणें माझेनि॥ ३५॥ ओढूनि धनुष्याची वोढी। त्र्यंबक मोडिलें कडाडी। मी राम म्हणोनि हांक फोडी। जैताची गुढी कीर्तनीं॥ ३६॥ गोवर्धन उचलिला। दावाग्नि प्राशियेला। तो तो विन्यासू दाविला। सेतु बांधिला अनुकारू॥ ३७॥ आळस दवडूनि दूरी। अभिमान घालोनियां बाहेरी। अहर्निशीं कीर्तन करी। गर्व न धरी गाणिवेचा॥ ३८॥ गाणीव जाणीवशहाणीव। वोंवाळूनि सांडावें सर्व। सप्रेम साबडी कथागौरव। सुख अभिनव तेणें मज॥ ३९॥ गर्जत नामाच्या कल्लोळीं। नामासरसी वाजे टाळी। महापातकां जाली होळी। ते वैष्णवमेळीं मी उभा॥ ७४०॥ जें सुख क्षीरसागरीं नसे। पाहतां वैकुंठींही न दिसे। तें सुख मज कीर्तनीं असे। कीर्तनवशें डुल्लतु॥ ४१॥ मज सप्रेमाची आवडी भारी। भक्तभावाचिया कुसरी। मीही कीर्तनीं नृत्य करीं। छंदतालावरी विनोदें॥ ४२॥ ऐशिया कीर्तनपरिपाटीं। बुडाल्या प्रायश्चित्तांच्या कोटी। खुंटली यमदूतराहाटी। काढिली कांटी पापाची॥ ४३॥ नामस्मरणाच्या आवडीं। लाजल्या मंत्रबीजांच्या कोडी। तपादि साधनें बापुडीं। जालीं वेडीं हरिनामें॥ ४४॥ ऐकोनि हरिनामाचा घोख। योगयागीं लपविलें मुख। धाकें पळालें विषयसुख। विराले देख अधर्म॥ ४५॥ हरिनामाच्या कडकडाटीं। दोष रिघाले दिक्पटीं। तीर्थांची उतरली उटी। कीर्तनकसवटी हरिप्रिय॥ ४६॥ माझेनि प्रेमें उन्मत्त होऊनी। आवडीं कीर्तन अनुदिनीं। मनसा वाचा कर्में करूनी। मजवांचूनी नेणती॥ ४७॥
मदर्थे धर्मकामार्थानाचरन्मदपाश्रय:।
लभते निश्चलां भक्तिं मय्युद्धव सनातने॥ २४॥
माझे भक्त जे उत्तम। त्यांचा धर्म अर्थ मीचि काम। मजवेगळा मनोधर्म। अन्यथा कर्म करूं नेणे॥ ४८॥ माझें भजन उत्तम कर्म। मज अर्पे तो शुद्ध धर्म। मज कामणें हा शुद्धकाम। ज्याचा आराम मजमाजीं॥ ४९॥ वेंचूनियां नाना अर्थ। संग्रहो करिती परमार्थ। नश्वर अर्थ जें वित्त। तें माझे भक्त न संचिती॥ ७५०॥ ज्यांचें धनावरी चित्त। ते केवळ जाण अभक्त। ते जें जें कांही भजन करीत। तें द्रव्यार्थ नटनाटॺ॥ ५१॥ मनसा वाचा कर्में जाण। जेथ नाहीं मदर्पण। तें तें दांभिक भजन। केवळ जाण उदरार्थ॥ ५२॥ भक्तीमाजीं विरुद्धपण। विरुद्ध धर्माचें लक्षण। तेंही करीन निरूपण। सावधान अवधारीं॥ ५३॥ माझें भजन करूनि गौण। जो करूं रिघे धनार्जन। हें भजनविरुद्ध लक्षण। मुख्य जाण भक्ताचें॥ ५४॥ गांठींचें वेंचूं नेणे धन। कोरडें करी माझें भजन। मजसी जेणें केलें वंचन। विरुद्धलक्षण मुख्यत्वें॥ ५५॥ या नांव अर्थविरुद्धता। आतां दुष्ट कामींजो विचरता। मी भजतसें भगवंता। दोष सर्वथा मज न लगे॥ ५६॥ ऐसऐसिया भावना। जो दुष्ट कामीं विचरे जाणा। हे भजनीं विरुद्धलक्षणा। भक्ता अभक्तपणा आणीत॥ ५७॥ मज नार्पितां जें जें श्राद्ध। ते त्याची कल्पना विरुद्ध। श्राद्धसंकल्प अविरुद्ध। मदर्पणें वेद गर्जती॥ ५८॥ श्राद्धीं मुख्य संकल्प जाण। पितरस्वरूपी जनार्दन। ऐसें असोनियां जाण। नैवेद्य मदर्पण न करिती॥ ५९॥ ‘अन्न ब्रह्म अहं ब्रह्म’। हें श्राद्धीचें गुह्य वर्म। ऐसें नेणोनि शुद्ध कर्म। वृथा भ्रम वाढविती॥ ७६०॥ मी सकळ जगाचा जनिता। मुख्य पितरांचाही मी पिता। त्या मज कर्म नार्पितां। विरुद्ध सर्वथा तें श्राद्ध॥ ६१॥ मज नार्पितां जें जें करणें। तें तें उपजे अभक्तपणें। विरुद्ध धर्माचीं लक्षणें। दु:ख दारुणें अनिवार॥ ६२॥ उत्तम भक्तांचें लक्षण। संकल्पेंवीण जाण। अन्नपानादि मदर्पण। करिती खूण जाणती॥ ६३॥ ध्रुवाच्यापरी अढळ। ते माझ्या ठायीं भजनशीळ। ते माझी भक्ति अचंचळ। अतिनिश्चळ पावती॥ ६४॥ आर्त जिज्ञासु अर्थार्थी। या तिघांसी जी नव्हेचि प्राप्ती। ते माझी जे चौथी भक्ती। प्रेमें पावती उद्धवा॥ ६५॥ आर्त आर्तिहरणकाजें। जिज्ञासु जाणपणालागीं भजे। तिजेनि वांछिजे। अतिवोजें अर्थसिद्धी॥ ६६॥ यावरी चौथियाचे ठायीं। या कल्पनांचा मागमोस नाहीं। यालागीं चौथी भक्ति पाहीं। त्याच्या ठायीं घर रिघे॥ ६७॥ जया भक्तीमाजीं वाडेंकोडें। मीच मी चहूंकडे। जेथींच्या तेथें सांपडें। हें भजनें जोडे तयासी॥ ६८॥ संकल्प केलियावीण। सहजें होतसे मदर्पण। हें चवथे भक्तीचें लक्षण। अतर्क्यभजन पैं माझे॥ ६९॥ तेथ जें करणें तेचि पूजा। जें बोलणें तो जपू माझा। जें देखणें तें अधोक्षजा। दर्शन वोजा होतसे॥ ७७०॥ तेथ चालणें ते यात्रा माझी। जें भक्षी तें मजचि यजी। त्याची निद्रा ते समाधि माझी। ऐसा मजमाजीं भजतसे॥ ७१॥ यापरी अनायासें जाण। सहजें होतसे मदर्पण। हे चौथी भक्ति सनातन। उद्धवा संपूर्ण तो लाभे॥ ७२॥ उद्धवा ऐसें मानिसी चित्तीं। जे मुळींहूनि चारी भक्ती। पहिली दुजी तिजी चौथी। मिथ्यावदंती कल्पना॥ ७३॥ सहज माझी जे प्रकाशस्थिती। ते भक्ति बोलिजे भागवती। संविती बोलिजे वेदांतीं। शैवीं शक्ती बोलिजे॥ ७४॥ बौद्ध जिनेश नेमिनाथ। जोगी म्हणती आदिनाथ। भैरव खंडेराव गाणपत्य। अव्यक्त म्हणत एक पै॥ ७५॥ एक म्हणती हे आदिमाता। सौर म्हणती तो हा सविता। असो नांवांची बहु कथा। उपासकता विभागें॥ ७६॥ ऐशी जे कां प्रकाशस्थिती। त्या नांव बोलिजे भक्ती। जेणें प्रकाशें त्रिजगतीं। उत्पत्ति स्थिति लय भासे॥ ७७॥ माझ्या नाना अवतारमाळा। येणें प्रकाशें प्रकाशती सोज्ज्वळा। देवो देवी सकळा। येणें प्रकाशमेळां भासती॥ ७८॥ माझ्या अवतारांची उत्पत्ती। तेणें प्रकाशें असे होती। नाना चरित्रें अंतीं। प्रवेशती ते प्रकाशीं॥ ७९॥ ऐशिया प्रकाशाची जे प्राप्ती। ते जाण सनातन माझी भक्ती। उद्धवा म्यां हे तुजप्रती। यथानिगुती सांगीतली॥ ७८०॥ निश्चळभक्ती सनातन। हें मुळींचें पदव्याख्यान। यालागीं भक्ति सनातन। समूळ जाण बोलिलों॥ ८१॥ सांडूनि पदपदार्था। नाहीं बोलिलों जी वृथा। सावधान व्हावें श्रोतां। पुढील कथा अनुपम॥ ८२॥ उद्धवा हे ऐशी माझी भक्ती। कैसेनि म्हणसी होये प्राप्ती। भावें धरिलिया सत्संगती। माझी भक्ती उद्बोधे॥ ८३॥
सत्सङ्गलब्धया भक्त्या मयि मां स उपासिता।
स वै मे दर्शितं सद्भिरञ्जसा विन्दते पदम्॥ २५॥
मुख्यत्वें संतांची सेवा। हेंचि साधन आवडे देवा। संतवचने निजभावा। देतुसे तेव्हां निजभक्ती॥ ८४॥ ज्यासी आवडे संतसंगाचा मेळू। जो साधुवचनीं अतिभुकाळू। जो पडिलें वचन नेणें उगळूं। तोचि पायाळू निजभक्ती॥ ८५॥ साधुवचनीं श्रद्धा भारी। देखोनियां निजनिर्धारीं। त्यावरी सद्गुरु कृपा करी। साधु चराचरीं गुरुरावो॥ ८६॥ गुरुवांचोनि तत्त्वतां। नाहीं संसारीतारिता। गुरुवचनें निजभक्तिदाता। मीचि सर्वथा भक्तांसी॥ ८७॥ सद्गुरु जो संसारीं। त्याची आज्ञा मी वाहें शिरीं। तो ज्यावरी कृपा करी। तो मी उद्धरीं तात्काळ॥ ८८॥ त्या सद्गुरुचें भजन। जो मद्रूपें करी जाण। त्याचें मज पढियंतेपण। माझेनिही जाण न बोलवे॥ ८९॥ त्याचा इहलोक परलोक। दोन्ही चालविता मीचि देख। त्याचे मज अत्यंत सुख। हरिखें हरिख वोसंडे॥ ७९०॥ त्यासी गुरूनें जो दाविला मार्ग। चालतां न पडे प्रयासपांग। मी सामोरा धांवें श्रीरंग। आपुलें सर्वांग मी वोडवीं॥ ९१॥ तेणें जावें ज्या पदासी। तें पदचि मी आणीं त्यापासीं। संतभजनीं प्रीति ऐशी। हृषीकेशी सांगतू॥ ९२॥ ऐसें ऐकोनियां वचन। उद्धवाचें कळवळलें मन। कोण कोण ते साधुजन। त्यांचें निजचिन्ह पुसों पां॥ ९३॥ कोण ते भक्तींचें लक्षण। भजती खूण ते कोण कोण। तें समूळ जाणावया आपण। उद्धवें प्रश्न मांडिला॥ ९४॥
उद्धव उवाच
साधुस्तवोत्तमश्लोक मत: कीदृग्विध: प्रभो।
भक्तिस्त्वय्युपयुज्येत कीदृशी सद्भिरादृता॥ २६॥
ज्ञाते वक्ते आहेत बहुत। परी ते रजतमगुणयुक्त। गुणानुसारें निरूपीत। त्यांसी पुसों चित्त मानीना॥ ९५॥ अथवा सात्त्विक केवळ। तो सत्त्वगुणें विव्हळ। बोलणें बोलतां जाये बरळ। नव्हे केवळ निजबोधू॥ ९६॥ तैसा तूं नव्हेसी कृष्णनाथा। तुजआधीन गुण तत्त्वतां। लीलाविग्रहें देहधरिता। निजज्ञानवक्ता तूंचि एक॥ ९७॥ यालागीं जी उत्तमश्लोक। तुज म्हणती तीनी लोक। तुजवेगळा आणिक। आम्हांसी देख मानेना॥ ९८॥ माझिया प्रश्नाचा वक्ता। तूंचि एककृष्णनाथा। तरी साधु कोण तत्त्वतां। तुज सर्वथा मानला॥ ९९॥ तुज मानले जे साधुजन। त्यांचें संपूर्ण सांग लक्षण। तुज पढियंती भक्ति कोण। तेंही लक्षण सांगावें॥ ८००॥ भक्तीमाजीं भक्ति सधर। जे कां तुझी प्राप्तिकर। अतिउत्तम परात्पर। संतीं निरंतर आदरिली॥ १॥ संतीं आदरिलें जे भक्तीसी। संतासी पुसूं जाय म्हणसी। मज विश्वास तुझिया वचनासी। पुसों आणिकांसी मानेना॥ २॥ जे ज्या देवतांतरा भजती। ते ती उत्तम भक्ति म्हणती। तुज मानली जे श्रीपती। ते मजप्रती सांगावी॥ ३॥ समान कुळशीळसंवादु। तैसियासीच म्हणती साधु। तूं निजमुखें जो म्हणसी शुद्धु। ती मज वंद्यु सर्वथा॥ ४॥ तीं संबोधनीं सारंगधरू। उद्धव प्रार्थूनि करी सादरू। तीं विशेषणीं निजविचारू। श्रवणाधिकारू सांगतु॥ ५॥
एतन्मे पुरुषाध्यक्ष लोकाध्यक्ष जगत्प्रभो।
प्रणतायानुरक्ताय प्रपन्नाय च कथ्यताम्॥ २७॥
पुरुषीं पुरुषोत्तम तूंचि कीं। कर्मधर्मांचा विवेकी। यालागीं बोलिजे पुरुषाध्यक्षी। सर्वसाक्षी गोविंदा॥ ६॥ जैसें कर्म तैसा फळदाता। यालागीं बोलिजे लोकाध्यक्षता। तूंचि ब्रह्मादिकांचा नियंता। प्रतिपाळिता जगाचा॥ ७॥ हो कां मी जगाचा प्रतिपाळिता। त्या जगामाजीं तूंही असतां। तुजचि सांगावी ज्ञानकथा। हे अधिकता कां म्हणसी॥ ८॥ जरी तूं सर्वज्ञ सर्वेश्वरू। अंतर्यामी नियंता ईश्वरू। जरी देखसी माझा अधिकारू। तरी ज्ञाननिर्धारू सांगावा॥ ९॥ हो कां मज अधिकारू नाहीं। तरी शरण आलों तुज पाहीं। शरणागताची तुझ्या ठायीं। उपेक्षा नाहीं सर्वथा॥ ८१०॥ विषयीं देखोनि थोर दु:ख। झालों तुझिया चरणासंमुख। अतिदीन मी तुझे रंक। पां आवश्यक तुवां कीजे॥ ११॥ माझ्या दुर्जय वासना। अनिवार मज निवारतीना। त्या तूं निवारीं श्रीकृष्णा। शरण चरणा यालागीं॥ १२॥ मी एक भक्त अनुरक्तु। ऐसें बोलतां बहु गर्व दिसतु। तूं सर्वज्ञ श्रीअनंतु। कृपावंतु दीनाची॥ १३॥ मी एकु श्रवणाधिकारी। हेंही न म्हणवे गा मुरारी। ऐसें बोलोनियां पाय धरी। कृपा करीं कृपानिधि॥ १४॥ आम्ही स्वगोत्र सखे सहज। पाय धरणें न घडें तुज। या म्हणणियाचें निजबीज। कळलें मज गोविंदा॥ १५॥
त्वं ब्रह्म परमं व्योम पुरुष: प्रकृते: पर:।
अवतीर्णोऽसि भगवन् स्वेच्छोपात्तपृथग्वपु:॥ २८॥
तूं निर्गुण निर्विशेष। चिन्मात्रैक चिदाकाश। पुरुषांमाजीं उत्तम पुरुष। वंद्य सर्वांस तूं एक॥ १६॥ तूं ब्रह्म गा निर्विकार। प्रकृतिपुरुषांहोनि पर। तुझा वेदशास्त्रां न कळे पार। अगोचर इंद्रियां॥ १७॥ ऐक आमुचे भाग्याची कळा। त्या तुज प्रत्यक्ष देखतों डोळां। मुकुटकुंडलेंवनमाळा। घनसांवळा शोभतु॥ १८॥ सुंदर राजीवलोचन। पीतांबर परिधान। देखोनि निवताहे तनुमन। तूं जगज्जीवन जगाचा॥ १९॥ त्या तुझें दर्शन अतिगोड। देखतां पुरे जगाचें कोड। त्याही देहाची तुज नाहीं चाड। ऐसा निचाड तूं देवा॥ ८२०॥ तरी भक्तकृपेचा कळवळा। धरिसी नानावतारमाळा। भक्तइच्छा तूं स्वलीळा। देहाचा सोहळा दाविसी॥ २१॥ भक्तकृपेनें तत्त्वतां। तूं अवतरलासी कृष्णनाथा। तरी माझिया प्रश्नाचा वक्ता। न प्रार्थितां जालासी॥ २२॥ जेवींवत्सहुंकारें गाये। वोरसली धांवताहे। तेवीं उद्धवप्रश्नीं देव पाहें। वोळलाहे निजबोधें॥ २३॥ धन्यासी दुभतें दोनी सांजे। तेंही वत्सयोगें पाविजे। वत्सासी वोळली सदा सहजें। तेवीं अधोक्षजें उद्धवासी॥ २४॥ उद्धव आवडला आवडीं। त्याच्या प्रश्नाची अतिगोडी। बापु भाग्याची परवडी। जोडिल्या जोडी श्रीकृष्णू॥ २५॥ जें जें कांहीं उद्धव पुसतू। त्यासी अंजुळी वोडवीं श्रीकृष्णनाथू। आवडी त्यातें चाटूं पाहतू। भावार्था अनंतू भुलला॥ २६॥ जैशी अजातपक्ष पिलीं। त्यांसी पक्षिणी मुखीं चारा घाली। तैसी निजज्ञानगुह्यबोली। कृष्ण हृदयीं घाली उद्धवाचे॥ २७॥ उद्धवप्रश्नाचें उत्तर। पांच श्लोकीं शार्ङ्गधर। साधुलक्षणें विचित्र। अतिपवित्र सांगेल॥ २८॥ साधुलक्षणें अपार जाण। त्यांत उत्तमोत्तम तीस गुण। निवडोनियां श्रीकृष्ण। उद्धवासी आपण सांगतु॥ २९॥
श्रीभगवानुवाच
कृपालुरकृतद्रोहस्तितिक्षु: सर्वदेहिनाम्।
सत्यसारोऽनवद्यात्मा सम: सर्वोपकारक:॥ २९॥
कृपेसी स्वतंत्र जन्म नाहीं। जेथ उपजे तो साधु पाहीं। कृपा वसे संतांच्या देहीं। त्यांचेनि ते पाहीं दाटुगी जगीं॥ ८३०॥ कृपा त्यांचेनि महिमे आली। दया त्यांचेनि जीवें ज्याली। कठिणत्वाची कांटी काढिली। समूळीं उपटिली निष्ठुरता॥ ३१॥ कृपा भूतमात्राच्या ठायीं। सारिखीच सर्व देहीं। येथतेथ हें त्या नाहीं। अवकृपा ठायीं निमाली॥ ३२॥ नवल कृपाळुत्वाचेंचित्त। जीवाचा जीव जीवीं स्यूत। दु:ख हरोनि सुख देत। कृपा अद्भुत यापरी॥ ३३॥ जेणें आपणासी होय दु:ख। तें परासी न करी नि:शेख। जेणें आपणिया होय सुख। तें करी आवश्यक प्राणिमात्रां॥ ३४॥ या नांव कृपाळुता। हे पहिलें लक्षण संतां। दुसरें तें अद्रोहता। ऐक आतां सांगेन॥ ३५॥ लोकीं हिंडतां अद्रोहता। ठावो न लभेचि सर्वथा। मग शरण आली साधुसंतां। सावकाशता वस्तीसी॥ ३६॥ ते दयाळु शरणागता। तिंहीं प्रतिपाळिली अद्रोहता। भूतीं भगवंतू देखतां। द्रोहाची वार्ता निमाली॥ ३७॥ व्याघ्रसर्पादि देहांसी। कदा द्वेष नुपजे त्यासी। जरी देऊं आलें उपद्रवासी। तरी द्वेषासी करीना॥ ३८॥ देहास आलिया आपदा। तेणें झाडिकरी प्रारब्धा। द्वेष येऊं नेदी कदा॥ नातळे क्रोधा निजबोधें॥ ३९॥ हे जाण पां अद्रोहता। दुसरें लक्षण तत्त्वतां। तितिक्षा ते ऐक आतां। सहनशीलता साधूंची॥ ८४०॥ शांति परदेशी झाली होती। जेथें जाये तो दवडी परती। मग अतिदीन येतां काकुळती। निजधामा संतीं आणिली॥ ४१॥ संतीं वाढविली अतिप्रीतीं। ते भगवंताची झाली पढियंती। तेणें आपुली निजसंपत्ती। शांतीच्या हातीं दिधली॥ ४२॥ शांती सकळ वैभवेंसीं। अखंड असे संतांपांशीं। यालागी सहनशीलता तयांसी। अहर्निशीं अनिवार॥ ४३॥ लागतां सकळ भूतांचा झटा। न म्हणे हा भला वोखटा। नाचतू निजशांतीचे चोहटा। संत गोमटा त्या नांव॥ ४४॥ ऐशी जे सहनशीलता। ते तितिक्षा जाण तत्त्वतां। हे तिसरी लक्षणता। सत्याची सत्यता अवधारीं॥ ४५॥ सत्य अल्पायुषी झालें येथें। मरे उपजे जेथींच्या तेथें। कोठेंही नव्हे वाढतें। तेणें संतांतें ठाकिलें॥ ४६॥ सत्यासी संतांसी होतां भेटी। तंव सत्यस्वरूपीं पडली गांठी। सत्य संतत्वे उठी। झालें सृष्टीं चिरायु॥ ४७॥ यापरी सत्य संतदृष्टीं। सत्य सारें आलें पुष्टी। संतबळें वाढलें सृष्टीं। सत्यें भेटी परब्रह्मीं॥ ४८॥ संतांसी होआवया उतरायी। सत्य लागलें त्यांचे पायीं। संतचरणावेगळा पाहीं। थारा नाहीं सत्यासी॥ ४९॥ ऐसे सत्यास आधारभूत। ज्यांचे पाखोवा सत्य जीत। ज्यांचेनि बळें सत्य समर्थ। ते शुद्ध संत जाणावे॥ ८५०॥ ज्यांसी सबाह्यसत्यत्वें तुुष्टी। जे सत्यस्वरूपें आले पुुष्टी। सत्ये धाली दे ढेंकर दृष्टी। ज्यांची वाचा उठीसत्यत्वें॥ ५१॥ या नांव जाण सत्याचें सार। हें संतांचें वसते घर। हे मज मान्य संत साचार। मी निरंतर त्यांपाशीं॥ ५२॥ जिंहीं असत्याची वाहूनि आण। ज्यांमाजीं सत्य सप्रमाण। जे सदा सत्यत्वें संपन्न। हें मुख्य लक्षण साधूंचें॥ ५३॥ या नांव सत्यसार। संतलक्षण साचार। हा चौथा गुण सधर। अनवद्य अपार तें ऐका॥ ५४॥ निंदा असूयादि दोष समस्त। निजात्मबोधें प्रक्षाळीत। अत्यंत पवित्र केलें चित्त। अनिंदित निजबोधें॥ ५५॥ गुरुआज्ञातीर्थीं न्हाला। न्हावोनि सर्वांगीं निवाला। त्रिविधतापें सांडवला। पवित्र झाला मद्रूपें॥ ५६॥ काय सांगूं त्याची पवित्रता। तीर्थें मागती चरणतीर्था। मीही पदरज वांछिता। इतरांची कथा कायसी॥ ५७॥ कृष्ण म्हणे उद्धवा। हा अनवद्य गुण पांचवा। ऐक आतां सहावा। सम सर्वां समभावें॥ ५८॥ निजरूपें सर्वसमता। समचि देखे सर्वां भूतां। नि:शेष निमाली विषमता। जेवीं सैंधवता सागरीं॥ ५९॥ नाना अलंकार पदार्था। सोनेंपणें विकत घेतां। ते ते पदार्थ न मोडितां। स्वभावतां सम सोनें॥ ८६०॥ तैसे नाना आकार नाना नाम। अवघें जग दिसे विषम। साधूचि चिद्रूपें सर्व सम। न देखे विषम निजबोधे॥ ६१॥ ऐशिया समसाम्यावस्थेसी। दैवें आलिया सुखदु:खांसी। तेही मुकली द्वंद्वभावासी। सहजें समरसीं निजसाम्यें॥ ६२॥ सव्यें मिनल्या महानदीसी। अपसव्यें आल्या गांवरसासी। गंगा दोहींतेंहीसमरसी। गुणदोषांसीं उडवूनी॥ ६३॥ तेथ पवित्रअपवित्रता। बोलूंचि न ये सर्वथा। गोडकडूपणांची वार्ता। निजांगें समता करी गंगा॥ ६४॥ तैसें सुखदु:खांचें भान। साधूंसी समत्वें समान। सदा निजबोधें संपन्न। हें अगाध लक्षण संतांचें॥ ६५॥ नटिया एकचि एकला। गायव्याघ्रांचें सोंग अवगला। भीतरील खेळ्ॺा जैं वोळखिला। तैं फिटला भवभ्रमू॥ ६६॥ तैशी भयाभयवार्ता। द्वैतभावें उठी सर्वथा। साधु उभयसाम्यें पुरता। भयनिर्भयता तो नेणे॥ ६७॥ द्वंद्वसाम्यें परिपूर्ण। साधूचा हा सहावा गुण। ऐक सातवें लक्षण। परोपकारीपण तयाचें॥ ६८॥ पत्र पुष्प छाया फळ। त्वचा काष्ठ समूळ। वृक्ष सर्वांगें सफळ। सर्वांसी केवळ उपकारी॥ ६९॥ जो वृक्षा प्रतिपाळी। कां जो घावो घाली मूळीं। दोनींतें वृक्ष पुष्पीं फळीं। समानमेळीं संतुष्ट॥ ८७०॥ मोडूनि फळें आलिया वृक्षें। वृक्षु एकही स्वयें न चाखे। तेवीं कर्मफळा जो न टेकें। तो यथासुखें परब्रह्म॥ ७१॥ तैसा कायावाचामनें प्राणें। साधु वाढला उपकाराकारणें। आपुलें परावें म्हणों नेणे। उपकारू करणें सर्वांसी॥ ७२॥ हो कां चंद्र उगवोनि अंबरीं। जेवीं जगाचें आंधारें निवारी। विश्वाचा ताप दूर करी। निववी निजकरीं सर्वांतें॥ ७३॥ तेथ चंद्रामृत चकोरीं सेवावें। येरांसी चंद्र न म्हणे न द्यावें। जोजो भजे जेणें भावें। तो तो पावे तें सुख॥ ७४॥ तैसेंचि जाण साधूपाशीं। जो जो श्रद्धा करी जैशी। त्या त्या देतसे सुखासी। होत जगासी उपकारी॥ ७५॥ काउळे चंद्रासी हेळसिती। चकोर चंद्रामृत सेविती। तेवीं दुष्ट साधूतें धिक्कारिती। भावार्थी पावती निजलाभू॥ ७६॥ सातव्या लक्षणाचा उभारा। सांगितलें परोपकारा। पुढील श्लोकीं लक्षणें अकरा। साधुनिर्धारा सांगत॥ ७७॥
कामैरहतधीर्दान्तो मृदु: शुचिरकिञ्चन:।
अनीहो मितभुक् शान्त: स्थिरो मच्छरणो मुनि:॥ ३०॥
उर्वशी आलिया सेजेसी। कामक्षोभ नुपजे ज्यासी। स्वानंद भोगितां अहर्निशीं। विषयकामासी विसरला॥ ७८॥ रंकू पालखिये बैसला। तो पूर्वील वाहना विसरला। तेवीं हा निजानंदें तृप्त झाला। काम विसरला तुच्छत्वें॥ ७९॥ कांहीं अप्राप्त पावावया कामावें। साधूसी अप्राप्तता न संभवे। प्राप्तपदीं यथागौरवें। निजानुभवें विराजतू॥ ८८०॥ खद्योता सूर्य भेटों जातां। खद्योता न देखे सविता। सूर्यासी न भेटवे खद्योता। तेवीं अप्राप्तता साधूसी॥ ८१॥ एवं उभय परी पाहतां। कामू निमाला सर्वथा। हें आठवें लक्षण तत्त्वतां। अकामता साधूची॥ ८२॥ सावधानें अंतर नेमितां। तेचि बाह्येंद्रियां नियामकता। जेवीं कां लेंकीसी शिकवण देतां। सून सर्वथा चळीं कांपे॥ ८३॥ मुख्य धूर रणीं लागल्या हाता। येर कटक जिंतिलें न जुंझतां। कां मूळ छेदिलें असतां। शाखा समस्ता छेदिल्या॥ ८४॥ एवं अंतरवृत्तीचा जो नेम। तोचि बाह्येंद्रियां उपरम। ऐसेनिही जें निपजे कर्म। तें निर्भ्रम अहेतुक॥ ८५॥ अंतर जडलें आत्मस्थितीं। बाह्य रंगलें मद्भक्तीं। तेथें जीं जीं कर्मे निपजती। तीं तीं होती ब्रह्मरूप॥ ८६॥ बाह्येंद्रियें करितां नेम। अंतरीचें कर्मीं प्रकटे ब्रह्म। हा बाह्येंद्रियांचानेम। आत्माराम जाणती॥ ८७॥ ऐशी बाह्येंद्रियनियामकता। हे जाणावी साधूची दांतता। हा नववा गुण तत्त्वतां। ऐक आतां दशमातें॥ ८८॥ आकाश सर्वांसीही लागे। परी कठिण नव्हे कोणेही भागें। तेवीं साधु जाण सर्वांगें। मृदु लागे सर्वांसी॥ ८९॥ पिंजल्या कापुसाचा गोळा। फोडूं नेणे कोणाच्या कपाळा। तैसाचि साधूचा जिव्हळा। अतिकोंवळा सर्वांसी॥ ८९०॥ पाहें पां जैसें गंगाजळ। गायीव्याघ्रांसी करी शीतळ। तैसाचि साधुही केवळ। मृदु मंजुळ सर्वांसी॥ ९१॥ साधूची अतिमृदुता। या नांव जाण सर्वथा। हे दशमलक्षणयोग्यता। ऐक आतां अकरावें॥ ९२॥ साधूंची जे शुचिष्मंतता। ते भगवद्भजनेंचि तत्त्वतां। व्रततपदानादितीर्था। शुचिष्मंतता त्यांचेनी॥ ९३॥ परदारा आणि परधन। सर्वथा नातळे ज्याचें मन। गंगादि तीर्थे त्याचें जाण। चरणस्पर्शनवांछिती॥ ९४॥ स्वदारास्वधन सलोभता। अवश्य जाणें अध:पाता। द्रव्यदारानिरपेक्षता। शुचिष्मंतता साधूची॥ ९५॥ ऐशी असोनि शुचिष्मंतता। तो निंदीना व्रततपादितीर्था। ते ते विधीतें आचरितां। सदाचारता अतिश्रोत्री॥ ९६॥ पडलिया मगरमिठी। ते न सोडी प्राणसंकटी। सांपडे तें सगळेंचि घोटी। तैशी पडली मिठी जीवब्रह्मा॥ ९७॥ हें पुढेंसूनि परब्रह्म। आश्रमधर्मादि स्वकर्म। आचरोनि दावी उत्तमोत्तम। कर्मी ब्रह्मप्रतीती॥ ९८॥ कर्म करितो लोक म्हणती। तो वर्तताहे ब्रह्मस्थितीं। हें ज्याचें तो जाणे निश्चितीं। लोकां प्रतीती कळेना॥ ९९॥ कुलाल भांडें करूनि उतरी। चक्र भोंवे पूर्विला भंवरीं। तैसा साधू पूर्वसंस्कारी। स्वकर्मे करी वृत्तिशून्य॥ ९००॥ हें साधुलक्षण अत्यंतथोर। ऐकतां सुगम करितां दुर्धर। हें अकरावें अतिपवित्र। ऐक विचित्र तें बारावें॥ १॥ साधूची अपरिग्रहता। परिग्रहो नातळे चित्ता। देहगेहें नि:संगता। अकिंचनता त्यासी नांव॥ २॥ स्फटिकु काजळीं दिसे काळा। आरक्तीं आरक्ती कीळा। नीळवर्णी भासे निळा। तरी तो वेगळा शुद्धत्वें॥ ३॥ स्फटिक जपाकुसुमीं ठेविला। पाहतां दिसे तांबडा झाला। परी तो अलिप्तपणें संचला। नाहीं माखला तेणें रंगें॥ ४॥ तैसा साधु परिग्रहामाजी वसे। परिग्रही झालाही दिसे। परी जागृतिस्वप्नसुषुप्तिवशें। परिग्रहो न स्पर्शे निजबोधें॥ ५॥ परीस सर्व धातूंसी खेंव देतां। मिळणीं सोनें करी तत्त्वतां। तो सुवर्णावांचूनि सर्वथा। आणिका पदार्था नातळे॥ ६॥ तैसा साधू म्हणे जें जें माझें। तें तें त्यासी नाठवे दुजें। ऐक्यभावाचीं नाचवी भोजें। अधोक्षजें अंकितु॥ ७॥ चिन्मात्री जडलें मन। विश्व जाहलें चैतन्यघन। बुडालें परिग्रहाचें भान। अकिंचनपण या नांव॥ ८॥ सकळ सांडूनि वना गेला। वनीं वनिता चिंतूं लागला। तो त्यागचि बाधकत्वा आला। उलथोन पडिला परिग्रहीं॥ ९॥ उंडणी भिंती चढों लाहे। चढते कष्ट व्यर्थ पाहे। ते पूर्विल्यापरीस तळीं जाये। उलंडूनि ठाये अति-दु:खी॥ ९१०॥ तैशी मुंगी नव्हे पाहें। उंडणी घेऊनि वृक्षावरी जाये। सत्संगती मूर्ख उद्धारों लाहे। परी ते उपाये न करिती॥ ११॥ मुंगी लहान उंडणी थोर। ते तिचा करूं शके उद्धार। तैसे अकिंचन जे नर। ते करिती उद्धार सकळांचा॥ १२॥ असो मूर्खांची जे त्यागिती गती। ते अत्यंतबाधें बाधका होती। जंव धरिली नाहीं सत्संगती। तंव त्यागस्थिती कळेना॥ १३॥ प्रपंच सांडूनि वना गेला। तो देहप्रपंचें दृढ अडकला। देही देहो जेणें मिथ्या केला। तो सत्य झाला अकिंचन॥ १४॥ मूर्खासी त्याग तो झाला बाधू। परिग्रहीं असोनि मुक्त साधू। सबाह्य त्यागें अतिशुद्धु। शुकनारदू तिहीं लोकीं॥ १५॥ ते दोघेही लागती जनकाच्या पायीं। तो राज्य करितांही विदेही। त्यासी मीही मानीतसें पाहीं। अभिनव नवाई साधूची॥ १६॥ या नांव मुख्य अकिंचनता। तुज म्यां सांगीतली तत्त्वतां। हे बारावी लक्षणता। ऐक आतां अनीहा॥ १७॥ अनीहा झाली बापुडी। जेथ जाय तो दूर दवडी। कोणी राहों नेदी अर्धघडी। अति चरफडी निराश्रयें॥ १८॥ अनीहा हिंडतां लोकीं तिहीं। तिळभरी ठावो बसावया नाहीं। ईहा वैरिणी लागली पाहीं। ठायींच्या ठायीं दंडवी॥ १९॥ कोणी येवों नेदी दाराकडे। अतिदीन जाली बापुडें। धाय मोकलोनि रडे। गाऱ्हाणें संतांपुढें देवों आली॥ ९२०॥ ते कृपाळू दयामेळें। निजकरें पुसोनि डोळे। प्रतिपाळिली स्वहितकाळें। संतबळें वाढली॥ २१॥ त्यापूर्वील वैर स्मरोनियां। ईहा वैरिणी साधावया। संतांसी पुसोनि उपाया। तिच्या अपाया प्रवर्तली॥ २२॥ ईहेसी नाना चेष्टीं चेष्टवितां। अहं आणि जाण ममता। कामें अंगीं घातली तत्त्वतां। कामकांता ते झाली॥ २३॥ ईहा कामबळें वाढली थोर। व्यापूनि राहिली घरोघर। तिसीं साधावया वैर। अनीहा सत्वर चालिली॥ २४॥ असंगशस्त्र मागोनि संतां। ईहेच्या करावया घाता। आधींमारूं धांवे अहंममता। दोघें धाकतां निमालीं॥ २५॥ अनीहा पाठीं लागल्या जाण। अंहममतेसी म्हातारपण। थरथरां कांपोनि प्राण। घायेंवीण सांडिला॥ २६॥ अनीहा देखोनि दिठीं। काम पळे बारा वाटीं। संकल्पाचे शेवटिले गोटीं। उठाउठी पाडिला॥ २७॥ कामू पडतां रणांगणीं। क्रोधादि शूर पडिले रणीं। ईहेचा कैवारी नुरेच कोणी। एकेक शोधूनी मारिले॥ २८॥ एवं अनीहे समोर। राही ऐसा नाहीं वीर। मारूनि अवघ्यांचा केला चूर। क्रिया करणार कोणी नाहीं॥ २९॥ काम निमाल्या सर्वथा। ईहा रांडवली वस्तुतां। मुख न दावीच संतां। अधोगमनता पळाली॥ ९३०॥ यालागीं ईहेसवें जो लागला। तो जाणावा अधोगती गेला। अनीहेचा जो अंकित झाला। तो आवडला गोविंदा॥ ३१॥ म्हणसी अनीहा ते कोण। काय ते ईहेचें लक्षण। ऐक सांगेन संपूर्ण। जेणें बाणे खूण जिव्हारीं॥ ३२॥ काम्यकर्मादि क्रियाजाळ। तेचि ईहा जाणावी अतिचपळ। अंतरीं जे सुनिश्चळ। तेचि केवळ अनीहा॥ ३३॥ अंतरीं कामाची वार्ता। नुपजे कर्माची कर्मावस्था। अणुभरी न रिघे उद्वेगता। अनीहा तत्त्वतां ते जाण॥ ३४॥ ऐशी अनीहा असे ज्यासी। देवोआज्ञाधारकू त्यापाशीं। ते अनीहा संतांची दासी। अहर्निशीं जीवेंभावें॥ ३५॥ हे अनीहा अतिगौरवें। साधुलक्षण तेरावें। मितभोजन तें चौदावें। लक्षण वैभवें अवधारीं॥ ३६॥ न कोंडे रसनेचिया चाडा। न पडे क्षुधेच्या पांगडा। आवडीनावडीचा उपाडा। करूनि निधडा भोजनीं॥ ३७॥ प्राणु आकांक्षी अन्नातें। जठराग्नि भक्षी त्यातें। उभयसाक्षी मी येथें। जाणोनि निरुते रस सेवी॥ ३८॥ जें जें आलें भोजनासी। दृष्टीनें त्याचे दोष निरसी। अतिपवित्र करूनि त्यासी। निजसमरसीं सेवितू॥ ३९॥ नदेखे भोग्य पदार्था। नाठवे मी एक भोक्ता। ग्रासीं समरसीं अच्युता। भोगूनि अभोक्ता मितभोजी॥ ९४०॥ अग्नि आधीं आपणयाऐसें करी। मग त्या आहारातें अंगीकारी। साधु आधीं द्वैतातें निवारी। मग स्वीकारी आहारातें॥ ४१॥ याचि नांव मितभोजन। साधूचे आहाराचें लक्षण। युक्तीवीण अल्प भोजन। तें पथ्य जाण रोगियाचें॥ ४२॥ ग्रासोग्रासीं ब्रह्मार्पण। त्या नांव परिमित भोजन। हें चौदावें लक्षण। साधूचें जाण उद्धवा॥ ४३॥ समळजळसंभारी। सरितामेळू मिळे सागरीं। तो डहुळेना तिळभरी। निर्विकारी निर्मळू॥ ४४॥ तैशा आलिया नाना ऊर्मी। ज्यांसी गजबजु नाहीं मनोधर्मी। शांति संतांची पराक्रमी। उपक्रमी निजशक्ती॥ ४५॥ जेवीं कां नागवेलीची वेली। आधारवीण न वचे वेंगली। तैसी संतबळें शांती वाढली। मंडपा चढली चिन्मात्र॥ ४६॥ झांकळोनि दश दिशांसी। आभाळ दाटल्या आकाशीं। गगन अविकारी त्या दोषासी। आभाळासी नातळे॥ ४७॥ शीत उष्ण पर्जन्यधारा। अंगीं न लगती अंबरा। तेवीं साधूचा उभारा। द्वंद्वसंभारा निर्द्वंद्व॥ ४८॥ तैशा उंच नीच नाना अवस्था। निबिड दाटल्या मोहममता। क्षोभु नुपजे ज्याच्या चित्ता। त्या नांव तत्त्वतां निजशांती॥ ४९॥ संतांचेनि शांति गहन। शांतीचेनि संत पावन। हें अनन्य निजलक्षण। पंधरावा गुण संतांचा॥ ९५०॥ जैं मीपणें नव्हतें जन्मनाम। तैंच पूर्वजांचें निजधाम। आपुली मिरासी जे उत्तम। तेथ मनोधर्म स्थिरु ज्याचा॥ ५१॥ मज जन्मचि नाहीं झालें। मरण म्यां नाहीं देखिलें। ऐसें मन मूळीं स्थिरावलें। स्थिरता बोलिलें या नांव॥ ५२॥ चहूं आश्रमांहूनि उत्तम। आपुला जो निजाश्रम। तेथें स्थिरावोनि मनोधर्म। वर्णाश्रम चालवी॥ ५३॥ चहूं वर्णांमाजीं पवित्रता। जेणें ब्राह्मणांची ब्राह्मणता। तेथें स्थिराविलें जेणें चित्ता। जाण स्थिरता ती नांव॥ ५४॥ तिहीं लोकीं स्थिरता। मरों टेंकली सर्वथा। कोणी नाहीं प्रतिपाळिता। हातीं धरिता न देखे॥ ५५॥ दारीं राहों नेदी कोणी। कोण देईल पथ्यपाणी। अवघी टाकिली निरंजनीं। ते सज्जनीं प्रतिपाळिली॥ ५६॥ स्थिरता वाढली संतबळें। जिणोनि वर्णाश्रमादि टवाळें। भेदोनि अकारादिवर्णपटळें। एके वेळे वाढली॥ ५७॥ स्वस्वरूपीं सायुज्यता। पावोनि स्थिरावली स्थिरता। तेथ वाट मोकळी संतां। स्वभावतां त्यां केली॥ ५८॥ तेथ स्वस्वरूपें स्वकर्म। स्वस्वरूपें वर्णाश्रम। स्वस्वरूपें स्वधर्म। स्थिरतासंभ्रम या नांव॥ ५९॥ ऐसी स्वधर्मकर्मीं अवस्था। ती नांव उत्तम स्थिरता। हे सोळावी लक्षणता। मच्छरणता ते ऐक॥ ९६०॥ सरिता सागरा शरण आली। ते समरसोनि सिंधू झाली। तैसी शरण जे वृत्ति मज आली। ते पावली दशा माझी॥ ६१॥ लवण जीवना आलें शरण। तें तत्काळ जाहलें जीवन। तैसा अनन्य मज जो शरण। तो मीचि जाण होऊनि ठाके॥ ६२॥ मज रिघोनियां शरण। जो वांछी महिमा सन्मान। तो गुळांतील पाषाण। केवळ जाण गुळदगडू॥ ६३॥ जो कां गुळें माखिला दगडू। तो पाहतां दिसे वरिवरी गोडू। शेखीं परिपाकीं निवाडू। अतिजडू कठिणत्वें॥ ६४॥ तैसें वरिवरी दावी माझें भजन। हृदयीं विषयअभिलाषण। तो नव्हे माझा अनन्यशरण। अतिदूषण लोभाचें॥ ६५॥ सर्वांगीं सुदंर सुरेख। जिच्या नाकावरी पांढरें टीक। तिसी वरीना साधु लोक। तैसा विषयलोभु देख मद्भजनीं॥ ६६॥ रांडवा केलें काजळ कुंकूं। देखोनि जग लागे थुंकूं॥ तैसा विषयांचा अभिलाखू। जेवीं वोकिला वोकू अतिनिंद्य॥ ६७॥ त्रैलोक्यसाम्राज्यवैभव जाण। जो थुंकोनि रिघाला मज शरण। तो समरसें मीचि जाण। मानापमान त्या कैंचा॥ ६८॥ या नांव मच्छरण। हें सतरावें लक्षण। उद्धवा जाण संपूर्ण। मननगुण तो ऐक॥ ६९॥ श्रुतिगुरुवाक्यनिरूपण। ऐकतां अद्वैतश्रवण। युक्तिप्रयुक्तीं पर्यालोचन। मनन गुण त्या नांव॥ ९७०॥ अग्निकापुरां भेटी होतां। तो अग्नीचि होय वस्तुतां। तेवीं माझे स्वरूपीं मन ठेवितां। मन चित्स्वरूपता पावलें॥ ७१॥ मनचिदंशें असे जाण। तें चिन्मात्र जाहलें करितां मनन। जेवीं जीवनीं जन्मलें लवण। तें होय जीवन निजमिळणीं॥ ७२॥ असो मननाचेनि लवलाहें। मन जेथवरी जावों पाहे। तेथवरी तया मीचि आहें। न वचतां राहें तेथही मी॥ ७३॥ दीप जेउता जाउं बैसे। तेउता प्रकाशचि तया असे। कोठेंही नवचोनि ठायीं वसे। तेथेंही वसे प्रकाशू॥ ७४॥ तैसें माझें करितां मनन। मद्रूपचि जाहलें मन। मग करितां गमनागमन। मद्रूपता जाण मोडेना॥ ७५॥ एवं माझें स्वरूप जें केवळ। तेथें मद्रूपें मननिश्चळ। ध्रुवाचे परी अचंचळ। मननशीळ त्या नांव॥ ७६॥ मुनि या पदाचें व्याख्यान। मननशीलता जाण। हें अठारावें लक्षण। तें हें निरूपण सांगितलें॥ ७७॥ अत्यंत गोड निरूपण। पुढिले श्लोकीं दशलक्षण। तें ऐकावया उद्धव सावधान। सर्वांगीं कान होऊनि ठेला॥ ७८॥
अप्रमत्तो गभीरात्मा धृतिमाञ्जितषड्गुण:।
अमानी मानद: कल्पो मैत्र: कारुणिक: कवि:॥ ३१॥
जंववरी वृत्तिशून्य नव्हे मन। तंववरी विश्वासेना विचक्षण। वृत्तिरूपें सिंतरील मन। यालागीं सावधान निजबोधें॥ ७९॥ हां हो दुर्वासाऐसा सज्ञान। त्यासी क्षणक्षणा क्षोभवी मन। न विचारितां गुणागुण। शाप दारुण देवों धांवे॥ ९८०॥ दुर्गंधा जन्मली मत्स्याचे पोटीं। पराशर नाडला तीसाठीं। नारद कौतुक पाहतां दिठीं। केला गंगातटीं नारदी॥ ८१॥ आपुली कन्या देखोनि गोमटी। मनक्षोभें भोगावया उठी। ब्रह्म धांवे सरस्वतीपाठीं। जो कां सृष्टिपितामहो॥ ८२॥ या मनाऐसें नाडक। जगामाजीं नाहीं आणिक। छळछद्में नाडी ज्ञाते लोक। साधु घातक मनाचे॥ ८३॥ म्हणाल मनेंवीण भोग घडे। तरी वृत्तीसी क्षोभु कां पां चढे। हे बोल बोलती ते सज्ञान वेडे। साधूसी नावडे हे गोष्टी॥ ८४॥ अधिष्ठूनि सत्त्वगुण। सूक्ष्मरूपें वृत्ति जाण। ते क्षोभवूनियां मन। मी मुक्त म्हणोनविषयी करी॥ ८५॥ मुक्ताभिमानें विषयासक्ती। हेचि मनक्षोभाची प्राप्ती। वृत्ति असोनियां मुक्ती। साधु न मानिती सर्वथा॥ ८६॥ अतिनाटकी नाटक मन। मुक्तत्वें धरी अभिमान। त्याचें करावया निर्दळण। साधु सावधान निजबोधें॥ ८७॥ मुखीं धरिल्या कृष्णसर्पासी। ढिलें करितां तो तत्काल ग्रासी। मरे तंववरी आंवळावें त्यासी। तेवीं मनासी निर्दाळिती॥ ८८॥ मन निर्दाळावे सावधानता। बोलिली ते हे साधुलक्षणता। हा एकुणिसावा गुण सर्वथा। ऐक आतां विसावा॥ ८९॥ वर्षाकाळीं जळबळें सरिता। आल्या समुद्र नुचंबळे श्लाघ्यता। उष्णकाळीं त्या न येतां। क्षोभोनि सर्वथा आटेना॥ ९९०॥ तैसें जाहलिया समृद्धिधन। साधूचें उल्हासेना मन। सकळ जाऊनि जाल्या निर्धन। दीनवदन हों नेणे॥ ९१॥ दिवसराती येतांजातां। प्रकाशें पालटेना सविता। तेवीं आल्यागेल्या नाना अवस्था। गंभीरता अक्षोभ्य॥ ९२॥ कडकडीत विजेचे कल्लोळ। तेणें गगनासी नव्हे खळबळ। तैसा नाना ऊर्मींमाजीं निश्चळ। गांभीर्य केवळ त्या नांव॥ ९३॥ हे संताची गंभीरता। विसांवा जीवशिवांसी तत्त्वतां। हे विसावी संताची अवस्था। धृतीची व्यवस्था अवधारीं॥ ९४॥ मनबुद्धॺादि इंद्रियें प्राण। निजधैर्यें धरोनि आपण। नित्य केलिया आत्मप्रवण। परतोनि जाण येवों नेदी॥ ९५॥ स्वयंवरीं जिणोनि अरिरायासी। बळें आणिलें नोवरीसी। तो जाऊं नेदी आणिकापाशीं। तेवीं वृत्तीसी निजधैर्य॥ ९६॥ वागुरें बांधिल्या मृगासी। पारधी जाऊं नेदी त्या वनासी। तेवीं धैर्यें आकळूनि मनासी। देहापाशीं येऊं नेदी॥ ९७॥ देहासी नाना भोगसमृद्धी। वावूनियां गजस्कंधीं। ऐसें सुखहोतां त्रिशुद्धी। मनासी देहबुद्धी धरूं नेदी॥ ९८॥ प्रळयकाळाच्या कडकडाटीं। महाभूतां होतां आटाटी। तरी मनासी देहाची भेटी। धैर्यें जगजेठी होंचि नेदी॥ ९९॥ तेथ काळाचेनि हटतटें। वृत्ति परब्रह्माचिये वाटे। लावूनियां नेटेंपाटें। चिन्मात्रपेठे विकिली॥ १०००॥ तेथ स्वानंदाचाग्राहकु। तत्काळ भेटला नेटकु। त्यासी जीवेंसहित विवेकु। घालूनि आंखू संवसाटी केली॥ १॥या नांव धृतीचें लक्षण। हा एकविसावा साधूचा गुण। आतां जिंतिले जे षड्गुण। तेंही लक्षण अवधारीं॥ २॥ स्वानंदें तृप्त जाला। यालागीं क्षुधेसी मुकला। जगाचे जीवनीं निवाला। तृषा विसरला नि:शेष॥ ३॥ भोगितां निजात्मसुख। विसरला शोकदु:ख। चिन्मात्रज्ञानें निष्टंक। त्यासंमुख मोहोन ये॥ ४॥ तिहीं अवस्थांबाहिरा। वसिन्नला निजबोधवोंवरा। तेथें जरा जाली अतिजर्जरा। कांपत थरथरां पळाली॥ ५॥ मिथ्या जाहलें कार्यकारण। देहाचें देहपणें न देखे भान। तंव मरणासीचिआलें मरण। काळाचें प्राशन तेणें केलें॥ ६॥ यापरी गा हे षड्गुण। अनायासें जिंतोन। सुखेंवर्तती साधुजन। हें लक्षण बाविसावें॥ ७॥ आपुला स्वामी देखे सर्वां भूतीं। तेथें मान इच्छावा कवणाप्रती। मानाभिमान सांडिले निश्चितीं। अतिनम्र वृत्तीं वर्तणें॥ ८॥ आधीं देहीं धरावा अभिमान। मग इच्छावा अतिसन्मान। तंव देहाचें खुंटलें भान। मानाभिमान बुडाले॥ ९॥ या नांव गा अमानिता। हे तेविसावी लक्षंणता। साधु सन्मानाचा दाता। तेही कथा अवधारीं॥ १०१०॥ ब्रह्मादि मशकवरी। सर्वांतें वंदी शिरीं। एकनिष्ठता चराचरीं। बुद्धि दुसरी जाणेना॥ ११॥ सर्व भूतीं स्वामी देखे। लोटांगणें घाली हरिखें। सुर नर खर हे नोळखे। अतिसंतोखें वंदित॥ १२॥ नानाअलंकार घडिले गुणें। सोनें सोनेपणा नव्हेच उणें। तेवीं नामरूपांचे विंदाणें। पालटु मनें घेऊं नेणे॥ १३॥ साकरेची निंबोळी केली। परी ते कडूपणा नाहीं आली। तेवीं सूकरादि योनी जरी जाली। तरी नाहीं भंगली चित्सत्ता॥ १४॥ सागरीं नाना परींचे विक्राळ। जरी उठिले अनंत कल्लोळ। ते जेवीं गा केवळ जळ। तेवीं वस्तु सकळ भूतमात्रीं॥ १५॥ यापरी सकळ भूतां। साधु सन्मानातें देता। हे चोविसावी लक्षणता। परबोधकता ते ऐक॥ १६॥ जैसा भावो जैशी श्रद्धा। तैसतैशाकरूं जाणे बोधा। ज्ञान पावोनि नव्हे मेधा। स्वरूपश्रद्धा प्रबोधी॥ १७॥ एक ज्ञान पावोनि जाहला पिसा। पडिला अव्यवस्थ ठसा। नोळखेचि सच्छिष्याची दशा। योग्य उपदेशा तो नव्हे॥ १८॥ एक ज्ञानआश्चर्यें कोंदला। विस्मयें तटस्थ होऊनि ठेला। काष्ठलोष्टांचेपरी पडला। नाहीं उरला उपदेश॥ १९॥ एक ज्ञान पावोनि अतिकृपण। जीव गेलिया न बोले जाण। भेणेंभेणें धरोनि मौन। न बोले वचन सर्वथा॥ १०२०॥ ज्यासी धनकोडी जोडी जाहली। ते पुरूनि वरी दगड घाली। दान न देतां वृथा गेली। संपत्ति केली भूमिसवती॥ २१॥ तैसें कष्टीं जोडूनि निजज्ञान। सत्पात्रीं न करीच दान। हें ज्ञात्याचें कृपणलक्षण। वंचकपण स्वभावें॥ २२॥ एक ज्ञान पावोनि सांगों जाये। उपदेशीं शिष्या बोधू नोहे। तें ज्ञान अबीज जाहलें पाहें। अंकुरां न लाहे सत्क्षेत्रीं॥ २३॥ सधन शिष्य करावया जाण। स्वयें प्रयत्न करी पूर्ण। आमुची दीक्षा अनुभव गहन। यापरी ज्ञान विकरां घाली॥ २४॥ जैसेनि प्रलोभे त्याचें मन। तैसें निरूपी निरूपण। अर्थस्वार्थें उपदेश पूर्ण। धनलोभें ज्ञान निर्वीर्य होये॥ २५॥ पेंवीं रिघालिया पाणी। त्या धान्याची नव्हे पेरणी। तेवीं धनलोभ रिघालिया ज्ञानीं। उपदेशें कोणी सुखी नव्हे॥ २६॥ शिष्य बोधेंवीण झुरे अंतरीं। गुरु गुरुपणें गुरगुरी। ते बोधकता नव्हे खरी। घरच्या घरीं चुकामुकी॥ २७॥ शब्दज्ञानें पारंगत। जो ब्रह्मानंदें सदा डुल्लत। शिष्यप्रबोधनीं समर्थ। तो मूर्तिमंत स्वरूप माझें॥ २८॥ हो कां मी जैसा अवतारधारी। तैसाचि तोही अवतारी। चिद्रत्नाच्या अलंकारीं। अलंकारी कुसरीं सच्छिष्यां॥ २९॥ तो मी या शब्दकुसरीं। नांवाचीं अंतरें बाहेरीं। आंतुवटें निजनिर्धारीं। एके घरीं नांदत॥ १०३०॥ एकचि बहुतांतें उपदेशी। एकाची प्राप्ती सुटंक कैशी। एकें अज्ञानें जैशीं तैशीं। हा बोलू कोणासी म्हणाल॥ ३१॥ कृषीवळ पेरणी करी। भूमिपाडें पिकती घुमरी। अंकुरेना क्षितितळीं उखरीं। तें बीज निर्धारीं अतिशुद्ध॥ ३२॥ भूमिचिसखर-निखर। बीज पावन गा साचार। भाविकीं उपदेशा विस्तर। विकल्पी नर सुनाट॥ ३३॥ जो जैसा देखे अर्थ। तोचि बोधूनि करी परमार्थ। ऐसा परबोधनीं समर्थ। गुण विख्यात पंचविसावा॥ ३४॥ साधुची मैत्री चोखट। वोळखी सर्वांसी जुनाट। सर्वांचा सखा श्रेष्ठ। सर्वांसी सकट सारिखा॥ ३५॥ सुहृद सर्वांचा सोयरा। सर्वांचा जिवलगु खरा। होऊनि सर्वांही बाहिरा। मित्राचारा चालवी॥ ३६॥ सांगतां आपुली गुह्य गोष्टी। अळोंचावया वेगळा नुठी। आप्तभावें देखे सृष्टी। अवंचक पोटीं सर्वांसी॥ ३७॥ क्षीरनीरांची मैत्री जैशी। भेद नाहीं मिळणीपाशीं। साधू सर्व जीव समरसी। अभेदभावेंसीं मित्रत्वें॥ ३८॥ परम मैत्रीचा भावो देख। दु:ख हिरोनि द्यावें सुख। साधू जीवांचें निरसोनि दु:ख। परम सुख देतसे॥ ३९॥ नवल मैत्रींचें महिमान। सखा सर्वांचा पुरातन। सर्वांसीनीच नवें सौजन्य। अवंचकपण सर्वदा॥ १०४०॥ बंधूहूनि मित्र अधिकु। पुत्राहूनि विश्वासिकु। तो मित्र जैं जाहला वंचकु। तैं केवळ ठकु तो जाणावां॥ ४१॥ मनें धनें कर्तव्यता। ज्याची अनन्य अवंचकता। त्या नांव परम मित्रता। हे खूण तत्त्वतां जाणावी॥ ४२॥ समूळ मैत्रीचें निरूपण। विशद सांगितलें जाण। हें सव्विसावें साधुलक्षण। कारुण्यपण तें ऐका॥ ४३॥ प्रत्युपकार न वांछितां। मी कारुणिक हे नाहीं अहंता। ऐसेनि दीनदु:ख निवारितां। कारुण्य सर्वथा त्यानांव॥ ४४॥ रसपूजा धरोनि पोटीं। वैद्य वोखदांच्या सोडी गांठी। कां संभावना सूनि दिठी। सांगे गोठी पुराणिक॥ ४५॥ ऐसी वर्तणूक सर्वथा। ते लागली विषयस्वार्था। साधूची नव्हे तैशी कथा। नैराश्यता दयाळू॥ ४६॥ दयार्णवें द्रवली दृष्टी। तनु मन धन वेंचूनि गांठी। अनाथावरी करुणामोठी। उद्धरी संकटीं दीनातें॥ ४७॥ जैसा कळवळा निजस्वार्था। त्याहून अधिक अनाथभूतां। तिये नांव परम कारुणिकता। जाण तत्त्वतां उद्धवा॥ ४८॥ हें सत्ताविसावें लक्षण। साधूचें जाण संपूर्ण। कविपदाचें व्याख्यान। सावधान अवधारीं॥ ४८॥ वेदशास्त्रांचा मथितार्थ। जाला करतळामळकवत। तैसाच ब्रह्मानंदें डुल्लत। कवि निश्चित या नांव॥ १०५०॥ उपनिषदांचामथितार्थ। ज्याच्या मुखाची वास पहात। परोक्षापरोक्ष ज्याचेनि सत्य। कवि विख्यात त्या नांव॥ ५१॥ कवि या पदाचे व्याख्यानें। झालीं अठ्ठावीस लक्षणें। उरलीं दोनी अतिगहनें। तें दों श्लोकींश्रीकृष्णें आदरिलें सांगों॥ ५२॥
आज्ञायैवं गुणान् दोषान् मयादिष्टानपि स्वकान्।
धर्मान् सन्त्यज्य य: सर्वान् मां भजेत स सत्तम:॥ ३२॥
प्रपंचनगरासभोंवतीं। कर्मनदीची महाख्याती। तिचेनि जळें जीव वर्तती। उत्पत्तिस्थिति अरतीरीं॥ ५३॥ ते नदीचेनि जीवनमेळें। कर्मासी येती कर्मफळें। स्वर्गनरकादि सोहळे। तेणें जळबळें भोगिती॥ ५४। प्रपंचनगरींहूनि निघतां। वेगें परमार्थासी येतां। जो तो कर्मनदीआंतौता। बुडे सर्वथा निर्बुजला॥ ५५॥ एक तरलों ऐसें ज्ञाते म्हणती। तेही कर्मीं कर्मगुचकिया खाती। स्वयें बुडोनि आणिकां बुडविती। तरलों म्हणती तोंडाळ॥ ५६॥ ऐसे बुडाले नेणों किती। बुडतां शिकवण तेचि देती। कर्मचि उपावो तरणोपायप्राप्ती। म्हणोनि बुडविती सर्वांतें॥ ५७॥ ‘न कर्मणा’ हें वेदवचन। कर्में नव्हे ब्रह्मज्ञान। तें न मानिती कर्मठ जन। त्यांसी कर्माभिमान कर्माचा॥ ५८॥ कर्म देहाचे माथां पूर्ण। तो न सांडितां देहाभिमान। कर्माचा त्याग नव्हे जाण। कर्मबंधन देहबुद्धी॥ ५९॥ एक अरतीरीं असती नष्ट। तरलों म्हणती अकर्मनिष्ठ। स्वकर्मत्यागी कर्मभ्रष्ट। जाण पापिष्ठपाषांडी॥ १०६०॥ ये कर्मनदीतें तरला। ऐसा न देखों दादुला। बुडाल्या धुराचि मुदला। पाडु केतुला इतरांचा॥ ६१॥ ये कर्मनदीची उत्पत्ती। मजचिपासोनि निश्चितीं। तेही सांगेन तुजप्रती। यथानिगुती निजबोधें॥ ६२॥ ‘आज्ञायैवं’ हें मुळींचें मूळ। श्लोकींचें प्रथम पद केवळ। येणेंचि कर्मनदी झाली स्थूळ। करूनि विवळ सांगत॥ ६३॥ मदाज्ञा मेघगंभीरा। नि:श्वसितपवनद्वारा। चतुर्वेदविधीच्याधारा। अतिअनिवारा वर्षले॥ ६४॥ तेणें कर्मनदी आंतौतें। अनिवार उलथलें भरतें। पूर दाटला जेथींचा तेथें। उतार कोणातें कळेना॥ ६५॥ तेथ गुणदोषांचा वळसा। विधिनिषेधांचा धारसा। कर्माकर्मांचा आवर्तं कैसा। सबाह्य सरिसा भंवतसे॥ ६६॥ संकल्पविकल्पांचे हुडे। नदी दाटली चहूंकडे। तरों जाय तो गुंतोनि बुडे। पाऊल पुढें न घालवे॥ ६७॥ प्रत्यवायाची मगरमिठी। पडल्या सगळेंचि घाली पोटीं। उगळोनि न सोडी संकटी। ने उठाउठीं अधोगती॥ ६८॥ अंगविकळतेचे मासे। तळपताती घ्यावया आविसें। कर्मठतेचे कमठ कैसे। खडक तैसे निबर॥ ६९॥ काळविक्षेपसर्पासी। एक सांपडले विलास आळशीं। विकल उच्चार चोंढियेसी। एक व्यग्रतेसीं बुडाले॥ १०७०॥ एक तरावयाच्या आशा। पडिले कर्माच्या धारसां। ते विधिनिषेधवळसां। पडिले सहसा नुगंडती॥ ७१॥ एक स्वकर्मधारीं। पडोनि वाहावले दूरी। ते सत्यलोकमगरीं। आपुल्या विवरीं सूदले॥ ७२॥ एकां न वचवेचि परतटीं। माझारींचि फळें गोमटीं। देखोनि धांविन्नले अव्हाटीं। ते स्वर्गसंकटीं गुंतले॥ ७३॥ आम्ही तरों युक्तिबळें। म्हणोनि रिघाले एके वेळे। ते अहंकारखळाळें। महातिमिंगिळें मिळिले॥ ७४॥ एकीं वेदत्रयाची पेटी। दीक्षेची दोरी बांधली पोटीं। ते स्वर्गांगनाकुचकपाटीं। गुंतोनि शेवटीं बुडाले॥ ७५॥ मंत्रतंत्रादिदीक्षितें। गुंतोनि बुडालीं जेथींच्या तेथें। कर्मनदीच्या परपारातें। कोणीपावतें दिसेना॥ ७६॥ विरळा कोणीएक सभाग्य येथें। हे सकळ उपाय सांडूनि परते। जो अनन्य प्रीतीं भजे मातें। कर्मनदी त्यातें कोरडी॥ ७७॥ माझे भक्तीचें तारूं नातुडे। जंव सप्रेमाचें शीड न चढे। तंव तरणोपाय बापुडे। वृथा कां वेडे शिणताती॥ ७८॥ धरूनि अनन्यभक्तीचा मार्गु। करूनि सर्वधर्मकर्मत्यागु। हा तरणोपाय चांगु। येरु तो व्यंगु अध:पाती॥ ७९॥ नेणोनिस्वधर्मकर्मांतें। कां नास्तिक्य मानूनि चित्तें। किंवा धरोनियां आळसातें। त्यागी कर्मातें तैसा नव्हे॥ १०८०॥ अथवा शरीरक्लेशाभेण। किंवा सर्वथा उबगोन। कां धरोनि ज्ञानाभिमान। स्वकर्म जाण सांडीना॥ ८१॥ माझी वेदरूप आज्ञा शुद्ध। ते वेदविवंचना विशद। स्वधर्मकर्मांचे कर्मवाद। अतिअविरुद्ध जाणता॥ ८२॥ स्वधर्माचा उत्तम गुण। प्रत्यवायें अध:पतन। या दोहींतें जाणोन। मद्भक्तीसी प्राण विकिला॥ ८३॥ विसरोनि आन आठवण। अखंडता हरिस्मरण। त्या नांव भक्तीसी विकिला प्राण। इतर भजन आनुमानिक॥ ८४॥ माझेनि भजनप्रेमें जाण। विसरला कर्माची आठवण। कर्म बापुडें रंक कोण। बाधक जाण नव्हे भक्तां॥ ८५॥ सप्रेम करितां भजनविधी। सर्व कर्मांतें विसरली बुद्धी। ते जाणावी भजनसमाधी। तेथ कर्म त्रिशुद्धी बाधेना॥ ८६॥ ज्याची श्रद्धा कर्मावरी। तोचि कर्माचा अधिकारी। ज्याची श्रद्धा श्रीधरीं। तो नव्हे अधिकारी कर्माचा॥ ८७॥ जो जीवेंप्राणें भक्तीसी विकिला। तो तेव्हांचि कर्मावेगळा जाला। त्याच्या भावार्था मी विकिला। तो कर्मीं बांधला केवीं जाये॥ ८८॥ गुणदोषांची जननी। ते नि:शेष अविद्या निरसूनी। जो प्रवर्तला माझे भजनीं। तो साधु मी मानीं मस्तकीं॥ ८९॥ निजकल्पना जे देहीं। तेचि मुख्यत्वें अविद्या पाहीं। ते कल्पना निमालिया ठायीं। जगीं अविद्या नाहीं निश्चित॥ १०९०॥ अविद्येच्या त्यागासवें। धर्माधर्मादि आघवें। न त्यजितांचि स्वभावें। त्याग फावे अनायासें॥ ९१॥ शिरतुटलियापाठीं। शरीर निजकर्मासी नुठी। तेवीं अविद्या त्यागितां शेवटीं। त्यजिले उठाउठीं सर्व धर्म॥ ९२॥ दिवसा चंद्रउदयो पाहे। तो झाला तैसा नाहीं होये। तेवीं अविद्येचेनि विलयें। सर्व धर्म लाहे ते दशा॥ ९३॥ खद्योत सूर्योदयापाठीं। शोघूनि पाहतां न ये दिठीं। तेवीं अविद्येच्या शेवटीं। धर्माधर्मकोटी मावळल्या॥ ९४॥ ग्रहगण नक्षत्रमाळा। खद्योततेजउमाळा। रात्रीसकट बोळवण सकळां। तेवीं धर्माधर्मकळा। अविद्येसवें॥ ९५॥ सर्व धर्मत्यागाची खूण। उद्धवा मुख्यत्वें हेचि जाण। याहीवरी माझें भजन। मुख्य भागवतपण या नांव॥ ९६॥ म्हणसी अविद्याचि केवीं नासे। मा अधर्म नासती ती सरिसे। ते अविद्या नाशे अनायासें। भक्तिउल्हासें माझेनि॥ ९७॥ सूर्योदय देखतां दृष्टीं। सचंद्र नक्षत्रांची मावळे सृष्टी। तेवीं माझ्या भक्तिउल्हासापाठीं। अविद्याउठाउठीं निमाली॥ ९८॥ अविद्येच्या नाशासवें। नासती धर्माधर्म आघवे। जेवीं गरोदर मारितां जीवें। गर्भही ती सवें निमाला॥ ९९॥ जेव्हां माझे भक्तीचा उल्हासू। तेव्हांचि अविद्येचा निरासू। अविद्ये सवें होय नाशू। अनायासू सर्व धर्मां॥ ११००॥ ते तूं भक्ति म्हणसी कोण। जिचें मागां केलें निरूपण। ते माझी चौथी भक्ति जाण। अविद्यानिरसन तिचेनि॥ १॥ येर आर्त जिज्ञासु अर्थार्थी। जे जे भक्तींतें आदरिती। ते अविद्यायुक्त निश्चितीं। चौथी भक्ति मुख्यत्वें माझी॥ २॥ जे भक्तीमाजीं कंहीं। अविद्येचा विटाळू नाहीं। भजन तरी ठायींच्या ठायीं। अनायासें पाहीं होतसे॥ ३॥ ते माझी आवडती भक्ती। उद्धवा जाण निश्चितीं। जिसी अविद्या असे धाकती। सर्व धर्म कांपती सर्वदा॥ ४॥ ते भक्तीची देखोनि गुढी। अविद्या धाकेंचि प्राण सांडी। सर्व धर्मांची आवडी। घायेंवीण बापुडी निमाली॥ ५॥ हा मद्भक्तीचा पर्यावो। आवडीच्या गोडिया सांगे देवो। ऐक भक्ताचा भजनभावो। जेणें निर्वाहो भक्तीचा॥ ६॥ माझेनि अनुसंधानेंवीण। स्नान संध्या जप होम दान। ते अवघेचि अधर्म जाण। मद्भजन तें नव्हे॥ ७॥ गोडी आवडी ते परपुरुषीं। मिथ्या लुडबुडी निजपतीपाशीं। ते पतिव्रता नव्हे जैशी। जाण भक्ति तैशी व्यभिचारी॥ ८॥ नाना विषयीं ठेवूनि मन। जो करीध्यान अनुष्ठान। ते जारस्त्रिेयेच्या ऐसें जाण। नव्हे पावन ते भक्ती॥ ९॥ काया वाचा मनसा। माझे भक्तीचा पडला ठसा। भजतां नाठवे दिवसनिशा। भक्तीची दशा या नांव॥ १११०॥ जपेंवीणनाम वदनीं। धारणेवीण ध्यान मनीं। संकल्पेंवीण मदर्पणीं। सर्व कर्में करूनी सर्वदा॥ ११॥ निरोधेंवीण वायुरोधू। मर्यादेवीण स्वरूपबोधू। विषयेंवीण सदा स्वानंदू। मद्भक्त शुद्धू या नांव॥ १२॥ भक्त म्हणवितां गोड वाटे। परी भजनमार्गीं हृदय फुटे। अकृत्रिम भक्ति जैं उमजे। तैं मी भेटें उद्धवा॥ १३॥ ऐसेनि भजनें जो भजत। तो मजमाजीं मी त्याआंत। भक्तांमाजीं जो उत्तम भक्त। साधु निश्चित या नांव॥ १४॥ तो पुरुषांमाजीं पुरुषोत्तम। साधूमाजीं अतिउत्तम। तो माझें विश्रामधाम। अकृत्रिम उद्धवा॥ १५॥ तयालागीं मी आपण। करीं सर्वांगाचें आंथरुण। जीवें सर्वस्वें निंबलोण। प्रतिपदीं जाण मी करीं॥ १६॥ तो मज आवडे म्हणशी कैसा। जीवासी पढिये प्राण जैसा। सांगतां उत्तमभक्तदशा। प्रेमपिसा देवो जाला॥ १७॥ मग न धरतु न सांवरतु। उद्धवासी कडिये घेतु। भुलला स्वानंदें नाचतु। विस्मयें स्फुंदतु उद्धवू॥ १८॥ मी एकु देवो हा एकु भक्तु। हेंही विसरला श्रीकृष्णनाथु। हा देवो मी एकु भक्तु। तें उद्धवाआंतु नुरेचि॥ १९॥ ऐशा भक्तिसाम्राज्यपटीं। दोघां पडली ऐक्यगांठी। तंव देवोचि कळवळला पोटीं। निजभक्तगोठी सांगावया॥ ११२०॥ ऐशी उत्तम भक्तांची कथा। अतिशयें आवडे कृष्णनाथा। रुचलेपणें तत्त्वतां। मागुतां मागुतां सांगतू॥ २१॥ श्लोकीं प्रमेयें दिसतां अनेगें। तें श्रीकृष्णें सांडूनि मागें। हा ग्रंथार्थु श्रीरंगे। साक्षेपें स्वांगें लिहविला॥ २२॥ हे माझे युक्तीची कथा। नव्हे नव्हे जी सर्वथा। सत्य मानावें श्रोतां। ये अर्थींचा वक्ता श्रीकृष्ण॥ २३॥ श्रोतां व्हावें सावधान। मागील कथा अनुसंधान। दोघां पडिलें होतें आलिंगन। विस्मयें पूर्ण उद्धवू॥ २४॥ चढत प्रेमाचें भरतें। तें आवरोनि कृष्णनाथें। थापटूनि उद्धवातें। सावध त्यातें करी हरी॥ २५॥ उद्धवातें म्हणे तत्त्वतां। तुज आवडली भक्तिकथा। तेचि मी सांगेन आतां। सावधानता अवधारीं॥ २६॥ एक जाणोनि भजती मातें। एक ते केवळ भावार्थें। मी दोहींच्या भुललों भावातें। दोघे मातें पढियंते॥ २७॥
ज्ञात्वाज्ञात्वाथ ये वै मां यावान् यश्चास्मि यादृश:।
भजन्त्यनन्यभावेन ते मे भक्ततमा मता:॥ ३३॥
मी स्वस्वरूपी सच्चिदानंद। जगदांदि आनंदकंद। नित्य सिद्ध परम शुद्ध। माझें स्वरूपविशद जाणती॥ २८॥ देश काळ वर्तमान। सर्वीं सर्वदा अनवच्छिन्न। सर्वात्मा सच्चिदानंदघन। भेदशून्य मी एक॥ २९॥ सत्य ज्ञान अनंत। परब्रह्म मी निश्चित। ऐसें जाणूनि मज भजत। उत्तम भागवत ते जाण॥ ११३०॥ शुद्ध झालिया स्वरूपप्राप्ती। म्हणशी भजन कैशा रीतीं। देवभक्ततेचि ते होती। मी होऊन भजती मजमाजीं॥ ३१॥ वाम सव्य दोनी भाग। दों नांवीं एकचि अंग। तेवीं देवभक्तविभाग। मद्रूपीं सांग भासती॥ ३२॥ पाहें पां लोखंडाचा आरिसा। लोखंडेंचि घडिजे जैसा। लोखंडेंचि उजळे कैसा। स्वप्रकाशा निजतेजें॥ ३३॥ दर्पण उजळलिया पाहीं। शशी सूर्य गगन मही। बिंबलीं धरी आपुल्या ठायीं। अप्रयासें पाहीं स्वलीला॥ ३४॥ तैसें मी होऊनि माझे भक्त। अनन्यभावें मजचि भजत। तैं माझें ऐश्वर्य समस्त। प्रतिबिंबत तयांमाजीं॥ ३५॥ हो कां तरंगु जैसा सागरीं। त्यासी जळचि तळींवरी। तैसा माझा भक्त मजमाझारीं। सबाह्याभ्यंतरीं मद्रूप॥ ३६॥ जैसा सुवर्णाचा नरहरी। सुवर्णहिरण्यकशिपूतें विदारी। सुवर्णप्रल्हाद पोटींसी धरी। तैशी परी मद्भजना॥ ३७॥ तेथें सगुण आणि निर्गुण। उभय रूपें मीचि जाण। जैसें सुवर्ण आणि कंकण। तैसें अभिन्न जाण मद्रूप॥ ३८॥ तेथ जें जें दृश्य देखे दृष्टीं। तेथ मद्रूपें पडे मिठी। दृश्य द्रष्टा लोपूनि त्रिपुटी। उठाउठी मज मिळे॥ ३९॥ ऐसें जाणोनियां मज भजत। ते जाण पां उत्तमभक्त। ऐसें नेणोनियां मज भजत। भोळे भक्त ते माझे॥ ११४०॥ नाहीं श्रुतीचें पठण। नाहीं वेदांतशास्त्रश्रवण। नाहीं विकल्पलक्षण। अनन्य जाण भावार्थीं॥ ४१॥ सगुण निर्गुण नेणेकांहीं। परी देवो आहे म्हणे हृदयीं। जडत्व असे देहाच्या ठायीं। तें देवो पाहीं वागवीत॥ ४२॥ यालागीं देहाचें जें चळण। तें हृदयस्थ करवी नारायण। दृष्टीचें जें देखणेपण। त्याचेनि जाण होतसे॥ ४३॥ काढूनि आपुला डोळा। दूरी ठेविला वेगळा। तो हृदयस्थेंवीण आंधळा। देखणीकळा देवाची॥ ४४॥ रसना केवळ चामडी। ते काय जाणे रसगोडी। कापूनि टाकिल्या बापुडी। गोडी अगोडी ते नेणे॥ ४५॥ रसनाद्वारें रसस्वादू। घेता हृदयस्थ परमानंदू। बुद्धीसी करिता उद्बोधू। सत्य गोविंदू हृदयींचा॥ ४६॥ मनाचें गमनागमन। दिसे हृदयस्थाआधीन। यालागीं दूरी जावोनिपरते मन। हृदयासी जाण येतसे॥ ४७॥ इंद्रियें प्रेरिता वारिता। हे सत्ता आधीन हृदयस्था। यालागीं नांवें हृषीकेशता। त्यासचि तत्त्वतां म्हणताती॥ ४८॥ एवं विचाराचा निर्वाहो। करितां निजहृदयींअसे देवो। तो पहावया बाहेरी धांवो। तैं मूर्ख पहा हो मी झालों॥ ४९॥ तीर्थीं क्षेत्रीं भेटेल देवो। हा आपुले हृदयींचा भावो। निजभावेंवीण पहा वो। तीर्थीही देवो असेना॥ ११५०॥ एवं देवो तो मजमाजीं आहे। त्याचेनि टवटवती इंद्रियें। क्रियाकर्म जें जें होये। तें त्याचेनि पाहें तत्त्वतां॥ ५१॥ देह तंव बापुडें। केवळ अचेतन मडें। त्याचेनि कर्म नुपजे फुडें। हें तंव कुडें सर्वथा॥ ५२॥ इंद्रियांचेनि चेतविता। कर्म क्रिया कर्तव्यता। देहाचेनि नोहे तत्त्वतां। मुख्यत्वें कर्ता हृदयस्थु॥ ५३॥ यापरी जे कांहीं कर्तव्यता। ते भोळेपणें नेघे माथां। सर्व कर्मांचा आत्मा कर्ता। विश्वासें सर्वथादृढ मानी॥ ५४॥ मग अन्नपानादि सेवितां। मानी आत्मारामु भोक्ता। सर्वकर्मकर्तव्यता। अहं कर्ता हें म्हणों नेणे॥ ५५॥ ऐसे भोळिवेचेनि समजें। माझें भजन निपजे वोजें। तें म्या आवडीं सेविजे। जाण तें माझें खाजुकें॥ ५६॥ सर्वभावें सर्वथा। बाळकांसी जेवीं माता। तेवीं माझिया भोळ्ॺा भक्तां। मी सर्वथा सर्वस्वें॥ ५७॥ धांवोनि मिठी घालावयासी। हितगुज आलोचासी। खाणें जेवणें विश्रांतीसी। जेवीं बाळकासी निजजननी॥ ५८॥ तेवीं माझिया भोळ्ॺा भक्तां। मीचि जाणजिवलग माता। अर्थ स्वार्थ परमार्थता। जाण तत्त्वतां मी त्यांसी॥ ५९॥ तोंडींचें पोटींचें गांठींचें। माता बाळकालागीं वेंचे। तेवीं भाविकांलागीं आमुचें। सर्वस्व साचें मी वेंची॥ ११६०॥ बाळक न मागतां धांवोनी। कळवळोनि माता लावी स्तनीं। तेवी भोळ्ॺा भक्तांलागुनी। मी अनुसंधानी लाविता॥ ६१॥ ज्येष्ठ कनिष्ठ पुत्रातें पिता। एकचि जाण प्रतिपाळिता। ज्येष्ठातें निग्रहो करिता। लळे पुरविता बाळकांचे॥ ६२॥ ज्येष्ठ वांकुडें बोलतां। तोंडावरी हाणे पिता। बाळक बोबडें बोलतां। संतोषे सर्वथा सर्वस्वें॥ ६३॥ सज्ञानासी अबद्ध पडतां। दोष वाजती त्याचे माथां। भोळ्ॺा भक्तांची अबद्ध कथा। तेणें देवो तत्त्वतां संतोषे॥ ६४॥ कर्माकर्मप्रत्यवायता। हे सज्ञानासीच सर्वथा। भोळ्ॺा भक्तांसी कर्मबाधकता। मी सर्वथा येऊं नेदीं॥ ६५॥ भोजनीं बैसतां बापासी। दूरी बैसवी ज्येष्ठ पुत्रासी। अंकी वाऊनि बाळकासी। तृप्ति निजग्रासीं देतुसे॥ ६६॥ तेथें जें जें गोड आपणासी। तें तें दे बाळकासी। न घेतां प्रार्थूनि त्यासी। तृप्तीच्या ग्रासीं जेववी॥ ६७॥ तेवीं साधनीं शिणतां सज्ञानासी। प्राप्ती होय अतिप्रयासीं। माझिया भोळ्ॺा भक्तांसी। मीच अनायासीं उद्धरीं॥ ६८॥ वाट चुकल्या भुयाळासी। फेरा पडे चालों जाणत्यासी। बाळक बापाचे कडियेसी। श्रमू तयासी येवों न शके॥ ६९॥ तेवीं ‘साधनी’ अंगविकळता। ते वाजे सज्ञानाचे माथां। भोळ्ॺा भक्तातें मी उद्धरिता। प्रयास सर्वथा त्या नाहीं॥ ११७०॥ त्यासी वाऊनि आपुल्या खांदीं। मी पाववीं सायुज्यसिद्धी। नवल त्याची भोळी बुद्धि। तेथही भजनविधी न सांडी॥ ७१॥ हृदयीं कपटाचा थारा। तोचि भजनासी आडवारा। करितां युक्तिप्रयुक्ती विचारा। विचाराबाहिरा मी त्यासी॥ ७२॥ नेणे आचारा विचारा। केवळ भावार्थी भोळा खरा। न धरत न सांवरत एकसरां। मजभीतरां तोपावे॥ ७३॥ देखोन भोळिवेच्या भक्तासी। मीचि सामोरा धांवें त्यासी। त्यापाशीं मी अहर्निशीं। भुललों भावासी सर्वथा॥ ७४॥ केवळ जे भोळे भक्त। ते भगवंतासी आवडत। सांगतां कृष्ण मिटकिया देत। लाळ घोटीत उद्धवू॥ ७५॥ मज भोळ्ॺा भक्तांची आवडी। काय सांगों त्यांची गोडी। त्यावेगळी अर्धघडी। कोडी परवडी नावडती॥ ७६॥ यापरीचे जे भोळे भक्त। ते मी मानीं उत्तम भागवत। त्यांच्या पायां मी लागें भगवंत। उत्तम निश्चित ते जाण॥ ७७॥ त्यांलागीं मी आर्तभूत। त्यांलागीं सदा सावचित्त। त्यांलागीं मी दशदिशा धांवत। भोळा भक्त दुर्लभ॥ ७८॥ उद्धवा काय सांगों गोठी। भोळा भक्त देखोनि दिठीं। मीही आपुलिये सवसाटी। उठाउठी घेतुसें॥ ७९॥ येऱ्हवीं मोल करितां जाण। मजहूनि माझे भक्त गहन। यालागीं मी त्यांअधीन। भक्तवचन नुल्लघीं॥ ११८०॥ भोळ्ॺा भक्तांचें वचन। माझेनि नुल्लंघवे जाण। देवकीवसुदेवाचीं आण। भावो प्रमाण भजनासी॥ ८१॥ वृथा घृतेंवीण भोजन। वृथा वंध्येचें मैथुन। वृथा भावेंवीण भजन। सत्य जाण उद्धवा॥ ८२॥ भावो तेथ भाग्य पहा हो। भावो तेथ मी नि:संदेहो। भावो तेथें प्रकटे देवो। निजस्वभावो स्वानंदें॥ ८३॥ भावो तेथ विरक्ती। भावो तेथ प्रकटे शांती। भावो तेथ माझी भक्ती। उल्हासती निजबोधें॥ ८४॥ एवं भाविकांमाजीं माझी भक्ति। मजसहित स्वानंदें नाचती। यालागीं भोळे जे भावार्थी। ते उत्तम होती भागवत॥ ८५॥ नेणते भक्त जे मातें भजती। ते मज पावले या रीतीं। सांगीतली ते म्यां व्युत्पत्ती। आतां उत्तम भक्ती अवधारीं॥ ८६॥
मल्लिङ्गमद्भक्तजनदर्शनस्पर्शनार्चनम्।
परिचर्या स्तुति: प्रह्वगुणकर्मानुकीर्तनम्॥ ३४॥
नाना अवतारअनुक्रमा। शैवी वैष्णवी अतिउत्तमा। शास्त्रोक्त माझ्या प्रतिमा। तीर्थक्षेत्रींमहिमा विशेष ज्यांचा॥ ८७॥ ज्या प्रतिमा देवीं प्रतिष्ठिलिया। ज्या नरकिन्नरीं संस्थापिलिया। ज्या स्वयें स्वयंभ प्रकटलिया। शास्त्रीं बोलिलिया गंडकी॥ ८८॥ एकी भक्तअनुग्रहें आल्या। आसुरी निशाचरीं ज्या केल्या। आपुलाल्या घरीं पूजिल्या। भक्तीं करविल्या त्रैवर्णिकीं॥ ८९॥ ऐशामाझ्या प्रतिमांची भेटी। पाहों धांवे उठाउठी। पूजा करावया पोटीं। आवडी मोठी उल्हासे॥ ११९०॥ माझें स्वरूप ते माझे भक्त। मी तेचि ते माझे संत। त्यांचे भेटीलागी आर्तभूत। जैसें कृपणाचें चित्त धनालागीं॥ ९१॥ माझ्या प्रतिमांहूनि अधिक। संतभजनीं अत्यंत हरिख। साधुसंगतीचें अतिसुख। सांडूनि देख घरदारां॥ ९२॥ चिंतामणीसी कीजे जतन। तैसी मर्यादा राखे सज्जन। नीच नवें अधिक भजन। न धाये मन पूजितां॥ ९३॥ सिद्ध करूनि पूजासंभार। माझे पूजेचा अत्यादर। पूजा करितां एकाग्र। जैं साधु नर घरा येती॥ ९४॥ त्या सांधूची पूजा न करितां। जो माझी पूजा करी सर्वथा। तेणें मज हाणितल्या लाता। कीं तो माझ्या घाता प्रवर्तला॥ ९५॥ बाळक एक एकुलता। त्यासी माथां हाणितल्या लाता। मग पाटोळाही नेसवितां। क्षोभली माता समजेना॥ ९६॥ तेवीं अवगणुनी माझिया संतां। मीचि क्षोभें मज पूजितां। ते सेवा नव्हे सर्वथा। अतिक्षोभकता मज केली॥ ९७॥ संत माझे लळेवाड। त्यांची पूजा मज लागे गोड। संतसेवकांचें मी पुरवीं कोड। मज निचाडा चाड संतांची॥ ९८॥ सांडूनि माझें पूजाध्यान। जो संतांसी घाली लोटांगण। कोटि यज्ञांचें फळ जाण। मदर्पण तेणें केलें॥ ९९॥ सकळ तीर्थी तोचि न्हाला। जपतपादिफळें तोचि लाहिला। सर्व पूजांचें सार तो पावला। जेणें साधू वंदिला सन्मानें॥ १२००॥ प्रतिमा माझ्या अचेतन व्यक्ती। संत सचेतन माझ्या मूर्ती। दृढ भावें केल्या त्यांची भक्ती। ते मज निश्चितीं पावली॥ १॥ प्रतिमा निजकल्पना उत्तम। संत प्रत्यक्ष पुरुषोत्तम। चालतें बोलतें परब्रह्म। अतिउत्तम साधुसेवा॥ २॥ माझ्या प्रतिमा आणि साधुनर। तेथें या रीतीं भजती तत्पर। हा तंव सांगीतलानिर्धार। भजनप्रकार तो ऐक॥ ३॥ प्रतिमा आणि साधु सोज्ज्वळे। आवडीं न पाहती ज्यांचे डोळे। दृष्टि असोनि ते आंधळे। जाण केवळें मोरपिसें॥ ४॥ जेवीं कां प्रिया पुत्र धन। देखोनियां सुखावती नयन। तैसें संतप्रतिमांचें दर्शन। आवडीं जाण जो करी॥ ५॥ अतिउल्हासें जें दर्शन। या नांव गा देखणेपण। तेणें सार्थक नयन जाण। दृष्टीचें भजन या रीतीं॥ ६॥ देखोनि संत माझीं रूपडीं। जो धांवोनियां लवडसवडी। खेंव देऊनियां आवडीं। मिठी न सोडी विस्मयें॥ ७॥ ऐसें संतांचें आलिंगन। तेणें सर्वांग होय पावन। कां मूर्तिस्पर्शें जाण। शरीर पावन होतसे॥ ८॥ तीर्थयात्रे न चालतां। संतांसमीप न वचतां। हरिरंगणीं न नाचतां। चरण सर्वथा निरर्थक॥ ९॥ जो कां नाना विषयस्वार्था। न लाजे नीचापुढें पिलंगतां। तो हरिरंगणीं नाच म्हणतां। आला सर्वथा उठवण्या॥ १२१०॥ तीर्थयात्रा क्षेत्रगमनता। हरिकीर्तना जागरणा जातां। संतसमागमें चालतां। कां नृत्य करितां हरिरंगीं॥ ११॥ या नांव गा सार्थक चरण। इतर संचार अधोगमन। चरणाचें पावनपण। या नांव जाण उद्धवा॥ १२॥ सर्वभावें अवंचन। कवडी धरूनि कोटी धन। जेणें केलें मदर्पण। माझें अर्चन या नांव॥ १३॥ धनधान्य वंचूनि गांठीं। माझी पूजा आहाच दृष्टीं। ते नव्हे अर्चन हातवटी। तो जाण कपटी मजसी पैं॥ १४॥ लोभें खावया आपण। ठेवी प्रतिमेपुढें पक्कान्न। अतीत आलिया न घाली अन्न। मदर्चन तें नव्हे॥ १५॥ कर पवित्र करितां पूजा। ते आवडती अधोक्षजा। जे न पूजिती गरुडध्वजा। त्या जाण भुजा प्रेताच्या॥ १६॥ न करितां हरिपूजनें। न देतां सत्पात्रीं दानें। जडित मुद्रा बाहुभूषणें। तें प्रेतासी लेणें लेवविलें॥ १७॥ वाचा सार्थक हरिकीर्तनें। कां अनिवार नामस्मरणें। जयजयकाराचेनि गर्जनें। केलीं त्रिभुवनें पावन॥ १८॥ रामनामाच्या गजरीं। सदा गर्जे ज्याची वैखरी। तेथ कळिकाळाची नुरे उरी। दुरि तें दूरी पळाली॥ १९॥ हरिनाम सांडूनि करंटीं। मिथ्या करिताती चावटी। जेवीं हागवणी पिटपिटी। तैशा गोठी जल्पती॥ १२२०॥ हरिनामाचा सुखसुरवाड। ज्याचे मुखीं लागला गोड। त्याचें मजपाशीं सरतें तोंड। मी अखंड त्याजवळी॥ २१॥ गद्यपद्यें स्तवनमाळा। नाना पदबंधाची कळा। छंदें कुसरीं विचित्र लीळा। स्तुति गोपाळा अर्पावी॥ २२॥ धैर्य स्थैर्य औदार्य। घनश्याम अतिसौंदर्य। शौर्य वीर्य अतिमाधुर्य। गुणगांभीर्य गोविंदू॥ २३॥ त्रिविक्रम उभा बळीच्या द्वारीं। द्वार न सांडूनि द्वारकरी। तेणें द्वारें द्वारकेभीतरीं। येऊनि उद्धरी कुशातें॥ २४॥ तो अद्यपि श्रीहरि। स्वयें उभा समुद्रतीरीं। शोभा विराजमान साजिरी। असुरसुरनरीं वंदिजे॥ २५॥ मत्स्य झाला तो सागरीं। वराह झाला नासिकद्वारीं। उपजला खांबा माझारीं। यशोदेघरीं पोसणा॥ २६॥ जरठपाठी झाला कमठू। बळिच्छळणीं तो खुजटू। वेदवादें अतिवाजटू। फुरफुराटू नि:श्वासें॥ २७॥ बाईलचोरीं नेली परदेशीं। तीलागीं रडे पडे वनवासीं। एकही गुण नाहीं त्यापाशीं। शेखीं दासी कुब्जेसीं रातला॥ २८॥ ‘स्तुतिगुणकर्मानुकीर्तन’। तें या नांव गा तूं जाण। ‘प्रह्व’ म्हणिजे तें नमन। तेंही व्याख्यान अवधारीं॥ २९॥ माझे प्रतिमांचें दर्शन। कां देखोनि संतजन। जो भावें घाली लोटांगण। देहाभिमान सांडूनि॥ १२३०॥ साधुजनांसी वंदितां। धणी न मनी जो चित्ता। पुन:पुन्हा चरणीं माथा। विनीततां अतिनम्र॥ ३१॥ भागवताचें रज:कण। जो मस्तकीं वंदीना आपण। तो जीवेंजीतां प्रेत जाण। अपवित्रपण तैसें तया॥ ३२॥ सांडूनि लौकिकाच्या लाजा। जो वैष्णवांच्या चरणरजा। गडबडां लोळे वोजा। हा भक्तीचा माझा उल्हास॥ ३३॥ या आवडीं करितां नमन। सहजें जाती मानाभिमान। हें मुख्य भक्तीचें लक्षण। जे मानाभिमान सांडावे॥ ३४॥ त्यजावया मानाभिमान। करावें मत्कीर्तनश्रवण। श्रवणादि भक्तीचें लक्षण। ऐक संपूर्ण उद्धवा॥ ३५॥
मत्कथाश्रवणे श्रद्धा मदनुध्यानमुद्धव।
सर्वलाभोपहरणं दास्येनात्मनिवेदनम्॥ ३५॥
दृढ आस्तिक्यें समाधान। शुद्ध श्रद्धा त्या नांव जाण। भावार्थें न डंडळी मन। कथाश्रवण सादरें॥ ३६॥ वक्त्याच्या वचनापाशीं। जडूनि घाली कानामनासी। श्रवणार्थ वाढवी बुद्धीसी। विकिला कथेसी भावार्थें॥ ३७॥ जेवीं दुधालागीं मांजर। संधी पहावया सादर। तेवीं सेवावया कथासार। निरंतर उल्हासु॥ ३८॥ जडित कुंडलेंमंडित कान। तें श्रवणासी नोहे मंडण। श्रवणासी श्रवण भूषण। श्रवणें श्रवण सार्थक॥ ३९॥ जरी स्वयें झाला व्याख्याता। पुराणपठणें पुरता। तरी साधुमुखें हरिकथा। ऐके सादरता अतिप्रीतीं॥ १२४०॥ श्रवणें श्रवणार्थीं सावधान। तोचि अर्थ करी मनन। संपल्या कथाव्याख्यान। मनीं मनन संपेना॥ ४१॥ ऐसें ठसावल्या मनन। सहजेंचि लागे माझें ध्यान। सगुण अथवा निर्गुण। आवडी प्रमाण ध्यानासी॥ ४२॥ तेथ ध्येय ध्यान ध्याता। तिहींसी एकी गांठी नसतां। तंवचिवरी ध्यानावस्था। जाण तत्त्वतां उद्धवा॥ ४३॥ ज्याच्या जीवीं ध्यानाची आवडी। ज्याच्या मनासी माझी गोडी। उद्धवा हे तैंचि जोडे जोडी। जैं जन्मकोडी निजभाग्यें॥ ४४॥ निष्काम करोनियां मन। जन्मजन्मांतरीं साधन। केलें असेल तैं माझे ध्यान। विश्वासें जाण दृढ लागे॥ ४५॥ दृढ लागल्या माझें ध्यान। अनन्यभावें माझें भजन। सर्व पदार्थेंसीं जाण। आत्मसमर्पण मज करी॥ ४६॥ वैदिक लौकिक दैहिक। या क्रियांचे लाभ देख। जरी झाल्या अलोकिक। भक्त भाविक तैं नेघे॥ ४७॥ वैदिक लाभ दिव्य सामग्री। स्वर्गादि सत्यलोकवरी। भक्त तेंही हातीं न धरी। भजन सुखें करी संतुष्ट॥ ४८॥ लौकिक लाभाची श्रेणी। कल्पतरु कामधेनु चिंतामणी। भक्त अर्पी कृष्णार्पणीं। हरिभजनीं संतुष्ट॥ ४९॥ दैहिक लाभाची थोरी। गजान्तलक्ष्मी आल्या घरीं। भक्त कृष्णार्पण करी। भजन सुखें करी संतुष्ट॥ १२५०॥ आविरिंच्यादि लाभ जाण। सर्वही मानोनियां गौण। माझे भक्तीसी विकिला प्राण। सर्व समर्पण मज करी॥ ५१॥ जेणें सेवेसी विकिला प्राण। तो वृथा जावों नेदी अर्ध क्षण। माझी कथा माझें ध्यान। महोत्साहो जाण माझाचि॥ ५२॥
मज्जन्मकर्मकथनं मम पर्वानुमोदनम्।
गीतताण्डववादित्रगोष्ठीभिर्मद्गृहोत्सव:॥ ३६॥
ध्यानावस्थें करी ध्यान। नातरी कथानिरूपण। अनुसंधानीं सावधान। रितें मन राहूं नेदी॥ ५३॥ माझीं जन्मकर्में निरूपितां। आवडी उल्हास थोर चित्ता। स्वेद रोमांच द्रवतां। सप्रेम कथा उल्हासे॥ ५४॥ ऐकूनि रहस्य हरिकथा। द्रव नुपजे ज्याचिया चित्ता। तो पाषाण जाणसर्वथा। जळीं असतां कोरडा॥ ५५॥ ऐक माझे भक्तीचें चिन्ह। माझ्या पर्वांचें अनुमोदन। करी करवी आपण। दीनोद्धरणउपावो॥ ५६॥ पर्वविशेष भागवतधर्मीं। नृसिंहजयंती रामनवमी। वामनजयंती जन्माष्टमी। उत्तमोत्तमीं शिवरात्र॥ ५७॥ वैष्णवांसी शिवरात्री विरुद्ध। हें बोलणें अतिअबद्ध। सकळ पुराणीं अविरुद्ध। व्यास विशुद्ध बोलिला॥ ५८॥ शिव श्याम तमोगुणी। तो शुद्ध झाला विष्णूच्या ध्यानीं। विष्णु श्याम शिवचिंतनीं। विनटले गुणीं येरयेरां॥ ५९॥ शिव धवळधाम गोक्षीरू। विष्णु घनश्याम अतिसुंदरू। बाप ध्यानाचा बडिवारू। येरें येरू व्यापिला॥ १२६०॥ मुदला दोहींसी ऐक्य शुद्ध। मा उपासकांसी का विरुद्ध। शिवरात्रीवैष्णवांसी अविरुद्ध। व्रत विशुद्ध सर्वांसी॥ ६१॥ जे पर्वणी प्रिय चक्रपाणी। जे सकळकल्याणाची श्रेणी। उभय पक्षां तारिणी। वैष्णवजननी एकादशी॥ ६२॥ जे शुक्लकृष्णपक्षविधी। भक्त वाऊनियां खांदी। नेऊनियां सायुज्यसिद्धी। मोक्षपदीं बैसवी॥ ६३॥ करावी शुक्ल एकादशी। त्यजावें कृष्णपक्षासी। उपडलिया एका पक्षासी। सायुज्यासी केवीं पावे॥ ६४॥ दों पांखीं उड्डाण पक्ष्यासी। एकु उपडिल्या नुडवे त्यासी। तेवीं पां त्यजितां कृष्णपक्षासी। सायुज्यासी नपविजे॥ ६५॥ तेवीं एकादशी पाहीं। जो जो उत्सवो जे जे समयीं। तो तो उपतिष्ठे माझ्या ठायीं। संदेहो नाहीं सर्वथा॥ ६६॥ जो एकादशीचा व्रतधारी। मी नित्य नांदें त्याच्या घरीं। सर्वपर्वकाळांच्या शिरीं। एकादशी खरी पैं माझी॥ ६७॥ जो एकादशीचा व्रती माझा। तो व्रत तप तीर्थांचा राजा। मज आवडे तो गरुडध्वजा। परिग्रहो माझा तो एकु॥ ६८॥ जैं माझे भक्त आले घरा। तैं सर्व पर्वकाळ येती दारा। वैष्णवां तो दिवाळी दसरा। तीर्थें घरा तैं येती॥ ६९॥ चंद्रसूर्यग्रहणांसी। वोवाळूनि सांडी ते दिवसीं। कपिलाषष्ठी ते याची दासी। मा अर्धोदयासी कोण पुसे॥ १२७०॥ ऐसें मद्भक्तांचें आगमन। तेणें उल्हासें न संटे मन। सर्वस्व वेंचितां धनधान्य। हरिखें जाण नाचतु॥ ७१॥ ऐशीं माझ्या भक्तांची आवडी। त्यांचे संगतीची अतिगोडी। त्या नांव भक्तीची कुळवाडी। पर्वकोडी ते दिवसीं॥ ७२॥ पर्वविशेष आदरें। संत आलेनि अवसरें। शृंगारी हरिमंदिरें। गुढिया मखरें महोत्साह॥ ७३॥ संत बैसवूनि परवडीं। कीर्तन मांडिती निरवडी। हरिखें नाचती आवडी। धरिती बागडी विन्यासें॥ ७४॥ टाळ घोळ मृदंग कुसरीं। नाना चरित्रें गाती गजरीं। गर्जती स्वानंद अवसरी। जयजयकारी हरिनामें॥ ७५॥
यात्रा बलिविधानं च सर्ववार्षिकपर्वसु।
वैदिकी तान्त्रिकी दीक्षा मदीयव्रतधारणम्॥ ३७॥
ऐक दीक्षेचें लक्षण। वैदिकी तांत्रिकी दोन्ही जाण। वैदिकी वेदोक्तग्रहण। तांत्रिक जाण। आगमोक्त॥ ७६॥ वैष्णवी दीक्षा व्रतग्रहण। पांचरात्रिक मंत्रानुष्ठान। हें आगमोक्त शुद्ध लक्षण। व्रतधारण तें माझें॥ ७७॥ वैष्णवव्रतधर्मासी। पर्वें करावीं वार्षिकेंसी। जे बोलिलीं चातुर्मासीं। एकादश्यादि जयंत्या॥ ७८॥ शयनी कटिनी प्रबोधिनी। पवित्रारोपणी नीरांजनी। वसंतदमनकारोपणी। जन्मदिनीं जयंत्या॥ ७९॥ इत्यादि नाना पर्वकाळीं। महामहोत्साहो पूजावळी। नीरांजनें दीपावळी। मृदंगटाळीं गर्जत॥ १२८०॥ उचंबळोनि अतिसुखें। यात्रे निघावें येणें हरिखें। दिंडी पताका गरुडटके। नामघोषें गर्जत॥ ८१॥ यात्रे जावें ज्या देवासी। तो देवो आणी निजगृहासी। आपली आवडी जे मूर्तीसी। ते प्रतिमेसी प्रतिष्ठी॥ ८२॥
ममार्चास्थापने श्रद्धा स्वत: संहत्य चोद्यम:।
उद्यानोपवनाक्रीडपुरमन्दिरकर्मणि॥ ३८॥
मूर्ति निपजवावी वरिष्ठ। नेटुगी देटुगी चोखट। साधुमुखें अतिनिर्दुष्ट। घवघवीत साजिरी॥ ८३॥ मूर्ति करावी अतिसुरेख। कृश न करावी अधोमुख। स्थूल न करावी ऊर्ध्वमुख। रडकी दुर्मुख न करावी॥ ८४॥ अंग स्थूल वदन हीन। मूर्ति न करावी अतिदीन। खेचरी भूचरी जिचे नयन। विक्राळ वदन न करावी॥ ८५॥ अंग साजिरें नाक हीन। वरदळ चांग चरण क्षीण। मोदळीबुदगुली ठेंगणें ठाण। अतिदीर्घ जाण न करावी॥ ८६॥ मूर्ति साजिरी सुनयन। सम सपोष सुप्रसन्न। अंगीं प्रत्यंगीं नव्हे न्यून। सुचिन्ह सुलक्षण सायुध॥ ८७॥ पाहतां निवे तनमन। देखतां जाय भूकतहान। घवघवीत प्रसन्नवदन। कृपालक्षण सुकुमार॥ ८८॥ जे देखतांचि जीवीं जडे। अतिशयें सर्वांसी आवडे। पाहों जातां निजनिवाडें। पूरु चढे प्रेमाचा॥ ८९॥ ईषत् दिसे हास्यवदन। अतिशयेंसीं सुप्रसन्न। जिचेनि घवघवाटें निवे मन। प्रतिमा संपूर्ण ती नांव॥ १२९०॥ तेथें मेळवूनि साधुश्रेष्ठां। अग्न्युत्तारण करावें निष्ठा। चक्षून्मीलन प्राणप्रतिष्ठा। करावी वरिष्ठाचेनि हातें॥ ९१॥ देवालय करावें गहन। वन उद्यान उपवन। खेंडकुलिया विश्रामस्थान। आराम जाण करावे॥ ९२॥ नाना जातींचे वृक्ष तें वन। फळभक्षी वृक्ष तें उपवन। पुष्पवाटिका तें उद्यान। कृष्णार्पण पूजेसी॥ ९३॥ हाट हाटवटिया चौपासी। नगर वसवावें देवापाशीं। वेदाध्ययन शास्त्रश्रवणेंसी। अहर्निशीं कीर्तनें॥ ९४॥ इतुकें करावया असमर्थ। श्रद्धा आहे परी नसे वित्त। तरी साह्य मेळवून समर्थ। मद्भावयुक्त करावें॥ ९५॥ कां मेळवूनि भगवद्भक्त। त्यांत श्रद्धाळू जे वित्तवंत। भावपूर्वक दिधल्या वित्त। तेणें हें समस्त करावें॥ ९६॥ देउळीं करूनि मूर्तिप्रतिष्ठा। परतोनि न वचे जो त्या वाटा। तो आळशी जाण पां करंटा। नव्हेचि चोखटा भावाचा॥ ९७॥ जो करूं जाणे मूर्तिप्रतिष्ठा। धन वेंचून भावार्थी मोठा। नीचसेवा तो माझा वांटा। झाडितां खरांटा न संडी॥ ९८॥
संमार्जनोपलेपाभ्यां सेकमण्डलवर्तनै:।
गृहशुश्रूषणं मह्यं दासवद्यदमायया॥ ३९॥
असतां शिष्य सेवकजन। ते प्रतिष्ठा सांडूनि सन्मान। स्वयें करी सडासंमार्जन। देवालयीं जाण निर्दंभ॥ ९९॥ रंगमाळा घाली कुसरीं। नाना यंत्रें नानाकारीं। नाना परीचे रंग भरी। आवडी भारी मद्भजनीं॥ १३००॥ जैसे कां नीच रंक। तैसी सेवा करी देख। नीच सेवेचें अतिसुख। निर्मायिक मद्भजनीं॥ १॥
अमानित्वमदम्भित्वं कृतस्यापरिकीर्तनम्।
अपि दीपावलोकं मे नोपयुञ्ज्यान्निवेदितम्॥ ४०॥
अपार वेंचूनि नाना अर्थ। प्रासादप्रतिष्ठा म्यां केली येथ। मी एक देवाचा मोठा भक्त। न धरी पोटांत अभिमान॥ २॥ शुद्ध भावो नाहीं चित्तीं। खटाटोपें अहाच भक्ती। ऐशी जे दांभिकस्थिती। भक्त नातळती भाविक॥ ३॥ भक्तें न धरावा अभिमान। नापेक्षावा मानसन्मान। न करावें दांभिक भजन। अभिलाष जाण न धरावा॥ ४॥ अनुभव जाला तो आपण। कां देवालयीं वेंचिलें धन। अथवा जें दिधलें दान। तें वाच्य जाण न करावें॥ ५॥ यजमान जैं केलें बोले। तैं जें केलें तें निर्वीर्य जालें। प्राणेंवीण प्रेत उरलें। तैसे झाले ते धर्म॥ ६॥ कृषीवळू पेरूनियां धान्य। सवेंचि आच्छादी आपण। तैं पीक लगडूनि ये जाण। तैसें सफळ दान न बोलतां॥ ७॥ देवासी समर्पिलें आपण। कां आणिकीं केलें निवेदन। तें घेऊं नये आपण। देवलकपण तो दोषु॥ ८॥ देवाचाप्रसाद घेतां। लोभें न घ्यावा सर्वथा। आधीं वांटावा समस्ता। अल्पमात्रतां स्वयें घ्यावा॥ ९॥ दीपु समर्पिला श्रीहरि। तेणें न वर्तावें गृहव्यापारीं। हें बोलिलें आगमशास्त्री। स्मृतिकारीं सज्ञानीं॥ १३१०॥ हे तंव अवघी साधारण बाह्य पूजा। परी दृढविश्वासें भावो माझा। ते भक्ति आवडे अधोक्षजा। भाविकांची पूजा भावार्थें॥ ११॥ ऐक पां भक्तीचा ईत्यर्थु। जेणें भजनें म्हणिजे भक्तु। तरी जें जें उत्तम या लोकांतु। आवडता पदार्थु मज अर्पी॥ १२॥
यद्यदिष्टतमं लोके यच्चातिप्रियमात्मन:।
तत्तन्निवेदयेन्मह्यं तदानन्त्याय कल्पते॥ ४१॥
हो कां चंद्रामृत तत्त्वतां। अवचटें आलें भक्ताचे हातां। तें अवघेंचि अर्पी भगवंता। देहलोभता न सेवी॥ १३॥ देहासी यावया अमरता। तेणें लोभें सेवावें अमृता। अमर अमृतपान करितां। मरती सर्वथा सकाळें॥ १४॥ नश्वर देहाचिया ममता। भक्त सेवीना अमृता। तेंचि भगवंतासी अर्पितां। अक्षयता अनश्वर॥ १५॥ परिस चिंतामणि न प्रार्थितां। दैवें आलिया भक्ताच्या हातां। तो लोभेंन ठेवी सर्वथा। अर्पी भगवंता तत्काळ॥ १६॥ लोभें कल्पतरु राखतां। कल्पना वाढे अकल्पिता। तोचि भगवंती अर्पितां। निर्विकल्पता स्वयें लाभे॥ १७॥ स्वार्थें चिंतामणि राखितां। अत्यंत हृदयीं वाढवी चिंता। तोचि भगवंती अर्पितां। निश्चिंतता चित्तासी॥ १८॥ कामधेनु राखतां आपण। अनिवार कामना वाढवी जाण। तेचि करितां कृष्णार्पण। निरपेक्षता पूर्ण अंगीं बाणे॥ १९॥ लोभें स्पर्शमणि राखतां। तो वाढवी धनलोभता। तोचि भगवंतीं अर्पितां। अर्थस्वार्थतानिर्मुक्त॥ १३२०॥ हो कां देशकाळऋतुमेळें। उत्तम पदार्थ अथवा फळें। नवधान्यादिकें सकळें। अर्पी भावबळें मजलागीं॥ २१॥ पोटांतूनि आवडता। प्राप्त झालिया पदार्था। मजचि अर्पिती सर्वथा। लोलिंगता सांडूनी॥ २२॥ आपुले हृदयींची आवडी। हरिचरणीं फुडी। आतां नाना पदार्थांची जे गोडी। ते मजचि रोकडी अर्पिती॥ २३॥ मज अनंताच्या हातीं। आवडीं अर्पिलें मद्भक्ती। त्याचीं फळें सांगतां श्रुती। मुक्या होती सर्वथा॥ २४॥ मी वेदांचा वेदवक्ता। मजही न बोलवे सर्वथा। त्याचें फळ तें मीचि आतां। जाण तत्त्वतां उद्धवा॥ २५॥ जीवाहिहोनि वरौती। माझ्या ठायीं अत्यंतप्रीती। तिये नांव गा माझी भक्ती। जाण निश्चितीं उद्धवा॥ २६॥ तत्काळ मज पाविजे जेणें। ते माझे पूजेचीं स्थाने। अतिपवित्र जें कल्याणें। तुजकारणें सांगेन॥ २७॥
सूर्योऽग्निर्ब्राह्मणो गावो वैष्णव: खं मरुज्जलम्।
भूरात्मा सर्वभूतानि भद्र पूजापदानि मे॥ ४२॥
एकादशीं एकादशाध्यायीं। एकादश पूजास्थानें पाहीं। एका जनार्दनु तेंही। एकरूप सर्वही वर्णील॥ २८॥ सूर्य अग्नि आणि ब्राह्मण। गायी वैष्णव आणि गगन। अनिळ जळ मही जाण। पूज्य आपण आपणासी॥ २९॥ अकरावें पूजा स्थान। सर्व भूतें पूज्य जाण। ऐक पूजेचें विधान। यथायोग्य लक्षण अवधारीं॥ १३३०॥
सूर्ये तु विद्यया त्रय्या हविषाग्नौ यजेत माम्।
आतिथ्येन तु विप्राग्र्ये गोष्वङ्ग यवसादिना॥ ४३॥
सविता माझें अधिष्ठान। माझेनि तेजें विराजमान। जेणें तेजें जगाचे नयन। देखणे जाण होताती॥ ३१॥ दीपु लाविल्या गृहाभीतरीं। तो प्रकाशु दिसे गवाक्षद्वारीं। तैसें माझें निजतेज अंतरीं। तें सूर्यद्वारीं प्रकाशे॥ ३२॥ तो सविता मंडळमध्यवर्ती। जाण नारायण मी निश्चितीं। त्या मज सूर्याची उपास्ती। सौर सूक्ति त्रैविद्या॥ ३३॥ ऋग्वेदादि वेद तीनी। साङ्ग सौरमंत्र जाणोनी। सूर्यसूक्तें संमुख पठणीं। पूजा सज्ञानीं करावी॥ ३४॥ हे वैदिकी उपासकता। वेदज्ञांसीचि तत्त्वतां। नेणत्या योग्य नव्हे सविता। ऐसें सर्वथा न म्हणावें॥ ३५॥ तत्काल प्रसन्न होय सविता। ऐसी सुगम उपासकता। तुज सांगेन आतां। सावधानता अवधारीं॥ ३६॥ सकळ वेदांची जननी। सकळ मंत्रांचा मुकुटमणी। ते गायत्री उत्तमवर्णी। सकळ ब्राह्मणीं जाणिजे॥ ३७॥ तिचा अर्थ विचारितां। तीअधीन असे सविता। त्रिपदा त्रिकाळीं अर्घ्य देतां। त्रैविद्या तत्त्वतां त्या नांव॥ ३८॥ अर्धमात्रा अर्धबिंबध्यान। त्रिपदा त्रिकाळीं अर्घ्यदान। तेणें संतोषे चिद्धन। आपणासमान भक्त करी॥ ३९॥ हें प्रथम माझें अधिष्ठान। सूर्यपूजा याचि नांव जाण। आतां अग्निपूजेचें लक्षण। साङ्ग संपूर्ण तें ऐक॥ १३४०॥ सर्वांगां मुख प्रधान। तें माझें मुख अग्नि जाण। ये अर्थी वेदशास्त्रपुराण। साक्षी संपूर्ण गर्जती॥ ४१॥ ब्राह्मण माझे आवडते। माझे मुखीं होआवया सरते। म्यां लाविले अग्निसेवेतें। तेही तेथें चूकले॥ ४२॥ घालूनि मजमुखीं अवदान। ‘इंद्राय स्वाहा’ म्हणती जाण। कर्मकांडें ठकिले ब्राह्मण। शुद्ध मदर्पण चूकले॥ ४३॥ केवळ मजमुखीं अर्पितां। आड आली त्यांची योग्यता। इंद्र यम वरुण सविता। नाना विकल्पता अवदानीं॥ ४४॥ देवो देवी मीचि आहें। हेंही सत्य न मानिती पाहें। मजवेगळा विनियोग होये। नवल काये सांगावें॥ ४५॥ जें जें सेविजे तिहीं लोकीं। तें तें अर्पे माझ्या मुखीं। हें न मनिजे याज्ञिकीं। कर्माविखीं। विकल्पू॥ ४६॥ विकल्पबुद्धि ब्राह्मण। अद्यापि संशयीं पडिले जाण। करूनि वेदशास्त्रपठण। शुद्ध मदर्पण न बोलती॥ ४७॥ माझें मुख वैश्वानर। येणें भावें विनटले नर। सांडूनि भेद देवतांतर। मजचि साचार अर्पिती॥ ४८॥ त्याचें समिधेनीं मन तृप्त झालें। तेथही जरी हविर्द्रव्य आलें। तरी माझें निजमुख सुखावलें। सर्वस्व आपुलें त्यांसी मी दें॥ ४९॥ मज नैराश्यतेची आस। त्यांच्या हाताची मी पाहें वास। त्यांलागीं सदा सावकाश। अल्पही ग्रास जैं देती॥ १३५०॥ त्यांचेनि हातें निर्विकल्पें। मद्भावें जें अग्नीस अर्पे। तृण काष्ठ तिळ तुपें। तें म्यां चिद्रूपें सेविजे॥ ५१॥ यापरी अग्नीची उपास्ती। जे दुजे स्थानींची पूजास्थिती। सांगीतली म्यां तुजप्रती। ब्राह्मणभक्ती अवधारीं॥ ५२॥ पूजेमाजीं अतिश्रेष्ठ जाण। शीघ्र मत्प्राप्तीचें कारण। ब्राह्मण माझें पूजास्थान। अतिगहन उद्धवा॥ ५३॥ त्यांचिया भजनाची नवलपरी। आड पडावें देखोनि दूरी। मस्तक ठेवावा चरणावरी। चरणरज शिरीं वंदावे॥ ५४॥ आवाहनविसर्जनेंवीण। शालिग्रामीं माझें अधिष्ठान। परी तें केवळ अचेतन। ब्राह्मण सचेतन मद्रूपें॥ ५५॥ मी अव्यक्तरूप जनार्दन। तो मी व्यक्त ब्राह्मणरूपें जाण। धरातळीं असें मी नारायण। धरामर ब्राह्मण यालागीं॥ ५६॥ ब्राह्मणमुखें वेदांसी महिमा। ब्राह्मणें यज्ञदानतपतीर्थगरिमा। ब्राह्मणें देवासी परम प्रेमा। ब्रह्मत्व ब्रह्मा ब्राह्मणमुखें॥ ५७॥ त्या ब्राह्मणांसी अपमानितां। अपमानिल्या यज्ञदेवता। वेदादि तपदानतीर्था। परब्रह्म तत्त्वतां अपमानिलें॥ ५८॥ मज त्रिलोकीं नाहीं सांठवण। मजहूनि अधिक माझे ब्राह्मण। त्यामाजीं मी वेदरूप नारायण। सगळा जाण सांठवलों॥ ५९॥ ब्राह्मणपद हृदयीं धरितां। मज आली परम पवित्रता। लक्ष्मी पायां लागे उपेक्षितां। चरणतीर्थ माथां शिवू धरी॥ १३६०॥ यालागीं ब्राह्मण पूज्य जाण। अंगें मी करीं चरणक्षालन। त्यांचें उच्छिष्ट मी काढीं आपण। पाडू कोण इतरांचा॥ ६१॥ मुख्य माझें अधिष्ठान। सर्वोपचारपूजास्थान। दान मान मिष्टान्न। विधिपूजन विप्रांचें॥ ६२॥ एका नेमू शालिग्रामाचा। एका स्थावर लिंगाचा। एका नेमू गणेशाचा। एका सूर्याचा दर्शननेमू॥ ६३॥ एका नेमू तुळशीचा। एका बांधल्या अनंताचा। नित्य नेम ब्राह्मणाचा। सभाग्य तो भाग्याचा दुर्लभ॥ ६४॥ नित्य नेमस्त द्विजपूजा। षोडशोपचार करी वोजा। माझे भक्तीचा तो राजा। आत्मा माझा तो एकू॥ ६५॥ जो देवतांतरा नुपासित। जीवेंभावें ब्राह्मणभक्त। त्याचा चुकवूनियां अनर्थ। निजस्वार्थ मी कर्ता॥ ६६॥ ऐसे जे ब्राह्मणभक्त। त्यांच्या पायीं पृथ्वी पुनीत। गंगा चरणतीर्थ वांछित। शिरीं वंदीत मी त्यांसी॥ ६७॥ त्यांचे सेवेचा सेवक। मोलेंवीण मी झालों देख। ब्राह्मणसेवेचें मज सुख। अलोकिक अनिवार॥ ६८॥ नित्यनेम द्विजपूजा। करी तो आवडे अधोक्षजा। त्यालागीं पसरूनि चारी भुजा। आलिंगनीं माझा जीवू निवे॥ ६९॥ ब्राह्मणांच्या स्नानप्रवाहतळीं। जेणें भावार्थेंकेली आंघोळी। कोटि अवभृथें पायांतळीं। तेणें तत्काळीं घातलीं॥ १३७०॥ ब्राह्मणचरणतीर्थ देखतां। पळ सुटे दोषदुरिता। तें भावार्थें तीर्थ घेतां। दोष सर्वथा निमाले॥ ७१॥ जो कोणी नित्य नेमस्त। सेवी ब्राह्मणाचें चरणीर्थ। तो स्वयें झाला तीर्थभूत। त्याचेनि पुनीत जड जीव॥ ७२॥ त्या ब्राह्मणाचे ठायीं जाण। अभ्यंगादि सुमन चंदन। आसन भोजन धन धान्य। शक्तिप्रमाण पूजेसी॥ ७३॥ ब्राह्मणासी प्रिय भोजन। दानीं श्रेष्ठ अन्नदान। निपजवूनियां मिष्टान्न। द्यावें भोजन मद्भावें॥ ७४॥ एक हेळसूनि देती अन्न। एक उबगल्यासाठीं जाण। एक देती निर्भर्त्सून। एक वसवसोन घालिती॥ ७५॥ तैसें न करावें आपण। ब्राह्मण माझें स्वरूप जाण। त्यांसी देऊनियां सन्मान। द्यावें भोजन यथाशक्ति॥ ७६॥ अज्ञान अतिथि आल्या समयीं। खोडी काढूं नये त्याच्या ठायीं। तोही माझें स्वरूप पाहीं। अन्न ते समयीं अर्पावें॥ ७७॥ अतिथि जातां पराङ्मुख। त्यासवें जाय पुण्य नि:शेख। अन्न द्यावें समयीं आवश्यक। नातरी उदक तरी द्यावें॥ ७८॥ ब्राह्मणबैसवूनि पंक्ती। जे कोणी पंक्तिभेद करिती। ते मोलें पाप विकत घेती। त्यांसी अधोगतीनिश्चितीं॥ ७९॥ ब्राह्मणसेवेलागीं जाण। काया वाचा मन धन। यथासामर्थ्यें अवंचन। अतिथिपूजन त्या नांव॥ १३८०॥ त्रिपदाजपें पवित्र पूर्ण। यालागीं वेदांचें निवासस्थान। ब्राह्मण माझें स्वरूप जाण। श्रेष्ठ अधिष्ठान पूजेचें॥ ८१॥ ब्राह्मणआज्ञेलागीं जाण। अतिसादर ज्याचें मन। देणें देववणें दान। श्रद्धा संपूर्ण या नांव॥ ८२॥ ब्राह्मणसेवा धनेंवीण। सर्वथा न घडे ऐसें न म्हण। सेवेसी श्रद्धा प्रमाण। उल्हास पूर्ण भजनाचा॥ ८३॥ एकाची शरीरसेवा जाण। एकाचे वाचिक पूजन। एकाचें मानसिक भजन। दया पूर्ण द्विजाची॥ ८४॥ ब्राह्मणभक्तिलागीं जाण। हर्षनिर्भरअंत:करण। श्रद्धायुक्त उल्हासपूर्ण। आतिथ्य जाण या नांव॥ ८५॥ यापरी ब्राह्मणभजन। तिसरे पूजेचें अधिष्ठान। हें सांगितलें जाण। गोशुश्रूषण तें ऐक॥ ८६॥ जे गायीच्या कैवारा। घायें सहस्रबाहो केला पुरा। तीन सप्तकें वसुंधरा। मुख्य धुरा म्यां मारिल्या॥ ८७॥ रामावतारीं अतिमहिमान। तैं न घडेचि गोशुश्रूषण। यालागीं गोकुळीं जाण। गायींचें सेवन म्यां केलें॥ ८८॥ गायीचे सेवें झाली पुष्टी। बाळपणीं मारिले जेठी। कंस चाणूर मारिले हटी। बैसविला राज्यपटीं उग्रसेन॥ ८९॥ गायीचे सेवेची अतिगोडी। तेणें माझी कीर्ति झाली चोखडी। फोडिली कंसाची बांदवडी। तोडिली बेडी पितरांची॥ १३९०॥ यालागीं गायीं आणि ब्राह्मण। माझा जाणजीवप्राण। माझे पूजेचें अधिष्ठान। सुलभ जाण इयें दोन्ही॥ ९१॥ आपत्काळीं गोरक्षण। करीतो पढियंता मज जाण। त्यासवें मी आपण। गोरक्षण करीतसें॥ ९२॥ गायीचे सेवेचें विधान। गोग्रास द्यावा जे तृण। करावें अंग कुरवाळण। इतुकेनि प्रसन्न मी होयें॥ ९३॥ निर्लोभ गायीचीसेवा। करितां माझी प्राप्ति उद्धवा। ऐक वैष्णवाची सेवा। पूजा सद्भावा विभागू॥ ९४॥
वैष्णवे बन्धुसत्कृत्या हृदि खे ध्याननिष्ठया।
वायौ मुख्यधिया तोये द्रव्यैस्तोयपुरस्कृतै:॥ ४४॥
वैष्णवसेवा अत्यंत कठिण। तेथें जाती नाहीं गा प्रमाण। न म्हणावा शूद्र ब्राह्मण। भक्तिप्राधान्यभावार्थे॥ ९५॥ विदुर दासीपुत्र प्रसिद्धु। त्यासी आवडला गोविंदु। झाला वैष्णवांमाजीं अतिशुद्धु। कैसेनि निंद्यु म्हणावा॥ ९६॥ योनि जन्मला मर्कट। तो वैष्णवांमाजीं अतिश्रेष्ठ। हनुमंत म्हणावया कनिष्ठ। ऐसा पापिष्ठ कोण आहे॥ ९७॥ राक्षसांमाजीं बिभीषण। दैत्यांमाजीं प्रल्हाद जाण। भगवंतासी अनन्यशरण। वैष्णवपण तेणें त्यांसी॥ ९८॥ जाती उत्तम भक्तिहीन। तो वैष्णव नव्हे जाण। अथवा करी दांभिक भजन। वैष्णवपण त्या नाहीं॥ ९९॥ वैष्णवीं मानी जातिप्रमाण। शालिग्राम मानी पाषाण। गुरूसी मानी माणुसपण। तो पापिष्ठ जाण सर्वथा॥ १४००॥ जाणीव शाहणीव ज्ञातेपण। सांडूनि जातीचा अभिमान। जो मज होय अनन्यशरण। वैष्णव जाण तो माझा॥ १॥ त्या वैष्णवाचें पूजन। बाह्य उपचारें नव्हें जाण। बंधस्नेहें कळवळी मन। साचार पूजन त्या नांव॥ २॥ ऐक सख्या बंधूचा स्नेहो। बंधूसी रणीं लागतां घावो। घायाआड स्वयें रिघोनि पहा हो। शत्रुसमुदावो विभांडी॥ ३॥ तैसा पोटाआंतुला कळवळा। तोचि वैष्णवपूजेचा सोहळा। स्नेहेंवीण टिळे माळा। सुख गोपाळा तेणें नव्हे॥ ४॥ एका पितयाचे पुत्र साधू। अकृत्रिम होती बंधू। माजीं सापत्नविरोधू। स्नेह शुद्धू तो नव्हे॥ ५॥ भक्ताअभक्तांची उत्पत्ती। मजपासूनि गा निश्चिती। भावाभावसापत्नप्राप्ती। विरुद्ध स्थिती परस्परें॥ ६॥ वैष्णव विष्णूचे उदरीं जाण। ते उदरीं उदरस्थ व्हावें आपण। तैं सहजें झालें सखेपण। अकृत्रिम जाण कळवळा॥ ७॥ ऐसा बंधुस्नेहें जो कळवळा। तेचि पूजा वैष्णवकुळा। वैष्णवपूजकाजवळा। भावें भुलला मी तिष्ठें॥ ८॥ वैष्णवपूजेचें लक्षण। तें पांचवें माझें पूजास्थान। ऐक आकाशाचें पूजन। केवळ माझें ध्यान ते ठायीं॥ ९॥ आकाश निर्लेप निर्विकार। अतिसूक्ष्म निराकार। तैसें माझें ध्यान निरंतर। हृदयीं साचार करावें॥ १४१०॥ ध्यानीं बैसोनि सावकाश। सगळें सर्व महदाकाश। जो आपुलें करी हृदयाकाश। तेणें मी परेश पूजिला॥ ११॥ अतिसूक्ष्म निर्विकार। हृदयीं माझें ध्यान सधर। तेचि पूजा गा साचार। अपरंपार मी पूजिलों॥ १२॥ आकाशा लेप लावूं जातां। लावितां न लागे सर्वथा। तेवीं सर्व कर्मीं वर्ततां। आपुली मुक्तता जो देखे॥ १३॥ आकाश सर्व पदार्थीं व्याप्त। व्याप्त असोनि अति अलिप्त। तेवीं सर्व कर्मीं वर्तत। कर्मातीत नभनिष्ठा॥ १४॥ आकाश माझें पूजास्थान। तेथील पूजेचें हें विधान। हें सहावें पूजाअधिष्ठान। वायूचें अर्चन तें ऐक॥ १५॥ वायूच्या ठायीं भगवद्बुद्धी। ज्याची ढळों नेणें कधीं। वायूचेनि भूतां चेतनसिद्धी। जगातें त्रिशुद्धी धरिता तो॥ १६॥ वायुरूपें मीचि जाण। जालों सर्व भूतांचा प्राण। प्राणाचा मी मुख्य प्राण। मद्रूपें पवन या हेतु॥ १७॥ वायू व्योमीं जन्म पावें। जन्मोनि व्योमावेगळा नव्हे। सर्व कर्मीं तेथेंचि संभवे। अंती स्थिरावे निजव्योमीं॥ १८॥ तेवीं जन्मकर्मनिदान। पावोनि न सांडी अधिष्ठान। प्राणाचा जो होय प्राण। हेंचि पूजन वायूचें॥ १९॥ प्राणाचें गमनागमन। तेथ सोहंहंसाचें नित्य ध्यान। तेंचि करितां नित्य सावधान। हेंचि पूजन वायूचें॥ १४२०॥ मद्रूपें दृढभावन। वायूचें जो करी आपण। तें पवनाचेंपूजन। पूजास्थान सातवें॥ २१॥ जीवनें जीवनाची पूजा। जीवनेंचि निपजे वोजा। ते पूजा पावे अधोक्षजा। तो भक्त माझा पढियंता॥ २२॥ ‘आपो नारायण: साक्षात्’। या मंत्राचा जो मंत्रार्थ। देवें देवोचि पूजिजेत। जाण निश्चित उद्धवा॥ २३॥ क्षीरें पूजिला क्षीरसागरू। तेवीं द्रव्यें द्रव्योपचारू। हा जीवनपूजाप्रकारू। जाण निर्धारू उद्धवा॥ २४॥ जीवा जीववी जीवन। त्या जीवना मी निजजीवन। जीवनें पूजिजे जीवन। जेवीं समुद्रपूजन तरंगीं॥ २५॥ ‘नद्यस्तृप्यंतु समुद्रास्तृप्यंतु’। हें जळेंचि जळ पूजिजेतू। पूज्यपूजकां एकत्व येथू। हेचि वेदोक्तू विधिपूजा॥ २६॥ जीवनें पूजिजे जीवन। हें आठवें पूजास्थान। ऐक पृथ्वीचें पूजन। श्लोकार्धे संपूर्ण सांगेन॥ २७॥
स्थण्डिले मन्त्रहृदयैर्भोगैरात्मानमात्मनि।
क्षेत्रज्ञं सर्वभूतेषु समत्वेन यजेत माम्॥ ४५॥
जळामाजीं धरा अधर। विरोनि हों पाहे तें नीर। ती माजीं मी प्रवेशलों धराधर। अधर ते सधर तेणें झाली॥ २८॥ यालागीं पृथ्वी माझें पूजास्थान। ऐक पूजेचें विधान। गोसदृश स्थंडिलीं जाण। आवाहन पैं माझें॥ २९॥ गोसदृश स्थंडिलीं कां म्हणसी। पृथ्वी आहे गायीच्या ऐशी। जैं पूजा करावी पडे तिसी। तैं तदाकारेेंसीं स्थंडिल॥ १४३०॥ ते स्थंडिलीं पूजावया धरा। आवाहन करावें धराधरा। तल्लिंग हृदयमंत्रा। मंत्रद्वारा पूजावी॥ ३१॥ हृदय कवच शिखा नेत्र। शक्तिबीज मंत्रास्त्र। स्थंडिलीं रेखूनियां यंत्र। धराधरमहापूजा॥ ३२॥ यापरी पृथ्वीपूजन। साङ्ग सांगीतलें जाण। आपुलें आपण पूजास्थान। दहावें लक्षण तें ऐक॥ ३३॥ आधीं एक पुढें पूर्ण। त्या नांव दहावें लक्षण। आपलें आपण पूजास्थान। विचित्र विंदान पूजेचें॥ ३४॥ पूज्यापुढें पूज्यकोटी। केल्या गणितासी पडे तुटी। पहिल्या पूज्यासी जैं फांटा उठी। तैं गणितसृष्टि असंख्य॥ ३५॥ पूर्णासी फांटा काढिजे। त्या नांव एक म्हणिजे। एकपणेंही पूर्ण असिजे। सहज निजें परिपूर्ण॥ ३६॥ पूर्णापुढें पूर्ण पडे। तैं गणित काय आतुडे। जैं निचाडा चाड वाढे। तैं निजनिवाडें निजपूजा॥ ३७॥ एकासी एक मेळविजे। तैं दोनीपणें होय दुजें। जैं एकें एकभोगिजे। तैं देखिजे निजपूज्यत्व॥ ३८॥ आपणचि आपला देवो। आपुला पूजक आपण पहा हो। आपुला आपणचि भावो। नवल नवलावो पूजेचा॥ ३९॥ हृदयीं भावूनि चैतन्यघन। स्वयें तद्रूप होऊनि जाण। मग जे जे भोग भोगी आपण। ब्रह्मार्पण सहजेंचि॥ १४४०॥ तो ग्रास घाली स्वमुखीं। तेणें मुखें मी होय सुखी। तृप्ति उपजे परमपुरुखीं। पूजा नेटकी हे माझी॥ ४१॥ तो जे जे कांहीं भोग भोगी। ते अर्पती मजचिलागीं। मी रंगलों त्याचे रंगीं। पावे श्रीरंगीं ते पूजा॥ ४२॥ मुख्य पूजेमाजीं हे माझी पूजा। तेणेंचि पूजिलें मज अतिवोजा। पूजामिसें गरुडध्वजा। वश अधोक्षजा तेणें केलें॥ ४३॥ हे आवडती माझी पूजा। अत्यंत प्रिय अधोक्षजा। हे भक्ति पढिये गरुडध्वजा। जाण तो माझा प्रिय भक्त॥ ४४॥ हो कां सगुण अथवा निर्गुण। दोहीं रूपें मीचि जाण। तेथ जो करी निजभोग अर्पण। शुद्ध पूजन तें माझें॥ ४५॥ निजात्मभोगीं अधोक्षजा। पूजिजे ते हे जाण पूजा। सर्व भूतांतें पूजिजे वोजा। समसाम्य समजा समभावें॥ ४६॥ अकरावे पूजेचा विवेक। मागां पुढां एकएक। अकरा इंद्रियां पडे आंख। तोचि पूजक सर्व भूतां॥ ४७॥ मागां पुढां एकएक कीजे। त्या नांव एकादश म्हणिजे। हाचि विवेक जेणें जाणिजे। तेणें पूजिजे सर्व भूतां॥ ४८॥ आत्मभोगसमर्पणें पाहीं। वस्तू जाणितली स्वदेहीं। तेचि सर्व भूतांच्या ठायीं। देहींविदेहीं समसाम्यें॥ ४९॥ सर्व क्षेत्रांतें वागविता। मी क्षेत्रज्ञु जाण तत्त्वतां। देखतांही विषमभूतां। ज्यासी माझी ममता मोडेना॥ १४५०॥ उंच नीच विषमता भूतां। वस्तूसी न देखे विषमता। समसाम्यें समान समता। सर्व भूतां समत्वें॥ ५१॥ माझिया साम्यें सर्वसमता। तेचि पूजा सर्व भूतां। तोचि पूजक तत्त्वतां। ज्यासी विषमता बाधीना॥ ५२॥ जो भावार्थें मजमाजीं आला। तैं सर्वभूतें तोचि झाला। सहजे समत्व पावला। पूजूं लागला आत्मत्वें॥ ५३॥ पूजूं जावो रंक रावो। परी पालटेना समभावो। न खंडितां समतेचा ठावो। यथायोग्य पहा हो पूजित॥ ५४॥ ऐक यदुवंशध्वजा। सर्व भूतीं माझी पूजा। माझेनि समत्वें निपजे वोजा। या अकराही पूजा समत्वें॥ ५५॥ इयें अकराही अधिष्ठानें। मत्प्राप्तिकरें अतिपावनें। म्यां सांगीतलेनि अनुसंधानें। पूजा करणेंयथाविधि॥ ५६॥ म्यां सांगीतलें ज्या निगुतीं। पूजा करावी त्याचि स्थिती। न कळे तरी माझीमूर्ती। सर्वांहीप्रती चिंतावी॥ ५७॥
धिष्ण्येष्वेष्विति मद्रूपं शङ्खचक्रगदाम्बुजै:।
युक्तं चतुर्भुजं शान्तं ध्यायन्नर्चेत्समाहित:॥ ४६॥
निर्गुणाहूनि सगुण न्यून। म्हणे तो केवळ मूर्ख जाण। सगुण निर्गुण दोनी समान। न्यून पूर्ण असेना॥ ५८॥ विघुरलें तें तूप होये। थिजलें त्यापरीस गोड आहे। निर्गुणापरिस सगुणीं पाहें। अतिलवलाहें स्वानंदू॥ ५९॥ निर्गुणाचा बोध कठिण। मनबुद्धिवाचे अगम्य जाण। शास्त्रांसी नकळे उणखूण। वेदीं मौन धरियेलें॥ १४६०॥ वारा उमाणावा वावें। आकाश आकळावें खेंवें। भावना भांबावली धांवे। काय करावें स्फुरेना॥ ६१॥ तैशी सगुण मूर्ति नव्हे जाण। सुलभ आणि सुलक्षण। देखतां जाय भूकतहान। निवताहे मन सप्रेमें॥ ६२॥ जो नित्यसिद्ध सच्चिदानंदू। प्रकृतिपरू परमानंदू। सगुण जाला जी गोविंदू। स्वानंदकंदू स्वलीळा॥ ६३॥ साखरेची गोडी वाखाणिली। तिची नाबदेची भेली केली। गोडिये अधिक शोभा आली। तैशी मूर्ति झाली साकार॥ ६४॥ लावूनियां कसवटी। उत्तम सुवर्णाची खोटी। बांधल्या नववधूच्या कंठीं। तेणें ते गोमटी दिसे काय॥ ६५॥ त्याचींच करूनियां भूषणें। अंगीं प्रत्यंगीं लेवितां लेणें। नववधू अत्यंत शोभली तेणें। निंबलोणें उतरिती॥ ६६॥ तैसें जें निर्गुण निर्विकार। त्याची सगुणमूर्ति सुकुमार। चिन्मात्रैक अतिसुंदर। मनोहर स्वलीला॥ ६७॥ घवघवित घनसांवळा। मुकुट कुंडलें मेखळा। कंठीं कौस्तुभ वनमाळा। सोनसळा झळकत॥ ६८॥ आधींच तो अतिसांवळा। वरी टिळक रेखिला पिंवळा। आरक्तप्रांत दोहीं डोळां। कमळदळां लाजवी॥ ६९॥ चिन्मात्रींचें देखणेपण। त्या डोळ्ॺां आलें शरण। सैराट हिंडतां शिणला पवन। हरीचें घ्राण ठाकिलें॥ १४७०॥ जैशा ओंकारामाजीं श्रुती। तैशा मुखामाजीं दंतपंक्ती। चौकीचे चारी झळकती। सच्चिद्दीप्तीं सोलींव॥ ७१॥ जेवीं जीव शिव भिन्नपणीं। तेवीं अध ऊर्ध्वअधर दोन्ही। हरिअंगीं मिनले मिळणीं। समानपणीं समत्वें॥ ७२॥ देखोनियां कृष्णवदन। चंद्रमा कृष्णपक्षीं क्षीण। तो तंव पूर्णिमेसी पूर्ण। हा सदा संपूर्ण वदनेंदू॥ ७३॥ दिवसा चंद्राची क्षीण प्रभा। वदनेंदूची नवलशोभा। लोपोनि चंद्रसूर्यप्रभा। स्वयें स्वयंभा प्रकाश॥ ७४॥ तो आर्तचकोरा अमृतपान। मुमुक्षुचातका स्वानंदघन। सगुणपणें नारायण। भूषणां भूषण तो झाला॥ ७५॥ चहूं खाणींच्या क्रिया विविधा। तैशा चहूं भुजींच्या चारी आयुधां। सगुण देखोनि गोविंदा। वेद निजबोधा आयुधें झाले॥ ७६॥ देवो न कळे श्रुतींसी। लाज आली होती वेदांसी। जगीं मिरवावया प्रतापासी। आयुधें हरीपासीं ते झाले॥ ७७॥ सामवेद झाला शंख। यजुर्वेद चक्र देख। अथर्वण गदा तिख। कमळसाजुक ऋग्वेदू॥ ७८॥ साकारपणें सच्चिदानंदा। शंख चक्र पद्म गदा। चहूं करीं चहूं वेदां। निववी सदा निजांगें॥ ७९॥ जगीं मिरवावया उपनिषदें। झालीं बाहुभूषणें अंगदें। करीं कंकणें अतिशुद्धें। सोहं शब्दें रुणझुणती॥ १४८०॥ नख केश अंगुलिका। कराग्रीं जडित मुद्रिका। त्रिकोण षट्कोणिया देखा। उपासकां विधिपीठ॥ ८१॥ अगम्य तेज हृदयींच्या पदका। गुणत्रिवळी उदरीं देखा। मध्येंकळसू नेटका। क्षुद्रघंटिका मेखळे॥ ८२॥ कांतीव मरकतस्तंभ जाण। तैसे शोभताती दोन्ही चरण। ते केवळ अचेतन। हे सचेतन हरिअंगीं॥ ८३॥ ध्वज वज्र अंकुश ऊर्ध्वरेखा। दोन्ही पायीं पद्में देखा। यवांकित सामुद्रिका। अतिनेटका पदबंधू॥ ८४॥ आरक्त रंग चरणतळां। वरील घनसांवळी कळा। नभीं इंद्रधनुष्यमेळा। तैसी लीळा हरिचरणीं॥ ८५॥ सगुण देखोनियां जगन्नायका। दशदिशांसीचरणीं आवांका। पावावया निजसुखा। दशांगुलिका होऊनि ठेल्या॥ ८६॥ चंद्र कृष्णपक्षीं क्षीण। तेणें ठाकिले हरिचरण। नखीं चंद्र जडोनियां जाण। परम पावन तो झाला॥ ८७॥ हें जाणोनित्रिनयनें। चंद्रमा मस्तकीं धरणें। पायवणी माथां वाहणें। जग उद्धरणें तेणें जळें॥ ८८॥ सगुण देवो देखोनि पाहीं। चारी मुक्ति लागल्या पायीं। यालागीं संत चरणांच्या ठायीं। तत्पर पाहीं सर्वदा॥ ८९॥ सलोकता समीपता। दोहीं पायीं वांकी गर्जतां। अंदू झाली स्वरूपता। सायुज्यता तोडरू॥ १४९०॥ ज्या तोडराचा धाक पाहीं। अहंगर्वित असुर वाहती देहीं। सर्व सुख तें हरीच्या ठायीं। त्यांच्या पायीं समाधी॥ ९१॥ धैर्य वीर्य उदारकीर्ती। गुणगांभीर्य शौर्य ख्याती। यांसी कारण माझी सगुण मूर्ती। जाण निश्चितीं उद्धवा॥ ९२॥ माझे ये मुर्तीचेनि दर्शनें। होत डोळ्ॺां पारणें। जन्ममरणांचें उठवीधरणें। खत फाडणें विषयांचे॥ ९३॥ माझी मूर्ति देखिल्यापाठीं। न लगे योगयाग आटाआटी। न लगे रिघावें गिरिकपाटीं। नाना संकटीं न पडावें॥ ९४॥ न लगे आसन भोजन। न लगे समाधिसाधन। माझिये प्राप्तीसी कारण। माझी भक्ति जाण उद्धवा॥ ९५॥ एकादश पूजाअधिष्ठान। तेथें माझें करोनि आव्हान। म्यां सांगीतलें मूर्तीचें ध्यान। सावधान करावें॥ ९६॥ माझें अर्चन माझें ध्यान। माझें करावें कीर्तन। माझ्या नामाचे स्मरण। माझे गुण वर्णावे॥ ९७॥ अहर्निशीं माझीकथा। अहर्निशीं माझी वार्ता। अहर्निशीं मातें ध्यातां। भक्ति तत्त्वतां ती नांव॥ ९८॥ दीपकळिका हातीं चढे। तैं घरभरी प्रकाशू सांपडे। माझी मूर्ती जैं ध्यानी जडे। तैं चैतन्य आतुडे अवघेंचि॥ ९९॥ या उपपत्ति उद्धवा देख। सगुण निर्गुण दोन्ही एक। जाण पां निश्चयो निष्टंक। सच्चिदानंदसुख समत्वें॥ १५००॥ जो कसू सुवर्णाचिये खोटीं। तोचि वाला एका कसवटीं। सगुणनिर्गुणपरिपाटीं। नाहीं तुटी चित्सुखा॥ १॥ तेवीं सगुण निर्गुण नि:शेष। जाण निश्चयें दोन्हीएक। सगळें साखरेचें टेंक। ना नवटांक सम गोडी॥ २॥ हें अंतरंग माझें ध्यान। तेथें मनकरोनि सावधान। अतिहर्षें मदर्चन। मद्भक्तीं जाण करावें॥ ३॥ उद्धवा ऐसें म्हणसी मनीं। हे भक्ति पाविजे कैसेनि। हें साध्य होय जिंहीं साधनीं। तें तुजलागोनी सांगेन॥ ४॥
इष्टापूर्तेन मामेवं यो यजेत समाहित:।
लभते मयि सद्भक्तिं मत्स्मृति: साधुसेवया॥ ४७॥
करितां नाना योगयाग। वापी कूप वन तडाग। श्रौतस्मार्त कर्में चांग। मदर्पणें साङ्ग जिंहीं केलीं॥ ५॥ श्रौत अग्निहोत्र सोमयाग। स्मार्त वापी कूप तडाग। मज नार्पितां दोन्ही व्यंग। सत्कर्म साङ्ग मदर्पणें॥ ६॥ कर्म करितां मदर्पण। अवचटें फळ वांच्छी मन। इतुकियासाठी भक्तासी विघ्न। सर्वथा मी जाण येवों नेदीं॥ ७॥ सकाम कर्मकर्त्यासी। जे प्राप्ति नव्हे अतिप्रयासीं। त्या उत्तमलोकगतिभोगांसी। मद्भक्तांसी मी देता॥ ८॥ पोटांतूनि माझा भक्तू। दिव्य भोगांसी विरक्तू। ते भोग भोगितां मातें स्मरतू॥ भोगासक्तू तो नव्हे॥ ९॥ साधु देवालया जातां। पर्जन्यें पीडिला धारावर्तां। वेश्यागृहासी नेणतां। आला अवचितां वोसरिया॥ १५१०॥ तो बसोनि वेश्येसी नातळे। तेवीं भक्त दिव्य भोगांसी कांटाळे। ठकलों म्हणे अनुतापबळें। पिटूनि कपाळें हरि स्मरे॥ ११॥ ऐशिया अनुतापस्थितीं। तत्काळ भोग क्षया जाती। तो जन्म पावे महामती। माझी भक्ती जिये गृहीं॥ १२॥ त्यासी पूर्वसंस्कारस्थितीं। सकळ विषयांची विरक्ती। उपजतचि लागे भक्तिपंथीं। भक्त आवडती जीवेंप्राणें॥ १३॥ तो मुक्तीतें हाणोनि लातें। निजसर्वस्वें भजे मातें। यापरी मी निजभक्तातें। नेदीं विघ्नातें आतळूं॥ १४॥ यापरी ज्यांस विषयविरक्ती। तेही इष्टापूर्त जैं करिती। योग याग त्याग जैं साधिती। माझी भक्ती तैं उपजे॥ १५॥ समाहित करोनि मन। श्रौतस्मार्तकर्मानुष्ठान। योग याग त्याग साधन। निष्ठेनें जाण जैं करिती॥ १६॥ तेणें शोधित होय चित्तावृत्ती। झालिया चित्तशुद्धीची प्राप्ती। तैं उपजे माझी सद्भक्ती। जाण निश्चितीं उद्भवा॥ १७॥ इतुकी न करितां आटाटी। माझे सद्भक्तीची होय भेटी। हें अतिगुह्य आहे माझे पोटीं। ते तुज मी गोठी सांगेन॥ १८॥ सांडोनिसकळ साधन। जो करी साधुभजन। तेव्हांचि त्याचें शुद्ध मन। सत्य जाण उद्धवा॥ १९॥ म्हणसी साधु तो कैसा कोण। मागां सांगीतलें लक्षण। बहु बोलावया नाहीं कारण। साधु तो जाण सद्गुरु॥ १५२०॥ त्या सद्गुरूचें भजन। जो भावार्थें करी आपण। सर्व शुद्धीचें कारण। सद्गुरु जाण सर्वांशीं॥ २१॥ ज्याचे मुखींचें वचन। ब्रह्मसाक्षात्कारा पाववी जाण। त्याचे सेवितां श्रीचरण। शुद्ध कोण होईना॥ २०॥ गुरुनाम घेतां मुखें। कळिकाळ पाहूं न शके। त्याची सेवा करितां हरिखें। पायां मोक्षसुखें लागती॥ २३॥ ज्यासी सद्गुरूची आवडी चित्तीं। ज्याची सद्गुरुभजनीं अतिप्रीती। त्यासी भाळली माझी सद्भक्ती। पाठीं लागे निश्चितीं वरावया॥ २४॥ जो गुरुभजनीं भावार्थी। जगामाजीं तोचि स्वार्थी। त्यापाशीं माझी सद्भक्ती। असे तिष्ठती आंखिली॥ २५॥ सद्भक्ति बापुडी कायसी। अंगें मीही अहर्निशीं। तिष्ठतसें स्वानंदेंसीं। गुरुप्रेमासी भूललों॥ २६॥ मज माझ्या भक्तांची थोडी गोडी। परी गुरु भक्तांची अतिआवडी। सत्संगेंवीण रोकडी। सद्भक्ति चोखडी न पविजे॥ २७॥
प्रायेण भक्तियोगेन सत्सङ्गेन विनोद्धव।
नोपायो विद्यते सध्र्यङ् प्रायणं हि सतामहम्॥ ४८॥
माझिये प्राप्तीलागुनी। भक्ति-ज्ञानमार्ग दोन्ही। ज्ञान अत्यंत कठिणपणीं। भक्ति निर्विघ्नीं पाववी मज॥ २८॥ संसार तरावयालागीं। अनेक साधनें अनेगीं। बोलिलीं तीं जाण वाउगीं। उत्तम प्रयोगीं मद्भक्ती॥ २९॥ उपायांमाजीं अतिप्रांजळ। निर्विघ्न आणि नित्य निर्मळ। माझा भक्तिमार्ग केवळ। ज्ञान तें विकळ मध्यपाती॥ १५३०॥ मळा शिंपावयालागुनी। मोट पाट उपाय दोन्ही। मोटां काढिजे विहीरवणी। बहुत कष्टोनी अतिअल्प॥ ३१॥ मोट नाडा बैलजोडी। अखंड झोडितां आसुडीं। येतां जातां वोढावोढी। भोय भिजे थोडी भाग एक॥ ३२॥ तेथही मोट फुटे कां नाडातुटे। वोडव पडे बैल अवचटे। तरी हातां येतां पीक आटे। वोल तुटे तत्काळ॥ ३३॥ तैसा नव्हे सरितेचा पाट। एक वेळ केल्या वाट। अहर्निशीं घडघडाट। चालती लोट जीवनाचे॥ ३४॥ मोटेचें पाणी तैसें ज्ञान। करूनि वेदशास्त्रपठण। नित्यानित्य विवेकासी जाण। पंडित विचक्षणबैसती॥ ३५॥ एक कर्माकडे वोढी। एक संन्यासाकडे बोडी। एक म्हणती हे गोष्टी कुडी। देहो वोढावोढीं न घालावा॥ ३६॥ एक म्हणती प्रारब्ध प्रमाण। एक म्हणती सत्य शब्दज्ञान। एक म्हणती धरावें मौन। अतिजल्पन न करावें॥ ३७॥ एक म्हणती सांडावी व्युत्पत्ती। ज्याची चढे अधिक युक्ती। तोचि ज्ञाता निश्चितीं। सांगों किती मूर्खांसी॥ ३८॥ एक म्हणती तप प्रमाण। एक म्हणती पुरश्चरण। एक म्हणती वेदाध्ययन। द्यावें दान एक म्हणती॥ ३९॥ एक तो हें अवघेंचि मोडी। घाली योगाचिये कडाडीं। लावी आसनमुद्रेची वोढी। बैसवी रोकडी वारयावरी॥ १५४०॥ ऐसे नाना वाद करितां। एक निश्चयो नव्हे सर्वथा। ज्ञानाभिमान अतिपंडितां। ज्ञान तत्त्वतां कळेना॥ ४१॥ ऐसी ज्ञानमार्गींची गती। नाना परींचीं विघ्नें येती। विकल्पें नासल्या व्युत्पत्ती। माझी निजप्राप्ती तेथें नाहीं॥ ४२॥ तैसी नव्हे माझी भक्ती। नाममात्रें मज पावती। नामें उद्धरले नेणोंकिती। हेंचि भागवतीं बोलिलें॥ ४३॥ माझें करितां गुणवर्णन। कां हरिकथा नामसंकीर्तन। तेथें रिघों न शके विघ्न। गडगर्जन हरिनामें॥ ४४॥ जेथें हरिनामाचे पवाडे। तेथें विघ्न कैंचें बापुडे। विघ्न पळे मद्भक्तांपुढें। उघडती कवाडें मोक्षाचीं॥ ४५॥ माझे भक्त अतिनिराश। न धरिती मोक्षाचीआस। यालागीं मी हृषीकेश। त्यांच्या भावार्थास भूललों॥ ४६॥ एवं निर्विघ्न मजमाजीं सरता। मार्ग नाहीं भक्तिपरता। त्रिसत्य सत्य गा सर्वथा। भक्ति तत्त्वतां मज पढिये॥ ४७॥ ऐशी निजभक्ति सुलभ फुडी। देवो सांगे अतिआवडीं। उद्धवासी हरिभक्तीची गोडी। हर्षाची गुढी उभारिली तेणें॥ ४८॥ जें उद्धवाच्या जीवीं होतें। तेंचि निरूपिलें श्रीअनंतें। हरिखें नाचों लागला तेथें। जीवें श्रीकृष्णातें वोवाळी॥ ४९॥ ऐशी तुझी सुलभ भक्ति। तरी अवघेचि भक्ति कां न करिती। देवो म्हणेभाग्येंवीण माझी भक्ति। न घडे निश्चितीं उद्धवा॥ १५५०॥ कोटि जन्मांची पुण्यसंपत्ती। जरीगांठीं असेल आइती। तैं जोडे माझ्या संतांची संगती। सत्संगें भक्ती उल्हासे॥ ५१॥ सत्संगें भक्तीची प्राप्ती। उद्धवा जाण तू निश्चितीं। संतांपाशीं माझी भक्ती। वास पाहती उभी असे॥ ५२॥ हो कां तूं संत माझे म्हणसी। येर लोक सांडिले कोणापाशीं। तुझी भक्ति अहर्निशीं। संतांपाशीं कां असे॥ ५३॥ उद्धवा ऐसा विकल्पभावो। येथें धरावया नाहीं ठावो। संतभजनीं माझा सद्भावो। केवा कोण पाहावो भक्तीचा॥ ५४॥ संतसेवा करावयासी। कोण कारण तूं मज म्हणसी। अनावरा मज अनंतासी। तिंहीं निजभावेंसी आकळिलें॥ ५५॥ मज आकळिलें ज्या हेतू। तेहीसांगेन तुज मातू। मजवांचूनि जगाआंतू। दुसरा अर्थू नेणती॥ ५६॥ आपुलें जें स्वकर्म। मज अर्पिले सर्व धर्म। देह गेह रूप नाम। आश्रमधर्म मदर्पण॥ ५७॥ कल्पांतींचेनि कडकडाटें। जैं धाके धाके विराट आटे। ऐसीं वोढवल्या अचाटें। मजवेगळे नेटें न ढळती॥ ५८॥ तुटोनि पडतां आकाश। आणिकाची ते न पाहती वास। यालागीं मी हृषीकेश। त्यांचा दास झालों असें॥ ५९॥ नवल भावार्थाचा महिमा। मज विश्वात्म्याचे झाले ते आत्मा। ऐसें लाहाणें तयां आम्हां। मज पुरुषोत्तमा वश केलें॥ १५६०॥ संतांसीं मज भिन्नपण। कल्पांतींही नाहीं जाण। तुज जिव्हारींची उणखूण। तुज संपूर्ण सांगीतली॥ ६१॥ संत माझे झाले माझ्या भक्तीं। येर लोक मज न भजती। ते म्यांदिधले काळाच्या हातीं। अदृष्टगतीं बांधोनी॥ ६२॥ माझिया संतांपाशीं। यावया प्राप्ती नाहीं काळासी। मी सदा संरक्षिता त्यांसी। ते कळिकाळासी नागवती॥ ६३॥ यापरी संतांचें सर्व काज। करितां मज नाहीं लाज। उद्धवा माझें अत्यंत निजगुज। तें मी तुज सांगेन॥ ६४॥
अथैतत्परमं गुह्यं शृण्वतो यदुनन्दन।
सुगोप्यमपि वक्ष्यामि त्वं मे भृत्य: सुहृत्सखा॥ ४९॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायामेकादशस्कन्धे एकादशोऽध्याय:॥ ११॥
ऐकें यदुवंशकुळटिळका। तूं स्वगोत्र भृत्य सुहृद सखा। तुज न सांगिजे हा आवांका। सर्वथा देखा न धरवे॥ ६५॥ मज गुप्ताचें गुप्त सार। साराचें गुप्त भांडार। ते भांडारींचें निज सार। तुज मी साचार सांगेन॥ ६६॥ ऐसें गुह्याचें गुह्य निश्चितीं। नाहीं सांगीतलें कोणाप्रती। तूं सखा जिवलग सांगाती। अनन्य प्रीती मजलागीं॥ ६७॥ केवळ कोरडी नव्हे प्रीती। तैसीच माझी अनन्यभक्ती। भक्तीसारिखी विरक्ती। अवंचक स्थिती तुजपाशीं॥ ६८॥ यादववंशीं पाहतां देख। मजसमान तूंचि एक। समान सगोत्र आणि सेवक। हें अलोकिक उद्धवा॥ ६९॥ नव्हेसी कार्यार्थी सेवक। सर्वभावें विश्वासुक। किती वाणूं गुण एकएक। परम हरिख मज झाला॥ १५७०॥ यालागीं गुह्य तेंही तुझ्या ठायीं। वंचावया मज धीरु नाहीं। हृदय आलिंगिलें हृदयीं। चिदानंदू पाहीं तुष्टला॥ ७१॥ मग म्हणे सावधान। सादर आइक माझें वचन। तुज फावल्या माझें गुह्य ज्ञान। वंशउद्धरण तुझेनि॥ ७२॥ जे वंशीं होय ब्रह्मज्ञानी। तो वंश पवित्र त्याचेनी। हे सत्य जाण माझी वाणी। विकल्प मनीं न धरावा॥ ७३। म्हणसी स्वयें तूं ब्रह्म पूर्ण। वंशीं अवतरलासी नारायण। तेणें वंश उद्धरला जाण। माझें ज्ञान तें किती॥ ७४॥ तरी नाम रूप जाति गोत। या अवघ्यांसी मी अलिप्त। सकळ कुळेंसीं मी कुळवंत। गोत समस्त जग माझें॥ ७५॥ ऐसें म्हणोनि निजगुह्यसार। तुज मी सांगेन साचार। तेणें होईल जगाचा उद्धार। ऐसें शार्ङ्गधर बोलिला॥ ७६॥ तें ऐकावया गुह्य ज्ञान। उद्धवें मनाचे उघडिले कान। सावध पाहतां हरीचें वदन। नयनीं नयन विगुंतले॥ ७७॥ यापरी उद्धव सावधान। त्यासी कृष्ण सांगेल गुह्य ज्ञान। पुढीले अध्यायीं अतिगहन। रसाळ निरूपणहरीचें॥ ७८॥ एका विनवी जनार्दन। संतीं मज द्यावें अवधान। श्रोतीं व्हावें सावधान। मस्तकींचरण वंदिले॥ ७९॥ तुमचेनि पदप्रसादें। श्रीभागवतींचीं श्लोकपदें। वाखाणीन अर्थावबोधें। संत स्वानंदें तुष्टलिया॥ १५८०॥ यालागीं एका शरण जनार्दनीं। तंव जनार्दनचि एकपणीं। जेवींकां सागरींचें पाणी। तरंगपणीं विराजे॥ १५८१॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे एकादशस्कंधे एकाकारटीकायां श्रीकृष्णोद्धवसंवादे एकादशपूजाविधानयोगो नाम एकादशोऽध्याय:॥ ११॥ श्रीकृष्णार्पणमस्तु॥ मूळश्लोक॥ ४९॥ ओव्या १५८१॥
॥ श्री ॐ तत्सत्-श्रीकृष्ण प्रसन्न॥
अध्याय बारावा
श्रीगणेशाय नम:॥ श्रीकृष्णाय नम:॥ ॐ नमो सद्गुरु वसंतू। ऐक्यकाळीं तुझा ऋतू। तया ऋतुकाळींचा मारुतू। ज्ञानवनांतू जैं रिघे॥ १॥ तैं अविद्येचीं जुनीं पानें। गळूनि जाती तत्क्षणें। नवपल्लवीं विराजमानें। विरक्तपणें आरक्त॥ २॥ अत्यंत वैराग्याची हांव। खांकर झाले वृक्ष सर्व। त्यांसी निघाले नवपल्लव। अतिलवलव कोंवळिक॥ ३॥ जाहल्या वसंताचें रिगवणें। वृक्ष आडवे फुटले तेणें। सोहंभावाचीं सुमनें। तेणें गुणें विकासलीं॥ ४॥ कृष्णसारूप्यें कृष्णभ्रमर। तेथें झेपावले अतिसत्वर। आमोद सेविती अरुवार। कैसेनि केसर कुचंबे॥ ५॥ सद्भावाच्या आमोदधारा। सेवितां सुख झालें भ्रमरां। हृदयकमळीं केला थारा। मध्यमद्वारा चालिले॥ ६॥ भेदोनियां साही कमळें। द्विदळादि षोडशदळें। झेपावले मळयानिळें। सहस्रदळीं मिसळले॥ ७॥ तेथ सेवूनि पराग धवळ। उन्मत्त मातलें अळिकुळ। करिती आनंदाचा गोंधळ। सुखकल्लोळ स्वानंदें॥ ८॥ लागला अनुहताचा ध्वनी। रुणझुणिती दशलक्षणीं। त्याही नादातें प्राशुनी। नि:शब्दपणीं निवांत॥ ९॥ तेथें मोक्षसुखाचे घड। डोलतां दिसे अतिगोड। तेणें जीवाचें पुरत कोड। करिती धुमाड सोहंशब्दें॥ १०॥ मुमुक्षुमयूर अतिप्रीतीं। पिच्छें पसरूनि नाचती। येऊन वसंतवनाप्रती। टाहो फोडिती गुरुनामें॥ ११॥ नेमस्त कोकिळां होतें मौन। वसंतऋतुराज देखोन। तिंहीं करोनि विसर्जन। मधुरस्तवनें गर्जती॥ १२॥ भक्तिसरोवरीं निर्मळ पाणी। विकासल्या नवविध कमळिणी। भक्त सुस्नात तिये स्थानीं। निमज्जनीं निश्चळ॥ १३॥ ते सरोवरींचें सेवितां पाणी। जीवशिव चक्रवाकें दोनी। सद्गुरुचिद्भानु वसंतवनीं। देखोनि मिळणीं मिळालीं॥ १४॥ वसंतें उल्हास तरुवरां। उलोनि लागल्या स्वानंदधारा। पारंब्या भेदूनियां धरा। धराधरा विगुंतल्या॥ १५॥ बोधमलयानिळ झळकत। तेणें वनश्री मघमघित। मोक्षमार्गीचे पांथिक तेथ। निजीं निजत निजरूपें॥ १६॥ ऐसा सद्गुरु वसंतरावो। निजभक्तवना दे उत्सावो। तो भागवतभजनअध्यावो। उद्धवासी देवो सांगत॥ १७॥ बारावे अध्यायीं निरूपण। सत्संगाचा महिमा गहन। कर्माचा कर्ता तेथ कोण। त्यागितें लक्षण कर्माचें॥ १८॥ संपतां अकरावा अध्यावो। गुह्य सांगेन म्हणे देवो। तें परिसावया उद्धवो। न्याहाळी पहा हो हरिवदन॥ १९॥ काय सांगेल गुह्य गोष्टी। कोण अक्षरें निघती ओंठीं। त्या वचनार्था घालावया मिठी। उल्हास पोटीं उद्धवा॥ २०॥ जैसें मेघमुखींचें उदक। वरच्यावरी झेली चातक। तैसें कृष्णवचनालागीं देख। पसरिलें मुख उद्धवें॥ २१॥ स्नान संध्या भोजन। आवडे या एकें काळें जाण। तैसें ज्ञेय ज्ञाता ज्ञान। घ्यावया सावधान उद्धव॥ २२॥ ऐसा उद्धवाचा आदरू। देखोनि हरि झाला सादरू। भक्तकृपाळू अतिउदारू। निजगुह्यसारू सांगत॥ २३॥
श्रीभगवानुवाच
न रोधयति मां योगो न साङ्ख्यं धर्म एव च।
न स्वाध्यायस्तपस्त्यागो नेष्टापूर्तं न दक्षिणा॥ १॥
व्रतानि यज्ञश्छन्दांसि तीर्थानि नियमा यमा:।
यथावरुन्धे सत्सङ्ग: सर्वसङ्गपहो हि माम्॥ २॥
मज वश करावयालागीं। सामर्थ्य नाहीं अष्टांगयोगीं। नित्यानित्यविवेक जगीं। आंगोवांगी मज न पवे॥ २४॥ प्रकृतिपुरुषविवंचना। अखंड आलोडितां मना। पावावया माझिया स्थाना। सामर्थ्य जाणा त्या नाहीं॥ २५॥ धर्म अहिंसादिसहित। सत्य त्यांचेनि मी नव्हें प्राप्त। मुख्यवेदाध्ययनेंही मी अप्राप्त। साङ्ग समस्त जरी पढिले॥ २६॥ तेथ तपें कायसीं बापुडीं। पंचाग्नि असार परवडी। कृच्छ्रचांद्रायणें झालीं वेडीं। त्यांचे जोडी मी न जोडें॥ २७॥ देहगेह सांडूनि उदास। विरजा होमीं हवी सर्वस्व। साधनीं अतिश्रेष्ठ संन्यास। त्यासी मी परेश नातुडें॥ २८॥ करितांश्रौतस्मार्तकर्मांसी। कर्मठें झालीं पानपिसीं। तरी मी नाकळें त्यांसी। क्लेश होमेंसीं कष्टतां॥ २९॥ गोदान भूदान तिलदान। दान देतां धनधान्य। त्यांसीं मी नाटोपें जाण। दानाभिमान न वचतां॥ ३०॥ संकटचतुर्थी ऋषिपंचमी। विष्णुपंचक बुधाष्टमी। अनेक व्रतें करितां नेमीं। ते मी कर्मीं नातुडें॥ ३१॥ अश्वमेध राजसूययाग। सर्वस्व वेंचूनि करितां साङ्ग। माझे प्राप्तीसी नव्हतीचि चांग। तेणें मी श्रीरंग नाटोपें॥ ३२॥ हो कां वापी कूप आराम। वृक्षारोपण वनविश्राम। आचरतां स्मार्तकर्म। मी आत्माराम न भेटें॥ ३३॥ नाना छंद रहस्यमंत्र। विधिविधान अतिविचित्र। सामर्थ्यें अतिविशेषपवित्र। नव्हती स्वतंत्र मत्प्राप्ती॥ ३४॥ पुष्करादि नाना तीर्थें। पापनिर्दळणीं अतिसमर्थें। शीघ्र पावावया मातें। सामर्थ्य त्यांतें असेना॥ ३५॥ यमनियम अहर्निशीं। जे सदा शिणती साधनेंसीं। ते यावया माझ्या द्वारासी। सामर्थ्य त्यांसी असेना॥ ३६॥ उद्धवा यमनियमनिर्धार। एकुणिसावे अध्यायीं सविस्तर। तुज मी सांगेन साचार। संक्षेपाकार बारावा॥ ३७॥ ते यमनियम बारा बारा। आणि सकळ साधनसंभारा। यावया माझिया नगरा। मार्गु पुढारा चालेना॥ ३८॥ ते गेलियासंतांच्या दारा। धरूनि साधूच्या आधारा। अवघी आलीं माझ्या घरा। एवं परंपरा मत्प्राप्ती॥ ३९॥ तैशी नव्हे सत्संगती। संगें सकळ संगांतें छेदिती। ठाकठोक माझी प्राप्ती। पंगिस्त नव्हती आणिकांचे॥ ४०॥ किडी भिंगुरटीच्या संगतीं। पालटली स्वदेहस्थिती। तेवीं धरिलिया संतांची संगती। भक्त पालटती मद्रूपें॥ ४१॥ केवळ पाहें पां जडमूढें। चंदनासभोंवतीं झाडें। तीं सुगंध होऊनि लांकडें। मोल गाढें पावलीं॥ ४२॥ तीं अचेतन काष्ठें सर्वथा। चढलीं देवब्राह्मणांचे माथां। त्यांचा पांग पडे श्रीमंता। राजे तत्त्वतां वंदिती॥ ४३॥ तैशी धरिल्या सत्संगती। भक्त माझी पदवी पावती। शेखीं मजही पूज्य होती। सांगों किती महिमान॥ ४४॥ संतसंगतीवेगळें जाण। तत्काळ पावावया माझें स्थान। आणिक नाहींच साधन। सत्य जाण उद्धवा॥ ४५॥ मागां बोलिलीं जीं साधनें। तीं अवघींही मलिन अभिमानें। ऐक तयांचीं लक्षणें। तुजकारणें सांगेन॥ ४६॥ अष्टांगयोगीं दुर्जयो पवन। सर्वथा साधेना जाण। साधला तरी नागवण। अनिवार जाण सिद्धींची॥ ४७॥ नित्यानित्यविवेकज्ञान। तेथ बाधी पांडित्यअभिमान। प्रबळ वांछी धनमान। ज्ञानचि विघ्न ज्ञान्यासी॥ ४८॥ अहिंसाधर्म करितां जनीं। धर्मिष्ठपणीं गाळिती पाणी। गाळितां निमाल्या जीवश्रेणी। अधर्मपणीं तो धर्म॥ ४९॥ करितां वेदाध्ययन। मुख्य वेदें धरिलें मौन। पठणमात्रें मी नातुडें जाण। याजनदान वांछिती॥ ५०॥ तप करूं जातां देहीं। क्रोध तापसांच्या ठायीं। परता जावों नेदी कंहीं। वाढला पाहीं नीच नवा॥ ५१॥ सर्वस्वत्यागें संन्यासग्रहण। तेथही न जळे देहाभिमान। व्यर्थ विरजाहोम गेला जाण। मानाभिमान बाधिती॥ ५२॥ श्रौत स्मार्त कर्म साङ्ग। इष्टापूर्त जे कां याग। तेथ आडवा ठाके स्वर्गभोग। कर्म क्षयरोग साधकां॥ ५३॥ नाना दानें देतां सकळ। वासना वांछी दानफळ। कां दातेपणें गर्व प्रबळ। लागला अढळ ढळेना॥ ५४॥ अनंतव्रतें व्रती झाला। चौदा गांठीं देवो बांधला। शेखीं अनंतातें विसरला। देवो हरविला हातींचा॥ ५५॥ नाना यज्ञ करितां विधी। मंत्र तंत्रपात्रशुद्धी। सहसा पावों न शके सिद्धी। पावल्या बाधी फळभोगू॥ ५६॥ नाना छंदें रहस्यमंत्र। विकळ हों नये उच्चार। मंत्रीं मंत्र रचिले साचार। चळले अपार मंत्रवादी॥ ५७॥ भगवीं करूनि तांबडीं। तीर्थाभिमानें जाले कापडी। भिके लागलीं बापुडीं। नाहीं अर्धघडीं विश्रांती॥ ५८॥ यमनियम बारा बारा। करितां अखंड वोरबारा। चोविसांमाजीं यांचा उभारा। नेणती सोयरा पंचविसावा॥ ५९॥ एवं सांगीतल्या साधनांसी। आपमतीं करितां त्यांसी। बाधकता आहे सर्वांसी। म्यां तुजपासीं सांगीतली॥ ६०॥ करितां साधनें आपमतीसी। तेणें विघ्नें उपजती ऐशीं। तींच साधनें साधुउपदेशीं। सर्वही सिद्धीसी पावती॥ ६१॥ साधु न सांगतां निर्धारीं। नाना साधनें हा काय करी। कोण विधान कैशी परी। निजनिर्धारीं कळेना॥ ६२॥ न करितां साधनव्युत्पत्ती। केवळ जाण सत्संगती। मज पावले नेणों किती। तें मी तुजप्रती सांगेन॥ ६३॥
सत्सङ्गेन हि दैतेया यातुधाना मृगा: खगा:।
गन्धर्वाप्सरसो नागा: सिद्धाश्चारणगुह्यका:॥ ३॥
विद्याधरा मनुष्येषु वैश्या: शूद्रा: स्त्रियोऽन्त्यजा:।
रजस्तम: प्रकृतयस्तस्मिंस्तस्मिन्युगेऽनघ॥ ४॥
पाहतां केवळ जडमूड। रजतमयोनीं जन्मले गूढ। सत्संगती लागोनि दृढ। मातें सुदृढ पावले॥ ६४॥ दैत्य दानव निशाचर। खग मृग गंधर्व अप्सर। सिद्ध चारण विद्याधर। नाग विखार गुह्यक॥ ६५॥ खग मृग सर्प पावले मातें। मानव तंव सहजें सरते। वैश्य शूद्र स्त्रियादि समस्तें। पावलीं मातें सत्संगें॥ ६६॥ जे सकळवर्णधर्मांवेगळे। ज्यांच्या नामास कोणी नातळे। छाया देखूनि जग पळे। अत्यंत मैळे अंत्यज॥ ६७॥ तिंहीं धरोनि सत्संगती। आले माझिया पदाप्रती। देव द्विज तयांतें वंदिती। अभिनव कीर्ति संतांची॥ ६८॥ धरिलिया सत्संगती। निंद्य तेही वंद्य होती। उद्धवा तूं निष्पाप निश्चितीं। तरी सत्संगती करावी॥ ६९॥ सोनें साडेपंधरें चोखडें। त्यासी रत्नाची संगती जोडे। तैं अधिकाधिक मोल चढे। मुकुटीं चढे महेशा॥ ७०॥ तैंशीं पुण्य पुरुषा सत्संगती। जाहल्या अनंत सुख पावती। सुरवर त्यांतें वंदिती। शिवादि येती भेटीसी॥ ७१॥ यमधर्म पायां लागती। तीर्थें पायवणी मागती। भावें धरिल्या सत्संगती। एवढी प्राप्ती पुरुषासी॥ ७२॥ दैत्य राक्षस स्त्री शूद्र पाहीं। अंत्यज तरले म्हणसी कायी। त्या त्या युगाच्या ते ते ठायीं। बहुसाल पाहीं उद्धरिले॥ ७३॥
बहवो मत्पदं प्राप्तास्त्वाष्ट्रकायाधवादय:।
वृषपर्वा बलिर्बाणो मयश्चाथ विभीषण:॥ ५॥
सुग्रीवो हनुमानृक्षो गजो गृध्रो वणिक्पथ:।
व्याध: कुब्जा व्रजे गोप्यो यज्ञपत्न्यस्तथापरे॥ ६॥
वृत्रासुर गाईजे वेदीं। जो इंद्रासी मिसळला युद्धीं। युद्धींही अविरुद्ध बुद्धी। माझे निजपदीं पावला॥ ७४॥ ऐकतां नारदाच्या गोठी। गर्भींच मजसी घातली मिठी। जो जन्मला कयाधूच्यापोटीं। भक्तजगजेठी प्रल्हादु॥ ७५॥ वृषपर्वा दैत्य उद्भटू। माझे पदीं झाला प्रविष्टू। बळीच्या द्वारी मी खुजटू। झालों बटू भिकेसी॥ ७६॥ छळें करितां बळिबंधन। छळितां मी छळिलों जाण। अंगा आलें द्वारपाळपण। बळीआधीन मी झालों॥ ७७॥ त्या बळीचा पुत्र बाणासुर। शिववरें मातला थोर। माझे पुत्राचा चोरिला पुत्र। दोहींचा हेर नारदू॥ ७८॥ तो म्यां साधूनि धरिला चोरू। बाणीं केला अतिजर्जरू। छेदिला सहस्र भुजांचा भारू। शिव जीवें मारूं नेदीच॥ ७९॥ तो म्हणे हा भक्तपुत्र झणीं मारीं। मजही बळीची भीड भारी। अखंड मी असें त्याच्या द्वारी। यालागीं उद्धरीं बाणातें॥ ८०॥ मग संबोखावया शिवातें। बाण आपुले निजहस्तें। ऐक्यें शिवपदीं स्थापिलें त्यातें। कल्याणातें पावला॥ ८१॥ खांडववन अग्नीसी। अर्जुनें दीधलें खावयासी। तेथें जळतां मयासुरासी। म्यांचि तयासी उद्धरिलें॥ ८२॥ राक्षसकुळीं जन्मला जाण। शत्रूचा बंधू बिभीषण। माझ्या ठायीं अनन्यशरण। जीवप्राण तो माझा॥ ८३॥ सुग्रीव हनुमंत जांबवंतू। यांचा पवाडा विख्यातू। जटायु उद्धरिला वनांतू। जो रावणें खस्तू केला होता॥ ८४॥ गज सरोवरीं ग्रहग्रस्त। स्त्रिायांपुत्रीं सांडिलाजीत। तो अंतकाळीं मातें स्मरत। आर्तभूत अतिस्तवनें ॥ ८५॥ सांडूनि समस्तांची आस। पाहोनि वैकुंठाची वास। राजीव उचलूनि राजस। पाव परेश म्हणे वेगीं॥ ८६॥ त्या गजेंद्राचे तांतडी। वैकुंठींहूनि लवडसवडी। म्यां गरुडापुढें घालोनि उडी। बंधन तोडीं गजाचे॥ ८७॥ त्यासी पशुयोनीं जन्म होतें। परी तो अंतीं स्मरला मातें। पावला माझ्या निजधामातें। गाईजे त्यातें पुराणीं॥ ८८॥ वैश्य तुळाधार वाणी। सत्य वाचा सत्य जोखणी। सत्यें पावला मजलागुनी। सत्यतोलणी त्याचें नांव॥ ८९॥ अंत्यजांमाजीं धर्मव्याध। माझें पावला निजपद। जराव्याध गा प्रसिद्ध। करोनि अपराध उद्धरिला॥ ९०॥ चरणीं विंधोनियां बाण। घायें घेतला कृष्णाचा प्राण। तो परीक्षिति जराव्याध जाण। कृष्णें आपण तारिला॥ ९१॥ कौलिकांमाजीं गुहक देख। आला श्रीरामासंमुख। कर्म निरसलें नि:शेख। निजधाम देख पावला॥ ९२॥ कुब्जा तीं ठायीं वांकुडी। नीट निजभावें चोखडी। तिच्या चंदनाची शुद्ध गोडी। अति आवडी मजलागीं॥ ९३॥ तिणें चर्चूनियां चंदन। मन केलें मदर्पण। मी झालों तिजआधीन। निजधाम ते जाण पावली॥ ९४॥ गोकुळींचिया गोपिका। संसारासी होऊनि विमुखा। तनमनप्राणें मजलागीं देखा। भाळोनि निजसुखा पावल्या॥ ९५॥ माझी गोपिकांसी परम आवडी। कीं मजचि गोपिकांची गोडी। पाहतां यांचे समान पाडीं। जाहलीं बापुडीं साधनें॥ ९६॥ सांडूनि संसाराची चाड। न धरूनि पतिपुत्रांची भीड। यज्ञपत्न्यांसी माझें कोड। भावार्थें दृढ भाविकां॥ ९७॥ तिंहीं मज अर्पोनियां अन्न। माझें निजधाम पावल्या जाण। मज न पावतीच ते ब्राह्मण। जयांसी कर्माभिमान कर्माचा॥ ९८॥ एक ब्राह्मण अतिशास्त्रबळें। पत्नीसी येवूं नेदी मजजवळें। तुम्ही वेदशास्त्रांसी वेगळे। गोरक्ष गोंवळे केवीं पूजा॥ ९९॥ येरी समस्तां जातां देखोन। तिचें मजलागीं तळमळी मन। अतिकर्मठ तो ब्राह्मण कठिण। अवरोधून राखिली॥ १००॥ पित्यानें लाविलीसी माझ्या हातीं। तेव्हांच मी तुझ्या देहाचा पती। मज सांडूनि केउती। गोवळाप्रती जातेसी॥ १॥ येरी म्हणे तूं या देहाचा पती। तो देह ठेवूनियां तयाप्रती। जीवित्वे मीनलिया मजप्रती। सायुज्य मुक्ति पावली॥ २॥ ज्या माझिया प्राप्तीसी। साधक शिणती नाना सायासीं। तीं साधनें न करितां त्यांसी। अनायासीं मज पावल्या॥ ३॥
ते नाधीतश्रुतिगणा नोपासितमहत्तमा:।
अव्रतातप्ततपस: सत्सङ्गान्मामुपागता:॥ ७॥
तिंहीं नाहीं केलें वेदपठण। नाहीं गुरु केले केवळ शास्त्रज्ञ। व्रततपादि नाना साधन। नाहीं जाण तिंहीं केलें॥ ४॥ केवळ गा सत्संगतीं। मज पावल्या नेणों किती। एकभावें जे भावार्थी। त्यांसी श्रीपती सुलभू॥ ५॥
केवलेन हि भावेन गोप्यो गावो नगा मृगा:।
येऽन्ये मूढधियो नागा: सिद्धा मामीयुरञ्जसा॥ ८॥
केवळस्वरूप जे संत। त्यां माझी संगती झाली प्राप्त। काय करिसी तप व्रत। भावार्थें प्राप्त मज जाहलिया॥ ६॥ होआवया माझें पद प्राप्त। त्यांसी भांडवल गा भावार्थ। भावबळें गा समस्त। पदनिश्चित पावल्या॥ ७॥ ऐकोनि माझें वेणुगीत। गोपिका सांडूनि समस्त। निजदेहातें न सांभाळित। मज गिवसीत पातल्या॥ ८॥ सांडूनि पतिपित्यांची चाड। न धरोनि वेदशास्त्रांची भीड। माझे ठायीं निजभाव दृढ। प्रेम अतिगोड गोपिकां॥ ९॥ पुत्रस्नेह तोडूनि घायें। विधीतें रगडूनि पायें। माझे आवडीचेनि लवलाहें। गोपिका मज पाहें पावल्या॥ १०॥ त्याचपरी जाण गायी। वेणुध्वनीं वेधल्या पाहीं। व्याघ्रभय विसरल्या देहीं। माझ्या ठायीं विनटल्या॥ ११॥ माझ्या वेणुध्वनीं वेधलें मन। वत्सें विसरलीं स्तनपान। मुखींचा कवळ मुखीं जाण। माझें ध्यान लागलें॥ १२॥ माझ्या वेणुश्रवणास्तव जिंहीं। निजवैर सांडूनिदेहीं। येरयेरांवरी माना पाहीं। व्याघ्रहरिणें तींही विनटलीं॥ १३॥ म्यां उपडिले यमलार्जुन। ते तरले हें नवल कोण। वृंदावनींचे वृक्ष तृण। माझ्या सांनिध्यें जाण उद्धरले॥ १४॥ मयूर तरले मोरपिसीं। गुल्मलतातृणपाषाणांसी। जड मूढ वृंदावनवासी। मत्सांनिध्यें त्यांसी उद्धारू॥ १५॥ माझे संगतीं अनन्य प्रीती। तेचि त्यांस शुद्ध भक्ती। तेणें कृतकृत्य होऊनि निश्चितीं। माझी निजप्राप्ती पावले॥ १६॥ माझेनि चरणघातें साचार। कालिया तरला दुराचार। नागनागिणी सपरिवार। माझेनि विखार उद्धरले॥ १७॥ आपुली जे निजपदप्राप्ती। ते सत्संगेंवीण निश्चितीं। दुर्लभ हें उद्धवाप्रती। स्वयें श्रीपती सांगत॥ १८॥
यं न योगेन सांख्येन दानव्रततपोऽध्वरै:।
व्याख्यास्वाध्यायसंन्यासै: प्राप्नुयाद्यत्नवानपि॥ ९॥
योग याग व्रत दान। वेदाध्ययन व्याख्यान। तप तीर्थ ज्ञान ध्यान। संन्यासग्रहण सादरें॥ १९॥ इत्यादि नाना साधनें। निष्ठा करितां निर्बंधनें। माझी प्राप्ति दुरासतेनें। जीवेंप्राणें न पविजे॥ १२०॥ यापरी शिणतां साधनेंसीं। माझी प्राप्ति नव्हे अतिप्रयासीं। ते गोपी पावल्या अप्रयासीं। सत्संगासी लाहोनी॥ २१॥ त्या गोपिकांसी माझी प्रीती। मीचि त्यांची सत्संगती। सत्संगें निजपदप्राप्ती। जाण निश्चितीं उद्धवा॥ २२॥ गोपिकांची सप्रेम स्थिती। ते तुज गोकुळीं झाली प्रतीती। तुजही न तर्केच त्यांची प्रीती। ते मी तुजप्रती सांगेन॥ २३॥ गोपिकांचें अत्यंत प्रेम। स्वमुखें सांगे पुरुषोत्तम। उद्धवाचें भाग्य उत्तम। आवडीचें वर्म देवो सांगे॥ २४॥
रामेण सार्धं मथुरां प्रणीते
श्वाफल्किना मय्यनुरक्तचित्ता:।
विगाढभावेन न मे वियोग-
तीव्राधयोऽन्यं ददृशु: सुखाय॥ १०॥
बळिभद्रासमवेत तत्त्वतां। अक्रूरें मज मथुरे नेतां। तैं गोपिकांसी जे झाली व्यथा। ते सांगतां मज न ये॥ २५॥ ते त्यांची अवस्था सांगतां। मज अद्यापि धीर न धरवे चित्ता। ऐसें देवो सांगतसांगतां। कंठीं बाष्पता दाटली॥ २६॥ सांगतां भक्तांचें निजप्रेम। प्रेमें द्रवला पुरुषोत्तम। जो भक्तकामकल्पद्रुम। कृपा निरुपम भक्तांची॥ २७॥ मज मथुरे जातां देखोनी। आंसुवांचा पूर नयनीं। हृदय फुटे मजलागुनी। प्रेम लोळणी घालिती॥ २८॥ पोटांतील परम प्रीती। सारितां मागें न सरती। धरिले चरण न सोडिती। येती काकुळती मजलागीं॥ २९॥ नवल भावार्थ त्यांच्या पोटीं। माझ्या रूपीं घातली मिठी। सोडवितां न सुटे गांठी। श्वास पोटीं परतेना॥ १३०॥ लाज विसरल्या सर्वथा। सासुरां पतिपित्यां देखतां। माझे चरणीं ठेवूनि माथा। रडती दीर्घता आक्रंदें॥ ३१॥ मजवीण अवघें देखती वोस। माझीच पुन:पुन्हा पाहती वास। थोर घालोनिनिश्वास। उकसाबुकसीं स्फुंदत॥ ३२॥ आमुचा जिवलग सांगाती। घेऊनि जातो हा दुष्टमूर्ती। अक्रूरा संमुख क्रूर म्हणती। येती काकुळती मजलागीं॥ ३३॥ उभ्या ठाकोनि संमुख। माझेंपाहती श्रीमुख। आठवे वियोगाचें दु:ख। तेणें अधोमुख विलपती॥ ३४॥ ऐशिया मजलागींआसक्त। माझ्या ठायीं अनन्यचित्त। विसरल्या देहसुखें समस्त। अतिअनुरक्त मजलागीं॥ ३५॥ माझेनि वियोगें तत्त्वतां। त्यांसी माझी तीव्र व्यथा। ते व्यथेची अवस्था। बोलीं सांगतां मज न ये॥ ३६॥ मजवेगळें जें जें सुख। तें गोपिकांसी केवळ दु:ख। कैशी आवडी अलोलिक। मज हृदयीं देख न विसंबती॥ ३७॥ मज गोकुळी असतां। माझे ठायीं आसक्तचित्ता। ते आसक्तीची समूळ कथा। ऐक आतां सांगेन॥ ३८॥
तास्ता: क्षपा: प्रेष्ठतमेन नीता
मयैव वृन्दावनगोचरेण।
क्षणार्धवत्ता: पुनरङ्ग तासां
हीना मया कल्पसमा बभूवु:॥ ११॥
नवल गोपिकांचा हरिख। मज वृंदावना जातां देख। माझें पाहोनि श्रीमुख। प्रात:काळीं सुख भोगिती॥ ३९॥ गायी पाजोनियां पाणी। गोठणीं बैसवीं मध्यान्हीं। तेथें उदकमिषें गौळणी। पाहावयालागूनी मज येती॥ १४०॥ तेथें नाना कौतुकें नाना लीला। नाना परींच्या खेळतां खेळां। तो तो देखोनि सोहळा। सुखें वेल्हाळा सुखावती॥ ४१॥ मज सायंकाळीं येतां देखोनी। आरत्या निंबलोण घेऊनी। सामोऱ्या येती धांवोनी। लागती चरणीं स्वानंदें॥ ४२॥ ऐशीं त्रिकाळ दर्शनें घेतां। धणी न पुरे त्यांचे चित्ता। त्याहीवरी वर्तली कथा। एकांतता अतिगुह्य॥ ४३॥ त्या गुह्याचें निजगुज। उद्धवा मी सांगेन तुज। महासुखाचें सुखभोज। मी अधोक्षज नाचिन्नलों॥ ४४॥ तें सुख गोपिका जाणती। कीं माझें मी जाणें श्रीपती। जे रासक्रीडेच्या रातीं। झाली सुखप्राप्ती सकळिकांसी॥ ४५॥ त्या सुखाची सुखगोडी। रमा काय जाणे बापुडी। ब्रह्मादिकें केवळ वेडीं। त्या सुखाची गोडी नेणती॥ ४६॥ पावावया त्या सुखासी। सदाशिव झाला योगाभ्यासी। तरी प्राप्ति नव्हे तयासी। भुलला मोहिनीसी देखतां॥ ४७॥ उमा होऊनि भिल्लटी। तिणें भुलविला धूर्जटी। त्या सुखाची सुखगोष्टी। नेणती हटी तापसी॥ ४८॥ जवळी असोनि निश्चितीं। संकर्षण महामूर्ती। त्यासी त्या सुखाची प्राप्ती। नव्हे निश्चितीं उद्धवा॥ ४९॥ रासक्रीडा गोपिकांप्रती। कोणी म्हणेल कामासक्ती। तेथ कामाची कैंची प्राप्ती। ऐक निश्चितीं उद्धवा॥ १५०॥ शिवातें जिणोनि फुडा। काम म्हणे मी सबळ गाढा। माझी भेदावया रासक्रीडा। वाऊनि मेढा चालिला॥ ५१॥ जेथ माझ्या स्वरूपाचेंवोडण। तेथ न चले कामाचें कामपण। मोडले मदनाचे बाण। दृढ वोडण स्मरणाचें॥ ५२॥ काम कामिकां चपळदृष्टी। निजक्षोभाची तीक्ष्ण बाणाटी। संधि साधूनि विंधे हटी। ते नव्हेचि पैठी हरिरंगीं॥ ५३॥ जेथ मी क्रीडें आत्मारामू। तेथ केवीं रिघे बापुडा कामू। माझे कामें गोपिकानिष्कामू। कामसंभ्रमू त्यां नाहीं॥ ५४॥ जो कोणी स्मरे माझें नामू। तिकडे पाहूं न शके कामू। जेथ मी रमें पुरुषोत्तमू। तेथ कामकर्मू रिघेना॥ ५५॥ कामू म्हणे कटकटा। अभाग्य भाग्यें झालों मोटा। रासक्रीडेचिया शेवटील गोटा। आज मी करंटा न पवेंचि॥ ५६॥ देखोनि रासक्रीडा गोमटी। काम घटघटां लाळ घोटी। लाज सांडूनि जन्मला पोटीं। त्या सुखाचे भेटीलागोनि॥ ५७॥ तो काम म्यां आपुले अंकीं। केला निजभावें निजसुखी। तें माझें निजसुख गोपिकीं। रासमिषें कीं भोगिलें॥ ५८॥ ते रासक्रीडेची राती। म्यां ब्रह्मषण्मास केली होती। गोपिका अर्धक्षण मानिती। वेगीं कां गभस्ती उगवला॥ ५९॥ जेथ माझा क्रीडासुखकल्लोळ। तेथ कोण स्मरे काळवेळ। गोपिकांचें भाग्य प्रबळ। माझें सुख केवळ पावल्या॥ १६०॥ ऐशा माझिया संगतीं। भोगिल्या राती नेणों किती। तरी त्यांसी नव्हे तृप्ती। चढती प्रीती मजलागीं॥ ६१॥ गोपिका करूनि माझी भक्ती। मी प्रसन्न केलों श्रीपती। रास मागीतला एकांतीं। माझी सुखप्राप्ती पावावया॥ ६२॥ त्या जाण वेदगर्भींच्या श्रुती। श्रुतिरूपें नव्हे मत्प्राप्ती। तैं परतल्या म्हणोनि ‘नेति नेति’। माझी सुखसंगती न पवेचि॥ ६३॥ विषयबुद्धितें मुख्य अज्ञान। तें असतां मी न भेटें जाण। असतां वेदोक्त जाणपण। तेणेंही संपूर्णं न भेटें मी॥ ६४॥ जाणीवनेणीव गेलिया नि:शेष। माझें पाविजे निजात्मसुख। श्रुति जाणोनि हें निष्टंक। गोकुळीं त्या देख सुखार्थ आल्या॥ ६५॥ त्याचि जाण समस्त श्रुती। गोपिकारूपें गोकुळा येती। रासक्रीडामिसें एकांतीं। माझी सुखप्राप्ती पावल्या॥ ६६॥ हाही असो अभिप्रावो। उद्धवा ज्यासीजैसा भावो। त्यालागीं मी तैसा देवो। यदर्थीं संदेहो असेना॥ ६७॥ उद्धवा मी भक्तांसी देख। कोणे काळीं नव्हें विमुख। जो तैसा भावी भाविक। तैसा मी देख तयासी॥ ६८॥ मी जनांसी सदा सन्मुख। जनचि मजसी होती विन्मुख। यासी कांहीं न चले देख। दाटूनि दु:ख भोगिती॥ ६९॥ मी सकाम सकामाच्या ठायीं। निष्कामासी निष्काम पाहीं। नास्तिका मी लोकीं तिहीं। असतूचि नाहीं नास्तिक्यें॥ १७०॥ असो हे किती उपपत्ती। ऐक गोपिकांसी माझी प्रीती। माझे सुखसंगें भोगिल्या राती। त्या मानिती निमेषार्ध॥ ७१॥ माझ्या वियोगें त्या त्या राती। ज्या आलिया यथास्थिती। त्या गोपिका कल्पप्राय मानिती। सन्निध स्वपती असतांही॥ ७२॥ त्यांच्या दु:खाची अवस्था। बोलें न बोलवे सर्वथा। माझेनि वियोगें मातें स्मरतां। समाधिअवस्था पावल्या॥ ७३॥
ता नाविदन्मय्यनुषङ्गबद्ध-
धिय: स्वमात्मानमदस्तथेदम्।
यथा समाधौ मुनयोऽब्धितोये
नद्य: प्रविष्टा इव नामरूपे॥ १२॥
मज गोकुळीं असतां। माझे ठायीं आसक्तचित्ता। हे अवघी समूळ कथा। तुज म्यां तत्त्वतां सांगीतली॥ ७४॥ ऐशियांसी म्यां अतिनिचाडतां। कृतघ्नाचे परी सांडूनि जातां। माझ्या वियोगकाळींची व्यथा। पाषाण पाहतां उतटती॥ ७५॥ यापरी मजवेगळ्ॺा असतां। मागें माझी कथा वार्ता। सदा माझें स्मरण करितां। मदाकारता पावल्या॥ ७६॥ करितां दळण कांडण। माझे दीर्घस्वरें गातीगुण। कीं आदरिल्या दधिमंथन। माझें चरित्रगायन त्या करिती॥ ७७॥ करितां सडासंमार्जन। गोपिकांसी माझें ध्यान। माझेनि स्मरणें जाण। परिये देणें बालकां॥ ७८॥ गायीचें दोहन करितां। माझे स्मरणीं आसक्तता। एवं सर्व कर्मीं वर्तता। माझ्या विसराची वार्ता विसरल्या॥ ७९॥ करितां करितां गमनागमन। अखंड माझ्या ठायीं मन। आसन भोजन प्राशन। करितां मद्धॺान तयांसी॥ १८०॥ एवं मज गेलियापाठीं। ऐशी माझी आवडी मोठी। अखंड माझ्या ठायीं दृष्टीं। माझ्याचि गोष्टी सर्वदा॥ ८१॥ ऐसी अनन्य ठायींच्या ठायीं। गोपिकांसी माझी प्रीति पाहीं। त्या वर्ततांही देहगेहीं। माझ्या ठायीं विनटल्या॥ ८२॥ यापरी बुद्धि मदाकार। म्हणोनि विसरल्या घरदार। विसरल्या पुत्रभ्रतार। निजव्यापार विसरल्या॥ ८३॥ विसरल्या विषयसुख। विसरल्या द्वंद्वदु:ख। विसरल्या तहानभूक। माझेनि एक निदिध्यासें॥ ८४॥ जेणें देहें पतिपुत्रांतें। आप्त मानिलें होतें चित्तें। तें चित्त रातलें मातें। त्या देहातें विसरोनी॥ ८५॥ विसरल्या इहलोक परलोक। विसरल्या कार्यकारण नि:शेख। विसरल्या नामरूप देख। माझेंध्यानसुख भोगितां॥ ८६॥ निरसोनि तत्त्वांचे विकार। समाधि पावे मुनीश्वर। तो विसरे जेवीं संसार। तेवीं मदाकार गोपिका॥ ८७॥ जेवीं कां नाना सरिता। आलिया सिंधूतें ठाकितां। तेथें पावोनि समरसता। नामरूपता विसरल्या॥ ८८॥ तेवीं गोपिका अनन्यप्रीतीं। माझी लाहोनियां प्राप्ती। नामरूपाची व्युत्पत्ती। विसरल्या स्फूर्ती स्फुरेना॥ ८९॥ सच्चिदानंदस्वरूपप्रभावो। नेणतां माझा निजस्वभावो। गोपिकांचा अनन्यभावो। परब्रह्म पहा हो पावल्या॥ १९०॥
मत्कामा रमणं जारमस्वरूपविदोऽबला:।
ब्रह्म मां परमं प्रापु: सङ्गाच्छतसहस्रश:॥ १३॥
त्या केवळ अबला निश्चितीं। मत्संगाची अतिप्रीती। तेही संगती कामासक्ती। शास्त्रप्रवृत्तीविरुद्ध॥ ९१॥ मी भ्रतारू नव्हें शास्त्रविधी। रूपें मदनमोहन त्रिशुद्धी। मज रतल्या ज्या अविधी। जारबुद्धीं व्यभिचारें॥ ९२॥ चौं प्रकारींच्या कामिनी। हस्तिनी इत्यादि पद्मिनी। चौघींसी चौं मुक्तिस्थानीं। काममोहनीं मी रमवीं॥ ९३॥ इतर पुरुषांचे संगतीं। क्षणभंगुर सुख भोगिती। अविनाशनिजसुखप्राप्ती। कामासक्ती माझेनि॥ ९४॥ स्वपतिसंगें क्षणिक आनंदू। माझ्या सुखाचा निजबोधू। नित्य भोगिती परमानंदू। स्वानंदकंदू सर्वदा॥ ९५॥ यालागीं गा अबळा चपळा। सांडूनि स्वपतीचा सोहळा। मजचि रातल्या सकळा। माझी कामकळा अभिनव॥ ९६॥ नव रसांचा रसिक। नवरंगडा मीच एक। यालागीं माझ्या कामीं कामुक। भावो निष्टंक गोपिकांचा॥ ९७॥ जीवाआंतुलिये खुणे। मीचि एक निववूं जाणें। ऐसें जाणोनि मजकारणें। जीवेंप्राणें विनटल्या॥ ९८॥ अंगीं प्रत्यंगीं मीचि भोक्ता। सबाह्य सर्वांगे मीचि निवविता। ऐसें जाणोनि तत्त्वतां। कामासक्तता मजलागीं॥ ९९॥ हावभावकटाक्षगुण। मीचि जाणें उणखूण। कोण वेळ कोण लक्षण। कोण स्थान मिळणीचें॥ २००॥ जे निजोनियां निजशेजारीं। जे काळीं माझी इच्छा करी। तेचि काळीं तेचि अवसरीं। सुखशेजारीं मी निववीं॥ १॥ मज कुडकुडें नाहीं येणें। नाहीं कवाड टणत्कारणें। नित्य निजशेजें निववणें। जे जीवेंप्राणें अनुसरली॥ २॥ ऐसा सर्वकामदायक। पुरुषांमाजीं मीचि एक। हा गोपिकीं जाणोनि विवेक। भाव निष्टंक धरियेला॥ ३॥ ज्यासी भाळले निष्काम तापसी। ज्यासी भाळले योगी संन्यासी। गोपी भाळल्या त्यासी। देहगेहांसी विसरोनी॥ ४॥ अंधारीं गूळ खातां। कडू न लगे तो सर्वथा। तेवीं नेणोनि माझी सच्चिदानंदता। मातें सेवितां मी जाहल्या॥ ५॥ परीस मानोनि पाषाण। फोडूं जातां लोहाचा घण। लागतांचि होय सुवर्ण। तैशा जाण गोपिकां॥ ६॥ विष म्हणोनि अमृत घेतां। मरण जाऊनि ये अमरता। तेवीं जारबुद्धीं मातें भजतां। माझी सायुज्यता पावल्या॥ ७॥ म्यांगोपिकांसी कामू केला। कीं त्यांचा सर्व कामू हरिला। विचारितां अर्थ एथिला। मोक्ष फावला मत्कामें॥ ८॥ ज्यांसी झाली माझी संगती। त्या एक दोन सांगों किती। शत सहस्र अमिती। निजपदाप्रती पावल्या॥ ९॥ वैरागराच्या मणीप्रती। खडे लागले हिरे होती। तैशा गोपिका माझ्या संगतीं। नेणों किती उद्धरल्या॥ २१०॥ मी परब्रह्ममूर्ति चोखडी। माझिया व्यभिचारपरवडी। धुतल्या अविद्यापापकोडी। मुक्ति रोकडी पावल्या॥ ११॥ मी अथवा माझे संत। संगती होईल ज्यांसी प्राप्त। ते मज पावले निश्चित। संदेह येथ न धरावा॥ १२॥ माझे स्वरूपावरी लोक। विकल्पें ठेविती नाना दोख। संत माझे निर्दोख। तत्संगें सुख निर्दुष्ट॥ १३॥ उद्धवा त्वांही येचि अर्थीं। बहुत न करावी व्युत्पत्ती। धरोनियां सत्संगती। संसारगुंती उगवावी॥ १४॥
तस्मात्त्वमुद्धवोत्सृज्य चोदनां प्रतिचोदनाम्।
प्रवृत्तं च निवृत्तं च श्रोतव्यं श्रुतमेव च॥ १४॥
माझें स्वरूप शुद्ध निर्गुण। वेद तितुका गा त्रिगुण। त्या वेदाचें जें प्रेरण। तें गौण जाण मत्प्राप्तीं॥ १५॥ त्या वेदार्थें श्रुतिस्मृती। नाना कर्में करविती। त्या कर्मांची कर्मगती। न कळेनिश्चितीं कोणासी॥ १६॥ कर्म स्वरूपें परम गूढ। विधिनिषेधें अतिअवघड। सज्ञानासी नव्हे निवाड। शास्त्रें दृढ विचारितां॥ १७॥ केवळ कर्मचि कर्माआंत। एक प्रवृत्त एक निवृत्त। सकाम निष्काम अद्भुत। अंगीं आदळत साधकां॥ १८॥ कर्म तितुकें आविद्यक। वेद तों त्रिगुणात्मक तत्संबंधीं श्रवण देख। साधनरूप वेदांत॥ १९॥ तमोगुणें कर्मकांड। रजोगुणें उपासनाकांड। सत्त्वगुणें ज्ञानकांड। वेद त्रिकांड त्रिगुणात्मक॥ २२०॥ वेदशास्त्र विधानविधी। यांचें मूळ अविद्या आधीं। जे अविद्येस्तव देहबुद्धी। विधिनिषेधीं गोंवित॥ २१॥ यालागीं उद्धवा तूं आधीं। सांडीं अविद्या पां त्रिशुद्धी। अविद्या सांडिल्या संबंधीं। सहजें वेदविधी सांडिला॥ २२॥ आधीं अविद्या ते कोण। हेंच आम्हां न कळे जाण। मग तिचें निराकरण। केवीं आपण करावें॥ २३॥ निजकल्पनेचा जो बोध। तेचि अविद्या स्वत:सिद्ध। तेणेंचि बाधे विधिनिषेध। ते त्यागिल्या शुद्ध ब्रह्मचि तो॥ २४॥ धूर पडिलिया रणीं। सहज कटक जाय पळोनी। तेवीं अविद्या सांडितां सांडणीं। विधिविधान दोनी सहजेंचि॥ २५॥ आंखु छेदिलिया पडिपाडें। रथ न चाले असतांही घोडे। तेवीं अविद्या छेदिलिया निवाडें। विधिनिषेध पुढें न चलती॥ २६॥ मूळ छेदिलिया एके घायीं। शाखा पल्लव छेदिले पाहीं। तेवीं अविद्या छेदिलिया लवलाहीं। विधिनिषेध राही सहजचि॥ २७॥ ऐकें वेदींचा तात्पर्यार्थ। मुख्य भजावा मी भगवंत। तोचि शास्त्रीं विशदार्थ। करी वेदांतश्रवणार्थें॥ २८॥ श्रवण केलियाचें फळ जाण। करावें अविद्यानिरसन। अविद्या निरसिलिया श्रवण। पुढारें जाण लागेना॥ २९॥ जेवीं ठाकिलिया स्वस्थान। पुढारें न लगे गमनागमन। तेवीं झालिया अविद्या निरसन। श्रवण मनन लागेना॥ २३०॥ म्हणसी अविद्या केवीं सांडे। हेंचि अवघड थोर मांडे। हें अवघें उगवे सांकडें। तें मी तुज पुढें सांगेन॥ ३१॥ वेदशास्त्रकर्मविधान। हें अविद्यायुक्त साधन। ते अविद्या जावया जाण। मजलागीं शरण रिघावें॥ ३२॥
मामेकमेव शरणमात्मानं सर्वदेहिनाम्।
याहि सर्वात्मभावेन मया स्या ह्यकुतोभय:॥ १५॥
सांडूनि स्त्रीपुत्रविषयध्यान। सांडूनि योग योग्यता शहाणपण। सांडूनि कर्मठता कर्माभिमान। मजलागीं शरण रिघावें॥ ३३॥ सांडूनियां वेदाध्ययन। सांडूनियां शास्त्रश्रवण। सांडूनि प्रवृत्ति निवृत्ति जाण। मजलागीं शरण रिघावें॥ ३४॥ सांडूनि धनमानचेष्टा। सांडूनि सज्ञान प्रतिष्ठा। सांडूनियां नाना निष्ठा। शरण वरिष्ठा मज यावें॥ ३५॥ सांडूनियां वैदिक लौकिक। सांडूनि आगम तांत्रिक। मज शरण रिघालिया देख। माझें निजसुख पावसी॥ ३६॥ सांडूनि कुळाचें उंचपण। सांडूनि जातीचा अभिमान। सांडूनि आश्रमाचें श्रेष्ठपण। मजलागीं शरण रिघावें॥ ३७॥ सांडूनियां ज्ञान ध्यान। सांडूनियां विधिविधान। सांडूनियां देहाभिमान। मजलागीं शरण रिघावें॥ ३८॥ माझें नांव अंतर्यामी। हृदयींचें जाणता मुख्यत्वें मी। तो मी चाळवेना शब्दधर्मीं। श्रद्धा परब्रह्मीं निर्ममत्वें॥ ३९॥ सर्व त्यागाचें त्यागितेपण। उद्धवा तुज मी सांगेन खूण। सर्व सांडावा अभिमान। हें मुख्य लक्षण त्यागाचें॥ २४०॥ सर्वही सांडोनि अभिमान। मज रिघालिया शरण। तुज कैंचें जन्ममरण। माझे प्रतापें जाण तरशील॥ ४१॥ शरण रिघावयासाठीं। काय रिघावें गिरिकपाटीं। किंवा सेवावी दरकुटी। अथवा दिक्पटीं भंवावें॥ ४२॥ तुज वस्तीसी नाहीं गांवो। नित्य नेमस्त कोण ठावो। शरण रिघावया कोठें धांवों। ऐसा भावो कल्पिसी॥ ४३॥ म्हणसी शरण रिघावें कवणे ठायीं। तरी मी असें तुझ्या हृदयीं। त्या हृदयस्थासी लवलाहीं। शरण पाहीं रिघावें॥ ४४॥ सर्वभावें सर्वस्वेंसीं। मज हृदयस्था शरण येसी। तैं माझी सर्वगतता पावसी। सर्वभूतनिवासी हृदयस्थू॥ ४५॥ तिळभरी राखोनि अभिमान। जरी मज रिघशी शरण। तरी माझी प्राप्ती नव्हे जाण। अभिमान विघ्न प्राप्तीसी॥ ४६॥ श्वानें स्पर्शिलें पक्कान्न। तें जेवीं नातळती ब्राह्मण। तेवीं जीवीं असतां अभिमान। साधकासी मी जाण नातळें॥ ४७॥ रजस्वलेची ऐकोनि वाणी। दूर पळिजे पुरश्चरणीं। तेवीं अहंकाराच्या साधनीं। थिता जवळुनी मी जायें॥ ४८॥ रजकविटाळाचें जीवन। जेवीं नातळती सज्जन। तेवीं हृदयीं असतां अभिमान। उद्धवा मी जाण न भेटें॥ ४९॥ डोळां हरळू न विरे। घायीं कोत न जिरे। टांकी मुक्तापळीं न शिरे। खिरीमाजीं न सरे सरांटा॥ २५०॥ तेवीं मजमाजीं अभिमान। उद्धवा न रिघे गा जाण। हे त्याग तात्पर्याची खूण। तुज म्या संपूर्ण सांगीतली॥ ५१॥ पत्नी विचरतां परपुरुषीं। देखोनि निजपती त्यागी तिसी। तेवीं अभिमानरत भक्तांसी। मी हृषीकेशी नातळें॥ ५२॥ यालागीं सांडूनि अभिमान। मज हृदयस्था रिघालिया शरण। तुज मी उद्धरीन जाण। देवकीची आण उद्धवा॥ ५३॥ म्हणसी तुज दोघी माता। कोणतीची आण मानूं आतां। मज तुझीच आण तत्त्वतां। तुज निर्भयता माझेनि॥ ५४॥ तूं बोलीं नातुडसी कांहीं। तुज सर्वथा क्रिया नाहीं। तुझी आणभाक मानावी कायी। ऐसें जरी कांहीं कल्पिसी॥ ५५॥ पातेजूनि तुझिया बोलासी। थितें सांडावें स्वधर्मासी। लटकें जाहलिया आणेसी। कोणें समर्थासीं भांडावें॥ ५६॥ उद्धवा ऐसें न म्हण। म्या जे वाहिली तुझी आण। तें परमात्म्यावरी प्रमाण। सत्य जाण सर्वथा॥ ५७॥ उद्धवा तूं आत्मा परिपूर्ण। मज तुज नाहीं मीतूंपण। त्या तुझी म्यां वाहिली आण। परम प्रमाण परमात्मता॥ ५८॥ असतां प्रत्यक्ष प्रमाण। कां लागे भाक आण। सर्वभावें मज आलिया शरण। आतांचि जाण तरशील॥ ५९॥ मज शरण रिघाल्या वाडेंकोडें। कळिकाळ तुझिया पायां पडे। कायसे भवभय बापुडें। कोण तुजकडे पाहेल॥ २६०॥ शरण रिघतांचि तत्काळ। तूं लाहासी माझें बळ। तेव्हां भवभय पळे सकळ। तुज कळिकाळ कांपती॥ ६१॥ तृणीं पेटलिया अग्निस्फुलिंग। तो जाळी नाना वनांचे दांग। तैसें शरण आलिया अव्यंग। संसारदांग तूं जाळिसी॥ ६२॥ शरण यावें हृदयस्थासी। तो हृदयस्थ न कळे आम्हांसी। उद्धवा तूं ऐसें म्हणसी। तरी ऐक त्या स्वरूपासी सांगेन॥ ६३॥ सांडूनि रूपनामअभिमान। स्फुरे जें कां उद्धवपण। तें मज हृदयस्थाचें रूप जाण। त्यासी तुवां शरण रिघावें॥ ६४॥ नाम-रूप-गुणवार्ता। हे माया जाण तत्त्वतां। ते सांडूनि जे स्फुरे सत्ता। तें मज हृदयस्थाचें रूप॥ ६५॥ ऐसेनि हृदयस्थ जोडल्या पहा हो। तेव्हां सर्व भूतीं पाहतां देवो। तेथ वेगळा उरावया उद्धवो। रिता ठावो न दिसेचि॥ ६६॥ तेव्हां सर्व भूतीं मी एकू। निश्चयें जाण निष्टंकू। देखतांही अनेक लोकू। त्यांसी मी एकू एकला॥ ६७॥ ऐसा तूं मिळोनि हृदयस्थासी। मी होऊनि मज पावसी। माझी प्राप्ती उद्धवा ऐसी। निर्भयेंसीं निश्चळ॥ ६८॥ ऐशी सांगोनि गुह्य गोष्टी। देवो उद्धवाची पाठी थापटी। येरें चरणीं घातली मिठी। उठवितां नुठी सर्वथा॥ ६९॥ तुवां जें सांगितलें निजगुज। तें मज मानलें गा सहज। बोला एकाचा संशय मज। तो मी तुज पुसेन॥ २७०॥
उद्धव उवाच
संशय: शृण्वतो वाचं तव योगेश्वरेश्वर।
न निवर्तत आत्मस्थो येन भ्राम्यति मे मन:॥ १६॥
वेदशास्त्राचें मथित सार। योगदुर्गींचें भांडार। पिकल्या सुखाचा सुखसागर। मज साचार उपदेशिला॥ ७१॥ तूं योगियांचा योगेश्वर। सकळ जगाचा ईश्वर। तुझें सत्य गा उत्तर। संशयकर मज वाटे॥ ७२॥ तुवांच सांगितलें साक्षेपें जाण। करावें गा स्वधर्माचरण। तें सत्य मानूनि वचन। सर्वस्वें जाण विश्वासलों॥ ७३॥ करावें जें स्वधर्माचरण। तेंच म्हणशी माझें भजन। शेखीं तेंही आतां सांडून। रिघावें शरण म्हणतोसी॥ ७४॥ तरी आत्मा कर्ता कीं अकर्ता। हेंचि न कळे तत्त्वतां। कर्म करावें कीं सर्वथा। आम्हीं आतां सांडावें॥ ७५॥ तुझी विषम उपदेशव्युत्पत्ती। सांगतां आम्हां अबळांप्रती। थोर संदेह वाढत चित्तीं। काय श्रीपती करावें॥ ७६॥ जरी आत्मा झाला अकर्ता। तरी कर्माचा कोण कर्ता। जैं आत्म्यासी आली अकर्तव्यता। तैं त्याग सर्वथा घडेना॥ ७७॥ ऐकोनि उद्धवाचा प्रश्न। सांवळा राजीवलोचन। काय बोलिला हांसोन। सावधान परिसावें॥ ७८॥
श्रीभगवानुवाच
स एष जीवो विवरप्रसूति:
प्राणेन घोषेण गुहां प्रविष्ट:।
मनोमयं सूक्ष्ममुपेत्य रूपं
मात्रा स्वरो वर्ण इति स्थविष्ठ:॥ १७॥
ऐक बापा उद्धवा। मी मायेच्या निजस्वभावा। अनुसरोनि जीवभावा। कर्तृत्व जीवाजीवत्वें॥ ७९॥ जळीं प्रतिबिंबला सविता। तो जळकंपें दिसे कांपता। तेवीं अकर्ताचि मी दिसेंकर्ता। जीवअहंतास्वभावें॥ २८०॥ राजा झालिया निद्रेआधीन। तो स्वप्नीं रंक होय आपण। तेवीं प्रकृतीस्तव मज जाण। जीवपण आभासे॥ ८१॥ स्वयें राजा आहे आपण। तो स्वप्नीं रंकत्वें करी कोरान्न। तेथें जो दे पसाभर कण। त्यासी वानी आपण राजा रे तूं॥ ८२॥ आपणचि राजा आहे। हें त्याचें त्यास ठाउकें नव्हे। तैसेंच जीवासही होये। पूर्णत्व स्वयें स्मरेना॥ ८३॥ जेवीं स्वप्नाचिया अवस्था। राजा रंकक्रिया करी समस्ता। तेवीं अविद्येस्तव तत्त्वतां। कर्मकर्ता मी झालों॥ ८४॥ तेथें वेदोक्त विधिविधान। जीवाअंगीं आदळे जाण। जंव नव्हे ब्रह्मज्ञान। तंव स्वधर्माचरण करावें॥ ८५॥ राजा राजपदीं जागा नव्हे। तंव रंकक्रिया त्यासी संभवे। तेवीं जंव ब्रह्मज्ञान नव्हे। तंव सर्व करावे स्वधर्म॥ ८६॥ राजा राजपदीं जागा झाला। तो भीक म्हणतांचि लाजला। तेवीं ब्रह्मज्ञान जो पावला। तो ‘मी कर्ता’ या बोला न बोले कदा॥ ८७॥ जैसें रायास मिथ्या रंकपण। तेवीं परमात्म्यासी जीवत्व जाण। त्या जीवास शरीरीं संसरण। तें उपलक्षण अवधारीं॥ ८८॥ जैसा जीव जडातें जीवविता। यालागीं जीवू ऐशी वार्ता। सहजें तरी स्वभावतां। चैतन्यरूपता जीवाची॥ ८९॥ घटामाजीं दीपू घातला। तैं घटभरी प्रकाशू झाला। तोचि घरामाजीं ठेविला। घरभरी झाला प्रकाश॥ २९०॥ तेवीं शरीरमाजीं तरी जीवू। सहजें तरी हा सदाशिवू। येथ बोलणें न लगे बहू। जीवशिवअनुभवू तो ऐसा॥ ९१॥ आरिशाचा सूर्य दिसे हातीं। तेवीं शरीरीं जीवाची प्रसूती। प्रकर्षेंसीं राहती स्थिती। यालागीं ‘प्रसूती’ बोलिजे॥ ९२॥ आरसा अत्यंत लहान। तेथें सूर्य बिंबे संपूर्ण। तेवीं विदेहा देहधारण। ‘विवरप्रवेशन’ त्या नांव॥ ९३॥ थिल्लरीं चंद्रासी अभिव्यक्ती। तो गगनींचा दिसे अधोगती। तेवीं शरीरीं जीवाची प्रसूती। अव्यक्त व्यक्तीं प्रवेशे॥ ९४॥ जळीं सविता प्रतिबिंबला। परी तो जळें नाहीं ओला झाला। तेवीं कर्में करोनि संचला। अलिप्त ठेला निजआत्मा॥ ९५॥ जळीं प्रतिबिंब आंदोलायमान। तेवीं जीवासी जन्ममरण। थिल्लरीं चंद्रअडकला संपूर्ण। तेवीं कर्मबंधन जीवासी॥ ९६॥ थिल्लरजळ आटलें। तेथें काय चंद्रबिंब निमालें। तें चंद्रबिंब होवोनि ठेलें। जाहलें निमालें दोनी मिथ्या॥ ९७॥ थिल्लरींचा चंद्र काढूं जातां। तो मिथ्यात्वें न ये हाता। तेवीं देहीं मिथ्या जीवता। ते सत्य मानितां अतिदु:खी॥ ९८॥ आरसा थोर अथवा लहान। तेथें सूर्य बिंबे संपूर्ण। तेवीं मी अंतर्यामी जाण। सर्वांभूतीं समान समग्र असें॥ ९९॥ सूर्य थिल्लराआंतौता। अडकला दिसे समस्तां। तेवीं जीवासी कर्मबद्धता। मूर्ख तत्त्वतां मानिती॥ ३००॥ गगनींचा सूर्यो न देखती। थिल्लरीं अडकला मानिती। तेवीं निर्गुणीं जया नाहीं प्रतीती। ते बद्ध म्हणती जीवातें॥ १॥ अग्निज्वाळा जाळीं आकळितां। जाळें जळे आकळूं जातां। तेवीं आत्मयाकर्मीं बांधतां। कर्मीं कर्मता निष्कर्म॥ २॥ नादउत्पत्तीसी ठावो। मुख्य वावो कां दुसरा घावो। या दोहींवेगळा नित्य निर्वाहो। तो नादू पहा हो अनुहत॥ ३॥ अनुहताचा सोलींव शब्दू। परापरतीरीं पराख्य नादू। ज्याचा योगियां सदा छंदू—। बोलिला अनुवादू नव्हे त्याचा॥ ४॥ ज्या नादाची सुखगोडी। सदाशिवूच जाणे फुडी। कां सनकादिकीं चोखडी। चाखिली गाढी ते चवी॥ ५॥ वायूचें शोधितां सत्त्व। त्यासी एकवटलें तें शब्दतत्त्व। उभयचेतनें जीवित्व। मनोमयत्व धरूं पाहे॥ ६॥ चेतनेचें चेतनत्व। तें वायूचें शोधित सत्त्व। तेंचि शब्दाचें निजतत्त्व। तेणें जीवित्वमनोरूप होय॥ ७॥ जीवाचा शरीरसंयोग। स्वयें सांगे तो श्रीरंग। आधारादिचक्रप्रयोग। क्रमेंचिसाङ्ग सांगत॥ ८॥ अहमिति प्रथमाध्यासें। जीवासी जीवत्व आभासे। तो जे जे तत्त्वीं प्रवेशे। तें मी ऐसें म्हणतचि॥ ९॥ तेथ मी देहो म्हणतां। तत्काळ जाय पूर्णता। तेव्हां एकदेशी परिच्छिन्नता। देहात्मता लागली॥ ३१०॥ निर्विशेष नाद अतिसूक्ष्म प्राण। त्यासहित आधारीं प्रवेशोन। अतिसूक्ष्म प्रथम स्फुरण। पावोनि जाण परा झाली॥ ११॥ आधारचक्रीं सूक्ष्म प्राण। परा वाचा तेथींची जाण। मनाचें कोंवळें स्फुरण। अतिसपूरपण सूक्ष्मत्वें॥ १२॥ स्वाधिष्ठानचक्राच्या ठायीं। मनाचें वाढतें बाळसें पाहीं। पश्यंती वाचा तये ठायीं। बोलूं देखे परी कांहीं बोलेना॥ १३॥ तिये चक्रीं एकवटला प्राण। पुढारां न चलेचि गा जाण। प्राणापानां झालें भांडण। दोघेजण रूसले॥ १४॥ घरकलहो लागला भारी। मग निघाले वेगळे चारी। पांचही राहिले पांचापरी। ऐक निर्धारीं विचारू॥ १५॥ मागें रुसोनि गेला जाण। त्या नांव म्हणती अपान। रागें पुढारां आला जाण। त्या नांव प्राण म्हणताती॥ १६॥ दोहींमाजीं समत्वें जाण। नाभीं राहिला तो समान। कंठीं राहिलातो उदान। व्यानासी रहावया स्थान असेना॥ १७॥ अद्यापि शरीरीं जाण। व्यानासी नाहीं एकस्थान। तो सर्वांगीं सर्वदा जाण। परिभ्रमण करीतसे॥ १८॥ याहून धाकटे पांच प्राण। तेही वेगळे राहिले जाण। तिंहीं वेगळालें आपण। वस्तीसी स्थान योजिलें॥ १९॥ नाग कूर्म कृकल देवदत्तू। पांचवां धनंजय जाण तेथू। यांची वस्ती जे शरीरांतू। ऐक निश्चितू सांगेन॥ ३२०॥ शिंक जांभई आणि ढेंकर। नाग कूर्म कृकलांचें घर। उचकी देवदत्ताचें बिढार। धनंजयासी थार मिळेचिना॥ २१॥ जीवदेहांचे आप्तवादापासीं। धनंजयो राहिला वस्तीसी। जीवें सांडिल्या शरीरासी। मुहूर्तार्ध देहासी तो वांचवी॥ २२॥ स्वाधिष्ठानाहोनि जाण। अनुक्रमें दशधा होती प्राण। त्यांचें स्थान मान उपलक्षण। तुज म्यां जाण सांगीतलें॥ २३॥ मागें म्यां सांगितली गोष्टी। प्राणापान रुसल्यापाठीं। दोघां अद्यापि नाहीं भेटी। महाहटी छांदस॥ २४॥ त्या दोघांसी करी बुझावण। तो माझा पढियंता तूं जाण। त्या सर्वस्व दें मी आपण। योगसाधन या नांव॥ २५॥ उद्धवा प्राणलक्षणें सांगतां। अवचटें प्राणापानसमता। प्रसंगीं आली कथा। त्वांही स्वभावातां ऐकावी॥ २६॥ स्वाधिष्ठानाहूनि मणिपुरा येतां। जीवामनांसी एकात्मता। सूक्ष्मप्राण तेथ वसतां। परेच्या ऐक्यता पश्यंती॥ २७॥ तेथ मनाचें खेळुगेपण। कुमार अवस्था बाणली जाण। तंव डोलत पुढें चाले प्राण। अनाहतस्थान ठाकिलें॥ २८॥ धरोनि पश्यंतीचें अनुसंधान। मध्यमा वाचा उपजे जाण। मौनाची मिठी न सोडून। करी गुणगुण आपणांत॥ २९॥ तेथ मनाची पौगंड अवस्था। मागें पुढें सांभाळितां। वांछी नानाभोग अवस्था। लाजा सर्वथा बोलेना॥ ३३०॥ मग वेगें ठाकिलें विशुद्धिस्थान। तेथ उसळत उदान झाला प्राण। तंव मनासी तारुण्यपण। पुरतें जाण बाणलें॥ ३१॥ त्या विशुद्धचक्राप्रती। परा मिळोनि आंतौती। पश्यंती मध्यमा एक होती। वाचा घुमघुमती झणत्कारें॥ ३२॥ त्या झणत्कारापरिपाठीं। वक्त्रीं वाचा तत्काळ उठी। तारुण्यें उन्मत्त झाली मोठी। त्या स्वरवर्ण चावटी मांडिली॥ ३३॥ आज्ञाचक्र भ्रूस्थान। तें याहूनि वेगळें जाण। तेथें वाचेसी नाहीं गमन। हंसलक्षण योग्यांचें॥ ३४॥ हीं साही चक्रें अनुक्रमें जाण। चार मातृका अठ्ठावीस वर्ण। सोळाही स्वर संपूर्ण। हंसलक्षण योगियांचें॥ ३५॥ कोण चक्रीं कोण वर्ण। मातृकांचें कोणतें स्थान। कोठें उठती स्वर संपूर्ण। तेंही लक्षण अवधारीं॥ ३६॥ आधारचक्रीं चतुर्दळ उभारा। तेथ न्यसिल्या चारी मात्रा। व श ष स या अक्षरां। बोलिजे मात्रा शास्त्रज्ञीं॥ ३७॥ स्वाधिष्ठान षड्दळ जेथ। साही वर्ण स्थापिले तेथ। बकरादि लकारान्त। जाण निश्चित ते स्थानीं॥ ३८॥ मणिपूर दशदळ निश्चित। दहा वर्ण स्थापिले तेथ। डकारादि फकारान्त। वर्ण नांदत ते चक्रीं॥ ३९॥ अनाहतचक्र द्वादशदळयुक्त। बारा वर्ण न्यसिले तेथ। ककारादि ठकारान्त। वर्ण विराजत ते चक्रीं॥ ३४०॥ विशुद्धिचक्रींच्या सोळा दळां। अ इ उ ऋ लृ हे वर्ण सोळा। कंठस्थानीं मीनला मेळा। यांचा वेदीं आगळा प्रताप॥ ४१॥ आज्ञाचक्र अति अवघड। नुघडे एकाकीमुखाचें कवाड। न चले प्राणांची चडफड। मार्ग अतिगूढ लक्षेना॥ ४२॥ तें आज्ञाचक्र गा द्विदळ। केवळ हंसाचें राउळ। तेथ पावावया योगबळ। अतिप्रबळ पाहिजे॥ ४३॥ हें स्थान पावावयासाठीं। योगी झाले महाहटी। अभ्यास करितां अतिसंकटीं। तेही शेवटीं न पावती॥ ४४॥ हें पावावया माझें स्थान। अतिगुह्य आहे अनुष्ठान। सोहंहंसाचें साधन। सावधान जो साधी॥ ४५॥ प्राणाचेनि गमनागमनें। सोहंहंसाचेनि स्मरणें। सावधानें जो साधूंजाणे। तेणें पावणें हें स्थान॥ ४६॥ त्यासीचि पवनजयो घडे। तोचि आज्ञाचक्रामाजीं चढे। तेथूनिही मार्ग काढी पुढें। अतिनिवाडें अचूक॥ ४७॥ तेथ नानाभोगसमृद्धिफळें। आणितीऋद्धिसिद्धींचें पाळें। तें डावलूनियां सकळें। निघे निर्मळें निजपंथें॥ ४८॥ जो कां ऋद्धिसिद्धींसी भुलला। मी सिद्ध ये श्लाघे आला। तो आज्ञाचक्रावरोनि चेवला। केल्या मुकला कष्टासी॥ ४९॥ ज्यासी वैराग्य असे सपुरतें। तो कदा भुलेना सिद्धीतें। लाता हाणोनि भोगमान्यतेतें। निघे निजपंथें मजलागीं॥ ३५०॥ तैं औटपीठ गोल्हाट। सांडूनि भ्रमरगुंफा कचाट। शोखूनि सहस्रदळाचे पाट। मजमाजीं सुभट मिसळले॥ ५१॥ सांगतां आज्ञाचक्राची संस्था। पुढें गोडी लागली योगपंथा। मागील विसरलों जी कथा। क्षमा श्रोतां करावी॥ ५२॥ म्हणाल वाहवटीं पडला मासा। तो परतेना जेवीं सहसा। ग्रंथनिरूपणीं तूं तैसा। जल्पू वायसा कां करिसी॥ ५३॥ जेवीं चुकलिया बाळकातें। माता शिकवण दे त्यातें। तेवीं तुमचें वचन मातें। निजहितातें द्योतक॥ ५४॥ करितां चक्रांचें निरूपण। योगारूढ झालें मन। विसरोनि मागील निरूपण। गेलें निघून शेवटां॥ ५५॥ हें ऐकोनि हांसिले श्रोते। तूं कर्ता नव्हसी येथें। हें कळोनि गेलें आमुतें। नको परिहारातें उपपादूं॥ ५६॥ आलोडितां ग्रंथकोडी॥ न कळे योगज्ञानाची गोडी। ते तुवां विशद केली फुडी। निजपरवडीविभागें॥ ५७॥ तुझेनि मुखें कृष्णनाथें। श्रीभागवत जें कठिण होतें। तें अर्थविलें यथार्थें। सत्य आमुतें मानलें॥ ५८॥ हा बारावा अध्यावो। अतिगूढ बोलिला देवाधिदेवो। तेथींचाही त्वां अभिप्रावो। विशद पहा हो विवरिला॥ ५९॥ ऐसा संतीं करोनि आदरू। निर्भय दिधला नाभिकारू। एका जनार्दनीं हर्षनिर्भरू। केला नमस्कारू संतांसी॥ ३६०॥ ‘वैखरी मात्रा स्वर वर्ण’। या पदांचें झालें व्याख्यान। तेंचि दृष्टांतें श्रीकृष्ण। उद्धवासी जाण सांगतू॥ ६१॥ सूक्ष्म जीवशिवांचें मूळ। तोचि वाग्द्वारा झाला स्थूल। येचि अर्थीं अतिविवळ। करूनि प्रांजळ सांगत॥ ६२॥
यथानल: खेऽनिलबन्धुरूष्मा
बलेन दारुण्यधिमथ्यमान:।
अणु: प्रजातो हविषा समिध्यते
तथैव मे व्यक्तिरियं हि वाणी॥ १८॥
अव्यक्तरूपें ऊष्मा गगनीं। व्यापकपणें असे वन्ही। तो अरणीमाजीं मथितां मंथनीं अतिसूक्ष्मपणीं प्रकटला॥ ६३॥ अनळा अनिळ निजसखा। कोमळ तूळें फुंकितां देखा। दिसे लखलखीत नेटका। ज्वाळा साजुका कोंवळिया॥ ६४॥ तेथ पावला दशा मध्यम। मग हवनद्रव्यें करितां होम। तेणें थोरावला निरुपम। वाढला व्योमचुंबित॥ ६५॥ तैसा सूक्ष्म नाद शिवसंयोगें। प्राणसंगमें लागवेगें। षटचक्रादिप्रयोगें। वैखरीयोगें अभिव्यक्त॥ ६६॥ मरा हे ऐकतां गोठी। ते वाचा सर्वांशें वाटे खोटी। तेंचि अक्षरें केल्या उफराटीं। रामनामें गोमटी निववी वाचा॥ ६७॥ करितां सुष्ठु दुष्टु उच्चार। वर्ण नव्हती क्षर अक्षर। यालागीं नांव तें अक्षर। यापरी पवित्र ते वाणी॥ ६८॥ जैशी वाचेची अभिव्यक्ती। तैशीच इतर इंद्रियप्रवृत्ती। संक्षेपें तेही स्थिती। उद्धवाप्रती सांगतू॥ ६९॥
एवं गदि: कर्म गतिर्विसर्गो
घ्राणो रसो दृक् स्पर्श: श्रुतिश्च।
सङ्कल्पविज्ञानमथाभिमान:
सूत्रं रज:सत्त्वतमोविकार:॥ १९॥
जैशी वाचेची व्युत्पत्ती। तैशीच कर्मेंद्रियांची प्रवृत्ती। चरणांच्या ठायीं गती। ग्रहणशक्ती हस्तांची॥ ३७०॥ विसर्ग जाण पायूचा। सुखोद्रेक तो लिंगाचा। कर्मेंद्रियीं पांचवी वाचा। विस्तारू तिचा सांगीतला॥ ७१॥ तैशींच जाण ज्ञानकरणें। दृष्टी उठी देखणेपणें। रसना रसातें चाखों जाणे। श्रवणा श्रवणें अधिकारू॥ ७२॥ शीत उष्ण मृदु कठिण। हें त्वगिंद्रियाचें लक्षण। सुगंध दुर्गंध जाणतेपण। घ्राण विचक्षण ते कर्मीं॥ ७३॥ संकल्प विकल्प मनाचे। निश्चयो कर्म बुद्धीचें। चिंतन जाण चित्ताचें। अहंकाराचें मीपण॥ ७४॥ सूत्र तंव प्रधानाचें। विकार रजतमसत्त्वांचे। संक्षेपें विवरण तिहींचें। ऐक साचें सांगेन॥ ७५॥ आधिदैव आधिभौत। ज्यासी आध्यात्म म्हणत। वाढला जो प्रपंचू येथ। ईश्वराचें अभिव्यक्त स्वरूप जाण॥ ७६॥ जगाचें मूळकारण। अंगें ईश्वरचि आपण। त्या कारणाहूनि कार्य भिन्न। नव्हे जाण सर्वथा॥ ७७॥ हो कां घृताची एके काळीं। थिजोनि झालिया पुतळी। ते घृताहोनि वेगळी। नाहीं देखिली प्रत्यक्ष॥ ७८॥ काष्ठाचा घोडा केला। अंगें ठाणें अति मिरविला। तो काष्ठपणा नाहीं मुकला। सर्वांगें शोभला काष्ठत्वें॥ ७९॥ त्याचे पाहतां वेगळाले अवयव। खूर खांद काष्ठचि सर्व। तेवीं महाभूतें गुणप्रभव। स्वरूप सावेव शिवाचें॥ ३८०॥ सुवर्णाचें झालें लेणें। तें जेवीं मिरवे सोनेपणें। तेवीं महाभूतें विषयकरणें। अभिन्नपणें शिवरूप॥ ८१॥ फडा पुच्छ वांकुडा बाग। येणें आकारें म्हणती नाग। तो नाग नव्हे सोनेंचि चांग। तेवीं हें जग मद्रूप॥ ८२॥ प्रपंच ईश्वरासी अभिन्न। येचि अर्थीं नारायण। उद्धवासी सांगें आपण। अभिन्नपण जीवशिवां॥ ८३॥
अयं हि जीवस्त्रिवृदब्जयोनि-
रव्यक्त एको वयसा स आद्य:।
विश्लिष्टशक्तिर्बहुधेव भाति
बीजानि योनिं प्रतिपद्य यद्वत्॥ २०॥
जीवाचा जीवू आपण। यालागीं बोलिजे शिवपण। जीवशिवरूपें हा भिन्न। जीवत्व जाण या हेतू॥ ८४॥ सागरु आपुल्या अंगावरी। वर्तुळ आवर्त करी धरी। तेवीं लोकपद्मातें श्रीहरी। करी धरी निजनाभीं॥ ८५॥ ‘त्रिवृदब्ज’ म्हणिजे यापरी। त्या नाभिकमळामाझारीं। स्वलीला त्रैलोक्यातें धरी। पद्मनाभ श्रीहरी या हेतू॥ ८६॥ सुवर्णाच्या सिंहासनीं। सुवर्णमूर्ती बैसवूनी। पूजिजे सुवर्णसुमनीं। एकपणें तीन्ही भासती॥ ८७॥ तेवीं नाभिपद्मीं त्रैलोक्य धरितां। तिहींतें भासवी अभिन्नता। यालागीं पद्मनाभ तत्त्वतां। आलें वाक्पथा श्रुतीचिया॥ ८८॥ दृति मार्दवें पिंवळी। एकली भासे चांपेकळी। तेचि विकासे जेवीं नाना दळीं। तेवीं मी वनमाळी लोकत्वें॥ ८९॥ हें नसतां कार्यकारण। यापूर्वी मी अव्यक्त जाण। जो मी प्रमाणांचाही प्रमाण। भेदें जेथ आण वाहिली॥ ३९०॥ हेतु मातु दृष्टांत। रिघों न शके ज्याच्या गांवांत। अपार अनादि अनंत। आद्य अव्यक्त मी ऐसा॥ ९१॥ एवं केवळ जें अभेद। तेथें कैंचे त्रिविध भेद। जेथ लाजोनि परतले वेद। स्वरूप शुद्ध तें माझें॥ ९२॥ तो न मेळवितां साह्यमेळू। स्वलीलाक्षोभें क्षोभक काळू। स्वशक्तीनें झालों सबळू। शक्तिबंबाळू चेतविला॥ ९३॥ ते निजशक्तीचे विभाग। म्यांचि विभागिले चांग। त्या विभागांचे भाग। ऐकसाङ्ग सांगेन॥ ९४॥ गुणशक्ति देवताशक्ती। मन:शक्ति इंद्रियशक्ती। महाभूतांची भूतशक्ती। एथ क्रियाशक्ती मुख्यत्वें॥ ९५॥ जीवापासाव अदृष्टशक्ती। झाली अनिवार त्रिजगतीं। हरिहरां नावरे निश्चितीं। अदृष्टशक्ती अनिवार॥ ९६॥ जें अदृष्टशक्तीनें जिवातें। बांधोनि केलें आपैतें। तिसी आवरावया मातें। सामर्थ्य येथें आथी ना॥ ९७॥ जेवीं कां राजाज्ञा जाण। राजा प्रतिपाळी आपण। तेवीं अदृष्टशक्तिउल्लंघन। मी सर्वथा जाण करींना॥ ९८॥ जीभ कापूनि देवासी वाहती। तैसें नासिक न छेदिती। तेवीं मी छेदीं कर्मस्थिती। परी अदृष्टगती छेदींना॥ ९९॥ अथवा विशेषेंसीं निश्चितीं। मीं माया आलिंगिली निजशक्ती। तो मी एकूचि त्रिजगतीं। बहुधाव्यक्तीं आभासें॥ ४००॥ माझिया साक्षात्कारा आला। जो जीवन्मुक्तत्व पावला। तोही अदृष्टें बांधला। वर्ते उगला देहगेहीं॥ १॥ जनकू राजपदीं नांदे। शुक नागवा प्रारब्धें। कळी लाविजे नारदें। अदृष्ट छंदें विनोदी॥ २॥ वसिष्ठ पुरोहितत्व करी। भीष्म पहुडे शरपंजरीं। याज्ञवल्क्या दोनी नारी। अदृष्टाकारीं वर्तत॥ ३॥ यापरी गा अदृष्टशक्ती। अनिवार वाढली त्रिजगतीं। त्या जीव बांधले अदृष्टगतीं। जेवीं गारोडियाहातीं वानर॥ ४॥ त्या जीवादृष्टें बहुधा व्यक्ती। मी एक भासें त्रिजगतीं। ‘विश्वतश्चक्षु’ या श्रुतीं। बहुधामूर्तीं मी एक॥ ५॥ मृत्तिकेचीं गोकुळें केलीं। नाना नामाकारें पूजिलीं। परी ते मृत्तिकाचि संचली। तेवीं सृष्टि झाली मद्रूपें॥ ६॥ जेवीं एकला एकु आपण निद्रेसी देतां आलिंगन। स्वप्नीं देखे बहुविध आपण। तेवीं मी जाण विश्वात्मा॥ ७॥ जेवीं सूक्ष्म वटबीज केवळ। त्यासी मीनल्या भूमिजळ। वाढोनियां अतिप्रबळ। वृक्ष विशाळ आभासे॥ ८॥ तेथ नामरूप पुष्प फळ। तें बीजचि आभासे समूळ। तेवीं जगदाकारें सकळ। भासे केवळ चिदात्मा॥ ९॥ जे कां मूळ बीजाची गोडी। तोचि स्वाद वाढला वाढी। कांडोकांडीं स्वादुपरवडी। अविकारगोडी उंसाची॥ ४१०॥ तेवीं मूळीं चिदात्माचि कारण। तेथूनि जें जें तत्त्व झालें जाण। तें तें निखळ चैतन्यघन। जग संपूर्ण चिद्रूप॥ ११॥ ऊंस सर्वांगें बीज सकळ। बीजरूपें ऊंस सफळ। तेवीं जगाचें चिन्मात्र मूळ। जाण सकळ तें चिद्रूप॥ १२॥ बीज ऊंस दोनी एकरूप। तैसा प्रपंचजाण चित्स्वरूप। येचि अर्थीं अतिसाक्षेप। कृपापूर्वक सांगत॥ १३॥
यस्मिन्निदं प्रोतमशेषमोतं
पटो यथा तन्तुवितानसंस्थ:।
यालागीं संसार जो समस्त। माझ्या ठायीं असे ओतप्रोत। मजवेगळें कांहीं येथ। नाहीं निश्चित अणुमात्र॥ १४॥ येचि अर्थींचा दृष्टांतू। देवो उद्धवासी सांगतू। जेवीं कापुसाचे सूक्ष्मतंतू। कांतोनि निश्चितू पटु केला॥ १५॥ आडवेतिडवे विणले तंतू। त्यांसी वस्त्र नाम हे मृषा मातू। तेवींसंसारशब्द हा व्यर्थू। स्फुरें भगवंतू मी तद्रूप॥ १६॥ पाहतां सूतचि दिसे उघडें। त्यांचें नाम म्हणती लुगडें। प्रत्यक्ष चैतन्य स्फुरतां पुढें। त्यासी संसारु वेडे म्हणताती॥ १७॥ सुतावेगळें वस्त्र न दिसे। मजवेगळा प्रपंचु नसे। उद्धवा अप्राप्ताचें भाग्य कैसें। मीचि नसें म्हणताती॥ १८॥ यापरी मी सर्वगत। विश्वात्मा विश्वभरित। वृक्षदृष्टांतें प्रस्तुत। तुज म्यां येथ सांगीतलें॥ १९॥ मज देखणा ज्याचा निर्धारू। त्यासीमी केवळ सर्वेश्वरू। मज अप्राप्त जो नरू। त्यासी संसारू आभासे॥ ४२०॥ जो सर्वात्मा सर्वेश्वरू। भ्रांतासी भासे भवतरुवरू। त्या भवतरूचा विस्तारू। स्वयें श्रीधरू सांगत॥ २१॥
य एष संसारतरु: पुराण:
कर्मात्मक: पुष्पफले प्रसूते॥ २१॥
भ्रांतीस्तव भवतरुवरू। कर्माकर्मजळें वाढला थोरू। जीर्ण जुनाट अपरंपारू। ओतंबरू फळपुष्पीं॥ २२॥ त्याचें कोण बीज कोण मूळ। कोण रसू कोण फळ। जेणें भ्रमले जीव सकळ। तें मी समूळ सांगेन॥ २३॥
द्वे अस्य बीजे शतमूलस्त्रिनाल:
पञ्चस्कन्ध: पञ्चरसप्रसूति:।
दशैकशाखो द्विसुपर्णनीड-
स्त्रिवल्कलो द्विफलोऽर्कं प्रविष्ट:॥ २२॥
भ्रमभूमीमाजिवडें। पापपुण्यजोडपाडें। बीज पडतांचि वृक्ष विरूढे। अग्रीं वाढे कल्पना॥ २४॥ पान फूल न दिसे फळ। वेलाअंगीं दोरवा सकळ। तेणेंचि वेला वाढ प्रबळ। तेवीं संसार सबळ कल्पनाग्रें॥ २५॥ कर्माकर्मप्रवाहजळें। भरिलें अविद्येचें आळें। अनंत वासना तेचि मूळें। वृक्ष तेणें बळें ढळेना॥ २६॥ सूक्ष्म वासना कल्पकोडी। अधोगती रुतल्या बुडी। संकल्पविकल्पें चहूंकडीं। पसरल्या बुडीं बुचबुचित॥ २७॥ संचितक्रियमाण वाफे भारी। सुबद्ध भरले जळेंकरीं। भरिलेच मागुते भरी। प्रवाहो त्यावरी पडलासे॥ २८॥ तेणें वृक्ष सबळ भारी। नित्य नूतन वाढी धरी। सगुण गुणाचे वाढीवरी। त्रिगुण अहंकारीं त्रिनाळ॥ २९॥ त्रिगुणगुणांची परवडी। येरांची येरांमाजीं मुरडी। येरयेरांवरी बुडी। मिसळे वाढीं वाढती॥ ४३०॥ पंचभूतांच्या खांद्याथोरी। प्रपंच वाढल्या बाहेरी। पसरल्या येरयेरांवरी। मीनल्या परस्परीं वाढती॥ ३१॥ समूळ गर्भ साधूनि रुखा। मनोमय वाढलिया शाखा। अग्रीं दशेंद्रियफांटे देखा। तिच्या झुळका डोलती॥ ३२॥ त्या त्या शाखांमाजीं देखा। दैवतें आलीं वस्तीसुखा। करूनि कर्माचा आवांका। आपुलाली शाखा ते धरिती॥ ३३॥ दशधा वायूची झडाड। तेणें तें डोलत दिसे झाड। त्यामाजीं दों पक्ष्यांचें नीड। अतिगूढ अतर्क्य॥ ३४॥ जेथूनि उपजे निजज्ञान। तेंचि नीड हृदयभुवन। जीवू परमात्मा दोघेजण। अतर्क्य पूर्ण वसताती॥ ३५॥ जीवू जो देहाभिमानी। परमात्मा जो निरभिमानी। इंहीं दोघींजणीं मिळोनी। हृदयभुवनीं नीड केलें॥ ३६॥ जीव संकल्पविकल्पप्राप्ती। परमात्मा निर्विकल्पस्थिती। दोहींची हृदयामाजीं वस्ती। नीड निश्चितीं या हेतू॥ ३७॥ पाहें पां वात पित्तश्लेष्मा। या आंतरत्वचा भवद्रुमा। वल्कलें म्हणावयाचा महिमा। भक्तोत्तमा या हेतू॥ ३८॥ गगनाहूनि वाढला वरुता। शून्यासहित लांबला आरुता। सैंघ पसरला सभोंवता। दिशांच्या प्रांता सांडूनी॥ ३९॥ एवं विस्तारलेनि विस्तारा। वृक्ष उन्मळोनि मदभरा। पंचरसांच्या विषयधारा। अतिमधुरा वर्षतू॥ ४४०॥ श्रुति-स्मृति हींच पानें। त्यामाजीं उगवलीं स्वर्गसुमनें। दीक्षितभ्रमर ज्यांकारणें। अतिसत्राणें उडताती॥ ४१॥ त्या वृक्षाचीं जावळीं फळें। सुखदु:ख दोनी एके मेळें। शेंडा धरोनि समूळें। दोनीचि फळें पैं त्यासी॥ ४२॥ जितुकीं सूर्यमंडळें भासती। तितुकी जाणयाची स्थिती। सुखदु:खफळें तितुक्यांप्रती। कर्मप्राप्ती देतुसे॥ ४३॥ सूर्यमंडळाआरुतें। सांगीतलें भववृक्षातें। चंद्रमंडळादि समस्तें। भवभय तेथें नाहीं न म्हण॥ ४४॥ मी सूर्यमंडळमध्यवर्ती। त्या मजवेगळी जे स्फुरे स्फूर्ती। तेथवरी भवभयाची प्राप्ती। जाण निश्चितीं उद्धवा॥ ४५॥ सूर्याचें जें सूर्यमंडळ। तेंही संसारामाजीं केवळ। जो न खाय या वृक्षाचें फळ। तोचि रविमंडळभेदक॥ ४६॥ वृक्षाचीं दोनी फळें येथें। दोहों फळांचे दोघे भोक्ते। दोघे संसाराआंतौते। ऐक तूतें सांगेन॥ ४७॥
अदन्ति चैकं फलमस्य गृध्रा
ग्रामेचरा एकमरण्यवासा:।
हंसा य एकं बहुरूपमिज्यै-
र्मायामयं वेद स वेद वेदम्॥ २३॥
दु:खफळाचे भोक्ते। अत्यंत विषयासक्त चित्तें। गीध गृहस्थ कां जे येथें। अविधीं विषयांतें सेविती॥ ४८॥ ग्राम्य विषयीं अतितत्पर। यालागीं बोलिजे ग्रामचर। ग्रामगीध जैसे घार। तैसे सादर विषयांसी॥ ४९॥ जेवीं कां घार गगना चढे। तेथूनि आविसा उडी पडे। तेवीं नरदेह पावोनि चोखडे। विषयीं झडपडे झोंबती॥ ४५०॥ एवं विषयासक्त जे चित्तें। जे अधोगतीतें पावते। ते दु:खफळाचे भोक्ते। जाण येथें निश्चित॥ ५१॥ सांडोनियां गार्हस्थ्य। वनवासी वानप्रस्थ। त्यांसचि सुखफल प्राप्त। जाण निश्चित उद्धवा॥ ५२॥ त्या सुखफळाचे विभाग। ब्रह्मसदनान्त इतर स्वर्ग। कर्में करूनियां सांग। जेथींचा मार्ग चालिजे॥ ५३॥ ब्रह्मचर्यें वेदाध्ययन। गार्हस्थ्येंपूजिते अग्निब्राह्मण। वानप्रस्थाश्रमीं जाण। वन्यफळभोजन वनवासी॥ ५४॥ येणें क्रमेंचिक्रममुक्तिस्थान। जिंहीं ठाकिलें ब्रह्मसदन। सुखफळाचे भोक्ते ते जाण। ब्रह्मभुवननिवासी॥ ५५॥ इतर स्वर्गीं सुखप्राप्ती। जेथें आहे पुनरावृत्ती। ब्रह्मसदनीं पावल्या वस्ती। त्यांसी क्रमें मुक्ती होईल॥ ५६॥ मूळींचें पद ‘अरण्यवासी’। तेणें द्योतिलें वानप्रस्थासी। तेथ नाहीं घेतला संन्यासी। त्यासी वनवासी म्हणों न ये॥ ५७॥ संन्याशांसी निवासस्थान। वेदीं बोलिलें नाहीं जाण। तिंहीं स्वदेहाचें केलें दहन। नेमिलें स्थान त्यां नाहीं॥ ५८॥ जे अविद्यादिकर्मप्रवृत्ती। विरजाहोमीं स्वयें जाळिती। ते भववृक्षाचीं फळें खाती। हेही युक्ती घडेना॥ ५९॥ जागृतीच्या पाहुण्यासी। जेवूं धाडावें स्वप्नगृहासी। तेवीं न्यस्तसंकल्प संन्यासी। संसारसुखासी केवीं भोक्ते॥ ४६०॥ स्वकर्म जाळोनि विरजाहोमीं। जिंहीं साध्य केलें ब्रह्माहमस्मि। त्यांसी निवासस्थान कोण नेमी। वनीं ग्रामीं नेमस्त॥ ६१॥ बिढार द्यावया आकाशासी। कोण घर नेमावें त्यासी। तेवीं न्यस्तसंकल्प संन्यासी। त्यांच्या निवासासी कोण नेमी॥ ६२॥ जे न्यस्तसंकल्प संन्यासी। त्यांसी कोण म्हणे अरण्यवासी। मायिक भववृक्षींच्या फळासी। भोक्ते त्यांसी म्हणों नये॥ ६३॥ मूळींचें पद ‘अरण्यवासी’। तें भागा आलें वानप्रस्थासी। वानप्रस्थ सदा वनवासी। दुसऱ्या फळासी तो भोक्ता॥ ६४॥ ऐक संन्याशांची सुखप्राप्ती। दोनी फळें मिथ्या जाणती। मीचि एक त्रिजगतीं। हे प्रतीति निश्चितीं त्यां झाली॥ ६५॥ जो हा बहुरूपें विस्तारू। तो मी चिदात्मा साचारू। जाणोनि गुरुमुखें निर्धारू। माझें सुख साचारू पावले॥ ६६॥ ते मद्रूपें मज पावले। माझेनि सुखें सुखरूप झाले। सुखदु:खफळांतें मुकले। येवों चुकले संसारा॥ ६७॥ संसार मायामय मिथ्याभास। जाणे तोचि वेदज्ञ विद्वांस। त्यासीच बोलिजे परमहंस। विश्वनिवासनिवासी॥ ६८॥ ऐशी होआवया पदप्राप्ती। सुदृढ करावी गुरुभक्ती। तेणें होय संसारनिवृत्ती। तेंचि श्रीपती सांगत॥ ६९॥ पहिली सांगितली सतसंगती। तेणें जाहली मत्पदप्राप्ती। तेचि अध्यायाच्या अंतीं। करावी गुरुभक्ती सांगतू॥ ४७०॥
एवं गुरूपासनयैकभक्त्या
विद्याकुठारेण शितेन धीर:।
विवृश्च्य जीवाशयमप्रमत्त:
सम्पद्य चात्मानमथ त्यजास्त्रम्॥ २४॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायामेकादशस्कन्धे द्वादशोऽध्याय:॥ ९२॥
न करितां सद्गुरुभजन। नव्हे भववृक्षाचें छेदन। जरी कोटिकोटी साधन। आनेआनकेलिया॥ ७१॥ भववृक्षातें छेदिती। केवळ जाण गुरुभक्ती। अरिनिर्दळणी निश्चितीं। जेवीं निजशक्ति शूरांची॥ ७२॥ दूरी करावया दुरित। जेवीं गंगाजळ समर्थ। तेवीं भवभया भस्म करीत। जाण निश्चित गुरुभक्ति॥ ७३॥ करितां सत्यव्रतग्रहण। पाप स्वयें जाय पळोन। तेवीं करितां गुरुभजन। भवनिर्दळण स्वयें होय॥ ७४॥ हनुमंत देखतां दिठीं। भूतें पळती बारा वाटीं। तेवीं गुरुभजनपरिपाटीं। पळे उठाउठी भवभय॥ ७५॥ मरतां घडे अमृतपान। तैं मरणासचि आलेंमरण। तेवीं करितां गुरुभजन। जन्ममरण निमालें॥ ७६॥ अंतीं अवचटें हरि म्हणतां। पांपराहाणे यमदूतां। तेवीं सद्गुरूतें भजतां। हाणे लाता भवभया॥ ७७॥ करावया भवनिर्दळण। मुख्य करावें गुुरुभजन। हेंचि श्रेष्ठ गा साधन। सभाग्य जाण गुरुभक्त॥ ७८॥ कोण सद्गुरु कैशीभक्ती। ऐसें कांहीं कल्पिसी चित्तीं। तेही मी यथानिगुतीं। मागां तुजप्रती सांगीतली॥ ७९॥ जो शब्दपरनिष्णात। शिष्यप्रबोधनीं समर्थ। तोचि सद्गुरु येथ। जाण निश्चित उद्धवा॥ ४८०॥ जो स्वरूपीं करी समाधान। तोचि सद्गुरु सत्य जाण। त्या वेगळें सद्गुरुपण। होआवया कारण असेना॥ ८१॥ त्या सद्गुरुभजनाची परी। तुज मी सांगेन निर्धारीं। सर्व कर्मधर्मांचिया शिरीं। जो कां करी गुरुभजन॥ ८२॥ गुरु म्हणों पित्यासमान। तंव तो एकजन्मींचा जाण। हा मायबापू सनातन। जनक पूर्ण जगाचा॥ ८३॥ गुरु मातेसमान पाहों। तंव गर्भजन्में तिचा स्नेहो। गर्भवास निवारी गुरुरावो। अधिक स्नेहो पुत्रापरिस॥ ८४॥ उदराबाहेर पडल्यापाठीं। पुत्रस्नेहें माता उठी। तें बाहेरील घालूनि पोटीं। स्नेहें गोमटी गुरुमाता॥ ८५॥ गुरु मानूं स्वामीसमान। स्वामी निवारूंन शके मरण। सद्गुरु चुकवी जन्ममरण। स्वामी संपूर्ण गुरुरावो॥ ८६॥ गुरु मानूं कुलदेवता। तंव तिसी कुलधर्मी पूज्यता। हा कुलदेवतेची देवता। नित्य पूज्यता निजकर्मीं॥ ८७॥ गुरु मानूं कल्पतरूसमान। तंव कल्पतरु दे कल्पिलें दान। सद्गुरु दे निर्विकल्पता पूर्ण। अगाध दान निर्लोंभें॥ ८८॥ चिंतामणी दे चिंतिल्या अर्था। सद्गुरु करी चिंतेच्या घाता। चित्ता मारूनि दे चैतन्यता। अक्षयता निजदान॥ ८९॥ कामधेनूचें दुभतें। तें कामनेचपुरतें। सद्गुरु दुभे स्वानंदार्थें। कामनेतें निर्दळी॥ ४९०॥ गुरुसमान म्हणों सागरू। तो गंभीर परी सदा क्षारू। हा स्वानंदें नित्य निर्भरू। अतिमधुरू निजबोधें॥ ९१॥ गुरु परब्रह्मसमान। हेंही बोलणें किंचित न्यून। गुरुवाक्येंब्रह्म सप्रमाण। येरवीं ब्रह्मपण शब्दमात्र॥ ९२॥ शब्दीं लोपूनि शब्दार्था। गुरु प्रबोधी संविदर्था। त्याहूनि पूज्य परता। नाहीं सर्वथा त्रिलोकीं॥ ९३॥ गुरु माता गुरु पिता। गुरु स्वामी कुळदेवता। गुरूवांचोनि सर्वथा। आणिक देवता स्मरेना॥ ९४॥ थोर मांडलिया सांकडें। जैं गगन गडगडूनि पडे। तैं न पाहे आणिकाकडे। नाम पढे गुरूचें॥ ९५॥ काया वाचा मनें प्राणें। जो गुरूवांचोनि आन नेणे। तैसाचि भजे अनन्यपणें। गुरुभक्ति म्हणणें त्या नांव॥ ९६॥ पक्षिणीचीं अपक्ष पिलें। तीं तिसीच स्मरती सर्वकाळें। तेवीं जागृति-स्वप्न-सुषुप्तिमेळें। जो गुरुवेगळें स्मरेना॥ ९७॥ मागां सांगीतलें भगवद्भजन। आतां सांगसी गुरुसेवन। नाहीं एकविध निरूपण। ऐसा विकल्प जाण न धरावा॥ ९८॥ सद्गुरु तोचि माझी मूर्ती। निश्चयेंसीं जाण निश्चितीं। विकल्प न धरावा ये अर्थीं। अनन्यभक्ति या नांव॥ ९९॥ एकाग्रता जें गुरुभजन। तेंचि माझें परमपूजन। गुरूसी मज वेगळेपण। कल्पांतीं जाण असेना॥ ५००॥ गुरु भगवंत दोन्ही एक। येणें भावें निजनिष्टंक। भजे तोचि गुरुसेवक। येरू तो देख अनुमानी॥ १॥ माझिया ऐक्यता अतिप्रीतीं। जेणें आदरिली गुरुभक्ती। तोचि धन्यधन्य त्रिजगतीं। भजती स्थिती तें ऐक॥ २॥ करावया गुरुसेवे। मनापुढें देह धांवे। एकला करीन सर्व सेवे। येवढे हांवे उद्यतू॥ ३॥ सेवेच्या दाटणी जाण। अधिकचि होय ठाणमाण। अंग अंगऊनि अंगवण। सेवेमाजी जाण विसांवा त्यासी॥ ४॥ सेवेचिया आवडीं। आरायेना अर्धघडी। आवडीचे चढोवढी। चढती गोडी गुरुभजनीं॥ ५॥ नित्य करितां गुरुसेवा। प्रेमपडिभरू नीच नवा। सद्भावाचिया हांवा। गुरुचरणीं जीवा विकिलें॥ ६॥ आळसु येवोंचि विसरला। आराणुकेचा ठावो गेला। गुरुसेवासंभ्रमें भुलला। घेवों विसरला विषयांतें॥ ७॥ तहान विसरली जीवन। क्षुधा विसरली मिष्टान्न। करितां गुरुचरणसंवाहन। निद्रा जाण विसरला॥ ८॥ जांभयी यावयापुरती। सवडी उरेना रिती। तेथें निद्रेलागीं केउती। राहावया वस्ती मिळेल॥ ९॥ मुखीं सद्गुरूचें नाम। हृदयीं सद्गुरूचें प्रेम। देहीं सद्गुरूचें कर्म। अविश्रम अहर्निशीं॥ ५१०॥ गुरुसेवेसी गुंतलें मन। विसरला स्त्री पुत्रधन। विसरला मनाची आठवण। मी कोण हें स्फुरेना॥ ११॥ नवल भजनाचा उत्सावो। भजतांनाठवे निजदेहो। थोर सेवेचा नवलावो। निजात्मभावो गुरुचरणीं॥ १२॥ ऐसाही प्रारब्धमेळा। अवचटें झालिया वेगळा। न तुटे प्रेमाचा जिव्हाळा। भजनीं आगळा सद्भावो॥ १३॥ गुरूचा वसता जो ग्राम। तेथेंचि वसे मनोधर्म। गुरुध्यान तें स्वधर्मकर्म। सेवासंभ्रम सांडीना॥ १४॥ गुरुमूर्तीचीसवे त्यासी। ते मूर्ति बैसवी हृदयावकाशीं। मग नानाभजनविलासीं। आवडी कैशी भजनाची॥ १५॥ चिन्मात्र पूर्णिमा गुरु पूर्णचंद्र। तळीं आपण होय आर्त चकोर। मग स्वानंदबोधाचे चंद्रकर। निरंतर स्वयें सेवी॥ १६॥ सद्गुरु सूर्य करी चिद्गगनीं। आपण होय सूर्यकांतमणी। त्याचेनि तेजें प्रज्वळोनी। स्वभावें मायावनीं होळी करी॥ १७॥ सद्गुरुकृपामृताच्या डोहीं। स्वयें तरंगू होय तये ठायीं। सबाह्य तद्रूपें पाहीं। भावना हृदयीं भावितु॥ १८॥ आपुला निजस्वामी जो सद्गुरु। भावी निर्विकल्प कल्पतरू। त्याचे छाये बैसोनि साचारू। मागे वरू गुरुभक्ति॥ १९॥ सद्गुरु कामधेनुकरी जाणा। वत्सरूपें भावी आपणा। आवडीं चाटवी बोधरसना। स्वानंदपान्हा सेवितू॥ ५२०॥ तुझ्या सकळ वृत्तींची सेवा। म्यांचि करावी गा गुरुदेवा। ऐसें प्रार्थूनि सद्भावा। हा वरू मज द्यावा कृपानिधी॥ २१॥ तेथ संतोषोनि गुरुनाथें। वरू दीधला वरदहस्तें। हर्षें वोसंडत चित्तें। धन्य मी वरातें लाधलों॥ २२॥ ऐसी लाहोनि वरदस्थिती। तेचि सेवा आदरी प्रीतीं। अतिधन्य भावार्थ गुरुभक्ति। नाना उपपत्ती गुरुभजना॥ २३॥ सद्गुरूचीं दहाही करणें। मनबुद्धॺादि अंत:करणें। क्रियामात्र मीचि होणें। ऐसें जीवेंप्राणें भावितु॥ २४॥ सद्गुरु जे जे भोग भोगिती। ते मीचि होईन निश्चितीं। एवं मीचि एक गुरुभक्ती। दुजी स्थिती हों नेदीं॥ २५॥ सद्गुरु जेथें उभे ठाकती। तैं पायांतळीं मीचि क्षिती। सद्गुरु जेथें जेथें चालती। ते मार्गींची माती मी होईन॥ २६॥ चरणक्षालनासी समस्त। मीचि उदक मीचि तस्त। मीचि चरण प्रक्षालित। चरणतीर्थ मी सेवीं॥ २७॥ सद्गुरुचरणींचे रज:कण। मीचि होईन आपण। सद्गुरु करिती आरोहण। तें सिंहासन होईन मी॥ २८॥ सद्गुरुचें सिंहासन। तें मीचि होईन आपण। त्यावरी बैसतें आसन। तेंही जाण होईन मी॥ २९॥ सद्गुरूसी स्नेह लागे। तें मी होईन सर्वांगे। गुरूसी वोठंगावया पुढें मागें। मृदुळी सर्वांगें मी होईन॥ ५३०॥ मनींचा ऐसा आवांका। सद्गुरूच्या सिद्ध पादुका। त्या मी होईन देखा। नेदीं आणिकां आतळों॥ ३१॥ मी होईन गुरूच्या श्वासोच्छ्वासा। वेगीं बाहेर निघेन नासा। गुरु घेतील ज्या सुवासा। त्या त्या विलासा मी होईन॥ ३२॥ गुरु अवलोकिती कृपादृष्टी। त्या दृश्याची मी होईन सृष्टी। गुरूसी देखती देखणी पुष्टी। ते मी उठाउठीं होईन॥ ३३॥ गुरूसी आवडतें निरूपण। तें मी श्रवणीं होईन श्रवण। अथवा रुचेल जें कीर्तन। तें गाता गायन मी होईन॥ ३४॥ सद्गुरुमुखींची जे कथा। ते मी आदरें होईन तत्त्वतां। अक्षरीं अक्षर अक्षरार्था। मीचि सर्वथा होईन॥ ३५॥ सद्गुरु जेथ करिती स्नान। तें मी अंगस्पर्शनाचें जीवन। गुरु करिती जें आचमन। तेंही जाण होईन मी॥ ३६॥ गुरु परिधान करिती वास। तें मी होईन सुवास। गुरुचरण पुसावयास। तेंही धूतवास मी होईन॥ ३७॥ गुरूसी करिती विलेपन। तें मी होईन शुद्ध चंदन। चरणीं अर्पितें सुमन। मीचि जाण होईन॥ ३८॥ सद्गुरु करिती भोजन। तेथ मीचि ताट मीचि अन्न। रसस्वाद पंक्तिकारु जाण मी होईन॥ ३९॥ मथोनियां दहीं मथित। सारांश तें नवनीत। वैराग्यअग्निसंतप्त। भोजनीं मुख्य घृत मी होईन॥ ५४०॥ परिपाकीं स्वादिष्टपण। सर्वां चवींचें कारण। मी होईन वरी लवण। न्यून तें पूर्ण गुरुकरिती॥ ४१॥ गुरु करिती प्राशन। तें मी होईन जीवन। सद्गुरूचें धालेपण। ते उद्गार जाण मी होईन॥ ४२॥ गुरूसी जें जें गोड लागे। ते ते पदार्थ मी होईन अंगें। सद्गुरूसी ज्याची रुचि लागे। तें मी सर्वांगें होईन॥ ४३॥ सद्गुरु आंचवती जेथ। मी उष्णोदक मी तस्त। शिंतोडे लागती जेथ जेथ। तेही समस्त होईन मी॥ ४४॥ गुरूसी अर्पिती जें फळ। तें मी होईन तत्काळ। गुरुअर्पणेंसफळ। फळाचें फळ मी होईन॥ ४५॥ सद्गुरूचें घ्यावया उच्छिष्ट। मजचि मोठा लवलवाट। मांजर होऊनियां ताट। चरचराट चाटीन मी॥ ४६॥ गुरु करिती करोद्वर्तन। तो मी होईन सुगंधचंदन। मुखवासा सुवासपण। मीचि जाण होईन॥ ४७॥ फळाशा फोडूनि फोडी। वासनाशिरा काढूनियां विडी। रिघोनियां सद्गुरूच्या तोंडीं। तांबूलगोडी मी होईन॥ ४८॥ जाळूनियां अहंकठिणपणा। मी होईन सोहं शुद्ध चुना। शांतिपरिपक्क लागोनि पाना। सद्गुरुवदना पावेन॥ ४९॥ सर्व सारांचें शुद्ध सार। तो होईन खदिरसार। सद्गुरुमुखीरंगाकार। मीचि साचार शोभेन॥ ५५०॥ सद्गुरुमुखींचें पवित्र पीक। वरच्यावरी मी घेईन देख। पिकदाणीचे मुखाचें मुख। आवश्यक मीच होईन॥ ५१॥ गुरूचा उगाळू मी होईन। पीक पिकदाणी धरोनि जाण। चवरी जी मक्षिकानिवारण। ती मी होईन निजांगें॥ ५२॥ गुरूचा उगाळू घ्यावया देख। मी होईन आगळा सेवक। नातरी लडिवाळ बाळक। गुरुअंकीं देख मी होईन॥ ५३॥ माझिया गुणांची सुमनमाळा। आवडीं घालीन गुरूच्या गळां। गुरु झेलिती लीलाकमळा। त्या करकमळा मी होईन॥ ५४॥ गुरूसी नीरांजन करिती। ते मी निजतेजें उजळीन ज्योती। गुरु जेणें प्रकाशें चालती। ते दीपिकादीप्ति मी होईन॥ ५५॥ जीवभावाचें निंबलोण। गुरूसी मी करीन आपण। इडापीडा मी घेईन जाण। तें लोणलक्षण मज लागो॥ ५६॥ मी छत्र मी छत्राकारू। मी चवर मीचि चवरधरू। मीचि विंजणा मीचिविंजणवारू। गुरूचा परिवारू मी होईन॥ ५७॥ गुरु करिती आरोहण। तो मी होईन श्यामकर्ण। गुरूचा भरभार साहावया जाण। वाजीवाहन होईन मी॥ ५८॥ गुरूपुढें मी वाटसुभटू। गुणवर्णनीं मी गर्जता भाटू। गुरुगृहीं शांतिपाठू। पढता भटू मी होईन॥ ५९॥ मीचि बारी मी कऱ्हेरी। मी हडपी मी फुलारी। मी झाडणा मी खिल्लारी। मी द्वारपाळ द्वारीं होईन॥ ५६०॥ गुरु जेथें देती अवधान। ते ते कळा मी होईन जाण। गुरूवेगळा अर्धक्षण। गेला प्राण तरी न वचें॥ ६१॥ गुरु सांगतीजे कथा। तेथ मी होईन सादर श्रोता। गुरुकृपा मी होईन वक्ता। निजात्मता बोलका॥ ६२॥ गुरु गंभीर दान देत। दीन मागतें मी होईन तेथ। गुरूचें निजगुज समस्त। करितां एकांत मी होईन॥ ६३॥ गुरु बैसती सावकाश। तैं मी होईन अवकाश। गुरुहृदयींचें चिदाकाश। निरवकाश मी होईन॥ ६४॥ गुरु बैसती आपण। तें मी होईन सुखासन। तें मीचि वाहेन आपण। भोई होईन चालणा॥ ६५॥ स्वामी सूनियां दिठी। चपळ पाउलांच्या नेटीं। चालेन मी उठाउठी। धुरेसी गोठी सांगत॥ ६६॥ आंतुले दृष्टीं पुढीले चालीं। गोवींचें पाऊल उगवोनि घालीं। उंच नीच भूमीचीखोली। चुकवूनि चालीं चालेन॥ ६७॥ संकल्पविकल्पांचे झोंक। जाते वाम सव्य अनेक। ते आवरूनियां देख। पाहत श्रीमुख चालेन मी॥ ६८॥ न चुकतां निजमार्ग। न हालतां धुरेचें आंग। न करितां आणिकांचा पांग। भोई चांग मी होईन॥ ६९॥ सुखासनाचेनि पडिपाडें। चालतां सुख अधिक वाढे। मागील सूड काढूनि पुढें। सुखसुरवाडें चालेन॥ ५७०॥ चढणें पडणें अडखळणें। दडकणें फडकणें अडकणें। सांभाळूनियां निष्ठेनें। टणकपणें चालेन॥ ७१॥ उरीं शिरीं खांदीं कोंपरीं। मागील सूड पुढें धरीं। दृष्टी ठेऊनि पायांवरी। निर्विकारी चालेन॥ ७२॥ आटी मुरडी उलट लोट। धापकांप पडे मेट। आधार धरूनि सुभट। चढती वाट चालेन॥ ७३॥ उल्लंघूनि कामाचा पाट। आंवरूनि क्रोधाचा लोट। चुकवूनि खोलव्याची वाट। धुरेसकट मी चालेन॥ ७४॥ ममतेची ओल प्रबळ। ते ठायीं रुती गुंती सबळ। तेथ न माखतां पाउल। लंघूनि तत्काळ जाईन॥ ७५॥ मोहनदीची थोर कराडी। माजीं सबळ जळें प्रबळ वोढी। शिंतोडा न लागतां धूर मी काढीं। परापर थडी तत्काळ॥ ७६॥ दृष्टी ठेवूनि स्वामीकडे। सवेग चालतां मागेंपुढें। भोई होईन दोहींकडे। सूड सुडें काढीन॥ ७७॥ एवं मीचि मी मागें पुढें। सुखासनाचेनि सुरवाडें। स्वामीची निजनिद्रा न मोडे। तेणें पडिपाडें वाहेन॥ ७८॥ उच्छिष्ट अन्नाचा पोसणा। आठां प्रहरांचा जागणा। सदा गुरुगुरुकरीत जाणा। गुरुद्वारीं सुणा मी होईन॥ ७९॥ विजाती देखोनि नयना। सोहं भावें भुंकेन जाणा। भजनथारोळा बैसणा। गुरुदारीं सुणा मी होईन॥ ५८०॥ ऐसऐशिया भावना। गुरुसेवेलागीं जाणा। अतिशयें आवडी मना। नाना विवंचना विवंची॥ ८१॥ जरी दैववशें दूर गेला। परी तो भावबळें जवळी आला। गुरुसेवे जो जीवें विकला। तो शास्त्र पावला सद्विद्या॥ ८२॥ असो जवळी अथवा दूरी। परी गुरुभक्तीची आवडी भारी। जीवित्व ठेविलें सेवेवरी। गुरूच्या द्वारीं भजनासी॥ ८३॥ ऐसा गुरुभक्तीसी सादर। चढत्या आवडीं एकाग्र। तेंचि सद्विद्यालक्षण शस्त्र। गुरुकृपाकुठार पैं पावे॥ ८४॥ लावोनि वैराग्याचे साहाणे। प्रत्यावृत्तिबोधकपणें। शस्त्र केलें जी सणाणें। तीक्ष्णपणें अतिसज्ज॥ ८५॥ शस्त्र सजिलें निज दृष्टीं। दृढ धरिलें ऐक्याचे मुष्टीं। शस्त्र आणि शस्त्रधरा एकी गांठी। करूनि उठी भवच्छेदा॥ ८६॥ दृढ साधोनियां आवो। निजबळें घालितां घावो। झाला भववृक्षाचा अभावो। घायेंवीण पहा हो छेदिला॥ ८७॥ जीवाशयाची वासना। ते छेदावी निजकल्पना। तोचि भववृक्षाचा छेदू जाणा। सावधाना धृतिबळें॥ ८८॥ झालिया चैतन्यपदप्राप्ती। सकळ साधनें सहजें जाती। भोजनीं झालिया पूर्ण तृप्ती। ठायींच राहती पक्वान्नें॥ ८९॥ परमतृप्ती उथळल्या पोटीं। अमृतही न लावी ओंठीं। तेवीं ब्रह्मपद पावल्यापाठीं। साधनआटाटी सांडाव्या॥ ५९०॥ हाचि भावो धरोनि चित्तीं। मागां सांगीतलें तुजप्रती। सांडीं साधनव्युत्पत्ती। प्रवृत्तिनिवृत्तीसमवेत॥ ९१॥ पावलिया परब्रह्म। मिथ्या वेदोक्त सकळ कर्म। मिथ्या आश्रमादि वर्णधर्म। हें त्यागितें वर्म कर्माचें॥ ९२॥ स्वप्नीं चालतां लवडसवडीं। जो अडखळूनि पडला आडीं। तो जागा होऊनि आपणातें काढी। तैशी वृक्षा वोढी साधनीं॥ ९३॥ पीक आलिया घुमरी। ते शेतीं कोण नांगरधरी। गजान्तलक्ष्मी आलिया घरीं। भीक दारोदारीं कोण मागे॥ ९४॥ हातीं लागलिया निधान। नयनीं कोण घाली अंजन। साधलिया निजात्मज्ञान। वृथा साधन कोण सोशी॥ ९५॥ अंगीकारोनि ज्ञानशक्ती। कलीं संसारनिवृत्ति। ते हे त्यागावी निजवृत्ती। जाण निश्चतीं उद्धवा॥ ९६॥ अग्निस्तव निपजे अन्न। तें वाफ न जिरतां परमान्न। पोळी अवशेष तापलेपण। रांधितेंहीं जाण चवीधिंनेणे॥ ९७॥ आंबया पाडु लागला जाण। तरी अंगीं असे आम्लपण। सेजेसि मुरालिया मघमघोन। न चाखतां घ्राण चवी सांगे॥ ९८॥ सेजे मुरावयाची गोठी। तेथ न व्हावी द्वैताची दिठी। येरयेरां जाहलिया भेटी। दोनी शेवटीं ठिकाळती॥ ९९॥ ठिकाळलीं सेजे घालिती। तत्संगें आणिकें नासती। निश्चळ राहिल्या एकांतीं। परिपाकपूर्ती घ्राण सांगे॥ ६००॥ शत्रु जिणोनियां कडाडीं। रणांगणीं उभवितां गुढी। शस्त्रेंसीं कवच जंव न फेडी। तंव विश्रांति गाढी न पविजे॥ १॥ गरोदरेसी प्रसूति होये। पुत्रजन्में सुखावली ठाये। तेही बारावळी जैं पाहे। तैं भोगूं लाहेपुत्रसुख॥ २॥ पुरुष निमोनियां जाये। त्या देहाचें दहन होये। तरी अवशेष सुतक राहे। तें गेलिया होये निजशुद्धी॥ ३॥ तेवीं जावोनियां अज्ञान। उरला जो ज्ञानाभिमान। तोही त्यागिलिया जाण। चित्समाधान स्वानंदें॥ ४॥ खैराचा शूळ तत्त्वतां मारी। मा चंदनाचा काय आन करी। तेवींअभिमान दोहींपरी। बाधकता धरी ज्ञानाज्ञानें॥ ५॥ लोखंडाची बेडी तोडी। मा आवडीं सोनियाची जडी। चालतां तेही तैशीच आडी। बाधा रोकडी जैशी तैशी॥ ६॥ ‘ब्रह्माहमस्मि’ हा अभिमान। शुद्ध ब्रह्म नव्हे जाण। अहंपणें तेंही कठिण। तेंही लक्षण अवधारीं॥ ७॥ जळापासोनि लवणहोये। तें जळींचें जळीं विरोनि जाये। मोतीं झालें तें कठिण पाहें। उदकीं न जाये विरोनी॥ ८॥ मुक्तपणें मोला चढलें। तें वनिताअधरीं फांसा पडिलें। मुक्तचि परी नासा आलें। कठिण केलें अभिमानें॥ ९॥ तेवीं अज्ञानअभिमान आहे। तो सर्वथा तत्काळ जाये। ज्ञानाभिमान कठिण पाहें। गोंविताहे मुक्तत्वें॥ ६१०॥ अपक्व घटू तत्काळ गळे। तो पृथ्वीचा पृथ्वीस मिळे। भाजिलें खापर अतिकाळें। पृथ्वीस न मिळे कठिणत्वें॥ ११॥ प्रपंच अज्ञानें झाला लाठा। ज्ञानअज्ञानांचासत्ववांटा। फेडूनि कांटेन कांटा। दोनी आव्हांटा सांडावे॥ १२॥ जरी सांडिले वाटेवरी। तरीअवचटें आपणासीचि बाधु करी। यालागीं सांडावे दूरी। निजनिर्धारीं हा त्यागू॥ १३॥ जेथवर अहंपण। तितुकेंही बाधक जाण। शुद्धाशुद्ध अभिमान। नि:शेष सज्ञान सांडिती॥ १४॥ उद्धवा तुज करितां माझी भक्ती। झाली माझ्या निजपदाची प्राप्ती। आतां नाना साधनउपपत्ती। शास्त्रव्युत्पत्ती कां करिसी॥ १५॥ सद्भावें करितां माझें भजन। तूं झालासी ब्रह्मसंपन्न। आतां सद्विद्यादि सर्व साधन। शास्त्रश्रवणेंसीं सांडीं पां॥ १६॥ ‘तस्मादुद्धव उत्सृज्य’। ये श्लोकींचें हें त्यागबीज। विशद सांगीतलें म्यां तुज। निजगुज हृदयस्थ॥ १७॥ सकळां साधनां श्रेष्ठ साधन। शिष्यासी सद्गुरूचें भजन। तेणे पाविजे ब्रह्मसमाधान। सत्य जाण उद्धवा॥ १८॥ जो भावें भजे गुरुचरणीं। तो नांदे सच्चिदानंदभुवनीं। हे सत्य सत्य माझी वाणी। विकल्प कोणीं न धरावा॥ १९॥ ऐसें बोलोनि श्रीहरी। आवडीं चारी बाह्या पसरी। उद्धवातें प्रीतिकरीं। हृदयीं धरी स्वानंदें॥ ६२०॥ देवें सद्भक्ता क्षेम दीधलें। निजहृदयीं हृदय एक झालें। सांगणें पुसणें सहज ठेलें। बोलणें बोलें प्राशिलें॥ २१॥ चहूं वाचां पडलें मौन। जीवू विसरला जीवपण। एका तुष्टला जनार्दन। स्वानंदघन सद्भक्तां॥ २२॥ तेचि सद्भक्तीचा भावार्थ। विशद बोलिला बाराव्यांत। निजभावें श्रीकृष्णनाथ। नित्य प्राप्त भाविकां॥ २३॥ निजात्मप्राप्तीचें कारण। केवळ भावार्थचि जाण। भावार्थावेगळें साधन। वृथा जाण परिश्रमू॥ २४॥ जप तप यज्ञ दानें। भावार्थालागीं करणें। तो भावार्थ लाहिजे जेणें। धन्य जिणें तयाचें॥ २५॥ धन्य नरदेहाची प्राप्ती। धन्य साधूची संगती। धन्य धन्य ते भावार्थी। जे भगवद्भक्तीं रंगले॥ २६॥ जे रंगले भगवत्पथा। त्यांचें चित्त विसरलें विषयावस्था। ते हंसगीताची कथा। उद्धव कृष्णनाथा पुसेल॥ २७॥ तें अतिरसाळ निरूपण। केवळ शुद्ध ब्रह्मज्ञान। श्रोतां व्हावें सावधान। एका जनार्दन विनवितू॥ ६२८॥
इति श्रीभागवते महापुराणे एकादशस्कंधे श्रीकृष्णोद्धवसंवादे एकाकारटीकायां द्वादशोऽध्याय:॥ १२॥ श्रीकृष्णार्पणमस्तु॥ मूळश्लोक॥ २४॥ ओंव्या॥ ६२८॥
॥ श्री ॐ तत्सत्-श्रीकृष्ण प्रसन्न॥
अध्याय तेरावा
॥ श्रीगणेशाय नम:॥ श्रीकृष्णाय नम:॥ ॐ नमो जी अनादि हंसा। हंसरूपा जी जगदीशा। तूं सद्गुरु परमहंसा। परमपरेशा परिपूर्णा॥ १॥ उभयपक्षेंवीण देख। तुझे शोभती दोनी पांख। शुद्धसत्त्वाहोनि चोख। स्वरूप सुरेख सोज्वळ॥ २॥ हंस बोलिजे शुभ्रवर्ण। तुझी हंसता विलक्षण। सांडोनियां सकळ वर्ण। हंसपण तुज शोभे॥ ३॥ विकासल्या सुवर्णपंकजें। इतर हंसीं तेथें क्रीडिजे। प्रेमें उत्फुल्लित कमळ जें। तुवां क्रीडिजे ते ठायीं॥ ४॥ मानससरोवरीं वस्ती हंसासी। तूं मानसातीत रहिवासी। हंसा उत्पतन आकाशीं। तुझें चिदाकाशीं उड्डाण॥ ५॥ विवेकचंचूचिया मुद्रा। स्वभावें निवडिसी क्षीरनीरां। मग सांडोनियां असारा। शुद्ध सारा सेविसी॥ ६॥ ऐसिया हंसा जी सुकुमारा। मुक्तमोतियांचा तुज चारा। जीं कां वैराग्यशुक्तिद्वारा। चित्सागरामाजीं झालीं॥ ७॥ सर्वथा नातळोनि क्षिती। निरालंब मार्गाप्रती। चालणें चालसी हंसगती। हे गमनशक्ती अभिनव॥ ८॥ अभिन्नस्वभावतां निजअंशीं। चिन्मात्रवागीश्वरी तूं वाहसी। हंसवाहिनी आख्या ऐशी। तुझेनि अंशेंसीं तीस झाली॥ ९॥ तुझेनि चालविल्या सरस्वती चाले। तुवां बोलविल्या वेदू बोले। तुवां चेतविल्या प्राण हाले। तुझेनि वाचाळें वाग्देवी वदे॥ १०॥ झाली वागीश्वरी वाग्देवता। तियेसी तुझेनि वाचाळता। जेवीं कां वेणु वाजे मधुरता। परी वाजविता तो भिन्न॥ ११॥ एवं वाच्य वचन वक्ता। तूंचि वागीश्वरी तूंचि वदता। आपुल्या हंसरूपाची कथा। स्वभावतां बोलविसी॥ १२॥ बोलावया महाकवीच्याठायीं। तुंवा वागीश्वरी द्योतिली पाहीं। ते हंसरूपाची नवाई। अभिनव कांहीं बोलवी॥ १३॥ तो तूं सर्वभूतीं समान। हंसस्वरूपी श्रीजनार्दन। त्याचे वंदितां निजचरण। जन्ममरण पळालें॥ १४॥ आपभयें पळतां त्यासी। लपणी मिळाली भ्रमापाशीं। जन्मामागे मरणासी। ठावू वसतीसी दीधला॥ १५॥ यालागीं भ्रमामाजीं जो पडला। तो जन्ममरणांसी आतुडला। मग न सुटे कांहीं केल्या। यंत्रीं पडला भ्रमचक्रीं॥ १६॥ तेथ राहाट माळेच्या परी। जन्ममरणांचे पडे यंत्रीं। एकाचीसोसी भरोवरी। तंव दुसरें शिरीं आदळे॥ १७॥ तें निस्तरावया जन्ममरण। तुज सोहंहंसाचें स्मरण। जैं कां करी सावधान। भ्रममोचन तैं होय॥ १८॥ तो तूं परमात्मा परमहंसू। परब्रह्मैक पूर्ण परेशू। ब्रह्मपुत्रांसी उपदेशू। करावया हंसू झालासी॥ १९॥ तें हंसमुखींचें निरूपण। बोलावया बोलका श्रीशुक जाण। त्या वचनार्थातें लेवून। परम पावन परीक्षिती॥ २०॥ त्या हंसाचें हंसगीत। कृष्ण उद्धवासी सांगत। श्रोतां व्हावें दत्तचित्त। अचुंबित निजबोधू॥ २१॥ तो हा तेरावा अध्यावो। अत्यादरें सांगे देवो। तें ऐकतां उद्धवो। विषयविलयो देखेल॥ २२॥ तेरावे अध्यायीं निरूपण। सत्त्ववृद्धीचें कारण। विद्याउद्भवक्रमू जाण। अतिसुलक्षण सोपारा॥ २३॥ हंसइतिहासाचा योगू। स्वयें सांगेल श्रीरंगू। तेणें चित्तासी विषयवियोगू। सुगम सांगू सांगेल॥ २४॥ द्वादशाध्यायाचे अंतीं। करूनि सद्गुरूचीं भक्ती। पावोनि विद्याकुठारप्राप्ती। छेदावा निश्चितीं जीवाशयो॥ २५॥ छेदिल्या जीवाचें जीवपण। सकळ सांडावें साधन। हें उद्धवें ऐकूनि जाण। प्रतिवचन नेदीच॥ २६॥ उद्धवाचे जीवींचा भावो। सखोल हृदयींचा अभिप्रावो। सकळ आकळोनियां सद्भावो। स्वयें श्रीकृष्णदेवो बोलत॥ २७॥ म्हणसी लागोनि सूत्र त्रिगुण। जीवासी आलें जीवपण। ते अंगीं असतां तिनी गुण। सद्विद्या जाण उपजेना॥ २८॥ तोंडींचा खिळू नव्हता दूरी। नारेळजळ न चढे करीं। तेवीं गुण नवचतां निर्धारीं। विद्या कैशापरी उपजेल॥ २९॥ ऐसा आशंकेचा भावो। जाणोनियां श्रीवासुदेवो। तिहीं श्लोकीं तो पहा हो। गूढाभिप्रावो निरसितू॥ ३०॥
श्रीभगवानुवाच
सत्त्वं रजस्तम इति गुणा बुद्धेर्न चात्मन:।
सत्त्वेनान्यतमौ हन्यात्सत्त्वं सत्त्वेन चैव हि॥ १॥
सत्त्वरजतमादि गुण। निश्चयेंसीं मायेचे जाण। हें द्वादशाध्यायीं निरूपण। तुज म्यां संपूर्ण सांगीतलें॥ ३१॥ सच्चिदानंदू जो येथ। आत्म्यासीं अभिन्न नित्य। तैसे गुण नव्हती समस्त। ते प्राकृत प्रकृतिकार्यें॥ ३२॥ जें सद तेंचि चिद। जें चिद तोचि आनंद। स्वरूपीं नाहीं त्रिविध भेद। तें एकवद सच्चिदानंद॥ ३३॥ जेवीं श्वेतता मृदु मधुर। त्रिविध भेदें एक साखर। तेवीं सच्चिदानंद अविकार। वस्तु साकार एकवद॥ ३४॥ प्रकृति गुणांतें उपजविती। गुणांस्तव सबळ प्रकृती। गुणांसी आत्म्यासी संगती। न घडे कल्पांतीं उद्धवा॥ ३५॥ येथ विद्याउत्पत्तिलक्षण। स्वयें सांगे नारायण। करूनि गुणें गुणांचें मर्दन। सद्विद्या जाण साधावी॥ ३६॥ सत्त्व वाढवून सुरवाडें। जैं रज तम नि:शेष झडे। तैं सद्विद्या हाता चढे। सत्त्वाची वाढी मोडे निजसत्त्वेकरूनी॥ ३७॥ सर्पु लागला होय ज्यासी। विष खादल्या उतार त्यासी। तें विष खातां येरे दिशीं। आत्मघातासी वाढवी॥ ३८॥ तैसें रजतमलोपें सत्त्व वाढे। वाढलें सत्त्व बाधकत्वें कुडें। तेही बाधा मी तुज पुढें। अतिनिवाडें सांगेन॥ ३९॥ मी अलिप्त कर्मकार्या। मी ज्ञाता मी महासुखिया। ऐशा वाढवूनि अभिप्राया। गुणें गुणकार्या गोंविजे सत्त्वे॥ ४०॥ ऐसा वाढला जो सत्त्वगुण। त्यासी उपशमात्मक निजसत्त्वे जाण। समूळ करावें निर्दळण। तैं समाधान पाविजे॥ ४१॥ उद्धवा तूं ऐसें म्हणसी। समानता तिहीं गुणांसी। केवीं वाढी होईल सत्त्वासी। गुण गुणांसी राखण॥ ४२॥ वाढल्या तमोगुण। नावडे तेव्हां ज्ञानध्यान। नावडे त्याग भोग चंदन। निद्रा दारुण कां कलहो॥ ४३॥ वाढल्या रजोगुण। ऐकतां ज्ञाननिरूपण। त्याचें भोगासक्त मन। सदा ध्यान विषयांचें॥ ४४॥ धनलोभ सुदल्या दिठी। पांपरा घेतल्या क्रोध नुठी। हे रजोगुणाची कोटी। लोभिष्ट पोटीं स्त्रीपुत्रां॥ ४५॥ वाढलिया सत्त्वगुण। स्त्रियादिभोगीं उदासीन। सदा करी भगवच्चिंतन। कां करी कीर्तन हरीभक्ती॥ ४६॥ क्रोधलोभमोहलक्षण। सत्त्वकाळीं नुठे जाण। परी एकला केवीं वाढे सत्त्वगुण। गुणांसी राखण गुण होती॥ ४७॥ मागें तम पुढें रज पूर्ण। मध्यें अडकला सत्त्वगुण। तो कैसेनि वाढेल जाण। अडकलेपण सुबद्ध॥ ४८॥ ऐसी आशंका धरूनि जाण। म्हणसी वाढेना सत्त्वगुण। तें सत्त्ववृद्धीचें लक्षण। ऐक संपूर्ण सांगेन॥ ४९॥
सत्त्वाद्धर्मो भवेद्वृद्धात्पुंसो मद्भक्तिलक्षण:।
सात्त्विकोपासया सत्त्वं ततो धर्म: प्रवर्तते॥ २॥
ये श्लोकींचें निरूपण। पहिलें उत्तरार्धव्याख्यान। तेथें सत्त्ववृद्धीचें कारण। सात्त्विक सेवन करावें॥ ५०॥ सात्त्विक पदार्थ सेवितां। सत्त्वबुद्धि होय सर्वथा। सत्त्वविजयें वर्ततां। पवित्रता जीवाची॥ ५१॥ सत्त्वउत्कर्षाचें लक्षण। धर्मनिष्ठा स्वधर्माचरण। तैसें तेथील वासनाबंधन। इहामुत्र जाण वांछीना॥ ५२॥ झालिया शुद्ध अंत:करण। तेव्हां नि:सीम वाढे सत्त्वगुण। पुरुषासी मद्भक्तिलक्षण। धर्म जाण उपतिष्ठे॥ ५३॥ सत्त्वें वाढल्या धर्मप्रवृत्ती। तैं गुरुभजनींअतिप्रीती। कां सत्त्वविग्रही माझी मूर्ती। ते ठायीं भक्ती उल्हासे॥ ५४॥ कायिक वाचिक मानसिक। मदर्पण करी स्वाभाविक। मजवेगळा आणिक। भावार्थ देख स्फुरेना॥ ५५॥ गुरु भगवंत अभिन्न। हेंते काळीं प्रकटे चिन्ह। ते अतिसत्त्वाची वोळखण। हे धर्म पूर्ण सात्त्विक॥ ५६॥
धर्मो रजस्तमो हन्यात् सत्त्ववृद्धिरनुत्तम:।
आशु नश्यति तन्मूलो ह्यधर्म उभये हते॥ ३॥
ऐसा वाढलिया सात्त्विक धर्म। तैं सत्त्ववृद्धि सर्वोत्तम। जे सत्त्वीं प्रकटे पुरुषोत्तम। विश्रामधाम मुमुक्षां॥ ५७॥ एवं सत्त्ववृत्तीं वाढला धर्म। तो तत्काळ नाशी अधर्म। अधर्माचें मूळ रजतम। त्यांचें रूपनाम उरों नेदी॥ ५८॥ सात्त्विकसेवने सत्त्ववृद्धी। तेणें सद्विद्येची उपलब्धी। हे उपायाची विधानविधी। कृष्ण कृपानिधी बोलिला॥ ५९॥ करावें सात्त्विकसेवन। ते सात्त्विक पदार्थ कोण कोण। ऐक त्यांचेंही निरूपण। दशलक्षण सांगेन॥ ६०॥
आगमोऽप: प्रजा देश:काल: कर्म च जन्म च।
ध्यानं मन्त्रोऽथ संस्कारो दशैते गुणहेतव:॥ ४॥
गुणवृद्धीचें कारण। आगम म्हणिजे शास्त्र जाण। आप म्हणिजे तें जीवन। आवडतें स्थान तो देशू॥ ६१॥ ऐक प्रजांचें विंदान। प्रजा म्हणिजे त्रिविध जन। जैसी ज्याची संगती जाण। तैसें लक्षण तो पावे॥ ६२॥ काळ म्हणिजे दिवसभाग। कर्म म्हणिजे जें जें करी अंग। जन्म म्हणिजे दीक्षा सांग। मंत्राचें लिंग यथारुचि॥ ६३॥ कर्त्याचा जेथ अत्यादरू। त्या नांव बोलिजे संस्कारू। हा दशलक्षणप्रकारू। गुणवृद्धिविचारू तो ऐक॥ ६४॥ येथ सत्त्ववृद्धीसी प्रस्तुत। साधकांसी शास्त्र निवृत्त। उपनिषद्भागेंसीं वेदांत। त्याचा मथितार्थ सेवावा॥ ६५॥ आप म्हणिजे जळपवित्रता। गौतमीभागीरथ्यादि पुण्यसरिता। ज्यांचा अवचटें शिंतोडा लागतां। पाप सर्वथा उरेना॥ ६६॥ कां माझ्या प्रतिमांचें चरणामृत। ज्यालागीं ब्रह्मादिक आर्तभूत। किंवा शालिग्रामशिळेचें तीर्थ। सकळ दुरित निवारी॥ ६७॥ जेणें सकळ तीर्थें होती पावन। तें ब्राह्मणाचें चरणतीर्थ जाण। स्वयें वंदी श्रीनारायण। निजहृदयीं चरण वाहतसे॥ ६८॥ भलतैसें हो कां पाणी। जें लागलें सद्गुरुचरणीं। तें सकळ तीर्थां शिरोमणी। सेवितां तत्क्षणीं उद्धरी॥ ६९॥ सत्त्ववृद्धीचें कारण आप। तें इये तीर्थीं जाण पुण्यरूप। सेविता सत्त्ववृद्धीचे स्वरूप। आपेआप प्रकाशे॥ ७०॥ प्रजा म्हणिजे महाजन। सेवावे साधु सज्जन। ज्यांचे संगतीस्तव जाण। उद्धरण जडजीवां॥ ७१॥ सत्त्ववृद्धीसी कारण। मुख्यत्वें सत्संगतीचि जाण। त्या सत्संगाचें महिमान। केलें निरूपण द्वादशीं॥ ७२॥ देशू पूण्यभूमिका सिद्धिस्थळ। विजनवासू एकांतशीळ। जेथ बैसतांचि तत्काळ। सत्त्वासी बळ चढोवढीं॥ ७३॥ एकांतीं स्थिरावल्या आसन। सहजें वाढे सत्त्वगुण। मनीं हव्यासू चढता जाण। वस्तु चिद्घन साधावया॥ ७४॥ साधकांसी काळ यथोचित। अवश्य ब्राह्ममुहूर्त। कां जे काळीं उद्वेगरहित। हर्षयुक्त मन होय॥ ७५॥ प्रेमयुक्त अंत:करणें। जो काळ जाय कथाश्रवणें। कां जयंत्यादि महापूजा करणें। जागरणें हरिदिनीं॥ ७६॥ थोर काळाची सार्थकता। हरिकीर्तनीं गातां नाचतां। त्या काळाचा महिमा तत्त्वतां। माझेन सर्वथा न बोलवे॥ ७७॥ निरभिमान कीर्तन करणें। निर्लोभ गाणें नाचणें। तो काळू वंदिजे म्यां श्रीकृष्णें। महिमा कोणें बोलावा॥ ७८॥ कर्म म्हणिजे तें निवृत्त। जें आशापाशफळरहित। कां क्रिया जे उपकारार्थ। सात्त्विक निश्चित तें कर्म॥ ७९॥ गुरूपासोनि दीक्षाग्रहण। तें पुरुषासी नवें जन्म जाण। गुरु मायबाप संपूर्ण। तें ऐक लक्षण उद्धवा॥ ८०॥ उपजलिया बाळकासी तत्त्वतां। पंचविध जाण पिता। जनिता आणि उपनेता। तिजा प्रतिपाळिता अन्नदानें॥ ८१॥ जो भयापासूनि सोडविता। जो बंधविमोचन करविता। जो देहाचें मरण चुकविता। तोही पिता शास्त्रार्थें॥ ८२॥ यांवेगळा पांचवा पिता। जो झाडणी करी पंचभूतां। मृत्यूपासून सोडविता। जो गर्भव्यथा निवारी॥ ८३॥ ज्याचे देखिलिया चरण। बाधूं न शके भवबंधन। तो सद्गुरु पिता जाण। भाग्येंवीण न पाविजे॥ ८४॥ उपजल्या बाळकासी सर्वथा। वेगळालीं मातापिता। एक वीर्यातें निक्षेपिता। धारणपोषणता जननीची॥ ८५॥ तैसा सद्गुरु नव्हे पिता। निजवीर्य न वेंचितां। योनिद्वारें नुपजवितां। जननी जनिता स्वयें झाला॥ ८६॥ उदराबाहेरी घातल्यापाठीं। माता पुत्रस्नेहें कळवळा उठी। बाहेरिलें सूनि आपुले पोटीं। निजस्नेहें गोमटी गुरुमाता॥ ८७॥ यालागीं शिष्यासी तत्त्वतां। सद्गुरुचि माता पिता। निजस्नेहें वाढविता। तदात्मता अभेदें॥ ८८॥ मागील पिते जे चौघेजण। ते याचे सावत्र बाप जाण। माता पिता भिन्न भिन्न। सखेपण त्यां कैंचें॥ ८९॥ यालागीं सद्गुरु जो सकृपू। तो सच्छिष्यासी सखा बापू। पित्यापुत्रांमाजीं अल्पू। कांहीं विकल्पू उपजेना॥ ९०॥ त्या सद्गुरूपासून जाण। शैवीवैष्णवीदीक्षाग्रहण। अथवा उपदेशी निर्गुण। चैतन्यघन निजबोधें॥ ९१॥ ऐक दीक्षानामाची युक्ती। दे चारी पुरुषार्थ चारी मुक्ती। नि:शेष अविद्येची नाशी स्थिती। दीक्षाव्युत्पत्ती त्या नांव॥ ९२॥ एवं दीक्षाजन्माची जे कथा। उद्धवा सांगीतली म्यां तत्त्वतां।ध्याननिष्ठ जे सात्त्विकता। ऐक आतां सांगेन॥ ९३॥ सत्त्वोपाधि शरीर साचें। चैतन्यघन स्वरूप ज्याचें। तो श्रीविष्णु ध्येय सात्त्विकांचें। ध्यान त्याचें करावें॥ ९४॥ अथवा धवळधाम गोक्षीर। कर्पूरगौर पंचवक्त्र। ध्यानीं आणावा शंकर। संसारपार तरावया॥ ९५॥ या मूर्तींचें ध्यान करितां। हारपे ध्येय ध्यान ध्याता। ठसावे चैतन्यघनता। सात्त्विकता हें ध्यान॥ ९६॥ जैसी दीक्षा तैसें ध्यान। हें आगमशास्त्रींचें प्रमाण। त्या ध्यानाचें पर्यवसान। चैतन्यघन पावावें॥ ९७॥ केवळ जें चैतन्यघन। तें सद्गुरुस्वरूप जाण। त्याचें करावें नित्य ध्यान। अनुसंधान निजनिष्ठा॥ ९८॥ पंचभूतदेहाची मूस। तेथ वोतिला ब्रह्मरस। गुरुस्वरूप तें सविलास। ध्यान रात्रंदिवस करावें त्याचें॥ ९९॥ सात्त्विकांचें जें कां ध्यान। तें हें तूं उद्धवा जाण। आतां मंत्रांचें मंत्रग्रहण। तेंही निरूपण अवधारीं॥ १००॥ सकळ मंत्रांची जननी। जे द्विजन्मा करी तत्क्षणीं। गायत्रीच्या मंत्रग्रहणीं। ब्राह्मणपणीं अधिकारू॥ १॥ जे सकळ मंत्रांचा राजा। जे वांटॺा आली असे द्विजा। जिचेनि धाकें द्विजपूजा। मज अधोक्षजा करणें पडे॥ २॥ ते गायत्री स्वभावतां। आली असे ब्राह्मणांच्या हाता। तिची उपेक्षा करितां। लौल्यें दरिद्रता पावले॥ ३॥ गायत्रीनिष्ठ जो ब्राह्मण। त्याचे मस्तकीं मी वंदीं चरण। मंत्रींगायत्री श्रेष्ठ जाण। वेद प्रमाण ये अर्थीं॥ ४॥ गायत्री रिघाल्यावीण कांहीं। इतर मंत्रां रिघमू नाहीं। मुख्यत्वें गायत्रीच्या ठायीं। ते लागले पाहीं सकळ मंत्र॥ ५॥ नव्हतां गायत्रीसंबंध। मुखीं रिघों न शके वेद। इतर मंत्रां केवीं संवाद। वेदां वंद्य गायत्री॥ ६॥ गायत्रीचें गुह्य परम। चिन्मात्रैक परब्रह्म। तो मंत्र ब्राह्मणासीच सुगम। परी तेही वर्म चुकले॥ ७॥ एवं गायत्रीमंत्र ब्रह्मपूर्ण। सकळ सिद्धींचें कारण। शैववैष्णवमंत्रग्रहण। तेणें त्वरित जाण सत्त्वशुद्धी॥ ८॥ सत्त्वशुद्धीचे परिपाटीं। शैववैष्णवमंत्रकोटी। तेणें सत्त्वशुद्धी उठाउठीं। होय निजात्मदृष्टी साधकां॥ ९॥ मंत्रग्रहणविचार। उद्धवा जाण हा साचार। आतां बोलिला जो संस्कार। तोही प्रकार परियेसीं॥ ११०॥ मनाचे संकल्पविकल्प। तोडावया अतिसाक्षेप। येचि अर्थींचा खटाटोप। महासाटोप जो मांडीं॥ ११॥ संकल्पु उठूंचि न लाहे। जेथें उठी तेथें ठेंचित जाये। विवेकाचेनिबळें पाहे। मोकळु होये मनाचा॥ १२॥ परमात्मनिष्ठापरवडी। अखंड मनाची मोडी पाडी। उसंतघेवों नेदी अर्धघडी। स्मरणनिरवडी मन राखे॥ १३॥ वैराग्यबळें दमी मन। तेणें भेणें करी हरिचिंतन। दासी नुल्लंघी स्वामीचें वचन। तैसें स्मरणाधीन मन करी॥ १४॥ इंद्रियें पाहती नाना पदार्थां। मन न पाहे आणिका अर्था। जागृतीं स्वप्नीं स्वभावतां। अखंडतां हरि स्मरे॥ १५॥ ऐशा संस्कारेंसंस्कारिलें मन। निमिषोन्मेषीं हरिचिंतन। श्वासोच्छ्वासांचें गमनागमन। सोहंध्यान त्या ठायीं॥ १६॥ स्वाभाविक स्मरणादरु। या नांव आत्मसंस्कारु। हा सत्त्ववृद्धीचा प्रकारु। शार्ङ्गधरु बोलिला॥ १७॥ आत्मशुद्धीचें महाकारण। बोलिलों तें हें दशलक्षण। साधकीं सेवावया जाण। विशद निरूपण म्यां केलें॥ १८॥ जेणें खवळला वाढे तमोगुण। तें तमोवृद्धीचें दशलक्षण। केवळ त्यागावया जाण। तेंही निरूपण सांगेन॥ १९॥ तेथींचा आगम आभिचारिक। वेदविरुद्ध मार्ग देख। वारुणी माध्वी मद्योदक। आवश्यक सेविती॥ १२०॥ जे उभयभ्रष्ट पाखंडी। वेषधारी वृथा मुंडी। त्याचें संगतीची अतिगोडी। जेथ अपरवडी विधिवेदां॥ २१॥ द्वेष चोहटा कां परद्वार। तेथेंचि बैसका निरंतर। काळ तों त्यासी मध्यरात्र। तैं व्यापार कर्माचा॥ २२॥ क्रियारंभु जारणमारण। मोहन स्तंभनउच्चाटण। कां करावें वशीकरण। हें कर्म जाण तामस॥ २३॥ जन्म म्हणिजे दीक्षाग्रहण। प्रेतभूतपिशाचविद्या जाण। करितां प्रेतभूतआराधन। प्रेतजन्म जाण तामसां॥ २४॥ जेथ तमोगुण प्रधान। तो क्रोधयुक्त पुरुष जाण। सदा शत्रूचें करी ध्यान। करावया हनन उद्यतू॥ २५॥ तामसी मंत्र मुकी मैळी। अथवा उच्छिष्टचांडाळी। कां प्रेतदेवता कंकाळी। मंत्रशैली हे तेथें॥ २६॥ संस्कार दगड माती। माझें घर हे माझी क्षिती। स्वप्नीं निजेला घाली भिंती। एवढी आसक्ती गृहाची॥ २७॥ घर करावया अशक्त। तरी त्या खिंडोराआंत। सदा दगडमाती राखत। नांदतें तेथ येवों नेदी॥ २८॥ देहालागीं गेह करणें घडे। तें देह कष्टवी अतिदुर्वाडें। तामस संस्कारें रोकडें। केवळ वेडें गृहासक्तीं॥ २९॥ गृहासक्तीचा व्यापारू। जो मरणांत न सोडी नरू। तो जाण तामस संसारू। त्याचा संस्कारू तो माती॥ १३०॥ जेणें थोरावे तमोगुण। तें हें जाण दशलक्षण। ऐक राजसाचें चिन्ह। त्याचें भिन्न स्वरूप॥ ३१॥ करावें सत्त्वाच्या अंगीकारा। त्यागावा तमोगुण दुसरा। पुढें चाविरा मागें लातिरा। ऐक तिसरा रजोगुण॥ ३२॥ हो कां शाहाणी सिंदळी नारी। ते पुरुषाचें मन बरें धरी। मग ठकोनि जाय व्यभिचारीं। तैसी परी रजोगुणा॥ ३३॥ जैसें कां कुचर घोडें। बरें दिसें परी आडवीं अडे। कांहीं केल्या न चले पुढें। मागिलीकडे सरों लागे॥ ३४॥ तैसी रजोगुणाची स्थिती। त्यागू न संभवे कल्पांतीं। धर्म करितो केवळ स्फीती। मनीं आसक्ती कामाची॥ ३५॥ सर्वस्व घ्यावया संवचोरू। सवें धांवे होऊनि नफरू। तैसा रजोगुणाचा विचारू। कामनासंसारू वाढवी॥ ३६॥ धर्म करी कामासक्ती। केलें भोगवी निश्चितीं। पाडी जन्ममरणआवर्तीं। कदाकल्पांतीं सुटेना॥ ३७॥ सात्त्विक तरले माझेनि भजनें। तामस तरले मद्विरोधध्यानें। राजसाचेंजन्ममरणधरणें। रजोगुणें उठीना॥ ३८॥ जेणें प्रबळ वाढ रजोगुणा। त्या सांगेन मी दशलक्षणां। केवळ त्यागावया काम्यकल्पना। या निरूपणा अवधारीं॥ ३९॥ राजसाचें प्रवृत्तिशास्त्र। जें केवळ कामनापर। जेणें होय इहामुत्र। तेथें अत्यादर राजसा॥ १४०॥ आप म्हणिजे तें तंव जळ। वेळावाळा सुपरिमळ। कर्पूरयुक्त अतिशीतळ। प्रिय प्रबळ तें राजसा॥ ४१॥ प्रजासंगति त्याची ऐक। राजवर्गीं सभानायक। व्यवहारीं चतुर अतिरंजक। प्रवृत्तिलोक प्रिय त्यासी॥ ४२॥ राजद्वारीं कां सभेमाझारीं। बैसावें पारीं अथवा वेव्हारीं। कां मंडपतोरणाभीतरीं। सन्मानें करी उपविष्ट॥ ४३॥ वेळु न गमे जैं घरिंच्या घरीं। तैं क्रमी चौहाटा नगरीं। कां बैसे बुद्धिबळांवरी। अत्यादरीं सादर॥ ४४॥ ऐक रजोगुणाची वेळ। सूर्योदयउपरी जो काळ। कां राजस जे सांजवेळ। ते ते काळ प्रिय त्यासी॥ ४५॥ राजसांचें सकाम कर्म। धनधान्यार्थ करिती धर्म। वासना ते पशुपुत्रकाम। स्वप्नींनिष्काम नेणती॥ ४६॥ राजसांसी काम गहन। कामासक्ती दीक्षाग्रहण। तेंचि त्यांचें जन्म जाण। सदा ध्यान स्त्रियेचें॥ ४७॥ मंत्र घ्यावा अभिलाखें। जेणें सन्मान होय लौकिकें। ज्याचा सुगरावा थोर देखे। तो मंत्र आवश्यकें आदरी॥ ४८॥ संस्कार अतिराजस। शरीरभोगांचे विलास। नानापरिमळ बहुवस। उत्तम वास सुधौता॥ ४९॥ संस्काराची अंतरनिष्ठा। लौकिकीं व्हावी देहप्रतिष्ठा। माझी आज्ञा वंद्य वरिष्ठां। सभेचे चौहाटां मी पूज्य॥ १५०॥ रजोगुण दशलक्षण। उद्धवा त्याचीही वोळखण। राजसासी जन्ममरण। सर्वथा जाण सोडीना॥ ५१॥ सात्त्विक त्याग करी विवेकनिष्ठें। तामस त्याग करी कडकडाटें। राजसासीं त्याग न घडे स्पष्टें। द्रव्यदारालोभिष्टें लोभाळू॥ ५२॥ तिहीं गुणांचें लक्षण। म्यां सांगितलें भिन्न भिन्न। तिहींचें सर्वसाधारण। सांगेन चिन्ह तें ऐक॥ ५३॥
तत्तत्सात्त्विकमेवैषां यद्यद्वृद्धा: प्रचक्षते।
निन्दन्ति तामसं तत्तद्राजसं तदुपेक्षितम्॥ ५॥
विवेकवृद्ध वृद्धाचारें। ज्यातें स्तविती अत्यादरें। तें तें सात्त्विक जाण खरें। निजनिर्धारें निश्चित॥ ५४॥ विवेकियाचे अनुवादा। ज्या पदार्थांची करिती निंदा। ते ते जाण तामसबाधा। माझ्या निजबोधा मानलें॥ ५५॥ ज्यातें स्तवित ना निंदित। जीवें भावें उपेक्षित। तें राजस जाण निश्चित। बाधा अद्भुत तयाची॥ ५६॥ जैसें कां विखें रांधिलें अन्न। वरिवरी गोड अंतरीं मरण। तैसा जाण राजस गुण। अतर्क्य बंधन तयाचें॥ ५७॥ राजसासी ज्ञानबोधू। करितां थोंटावला वेदू। त्याचे उपदेशीं ब्रह्मा मंदू। माझेनेही बोधू न करवे॥ ५८॥ याचिलागीं रजोगुण। विवेकीं सांडिला उपेक्षून। उपेक्षेचें हेंच कारण। तुज म्यां जाण सांगीतलें॥ ५९॥ यालागीं सात्त्विक सेवन। साधकीं अवश्य करावें जाण। सात्त्विक सेवनाचा गुण। तुज मी संपूर्ण सांगेन॥ १६०॥
सात्त्विकान्येव सेवेत पुमान् सत्त्वविवृद्धये।
ततो धर्मस्ततो ज्ञानं यावत्स्मृतिरपोहनम्॥ ६॥
सात्त्विक द्रव्यें सेवितां। सत्त्ववृद्धी होय तत्त्वतां। सत्त्ववृद्धी पुरुषीं होता। धर्म स्वभावतां प्रवर्ते॥ ६१॥ धर्मप्रवृत्ति माझें भजन। माझ्या भक्तिउल्हासें जाण। भक्तांसी मी होयें प्रसन्न। तैं स्वभावें ज्ञान प्रकाशे॥ ६२॥ तत्त्वमस्यादि वाक्यव्युत्पत्ती। ते गुरुद्वारा ज्ञानाची प्राप्ती। तरी सत्त्वशुद्धित्वें धर्म भक्ती। कोणे अर्थीं सेवावी॥ ६३॥ ऐसा विकल्प जरी तूं धरिसी। उद्धवा ऐक त्याही विचारासी। यथार्थ सांगेन तुजपाशीं। सत्त्वशुद्धीसी उपयोगू॥ ६४॥ केवळ सत्त्वशुद्धीविण। जाहल्या गुरुवाक्याचें श्रवण। तें पां हाटगाण्याऐसें जाण। अनोळखपण स्वस्वरूपा॥ ६५॥ आंधळें उपजलें जे कुशीं। स्तनपान करी अहर्निशीं। परी तें न देखे माउलीसी। दशा तैशी उपदेशा॥ ६६॥ इंद्रियें सचेतनमेळीं। भगवंत सर्वांतें प्रतिपाळी। त्यातें न देखती विषयांधळीं। अतिअंध झालीं चित्तशुद्धीविण॥ ६७॥ अजागळां लोंबते जाण। मिथ्या भाषण म्हणती ते स्तन। त्यापरी सत्त्वशुद्धीविण। वृथा जाण उपदेश॥ ६८॥ वाहते उदकीं लिहिले लेख। तळीं अक्षर नुमटे एक। तेवीं सत्त्वशुद्धीविण देख। निजज्ञान सुटंक प्रकटेना॥ ६९॥ झाल्या आपादतां सत्त्वशुद्धी। जंव प्रकटेना धर्मबुद्धी। तंव निजज्ञानाची नव्हे सिद्धी। जेवीं ग्रहणामधीं चंद्रमा॥ १७०॥ ऐकतां हरिकथाश्रवण। बाष्प रोमांच स्वेद रुदन। रुका वेंचितां जाय प्राण। तेथेंही ब्रह्मज्ञान प्रकटेना॥ ७१॥ हृदयींचा लोभ जंव न तुटे। तंव निश्चयज्ञान कैंचें भेटे। सत्त्वशुद्धिधर्मू जैं प्रकटे। तैं निजज्ञाननेटें सुपंथीं लागे॥ ७२॥ ते चालतां धर्मपंथीं। जै माझी भक्ति होय सांगाती। तैं चोरांची न पडे गुंती। शीघ्रगती मज पावे॥ ७३॥ ते भक्तीचा सांडितां सांगातू। पुढील अनोळख महापंथू। तेथ कामक्रोध करिती घातू। विकल्पआवर्तू बुडविती॥ ७४॥ भाग्येंवीण माझी भक्ती। प्राण्यासी नव्हे गा सांगाती। जिचे संगें चालतां पंथीं। अल्पही गुंती पडेना॥ ७५॥ माझे भक्तीसवें महाशूर। नांवाणिगे नवविध वीर। सन्नद्धबद्ध सदा समोर। महाझुंझार निजबोधें॥ ७६॥ यालागीं माझे भक्तीविण। सहस्रधा केल्या श्रवण मनन। माझी प्राप्ति नव्हे जाण। भजनें पूर्ण मत्प्राप्ती॥ ७७॥ सर्व भूतीं भगवद्भावो। या नांव मुख्यभक्ति पहा हो। ते सांगाती झालिया स्वयमेवो। कामक्रोधमोहो न शकती बाधूं॥ ७८॥ साक्षेपें नेऊनि घागरी। पालथी घातल्या गंगासागरीं। जळबिंदु रिघेना भीतरीं। तैशी परी महावाक्या॥ ७९॥ यालागीं अत्यादरेंसीं जाण। धर्मयुक्त माझें भजन। करितां मी होय प्रसन्न। मत्प्रसादें ज्ञान प्रकाशे॥ १८०॥ लोभ ठेऊनि अर्थस्वार्थीं। कोरडी करितां माझी भक्ती। मी प्रसन्न नव्हें श्रीपती। जाण निश्चितीं उद्धवा॥ ८१॥ जो धनें मनें काया वचनें। वेंचूनि भजे मजकारणें। त्यासीच म्यां प्रसन्न होणें। जेवीं चंद्रकिरणें चकोरा॥ ८२॥ व्याली धेनु वत्सा वोरसे। तेवीं मी तुष्टें अतिसंतोषें। तेवीं माझेनि प्रसादवशें। माझें ज्ञान प्रकाशे मद्भक्तां॥ ८३॥ सगुण सुंदर आणि पतिव्रता। अतिशयें पढियंती होय कांता। तिसी सर्वस्व दे न मागतां भर्ता। तेवीं मी मद्भक्तां प्रसन्न॥ ८४॥ माझेनि प्रसादें प्रकाशे ज्ञान। श्रुति स्मृती नांव म्हणती जाण। सविलास अविद्यानिरसन। ‘अपोहन’ या नांव॥ ८५॥ गुणास्तव देह जाण। देहास्तव उपजे ज्ञान। तेणें ज्ञानें गुणनिर्दळण। देहनिरसन न घडे म्हणसी॥ ८६॥ हे गोष्टी तूं म्हणसी कुडी। कीं पक्षी आपुले पांख मोडी। नारळ नारळीतें तोडी। स्वमांसाची गोडी व्याघ्र चाखे॥ ८७॥ हें न घडतें जैं घडों बैसे। तैं देहींचेनि ज्ञानें गुणदेह नासे। हा विकल्पू धरिसी मानसें। ऐक अनायासें तो निरासू॥ ८८॥
वेणुसङ्घर्षजो वह्निर्दग्ध्वा शाम्यति तद्वनम्।
एवं गुणव्यत्ययजो देह: शाम्यति तत्क्रिय:॥ ७॥
दैवें वायूच्या कल्लोळीं। परस्परें वेळूजाळीं। स्वजातिकांचणीं इंगळी। पेटली ते होळी वनाची करी॥ ८९॥ अग्नि उपजला जे कांडीं। तेंही कांडें जाळूनि सांडी। वनीं नुरवूनियां काडी। स्वयें राखोंडी होऊनि विझे॥ १९०॥ तेवीं वैराग्याभ्यासवायूंनीं। होतां त्रिगुणांची कांचणी। तेथें प्रकटला ज्ञानाग्नी। अविद्यावनीं दाहकू॥ ९१॥ तो हरिगुरुकृपा खवळला। वृत्तिरूपें प्रज्वळला। देहद्वयेंसीं लागला। प्रवर्तला गुणांतें जाळूं॥ ९२॥ जळाल्या आशातृष्णेच्या पाळी। जळालीं कामलोभांचीं कोल्हीं। क्रोधव्याघ्राची होळी झाली। आगी लागली मदगजा॥ ९३॥ जाळिली स्नेहाची आरांटी। जाळिली असत्याची बोरांटी। जाळिला मोहअजगरू उठाउठी। जाळिला शेवटीं काळविट काळू॥ ९४॥ उठिला अहंकाराचा सोरू। धरितां न धरे अनिवारू। तोही जाळिला दुर्धरू। वणवा चौफेरू कोंडला॥ ९५॥ पळूनि जावयापुरता। अणुभरी ठावो नुरेचि रिता। एवं जळाला तो पळतपळतां। अहंसोरु सर्वथा निमाला॥ ९६॥ नवल अग्नीचें विंदाण। आपणिया जाळी आपण। दाहकशक्तीतें जाळून। स्वस्वरूपीं जाण उपरमे॥ ९७॥ ऐसें ऐकोनि निरूपण। उद्धवासी विस्मयो गहन। जनास केवढी नागवण। आपणिया आपण वोढवली॥ ९८॥ नश्वरदेहाचिये साठीं। पाविजे परब्रह्माची पुष्टी। ते सांडूनियां करंटीं। विषयनिष्ठीं मरमरों मरती॥ ९९॥ सात्त्विकसेवनें सत्त्ववृद्धी। तेणें अलभ्य लाभे सिद्धी। ते सांडोनियां दुर्बुद्धी। विषयविधीं रातले॥ २००॥ केवढा नाडू मांडला लोकां। ऐशी जीवींची आशंका। यालागीं यदुनायका। आदरें देखा पुसत॥ १॥
उद्धव उवाच
विदन्ति मर्त्या: प्रायेण विषयान्पदमापदाम्।
तथापि भुञ्जते कृष्ण तत्कथं श्वखराजवत्॥ ८॥
उद्धव म्हणे श्रीमुकुंदा। ऐक सर्वज्ञा गोविंदा। विषयांची पदोपदीं आपदा। सर्वीं सर्वदा कळलीसे॥ २॥ जो झाला विषयाधीन। तो सर्वीं सर्वत्र सदा दीन। ऐसें जाणत जाणतां जन। आसक्ति गहन विषयांची॥ ३॥ जैसें कां श्वान आणि खर अज। तैसे विषयांसी लोक निर्लज्ज। सांडूनि स्वहिताचें काज। का विषयांचे भोज नाचती॥ ४॥ शुनी वसवसोनि पाठीं लागे। श्वान सवेंच लागे मागें। पुच्छ हालवूनि हुंगे। लाज नेघे जनाची॥ ५॥ काणा कुंटा व्याधिव्याप्त। चिंता कांठफरा गळां वाहत। तोही शुनीमागें धांवत। कामासक्त अविचार॥ ६॥ शुनी सक्रोधें वसवसी। तें गोड लागे श्वानासी। जीवित बांधलें तिच्या पुंसीं। ती मागमागेंसीं हिंडतू॥ ७॥ अंगीं अंगा होतां भेटी। सक्रोध शुनी लागे पाठीं। तरी न सोडी पुसांटी। कुंकांत उठी कामासी॥ ८॥ ऐशा संकटीं जैं भोग चढे। तैं भोगासवेंचि आडकोनि पडे। हड हड करिती चहूंकडे। जगापुढें फजीती॥ ९॥ निंदेचे सैंघ वाजती धोंडे। मूर्ख तेही थुंकिती तोंडें। ऐंसेंचि पुरुषासही घडे। तरीही आवडे अतिकामू॥ २१०॥ श्वानाचें हेंड तत्काळ सुटे। मनुष्याचें आकल्प न सुटे। स्त्रीलोभाळू अतिलोभिष्ठ। तीलागीं संकटें नाना सोशी॥ ११॥ नातरी गाढवाच्या परी। दूरी देखोनियां खरी। भुंकत धांवे तीवरी। लाज न धरी सर्वथा॥ १२॥ खरी पळे पुढेंपुढें। खरू धांवे वाडेंकोडें। लाता हाणोनि फोडी जाभाडें। तरी पुढेंपुढें धसों लागे॥ १३॥ लाता हाणे उरावरी। तरी तिची प्रीति धरी। ऐशिया स्त्रियांचे घराचारीं। खराच्यापरी नांदती॥ १४॥ नातरी बोकडाची गति जैशी। तैशी दशा दिसे पुरुषासी। मारूं आणिल्या पशुहत्याऱ्यापाशीं। तरी शेळ्यांसी सेवित॥ १५॥ स्वयाती मारितां देखे। अनुताप नेघे तेणें दु:खें। मृत्युसमीपही अभिलाखें। कामसुखें वांछिती॥ १६॥ पूर्ण मृत्यूची पायरी। तें वार्धक्य वाजलें उरीं। तरी धांवे विषयावरी। आठवू न धरी मरणाचा॥ १७॥ मेष मारूं आणिला घातकें। निजसख्यांतें मारितां देखे। तें न मनूनियां यथासुखें। अजीसीं हरिखें रमों धांवे॥ १८॥ मेष श्वान आणि खर। हे ऋतुकाळींचि विषयतत्पर। त्याहूनि विशेषेंसीं नर। कामी दुर्धर सर्वदा॥ १९॥ गर्भ संभवल्यापाठीं। श्वानही स्त्रीभोगासी नुठी। पुरुषाची अभिनव गोठी। गरोदर गोमटी भोगिती॥ २२०॥ गाढव गाढवीसी बुंथड। न करी अलंकार मोथड। मनुष्यासी स्त्रियेचें कोड। तिचें वालभ वाड वाढवी॥ २१॥ दांडा गोंडा मूद वेणी। टिळकु वरी रत्नखेवणी। नाकींचें हालों दे सुपाणी। हें मनुष्यपणीं वालभ॥ २२॥ जरी प्रसूतिकाळ निकट। गाडॺाएवढें वाढलें पोट। तरी कामचारी विवेकनष्ट। रमताती दुष्ट स्त्रियांसीं॥ २३॥ अस्थि मांस विष्ठा मूत। तेणें कामिनी पूर्ण भरित। ते कुश्चळीं जन कामासक्त। जाणोनि होत कां देवा॥ २४॥ या प्रश्नाचें प्रत्युत्तर। तीं श्लोकीं सांगे शार्ङ्गधर। कामासक्तीचा विचार। ऐक सादर उद्धवा॥ २५॥
श्रीभगवानुवाच
अहमित्यन्यथाबुद्धि: प्रमत्तस्य यथा हृदि।
उत्सर्पति रजो घोरं ततो वैकारिकं मन:॥ ९॥
मोहप्रमत्त विवेकशून्य। त्या पुरुषांच्या ठायीं जाण। देहात्मवादें अभिमानें। रजोगुणें खवळला॥ २६॥ जैसा मदिरापानें उन्मत्तू। विसरूनि आपुला निजस्वार्थू। मग अन्योन्य अनर्थू। आत्मघातू करूं धांवे॥ २७॥ तेवीं शुद्ध बुद्ध नित्यमुक्तु। हा विसरोनि निजस्वार्थु। रजोगुणें लोलंगतु। कामासक्तु नरू कीजे॥ २८॥ रजीं रंगल्या अभिमान। दु:खरूप तो दारुण। दुर्धर वाढे रजोगुण। विचारी मन तेणें होय॥ २९॥
रजोयुक्तस्य मनस: सङ्कल्प: सविकल्पक:।
तत: कामो गुणध्यानाद्दु:सह: स्याद्धि दुर्मते:॥ १०॥
जैं रजोयुक्त झालें मन। तैं संकल्पविकल्प गहन। एकांतीं घातल्या आसन। ध्यानीं चिंतन स्त्रियेचें॥ २३०॥ रजोगुणें कामासक्ती। होय दुष्ट वासना दुर्मती। कामावांचूनि चित्तीं। आणिक स्फूर्ती स्फुरेना॥ ३१॥ जनीं वनीं आणि विजनीं। जागृतीं सुषुप्तीं स्वप्नीं। ध्यानीं मनीं चिंतनीं। स्त्रीवांचूनी स्मरेना॥ ३२॥ कामिनीकामाचा अध्यास। हावभाव अतिविलास। गुणलावण्य सुरतरस। आसक्त मानस ते ठायीं॥ ३३॥ रतिसुखाचा आराम। कामिनीक्रीडेचा संभ्रम। तेणें दुर्धर झाला जो काम। तयासि नियम चालेना॥ ३४॥ धनधान्यपुत्रसुख। वांछी इहलोकपरलोक। हा रजोगुणाचा देख। अलोलिक अतिकामू॥ ३५॥
करोति कामवशग: कर्माण्यविजितेन्द्रिय:।
दु:खोदर्काणि सम्पश्यन् रजोवेगविमोहित:॥ ११॥
जेथ रजाचा वेग उदित। तेथ कामग्रहो खवळे अद्भुत। जो पुरुष झाला कामग्रस्त। तो सदा अंकित कामाचा॥ ३६॥ ज्यासी विवेक नाहीं मानसीं। तो जाण पां कामाची आंदणी दासी। काम नाचवी जैसें त्यासी। तेणें विकारेंसीं नाचत॥ ३७॥ कामांकित झालिया पुढें। सकाम कर्म करणें पडे। ज्याचें उत्तरोत्तर दु:ख वाढे। अतिदुर्वाडें गर्वितु॥ ३८॥ रजोगुणें अतिमोहित। यालागीं अजितेंद्रिय अयुक्त। जन्ममरणांचा अंकित। कर्में करीत तद्रूपें॥ ३९॥ रजोगुणाचा अतिबाध। तेणें जन केले विषयांध। रजरागी महामंद। जाण प्रसिद्ध उद्धवा॥ २४०॥ रजें बांधल्यापाठीं जाण। होय महामोहाचें संचरण। तेव्हां भ्रमाचें वाउधाण। सैरा तमोगुण उल्हासे॥ ४१॥ ऐशी प्राणियांची मती। उद्धवा जाण निश्चितीं। यालागीं काम ते सेविती। नव्हे विरक्ती विषयांची॥ ४२॥ तुज ऐसें वाटेल चित्तीं। बुडाली तरणोपायस्थिती। खुंटली प्राण्यांची परम गती। विषयासक्ती अनिवार॥ ४३॥ जीवा अविद्याविषयसंबंधू। याचा बाधू अतिसुबद्धू। अविद्यायोग अनादिसिद्धू। तेणें दृढ भेदू जीवासी॥ ४४॥ अंत:करणही अनादी। प्रवाहरूपें त्याची सिद्धी। तेणें दृढ झाली विषयबुद्धी। त्याग त्रिशुद्धी घडेना॥ ४५॥ सत्त्वीं उत्पन्न अंत:करण। परी तें प्रकृतिकार्य जाण। तेथें भोगाध्यासें रजोगुण। खवळला कोण आवरी॥ ४६॥ विषयीं बांधिले विवेकी। तो विषयत्याग नव्हे ये लोकीं। उद्धवा तुझी आशंका हेच कीं। ऐक तेविखीं उपावो॥ ४७॥ विवेकियांच्या ठायीं। विषयबुद्धि नुपजे पाहीं। विक्षेपू झाल्या कहींबहीं अभ्यासू तिंहीं करावा॥ ४८॥
रजस्तमोभ्यां यदपि विद्वान्विक्षिप्तधी: पुन:।
अतन्द्रितो मनो युञ्जन् दोषदृष्टिर्न सज्जते॥ १२॥
हो कां रजतमांचेनि गुणें। जरी बुद्धि विक्षिप्त केली तेणें। तरी आळस सांडूनि सज्ञानें। आवरणें मनातें॥ ४९॥ अस्थिमांसाचा घडिला। विष्ठामूत्रांचा कोथळा। स्त्री विचारितां कांटाळा। नरकजिव्हाळा तो भोगू॥ २५०॥ भोगीं दावूनि दोषदृष्टी। मनासी विषयांची तुटी। करावी गा उठाउठी। नेमूनि निहटीं मनातें॥ ५१॥ ऐसेनिही मन अतिदुर्धर। नियमासी नावरे अनावर। साधकांसी अतिदुस्तर। अशक्त नर ये अर्थीं॥ ५२॥ तरी ऐक बापा सावधान। मनोनिग्रहाचें लक्षण। तेंही सांगेन साधन। जेणें प्रकारें मन आकळे॥ ५३॥
अप्रमत्तोऽनुयुञ्जीत मनो मय्यर्पयञ्छनै:।
अनिर्विण्णो यथाकालं जितश्वासो जितासन:॥ १३॥
आळसनिद्रेसी दवडूनि दूरी। जो सावधान निजवृत्ति धरी। माझें चिद्रूप निर्धारीं। शनै:शनै:करी अभ्यासू॥ ५४॥ अभ्यासीं प्रथम भूमिका। शिकावी आसनगाढिका। मूळबंध अतिनेटका। आसनजयो देखा शिकावा॥ ५५॥ आसनजयो आल्या हाता। सहजें चढे योगपंथा। तेथें प्राणापानसमता। अभ्यासितां हों लागे॥ ५६॥ विषय ते मनाआधीन। मन पवनासी वश्य जाण। अभ्यासें वश केला पवन। सहजें मन स्थिरावे॥ ५७॥ यापरी जो हळू हळू। अभ्यासें सार्थक करी काळू। अविरक्त परी प्रबळू। होय भुकाळू परमार्थी॥ ५८॥ हरिचिंतनीं एकाग्र मन। तैं एक होती प्राणापान। हाचि पवनजयो पूर्ण। योगसाधन सहजेंचि॥ ५९॥ तंव प्राणापान सम जोडी। षट्चक्रांचे पदर फोडी। तैं विषयांतें चित्त सांडी। विषयो वोसंडी चित्तातें॥ २६०॥ यापरी या अभ्यासवाटे। सकाम कामाचा तटका तुटे। सनकादिक येणें परिपाठें। म्यां आत्मनिष्ठे लाविले॥ ६१॥
एतावान्योग आदिष्टो मच्छिष्यै: सनकादिभि:।
सर्वतो मन आकृष्य मय्यद्धाऽऽवेश्यते यथा॥ १४॥
येणेंचि उपदेशें देख। माझे शिष्य सनकादिक। अभ्यासबळें अलोलिक। निजात्मसुख पावले॥ ६२॥ तो उपदेश कोण म्हणसी। जो वियोग चित्तविषयांसी। हें म्यां सांगोनियां त्यांसी। आत्माभ्यासीं लाविलें॥ ६३॥ मन जेथें जेथें जाये। तेथें तेथें वस्तूचि आहे। येणें अभ्यासें लवलाहें। सनकादिक पाहें सिद्ध झाले॥ ६४॥ चित्तासी विषयांचा वियोगू। हा सनकादिकीं साधिला योगू। त्यांसी उपदेशावया सांगू। मी स्वयें श्रीरंगू उपदेष्टा॥ ६५॥ तें ऐकोनि उद्धव पाहीं। विचारी आपुलिया ठायीं। मी श्रीकृष्णावेगळा कंहीं नाहीं। सनकादिक कंहीं उपदेशिले॥ ६६॥ सनकादिक ब्रह्मशीळ। पूर्वीं जाहले बहुकाळ। कृष्ण ये काळींचें देवकीबाळ गुरुत्व केवळ घडे कैसें॥ ६७॥
उद्धव उवाच
यदा त्वं सनकादिभ्यो येन रूपेण केशव।
योगमादिष्टवानेतद्रूपमिच्छामि वेदितुम्॥ १५॥
उद्धव म्हणे गा केशवा। सनकादिकांसी केव्हां। उपदेश केला गा तुवां। जवळी तेव्हां मी कां नव्हतों॥ ६८॥ येणेंचि रूपें हृषीकेशी। योग सांगीतला तयांसी। किंवा रूपांतरें म्हणसी। तें जाणावयासी मज इच्छा॥ ६९॥ कोण काळ समयो कोण। कोण योग कैसा प्रश्न। तें कृपा करोनि आपण। मज संपूर्ण सांगावें॥ २७०॥ ऐकोनि उद्धवाचा प्रश्न। कृपा कळवळला नारायण। हंसइतिहासनिरूपण। आपुलें आपण सांगत॥ ७१॥
श्रीभगवानुवाच
पुत्रा हिरण्यगर्भस्य मानसा: सनकादय:।
पप्रच्छु: पितरं सूक्ष्मां योगस्यैकान्तिकीं गतिम्॥ १६॥
ब्रह्मयाचे मानसपुत्र। महाप्रसिद्ध सनत्कुमार। तिंहीं सत्यलोकीं प्रश्न थोर। अतिदुस्तरपूशिला॥ ७२॥ अतिसूक्ष्म योगगती। दुर्ज्ञेय स्वस्वरूपस्थिती। परम कठिण प्रश्नोक्ती पित्याप्रती पूशिली॥ ७३॥
सनकादयऊचु:
गुणेष्वाविशते चेतो गुणाश्चेतसि च प्रभो।
कथमन्योन्यसंत्यागो मुमुक्षोरतितितीर्षो:॥ १७॥
सनकादिक पुसत। विषयांच्या ठायीं चित्त। स्वभावें असे विषयासक्त। तें विषयीं सतत आवेशलें॥ ७४॥ तैसेचि विषय पाहीं। प्रवेशले चित्ताच्या ठायीं। वासनारूपें जडले तेही। निघोंकंहीं नेणती॥ ७५॥ फळ काळ दोनी नाहीं। तरी तैंचे आंबे गोड पाहीं। ऐसे विषय चित्ताचे ठायीं। रिघाले कंहीं न निघती॥ ७६॥ पर्णिली कांता माहेरा जाये। चित्तीं रिघाली दूरी न राहे। यापरी विषयो पाहें। जडला ठाये चित्तासी॥ ७७॥ चित्त विषयो अन्योन्य त्यागू। मुमुक्षां केवीं घडे चांगू। ये उपायीं उपाययोगू। स्वामीनें सांगू सांगावा॥ ७८॥
श्रीभगवानुवाच
एवं पृष्टो महादेव: स्वयंभूर्भूतभावन:।
ध्यायमान: प्रश्नबीजं नाभ्यपद्यत कर्मधी:॥ १८॥
ज्यासी अग्रपूजेचा सन्मान। श्रेष्ठ देवांमाजीं महिमान। महादेव म्हणावया कारण। ब्रह्मयासी जाण या हेतू॥ ७९॥ जो आंगें स्रजी चराचर। जो वेदांचें निजमंदिर। त्या ब्रह्मयाप्रती अतिगंभीर। प्रश्न महाथोर पुत्रीं केला॥ २८०॥ त्या प्रश्नाची प्रश्नोत्तरविधी। ब्रह्मयासी न कळे त्रिशुद्धी। कर्मजड झाली बुद्धी। बोधकसिद्धी स्फुरेना॥ ८१॥ प्रश्न अत्यंत सखोल पडिला। तेणें ब्रह्मा वेडावला ठेला। कांहीं न बोलवे जी बोला। तो चिंतूं लागला मज तेव्हां॥ ८२॥ सनकादिकांची प्रश्नावस्था। सत्यलोकीं समस्तांदेखतां। न कळे न म्हणवे सर्वथा। सांगों जातां नव्हे बोध॥ ८३॥ ऐसें ब्रह्मयासी दुर्घट। कांहीं न बोलवे स्पष्ट। परम देखोनि संकट। मी ज्ञानवरिष्ठ चिंतिलों॥ ८४॥
स मामचिन्तयद्देव: प्रश्नपार तितीर्षया।
तस्याहं हंसरूपेण सकाशमगमं तदा॥ १९॥
निरसावया पुत्राचें अज्ञान। आणि तरावया त्यांचा प्रश्न। ब्रह्मा करी माझें चिंतन। तेव्हां माझेंही मन कळवळलें॥ ८५॥ ब्रह्मा माझे पोटींचें बाळ। त्यासी कर्मजाडॺें आलें पडळ। तें निरसावयातत्काळ। हंस केवळ मी जाहलों॥ ८६॥ प्रश्न केला अपरंपार। जो परमहंसाचें परम सार। त्याचा पावावया परपार। हंसरूपधर मी जाहलों॥ ८७॥ नातळे वर्णव्यक्तिविलास। तो मी श्वेतवर्ण स्वप्रकाश। स्वयें झालों राजहंस। ब्रह्मपुत्रांस उपदेशावया॥ ८८॥ सृष्टि स्रजावयाचे विधी। विधाता लागला त्रिशुद्धी। तेणें कर्मजड झाली बुद्धी। निजज्ञानसिद्धी विसरला॥ ८९॥ जो म्हणे मी कर्माधिकारी। तेव्हांचि तो देहधारी। तो परमार्थचे नगरीं। न सरे निर्धारीं बाह्यमुद्रा॥ २९०॥ ‘न कर्मणा न प्रजया’ ऐसी वेदोक्ति। कर्म निषेधें त्यागवि श्रुती। तेणें कर्में ब्रह्मप्राप्ती। जे म्हणती ते अज्ञान ज्ञाते॥ ९१॥ म्यां उपदेशिलें ब्रह्मयासी। शेखीं कर्मजाडॺ आलें त्यासी। केवळ कर्में कर्मठासी। मुक्ति तयासी कैसेनी॥ ९२॥ ब्रह्मा अदृष्टद्रष्टा लोकीं तिहीं। तो कर्मजाडॺें झाला विषयी। इतरांचा तो पाड कायी। ठकले ये ठायीं सज्ञान॥ ९३॥ सांगतां पुत्रांचा प्रश्न। उजळेल ब्रह्मयाचें निजज्ञान। ऐसें साधोनियां विंदान। सत्यलोकीं जाण उतरलों॥ ९४॥ प्रश्नकर्ते सनकादिक। वक्ता सत्यलोकनायक। दोहींसीही पडली अटक। ते काळीं देख मी आलों॥ ९५॥ नासों नेदितां साचार। हंस निवडी क्षीरनीर। तैसें निवडावया सारासार। ज्ञानचतुर मी राजहंस॥ ९६॥ पूर्वपुण्यसंचयेंवीण। विमानेंवीण स्वयें गमन। सत्यलोकीं आगमन। कोणाचेंही जाण कदा नव्हे॥ ९७॥ मी पापपुण्यातीत पाहीं। यालागीं मजपाप पुण्य नाहीं। पाखीं कां चालोनि पायीं। तो मी सर्वां ठायीं सर्वगतू॥ ९८॥ त्या सत्यलोका मी अवचितां। हंसस्वरूपें झालों येता। त्या मज देखोनियां समस्तां। परमाश्चर्यता वाटली॥ ९९॥
दृष्ट्वा मां त उपव्रज्य कृत्वा पादाभिवन्दनम्।
ब्रह्माणमग्रत: कृत्वा पप्रच्छु: को भवानिति॥ २०॥
परब्रह्मैक परम मूर्ती। मज येतां देखोनि हंसस्थितीं। उभे ठाकोनि सामोरे येती। चरण वंदिती साष्टांग॥ ३००॥ ब्रह्मसदनीं वेद मूर्तिमंत। पुण्यही मूर्तिमंत तेथ। सत्यलोकीं मूर्तिमंत सत्य। तपादि समस्त मूर्तिमंतें॥ १॥ त्या समस्तां देखतां जाण। ब्रह्मयानें पुसावें तूं कोण। पुसल्या येईल नेणतेपण। यालागीं मौन धरोनि ठेला॥ २॥ ब्रह्मा पुढें करूनि जाण। सनकादिकीं आपण। मज केला गा तिंहीं प्रश्न। तुम्ही कोण कोठील॥ ३॥
इत्यहं मुनिभि: पृष्टस्तत्त्वजिज्ञासुभिस्तदा।
यदवोचमहं तेभ्यस्तदुद्धव निबोध मे॥ २१॥
ब्रह्मयासी पुसिला जो प्रश्न। त्याचा तत्त्वार्थ जाणावया जाण। मज पुशिलें तिंहीं तूं कोण। अतिविचक्षण जिज्ञासू॥ ४॥ त्यासी स्थूळ लिंग कारण। यावेगळी वस्तु चिद्धन। सांगावया प्रश्नखंडण। तीं श्लोकीं जाण म्यां केलें॥ ५॥ करोनियां प्रश्नखंडण। नित्यानित्यविवेकज्ञान। त्यांसी म्यां सांगीतलें जाण। तेंचि निरूपण तूं ऐक॥ ६॥ सनकादिकांसमान। उद्धवा तुज मी मानीं जाण। यालागीं त्यांचें ज्ञानकथन। ऐक सांगेन म्हणतसें॥ ७॥ तें अतिश्रेष्ठ जुनाट ज्ञान। उद्धवा परिसें सावधान। ऐसें ऐकोनियां वचन। येरें मनाचे कान पसरले॥ ८॥ देहद्वय सांडोनि मागें। उद्धव श्रवण झाला सर्वांगें। यालागीं स्वयें श्रीरंगें। गुह्य ज्ञान स्वांगें सांगीतलें॥ ९॥ देवालयीं लागे रत्नखाणी। त्यांमाजीं सांपडला स्पर्शमणी। अमृत स्रवे त्यापासोनि। तैसा सभाग्यपणीं उद्धवू॥ ३१०॥ सांगता श्रीमहाभागवता। श्रीकृष्णासारिखा वक्ता। त्याहीमाजी हंसगीतकथा। आदरें सांगता हरि झाला॥ ११॥ सनकादिकांची जे प्राप्ती। ते दाटूनि उद्धवाचे हातीं। स्वयें देतसे श्रीपती। त्याचें भाग्य किती वर्णावें॥ १२॥ ब्रह्मरूप स्वयें वक्ता। तोही उपदेशी ब्रह्मकथा। गुरु ब्रह्मचि स्वभावतां। हे सभाग्यता उद्धवीं॥ १३॥ यालागीं निजभाग्यें भाग्यवंतू। जगीं उद्धवचि अतिविख्यातू। ज्यालागीं स्वयें जगन्नाथू। ज्ञानसमर्थूतुष्टला॥ १४॥
हंस उवाच
वस्तुनो यद्यनानात्वमात्मन: प्रश्न ईदृश:।
कथं घटेत वो विप्रा वक्तुर्वा मे क आश्रय:॥ २२॥
परमात्मा अवघा एक। तेथ ‘मी तूं’ हें न रिघे देख। ‘तूं कोण’ हें जें वाचिक। वृथा शाब्दिक वाचाळे॥ १५॥ तुम्हीं केला जो प्रश्न। त्यासी द्यावया प्रतिवचन। वक्त्यासी आश्रयो नाहीं जाण। मीतूंपण दिसेना॥ १६॥ तुम्हीं पुसिलें नेणोन। म्यां काय सांगावें जाणोन। मूळीं नाहीं मीतूंपण। पुशिला प्रश्न तो मिथ्या॥ १७॥ नामरूपवर्णव्यक्ती। नाहीं स्वजातिविजाती। विप्र हो तुमची वचनोक्ती। न घडे निश्चितीं सत्यत्वें॥ १८॥ चारी पुरुषार्थ पूर्ण करिती। हे विप्रनामाची परमख्याती। त्या तुम्हां सज्ञानाची प्रश्नोक्ती। न घडे निश्चितीं विप्र हो॥ १९॥ असावें जरी बहुपण। तरी पुसणें घडे तूं कोण। आत्म्याचे ठायीं ऐसा प्रश्न। न घडे जाण सर्वथा॥ ३२०॥ प्रश्न न घडे आत्म्याच्या ठायीं। जरी म्हणाल देहाविषयीं। तेंही न घडे गा पाहीं। तो देहाचे ठायीं योजेना॥ २१॥
पञ्चात्मकेषु भूतेषु समानेषु च वस्तुत:।
को भवानिति व: प्रश्नो वाचारम्भो ह्यनर्थक:॥ २३॥
आदी ब्रह्मा अंतीं मशक। देह तितुका पांचभौतिक। तेथ तूं कोण म्हणावया देख। वेगळीक दिसेना॥ २२॥ कटक कुंडलें मुकुट माळा। करमुद्रिका कटिमेखळा। अलंकार पाहातां डोळां। सुवर्णावेगळा अंशु नाहीं॥ २३॥ कां घडा गाडगें वेळणी। परळ रांजण माथणी। हें मृत्तिकेवांचुनी। आन कांहीं असेना॥ २४॥ तेवीं सर्व देहीं देहत्वें जाण। पांचभौतिक समसमान। तेथ म्हणावया तूं कोण। वेगळेपण असेना॥ २५॥ वस्तु वस्तुत्वें समसमान। भूतें भूतत्वें समान जाण। तेथ प्रश्नोक्ति वाचारंभण। ‘तूं कोण’ हें अनर्थू॥ २६॥ हो कां आपणिया आपण। जो कोणी पुसेल तूं कोण। तो अतिभ्रमें भुलला जाण। निजात्मज्ञान विसरला॥ २७॥ विचारितां प्रश्नाचा अर्थू। एवढा दिसतसे अनर्थू। कांहीं भासेना परमार्थू। तूं कोण हा व्यर्थू प्रश्न तुमचा॥ २८॥ देहासी तूं कोण ऐसें। आत्मा जैं स्वयें पुसे। तैं आत्मत्वा लागलें पिसें। अतिभ्रंशें भूलला॥ २९॥ दोराअंगीं सर्प नसे। त्यावरी तो भ्रमें भासे। त्या सर्पातें दोरू पुसे। तूं कोण ऐसें तें मिथ्या॥ ३३०॥ या रीतीं त्यांचें प्रश्नखंडन। उद्धवा तैं म्यां केलें जाण। तेणें भेदाचें निरसन। वचनोक्तीं जाण दाविलें॥ ३१॥ प्रश्नखंडणाचे अर्थें। कैंचीं करणें कैंचीं भूतें। भेद नाहीं जीवशिवांतें। हेंही त्यांतें सूचिलें॥ ३२॥ याहीवरी जे कथा गहन। परम कारणेंसीं अभिन्न। त्यांसी म्यां सांगीतलें निजज्ञान। ऐक सावधान उद्धवा॥ ३३॥
मनसा वचसा दृष्टॺा गृह्यतेऽन्यैरपीन्द्रियै:।
अहमेव न मत्तोऽन्यदिति बुध्यध्वमञ्जसा॥ २४॥
मजवेगळा तिळाइतुका। रिता ठावो नाहीं देखा। तेथ व्याप्य आणि व्यापका। अभिन्नत्व देखा सहजचि॥ ३४॥ मनाच्या संकल्पा आलें जें जाण। त्यासी शाब्दिक म्हणती भिन्न। माझ्या स्वरूपाचा विवर्त तें मन। हे अभिन्न खूण कळेना॥ ३५॥ मन लक्षितां सावधान। सर्वथा लक्षेना तें जाण। परब्रह्मही अलक्ष्य पूर्ण। दोनी समान चिद्रूपें॥ ३६॥ शिंपीच्या अंगीं रुपें आभासे। तेंचि तेथें साचें नसे। माझ्या स्वरूपीं मन तैसें। मिथ्या भासे कल्पनामात्र॥ ३७॥ विचारितां शब्दमहिमान। शब्द स्वरूपें ज्ञानघन। ज्ञानार्थेंवीण वचन। अल्पही जाण असेना॥ ३८॥ वक्ता वाच्य वचन। तीनी मीचि आहें जाण। बोलु बोलका मजवीण। दुसरा जगीं कोण असे॥ ३९॥ मी वेदू जाण पां वेदांचा। प्रणवरूप मीचि साचा। मुख्य वाचेची मीचि वाचा। वेगळा शब्दाचा ठावो नाहीं॥ ३४०॥ दृष्टीचें जें देखणेंपण। देखणें तेंचि मुख्य ज्ञान। तेंचि जाण ब्रह्म पूर्ण। चैतन्यघन निजदृष्टीं॥ ४१॥ मीचि डोळा मीचि देखता। दृश्य द्रष्टा मीचि तत्त्वतां। मजवेगळी देखणी अवस्था। नाहीं सर्वथा तिहीं लोकीं॥ ४२॥ मीचि डोळियांचा निजडोळा। मी सर्वांगदेखणा सोज्ज्वळा। मजवेगळी देखणी कळा। नाहीं जिव्हाळा आणिकांचा॥ ४३॥ मीचि शब्दांतें शब्दविता। मीचि श्रवणांमाजीं श्रोता। ऐशिया एकात्मता पाहतां। शब्द नि:शब्दता परब्रह्म॥ ४४॥ कान वचन मीचि श्रोता। मीचि जाणता शब्दार्था। ऐकणाराही मजपरता। नाहीं तत्त्वतां श्रवणाचा॥ ४५॥ मीचि घ्राण मीचि वास। मीचि जाणता सुवास। मजवेगळा रहिवास। परिमळास असेना॥ ४६॥ रसना रसज्ञत्वें चोखडी। परी ते केवळ चामडी। कापून सोडिल्या बापुडी। गोडी अगोडी ते नेणे॥ ४७॥ मीचि रसू मीचि रसना। स्वादु सेविता मीचि जाणा। मजवेगळा चवी चाखणा। रसज्ञपणा आन नाहीं॥ ४८॥ इतर इंद्रियप्रवृत्ती। त्याही मद्रूप जाण निश्चितीं। मी सर्वात्मा आत्ममूर्ती। क्रियाशक्ती तेही मीचि॥ ४९॥ पांचभौतिक देहाचा गोळा। भ्रांत म्हणती मजवेगळा। चुकोनि व्यापका सकळा। तो कोठें निराळा राहोंलाहे॥ ३५०॥ जैसे जळींचे जळतरंग। जळरूपें जळीं क्रीडती चांग। तैसे माझ्या स्वरूपीं सांग। देह अनेग मद्रूपे॥ ५१॥ हो कां घृताची पुतळी। थिजोनि जाली एके काळीं। परी ते नव्हे घृतपणावेगळी। तेवीं भूतें झालीं मजमाजीं॥ ५२॥ जळीं जळाची जळगार। जळामाजीं भासली साकार। तैसें मजमाजीं चराचर। अभिन्न साचार मद्रूपीं॥ ५३॥ जैसा एकला एक तंतू। सुतेंचि विणिला सुताआंतू। त्यां वेगळाले म्हणती तांतू। तैसें मजआंतू जग भासे॥ ५४॥ तंतू पाहतां वस्त्र न दिसे। आत्मा लक्षितां जगचि नसे। येणें अद्वैततत्त्वसौरसें। आहे अनायासें परब्रह्म॥ ५५॥ ऐसा अद्वैतबोधें मी एकू। सर्वात्मा सर्वात्मकू। हा निश्चयेंसीं विवेकू। बुद्धिबोधें निष्टंकू जाणावा॥ ५६॥ मीचि एक सर्वां ठायीं। हेंचि दृढ धरिल्या पाहीं। मग साधनाचें कार्य नाहीं। ठायींच पाहीं नित्यमुक्त॥ ५७॥ सर्वात्मा चैतन्यघन। अतिसुलभ हें निजज्ञान। उद्धवा म्यां हें सांगोन जाण। भेदखंडण केलें त्यांचें॥ ५८॥ सनकादिकांचा पूर्वील प्रश्न। जो ब्रह्मादिकां अटक जाण। त्याचेंही म्यां प्रतिवचन। विवंचूनिज्ञान सांगितलें॥ ५९॥
गुणेष्वाविशते चेतो गुणाश्चेतसि च प्रजा:।
जीवस्य देह उभयं गुणाश्चेतो मदात्मन:॥ २५॥
तुम्हीं ब्रह्मयासी पुसिलें पाहीं। विषय रिघाले चित्ताच्या ठायीं। चित्त जें रिघालें विषयीं। तें वेगळें कांहीं निवडेना॥ ३६०॥ विषयत्यागेंविण। कदा नव्हे ब्रह्मज्ञान। त्याही त्यागाची त्यागिती खूण। ऐक संपूर्ण सांगेन॥ ६१॥ चित्त विषय दोनी पाहें। तें जीवाचें निजस्वरूप नव्हे। हे उपाधिवशें दोनी देहें। लागलीं पाहें प्रवाहरूपें॥ ६२॥ कर्तृत्वभोक्तृत्वरूपें जाण। विषयी जाहलें अंत:करण। तेणें उभय देहांचें कारण। अंहकारू जाण खवळला॥ ६३॥ तेणें भुलविलें चित्त विषयांसी। विसरला निजात्मस्वरूपासी। तेणें तदात्मता जीवामनांसी। अतिशयेंसीं दृढ झाली॥ ६४॥ चित्त जीवाचें स्वरूप होतें। तरी विषयीं लोलुप नव्हतें। हा उभय उपाधी जीवातें। अभिमानें येथें वाढविला॥ ६५॥ जेवीं कां विसरोनि आपणासी। स्वप्नींचिया स्वप्नदेहासी। अतिप्रीति वाढे पुरुषासी। तैसी दशाजीवासी येथ झाली॥ ६६॥ नित्य शुद्ध मुक्त जाण। जीवाचें स्वरूप चैतन्यघन। त्यासी अभिमानें हें जाण। मिथ्या बंधन लाविलें॥ ६७॥ यालागीं सांडावा अभिमान। तैं तुटे सकळ बंधन। अभिमान निरसावया जाण। माझें भजन करावें॥ ६८॥ परी वैराग्येंवीण माझी भक्ती। पोंचट जाण पां निश्चितीं। जैं वैराग्ययुक्त उपजे भक्ती। तैं मद्रूपप्राप्ती जीवासी॥ ६९॥ हृदयीं विषयांचा अभावो। आणि सर्वांभूतीं भगवद्भावो। हे वैराग्ययुक्त भक्ति पहा हो। तैं जीवासी निर्वाहो मद्रूपीं॥ ३७०॥ जीव मद्रूपचि तत्त्वतां। त्यासी देहाभिमान जीविता। सदा भूतीं मद्भावो पाहतां। सिद्ध मद्रूपता उद्बोधे॥ ७१॥ जीवासी जाहल्या मद्रूपता। सहजें त्यागू विषयचित्ता। देखें उभयांसी मिथ्यात्वता। न त्यागितां हा त्यागू॥ ७२॥ चित्तविषयांचा त्यागू। पुत्र हो तुम्हीं पुशिला चांगू। तो म्यां सांगितला अव्यंगू। हा ज्ञानमार्गू अतिशुद्ध॥ ७३॥ म्हणाल मिथ्या उभयांचें भान। तरी एवढें जीवासी बंधन। लागावया कांहीं कारण। ऐसें कांहीं मन कल्पील जरी॥ ७४॥ गगनसुमनांची माळा। कधीं कोणी लेईली गळां। तारूं बुडे मृगजळां। हें कोणी तरी डोळां देखतें काय॥ ७५॥ सत्यासी बाधक। कदाबाधूं न शके लटिक। ऐसें कल्पाल तुम्हीं कल्पक। तोही परिपाक अवधारा॥ ७६॥ तरी परिसा सावधान। तें मी सांगेन निरूपण। जेणें जीवासी बंधन। लटिकेंचि जाण दृढ झालें॥ ७७॥
गुणेषु चाविशच्चित्तमभीक्ष्णं गुणसेवया।
गुणाश्च चित्तप्रभवा मद्रूप उभयं त्यजेत्॥ २६॥
अनादिसंसारमाळेच्या ठायीं। नित्य विषय भोगिले पाहीं। ते ठसावले चित्ताच्या ठायीं। वारंवार देहीं सेवितां॥ ७८॥ चित्तासी विषयांची अतिप्रीती। तेणें वाढली विषयासक्ती। ते प्रवेशलें विषयांप्रती। न निघे मागुती सर्वथा॥ ७९॥ बुद्धीसी विषयांचें ध्यान। चित्तीं विषयांचें चिंतन। विषयांलागींतळमळी मन। विषयाभिमान तेणें झाला॥ ३८०॥ विषयीं खवळल्या अभिमान। देहद्वयाचें दृढबंधन। जीवासि लागलें अतिकठिण। परम दारुण दुस्तर॥ ८१॥ मग त्या देहाचे विकार। ते आपुले मानी साचार। अंध पंगू मी कुष्ठी नर। स्वरूपें सुंदर मी ज्ञाता॥ ८२॥ मी देह हें मानोनि चित्तें। निजरूप विसरला भावार्थें। हें मिथ्याबंधन जीवातें। सत्यत्वें त्यातें अभिमानू॥ ८३॥ मिथ्या बुद्धिबळाचा खेळ। हारी जैती ही निष्फळ। तरी खेळत्या अभिमान प्रबळ। तैसें देहबळ जीवासी॥ ८४॥ त्या खेळाचे घोडे हस्ती। पहिले काय जीत होती। मा मारिले म्हणोनि भांडती। तेवीं जन्मपंक्ती जीवासी॥ ८५॥ हें निरसावया जीवबंधन। नि:शेष सांडावा देहाभिमान। अभिमान सांडितांचि जाण। मद्रूपपणसहजेंचि॥ ८६॥ जीवें साधिल्या मद्रूपता। सहजेंचि त्याग विषयचित्ता। माझे स्वरूपीं अहंता। नाहीं वार्ता विषयांची॥ ८७॥ जेव्हां बुद्धिबळांचा खेळ मोडे। तेव्हां राजाप्रधानादि लांकुडें। तेवीं अहंकारू निमाल्या पुढें। प्रपंच उडे मिथ्यात्वें॥ ८८॥ जेवीं स्वप्नींचा स्वप्नाभिमान। दारा पुत्र स्वजन धन। स्वदेहेंसीं मिथ्या जाण। जागेपण झालिया॥ ८९॥ तेवीं पावलिया माझी सरूपता। कैंचा देह कैंची अहंता। विषयचित्तांची वार्ता। नाहीं अवस्था गुणत्रया॥ ३९०॥ तिहीं अवस्थीं अवस्थाभूत। जागृतिस्वप्नसुषुप्तिमंत। तो होऊनि जीव निरवस्थ। परमात्म्यांत मिळे कैसा॥ ९१॥ ऐसा कांहीं कल्पाल भावो। त्या जीवासी अवस्थांचा अभावो। त्रिगुण गुणांचा स्वभावो। या वृत्ति पहा हो बुद्धिच्या॥ ९२॥
जाग्रत्स्वप्न: सुषुप्तं च गुणतो बुद्धिवृत्तय:।
तासां विलक्षणो जीव: साक्षित्वेन विनिश्चित:॥ २७॥
तिन्ही गुणांच्या तिन्ही वृत्ती। सत्त्वगुणाची जागृती। रजोगुणें स्वप्नप्राप्ती। केवळ सुषुप्ती तमाची॥ ९३॥ या तिनी अवस्था पाहीं। दृढ जडल्या बुद्धीच्या ठायीं। जीवासी यांचा संबंध नाहीं। तो वेगळा पाहीं साक्षित्वें॥ ९४॥ जैं जीवाअंगीं अवस्था जडे। तैं तो अवस्थेमाजीं बुडे। तिहींचें साक्षित्व त्यासी न घडे। ऐक निवाडें अवस्था॥ ९५॥ जागृतीमाजीं नाहीं स्वप्न। स्वप्न जागृतीसी नेणे जाण। सुषुप्ती नेणे जागृतिस्वप्न। सुषुप्तीचें भान त्या नेणती॥ ९६॥ जीवूं अवस्थांचा अभिमानी। हेंही न घडे जीवालागुनी। विश्व तैजस प्राज्ञ तिन्ही। अवस्थाभिमानी हे तिहींचे॥ ९७॥ जो जे अवस्थेचा अभिमानी। तो ते अवस्थेसवें जाय निमोनी। जीव वेगळा साक्षिपणीं। अवस्थाभिमानी तो नव्हे॥ ९८॥ देहातीत गुणातीत। तिहीं अवस्थां अतीत। द्रष्टा साक्षी निश्चित। जाणता येथ तो जीवू॥ ९९॥ अवस्थाभिमान नाहीं जीविता। तरी कवण भोगी तिनी अवस्था। मी निजलों मीचि जागता। म्यां स्वप्नावस्था देखिली॥ ४००॥ ऐसा प्रत्यक्ष अनुभवू। स्वयें बोलताहे जीवू। हा म्हणाल जीवाचा स्वभावू। ऐक अभिप्रावू सांगेन॥ १॥
यर्हि संसृतिबन्धोऽयमात्मनो गुणवृत्तिद:।
मयि तुर्ये स्थितो जह्यात्त्यागस्तद्गुणचेतसाम्॥ २८॥
जो डोल्हारां बैसे यथासुखें। तो न हालतां हाले तेणें हरिखें। उंच नीच खाय झोंके। निजकौतुकें हिंदोळे॥ २॥ हिंदोळतांही प्रबळ। डोल्हाराचि अतिचंचळ। बैसला तो निजनिश्चळ। मानी केवळ मी हालतों॥ ३॥ जीवासी झाली तैशी वानी। अहंममतेच्या अभिमानीं। तिनी अवस्था स्वयें मानी। जेवीं कां स्वप्नीं गृहदारा॥ ४॥ हो कां लोखंडकाम घडतां। लोहाचे घाय अग्नीचे माथां। प्रत्यक्ष दिसती वाजतां। लोहतदात्मतासंयोगें॥ ५॥ तेणें अग्निसंगें वाडेंकोडें। लोहकामचि घडे मोडे। परी अग्नीसी घडमोड न घडे। तेणें पडिपाडें जीवू येथें॥ ६॥ जेवीं अग्निवीण लोह न घडे। तेवीं आत्मसंयोगेंवीण पुढें। बुद्धि केवळ जड वेडें। कर्मक्रिया नातुडे सर्वथा॥ ७॥ लोह घडवूनिअग्नि न घडता। कर्म करवूनि जीव अकर्ता। तरी वृत्तिसंगें तदात्मता। अहंकर्ता हें मानी॥ ८॥ जीव आपुले प्रकाशता। झाला वृत्तीतें प्रकाश करिता। वृत्ति जीवासी नानावस्था। निजस्वभावता देतसे॥ ९॥ सूर्यें प्रकाशिलें जळ। जळें केलें प्रतिमंडळ। खळाळ चंचळ निश्चळ। कांपे चळचळ जळकंपें॥ ४१०॥ सूर्याची गगनीं नित्य वस्ती। तो जळें आणिला अधोगती। तेवीं वृत्तीचि या निजख्याती। मुक्तांतें दाविती बद्ध करूनी॥ ११॥ आत्म्यानें प्रकाशिली वृत्ती। वृत्तीनें आत्म्यासी जीवप्राप्ती। जीवा जीवत्वें देहासक्ती। सुखदु:खप्राप्ती तेणें भोगी॥ १२॥ एवं वृत्तीचिया संगती। वाढली विषयांची आसक्ती। तेणें संसारबंधप्राप्ती। झाली निश्चितीं जीवासी॥ १३॥ हो कां गुणचित्त-विषयासक्ती। जरी झाली जीवासी बंधप्राप्ती। तरी आवरावी विषयवृत्ती। वैराग्ययुक्तीं गुरुकृपा॥ १४॥ ऐक गुरुकृपेची मातू। तिहीं अवस्थांमाजीं सततू। जो मी तुरीय गुणातीतू। ते अभ्यासीं लावितू निजबोधें॥ १५॥ नवल अभ्यासाची गोठी। विषयवृत्तीच्या पाठींपोटीं। मज तुरीयातें दावी दिठी। बोधपरिपाटी निजबोधें॥ १६॥ मी तुरीय तंव संततु। सर्वीं असें सर्वगतु। शिष्यवृत्तीसी मजआंतु। गुरु निजस्वार्थु दाखवी॥ १७॥ सुतावेगळें लुगडें। करूं जातां गा उघडें। तेथ क्रियाचि लाजोनि बुडे। मागें पुढें सूतचि॥ १८॥ तेवीं साधकासी जाण। विषयांचें विषयभान। माझे स्वरूपीं नव्हेचि भिन्न। चैतन्यघन मीचि मी॥ १९॥ तेथ नामरूपवर्णभेद। नाहीं कर्म कर्ता विधिवाद। बुडाले प्रणवेंसीं वेद। केवळ शुद्ध मी एक॥ ४२०॥ तेथें भ्रमेंसहित पळाली भ्रांती। क्रियेसहित गळाली प्रवृत्ती। लाजा विराली निवृत्ती। स्वस्वरूपीं वृत्ती विनटली॥ २१॥ सूर्योदयो जाहल्यापाठीं। समूळ अंधारातें घोंटी। खद्योताची नळी निमटी। नक्षत्रकोटी तत्काळ गिळी॥ २२॥ तेवीं माझी स्वरूपप्राप्ती। मायेची मावळे स्फूर्ती। लाजा विसरे प्रवृत्तिनिवृत्ती। नित्यतृप्ती स्वानंदें॥ २३॥ ऐशी माझ्या स्वरूपाची गोडी। जैं साधकां लागे धडफुडी। तैं चित्त विषयातें सांडी। विषयो वोसंडी चित्तातें॥ २४॥ जीं देंठीं वाढलीं फळें। तींचि परिपाकाचे वेळे। होती देंठावेगळें। देंठू तो फळें धरीना॥ २५॥ कां मंथूनि काढिलें नवनीत। तें परतोनि घातल्या ताकाआंत। तें ताकेंसी होयअलिप्त। तैसें चित्त विषयांसी॥ २६॥ पावल्या माझी स्वरूपता। दैव बळें विषयो देतां। चित्तासी नुपजे विषयावस्था। स्वभावतां अलिप्त॥ २७॥ एवं साधिल्या माझा योगू। चित्तविषयांचा वियोगू। सहजेंचि होय चांगू। हा सुगम सांगू उपावो॥ २८॥ येथें झणें आशंका धराल देख। स्वरूप शुद्ध अवघें एक। तेथें कैंचें बाध्यबाधक। काय साधक साधिती॥ २९॥ ऐशाही संधीमाजीं जाण। अहंता बंधाचें कारण। त्याचें सांगेन मी लक्षण। सावधान परियेसीं॥ ४३०॥
अहङ्कारकृतं बन्धमात्मनोऽर्थविपर्ययम्।
विद्वान्निर्विद्य संसारचिन्तां तुर्ये स्थितस्त्यजेत्॥ २९॥
जेथ मुहूर्तमात्र वसती घडे। त्या ठायाचा अभिमान चढे। ऐसें अभिमानाचें सांकडें। पाहें पां रोकडें कौतुक त्याचें॥ ३१॥ बुद्धि अहंकार अळुमाळ। उठतां शुद्धासी करी शबळ। तेणें देहयोगें धरिल्या बळ। करी तत्काळ विपरीत॥ ३२॥ अहंकार खवळल्या जाण। करी आनंदाचें आच्छादन। बुडे परमात्मस्फूर्तीचें स्फुरण। देहाचें मीपण वाढवी॥ ३३॥ जेवीं कूर्मीच्या पिलियां। चक्षुरमृतें तृप्ती तयां। तेंचि मातेसि चुकलिया। मग भुकेलिया कर्दमू सेवी॥ ३४॥ तेवीं खुंटलिया आनंदअभिव्यक्ती। जीवासी वाढे विषयासक्ती। कामिनीकामा पंगिस्त होती। चिंता चित्तीं विषयांची॥ ३५॥ विसरला आपुलें पूर्णपण। धनालागीं अतिहीन दीन। मी देहवंत परिच्छिन्न। ऐसा देहाभिमान दृढ होय॥ ३६॥ तेणें कर्माकर्मांचे आघात। नाना नरकयातना होत। जन्ममरणादि आवर्त। तेणें दु:खी होत अतिदु:खें॥ ३७॥ भोगितां दु:खयातना। त्रासु उपजे ज्याच्या मना। न साहवे भव वेदना। तेणें देहाभिमाना सांडावें॥ ३८॥ अभिमान सांडितां न संडे। हेंचि दुर्घटथोर मांडे। यालागीं साधनाचें सांकडें। सोसणें पडे साधकां॥ ३९॥ जें जें करावें साधन। साधनीं रिघे साधनाभिमान। धांवणें नागवी संपूर्ण। साधनीं विघ्न होय तैसें॥ ४४०॥ ऐकसाधकांचें साधन। वेदोक्त स्वधर्माचरण। साधावें वैराग्य पूर्ण। माझें भजन अतिप्रीतीं॥ ४१॥ तत्काळ जावया देहाभिमान। अखंड माझें नामस्मरण। गीत नृत्य हरिकीर्तन। सर्वांभूतीं समान मद्भावो॥ ४२॥ मद्भावें भूतें समस्त। सर्वदा पाहतां सतत। मी तुरीय जो सर्वगत। ते ठायीं चित्त प्रवेशे॥ ४३॥ तिहीं अवस्थांमाजीं मी सतत। तिहीं अवस्थांतें मी प्रकाशित। तिहीं अवस्थांहूनि अतीत। तो जाण निश्चित मी तुरीयू॥ ४४॥ तिहीं गुणांहूनि परता। चौथेपणेंवीण चौथा। तो मी तुरीय जाण तत्त्वतां। ते ठायीं चित्ता जो ठेवी॥ ४५॥ तेथें ठेवितां चित्ता। जीवू पावे मद्रूपता। निमाली सांसारिक चिंता। विषयावस्था बुडाली॥ ४६॥ तेव्हां चित्त चिंता चिंतन। विषयवासना अभिमान। या अवघियांचें होय शून्य। मी स्वानंदघन स्वयें प्रकटें॥ ४७॥ न तुटतां भेदाचेंभेदभान। जो म्हणवी मी सज्ञान। वृथा धरी ज्ञानाभिमान। तोही अज्ञान तें ऐका॥ ४८॥
यावन्नानार्थधी: पुंसो न निवर्तेत युक्तिभि:।
जागर्त्यपि स्वपन्नज्ञ: स्वप्ने जागरणं यथा॥ ३०॥
नाना वर्ण नाना व्यक्ती। नाना गोत्रें नाना जाती। अधमोत्तमविधानस्थिती। भेदु चित्तीं दृढ भासे॥ ४९॥ मी काळा गोरा सांवळा। मी सज्ञानत्वें आगळा। माझी उत्तम पवित्र लीळा। मी कुळें आगळा सत्कुलीन॥ ४५०॥ ऐशी झाल्या भेदप्राप्ती। पाहतां अभेदपरा श्रुती। साधकां शास्त्रार्थयुक्तीं। भेदनिवृत्ती ज्यां नव्हेचि॥ ५१॥ त्याचा व्यर्थ ज्ञानाभिमान। त्याचें व्यर्थ कर्माचरण। तो जागाचि निजेला जाण। जागेपण त्या नाहीं॥ ५२॥ दृढ जो कां देहाभिमान। तेंचि कनकबीजसेवन। करूनि थोर भ्रमला जाण। अविद्या दीर्घ स्वप्नभेदु देखे॥ ५३॥ वोसणतां बोली न लभे अर्थू। तेवीं पठणमात्रें परमार्थू। श्रुतिशास्त्रांचा निजशास्त्रार्थू। नव्हेचि प्राप्तु तयांसी॥ ५४॥ वेदाध्ययन नित्य करिती। अरण ब्राह्मण सूत्र निरुक्ती। नव्हेचि कामक्रोधनिवृत्ती। पठणें परमप्राप्ती कदा न घडे॥ ५५॥ देहाभिमानें भेददृष्टी। पढतां श्रुतिशास्त्रांच्या कोटी। परमार्थेंसीं नव्हे भेटी। भेददृष्टी न वचतां॥ ५६॥ जो कां स्वप्नींचे स्वप्नीं जागा जाहला। स्वप्नीं वेदशास्त्र पढिन्नला। जागा म्हणतां असे निजेला। तैसा व्यवहारू झाला शास्त्रज्ञांसी॥ ५७॥ देहाभिमानेंसीं भेदभान। नि:शेष जंव न वचे जाण। तंववरी नव्हे निजज्ञान। अत्यंत बंधन तो भेद॥ ५८॥ सनकादिकांची आशंका। घेऊनि देव बोले देखा। वेदविभाग नेटका। सकळ लोकां कळेे तैसा॥ ५९॥ स्वयें प्रकाशोनि सकळ भेदू। गर्जत उठी तुझा वेदू। भेद वेदेंचि प्रतिपाद्यू। वेदानुवादू नव्हे मिथ्या॥ ४६०॥ वेदवचन तें तात्त्विक। मानावें पैं आवश्यक। हे तुझीच शिकवण देख। तो वेदु लटिक म्हणावा कैसा॥ ६१॥ वेदाज्ञेचा परम नेम। वेदें प्रतिपाद्य क्रियाकर्म। वेदबळें वर्णाश्रम। निज स्वधर्म चालविती॥ ६२॥ वेद म्हणे जो लटिक। तो वेदबाह्य आवश्यक। हें तूंचि बोलिलासी देख। तो वेद लटिक केवीं मानूं॥ ६३॥ ऐशीमानाल आशंका। तोही विषयीं मीचि देखा। वेदवादाच्या विवेका। विभाग नेटका सांगेन॥ ६४॥ अविद्याभेद सबळ ज्यासी। भेदू नियामक म्यां केला त्यासी। मद्रूपीं अभेदता ज्या भक्तासी। मिणधा त्यापाशीं वेदवादु॥ ६५॥ वेद तितुकाही त्रिगुण। अभेदजनें भक्त निर्गुण। त्यासी वेदाचें नियामकपण। न चले जाण ममाज्ञा॥ ६६॥ रायाचा जिवलग सेवकू। त्यासी द्वारपाळ नव्हे नियामकू। कां दासीस लागल्या राजांकू। तीस मानी लोकू प्रधानादि॥ ६७॥ निजकन्येसी शिकवी माता। लाज धरावी लोकांदेखतां। एकांतीं मीनल्या कांता। लाज सर्वथा सोडावी॥ ६८॥ सबळ भेदांचें भेदमान। तंव दुर्लंघ्य वेदवचन। अभेद भक्त माझे जाण। वेदविधान त्यां न बाधी॥ ६९॥ आशा तेचि अविद्याबाधू। छेदिल्या बाधीना वेदवादू। जेवीं सूर्योदयापुढें चांदू। होय मंदू निजतेजें॥ ४७०॥
असत्त्वादात्मनोऽन्येषां भावानां तत्कृता भिदा।
गतयो हेतवश्चास्य मृषा स्वप्नदृशो यथा॥ ३१॥
गुरुकृपा जो सज्ञान। त्यासी देहाचें अबाधित भान। मिथ्या प्रपंचाचें दर्शन। कर्में कर्तेपण त्या नाहीं॥ ७१॥ अविद्या द्योतिले वर्णाश्रम। तेथींचें आविद्यक क्रियाकर्म। तेथील जो वेदोक्त धर्म। तो अविद्याभ्रम अज्ञाना॥ ७२॥ सज्ञान भक्तांच्या ठायीं। ते अविद्या नि:शेष नाहीं। मा वेदविधान तेथें पाहीं। रिघावया कायी कारण॥ ७३॥ आंबा सफळित जव असे। तंव नेटेंपाटें राखण बैसे। फळ हाता आल्या आपैसें। राखण वायसें राहेना॥ ७४॥ तेवीं अविद्येचें जंव बंधन। तंव वेदाचें वेदविधान। अविद्या नाशिलिया जाण। विधीनें तें स्थान सोडिलें॥ ७५॥ अविद्या जाऊनि वर्ततां देहीं। देहाचा देहत्वें हेतु नाहीं। हें म्हणाल न घडेच कांहीं। ऐक तेंही सांगेन॥ ७६॥ स्वप्नींचें देहादि प्रपंचभान। स्वप्नाचमाजीं सत्य जाण। जागें होतां तें अकारण। संस्कारें स्वप्न दिसतांही॥ ७७॥ स्वप्नीं राज्यपद पावला। कां व्याघ्रमुखीं सांपडला। अथवा धनादिलाभ झाला। रत्नें पावला अनर्घ्यें॥ ७८॥ तेथींचें सुख दु:ख हरिख। जागत्यासी नाहीं देख। तेवीं सज्ञानासी आविद्यक। नोहे बाधक निजबोधें॥ ७९॥ देहीं असोनि विदेहस्थिती। ऐशा बोधसाधिका ज्या युक्ती। स्वयें सांगेन म्हणे श्रीपती। भेदाची उत्पत्ती छेदावया॥ ४८०॥
यो जागरे बहिरनुक्षणधर्मिणोऽर्थान्
भुङ्क्ते समस्तकरणैर्हृदि तत्सदृक्षान्।
स्वप्ने सुषुप्त उपसंहरते स एक:
स्मृत्यन्वयात् त्रिगुणवृत्तिदृगिन्द्रियेश:॥ ३२॥
तिहीं अवस्थांच्या ठायीं। आत्मा एकचि असे देहीं। तोचि देहाच्या ठायीं विदेही। साक्षी पाहीं सर्वांचा॥ ८१॥ मी बाळ तोचि झालों तरणा। आतां आलों म्हातारपणा। ऐशा वयसांचे साक्षीपणा। आपण आपणा देखतू॥ ८२॥ जागृतीसी नाना भोग। सविस्तर भोगी अनेक। तेचि स्वप्नामाजींसांग। निजहृदयीं चांग विस्तारी॥ ८३॥ जागृतिभोगाचा संस्कारू। तोचि स्वप्नामाजीं विस्तारू। मनोमय विश्वाकारू। निजहृदयीं वेव्हारू वाढवी॥ ८४॥ गज तुरंग खर नर। गिरि दुर्ग पुर नगर। विशाळ सरिता समुद्र। वासनेचें वैचित्र्य स्वप्नीं देखे॥ ८५॥ नाहीं जागृती नाहीं स्वप्न। अंत:करणही करोनि लीन। सुषुप्तिकाळीं तोचि जाण। अहंकारेंवीण उरलासे॥ ८६॥ विश्वाभिमानी इंद्रियवृत्ती। तेणें तो देखतसे जागृतीं। तैजस अभिमानी अविद्यावृत्ती। स्वप्नस्थिती तो देखे॥ ८७॥ प्राज्ञ अभिमानी मूढवृत्ती। तो देखतसे सुषुप्ती। एक आत्मा तिहींप्रती। न घडे निश्चितीं म्हणाल॥ ८८॥ तिहीं अवस्थांचे अभिमानी। म्हणाल देखणे भिन्न तिनी। तरी एक आत्मा द्रष्टेपणीं। उरला निदानीं तें ऐका॥ ८९॥ पहिला जो कां मी जागता। तेणें म्यां देखिली स्वप्नावस्था। तोचि मी सुखें निजेला होता। या तिनी अवस्था स्वयें मी जाणें॥ ४९०॥ जेणें जे देखिली नाहीं। तो ते अवस्था सांगेल कायी। यालागीं तिहीं अवस्थांचे ठायीं। आत्मा पाहीं अनुस्यूत॥ ९१। जागृतीं इंद्रियां देखणेपण। स्वप्नीं देखणें तें तंव मन। सुषुप्ति गाढ मूढ अज्ञान। कैंचें देखणेपण आत्म्यासी॥ ९२॥ येही आशंकेचें वचन। ऐका द्विज हो सावधान। मन इंद्रियें जडें जाण। देखणेपण त्यां कैंचें॥ ९३॥ जो मनाचा चाळकू। जो इंद्रियांचा प्रकाशकू। जो सुषुप्तीचा द्योतकू। साक्षित्वें एकू तो आत्मा॥ ९४॥ म्हणाल सुषुप्तीं आत्मा नाहीं। बोलणें न घडे कांहीं। मी सुखें निजेलों होतों पाहीं। हें कोणाचे ठायीं जाणवे॥ ९५॥ प्रकृतिकार्याहूनि परता। देहादि अवस्थांतें प्रकाशिता। गुणइंद्रियांचा नियंता। जाण तत्त्वतां तो आत्मा॥ ९६॥ इंद्रियें आत्मा नव्हती हा नेम। त्यांचें सदा एकदेशी कर्म। आत्मा सर्वकर्ता सर्वोत्तम। करोनि निष्कर्म सर्वदा॥ ९७॥ मन आत्मा नव्हे तें ऐक वर्म। संकल्पविकल्प त्याचें कर्म। आत्मा निर्विकल्प निरुपम। विश्रामधाम जगाचें॥ ९८॥ जो सुषुप्तिसुखभोगसाक्षी। जो देखणेपणें तिहींलोकीं। तो मी आत्मा गा एकाकी। जाण निष्टंकीं निश्चित॥ ९९॥ एवं युक्तीचिया विभागलीला। परमात्मा जो एकू साधिला। तो साधकांसी उपयोगा आला। योग सिद्धी नेला तेणें बळें॥ ५००॥;
एवं विमृश्य गुणतो मनसस्त्र्यवस्था
मन्मायया मयि कृता इति निश्चितार्था:।
संछिद्य हार्दमनुमानसदुक्तितीक्ष्ण-
ज्ञानासिना भजत माखिलसंशयाधिम्॥ ३३॥
म्यां सांगीतल्या ज्या युक्ती। ज्या कां श्रुतिशास्त्रार्थसंमती। त्या विचारोनि परमार्थगतीं। संसारगुंती उगवावी॥ १॥ संसारगुंतीसी कारण गुण। गुणावस्थीं व्यापिलें मन। त्यासी माझी माया मूळ जाण। जिया केलें आवरण माझेंचि॥ २॥ माझी माया माझेनि सबळ। त्या मजचि आवरिलें तत्काळ। जैसें डोळ्ॺाचें डोळां जळ। गोठूनि पडळ होऊनि ठाके॥ ३॥ कां पूर्णचंद्र अतिनिर्मळ। तेथ पृथ्वी बिंबली सकळ। तेणें सलांछन चंद्रमंडळ। लोक सकळ देखती॥ ४॥ पृथ्वीचंद्रासी अंतर। विचारितां दूरांतर। मिथ्या बाधिला रजनीकर। ते लोक साचार मानिती॥ ५॥ यापरी माया माझ्या ठायीं। आतळली नाहीं कंहीं। मिथ्याभासें लोक पाहीं। तिच्याठायीं भूलले॥ ६॥ तेणें नाथिली गुणावस्था। अहंकर्तृत्वें घेतली माथां। तेणें विषयभोगअवस्था। वासनायुक्ता वाढविल्या॥ ७॥ एवं उभय देहबंधन। मिथ्या जीवत्वें लागलें जाण। त्याचें करावया छेदन। माझ्या युक्ती जाण विवराव्या॥ ८॥ करितां युक्तींचें अनुमान। तेणें अनुमानिक होय ज्ञान। न तुटे अविद्याबंधन। यालागीं साधुसज्जन सेवावे॥ ९॥ साधूंमाजीं साधुत्व पूर्ण। सेवावे सद्गुरुचरण। तेणें निरसे भवबंधन। साधुसज्जन सद्गुरु॥ ५१०॥ त्या साधूंचिया सदुक्ती। श्रुत्यर्थें उपदेश करिती। तेणें होय ज्ञानखड्ग प्राप्ती। जे बुद्धीच्या हातीं हातवशी॥ ११॥ तेंही वैराग्यनैराश्यसाहाणे। लावूनि सतेजशस्त्र करणें। धृतीच्या धारणा दृढ धरणें। सावधपणें नि:शंक॥ १२॥ शस्त्रासी आणि आपणा। एकपणाची धारणा। दृढ साधूनि साधना। देहाभिमाना छेदावें॥ १३॥ जो सकळ संशयाचा कंदू। जेणें देहदु:खाचा उद्बोधू। ज्याचेनि सदा विषयसंदू। जो कामक्रोधपोषकू॥ १४॥ जो वाढवी तिनी गुण। जो शुद्धासी आणी जीवपण। ज्याचेनि जीव जन्ममरण। दुर्निवार जाण लागलें॥ १५॥ जो सकळ अनर्थांचा दाता। ज्याची लडिवाळ कन्या ममता। तियेसी वाढवी माया माता। तिच्या सत्ता हा दाटुगा॥ १६॥ तेथें शस्त्राचेनि लखलखाटें। राहोनियां नेटेंपाटें। समरांगणीं सुभटें। घावो येणें नेटें हाणावा॥ १७॥ एकेचि घायें जाण। माया ममता अभिमान। त्रिपुटीचें होय छेदन। येणें बळें जाण छेदावा॥ १८॥ भोग्य भोगू भोक्ता। कर्म कार्य कर्ता। ध्येय ध्यान ध्याता। त्रिपुटी तत्त्वतां छेदावी॥ १९॥ अहं कोहं सोहं स्वभावो। हाही छेदूनि अहंभावो। साधकां निजपदीं ठावो। ब्रह्म स्वयमेवो होऊनि ठेले॥ ५२०॥ म्हणाल सांगतां जो प्रकारू। तो शब्दज्ञानवेव्हारू। बोलाचा कडकडाट थोरू। कैसेनि अहंकारू मारवे॥ २१॥ शब्दमात्रें अभिमान। जरी पावता निर्दळण। तरी कां पां विद्वज्जन। अभिमानमग्न होताती॥ २२॥ अभिमान संमुख दिसता। तरी धांवोनि करूं ये घाता। तो अतर्क्य जी सर्वथा। शब्दें अहंता मरेना॥ २३॥ घडे अपरोक्षसाक्षात्कारू। तो शब्दमात्रें नव्हे प्रकारू। ऐसा आशंकेचा विचारू। ऐक निर्धारू सांगेन॥ २४॥ जो अनन्यभावें माझें भजन। सर्वदा करी सावधान। कां सद्गुरूचे श्रीचरण। मद्भावें जाण जो सेवी॥ २५॥ मज आणि सद्गुरुमूर्ती। भेद नाहीं गा कल्पांतीं। येणें अभेदभावें जे भजती। ते ज्ञान पावती सहजचि॥ २६॥ त्यांसी स्वभावें भजनस्थिती। ज्ञानखड्गाची होय प्राप्ती। सहजेंचि सांपडे हातीं। ज्या शस्त्रदीप्तिकाळू कांपे॥ २७॥ ज्या शस्त्राच्या धाकाभेण। माया ममता अभिमान। सांडूनियां जीवपण। समूळ जाण पळालीं॥ २८॥ हाणावया पुरता घावो। अहंममतेसी नाहीं ठावो। अविद्येचाही अभावो। आपभयें पहा हो आपणचि॥ २९॥ सद्भावें जें माझें भजन। करितां एवढें होय ज्ञान। येथ आशंका करील मन। कोठें भजन करावें॥ ५३०॥ तुझें स्वरूप अतर्क्य जाण। अतिसूक्ष्म आणि निर्गुण। तुज भजावया कवण स्थान। आम्हांसी जाण कळेना॥ ३१॥ ऐसें कल्पील जरी मन। तरी ऐक सावधान। अतिसुगम भजनस्थान। मी सांगेन तें ऐक॥ ३२॥ नुल्लंघितां पर्वतकोटी। न रिघतां गिरिकपाटीं। दूरी न करितां आटाटी। जे स्थानीं भेटी सदा माझी॥ ३३॥ भजनस्थान निरुपम। जेथ मी वसें पुरुषोत्तम। प्राप्तीलागीं अतिसुगम। विश्रामधाम भक्तांचें॥ ३४॥ सर्व सुखांचा आराम। निजहृदयीं आत्माराम। सर्वदा असे सम। भजावें सप्रेम ते ठायीं॥ ३५॥ आदि ब्रह्मा अंतीं मशक। सर्वांचे हृदयीं मीचि एक। ऐसें पाहे तो सभाग्य देख। हें भजन चोख मत्प्राप्ती॥ ३६॥ ज्या मज हृदयस्थाचे दीप्ति। मनबुद्धॺादिकें वर्तती। ज्या माझिये स्फुरणस्फूर्ती। ज्ञानव्युत्पत्ती पायां लागे॥ ३७॥ त्या मज हृदयस्थाच्या ठायीं। भजनशीळ कोणीच नाहीं। शिणतां बाह्य उपायीं। जन अपायीं पडताती॥ ३८॥ ऐशांत सदैव कोणी एक। निजभाग्यें अत्यंत चोख। मज हृदयस्थाचा विवेक। करूनि निष्टंक मद्भजनीं॥ ३९॥ करितां हृदयस्थाचें भजन। माझें पावे तो निजज्ञान। वैराग्ययुक्त संपूर्ण। जे ज्ञानीं पतन रिघेना॥ ५४०॥ ज्या ज्ञानाभेणें जाण। धाकेंचि पळे अभिमान। तें मी आपुलें त्यांसी दें ज्ञान। जे हृदयस्थाचें भजन करिती सदा॥ ४१॥ ज्या ज्ञानाचिये ज्ञानसिद्धी। अखिल जाती आधिव्याधी। संशय पळती त्रिशुद्धी। भक्त निजपदीं पावती॥ ४२॥ सबळ बळें सुभटें। शस्त्राचेनि लखलखाटें। संशयो छेदावा कडकडाटें। हें म्यां नेटेंपाटें सांगीतलें॥ ४३॥ यावरी ऐसें गमेल चित्तीं। संसाराची सत्यप्राप्ती। त्यासी शस्त्र घेऊनि हातीं। कोणे युक्तीं छेदावा॥ ४४॥ तरी संसार तितुकी भ्रांती। हेंचि सांगावया दृष्टांतीं। पुढील श्लोकाची श्लोकोक्ती। स्वयें श्रीपती सांगतू॥ ४५॥
ईक्षेत विभ्रममिदं मनसो विलासं
दृष्टं विनष्टमतिलोलमलातचक्रम्।
विज्ञानमेकमुरुधेव विभाति माया
स्वप्नस्त्रिधा गुणविसर्गकृतो विकल्प:॥ ३४॥
देहादिअहंकारपर्यंत। पिंड ब्रह्मांड जें भासत। तें मनोमात्र विलसत। मिथ्याभूत संसारु॥ ४६॥ जैसें स्वप्नीं निद्रेमाजीं मन। स्वयें देखे त्रिभुवन। तैसेंचि हें दीर्घस्वप्न। अविद्या जाण विकाशी॥ ४७॥ आन असूनि आन देखती। त्या नांव आभास म्हणती। शुक्तिके माजीं रजतभ्रांती। दोरातें म्हणती महासर्पू॥ ४८॥ सूर्याचे किरण निखळ। ते ठायीं देखती मृगजळ। तैशी शुद्ध वस्तू जे केवळ। तो संसार बरळ म्हणताती॥ ४९॥ तया आरोपासी अधिष्ठान। मीचि साचार असें आपण। जेवीं कां कोलिताचें कांकण। अग्नितेजें जाण आभासे॥ ५५०॥ अलातचक्रींचा निर्धार। अग्नि सत्य मिथ्या चक्र। तेवीं निर्धारितां संसार। ब्रह्म साचार संसार मिथ्या॥ ५१॥ तेथ आधिदैव आधिभौतिक। आध्यात्मादि सकळिक। अलातचक्राच्या ऐसे देख। त्रिगुणमायिक परिणाम॥ ५२॥ कोलिताचेनि भ्रमभासें। भ्रमणबळें तें चक्र दिसे। क्षणां दिसे क्षणां नासे। तैसा असे हा संसारू॥ ५३॥ जंव भ्रमणाचें दृढपण। तंव कोलिताचें कांकण। भ्रम गेलिया जाण। कांकणपण असेना॥ ५४॥ तेवीं जंव जंव भ्रम असे। तंव तंव दृढ संसार भासे। भ्रम गेलिया अनायासें। संसार नसे पाहतांही॥ ५५॥ मी देहो माझें कलत्र पुत्र। हें भ्रमाचें मुख्य सूत्र। तें न छेदितां पामर। मुक्ताहंकार मिरविती॥ ५६॥ एवं मायामय संसारू। ऐसा जाणोनि निर्धारू। तेथील सांडूनि अत्यादरू। उपरम प्रकारू सांगत॥ ५७॥
दृष्टिं तत: प्रतिनिवर्त्य निवृत्ततृष्ण-
स्तूष्णीं भवेन्निजसुखानुभवो निरीह:।
सन्दृश्यते क्व च यदीदमवस्तुबुद्धॺा
त्यक्तं भ्रमाय न भवेत्स्मृतिरानिपातात्॥ ३५॥
पूर्विल्या भजनपरिपाटीं। सहजें निर्मळ झाली दृष्टी। मिथ्या सांसारिक त्रिपुटी। हा निर्धार पोटीं दृढ झाला॥ ५८॥ तेथें सांसारिक त्रिपुटी। सांडूनि उपरमवितां दृष्टी। मज हृदयस्थासी होय भेटी। जेवीं सुवर्णदृष्टीं अळंकारू॥ ५९॥ तेथ दृश्य द्रष्टा दर्शन। मोडूनि त्रिपुटीचें भान। तेचि धारणातेंचि ध्यान। तेथ समाधान धरावें॥ ५६०॥ तेंचि अंगें व्हावया आपणा। सांडावी सकळ तृष्णा। वाचेसी धरावें महामौना। देहचेष्टा जाणा आवराव्या॥ ६१॥ सांडावी वेदशास्त्रव्युत्पत्ति वाड। सांडावी वाग्वादबडबड। भगवद्भावो धरावा दृढ। जेणें आशेचें बूड समूळ छेदे॥ ६२॥ काया वाचा आणि मन। दृढ आवरावें आपण। तुटों नेदावें अनुसंधान। सदा सावधान निजरूपीं॥ ६३॥ ते स्वरूपसुखीं लोधल्या जाण। देहाचें स्फुरेना देहपण। अहंकारेंसीं मावळे मन। स्वानंद पूर्ण वोसंडे॥ ६४॥ तेथ संमुख ना पाठिमोरें। एकपण ना दुसरें। देवो भक्त हेंही नुरे। सुखें सुखभरें सुखरूप॥ ६५॥ मी एक सुखरूप आहें। वेगळेपणें ठावें नोहे। येणे आत्मानुभवें राहे। एवढी प्राप्ती होये मद्भक्तां॥ ६६॥ म्हणाल काष्ठाच्या परी त्यासी। पडला असेल अहर्निशीं। हेंही न घडे गा तयासी। सांडूनि हेतूसी देहीं वर्ते॥ ६७॥ तोही प्रारब्धाचेनि बळें। आहारनिद्रादि खेळेंमेळें। देहींचीं कर्में करितां सकळें। सर्वथा नातळे देहबुद्धी॥ ६८॥ दंड काढोनि नेलिया कुंभारें। पहिले भवंडीं चक्र फिरे। तेवीं प्रारब्धाचेनि संस्कारें। कर्मानुसारें देह वर्ते॥ ६९॥ कुलालचक्रीं बैसली माशी। न हालतां भोंवे चक्रासरसी। कोटी फेरे म्हणती तिसी। तेवीं मुक्तासी देहकर्में॥ ५७०॥ यापरी देहकर्मीं वर्ततां। ज्ञाता न म्हणे अहं कर्ता। जेवीं वाऱ्याचिया स्वभावता। दिसे चपळता गलितपत्रीं॥ ७१॥ जेवीं कां पुरुषासवें छाया असे। परी ते छायेसी पुरुष न बैसे। तेवीं ज्ञात्यासवेंही देह दिसे। परी तो देह दोषें मैळेना॥ ७२॥ निजछायेसी बैसों जातां। छायाचि पळे तत्त्वतां। तेवीं मद्भक्तीं माया पाहतां। माया स्वभावतां मिथ्यात्वें पळे॥ ७३॥ हो कां मुक्ताफळांची माळा। भ्रमें सर्परूप भासे डोळां। तेचि भ्रमांतीं घालितां गळां। नुपजे कंटाळा सर्पभयाचा॥ ७४॥ तेवीं अधमोत्तम योनी। कां वंद्यनिंद्य जे जनीं। ते मी म्हणतां ज्ञानी। शंका न मानी देहमिथ्यात्वें॥ ७५॥ यापरी ते अतिसज्ञान। जाणोनि देहाचें मिथ्याभान। देहकर्मीं वर्ततां जाण। देहाचें देहपण स्फुरेना॥ ७६॥ तो देहो सर्वांगीं तोडितां। कां वृकव्याघ्रादिकीं फाडितां। कां अग्निमाजीं धडाडितां। त्यासी देहअहंता स्फुरेना॥ ७७॥ आपुली छाया देखिली शूळीं। तीलागीं पुरुष न तळमळी। तेवीं देहाची होत होळी। ज्ञाता न डंडळी निजबोधें॥ ७८॥ म्हणाल देहसंगें वर्ततां। केवीं बाधीना देहअहंता। सांडूनि अंगींची क्षारता। लवण वर्ततां उरे कैसें॥ ७९॥ हिंग सांडूनि आपुली घाणी। केवीं राहेल सुगंधपणीं। नि:शेष सांडोनिअंगींचें पाणी। केळी केळीपणें उरे कैंची॥ ५८०॥ न झुंझें म्हणोनि रणीं रिघतां। जेवीं कां घाय वाजती माथां। तेवीं देहसंगें वर्ततां। देहअहंता सोडीना॥ ८१॥ ये विषयीं ऐका सावधान। ज्ञात्यासी देहाचें बाधीना भान। तेथें स्फुरे जो अभिमान। तो भर्जित जाण बीज जैसें॥ ८२॥ भर्जित बीजें जाण। हों शके क्षुधाहरण। परी करितां बीजारोपण। अंकुर जाण त्या नाहीं॥ ८३॥ चित्रामाजींव्याघ्र दिसे। परी बाधकत्व त्यासी नसे। तेवीं भर्जित अभिमानशेषें। बाधा नसे ज्ञात्यासी॥ ८४॥ चित्रींच्या वाघासी जाण। नि:शेष नाहीं व्याघ्रपण। तेवीं मुक्तांच्या देहासी जाण। देहपण असेना॥ ८५॥ दृढ ठसावल्या चैतन्यघन। स्वरूपीं वृत्ति होय निमग्न। तेव्हां दिसे तेंही भर्जित भान। तेंही स्फुरण निमालें॥ ८६॥ ऐशी मावळल्या स्मृती। ज्ञात्याची वर्तती स्थिती। स्वयें सांगतु श्रीपती। यथानिगुती निजबोधें॥ ८७॥ सर्व कर्मी वर्ततां जाण। देहाचें स्फुरेना देहपण। तें मुख्य समाधिलक्षण। स्वयें श्रीकृष्ण सांगत॥ ८८॥
देहं च नश्वरमवस्थितमुत्थितं वा
सिद्धो न पश्यति यतोऽध्यगमत्स्वरूपम्।
दैवादपेतमुत दैववशादुपेतं
वासो यथा परिकृतं मदिरामदान्ध:॥ ३६॥
जया देहाचेनि मद्भजनें। माझें शुद्ध स्वरूप पावणें। त्या देहासी विसरिजे तेणें। मी माझेपणें देखेना॥ ८९॥ जेवीं कां भाडियाचें घोडें। जेणें आणिलें निजधामा रोकडें। तें आहे कीं गेलें कोणीकडे। हें स्मरेना पुढें तो जैसा॥ ५९०॥ हो कां भेटावया भ्रतारासी। सवें मजुर आणी विश्वासी। ते पतीसीं पहुडल्या राणिवसीं। त्या मजुरासी विसरली॥ ९१॥ कां जो दैवयोगें पालखीं चढे। तो पूर्वील तुटके मोचडे। आहेत कीं गेले कोणीकडे। हें स्मरेना पुढें तेणें हरिखें॥ ९२॥ हो कां बहुकाळें पत्नी जैसी। भर्तारू मीनल्या निजसेजेसी। ते नि:शेष विसरे लाजेसी। देहाची तैसी दशा जाहली॥ ९३॥ त्या दांपत्याचे सुखभेटी। पारकें देखतां लाज उठी। तेवीं देहाचें भान द्वैतदृष्टीं। मदैक्यपुष्टीं देह कैंचें॥ ९४॥ एवं पावोनि माझ्या स्वरूपासी। स्वानंदपूर्ण साधकासी। सुखें सुखरूपता जाहली त्यासी। निजदेहासी विसरोनी॥ ९५॥ मग उठलें कीं बसलें। चालतें कीं राहिलें। जागतें कीं निजलें। हें स्मरण ठेलें देहाचें॥ ९६॥ हें धालें कीं भुकेलें। हिंवलें कीं तापलें। प्यालें कीं तान्हलें। राहिलें उगलें स्मरेना तो॥ ९७॥ हें येथें कीं तेथें। मुकें कीं बोलतें। होतें कीं नव्हतें। स्मरणसहितें स्मरेना तो॥ ९८॥ हें ओंवळें कीं सोंवळें। चोखट कीं मैळें। डोळस कीं आंधळें। अंगीं पांगुळलें स्मरेना तो॥ ९९॥ हें आलें कीं गेलें। होतें कीं केलें। जाहलें कीं मेलें। तटस्थ राहिलें स्मरेना तो॥ ६००॥ हें बाळ कीं प्रौढ। मोठें कीं रोड। हळू कीं जड। कांहीं सदृढ स्मरेना तो॥ १॥ हें खाटे कीं भुयीं। ठायीं कीं कुठायीं। आहे कीं नाहीं। हेंही पाहीं स्मरेना तो॥ २॥ हें मंत्रीं कीं तंत्रीं। तीर्थीं कीं क्षेत्रीं। विष्ठीं कीं मूत्रीं। आहे पवित्रीं स्मरेना तो॥ ३॥ जनीं कीं वनीं। अथवा निरंजनीं। जपीं कीं ध्यानीं। हेंही मनीं स्मरेना तो॥ ४॥ हें सुजनीं कीं दुर्जनीं। बंदी कीं विमानीं। मंदिरीं कीं मसणीं। पाहती कोणी स्मरेना तो॥ ५॥ हें गजीं कीं तुरगीं। कीं अंगनासंभोगीं। खरीं कीं उरगीं। अंगीच्या अंगीं स्मरेना तो॥ ६॥ हें काशीं कीं कैकटीं। नरकीं कीं वैकुंठीं। घरी कीं कपाटीं। राहिलें नेहटीं स्मरेना तो॥ ७॥ हें पूजिलें कीं गांजिलें। धरिलें कीं मारिलें। देहाचें येकही केलें। अथवा काय झालें स्मरेना तो॥ ८॥ मी शेषशयनावरी। कीं मातंगाच्या घरीं। कीं बैसलों शूळावरी। हेंही न स्मरी सहसा तो॥ ९॥ ऐशी ज्ञात्याची निरभिमानता। माझेनि न सांगवे तत्त्वतां। जे पावले माझी सायुज्यता। त्यांची कथा न बोलवे॥ ६१०॥ जेथ वेदां मौन पडे। स्वरवर्णेंसीं वाचा बुडे। त्या संतांचे पवाडे। माझेनिही निवाडे न सांगवती॥ ११॥ ऐकोन सज्ञानाची स्थिती। तुम्हांसी गमेल ऐसें चित्तीं। केवळ जड मूढ झाली प्राप्ती। एकही स्फूर्ती स्फुरेना॥ १२॥ जेवीं कां केवळ पाषाण। तैसें झालें अंत:करण। एकही स्फुरेना स्फुरण। ज्ञातेपण घडे कैसें॥ १३॥ ऐशी धरिल्या आशंका। तेविषयीं सावध ऐका। ज्ञानअज्ञानभूमिका। अतर्क्य लोकां निश्चित॥ १४॥ केवळ जें शुद्ध ज्ञान। आणि जडमूढ अज्ञान। दोहींची दशा समान। तेथीलही खूण मी जाणें॥ १५॥ निबिड दाटला अंधकारू। त्यामाजीं काजळाचा डोंगरू। तेथ आंधळा आला विभाग करूं। तैसा व्यवहारू अज्ञाना॥ १६॥ शोधावया अध्यात्मग्रंथ भले। अंधमूकाहातीं दीधले। तें ऐके देखे ना बोले। तैसें जडत्वें झालें अज्ञान॥ १७॥ ऐशी अज्ञानाची गती। ऐका सज्ञानाची स्थिती। अपरोक्षसाक्षात्कारप्रतीती। देहीं वर्तती विदेहत्वें॥ १८॥ जेवीं कां रत्नें आणि गारा। दोहींचा सारिखा उभारा। मोल वेंचूनि नेती हिरा। फुकट गारा न घेती॥ १९॥ जैसें कण आणि फलकट। दोहींसी वाढी एकवाट। तैसें ज्ञानाज्ञान निकट। दिसे समसकट सारिखें॥ ६२०॥ जेवीं कां खरें कुडें नाणें। पाहतां दिसे सारिखेपणें। खरें पारखोनि घेती देखणे। मूर्खीं नाडणें ते ठायीं॥ २१॥ तेवीं ज्ञानाज्ञानाची पेंठ। भेसळली दिसे एकवट। तेथ अणुभरी चुकल्या वाट। पाखंड उद्भट अंगीं वाजे॥ २२॥ यालागीं मद्भक्तीपाशीं आले। जे माझ्या विश्वासा टेंकले। त्यांसी म्यां निजरूप आपुलें। खरें दीधलें अतिशुद्ध॥ २३॥ माझ्या नामविश्वासासाठीं। प्रल्हाद द्वंद्वें पायें पिटी। न घेतां मुक्ती लागे पाठीं। विश्वासें भेटी माझ्या रूपीं॥ २४॥ पावोनि माझ्या निजस्वरूपासी। तेंचि ते झालें मद्भावेंसीं। जेवीं लवण मीनल्या जळासी। लवणपणासी मूकलें॥ २५॥ तेथ मी एक लवण। हेही विराली आठवण। स्वयें समुद्र झालें जाण। तेवीं सज्ञान मद्रूपें॥ २६॥ ऐसें पावोनि माझ्या स्वरूपासी। विसरले देहअभिमानासी। झाले चैतन्यघन सर्वांशीं। आनंदसमरसीं निमग्न॥ २७॥ जेवीं दोरीं सर्पू उपजला। नांदोनि स्वयें निमाला। तो दोरें नाहीं देखिला। तैसा झाला देहभावो मुक्तां॥ २८॥ तेव्हां मी तूं हे आठवण। आठवितें आहे कोण। विसरोन गेलें अंत:करण। आपण्या आपण विसरला॥ २९॥ तेथ कैंचा स्वर्ग कैंचा नरक। कैंचें चोख कैंचें वोख। कैंचे चतुर्दश लोक। ब्रह्म एक एकलें॥ ६३०॥ कैंचें पवित्र कैंचें अपवित्र। कैचें तीर्थ कैंचें क्षेत्र। कैचा वेदू कैंचें शास्त्र। ब्रह्म स्वतंत्र अद्वय॥ ३१॥ तेथ कैंचा उत्पत्तिविनाशू। कैंचा वैकुंठ कैलासू। कैंचा ब्रह्मा विष्णु महेशू। एक अविनाशू उरलासे॥ ३२॥ तेथ कैंचा बोधू कैंची बुद्धी। देवपण बुडालें त्रिशुद्धी। लाजा निमाली मोक्षसिद्धी। कैंचा क्षीराब्धिशेषशायी॥ ३३॥ तेथ माझीही भगवंतता। हारपोनि जाय तत्त्वतां। प्रणवाचा बुडाला माथा। ऐशी सायुज्यता पावले॥ ३४॥ यालागीं देहाचें केलें ठेलें। अथवा आलें कां गेलें। हें स्फुरेना जें बोलिलें। ते विशद केलें या रीती॥ ३५॥ अविद्या कारण देह कार्य। ते अविद्या नासोनि जाये। कारण नासल्या कार्य राहे। हें न घडे पाहें म्हणाल॥ ३६॥ वृक्ष समूळीं उपडिला जाये। सार्द्रता तत्काळ न जाये। पत्र पुष्प फळ सार्द्र राहे। शुष्क होये अतिकाळें॥ ३७॥ तेवीं अविद्या नासोनि जाये। भोगानुरूप दैव जें राहे। तेणें ज्ञाता वर्तताहे। निजदेहीं पाहे विदेहत्वें॥ ३८॥ म्हणाल वाढवितां वाडेंकोडें। प्रतिपाळितां सुरवाडें। राखतराखतां देह पडे। प्रत्यक्ष रोकडें दिसताहे॥ ३९॥ ज्याचें देह त्यासी दृढ नव्हे। तरी तें तत्काळचि पडावें। वांचलें असे कोणे भावें। ऐसें कांहीं जीवें कल्पाल॥ ६४०॥ ज्याचें देह तो न पुसे त्यातें। तरी तें देह केवीं कर्मीं वर्ते। ऐशी आशंका तुम्हांतें। ऐका सावचित्तें सांगेन॥ ४१॥ देहाचें उत्पत्तिस्थितिनिदान। पुरुषासी वश्य नव्हे जाण। त्यासी अदृष्टचि प्रमाण। दैवयोगें चळण देहाचें॥ ४२॥ उठणें कां बैसणें। तें देहासी दैवगुणें। अदृष्टगतीं देणें घेणें। खाणें जेवणें अदृष्टें॥ ४३॥ स्वदेशीं कां परदेशीं। अदृष्ट नेतसे देहासी। स्वर्गनरकभोगासी। अदृष्ट देहासी उपजवी॥ ४४॥ यश लाभ हानि मृत्यु। देहासी अदृष्टें असे होतू। ज्ञाता देहासी अलिप्तू। जैसा घटांतू चंद्रमा॥ ४५॥ जैशी छाया पुरुषासरसी। तैशी काया सज्ञानासी। ते राहिली अदृष्टापाशीं। निजकर्मासी भोगावया॥ ४६॥ जन्मोनि छाया सरसी वाढे। माझी ऐशी अहंता न चढे। तैसेंच देह ज्ञात्याकडे। मी म्हणोनि पुढें येवों न शके॥ ४७॥ सदा छाया सरिसी असे। परी कोठें असे कोठें नसे। हें ज्याची तो न पुसे। देहाचें तैसें वर्तन झालें॥ ४८॥ छाया विष्ठेवरी पडे। कां पालखीमाजीं चढे। पुरुषासी सुखदु:ख न जोडे। ज्ञात्यासी तेणें पाडें देहभोग॥ ४९॥ येथवरी निजदेहासी। कैसे न विसर पडिला त्यासी। ऐक त्याही अभिप्रायासी। दृष्टांतेंसीं सांगेन॥ ६५०॥ जो मोलें मदिरा पिवोनि ठाये। तो तेणें मदें नाचे गाये। देहवंत देह विसरोनि जाये। वस्त्र नाहीं आहे स्मरेना॥ ५१॥ हा तंव ब्रह्मरस प्याला। परमानंदें तृप्त झाला। देहो झाला कीं मेला। आठवू ठेला तेणें मदें॥ ५२॥ एवं देहाचें भरण पोषण। जन्म अथवा मरण। तें दैवयोगें जाण। तेंचि निरूपण हंस बोले॥ ५३॥
देहोऽपि दैववशग: खलु कर्म
यावत् स्वारम्भकं प्रतिसमीक्षत एव सासु:।
तं सप्रपञ्चमधिरूढसमाधियोग:
स्वाप्नं पुनर्न भजते प्रतिबुद्धवस्तु:॥ ३७॥
जितुकें देहाचें वर्तन। तितुकें अदृष्टास्तव जाण। अज्ञानासी देहाभिमान। त्यातें सज्ञान न धरिती॥ ५४॥ जैसें अदृष्ट पूर्वस्थित। तैसा देह उपजे येथ। सावेव प्राणेंसहित। ऐसें वर्तत जंव दैवें॥ ५५॥ म्हणाल दैवयोगें देहीं असतां। अवश्य वाढेल देहअहंता। जेवीं एकत्र गमनें मार्गस्थां। येरयेरांच्या व्यथा भोगिती॥ ५६॥ लवणाच्या मिळणीं पाणी। होऊनि ठाके खारवणी। तेवीं ज्ञाताही देहाचे मिळणीं। देहाभिमानी होईल॥ ५७॥ जेवीं लोहसंगाचिये प्राप्ती। दुर्धर अग्नि घण वरी घेती। तेवीं देहाचिया संगती। ज्ञाते भोगिती सुखदु:खें॥ ५८॥ ऐसा कल्पाल अभिप्रावो। तो सज्ञानासी न घडे भावो। तिंहीं निवटूनियां अहंभावो। चिदानंदें पहा हो समाधिस्थ॥ ५९॥ ‘अधिरूढसमाधियोग’। हें मूळींचें पद अभंग। येणें समाधि अतिनिर्व्यंग। साधिली चांग निजबोधें॥ ६६०॥ तरी समाधी ते कैशी असे। तटस्थ काष्ठाचेपरी दिसे। कां समाधिस्थ केवळपिसें। अथवा असे सज्ञान॥ ६१॥ ते समाधीचीं लक्षणें। ऐक सांगेन संपूर्णें। देहीं असोनि देहबंधनें। नाहीं अडकणें सज्ञाना॥ ६२॥ केवळ ताटस्थ्या नांव समाधी। म्हणतां ज्ञात्याची ठकली बुद्धी। ते समाधि नव्हे त्रिशुद्धी। मूर्च्छित ते संधी असे वृत्ती॥ ६३॥ निरभिमान निरवधी। त्या नांव अखंडसमाधी। परी काष्ठातें त्रिशुद्धी। नव्हे समाधी सर्वथा॥ ६४॥ ताटस्थ्यचि समाधि साचें। जे मानिती त्यांसी स्वरूपाचें। ज्ञान नाहीं निश्चयाचें। अनुमानाचें बोलणें॥ ६५॥ प्रचंड आघाताच्या भुली। तत्काळ तटस्थता बाणली। तरी काय तेणें झाली। सत्यचि भली समाधि त्यासी॥ ६६॥ ओंवाळणीचिया आस्था। बहुरूपी सोंग संपादितां। वायु स्तंभविला अवचितां। तेणें तटस्थता बहुकाळ॥ ६७॥ परी वासना जंव उरली आहे। तंव समाधि कैसेनि हों लाहे। सावध होतांचि म्हणे काये। ये दात्याचे रायें उचित द्यावें॥ ६८॥ सर्व संकल्पांची अवधी। त्या नांव निर्विकल्प समाधी। सकळ शास्त्र हेंचि प्रतिपादी। समाधि त्रिशुद्धी त्या नांव॥ ६९॥ सापु आल्या शेळीप्रती। तटस्थ होय सकळवृत्ती। तैशी झालिया ताटस्थस्थिती। नव्हे निश्चितीं ते समाधी॥ ६७०॥ अकस्मात अवचितां। दिव्य स्वरूप देखतां। आश्चर्यें झाली तटस्थता। तेथ जाणावी तत्त्वतां वृत्ति आहे॥ ७१॥ स्वस्वरूप देखतां प्रथमदृष्टीं। न संवरतु विस्मयो उठी। तोही जिरवूनियां पोटीं। दशा जे उठी ते समाधी॥ ७२॥ नि:शेष कल्पना जेथ विरे। तेथ विस्मयो कोठें स्फुरे। सूक्ष्म कल्पना थावरे। तेणें वोसरे विस्मयो॥ ७३॥ जेथ साचार ब्रह्मप्राप्ती होये। तेथें देहचि स्फुरों न लाहे। तेव्हां तटस्थ कीं चालताहे। हें देखणें होये पुढिलांचें॥ ७४॥ एवं देहचि जेथ मिथ्यापणें। त्याचीं कवण लक्षी लक्षणें। हो कां मृगजळींचेनि नाहाणें। जेवीं कां निवणें सज्ञानीं॥ ७५॥ मिथ्यादेहासी तटस्थता। झाल्या मानावी समाध्यवस्था। ऐशीं लक्षणें सत्य मानितां। ठकले तत्त्वतां परीक्षक॥ ७६॥ हो कां स्वप्नींचे सज्ञानासी। ताटस्थ्यमुद्रा लागल्या त्यासी। जरी मान्य झाल्या स्वप्नींच्यासी। तरी जागृतीसी नाहीं आला॥ ७७॥ हो कां स्वप्नींच्या लोकांप्रती। थोर झाली समाधीची ख्याती। तरी नाहीं आला तो जागृती। जाणावा निश्चितीं निद्रितू॥ ७८॥ तेवीं ताटस्थ्या नांव समाधी। ते अविद्या स्वप्नमूर्च्छासिद्धी। परी स्वस्वरूपप्रबोधीं। जागा त्रिशुद्धी नाहीं झाला॥ ७९॥ तो जागा होऊनि स्वप्न पाहे। तें मिथ्यात्वें देखताहे। त्यांतु आपुला देहो सत्य काये। मा ताटस्थ्य राहे ते ठायीं॥ ६८०॥ जो जागा होऊनि तत्त्वतां। स्वप्नदेहासी तटस्थता। साक्षेपपूर्वक लावूं जातां। लाजे परी अधिकता दशा न मनीं॥ ८१॥ जो जागा होऊनि स्वप्न सांगे। तें मिथ्यापणेंचि अवघें। परी सत्यसत्त्वाचेनि पांगें। कदा निजांगें नातळे॥ ८२॥ तैशी साचार वस्तुप्राप्ती। तो नातळे देहस्थिती। तरी देह वर्ते कोणे रीती। तो प्रारब्धगतीचेनि शेषें॥ ८३॥ स्थंडिलीं अग्नि विझोनि जाये। तरी भूमिये उष्णता राहे। कर्पूर सरल्याही पाहें। सुवासु आहे ते देशीं॥ ८४॥ पाळणा हालवितां वोसरे। तरी तो हाले पूर्वसंस्कारे। तेवीं अविधानाशें प्रारब्ध उरे। तेणें देहो वावरे मुक्तांचा॥ ८५॥ लक्ष्य भेदोनियां तीरें। बळें चालिजे पुढारें। तेवीं अविद्यानाशें प्रारब्ध उरे। तेणें देहो वावरे मुक्तांचा॥ ८६॥ शरीराचेनि छाया चळे। परी शरीर छायेवेगळें। तेवीं देह मिथ्या मुक्ताजवळें। चळे वळे प्रारब्धें॥ ८७॥ हेतुवीण अनायासें। पुरुषासवें छाया असे। तेवीं सज्ञानासरिसें। देह दिसे मिथ्यात्वें॥ ८८॥ जैसें गलित पत्र वारेनि चळे। तैसें देह वर्ते प्राचीन मेळें। परी देहकर्माचेनि विटाळें। ज्ञाता न मैळे निजबोधें॥ ८९॥ त्या प्रारब्धाच्या पोटीं। सांगो सकळ जगेंसीं गोठी। कां धरोनि मौनाची मिठी। गिरिकपाटीं पडो सुखें॥ ६९०॥ तो आचरो सकळ कर्में। अथवा पिसा हो कां निजभ्रमें। तेणें तेणें अनुक्रमें। जाण परिणामें प्रारब्धें॥ ९१॥ तो चढो पालखीं गजस्कंधीं। कां पडो विष्ठामूत्रसंधीं। ते ते प्रारब्धाची सिद्धी। जाण त्रिशुद्धी ज्ञात्यासी॥ ९२॥ जेथ बाध्यबाधकता फिटली। सकळ अहं अविद्यातुटली। सहज समाधी त्या नांव झाली। हे संख्या केली सिद्धांतीं॥ ९३॥ ऐशी जे सैर समाधिअवस्था। तोंचि भोग भोगोनि अभोक्ता। कर्में करोनि अकर्ता। जाण तत्त्वतां तो एक॥ ९४॥ तो क्रियाकारणसंयोगें। डुलत देखिजे विषयभोगें। परी समाधिमुद्रा न भंगे। भोगसंगें अलिप्त॥ ९५॥ त्यासी स्त्री म्हणे माझा भर्ता। पुत्र म्हणे माझा पिता। शिष्य म्हणे स्वामी तत्त्वतां। त्यांहूनि परता त्यांमाजीं वर्ते॥ ९६॥ हो कां काष्ठास्तव उत्पत्ती। काष्ठावरी ज्याची स्थिती। तो आकळितां काष्ठीं बहुतीं। नावरे निश्चितींअग्नि जैसा॥ ९७॥ फुंकितां लखलखिला। जो फुंकास्तव प्रकटला। तो फुंक न साहतां ठेला। निर्वातींचा संचला दीप जैसा॥ ९८॥ तेवीं कर्मास्तव उत्पत्ती। कर्मेंचि झाली परब्रह्मप्राप्ती। त्या कर्मामाजीं वर्तती। निष्कर्मस्थिती महायोगी॥ ९९॥ तो व्यवहारी दिसो जनीं। कीं पिसेपणीं नाचो वनीं। अथवा तटस्थ राहो विजनीं। दशा अधिक उणी बोलूं नये॥ ७००॥ जें सिंहासनीं राजत्वजोडे। तें वनांत खेळतां न मोडे। कीं धांवतां व्याहाळीपुढें। राजपद चोखडें ढळूं नेणे॥ १॥ रावोरानीं वसिन्नला। त्या रानासी राजभोग आला। रावो राजत्वा मुकला। मूर्खही या बोला न बोलती॥ २॥ तेवीं पावोनि स्वरूपप्राप्ती। योगी प्रारब्धाच्या स्थिती। नाना कर्में करितां दिसती। परी निजात्मस्थिती भंगेना॥ ३॥ यालागीं समाधि आणि व्युत्थान। या दोहीं अवस्थांचें लक्षण। अपक्वासीचि घडे जाण। परिपूर्णासी लक्षण तें कैंचें॥ ४॥ स्वरूपावेगळें कांहीं एक। पूर्णासी उरलें नाहीं देख। समाधिव्युत्थानाचें मुख। त्यासंमुख येवों लाजे॥ ५॥ अर्जुना देवोनि समाधी। सवेंचि घातला महायुद्धीं। परी कृष्ण कृपानिधी। तटस्थ त्रिशुद्धी न करीच॥ ६॥ यालागीं समाधिव्युत्थानविधी। ताटस्थ्येंसहित निरवधी। गिळूनि झाली सैर समाधी। पूर्ण निजपदीं विलसतां॥ ७॥ एवं प्रारब्ध जंव असे। तंव मुक्ताचें देह वर्ते ऐसें। परी अहंममतेचें पिसें। पूर्विल्या ऐसें बाधीना॥ ८॥ जेवीं स्वप्नदेहाच्या नाना अवस्था। जागृतीं आलिया तत्त्वतां। पुरुष नेघे आपुले माथां। तेवीं समाधिस्था देहकर्में॥ ९॥ हेचि परमार्थता ब्रह्मस्थिती। नाना परींच्या उपपत्ती। म्यां सांगीतल्या तुम्हांप्रती। ज्ञानसंपत्ती निजगुह्य॥ ७१०॥ तूं कोण हें पुसिलें होतें। सांगावया तें सनकादिकांतें। सांगतसें निजरूपातें। विश्वास त्यातें दृढ व्हावया॥ ११॥
मयैतदुक्तं वो विप्रा गुह्यं यत्सांख्ययोगयो:।
जानीतमाऽऽगतं यज्ञं युष्मद्धर्मविवक्षया॥ ३८॥
अतिगुह्य ज्ञान परात्पर। जें उपनिषदांचें भांडार। म्यां सांगितलें साचार। योगसार योग्यांचें॥ १२॥ ज्या ज्ञानालागीं साधनकोटी। मुमुक्षु करिती हटतटीं। योगी रिघोनि गिरिकपाटीं। महामुद्रा नेहटीं साधिती॥ १३॥ वेदशास्त्रांचिया युक्ती। थोंटावल्या जिये अर्थीं। तें निजज्ञान म्यां तुम्हांप्रती। यथानिगुती सांगीतलें॥ १४॥ एवढिया ज्ञानाचा ज्ञानवक्ता। मी कोण हें न कळेल सर्वथा। तरी यज्ञाचा यज्ञभोक्ता। जाण तत्त्वतां मी विष्णू॥ १५॥ मज यावया हेंचि कारण। तुम्हीं ब्रह्मयाप्रती केला प्रश्न। तें उपदेशावया ब्रह्मज्ञान। स्वयें आपण येथें आलों॥ १६॥ ज्या उपदेशाच्या पोटीं। वर्णाश्रमपरिपाटी। न सांडितां होय माझी भेटी। तेही गोष्टी ध्वनिलीसे॥ १७॥ सांडावें ब्राह्मणपण। मग मांडावें संन्यासग्रहण। हे दोनी धर्म देहींचे जाण। उपदेशीं देहपण मुख्यत्वें मिथ्या॥ १८॥ उपदेशू करूनि प्रमाण। सनकादिकीं ब्राह्मणपण। अद्यापि सांडिलें नाहीं जाण। माझें गुह्य ज्ञान पावले॥ १९॥ तेणेंचि उपदेशें निश्चित। नारद ब्राह्मणपणें वर्तत। ब्रह्मानंदें डुल्लत। गात नाचत निजबोधें॥ ७२०॥ ऐसें जें चैतन्यघन। आपुलें स्वरूप आपण। स्वयें करिताहे स्तवन। निजमहिमान द्योतावया॥ २१॥
अहं योगस्य सांख्यस्य सत्यस्यर्तस्य तेजस:।
परायणं द्विजश्रेष्ठा: श्रिय: कीर्तेर्दमस्य च॥ ३९॥
सांख्य जें परम ज्ञान। योग अष्टांगादिसाधन। सत्याचें सत्यपण। सत्यस्वरूप जाण मी एक॥ २२॥ पहा पां ज्या सत्याच्या ठायीं। संत सद्धर्में राहिले पाहीं। सूनृत जे वाचा तेही। मजवेगळी कांहीं हों नेणे॥ २३॥ तेजाची जे प्रगल्भता। ते माझेनि तेजें सतेजता। श्रियेची जे ऐश्वर्यता। जाण तत्त्वतां माझेनि॥ २४॥ कीर्ति माझेनि कीर्तनें। सदा वंदिजे साधुजनें। मजवेगळें कीर्तीचें जिणें। कोणी पोसणें न घेती॥ २५॥ माझेनि तेजें निग्रहता। निग्रहो करी समस्तां। अदम्या दमू दमिता। जाण तत्त्वतां माझेनि॥ २६॥ येथ ध्येय आणि ध्यान। कां साध्य आणि साधन। या अवघियां मी अधिष्ठान। मजवेगळें भान यां कैंचें॥ २७॥ तुम्ही ब्राह्मण अतिश्रेष्ठ। मजही पूज्यपणें वरिष्ठ। यालागीं निजज्ञान चोखट। तुम्हांसी म्यां प्रकट सांगीतलें॥ २८॥
मां भजन्ति गुणा: सर्वे निर्गुणं निरपेक्षकम्।
सुहृदं प्रियमात्मानं साम्यासङ्गादयोऽगुणा:॥ ४०॥
मी वस्तुतां निरपेक्ष निर्गुण। त्या माझ्या ठायीं भजोनि गुण। सुहृद आत्मा प्रिय जाण। ऐसें लक्षण मज करिती॥ २९॥ समता आणि असंगता। याही गुणांच्या अवस्था। आणूनि ठेविती माझ्या माथां। गुणस्वभावतां लक्षणें॥ ७३०॥ हो कां सबळ बळें अंधकार। कैं युद्धा आला सूर्यासमोर। तरी तमारी हा बडिवार। सूर्या आंधार जेवीं देत॥ ३१॥ कोणें धरोनियां आकाश। घटीं घातलें सावकाश। तरी घटयोगें घटाकाश। मिथ्या गगनास नांव आलें॥ ३२॥ नाहीं घटासी आतळला। गगनीं चागगनींच संचला। तो घटें घटचंद्रमा केला। मूर्खासी मानला सत्यत्वें॥ ३३॥ तेवीं मी केवळ निर्गुण। त्या माझ्या ठायीं भजोनि गुण। सुहृद आत्मा इत्यादि जाण। असंगादि लक्षण मज देती॥ ३४॥ गुणासी मीनातळें जरी। तरी मज म्हणती लीलाधारी। एवं गुणचि गुणांमाझारीं। मिथ्या मजवरी आळ हा॥ ३५॥ तेथ मी घेता ना देता। कर्ता ना करविता। हे माझी निजस्वभावता। येर ते अवस्था गुणांची॥ ३६॥ एवं पूर्वापर अतिविचित्र। सांगोनि ज्ञानविज्ञाननिर्धार। त्या इतिहासाचा उपसंहार। स्वयें सारंगधर करीतसे॥ ३७॥
इति मे छिन्नसन्देहा मुनय: सनकादय:।
सभाजयित्वा परया भक्त्यागृणत संस्तवै:॥ ४१॥
आत्मज्ञानी परम दक्ष। मुमुक्षूंमाजीं अतिनेटक। संदेहापन्न सनकादिक। म्यां यापरी देखनि:संदेह केले॥ ३८॥ सदा सावधानें निर्मळ। माझ्या भजनीं अतिप्रेमळ। सदा मद्रूपें मननशीळ। अव्याकुळ श्रवणार्थी॥ ३९॥ उद्धवा तिंहीं ऐकतां माझी गोष्टी। माझ्या स्वरूपीं घातली मिठी। मद्रूप झाले उठाउठी। बाप जगजेठी ब्रह्मपुत्र॥ ७४०॥ तिंहीं दृश्य द्रष्टा दर्शन। त्रिपुटीचें केलें शून्य। परब्रह्मचि झाले पूर्ण। माझेनि जाण उपदेशें॥ ४१॥ परम पावले समाधान। गद्यपद्यादि सुलक्षण। माझें करोनियां स्तवन। पूजाविधान मांडिलें॥ ४२॥
तैरहं पूजित: सम्यक् संस्तुत: परमर्षिभि:।
प्रत्येयाय स्वकं धाम पश्यत: परमेष्ठिन:॥ ४२॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायामेकादशस्कन्धे त्रयोदशोऽध्याय:॥ ४३॥
जरी पूज्यपूजकता गेली। तरी तिंहीं गुरूची पूजा केली। सांडूनि द्वैताची भुली। पूजा मांडिली अतिप्रीतीं॥ ४३॥ शिष्य झालियाही ब्रह्मसंपन्न। त्याहीवरी त्यासी गुरु पूज्य जाण। सद्गुरु तोचि ब्रह्म पूर्ण। हे पावली खूण सनकादिकां॥ ४४॥ ज्याच्या बोलासरिसेंचि पाहें। अवघें ब्रह्मचि होऊनि ठाये। त्या सद्गुरूचे पूज्य पायें। सांगूं काये बोलवरी॥ ४५॥ ज्यासी परब्रह्म आलें हाता। तोचि जाणे सद्गुरूची पूज्यता। इतरांसी हे न कळे कथा। अनुमानता बोलवरी॥ ४६॥ ते सनकादिक समस्त। माझी पूजा करोनि यथोक्त। वारंवार स्तवन करीत। चरणा लागत पुन:पुन:॥ ४७॥ माझ्या भजनीं एकमुख। माझिया निजभावें अतिभाविक। मज अवाप्तकामासी सुख। त्यांचे पूजनीं देख उथळलें॥ ४८॥ मग करूनि प्रदक्षिणा। ते लागले माझिया चरणा। परम सुख झालें ब्राह्मणां। वचनार्थें जाणा माझेनी॥ ४९॥ पहात असतां प्रजापती। सनकादिक उभे असती। त्यां देखतां निजधामाप्रती। शीघ्रगती मी आलों॥ ७५०॥ माझे शिष्य सनकादिक। उद्धवा या रीतीं झाले देख। तो इतिहास अलोलिक। तुज म्यां सम्यक सांगीतला॥ ५१॥ ते योगियांमाजीं अतिउद्भट। भक्तांमाजीं अतिश्रेष्ठ। ज्ञानियांमाजीं अतिवरिष्ठ। शिष्य चोखट सनकादिक॥ ५२॥ हंसगीतनिरूपण। पुरातन जें ब्रह्मज्ञान। तें उद्धवासी श्रीकृष्ण। प्रसन्न होऊन दीधलें॥ ५३॥ भागवतपंथें चालतां। हे पुरातन ब्रह्मकथा। एका एकादशू पाहतां। स्वभावें हाता पैं आली॥ ५४॥ जीं हंसमुखींचीं चिद्रत्नें। जीं सनकादिकां झालीं भूषणें। उद्धवा अळंकारिला श्रीकृष्णें। तें शेष जनार्दनें मज दीधलें॥ ५५॥ सनकादिक-उद्धवाचें शेष। हाता आलें हा बोल वोस। ते गोष्टीसी जाहले बहु दिवस। म्हणाल वायस हा जल्पू॥ ५६॥ कृतयुगीं शंखासुरासी। देवें मर्दिलें होतें त्यासी। ते ठायीं अद्यापि सभाग्यासी। अव्हाशंखासी पावती॥ ५७॥ रामें पूर्वीं अयोध्येसी। केलें होतें महायागासी। तेथें हवि:शेषलोकांसी। अद्याप हातासी येतसे॥ ५८॥ तैसेंचि येथें भागवतीं। जनार्दनकृपापद्धतीं। सनकादिकांची शेषप्राप्ती। एकादशार्थीं आम्हां झाली॥ ५९॥ मागेंपुढें अवघें एक। हा एकादशाचा विवेक। तेणें सनकादिक-उद्धवशेष। आम्हांही देख प्राप्त झालें॥ ७६०॥ करूं नेदितां गयावर्जनीं। न रिघवे समर्थजनीं। ते पदीं माशीलागुनी। निवारण कोणी करीना॥ ६१॥ तेवीं नाना शास्त्रार्थयुक्तींसी। शिणतां समर्थ साधकांसी। प्राप्ति नव्हे ज्ञानशेषासी। ते झाली आम्हांसी एकादशें॥ ६२॥ हंसकृष्ण जनार्दन। स्वरूप एक नामें भिन्न। तेणें घालून बोधांजन। जुना ठेवा जाण दाखविला॥ ६३॥ तेथ मी एका एकू देखता। आणि तो एकू मातें दाखविता। हेही नुरेचि बोध्यबोधकता। पाहता पाहविता तोचि तो॥ ६४॥ आरसा आलिया मुख दिसे। तो गेलिया तें न दिसे। परी येणें जाणें मुखासी नसे। ते सहजेंचि असे संचलें॥ ६५॥ आरिशाचें मुख आरिसें नेलें। परी पाहातया नाहीं ऐसें झालें। जें कटकटा माझें मुख गेलें। तें असे संचलें तो जाणे॥ ६६॥ तेवीं अज्ञानें न्यावें। कां ज्ञान झालिया यावें। तैसें वस्तूसी न संभवे। तें असे स्वभावें संचलें॥ ६७॥ तैसें देखतें आणि दाखवितें। दोनी जाऊनियां तेथें। माझें मीपण जें जुनें होतें। तें दाविलें मातें जनार्दनें॥ ६८॥ जेवीं सूर्याचेनि प्रकाशें। सूर्येंचि कीं सूर्यो दिसे। तेवीं माझेनि निजप्रकाशें। मज मीचि असें देखत॥ ६९॥ ऐशियाही ठायीं जाण। कैंचें नवें जुनें ज्ञान। बहु काळ ठेविलें सुवर्ण। त्यासी म्हणे कोण कुहजकू॥ ७७०॥ कालचाचि आजि उगवला। तो सूर्य काय म्हणावा शिळा। कीं आजिचा अग्नि सोंवळा। कालचा काय वोंवळा म्हणों ये॥ ७१॥ तेवीं सनकादिकांचें जें ज्ञान। तेंचि मराठीभाषेमाजीं जाण। येथें ठेवूं जातां दूषण। दोषी आपण होईजे॥ ७२॥ कां सुवर्णाचें केलें सुणें। परी तें मोलें नव्हेचि उणें। तेवीं सनकादिकांचीं ज्ञानें। देशभाषा हीनें नव्हतीच॥ ७३॥ जेवीं कां गुळाचें कारलें केलें। परीतें कडूपणा नाहीं आलें। तेवीं हंसगीत मराठें झालें। नाहीं पालटलें चिन्मात्र॥ ७४॥ जें मोलमुकुटींच्या हेमासी। तेंचि मोल सुवर्णश्वानासी। जो कां ग्राहिक सुवर्णासी। तो घे दोघांसी समत्वें॥ ७५॥ तैसें आत्मानुभवी जे येथें। ते मानितील या ग्रंथातें। येर ते हेळसितील यातें। निजभावार्थें न घेती॥ ७६॥ जे वंदिती कां निंदिती। ते दोघे आम्हां ब्रह्ममूर्ती। हे निजात्मभावाची प्रतीती। केली निश्चितीं जनार्दनें॥ ७७॥ एका जनार्दना शरण। रिघतां विरालें एकपण। जेवीं कां समरसोनि लवण। स्वयें जाण समुद्र झालें॥ ७८॥ तेथे एका आणि जनार्दन। एक झाले हें म्हणे कोण। जेवीं डोळ्ॺांचें देखणेपण। डोळाचि आपण स्वयें जाणे॥ ७९॥ डोळ्ॺांनी आरिसाप्रकाशिजे। तेथें डोळेनि डोळा पाहिजे। तेवीं हें ज्ञान जाणिजे। देखणें देखिजे देखणेनी॥ ७८०॥ सांडोनियां एकपण। एका जनार्दना शरण। हेंचि हंसगीतनिरूपण। झालें परिपूर्ण पूर्णत्वें॥ ७८१॥
इति श्रीभागवते महापुराणे एकादशस्कंधे एकाकारटीकायां श्रीकृष्णोद्धवसंवादे हंसगीतनिरूपणं नाम त्रयोदशोऽध्याय:॥ १३॥ श्रीकृष्णार्पणमस्तु॥ ॥ मूळश्लोक॥ ४२॥ ओव्या॥ ७८१॥
॥ श्री ॐ तत्सत्-श्रीकृष्ण प्रसन्न॥
अध्याय चवदावा
श्रीगणेशाय नम:॥ श्रीकृष्णाय नम:॥ ॐ नमो स्वामी सद्गुरू। तूं निजांगें क्षीर सागरू। तुझा उगवल्या प्रबोधचंद्रू। आल्हादकरू जीवासी॥ १॥ ज्या चंद्राचे चंद्रकरीं। निबिड अज्ञान अंधारीं। त्रिविध ताप दूर करी। हृदयचिदंबरीं उगवोनी॥ २॥ ज्या चंद्राचे चंद्रकिरण। आर्तचकोरांलागीं जाण। स्वानंदचंद्रामृतें स्रवोन। स्वभावें पूर्ण करिताती॥ ३॥ अविद्याअंधारीं अंधबंधे। संकोचलीं जीवदेहकुमुदें। तीं ज्याचेनि किरणप्रबोधें। अतिस्वानंदें विकासलीं॥ ४॥ जो चंद्र देखतांचि दिठीं। सुख होय जीवाच्या पोटीं। अहंसोमकांतखोटी। उठाउठी विरवितू॥ ५॥ पूर्णिमा पूर्णत्वें पूर्णवाढे। देखोनि क्षीराब्धी भरतें चढे। गुरुआज्ञामर्यादा न मोडे। स्वानंद चढे अद्वयें॥ ६॥ सद्गुरु क्षीराब्धी अतिगहन। सादरें करितां निरीक्षण। वेदांतलहरीमाजीं जाण। शब्दचिद्रत्नें भासती॥ ७॥ तेथ विश्वासाचा गिरिवर। वैराग्यवासुकी रविदोर। निजधैर्याचे सुरासुर। मंथनतत्पर समसाम्यें॥ ८॥ मथनीं प्रथम खळखळाटीं। लयविक्षेप हाळाहळ उठी। तें विवेकनीळकंठें कंठीं। निजात्मदृष्टीं गिळिलें॥ ९॥ मग अभ्यास प्रत्यगावृत्ती। क्रियेसी झाली विश्रांती। प्रकटली रमा निजशांती। जीस श्रीपती वश्य झाला॥ १०॥ तेथ ब्रह्मरस आणि भ्रमरस। इंहीं युक्त अमृतकलश। मथनीं निघाला सावकाश। ज्याचा अभिलाष सुरासुरां॥ ११॥ ते विभागावयालागुनी। माधवचि झाला मोहिनी। अहंराहूचें शिर छेदूनी। अमृतपानी निवविले॥ १२॥ ते वृत्तिरूप मोहिनी पालटली तत्क्षणीं। ठेली नारायण होउनी। पहिलेपणीं उठेना॥ १३॥ ते क्षीरसागरीं नारायण। समाधि शेषशयनीं आपण। सुखें सुखावला जाण। अद्यापि शयन केलें असे॥ १४॥ ऐसा सद्गुरुचित्सागरु। ज्याचा वेदांसी न कळे पारू। नारायणादि नानावतारू। ज्याचेन साचारू उपजती॥ १५॥ ज्याचीं चिद्रत्नें गोमटीं। हरिहरांचें कंठीं मुकुटीं। बाणलीं शोभती वेदपाठीं। कवि वरिष्ठीं वानिलीं॥ १६॥ ऐशिया जी अतिगंभीरा। जनार्दना सुखसागरा। अनंतरूपा अपारा। तुझ्या परपारा कोण जाणे॥ १७॥ विवेकें न देखवे दिठीं। वेदां न बोलवे गोठी। तेथ हे माझी मराठी। कोणे परिपाटी सरेल॥ १८॥ हो कां राजचक्रवर्तीचे माथां। कोणासी न बैसवे सर्वथा। तेथ माशी जाऊनि बैसतां। दुर्गमता तंव नाहीं॥ १९॥ कां राजपत्नीचे स्तन। देखावया शके कोण। परी निजपुत्र तेथें जाण। बळें स्तनपान करीतसे॥ २०॥ तेवीं माझी हे मराठी। जनार्दनकृपापरिपाटीं। नि:शब्दाच्या सांगेगोठी। चिन्मात्रीं मिठी घालूनी॥ २१॥ असो आकाश घटा सबाह्य आंतू। तेवीं शब्दामाजीं नि:शब्दवस्तू। रिता बोल रिघावया प्रांतू। उरला प्रस्तुतू दिसेना॥ २२॥ बाळक बोलों नेणे तत्त्वतां। त्यासी बोलिकें बोलवी पिता। तैसीच हेही जाणावी कथा। वाचेचा वक्ता जनार्दन॥ २३॥ त्या जनार्दनाचे कृपादृष्टीं। भागवत सांगों मराठिये गोष्टी। जें कां आलोडितां ग्रंथकोटी। अर्थी दृष्टी पडेना॥ २४॥ तेंचि श्रीमहाभागवत। जनार्दनकृपें येथ। देशभाषा हंसगीत। ज्ञान सुनिश्चित सांगीतलें॥ २५॥ सद्भावें करितां माझी भक्ती। तेणें ज्ञानखड्गाची होय प्राप्ती। छेदोनि संसारआसक्ती। सायुज्यमुक्ती मद्भक्तां॥ २६॥ माझेनि भजनें मोक्ष पावे। ऐसें बोलिलें जें देवें। तें आइकोनियां उद्धवें। विचारू जीवें आदरिला॥ २७॥ देवो सांगे भजनेंचि मुक्ती। आणि ज्ञात्यांची व्युत्पत्ती। आणिकें साधनें मोक्षाप्रती। सांगताती आनआनें॥ २८॥ एवं या दोहीं पक्षीं जाण। मोक्षीं श्रेष्ठ साधन कोण। तेचि आशंकेचा प्रश्न। उद्धवें आपण मांडिला॥ २९॥
उद्धव उवाच
वदन्ति कृष्ण श्रेयांसि बहूनि ब्रह्मवादिन:।
तेषां विकल्पप्राधान्यमुताहो एकमुख्यता॥ १॥
उद्धव म्हणे गा श्रीपती। मोक्षमार्गीं साधनें किती। वेदवादियांची व्युत्पत्ती। बहुत सांगती साधनें॥ ३०॥ तीं अवघींच समान। कीं एक गौण एक प्रधान। देवें सांगीतलें आपण। भक्तीचि कारण मुक्तीसी॥ ३१॥
भवतोदाहृत: स्वामिन् भक्तियोगोऽनपेक्षित:।
निरस्य सर्वत: सङ्गं येन त्वय्याविशेन्मन:॥ २॥
आणिकां साधनां नापेक्षिती। सर्व संगांतें निरसिती। मोक्षमार्गीं मुख्य भक्ती। जिणें स्वरूपप्राप्ती तत्काळ॥ ३२॥ माझ्या स्वरूपीं ठेवूनि मन। फळाशेवीण माझें भजन। हेंचि मोक्षाचें मुख्य साधन। देवें आपण बोलिलें॥ ३३॥ स्वामी बोलिले मुख्य भक्ती। इतर जे साधनें सांगती। त्यांसी प्राप्तीची अस्तिनास्ति। देवें मजप्रती सांगावी॥ ३४॥ याचि प्रश्नाची प्रश्नस्थिती। विवंचीतसे श्रीपती। त्रिगुण ज्ञात्याची प्रकृती। साधनें मानिती यथारुचि॥ ३५॥ ज्याची आसक्ती जिये गुणीं। तो तेंचि साधन सत्य मानी। यापरी ज्ञानाभिमानी। नाना साधनीं जल्पती॥ ३६॥ परंपरा बहुकाळें। ज्ञात्याचें ज्ञान झालें मैळें। तें सत्य मानिती तुच्छ फळें। ऐक प्रांजळें उद्धवा॥ ३७॥ चौदाव्यामाजीं निरूपणस्थिती। इतुकें सांगेल श्रीपती। साधनांमाजीं मुख्य भक्ती। ध्यानयोगस्थिती समाधियुक्त॥ ३८॥ इतरसाधनांचें निराकरण। तुच्छफलत्वें तेंही जाण। सात श्लोकीं श्रीकृष्ण। स्वमुखें आपण सांगतू॥ ३९॥
श्रीभगवानुवाच
कालेन नष्टा प्रलये वाणीयं वेदसंज्ञिता।
मयाऽऽदौ ब्रह्मणे प्रोक्ता धर्मो यस्यां मदात्मक:॥ ३॥
माझी वेदवाणी प्रांजळी। ज्ञानप्रकाशें अतिसोज्ज्वळी। ते नाशिली प्रळयकाळीं। सत्यलोकहोळी जेव्हां झाली॥ ४०॥ ब्रह्मयाचा प्रळयो होतां। वेदवाणीचा वक्ता। कोणी नुरेचि तत्त्वतां। यालागीं सर्वथा बुडाली॥ ४१॥ तेचि वेदवाणी कल्पादीसी। म्यांचि प्रकाशिली ब्रह्मयासी। जिच्या ठायीं मद्भक्तीसी। यथार्थेंसी बोलिलों॥ ४२॥ जे वाचेचें अनुसंधान। माझे स्वरूपीं समाधान। ऐसें माझें निजज्ञान। ब्रह्मयासी म्यां जाण सांगीतलें॥ ४३॥
तेन प्रोक्ता च पुत्राय मनवे पूर्वजाय सा।
ततो भृग्वादयोऽगृह्णन् सप्त ब्रह्ममहर्षय:॥ ४॥
तो सकळ वेद विवंचूनू। ब्रह्मेनि उपदेशिला मनू। सप्त ब्रह्मर्षी त्यापासूनू। वेद संपूर्णू पावले॥ ४४॥ ब्रह्मेनि दक्षादि प्रजापती। उपदेशिले त्याचि स्थिती। यापासून नेणों किती। ज्ञानसंपत्ती पावले॥ ४५॥ सप्तऋषींची जे मातू। भृगु मरीचि अत्रि विख्यातू। अंगिरा पुलस्त्य पुलह क्रतू। जाण निश्चितू ऋषिभागू॥ ४६॥
तेभ्य: पितृभ्यस्तत्पुत्रा देवदानवगुह्यका:।
मनुष्या: सिद्धगन्धर्वा: सविद्याधरचारणा:॥ ५॥
किंदेवा: किन्नरा नागा रक्ष:किम्पुरुषादय:।
बह्वॺस्तेषां प्रकृतयो रज:सत्त्वतमोभुव:॥ ६॥
तिंहीं ऋषीश्वरीं पुत्रपौत्र। उपदेशिले नर किन्नर। देव दानव अपार सिद्ध विद्याधरचारण॥ ४७॥ गुह्यक गंधर्व राक्षस। किंदेव आणि किंपुरुष। नागसर्पादि तामस। परंपरा उपदेश पावले॥ ४८॥ मुखाकृती दिसती नर। शरीरें केवळ वनचर। ऐसे जे कां रीस थोर। त्यांसी किन्नर बोलि जे॥ ४९॥ मुखाभासें दिसती पुरुष। शरीर पाहतां श्वापदवेष। ऐसे जे वानर रामदास। त्यांसी किंपुरुष बोलिजे॥ ५०॥ स्वेददुर्गंधिकल्मषरहित। शरीरें अतिभव्य भासत। मनुष्यदेवांऐसे दिसत। ते बोलिजेत किंदेव॥ ५१॥ यापरींच्या बहुधा व्यक्ती। रजतमादि सत्त्वप्रकृती। उपदेशपरंपरा प्राप्ति ज्ञान बोलती यथारुचि॥ ५२॥
याभिर्भूतानि भिद्यन्ते भूतानां मतयस्तथा।
यथाप्रकृति सर्वेषां चित्रा वाच: स्रवन्ति हि॥ ७॥
जैशी प्रकृति तैशी भावना। जैसा गुण तशी वासना। जे वासनेस्तव जाणा। भूतीं विषमपणा आणी भेदु॥ ५३॥ देवमनुष्यतिर्यगता। हे वासनेची विषमता। येवढा भेद करी भूतां। अनेकता यथारुचि॥ ५४॥ ज्यांची जैशी प्रकृती। ते तैसा वेदार्थू मानिती। तेंचि शिष्यांसी सांगती। परंपरास्थिती उपदेशू॥ ५५॥ विचित्र वेदार्थ मानणे। विचित्र संगती साधनें। विचित्र उपदेश करणें। प्रकृतिगुणें मतवाद॥ ५६॥
एवं प्रकृतिवैचित्र्याद्भिद्यन्ते मतयो नृणाम्।
पारम्पर्येण केषाञ्चित्पाखण्डमतयोऽपरे॥ ८॥
यापरी गा निजप्रकृती। वाढली जाण नाना मतीं। तो मतवाद ठसावला चित्तीं। यथानिगुतीं सत्यत्वें॥ ५७॥ मिथ्या स्वप्न जेवीं निद्रिता। सत्य मानलेंसे सर्वथा। तेवीं नानामतवादकथा। सत्य तत्त्वतां मानिती॥ ५८॥ हे वेदपढियंत्यांची कथा। ज्यांसी वेदीं नाहीं अधिकारता। त्यांसी उपदेशपरंपरता। नानामतता सत्य माने॥ ५९॥ एकाची वेदबाह्य व्युत्पत्ती। ते आपुलालिये स्वमतीं। पाषंडाते प्रतिष्ठिती। तेंच उपदेशिती शिष्यातें॥ ६०॥
मन्मायामोहितधिय: पुरुषा: पुरुषर्षभ।
श्रेयो वदन्त्यनेकान्तं यथाकर्म यथारुचि॥ ९॥
नाना वासनागुणानुवृत्ती। नाना परींच्या पुरुषप्रकृती। यांसी माझी माया मूळकर्ती। जाण निश्चितीं उद्धवा॥ ६१॥ माझिया मायें मोहिले वरिष्ठ। जन केले विवेकनष्ट। भुलवूनियां मोक्षाची वाट। विषयनिष्ठ विवेकू॥ ६२॥ ऐक उद्धवा पुरुषश्रेष्ठा। यापरी भ्रंशली जनांची निष्ठा। चुकोनि मोक्षाचा दारवंटा। साधन कचाटा जल्पती॥ ६३॥ त्या नाना साधनांच्या युक्ती। ज्या मतवादें प्रतिपादिती। त्याही दीड श्लोकीं श्रीपती। उद्धवाप्रती सांगत॥ ६४॥
धर्ममेके यशश्चान्ये कामं सत्यं दमं शमम्।
अन्ये वदन्ति स्वार्थं वा ऐश्वर्यं त्यागभोजनम्।
केचिद्यज्ञतपोदानं व्रतानि नियमान्यमान्॥ १०॥
मीमांसकाचें मत येथ। काम्य निषिद्धरहित। कर्मचि साधन मानित। मोक्ष येणें प्राप्त म्हणताती॥ ६५॥ काव्य नाटक अळंकार करिती। ते कवित्वचि साधन मानिती। कविताप्रबंधव्युत्पत्ती। मोक्ष मानिती तेणें यशें॥ ६६॥ कवीश्वरांचें मत ऐसें। आपुले कवित्वाचेनि यशें। मोक्ष लाहों अनायासें। हें कवितापिसें कवीश्वरां॥ ६७॥ वात्स्यायनकोकशास्त्रमत। त्यांचा अभिप्रायो विपरीत। कामसुखें मोक्ष मानित। काम सतत सेवावा॥ ६८॥ सांख्य-योगांची वदंती। सत्य-शम-दमादि संपत्ती। हेंचि साधन मोक्षाप्रती। नेम निश्चितीं तिंहीं केला॥ ६९॥ नीतिशास्त्रकारांचें मत। सार्वभौम राज्य प्राप्त। त्यातेंचि मोक्ष मानित। सामदानादि तेथ साधन॥ ७०॥ एकांचा मतविभाग। शिखासूत्रमात्रत्याग। त्याचें नांव मोक्षमार्ग। परम श्लाघ्य मानिती॥ ७१॥ देहात्मवाद्यांचा योग। स्वेच्छा भोगावे यथेष्ट भोग। कैंचा नरक कैंचा स्वर्ग। मेल्या मग कोण जन्मे॥ ७२॥ अश्वमेध राजसूययाग। हाचि एकांचा मोक्षमार्ग। एकां मूर्तिउपासना सांग। पूजाविभाग तें साधन॥ ७३॥ एकाचें मत साक्षेप। कडकडाटेंसी खटाटोप। शरीरशोषणादि जें तप। तो मार्ग समीप मोक्षाचा॥ ७४॥ एक म्हणती श्रेष्ठ साधन। मोक्षमार्गीं केवळ दान। दीक्षित म्हणती व्रतग्रहण। हेंचि साधन मोक्षाचें॥ ७५॥ एकांच्या मताचा अनुक्रम। अवश्य करावे व्रत नियम। एवं मतानुसारें उपक्रम। नानासाधनसंभ्रम बोलती॥ ७६॥ या साधनांची पाहतां स्थिती। आद्यंतवंत निश्चितीं। तेंचि पैं उद्धवाप्रती। कृष्ण कृपामूर्ती सांगत॥ ७७॥
आद्यन्तवन्त एवैषां लोका: कर्मविनिर्मिता:।
दु:खोदर्कास्तमोनिष्ठा: क्षुद्रानन्दा: शुचार्पिता:॥ ११॥
सांडूनि फळाशा देहाभिमान। मज नार्पिती जे साधन। त्यांचें फळ दु:खरूप जाण। जन्ममरणदायक॥ ७८॥ तिंहीं साधनीं साधिले लोक। ते अंतवंत नश्वर देख। ते लोकींचें जें सुख। साखरेंसीं विख रांधिलें॥ ७९॥ त्याचे जिव्हाग्रीं गोडपण। परिपाकीं अचूक मरण। तैसा तो क्षुद्रानंद जाण। शोकासी कारण समूळ॥ ८०॥ निजकर्में मलिन लोक। त्यांच्या ठायीं कैंचें सुख। उत्तरोत्तर वाढते दु:ख। अंधतमदायक परिपाकू॥ ८१॥ भोगासक्त जें झालें मन। त्यासी अखंड विषयांचेंध्यान। विषयाध्यासें तमोगुण। अध:पतनदायक॥ ८२॥ इंहींच साधनीं माझी भक्ती। जो कोणी करील परमप्रीतीं। ते भक्तीची मुख्यत्वें स्थिती। स्वयें श्रीपती सांगत॥ ८३॥
मय्यर्पितात्मन: सभ्य निरपेक्षस्य सर्वत:।
मयाऽऽत्मना सुखं यत्तत्कुत: स्याद्विषयात्मनाम्॥ १२॥
भक्ती निजसुखाची मातू। सांगावया उद्धवासी संबोधितू। भक्तिसुखालागीं भाग्यवंतू। तूंचि निश्चितू उद्धवा॥ ८४॥ भक्तिसुखाचें भाग्य यासी। म्हणोनि सभ्य म्हणणें त्यासी। ऐसें पुरस्कारोनि उद्धवासी। भक्तिसुखासी देवो सांगे॥ ८५॥ पावावया माझी स्वरूपप्राप्ती। इहलोकींची भोगासक्ती। नि:शेष नातळे चित्तवृत्ती। जेवीं निजपती रजस्वला॥ ८६॥ साधूनि माझिया अनुसंधाना। परलोक नातळे वासना। धिक्कारी पैं ब्रह्मसदना। इतर गणना कोण पुसे॥ ८७॥ ऐशिया गा निरपेक्षता। माझेनि भजनें सप्रेमता। तेथ मी जाण स्वभावतां। प्रकटें तत्त्वतां निजरूपें॥ ८८॥ मी प्रकटलों हें ऐसें। बोलणें तें आहाच दिसे। सदा मी हृदयींचि वसें। प्रकटलों दिसें निर्विकल्पें॥ ८९॥ आभाळ गेलिया सविता। सहजेंचि दिसे आंतौता। तेवीं गेलिया विषयावस्था। मी स्वभावतां प्रकटचि॥ ९०॥ एवं भक्ताचिया भावार्था। भावबळें मज प्रकटतां। तेव्हां भक्ताचिया चित्ता। विषयवार्तास्फुरेना॥ ९१॥ सांडूनि विषयावस्था। मद्रूपीं लागल्या चित्ता। भक्तासी होय मद्रूपता। स्वभावतां निजबोधें॥ ९२॥ लोह एकांगें स्पर्शमणी। लागतां सर्वांग होय सुवर्णी। तेवीं मद्भक्त माझ्या ध्यानीं। चिद्रूपपणीं सर्वांग॥ ९३॥ ते काळीं सहजसुख। भक्तांसी जें होय देख। त्यासी तुकावया तुक। कैंचें आणिक कांटाळें॥ ९४॥ ज्या निजसुखाकारणें। सदाशिवू सेवी श्मशानें। ब्रह्मा तें सुख काय जाणे। त्याकारणें म्यां उपदेशिलें॥ ९५॥ भक्तीं भोगितां माझें सुख। विसरले देहादि जन्मदु:ख। विसरले ते तहानभूक। निजात्मसुख कोंदलें॥ ९६॥ ऐशिया निजसुखाची गोडी। विषयी काय जाणती बापुडीं। वेंचितां लक्षालक्षकोडीं। त्या सुखाचा कवडी लाभेना॥ ९७॥ धन धान्य पुत्र स्वजन। सर्वस्व वेंचितांही जाण। त्या सुखाचा रज:कण। विषयी जन न लभती॥ ९८॥ हो कां सत्यलोकनिवासी। तेही न पावती त्या सुखासी। इतरांची कथा कायसी। मुख्य प्रजापतीसी हें सुख कैंचें॥ ९९॥ मज निजात्म्याचे सुखप्राप्ती। सकळ इंद्रियें सुखरूप होती। त्या सुखाची सुखस्थिती। लोकांतरप्राप्ती कोटॺंशें न तुके॥ १००॥ निष्काम निर्लोभ निर्दंभ भजन। निर्मत्सर निरभिमान। ऐशिया मद्भक्तांसी जाण। माझें सुख संपूर्ण मी देतों॥ १॥ जे कां देशत: कालता। अनवच्छिन्नगा वस्तुतां। ऐशिया निजसुखाचे माथां। माझिया निजभक्तां रहिवासू॥ २॥
अकिञ्चनस्य दान्तस्य शान्तस्य समचेतस:।
मया सन्तुष्टमनस: सर्वा: सुखमया दिश:॥ १३॥
ऐक अकिंचनाची गोठी। नाहीं मठ मठिका पर्णकुटी। पांचापालवीं मोकळ्ॺा गांठी। त्यांसी ये भेटी निजसुख माझें॥ ३॥ जो दमनशीळ जगजेठी। अकरांचीही नळी निमटी। तो निजसुखाचे साम्राज्यपटीं। बैसे उठाउठीं तत्काळ॥ ४॥ देखतां नानाभूत विषमता। ज्यासी साचार दिसे समता। तो माझिया निजसुखाचे माथां। क्रीडे सर्वार्थता समसाम्यें॥ ५॥ सर्पत्वचा जेवीं पांपरीं। माथां हालविल्या फडा न करी। तेवीं धनदारागृहपुत्रीं। छळितां ज्या भीतरीं क्रोध नुमसे॥ ६॥ कामक्रोध मावळले देहीं। साचार शांति ज्याच्याठायीं। माझें निजसुख त्याच्या पायीं। लोळत पाहीं सर्वदा॥ ७॥ तो जरी तें सुख नेघे। तरी तें सुख तया पुढेंमागें। जडोनि ठेलें जी सर्वांगें। सांडितां वेगें सांडेना॥ ८॥ तो जेउती वास पाहे। तें दिग्मंडळ सुखाचें होये। तो जेथ कां उभा राहे। तेथ मुसावलें राहे महासुख॥ ९॥ त्याचें पाऊल जेथे पडे। तेथें निजसुखाची खाणी उघडे। तो प्रसंगें पाहे जयाकडे। तेथें स्वानंदें वाढे परमानंद॥ ११०॥ तो ज्यासी भेटे अदृष्टें। त्यास सुखाची पहांट फुटे। त्याचा पावो लागलिया अवचटें। सुखाचें गोमटें निजसुख लाभे॥ ११॥ ज्याचे श्वासोच्छ्वासांचा परिचार। कीं निमेषोन्मेषांचे व्यापार। माझेनि निजसुखें साचार। तेथेंचि घर बांधलें॥ १२॥ तो सकळ सुखांचा मंडपू। कीं निजसुखाचा कंदर्पू। तो सर्वांगें सुखस्वरूपू। सबाह्य सुखरूपू समसुखत्वें॥ १३॥ त्याचे सुखाची परिपूर्णता। पुढिले श्लोकें तत्त्वतां। स्वयें देवोचि झाला सांगता। सुखसंपन्नता भक्ताची॥ १४॥
न पारमेष्ठॺं न महेन्द्रधिष्ण्यं न
सार्वभौमं न रसाधिपत्यम्।
न योगसिद्धीरपुनर्भवं वा
मय्यर्पितात्मेच्छति मद्विनान्यत्॥ १४॥
माझे ठायीं अर्पितचित्त। ऐसे माझे निजभक्त। माझेनि सुखें सुखी सतत। ते अनासक्तसर्वार्थीं॥ १५॥ माझ्याठायीं नित्यभक्ती। आणि लोकलोकांतरआसक्ती। ते भक्ति नव्हे कामासक्ती। जाण निश्चितीं उद्धवा॥ १६॥ सकळ द्वीपांसमवेत। सार्वभौम वलयांकित। येऊनियां होतां प्राप्त। माझे निजभक्त थुंकिती॥ १७॥ विष्ठेमाजील सगळे चणे। ते सूकरासी गोडपणें। त्यांतें कांटाळती शहाणे। तेवीं मद्भक्तीं सांडणें सार्वभौमता॥ १८॥ रसातळादि समस्त। पाताळीं भोग अमृतयुक्त। ते प्राप्त होतां माझे भक्त। लाता हाणत अनिच्छा॥ १९॥ खात्या सांडूनि अमृतफळा। शाहाणा न घे पेंडीचा गोळा। तेवीं सांडूनि सुखसोहळा। भक्त रसातळा न वचती॥ १२०॥ सुर नर पन्नग वंदिती। येणें महत्त्वें आलिया अमरावती। जेवीं कां कस्तूरीपुढें माती। तेवीं उपेक्षिती मद्भक्त॥ २१॥ जें इंद्रादिकां वंद्य स्थान। उत्तमोत्तम ब्रह्मसदन। तें तुच्छ करिती भक्तजन। जे सुखसंपन्न मद्भावें॥ २२॥ ताक दूध पाहतां दिठीं। सारिखेंपणें होतसे भेटी। सज्ञान दूध लाविती ओंठीं। त्यागिती वाटी ताकाची॥ २३॥ तेवीं सत्यलोक आणि भक्तिसुख। समान मानिती केवळ मूर्ख। मद्भावें माझे भक्त जे चोख। ते सत्यलोक धिक्कारिती॥ २४॥ इंद्रपद ब्रह्मसदन। पाताळभोग अमृतपान। एके काळेंद्यावया जाण। सर्वसिद्धी आपण आलिया॥ २५॥ ज्या साधावया महासिद्धी। योगी शिणताती नाना विधी। त्या प्रकटल्या त्रिशुद्धी। भक्त सद्बुद्धी नातळती॥ २६॥ त्या अणिमादि सिद्धींच्यामाथां। मद्भक्तीं हाणोनि लाता। लागले माझ्या भक्तिपंथा। जाण तत्त्वतां उद्धवा॥ २७॥ या सिद्धींची कायसी कथा। सलोकता समीपता। माझी देतां स्वरूपता। भक्त सर्वथा न घेती॥ २८॥ जेथ न रिघेचि काळसत्ता। नाहीं जन्ममरणवार्ता। ऐशी देतां माझी सायुज्यता। भक्त सर्वथा न घेती॥ २९॥ आधीं असावें वेगळेपणें। मग सायुज्यें एक होणें। हें मूळचें अबद्ध बोलणें। सायुज्य न घेणें मद्भक्तीं॥ १३०॥ भक्तिसुखें सुखावली स्थिती। यालागीं आवडे माझी भक्ती। पायां लागती चारी मुक्ती। भक्त न घेती मजवीण॥ ३१॥ एक मजवांचूनि कांहीं। भक्तांसी आणिक प्रिय नाहीं। माझेनि भजनसुखें पाहीं। लोकीं तिहीं न समाती॥ ३२॥ आदिकरूनि चारी मुक्ती। मजवेगळी जे सुखप्राप्ती। भक्त सर्वथा न घेती। माझ्या अभेदभक्ती लोधले॥ ३३॥ मजवेगळें जें जें सुख। तुच्छ करूनि सांडिती देख। माझ्या भजनाचा परम हरिख। अलोलिक मद्भक्तां॥ ३४॥ म्हणाल भक्त केवळ वेडीं। तुझ्या भजनीं धरिती गोडी। परी तुज तयांची आवडी। नसेल गाढी अतिप्रीती॥ ३५॥ जेवीं गोचिडां आवडे म्हशी। परी गोचीड नावडे तिसी। तेवीं भक्तांची प्रीती तुजसरिसी। तुज त्यांची प्रीति नसेल॥ ३६॥ भज्य भजन भजता। हे त्रिपुटी आविद्यकता। अविद्यायुक्त भजनपंथा। नसेल सर्वथा तुज प्रीती॥ ३७॥ जेवीं कां स्वप्नींचे आंवतणें। जागत्यासी नाहीं जेवूं जाणें। तेवीं अविद्यायुक्त मिथ्याभजनें। त्वांप्रीती करणें हें घडेना॥ ३८॥ ऐसा आशंकेचा अभिप्रावो। तेचि अर्थीं सांगताहे देवो। भजनींभक्तांचा शुद्ध भावो। तेथ मजही पहा हो अतिप्रीती॥ ३९॥ जो जैसा मजकारणें। मी तैसाचि त्याकारणें। भक्त अनन्य मजकारणें। मीही त्यांकारणें अनन्य॥ १४०॥
न तथा मे प्रियतम आत्मयोनिर्न शङ्कर:।
न च सङ्कर्षणो न श्रीर्नैवात्मा च यथा भवान्॥ १५॥
माझ्या भक्तांची मज प्रीती। ते मीचि जाणें श्रीपती। ते उपमेलागीं त्रिजगतीं। नाही निश्चितीं कांटाळें॥ ४१॥ जो अनन्य झाला माझे भक्ती। तेव्हांचि त्याची अविद्यानिवृत्ती। ऐशिया भक्तांची जे मज प्रीती। ते सांगूं मी किती उद्धवा॥ ४२॥ ब्रह्मा माझे पोटींचें बाळ। त्याचे लळे मी पुरवीं सकळ। परी भक्तांच्या ऐसा प्रबळ। प्रीतिकल्लोळ तेथ नाहीं॥ ४३॥ म्यां ब्रह्मा लाविला कर्मपंथा। भक्तांसी दिधली निष्कर्मता। यालागीं न वचें मी ब्रह्मा प्रार्थितां। होय भात खाता गोवळ्ॺांचा॥ ४४॥ उणें आणूनि ब्रह्मयासी। मी तों झालों वत्सें वत्सपांसी। एवं निजभक्तांच्या ऐसी। प्रीती ब्रह्मयासी मज नाहीं॥ ४५॥ असो ब्रह्मयाची ऐशी कथा। संकर्षण माझा ज्येष्ठ भ्राता। परी भक्तांच्या ऐशी सर्वथा। नसे प्रीती तत्त्वतां तयासी॥ ४६॥ कौरवांच्या पक्षपातासी। उणें आणोनि बळिभद्रासी। म्यां वांचविलें निजभक्तांसीं। पांडवांसी निजांगें॥ ४७॥ तुजदेखतां भीष्माच्या पणीं। म्यां हारी घेऊनि रणांगणीं। वांचविला कोदंडपाणी। भक्तचूडामणी अर्जुन॥ ४८॥ रमा माझ्यापट्टाची राणी। ते म्यां सेवेसी लाविली चरणीं। खांदीं वाहिल्या गौळणी। भक्तशिरोमणी गोपिका॥ ४९॥ जे लक्ष्मी नि:शेष उपेक्षिती। ते मज पूज्य परम प्रीतीं। जे मज लक्ष्मी मागती। त्यांसी श्री ना श्रीपती ऐसें होय॥ १५०॥ लक्ष्मी उपेक्षूनि निश्चितीं। मज निजभक्त आवडती। मज पढियंता उमापती। त्याहून अतिप्रीती भक्तांची॥ ५१॥ ज्या महादेवाचेनि गुणें। म्यांही श्यामवर्णधरणें। ज्या महादेवाचेनि वचनें। म्यां मोहिनी होणें दुसरेनी॥ ५२॥ ते मोहिनीच्या दर्शनीं। म्यां शिव भुलविला तत्क्षणीं। रुक्मांगद मोहिनीपासूनी। अर्धक्षणीं तारिला॥ ५३॥ यापरी माझ्या भक्तांहुनी। मज प्रिय नव्हे शूलपाणी। मज पढियंता त्रिभुवनीं। भक्तावांचुनी आन नाहीं॥ ५४॥ आगमनिगमीं प्रतिपाद्य। माझी चतुर्भुजमूर्ति शुद्ध। ते निजहृदयीं मी परमानंद। भक्तनिजपद वाहतसें॥ ५५॥ मज निजदेहाची नाहीं गोडी। गोवळ झालों अतिआवडीं। गायी राखें अरडीदरडी। कीं थापटीं घोडीं भक्तांचीं॥ ५६॥ मी अवाप्तसकळकाम। परी प्रेमळांलागीं सदा सकाम। देखतां प्रेमळांचा भाव परम। मी आत्माराम उडी घालीं॥ ५७॥ प्रेमळ देखतांचि दिठीं। मी घे आपुलिये संवसाटीं। नव्हतां वरीव दें सुखकोटी। न ये तरी उठाउठी सेवक होय॥ ५८॥ सांडूनि महत्त्वपरवडी। मी निजभक्तांचीं उच्छिष्टें काढीं। भक्तकाजाचे सांकडीं। करीं कुरंवडी देहाची॥ ५९॥ उपेक्षूनि निजदेहासी। उद्धवा तुजसारिखिया भक्तांसी। मज आवडती ते अहर्निशीं। जीवें सर्वस्वेंसी पढियंते॥ १६०॥ आवडी करितां माझें भजन। मज पूज्य झाले भक्तजन। त्या भक्तांचें निजलक्षण। स्वयें श्रीकृष्ण सांगत॥ ६१॥
निरपेक्षं मुनिं शान्तं निर्वैरं समदर्शनम्।
अनुव्रजाम्यहं नित्यं पूयेयेत्यङ्घ्रिरेणुभि:॥ १६॥
अनन्य करितां माझें भजन। माझ्या स्वरूपीं झगडलें मन। सकळ वासना गेल्या विरोन। वृत्तिशून्य अवस्था॥ ६२॥ आटाटीवीण न प्रार्थितां। अयाचित अर्थ प्राप्त होतां। तोही हातीं घेवों जातां। निरपेक्षता बुडाली॥ ६३॥ अर्थ देखोनि जो लविन्नला। तो जाण लोभें वोणवा केला। तोही उपेक्षूनि जो निघाला। तो म्यां वंदिला सर्वस्वें॥ ६४॥ मार्गीं अर्थ पडतां। कोणी नाहीं माझा म्हणतां। तोही स्वयें हातीं घेतां। निरपेक्षता बुडाली॥ ६५॥ वृत्तिशून्य जे अवस्था। ती नांव जाण निरपेक्षता। ते काळींची जे मननता। ऐक तत्त्वतां सांगेन॥ ६६॥ वेदशास्त्रार्थें परम प्रमाण। ते माझें सत्य स्वरूप जाण। ते स्वरूपीं निजनिर्धारण। त्या नांव मनन बोलिजे॥ ६७॥ करितां स्वरूपविवेचन। स्वरूपरूप झालें मन। तेथें धारणेवीण मनन। न करितां स्मरण होतसे॥ ६८॥ या नांव मननावस्था। सत्यजाण पां सर्वथा। याहीवरी शांतीची जे कथा। ऐक तत्त्वतां सांगेन॥ ६९॥ काम क्रोध सलोभता। समूळ मूळेंसी न वचतां। देहीं आली जे निश्चळता। ते न सरे सर्वथा येथ शांती॥ १७०॥ मत्स्यधरूनियां मनीं। बक निश्चळ राहिला ध्यानीं। ते शांति कोण मानी। अंत:करणीं सकाम॥ ७१॥ देहीं स्फुरेना देहअहंता। विराली कामक्रोधसलोभता। हे शांति बाणे भाग्यवंता। मुख्य शांतता या नांव॥ ७२॥ उद्धवा जाण पां निश्चितीं। मजही मानली हेचि शांति। याहीवरी जे समतेची स्थिती। ऐक तुजप्रती सांगेन॥ ७३॥ विचित्र भूतें विचित्र नाम। विचित्राकारें जग विषम। तेथें देखे सर्वींसर्व सम। परब्रह्म समत्वें॥ ७४॥ फाडाफाडीं न शिणतां। तडातोडी न करितां। माझेनि भजनें मद्भक्तां। सर्वसमता मद्भावें॥ ७५॥ मद्भावें समता आल्या हाता। खुंटली भूतभेदाची वार्ता। भेदशून्य स्वभावतां। निर्वैरता सहजेंचि॥ ७६॥ जंववरी द्वैताचें भान। तंववरी विरोधाचें कारण। अवघा एकचि आपण। तेथ वैरी कोण कोणाचा॥ ७७॥ गगन गगनासी कैं भांडे। कीं चंद्रा चंद्रेंसीं झुंझ मांडे। कीं वायूचेनि वायु कोंडे। कीं जिव्हेचीं दुखंडें जिव्हा करी॥ ७८॥ जें भेदाचें निराकरण। तेंचि निर्वैरतेचें लक्षण। उद्धवा सत्य जाण। निर्वैरपण या नांव॥ ७९॥ निरपेक्षता आणि माझें मनन। शांति आणि समदर्शन। पांचवें तें निर्वैर जाण। पंचलक्षण हें मुख्यत्वें॥ १८०॥ असो पंचलक्षणकथा। एक निरपेक्षता आल्या हाता। पायां लागे सायुज्यता। पूर्णब्रह्मता ठसावे॥ ८१॥ निरपेक्षाचें निश्चळ मन। निरपेक्ष तो निर्वैर जाण। निरपेक्ष तो शांत संपूर्ण। निरपेक्षाची जाण सेवा मी करीं॥ ८२॥ कडेकपाटीं न रिघतां जाण। न सोशितां अतिसाधन। हें हाता आल्या पंचलक्षण। विश्वउद्धरण त्याचेनी॥ ८३॥ ऐशिया भक्तांचें दर्शन। झाल्या तरती हें नवल कोण। त्यांचें करितां नामस्मरण। उद्धरण जडजीवां॥ ८४॥ हें पंचलक्षण आल्या हाता। मजहोनि अधिक पवित्रता। जोडली माझ्या निजभक्तां। मीही वंदीं माथां चरणरेणु॥ ८५॥ समुद्रोदक मेघीं चढे। त्यासी मधुरता अधिक वाढे। जग निववी वाडेंकोडें। फेडी सांकडें दुकाळाचें॥ ८६॥ तेंचि उदक समुद्रीं असतां। उपयोगा नये गा सर्वथा। तेवीं माझेनि भजनें मद्भक्तां। झाली पवित्रता मजहुनी॥ ८७॥ केळी चाखतां चवी नातुडे। तिचींच केळें अतिगोडें। तेवीं मजहूनि माझ्या भक्तांकडे। पवित्रता वाढे अनिवार॥ ८८॥ माझ्या ठायीं जें पवित्रपण। तें भक्तांचेनि मज जाण। यालागीं भक्तांमागें मी आपण। धांवें चरणरेणू वंदावया॥ ८९॥ भक्तचरणरेणु वंदितां। मज केवढी आली पवित्रता। माझें पायवणी वाहे माथां। जाण तत्त्वतां सदाशिवू॥ १९०॥ एवं माझ्या भक्तांचें जें सुख। सुखपणें अलोलिक। तें सुख नेणती आणिक। तें बोलावया मुख सरेना॥ ९१॥
निष्किञ्चना मय्यनुरक्तचेतस:
शान्ता महान्तोऽखिलजीववत्सला:।
कामैरनालब्धधियो जुषन्ति यत्
तन्नैरपेक्ष्यं न विदु: सुखं मम॥ १७॥
मीवांचूनि ज्यांचे गांठी। नाहीं फुटकी कांचवटी। मजवांचोनि सगळे सृष्टीं। आणिकांतें दृष्टीं न देखती॥ ९२॥ ऐसें करितां माझें भजन। जाति कुळ देहाभिमान। सहजें जाय निरसोन। अकिंचन या नांव॥ ९३॥ याहीवरी प्रेमयुक्त। माझ्या स्वरूपीं रंगलें चित्त। अतएव निजशांती तेथ। असे नांदत निजरूपें॥ ९४॥ ऐशिया गा निजशांती। परिपाकातें पावली भक्ती। तें मीवांचूनि सर्वभूतीं। दुजीस्थिती जाणेना॥ ९५॥ जो जो जीवू जेथें देखे। तो तो मद्रूपें वोळखे। ते वोळखीचेनि हरिखें। प्रीति यथासुखें अनन्य करी॥ ९६॥ ऐशिया मद्रूपस्थिती। जीवमात्रीं अनन्य प्रीती। एवं मद्भावें माझी भक्ती। महंतस्थिती या नांव॥ ९७॥ ऐसा मद्भावनायुक्त। सर्वीं सर्वत्र माझा भक्त। तेथ कामादिदोष समस्त। अस्तमाना जात ते काळीं॥ ९८॥ सविता येतां प्राचीजवळी। मावळे नक्षत्रमंडळी। तेवीं भक्तीच्या प्रबोधकाळीं। झाली होळी कामादिकां॥ ९९॥ झालिया कामाची निवृत्ती। सहजेंचि निर्विषयस्थिती। तेथें माझ्या सुखाची सुखप्राप्ती। सुखें सुख भोगिती सुखरूप॥ २००॥ देशें काळें वेदानुवादा। ज्या सुखाची न करवे मर्यादा। त्या सुखाची सुखसंपदा। मद्भक्त सदा भोगिती॥ १॥ ज्या सुखाचे सुखप्राप्ती। विरोनि जाय चित्तवृत्ती। सुखें सुखरूप सर्वांगें होती। एवढी सुखप्राप्ती मद्भक्तां॥ २॥ इतर मी सांगों कायी। मोक्षसुखाच्याही ठायीं। या सुखाची गोडी नाहीं। धन्य पाहीं हरिभक्त॥ ३॥ ऐशिया सुखाकारणें। साधक शिणती जीवें प्राणें। तपादि शरीरशोषणें। व्रत धरणें विषयांचें॥ ४॥ एक करिती योगयाग। एक करिती शास्त्रसंग। एक करिती सर्वस्वत्याग। एकीं सांडिला संग गृहदारा॥ ५॥ एक फळाहारी निराहारी। एक ते नग्न ब्रह्मचारी। एक कडेकपाटीं शिखरीं। गिरिकंदरीं रिघाले॥ ६॥ एक ते जटाळ गांठॺाळ। एक नखधारी ढिसाळ। एक महाहटी विशाळ। एक पिसाळ मत्तमुद्रा॥ ७॥ एक तांबडे बोडके। एक ते केवळ सुडके। एक तीर्थाटणें रोडके। एक ते मुके मौननिष्ठ॥ ८॥ एक राख्ये एक शंख्ये। एक ते अत्यंत बोलके। एक पाणीपिशीं झालीं उदकें। कुशमृत्तिके विगुंतलीं॥ ९॥ ऐशा नाना परींच्या व्युत्पत्ती। साधक शिणती नेणों किती। माझ्या भजनसुखाची प्राप्ती। नव्हे निश्चितीं कोणासी॥ २१०॥ जें माझ्या भक्तांचें निजसुख। तें कोणासी न पवेचि देख। स्वप्नींही त्या सुखाचें मुख। अनोळख पैं झालें॥ ११॥ चंद्रकिरणींचें अमृत। जेवीं वायसां अप्राप्त। तेवीं माझें निजसुख निश्चित। नव्हेचि प्राप्त अभक्तां॥ १२॥ थानीं लागल्या गोचिडा। अशुद्धचि आवडे मूढा। जवळिल्या क्षीरा वरपडा। नव्हेचि रोकडा अभागी॥ १३॥ तेवीं सांडोनि माझी भक्ती। नाना साधनीं व्यर्थ शिणती। त्यांसी माझ्या निजसुखाची सुखप्राप्ती। नव्हे निश्चितीं उद्धवा॥ १४॥ जिंहीं माझ्या भजनपरवडी। केली भक्तीची कुळवाडी। ते माझ्या निजसुखाची गोडी। पावले रोकडी आत्यंतिक॥ १५॥ ज्या निजसुखाच्या ठायीं। शिळेपणाची भाषाचि नाहीं। विटों नेणे कल्पांतींही। इंद्रियांचा कांहीं न पडे पांगू॥ १६॥ जें जें विषयांचें सुख। तें तें इंद्रियांपंगिस्त देख। अपंगिस्त भक्तिसुख चोख। सभाग्य लोक पावती॥ १७॥ जें सुख भोगितां पाहीं। देही तोचि होय विदेही। तें सुख माझ्या भक्तांच्या ठायीं। प्रकटलें कंहीं लोपेना॥ १८॥ हे उत्तमोत्तम भक्त पाहीं। सुख पावले नवल कायी। परी केवळ जे विषयी। भजनें त्यांही सुखप्राप्ती॥ १९॥ भाग्यवशें सत्संगती। आस्तिक्यभावें अनन्यस्थिती। अल्पही माझी घडल्या भक्ती। विषयनिवृत्ती तेणें होय॥ २२०॥
बाध्यमानोऽपि मद्भक्तो विषयैरजितेन्द्रिय:।
प्राय: प्रगल्भया भक्त्या विषयैर्नाभिभूयते॥ १८॥
माझ्या ठायीं अनन्य प्रीती। प्रेमयुक्त भजनस्थिती। ऐशियां भक्तां विषय बाधिती। हे व्याख्यानस्थिती केवीं घडे॥ २१॥ आवडी करितां माझी भक्ती। विषयवासना जळून जाती। तेथ उपजे विषयासक्ती। हे कोणें युक्ती मानावी॥ २२॥ आरिसा उटितां उजळे। तेवीं भक्तीनें विषयोक्षाळे। तेथ विषयासक्ती खवळे। हें निरूपण कोंवळें साधारण॥ २३॥ केवळ जो विषयासक्त। संसारीं प्रपंचयुक्त। तोही प्रसंगें झालिया भक्त। होय विरक्त तें ऐक॥ २४॥ जीवीं भक्ति लागली गोड। नाहीं मावळली विषयचाड। ऐसें उभय अवघड। अतिसांकड जयासी॥ २५॥ तेणें मुख्यत्वें घ्यावी भक्ती। गौण धरावी विषयासक्ती। तिची ही होय विरक्ती। ऐक ते युक्ती सांगेन॥ २६॥ लवणासी मिळतां जळ। विरवूनि सांडी तत्काळ। तेवीं भक्ति वाढविल्या प्रबळ। विषयमंडळ विभांडी॥ २७॥ यापरी भजनपरिपाटीं। विषयांसी पडे तुटी। निजसुखाची लाभे भेटी। पडे मिठी स्वानंदें॥ २८॥ मज पाहिजे विषयनिवृत्ती। या हेतू केली नाहीं भक्ती। म्हणाल विषयांची विरक्ती। कोणे युक्ती घडे त्या॥ २९॥ येचिविषयीं उत्तर। सांगताहे शार्ङ्गधर। दीपाचा पेटल्या वैश्वानर। तो जाळील घर नगर तैसें हें॥ २३०॥
यथाग्नि: सुसमृद्धार्चि: करोत्येधांसि भस्मसात्।
तथा मद्विषया भक्तिरुद्धवैनांसि कृत्स्नश:॥ १९॥
दीप लावावयालागुनी। सोज्ज्वळ केला जो वन्ही। तो अवचटें पडला वनीं। तिडिकी उडोनी तृणांकुरीं॥ ३१॥ तो अनिच्छितचि एकसरें। कोपटें आणि धवळारें। नगरें पुरें मंदिरें। गिरिकंदरेंभस्म करी॥ ३२॥ तैशी अल्पही माझी भक्ती। श्रद्धायुक्त प्रवेशल्या चित्तीं। संचित क्रियमाण पापपंक्ती। होय जाळिती नि:शेष॥ ३३॥ पूर्वपापाचे समूळ मळ। चित्तीं जडले होते प्रबळ। तें चित्त अतिचंचळ। विषयीं व्याकुळ सर्वदा॥ ३४॥ त्यासी माझिया भक्तिलेशें। पूर्वपापाचा समूह नासे। जेवीं कां कर्पूर दीपस्पर्शें। नि:शेष नासे तत्काळ॥ ३५॥ ऐसें निर्मळ झालिया चित्त। ब्रह्म प्रकाशे सदोदित। मग तें नव्हे विषयासक्त। होय विरक्त अनिच्छितां॥ ३६॥ भक्तिलेशाची एवढी गरिमा। तो संपूर्ण भक्तीचा महिमा। कोण जाणो भक्तोत्तमा। आगमनिगमां अतर्क्य॥ ३७॥ अलक्ष्य लक्षेना माझी भक्ती। अतर्क्य तर्केना शास्त्रयुक्तीं। अगाध नाकळे निश्चितीं। साधनव्युत्पत्ती शिणतांही॥ ३८॥ पूर्ण माझे भक्तीचा पार। मजही न कळे साचार। यालागीं मी भक्तांचाआज्ञाधार। नुल्लंघीं उत्तर सर्वथा॥ ३९॥ अगाध भक्तांची थोरी। यालागीं मीही सेवा करीं। भक्तपद धरिेंले उरीं। वंदीं शिरीं अंघ्रिरेणू॥ २४०॥ भक्त म्हणवितां वाटे गोड। भजनमुद्रा अतिअवघड। भक्तीचें अंतर अतिगूढ। न कळे उघड तिशास्त्रां॥ ४१॥ ज्ञान सांगतां अतिसुगम। भक्तिरहस्य गुह्य परम। अकृत्रिम उपजे प्रेम। ऐसें हें वर्म लाविल्या न लगे॥ ४२॥ कृपण जरी दूरी जाये। तो घरींचें ठेवणें जीवीं वाहे। तैसें माझें प्रेम पाहें। जो हृदयीं वाहे सर्वदा॥ ४३॥ कां वंध्या गर्भ संभवल्यापाठीं। उल्हासें वाढवी गोरटी। तैशी माझ्या प्रेमाची पोटीं। आवडी मोठी जैं होय॥ ४४॥ जैसे वंध्यागर्भाचे डोहळे। तैसे माझ्या प्रेमाचे सोहळे। पोटांतलेनि कळवळें। उल्हासबळें चढोवढी॥ ४५॥ सदैव जांवयी आल्या घरा। जेवीं सर्वस्व वेंची सुंदरा। तेवीं माझा कळवळा पुरा। ज्याच्या जिव्हारा वोसंडे॥ ४६॥ बीज अधिकाधिक पेरितां। उल्हास कृषीवळाचे चित्ता। तेवीं सर्वस्व मज अर्पितां। तैशी उल्हासता जैं होये॥ ४७॥ सगुण सुरूप समर्थ भर्ता। निघोन गेलिया तत्त्वतां। त्यालागीं तळमळी जैशी कांता। तैशी कळवळता जैं उठी॥ ४८॥ त्या नांव गा माझीभक्ती। उद्धवा जाण निश्चितीं। जे भक्तीसी भुलोनि श्रीपती। भक्तांहातीं आतुडलों॥ ४९॥ चढत्या आवडीं माझी प्रीती। तेचि जाण पां माझी भक्ती। ऐसा भक्तीचा महिमा श्रीपती। स्वयें उद्धवाप्रती सांगत॥ २५०॥ आवडी धरोनि पोटेंसी। देवो सांगे उद्धवासी। माझी भक्ति ते जाण ऐसी। अखंड जीपाशीं मी असें॥ ५१॥ संसारतरणोपायीं। हेचि एक मुख्य पाहीं। मोक्ष लागे इच्या पायीं। इतर साधनें कायी बापुडीं॥ ५२॥ मी तंव अजित लोकीं तिहीं। त्या मज भक्तिप्रतापें पाहीं। जिंतोनियां ठायींच्याठायीं। भावबळें पाहीं स्ववश केलों॥ ५३॥ यालागीं सर्व विजयांचे माथां। माझी भक्तीचि गा सर्वथा। ऐक पां तेही कथा। तुज मी तत्त्वतां सांगेन॥ ५४॥
न साधयति मां योगो न सांख्यं धर्म उद्धव।
न स्वाध्यायस्तपस्त्यागो यथा भक्तिर्ममोर्जिता॥ २०॥
सांख्य जें कां नित्यानित्य। कर्म जें कां नित्यनैमित्य। अष्टांगयोग समस्त। नव्हती समर्थ मत्प्राप्तीं॥ ५५॥ स्वाध्याय जें वेदाध्ययन। तप जें वातांबुपर्णाशन। त्याग जो संन्यासग्रहण। माझे भक्तीविण बापुडीं॥ ५६॥ जैशी नाकेंवीण बरव। कां शिरेंवीण अवयव। भर्तारेंवीण अहेव। जाण पां तो सर्व विटंबू॥ ५७॥ तैसें माझे भक्तीविण। सकळ साधनें बापुडीं जाण। मज पावावया समर्थपण। नाहीं आंगवण समस्तां॥ ५८॥ तैशी नव्हे माझी भक्ती। चढती वाढवून माझी प्रीती। तत्काळ करी माझी प्राप्ती। नव्हे पंगिस्ती आणिकाची॥ ५९॥ जेव्हां उपजली माझी भक्ती। तेव्हांच झाली माझी प्राप्ती। हें पुन:पुन्हां उद्धवाप्रती। हरिखें श्रीपती सांगत॥ २६०॥ रत्नासवें जैशी दीप्ती। अरुणासवें जेवीं गभस्ती। तेवीं भक्तीपाशीं मी श्रीपती। असें निश्चितीं उद्धवा॥ ६१॥ ते भक्तिलागे ज्याच्या चित्तीं। तैं मी सांपडलों त्याच्या हातीं। आणिकां साधनांचे प्राप्ती। विनाभक्ती मी नातुडें॥ ६२॥
भक्त्याहमेकया ग्राह्य: श्रद्धयाऽऽत्मा प्रिय: सताम्।
भक्ति: पुनाति मन्निष्ठा श्वपाकानपि सम्भवात्॥ २१॥
इतर साधनें व्युत्पत्ती। दूरी सांडूनि परतीं। श्रद्धायुक्त माझी भक्ती। धरिल्या हातीं मी लाभें॥ ६३॥ निर्विकल्प नि:संदेहो। सर्व भूतीं भगवद्भावो। हा भक्तीचा निजनिर्वाहो। भजनभावो या नांव॥ ६४॥ होऊनि सर्वार्थी उदासू। माझ्या भजनाचा उल्हासू। न धरी मोक्षाचा अभिलाषू। एवढा विश्वासू मद्भजनीं॥ ६५॥ तेथें तरें कीं न तरें। हा विकल्पू कोठें उरे। माझेनि भजनें निर्धारें। के पाठिमोरे विधिवाद॥ ६६॥ एवढा विश्वासीं ज्याचा भावो। न धरी भक्तीवेगळा उपावो। आम्हां त्याचेनि जीवें जीवो। तो आत्मा पहा हो पैं माझा॥ ६७॥ जो मी ज्ञानियांचा आत्मा। भक्तांचा प्रिय परमात्मा। शास्त्रीं प्रतिपादिती पुरुषोत्तमा। तो मी साउमा त्या धांवें॥ ६८॥ मज आवडे अनन्य भक्ती। मी त्यांचा अंकित निश्चितीं। त्यांचेनि माझी त्रैलोकीं ख्याती। मज महंती त्यांचेनि॥ ६९॥ त्यांचेनि मज खाणें जेवणें। त्यांचेनि मज लेणें नेसणें। त्यांचेनि जीवेंप्राणें। म्यां वर्तणें सर्वत्र॥ २७०॥ माझे गांठीं कांहीं नाहीं। भक्तीं सर्वस्वें वेंचूनि पाहीं। नाना उपचार उपायीं। महत्त्व तिंहीं मज दिधलें॥ ७१॥ मज अचक्षूसी दिधले डोळे। अश्रोत्रा श्रवण दिधले। मज अमुखा तिंहीं मुख केलें। त्यांचेनि बोलें मी बोलका॥ ७२॥ मज त्यांचेनि गमनागमन। त्यांचेनि अवयव अळंकरण। त्यांचेनि मज नेमस्त स्थान। मज समर्थपण त्यांचेनि॥ ७३॥ मज नामरूप तिंहीं करणें। मज पवित्रता त्यांचेनि गुणें। मज वैकुंठींचें ठाणें। भक्तीं अचळपणें दीधलें॥ ७४॥ येथवरी निजभक्तांसी। मी वश्य झालों भक्तीपाशीं। यालागीं अहर्निशीं। मी भक्तांपाशीं तिष्ठतू॥ ७५॥ मी अजन्मा त्यांचेनि जन्म धरीं। मी अकर्मा त्यांचेनि कर्म करीं। त्यांचेनि बोलें उद्धरीं। नाममात्रें महापापियां॥ ७६॥ नारदवचनासाठीं। वाल्मीकि परम पापी सृष्टीं। म्यां वंद्य केला वैकुंठीं। नामपरिपाटीं पवित्रत्वें॥ ७७॥ येथवरी भक्तीची सत्ता। मजवरी चाले तत्त्वतां। भक्तीवेगळा सर्वथा। मीं न यें हाता कोणाचे॥ ७८॥ भक्तांच्या उपकारता। मी थोर दाटलों तत्त्वतां। नव्हेचि प्रत्युपकारता। आधीन सर्वथा यालागीं॥ ७९॥ त्यालागीं व्हावया उतरायी। माझे गांठीं कांहींच नाहीं। लटकुफटकु दीधलें कांहीं। तें हळूचि पाहीं सांगेन॥ २८०॥ भक्त माझेनि सनाथ। माझेनि झाले ते कृतकृत्य। माझेनि आनंदें तें सदा तृप्त। वोसंडत निजबोधें॥ ८१॥ माझेनि बळें जगजेठी। घायेंवीण छेदिती सृष्टी। माझेनि बळें त्यांचे दृष्टी। संमुख नुठी कळिकाळ॥ ८२॥ माझेनि न माती लोकीं तिहीं। माझेनि ते देहीं विदेही। माझेनिबळें पाहीं। प्रळयकाळ तिंहीं प्राशिला॥ ८३॥ माझेनि बळें जाण। विभांडिलें जन्ममरण। माझें करोनियां भजन। ब्रह्म सनातन ते झाले॥ ८४॥ हेंही नाहीं म्यां दीधलें। भजनबळें तिंहीं नेलें। त्यांसीं माझें कांहीं न चले। सर्वस्व लुटिलें निजभक्तीं॥ ८५॥ भक्तीं भजनभावबळें। अजिता मातें तिंहीं जिंकिलें। जिंकोनि आपण्या वश्य केलें। माझें निजपद नेलें निजभक्तीं॥ ८६॥ एवं माझ्यानिजपदाची सत्ता। जरी आली भक्तांच्या हाता। तरी स्वामित्व ठेवूनि माझे माथां। माझे भक्तिपंथा विनटले॥ ८७॥ ते माझे भक्तीची पवित्रता। आश्चर्य वाटेल तुज ऐकतां। संदेहो नाहीं मज सांगतां। ऐक तत्त्वतां तो महिमा॥ ८८॥ सांडोनि दांभिक लौकिक। माझ्या भजनीं भावार्थें चोख। तो ज्ञाती जरी झाला श्वपाक। तरी आवश्यक मज पूज्य॥ ८९॥ केवळ जीं अपवित्रें। रिसें आणि वानरें। म्यां पूजिलीं गौळ्ॺांची पोरें। ताकपिरें रानटें॥ २९०॥ जो जातीनें नीचत्वा नेला। परी भक्तिभावें उंचावला। तो मद्रूपता पावला। पूज्य झाला तिहीं लोकीं॥ ९१॥ ‘विप्रात् द्विषड्गुणयुता’। ये श्लोकींची हेचि कथा। जळो त्या द्विजाची पवित्रता। जो माझ्या भजनपथा विन्मुख॥ ९२॥ त्याहूनि श्वपच गा वरिष्ठ। जो माझ्या भजनीं भजननिष्ठ। त्यातें वंदिती पुराणश्रेष्ठ। कविवरिष्ठ महाकवी॥ ९३॥ विदुर दासीपुत्र तत्त्वतां। भावें पढिया भगवंता। भावो प्रमाण परमार्था। जात्यभिमानता सरेना॥ ९४॥ मज पावावया साचोकारें। भावो सरे जाती सरे। यालागीं अवघ्यांचे धुरे। म्यां वनचरें उद्धरलीं॥ ९५॥ पक्ष्यांमाजीं केवळ निंद्यू। जटायु उद्धरिला म्यां गीधू। अंत्यज उद्धरिला धर्मव्याधू। भाव शुद्धू मदर्थी॥ ९६॥ भलता हो भलते जाती। ज्यासी माझी भावार्थें भक्ती। तोचि जाण पां पवित्रमूर्ती। माझी प्राप्ती मद्भजनें॥ ९७॥ सांडोनियां माझी भक्ती। नाना साधनें व्युत्पत्ती। करितां नव्हे माझी प्राप्ती। तेंचि श्रीपती सांगत॥ ९८॥
धर्म: सत्यदयोपेतो विद्या वा तपसान्विता।
मद्भक्त्यापेतमात्मानं न सम्यक् प्रपुनाति हि॥ २२॥
माझे भक्तीवीण कर्मधर्म। जाण पां तो केवळ भ्रम। चुकलें मत्प्राप्तीचें वर्म। तो धर्म अधर्म परिणमे॥ ९९॥ माझे भक्तीवीण सत्यवादू। तो जाण पां जैसा गर्भांधू। प्रतिपदीं घडे प्रमादू। अध:पतनबाधू देखेना॥ ३००॥ भक्तीवीण दयेची थोरी। जेवीं पुरुषेंवीण सुंदरी। ते विधवा सर्व धर्मा बाहेरी। तैसी परी दयेची॥ १॥ माझे भक्तीवीण जे विद्या। ते केवळ जाण पां अविद्या। जेवीं वायस नेणती चांदा। तेवीं माझ्या निजबोधा नोळखती॥ २॥ चंदनभार वाहे खर। परी तो नेणे सुवासाचें सार। माझेनि भक्तीवीण विद्याशास्त्र। केवळ भारवाहक॥ ३॥ माझे भक्तीवीण जें तप। शरीरशोषणादि अमूप। तें पूर्वादृष्टें भोगी पाप। नव्हे सद्रूप तप:क्रिया॥ ४॥ माझे भक्तीवीण जें साधन। तें कोशकीटाच्या ऐसें जाण। आपण्या आपण बंधन। भक्तिहीन क्रिया ते॥ ५॥ एवं माझे भक्तीवीण। जें केलें तें अप्रमाण। तें भक्तीचें शुद्ध लक्षण। स्वयें श्रीकृष्ण सांगत॥ ६॥
कथं विना रोमहर्षं द्रवता चेतसा विना।
विनाऽऽनन्दाश्रुकलया शुध्येद्भक्त्या विनाऽऽशय:॥ २३॥
आवडीं हरिकथा ऐकतां। नाना चरित्रें श्रवण करितां। माझी आत्मचर्चा हृदयीं धरितां। पालटू चित्ता तेणें होये॥ ७॥ तेणेंचि उपजे माझी भक्ती। माझ्या भजनाच्या अतिप्रीतीं। आवडीं माझीं नामें गाती। रंगीं नाचती सद्भावें॥ ८॥ पोटांतूनियां उल्हासतां। रंगीं गातां पैं नाचतां। अंतरीं द्रवो झाला चित्ता। ते अवस्था बाह्य दिसे॥ ९॥ अंतरीं सुखाची झाली जोडी। बाह्य रोमांचीं उभिली गुढी। त्या स्वानुभवसुखाची गोडी। नयनीं रोकडी प्रवाहे॥ ३१०॥ माझे भक्तीचिया आवडीं। अहं सोहं दोनी कुडीं। तुटली अभिमानाची बेडी। विषयगोडी निमाली॥ ११॥ ते काळींचें हेंचि चिन्ह। पुलकांकित देहो जाण। नयनीं आनंदजीवन। हृदयीं परिपूर्ण स्वानंदू॥ १२॥ पुंजाळले दोनी नयन। सदा सर्वदा सुप्रसन्न। स्फुरेना देहाचे भान। भगवंतीं मन रंगलें॥ १३॥ ऐसी नुपजतां माझी भक्ती। कैंची होय विषयविरक्ती। विरक्तीवीण माझी प्राप्ती। नव्हे निश्चितीं उद्धवा॥ १४॥ माझी शुद्धभक्ती तत्त्वतां। साचार आली जयाचे हाता। ऐक त्याच्या चिन्हांची कथा। आणि पवित्रता तयाची॥ १५॥ माझे भक्तीसी जो लागला। तो तत्काळ पवित्र झाला। त्याणें त्रिलोक पुनीत केला। हें गर्जोनि बोलिला श्रीकृष्णू॥ १६॥
वाग्गद्गदा द्रवते यस्य चित्तं
रुदत्यभीक्ष्णं हसति क्वचिच्च।
विलज्ज उद्गायति नृत्यते च
मद्भक्तियुक्तो भुवनं पुनाति॥ २४॥
अंगीं रोमांच रवरवित। स्वेदबिंदू डळमळित। चित्त चैतन्यें द्रवत। तेणें सद्गदित पैं वाचा॥ १७॥ हर्ष वोसंडतां पोटीं। अर्धोन्मीलित होय दृष्टी। जीवशिवां पडली मिठी। ध्यानत्रिपुटी मावळली॥ १८॥ नयनीं अश्रूंचा पूर लोटी। उभंडू न संटेचि पोटीं। होत जीवभावाची तुटी। पडे सृष्टीं मूर्च्छित॥ १९॥ आक्रंदे थोर आक्रोशें। वारंवार रडतां दिसे॥ रडण्यामाजीं गदगदां हांसे। जेवीं लागलें पिसें ब्रह्मग्रहो॥ ३२०॥ रडणें हांसणें न सांडी। त्याहीमाजीं नवल आवडी। अर्थावबोधें गाणें मांडी। निजात्मगोडीचेनि योगें॥ २१॥ विसरोनि माझें तुझें। सांडोनियां लोकलाजे। हरिखें प्रेमाचेनि भोजें। तेणें नाचिजे नि:शंक॥ २२॥ गाणें नाचणें हांसणें। तो रडे कासयाकारणें। ऐक तींही लक्षणें। तुजकारणें सांगेन॥ २३॥ माउली वेगळें बाळक पडे। जननीं पाहतां कोठें नातुडे। भेटता ओरडूनि रडे। मिठी पडे सप्रेम॥ २४॥ जीव परमात्मा दोनी। चुकामुकी झाली भ्रमपट्टनीं। त्यांसी एकाकीं होतां मिळणी। रडे दीर्घस्वरें स्फुंदत॥ २५॥ बहुकाळें झाली भेटी। ऐक्यभावें पडली मिठी। तेणें उभंडू न संटे पोटीं। रुदन उठी सप्रेम॥ २६॥ देवो लाघवी नानापरी। मायावी नातुडे निर्धारीं। तो सांपडला घरींच्या घरीं। तेणें विस्मय करी टवकारें॥ २७॥ देव सदा जवळीच असे। त्यालागीं जन कैसे पिसे। पाहों जाती देशोदेशें। तें देखोनि हांसे गदगदां॥ २८॥ देव सर्वांसी अजितू। तो म्यां जिंकिला भगवंतू। धरोनि राखिला हृदयांतू। यालागीं नाचतू उल्हासें॥ २९॥ निवटूनि दुजयाची मातू। अंगें जीतिला भगवंतू। जंगीं झाला यशवंतू। यालागीं गात नाचतू उल्हासें॥ ३३०॥ पाहतां दुसरें न दिसे मज। यालागीं धरूं विसरला लाज। जगीं झाला तो निर्लज्ज। निर्लज्जतेची वोज हे त्याची॥ ३१॥ यापरी भक्तियुक्त। होऊनियां माझे भक्त। निजानंदें गात नाचत। तेणें केलें पुनीत लोकत्रय॥ ३२॥ जयाचे देखतां चरण। जडजीवां उद्धरण। ज्याचे लागतां चरणरेणु। पशु पाषाण उद्धरती॥ ३३॥ कीर्तनाचेनि महाघोकें। नाशिलीं जगाचीं सर्व दु:खें। अवघें विश्वचि हरिखें। भरिलें महासुखें उचंबळत॥ ३४॥ दर्शनें स्पर्शनें वचनें। एक तारिले कीर्तनें। एक तारिले नामस्मरणें। यापरी जग उद्धरणें उद्धवा॥ ३५॥ अविद्यायुक्त जीव मलिन। त्यासी शुद्ध व्हावया जाण। माझी भक्तीचि प्रमाण। हेंचि श्रीकृष्ण स्वयें सांगे॥ ३६॥
यथाग्निना हेम मलं जहाति
ध्मातं पुन: स्वं भजते च रूपम्।
आत्मा च कर्मानुशयं विधूय
मद्भक्तियोगेन भजत्यथो माम्॥ २५॥
डांकमिळणी सुवर्ण। हीनकसें झालें मलिन। उदकें धुतांही जाण। निर्मळपण न ये त्या॥ ३७॥ त्याच सुवर्णाचें तगट। अग्निमुखें देतां पुट। मळत्यागें होय चोखट। दिसे प्रकट पूर्वरूपें॥ ३८॥ तेवीं अविद्याकामकर्मीं मलिन। त्याचे चित्तशुद्धीलागीं जाण। माझी भक्तीचि परम प्रमाण। मळक्षालन जीवाचें॥ ३९॥ जंव जंव भक्तीचें पुट चढे। तंव तंव अविद्याबंध विघडे। मायेचें मूळचि खुडे। जीवू चढे निजपदा॥ ३४०॥ तुटोनियां अविद्याबंधू। चिन्मात्रैक अतिविशुद्धू। जीवपावे अगाध बोधू। परमानंदू निजबोधें॥ ४१॥ जीवासी अविद्येची प्राप्ती। ते ज्ञानास्तव होय निवृत्ती। तेथ कां पां लागली भक्ती। ऐशी आशंका चित्तीं जरी धरिसी॥ ४२॥ तरी माझे भक्तीवीण ज्ञान। सर्वथा नुपजे जाण। तेचि अर्थींचें निरूपण। स्वयें श्रीकृष्ण सांगत॥ ४३॥
यथायथाऽऽत्मा परिमृज्यतेऽसौ
मत्पुण्यगाथाश्रवणाभिधानै:।
तथा तथा पश्यति वस्तु सूक्ष्मं
चक्षुर्यथैवाञ्जनसम्प्रयुक्तम्॥ २६॥
माझी प्रतिपाद्य स्वरूपता। नाना चरित्रें पवित्र कथा। तेथें श्रवणमननें चित्ता। प्रक्षाळितां कीर्तनें॥ ४४॥ जंव जंव करी माझी भक्ती। तंव तंव अविद्यानिवृत्ती। तेणें माझे स्वरूपाची प्राप्ती। जे श्रुतिवेदांतीं अतर्क्य॥ ४५॥ जें कां अतिसूक्ष्म निर्गुण। अलक्ष्य लक्षेना गहन। तेणें स्वरूपें होय संपन्न। जीव समाधान मद्भजनें॥ ४६॥ नयनीं सूदल्या अंजन। देखे पृथ्वीगर्भींचें निधान। तेवीं मद्भजनें लाहोनि ज्ञान। चैतन्यघन जीव होय॥ ४७॥ उद्धवा ऐक पां निश्चितीं। बहुत न लगे व्युत्पत्ती। जैसा भावो ज्याचे चित्तीं। तैशी प्राप्ती तो पावे॥ ४८॥
विषयान् ध्यायतश्चित्तं विषयेषु विषज्जते।
मामनुस्मरतश्चित्तं मय्येव प्रविलीयते॥ २७॥
जो करी विषयांचें ध्यान। तो होय विषयीं निमग्न। जो करी सदा माझें चिंतन। तो चैतन्यघन मीचि होय॥ ४९॥ स्त्री गेली असतां माहेरीं। ध्यातांचि प्रकटे जिव्हारीं। हावभावकटाक्षेंवरी। सकाम करी पुरुषातें॥ ३५०॥ नसते स्त्रियेचें ध्यान करितां। प्रकट दिसे यथार्थता। मी स्वत:सिद्ध हृदयीं असतां। सहजें मद्रूपता चिंतितां मज॥ ५१॥ आवडीं माझें जें चिंतन। चित्त चिंता चिंतितेपण। विरोनि होय चैतन्यघन। मद्रूपपण या नांव॥ ५२॥ माझे प्राप्तीलागीं जाण। हेंचि गा मुख्य लक्षण। माझें ध्यान माझें भजन। मद्रूपपण तेणें होय॥ ५३॥ मजवेगळें जें जें ध्यान। तेंचि जीवासी दृढबंधन। यालागीं सांडूनि विषयांचें ध्यान। माझें चिंतन करावें॥ ५४॥
तस्मादसदभिध्यानं यथा स्वप्नमनोरथम्।
हित्वा मयि समाधत्स्व मनो मद्भावभावितम्॥ २८॥
साचाच्यापरी दिसत। परिणामीं नाशवंत। त्यासीच बोलिजे असत। जें मिथ्याभूत आभासू॥ ५५॥ तेवीं इहामुत्र कमनीये। जें अविचारित रमणीये। त्यालागीं प्राणी पाहें। नाना उपायें शिणताती॥ ५६॥ कष्टीं सेवूनि साधन। साधिलें स्वर्गभोगस्थान। तेंही नश्वर गा जाण। जेवीं कां स्वप्नमनोरथ॥ ५७॥ यालागीं विषयाचें ध्यान। सांडूनि करावें माझें भजन। माझिया भावना मन। सावधान राखावें॥ ५८॥ सावधान करितां भजन। एकाग्र धरितां माझें ध्यान। तेथ अत्यंत जें बाधकपण। तें त्याग लक्षण हरि बोले॥ ५९॥
स्त्रीणां स्त्रीसङ्गिनां सङ्गं त्यक्त्वा दूरत आत्मवान्।
क्षेमे विविक्त आसीनश्चिन्तयेन्मामतन्द्रित:॥ २९॥
जो मजलागीं आर्तभूत। तेणें सांडावी स्त्रीसंगाची मात। मी चिंतावा भगवंत। तेणें एकांत सेवावा॥ ३६०॥ स्त्रियेच्याही परीस वोखटी। संगति स्त्रैणांची अतिखोटी। त्यांसी न व्हावी भेटीगोठी। न पहावे दिठीं दुरोनी॥ ६१॥ साधकें कायवाचाचित्तीं। सांडूनि दोहींची संगती। परतोनि स्फुरेना स्फूर्ती। ऐशी दृढ स्थिती करावी॥ ६२॥ केवळ एकांत जें विजन। प्रशस्त आणि पवित्रस्थान। तेथें घालोनियां आसन। माझें चिंतन करावें॥ ६३॥ करोनि आळसाची बोळवण। धरूनि निजवृत्ति सावधान। त्यावरी करावें माझें ध्यान। एकाग्र मन राखूनी॥ ६४॥ माझें विध्वंसोनि ध्यान। माझे प्राप्तीआड विघ्न। साधकांसी अतिबंधन। स्त्री आणि स्त्रैणसंगती॥ ६५॥
न तथास्य भवेत्क्लेशो बन्धश्चान्यप्रसङ्गत:।
योषित्सङ्गाद्यथा पुंसो यथा तत्सङ्गिसङ्गत:॥ ३०॥
अविद्येच्या अनंतकोटी। जाण पां स्त्रीसंगाचे पोटीं। अधर्माचा भडका उठी। योषिता दृष्टीं देखतां॥ ६६॥ जें महामोहाचें मेळवण। जें खवळल्या कामाचें इंधन। जें जीवाचें परम मोहन। अध:पतन ते योषिता॥ ६७॥ जे मदनाचे तिखट बाण। जें मायेचें चक्र जाण। जें अंधतमाचें पूर्ण। भरितें तें जाण योषिता॥ ६८॥ हो कां जीचिये संगतीं। आंधळी होय ज्ञानशक्ती। जे वाढवी नाना आसक्ती। जिचेनि विस्मृती निजस्वार्था॥ ६९॥ जिचेनि संसार बहुवस। जिचेनि असोस गर्भवास। जिचेनि विषयविलास। जे वज्रपाश जीवाचा॥ ३७०॥ जे अखंड सोशी दु:खशोक। जे सदा सोशी नरक वोक। ते माता अनाप्त करूनि देख। स्त्री आवश्यक आप्त होय॥ ७१॥ जे मातृस्नेहातें तोडवी। जे बंधुस्नेहातें बिघडवी। जे सदा गोंवी हावभावीं। अधर्म अटवीं जे पाडी॥ ७२॥ जिचे कटाक्ष अतितिख। जिव्हारीं रुतले देख। जे जीवाची व्यामोहक। जिचें चढलें विख उतरेना॥ ७३॥ एवढीबाधा जाण स्त्रीसंगती। जो वांछूं पाहे माझी प्राप्ती। तेणें सांडावी स्त्रियेची आसक्ती। हृदयीं प्रीती न राखावी॥ ७४॥ स्त्री आठवतांचि चित्ता। उच्छेदी ज्ञानध्यान अवस्था। एवढी स्त्रीसंगबाधकता। त्याहूनि अधिकता स्त्रैणसंगें॥ ७५॥ स्त्रीसंगाच्या मोहमदा। सुटका आहे यदाकदा। परी स्त्रैणसंगतीची बाधा। ते आपदा अनिवार॥ ७६॥ चूडाला स्त्रियेचें संगतीं। तरला शिखिध्वज भूपती। नातरी मदालसेचे संगतीं। तरला नृपती कुवलयाश्वू॥ ७७॥ हो कां लीलेनें करोनि भक्ती। प्रसन्न केली सरस्वती। तिचा उद्धरिला निजपती। हें बोलिलें ग्रंथीं वसिष्ठें॥ ७८॥ यापरी स्त्रीसंगतीं। उद्धरले ऐकिजेती। परी स्त्रैणाचे संगतीं। उद्धारा गती असेना॥ ७९॥ जो कां स्त्रियेचा अंकिला। जो स्त्रियेसी जीवें विकिला। जो स्त्रियेचा पोसणा झाला। तिचे बोलामाजीं वर्ते॥ ३८०॥ जैशी कुलदेवता खेचरी। तैसें स्त्रियेसी पूज्य करी। मग तिचेचि सेवेवरी। नाना उपचारीं नाचत॥ ८१॥ पाळिल्या श्वानाचे परिपाटीं। लाविल्या लागे सुहृदापाठीं। त्या हडकिलिया शेवटीं। काम थारोळां पुसाटी घालूनि पडे॥ ८२॥ धड गोड उत्तम पदार्था। आपण भोगीना सर्वथा। तें देऊन स्त्रियेच्या हाता। आपुली सत्ता निवर्तवी॥ ८३॥ इसी जैं विरुद्ध वाटेल। तैं हें ब्रह्मांड पालथेल। इचा उल्लंघितां बोल। क्षीराब्धि सुकेल सुखाचा॥ ८४॥ नाहीं कुळदेवीं देवो पूजणें। मायबापांतें वंचणें। शेखीं गुरूतेंही ठकणें। परी सर्वस्व देणें स्त्रियेसी॥ ८५॥ एवं माकड जैसें गारुडॺाचें। तैसा स्त्रियेचेनि छंदें नाचे। ऐशिया स्त्रैणाचे संगतीचें। तेथें सुख कैंचें साधका॥ ८६॥ ज्याच्या ऐकतां स्त्रियेच्या गोठी। सज्ञानासही काम उठी। जो लावी योषितापाठीं। उठाउठी सकामत्वें॥ ८७॥ ऐशिया स्त्रैणाचे संगतीं। कैंची साधकां सुखप्राप्ती। तो घालील अधोगतीं। अंधतमाप्रती नेईल॥ ८८॥ यालागीं स्त्रैणाची कथा। कानीं नायकावी वार्ता। त्याचा वाराही लागतां। तेथूनि सर्वथा पळावें॥ ८९॥ त्याची न घ्यावी भेटी। त्यासी न करावी गोठी। तो न पहावा दिठीं। न लागावें पाठीं स्त्रैणाचिये॥ ३९०॥ स्त्रैण पुढें वाटे जाय। त्याच्या मार्गीं मागू उरला राहे। तेही आपण चुकवावी भोये। येथवरी पाहें त्यागावा॥ ९१॥ स्त्री आणि स्त्रैणाचे संगतीं। जैसी होय दु:ख प्राप्ती। तैसे दु:ख त्रिजगती-। माजीं निश्चितीं असेना॥ ९२॥ अत्यंत स्त्रीकामी वशता। ती नांव मुख्य स्त्रैणता। केवळ स्त्रियेची अधीनता। तो बाधू परमार्था अतिनिंद्यत्वें॥ ९३॥ आपुले हृदयींची कामासक्ती। तेचि स्त्रीसंगाची दृढ प्राप्ती। तेथ उपजलिया विरक्ती। मग स्त्रियेची प्राप्ती कोण पुसे॥ ९४॥ ऐसें हृदयींचे कणवे। उद्धवासी सांगीतलें देवें। हें ऐकोनियां उद्धवें। विचारु जीवें आदरिला॥ ९५॥ अनिवार उपजे विरक्ती। जेणें बाधीना विषयासक्ती। ऐशी जे ध्यानस्थिती। तेचि देवाप्रती पुसत॥ ९६॥ जें लागलिया ध्यान। न दिसे स्त्रीपुरुषभान। जीवीं उपजे चित्समाधान। तैसें विधान पुसत॥ ९७॥
उद्धव उवाच
यथा त्वामरविन्दाक्ष यादृशं वा यदात्मकम्।
ध्यायेन्मुमुक्षुरेतन्मे ध्यानं त्वं वक्तुमर्हसि॥ ३१॥
उद्धव म्हणे कमळनयना। मुमुक्षु करिती तुझिया ध्याना। त्या ध्यानाची ध्यानलक्षणा। जगज्जीवना मज सांगें॥ ९८॥ तें सगुण कीं निर्गुण। कोण रूप कैसा वर्ण। तें अवघेंही संपूर्ण। कृपा करून मज सांगा॥ ९९॥ जेथ रिघतां नुबगे मन। ज्याचें अत्यंत गोडपण। जें तुजही आवडतें जाण। तें मज ध्यान सांगावें॥ ४००॥ ऐकोनि उद्धवाचा प्रश्न। सांगावया उत्तम ध्यान। पूर्वपीठिका आसन। प्राणायामलक्षण सांगत॥ १॥
श्रीभगवानुवाच
सम आसन आसीन: समकायो यथासुखम्।
हस्तावुत्सङ्ग आधाय स्वनासाग्रकृतेक्षण:॥ ३२॥
ऐक आसनाचें लक्षण। पाषाणीं व्याधि संभवे जाण। केवळ धरणीचें आसन। तें अतिकठिण दु:खरूप॥ २॥ दारुकासनें निर्दय मन। कोरडॺा काष्ठाऐसें होय जाण। तृणासनीं विकल्प गहन। जैसें कां तृण विचित्रांकुरें॥ ३॥ वृक्षपल्लवांवरी आसन। तेणें चित्त सदा दोलायमान। जारण मारण स्तंभन। तेथ काळें आसन साधकां॥ ४॥ ज्ञानोपलब्धि मृगाजिनीं। मोक्षसिद्धि व्याघ्राजिनीं। मोक्षादि सर्व सिद्धींची श्रेणी। श्वेतकंबलासनीं साधकां॥ ५॥ भूमिका शुद्ध आणि समान। पाहोनि निरुपद्रव स्थान। तेथ रचावें आसन। सुलक्षण अनुक्रमें॥ ६॥ कुश वस्त्र कंबलाजिन। इंहीं युक्त घालावें आसन। उंच नीच न व्हावें जाण। समसमान समभागें॥ ७॥ उंच झालिया आसन डोले॥ नीचीं भूमिदोष आदळे। यालागीं समत्वें प्रांजळें। रचावें कोवळें मृदु आसन॥ ८॥ तेथ शुद्ध मुद्रा वज्रासन। कां अंबुजासनही जाण। अथवा घालावें सहजासन। जे आसनीं मन सुखावे॥ ९॥ तेणें मेरुदंड अवक्र शुद्ध। समकाया राखोनि प्रसिद्ध। मूळाधारादि तीनी बंध। अतिसुबद्ध पैं द्यावे॥ ४१०॥ ऐसें आसन लागतां। आसनावरी स्वभावतां। करांबुजाची विकासता। उत्संगता शोभती॥ ११॥ नाकाचें अग्र सांडूनि दूरी। दृष्टि ठेवावी नासिकाग्रीं। ते ठायीं बैसे अग्निचक्रीं। योग गंभीरीं योग्यता॥ १२॥ ते अभ्यासीं निजनिश्चळें। योगाभ्यासे योगबळें। अर्धोन्मीलित होती डोळे। धारणामेळें ते काळीं॥ १३॥ भेदापासाव उठाउठी। उपरमतां अभेदीं दृष्टी। तिची नासाग्रीं दिसे मिठी। इतर दृष्टी न लक्षितां॥ १४॥ आसनजयो त्रिबंधप्राप्ती। दृष्टीची उपरमस्थिती। हे अकस्मात् कोणे रीतीं। साधका हातीं आतुडेल॥ १५॥ ऐसी आशंका धरिसी चित्तीं। त्याही अभ्यासाची स्थिती। उद्धवा मी तुजप्रती। यथानिगुती सांगेन॥ १६॥
प्राणस्य शोधयेन्मार्गं पूरकुम्भकरेचकै:।
विपर्ययेणापि शनैरभ्यसेन्निर्जितेन्द्रिय:॥ ३३॥
अभ्यासाचें लक्षण। प्रथम प्राणमार्गशोधन। पूरक कुंभक रेचक जाण। प्राणापानशोधक॥ १७॥ जिव्हा उपस्थ उपमर्दवे। ऐसा इंद्रियनेम जैं संभवे। त्यासीच हा प्राणजयो फावे। येरां नव्हे श्रमतांही॥ १८॥ प्राणशोधन तें तूं ऐक। पूरक कुंभक रेचक। सवेंचि रेचक पूरक कुंभक। हा उभय देख अभ्यासू॥ १९॥ इडेनें करावा प्राण पूर्ण। तो कुंभिनीनें राखावा जाण। मग तिनेंचि करावा रेचन। हें एक लक्षण अभ्यासीं॥ ४२०॥ कां पिंगलेनें करावा पूर्ण। तो तिनेंचि करावा रेचन। हें एक अपरलक्षण। विचक्षण बोलती॥ २१॥ सर्वसंमत योगलक्षण। इडेनें प्राण करावा पूर्ण। तो कुंभकें राखावा स्तंभून। करावें रेचन पिंगलया॥ २२॥ हो कां पिंगलेनें पुरावा प्राण। तोही कुंभकें राखावा कुंभून। मग इडेनें सांडावा रेचून। हें विपरीत लक्षण अभ्यासीं॥ २३॥ तेथ न करावी फाडाफोडी। न मांडावी ताडातोडी। सांडोनियां लवडसवडी। अभ्यासपरवडी शनै:शनै:॥ २४॥ येथ मांडलिया तांतडी। तैं प्राण पडेल अनाडीं। मग हे थडी ना ते थडी। ऐशी परवडी साधकां॥ २५॥ जेवीं मुंगी वळंघे पर्वता। ते चढे परी पडेना सर्वथा। तेथ जात्यश्व चालों जातां। न चढे तत्त्वतां अतिकष्टी॥ २६॥ तैसें ये योगाभ्यासीं जाण। न चले जाणीव शहाणपण। जाणिवा येथ होय पतन। सर्वथा गमन घडेना॥ २७॥ ते मुंगीच्या परी योगपंथा। जो शनै:शनै: अभ्यासतां। प्रणवाच्या चढे माथां। जाण तत्त्वतां उद्धवा॥ २८॥ दृढ अभ्यास आल्या हाता। जैशी साधकाची मनोगतता। तैसा पवन चाले तत्त्वतां। जेवीं रणाआंतौता महाशूर॥ २९॥ अभ्यासाच्या गडाडीं। प्राण खवळल्या कडाडी। तो प्राणापानाचे भेद मोडी। पदर फोडी चक्राचे॥ ४३०॥ येथ द्विविध माझें भजन। एक तें योगयुक्त निर्गुण। एक तें प्रणवाभ्यासें भक्त सगुण। तेंही लक्षण अवधारीं॥ ३१॥ ऐक प्राणायामाचे भेद। सगर्भ अगर्भ द्विविध। सगर्भ आगमोक्तें शुद्ध। सगुण संबंध ध्यानादि॥ ३२॥
हृद्यविच्छिन्नमोङ्कारं घण्टानादं बिसोर्णवत्।
प्राणेनोदीर्य तत्राथ पुन: संवेशयेत्स्वरम्॥ ३४॥
वाचेसी नव्हतां गोचरू। दीर्घ प्रणवाचा उच्चारू। हृदयीं अनवच्छिन्न ओंकारू। अखंडाकारू उल्हासे॥ ३३॥ घंटानादसदृश स्थितू। जैसा कमळमृणालसूक्ष्मतंतू। तैसा मूळादारभ्य ब्रह्मरंध्रांतू। प्राणायामयुक्तू प्रणवू भासे॥ ३४॥ तेथ दीर्घ स्वरें उच्चारू। तेणें प्रणवू भासे अतिसपुरू। तो प्राणायामें करावा स्थिरू। अखंडाकारू स्वरयुक्त॥ ३५॥
एवं प्रणवसंयुक्तं प्राणमेव समभ्यसेत्।
दशकृत्वस्त्रिषवणं मासादर्वाग्जितानिल:॥ ३५॥
स्वरवर्णमात्रातीत पर। प्रणव जो कां अगोचर। तो अभ्यासबळें नर। वृत्तिगोचर स्वयें करिती॥ ३६॥ नवल उच्चाराचा चमत्कार। ऊर्ध्वमुख अखंडाकार। अभ्यासें प्रणवू करिती स्थिर। झणत्कार स्वरयुक्त॥ ३७॥ ऐसा प्राणायामयुक्त प्रणवाभ्यास। त्रिकाळ करितां सांडूनि आळस। काळीं आवर्तनें दशदश। सावकाश करितां पैं॥ ३८॥ तरी एक मास न लागतां। हा प्राणजयो आतुडे हाता। जेवीं कां सती पतिव्रता। नुल्लंघी सर्वथा पतिवचन॥ ३९॥ ये अभ्यासीं अतितत्पर। झालिया गा निरंतर। योगाभ्यासाचें सार। सहजेंचि नर पावती॥ ४४०॥ ऐसा प्राणजयो आलिया हाता। दों प्रकारीं भजनावस्था। एकी सगुण आगमोक्ता। दुजी योगाभ्यासता निर्गुणत्वें॥ ४१॥ परी दोहींचें समाधान। निर्गुणींच पावे जाण। त्या दोहींचें उपलक्षण। संक्षेपें श्रीकृष्ण सांगत॥ ४२॥ अगा ॐ हें स्मरों सरे। स्मरतां स्वरेंसीं प्राणू प्रणवीं भरे। मग प्रणवूचि तेव्हां स्फुरे। अखंडाकारें उल्हासतू॥ ४३॥ जेथूनि अक्षरें उपजती। शब्द वदोनि जेथ सामावती। मग जे उरे जाण ती स्फूर्ती। प्रणवू निश्चितीं त्या नांव॥ ४४॥ त्या प्रणवाचेनि आधारें। जिणोनियां साही चक्रें। तो प्रणवू सूनि धुरे। निजनिर्धारें चालिजे॥ ४५॥ तेथ उल्हाट शक्तीचा लोट। वैराग्याचा नेटपाट। जिणोनि काकीमुखाची वाट। सवेगें त्रिकूट घेतलें॥ ४६॥ तेव्हां अनुहताच्या घायीं। निशाण लागलें पाहीं। तंव पुढील जे योगभुयी। ते आपैती पाहीं हों सरली॥ ४७॥ तेथें हरिखें अतिउद्भट। औटपीठ आणि गोल्हाट। तेही जिणोनियां वाट। घडघडाट चालिला॥ ४८॥ मागील ठेली आठवण। झाली विकल्पाची बोळवण। सत्रावी वोळली जाण। स्वानंदजीवन जीवाचें॥ ४९॥ ते सहस्रदळाचे पाट। वरूनि उतरले घडघडाट। स्वानंदजीवनानिकट। नीट वाट पैं आले॥ ४५०॥ तें सेवितां संतोषें पाणी। निवली संतप्त अवनी। इंद्रियांची पुरली धणी। गुणांची त्रिवेणी बुडाली॥ ५१॥ तंव भ्रमरगुंफेआंत। जीवशिवांचा एकांत। तेणें जीवपणाचा प्रांत। वृत्तीसी घात हों सरसा॥ ५२॥ तेथ शिवशक्तिसंयोग। निजऐक्यें झाला चांग। परमानंदें कोंदलें अंग। सुखाचा सुखभोग सुखरूप झाला॥ ५३॥ तेव्हां हेतु मातु दृष्टांतू। खुंटली वेदवादाची मातू। झाला मीतूंपणाचा प्रांतू। एकला एकांतू एकपणें॥ ५४॥ ते एकलेपणाचें एक। म्हणावया म्हणतें नाहीं देख। ऐसे योगबळें जे नेटक। माझें निजसुख पावले॥ ५५॥ हे योगमार्गींची वाट। अतिअवघड परम कष्ट। थोर विघ्नाचा कडकडाट। प्राप्ति अवचट एकाद्या॥ ५६॥ तैसा नव्हे माझा भक्तिपंथू। तेथ नाहीं विघ्नाची मातू। भक्तांसीही हाचि ठावो प्राप्तू। ऐक तेही मातू मी सांगेन॥ ५७॥ मूळीं योग हा नाहीं स्पष्ट। म्हणाल कैंचें काढिलें कचाट। पदबंधाची चुकली वाट। वृथा वटवट न म्हणावी॥ ५८॥ येच श्लोकीं देवो बोलिला। मासादर्वाक् प्राणजयो जाहला। यांतू ध्वनितें योग बोलिला। तो म्यां केला प्रकटार्थ॥ ५९॥ जेथ प्राणापानजयो झाला। तेथ महायोगू हा भागा आला। हा योगू शास्त्रार्थ बोलिला। विशद केला आकुलागमीं॥ ४६०॥ प्राणापानजयो झाला पहा हो। जैसा साधकाचा भावो। सगुणनिर्गुण उपावो। प्राप्ती ठावो सहजेंचि॥ ६१॥ प्राणापानजयप्राप्ती। सगुण उपासनास्थिती। तद्द्वारा निर्गुणपाप्ती। उद्धवाप्रती हरि बोले॥ ६२॥ कशासारिखें तुझें ध्यान। ऐसा उद्धवें केला प्रश्न। यालागीं सांगोनियां सगुण। सवेंचि निर्गुण संस्थापी॥ ६३॥ मत्स्य साधावया बडिश जाण। चित्त साधावया मूर्ति सगुण। तेचि मूर्तीचें सगुण ध्यान। स्वयें श्रीकृष्ण सांगत॥ ६४॥
हृत्पुण्डरीकमन्त:स्थमूर्ध्वनालमधोमुखम्।
ध्यात्वोर्ध्वमुखमुन्निद्रमष्टपत्रं सकर्णिकम्॥ ३६॥
जैसें केळीचें कमळ। तैसें हृदयीं अष्टदळ। अधोमुख ऊर्ध्वनाळ। अतिकोमळ लसलसित॥ ६५॥ धरोनि प्राणायामाचें बळ। ऊर्ध्वमुख हृदयकमळ। विकसित करावें अष्टदळ। ध्यानें प्रबळ ध्यातां पैं॥ ६६॥ तेथ ऊर्ध्वमुख अधोनाळ। ध्याना आलिया हृदयकमळ। अतिउन्निद्र अष्टदळ। ध्यानीं अचंचळ स्थिरावल्या॥ ६७॥
कर्णिकायां न्यसेत्सूर्यसोमाग्नीनुत्तरोत्तरम्।
वह्निमध्ये स्मरेद्रूपं ममैतद्धॺानमङ्गलम्॥ ३७॥
कर्णिकेमाजीं चंद्रमंडळ। ध्यावें सोळा कळीं अविकळ। त्याहीमाजीं सूर्यमंडळ। अतिसोज्ज्वळ बारा कळीं॥ ६८॥ त्याहीमाजीं वन्हिमंडळ। दाही कळीं अतिजाज्वल्य। ते अग्निमंडळीं सुमंगल। ध्यावी सोज्ज्वळ मूर्ति माझी॥ ६९॥
समं प्रशान्तं सुमुखं दीर्घचारुचतुर्भुजम्।
सुचारु सुन्दरग्रीवं सुकपोलं शुचिस्मितम्॥ ३८॥
समानकर्णविन्यस्तस्फुरन्मकरकुण्डलम्।
हेमाम्बरं घनश्यामं श्रीवत्सश्रीनिकेतनम्॥ ३९॥
तेंचि माझें मूर्तीचें ध्यान। उद्धवा ऐक सावधान। आपुले मूर्तीचें आपण। ध्यान श्रीकृष्ण सांगत॥ ४७०॥ अतिदीर्घ ना ठेंगणेपण। सम अवयव समान ठाण। सम सपोष अतिसंपूर्ण। मूर्ति सुलक्षण चिंतावी॥ ७१॥ मूर्ति चिंतावी संमुख। प्रसन्नवदन अतिसुरेख। जिचें देखतांचि मुख। हृदयीं हरिख कोंदाटे॥ ७२॥ जैशीं विशाळ कमळदळें। तैसे आकर्णांत दोनी डोळे। भंवया रेखिल्याकाजळें। तैशी रेखा उजळे धनुष्याकृती॥ ७३॥ कपाळ मिरवत सांवळें। त्याहीवरी चंदन पिंवळें। माजीं कस्तूरीचीं दोनी अंगुळें। कुंकुममेळें अक्षता॥ ७४॥ दीर्घ नासिक आणि कपाळें। लखलखित गंडस्थळें। मुख सुकुमार कोवळें। अधरप्रवाळें आरक्त॥ ७५॥ श्यामचंद्राची सपोष कोर। तैशी चुबुका अतिसुंदर। मुख निमासुरें मनोहर। भक्तचकोरचंद्रमा॥ ७६॥ जैसा हिरियाच्या ज्योती। कीं दाळिंबबीजांची दीप्ती। तैशी मुखामाजीं दंतपंक्ती। दशन झळकती बोलतां॥ ७७॥ समानकर्ण दोनी सधर। स्फुरत कुंडलें मकराकार। ईषत् हास्य मनोहर। ग्रीवा सुंदर कंबु जैशी॥ ७८॥ कंठींची त्रिवळी उभवणी। माजीं मिरवे कौस्तुभमणी। ते प्रकाशली दीप्ती कवण गुणीं। तेजें दिनमणी लोपला॥ ७९॥ भुजंगाकार स्वभावो। चतुर्भुज आजानुबाहो। विशाळ वक्ष:स्थळनिर्वाहो। श्रीवत्स पहा हो चिन्हित॥ ४८०॥ श्रीवत्स श्रीनिकेतन। हृदयीं दोहीं भागीं जाण। त्रिवळीयुक्त उदर गहन। दामोदरचिन्ह त्या आलें॥ ८१॥ विजू तळपे तैसा पिंवळा। लखलखित दिसे डोळां। तेवीं कसिला सोनसळा। तेणें घनसांवळा शोभत॥ ८२॥ जैसें चांदिणें गगना माझारीं। शुभ्रता बैसे श्यामतेवरी। तेवीं श्यामांगीं चंदनाची भुरी। तेणें श्रीहरी शोभत॥ ८३॥
शङ्खचक्रगदापद्मवनमालाविभूषितम्।
नूपुरैर्विलसत्पादं कौस्तुभप्रभया युतम्॥ ४०॥
द्युमत्किरीटकटककटिसूत्राङ्गदायुतम्।
सर्वाङ्गसुन्दरं हृद्यं प्रसादसुमुखेक्षणम्।
कौस्तुभासीं संलग्न गळा। आपाद रुळे वनमाळा। कटीं बाणली रत्नमेखळा। किंकिणी जाळमाळासंयुक्त॥ ८४॥ करकंकण बाहु अंगदें। शंखचक्रपद्मगदादि आयुधें। जडित मुद्रिका नाना छंदें। कराग्रीं विनोदें बाणल्या॥ ८५॥ नाभि सखोल निर्मळ। जेथ ब्रह्मा झाला पोटींचें बाळ। जें लोकपद्माचें समूळ मूळ। तें नाभिकमळ हरीचें॥ ८६॥ जैसे सचेतन मर्गजस्तंभ। तैसे घोंटींव साजिरे स्वयंभ। उभय चरणांची अभिनवशोभ। हरीअंगीं स्वयंभ शोभती॥ ८७॥ ध्वज वज्र अंकुश देखा। यवांकित ऊर्ध्वरेखा। पद्मचक्रादि सामुद्रिका। चरण नेटका हरीचा॥ ८८॥ त्रिकोण कांतीव इंद्रनीळीं। तैशीं साजिरीं घोटींव सांवळीं। पाउलें सुकुमारें कोंवळीं। आरक्त तळीं पदप्रभा॥ ८९॥ पाउलावरी सांवळी प्रभा। तळवातळीं आरक्त शोभा। जेवीं संध्याराग मीनला नभा। तैशी शोभा हरिचरणीं॥ ४९०॥ नभमंडळीं चंद्ररेखा। तैशी पादाग्रीं मांडणी नखा। पोटऱ्या सुकुमार नेटका। जंघा सुरेखा जानुद्वय॥ ९१॥ अतिशयें माजु साना। होता अभिमान पंचाननां। मध्य देखोनि जगज्जीवना। लाजोनि राना ते गेले॥ ९२॥ अद्यापि ते झाले अरण्यवासी। लाजा मुख न दाविती कोणासी। पहावया हरिमध्यासी। लेप मेखलेसी ते झाले॥ ९३॥ चरणीं नूपुरांचा गजर। वांकीअंदुवांचा झणत्कार। मस्तकीं कुटिलालकभार। सुमनीं कबर शोभती॥ ९४॥ नानारत्नीं अतिगहन। मस्तकीं मुकुट देदीप्यमान। सर्वांगीं सुलक्षण। मूर्ति संपूर्ण हरीची॥ ९५॥ जे मूर्तीची धरिल्या सोये। तहान भूक विसरोनि जाये। ध्यानीं आतुडल्या पाहें। सुखाचा होये सुदिन॥ ९६॥ सर्वांगसुंदर श्यामवर्ण। ज्येष्ठ वरिष्ठ गंभीर गहन। सुमुख आणि सुप्रसन्न। मूर्तीचें ध्यान करावें॥ ९७॥
सुकुमारमभिध्यायेत्सर्वाङ्गेषु मनो दधत्॥ ४१॥
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यो मनसाऽऽकृष्य तन्मन:।
बुद्धॺा सारथिना धीर: प्रणयेन्मयि सर्वत:॥ ४२॥
तत्सर्वव्यापकं चित्तमाकृष्यैकत्र धारयेत्।
नान्यानि चिन्तयेद्भूय: सुस्मितं भावयेन्मुखम्॥ ४३॥
झणीं दृष्टीचा रुपेल न्याहारू। लागतां खुपेल चंद्रकरू। तैशी मूर्ति ध्यावी सुकुमारू। अति अरुवारू ध्याननिष्ठा॥ ९८॥ इंद्रियार्थीं अतिलोलुप। तें वैराग्यें आवरोनि चित्त। माझे ध्यानीं सुनिश्चित। बुद्धिमंत लाविती॥ ९९॥ विषयीं आवरोनि मन। अखंड करितां माझें ध्यान। मद्रूपचि होय जाण। ऐसें चिंतन करावें॥ ५००॥ चिंतनीं बिचकतां मन। सविवेक बुद्धिबळें जाण। नि:शंक करितां माझें स्मरण। धारणेवीण ध्यान ठसावे॥ १॥ धारणा जरी तुटोनि जाये। ध्यानठसा न तुटत राहे। मन मूर्तीच्या ठायीं पाहें। जडलें ठाये सर्वांगीं॥ २॥ अंगप्रत्यंगीं ध्यानयुक्त। जडोनि ठेलें जें चित्त। तें आवरूनि समस्त। चिंतावें निश्चित हास्यस्वदन॥ ३॥ सर्वही सांडोनियां जाण। सांगोपांग मूर्तिध्यान। चिंतावें गा हास्यवदन। स्वानंदघन हरीचें॥ ४॥ अंग प्रत्यंग मूर्तिध्यान। पुढतीं न करावेंचि गा जाण। ध्यातां माझें हास्यवदन। तल्लीन मन करावें॥ ५॥ उद्धवें केला होता प्रश्न। कशासारिखें तुझें ध्यान। तें सांगोनियां जाण। यदात्मलक्षण हरि बोले॥ ६॥ ध्याना आलें जें हास्यवदन। त्यांतूनही सांडोनि वदन। केवळ हास्याचें करावें ध्यान। हास्यामाजीं मन घालूनी॥ ७॥ त्याही हास्याचें सांडूनि ध्यान। हास्यामाजीं जो आनंदघन। तेथ प्रवेशवावें मन। अतिसावधान निजनिष्ठा॥ ८॥ ते आनंदीं आनंदयुक्त। जाहलिया आपुलें चित्त। आनंदाची उपलब्धि तेथ। होय सुनिश्चित साधकां॥ ९॥
तत्र लब्धपदं चित्तमाकृष्य व्योम्नि धारयेत्।
तच्च त्यक्त्वा मदारोहो न किञ्चिदपि चिन्तयेत्॥ ४४॥
जाहलिया आनंदपद प्राप्त। चिदाकाशचि दिसे समस्त। चिदाकाशीं चित्त। अतिसावचित्त ठेवावें॥ ५१०॥ तेव्हां चिदाकाश चित्त चिंतन। हेंही सांडूनि त्रिविध भेदध्यान। जो मी परमानंद परिपूर्ण। भेदशून्य चिदात्मा॥ ११॥ तेथें वृत्ति करूनि निमग्न। सांडावें चिदाकाशाचेंही ज्ञान। तेव्हां ज्ञेय ज्ञाता ज्ञान। हेंही स्फुरण स्फुरेना॥ १२॥
एवं समाहितमतिर्मामेवात्मानमात्मनि।
विचष्टे मयि सर्वात्मन् ज्योतिर्ज्योतिषि संयुतम्॥ ४५॥
यापरी साधकांची निजवृत्ती। माझ्या स्वरूपीं मीनल्या स्वरूपस्थिती। तेव्हां मीपणाची स्फुरे जे स्फूर्ती। तेही अद्वैतीं विराली॥ १३॥ तेथें मीतूंपणाचा भास। यापरी निमाला नि:शेष। माझें परमानंद निजसुख। अद्वैतें देख कोंदलें॥ १४॥ जेवीं ज्योतीसी मीनल्या ज्योती। दोहींची होय एकचि दीप्ति। तेवीं जीवचैतन्याची स्फूर्ती। अद्वैतसुखप्राप्ती समरसें॥ १५॥ कोटि स्नेहसूत्रें मांडिती। तेणें कोटि दीप नामाभिव्यक्ती। ते कोटि दीपीं एक दीप्ती। तेवीं जीव अद्वैतीं चिन्मात्र॥ १६॥ देहेंद्रियउपाधिवशें। जीवासी भिन्नत्व आभासे। अद्वैतबोध समरसें। जीवू प्रवेशे स्वरूपीं॥ १७॥ तेव्हां एक परमसुख। हेंही म्हणतें नाहीं देख। एकाकी एकलें एक। सुखेंसीं निजसुख कोंदलें॥ १८॥ जेवीं साखरे साखर चाखित। कीं उदकीं उदक स्नान करित। हो कां घृत रिघालें घृताआंत। सुनिश्चित सुवासा॥ १९॥ यापरी माझी ध्यानस्थिती। साधकां जाहली परमप्राप्ती। तेचि उपसंहारें श्रीपती। उद्धवाप्रती सांगत॥ ५२०॥
ध्यानेनेत्थं सुतीव्रेण युञ्जतो योगिनो मन:।
संयास्यत्याशु निर्वाणं द्रव्यज्ञानक्रियाभ्रम:॥ ४६॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायामेकादशस्कन्धे चतुर्दशोऽध्याय:॥ १४॥
यापरी तीव्र ध्यानस्थिती। समाधिपर्यंत माझी प्राप्ती। साधकासी होय शीघ्रगती। यथानिगुती ध्यान करितां॥ २१॥ हें माझें ध्यान उत्तमोत्तम। सर्वदा ठसावलें जैं नि:सीम। तैं अधिभूत अधिदैव अध्यात्म। हा त्रिविध भ्रम उरों नेदी॥ २२॥ विषयी विषयो विषयसंभ्रम। ज्ञेय ज्ञाता ज्ञानोपक्रम। कर्म कर्ता क्रियाभ्रम। यांचें रूपनाम उरों नेदी॥ २३॥ तेथ ध्येय ध्याता ध्यान। दृश्य द्रष्टा आणि दर्शन। मन मंता आणि मनन। यांचें समूळ भान उच्छेदी॥ २४॥ देवो देवी देवता। भज्य भजन भजता। लक्ष्य लक्षण लक्षिता। हेही कथा नुरेचि॥ २५॥ तेथ योग्यतेशीं महायोगू। समाधिसुखाचा सुखभोगू। जीवशिवांचा निजसंयोगू। हाही उपयोगू उडाला॥ २६॥ तेथें बोध कैंचा कैंची बोधकता। कैंची बद्धता आणि मुक्तता। ब्रह्मनाम हेही वार्ता। जाण सर्वथा बुडाली॥ २७॥ सत् चित् आणि आनंद। या नांवाचा जो प्रवाद। तो मज मायावी संबंध। ऐक तोही विषदविभाग॥ २८॥ असंताचे व्यावृत्तीं। ‘संत’ मातें म्हणती श्रुती। करितां जडाची समाप्ती। ‘चिन्मात्र’ म्हणती मजलागीं॥ २९॥ तोडितां दु:खाचा संबंधू। मातें म्हणती ‘परमानंदू’। एवं सच्चिदानंदप्रवादू। हा विपरीत बोधू विद्येचा॥ ५३०॥ जेथ असंतचि नाहीं। तेथ संत म्हणणें घडे कायी। समूळ अज्ञानचि जेव्हां नाहीं। तेव्हां चिन्मात्र हेंही म्हणे कोण॥ ३१॥ जेव्हां दु:खाचा लेशू नाहीं। तेव्हां सुख म्हणावें कोणे ठायीं। यालागीं नामरूप मज पाहीं। ठेवितां ठायीं तुकेना॥ ३२॥ समूळ उडे त्रिपुटीचें भान। या नांव गा तीव्र ध्यान। माझें करूनियां भजन। निजसमाधान पावले॥ ३३॥ एवं माझेनि ध्यानप्रकारें। संसार उडे चमत्कारें। माझें केवळ स्वरूपचि उरे। निजनिर्धारें उद्धवा॥ ३४॥ ते स्वरूपीं सुख ना दु:ख। नाहीं संतासंताचे लेख। ज्ञानाज्ञानाची अटक। ते ठायीं देख असेना॥ ३५॥ तेथ नाम रूप गुण। नाहीं मीतूंपणाची खूण। विद्याअविद्याभान। आनंदघन निजरूप॥ ३६॥ भक्तिसुखाचे हेलावे। नानाउपायगौरवें। उद्धवालागीं देवें। निजानुभवें दीधले॥ ३७॥ ठसावल्या माझी भक्ती। सकळ सिद्धींची होय प्राप्ती। संदेह नाहीं ये अर्थीं। जाण निश्चितीं उद्धवा॥ ३८॥ भजनपंथें निरंतर। दोहोनि भक्तिसुखक्षीर। त्याचेंही मंथोनिया सार। उद्धवासी श्रीवर देता झाला॥ ३९॥ तो हा चौदावा अध्यावो। स्वमुखें बोलिला देवो। भक्तीसी मी वश्य पहा हो। येर उपावो तो गौण॥ ५४०॥ सकळ योगांचें योगगव्हर। वेदांत निजभांडार। सकळ सिद्धींचें परम सार। भक्ति साचार हरीची॥ ४१॥ निजभाग्याची परम जोडी। महासुखाची आवडी गाढी। सकळ गोडियांची गोडी। भक्ति रोकडी हरीची॥ ४२॥ भावें करितां भगवद्भजन। श्वपच जाहले पावन। जेणें भक्तीशीं विकलें मन। त्याआधीन सदा देवो॥ ४३॥ उपेक्षूनियां निजमुक्ती। एका जनार्दनीं पढिये भक्ती। त्याचेनि प्रसादें भगवत्प्राप्ती। जाहली अहोराती खेळणें॥ ४४॥ तो जरी भगवत्प्राप्ती नेघे। तरी ते दाटूनि घर रिघे। ऐसे गुरुभक्तीचेनि योगें। देवो सर्वांगें भूलला॥ ४५॥ भगवत्प्राप्ती पाहिजे ज्यासी। तेणें न विसंबावें मद्भक्तीसीं। अखंड स्मरे जो हरिनामासी। देवो त्यापाशीं तिष्ठत॥ ४६॥ सकळ भजनाचे शिरीं। रामनाम दों अक्षरीं। सदा गर्जे ज्याची वैखरी। धन्य चराचरीं तो एक॥ ४७॥ एका जनार्दना शरण। इतुकें करितां नामस्मरण। पाठिमोरें होय जन्ममरण। महासिद्धी आंगण वोळंगती॥ ५४८॥
इति श्रीभागवते महापुराणे एकादशस्कन्धे एकाकारटीकायां श्रीकृष्णोद्धवसंवादे भक्तिरहस्यावधारणयोगो नाम चतुर्दशोऽध्याय:॥ १४॥ श्रीकृष्णार्पणमस्तु॥ मूळश्लोक॥ ४६॥ ओव्या॥ ५४८॥
॥ श्री ॐ तत्सत्-श्रीकृष्ण प्रसन्न॥
अध्याय पंधरावा
श्रीगणेशाय नम:॥ श्रीकृष्णाय नम:॥ ॐ नमो श्रीजनार्दन॥ सकळ सिद्धींचें सिद्धस्थान। सकळ ऋद्वींचें परम निधान। तुझे श्रीचरण सर्वार्थी॥ १॥ निधान साधावया अंजन। नयनीं काळिमा घालिती जन। तेणें काळवंडले नयन। थितें निधान दिसेना॥ २॥ तैसे नव्हती तुझे चरण। करितां चरणरजवंदन। नि:शेष काळिमा निरसे जाण। पूर्ण निधान दाविसी॥ ३॥ अंजनें साधितां निधान। तेथ छळावया पावे विघ्न। बळी देऊनि साधिल्या जाण। नश्वरपण तयासी॥ ४॥ तैसे नव्हती तुझे चरण। अवलीळा करितां स्मरण। नित्य सिद्ध अव्यय जाण। निजनिधान ठसावे॥ ५॥ हें साधूनियां निधान। झाले सनकादिक संपन्न। नारदाचें उदारपण। येणेंचि जाण वाखाणे॥ ६॥ वज्रकवच प्रल्हादासी। हेंचि भांडवल गांठी त्यासी। शुकादि वामदेवांसी। महिमा येणेंसीं पावले ते॥ ७॥ व्यासवाल्मीकि महावेव्हारे। येणेंचि भांडवलें झाले खरे। त्यांचेनि भांडवलें लहान थोरें। छेदूनिदरिद्रें नांदती॥ ८॥ त्या सद्गुरूचे श्रीचरण। परम निधींचें निधान। एका जनार्दना शरण। हें आम्हां परिपूर्ण भांडवल॥ ९॥ येणेंचि भांडवलें प्रस्तुत। प्राप्त झालें श्रीभागवत। तेथ उद्धवासी श्रीअनंत। ज्ञानमथितार्थ सांगत॥ १०॥ त्या दोघांची एकांत मातु। प्रकट जाहली जगाआंतू। हा परीक्षितीचा विख्यातू। उपकार लोकांतू थोर झाला॥ ११॥ ज्याचे श्रद्धेच्या आवडीं। शुक पावला लवडसवडी। तेणें गुह्य ज्ञानाची गोडी। प्रकट उघडी दाखविली॥ १२॥ त्या शुकाचें नवल महिमान। कानीं न सांगतां गुह्य ज्ञान। श्रवणें तोडोनि भवबंधन। परीक्षिती जाण उद्धरिला॥ १३॥ एथवरी श्रवणाची गोडी। प्रसिद्ध दाविली उघडी। तरी अभाग्यु दांतखिळी पाडी। कानाची नुघडी निमटली मिठी॥ १४॥ श्रवणीं घालितां वाडेंकोडें। कथासारामृत बाहेरी सांडे। श्रवणा आंतौता थेंबही न पडे। यालागीं रडे विषयांसी॥ १५॥ असो हे श्रोत्यांची कथा। कथा सांगे जो वक्ता। तोही तैसाचि रिता। घोटु आंतौता पावों नेदी॥ १६॥ जैसा गुळ उंसाचा घाणा। रसु बाहेरी जाये मांदणा। फिकेपणें करकरी गहना। ते गती वदना वक्त्याचे॥ १७॥ जें कथामृताचें गोडपण। तें सद्गुरूवीण चाखवी कोण। यालागीं जनार्दना शरण। जेणें गोडपण चाखविलें॥ १८॥ परी चाखविली उणखूण। तेही अभिनव आहे जाण। स्वाद स्वादिता आपण। होऊनि गोडपण चाखवी॥ १९॥ बाळकाहातीं दिधल्याफळा। खावें हें न कळे त्या अबळा। त्याचे मुखीं घालूनि गळाळा। गोडीचा जिव्हाळा जनक दावी॥ २०॥ गोडी लागल्या बाळकासी। तेंचि फळ खाय अहर्निशीं। तेवीं जनार्दनें आम्हांसी। गोडी श्रीभागवतासी लाविली॥ २१॥ ऐसी लाविली गोडी चढोवडी। तेणें झाली नवलपरवडी। मज सांडितांही ते गोडी। गोडी न सोडी मजलागीं॥ २२॥ ते गोडीनें गिळिलें मातें। मीपण गेलें गोडीआंतौतें। ते गोडीचें उथळलें भरितें। सबाह्य रितें उरों नेदी॥ २३॥ हें शुकमुखींचें श्रेष्ठ फळ। गोडपणें अतिरसाळ। त्वचाआंठोळीवीण केवळ। गोडीच सकळ फळरूपें॥ २४॥ ते श्रीभागवतींची गोडी। श्रीकृष्णें निजआवडीं। उद्धवासी कडोविकडी। भक्ति चोखडी चाखविली॥ २५॥ करितां माझें भजन। धरितां माझे मूर्तीचे ध्यान। समाधिपर्यंत साधन। उद्धवासी संपूर्ण सांगीतलें॥ २६॥ ते कृष्णामुखींची मातू। ऐकोनि चौदाव्या अध्यायांतू। उद्धव हरिखला अद्भुतू। माझा निजस्वार्थू फावला॥ २७॥ मज कृष्णमूर्तीचें ध्यान। सहजें सदा असे जाण। तेणेंच होय समाधि समाधान। तरी कां प्रश्न करूं आतां॥ २८॥ ऐकोनि चौदावा अध्यायो। झाला उद्धवासी हा दृढ भावो। हें देखोनि स्वयें देवो। पुढील अभिप्रावो सूचितू॥ २९॥ दृढ विश्वासेंसीं जाण। करितां माझें भजनध्यान। पुढां उपजे सिद्धींचें विघ्न। ते अर्थीं श्रीकृष्ण उपदेशी॥ ३०॥ पंधरावे अध्यायीं निरूपण। भक्तीं माझें करितां भजन। अवश्य सिद्धि उपजती जाण। त्या त्यागाव्या विघ्न म्हणोनी॥ ३१॥
श्रीभगवानुवाच
जितेन्द्रियस्य युक्तस्य जितश्वासस्य योगिन:।
मयि धारयतश्चेत उपतिष्ठन्ति सिद्धय:॥ १॥
प्राणापानजयो जयापासीं। इंद्रियजयो असे ज्यासी। यावरी उल्हास मद्भक्तीसी। चित्तअहर्निशीं मद्युक्त॥ ३२॥ उद्धवा गा त्याच्या ठायीं। अनिवार सिद्धि उपजती पाहीं। ये अर्थी संदेह नाहीं। जे जे समयीं जें इच्छी॥ ३३॥ ऐसें उद्धवें ऐकतां। चमत्कारू झाला चित्ता। समूळ सिद्धींची कथा। श्रीकृष्णनाथा पुसों पा॥ ३४॥
उद्धव उवाच
कया धारणया कास्वित्कथंस्वित्सिद्धिरच्युत।
कति वा सिद्धयो ब्रूहि योगिनां सिद्धिदो भवान्॥ २॥
कोण्या धारणा कोण सिद्धि। ते सांगावी विधानविधी। संख्या किती सकळ सिद्धि। तेंही कृपानिधी सांगिजे॥ ३५॥ या सकळ सिद्धींची कथा। तूं एक जाणता तत्त्वतां। ते मज सांगिजे जी अच्युता। तूं सिद्धिदाता योगियां॥ ३६॥
श्रीभगवानुवाच
सिद्धयोऽष्टादश प्रोक्ता धारणायोगपारगै:।
तासामष्टौ मत्प्रधाना दशैव गुणहेतव:॥ ३॥
सिद्धि अष्टादश जाण। त्यांची धारणा भिन्न भिन्न। ऐंसे बोलिले योगज्ञ। योगसंपन्न महासिद्ध॥ ३७॥ या नांव गा सिद्धि समस्ता। यांत अष्ट महासिद्धि विख्याता। त्या माझे स्वरूपीं स्वरूपस्थिता। आणिकासी तत्त्वतां त्या नाहीं॥ ३८॥ मनसा वाचा कर्मणा जाण। विसरोनि देहाचें देहपण। माझेनि स्वरूपें अतिसंपन्न। चैतन्यघन जो झाला॥ ३९॥ त्यापाशीं या सिद्धि जाण। उभ्या असती हात जोडून। परी तो न पाहे थुंकोन। निचाड जाण यापरी॥ ४०॥ इतर दहा सिद्धींची कथा। ज्या सत्त्वगुणें गुणभूता। साधक शुद्धसत्त्वात्मा होतां। त्यापाशीं सर्वथा प्रकटती॥ ४१॥ अष्ट महासिद्धींची कथा। तुज मी सांगेन तत्त्वतां। ज्या माझे स्वरूपीं स्वभावतां। असती वर्ततां अहर्निशीं॥ ४२॥
अणिमा महिमा मूर्तेर्लघिमा प्राप्तिरिन्द्रियै:।
प्राकाम्यं श्रुतदृष्टेषु शक्तिप्रेरणमीशिता॥ ४॥
गुणेष्वसङ्गो वशिता यत्कामस्तदवस्यति।
एता मे सिद्धय: सौम्य अष्टावौत्पत्तिका मता:॥ ५॥
अणिमा महिमा लघिमास्थिती। या तिन्ही देहसिद्धीचे प्राप्ती। प्राप्तरिंद्रियै: जे वदंती। ते जाण चौथी महासिद्धी॥ ४३॥ प्राकाम्य श्रुतदृष्टता। ते पांचवी सिद्धि गा सर्वथा। शक्तिप्रेरण ईशिता। हे जाण तत्त्वतां सहावी सिद्धि॥ ४४॥ माझे धर्म जेथ वश होती। ते वशिता बोलिजे सिद्धांतीं। ते सातवी सिद्धि वदंती। जाण निश्चितीं उद्धवा॥ ४५॥ त्रिलोकीं भोग जो निरुपम। तो न करितां परिश्रम। इच्छामात्रें उत्तमोत्तम। भोग सुगम हों लागे॥ ४६॥ (‘यत्कामस्तदवस्यति’) इच्छिल्या कामसुखाची प्राप्ति। त्रिभुवनींची भोगसंपत्ती। एकेच काळें अवचितीं। ते जाण पां ख्यातीं आठवी सिद्धि॥ ४७॥ या अष्टमहासिद्धींची राशी। स्वभावें असे मजपाशीं। साधक शिणतां प्रयासीं। एकादी कोणासी उपतिष्ठे॥ ४८॥ हे महासिद्धींची व्युत्पत्ती। इतर दहा ज्या बोलिजेती। त्याही सांगेन तुजप्रती। यथानिगुती उद्धवा॥ ४९॥
अनूर्मिमत्त्वं देहेऽस्मिन्दूरश्रवणदर्शनम्।
मनोजव: कामरूपं परकायप्रवेशनम्॥ ६॥
स्वच्छन्दमृत्युर्देवानां सहक्रीडानुदर्शनम्।
यथासङ्कल्पसंसिद्धिराज्ञाप्रतिहता गति:॥ ७॥
देहीं बाधिती ना ऊर्मि साही। ते अनूर्मिसिद्धि पहिली पाहीं। दूरली वाचा ऐके ठायीं। दूरश्रवण नवाई दुसरी सिद्धि॥ ५०॥ त्रिलोकींचा सोहळा। बैसले ठायीं देखे डोळां। हे तिसरे सिद्धीची लीला। दूरदर्शनकळा ती नांव॥ ५१॥ मनोजवसिद्धि ऐशी आहे। कल्पिल्या ठायासी पाहें। मनोवेगें शरीर जाये। चौथी होये हे सिद्धि॥ ५२॥ कामरूप सिद्धिची परी। जैशिया रूपाची कामना करी। तैसें रूप तत्काळ धरी। हे पांचवी खरी कामनासिद्धी॥ ५३॥ आपुलें शरीर ठेवूनि दूरी। परशरीरीं प्रवेश करी। हे परकायप्रवेशपरी। सहावी साजिरी अतिसिद्धि॥ ५४॥ काळासी वश्य नाहीं होणें। आपुलिये इच्छेनें मरणें। हे सातवी सिद्धि जाणणें। स्वच्छंद मरणें ती नांव॥ ५५॥ स्वर्गीं देवांचें जें क्रीडन। त्यांचें हा देखे दर्शन। स्वयें क्रीडावया अंगवण। ते सिद्धि जाण आठवी॥ ५६॥ जैसा संकल्प तैसी सिद्धि। ते नववी जाण पां त्रिशुद्धी। राजाही आज्ञा शिरीं वंदी। ज्याची गमनसिद्धि सर्वत्र॥ ५७॥ ज्याची आज्ञा आणि गमन। कोठेंही अवरोधेना जाण। हें दहावे सिद्धीचें लक्षण। ज्ञानविचक्षण जाणती॥ ५८॥ या गुणहेतुसिद्धींची विधी। म्यां सांगीतली हे त्रिशुद्धी। यांहीहोनि क्षुद्रसिद्धी। त्याही निजबुद्धीं अवधारीं॥ ५९॥
त्रिकालज्ञत्वमद्वन्द्वं परचित्ताद्यभिज्ञता।
अग्न्यर्काम्बुविषादीनां प्रतिष्टम्भोऽपराजय:॥ ८॥
क्षुद्रसिद्धि पंचलक्षण। भूत भविष्य वर्तमान। या त्रिकाळांचें जें ज्ञान। तें पहिलें जाण ये ठायीं॥ ६०॥ सुख दु:ख शीत उष्ण। मृदु आणि अतिकठिण। या द्वंद्वांसी वश नव्हे जाण। तें दुसरें लक्षण सिद्धीचें॥ ६१॥ पराचें स्वप्न स्वयें सांगणें। पुढिलाचे चित्तींचें जाणणें। हे तिसरी सिद्धि म्हणणें। ऐक लक्षणें चौथीचीं॥ ६२॥ अग्नि वायु आणि उदक। शस्त्र विष आणि अर्क । यांचें प्रतिस्तंभन देख। ते सिद्धि निष्टंक पैं चौथी॥ ६३॥ कोणासी जिंकिला न वचे पाहें। जेथींचा तेथ विजयी होये। एकला सर्वत्र विजयो लाहे। हे पांचवी आहे विजयसिद्धि॥ ६४॥
एताश्चोद्देशत: प्रोक्ता योगधारणसिद्धय:।
यया धारणया या स्याद्यथा वा स्यान्निबोध मे॥ ९॥
उद्देश्यमात्रें सिद्धींची गती। म्यां सांगीतली तुजप्रती। आतां कोण धारणा कोण स्थिती। सिद्धीची प्राप्ती होय ते ऐक॥ ६५॥ अष्ट महासिद्धींची धारणा। गुणहेतु दहा सिद्धी जाणा। क्षुद्रसिद्धि पंचलक्षणा। त्यांचे साधित्या साधना हरि बोले॥ ६६॥
भूतसूक्ष्मात्मनि मयि तन्मात्रं धारयेन्मन:।
अणिमानमवाप्नोति तन्मात्रोपासको मम॥ १०॥
अष्ट महासिद्धि स्वाभाविका। माझ्या ठायीं असती देखा। या असाध्य साधावया आवांका। करि त्या साधका साधन सांगे॥ ६७॥ मी अणुरेणूचाही अणुरेण। जीवाचाही हृदयस्थ जाण। तेथ अणुतन्मात्र करूनि मन। माझ्या ठायीं जाण जो राखे॥ ६८॥ अणुतन्मात्र ध्यान सदा राहे। त्याचा अणुमात्रचि देह होये। कीटकीभृंगीच्या ऐसें पाहें। अणिमेची लाहे तो सिद्धी॥ ६९॥ तो अच्छिद्रीं निघोनि जाये। जगाच्या डोळॺामाजीं समाये। कोठेंही खुपेना पाहें। हे अणिमेची लाहे महासिद्धी॥ ७०॥
महत्यात्मन्मयि परे यथासंस्थं मनो दधत्।
महिमानमवाप्नोति भूतानां च पृथक् पृथक्॥ ११॥
माझें स्वरूप अनंत अपार। महत्तत्त्वाहोनि अतिथोर। आणि महत्तत्त्वाचाहीं साचार। नियंता ईश्वर जो कां मी॥ ७१॥ हे सिद्धि साधावया जो नर। माझी धारणा धरी अपरंपार। तेवढेंच होय त्याचें शरीर। हे सिद्धि महाथोर महिमान॥ ७२॥ सूक्ष्म कापुसाचे तंतू पाहें। तो कल्पनेऐसा पटू होये। माझी महती धारणा वाहे। तो माझी सिद्धि लाहे महिमत्वें॥ ७३॥ तुकितां त्याच्या समान भारा। न पुरे सपर्वत सगळी धरा। एवढॺा महत्तत्त्वांचा उभारा। सिद्धिद्वारा तो पावे॥ ७४॥
परमाणुमये चित्तं भूतानां मयि रञ्जयन्।
कालसूक्ष्मार्थतां योगी लघिमानमवाप्नुयात्॥ १२॥
वाय्वादि प्राणप्रमाण। जेणें काळसूत्राचें गणन। तो परमाणुरूप भगवंत जाण। त्याचेंचि दृढ ध्यान सदा जो करी॥ ७५॥ परमाणुधारणेचा महिमा। त्याचा देहासी ये अतिलघिमा। तो मशकीं चढोनि पाहे मा। उडे व्योमामाजीं सुखें॥ ७६॥ अणिमादि तीनी धारणा। या देहींच्या सिद्धिजाणा। लहान थोर हळूपणा। देहलक्षणां उपजवी॥ ७७॥ उरल्या ज्या पंचमहासिद्धि। त्यांच्या धारणेचा विधी। तोही सांगेन त्रिशुद्धी। ऐक सुबुद्धी उद्धवा॥ ७८॥
धारयन्मय्यहंतत्त्वे मनो वैकारिकेऽखिलम्।
सर्वेन्द्रियाणामात्मत्वं प्राप्तिं प्राप्नोति मन्मना:॥ १३॥
मूळींचा शुद्ध अहंकारू। ज्यापासूनि इंद्रियविकारू। इंद्रियअधिष्ठात्री सुरवरू। चेतविता ईश्वरू जो कां मी॥ ७९॥ त्या माझ्या ठायीं धारणा धरितां। इंद्रिय अधिष्ठात्री देवता। त्यासी पावोनि एकात्मता। इंद्रियप्रकाशता स्वयें लाहे॥ ८०॥ जे कां इंद्रियव्यापार जगाचे। प्रकाशूनि हा देखे साचे। एवढिये इंद्रियप्राप्तीचें। साधी सिद्धीचें वैभव॥ ८१॥ तेव्हां ज्याचा जो जेथ पाहे। इंद्रियांचा व्यापारू होये। तो येणेंचि केला आहे। ऐशी प्रतीति होये इंद्रियप्राप्ती॥ ८२॥
महत्यात्मति य: सूत्रे धारयेन्मयि मानसम्।
प्राकाम्यं पारमेष्ठॺं मे विन्दतेऽव्यक्तजन्मन:॥ १४॥
जें महत्तत्त्व गा जाण। तें मायेचें प्रथम स्फुरण। ज्यासी क्रिया सूत्रप्रधान। नामाभिधान बोलती॥ ८३॥ तेथ अजन्मा मी आपण। जाहलों सूत्राचा सूत्रात्मा जाण। त्या माझ्या स्वरूपाचें ध्यान। सावधान जो करी॥ ८४॥ ज्या सूत्राचेनि प्रकाशप्रवाहें। ब्रह्मांड हिरण्यगर्भ प्रकाशला राहे। ते प्रकाशता त्यासी वश्य होये। येणें सूत्रात्मा पाहे निदिध्यासनें॥ ८५॥ त्या निदिध्यासनापोटीं। करूं शके ब्रह्मांडकोटी। एवढी प्रकाशसिद्धि गोमटी। हे मजवीण नुठी साधकां॥ ८६॥
विष्णौ त्र्यधीश्वरे चित्तं धारयेत्कालविग्रहे।
स ईशित्वमवाप्नोति क्षेत्रक्षेत्रज्ञचोदनाम्॥ १५॥
मायादित्रिगुणनियंता। जो कळिकाळातें आकळिता। उत्पत्तिस्थितिप्रळयकर्ता। जाण तत्त्वतां अंतर्यामी॥ ८७॥ त्या मज विष्णूचें ध्यान। निरंतर जो करी जाण। त्यासी अदृष्टद्रष्टेपण। शक्तिप्रेरण ईशित्वें ये॥ ८८॥ मिथ्या बुद्धिबळाच्या खेळाप्रती। स्वारीची जाणे गति निगुती। तेवीं मिथ्या संसारप्रतीती। भूतांची आगती निर्गती स्वयें जाणे॥ ८९॥ तो जीवादि शरीरप्रेरण। स्वयें करूं शके आपण। करितां अंतर्याम्याचे ध्यान। एवढी सिद्धि जाण उपतिष्ठे॥ ९०॥ तो आपुलेनि प्रतापस्वभावीं। मशकाहातीं मेरू विभांडवी। नीचहस्तें सृष्टि विध्वंसूनि मांडवी। कां इंद्रातें मारवी उंदिराहातीं॥ ९१॥ यापरी एकातें मारवी। जीवें गेलिया जीववी। अचेतनातें पालेजवी। ये सिद्धिची पदवी ईशित्व॥ ९२॥
नारायणे तुरीयाख्ये भगवच्छब्दशब्दिते।
मनो मय्यादधद्योगी मद्धर्मा वशितामियात्॥ १६॥
जीव शिव आणि प्रकृति। यांहूनि परती चौथी स्थिती। ज्यातें नारायण म्हणती। जाण निश्चितीं सज्ञान॥ ९३॥ जागृति स्वप्न सुषुप्ती। यांवेगळी तुरीय स्थिती। त्यातें नारायण म्हणती। यथानिगुती सज्ञान॥ ९४॥ दृश्य द्रष्टा दर्शन। यां अतीत चौथा जाण। त्यातें म्हणती नारायण। ज्ञानविचक्षण निजबोधें॥ ९५॥ त्रिपुटी वेगळी जे मातू। असोनियां त्रिपुटीआंतू। जो कां त्रिपुटीसी अलिप्तू। तो मी विख्यातू नारायण॥ ९६॥ यश श्री वैराग्य ज्ञान। ऐश्वर्य औदार्य हे षड्गुण। नित्य वसती परिपूर्ण। तो मी नारायण भगवंत॥ ९७॥ त्या मज नारायणातें ध्यातां। माझी वशिता सिद्धि ये हाता। सर्व कर्मीं अलिप्तता। भोगून अभोक्ता भोगातें॥ ९८॥
निर्गुणे ब्रह्मणि मयि धारयन् विशदं मन:।
परमानन्दमाप्नोति यत्र कामोऽवसीयते॥ १७॥
चित्तदेवता सत्त्वगुण। इंद्रियें तो रजोगुण। विषय केवळ तमोगुण। हेंचि आवरणपरमानंदा॥ ९९॥ परमानंदासी आवरण। आडवे असती तिन्ही गुण। त्यांतें सांडूनि निर्गुण। ब्रह्मपरिपूर्ण मज जो ध्याये॥ १००॥ त्यासी माझिये ध्यानस्थितीं। होय परमानंदअवाप्ती। ज्या आनंदामाजीं उपशांती। होय निश्चितीं सकळ कामा॥ १॥ झालिया परमानंदप्राप्ती। सकळ काम निमग्न होती। जेवीं सूर्योदयाप्रती। तारा हारपती सचंद्र॥ २॥ तेवीं परमानंदाच्या पोटीं। हारपती कामकोटी। तेथ इंद्रियसुखाच्या गोठी। लाजोनि उठाउठी विरताती॥ ३॥ उद्धवा ऐक पां निश्चितीं। नव्हतां परमानंदप्राप्ती। कदा नव्हे कामनिवृत्ती। नाना युक्ती करितांही॥ ४॥ या अष्ट महासिद्धीच्या धारणा। तुज म्यां सांगीतल्या जाणा। यांसी साधावया आंगवणा। सुरनरगणां पैं नाहीं॥ ५॥ यापरी अष्ट महासिद्धी। तुज म्यां सांगीतली धारणाविधी। आतां गुणहेतुकाचे प्रबोधीं। सावधबुद्धी अवधारीं॥ ६॥
श्वेतद्वीपपतौ चित्तं शुद्धे धर्ममये मयि।
धारयञ्छ्वेततां याति षडूर्मिरहितो नर:॥ १८॥
सांडूनि कार्येंसीं रजतमें दूरी। जो मी सत्त्वाधिष्ठाता श्रीहरी। त्या माझी जो धारणा धरी। अखंडाकारी सर्वदा॥ ७॥ तो माझेनि सत्त्वे सत्त्ववंतू। होय षडूर्मीसीं रहितू। शोक मोह जरा मृत्यू। क्षुधा तृषा हातू लावूं न शके॥ ८॥
मय्याकाशात्मनि प्राणे मनसा घोषमुद्वहन्।
तत्रोपलब्धा भूतानां हंसो वाच: शृणोत्यसौ॥ १९॥
सघोष प्राणेंसीं शब्दमहिमा। अवश्य विश्रांतीस ये व्योमा। त्या आकाशाचाही मी आत्मा। मजमाजीं व्योमा रहिवासू॥ ९॥ तो मी सघोष प्राणांचाही प्राण। सकळ वाचांची वाचा जाण। वागीश्वरीचें जीवन। सत्य मी जाण उद्धवा॥ ११०॥ ऐसिया माझें दृढ ध्यान। निजहृदयीं जो करी जाण। तो विचित्रा वाचांचें श्रवण। जीवस्वरूपें जाण स्वयें ऐके॥ ११॥ सनाद माझी धारणापोटीं। धरितां जगाच्या गुह्य गोष्टी। त्याचे पडती कर्णपुटीं। ते काळीं उठी दूरश्रवणसिद्धि॥ १२॥
चक्षुस्त्वष्टरि संयोज्य त्वष्टारमपि चक्षुषि।
मां तत्र मनसा ध्यायन् विश्वं पश्यति सूक्ष्मदृक्॥ २०॥
सविता तो मी नारायण। ऐसें डोळॺांमाजीं करी ध्यान। तेव्हां डोळाचि मद्रूप जाण। सविता आपण स्वयें होय॥ १३॥ एवं डोळा सविता हें माझे ध्यान। तिहींस एकात्मता झाल्या जाण। तेव्हां सूक्ष्मद्रष्टा होय आपण। जग संपूर्ण तो देखे॥ १४॥ बैसलेचि ठायीं जाण। चतुर्दशभुवनांचें दर्शन। एके काळें देखे आपण। दूरदर्शन हे सिद्धि॥ १५॥
मनो मयि सुसंयोज्य देहं तदनु वायुना।
मद्धारणानुभावेन तत्रात्मा यत्र वै मन:॥ २१॥
अत्यंत सवेग तें मन। त्या मनाचेंही मी मन जाण। त्या मनासी मजसीं अभिन्न। प्राणधारणयुक्त राखे॥ १६॥ ऐसें प्राणधारणयुक्त मन। मजसीं राखतां अभिन्न। त्या धारणाप्रभावें जाण। मनोवेगें गमन देहासी होय॥ १७॥ जेथें संकल्पें जाय मन। तेथें होय देहाचेंही गमन। हे मनोजवसिद्धि जाण। धारणालक्षण या हेतू॥ १८॥
यदा मन उपादाय यद्यद्रूपं बुभूषति।
तत्तद्भवेन्मनोरूपं मद्योगबलमाश्रय:॥ २२॥
पहिली मनोजवधारणा। त्याहीवरी माझी भावना। अचिंत्य सामर्थ्य माझें जाणा। अनुसंधाना जो आणी॥ १९॥ मी नाना रूपांतें धरिता। सवेंचि रूपांतरें विसर्जिता। ऐशी माझी संपूर्ण सत्ता। ते त्याच्या हाता पैं लाभे॥ १२०॥ एवं माझिया दृढ धारणा। माझें सामर्थ्य ये त्याच्या मना। मग ज्या रूपाची करी भावना। तद्रूप जाणा स्वयें होय॥ २१॥ सुरनरपन्नगांमाजीं जें जें रूप। धरावया करी जो संकल्प। तो तत्काळ गा मद्रूप। हे कामरूप सिद्धि माझी॥ २२॥
परकायं विशन् सिद्ध आत्मानं तत्र भावयेत्।
पिण्डं हित्वा विशेत्प्राणो वायुभूत: षडङ्घ्रिवत्॥ २३॥
परकायप्रवेशू करितां जाणा। आवरूनि स्वदेहींच्या सर्व प्राणां। जेथ प्रवेश करितां आपणा। तेथ आपुली भावना करावी॥ २३॥ तेव्हां लिंगदेहाचे माथां। जीवप्राणांची एकात्मता। धरोनि देहांतर अहंता। बाह्य वायूच्या पंथा मिळोनि जाय॥ २४॥ तेथ मिळतांचि मिळवणी। या देहाचा अभिमान सांडूनी। देहांतरीं प्रवेशोनी। मी म्हणोनी उठे तेथें॥ २५॥ जैसें कमळींहूनि कमळांतरा। वायुबळें प्रवेशणें भ्रमरा। तैसें सांडोनियां स्वशरीरा। देहांतरा जीवू जाये॥ २६॥ हें परकायप्रवेशन। म्यां सांगीतलें संपूर्ण। माझिया स्वरूपाचें धारण। तें निजलक्षण अवधारीं॥ २७॥ दृढ ध्यातां माझे स्वरूपासी। तैं सर्व देहीं तूंचि आहेसी। न सांडितां निजदेहासी। हो परकायेंसीं प्रवेशू॥ २८॥ स्वसत्ता स्वदेह सांडणें। तेचि अर्थींचीं लक्षणें। पुढिले श्लोकीं नारायणें। विशद निरूपणें निरूपिलीं॥ २९॥
पार्ष्ण्याऽऽपीडॺ गुदं प्राणं हृदुर:कण्ठमूर्धसु।
आरोप्य ब्रह्मरन्ध्रेण ब्रह्म नीत्वोत्सृजेत्तनुम्॥ २४॥
देहत्यागाचें प्राणधारण। तेंच स्वच्छंदमृत्यूचें लक्षण। तदर्थी जें प्राणोत्क्रमण। तें योगधारण अवधारीं॥ १३०॥ मूळाधारीं वामचरण। टांचेचेनि नेटें जाण। अपानाचें अधोगमन। गुद पीडून राखावें॥ ३१॥ हृदयीं विचरता जो प्राण। त्याचें सदा ऊर्ध्व गमन। तो प्राणायामें आवरून। अधोमुख जाण करावा॥ ३२॥ अपानाचें ऊर्ध्व गमन। स्वाधिष्ठानपर्यंत जाण। प्राणाचें अध:संचरण। तेचि चक्रीं जाण जैं घडे॥ ३३॥ तेथ प्राणापानांची बुझावण। त्या चक्रामाजीं करी समान। ऐक्ये पडिलें आलिंगन। एकात्मता जाण चालिले॥ ३४॥ सांडोनि अपानाची अधोवाट। प्राणें त्यजिला हृदयकंठ। फोडूनि सुषुम्नेचें कपाट। ऊर्ध्वमुखें नीट चालिले॥ ३५॥ जिणतां सुषुम्नेचें घर। भेदिले साही चक्रांचे पदर। उघडूनि काकीमुखाचें द्वार। ब्रह्मरंध्र ठाकिलें॥ ३६॥ तेथें पावल्या यथानिगुतीं। या देहाचीसांडूनि स्थिती। जो कामभोग वाहे चित्तीं। त्या देहाची प्राप्ती तो पावे॥ ३७॥ वैकुंठ कैलास अमरावती। सार्वभौम चक्रवर्ती। जे कामना कामी चित्तीं। ते पावे गती तत्काळ॥ ३८॥ जरी तो ब्रह्मसायुज्यता वाहे। तरी सांडूनि देहाची सोये। शुद्ध ब्रह्मधारणा पाहे। तो ब्रह्मचि होये स्वत:सिद्ध॥ ३९॥ यापरी प्राणधारण। करूनि निवर्ते जो जाण। तें स्वच्छंदमृत्यूचें लक्षण। त्याआधीन कळिकाळ॥ १४०॥
विहरिष्यन्सुराक्रीडे मत्स्थं सत्त्वं विभावयेत्।
विमानेनोपतिष्ठन्ति सत्त्ववृत्ती: सुरस्त्रिय:॥ २५॥
देवांचे दिव्यभोगीं आसक्त। योगियाचें झाल्या चित्त। ते प्राप्तिलागीं येथ। माझें सत्त्व निश्चित चिंतावे॥.४१॥ जेणें सत्त्वे म्यां जाण। स्वर्गीं स्थापिले सुरगण। त्या सत्त्वगुणाचें धारण। निजहृदयीं जाण जो राखे॥.४२॥ ध्यातां सुरस्त्रियांची कामनिष्ठा। तो पावे सुरस्वर्गींची प्रतिष्ठा। विमानीं चढोनि वरिष्ठा। करी कामचेष्टा अप्सरांसीं॥.४३॥
यथा संकल्पयेद् बुद्धॺा यदा वा मत्पर: पुमान्।
मयि सत्ये मनो युञ्जंस्तथा तत्समुपाश्नुते॥ २६॥
संकल्पमात्रें करी समस्त। जो मी सत्यसंकल्प भगवंत। त्या माझे ठायीं चित्त। विश्वासयुक्त जो राखे॥.४४॥ तो जे जे काळीं जे जे देशीं। जे जे कर्मीं जे जे अवस्थेसी। जें जें कांहीं वांछीं मानसीं। ते संकल्प त्यापाशीं सदा सफळ॥.४५॥ मी सत्यसंकल्प भगवंत। हृदयीं धरिल्याध्यानयुक्त। त्याचें जे जे काम कामी चित्त। ते संकल्प प्राप्त होती त्यासी॥.४६॥
यो वै मद्भावमापन्न ईशितुर्वशितु: पुमान्।
कुतश्चिन्न विहन्येत तस्य चाज्ञा यथा मम॥ २७॥
जो कां मी सर्वांचा नियंता। स्वयें स्वतंत्र तत्त्वतां। त्या माझें ध्यान करितां। मद्भावता उपतिष्ठे॥.४७॥ मीचि भगवंत सुनिश्चित। ऐसें बोधा आलें यथास्थित। त्याची आज्ञा सुरवर वंदित। पशुपक्षी नुल्लंघित ते आज्ञा॥.४८॥ जैशी माझी आज्ञा सर्वांवरी। तैशी त्याची आज्ञा चराचरीं। कोणी नुल्लंघिती तिळभरी। ते आज्ञासिद्धि खरी तो लाहे॥.४९॥ एवं या गुणहेतुसिद्धि दहाही। धारणायुक्त सांगीतल्या पाहीं। आतां क्षुद्र पंचसिद्धि ज्याही। तुज मी त्याही सांगेन॥.५०॥
मद्भक्त्या शुद्धसत्त्वस्य योगिनो धारणाविद:।
तस्य त्रैकालिकी बुद्धिर्जन्ममृत्यूपबृंहिता॥ २८॥
जगाचें उत्पत्तिस्थितिनिदान। सत्य असे मजअधीन। त्या माझ्या ठायीं करितां भजन। अंत:करण अतिशुद्ध॥ ५१॥ ते शुद्धअंत:करणीं जाण। भूत भविष्य वर्तमान। जगाचें जन्म भोग मरण। हे त्रिकाळज्ञान सिद्धि प्रकटे॥ ५२॥
अग्न्यादिभिर्न हन्येत मुनेर्योगमयं वपु:।
मद्योगश्रान्तचित्तस्य यादसामुदकं यथा॥ २९॥
अतिप्रयास करितां चित्त। मजसी योगातें झालें प्राप्त। तेणें योगें शरीर योगयुक्त। अबाधित महाद्वंद्वीं॥ ५३॥ त्यासी बाधीना शीत उष्ण। मृदु आणिक कठिण। अग्नि लागलियाही जाण। देह दहन नव्हे त्याचा॥ ५४॥ ते अग्निमाजीं विश्रांति त्यासी। जेवीं कां जळीं जळचरांसी। अद्वंद्वतासिद्धि ऐसी। साधकासी उपतिष्ठे॥ ५५॥ येचि सिद्धिच्या धारणा। प्रतिष्टंभसिद्धी प्रकटे जाणा। ऐक तिच्याही लक्षणा। जिचे तोडरी जाणा सकळ बाधा॥ ५६॥ त्यासी बाह्य वायूचेनि झडाडें। बाधकता कदा न घडे। प्राण जिंतोनि आंतुलीकडे। करी रोकडे दासी त्यासी॥ ५७॥ देंठ फेडूनि सुमनसेजे। जेवीं कां सुखें निद्रा कीजे। तेवीं इंगळावरी हा निजे। बाधा नुपजे अग्नीची॥ ५८॥ शीतळ जळीं शीतकाळीं। सिद्ध बुडविल्या कौतुकें जळीं। तो बाहेरी निघावया न तळमळी। जळीं मासोळी जेवीं क्रीडे॥ ५९॥ ग्रीष्मकाळींचें निदाघ उष्ण। त्यामाजीं सिद्ध घातल्या जाण। रविकरीं पद्म उल्हासे गहन। तैंसे लागतां उष्ण तो टवटवी॥ ६०॥ यापरी अर्कबाधकता। त्यासी बाधीना सर्वथा। तैशींच सिद्धासी शस्त्रें लागतां। शस्त्रघाता नातुडे तो॥ ६१॥ आकाश खोचूं जातां पाहें। शस्त्रेंसीं घावो वायां जाये। तेवीं सिद्धासी न लागती घाये। शस्त्रउपाये सुनाट॥ ६२॥ सिद्धासी दिधलिया विख। विखही नव्हे त्या बाधक। जेवीं विखकिडे विखीं। देखा यथासुख क्रीडती॥ ६३॥ छाया पर्वतातळीं दडपितां। ते दाटेना जेवीं पर्वता। तेवीं अग्नि अर्क विष अंबु वाता। सिद्धासी सर्वथा बाधेना॥ ६४॥ ऐकोनि सिद्धींची कथा। उल्हासू जरी माने चित्ता। तरी माझे प्राप्तीसी तत्त्वतां। सिद्धि सर्वथा बाधक॥ ६५॥ माझें स्वरूप शुद्ध अद्वैत। तेथ सिद्धींचें जे मनोरथ। लोकरंजन समस्त। नाहीं परमार्थ सिद्धींमाजीं॥ ६६॥ मागिलेचि श्लोकसंधीं। परचित्ताभिज्ञतेचि सिद्धी। ध्वनित सुचविली त्रिशुद्धी। तिचाही विधी अवधारीं॥ ६७॥ तेच श्लोकीं व्याख्यान। करितां भगवंताचें ध्यान। प्रकृतिनियंता आपण। साक्षी जाणा सर्वांचा॥ ६८॥ ऐसें ईश्वरत्व दृढ ध्यातां। चित्तचालकता ये त्याच्या हाता। तेव्हां चित्ताची अभिज्ञता। स्वभावतां उपतिष्ठे॥ ६९॥ तेव्हां जीवाची स्वप्नावस्था। हा साक्षित्वें देखता। जो जो संकल्प त्याच्या चित्ता। तो स्वभावतां हा जाणे॥ ७०॥ जिव्हारींची जे आवडी मोठी। ते हा अवलीला सांगे गोष्टी। एवढी सिद्धीची कसवटी। उठाउठी तो लाभे॥ ७१॥
मद्विभूतीरभिध्यायन् श्रीवत्सास्त्रविभूषिता:।
ध्वजातपत्रव्यजनै: स भवेदपराजित:॥ ३०॥
अपराजयसिद्धीची प्राप्ती। ध्याना आणावी माझी मूर्ती। जिचेनि नांवें जयो पावती। जाण निश्चितीं सुरवर॥ ७२॥ चतुर्भुज घनश्याम। शंखचक्रगदापद्म। छत्रातपत्र चामरयुग्म। ध्वजीं उत्तम गरूडलांछन॥ ७३॥ रत्नदंडें झणत्कार। व्यजन वीजिती सनागर। चरणीं गर्जती तोडर। तोडरीं अपार अरिवर्ग॥ ७४॥ ऐशिये माझे मूर्तीचें ध्यान। जो सर्वदा करी सावधान। तो सर्वत्र विजयीजाण। अभंगपण माझेनी॥ ७५॥ तो माझेनि ध्यानें पाहें। कोणी न मेळवितां साह्ये। एकला सर्वत्र विजयी होये। ऐशी सिद्धि लाहे या निष्ठा॥ ७६॥ जो मी हृदयीं धरी अजितू। तो सर्वत्र होय अपराजितू। ऐसें सांगोनि भगवंतू। उपसंहारितू सिद्धींतें॥ ७७॥
उपासकस्य मामेवं योगधारणया मुने:।
सिद्धय: पूर्वकथिता उपतिष्ठन्त्यशेषत:॥ ३१॥
म्यां सांगीतल्या ज्या योगधारणा। मज भजतां त्या भावना। त्या त्या सिद्धी त्यासी जाणा। पूर्वोक्तलक्षणा उपजती॥.७८॥ अनेक भावना धरितां चित्तीं। त्या त्या धारणेच्या व्युत्पत्ती। अनेक सिद्धींची होय प्राप्ती। जाण निश्चितीं उद्धवा॥.७९॥ नाना योगधारणाव्युत्पत्ती। न करितां सकळसिद्धींची प्राप्ती। एके धारणेनें होय निश्चितीं। ते मी तुजप्रती सांगेन॥.१८०॥
जितेन्द्रियस्य दान्तस्य जितश्वासात्मनो मुने:।
मद्धारणां धारयत: का सा सिद्धि: सुदुर्लभा॥ ३२॥
पांच पांच इंद्रियांची जोडी। जिणोनि शमदमपरवडी। उभवूनि वैराग्याची गुढी। प्राणापानवोढी जिंकिल्या॥ ८१॥ विवेकाचेनि बळें जाण। वृत्ति राखोनि सावधान। सदा करितां माझें मनन। मननें मन जिंकिलें॥ ८२॥ यापरी गा साधकासी। धारणा धरोनि मानसीं। मी एक ध्यातां अहर्निशीं। सकळ सिद्धी दासी त्यासी होती॥ ८३॥ सांडूनि सकळ उपाये। मी एक ध्यानीं धरिल्या पाहें। साधकासी काय उणें आहे। दुर्लभ काये सिद्धींचें॥ ८४॥ माझे भजनें सावकाशीं। सिद्धी प्रकटती साधकासी। त्या सेव्य नव्हती त्यासी। तेंचि हृषीकेशी सांगतू॥ ८५॥
अन्तरायान्वदन्त्येता युञ्जतो योगमुत्तमम्।
मया सम्पद्यमानस्य कालक्षपणहेतव:॥ ३३॥
अहेतुक करितां माझें भजन। तेणें शीघ्र माझी प्राप्ती जाण। तेथें सिद्धींवरी घालिता मन। आली नागवण मत्प्राप्तीसी॥ ८६॥ ज्यासी विषयभोग लागे गोड। तोचि सिद्धींची वाहे चाड। ज्यासी माझे प्राप्तीचें कोड। तो वांछीना बंड ऋद्धिसिद्धींचें॥ ८७॥ ज्यासी लौकिकीं अतिप्रतिष्ठा। तो सिद्धींच्या सोशी खटपटा। ज्यासी मत्प्राप्तीची निष्ठा। तो वचेना वाटा सिद्धींच्या॥ ८८॥ पावतपावतां वाराणसी। जो वस्तीसी गेला वेश्यागृहासी। तेथें भुलोनि तिच्या भोगासी। सर्वस्व तियेसी समर्पी॥ ८९॥ इयेपासूनि जीवेंप्राणें। सर्वथा वेगळें नाहीं जाणें। ऐसा संकल्प करोनि तेणें। वश्य होणें वेश्येसी॥ १९०॥ जंव असे गांठी गांठोडी। तंव ते त्यापाशीं लुडबुडी। नि:शेष वेंचलिया कवडी। बाहेरी दवडी तत्काळ॥ ९१॥ तो दवडितांही न जाये। निर्लज्ज नि:संगु होऊनि राहे। तरी आपणचि सांडोनि जाये। तैशाचि पाहें महासिद्धी॥ ९२॥ सकळ पापांतें निर्दळणें। सकळ कुळांतें उद्घरणें। तें काशीचें खुंटलें पावणें। वेश्या नागवणें भोगलिप्सा॥ ९३॥ तैसीच सिद्धींचीही कथा। माझे प्राप्तीसी प्रतिबंधभूता। माझें ध्यान ज्ञान वैराग्यावस्था। नागवूनि रिता सांडिती॥ ९४॥ माझे प्राप्तीनिकट जाण। उठे सिद्धींची नागवण। भोगें छळावया व्यामोहकपण। विलंबकारण मत्प्राप्ती॥ ९५॥ माझें स्वरूप अद्वैतता। तेथें सिद्धींच्या नानावस्था। ते मायेची व्यामोहकता। जाण तत्त्वतां उद्धवा॥ ९६॥ माझे प्राप्तीआड सिद्धींचें विघ्न। हेंचि तुज कळावया जाण। म्यां सर्व सिद्धींचें निरूपण। समूळ संपूर्ण सांगीतलें॥ ९७॥ माझ्या ठायीं धरितां ध्यान। एकाग्रता होतां मन। तेथ भोगलिप्सा सिद्धी जाण। करिती नागवण साधका॥ ९८॥
जन्मौषधितपोमन्त्रैर्यावतीरिह सिद्धय:।
योगेनाप्नोति ता: सर्वा नान्यैर्योगगतिं व्रजेत्॥ ३४॥
सिद्धींचे प्राप्तीचें कारण। जन्मौषधि मंत्र तप जाण। कां साधल्या प्राणापान। सकळ सिद्धी जाण योगाभ्यासीं॥ ९९॥ एकी जन्मास्तव सहज सिद्धी। एकी त्या साधिती औषधी। एकी त्या तपादि महाविधी। एकी त्या त्रिशुद्धि मंत्रद्वारा॥ २००॥ सर्पासी वायुधारण। मीनासी जळतरण। पक्ष्यासी नभोगमन। हे जन्मसिद्धि जाण स्वाभाविक॥ १॥ हंस निवडी क्षीरनीर। कोकिळेसी मधुर स्वर। चंद्रामृत सेवी चकोर। हे सिद्धि साचार जन्मास्तव॥ २॥ जन्मास्तव सहज सिद्धी। त्या म्यां सांगीतल्या सुबुद्धी। आतां साधिलिया औषधी। लाभती सिद्धी त्या ऐक॥ ३॥ श्वेतमांदारीं गजानन। अंगारकचतुर्थी साधिल्या जाण। सकळ विद्यांचें होय ज्ञान। धनधान्यसमृद्धी॥ ४॥ अजानवृक्षाची वोळखण। त्याचीं फळें श्वानमुखें जाण। त्याचें घडल्या क्षीरपान। होय आपण अजरामर॥ ५॥ पिचुमंद नित्य सेविल्या देख। त्यासी बाधीना कोणी विख। पाताळगरूडीचें प्राशिल्या मुख। त्यासी देहदु:ख बाधीना॥ ६॥ पूतिकावृक्षाचे मूळीं। असे महाशक्तीची पुतळी। ते साधल्याअप्सरांचे मेळीं। क्रीडे तत्काळीं साधक॥ ७॥ अनंत औषधी अनंत सिद्धी। त्यांची साधना कठिण त्रिशुद्धी। तपादि सिद्धींची विधि। ऐक सुबुद्धी उद्धवा॥ ८॥ कृच्छ्र पराक चांद्रायण। आसार जलाशय धूम्रपान। तप करी जें जे भावून। ते ते सिद्धि जाण तो पावे॥ ९॥ ऐक मंत्रसिद्धीचें लक्षण। प्रेतावरी बैसोनि आपण। एक रात्र केल्या अनुष्ठान। प्रेतदेवता संपूर्ण प्रसन्न होय॥ २१०॥ तेणें भूत भविष्य वर्तमान। ते सिद्धि प्राप्त होय जाण। करितां सूर्यमंत्रविधान। दूरदर्शनसिद्धि उपजे॥ ११॥ जैसा मंत्र जैसी बुद्धी। तैसी त्यास प्रकटे सिद्धी। या सकळ सिद्धींची समृद्धी। योगधारणाविधीमाजीं असती॥ १२॥ नेहटूनियां आसना। ऐक्य करोनि प्राणापानां। जो धरी योगधारणा। सकळ सिद्धी जाणा ते ठाये॥ १३॥ म्यां सांगीतली सिद्धींची कथा। झालिया प्राणापानसमता। आलिया योगधारणा हाता। तैं सिद्धी समस्ता प्रकटती॥ १४॥ प्राणापान समान न करितां। योगधारणाही न धरितां। मज एकातें हृदयीं धरितां। सिद्धी समस्ता दासी होती॥ १५॥ मज पावावया तत्त्वतां। मज एकातें स्मरतां ध्यातां। पावो देऊन सिद्धींचे माथां। चारी मुक्ति स्वभावतां दासी होती॥ १६॥ नाना सिद्धींची धारणा धरितां। माझी सलोकता समीपता। हाता न ये गा सरूपता। मग सायुज्यता ते कैंची॥ १७॥ माझे अतिशयें शुद्ध भक्त। ते मुक्तीसी दूर दवडित। माझेनि भावार्थें नित्यतृप्त। ते पूज्य होत मजलागीं॥ १८॥ जो सकळ सिद्धींचा ईश्वरू। तो मी लागें त्यांची पूजा करूं। तेथिला जो सिद्धींचा संभारू। घेऊनि निजवेव्हारू पळताती॥ १९॥ सकळ सिद्धींच्या स्वामित्वेंसीं। मी भगवंत तिष्ठें भक्तांपाशीं। तेंचि श्लोकार्थें हृषीकेशी। उद्धवासी सांगत॥.२२०॥
सर्वासामपि सिद्धीनां हेतु: पतिरहं प्रभु:।
अहं योगस्य सांख्यस्य धर्मस्य ब्रह्मवादिनाम्॥ ३५॥
सकळ सिद्धींचें मी जन्मस्थान। माझेनि सिद्धींचें थोर महिमान। सिद्धींसी मजमाजीं निदान। यापरी मी जाण स्वामी त्यांचा॥ २१॥ जे जीवात्म्याची ऐक्यता। त्या योगाचा स्वामी मी तत्त्वतां। जेथ जीवत्वाची मिथ्या वार्ता। त्या ज्ञानाचाही सर्वथा स्वामी मीचि॥ २२॥ ज्ञानोपदेष्टे जे साधू। त्यांचाही स्वामी मी प्रसिद्धू। माझेनि प्रसादें ज्ञानबोधू। होतसे विशदू सज्ञाना॥ २३॥ उपदेशी उपनिषद्भागें वेदू। त्या वेदाचाही स्वामी मी गोविंदू। मजवेगळा वेदवादू। उच्चारीं शब्दू नुच्चारे॥ २४॥ धर्म म्हणिजे ज्ञानसाधन। त्याचाही स्वामी मीचि जाण। मी सबाह्य परिपूर्ण। चैतन्यघन सर्वात्मा॥ २५॥ मी सर्वात्मा सर्वव्याप्त। सबाह्य परिपूर्ण समस्त। हे माझ्या ठायीं सहज स्थित। ऐक सुनिश्चित उद्धवा॥ २६॥
अहमात्माऽऽन्तरो बाह्योऽनावृत: सर्वदेहिनाम्।
यथा भूतानि भूतेषु बहिरन्त: स्वयं तथा॥ ३६॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणो पारमहंस्यां संहितायामेकादशस्कन्धे पञ्चदशोऽध्याय:॥ १५॥
जीवांच्या जीवामाजीं माझा वास। जीव मजमाजीं सावकाश। माझें स्वरूप गा असमसाहस। गुणमायेस अनावृत॥ २७॥ जेवीं घटाची वस्ती आकाशीं। आकाश सबाह्य त्या घटासी। तेवीं मी जीवमात्रांसी। सबाह्य हृषीकेशी परिपूर्ण॥ २८॥ जैशीं महाभूतें भौतिकांसी। सबाह्य असती सर्वांसी। तेवीं मी सकळ जगासी। सबाह्य हृषीकेशी पूर्णत्वें पूर्ण॥ २९॥ जीवन जैसें तरंगासी। कां गोडी जैसी गुळासी। तेवीं अनंतकोटि ब्रह्मांडांसी। मी पूर्णत्वेंसी परिपूर्ण॥ २३०॥ मज पूर्णाची पूर्ण प्राप्ती। निकट येतयेतां हातीं। ते संधीं सिद्धी नागविती। भोगसंपत्तीउपचारें॥ ३१॥ ज्याचें रायापाशीं पूर्ण चलन। त्याचे हाता ये लांचु संपूर्ण। तेणेंचि तो पावे मरण। तैशा सिद्धी जाण घातका॥ ३२॥ ये अध्यायींचें निरूपण। सांगावया हेंचि गा कारण। माझे प्राप्तीस सिद्धी विघ्न। उद्धवा जाण निश्चितीं॥ ३३॥ एकाग्र भजनें माझी प्राप्ती। होतां ते संधीसी सिद्धी येती। त्या भुलवोनियां भोगासक्तीं। नागविती साधकां॥ ३४॥ जे नेणती माझें निजसुख। ऐसे जे कां केवळ मूर्ख। त्यांसीच सिद्धींचें कौतुक। अलोकिक भोगलिप्सा॥ ३५॥ जैसे वेश्येचे हावभाव। तैसें सिद्धींचें वैभव। हें त्यागावया गा सर्व। देवें हा अध्याव निरूपिला॥ ३६॥ ज्यासी प्राप्त माझें निजसुख। त्यासी सिद्धी तुच्छप्राय देख। न देखती जन्ममरणांचें मुख। माझा पूर्ण हरिख कोंदाटे॥ ३७॥ सेवितां सद्गुरुचरण। कोंदाटे ब्रह्म परिपूर्ण। तेथ सिद्धींसी पुसे कोण। हे जाणतीखूण हरिभक्त॥ ३८॥ हरिभक्तीसी विकिला भावो। भजनें फिटला अहंभावो। तेथ सिद्धींचा भोगसंदेहो। निपजे पहा हो सर्वथा॥ ३९॥ भुक्ति मुक्ती ऋद्धि सिद्धी। सद्गुरुचरणीं गा त्रिशुद्धी। हें नेणती जे मंदबुद्धी। ते नाना सिद्धी वांछिती॥ २४०॥ सकळ सिद्धींचें साधन। निरपेक्षता सत्य जाण। निरपेक्षाचें अंगण। सिद्धी संपूर्ण ओळंगती॥ ४१॥ सिद्धींची अपेक्षा ज्यांचे चित्तीं। सिद्धी त्यांकडे न थुंकिती। निरपेक्षाचे पायींची माती। सिद्धी वंदिती सर्वदा॥ ४२॥ ज्ञानवैराग्यभक्तीचे माथां। सत्य जाण पां निरपेक्षता। ते निरपेक्षता आलिया हाता। मुक्ति सायुज्यता पायां लागे॥ ४३॥ निरपेक्षतेपाशीं सर्व सिद्धी। निरपेक्षतेपाशीं विधी। निरपेक्षतेपाशीं सुबुद्धी। चरण वंदी अहर्निशीं॥ ४४॥ निरपेक्षता तेथ निर्वाहो। निरपेक्षता तेथ सद्भावो। निरपेक्षतेपाशीं भगवद्भावो। यथार्थ पहा वो तिष्ठतू॥ ४५॥ निरपेक्षतेपाशीं उपनिषद्भागू। निरपेक्षतेपाशीं साचार योगू। निरपेक्षता स्वांनदभोगू। सांपडे श्रीरंगू निरपेक्षा॥ ४६॥ एका जनार्दना शरण। त्याचे वंदितां श्रीचरण। चढती निरपेक्षता जाण। सदा संपूर्ण स्वानंदें॥ ४७॥ आम्हां स्वानंदाचा निजबोधू। हा सद्गुरुचरणींचा प्रसादू। महासुखाचा विनोदू। आनंदकंदू श्रीचरणीं॥ ४८॥ गुरुचरणीं करितां भक्ती। अनायासें प्राप्त चारी मुक्ती। निजशांतीसी विरक्ती। सेवों लागती गुरुभक्तां॥ ४९॥ एका जनार्दना शरण। त्याचे कृपेस्तव जाण। श्रीभागवताचें निरूपण। झाला संपूर्ण पंधरावा॥ २५०॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे एकादशस्कंधे श्रीकृष्णोद्धवसंवादे एकाकारटीकायां सिद्धिनिरूपणयोगो नाम पञ्चदशोऽध्याय:॥ १५॥ श्रीकृष्णार्पणमस्तु॥ श्लोकसंख्या॥ ३६॥ ओव्या॥ २५०॥
॥ श्री ॐ तत्सत्-श्रीकृष्ण प्रसन्न॥
अध्याय सोळावा
श्रीगणेशाय नम:॥ श्रीकृष्णाय नम:॥ ॐ नमो सद्गुरु श्रीमूर्ती। चराचर तुझी विभूती। विश्वात्मा विश्वस्फूर्ती। अमूर्तमूर्ती श्रीगुरुराया॥ १॥ तुझे मूर्तीचें महिमान। सकळ शास्त्रां अतर्क्य जाण। श्रुतीनें घेतलें मौन। शब्दें आण वाहिली॥ २॥ आण वाहिली दृष्टांतीं। तुजसमान नाहीं दुजी स्थिती। जे जे योजावी उपपत्ती। ते ते विभूती पैं तुझी॥ ३॥ तुझिया प्रभावाची ऐशी खोडी। जे दुजेपणाचें मूळ तोडी। मग एकपणाचे परवडी। दृष्टांत काढी कोण कोठें॥ ४॥ कोठें तुझें स्थानमान। हेंच सर्वथा न कळे जाण। अगाध तुझें महिमान। कैसेनि ध्यान करावें॥ ५॥ हेतु मातु दृष्टांतू। न रिघे ज्यांचे शिंवेआंतू। तो भागवतींचा भागवतार्थू। ओंवियांआंतू बोलविशी॥ ६॥ ते माझे मऱ्हाटेआरुष बोल। सद्गुरूंनीं केले सखोल। तेथींच्या प्रेमाचे जे बोल। जाणती केवळ गुरुभक्त॥ ७॥ ज्यासी नाहीं गुरुचरणीं भक्ती। त्यासी कैसेनि होईल विरक्ती। जरी पढले श्रुतिस्मृती। शास्त्रव्युत्पत्ती केल्याही॥ ८॥ करितां साधनांच्या कोटी। साधनीं समाधान नुठी। झालिया सद्गुरुकृपादृष्टी। ब्रह्मत्वें पुष्टी गुरुभक्तां॥ ९॥ तो तूं सद्गुरु श्रीजनार्दन। सकळ जगाचें अधिष्ठान। भूतीं भूतात्मा तूं आपण। सहजें जाण समसाम्यें॥ १०॥ समसाम्य सर्व भूतीं। ज्यांसी घडे सद्गुरुभक्ती। तेचि ये श्रीमहाभागवतीं। अर्थप्राप्ती प्रविष्ट॥ ११॥ झालिया सद्गुरुकृपा वरिष्ठ। न करितां व्युत्पत्तीचे कष्ट। भागवतार्थी होय प्रविष्ट। भक्त सुभट भावार्थी॥ १२॥ हृदयीं झालिया सद्भावो। भावें प्रकटे देवाधिदेवो। तेथें भागवताचा अभिप्रावो। सहजेंचि पहा वो ठसावे॥ १३॥ यालागीं करितां गुरुभक्ती। प्राप्त होईजे भागवतार्थीं। तेथ काव्यादि व्युत्पत्ती। नाना युक्ती किमर्थ॥ १४॥ किमर्थ करावें शास्त्र ज्ञान। किमर्थ धरावें वृथा ध्यान। चालतें बोलतें ब्रह्म पूर्ण। सद्गुरुचरण साधकां॥ १५॥ वांचूनियां गुरुभजन। शिष्यासी नोहे समाधान। याहूनियां श्रेष्ठ साधन। नाहीं जाण सर्वथा॥ १६॥ त्या सद्गुरुकृपापरिपाटीं। एकादशीं पूर्वार्ध कोटी। वाखणिली जी मऱ्हाटी। यथार्थदृष्टीं निजबोधें॥ १७॥ ऊंस गाळितां रस होये। तो ठेविलिया बहुकाळ न राहे। त्याचा आळूनियां पाहें। गूळ होये सपिंड॥ १८॥ तोही ठेवितां लिगाड धरी। मग साखर कीजे रायपुरी। तेही घोटूनियां चतुरीं। नाबद करिजे कोरडी॥ १९॥ तैसें हें श्रीभागवत जाण। मुळीं बोलिला श्रीनारायण। तेंचि श्रीव्यासें आपण। दशलक्षण वर्णिलें॥ २०॥ ते दशलक्षणपरवडी। श्रीशुकमुखें चढली गोडी। तेथील कठिण पदबंधमोडी। टीका चोखडी श्रीधरी॥ २१॥ ते श्रीधरीचें व्याख्यान। भावार्थदीपिका जाण। त्या भावार्थाची सद्भाव खूण। केलें निरूपण देशभाषा॥ २२॥ मुळीं वक्ता एक नारायण। व्यास-शुक-श्रीधरव्याख्यान। त्यांत मुळींचें लक्षूनि गोडपण। एका जनार्दन कवि कर्ता॥ २३॥ मुळीं बीज श्रीनारायण। ब्रह्मयाचे ठायीं प्रेरिलें जाण। तें नारदक्षेत्रीं संपूर्ण। पीक परिपूर्ण निडारलें॥ २४॥ त्याचें व्यासें दशलक्षण। संपूर्ण केलें संवगण। शुकें परीक्षितीच्या खळां जाण। मळूनि निजकण काढिले॥ २५॥ तेंचि शास्त्रार्थें जाण। श्रीधरें निजबुद्धीं पाखडून। काढिले निडाराचे कण। अतिसघन सुटंक॥ २६॥ त्याचीं पक्वान्नेंचोखडीं। मऱ्हाटिया पदमोडी। एका जनार्दनें केली परवडी। ते जाणती गोडी निजात्मभक्त॥ २७॥ त्या श्रोत्यांचेनि अवधानें। जनार्दनकृपा सावधानें। पूर्वार्ध एका जनार्दनें। संपूर्ण करणें देशभाषा॥ २८॥ ते प्रथमाध्यायीं अनुक्रम। वैराग्यउत्पत्तीचा संभ्रम। कुलक्षयासी पुरुषोत्तम। करी उपक्रम ब्रह्मशापें॥ २९॥ दुसऱ्यापासूनि चतुर्थवरी। नारदें वसुदेवाच्या घरीं। निमिजायंतप्रश्नोत्तरीं। पंचाध्यायी खरी संपविली॥ ३०॥ षष्ठाध्यायीं श्रीकृष्णमूर्ती। पाहों आलिया सुरवरपंक्ती। तिहीं प्रार्थिला श्रीपती। निजधामाप्रती यावया॥ ३१॥ ऐकोनि सुरवरांची विनंती। देखोनि अरिष्टभूत द्वारावती। उद्धवें प्रार्थिला श्रीपती। निजधामाप्रती मज नेईं॥ ३२॥ त्याचे प्रश्नांचें प्रश्नोत्तर। त्यागयुक्त ज्ञानगंभीर। सप्तमाध्यायीं शार्ङ्गधर। थोडेनि फार बोलिला॥ ३३॥ तेथ त्यागसंग्रहलक्षण। यदुअवधूतसंवादें जाण। चोविसां गुरूंचें प्रकरण। केलें संपूर्ण अष्टमीं नवमीं॥ ३४॥ श्रद्धासंग्रह ज्ञानविश्वास। तेथ नाना मतांचा मतनिरास। दशमाध्यायीं हृषीकेश। ज्ञानविलास बोलिला॥ ३५॥ अकरावे अध्यायीं जाण। बद्धमुक्तांचेंवैलक्षण्य। सांगोनि साधूचें लक्षण। भक्तीचें संपूर्ण दाविलें रूप॥ ३६॥ भागवतीं बारावा अध्यावो। अतिगुह्य बोलिला देवो। तेथील लावितां अभिप्रावो। पडे संदेहो सज्ञाना॥ ३७॥ बारावे अध्यायाची किल्ली। युक्तिप्रयुक्तीं नातुडे बोली। जनार्दनकृपा माउली। तेणें मागी दाविली ग्रंथाची॥ ३८॥ तें द्वादशाध्यायीं निरूपण। सत्संगाचा महिमा गहन। कर्माचा कर्ता कोण। त्यागितें लक्षणकर्माचें॥ ३९॥ तो द्वादशाध्यावो ऐकतां। ज्ञानसंलग्नता होय चित्ता। आडवी ठाके विषयावस्था। तेणें बाधकता साधकां॥ ४०॥ गुणवैषम्याचें लक्षण। तेणें विषयावस्था गहन। तेथ सत्त्वशुद्धीचें कारण। केलें निरूपण त्रयोदशीं॥ ४१॥ तेचि प्रसंगें यथोचित। चित्तविषयांचें जें ग्रथित। उगवावया हंसगीत। सुनिश्चित सांगीतलें॥ ४२॥ हंसगीतीं जें निरूपिलें ज्ञान। समाधिपर्यंत समाधान। तेंचि साधावया साधन। चवदावा आपण बोलिला देवो॥ ४३॥ साधनांमाजीं मुख्य भक्ती। सगुण तेचि माझी निर्गुण मूर्ती। योगयुक्त ध्यानस्थिती। बोलिला श्रीपती चतुर्दशीं॥ ४४॥ विविधा सिद्धींची धारणास्थिती। देवें सांगीतली उद्धवाप्रती। सिद्धी बाधिका माझे प्राप्ती। हें पंधराव्याअंतींनिरूपिलें॥ ४५॥ एवं पंधराध्यायीं पूर्वार्ध। निरूपण झालें अतिशुद्ध। आतां उरलें उत्तरार्ध। तो कथासंबंध अवधारा॥ ४६॥ षोडशीं भगवद्विभूती। सतरा अठरा अध्यायांप्रती। वर्णाश्रमकर्मगती। विधानस्थिती निरूपण॥ ४७॥ एकुणिसावा अध्याय गहन। ज्ञाननिर्णयाचें महिमान। उद्धवाचे यमनियमादि प्रश्न। सांगीतले ज्ञानपरिपाकें॥ ४८॥ त्या ज्ञानाधिकाराचा योग। अज्ञान ज्ञानमध्यस्थभाग। विसावे अध्यायीं श्रीरंग। त्रिविध विभाग बोलिला॥ ४९॥ तेथ गुणदोषांची अवस्था। उद्धवें ठेविली वेदांचे माथां। ते वेदवादसंस्था। केली तत्त्वतां एकविसांत॥ ५०॥ तेचि वेदवादव्युत्पत्ती। तत्त्वांची संख्या किती। ते तत्त्वसंख्याउपपत्ती। केली श्रीपती यथान्वयें॥ ५१॥ सकळ तत्त्वांचें विवेचन। प्रकृतिपुरुषांचें लक्षण। जन्ममरणांचें प्रकरण। केलें निरूपण बाविसावां॥ ५२॥ साहोनियां परापराध। स्वयें राहावें निर्द्वंद्व। हा भिक्षुगीतसंवाद। केला विशद तेविसावां॥ ५३॥ अद्वैतीं राहावया स्थिती। चोविसावां सांख्यव्युत्पत्ती। निर्गुणापासोनि गुणोत्पत्ती। गुणक्षया अंतीं निर्गुण उरे॥ ५४॥ आदीं निर्गुण अंतीं निर्गुण। मध्यें भासले मिथ्या गुण। ये अद्वैतप्राप्तीलागींजाण। केलें निरूपण सांख्याचें॥ ५५॥ ते मिथ्यागुण प्रवृत्तियुक्त। त्रिगुणगुणांचा सन्निपात। बोलिला पंचविसाव्यांत। निर्गुणोक्त निजनिष्ठा॥ ५६॥ सव्विसावे अध्यायाप्रती। अनिवार अनुतापाची शक्ती। भोगितां उर्वशी कामप्राप्तीं पावला विरक्ती पुरूरवा॥ ५७॥ भजनक्रिया मूर्तिलक्षण। वैदिक तांत्रिक मिश्र भजन। या उद्धवप्रश्नाचें निरूपण। केलें संपूर्ण सत्ताविसावां॥ ५८॥ महायोग्यांचें योगभांडार। परम ज्ञानें ज्ञानगंभीर। निजसुखाचें सुखसार। केवळ चिन्मात्र अठ्ठाविसावा॥ ५९॥ त्याचि अध्यायामाजीं जाण। संसारअसंभवाचा प्रश्न। उद्धवें केला अतिगहन। त्याचेंही प्रतिवचन दीधलें देवें॥ ६०॥ एकादशाचा निजकळसू। भक्तिप्रेमाचे अतिविलासू। एकुणतिसावां सुरसू। ज्ञानोपदेशू भक्तियुक्त॥ ६१॥ पुढिले दों अध्यायांआंत। स्त्रीपुत्रादि कुळाचा घात। होतां डंडळीना ज्ञानसमर्थ। तें प्रत्यक्षभूत हरि दावी॥ ६२॥ ब्राह्मणांचा शाप कठिण। शापें बाधिला श्रीकृष्ण। इतरांची कथा कोण। कुळनिर्दळण ब्रह्मशापे॥ ६३॥ ब्राह्मणांचा कोप समर्थ। सगळा समुद्र केला मूत। शिवाचा जाला लिंगपात। ब्रह्मक्षोभांत निमेषार्धे॥ ६४॥ यालागीं सज्ञान अथवा मुग्ध। तिहीं न करावा ब्रह्मविरोध। हेंचि दावावया मुकुंद। कुलक्षयो प्रसिद्ध दाखवी॥ ६५॥ निजदेहासी जो करी घात। तो जराव्याध केला मुक्त। येथवरी ज्ञाता देहातीत। क्षमायुक्त तो सज्ञान॥ ६६॥ एकुणतीस अध्यायपर्यंत। कृष्णें उपदेशिला ज्ञानार्थ। पुढील दोन अध्यायांत। स्वयें दावीत विदेहत्व॥ ६७॥ राम अयोध्या घेऊन गेला। कृष्णें निजदेहही सांडिला। येणें देहाभिमान मिथ्या केला। तरावया पुढिलां मुमुक्षां॥ ६८॥ पंधरा अध्याय पूर्वार्ध। व्याख्यान झालें अतिशुद्ध। सूत्रप्राय उत्तरार्ध। दाविले विशद अध्यायार्थ॥ ६९॥ साह्य सद्गुरु जनार्दन। श्रोतीं द्यावें अवधान। पुढील उत्तरार्धव्याख्यान। एका जनार्दन बोलवी॥ ७०॥ झालिया वसंताचें रिगवणें। वृक्ष सपुष्प सफळ तेणें। तेवीं जनार्दनकृपागुणें। सार्धक वचनें कवित्वाचीं॥ ७१॥ गगनीं उगवला अंशुमाळी। जेवीं विकासिजे नवकमळीं। तेवीं जनार्दनकृपामेळीं। कवित्वनवाळी विकासे॥ ७२॥ वेणु घेऊनियां हातें। विश्वामोहिलें कृष्णनाथें। तेवीं कवीश्वर करोनि मातें। वक्ता येथें जनार्दन॥ ७३॥ तो जनार्दनकृपाक्षीराब्धी। ज्याचे कृपेसी नाहीं अवधी। तेणें उत्तरार्धीं प्रवेशे बुद्धी। अर्थसिद्धीसमवेत॥ ७४॥ मागीलकथासंगती। पंधरावे अध्यायाअंतीं। सिद्धी बाधिका माझे प्राप्ती। ऐसें श्रीपती बोलिला॥ ७५॥ एवं सांडूनि सिद्धींचें ध्यान। माझे स्वरूपीं राखावें मन। हें ऐकोनि कृष्णवचन। उद्धवें प्रश्नमांडिला॥ ७६॥ उद्धव म्हणे श्रीकृष्णनाथा। विनंती अवधारीं समर्था। तुझ्या विभूति समस्ता। मज तत्त्वतां सांगाव्या॥ ७७॥
उद्धव उवाच
त्वं ब्रह्म परमं साक्षादनाद्यन्तमपावृतम्।
सर्वेषामपि भावानां त्राणस्थित्यप्ययोद्भव:॥ १॥
भूतभौतिकांचें तूं कारण। तुझेनि जन्म-स्थिति-निदान। इतुकें करोनि अकर्ता जाण। ब्रह्मपरिपूर्ण तूं यालागीं॥ ७८॥ म्हणसी उत्पत्ति स्थिति मरण। भूतांतें प्रकृति करी जाण। ते प्रकृति तुझे अधीन। तुझेनि चलन प्रकृतीसी॥ ७९॥ यालागीं प्रकृती ते परतंत्र। तूं परमात्मा स्वतंत्र। अनादि अव्ययो अपार। श्रुतींसी पार न कळेचि॥ ८०॥ प्रकृतीसी तुझें आवरण। तूं अनंत गा निरावरण। जीवांचें स्वरूप गा तूं आपण। परी जीवपण तुज नाहीं॥ ८१॥ जीवू तितुका अज्ञानयुक्त। तूं ज्ञानाज्ञानातीत निश्चित। यालागीं ब्रह्म तूं साक्षात। अविनाशवंत अपरोक्ष॥ ८२॥ तो तूं अपरोक्ष कैसा म्हणशी। सर्वीं सर्वत्र सबाह्य असशी। ऐसा असोनि अतर्क्य होशी। हृषीकेशी तें ऐक॥ ८३॥
उच्चावचेषु भूतेषु दुर्ज्ञेयमकृतात्मभि:।
उपासते त्वां भगवन्यथातथ्येन ब्राह्मणा:॥ २॥
मशकादि हिरण्यगर्भपर्यंत। तूं सबाह्य सर्व भूतीं संतत। ऐशिया तूतें निश्चित। ब्राह्मण जाणत वेदार्थें॥ ८४॥ आकळूनि उपनिषदर्थ। तुझ्या ठायीं भजनयुक्त। ते तुज सर्वगतातें जाणत। सुनिश्चित सर्वात्मा॥ ८५॥ त्या सर्वात्म्याचा पाहतां पार। अचिंत्यानंतऐश्वर्यधर। त्या तुज नेणती प्राकृत नर। ऐक विचार तयांचा॥ ८६॥ जे मनाचे विकिले। उपस्थाचे अंकिले। जे रसनेचे पोसणे झाले। निद्रेनें केले घर जांवयी॥ ८७॥ त्यांसी स्वत:सिद्ध स्वरूप पाहीं। सर्वगत न पडेचि ठायीं। निजात्मता न कळे देहीं। सदा विषयीं भूलले॥ ८८॥ विषयीं चंचळ अंत:करण। त्यांसी नव्हे ध्यान सगुण। निर्गुणीं प्रवेशेना मन। अज्ञान जन केवीं तरती॥ ८९॥ न करितां नाना व्युत्पत्ती। न धरितां ध्यानस्थिती। तुझ्या उत्तमा ज्या विभूती। त्या सांग निश्चितीं भजनासी॥ ९०॥
येषु येषु च भावेषु भक्त्या त्वां परमर्षय:।
उपासीना: प्रपद्यन्ते संसिद्धिं तद्वदस्व मे॥ ३॥
ज्या ज्या तुझ्या विभूती। पूर्वीं उपासिल्या संतीं। दृढभावें करोनियां भक्ती। तुझी स्वरूपप्राप्ती पावले॥ ९१॥ त्या सकळ तुझ्या विभूती। कवण स्थिती कवण व्यक्ती। कवण भाव कवण गती। हें निश्चितीं मज सांगा॥ ९२॥ म्हणसी सकळ भूतांप्रती। तूंचि वोळख माझ्या विभूती। तरी ते तुझी अतर्क्य स्थिती। न कळे श्रीपती आमुचेनी॥ ९३॥
गूढश्चरसि भूतात्मा भूतानां भूतभावन।
न त्वां पश्यन्ति भूतानि पश्यन्तं मोहितानि ते॥ ४॥
सर्व भूतांचा हृदयस्थ। हृदयीं असोनि गुप्त। त्या तूतें भूतें समस्त। न देखत देहभ्रमें॥ ९४॥ त्या देहभ्रमासी देवराया। मूळकारण तुझी माया। तेथें तुझी कृपा झालिया। माया जाय विलया गुणेंसीं॥ ९५॥ मग सर्वत्र सर्वां ठायीं। सर्व भूतीं सबाह्य देहीं। तुझें स्वरूप ठायीं ठायीं। प्रकटे पाहीं सदोदित॥ ९६॥ एवढें तुझे कृपेचें करणें। ते कृपा लाहिजे कवणें गुणें। यालागीं तुझ्याविभूती उपासणें। तुझे कृपेकारणें गोविंदा॥ ९७॥ याचिलागीं विभूतींची स्थिती। समूळ सांगावी मजप्रती। तेचि अर्थींची विनंती। पुढतपुढती करीतसें॥ ९८॥
या: काश्च भूमौ दिवि वै रसायां
विभूतयो दिक्षु महाविभूते।
ता मह्यमाख्याह्यनुभावितास्ते
नमामि ते तीर्थपदाङ्घ्रिपद्मम्॥ ५॥
स्वर्गमृत्युपाताळस्थिती। विस्तारल्या दशदिशांप्रती। त्या समस्तही तुझ्या विभूती। सांग श्रीपती मजलागीं॥ ९९॥ ऐसा करोनियां प्रश्न। उद्धवें घातलें लोटांगण। सकळ तीर्थांचें जन्मस्थान। मस्तकीं श्रीचरण वंदिले॥ १००॥ ऐकोनि उद्धवाच्या प्रश्नासी। परम संतोषे हृषीकेशी। पुरस्करोनि उद्धवासी। काय त्यासी बोलिला॥ १॥ जो वैरिगजयूथपंचानन। कोदंडदीक्षाप्रतापगहन। सखा जिवलग पढियंता जाण। जीवप्राण जो माझा॥ २॥ ज्याचे रथींचे मी धुरेवरी। ज्याच्या अश्वांचे वाग्दोरे धरीं। जो उपदेशिला कुरुक्षेत्रीं। उभय सेनेमाझारीं रणरंगीं॥ ३॥ तो नरावतार अर्जुन। त्याच्याऐसा हा तुझा प्रश्न। ऐसें उद्धवासी संतोषोन। काय श्रीकृष्ण बोलिला॥ ४॥
श्रीभगवानुवाच
एवमेतदहं पृष्ट: प्रश्नं प्रश्नविदां वर।
युयुत्सुना विनशने सपत्नैरर्जुनेन वै॥ ६॥
हाचि प्रश्न मजकारणें। पूर्वीं पुशिला अर्जुनें। जेव्हां तिरस्कारूनि दुर्योधनें। युद्ध सत्राणें मांडिलें॥ ५॥ अरिनिर्दळणीं प्रतापपूर्ण। धीर वीर आणि सज्ञान। प्रश्नकर्त्यांमाजीं विचक्षण। माझा आत्मा जाण अर्जुन॥ ६॥ तेणें अर्जुनें कुरुक्षेत्रीं। युद्धसमयीं महामारीं। स्वजनवधाचें भय भारी। हाचि प्रश्न करी मज तेव्हां॥ ७॥
ज्ञात्वा ज्ञातिवधं गर्ह्यमधर्मं राज्यहेतुकम्।
ततो निवृत्तो हन्ताहं हतोऽयमिति लौकिक:॥ ७॥
स तदा पुरुषव्याघ्रो युक्त्या मे प्रतिबोधित:।
अभ्यभाषत मामेवं यथा त्वं रणमूर्धनि॥ ८॥
केवळ राज्यलोभाकारणें। गुरु गोत्र पितृव्य वधणें। हें अतिनिंद्य मजकारणें। नाहीं झुंझणें प्राणांतीं॥ ८॥ लौकिक धर्मप्रवृत्ती। मी मारिता हे मरती। हे महामोहाची भ्रांती। उपजली चित्तीं अर्जुना॥ ९॥ राज्यभोगाचें धरोनि वर्म। ज्ञातिवधाचें निंद्य कर्म। हा केवळ मज अधर्म। धर्माचा स्वधर्म बुडेल॥ ११०॥ ज्यांचें तीर्थ घ्यावें प्रतिदिनीं। जे पूजावे वरासनीं। ते खोंचूनि तिखट बाणीं। भोगावी अवनी स्वगोत्ररुधिरें॥ ११॥ स्वगोत्ररुधिराचा पूर। पृथ्वीवरी वाहेल दुस्तर। तेणें आम्हीं होऊं राज्यधर। हें कर्म घोर न करवे मज॥ १२॥ कुळीं सुपुत्र वांछिजे जिंहीं। बाण खोचावे त्यांचे हृदयीं। यापरी पूर्वजांसी पाहीं। झालों उतरायी मानावें॥ १३॥ ज्यांचें करावें श्राद्धतर्पण। त्यांचे बाणवरी घ्यावे प्राण। भलें पूर्वजां झालों उत्तीर्ण। आली नागवण निजधर्मा॥ १४॥
संमत॥ हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम्॥
युद्धीं निमालिया स्वर्गगती। जयो आलिया राज्यप्राप्ती। दोन्ही नश्वरें गा श्रीपती। कोणे हितार्थी झुंझावें॥ १५॥ ऐसेनि अनुतापें जाण। सांडूनियां धनुष्यबाण। शोकाकुलित अर्जुन। म्लानवदन रणरंगीं॥ १६॥ ते काळीं म्यांचि जाण। तो महावीरपंचानन। नाना युक्तीं केलें समाधान। तेंही लक्षण अवधारीं॥ १७॥ अर्जुना देह तितुका नश्वर। मळमूत्रांचें कोठार। करितां नाना उपचार। मरणतत्पर क्षणिक॥ १८॥ जीव निज नित्य निर्मळ। अज अव्यय अचळ। अच्छेद्य अभेद्य अमळ। अचंचळ निजांगें॥ १९॥ अर्जुना ऐक साचें। देहो तुझेनि प्रयत्नें न वांचे। जीव तुझेनि मारिला न वचे। पातक हत्येचें अहंभावें॥ १२०॥ हो कां त्वां असतें केलें। तरी तुझेनि जातें मारिलें। मी मारिता येणें बोलें। तुजसि गोंविलें अभिमानें॥ २१॥ जो देहाचा निर्माणकर्ता। तोचि तयाचा संहर्ता। तूं करण्या मारण्या परता। व्यर्थ अहंता कां घेसी॥ २२॥ जरी हे अहंता तूं न सांडिशी। तरी सकळ हत्येचिया राशी। साचचि आल्या तुजपाशीं। दोषी झालासी अर्जुना॥ २३॥ ऐक पां बापा पार्था। देहादि कर्मांची अहंता। जो घे आपुले माथां। तो दोषी सर्वथा तिहीं लोकीं॥ २४॥ हो कां स्वधर्मचि तूं पुसशी। तरी ऐक क्षत्रियाच्या क्षात्रधर्मासी। समरांगणीं पित्यापुत्रांसी। वधितां क्षत्रियासी दोष नाहीं॥ २५॥ युद्ध म्हणिजे स्वधर्मतीर्थ। समरांगणीं निमे तो नित्यमुक्त। जें तुज निजभाग्यें प्राप्त। तें तूं अहित मानिसी॥ २६॥ कर्ता दोष अहंतेच्या माथां। ते जो नातळे देहअहंता। तोचि कर्म करूनि अकर्ता। भोगूनि अभोक्ता तोचि एक॥ २७॥ तोचि संगामाजीं नि:संग। अवघें जग तो एकला सांग। जो निरभिमानी अव्यंग। तो सौरा चांग समरंगीं॥ २८॥ अर्जुना अभिमान सांडितां। तूं माझी पावशी समसाम्यता। तेव्हां सकळ पापाची वार्ता। तुज सर्वथा स्पर्शेना॥ २९॥ म्हणशी केवीं जाय अहंता। तरी मज लक्षूनि तत्त्वतां। स्वधर्मकर्मातें आचरितां। चित्तशोधकता तेणें होय॥ १३०॥ निर्मळत्व आलिया चित्ता। तो लागे माझिया भक्तिपंथा। भजनें माझिया समरसता। माझ्या निजभक्तां तत्काळ॥ ३१॥ अर्जुना सांडावया अभिमान। तूं नाइकसी माझें वचन। तरी जन्ममरणांचें भूषण। सकळ दोष जाण भोगिसी॥ ३२॥ तूं नित्यमुक्त अज अव्ययो। हा बुडेल तुझा सद्भावो। मग जन्ममरणांचा निर्वाहो। अविश्रम पहा हो भोगिसी॥ ३३॥ यालागीं करणें न करणें दोन्ही। प्रकृतीचे माथां ठेवूनी। तूं कायावाचामनींहूनी। मजलागुनी शरण रिघें॥ ३४॥ यापरी गा तत्त्वतां। मज सद्भावें शरण येतां। तुज सकळ कर्मांची वार्ता। मी सर्वथा शिवों नेदीं॥ ३५॥ यालागीं गा कोदंडपाणी। मरतें मारितें सांडूनि दोन्ही। सैरा होयीं रणांगणीं। मी तुजलागोनी उद्धरीन॥ ३६॥ तूं एक येथें कर्म करिता। मी एक तूतें उद्धरिता। ऐसें भिन्नत्व गा पार्था। माझ्या शरणागता असेना॥ ३७॥ मज अनंता शरण येणें। आणि जीवत्वें वेगळें उरणें। तें गुळदगडाऐसें जिणें। अनन्यपणें नव्हे शरण॥ ३८॥ सरिता सागरा शरण गेली। ते समुद्रचि होऊनि ठेली। पुढती परतावया मुकली। समरसिली सिंधुत्वें॥ ३९॥ गंगा पावोनि सिंधुत्वासी। मागील यावा वंचीना तिसीं। तेवीं सबाह्य आत्मसमरसीं। शरण अहर्निशीं अखंडत्वें॥ १४०॥ दीप दावाग्नी भेटों गेला। तो तेव्हढाचि होऊनि ठेला। तेवीं मजलागीं जो शरण आला। तो मीचि झाला अर्जुना॥ ४१॥ पार्था परिस पा चिन्ह प्राप्ताचें। हें भूताकार मज अच्युताचें। ऐसें सद्भावें जो देखे साचें। त्यासी ब्रह्मसायुज्याचें साम्राज्य लाभे॥ ४२॥ मज आत्मयाचे निजस्थितीं। संसार मुळीं मुख्य भ्रांती। तेथ मारिता मी हे मरती। कोणें हे युक्ती मानावी॥ ४३॥ मृगजळ जेथें नसे। तेथें तंव कोरडेंचि असे। मा जे ठायीं आभासे। तेथ तऱ्ही असे वोल्हांशु कायी॥ ४४॥ तेवीं संसाराचें रूप नाम। ठेविती तेथें निखळ ब्रह्म। हाचि ज्याचा स्वभाव परम। तें चालतें ब्रह्म वर्ततां देहीं॥ ४५॥ देहा जडत्वें न बाधी कर्म। आत्मा नातळे धर्माधर्म। हें ज्यासी कळलें वर्म। तें चालतें ब्रह्म वर्ततां देहीं॥ ४६॥ देहीं वर्ततां तो विदेह। विदेह तेंच त्याचें देह। हें माझें परम गुह्य। अर्जुनासी पाहें सांगितलें॥ ४७॥ यापरी म्यां नानायुक्तीं। युद्धीं बोधिला सुभद्रापती। तेणेंही मज करोनि विनंती। पुशिल्या विभूती तुझ्याऐशा॥ ४८॥ ज्या सांगीतल्या अर्जुनासी। त्याचि मी सांगेन तुजपाशीं। ऐसें पुरस्करूनि उद्धवासी। निजविभूति त्यासी सांगत॥ ४९॥ उद्धवा ज्या पुशिल्या विभूती। त्या माझ्या मज न गणवती। मी जगदात्मा त्रिजगतीं। संख्यासंस्थिती गणी कोण॥ १५०॥
अहमात्मोद्धवामीषां भूतानां सुहृदीश्वर:।
अहं सर्वाणि भूतानि तेषां स्थित्युद्भवाप्यय:॥ ९॥
मी हृदयस्थ समर्थ हृदयीं। त्या मज जीवू मागे जें कांहीं। त्यासी विमुख मी नव्हें कंहीं। पुरवीं सर्वही ईश्वरत्वें॥ ५१॥ जीवू अति अडलेपणें। जें मागे मजकारणें। तें मी त्यासी अलोट देणें। यालागीं म्हणणें ईश्वर मज॥ ५२॥ मी आत्मा असें हृदयीं। हा विश्वास जयांसी नाहीं। ते मृगजळाचे डोहीं। नावे सकट पाहीं बुडबुडों गेले॥ ५३॥ तेथ नाव करावयाचे कष्ट। वृथा गेले फुकट। तेवीं साधनें सोसूनि कचाट। साधनेंसकट बुडों गेले॥ ५४॥ माझे प्राप्तीचें मुख्य वर्म। मी हृदयीं असें परब्रह्म। हेंचि ज्याचें नित्य कर्म। तो विभूती परम पैं माझी॥ ५५॥ मी सर्वभूतहृदयवासी। सुहृद सोयरा मी सर्वांसी। नियंता ईश्वरसत्तेसी। नियामक भूतांसी मी एक॥ ५६॥ एवं सर्वभूतांचा मी स्वामी। इयें सर्व भूतें तेंही मी। भूतांचे जन्मभूमीची मी भूमी। उत्पत्त्यादि कर्मीं मी कर्ता॥ ५७॥ कृषीवळाचियेपरी। मी सृजीं पाळीं संहारीं। ब्रह्मा विष्णु त्रिपुरारी। गुणावतारी मी एक॥ ५८॥ कर्माची जे क्रियाशक्ती। ते मी म्हणे श्रीपती। हे सामान्यें बोलिली स्थिती। विशेष विभूती त्या ऐक॥ ५९॥
अहं गतिर्गतिमतां काल: कलयतामहम्।
गुणानां चाप्यहं साम्यं गुणिन्यौत्पत्तिको गुण:॥ १०॥
गतिमंतांमाजीं जे गती। ते मी म्हणे लक्ष्मीपती। गतीसी माझेनि निजगती। जाण निश्चितीं उद्धवा॥ १६०॥ चेतनेनें सर्वां गती। ते चेतना चैतन्याची शक्ती। चेतनेस्तव इंद्रियप्रवृत्ती। एवं गतीची गती मी एक॥ ६१॥ सकळ गतींची परम गती। प्राण्यासी मुख्यत्वें मुक्ती। ते मुक्तीसी मजमाजीं मुक्ती। एवं गतीची गती मी एक॥ ६२॥ सुरनरां आकळिता। ते जाण काळाची सत्ता। त्या काळाचा मी आकळिता। जाण तत्त्वतां मी महाकाळू॥ ६३॥ तिहीं गुणांची समानावस्था। ते मी जाण गा निजभक्ता। अकृत्रिम गुण जो धर्मता। तो मी तत्त्वतां म्हणे हरी॥ ६४॥
गुणिनामप्यहं सूत्रं महतां च महानहम्।
सूक्ष्माणामप्यहं जीवो दुर्जयानामहं मन:॥ ११॥
गुणी म्हणावया हेंचि कारण। ज्या मजमाजीं सूत्र क्रियाप्रधान। मायेचें प्रथमकार्य जाण। तो गुणी मी संपूर्ण उद्धवा॥ ६५॥ जगीं आकाश थोर पाहीं। तें मजमाजीं खेळे लपंडायी। माझ्या महत्तत्त्वाची नवायी। मजही निश्चयीं नेमेना॥ ६६॥ महत्तत्त्व जें ज्ञानप्रधान। तें मी म्हणे नारायण। सूक्ष्मांमाजीं जीवू मी आपण। ब्रह्मादिकां जाण अतर्क्य॥ ६७॥ दुर्जयांमाजीं मी मन। त्यासी जिंकावया जाण। मजवेगळी आंगवण। नाहीं संपूर्ण आणिकासी॥ ६८॥ मज लक्षितां मन आकळे। मज विसरतां मन चौताळे। मन न धरवे वेदशास्त्रबळें। मन नाकळे मजवीण॥ ६९॥ मन तेंचि मी आहें। मज चिंतितां तें विरोनि जाये। मज विसरतां तें पाहें। सैरा जाये सुनाट॥ १७०॥
हिरण्यगर्भो वेदानां मन्त्राणां प्रणवस्त्रिवृत्।
अक्षराणामकारोऽस्मि पदानिच्छन्दसामहम्॥ १२॥
वेद-अध्यापक प्रसिद्ध। हिरण्यगर्भ मी म्हणे गोविंद। माझेनि जगीं अनुल्लंघ्य वेद। वेदवाद तोही मी॥ ७१॥ ओंकारावीण मंत्रश्रेणी। ते जाण बाळकाची कहाणी। मंत्रीं ओंकार मी चक्रपाणी। सकळ मंत्र त्याचेनी पावन॥ ७२॥ अकार उकार मकार। अर्धमात्रेसी उच्चार। या नांव ‘त्रिविध ओंकार’। पावन मंत्र येणेंसीं॥ ७३॥ अक्षरांच्या उच्चारासीं। अकार लागला सर्वांसी। तो अकारू मी हृषीकेशी। जाण निश्चयेंसीं उद्धवा॥ ७४॥ अक्षरीं अकार मी मुकुंदू। छंदांमाजीं गायत्री छंदू। तो मी म्हणे गोविंदू। यालागीं ब्रह्मवृंदू सेविती॥ ७५॥ छंदांमाजीं गायत्री छंद। सकळद्वंद्वांमाजीं निर्द्वंद्व। तो मी म्हणे गोविंद। द्विजवृंद येणेंचि मज॥ ७६॥
इन्द्रोऽहं सर्वदेवानां वसूनामस्मि हव्यवाट्।
आदित्यानामहं विष्णू रुद्राणां नीललोहित:॥ १३॥
देवांमाजीं मी इंद्र जाण। वसूंमाजीं मी हुताशन। आदित्यांमाजीं मी वामन। रुद्रांमाजीं जाण। नीललोहितू॥ ७७॥
ब्रह्मर्षीणां भृगुरहं राजर्षीणामहं मनु:।
देवर्षीणां नारदोऽहं हविर्धान्यस्मि धेनुषु॥ १४॥
शापूनि ब्रह्म अपूज्य केला। शिवाचा नैवेद्य त्यागविला। विष्णू हृदयीं लाता हाणितला। भृगु वाखाणिला श्रीवत्सें॥ ७८॥ ब्रह्मऋषींमाजीं संपन्न। भृगु तो मी म्हणे श्रीकृष्ण। मनुस्वरूपें मी आपण। राजर्षि जाण मुख्यत्वें॥ ७९॥ देवर्षीमाजीं मुनि नारद। तोही मी म्हणे गोविंद। कामधेनु अतिशुद्ध। स्वरूप प्रसिद्ध तें माझें॥ १८०॥
सिद्धेश्वराणां कपिल: सुपर्णोऽहं पतत्त्रिणाम्।
प्रजापतीनां दक्षोऽहं पितॄणामहमर्यमा॥ १५॥
सिद्धांमाजीं कपिल मुनीश्वर। तो मी म्हणे सारंगधर। पक्ष्यांमाजीं खगेश्वर। तो मी श्रीधर गरुडरूपें॥ ८१॥ प्रजापतींमाजीं मुख्य। कृष्ण म्हणे तो मी दक्ष। पितृगणांमाजीं अध्यक्ष। अर्यमा प्रत्यक्ष स्वरूप माझें॥ ८२॥
मां विद्धॺुद्धव दैत्यानां प्रह्रादमसुरेश्वरम्।
सोमं नक्षत्रौषधीनां धनेशं यक्षरक्षसाम्॥ १६॥
भक्तिप्रतापें अतिअगाध। तो दैत्यांमाजीं मी प्रल्हाद। नक्षत्रऔषधींचा जो स्वामी चंद्र। तें म्हणे गोविंद स्वरूप माझें॥ ८३॥ यक्षराक्षसांमाजीं थोर। माझें स्वरूप तो कुबेर। ज्याचे विश्वासेंनिरंतर। असे भांडार हरीचें॥ ८४॥
ऐरावतं गजेन्द्राणां यादसां वरुणं प्रभुम्।
तपतां द्युमतां सूर्यं मनुष्याणां च भूपतिम्॥ १७॥
ऐरावत जो गजेंद्र। तो मी म्हणे यादवेंद्र। वरुण जो जळचरेंद्र। तें म्हणे उपेंद्र स्वरूप माझें॥ ८५॥ स्वप्रभा प्रकाशनिष्ठ। जग प्रकाशूनि उद्भट। तो सूर्य मी म्हणे वैकुंठ। अतितिखट निजतेजें॥ ८६॥ मनुष्यांमाजीं जो भोगी क्षिती। सर्व भूमी ज्याच्या हातीं। ज्यातें बोलती भूपती। ते माझी विभूती हरि म्हणे॥ ८७॥
उच्चै:श्रवास्तुरङ्गाणां धातूनामस्मि काञ्चनम्।
यम: संयमतां चाहं सर्पाणामस्मि वासुकि:॥ १८॥
नागेन्द्राणामनन्तोऽहं मृगेन्द्र: शृङ्गिदंष्ट्रिणाम्।
आश्रमाणामहं तुर्यो वर्णानां प्रथमोऽनघ॥ १९॥
उच्चै:श्रवा तुरंगजाती। तो मी म्हणे कमळापती। सुवर्ण धातु माझी विभूती। जीलागीं लुलाती तिनी लोक॥ ८८॥ दंडधरित्यांमाजीं गहन। यमधर्म मी आपण। सर्पांमाजीं जाण। मी नारायण वासुकी॥ ८९॥ अनंत या नामातें जो धरी। तो नाग मी म्हणे श्रीहरी। नखदंष्ट्राशृंगधारी। त्यांमाजीं केसरी म्हणे देवो॥ १९०॥ चतुर्थाश्रम संन्यास जाण। तो मी म्हणे नारायण। वर्णाग्रज जे ब्राह्मण। ते मी ब्रह्म जाण बोलतें॥ ९१॥
तीर्थानां स्रोतसां गङ्गा समुद्र: सरसामहम्।
आयुधानां धनुरहं त्रिपुरघ्नो धनुष्मताम्॥ २०॥
तीर्थसरितांमाजीं गांग। तें मी म्हणे श्रीरंग। तडागीं श्रेष्ठ तडाग। समुद्र सांग मी म्हणे हरी॥ ९२॥ आयुधीं धनुष्य हतियेर। तें मी म्हणे सारंगधर। त्रिपुरारि मी धनुर्धर। जेणें केला संहार त्रिपुराचा॥ ९३॥
धिष्ण्यानामस्म्यहं मेरुर्गहनानां हिमालय:।
वनस्पतीनामश्वत्थ ओषधीनामहं यव:॥ २१॥
त्रिभुवननिवासस्थान महामेरू। तो मी म्हणे धराधरू। दुर्गमत्वें अतिदुर्धरू। तो मी हिमगिरिवरू म्हणे कृष्ण॥ ९४॥ वृक्षांमाजीं जो अश्वत्थू। तो मी म्हणे श्रीकृष्णनाथू। औषधींमाजीं अतिविख्यातू। यव मी अच्युतू म्हणे वेगें॥ ९५॥
पुरोधसां वसिष्ठोऽहं ब्रह्मिष्ठानां बृहस्पति:।
स्कन्दोऽहं सर्वसेनान्यामग्रण्यां भगवानज:॥ २२॥
श्रीरामपौरोहित्यें श्रेष्ठ। देवो म्हणे तो मी वसिष्ठ। वेदवेत्त्यांमाजीं उद्भट। सुरगुरु वरिष्ठ मी उद्धवा॥ ९६॥ स्कंद सेनापतिशिरोमणी। तो मी म्हणे चक्रपाणी। स्वधर्मप्रवर्तकू अग्रगणी। वंद्य ब्राह्मणीं तो ब्रह्मा मी॥ ९७॥
यज्ञानां ब्रह्मयज्ञोऽहं व्रतानामविहिंसनम्।
वाय्वग्न्यर्काम्बुवागात्मा शुचीनामप्यहं शुचि:॥ २३॥
यज्ञांमाजीं ब्रह्मयज्ञ। तो मी म्हणे सर्वज्ञ। देवर्षिपितृभूतगण। आब्रह्म भुवन जेणें तृप्त॥ ९८॥ जीवमात्रासी पैं जाण। नेदावें दु:खवचन। व्रतांमाजीं जें अविहिंसन। तें मी श्रीकृष्ण स्वयें म्हणे॥ ९९॥ एका वायूचेनि पवित्रपण। एक अग्नीस्तव पवित्र जाण। एकातें पवित्र करी जीवन। एक पावन वचनमात्रें॥ २००॥ एक बुद्धीस्तव पवित्र जाण। या समस्तांमाजीं पवित्रपण। तें माझें स्वरूप म्हणे श्रीकृष्ण। पावना पावन मी एक॥ १॥ जग माझेनि नामें पुनीत। हें सर्वांचें संमत। त्या माझें स्वरूप जें येथ। परम पुनीत पुनीतां॥ २॥
योगानामात्मसंरोधो मन्त्रोऽस्मि विजिगीषताम्।
आन्वीक्षिकी कौशलानां विकल्प: ख्यातिवादिनाम्॥ २४॥
विविध योगांमाजीं आत्मरोधू। तो योग मी म्हणे गोविंदू। जेणें प्रकटे परमानंदू। समाधिबोधू साधकां॥ ३॥ मुख्यत्वें विवेक धरोनि हातीं। जो न्यायतां विजयो वांछी चित्तीं। ते नीतीची नीति मी श्रीपती। जाण निश्चितीं उद्धवा॥ ४॥ आत्मानात्मविवेक केवळ। ते आन्वीक्षिकी विद्या कुशळ। ते विद्या म्हणे मी गोपाळ। विवेक प्रबळ माझेनी॥ ५॥ वादांमाजीं वाद अनंत। जेथ विकल्पा नाहीं अंत। तो वादू मी म्हणे अच्युत। ऐक निश्चित विकल्प॥ ६॥ आख्याति अन्यथाख्याती। शून्यख्याति सत्ख्याती। अनिर्वचनीय जे ख्याती। तो वादू निश्चितीं मी उद्धवा॥ ७॥
स्त्रीणां तु शतरूपाहं पुंसां स्वायंभुवो मनु:।
नारायणो मुनीनां च कुमारो ब्रह्मचारिणाम्॥ २५॥
शतरूपा आणि मनू। इयें दोनी मी म्हणे जनार्दनू। मुनींमाजीं मी नारायणू। बदरी सेवुनू सदा असें॥ ८॥ नैष्ठिक ब्रह्मचर्यधर। माझें स्वरूप सनत्कुमार। स्वयें सांगताहे श्रीधर। जाण साचारउद्धवा॥ ९॥
धर्माणामस्मि संन्यास: क्षेमाणामबहिर्मति:।
गुह्यानां सूनृतं मौनं मिथुनानामजस्त्वहम्॥ २६॥
भूतां अभयदानउपक्रमू। सर्वां भूतीं मी आत्मारामू। हा संन्यासाचा मुख्य धर्मू। तो धर्मपुरुषोत्तमू स्वयें मी म्हणे॥ २१०॥ भूतांसी काया वाचा मनें। दु:ख नेदूनि सुख देणें। या नांव संन्यासधर्म म्हणणें। तो धर्म मी म्हणे गोविंद॥ ११॥ अंतरीं शुद्ध नाहीं बोध। दांत चावोनि साहतां द्वंद्व। ते क्षमा नोहे शुद्ध। ऐक विनोद क्षमेचा॥ १२॥ अंतरीं ठसावलें परब्रह्म। बाह्य सर्वां भूतीं जाहला सम। ते क्षमा मी म्हणे पुरुषोत्तम। द्वंद्वाराम बाधीना॥ १३॥ असत्य पापी सकळ सृष्टीं। असत्यांमाजीं पापकोटी। असत्याची खोटी गोठी। जो तो पोटीं सांडीना॥ १४॥ उभय लौकिकीं खोटेपणें। असत्य बहिर्मुख नाणें। तें मनींहूनि जेणें सांडणें। तो म्यां श्रीकृष्णें वंदिजे॥ १५॥ ते गुह्यांमाजीं अतिगुह्य जाण। सत्य वाचा कां मनींहूनि मौन। तें मी म्हणे मधुसूदन। सत्य प्रिय जाण निजगुह्य॥ १६॥ स्रष्टॺाचे देह द्विधा जाण। मनु शतरूपा मूळ मिथुन। तें मी म्हणे नारायण। मनुष्यसृजन सद्भावें॥ १७॥
संवत्सरोऽस्म्यनिमिषामृतूनां मधुमाधवौ।
मासानां मार्गशीर्षोऽहं नक्षत्राणां तथाभिजित्॥ २७॥
सावधानें अविकळ। न चुकतां पळें पळ। संवत्सरात्मक जो काळ। तो मी गोपाळ स्वयें म्हणे॥ १८॥ त्रसरेणूपासोनि जाण। लवनिमिषदिनमान। संवत्सरवरी सावधान। गणीं मी संकर्षण काळगणना॥ १९॥ मधुमाधववसंतयुक्तू। कृष्ण म्हणे तो मी ऋतू। मार्गशीर्ष मी मासांआंतू। धान्यपाकयुक्तू। आल्हादी॥ २२०॥ गणितां न ये पंचांगांत। नक्षत्रीं असोनि सदा गुप्त। अव्यक्त परी सज्ञाना प्राप्त। तें मी अभिजित् म्हणे हरी॥ २१॥
अहं युगानां च कृतं धीराणां देवलोऽसित:।
द्वैपायनोऽस्मि व्यासानां कवीनां काव्य आत्मवान्॥ २८॥
युगांमाजीं कृतयुग। तें मी म्हणे श्रीरंग। जेथ संपूर्ण धर्म सांग। अधर्मभाग असेना॥ २२॥ निजधैर्य अतिअद्भुत। असित देवल धैर्यवंत। तो मी म्हणे गा अच्युत। जाण निश्चित उद्धवा॥ २३॥ वेदविभागी राजहंस। जो कां द्वैपायन व्यास। तो मी म्हणे हृषीकेश। निवडूनि द्विजांस दीधले वेद॥ २४॥ कवि त्यांमाजीं परमार्थ ज्ञाता। उशना कवी जाण तत्त्वतां। तो मी म्हणे रमाभर्ता। निजात्म कविता मी शुक्र॥ २५॥
वासुदेवो भगवतां त्वं तु भागवतेष्वहम्।
किंपुरुषाणां हनुमान्विद्याध्राणां सुदर्शन:॥ २९॥
षड्गुणभाग्यें भाग्यवंत। पूर्णांशें जो भगवंत। वासुदेवनामें विख्यात। जाण तो मी येथ श्रीकृष्ण॥ २६॥ भागवतांमाजीं अतिगहन। उद्धवा तूं तो मीचि जाण। ऐसें बोलतां श्रीकृष्ण। उद्धवें श्रीचरण वंदिले॥ २७॥ उद्धवें करितां नमन। कृष्णें दीधलें आलिंगन। आनंदें कोंदलें त्रिभुवन। स्वानंदघन तुष्टला॥ २८॥ उद्धव आणि श्रीकृष्ण। दोनी एक जाहले जाण। ‘मी तो तूं’ जें बोलिला श्रीकृष्ण। तें उद्धवासी आपण सत्यत्वें दावी॥ २९॥ दोघांचें मोडलें दोनीपण। उद्धव जाहला श्रीकृष्ण। कृष्णाअंगीं उद्धवपण। संपूर्ण जाण बाणलें॥ २३०॥ तेणें उद्धव झाला विस्मित। नावेक श्लाघला आपणांत। मीच कृष्णाचा प्रिय भक्त। हें जाणोनि अनंत बोलिला॥ ३१॥ वानरांमाजीं हनुमंत। तो मी म्हणे कृष्णनाथ। तंव उद्धव जाहला गर्वहत। लाजला पोटांत ते काळीं॥ ३२॥ जेथ वानर आणि वनचर। मजहूनि कृष्णाचे प्रियकर। न कळे हरिभक्तांचा पार। मी कोण किंकर ते ठायीं॥ ३३॥ ऐसें विचारूनि चित्तां। सवेंचि नमिलें कृष्णनाथा। तुझ्या विभूति अचुंबिता। कृपेनें तत्त्वतां मज सांग॥ ३४॥ तंव हांसोनि श्रीधर। काय बोलिला उत्तर। सुदर्शन जो विद्याधर। तो विभूति साचार पैं माझी॥ ३५॥
रत्नानां पद्मरागोऽस्मि पद्मकोश: सुपेशसाम्।
कुशोऽस्मि दर्भजातीनां गव्यमाज्यं हवि:ष्वहम्॥ ३०॥
रत्नांमाजीं जो पद्मराग। तो मी म्हणे श्रीरंग। मनोहरांमाजीं अव्यंग। हरि म्हणे सांग पद्मकळा तो मी॥ ३६॥ दशदर्भांमाझारीं। कुश तो मी म्हणे श्रीहरी। सकळ हविषांच्या शिरीं। गोघृत श्रीहरि स्वयें मी म्हणे॥ ३७॥
व्यवसायिनामहं लक्ष्मी: कितवानां छलग्रह:।
तितिक्षास्मि तितिक्षूणां सत्त्वं सत्त्ववतामहम्॥ ३१॥
व्यवसायाचे व्यवस्थिती। दानयुक्त अतिसंपत्ती। ते लक्ष्मी मी म्हणे श्रीपती। जाण निश्चितीं। उद्धवा॥ ३८॥ कपटाचिये कपटगती। अगम्य जे छळणस्थिती। तो मी कृष्ण मायिकमूर्ती। अतर्क्य युक्ती छळणाची॥ ३९॥ ब्रह्माचे अंगीं निजजीविता। जीवासी ब्रह्मसायुज्यता। त्या कपटाचा मीचि कर्ता। देवांदेवतां अतर्क्य॥ २४०॥ आम्ही मायानियंते म्हणविती। तो शिवू ठकिला मोहिनीप्रती। ब्रह्मा ठकिला वत्सहरणार्थी। ठकडा निश्चितीं मी एकू॥ ४१॥ सहनशीळीं सहनशक्ती। ते मी म्हणे कमळापती। सात्त्विकांची निजसत्त्ववृत्ती। ते मी श्रीपती स्वयें म्हणे॥ ४२॥
ओज:सहो बलवतां कर्माहं विद्धि सात्त्वताम्।
सात्त्वतां नवमूर्तीनामादिमूर्तिरहं परा॥ ३२॥
बळवंतांच्या ठायीं प्रबळ। मनोबळ शरीरबळ। धैर्यबळ तें मी गोपाळ। जेणें अळुमाळ डंडळीना॥ ४३॥ भक्तांच्या ठायीं भजनकर्म। जेणें माझें अनिवार प्रेम। तें कर्म म्हणे मी पुरुषोत्तम। भक्तकामनिर्दळणू॥ ४४॥ नवव्यूह अर्चनस्थिती। सात्त्वतां ज्या नवमूर्ती। त्यांत वासुदेव प्रथमस्थिती। ऐक व्युत्पत्ती नवांची॥ ४५॥ वासुदेव संकर्षण। अनिरुद्ध आणि प्रद्युम्न। हयग्रीव नारायण। वराह वामन नरसिंह॥ ४६॥ हे नवव्यूहांची व्युत्पत्ती। यांमाजीं मी प्रथम मूर्ती। येर आठही माझ्या विभूती। जाण निश्चितीं उद्धवा॥ ४७॥ हयग्रीव वेदमूर्ती। तेथें श्रीव्यासें करूनि भक्ती। वेदव्यासपदप्राप्ती। हे केली ख्याती तिहीं लोकीं॥ ४८॥ नारायण निजमूर्ती। स्रष्टॺानें करूनि त्याची भक्ती। चतु:श्लोकीं ज्ञानस्थिती। पावोन निश्चितीं ब्रह्मत्वा आला॥ ४९॥ श्वेतवराह महामूर्ती। धरेनें केली पूर्ण भक्ती। तीस उद्धरूनि कृपामूर्ती। अभिनव शांती अर्पिली॥ २५०॥ माझी निजमूर्ति वामन। देवीं करूनि पूर्ण भजन। त्यांच्या छळें बळी बांधोन। देवांचा सन्मान स्वाधिकार केला॥ ५१॥ नरहरि दिव्यमूर्ती। प्रल्हादें करूनि अनन्यभक्ती। मी सर्वात्मा सर्वां भूतीं। हे लोकप्रतीती विश्वासिली जेणें॥ ५२॥ संकर्षण श्रेष्ठ मूर्ती। ब्रह्माज्ञा रैवतें केली भक्ती। अर्पूनियां रेवती। स्वानंदस्थितीं निवाला॥ ५३॥ प्रद्युम्न काममूर्ती। सकाम कामुकीं करूनियां भक्ती। जे जे काम वांछिती। ते ते निश्चितीं तो पुरवी॥ ५४॥ अनिरुद्ध माझा निजसखा। शिवाज्ञा भक्ती केली उखा। बाणासुर तारिला देखा। साह्य चित्ररेखा नारदाज्ञा॥ ५५॥ पूर्णांशें ब्रह्मस्थिती। वासुदेव मी आदिमूर्ती। लीलेनें तारिले नेणों किती। तेथील निजभक्ती उद्धवार्जुनीं नांदे॥ ५६॥ नव भक्ति नव मूर्ती। तेथील भक्तीची स्थिती। उद्धवा म्यां तुजप्रती। यथार्थ गती सांगीतली॥ ५७॥
विश्वावसु: पूर्वचित्तिर्गन्धर्वाप्सरसामहम्।
भूधराणामहं स्थैर्यं गन्धमात्रमहं भुव:॥ ३३॥
ज्याचें गायन अतिअपूर्व। जो विश्वावसु गंधर्व। तो मी म्हणे माधव। ऐके उद्धव सावध॥ ५८॥ नृत्य करूनि मनोहरा। सबाह्य सद्भावें सुंदरा। पूर्वचित्ती जे अप्सरा। ते मी म्हणे नोवरा भीमकीचा॥ ५९॥ पर्वतांमाजीं जें ‘स्थैर्यपण’। तें मी म्हणे नारायण। पृथ्वीमाजीं जो ‘गंध’ जाण। तो मी श्रीकृष्ण स्वयें म्हणे॥ २६०॥
अपां रसश्च परमस्तेजिष्ठानां विभावसु:।
प्रभा सूर्येन्दुताराणां शब्दोऽहं नभस: पर:॥ ३४॥
उदकाच्या ठायीं ‘रस’ सुरसु। तो मी म्हणे श्रीनिवासु। तेजिष्ठांमाजीं जो ‘प्रकाशु’। तो मी निजतेजसु उद्धवा॥ ६१॥ चंद्रसूर्यतारांच्या ठायीं। जें ‘तेज’ तें माझें पाहीं। ‘अनाहतशब्द’ तो मीही। जो गगनासीं कंहीं नातळे॥ ६२॥
ब्रह्मण्यानां बलिरहं वीराणामहमर्जुन:।
भूतानां स्थितिरुत्पत्तिरहं वै प्रतिसङ्क्रम:॥ ३५॥
ब्राह्मणभजनीं ‘बळी’ ची थोरी। तो मी कृष्ण म्हणे निर्धारीं। ब्राह्मणभजनप्रतापें करीं। मी बळीच्या द्वारीं द्वारपाळु॥ ६३॥ नरावतारें अतिसंपन्न। पांडवांमाजीं वीर ‘अर्जुन’। तो मी म्हणे नारायण। जीवप्राण तो माझा॥ ६४॥ भूतांची ‘उत्पत्ति-स्थिती’। ते मी म्हणे श्रीपती। भूतांसी जे ‘प्रळयगती’। तेही मी निश्चितीं उद्धवा॥ ६५॥
गत्युक्त्युत्सर्गोपादानमानन्दस्पर्शलक्षणम्।
आस्वादश्रुत्यवघ्राणमहं सर्वेन्द्रियेन्द्रियम्॥ ३६॥
ज्ञान-कर्म उभय इंद्रियें। त्या इंद्रियांचें मी इंद्रिय पाहें। त्यांची क्रिया जे जे आहे। ते माझेनि होये अभिव्यक्त॥ ६६॥ ‘गति-ग्रहण-गमन’। ‘उत्सर्ग’ आणि ‘मोहन’। ‘दर्शन’ ‘स्पर्शन’ ‘घ्राण’। ‘श्रवण’ ‘स्वादन’ माझेनी॥ ६७॥ ते इंद्रियक्रियेचें चलन। तिळभरी नव्हे मजवीण। ऐक त्याचेंही लक्षण। तुज मी संपूर्ण सांगेन॥ ६८॥ मी मनाचेंही ‘महामन’। नयनाचेंही ‘नयन’। स्पर्शाचेंही ‘स्पर्शन’। जिव्हेची जाण ‘निजजिव्हा’॥ ६९॥ मी घ्राणाचेंही निज ‘घ्राण’। श्रवणाचें ‘आदिश्रवण’। ग्रहणाचें ‘निजग्रहण’। गतीची जाण मी ‘गती’॥ २७०॥ मी आनंदाचा ‘आनंदु’। मी बुद्धीचाही ‘प्रबोधु’। सकळ इंद्रियांचा ‘विषय स्वादु’। तो मी मुकुंदु उद्धवा॥ ७१॥ मी वाचेची ‘वाचा’ सावकाश। मी परेचाही ‘परेश’। सकळ इंद्रियांचा मी ‘ईश’। यालागीं ‘हृषीकेश’ नांव माझें॥ ७२॥
पृथिवीवायुराकाश आपो ज्योतिरहं महान्।
विकार: पुरुषोऽव्यक्तं रज: सत्त्वं तम: परम्॥ ३७॥
तत्त्वसंख्या पंचवीस। त्रिगुण घालितां अठ्ठावीस। ऐक त्यांचाही विलास। सावकाश सांगेन॥ ७३॥ अहं महतत्त्व पंचतन्मात्रा। हा स्थूल प्रकृतीचा उभारा। महाभूतेंद्रियें अकरा। हे षोडश विकारांची संख्या॥ ७४॥ यांत मिळाल्या प्रकृति-पुरुष। तत्त्वसंख्या पंचवीस। प्रकृतीमाजीं गुणांचा वास। हा तत्त्वविलास तत्त्वांचा॥ ७५॥ प्रकृति गुणविकार। तत्त्वसंख्या निर्धार। हा म्यां सांगितला जो विचार। तें परात्पर स्वरूप माझें॥ ७६॥
अहमेतत्प्रसंख्यानं ज्ञानं तत्त्वविनिश्चय:।
मयेश्वरेण जीवेन गुणेन गुणिना विना।
सर्वात्मनापि सर्वेण न भावो विद्यते क्वचित्॥ ३८॥
एवं ‘पंचवीसतत्त्वसंख्यान’। तें अवघें मीचि जाण। या गणण्याचें गणितें ‘ज्ञान’। तेंही मी आपण म्हणे देवो॥ ७७॥ हेंही जाणतें जें लक्षण। तेंही देवो म्हणे मी आपण। मजवेगळें अणुप्रमाण। सर्वथा जाण असेना॥ ७८॥ जीव आणि ईश्वर। गुणी आणि गुणावतार। क्षेत्रक्षेत्रज्ञ निर्धार। सर्वही साचार मीचि मी॥ ७९॥ मजवेगळें अणुमात्र। उरलें नाहीं गा स्वतंत्र। मी सर्वात्मा सर्वत्र। केवळ ‘चिन्मात्र’ तेंही मी॥ २८०॥ मजवेगळें येथ कांहीं। उद्धवा गा उरलें नाहीं। सर्वसाधारण पाहीं। सर्वां देहीं असें मी॥ ८१॥ उद्धवा ऐसें म्हणसी कांहीं। ‘संक्षेपु न करावापाहीं’। विस्तारू न चले ये ठायीं। ऐक तेंही सांगेन॥ ८२॥
संख्यानं परमाणूनां कालेन क्रियते मया।
न तथा मे विभूतीनां सृजतोऽण्डानि कोटिश:॥ ३९॥
पृथ्वीचिया परमाणुकणा। मी काळरूपें करी गणना। परी विभूतिसंख्याप्रमाणा। माझेनिही जाणा। न गणवती॥ ८३॥ म्यां सृजिलें अनंत ब्रह्मगोळ। ते मज गणवतीना सकळ। मा विभूति माझ्या केवळ। कोण तोंडाळ गणूं शके॥ ८४॥ मी सर्वज्ञ श्रीनारायण। माझ्या विभूति मज जाण। गणावया नाहीं आंगवण। मा निरूपण केवीं सांगें॥ ८५॥ मनुष्यांमाजीं माझी विभूती। नांदतसे कोणे स्थितीं। ते खूण सांगेन मी तुजप्रती। ऐक निश्चितीं उद्धवा॥ ८६॥
तेज: श्री:कीर्तिरैश्वर्यं ह्रीस्त्याग: सौभगं भग:।
वीर्यं तितिक्षा विज्ञानं यत्र यत्र स मेंऽशक:॥ ४०॥
ज्याची प्रबळ प्रतापशक्ती। जेथ निरंतर लक्ष्मीची वस्ती। ज्यासी मर्यादा नाहीं संपत्ती। ज्याची उदार कीर्ति स्वधर्में॥ ८७॥ ज्याच्या ऐश्वर्याची परमगती। आज्ञेवरी नेमी त्रिजगती। ज्याची अनावर दानस्थिती। जेथ भाग्याची उत्पत्ती नीच नवी दिसे॥ ८८॥ ज्याचें सामर्थ्य अतिदुर्धर। कोणी बोलों शकेना उत्तर। ज्याचें सौभाग्य मनोहर। आल्हादकर जननयनां॥ ८९॥ ज्यासी सहनशीळतेची वोज। ज्यासी निंद्य कर्माची लाज। जो विज्ञानाचें भोज। सहजेंचि निज नाचत॥ २९०॥ इयें लक्षणें जेथ वर्तती। ते जाण माझी विभूती। यांत एका लक्षणाची जेथ प्राप्ती। तेही विभूती पैं माझी॥ ९१॥
एतास्ते कीर्तिता: सर्वा: सङ्क्षेपेण विभूतय:।
मनोविकारा एवैते यथा वाचाभिधीयते॥ ४१॥
केवळ संकोच संक्षेपस्थितीं। म्यां सांगितल्या ज्या विभूति। त्या मनोविकारप्रतीती। जाण निश्चितीं उद्धवा॥ ९२॥ साधकांचे साधनस्थितीं। सत्य जाणाव्या माझ्या विभूती। विचारितां परमार्थगतीं। तरी या कल्पिती मनोजन्या॥ ९३॥ माझें स्वरूप अद्वैत जाण। नाहीं नाम रूप गुण वर्ण। तेथ नाना विभूतिलक्षण। मिथ्या जाण वाचिक॥ ९४॥
वाचं यच्छ मनो यच्छ प्राणान् यच्छेन्द्रियाणि च।
आत्मानमात्मना यच्छ न भूय: कल्पसेऽध्वने॥ ४२॥
माझें स्वरूप नित्य निर्विकार। मनबुद्धिवाचा न कळे पार। तेथ बापुडीं इंद्रियें किंकर। प्राण निर्धार तें नेणे॥ ९५॥ यालागीं शमदमांच्या अनुक्रमीं। मनबुद्धिइंद्रियें वाचा नेमीं। प्राण नेमूनि प्राणधर्मीं। आत्मारामीं पावसी॥ ९६॥ मनबुद्धॺादि-इंद्रियनेम। करावयाचें न कळे वर्म। म्हणसी तरी तो अनुक्रम। ऐक सुगम सांगेन॥ ९७॥ ‘वाचा’ नेमावी माझेनि नामें। ‘मन’ नेमावें ध्यानसंभ्रमें। ‘प्राण’ नेमावा प्राणायामें। ‘इंद्रियें’ दमें नेमावीं॥ ९८॥ ‘बुद्धि’ नेमावी आत्मविवेकें। ‘जीव’ नेमावा परमात्मसुखें। इतकेन तूं आवश्यकें। होसी कौतुकें मद्रूप॥ ९९॥ मद्रूप झालियापाठीं। संसारचि न पडे दिठीं। खुंटल्या जन्ममरणांचिया गोठी। गमनागमन आटाआटी निमाली॥ ३००॥ म्यां सांगितल्या नेमपरिपाटीं। हा नेम करणें नाहीं ज्याच्या पोटीं। तो भोगी दु:खांचिया कोटी। ऐक ते गोठी सांगेन॥ १॥
यो वै वाङ्मनसी सम्यगसंयच्छन् धिया यति:।
तस्य व्रतं तपो दानं स्रवत्यामघटाम्बुवत्॥ ४३॥
म्यां सांगितल्या नेमाचे निगुतीं। मनबुद्धिइंद्रियपंक्ती। जो नेमीना साक्षेपस्थितीं। त्याचीं साधनें होती नश्वर॥ २॥ त्याचें व्रत तप दान। योग याग शब्दज्ञान। काचे भांडॺांतील जीवन। तैशीं जाण नासती॥ ३॥ जेवीं राखेमाजीं केला होम। कां अशौचें आचरला कर्म। कुपात्रीं दानधर्म। तैसा संभ्रम साधनां॥ ४॥ उखरीं पेरिलें बीज। कां गोळक आवंतिला द्विज। डोहळ्ॺांचे सोहळे भोगी वांझ। तैशी वोज साधनां॥ ५॥ यापरी गा निश्चितीं। विध्युक्त नेम नाहीं चित्ती। त्याचीं साधनें वृथा जाती। हातोहातीं उद्धवा॥ ६॥ यालागीं मनादि इंद्रियवृत्ती। नेमाव्या गा यथानिगुतीं। हेंचि उद्धवाप्रती। स्वयें श्रीपति सांगत॥ ७॥
तस्मान्मनो वच: प्राणान् नियच्छेन्मत्परायण:।
मद्भक्तियुक्तया बुद्धॺा तत: परिसमाप्यते॥ ४४॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायामेकादशस्कन्धे षोडशोऽध्याय:॥ १६॥
मन बुद्धि इंद्रिय प्राण। अवश्य नेमावीं गा जाण। वृत्ति करोनि सावधान। माझें भजन जो करी॥ ८॥ भावें करितां माझी भक्ती। विषयवासना जळोनि जाती। निर्विकल्प उपजे शांती। माझे भक्तिपंथीं चालतां॥ ९॥ चालतां माझे भक्तिपंथीं। सकळ साधनें लाजोनि जाती। भावें प्रकटें मी श्रीपती। करीं संसारनिवृत्ती निजभक्तां॥ ३१०॥ हो कां माझिया निजभक्तां। संसारबाधेची व्यथा। ते लाज मज भगवंता। गांजूं निजभक्तां मी नेदीं॥ ११॥ प्रल्हाद गांजितां जगजेठी। मी प्रकटलों कोरडे काष्ठीं। वैकुंठ सांडूनि उठाउठीं। गजेंद्रासाठीं पावलों॥ १२॥ द्रौपदी गांजितां तत्काळीं। म्यां कौरवांचीं तोंडें केलीं काळीं। आगीनें गांजितां गोवळीं। म्यां प्राशिला ते काळीं दावाग्नी॥ १३॥ गोकुळ गांजितां सुरपती। म्यां गोवर्धन धरिला हातीं। कीं गोपिकांची पुरवावया आर्ती। मी झालों श्रीपति कामारा॥ १४॥ अर्जुनप्रतिज्ञेचे प्राप्ति। म्यां दिवसा लपविला गभस्ती। लावूनि जयद्रथासी ख्याती। सुभद्रापति वांचविला॥ १५॥ अंबरीषाचे गर्भवास। म्यांचि सोसिले सावकाश। उणें आपुल्या निजभक्तांस। मी हृषीकेश येवों नेदीं॥ १६॥ भक्तांचे पायींची माती। मी हृदयीं वाहें श्रीपती। वानरें वनचरें भावार्थीं। म्यां आपुले पंक्तीं बैसविलीं॥ १७॥ यालागी उद्धवा पुढतपुढती। मी सांगें करावी माझी भक्ती। माझे भजनें माझी प्राप्ती। अवलीळा पावती मद्भावें॥ १८॥ मद्भावें करितां माझी भक्ती। मी अनंत आतुडें त्यांच्या हातीं। शेखीं कामारा होय भक्तांप्रती। भक्तीची प्रीती मज ऐशी॥ १९॥ माझिये भक्तीपरतें। सुगम साधन नाहीं येथें। हें जाणोनि म्यां तूतें। भजनपंथें लाविलें॥ ३२०॥ लाविल्या लागे सद्भक्ती। तैं संसार बापुडें तें किती। हेळसून चारीमुक्ती। निजसुख भोगिती मद्भक्त॥ २१॥ मद्भक्तांचें महिमान। अतिशयें अगम्य गहन। ऐसें बोलूनियां श्रीकृष्ण। उद्धवासी जाण कुरवाळी॥ २२॥ तेणें श्रीकृष्णकराग्रस्पर्शें। उद्धवासी झालें कैसें। व्याले धेनूचेनि वोरसें। वत्स जैसें उल्हासे॥ २३॥ जेवीं कां लागतां चंद्रकर। सबाह्य निवोंलागे चकोर। मेघ देखोनि मयूर। नृत्यतत्पर स्वानंदें॥ २४॥ यापरी उद्धव जाण। स्वानंदें झाला परिपूर्ण। विसरला देवभक्तपण। कृष्णही कृष्णपण विसरला॥ २५॥ यापरी भक्तिसुखाआंत। दोघेही ऐक्यें झाले उन्मत्त। परमानंदाचा तेथ। धेंडा नाचत स्वानंदें॥ २६॥ या भक्तिसुखाची गोडी। भाग्येंवीण न कळे फुडी। उद्धवभजनाचे कुळवाडीं। जोडला जोडी श्रीकृष्ण॥ २७॥ एकाजनार्दना शरण। भजनसुखाची उणखूण। तो एक जाणे संपूर्ण। भक्तजीवनजिव्हाळा॥ २८॥ जो निजभक्तांचा जिव्हाळा। तो गोकुळीं होऊनि गोंवळा। क्रीडोनि त्यांचिया खेळामेळा। गोपीगोपाळां उद्धरिलें॥ २९॥ स्वयें खेळोनि त्यांचिया खेळा। उद्धरिलें बाळगोपाळां। हें नवल नव्हे त्याची कळा। उदार लीळा ते ऐका॥ ३३०॥ पर्वत पाषाण तृण तरुवर। भृंग मत्स्य मृग मगर। व्याघ्र वनचर विखार। पारावतें मयूर आदिकरून॥ ३१॥ येणेंसीं समवेत। गोकुळींचे जीव समस्त। स्वयें उद्धरी श्रीकृष्णनाथ। कृपाळू समर्थ स्वलीला॥ ३२॥ कां पितृवचन पुढारां। सीतेचिया वियोगद्वारा। रिसां आणि वानरां। उद्धरी निशाचरां रघुनाथ॥ ३३॥ सेवेनें तारिले रीसवानर। युद्धें तारिले निशाचर। हें नवल कांहीं नव्हे थोर। ऐक उदार लीला त्याची॥ ३४॥ अयोध्येपासून लंकेपर्यंत। मार्गी वृक्षवल्ली पाषाण पर्वत। तृणादि जीव समस्त। उद्धरी रघुनाथ स्वलीला॥ ३५॥ एवं नानावतारीं जनार्दन। यापरी उद्धरी सकळ जन। तेणें एका एकू केला पावन। हें नवल कोण मानावें॥ ३६॥ परी नवल एक केलें मोठें। मज मूर्खाचेही मुखावाटें। श्रीभागवतबोल केले मऱ्हाटे। हें आश्चर्य वाटे माझेंचि मज॥ ३७॥ यालागीं एका जनार्दना शरण। ज्याची कृपा ऐशी परिपूर्ण। त्याचे स्मरोनि श्रीचरण। केला संपूर्ण सोळावा॥ ३३८॥
इति श्रीभागवते महापुराणे एकादशस्कंधे श्रीकृष्णोद्धवसंवादे एकाकारटीकायां विभूतियोगो नाम षोडशोऽध्याय:॥ १६॥ श्रीकृष्णार्पणमस्तु॥ श्लोकसंख्या॥ ४४॥ ओव्या॥ ३३८॥
॥ श्री ॐ तत्सत्-श्रीकृष्ण प्रसन्न॥
अध्याय सतरावा
श्रीगणेशाय नम:॥ श्रीकृष्णाय नम:॥ ॐ नमो श्रीसद्गुरु महामेरु। सूक्ष्मस्वरूपें तूं गिरिवरु। चैतन्यस्वभावें अतिथोरु। तूं आधारु सर्वांचा॥ १॥ तुझ्या निजबोधाचीं शिखरें। वैकुंठकैलासादि अतिथोरें। तेथें ब्रह्माविष्णुमहारुद्रें। तुझेनि आधारें नांदिजे॥ २॥ तुझिया आधारस्थितीं। नांदती त्रैलोक्य-लोकपंक्ति। सकळ भूतांची उत्पत्ति स्थिती। निदान अंतीं तुजमाजीं॥ ३॥ सुरासुर लहानथोर। एक सौम्य एक क्रूर। इयें भूतें धरूनि निर्विकार। स्वरूप साचार पैं तुझें॥ ४॥ तेथ विवेकाचेंआगर। सच्चिदानंदाचे रत्नाकर। तेथील लाधल्या कंकर। नीच ते थोर वेव्हारे होती॥ ५॥ ज्याच्या औषधींचा चमत्कार। सेवितां करिती अजरामर। जेथ चिद्गंगेचे निर्झर। निरंतर प्रवाहती॥ ६॥ जो सुरनरांचा विश्राम। जो सकळ आश्रमांचा आश्रम। जो क्रियाकर्मांचें नैष्कर्म्य। जो निजधाम जीवाचे॥ ७॥ जो भजनाची कुळवाडी। जो भक्तजीवनाची वाडी। जो आवडीची निजआवडी। जो गोडियेची गोडी निजात्मता॥ ८॥ ऐसा सद्गुरु महामेरु। जो कठिणत्वेंवीण आधारु। ज्याचेनि अंगें संसारु। होय सुखकरु साधकां॥ ९॥ त्या साधकांचें समाधान। शिष्यांचा स्वानंदघन। आर्त-चातकां निजजीवन। स्वामी जनार्दन तुष्टला॥ १०॥ तयाचा जो चरणप्रसादु। श्रीभागवतीं एकादशस्कंधु। पूर्वार्धाचाविनोदु। भाषाप्रबंधु वाखाणिला॥ ११॥ तेथें उद्धवें पुशिल्या विभूती। त्या षोडशाध्यायीं श्रीपती। सांगितल्या यथानिगुतीं। भजनस्थितीलागोनी॥ १२॥ त्या विभूतींमाजीं निजवर्म। ‘भक्तांचें जें भजनकर्म। तें मी केवळ आत्माराम’। ऐसें पुरुषोत्तम बोलिला॥ १३॥ तेथ आशंकेची व्युत्पत्ती। ‘करितां कर्माची कर्मगती। कर्मठ जाहले नेणों किती। तरी कर्में मुक्ती घडे केवीं’॥ १४॥ कर्में करितां वाडेंकोडें। कर्मीं कर्मठता न चढे। कर्मांमाजीं मोक्ष आतुडे। हेंचि रोकडें पुसों पां॥ १५॥ स्वयें बोलिला श्रीपती। ‘सात्त्विकांची जे कर्मस्थिती। ते कर्मचि माझी विभूती’। हें सोळाव्याअंतीं निरूपिलें॥ १६॥ स्वयें आचरितां स्वकर्म। तें कर्मचि होय ब्रह्म। हेंचि कर्मक्रियेचें वर्म। देवासी सुगम पुसों पां॥ १७॥ ऐसा पोटींचा आवांका। तेचि पुसावया आशंका। वर्णाश्रमांची स्वधर्मपीठिका देवासी देखा पुसत॥ १८॥
उद्धव उवाच
यस्त्वयाभिहित: पूर्वं धर्मस्त्वद्भक्तिलक्षण:।
वर्णाश्रमाचारवतां सर्वेषां द्विपदामपि॥ १॥
उद्धव म्हणे गा भक्तपती। ऐकतां तुझ्या निजविभूति। मज ऐसें गमलें चित्तीं। स्वधर्मेंसीं भक्ती घडे कैसी॥ १९॥ तुवां कल्पादि वाडेंकोडें। स्वधर्मकर्में भक्ति जोडे। हें वर्णाश्रमनिजनिवाडें। निरूपण चोखडें निरूपिलें॥ २०॥ सर्वां मानवां परम गति। स्वधर्में घडे भगवद्भक्ति। यानिरूपणाची निगुती। तुवां निश्चितीं निरूपिली॥ २१॥
यथानुष्ठीयमानेन त्वयि भक्तिर्नृणां भवेत्।
स्वधर्मेणारविन्दाक्ष तत्समाख्यातुमर्हसि॥ २॥
ऐके कमलनयना अच्युता। जो कां स्वधर्म अनुष्ठितां। तुझी निजभक्ती स्वभावतां। प्राण्याच्या हाता जेणें लाभे॥ २२॥ ते कर्मकुशलतेची स्थिती। मजलागीं सांगावी सुनिश्चितीं। कमलनयना कमलापती। कृपामूर्ती माधवा॥ २३॥ तूं ऐसें म्हणशील श्रीपती। ‘म्यां कल्पाचे आधीं कवणाप्रती। सांगितली स्वधर्मस्थिती’। तरी ते विनंती अवधारीं॥ २४॥
पुरा किल महाबाहो धर्मं परमकं प्रभो।
यत्तेन हंसरूपेण ब्रह्मणेऽभ्यात्थ माधव॥ ३॥
ज्याच्या बाहूचा प्रताप अद्भुत। विश्वमर्यादा धर्मसेत। राखों जाणे यथास्थित। त्यालागींम्हणिपत ‘महाबाहो’॥ २५॥ स्वधर्मकर्माचा द्योतकु। अनादि वक्ता तूं एकु। वर्णाश्रमादि विवेकु। उपदेशकु तूं स्रष्टॺाचा॥ २६॥ पूर्वीं हंसरूपें सविस्तर। बोलिलासी स्वधर्माचा निर्धार। त्यांतील तुवां अध्यात्मसार। निवडूनि साचार मज सांगितलें॥ २७॥ तेथील स्वधर्माचें लक्षण। मज न कळेचि निरूपण। जें तूं हंसरूपें आपण। स्वधर्म जाण बोलिलासी॥ २८॥ तुझेनि मुखें यथोचितें। भक्तियुक्त आश्रमधर्मातें। सनत्कुमार जाहले श्रोते। तेंचि मातें सांगावें॥ २९॥ म्हणसी ‘सनत्कुमारद्वारा। धर्म विस्तारला परंपरा। तो विचारूनि करीं निर्धारा’। हें सारंगधरा घडेना॥ ३०॥
स इदानीं सुमहता कालेनामित्रकर्शन।
न प्रायो भविता मर्त्यलोके प्रागनुशासित:॥ ४॥
काम क्रोध लोभ अभिमान। हे भक्तांचे वैरी सहाजण। त्यांचें तूं करिशी निर्दळण। अरिमर्दन या हेतू॥ ३१॥ भक्तांचें अरिनिर्दळण। तुजवांचोनि कर्ता आन। तिहीं लोकीं नाहीं जाण। अनन्यशरण यालागीं॥ ३२॥ तुवां कल्पाचिये आदीसी। उपदेशिलें सनकादिकांसी। बहुकाळ जाहले त्या बोलासी। ते धर्म कोणापाशीं प्रायशां नाहीं॥ ३३॥ प्रायशां ये कालीं नर। नाहीं स्वधर्मी तत्पर। शिश्नोदरीं अत्यादर। स्वधर्मविचार विसरोनी॥ ३४॥ याथातथ्यें धर्मप्रतिष्ठा। करी ऐसा नाहीं उपदेष्टा। यालागीं जी वैकुंठा। स्वधर्मनिजनिष्ठा मज सांग॥ ३५॥
वक्ता कर्ताविता नान्यो धर्मस्याच्युत ते भुवि।
सभायामपि वैरिञ्चॺां यत्र मूर्तिधरा: कला:॥ ५॥
कर्तावित्रा प्रवक्त्रा च भवता मधुसूदन।
त्यक्ते महीतले देव विनष्टं क: प्रवक्ष्यति॥ ६॥
अलुप्तज्ञानें स्वधर्मवक्ता। ये भूलोकीं गा तत्त्वतां। तुजवांचोनि अच्युता। आणिक सर्वथा असेना॥ ३६॥ एक शास्त्रमर्यादाव्युत्पत्ती। कर्मकलाप बोलों जाणती। परी कर्माची आचरती गती। तेही नेणती तत्त्वतां॥ ३७॥ यालागीं गा भगवंता। धर्माचा कर्ता वक्ता। धर्म विस्तारूनि रक्षिता। आणिक सर्वथा असेना॥ ३८॥ पहातां या लोकांच्या ठायीं। तुजऐसा सर्वज्ञ नाहीं। ऐसें विचारितां लोकीं तिंही। तुजसमान नाहीं सांगता॥ ३९॥ जरी सत्यलोक पाहणें। जेथें चारी वेद षड्दर्शनें। इतिहास स्मृति पुराणें। मूर्तिमंतपणें उभीं असतीं॥ ४०॥ तेथें सनकादिकांचा प्रश्न। ब्रह्मयासी न सांगवे जाण। तुवां हंसरूपें येऊन। समाधान दीधलें॥ ४१॥ ते ब्रह्मसभेच्या ठायीं। तुजऐसा वक्ता नाहीं। तो तूं भक्तानुग्रहें पाहीं। या लोकांच्या ठायीं मूर्तिमंत ब्रह्म॥ ४२॥ तेणें तुवां सर्व कर्मधर्मसंस्था। करूनि दाविली तत्त्वतां। तो तूं निजधामा गेलिया आतां। स्वधर्मवक्ता मग कैंचा॥ ४३॥ भक्तियुक्त स्वधर्मगती। सांगावया यथास्थिती। तुजवांचोनियां श्रीपती। आणिकासी शक्ति असेना॥ ४४॥ तूं भक्तसाह्य जगज्जीवन। भक्तमदगजभंजन। यालागीं नांवें तुं ‘मधुसूदन’। ऐसें प्रार्थून बोलत॥ ४५॥
तत्त्वं न: सर्वधर्मज्ञ धर्मस्त्वद्भक्तिलक्षण:।
यथा यस्य विधीयेत तथा वर्णय मे प्रभो॥ ७॥
तूं सर्वज्ञ ज्ञानमूर्ति। तरी मनुष्यांची कर्मगति। वर्णाश्रमांची धर्मस्थिती। यथानिगुतीं मज सांग॥ ४६॥ वर्णबाह्याचें निजकर्म। तोही सांगावा विहित धर्म। उद्धवें प्रार्थिला पुरुषोत्तम। तेणें मेघश्याम तुष्टला॥ ४७॥ सकळ जनांचा हितकर। उद्धवें प्रश्न केला सधर। तो ऐकोनि शुकयोगींद्र। आनंदनिर्भर तेणें प्रश्नें॥ ४८॥ शुक म्हणे परीक्षितीसी। धन्य बुद्धी ते उद्धवासी। जेणें प्रार्थूनि हृषीकेशी। जाहला जगासी उपकारी॥ ४९॥
श्रीशुक उवाच
इत्थं स्वभृत्यमुख्येन पृष्ट: स भगवान्हरि:।
प्रीत: क्षेमाय मर्त्यानां धर्मानाह सनातनान्॥ ८॥
शुक म्हणे गा परीक्षिती। सावधान होईं चित्तीं। धन्य उद्धवाची प्रश्नोक्ती। स्वधर्मे मुक्ती पुशिली॥ ५०॥ जो भृत्यांमाजीं पढियंता। अत्यंत आवडे कृष्णनाथा। त्या वेगळें श्रीअनंता। क्षणही सर्वथा करमेना॥ ५१॥ ज्यापाशीं गा निजगुज। सदा सांगे गरुडध्वज। ज्यावेगळें आप्तकाज। अधोक्षज बोलेना॥ ५२॥ ज्याच्या वचनासी विलंबु। क्षण न करीच रमावल्लभु। जो ब्रह्मादिकांदुर्लभु। तो जाहला सुलभु उद्धवा॥ ५३॥ यालागीं ‘भृत्यमुख्यता’। आली उद्धवाचे हाता। तेणें प्रार्थूनियां भगवंता। ‘स्वकर्में मुक्तता’ पुशिली॥ ५४॥ हो कां ज्याचेनि प्रश्नधर्मे। जग उद्धरिलें यथानुक्रमें। ज्यालागीं गा पुरुषोत्तमें। मोक्ष स्वधर्मे प्रकटिजे॥ ५५॥ स्वधर्म करितां स्वभावतां। निजमोक्ष लाभे आयिता। एवढॺा उपकाराची कथा। उद्धवें तत्त्वतां पुशिली॥ ५६॥ ऐकोनि चातकाचें वचन। गर्जोनि वर्षे जेवीं घन। कां वत्सहुंकारें जाण। ये हुंबरोन धेनु जैशी॥ ५७॥ तेवीं ऐकोनि उद्धवाच्या बोला। श्रीकृष्ण निजबोधें गर्जिन्नला। अतिस्वानंदें संतोषला। कायबोलिला गोविंदु॥ ५८॥
श्रीभगवानुवाच
धर्म्य एष तव प्रश्नो नै:श्रेयसकरो नृणाम्।
वर्णाश्रमाचारवतां तमुद्धव निबोध मे॥ ९॥
जेवीं कां पुत्र एकुलता। त्यासी कांहीं वंचीना माता। तेवीं उद्धव श्रीकृष्णनाथा। त्याचें वचन वृथा हों नेदी॥ ५९॥ हरिखें म्हणे सारंगपाणी। धन्य धन्य उद्धवा तुझी वाणी। मोक्षमार्गींची निशाणी। हे जनालागोनी त्वां केली॥ ६०॥ तुझ्या प्रश्नाचें प्रश्नोत्तर। वर्णाश्रमी जे कोणी नर। त्यांसी स्वधर्मचि मोक्षकर। ऐक साचार सांगेन॥ ६१॥ कल्पादिपासोनि स्वधर्मसंस्था। पुरातनयुगवर्ती कथा। तुज मी सांगेन तत्त्वतां। ऐक आतां उद्धवा॥ ६२॥
आदौ कृतयुगे वर्णो नृणां हंस इति स्मृत:।
कृतकृत्या: प्रजा जात्या तस्मात्कृतयुगं विदु:॥ १०॥
वेद: प्रणव एवाग्रे धर्मोऽहं वृषरूपधृक्।
उपासते तपोनिष्ठा हंसं मां मुक्तकिल्बिषा:॥ ११॥
पूर्वील कृतयुगींचें लक्षण। तैं नव्हते गा चारी वर्ण। बहुशाखा वेदपठण। कर्माचरण तैं नाहीं॥ ६३॥ तैं सकळ मनुष्यांसी जाण। ‘सोहंहंसा’ चें अखंड ध्यान। यालागीं ‘हंस’ हा एकचि वर्ण। सर्वांसही जाण ते काळीं॥ ६४॥ तैं ‘प्रणवमात्रें’ वेदपठण। वृषरूपें मी आपण। धर्म चतुष्पाद संपूर्ण। अधर्माचें जाण नांवही नाहीं॥ ६५॥ ते काळीं श्रेष्ठ सत्त्वगुण। यालागीं सत्यवादी जन। अवघे धर्मपरायण। कपट तैं जाण जन्मलें नाहीं॥ ६६॥ परद्रव्य आणि परदारा। यांच्या अभिलाषाचा थारा। स्पर्शला नाहीं जिव्हारा। ते काळींच्या नरां धर्मिष्ठां॥ ६७॥ ते काळींच्या जनां धर्मिष्ठां। ‘सोहंहंसा’ ची आत्मनिष्ठा। हेंचि भजन मज वरिष्ठा। ‘तपोनिष्ठा’ तया नांव॥ ६८॥ तैं स्वर्गा जावें हे नाहीं कथा। नेणती नरकाची वार्ता। अधर्माची अवस्था। स्वप्नीहीं चित्ता स्पर्शेना॥ ६९॥ यापर प्रजा समस्त। स्वधर्मस्वभावें कृतकृत्य। यालागीं जाण निश्चित। त्यातें बोलिजेत ‘कृतयुग’॥ ७०॥
त्रेतामुखे महाभाग प्राणान्मे हृदयात्त्रयी।
विद्या प्रादुरभूत्तस्या अहमासं त्रिवृन्मख:॥ १२॥
उद्धवा या कलियुगाच्या ठायीं। तुझ्या भाग्याची परम नवायी। कृतयुगींच्या प्रजांपरीस पाहीं। तुज माझ्याठायीं विश्वास॥ ७१॥ त्रेतायुगीं प्रकटलें कर्म। जो वैराज मी पुरुषोत्तम। त्या माझेनि नि:श्वासें त्रयीधर्म। वेदसंभ्रम वाढला॥ ७२॥ तेथ त्रैविद्या विविध भेद। नाना मंत्र नाना छंद। ऋग्वेदादि तिन्हीं वेद। प्रकटले प्रसिद्ध निजशाखीं॥ ७३॥ त्या वेदांपासाव त्रिविध मख। त्रिमेखलायुक्त मीचि देख। जेथ होत आध्वर्यव हौत्रिक। कर्मविशेख जे ठायीं॥ ७४॥ ऐसें मद्रूप यज्ञकर्म। तेथिल्या अधिकाराचें वर्म। दों श्लोकीं पुरुषोत्तम। वर्णाश्रम सांगत॥ ७५॥
विप्रक्षत्रियविट्शूद्रा मुखबाहूरुपादजा:।
वैराजात्पुरुषाज्जाता य आत्माचारलक्षणा:॥ १३॥
वैराजपुरुषापासाव जाण। मुखीं उपजले ‘ब्राह्मण’। बाहूपासूनि ‘राजन्य’। ऊरू जन्मस्थान ‘वैश्यांचें’॥ ७६॥ ‘शूद्र’ चरणीं जन्मले जाण। यापरी जाहले चारी वर्ण। यांचें ऐक मुख्य लक्षण। स्वधर्माचरण सर्वांशीं॥ ७७॥ चतुर्वर्णांची उत्पत्ती। वैराज पुरुषापासूनि या रीतीं। आतां आश्रमांची स्थिती। ऐक निश्चितीं सांगेन॥ ७८॥
गृहाश्रमो जघनतो ब्रह्मचर्यं हृदो मम।
वक्ष:स्थानाद्वने वासो न्यास: शीर्षणि संस्थित:॥ १४॥
‘गृहस्थाश्रमासी’ जघनस्थान। ‘ब्रह्मचर्य’ माझ्या हृदयीं जाण। ‘वानप्रस्थासी’ मी आपण। वाढवीं महिमान वक्ष:स्थळीं॥ ७९॥ चतुर्थाश्रम जो ‘संन्यास’। त्याचा माझे शिरीं रहिवास। एवं वर्णाश्रमविलास। तुज सावकाश सांगितला॥ ८०॥
वर्णानामाश्रमाणां च जन्मभूम्यनुसारिणी:।
आसन्प्रकृतयो नॄणां नीचैर्नीचोत्तमोत्तमा:॥ १५॥
जैसें जन्म जैसें स्थान। त्या वर्णाश्रमा तैसे गुण। उत्तमीं उत्तमत्व जाण। नीचीं नीचपण सहजेंचि॥ ८१॥ ‘सत्त्वप्राधान्ये’ ब्राह्मण। ‘सत्त्वरजें’ क्षत्रिय जाण। ‘रजतमें’ वैश्यवर्ण। शूद्र ते जाण ‘तमोनिष्ठ’॥ ८२॥ तेचि ब्राह्मणादि चारी वर्ण। त्यांचें प्रकृतींचे लक्षण। वेगळें वेगळेंचि पैं जाण। स्वयें नारायण सांगत॥ ८३॥
शमो दमस्तप: शौचं सन्तोष: क्षान्तिरार्जवम्।
मद्भक्तिश्च दया सत्यं ब्रह्मप्रकृतयस्त्विमा:॥ १६॥
उद्धवासी म्हणे श्रीकृष्ण। ब्राह्मणप्रकृति दशलक्षण। तुज मी सांगेन निरूपण। तें सावधान अवधारीं॥ ८४॥ मनादि ज्ञानेंद्रियवृत्ती। बाह्य दृष्टीं परिचारस्थिती। ते आवरूनि विवेकयुक्तीं। आत्मप्रतीति धरावी॥ ८५॥ तेचि वृत्तीचें धरणें ऐसें। कृष्णसर्पाचें मुख धरणें जैसें। तो वेढे उकली जंव आपैसें। तंव धारणा सौरसें नेहटावा॥ ८६॥ तेवीं वैराग्यप्रतापवशें। गुरुवचनाचेनि विश्वासें। अंतरवृत्तीतें नेहटावें ऐसें। जंव ये आत्मसमरसें निजात्मता॥ ८७॥ मुख्य करूनि गुरुवचन। तदर्थी बुद्धि निमग्न। तत्प्रवण होय मन। ‘शम’ तो जाण या नांव॥ ८८॥ ब्राह्मणप्रकृतीमाजीं जाण। हें स्वाभाविक निजलक्षण। या नांव गा शमगुण। ऐक निरूपण दमाचें॥ ८९॥ विषयप्रवृत्ति प्रचंड। कर्मेंद्रियांचें बळ बंड। विधीनें त्यांचें ठेंचूनि तोंड। सैरा वितंड विचरों नेदी॥ ९०॥ वेदविधीचेनि हातें। देहनिर्वाहापुरतें। खाणें जेवणें इंद्रियांतें। तो जाण येथें ‘दम’ गुण॥ ९१॥ तेथ शम तो जाण मुख्य राजा। दमादिइतर त्याच्या प्रजा। ते दोनी सांगितले वोजा। ऐक तिजा तपो नेमु॥ ९२॥ शमें ज्ञानेंद्रिय उपशमु। तोचि कर्मेंद्रियां मुख्य दमु। याहीवरी वेदोक्त कर्मु। तें ज्ञान परमु गौरवाचें॥ ९३॥ शरीरशोषणानांव तप। तें प्रारब्धभोगानुरूप। हृदयीं हरि चिंतणें सद्रूप। हें मुख्य तप तपांमाजीं॥ ९४॥ जो वर्ततां स्वधर्मस्थितीं। हरीतें विसंबेना निजवृत्ती। जो निजात्मनिश्चयो चित्तीं। अहोराती विवंचित॥ ९५॥ जेवीं लोभिया वाहे धन। कां तरुणालागीं तरुणी जाण। तैसें निजात्मविवंचन। जयाचें मन सदा करी॥ ९६॥ त्या नांव गा तपोनिष्ठ। हें तपांमाजी तप वरिष्ठ। ब्राह्मणप्रकृतीमाजीं श्रेष्ठ। ‘तप’ तें उद्भट या नांव॥ ९७॥ ऐक ‘शौचा’ चा विचार। तो आहे द्विप्रकार। अंतरीं ज्ञाननिर्धार। बाह्यआचार वेदोक्त॥ ९८॥ बाह्य मळाचें क्षाळण। मृज्जलादि वेदविधान। आंतर मळाचें निर्दळण। आत्मज्ञान निजनिष्ठा॥ ९९॥ शुद्ध शौचाचें निर्मळपण। मुख्यत्वें उद्धवा हेंचि जाण। आतां संतोषाचें लक्षण। ऐक संपूर्ण सांगेन॥ १००॥ पुत्र जन्मल्या होय सुख। तो गेलिया सवेंचि दु:ख। धन जोडलिया होय हरिख। सवेंचि शोक तन्नाशीं॥ १॥ ज्या सुखाची होतां भेटी। नि:शेष मावळे दु:खकोटी। या नांव ‘सत्यसुख’ सृष्टी। इतर चावटी ते मिथ्या॥ २॥ निरुपचार अंतरगती। मद्भावें जे सुखप्राप्ती। जाहलिया संपत्ती विपत्ती। जे संतोषप्राप्ती समसाम्यें॥ ३॥ येचि पदीं पाठांतर। ‘तितिक्षा’ म्हणती थोरथोर। ऐक त्याचेंही अर्थांतर। पदार्थविचार तो ऐसा॥ ४॥ शीत-उष्ण-मृदु-कठीण। अंगीं आदळतांही जाण। ज्याचें डंडळीना मन। भावना पूर्ण मद्भावें॥ ५॥ संतोषतितिक्षा-व्याख्यान। हें पांचव्या पदाचें लक्षण। उद्धवासी म्हणे श्रीकृष्ण। ऐक निरूपण शांतीचें॥ ६॥ माझा निर्धारितां निजबोध। अंतरीं निमाले कामक्रोध। त्यांसी केलियाही अपराध। न मनीं विरुद्ध पुढिलांचें॥ ७॥ परी तेथींची नवलपरी। अपकाऱ्या होय उपकारी। विकार नाहीं ज्याचे अंतरीं। जाण ते खरी ‘निजशांति’॥ ८॥ ऐशी सदा शांति संपूर्ण। तें ब्राह्मणाचें षष्ठ लक्षण। ऐक आर्जवाचें निरूपण। जीवींची खूण सांगेन॥ ९॥ कुरूप जरी जाहली माता। तरी स्नेहासी नाहीं कुरूपता। कां सुवर्णाचे नाग करितां। सोनें सर्वथा नव्हे सर्पु॥ ११०॥ तेवीं कुटिलांसी कुटिलता। करावी म्हणोनि शिकवितां। कुटिलत्व नुपजे चित्ता। जाण तत्त्वतां तें ‘आर्जव’॥ ११॥ गायीसी गोड व्याघ्रासी कडू। हा गंगाजळी नाहीं पवाडु। तेवीं आर्जवाचा पडिपाडु। विषमांही गोडु समसाम्यें॥ १२॥ या नांव जाण ‘आर्जव’। सातवें लक्षण अपूर्व। आतां निजभक्तीचा स्वभाव। देवाधिदेवसांगत॥ १३॥ वन उद्यान गंगादि जीवन। यांसी पृथ्वीचि जेवीं अधिष्ठान। तेवीं सकळ लक्षणां जन्मस्थान। माझी ‘भक्ति’ जाण उद्धवा॥ १४॥ सकळ पिकांचिये प्राप्ती। आधारभूत जेवीं क्षिती। तेवीं सकळ लक्षणां उत्पत्ती। माझिये भक्तीमाझारीं॥ १५॥ ऐक ते भक्तीचा इत्यर्थ। सांडोनियां विषयस्वार्थ। जीवींहूनि मजलागीं भावार्थ। तोचि निजभक्त पैं माझा॥ १६॥ भक्त आणि करी धनार्जन। हेंचि भक्तीसी मुख्य विघ्न। धनलोभी तो अभक्त पूर्ण। सत्य जाण उद्धवा॥ १७॥ माझा भाव नाहीं जिव्हारीं। आहाचवाहाच माझी भक्ति करी। तो आंधळॺा गरुडाचे परी। उडे परी निर्धारीं स्थान नेणे॥ १८॥ माझा भावार्थ जेथ होये। तेथ मी जाती कुळ न पाहें। मी भावाचेनि लवलाहें। वश्य होयें निजभक्तां॥ १९॥ जेथ भावार्थे माझी आवडी। तेथ अवश्य माझी पडे उडी। जेणें भावार्थाची उभविली गुढी। तो जाणे गोडी मद्भक्तीची॥ १२०॥ जें जें भेटे तोचि देवो। ऐसा भावार्थीं ज्ॺाचा भावो। तो एक पढियंता मज पहा हो। त्याचेनि भावें जीवों आम्ही उद्धवा॥ २१॥ तोचि माझा जीवप्राण। त्यासी मी सर्वस्वें करीं निंबलोण। मी सर्वदा त्याआधीन। जेवीं व्याली धेनु वत्सासी॥ २२॥ एवं नि:सीम भावार्थाची स्थिती। त्या नांव उद्धवा माझी ‘भक्ती’। यापरी भक्तीची व्युत्पत्ती। ऐक पां ख्याती दयेची॥ २३॥ बाळक देखोनि संकटीं। जेवीं न सांवरत माय उठी। तेवीं दीन देखोनि दृष्टीं। ज्याचे पोटीं दया द्रवे॥ २४॥ ऐशिया दयेच्या ठायीं जाण। आपुलें पारकें पुसे कोण। स्वजाति-विजातिलक्षण। पुसायाही पण धीर नाहीं॥ २५॥ महापूरीं बुडतयातें। कृपाळूजाती न पुसे तेथें। उडी घालूनि वांचवी त्यातें। ‘दया’ निश्चितें ती नांव॥ २६॥ दीनाचिये दयेलागीं। जो रिघे जळत्या आगीं। त्याचे चरण मी वंदीं वेगीं। धन्य जगीं दयाळू॥ २७॥ ऐशिये दयेचेनि गुणें। मज अनंतालागीं तेणें। विकत घेतलें जीवें प्राणें। कीं जाहलों पोसणें मी त्याचें॥ २८॥ यालागीं दयाळुवाचे घरीं। मी सदा नाटिका काम करीं। जे दयावंताचे अवसरीं। तें माझे शिरीं सर्वदा॥ २९॥ जो जाणे दीनांचा विचार। दीनदयाळू जो साचार। उद्धवा तो माझें निजभांडार। सुखाचें सुखसार तो माझें॥ १३०॥ या नांव गा ‘दया’ जाण। तें हें नववें लक्षण। आतां सत्याची उणखूण। तुज मी संपूर्ण सांगेन॥ ३१॥ सत्याचें सत्यत्व तें ऐसें। जागृतिस्वप्नसुषुप्तिवशें। ज्यासी असत्यता न स्पर्शे। निजसत्य ऐसें निडारिलें॥ ३२॥ ऐसें सत्य परिपक्वल्या पोटीं। सत्य वाचा सत्य दृष्टी। निजसत्यत्वें सत्य सृष्टी। पडिली तुटी असत्याची॥ ३३॥ यापरी गा ‘सत्यत्व’ जाण। त्या नांव दहावें लक्षण। हें ब्राह्मणाचें संपूर्ण। कर्माचरण स्वभावें॥ ३४॥ ब्राह्मणप्रकृतीचे स्थितीं। या दशलक्षणांची उत्पत्ती। स्वाभाविक सहजगती। अकृत्रिम स्थिति उद्धवा॥ ३५॥ येंहीं दश लक्षणीं संपूर्ण। वर्णवरिष्ठ वंद्य ब्राह्मण। आतां क्षात्रप्रकृतीचे गुण। ऐक निरूपण उद्धवा॥ ३६॥
तेजो बलं धृति: शौर्यं तितिक्षौदार्यमुद्यम:।
स्थैर्यं ब्रह्मण्यतैश्वर्यं क्षत्रप्रकृतयस्त्विमा:॥ १७॥
ब्राह्मणप्रकृति दश लक्षण। तुज म्यां सांगितली सुलक्षण। आतां क्षात्रवृत्तीचे दश गुण। ऐक संपूर्ण उद्धवा॥ ३६॥ ‘तेज’ म्हणजे प्रतापशक्ती। जैसा क्षितितळींचा गभस्ती। ज्याचिया प्रतापदीप्तीं। लोपले जाती महींद्र॥ ३७॥ क्षात्रधर्मी प्रथम काज। तया नांव जाण ‘तेज’। आतां क्षात्रबळाची वोज। ऐक चोज सांगेन॥ ३८॥ ज्याच्या शरीरबळाचें कोड। एकला लक्षावरी दे झड। जरी तुटला दुधड। तरी वैरियांचे तोंड विभांडी॥ ३९॥ रिघतां रणामाझारीं। दुजयाचें साह्य न विचारी। जेवीं वनगजीं केसरी। तेवीं रिघोनि दळभारीं विभांडी वीर॥ १४०॥ आकाश दाटल्या निशाचरीं। भूमंडळ कोंदल्या असुरीं। ऐसे प्रबळ बळें आल्या वैरी। ज्याचे धृतीमाझारीं विस्मयो नुठी॥ ४१॥ आकाश पडावया गडाडी। पृथ्वी उलथावया हडबडी। तरी ज्याचे धृतीची रोकडी। नव्हे वांकुडी रोमावळी॥ ४२॥ वोडवलियाही कल्पांता। धाक रिघों नेणे ज्याच्या चित्ता। ऐसें निजधैर्य स्वभावतां। ‘धृति’ तत्त्वतां ती नांव॥ ४३॥ चौऱ्यांशीं दंडायुधें धरूं जाणती। शस्त्रास्त्र-धारणाशक्ती। स्वधर्में आवश्यकें करिती। या नांव ‘धृति’ क्षत्रियांची॥ ४४॥ शूरांचें शौर्य तें कैसें। शत्रूंचें नि:शेष नांवचि पुसे। वैरी कोणी कोठेंचि नसे। करणें ऐसें तें शौर्य॥ ४५॥ धर्मयुद्धाची शौर्यवृत्ती। जेणें विजयश्री चढे हातीं। दुश्चित्त नि:शस्त्री न हाणिती। पळतया न मारिती महाशूर॥ ४६॥ संमुख आलिया रणांगणीं। मागें पावो न ठेवीं रणीं। एकला विभांडी वीरक्षोणी। हे स्वधर्मकरणी निजशौर्यें॥ ४७॥ मृत्यूएवढा महावैरी। जो नि:शेष नाहीं करी। त्याच्या शौर्याची थोरी। सुरासुरी वानिजे॥ ४८॥ एवं निजशौर्यनिर्धारा। निर्वैर करणें धरा। हा चौथा गुण खरा। जाण क्षात्रद्वारा क्षत्रियांचा॥ ४९॥ शस्त्रांचे घाय वाजतां माथां। कां सपिच्छ बाण खडतरतां। रणांगणीं न सरे मागुता। हे ‘सहिष्णुता’ क्षत्रियाची॥ १५०॥ आलिया गजदळाचे थाट। महावीरांचे घडघडाट। तो यावा साहे सुभट। ‘सहिष्णुता’ चोखट ती नांव॥ ५१॥ समुद्रलहरीेंच्या संपाता। कुलाचल न सरे परता। तेवीं परसैन्याच्या आघाता। न सरे मागुता रणांगणीं॥ ५२॥ तेथ यशअपयशांची व्यथा। हर्षशोकविषमता। बाधीना क्षत्रियांच्या चित्ता। सर्वसहिष्णुता या नांव॥ ५३॥ या नांव ‘तितिक्षा’ जाण। हें क्षत्रियांचें पांचवे लक्षण। ऐक औदार्याचा गुण। दातेपण क्षत्रियांचें॥ ५४॥ क्षत्रियांचे प्रकृतीस जाण। द्रव्य तें तृणासमान। याचकांचें निवे मन। तंव देणें दान सर्वस्व॥ ५५॥ देश काल सत्पात्र स्थान। तेथही देऊनि सन्मान। निर्विकल्पभावें गहन। देणें दान विध्युक्त॥ ५६॥ चंद्र चकोरातें पाहीं। सदा देतां नुबगे कंहीं। तेवीं हा याचकाचे ठायीं। पराङ्मुखता नाहीं क्षत्रियासी॥ ५७॥ ऐसें स्वाभाविक जें दान। हा क्षत्रियांचा प्रकृतिगुण। या नांव गा ‘उदारपण’। सहावें लक्षण क्षत्रियांचें॥ ५८॥ परमार्थप्राप्तिउपायीं। स्वधर्मनिष्ठा क्षत्रियांठायीं। जो जो व्यवसावो करणें कांहीं। तो ‘उद्यम’ पाहीं बोलिजे॥ ५९॥ वेंचूनियां निजप्राण। गोब्राह्मणांचें संरक्षण। स्वधर्में प्रजापालन। पृथ्वीरक्षण निरुपद्रव॥ १६०॥ या नांव गा ‘उद्यम’ जाण। क्षत्रियांचे सातवें लक्षण। आतां स्वधर्मस्थैर्यगुण। तेहीं निरूपण अवधारीं॥ ६१॥ गोब्राह्मणसंरक्षणता। स्वधर्मीं प्रजापतिपाळता। ये ठायीं उबगु नये चित्ता। या नांव ‘स्थिरता’ क्षत्रियांची॥ ६२॥ स्वधर्मीं जे स्थिरता। तें आठवें लक्षण तत्त्वतां। ब्राह्मणभक्तीची जे कथा। ऐक आतां सांगेन॥ ६३॥ परमार्थप्राप्तीचें कारण। क्षत्रियासी मुख्यत्वेंगुरु ब्राह्मण। त्या ब्राह्मणाचें ब्रह्मभावें भजन। सर्वस्वें जाण करावें॥ ६४॥ ब्राह्मभावें ब्राह्मणभजन। विधियुक्त देवोनि सन्मान। अनुदिनीं ब्राह्मणपूजन। सद्भावें जाण जो करी॥ ६५॥ जो मद्भावें ब्राह्मणपूजा। सन्मानें सुखी करी द्विजा। उद्धवा तो आत्मा माझा। तेणें मज अधोक्षजा पूजिलें॥ ६६॥ क्षत्रिय सन्मानें द्विज पूजिती। तेणें त्यांसी ऐश्वर्यप्राप्ती। ब्राह्मण ब्राह्मणां द्वेषिती। तेणें ते पावती दरिद्रदु:ख॥ ६७॥ ऐसें करितां ब्राह्मणभजन। मी परब्रह्म होय त्या अधीन। त्याच्या ऐश्वर्याचें चिन्ह। दहावें लक्षण तें ऐक॥ ६८॥ न करितां ब्राह्मणभजन। अंगीं ऐश्वर्य न ये जाण। मी जाहलों षड्गुणैश्वर्यसंपन्न। सदा द्विजचरण हृदयीं दृढ वाहतां॥ ६९॥ ब्राह्मणभजनमार्गें ब्रह्मसुख पायांलागे। ब्रह्मसायुज्य घर रिघे। तरी भक्त नेघे द्विजभजनें॥ १७०॥ ब्राह्मणभजनें स्वभावतां। माझीसत्ता ये त्याच्या हाता। तेव्हां त्याची आज्ञा वंदिती माथां। जाण तत्त्वतां सुरासुर॥ ७१॥ त्याचे आज्ञेभेण। पडों न शके अवर्षण। न्यायतां प्रजापालन। धर्मसंरक्षण त्याचेनी॥ ७२॥ येणेंच स्वधर्में अतिचोख। भरत पुरूरवा जनकादिक। महाऐश्वर्य पावले देख। अलोकिक द्विजभजनें॥ ७३॥ एवं क्षत्रियांचें दशलक्षण। तुज म्यां केलें निरूपण। यांत मुख्यत्वें ब्राह्मणभजन श्रेयस्कर सर्वांसी॥ ७४॥ वैश्याचे प्रकृतीस जाण। स्वाभाविक पंचलक्षण। ऐक त्याचेंही निरूपण। आचरण यथार्थे॥ ७५॥
आस्तिक्यं दाननिष्ठा च अदम्भो ब्रह्मसेवनम्।
अतुष्टिरर्थोपचयैर्वैश्यप्रकृतयस्त्विमा:॥ १८॥
वैश्याचे प्रकृतीसी जाण। अर्थतृष्णा अतिगहन। जाहलिया कोटॺानुकोटी धन। तृष्णा परिपूर्ण हों नेणे॥ ७६॥ ‘आस्तिक्य’ अर्थसंचयासी। द्वीपींहूनि द्वीपांतरासी। नाना वस्तु ने विश्वासेंसी। साधावया अर्थासी भावार्थी॥ ७७॥ कां वेदशास्त्रीं अतिविश्वासी। हें मुख्यत्वें ‘आस्तिक्य’ वैश्यासी। वेदें लिहिल्या स्वधर्मासी। नव्हे उदासी अणुमात्र॥ ७८॥ वैश्याचें स्वधर्माचरण। नेमेंसीं द्यावें नित्यदान। प्राणांत मांडल्या जाण। दानखंडण हों नेदी॥ ७९॥ परलोकप्राप्तीचें कारण। ‘ब्राह्मणाची सेवा’ जाण। ब्राह्मणआज्ञा परम प्रमाण। विशेष जाण गुरुसेवा॥ १८०॥ वेदशास्त्रार्थ प्रमाण। सद्गुरुपरब्रह्म जाण। तद्रूपें देखावे ब्राह्मण। सेवेसी प्राण अर्पावा॥ ८१॥ मी मान्य होईन अतिश्रेष्ठां। कां लौकिकीं जोडावी प्रतिष्ठा। ऐशी जे दांभिक निष्ठा। वैश्या वरिष्ठा स्पर्शेना॥ ८२॥ सांडूनियां धूर्तपण। निर्लोप ‘निर्दंभ’ जाण। विप्रसेवेसी वोपिती प्राण। हें मुख्य लक्षण वैश्याचें॥ ८३॥ येणेंचि परमार्थप्राप्ती। सत्य जाण वैश्ययाती। हे स्वाभाविक गा प्रकृती। जाण निश्चितीं वैश्याची॥ ८४॥ आतां शूद्राचिया प्रकृती। त्रिविध कर्मांची पैं प्राप्ती। तेही सांगेन मी तुजप्रती। ऐक निश्चितीं उद्धवा॥ ८५॥
शुश्रूषणं द्विजगवां देवानां चाप्यमायया।
तत्र लब्धेन सन्तोष: शूद्रप्रकृतयस्त्विमा:॥ १९॥
स्वधर्म शूद्राचिये ज्ञाती। द्विजसेवा यथानिगुती। त्यांचेनि प्रसादें जीविकावृत्ती। निष्कपटस्थिति सेवेची॥ ८६॥ करावें गृहस्थांचें गोरक्षण। चाराव्या जेथें तृणजीवन। श्वापदभय आलिया जाण। वेंचूनि प्राण रक्षाव्या॥ ८७॥ गोरक्षणीं वेंचिल्या प्राण। त्यासी उत्तम गति जाहली जाण। ज्यासी गायींचा कळवळा गहन। त्यासी मी श्रीकृष्ण सदा साह्य॥ ८८॥ द्विजसेवा गोरक्षण। दोनही वृत्ति न मिळतां जाण। तरी देवालयीं संमार्जन। जीविकार्थ जाण करावें॥ ८९॥ निष्कपटभावें आपण। निर्मळ करावें हरिरंगण। तेथील प्राप्तीचेनि जाण। करावी पूर्ण जीविका॥ १९०॥ तेथ जे जे काळीं जे जे प्राप्ती। तेणें सुखें असावें निजवृत्तीं। हे स्वधर्मकर्मस्थिती। शूद्रप्रकृतिस्वभावें॥ ९१॥ विप्रासी अग्निहोत्रादिक कर्म। शूद्र नमी द्विजोत्तम। तेथ दोंहींचा स्वधर्म। सहजें सम होतसे॥ ९२॥ ‘गृहस्थाश्रमाचें’ वर्तन। तिन्हीं आश्रमां आश्रयो आपण। अन्न वस्त्र देऊनि जाण। संरक्षण करावें॥ ९३॥ ‘ब्रह्मचर्याश्रम’ वर्तन। गुरुसेवा वेदाध्ययन। त्यासी द्यावया दान। अधिकार जाण असेना॥ ९४॥ ब्रह्मचाऱ्यासी जें जें योजिलें। तें पाहिजे गुरूसी समर्पिलें। गुरूसी वंचूनि दान दिधलें। ते तेणें केले अधर्म॥ ९५॥ ‘वानप्रस्थाश्रमी’ जाण। मुख्यत्वें तप प्रधान। करावें अग्निशुश्रूषण। वेदोक्तलक्षण प्रकारें॥ ९६॥ संन्यासी ब्रह्मचारी दीन। समयीं आश्रमा आल्या जाण। यथानुशक्त्या द्यावें अन्न। हें आश्रमरक्षण वानप्रस्था॥ ९७॥ ‘संन्याशासी’ अहिंसा प्रधान। ज्ञानपरिपाकें शांति संपूर्ण अनोळखीं भिक्षाटण। हा मुख्य धर्म जाण चतुर्थाश्रमीं॥ ९८॥ वर्णाश्रमांहूनि बाह्य जाण। केवळ अंत्यजादि जे जन। त्यांचे प्रकृतीचें जें लक्षण। स्वयें नारायण सांगत॥ ९९॥
अशौचमनृतं स्तेयं नास्तिक्यं शुष्कविग्रह:।
काम: क्रोधश्च तर्षश्च स्वभावोऽन्तेवसायिनाम्॥ २०॥
ये श्लोकींचे अष्ट गुण। त्यागावया न मनी ज्याचें मन। तोही अंत्यजासमान। हें प्रकृतिलक्षण अतिनिंद्य॥ २००॥ ज्यासी स्नानसंध्या शौचाचार। स्वकर्म नावडे साचार। अंतरीं विकल्प अपार। जैसा विखार काळिया॥ १॥ ‘कनकफळ’ हें नाम गोमटें। आंत माजिरें बाहेर कांटे। तैसें सबाह्य वोखटें। ‘अशौच’ मोठें त्या नांव॥ २॥ शरीरीं श्वेत कुष्ठ निर्नासिक। तोंडाळ वोढाळ पतिनिंदक। ते स्त्रियेच्या ऐसें देख। अशौचक सबाह्य॥ ३॥ यापरी गा ‘अशौचता’। ज्याचे अंगीं स्वभावतां। तो जाण पां तत्त्वतां। गुण प्रथमता अंत्यजाचा॥ ४॥ ‘असत्यता’ जे प्रकृतीपाशीं। अखंड बैसे अहर्निशीं। मातापितादि गुरूंसी। झकवणें त्यांसी मिथ्यात्वें॥ ५॥ जेवीं कां शिमग्याच्या सणीं। ‘रामकृष्ण’ न म्हणे कोणीं। उपस्थनामें गर्जे वाणी। संतोषोनी स्वानंदें॥ ६॥ तेवीं जागृति-स्वप्न-सुषुप्तीं। ‘असत्य’ आवडे ज्याच्या चित्तीं। तो जाण पां निश्चितीं। अंत्यजप्रकृति स्वभावें॥ ७॥ पडिलिया दृष्टी बुडीं। मायबापांचें ठेवणें काढी। नाना विश्वासपरवडी। बुडवीगांठोडी गुरूची॥ ८॥ सधन सांपडल्या हाता। नाना युक्तीं अतिक्षुद्रता। नातरी बलात्कारेंतत्त्वता। घ्यावें सर्वथा सर्वस्व॥ ९॥ यापरी गा अधर्मतां। परद्रव्य यावया हाता। आसक्ति ज्याचिया चित्ता। जाण तत्त्वतां ते ‘चोरी’॥ २१०॥ स्वधर्मकर्मी स्वभावतां। विश्वास नाहीं ज्याच्या चित्ता। वेदशास्त्रपुराणार्था। मिथ्या सर्वथा जो मानी॥ ११॥ उद्धवा जाण तत्त्वतां। या नांव गा‘नास्तिकता’। आस्तिक्यभावो स्वभावतां। अनुमात्रतां जेथ नाहीं॥ १२॥ गांठीं असतां लक्षकोडी। सदा नास्तिकता ज्याचे तोंडीं। घरींच्यासी आपदा लावी गाढी। ते प्रकृति रोकडी अंत्यजाची॥ १३॥ कार्येवीण कोरडी कळी। संबंधेंवीण वृथा सळी। अखंड करी दांतकसाळी। ते अंत्यजाचीबळी निजवृत्ती॥ १४॥ ज्यासी सदा विरोध पोटीं। वरीवरी गोड मैंद गोठी। भीतरीं द्वेषाचा भडका उठी। जो क्रूरदृष्टी सर्वदा॥ १५॥ जन्मवरी केल्या उपकारकोटी। त्यासि एकाचि उत्तरासाठीं। अपकारु करावया पोटीं। छिद्रदृष्टी सदा ठेवी॥ १६॥ उपकाऱ्या अपकारस्थिती। अंत्यजही न करी प्राणांतीं। ऐशिया विरोधातें जे वाहती। ‘शुष्कविग्रहगती’ त्या नांव॥ १७॥ जो सुहृदांमाजीं पाडी वैर। अपायीं घाली थोर थोर। अशौच नास्तिक्य घोर। जाणावा नर ‘अतिविग्रही’॥ १८॥ स्वार्थेंवीण परकार्य नाशी। ‘शुष्कविग्रही’ म्हणिपे त्यासी। उद्धवा ऐशी प्रकृति ज्यासी। अंत्यजही त्यासी पैं भीती॥ १९॥ ऐक कामाची कथा। कनक आणि कांता। येविषयीं अतिलोभता। उपरमु चित्ता असेना॥ २२०॥ स्त्रीकामाचेनि नांवें। लिंगमात्रचि असावें। मग सेव्यासेव्य भावें। विचारूं जीवें स्मरेना॥ २१॥ तैसाचि जाण द्रव्यार्था। भलतैसें यावें हाता। न विचारी विहिता अविहिता। अतिकामता अर्थार्थीं॥ २२॥ अविहित कामस्थिती। हा स्वभाव ज्याचे वृत्ती। ते अंत्यजादिप्रकृती। जाण निश्चितीं उद्धवा॥ २३॥ पाहे पां कामिकांच्या पोटीं। सदा क्रोधाची आगटी। कामअप्राप्ती ऐकतां गोष्ठी। भडका उठी प्रळयांत॥ २४॥ ज्याचिये शरीरस्थिती। उसंतु नाही क्रोधाहातीं। सदा धुपधुपीत वृत्ती। ते जाण प्रकृती अतिनीच॥ २५॥ प्राप्तभोगें तृष्णा न बाणे। ऐकिल्याही भोगाकारणें। अखंड मनाचें बैसे धरणें। ते प्रकृति जाणे अतिनीच॥ २६॥ म्यांसांगितले जे आठही गुण। हे ज्याचे प्रकृतीस लक्षण। तो हो कां भलता वर्ण। परी अंत्यजपण त्यामाजीं॥ २७॥ अवगुण सांगितले समस्त। एक एक नरकदानीं विख्यात। मा आठही मिळाले जेथ। उगंड तेथ मग कैंचा॥ २८॥ त्यागावया निजस्थिती। या आठ अवगुणांची व्युत्पत्ती। म्यां सांगितली तुजप्रती। जाण निश्चितीं उद्धवा॥ २९॥ या गुणांतें अंगीकारिती। ते नरकगामी गा निश्चितीं। या गुणांतें जे त्यागिती। ते पावती पद माझें॥ २३०॥ जेणें माझ्या पदाची प्राप्ती। सर्वां वर्णां उत्तम गती। ऐशिया गुणांची व्युत्पत्ती। सांगेन तुजप्रती उद्धवा॥ ३१॥ सकळ लक्षणांचें निजसार। जें गुह्यगुणांचें भांडार। जेणें पाविजे संसारपार। ऐक साचार उद्धवा॥ ३२॥ जो सर्व वर्णांचा सहज धर्म। जेणें पाविजे परब्रह्म। जे नाशिती चित्तभ्रम। ते गुण उत्तम अवधारीं॥ ३३॥
अहिंसा सत्यमस्तेयमकामक्रोधलोभता।
भूतप्रियहितेहा च धर्मोऽयं सार्ववर्णिक:॥ २१॥
हो कां उपायें जेणें तेणें। पुढिलासी जें सुख देणें। तें उपतिष्ठे मजकारणें। तो गुण म्यां श्रीकृष्णें वंदिजे॥ ३४॥ तैसेंच परपीडा असुख। पुढिलांसी न देणें दु:ख। तेणेंही मज होय सुख। जाण निष्टंक उद्धवा॥ ३५॥ दु:ख नेदूनि सुख देणें। या नांव ‘अहिंसा’ म्हणणें। हा पहिला गुण जाणणें। ऐक लक्षणें सत्याचीं॥ ३६॥ सत्य तें जाण पां ऐसें। ज्याचें मन वाचा असत्यदोषें। जागृतिस्वप्नसुषुप्तिवशें। स्पर्शलें नसे अणुमात्र॥ ३७॥ निंदा आणि नरस्तवन। कदा मिथ्या न बोले वचन। वाचा अनसुट धरणें जाण। ‘सत्य’ संपूर्ण या नांव॥ ३८॥ हो कां अधर्माचिये जोडी। कोडी धरोनियां कवडी। जो रिघों नेदी दृष्टीबुडीं। फुटकी कवडी स्पर्शेना॥ ३९॥ तेथेंही चोरीकरणें। कां दृष्टी चुकवूनि वस्तु घेणें। अथवा न पुसतां नेणें। हें जीवेंप्राणें न संभवे॥ २४०॥ अन्यायोपार्जित धन। स्वप्नींही नातळे मन। हें ‘अचौर्याचें’ लक्षण। तिसरा गुण उद्धवा॥ ४१॥ स्वधर्में धन यावें हाता। हेही नसे धनकामता। कामिनीकामाची नेणे वार्ता। परस्त्री ते माता नेमस्त॥ ४२॥ हो कां स्वदाराभिगमन। तेथेंही आसक्त नसे मन। आश्रमधर्मार्थ जाण। प्रतिपालन स्त्रियेचें॥ ४३॥ या नांव गा ‘अकामता’। उद्धवा जाण तत्त्वतां। हे चौथी लक्षणता। ऐक आतां अक्रोधु॥ ४४॥ जेथ कामाचा आदरु नाहीं। तेथ क्रोधाचें न चले कांहीं। जेवीं आकाशाचे ठायीं। न रुपती पाहीं निजशस्त्रें॥ ४५॥ जरी बीज जाहलें गोमटें। तरी भूमीविण अंकुर न फुटे। तैसें कामावांचूनि कोठें। क्रोध उद्भट न वाढे॥ ४६॥ एवं कामाची जे बोळवण। तेचि क्रोधाचीही जाण। जैसें गरोदरीचें मरण। करी निर्दळपण गर्भाचें॥ ४७॥ शिर तुटलिया पाठीं। हस्तपादादिक्रिया नुठी। काम निमालियापाठीं। निमाली गोष्टी क्रोधाची॥ ४८॥ जेथ काम क्रोध नाहीं। तेथ लोभ उठी कोणे ठायीं। तळवटीं नसतां भुयी। वृक्ष कंहीं वाढेना॥ ४९॥ शीस बोडिलें सकेशीं। तेथ राहूं न शके ऊ जैसी। तेवीं गेलिया कामक्रोधांसी। वस्ती लोभासी असेना॥ २५०॥ जेवीं कां भ्रताराचें मरण। घेऊनि जाय अहेवपण। तेवीं कामक्रोधेंवीण। लोभलक्षण असेना॥ ५१॥ या नांव ‘निर्लोभता’। सत्य जाण सर्वथा। क्रोधलोभांतें वाढविता। जाण तत्त्वतां कामचि॥ ५२॥ जेथ कामाचें अपूर्ण काज। तेथ क्रोधाचें खवळे तेज। जेव्हां कामाचें पूर्ण निज। तेव्हां नाचे भोज लोभाचें॥ ५३॥ जेवीं दीपाची दीपकळा। ते सवें वागवी तेज काजळां। तेवीं क्रोधलोभांचा सोहळा। कामाजवळा संतत॥ ५४॥ जेवीं कां शारियाचें शीत। घामज्वरासमवेत। तेवीं क्रोधलोभयुक्त। जाण निश्चित कामचि॥ ५५॥ जेथ कामाचा नाहीं पांगु। तोचि क्रोधलोभांचा त्यागु। हा समूळ उपावो चांगु। स्वयें श्रीरंगु बोलिला॥ ५६॥ एवं कामत्यागें सर्वथा। त्यागु पावे क्रोधलोभता। भूतांसी प्रियत्वें जे हितता। ऐक तत्त्वतां सांगेन॥ ५७॥ जैशी शक्ति आपणासी। तैसें प्रिय करावें भूतांसी। अगत्य विचंबु ज्याचा ज्यासी। तें तें त्यासी अर्पावें॥ ५८॥ अन्न वस्त्र दान मान। पोटींच्या कळवळॺानें जाण। करावें भूतीं प्रियाचरण। हा स्वधर्म जाण सर्वांचा॥ ५९॥ ऐसें प्रिय करावेंभूतां। जें परिपाकीं ये त्याच्या हिता। जेणें प्रियें उपजे बाधकता। तें सर्वथा न करावें॥ ६१॥ जो भूतप्रिय हितकारी। ऐसा जो पुरुष संसारीं। मी भगवंत त्याच्या घरीं। सर्व हित करीं सर्वदा॥ ६२॥ त्याच्या अशुभांची होळी। भूतहितप्रियमेळीं। मी स्वयें करीं वनमाळी। तेचि काळीं तत्त्वतां॥ ६३॥ जो सद्भावें सत्य साचार। भूतांसी हितत्वें प्रियकर। त्यासी मी भूतात्मा श्रीधर। करीं संसारसुखरूप॥ ६४॥ अहिंसादि सप्तलक्षण। हा सर्वांचा स्वधर्म जाण। सर्वाश्रम सर्व वर्ण। त्यांसीमुख्यत्वें जाण हा धर्म॥ ६५॥ चतुर्वर्णस्वभावप्रकृती। वर्णबाह्यांची लक्षणस्थिती। सर्व वर्णांची स्वधर्मगती। ते म्यां तुजप्रती सांगितली॥ ६६॥ यावरी आश्रमस्वधर्मता। तुज मी सांगेन आतां। उद्धवा ऐक गा तत्त्वतां। प्रथमतां ब्रह्मचर्य॥ ६७॥ ब्रह्मचर्य द्विविध जाण। एकाचें ‘नैष्ठिक्य’ संपूर्ण। एक तो ‘उपकुर्वाण’। ऐक लक्षण दोहींचें॥ ६८॥ व्रतबंध वेदाध्ययन जाहल्यापाठीं। जो परमार्थीं ठेवूनि दृष्टी। गृहस्थाश्रमाची न करी गोठी। ‘नैष्ठिक्य’ परिपाठी त्या नांव॥ ६९॥ वेदशास्त्र संपूर्ण पठन। गुरुदक्षिणा व्रतविसर्जन। करूनि करी पाणिग्रहण। ‘उपकुर्वाण’ या नांव॥ २७०॥
द्वितीयं प्राप्यानुपूर्व्याज्जन्मोपनयनं द्विज:।
वसन्गुरुकुले दान्तो ब्रह्माधीयीत चाहुत:॥ २२॥
मेखलाजिनदण्डाक्षब्रह्मसूत्रकमण्डलून्।
जटिलोऽधौतदद्वासोऽरक्तपीठ: कुशान् दधत्॥ २३॥
स्नानभोजनहोमेषु जपोच्चारे च वाग्यत:।
न च्छिन्द्यान्नखरोमाणि कक्षोपस्थगतान्यपि॥ २४॥
गर्भाधान पुंसवन। जातकर्म अन्नप्राशन। हीं समस्त कर्में पूर्वीं जाण। केलीं संपूर्ण चौलांत॥ ७१॥ याउपरी उपनयन। गुरुद्वारा गायत्रीग्रहण। सावित्रजन्म हें संपूर्ण। ‘व्रतबंध’ जाण या नांव॥ ७२॥ एवं गायत्रीमंत्रें जाण। द्विजन्मे होती तीनी वर्ण। हा ब्रह्मचर्याश्रम संपूर्ण। व्रतधारण वेदार्थ॥ ७३॥ तेथ वेदाध्ययन निर्धारीं। गुरुगृहीं वसे ब्रह्मचारी। त्याच्या व्रतनेमाची कुसरी। ऐक ते परी सांगेन॥ ७४॥ मुंजी जानवें कृष्णाजिन। पळसाचें दंडग्रहण। कमंडलु वागवावा जाण। जळाचरण करावया॥ ७५॥ न करावें मस्तकवपन। न करावें तैलाभ्यंगस्नान। न करावें दंतधावन। केशविंचरण न करावें॥ ७६॥ न करावें नखनिकृंतन। न करावें रोमच्छेदन। बाहुमूलादिक जे जाण। गुह्य स्थान अतिव्याप्त॥ ७७॥ रजकक्षाळित वस्त्रें जाण। त्याचें न करावें परिधान। प्रवाहीं करावें स्नान। प्रातर्मध्यान्ह दोंही काळीं॥ ७८॥ आसनीं श्वेत पीठासन। श्वेत वस्त्रांचें धारण। रुद्राक्ष अथवा पद्माक्ष जाण। मालाग्रहण जपार्थ॥ ७९॥ कुशादि दर्भ पवित्र। तिहीं युक्त असावे कर। ऐक मौनाचा विचार। तुज मी साचार सांगेन॥ २८०॥ मळमूत्र कां करितां स्नान। जप होम आणि भोजन। उभय संध्याकाळीं जाण। निश्चित मौन धरावें॥ ८१॥ नाहीं अभ्यंग केशविंचरण। तेणें जटा वळल्या आपण। हें ब्रह्मचारियासी जाण। व्रतधारण नेमस्त॥ ८२॥ इतुकेनि व्रतेंसीं जाण। सदा गुरुसेवेसी सावधान। गुरु कृपेनें सांगे अध्ययन। तेव्हां वेदपठन करावें॥ ८३॥ मज पढों सांगावें आतां। हा आग्रह न करावा गुरुनाथा। त्याची आज्ञा वंदूनि माथां निष्कपटता गुरुसेवा॥ ८४॥ अध्ययन सांगेना लवलाह्या। तरी सांडूनि कुलाचार्या। पढों गेलिया आणिका ठाया। गुरु त्यागिलिया महादोष॥ ८५॥ सेवा करावी अहर्निशीं। जेणें कृपा उपजे स्वामीसी। ते कृपेस्तव अध्ययनासी। अहर्निशीं सांगेल॥ ८६॥ ठेवूनि गुरुचरणीं भावार्था। पढावें गा वेदशास्त्रार्था। आकळावें वेदतत्त्वार्था। परमार्थतां निजबुद्धी॥ ८७॥
रेतो नावकिरेज्जातु ब्रह्मव्रतधर: स्वयम्।
अवकीर्णेऽवगाह्याप्सु यतासुस्त्रिपदीं जपेत्॥ २५॥
या रीतीं ब्रह्मचारीं देख। वीर्यत्याग बुद्धिपूर्वक। करूं नये आवश्यक। व्रतविशेष ब्रह्मचर्य॥ ८८॥ स्वप्नीं जाहल्या वीर्यपतन। शास्त्रोक्तविधीं करावें स्नान। मग प्रायश्चित्तार्थ जाण। गायत्रीस्मरण करावें॥ ८९॥ ब्रह्मचारी वानप्रस्थ संन्यासी। प्रयत्नें वीर्यत्यागु नाहीं त्यांसी। जो करी तो अतिदोषी। आश्रमधर्मासी बुडविलें॥ २९०॥ स्वप्नीं जाहलिया वीर्यपतन। करावें मृत्तिका सचैल स्नान। मग प्रायश्चित्तार्थ जाण। विहिताचरण जप कीजे॥ ९१॥
अग्न्यर्काचार्यगोविप्रगुरुवृद्धसुराञ्छुचि:।
समाहित उपासीत सन्ध्ये च यतवाग्जपन्॥ २६॥
गायत्रीदात्या आचार्यपण। माता पिता तें गुरुस्थान। अग्निसूर्यादि सुरगण। गो ब्राह्मण आणि ज्येष्ठ॥ ९२॥ यांचें करावया उपासन। बाह्य शुचि अंतरीं समाधान। गुरुचरणीं अनन्य शरण। आज्ञापालन पितरांचें॥ ९३॥ अग्नीचे ठायीं हवन। इंद्रादि देवांचें स्तवन। ब्राह्मण तें पूज्यस्थान। अर्घ्यदान सूर्यासी॥ ९४॥ ज्येष्ठांसी साष्टांग नमन। गायीसी अंगकुरवाळण। सायंप्रात:संध्येसी मौन। मध्यान्हीं जाण मौन नाहीं॥ ९५॥ सद्गुरूचा समर्थवादु। सर्वां वरिष्ठ सर्ववंद्यु। ज्याचा प्रताप प्रसिद्धु। स्वयें गोविंदु सांगत॥ ९६॥
आचार्यं मां विजानीयान्नावमन्येत कर्हिचित्।
न मर्त्यबुद्धॺासूयेत सर्वदेवमयो गुरु:॥ २७॥
जो अंतर्यामी ईश्वरु। जो विश्वात्मा विश्वंभरु। जो अनंत अपरंपारु। तो मी श्रीगुरुशिष्याचा॥ ९७॥ गुरुनामाची जे मातु। तो मी साचार भगवंतु। देखोनि भजनभावार्थु। पुरवीं मनोरथु शिष्याचा॥ ९८॥ ज्या सद्गुरूच्या अंगुष्ठीं। ब्रह्मादि देवांचिया कोटी। ज्याच्या नांवाची गोठी। वंद्य वैकुंठीं कैलासीं॥ ९९॥ ज्याचें नांव ऐकतां कानीं। यम काळ कांपती दोनी। ब्रह्माविष्णु रुद्र तिन्ही। हात जोडुनी तिष्ठती॥ ३००॥ सकळ वेदांचें निजसार। तें सद्गुरुस्वरूप साचार। ऐसा शिष्यासी निर्धार। निरंतर असावा॥ १॥ त्यासी मनुष्यबुद्धीं आपण। कदा न करावें हेळण। गुरुनिंदा बोलतां जाण। आली नागवण सर्वार्थीं॥ २॥ सद्गुरुनिंदेचा एकांतु। करूं आला परमआप्तु। तो त्यागावा जेवीं पतितु। हा नव्हे अर्थु तैं पळावें॥ ३॥ सद्गुरुनिंदेची वाणी। ऐकतां बोटेंद्यावीं कानीं। सद्गुरूसी भावें स्मरोनी। तें स्थानही त्यजोनी पळावें॥ ४॥ त्या सद्गुरुनिंदेची स्वयेंमातु। करिता बुडाला निजस्वार्थु। धुळीस मिळाला परमार्थु। आला अपघातु अंगासी॥ ५॥ ऐशिया गुरूच्या ठायीं जाण। पत्र पुष्प अन्न धन। शिष्यें करूं नये वंचन। तें स्वयें श्रीकृष्ण सांगत॥ ६॥
सायं प्रातरुपानीय भैक्ष्यं तस्मै निवेदयेत्।
यच्चान्यदप्यनुज्ञातमुपयुञ्जीत संयत:॥ २८॥
अन्नधनपुष्पीं फळीं। सायंप्रातर्मध्यान्हकाळीं। भिक्षा मिळे ते गुरूजवळी। अर्पूनि कृतांजळी रहावें॥ ७॥ तेथ गुरुआज्ञा जाहल्याही जाण। उदरापुरतें घ्यावें अन्न। अन्नावेगळें पदार्थभरण। घेवों न ये जाण ब्रह्मचाऱ्या॥ ८॥ सायं प्रात:काळीं जाण। ब्रह्मचाऱ्या विहित भोजन। गुरुआज्ञा जें दिधलें अन्न। तेणें प्राणतर्पण करावें॥ ९॥ तेथ न म्हणावें धडगोड। न करावें रसनाकोड। न वाढवावा विषय वाड। देहनिर्वाहीं चाड शिष्यासी॥ ३१०॥ भोजनीं कांहीं न मागावें जाण। यालागीं दृढ धरावें मौन। अधिक खादलिया अन्न। तें प्रतिबंधन गुरुसेवे॥ ११॥ आहारीं अधिक घेतलिया अन्न। निद्रा आलस्य दाटी गहन। अत्यंत अल्प जें भोजन। तेणें विकळचळण देहाचें॥ १२॥ गुरुसेवेलागीं जाण। वृत्ती राखावी सावधान। यालागीं शिष्यासी भोजन। युक्ताहारपण सर्वदा॥ १३॥ गुरुसेवेलागीं जाण। शरीर राखावें सावधान। तें गुरुसेवेचें लक्षण। स्वयें जनार्दन सांगत॥ १४॥
शुश्रूषमाण आचार्यं सदोपासीत नीचवत्।
यानशय्यासनस्थानैर्नातिदूरे कृताञ्जलि:॥ २९॥
सर्वदा अतिसादर। न पडतांही अंतर। गुरुसेवेसी निरंतर। अतितत्पर उल्हासें॥ १५॥ गुरु यानारूढ असतां। पुढें चालावें साटोपतां। पाठीसी यावें चरणीं चालतां। उपचारता समवेत॥ १६॥ समयोचित जाणोन। द्यावें तांबुल जीवन। करावें चरणसंवाहन। घालावें आसन बैसती तेथें॥ १७॥ सद्गुरु बैसल्या आसनीं। शिष्यें न बसावें नेहटूनी। दूरी नवजावें तेथूनी। नयनोन्मीलनीं रहावें॥ १८॥ अंजळीसंपुट जोडुनी। संमुख राहावें सावधानीं। गुरूची संज्ञा ज्यालागूनी। तें अविलंबनीं करावें॥ १९॥ गुरु शेजेवरी निजले असतां। जवळी नसावें तत्त्वतां। जेथूनि ऐकूं ये वचनार्था। तेथें निशीं अवस्था क्रमावी॥ ३२०॥ मी एक सेवेनें संपन्न। ऐसा धरिलिया अभिमान। केले सेवेसी आंचवण। सवेंचि जाण होईल॥ २१॥ सेवकांमाजीं मी एक। केवळ रंकाचाही रंक। ऐसा भावो निष्टंक। सेवेसी देख धरावा॥ २२॥ तैसेंचि नीच काम करितां। लाज न धरावी सर्वथा। उबग न मानूनी चित्ता। उल्हासता गुरुभजनीं॥ २३॥
एवंवृत्तो गुरुकुले वसेद्भोगविवर्जित:।
विद्या समाप्यते यावद्बिभ्रद्व्रतमखण्डितम्॥ ३०॥
सांडोनि सकळ भोगांतें। गुरुकुळीं राहोनि तेथें। गुरुसेवेचेनि व्रतें। प्रिय सर्वांतें तो जाहला॥ २४॥ एवं गुरुसेवायुक्त। धरोनियां अखंड व्रत। पावला वेदशास्त्र समस्त। पढणें समाप्त पैं जाहलें॥ २५॥ एवं विद्या जाहलिया समाप्त। उपकुर्वाण नैष्ठिक व्रत। स्वयें सांगावया अनंत। पुढील श्लोकार्थ सांगतु॥ २६॥
यद्यसौ छन्दसां लोकमारोक्ष्यन् ब्रह्मविष्टपम्।
गुरवे विन्यसद्देहं स्वाध्यायार्थं बृहद्व्रत:॥ ३१॥
जरी ब्रह्मचारी व्रतस्थ। येणेंचि आश्रमें निश्चित। सत्यलोक वैकुंठपर्यंत। वांछी वेदोक्त मत्प्राप्ती॥ २७॥ तेणें यावज्जन्म आपण। दृढ़ करावें गुरुभजन। निजदेहाचेंही जाण। करी समर्पण गुरुचरणीं॥ २८॥ सद्गुरुभजनाची परवडी। नित्य नूतन आवडी। निजात्मभावें चोखडी। लागली गोडी गुरुचरणीं॥ २९॥ पूर्वील व्रतें व्रत धरी। तेंचि व्रत दृढ करी। होय नैष्ठिक ब्रह्मचारी। गुरुभजनावरी निर्धारु॥ ३३०॥ न मनी सन्मानाचें कोड। न म्हणे विषय गोड। न धरी संसाराची चाड। व्रतीं दृढ व्रतस्थ॥ ३१॥ ऐसा थोर व्रतें व्रतधर। तैसाचि गुरुभजनीं सादर। करी सद्गुरूशीं विचार। वेदांतसार स्वाध्यायें॥ ३२॥ ‘स्व’ म्हणिजे आत्मा जाण। ते ठायीं नित्य अनुसंधान। तो ‘स्वाध्याय’ म्हणती सज्ञान। ज्ञानविचक्षण निजद्रष्टे॥ ३३॥ ऐशिया साधकासी जाण। सर्वत्र ब्रह्मभावन। हेंचि स्वमुखें मधुसूदन। स्वयें आपण सांगत॥ ३४॥
अग्नौ गुरावात्मनि च सर्वभूतेषु मां परम्।
अपृथग्धीरुपासीत ब्रह्मवर्चस्व्यकल्मष:॥ ३२॥
ब्रह्मचर्यव्रत धरणें। ब्रह्मवर्चस्व चढे तेणें। आणि सद्गुरूचेनि भजनें। निष्पाप होणें निजवृत्तीं॥ ३५॥ तेथें अग्नि गुरु आपण। सर्व भूतांच्या ठायीं जाण। अभिन्न ब्रह्मभावन। अनुसंधान सर्वदा॥ ३६॥ तेव्हां जें जें देखे दृश्यजात। तेथ ब्रह्मभावो अचुंबित। यापरी मातें उपासित। ब्रह्मयुक्त सद्भावें॥ ३७॥ नैष्ठिक ब्रह्मचर्याचा नेम। वानप्रस्थसंन्यासिया सम। तेथील आवश्यक जो धर्म। मुख्य वर्म त्यागाचें॥ ३८॥
स्त्रीणां निरीक्षणस्पर्शसंलापक्ष्वेलनादिकम्।
प्राणिनो मिथुनीभूतानगृहस्थोऽग्रतस्त्यजेत्॥ ३३॥
नैष्ठिक ब्रह्मचारी संन्यासी। वानप्रस्थ वनवासी। तिहीं न पहावें स्त्रियांसी। हा मुख्यत्वें त्यांसी स्वधर्म॥ ३९॥ स्त्री देखतांचि दिठीं। सांडूनियां पर्णकुटी। पळावें गा उठाउठी। मा कराव्या गोठी घडे केवीं॥ ३४०॥ स्वप्नींही स्त्रियेच्या स्पर्शासी। करूं नये या तिघांशीं। करितांचि मदनु त्यांसी। वीर्यपातासी उपजवी॥ ४१॥ त्या स्त्रियांसी क्रीडाविनोद। करितां विध्वंसे स्वधर्मकंद। यालागीं स्त्रीगुणानुवाद। न करिती शुद्ध सज्ञान॥ ४२॥ स्त्रियांचे हावभावदर्शन। एकांत गुह्य संभाषण। नाना विनोद अंगस्पर्शन। परिहासन मदनोक्ती॥ ४३॥ इतुकेंही जेथ घडे। तेथ कामाचा घाला पडे। स्वधर्म समूळ बुडे। धैर्याचें उडे निजसत्त्व॥ ४४॥ गृहस्थाचिये प्रवृत्ती। परस्त्रियेसी ऐसी गती। जाहलिया जाण निश्चितीं। अपावो अंतीं पावेल॥ ४५॥ स्त्री ते अग्निकुंडासमान। पुरुष तो घृतकुंभ जाण। तेथ द्रवतां अंत:करण। अर्ध क्षण लागेना॥ ४६॥ घृत वेंचलियापाठीं। घटासी झालीं वर्षें साठी। तरी अग्नीशीं जाहल्या भेटी। द्रवता पोटीं तोही धरी॥ ४७॥ तेवीं वार्धक्यवयसेंसीं। एकांत जाहलिया स्त्रियेशीं। गोष्टीमात विनोदेसीं। कामाचा त्यासी घाला पडे॥ ४८॥ त्यागावी कामिनीसंगती। हा मुख्य त्याग परमार्थीं। हेंचि स्वमुखें श्रीपती। उद्धवाप्रती बोलिला॥ ४९॥ पराशराऐसा महंत। मत्स्योदरीशीं जाहला रत। यालागीं स्त्रियेचा एकांत। अनर्थभूत पुरुषासी॥ ३५०॥ मैथुनभूत जे प्राणी। पशुपक्षी आदिकरूनी। सादरें न पहावे नयनीं। पाहतां कडकडूनि काम खवळे॥ ५१॥ मत्स्यमैथुन देखिल्यासाठीं। खवळल्या कामाच्या परिपाठी। सौभर ऋषीश्वरें तपकोटी। मैथुनासाठीं नाशिल्या॥ ५२॥ यालागीं कामाचें दर्शन। कां कामाची आठवण। पुरुषासी बाधक जाण। कामस्मरण न करावें॥ ५३॥ हृदयीं नव्हे कामसंचार। तैसा करावा सदाचार। भूतें पहावीं मदाकार। हा मुख्य प्रकार हरि बोले॥ ५४॥
शौचमाचमनं स्नानं सन्ध्योपासनमार्जवम्।
तीर्थसेवा जपोऽस्पृश्याभक्ष्यासंभाष्यवर्जनम्॥ ३४॥
शौच आचमन स्नान। संध्या तर्पण उपासन। जपादिक अनुष्ठान। तीर्थसेवन विश्वासें॥ ५५॥ अधर्म-अकर्मांचा विटाळु। हों न द्यावा अळुमाळु। आलियाही संकटकाळु। अभक्षणशीळु नव्हे भावो॥ ५६॥ ज्यासी असे व्रतधारण। तेणें रजस्वलादि निंद्य जन। त्यांसी न करावें संभाषण। धरावें मौन निंदास्तवनीं॥ ५७॥ सर्वांही आश्रमांसी जाण। स्वधर्मनियमाचें लक्षण। सांगेन म्हणे श्रीकृष्ण। ऐक सावधान उद्धवा॥ ५८॥
सर्वाश्रमप्रयुक्तोऽयं नियम: कुलनन्दन।
मद्भाव: सर्वभूतेषु मनोवाक्कायसंयम:॥ ३५॥
यदुवंशकुलनंदना। ऐक उद्धवा सज्ञाना। वर्णाश्रमस्वधर्मलक्षणा। सर्वांस जाणा हे एकी निष्ठा॥ ५९॥ मनसा वाचा कर्मणा। नेमूनि आपआपणा। सर्वांभूतीं ब्रह्मभावना। अखंड धारणा राखावी॥ ३६०॥ ऐसा मद्भाव सर्वांभूतीं। दृढ ठसावल्या चित्तवृत्ती। ऐशा नैष्ठिक ब्रह्मचाऱ्याप्रती। मोक्षफलप्राप्ती हरि बोले॥ ६१॥
एवं बृहद्व्रतधरो ब्राह्मणोऽग्निरिव ज्वलन्।
मद्भक्तस्तीव्रतपसा दग्धकर्माशयोऽमल:॥ ३६॥
यापरी जो ब्रह्मचारी। महाव्रतें व्रत धरी। मद्भावना भूताकारीं। धारण धरी अविश्रम॥ ६२॥ यापरी करितां मद्भजना। जळाल्या कर्मबीजेंसीं वासना। तेव्हां पूर्ण भक्ति माझी जाणा। वरी अंत:करणा भक्तांच्या॥ ६३॥ तेव्हां निरुपचार निजस्थिती। सहजचि घडे माझी भक्ती। तेथ ज्या ज्या देखे दृश्य व्यक्ती। मद्भावप्रतीती चिद्रूपें॥ ६४॥ ऐशी घडतां माझी भक्ती। आर्त जिज्ञासु अर्थार्थी। यांची उठवूनिया पंक्ती। चिन्मात्रैक चौथी भक्ती तो लाभे॥ ६५॥ साचचि जे भक्तीच्या ठायीं। चारी मुक्ती लोळती पायीं। जो स्वानंद मद्भक्तांच्या देहीं। संपूर्ण पाहीं उल्हासे॥ ६६॥ तेव्हां मज व्हावी मुक्तता। हेंही नाठवे त्याच्या चित्ता। हो कां ‘गेली माझी बद्धता’। हेंही सर्वथा स्मरेना॥ ६७॥ एवं माझेनि भजनसुखें। विसरला सकळ सुखदु:खें। माझे भक्तीचेनि हरिखें। स्वानंदतोखें संतुष्ट॥ ६८॥ ऐसा नैष्ठिक ब्रह्मचारी। मज पावला स्वधर्मेंकरीं। आतां उपकुर्वाणाची परी। ऐक दुसरी अवस्था॥ ६९॥
अथानन्तरमावेक्ष्यन्यथा जिज्ञासितागम:।
गुरवे दक्षिणां दत्वा स्नायाद्गुर्वनुमोदित:॥ ३७॥
संपूर्ण केलिया अध्ययन। जाहलिया वेदशास्त्रसंपन्न। तेणें गुरूसी आज्ञा पुसोन। व्रतविसर्जन सकामा॥ ३७०॥ सकामनिष्कामतेचा भरु। देखोनि विवेकविचारु। तैशीच आज्ञा देती गुरु। जैसा अधिकारु शिष्याचा॥ ७१॥ ज्यासी गृहाश्रमाची आसक्ती। तेणें आपुल्या यथाशक्ती। दक्षिणा देऊनि गुरूप्रती। व्रतसमाप्ती करावी॥ ७२॥ करावया समावर्तन। घेऊनि गुरूचें अनुमोदन। करावें मंगलस्नान। विसर्जन व्रतबंधा॥ ७३॥ येथ अधिकाराचा भेदु। स्वयें सांगतो गोविंदु। तोचि श्लोकार्थे विशदु। वैराग्यसंबंधु अधिकारा॥ ७४॥
गृहं वनं वोपविशेत्प्रव्रजेद्वा द्विजोत्तम:।
आश्रमादाश्रमं गच्छेन्नान्यथा मत्परश्चरेत्॥ ३८॥
ज्यासी वैराग्य नाहीं सर्वथा। हृदयीं स्त्रीकामाची आस्था। तेणें द्वितीयाश्रमसंस्था। गार्हस्थ्या करावें॥ ७५॥ स्त्रीकामु तरी नावडे। विवेक वैराग्य ज्यासी थोडें। तेणें वानप्रस्थाश्रमाकडे। निघावें रोकडें तत्काळ॥ ७६॥ जो विवेकतेजें दीप्तिमंत। ज्यासी सदा वैराग्य धडधडीत। जो सर्वार्थी दिसे विरक्त। त्यासीच निश्चित चतुर्थाश्रम॥ ७७॥ मुख्यत्वें ज्यासी ब्राह्मणजन्म। तोचि बोलिजे द्विजोत्तम। त्यासीच बोलिला चतुर्थाश्रम। वैश्यक्षत्रियां नेम संन्यासी नाहीं॥ ७८॥ क्षत्रिय संन्यास अंगीकारिती। तिंहीं रिघावें महापंथीं। दंड-कमंडलादिप्रवृत्ती। व्यवहारस्थिती त्यां नाहीं॥ ७९॥ ब्राह्मणासी ब्रह्मचर्याच्या पोटीं। धडधडीत जैं वैराग्य उठी। तै संन्यास परिपाठीं। उठाउठीं अंगीकारु॥ ३८०॥ बैसतां भार्येच्या पाटीं। बहुल्यावरी वैराग्य उठी। त्यासी संन्यासग्रहणीं गोठी। अधिकारु श्रेष्ठीं बोलिला॥ ८१॥ संन्यासग्रहणीं ज्याचें। वैराग्य दिसे अर्धकाचें। त्यासी संन्यासग्रहणाचें। योग्यत्व साचें असेना॥ ८२॥ जैसा कां वोकिला वोक। ज्याचा त्यास नावडे देख। तैसें विषयभोगसुख। ज्यासी नि:शेष नावडे॥ ८३॥ त्यासी संन्यासीं अधिकारु। तोचि संन्यासी साचारु। ज्यासी विषयांचा विकारु। अणुमात्रु बाधेना॥ ८४॥ प्रथम ब्रह्मचर्ययुक्त। वैराग्य न चढेचि हात। तरी होऊनि गृहस्थ। स्वधर्मयुक्त वर्तावें॥ ८५॥ तेथें स्वधर्में विषय सेवितां। दृढ साधावी विरक्तता। तेथेंही वैराग्य न ये हाता। तरी वानप्रस्थाश्रमी व्हावें॥ ८६॥ यापरी आश्रमादाश्रमा जातां। वैराग्यें संन्यासाग्रहणता। परी अनाश्रमीं तत्त्वतां। नाहीं सर्वथा अधिकारु॥ ८७॥ सांडूनि पूर्वाश्रमासी। जो गेला आश्रमांतरासी। तेथूनि पुढारां मार्ग त्यासी। परी मागें यावसायी विधि नाहीं॥ ८८॥ कां मत्पर जो माझा भक्त। त्यासी आश्रमनेम नाहीं येथ। तो माझेनि भजनें कृतकृत्य। जाण निश्चित उद्धवा॥ ८९॥ सद्भावें माझी भक्ति करितां। विवेकवैराग्य-योग्यता। पावोनि माझी पूर्ण सत्ता। सायुज्यता नेघती॥ ३९०॥ ऐसे जे माझे भक्तोत्तम। त्यांसी न लगे आश्रमनेम। त्यांचा सर्वही मी स्वधर्म। ऐसें पुरुषोत्तम बोलिला॥ ९१॥ उद्धवा ऐक पां निश्चितीं। गृहस्थाची स्वधर्मस्थिती। समूळ सांगेन तुजप्रती। ऐसें श्रीपति बोलिला॥ ९२॥
गृहार्थी सदृशीं भार्यामुद्वहेदजुगुप्सिताम्।
यवीयसीं तु वयसा तां सवर्णामनुक्रमात्॥ ३९॥
करोनियां समावर्तन। व्रतबंधाचें विसर्जन। गुरुआज्ञा घेऊनि जाण। पाणिग्रहण करावें॥ ९३॥ भार्या पर्णावी सवर्ण। इतर वर्जिले तिन्ही वर्ण। स्ववेद-स्वशाखेचे वर्ण। सगोत्रपण चुकवूनी॥ ९४॥ जे उभय कुळीं विशुद्ध। जे दशलक्षणीं अनिंद्य। देतां मातापित्यांसी आल्हाद। तो श्लाघ्य संबंध पर्णावा॥ ९५॥ जिची जन्मोत्तरी पाहतां। स्वयें वरापरीस अधिकता। कां समान वयें समता। या दोनी सर्वथा त्यागाव्या॥ ९६॥ जन्मपत्र पाहतां दिठीं। वरुषें सातें पांचें धाकुटी। ते पर्णावी स्वधर्मदृष्टीं। भार्या गोमटी ती नांव॥ ९७॥ नोवरी पाणिग्रहणयुक्त। आठांपासूनि दशवर्षांत। अधिक ते वृषली निश्चित। शास्त्रार्थप्रयोगें॥ ९८॥ गर्भाष्टमाहूनि खालती। जिची वयसा असे निश्चितीं। ते नोवरी वराधिकारीं अप्राप्ती। ऐसें शास्त्रार्थीं बोलिलें॥ ९९॥ ऐशा लक्षणांचा नाहीं बाधू। तैशी पर्णावी शुद्ध वधू। मग आश्रमधर्म अतिशुद्धू। शास्त्रअविरुद्धु तो ऐक॥ ४००॥
इज्याध्ययनदानानि सर्वेषां च द्विजन्मनाम्।
प्रतिग्रहोऽध्यापनं च ब्राह्मणस्यैव याजनम्॥ ४०॥
ब्राह्मणाचें षट्कर्म जाण। यजन आणि याजन। अध्ययन आणि अध्यापन। प्रतिग्रहो दान हें साही॥ १॥ हो कां द्विजन्मे तिन्ही वर्ण। त्यांत क्षत्रिय वैश्य दोघे जण। त्यांस तीं कर्मीं अधिकारपण। यजन-दान-अध्ययन॥ २॥ जे उत्तमजन्मे ब्राह्मण। त्यांसी षट्कर्मीं अधिकार जाण। तीनी परमार्थासी पूर्ण। जीविकावर्तन तीं कर्मीं॥ ३॥ कोणें कर्में जीविकेसी। कोणें पाविजे परमार्थासी। त्या ब्राह्मणकर्मविभागासी। ऐक तुजपाशीं सांगेन॥ ४॥ ‘यजन’ तें यज्ञाचरण। ‘अध्ययन’ तें वेदपठण। ‘दान’ जें देणें आपण। हें त्रिकर्म जाण परमार्था॥ ५॥ गुरुत्व घेऊनि आपणें। ‘याजन’ तें याग करविणें। ‘अध्यापन’ वेद पढवणें। स्वयें दान घेणें तो ‘प्रतिग्रहो’॥ ६॥ जाहलिया सच्छिष्यसंपत्ती। इये तिहीं कर्मीं जीविकावृत्ती। गुरुत्वें गुरुपूजाप्राप्ती। तेणें जीविकास्थिति ब्राह्मणां॥ ७॥ क्षत्रियवैश्यद्विजन्म्यांसी। गुरुत्व बोलिलें नाहीं यांसी। हीं तिन्ही कर्में त्यांसी। निषेधतेसी यालागीं॥ ८॥ आतां ब्राह्मणाचें लक्षण। स्वयें सांगताहे श्रीकृष्ण। ‘मुख्य’ ‘मुख्यतम’ ‘साधारण’। त्रिविध जाण उद्धवा॥ ९॥
प्रतिग्रहं मन्यमानस्तपस्तेजोयशोनुदम्।
अन्याभ्यामेव जीवेत शिलैर्वा दोषदृक् तयो:॥ ४१॥
स्वधर्मनिष्ठ ब्राह्मणापाशीं। तप-तेज-धैर्य-यशोराशी। प्रतिग्रहो इतुकियांसी। मूळ नाशासी कारण॥ ४१०॥ जो स्वधर्मनिष्ठ ब्राह्मण। करी प्रतिग्रहो अंगीकरण। तो जाण पां ‘साधारण’। हें एक लक्षण द्विजाचें॥ ११॥ जो प्रतिग्रहा पराङ्मुख ब्राह्मण। तेणें याजन अध्यापन जाण। स्वधर्मेंकरूनि द्रव्यार्जन। जीविकावर्तन करावें॥ १२॥ धरोनि द्रव्याशा मानसीं। न करावें यागांत कर्मासी। कां सांगोनि वेदाक्षरासी। द्रव्य त्यापाशीं इच्छूं नये॥ १३॥ करूनि वेदाक्षरदान। जो शिष्याचेंही न घे धन। ऐसा वैराग्यें परिपूर्ण। तो ‘शुद्ध ब्राह्मण’ सर्वथा॥ १४॥ ऐक त्याचें जीविकावर्तन। ‘शिल’ कां ‘उंछवृत्ती’ जाण। ऐक त्याचेंही लक्षण। सकारण सांगेन॥ १५॥ शेत संवगूनि नेल्या जाण। ते शेतीं प्राप्त कणिसें कां कण। ते शिलवृत्ति संपूर्ण। ऐक लक्षण उंछवृत्तीचें॥ १६॥ स्वामी नसतां सांडले जाण। ऐसे हाटवाटीं पडिले कण। ते वेंचूनि घेणें आपण। जीविकावर्तन तयांवरी॥ १७॥ या नांव उंछवृत्ती। ब्राह्मणाची ‘अतिशुद्ध’ स्थिती। तोही प्रकार उद्धवाप्रती। स्वयें श्रीपति सांगत॥ १८॥
ब्राह्मणस्य हि देहोऽयं क्षुद्रकामाय नेष्यते।
कृच्छ्राय तपसे चेह प्रेत्यानन्तसुखाय च॥ ४२॥
वर्णांमाजीं उत्तम वर्ण। त्या ब्राह्मणाचा देहो जाण। क्षुद्रकामार्थ निर्माण। देवें आपण नाहीं केला॥ १९॥ पशुपक्ष्यादि योनींच्या ठायीं। कामावांचूनि आन नाहीं। तेंचि जरी ब्राह्मणाचे देहीं। तैं विशेष कायी उत्तमत्वें॥ ४२०॥ ब्राह्मणांचे देहीं जाण। करावें स्वधर्में अनुष्ठान। माझेनि उद्देशें संपूर्ण। तपसाधन कृच्छ्रादिकें॥ २१॥ मी हृदयीं धरोनि अनंत। जो पूर्णवैराग्ययुक्त। तपादि साधनीं सतत। सदा शिणत ब्राह्मण जे॥ २२॥ त्यांसी देहपाताच्या अंतीं। माझ्या अनंत सुखाची प्राप्ती। तेथ स्वर्गसुखादि संपत्ती। मावळती तत्काळ॥ २३॥ ज्या सुखाचे सुखस्थितीं। स्फुरेना संसारस्फूर्ती। जेथूनि नाहीं पुनरावृत्ती। ते सुखप्राप्ती त्या ब्राह्मणां॥ २४॥ कृच्छ्रादि साधनयुक्तीं। ब्राह्मणां ब्रह्मसुखप्राप्ती। त्याचि सुखाची सुखसंपत्ती। शिलोंछवृत्ती साधकां॥ २५॥
शिलोञ्छवृत्त्या परितुष्टचित्तो
धर्मं महान्तं विरजं जुषाण:।
मय्यर्पितात्मा गृह एव तिष्ठ-
न्नातिप्रसक्त: समुपैति शान्तिम्॥ ४३॥
शिल अथवा उंछवृत्ती। करूनि संतुष्ट चित्तवृत्ती। विषयवैराग्यें मत्प्राप्ती। पूजिती अतिथी मद्भावें॥ २६॥ अतिथि आलिया देख। प्राणांतींही नव्हे पराङ्मुख। नाठवे निज तहानभूक। समयीं आवश्यक दे अन्न॥ २७॥ तेथ अत्यादरेंसीं जाण। देऊनि अत्यंत सन्मान। यथानुशक्त्या देतां अन्न। मी जनार्दन संतुष्टें॥ २८॥ सांडूनियां अभिमान। सर्व जीवांसी सर्वदा लीन। या नांव ‘महद्धर्म’ जाण। शुद्ध लक्षण हें धर्माचें॥ २९॥ ऐसें जें स्वधर्माचरण। तें कर्त्यासी अतिभूषण। ये धर्मीं न रिघे दूषण। ‘अतिशुद्धाचरण’ या नांव॥ ४३०॥ मजमाजीं रंगली चित्तवृत्ती। यालागीं विसरला गृहासक्ती। त्यासी गृहाश्रमीं माझी प्राप्ती। सुखसंपत्ती निजबोधु॥ ३१॥ निर्धनासी ऐशिया रीतीं। गृहाश्रमीं माझी प्राप्ती। आतां सधनाचे प्राप्तीची स्थिती। ऐक तुजप्रती सांगेन॥ ३२॥ सधन होय जैं सज्ञान। तैं न करितां अतिसाधन। माझी प्राप्ति अतिसुगम जाण। ऐक लक्षण तयाचें॥ ३३॥
समुद्धरन्ति ये विप्रं सीदन्तं मत्परायणम्।
तानुद्धरिष्ये नचिरादापद्भ्यो नौरिवार्णवात्॥ ४४॥
आधींच पूज्य ब्राह्मण। त्याहीवरी माझा भक्त जाण। माझे निजभजनें अतिसंपन्न। मद्भावें पूर्ण परिपक्व॥ ३४॥ मागणें नाहीं सर्वथां। हा नेम माझिया निजभक्ता। त्यासी पीडिजे क्षुधादि व्यथा। ते निवारिता जो होय॥ ३५॥ देऊनि अन्न धन जीवन। वस्त्र आदिकरूनि लवण। ऐसें वेंचूनियां निजधन। भक्तसंरक्षण जो करी॥ ३६॥ नाहीं देणें निर्भर्त्सितां। देऊनि आभार न ठेवी माथां। सन्मानें अतिनम्रता। जो मद्भक्तां संरक्षी॥ ३७॥ जेवीं पोटांतले कळवळेंसी। माता गोड तें दे बाळकासी। तेवीं सांडोनि निजस्वार्थासी। माझ्या भक्तांसी जो रक्षी॥ ३८॥ तैं मागें सांडूनि निजभक्ता। त्यासी मी वाहीं आपुले माथां। मग वैकुंठाही वरुता। त्याहीपरता पाववीं॥ ३९॥ ज्यासी म्यां वाहिलें निजमाथां। त्यासी कोण्या अर्थाची दुर्लभता। जो संरक्षी माझ्या निजभक्तां। त्यासी उद्धरिता मी उद्धवा॥ ४४०॥ माझे भक्तांचीं सांकडीं। जो कोणी निजांगें दवडी। त्यासी भवार्णवपरथडी। तत्काळ रोकडी मी पाववीं॥ ४१॥ जेवीं कां जळसागरीं। नाव धनवंतातें तारी। तेवीं भक्तरक्षका संसारीं। मी उद्धरीं उद्धवा॥ ४२॥ यापरी धनवंत जन। जो करी भक्तसंरक्षण। देवकीवसुदेवांची आण। त्याचें उद्धरण मी करीं॥ ४३॥ सर्वांचे आपत्तीचें निवारण। राजेनि करावें आपण। त्या राजधर्माचें लक्षण। स्वयें श्रीकृष्ण सांगत॥ ४४॥
सर्वा: समुद्धरेद्राजा पितेव व्यसनात्प्रजा:।
आत्मानमात्मना धीरो यथा गजपतिर्गजान्॥ ४५॥
सर्वांचें आपत्तींत रक्षण। रायें करावें आपण। दीन दुर्बळ ब्राह्मण। अयाचित जन शोधूनी॥ ४५॥ व्यसनप्राप्त निजात्मजा। पिता संरक्षणीं निघे पैजा। तेवीं आपत्तीपासोनि प्रजा। संरक्षणीं राजा सादर॥ ४६॥ करूनि प्रजांचें संरक्षण। आपुल्या आपत्तीसी आपण। स्वयें करावें निवारण। हा स्वधर्म जाण रायाचा॥ ४७॥ चिखलीं रुतल्या भद्रजाती। स्वयें निघे आत्मशक्तीं। गजी गजशावे नेणों किती। काढी रुतीबाहेरी॥ ४८॥ तेवीं राजा जो भूपति। तेणें प्रजा रक्षाव्या आपत्तीं। आपुलेही आपत्तीची निवृत्ती। निजात्मशक्तीं जो करी॥ ४९॥ ऐशिया स्वधर्मस्थिती। सादरें वर्ते जो भूपती। त्याच्या स्वधर्माची फलप्राप्ती। स्वयें श्रीपती सांगत॥ ४५०॥
एवंविधो नरपतिर्विमानेनार्कवर्चसा।
विधूयेहाशुभं कृत्स्नमिन्द्रेण सह मोदते॥ ४६॥
यापरी जो कां नृपती। इहलोकींच्या राज्यप्राप्ती। अधर्म नाशोनि स्वधर्मस्थितीं। स्वर्ग प्राप्ती तो पावे॥ ५१॥ ‘राज्याचे अंतीं नरक’। ऐसें बोलती ज्ञाते लोक। ते निरयगती नाशोनि देख। स्वधर्मे परलोक पावले॥ ५२॥ ते स्वर्गलोकीं गा जाण। अर्कप्रकाशासम विमान। तेथ आरूढोनि आपण। इंद्रासमान सुख भोगिती॥ ५३॥ गृहस्थाश्रम अतिविषम। तेथें आचरतां स्वधर्म। वोडवे जैं कां दुर्गम। ते आपद्धर्म अवधारीं॥ ५४॥
सीदन् विप्रो वणिग्वृत्त्या पण्यैरेवापदं तरेत्।
खड्गेन वाऽऽपदाक्रान्तो न श्ववृत्त्या कथंचन॥ ४७॥
स्वधर्मे पीडितां ब्राह्मणासी। तेणें करावें वणिग्वृत्तीसी। कां दुरावले क्षात्रधर्मासी। तेही सदोषी अतिदुष्ट॥ ५५॥ ब्राह्मणासी हिंसाकर्म। तो जाण पां परम अधर्म। लागल्या अनुपपत्ती दुर्गम। तैं क्षात्रधर्म करावा॥ ५६॥ करितां वाणिज्यकर्मास। तिळ सर्षप कार्पास। कां लवणादि रस तैजस। यांच्या महादोष विक्रयीं॥ ५७॥ त्या सोडोनि सदोषां समस्तां। लागावें वाणिज्यपंथा। तांबूलपर्णें श्वेतवस्त्रता। हें विकितां निर्दुष्ट॥ ५८॥ ऐशिया वाणिज्यस्थितीं। ज्याची ढळेना अनुपपत्ती। तेणें खड्ग घेऊनि हातीं। क्षात्रवृत्ती करावी॥ ५९॥ तेथें चोरावीं ना अंगें। रणीं न सरावें मागें। स्वामिकार्याचेनि योगें। देहत्यागें उठावें॥ ४६०॥ ऐशिया शुद्ध क्षात्रवृत्तीं। ब्राह्मणें कंठावी अनुपपत्ती। परी नीचसेवा प्राणांतीं। श्ववृत्ती न करावी॥ ६१॥ क्षत्रियांसी स्वधर्में अनुपपत्ती। लागल्या वर्तावें कोणे स्थिती। तें विशद करूनि श्रीपती। उद्धवाप्रती सांगत॥ ६२॥
वैश्यवृत्त्या तु राजन्यो जीवेन्मृगययाऽऽपदि।
चरेद्वा विप्ररूपेण न श्ववृत्त्या कथंचन॥ ४८॥
क्षत्रियासी लागल्या अनुपपत्ती। पूर्वोक्त करावी वणिग्वृत्ती। कां पारधी करावी वनांतीं। तेणें अनुपपत्ती कंठावीं॥ ६३॥ येणेंही न कंठे अनुपपत्ती। तरी भीक मागावी विप्रगतीं। परी नीचसेवा प्राणांतीं। श्ववृत्ती न करावी॥ ६४॥ स्वधर्मे वैश्यासी अनुपपत्ती। लागल्या वर्तावें कोणे स्थितीं। ते विवंचना उद्धवाप्रती। कृष्ण कृपामूर्ति सांगत॥ ६५॥
शूद्रवृत्तिं भजेद्वैश्य: शूद्र: कारुकटक्रियाम्।
कृच्छ्रान्मुक्तो न गर्ह्येण वृत्तिं लिप्सेत कर्मणा॥ ४९॥
वैश्यासी लागल्या अनुपपत्ती। तेणें धरावी शूद्रवृत्ती। निष्कपट सेवा यथास्थिती। तीं वर्णाप्रती करावी॥ ६६॥ वैश्य पीडिल्याही अनुपपत्तीं। ब्राह्मण-क्षत्रियांची वृत्ती। सर्वथा धरूं नये हातीं। जाण निश्चितीं उद्धवा॥ ६७॥ वैश्यासी अतिअनुपपत्ती। मांडल्याही प्राणांतगती। तरी नीचसेवेची स्थिती। कोणेही अर्थीं न करावी॥ ६८॥ शूद्रासी लागलिया अनुपपत्ती। तेणेंही न करावी श्ववृत्ती। धरूनि बुरुडक्रिया हातीं। जीविकावृत्ती करावी॥ ६९॥ विकावीं दोर दावीं शिंकीं। पाटे वरवंटे टवळीं निकीं। कां काष्ठें वाहावीं मस्तकीं। जीवीके विखीं उदरार्थ॥ ४७०॥ आपत्काळाचिये गती। चतुर्वर्णांची जीविकास्थिती। म्यां सांगीतली तुजप्रती। परी सर्वथा श्ववृत्ती सांडावी॥ ७१॥ एवं क्रमलिया अनुपपत्ती। म्यां सांगितल्या ज्या जीविकावृत्ती। तेथें देखिलियाही लाभप्राप्ती। सर्वथा हातीं न धराव्या॥ ७२॥ आपत्काळींच्या आपद्वृत्ती। अनुतापें क्रमिल्या अंतीं। सांडूनियां स्वधर्मस्थितीं। यथानिगुतीं रहावें॥ ७३॥ गृहस्थाचें विहित कर्म। त्यांतीलही आवश्यक धर्म। तेथील ब्रह्मार्पणवर्म। स्वयें पुरुषोत्तम सांगत॥ ७४॥
वेदाध्यायस्वधास्वाहाबल्यन्नाद्यैर्यथोदयम्।
देवर्षिपितृभूतानि मद्रूपाण्यन्वहं यजेत्॥ ५०॥
स्वाध्याय ‘वेदाध्ययन’। वेदप्रोक्त ब्रह्मयज्ञ। ‘स्वधा’ म्हणिजे पितृतर्पण। ‘स्वाहा’ जाण देवतादिकां॥ ७५॥ बळिदानादिकीं जाण। तृप्त होय ‘भूतगण’। ‘मनुष्यांसी’ अन्नोदकदान। हे पंचयज्ञ जाण नित्यकर्म॥ ७६॥ हेंचि ब्रह्मकर्म जाण। जेणें होय ब्रह्मार्पण। त्या अर्पणाची निजखूण। तुज मी संपूर्ण सांगेन॥ ७७॥ मी एक कर्मकर्ता येथें। हें सांडोनियां निजचित्तें। भगवद्रूप भावितां भूतें। ब्रह्मार्पण तेथें होय कर्म॥ ७८॥ सांडितां कर्माभिमान। कर्म होय ब्रह्मार्पण। हें संकल्पेंवीण जाण। अर्पितीखूण उद्धवा॥ ७९॥ माझेनि हें कर्म जाहलें। तें म्यां कृष्णार्पण केलें। येणें संकल्पाचेनि बोलें। अंगा आलें कर्तृत्व॥ ४८०॥ जो म्हणे मी कर्मकर्ता। तो होय कर्मफळभोक्ता। मुख्य बाधक ते अहंता। जाण तत्त्वतां उद्धवा॥ ८१॥ ज्याच्या ठायीं अहंममता। त्याचे अंगीं नित्यबद्धता। जो निरभिमानीनिर्ममता। नित्यमुक्तता त्यापाशीं॥ ८२॥ यालागीं सांडूनि अभिमान। पंचमहायज्ञाचरण। गृहस्थेंप्रत्यहीं करितां जाण। कर्म ब्रह्मार्पण सहजेंचि॥ ८३॥ जैसेनि अर्पे भगवंता। ते गृहस्थाची नित्यकर्मता। तुज म्यां सांगितली तत्त्वतां। यज्ञादि कथा ते ऐक॥ ८४॥ यज्ञ करावया अधिकारवंत। गांठी शुद्धबारा सहस्र अर्थ। ज्यासी वेदीं ज्ञान यज्ञांत। तेचि येथ अधिकारी॥ ८५॥
यदृच्छयोपपन्नेन शुक्लेनोपार्जितेन वा।
धनेनापीडयन् भृत्यान् न्यायेनैवाहरेत् क्रतून्॥ ५१॥
उदीमव्यापारें जोडिलें। का जें असत्प्रतिग्रहें आलें। नातरी परपीडा प्राप्त जाहलें। कां आडवूनि घेतलें जें द्रव्य॥ ८६॥ द्रव्य देतां चरफडी। ते शिष्या घालून सांकडीं। ऐसा अर्थ जोडिला जोडी। ते अपरवडी द्रव्याची॥ ८७॥ जें यदृच्छा सहज आलें। कां जें शुक्लवृत्तीं जोडिलें। जें सुखोपायें हाता आलें। तें द्रव्य विहिलें यज्ञार्थ॥ ८८॥ पाडूनि कुटुंबासी लंघन। सर्व द्रव्य वेंचूनि जाण। करूं नये यज्ञाचरण। अधर्मपण तेणेंही॥ ८९॥ कां जीविका जीवनवृत्ती। याग करूं नये निश्चितीं। लौकिकीं मिरवावया स्फीती। याग करिती ते मंद॥ ४९०॥ न धरितां कर्माभिमान। शुद्ध द्रव्य जोडिल्या जाण। करावें यज्ञाचरण। हें स्वधर्मलक्षण गृहस्थाचें॥ ९१॥ सांडूनियां विषयलिप्सा चित्तीं। त्यजूनि गृहाची गृहासक्ती। गृहस्थें धरावी निवृत्ती। हें स्वयें श्रीपति सांगत॥ ९२॥
कुटुम्बेषु न सज्जेत न प्रमाद्येत्कुटुम्ब्यपि।
विपश्चिन्नश्वरं पश्येददृष्टमपि दृष्टवत्॥ ५२॥
जरी जाहली स्त्रीपुत्रगृहस्थिती। परी न धरावी त्यांची आसक्ती। सावध राखावी चित्तवृत्ती। परमात्मयुक्तिसाधनें॥ ९३॥ सांडूनि कल्पना प्रमाद संग। चुकवूनि प्रमदांचें अंग। ईश्वरनिष्ठाअतिचांग। वृत्ति अभंग राखावी॥ ९४॥ गृह-कुटुंब-विषयासक्ती। पाहतां विवेकाचिये स्थितीं। परिपाकें नश्वरप्राप्ती। जाण निश्चितीं उद्धवा॥ ९५॥ जैसा इहलोकींचा परिपाक। तैसाचि जाण स्वर्गलोक। उभयतां नश्वर देख। केवळ मायिक मिथ्यात्वें॥ ९६॥ स्त्री पुत्र आणि धन। हें नश्वर जैसे कां स्वप्न। येचि विषयीं निरूपण। स्वयें नारायण सांगत॥ ९७॥
पुत्रदाराप्तबन्धूनां सङ्गम: पान्थसङ्गम:।
अनुदेहं वियन्त्येते स्वप्नो निद्रानुगो यथा॥ ५३॥
जैसे वृक्षातळीं पांथिक। एकत्र मीनले क्षण एक। तैसे पुत्रदाराप्तलोक। सर्वही क्षणिक संगम॥ ९८॥ उभय नदीप्रवाहेंसीं। काष्ठें मीनलीं संगमीं जैसीं। सोयरीं सर्व जाण तैसीं। हेलाव्यासरसीं फांकती॥ ९९॥ जे योनीं जो जीव देहधारी। तेथें तेचि योनीचीं सोयरीं। ऐशीं अनंत जन्में संसारीं। तैं अमित सोयरीं जीवाचीं॥ ५००॥ परी ये योनीचीं ते योन्यंतरीं। येरयेरां नोळखती सोयरीं। जैसी ये स्वप्नींची पदार्थपरी। त्या स्वप्नांतरीं रिघेना॥ १॥ यापरी हे समस्त। स्त्री पुत्र बंधु आप्त। मायामय कल्पित। जाणें निश्चित तो धन्य॥ २॥
इत्थं परिमृशन्मुक्तो गृहेष्वतिथिवद्वसन्।
न गृहैरनुबध्येत निर्ममो निरहङ्कृत:॥ ५४॥
ऐसेनि विवेकें विवेकवंता। कदा न बाधी मोहममता। अतिथीच्या परी सर्वथा। अनासक्तता गृहवासीं॥ ३॥ एवं निर्मानमोहममता। जो उदासीन गृहावस्था। ज्यांसी निष्काम निर्लोभता। त्यासी अहंता बाधीना॥ ४॥ निर्ममता निरभिमान। व्हावया मुख्य गुरुभजन। तेणें वैराग्य-विवेक-ज्ञान। सहजचि जाण गुरुभक्तां॥ ५॥ ऐशिया वैराग्यविवेकस्थितीं। गृहीं वसतां गृहस्थाप्रती। प्राप्त होय निजमुक्ती। जाण निश्चितीं उद्धवा॥ ६॥ आतां आश्रमांतराची गती। स्वयें सांगताहे लक्ष्मीपति। भक्ति विरक्ति निजशांती। आश्रमस्थितिविभाग॥ ७॥
कर्मभिर्गृहमेधीयैरिष्ट्वा मामेव भक्तिमान्।
तिष्ठेद्वनं वोपविशेत् प्रजावान् वा परिव्रजेत्॥ ५५॥
गृहीं असोनि आश्रमस्थितीं। ज्यासी मुख्यत्वें भगवद्भक्ती। त्यासी आश्रमांतरप्राप्ती। न लगे निश्चितीं मद्भक्तां॥ ८॥ तेंचि माझें कैसें भजन। स्वाहा स्वधा यज्ञदान। जें जें येथें अर्पे जाण। तें तें मदर्पण निश्चित॥ ९॥ काळीं अकाळीं सर्वथा। भजनीं पालट नाहीं चित्ता। ऐशी ज्या गृहस्थाची अवस्था। तेणें असावें सर्वथा गृहाश्रमीं॥ ५१०॥ जया कर्माची अति आसक्ती। आणि विषयांची अनासक्ती। नाहीं ज्ञानयुक्त निजशांती। त्यासी वानप्रस्थीं। अधिकारु॥ ११॥ ज्यासी विरक्ति शांति ज्ञानस्थिती। करतळामळक हस्तप्राप्ती। त्यासी संन्यासग्रहणस्थिती। जाण निश्चितीं अधिकार॥ १२॥ जाहलिया पुत्रसंतती। भार्या देऊनि पुत्राच्या हातीं। संन्यास करावा निश्चितीं। श्रुति ये अर्थीं संमत॥ १३॥ ज्यासी गृहस्थाश्रमीं नावडे भक्ती। अपार पोरांची संतती। जाहल्याही न धरी विरक्ती। जो वानप्रस्थीं रिघेना॥ १४॥ ज्याचा न फिटे विषयभ्रम। जो संन्यासी नव्हे निष्कर्म। त्याचें जाण निंद्य कर्म। स्वयें पुरुषोत्तम सांगत॥ १५॥
यस्त्वासक्तमतिर्गेहे पुत्रवित्तैषणातुर:।
स्त्रैण: कृपणधीर्मूढो ममाहमिति बध्यते॥ ५६॥
जो गृहासक्तीं सुभटु। तो ईषणात्रयीं वरिष्ठु। जो विषयांलागीं लंपटु। अतिलोभिष्ठु धनेच्छा॥ १६॥ जो विकारांचा अंकिला। जो अहंममतेचा पोसणा जाहला। जो स्त्रियेसी जीवें विकिला। तो मूढतेच्या पडिला महादुर्गीं॥ १७॥ जो आशेचिया वणवणा। सर्वांगांचा वोळंगणा। यालागीं बद्धतेचा जाणा। जाहला आंदणा जीवेंभावें॥ १८॥ तेचि बद्धतेची गती। त्याच्या मूर्खत्वाची वदंती। स्वयें सांगताहे श्रीपती। उद्धवाप्रती उद्देशें॥ १९॥
अहो मे पितरौ वृद्धौ भार्या बालात्मजाऽऽत्मजा:।
अनाथा मामृते दीना: कथं जीवन्ति दु:खिता:॥ ५७॥
माता पिता वृद्धें केवळें। भार्या धाकुटी तान्हीं बाळें। मज होतां यांवेगळें। तेणेंची काळें मरतील॥ ५२०॥ ऐशिया नानावस्था। आपुल्याही मरणापरता। वाहे कुटुंबाची चिंता। ऐक आतां सांगेन॥ २१॥ एखादेनि अकाळकाळें। मजचि जैं मरण आलें। तैं काय करितील स्त्रिया बाळें। आंसुवें डोळे लोटती॥ २२॥ मात्यापित्यांची पडो वाट। स्त्रियेसी होईल हृदयस्फोट। बाळांचा शोषेल कंठ। पिटी ललाट तेणें दु:खें॥ २३॥ मज निमालियाअंतीं। हीं अतिदु:खी कैशीं जीती। ऐशी जीतांची करी खंती। मूढमति यालागीं॥ २४॥ गाढ मूढतेचें भरितें। अपार उथळलें जेथें। विवेकाचें तारूं तेथें। विपरीतार्थें बुडालें॥ २५॥
एवं गृहाशयाक्षिप्तहृदयो मूढधीरयम्।
अतृप्तस्ताननुध्यायन् मृतोऽन्धं विशते तम:॥ ५८॥
इति श्रीभागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायामेकादशस्कन्धे सप्तदशोऽध्याय:॥ १७॥
यापरी गृहासक्तीं आसक्त। सदा विषयीं अतृप्तचित्त। अखंड स्त्रीपुत्रांतें ध्यात। हृदयाआंतमोहित॥ २६॥ त्या मोहाचे मोहविधीं। मूढ जाहली हृदयबुद्धी। ऐसा निमाला जो त्रिशुद्धी। तो प्रवेशे अंधीं महातमीं॥ २७॥ ज्या तमाचेनि महाबळें। ज्ञान होऊनि ठाके आंधळें। तेथ सूर्याचे फुटती डोळे। ते तमीं लोळे तो तामसु॥ २८॥ ज्या तमापासूनि उपरती। हों नेणें गा कल्पांतीं। त्या अंध-तमातें पावती। मूढमति अतिमंद॥ २९॥ महामोहाचे परिपाटीं। नश्वर विषयासाठीं। चुकोनि अनंतसुखाची पुष्टी। दु:खकोटी भोगिती॥ ५३०॥ यालागीं मनुष्यदेहीं जाण। करोनियां भगवद्भजन। चुकवावें जन्ममरण। आपणा आपण उद्धरावें॥ ३१॥ जीवा जे जे योनीं जन्मगती। तेथ तेथ विषयासक्ती। तेचि मनुष्यदेहीं विषयस्थिती। तैं परमार्थप्राप्ती कोणे देहीं॥ ३२॥ विशेषें उत्तमोत्तम। प्राप्त जाहल्या ब्राह्मणजन्म। ज्याचे नित्यकर्मीं परब्रह्म। अतिसुगम सहजचि॥ ३३॥ ज्यासी वर्ततां अहोराती। संध्यावंदनविधानस्थिती। त्रिकाळ पापाची निवृत्ती। जाण निश्चितीं ब्राह्मणा॥ ३४॥ सकळ साराची सारमूर्ति। तो गायत्रीमंत्र ज्याचे हातीं। वेद मुखाची वास पाहती। एवढी प्राप्ती ब्राह्मणा॥ ३५॥ ब्राह्मणाचे हृदयीं जाण। वेदरूपें नारायण। स्वयें राहिला आपण। धन्य ब्राह्मण त्रिलोकीं॥ ३६॥ ज्या ब्राह्मणासी सदा जाण। शिरीं वंदिती सुरगण। ज्या ब्राह्मणाचा श्रीचरण। स्वयें नारायण हृदयीं वाहे॥ ३७॥ ज्याअंगीं एक रती। पाप न राहे संध्येहातीं। यालागीं ब्राह्मण पुण्यमूर्ती। स्वयें रमापती बोलिला॥ ३८॥ ज्याची भगवंत करी वर्णना। ‘किं पुनर्ब्राह्मणा: पुण्या:’। त्या भगवद्गीतावचना। सत्यत्व जाणा या हेतू॥ ३९॥ ब्राह्मण आणि भगवद्भक्त। तैं सकळ भाग्य आलें तेथ। त्यासी कोण अर्थ अप्राप्त। ज्याचे बोलांत हरि तिष्ठे॥ ५४०॥ ते काष्ठपाषाणप्रतिमे पहा हो। प्रतिष्ठिती तेथ प्रकटे देवो। एवढा ब्राह्मणीं सद्भावो। सहजान्वयो सामर्थ्य॥ ४१॥ तो पावोनियां ब्राह्मणजन्म। जो करी क्षुद्र विषयकर्म। त्याचे हातींचा गेला पुरुषोत्तम। अंधतम तो पावे॥ ४२॥ एका-जनार्दनाची विनंती। येऊनि मनुष्यदेहाप्रती। करोनियां भगवद्भक्ती। निजात्मप्राप्ती साधावी॥ ५४३॥
इति श्रीभागवते महापुराणे एकादशस्कंधे श्रीकृष्णोद्धवसंवादे ब्रह्मचर्यगृहस्थकर्मधर्मनिरूपणे एकाकारटीकायां सप्तदशोऽध्याय:॥ १७॥ श्लोक संख्या॥ ५८॥ ओव्या॥ ५४३॥
॥ श्री ॐ तत्सत्-श्रीकृष्ण प्रसन्न॥
अध्याय अठरावा
श्रीगणेशाय नम:॥ श्रीकृष्णाय नम:॥ ॐ नमो कर्मप्रकाशका। सद्विद्याविधिविवेका। कर्मधर्मप्रतिपाळका। जगन्नायका गुरुवर्या॥ १॥ वर्णाश्रमादि मर्यादा। त्याचा सेतू तूं गोविंदा। तूं कारण वेदानुवादा। विवादसंवादा तूं मूळ॥ २॥ तूं शब्दसृष्टीचा अर्कु। तूं वेदगुह्यप्रकाशकु। तूंचि एकला अनेकु। व्याप्य व्यापकु तूंचि तूं॥ ३॥ तूंचि तूं विधि विधान। तूं बोलका तूंचि मौन। एका आणि जनार्दन। दोनी संपूर्ण तूं गुरुराया॥ ४॥ यालागीं श्रीभागवता। तूंचि अर्थ तूं कविता। तूंचि अर्थावबोधकता। हेंही बोलविता तूंचि आम्हां॥ ५॥ जैशीं आपुलींचि उत्तरें। पडसादें होतीं प्रत्युत्तरें। तेवीं माझेनि मुखांतरें। तूं कवित्वद्वारें बोलका॥ ६॥ बोलका श्रीभागवतीं। श्रीकृष्ण कृपामूर्ती। तेणें वर्णाश्रमउत्पत्ति। यथास्थिती सांगीतली॥ ७॥ सप्तदशाध्यायीं सुगम। सांगीतले ब्रह्मचर्य-धर्म। गृहस्थाचें स्वधर्मकर्म। नित्यनेम निरूपिले॥ ८॥ आतां अष्टादशाध्यायीं जाण। वानप्रस्थाश्रमलक्षण। संन्यासधर्माचें निरूपण। स्वयें श्रीकृष्ण सांगत॥ ९॥
श्रीभगवानुवाच
वनं विविक्षु: पुत्रेषु भार्यां न्यस्य सहैव वा।
वन एव वसेच्छान्तस्तृतीयं भागमायुष:॥ १॥
आतां क्रमेंचि निरूपण। वानप्रस्थाचें आलें जाण। त्यासी वनास निघावया कारण। आयुष्यलक्षण विभाग॥ १०॥ ‘शतायु:पुरुष’—मर्यादा श्रुती। त्याच्या तृतीयभागाची स्थिती। सासष्टी क्रमिल्याअंतीं। वनाप्रती निघावें॥ ११॥ निघावया वनाप्रती। भार्या देऊनि पुत्राचे हातीं। आपण निघावें शीघ्रगतीं। वानप्रस्थीं वनवासा॥ १२॥ भार्या साध्वी पतिव्रता सती। ईश्वरस्वरूप मानी पती। भ्रतार निघतां वानप्रस्थीं। जे पुत्राप्रती राहेना॥ १३॥ सांडितां भ्रतार सेवेसी। कल्पांत हों पाहे जिसी। जे भ्रतारचरणांची दासी। ते सवें वनासी आणावी॥ १४॥ जो पुरुष स्त्रीसमवेत। वनीं झाला वानप्रस्थ। तेणें स्त्रीकामासी अलिप्त। व्हावें दृढव्रत ते आश्रमीं॥ १५॥ जो वानप्रस्थवनवासी। तेणें दृढ धरावी शांति मानसीं। नातळावें कामक्रोधासी। हेही व्रत त्यासी आवश्यक॥ १६॥
कन्दमूलफलैर्वन्यैर्मेध्यैर्वृत्तिं प्रकल्पयेत्।
वसीत वल्कलं वासस्तृणपर्णाजिनानि च॥ २॥
वनींचीं कंदमूलफळें। जीं निपजलीं ऋतुकाळें। तींही अतिपवित्रें निर्मळें। आहार तेणें मेळें करावा॥ १७॥ वनवासीं वस्त्रें जाण। वल्कलें व्याघ्रमृगाजिन। अथवा नेसावें केवळ तृण। कां पर्णाभरण वृक्षांचें॥ १८॥ वानप्रस्थीं नेमग्रहण। ऐक त्याचेंही लक्षण। त्या नेमाचें निरूपण। स्वयें नारायण सांगत॥ १९॥
केशरोमनखश्मश्रुमलानि बिभृयाद् दत:।
न धावेदप्सु मज्जेत त्रिकालं स्थण्डिलेशय:॥ ३॥
केश म्हणिजे मस्तकींचे। श्मश्रु बोलिजे मुखींचे। रोम ते कक्षोपस्थींचे। छेदन यांचें न करावें॥ २०॥ मस्तकीं न करावें वपन। न करावें श्मश्रुकर्म जाण। न करावें रोमनखच्छेदन। दंतधावन न करावें॥ २१॥ स्नान मुसलवत् केवळ। अवश्य करावें त्रिकाळ। प्रक्षाळावे ना शरीरमळ। व्रत प्रबळ वनस्था॥ २२॥ केवळ भूमीवरी शयन। सदासर्वदा करावें जाण। तळीं घालावें ना तृण। मग आस्तरण तें कैंचें॥ २३॥ यापरी वानप्रस्थें जाण। दृढ धरूनि व्रतधारण। करावें तपाचरण तें तपलक्षण अवधारीं॥ २४॥
ग्रीष्मे तप्येत पञ्चाग्नीन् वर्षास्वासारषाड्जले।
आकण्ठमग्न: शिशिरे एवं वृत्तस्तपश्चरेत्॥ ४॥
उष्णकाळीं पंचाग्नी। अग्निकुंडें चहूं कोणीं। पांचवा रवि माध्याह्नीं। ऐसा पंचाग्नी साधावा॥ २५॥ माळा करोनि उच्च प्रदेशीं। घन वर्षतां धारावर्त्तेंसीं। तेथ व्हावें आकाशवासी। वर्षाकाळीं ऐसी तपप्राप्ती॥ २६॥ आलिया हेमंतऋतूसी। आकंठमग्न जळवासी। जळ वास करावा निशीं। हे वानप्रस्थासी तपक्रिया॥ २७॥ हे तपक्रिया प्रतिवरुषीं। विहित वानप्रस्थासीं। वयसापरत्वें भक्षणासी। हृषीकेशी सांगत॥ २८॥
अग्निपक्वं समश्नीयात्कालपक्वमथापि वा।
उलूखलाश्मकुट्टो वा दन्तोलूखल एव वा॥ ५॥
अगीस्तव पाका आलीं। कां काळें जीं परिपक्व झालीं। तीं तापसालागीं भलीं। आहारीं विहिलीं उदरार्थ॥ २९॥ दांत असलिया बळी। फळें खावी तेणें सगळीं। कां गेलिया दांत समूळीं। कांडूनि उखळीं सुखें खावीं॥ ३०॥ जरी उखळ न मिळे वनीं। तरी खावीं दगडें ठेंचुनी। नाहीं चाड गोडपणीं। क्षुधानिवारणीं आहारार्थ॥ ३१॥
स्वयं सञ्चिनुयात्सर्वमात्मनो वृत्तिकारणम्।
देशकालबलाभिज्ञो नाददीतान्यदाऽऽहृतम्॥ ६॥
ऋतुकाळीं फळें संपूर्णें। तीं कालांतराकारणें। संग्रहो सर्वथा न करणें। व्रतधारणेंवनस्था॥ ३२॥ पूर्वदिवसीं फळें आणिलीं। अपरदिवसीं जरी उरलीं। ती अवश्य पाहिजे त्यागिलीं। नाहीं बोलिलीं आहारार्थ॥ ३३॥ प्रत्यहीं आहारार्थ जाण। फळें आणावीं नूतन। जीर्ण फळांचें भक्षण। निषिद्ध जाण वानप्रस्था॥ ३४॥ आणिकें फळें जीं आणिलीं। तीं अंगीकारा निषिद्ध झालीं। जीं स्वकष्टें अर्जिलीं। तींचि वहिले आहारार्थ॥ ३५॥ देश काळ वर्तमान। इत्थंभूत कळलें ज्ञान। तरी संग्रह न करावा जाण। अदृष्टधारण निर्धारें॥ ३६॥ पराचा प्रतिग्रहो पूर्ण। सर्वथा न करावा आपण। प्रतिग्रह घेतां जाण। व्रतखंडन वानप्रस्था॥ ३७॥
वन्यैश्चरुपुरोडाशैर्निर्वपेत्कालचोदितान्।
न तु श्रौतेन पशुना मां यजेत वनाश्रमी॥ ७॥
जो वानप्रस्थ स्त्रीसमवेत। त्यासी अग्निहोत्र झालें प्राप्त। तेव्हां कर्म जें वेदोक्त। तें करावेंसमस्त वनवासीं॥ ३८॥ वनीं जीं फळें ज्या ऋतूस। तोचि कल्पावा चरुपुरोडाश। तेणें यजावा मी यज्ञपुरुष। सावकाश मंत्रोक्त॥ ३९॥ यापरी श्रौतकर्मविधान। यागार्थ पशुहनन। तें वानप्रस्थासी नाहीं जाण। वनफळीं यजन यागाचें॥ ४०॥
अग्निहोत्रं च दर्शश्च पूर्णमासश्च पूर्ववत्।
चातुर्मास्यानि च मुनेराम्नातानि च नैगमै:॥ ८॥
पूर्वीं अग्निहोत्रकर्में जैसीं। गृहीं होतीं गृहस्थासी। तींचि चालवावीं वनवासीं। वेदाज्ञेसीं वनस्थें॥ ४१॥ आम्नायें आगमनिगमांसी। जाणोनि करावें यागासी। दर्शपौर्णमासचातुर्मास्यांसी। निष्कामतेसी वेदाज्ञा॥ ४२॥ ऐसा मुनीश्वर वनवासी। तपस्वी तेजोराशी। त्याचिये फळप्राप्तीसी। स्वयें हृषीकेशी सांगत॥ ४३॥
एवं चीर्णेन तपसा मुनिर्धमनिसन्तत:।
मां तपोमयमाराध्य ऋषिलोकादुपैति माम्॥ ९॥
ऐसें वेदोक्त तप साचार। आस्तिक्यभावें अत्यादर। साक्षेपें करितां निरंतर। अस्थिमात्र देह उरे॥ ४४॥ शुष्कशरीरपांजरा। त्वचेनें झांकिलिया शिरा। परी सामर्थ्यें अति खरा। न सरे माघारा तपोनिष्ठें॥ ४५॥ ऐसें यावज्जन्म करितां तप। तो सबाह्य झाला निष्पाप। लाहोनि ज्ञान सद्रूप। माझें निजस्वरूप तो पावे॥ ४६॥ अवशेष वासना असतां। सूक्ष्मरूप प्रतिबद्धकता। तपाभिमानें तत्त्वतां। देहअहंता अणुमात्र॥ ४७॥ परी फळाशा पोटीं नाहीं। ऐसेनि निमाला जो देही। तो पावोनि ऋषिलोकाच्या ठायीं। तेथोनि पाहीं मज पावे॥ ४८॥ जो ऋषिलोकातें पावला। तो क्रमें मुक्तीच्या मार्गा आला। तेथूनि क्रमेंचि मज पावला। यापरी उद्धरला वनस्थ॥ ४९॥
यस्त्वेतत् कृच्छ्रतश्चीर्णं तपो नि:श्रेयसं महत्।
कामायाल्पीयसे युञ्ज्याद्बालिश: कोऽपरस्तत:॥ १०॥
एवं वानप्रस्थ अतिकष्टीं। तपादिसाधनसंकटीं। भोगफळाशेच्या तुटीं। मोक्षपरिपाटी पावले॥ ५०॥ जें हाता आलें मोक्षफळ। आविरिंच्यादि मंगळ। तें तपादिसाधन निर्मळ। कामार्थ केवळ कल्पिती॥ ५१॥ जेवीं कां चिंतामणीचियेसाठीं। मागे चातीलागीं खापरखुंटी। कां परीस देवोनि पालटीं। काळी गोमटी वीट मागे॥ ५२॥ तेवीं मनुष्यपणाचिये स्थितीं। उत्तम जन्मेंतप:प्राप्ती। ते तप:क्रिया व्यर्थ करिती। काम वांछिती ते मूर्ख॥ ५३॥ त्या मूर्खांचें मूर्खपण। किती सांगावें गा गहन। मोक्षप्राप्तीचें साधन। कामलिप्सा जाण नाशिलें॥ ५४॥ असो हें मूर्खाचें कथन। वानप्रस्थाचेंचि लक्षण। पुढील सांगेन संपूर्ण। शास्त्रार्थ जाण सुनिश्चित॥ ५५॥ जो वानप्रस्थ आपण। तपादि साधनीं अतिक्षीण। झाला तरी वैराग्यज्ञान। ज्यासी जाण नुपजेचि॥ ५६॥ पन्नास वर्षें गार्हस्थ्य। दोनी द्वादशें वानप्रस्थ। झाला तरी जो अप्राप्त। वैराग्ययुक्त निजज्ञाना॥ ५७॥ आयुष्याचे तीन भागवरी। वेंचलें गा ऐशापरी। आतां चतुर्थ भाग उरल्यावरी। क्षीण शरीरीं जर्जर॥ ५८॥ ऐसें शरीर झालिया क्षीण। अल्पही वैराग्य झाल्या जाण। करावें संन्यासग्रहण। कर्माचरण यथाशक्ती॥ ५९॥ वानप्रस्थाश्रमी झाल्याही। नि:शेष वैराग्य अल्पही। सर्वथा नुपजे ज्याच्या ठायीं। त्याचा अधिकार पाहीं हरि बोले॥ ६०॥
यदासौ नियमेऽकल्पो जरया जातवेपथु:।
आत्मन्यग्नीन् समारोप्य मच्चित्तोऽग्निं समाविशेत्॥ ११॥
सर्वथा वैराग्य नुठी देहीं। जरा आदळली ठायींचे ठायीं। स्वधर्माचरणीं शक्ति नाहीं। कंप पाहीं सर्वांगीं॥ ६१॥ ऐसा वानप्रस्थवनवासी। आत्मसमारोप करूनि अग्नीसी। मातें दृढ ध्याऊनि मानसीं। अग्निप्रवेशीं रिघावें॥ ६२॥ वानप्रस्थाश्रमीं वनस्थ। अतिशयें झाला जो विरक्त। त्याची उत्तरविधि समस्त। स्वयें भगवंत सांगतसे॥ ६३॥
यदा कर्मविपाकेषु लोकेषु निरयात्मसु।
विरागो जायते सम्यङ् न्यस्ताग्नि: प्रव्रजेत्तत:॥ १२॥
वानप्रस्थीं अनुष्ठान। तेणें वैराग्य अतिगहन। इंद्रचंद्रादिब्रह्मसदन। निरयासमान जो मानी॥ ६४॥ ऐसा दृढ वैराग्यउठावा। तेणें विहिताग्नि बोळवावा। त्याग करूनि आघवा। अंगीकारावा संन्यास॥ ६५॥ ते संन्यासग्रहणस्थिती। यथाशास्त्र यथापद्धती। स्वयें सांगताहे श्रीपती। यथानिगुती विहितार्थे॥ ६६॥
इष्ट्वा यथोपदेशं मां दत्त्वा सर्वस्वमृत्विजे।
अग्नीन्स्वप्राण आवेश्य निरपेक्ष: परिव्रजेत्॥ १३॥
अष्ट श्राद्धादि विधान। प्राजापत्यनामेष्टिसाधन। मज भगवंतातें यजून। सर्वस्वदान ऋत्विजां॥ ६७॥ मुख्यत्वें मूर्त जो अग्नी। तो निजहृदयीं संस्थापूनी। आशा नि:शेष छेदूनी। संन्यास करूनी निरपेक्ष॥ ६८॥ संन्यास करिते ठायीं। विघ्नें अपार उठतीं पाहीं। तीं रगडूनियां पायीं। संन्यास तिंहीं करावा॥ ६९॥
विप्रस्य वै संन्यसतो देवा दारादिरूपिण:।
विघ्नान्कुर्वन्त्ययं ह्यस्मानाक्रम्य समियात्परम्॥ १४॥
संन्यास करिता जो ब्राह्मण। त्यासी समस्त देव मिळोन। नाना स्त्रियादि रूपें जाण। अनंत विघ्नें करूं येती॥ ७०॥ विघ्न करावया कारण। मनुष्य देवांचा पशु जाण। सदा अर्पी बळिदान। देवाअधीन हा सर्वदा॥ ७१॥ तो बळी नेदी येथूनि आतां। पाय देऊनि आमुचे माथां। घेऊं पाहे ब्राह्मसायुज्यता। यालागीं सर्वथा विघ्नें करिती॥ ७२॥ तेथ वैराग्यबळें तत्त्वतां। विघ्नें हाणूनियां लातां। अवगणूनि देवां समस्तां। संन्यास सर्वथा करावा॥ ७३॥ ऐसा वैराग्यें उद्भट। विवेकज्ञानें अतिश्रेष्ठ। संन्यासग्रहण वरिष्ठ। विधिनिष्ठ विभागें॥ ७४॥ एवं झाल्या संन्यासग्रहण। त्याचें विधीचें विधिविधान। स्वयें सांगताहे नारायण। स्वधर्मलक्षण संन्यासिया॥ ७५॥
बिभृयाच्चेन्मुनिर्वास: कौपीनाच्छादनं परम्।
त्यक्तं न दण्डपात्राभ्यामन्यत्किञ्चिदनापदि॥ १५॥
भूतां अभयदानपुरस्कर। संकल्पपूर्वक प्रेषोच्चार। तैं उरलें दिसे देहमात्र। सर्वस्व येर त्यागिलें॥ ७६॥ जो गुरुवाक्यश्रवणासरिसा। वस्तूचि होऊनि ठेला आपैसा। उडाला देहबुद्धीचा वळसा। तुटला फांसा कर्माचा॥ ७७॥ त्यासी विधिविधानकर्तव्यता। बोलोंचि नये गा सर्वथा। नवनीत आलिया हाता। रितें ताक आतां कोण घुसळी॥ ७८॥ कापूर मिळालिया वन्हीं।
तो परतेना कापूरपणीं। तेवीं वस्तु झाला जो गुरुश्रवणीं। तो विधिकिंकरपणीं वर्तेना॥ ७९॥ परी गुरुवाक्यें तत्त्वतां। ज्यासी ऐसी हे अवस्था। सत्य न बाणेचि सर्वथा। त्याची विधानता अवधारीं॥ ८०॥ गुरुवाक्याचें करितां मनन। नागवेपणीं लाजे मन। तरी लिंगमात्र आच्छादन। कौपीन जाण धरावी॥ ८१॥ इतुकेन निर्वाह न सरे। ऐसें जाणवलें जैं पुरें। तैं वस्त्रखंड दुसरें। स्वाधिकारें धरावें॥ ८२॥ दंड कमंडलु जंव आहे। तंव कौपीन बहिर्वास राहे। दंडत्यागासवें पाहें। त्याग होये वस्त्रांचा॥ ८३॥ आपत्तिकाळीं संन्याशासी। रोग लागला होय ज्यासी। का जरेनें व्यापिलें देहासी। तैं जें लागेल त्यासी तें द्यावें॥ ८४॥ गुरुवाक्यें श्रवण मनन। ऐसें साधी जो साधन। त्या साधकाचें लक्षण। स्वयें श्रीकृष्ण सांगत॥ ८५॥
दृष्टिपूतं न्यसेत्पादं वस्त्रपूतं पिबेज्जलम्।
सत्यपूतां वदेद्वाचं मन:पूतं समाचरेत्॥ १६॥
दृष्टि ठायीं ठेवूनि जाण। पृथ्वी पाहूनि पावन। हंसगतीं करी गमन। अनुसंधान निजवृत्तीं॥ ८६॥ जेथ जीवसंपदा दृष्टीं पडे। तैं प्राण गेल्या न चले पुढें। जीवांतें काढूनि कडे। पाऊल पडे अतिशुद्ध॥ ८७॥ आधींच पवित्र गंगाजळ। त्याचा निर्मळ वस्त्रें निरसोनि मळ। यापरी करोनियां निर्मळ। गंगाजळसेविती॥ ८८॥ ज्याचे वाचेचे आळां। असत्याच्या तृणशाळा। जाळूनि वैराग्यज्वाळा। सत्याचा उगवला कल्पद्रुम॥ ८९॥ ज्या कल्पद्रुमाचीं वचनफळें। परिपक्वे आणि सोज्वळें। मधुर रसेंसीं रसाळें। अतिनिर्मळें घमघमितें॥ ९०॥ जें श्रवणीं अतिगोड। पुरवी श्रोतयांचें कोड। निववी जीवाची चाड। सत्य सुरवाड हा वाचेचा॥ ९१॥ सहजें संन्याशाचें ध्यान। ‘अहमेव नारायण’। तें दृढ धरोनि अनुसंधान। पवित्र मन करावें॥ ९२॥ मन करोनि पावन। पृथ्वी विचरावी जाण। त्या मनाचें पवित्रपण। सर्वत्र आपण लक्षावें॥ ९३॥ संन्याशाचे धर्मीं जाण। मुख्यत्वें हेंचि लक्षण। पवित्र करोनि अंत:करण। सर्वत्रनारायण लक्षावा॥ ९४॥ मनाचें पवित्रपण। उद्धवा या नांव जाण। आतां त्रिदंडाचें लक्षण। संन्यासनिरूपण तें ऐक॥ ९५॥
मौनानीहानिलायामा दण्डा वाग्देहचेतसाम्।
न ह्येते यस्य सन्त्यङ्ग वेणुभिर्न भवेद्यति:॥ १७॥
मौन अथवा सत्य भाषण। कां श्रीरामनामाचें स्मरण। हो कां ओंकाराचें उच्चारण। ‘वाग्दंड’ जाण या नांव॥ ९६॥ शरीरींचे जितुकें चळण। तें प्राणाचेनि बळें जाण। त्या प्राणाचें प्राणरोधन। करावें आपण प्राणायामें॥ ९७॥ प्राणायामें निजप्राण। जिणोनि करावा स्वाधीन। या नांव ‘देहदंड’ जाण। ऐक लक्षण ‘मनोदंडाचें’॥ ९८॥ मनाचें चपळपण। संकल्प विकल्प जाण। त्याचें करावया छेदन। ब्रह्मानुसंधान करावें॥ ९९॥ माझें स्वरूप सर्वगत। तेथ निश्चयें ठेवितां चित्त। मन संकल्पविकल्पें जाय जेथ। तेथ तेथ स्वरूप॥ १००॥ ऐसें सावध राखतां मन। दृढ लागल्या अनुसंधान। तंव संकल्पविकल्प क्षीण। सहजचि जाण स्वयें होती॥ १॥ देह वाचा आणि मन। या त्रिदंडांचें लक्षण। तुज म्यां सांगितलें संपूर्ण। संन्यासत्व जाण येणें सत्य॥ २॥ हे तिन्ही दंड नसतां जाण। केवळ वेणु दंड ग्रहण। तेणें संन्यासत्व न घडे जाण। देहविटंबन दंभार्थ॥ ३॥ सन्याशाचा आहार विहार। आचार संचार विचार। स्वधर्मयुक्त साचार। स्वयें सारंगधर सांगतु॥ ४॥
भिक्षां चतुर्षु वर्णेषु विगर्ह्यान् वर्जयंश्चरेत्।
सप्तागारानसंक्लृप्तांस्तुष्येल्लब्धेन तावता॥ १८॥
पूर्वीं जाण संन्याशासी। चतुर्वर्णीं भिक्षा होती त्यासी। कलियुगीं गोष्टी झाली कैसी। ब्राह्मणापाशीं चतुर्वर्ण॥ ५॥ ज्याची जीविका जेणें जाण। त्या ब्राह्मणाचा तोचि वर्ण। ऐका तेंही प्रकरण। जीविकालक्षण सांगेन॥ ६॥ ‘मुख्य ब्राह्मणाची वृत्ति’ जाण। ‘शिल’ ‘उंछ’ का ‘कोरान्न’। अयाचित का अध्यापन। अथवा याजन जीविकेसी॥ ७॥ जो जीविकेलागीं निर्धारीं। शस्त्र घेऊनियां करीं। शूरवृत्तीं जीविका करी। तो जाणावा ‘क्षत्री’ ब्राह्मणांमाजीं॥ ८॥ जो वाणिज्यवृत्तीवरी। नित्य जीविका आपुली करी। तो ब्राह्मण ब्राह्मणामाझारीं। ‘वैश्य’ निर्धारीं निश्चित॥ ९॥ जो शूद्राचे शूद्रक्रियेवरी। सदा सर्वदा जीविका करी। तो ब्राह्मण शूद्रकर्मेंकरीं। ‘शूद्रत्व’ धरी क्रियायोगें॥ ११०॥ जैं उत्तम ब्राह्मणाची भिक्षा न लभे। तैं क्षत्रियब्राह्मणीं भिक्षा लाभे। क्षात्रब्राह्मणांचेनि अलाभें। वैश्यादि ब्राह्मणीं लाभे भिक्षाग्रहण॥ ११॥ ब्राह्मण-क्षत्रिय-वैश्यब्राह्मणीं। भिक्षेस अप्राप्त हे तिनी। तैं शूद्रजीविका-ब्राह्मणीं। भिक्षाग्रहणीं अधिकारु॥ १२॥ यांत निंद्य जे ब्राह्मणाआंतु। केवळ दोषी अथवा अभिशप्तु। ते भिक्षेसी न लावावा हातु। हास्वधर्मार्थु भिक्षेचा॥ १३॥ तेही भिक्षा अतिनेमस्त। भिक्षेसी येतों हें कळों नेदित। मागावीं नेमिलीं घरें सात। जें झालें प्राप्त तेणें सुखी॥ १४॥ जे सातां घरीं भिक्षा प्राप्त। ते भिक्षेचा धर्म विहित। स्वयें सांगे श्रीकृष्णनाथ। स्मृतिशास्त्रार्थप्रयोगें॥ १५॥
बहिर्जलाशयं गत्वा तत्रोपस्पृश्य वाग्यत:।
विभज्य पावितं शेषं भुञ्जीताशेषमाहृतम्॥ १९॥
ग्रामाबाहेर गंगातीरीं। अथवा तडागाचे परिसरीं। भिक्षा धरोनियां करीं। आचमन तीरीं करावें॥ १६॥ याचित जें भिक्षेचें अन्न। तें द्वादशप्रणवें अभिमंत्रून। तेणें मंत्रोदकें प्रोक्षितां जाण। होय पावन पवित्र॥ १७॥ चतुर्धा करावें त्या अन्नातें। चार अधिकारी त्या भागातें। ब्रह्मा विष्णुअर्क आणि भूतें। अर्पण तेथें अवधारीं॥ १८॥ विष्णुकल्पित जो भाग। तो जळीं घालावा साङ्ग। भूतकल्पित जो विभाग। तो पृथ्वीवरी चांग ठेवावा॥ १९॥ उरले जे विभाग दोनी। यतीसी अधिकार सेवनीं। दीन मागों आलिया ते क्षणीं। भूतदयागुणीं अन्न द्यावें॥ १२०॥ परी मी एक अन्नदाता। हें आठवोंही नये चित्ता। आल्या दातेपणाची अहंता। अधर्मता संन्यासीं॥ २१॥ मधुकरीचें अवघेंचि अन्न। समयीं मागों येती दीन। येणें उद्देशें अधिक अन्न। सर्वथा जाण मागों नये॥ २२॥ करितां मधुकरीभोजन। ठायीं अधिक उरलिया अन्न। तें सांडितां अतिपतन। अवघेंच जाण भक्षावें॥ २३॥ संन्यासधर्मीं लघु आहार। नित्य करावा निरंतर। अधिक आहारीं विकार। निद्रा आळस फार बाधिती॥ २४॥ ज्यालागीं कीजे चतुर्थाश्रम। तो संन्याशाचा मुख्य धर्म। स्वयें सांगे पुरुषोत्तम। जेणें आत्माराम पाविजे॥ २५॥
एकश्चरेन्महीमेतां नि:सङ्ग: संयतेन्द्रिय:।
आत्मक्रीड आत्मरत आत्मवान् समदर्शन:॥ २०॥
सदा वैराग्य अंगीं पुरतें। जो अपेक्षीना सांगात्यातें। नि:संग होत्साता चित्तें। सुखें पृथ्वीतें विचरतु॥ २६॥ इंद्रियें बांधोनि चित्ताच्या पायीं। चित्त लावी चैतन्याच्या ठायीं। तेणें चिन्मात्र ठसावें पाहीं। देहत्व देहीं स्मरेना॥ २७॥ ऐसा आत्मस्थितीचा उद्यम। तेणें आत्मक्रीडेचा आराम। आत्मसुखाचा संभ्रम। अनुभव परम तो ऐक॥ २८॥ आत्मस्थिति निजात्मयुक्त। तेणें आत्मसुखें उल्हासत। सदा समदर्शनें डुल्लत। वोसंडत समसाम्यें॥ २९॥ ऐशिया समसुखाची संपत्ती। भोगावया सुनिश्चितीं। सदा एकाकी वसे एकांतीं। तेंचि श्रीपती सांगत॥ १३०॥
विविक्तक्षेमशरणो मद्भावविमलाशय:।
आत्मानं चिन्तयेदेकमभेदेन मया मुनि:॥ २१॥
पवित्र आणि विजन। प्रशस्त आणि एकांतस्थान। तेणें माझें अनुसंधान। सद्भावें जाणसर्वदा॥ ३१॥ तेथें सांडून जनपद दुश्चित। सदा एकांतीं व्हावें निरत। मद्भावें सुनिश्चित। आत्मसुख प्राप्त साधकां॥ ३२॥ ज्यासी निजात्मसुख झालें प्राप्त। तो होय अनन्यशरणागत। मीवांचूनि जगाआंत। आणिक अर्थ देखेना॥ ३३॥ ऐसे अनन्य करितां माझें ध्यान। साधक विसरे मीतूंपण। तेव्हां अभेदें चैतन्यघन। मद्रूप जाण तो होय॥ ३४॥ त्या मद्रूपाचे स्वरूपस्थिती। पाहों जातां निजात्मवृत्ती। मी ना तो ऐशी होय गती। ‘अभेदप्राप्ती’ या नांव॥ ३५॥ जंव असे द्वैतवार्ता। तंव भयाची बाधकता। अभेदत्व आल्या हाता। निर्भयता साधकां॥ ३६॥ अभेदप्राप्तीच्या ठायीं। बंधमोक्षांची वार्ता नाहीं। गडगर्जें बंधमोक्ष पाहीं। नांदती नवायी हरि बोले॥ ३७॥
अन्वीक्षेतात्मनो बन्धं मोक्षं च ज्ञाननिष्ठया।
बन्ध इन्द्रियविक्षेपो मोक्ष एषां च संयम:॥ २२॥
ऐक्यें पावोनि एकात्मता। तेथूनि बंधमोक्ष पाहतां। दोंहीची मिथ्या वार्ता। मायिकता निश्चित॥ ३८॥ प्रवृत्तीमाजीं बंधमोक्षता। त्या दोंहीची विभागता। इंद्रियांची जे विषयासक्तता। ‘दृढबद्धता’ ती नांव॥ ३९॥ काया-वाचा-चित्तवृत्तीं। नि:शेष विषयांची विरक्ती। या नांव साचार ‘मुक्ती’। जाण निश्चितीं उद्धवा॥ १४०॥ ज्यासी साचार पाहिजे मुक्ती। तेणें करावी विषयनिवृत्ती। हेचि मुख्यत्वें उपायस्थिती। कृष्ण कृपामूर्ती सांगत॥ ४१॥
तस्मान्नियम्य षड्वर्गं मद्भावेन चरेन्मुनि:।
विरक्त: क्षुल्लकामेभ्यो लब्ध्वाऽऽत्मनि सुखं महत्॥ २३॥
येणें विचारें विचारिता। विषयासक्ती दृढबद्धता। त्या विषयांचा त्याग करितां। निजमुक्तता सहजेंचि॥ ४२॥ तेचि विषयांची विरक्ती। केवीं आतुडे आपुल्या हातीं। यालागीं वैराग्याचीउत्पत्ती। साधकें निश्चितीं साधावी॥ ४३॥ अंतरीं वासना दृढमूळ। विषयशाखा तेणें सबळ। ते वासना छेदावया समूळ। वैराग्य सबळ साधावें॥ ४४॥ वैराग्यप्राप्तीचें कारण। स्वधर्मकर्ममदर्पण। सांडावें कर्माचें कर्तेपण। ‘मदर्पण’ या नांव॥ ४५॥ मदर्पणें कर्मस्थिती। तेणें माझ्याठायीं उपजे प्रीती। माझें नाम माझी कीर्ती। चिंतन चित्तीं पैं माझें॥ ४६॥ ऐशिया माझ्या परम प्रीतीं। होय वैराग्याची उत्पत्ती। तेणें विषयांची विरक्ती। माझी सुखप्राप्ती शनै:शनै:॥ ४७॥ माझेनि सुखें माझें भजन। अत्यंत थोरावे पैं जाण। तेव्हां सर्वत्र मद्भावन। ब्रह्मत्वें पूर्ण ठसावे॥ ४८॥ सर्वत्र ब्रह्मभावन। ब्रह्मसुखाचें अनुसंधान। धरूनि करावें पर्यटण। जंव निर्वासनमन होय॥ ४९॥
पुरग्रामव्रजान् सार्थान् भिक्षार्थं प्रविशंश्चरेत्।
पुण्यदेशसरिच्छैलवनाश्रमवतीं महीम्॥ २४॥
पृथ्वी विचरणें विचित्र। पुण्यदेश कुरुक्षेत्र। सप्त पुऱ्या परम पवित्र पुष्करादि थोर महातीर्थें॥ १५०॥ कृतमाला पयस्विनी। पुण्यरूप ताम्रपर्णी। गौतमी रेवा त्रिवेणी। परमपावनी गोमती॥ ५१॥ कृष्णा वेण्या तुंगभद्रा। तपती पयोष्णी भिंवरा। यमुना भागीरथी नीरा। गंगा सागरासंगमीं॥ ५२॥ ऋष्यमूक श्रीशैल व्यंकटाद्री। मूळपीठींचा सह्याद्री। गौतमीतीरींचा ब्रह्मगिरी। जो पापें संहारी यात्रामात्रें॥ ५३॥ हो कां चढता हिमगिरी। पदीं दुरितांतें दूर करी। नि:शेष पापांतें निवारी। ते यात्रा मुनीश्वरीं अवश्य कीजे॥ ५४॥ दंडकारण्य बृहद्वन। नैमिषारण्य आनंदवन। इत्यादि वनांचें गमन। संन्याशीं जाण करावें॥ ५५॥ च्यवनकपिलव्यासाश्रम। गौतमवामनआश्रमोत्तम। यात्रा श्रेष्ठ बदरिकाश्रम। जो सकळ कर्मदाहकु॥ ५६॥ ऐशीं स्थळें जीं पावन। तेथें संन्याशियें करावें गमन। मार्गीं भिक्षार्थ जें अटन। तेंही निरूपण अवधारीं॥ ५७॥ हाट हाटवटिया अति उत्तम। त्यातें ‘पुर’ म्हणती नरोत्तम। हाटहाटवटियाहीन तो ‘ग्राम’। भिक्षेचा नेम सारावा तेथें॥ ५८॥ गायीगौळियांचें निवासस्थान। ‘व्रत’ त्यातें म्हणती जाण। ‘सार्थ’ म्हणिजे पव्हा संपूर्ण। भिक्षार्थ अटन करावें तेथें॥ ५९॥ पवित्र भिक्षेचे प्राप्तीकारणें। संन्यासीं अवश्य जाणें। तेचि अर्थींचें निरूपणें। स्वयें श्रीकृष्णें सांगिजे॥ १६०॥
वानप्रस्थाश्रमपदेष्वभीक्ष्णं भैक्ष्यमाचरेत्।
संसिध्यत्याश्वसंमोह: शुद्धसत्त्व: शिलान्धसा॥ २५॥
शुद्ध व्हावया अंतर। वानप्रस्थाश्रमी जो नर। जाऊनि ठाकावें त्याचें द्वार। अतिसादर भिक्षार्थ॥ ६१॥ सेवितां सात्त्विकाचे अन्नासी। शुद्धसत्त्वता साधकासी। तत्काळ होय ग्रासोग्रासीं। शुद्ध अन्नासी हा महिमा॥ ६२॥ यालागीं वानप्रस्थाचें द्वार। ठाकोनि जावें वारंवार। तेणें सत्त्वशुद्धि अनिवार। होय साचार साधकां॥ ६३॥ शुद्ध भिक्षेचिये प्राप्ती। सत्त्वशुद्ध होय वृत्ती। तेणें वासना नि:शेष नासती। निजशांती उल्हासे॥ ६४॥ वासना नासल्या निलाग। तो सत्यत्वें न देखे जग। विषयासक्ति कैंची मग। सहज विराग उद्भट॥ ६५॥
नैतद्वस्तुतया पश्येद् दृश्यमानं विनश्यति।
असक्तचित्तो विरमेदिहामुत्र चिकीर्षितात्॥ २६॥
येथ जें जें दिसे तें तें नासे। हें सर्वांसी प्रत्यक्ष आभासे। परी अज्ञानें भुलले कैसे। विषयविलासें गुंतोनी॥ ६६॥ यालागीं शुद्ध भिक्षेचिये प्राप्ती। ज्याची शुद्धसत्त्व झाली वृत्ती। त्यासी विषयसत्यत्वें न दिसती। मा विषयासक्ती तेथें कैंची॥ ६७॥ ऐसें मिथ्या विषयांचें भान। त्याचें विषयासक्त नव्हे मन। यालागीं भवस्वर्गसाधन। दोन्ही तो जाण स्पर्शेना॥ ६८॥ ऐसा जो विषयविरक्त। त्याचें परमार्थीं लागे चित्त। तो जगीं विचरे अनासक्त। परमार्थयुक्त निजबोधें॥ ६९॥ त्याच्या निजबोधाचें लक्षण। स्वयें सांगताहे नारायण। प्रपंचाचें मिथ्यापण। समाधान निजात्मता॥ १७०॥
यदेतदात्मनि जगन्मनोवाक्प्राणसंहतम्।
सर्वं मायेति तर्केण स्वस्थस्त्यक्त्वा न तत्स्मरेत्॥ २७॥
मनसा-वाचा-प्राणप्रवाहीं। अहंकारकृत उभय देहीं। जग आत्म्याच्या ठायीं। मिथ्या मायिक पाहीं आभासे॥ ७१॥ दोराअंगीं सर्पाभास। शुक्तिकेमाजीं रजतप्रकाश। उखरीं मृगजळाचाविलास। तैसा जगदाभास चिन्मात्रीं॥ ७२॥ जैसा स्वप्नींचा व्यवहार। तैसें भासे चराचर। ऐसें मिथ्या जाणोनि साचार। पुढती स्मरणादर स्फुरेना॥ ७३॥ जो जागा झाला इत्थंभूत। तैं स्वप्नभोग न वांछी चित्त। तेवीं स्वरूपीं जो सुनिश्चित। तो प्रपंचजात स्मरेना॥ ७४॥ त्रिदंडी बहूदकाचें कर्म। तुज म्यां सांगितलें सुगम। आतां हंस परमहंसांचे धर्म। यथानुक्रम अवधारीं॥ ७५॥ संन्यास चतुर्विध देख। ‘हंस’ ‘परमहंस’ एक। एक तो ‘बहूदक’। ‘कुटीचक’ तो भिन्न॥ ७६॥ कर्म त्यागोनि झाला संन्यासी। ज्ञान ध्यान नाहीं मानसीं। अन्नालागीं स्वग्रामवासी। ‘कुटीचक’ तयासी बोलिजे॥ ७७॥ वार्धकीं कुटीचकाची परी। अग्निहोत्र-स्त्रियेचा त्याग करी। परी शिखासूत्र न अव्हेरी। गायत्रीमंत्रीं अधिकारु॥ ७८॥ नित्य भिक्षा पुत्राचे घरीं। पर्णकुटी बांधे त्याचे द्वारीं। मठिका सांडोनि न वचे दूरी। ‘कुटीचक’ निर्धारीं या नांव॥ ७९॥ शिखासूत्र त्यागोनि जाण। करूनि त्रिदंडांचें ग्रहण। केवळ करी कर्माचरण। ज्ञानाचें लक्षण जाणेना॥ १८०॥ नाहीं वैराग्य वरिष्ठ। न दिसे ज्ञाननिष्ठा श्रेष्ठ। अतिशयेंसीं जो कर्मिष्ठ। ‘बहूदक’ ज्येष्ठ त्यासी म्हणती॥ ८१॥ जो कां वैराग्याच्या निर्धारीं। ज्ञानसाधनार्थ विचारी। शिखासूत्रकर्मत्याग करी। आत्मचिंतनावरी निजनिष्ठा॥ ८२॥ ऐसा जो त्यागविलास। या नांव ‘विविदिषा’ संन्यास। ऐशिया निष्ठें वर्ते तो ‘हंस’। एक ‘परमहंस’ हा म्हणती॥ ८३॥ ऐक परमहंसाचें लक्षण। ज्ञानपरिपाकें परिपूर्ण। अतएव शांति वोळंगे आंगण। देखे तिन्ही गुण मिथ्यात्वें॥ ८४॥ मिथ्या जाणे कर्माची वार्ता। आपुली देखे नित्य निष्कर्मता। कर्मक्रिया जे कर्तव्यता। ते प्रकृतीचे माथां प्रारब्धें॥ ८५॥ ऐशिया स्थितीं सावकाश। त्या नांवजाण ‘परमहंस’। नाहीं मठ मठिका विलास। नित्य उदास निराश्रयी॥ ८६॥ आतां हंस-परमहंसांचे धर्म। स्वयें सांगताहे पुरुषोत्तम। त्या धर्माचें विशद वर्म। ऐक सुगम उद्धवा॥ ८७॥
ज्ञाननिष्ठो विरक्तो वा मद्भक्तो वानपेक्षक:।
सलिङ्गानाश्रमांस्त्यक्त्वा चरेदविधिगोचर:॥ २८॥
विषयांची नावडे मातु। ज्ञानप्राप्तीलागीं उद्यतु। यापरी जो अतिविरक्तु। तो संन्यास बोलिजेतु मुख्यत्वें॥ ८८॥ जो ज्ञाननिष्ठा अतिसंपन्न। सदा स्वरूपीं रंगलें मन। कदा न मोडे अनुसंधान। परमहंसासमान हा हंस॥ ८९॥ ज्यासी करितां भगवद्भक्ती। अपेक्षामात्राची झाली शांती। मोक्षापेक्षा नुपजे चित्तीं। हे संन्यासपद्धती अतिश्रेष्ठ॥ १९०॥ ज्ञाननिष्ठ कां मद्भक्त। इहीं आश्रमधर्म दंडादियुक्त। त्याग करावा हृदयीं समस्त। बाह्य लोकरक्षणार्थ राखावे॥ ९१॥ येचि अर्थींचें निरूपण। पुढें सांगेल श्रीकृष्ण। प्रस्तुत त्यागाचें लक्षण। ऐक संपूर्ण हरि बोले॥ ९२॥ आश्रमधर्म समस्त करी। परी विधिकिंकरत्व तो न धरी। प्रतिबिंब कांपतां जळांतरीं। आपण बाहेरी कांपेना॥ ९३॥ तेवीं स्वधर्मकर्म कर्तव्यता। करी परी नाहीं कर्मठता। आपुली कर्मातीतता। जाणे तत्त्वतां निजकर्मी॥ ९४॥ यापरी स्वधर्मकर्म करी। परी विधीचें भय तो न धरी। विधिनिषेध घालून तोडरीं। कर्में करी अहेतुक॥ ९५॥ जो नातळे स्वाश्रमकर्मगती। दंडादि लिंग न धरी हातीं। ऐसिया सर्वत्यागाचीस्थिती। पुढें श्रीपती सांगेल॥ ९६॥ प्रस्तुत हेंचि निरूपण। लोकरक्षणार्थ लिंगधारण। अंतरीं जो निष्कर्म जाण। त्याचें लक्षण हरि बोले॥ ९७॥
बुधो बालकवत् क्रीडेत् कुशलो जडवच्चरेत्।
वदेदुन्मत्तवद्विद्वान् गोचर्यां नैगमश्चरेत्॥ २९॥
विवेकज्ञान शुद्ध आहे। परी बाळकाच्या परी पाहे। मानापमान सुखें साहे। सांडोनि सोये देहाभिमानाची॥ ९८॥ निजनैष्कर्में अतिकुशल। परी कर्मजडाऐसा केवळ। कर्में आचरे तो सकळ। कोठेंही विकळ दिसों नेदी॥ ९९॥ जाणे धर्माधर्मलक्षण। सर्वार्थीं अतिसज्ञान। परी न करी प्रश्नसमाधान। अप्रमाणिक जाण स्वयें बोले॥ २००॥ करितां प्रश्नसमाधान। लौकिकीं वाढेल सन्मान। यालागीं साक्षेपें जाण। उन्मत्त वचन स्वयें बोले॥ १॥ वेदतत्त्वार्थ विहित जाणे। तें लौकिकीं नाहीं मिरवणें। सकळिकीं मूर्खचि म्हणणें। तैशीं ‘पशु’ लक्षणें स्वयें दावी॥ २॥ यालागीं वेदवादसंवाद। न करी वाद अतिवाद। येचि अर्थीं अतिविशद। स्वयें गोविंद सांगत॥ ३॥
वेदवादरतो न स्यान्न पाषण्डी न हैतुक:।
शुष्कवादविवादे न कञ्चित्पक्षं समाश्रयेत्॥ ३०॥
धरोनियां मीमांसकमत। कर्मकांडींचे शास्त्रार्थ। नानावाद कर्मार्थ। न करी निश्चित निजबोधें॥ ४॥ तार्किकाचे अतितर्क। तर्क वितर्क कुतर्क। हेही वाद करीना देख। निजात्मसुख जो जाणे॥ ५॥ बाहेरी ब्रह्मज्ञानें गर्जे तोंड। भीतरीं विषयवासना उदंड। ऐसे महावादी प्रचंड। अतर्क्य ‘पाखंड’ त्या नाव॥ ६॥ नसोनि ब्रह्मानुभव साचार। जो उच्छेदी निजाचार। तो केवळ पाखंडी नर। उदरंभर दु:शील॥ ७॥ ऐशिया वादाचा विटाळ। ज्याचे वाचेसी नाहीं अळुमाळ। नलगे असत्याचा समूळ मळ। नित्य निर्मळ निजबोधें॥ ८॥ ‘शुष्कवाद’ ज्या वृथा गोष्टी। त्यांतही वाग्वाद उठी। होय नव्हे कपाळपिटी। मिथ्या चावटी करीना॥ ९॥ ऐशिया विवादाची कथा। दृष्टीं न पाहे निजज्ञाता। मा स्वयें करील ऐशा वार्ता। हें सर्वथा घडेना॥ २१०॥ होतां शास्त्रार्थ महावाद। देतां युक्तीचे प्रतिबाध। तेथ न करी पक्षपात शुद्ध। जाणे परी शब्द बोलेना॥ ११॥ श्रुतिस्मृतींसीं विरुद्ध। होतां देखे अतिवाद। स्वयें जाणे शास्त्रार्थ शुद्ध। परीपक्षपात करीना॥ १२॥ वाग्वादीं बोलतां जाण। दुखवेल पुढिलांचें मन। कां क्षोभेल स्वांत:करण। यालागीं वचन बोलेना॥ १३॥
नोद्विजेत जनाद्धीरो जनं चोद्वेजयेन्न तु।
अतिवादांस्तितिक्षेत नावमन्येत कञ्चन।
जनापासोनि उद्वेगगती। ज्ञाता न पवे सर्वथा चित्तीं। निंदा अवगणना अपमानिती। ते आत्मस्थितीं स्वयें साहे॥ १४॥ जन जे जे उपद्रव देती। ज्ञाता साहे ऐशिया रीतीं। मीचि आत्माएक सर्व भूतीं। यालागीं खंती मानीना॥ १५॥ आपुलिया अवयवविकारता। उद्वेग नुपजें जेवीं चित्ता। तेवीं सर्वांभूतीं एकात्मता। जाणून तत्त्वतां उबगु न मनी॥ १६॥ तैसेंचि ज्याचिया स्थितीं। भूतें उद्वेग न मानिती। ज्याचिया निजाचार गतीं। सुखी होती जीवमात्र॥ १७॥ सर्व भूतीं भगवंत आहें। झणें त्यासी उपद्रव होये। यालागीं वागवितां हातपाये। सावध राहे निजदृष्टीं॥ १८॥ थोर देतां आरोळी। झणें दचकेल वनमाळी। कां नेटें भवंडितां जपमाळी। देवाचे कपाळीं झणें लागे॥ १९॥ यालागीं करचरणांच्या चेष्टा। आवरोनियां निजात्मनिष्ठा। भूतीं लागों नेदी झटा। झणें वैकुंठा उपद्रव लागे॥ २२०॥ ऐसिऐशिया निजात्मगती। उद्वेग उपजों नेदी भूतीं। तेथ वाग्वादाची गती। कैशा रीतीं संभवे॥ २१॥ सर्वभूतीं भूतात्मा ईश्वर। यालागीं उंच न बोले उत्तर। तेथ अतिवाद्यासी समोर। सर्वथा अधर उचलीना॥ २२॥ पडल्या जीवसंकट प्राणांतीं। अपमान न करवे कोणे व्यक्ती। अपमानीना भूताकृती। सर्वांभूतीं हरि देखे॥ २३॥ जनास्तव उद्वेगता। कदाकाळीं न पवे ज्ञाता। ज्ञात्यापासोनि उद्वेगता। नव्हे सर्वथा जनासी॥ २४॥ ऐशी निजात्मस्थिती साचार। तो कोणासीं न करी वैर। येचि अर्थीं शारंगधर। विशद उत्तर सांगत॥ २५॥
देहमुद्दिश्य पशुवद् वैरं कुर्यान्न केनचित्॥ ३१॥
एक एव परो ह्यात्मा भूतेष्वात्मन्यवस्थित:।
केवळ पशूचियापरी। होऊनियां देह अहंकारी। कोणासी वैर न करी। तेही परी परियेसीं॥ २६॥ प्रकृति-पर चिदात्मा आहे। तोचि सर्वांभूतीं भूतात्मा पाहे। मजमाजींही तोचि राहे। ऐशी सर्व भूतींवाहे एकात्मता जो॥ २७॥ त्यासी कोण आप्त कोण इतर। कोणासी करावें वैर। सर्व भूतीं मीचि साचार। निरंतर निजात्मा॥ २८॥ एक आत्मा सर्व भूतांत। येचि अर्थींचा दृष्टांत। स्वयें सांगे श्रीकृष्णनाथ। श्रोता सावचित्त उद्धव॥ २९॥
यथेन्दुरुदपात्रेषु भूतान्येकात्मकानि च॥ ३२॥
अलब्ध्वा न विषीदेत काले कालेऽशनं क्वचित्।
लब्ध्वा न हृष्येद्धृतिमानुभयं दैवतंत्रितम्॥ ३३॥
सहस्र घटीं भरल्या जळ। बिंबे एकचि चंद्रमंडळ। तेवीं निजात्मा एक केवळ। भूतींसकळ भूतात्मा॥ २३०॥ देखे भूताकृति ज्या भिन्न। त्याही परमकारणीं अभिन्न। जेवीं अळंकारीं सुवर्ण। आकारींही जाण भिन्नत्व नाहीं॥ ३१॥ जेवीं मृत्तिकेचीं गोकुळें केलीं। नानाकारीं पूज्य झालीं। परी ते मृतिकाचि संचली। तेवीं भूतें भासलीं भगवंतीं॥ ३२॥ का विणोनियां सुतें सुत। शेला परकळा पातळ म्हणत। तैशी वस्तूचि वस्तुत्वें येथ। साकार भासत भवरूपें॥ ३३॥ एवं साकार निराकार। उभयतां ब्रह्मचि साचार। ऐसा ज्याचा ज्ञाननिर्धार। त्याचा ‘आहार’ तूं ऐक॥ ३४॥ आहार न मिळे जिये काळीं। दु:खी नव्हे तिये वेळीं। अन्नालागीं न तळमळी। धारणाबळीं बलिष्ठ॥ ३५॥ आहार मिळाल्या उत्तम। हरिखेजेना मनोधर्म। दैवाधीन जाणे वर्म। निजकर्मप्राप्तीसी॥ ३६॥ एवं प्राप्ताप्राप्ताची कथा। जाणे दैवाधीन तत्त्वता। यालागीं हर्षविषादता। त्याचे चित्ता स्पर्शेना॥ ३७॥ दैवाधीन प्राप्ती प्राणियांसी। ऐसें सत्य कळलें ज्यासी। तैं भिक्षेसी कां हिंडणें म्हणसी। तेंचि हृषीकेशी सांगत॥ ३८॥
आहारार्थं समीहेत युक्तं तत्प्राणधारणम्।
तत्त्वं विमृश्यते तेन तद्विज्ञाय विमुच्यते॥ ३४॥
पाळावया आश्रमधर्मासी। अवश्य हिंडावें भिक्षेसी। मधुकरी संन्याशांसी। स्वधर्मासी अतिविहित॥ ३९॥ साधकां तरी आहारार्थ। अवश्य हिंडावें लागे येथ। आहारेंवीण त्यांचें चित्त। विक्षेपभूत हों पाहे॥ २४०॥ तिंहीं रसासक्ति सांडून। भिक्षेसी करावा प्रयत्न। आहारेंवीण त्यांचें मन। अतिक्षीण सर्वार्थीं॥ ४१॥ साधकांसी आहारेंवीण। न संभवे श्रवण मनन। न करवे ध्यान चिंतन। अनुसंधान राहेना॥ ४२॥ संन्याशांसी ध्यान न घडे। तैं आश्रमधर्माचें तारूं बुडे। यालागीं भिक्षेसी रोकडें। हिंडणें घडे हितार्थ॥ ४३॥ मिळावें मिष्टान्न गोड। हे सांडूनि रसनाचाड। करावें भिक्षेचें कोड। परमार्थ दृढ साधावया॥ ४४॥ आहार घेतलिया जाण। साधकांसी घडे साधन। साधनकरितां प्रकटे ज्ञान। ज्ञानास्तव जाण निजमोक्ष लाभे॥ ४५॥ सर्वथा न वांछावें मिष्टान्न। तरी भिक्षा मागावी कोण। ऐसें कांहीं कल्पील मन। तेंचि श्रीकृष्ण सांगत॥ ४६॥
यदृच्छयोपपन्नान्नमद्याच्छ्रेष्ठमुतापरम्।
तथा वासस्तथा शय्यां प्राप्तं प्राप्तं भजेन्मुनि:॥ ३५॥
सहज भिक्षेसी आलें जाण। शुष्क अथवा मिष्टान्न। तेणें करावें प्राणधारण। रसनालालन सांडोनी॥ ४७॥ निद्रालस्याचें न ये प्रस्थान। तैसें करावें प्राणधारण। दृढ ठसावें आसनध्यान। ‘युक्ताहार’ जाण या नांव॥ ४८॥ वल्कल अथवा अजिन। नवें अथवा वस्त्र जीर्ण। सहजें प्राप्त झाल्या जाण। करी प्रावरण यथासुखें॥ ४९॥ कंथा हो कां मृदु आस्तरण। तृणशय्या कां भूमिशयन। स्वभावें प्राप्त झाल्या जाण। तेथही शयन करी मुनि॥ २५०॥ मी एक भोक्ताशयनकर्ता। हेही नाहीं त्यासी अहंता। स्नानादि कर्मीं वर्ततां। त्याची निरभिमानता हरि सांगे॥ ५१॥
शौचमाचमनं स्नानं न तु चोदनया चरेत्।
अन्यांश्च नियमाञ्ज्ञानी यथाहं लीलयेश्वर:॥ ३६॥
आचमन स्नान शौचाचार। करितां नव्हे विधिकिंकर। कर्माभिमानाची मोडली थार। जैसा मी अवतार तैसा तो॥ ५२॥ जैसा मी ‘लीलावतार’ धरीं। अलिप्तपणें कर्में करीं। तैसीचि जाण योग्याची परी। सर्व कर्माचारीं अलिप्त॥ ५३॥ ज्यासी विधींचें भय नाहीं पोटीं। तो कर्में करावया कदा नुठी। तेचि विखींची विशद गोठी। कृष्ण जगजेठी सांगत॥ ५४॥
न हि तस्य विकल्पाख्या या च मद्वीक्षया हता।
आदेहान्तात् क्वचित् ख्यातिस्तत: संपद्यते मया॥ ३७॥
कर्म करणें न करणें। ऐशिया संदेहाचें ठाणें। पळालें माझेनि दर्शनें। संकल्पाचें जिणें निमालें॥ ५५॥ संकल्पु निमतांचि पोटीं। विराली लिंगदेहाची गांठी। भेदाची हारपली त्रिपुटी। मी परमात्मा दिठीं देखतां॥ ५६॥ ज्यासी नाहीं भेदाचें भान। त्याचे देहाचें भरण पोषण। स्नान-भोजन-शयन। गमनागमन केवीं घडे॥ ५७॥ जो जिणोनियां विकल्पभ्रांती। त्रिशुद्धीं मिसळला अद्वैतीं। त्याचे देहाची स्थितिगती। प्रारब्धाहातीं निश्चित॥ ५८॥ वृक्ष समूळ उपडलिया पाहें। परी सार्द्रता वृक्षीं राहे। तांबूल खाऊनियां जाये। तरी अधरीं राहे सुरंगता॥ ५९॥ हो कां कन्यादान केल्या पाहें। वरु कन्याही घेउनि जाये। तरी उगा मान उरला राहे। रुसणें फुगणें न जाये देहांत॥ २६०॥ तैसा अभिमानाचेनि सळें। मी कर्मकर्ता म्हणवी बळें। ते अहंता निमे ज्ञानबळें। तरी शरीर चळे प्रारब्धें॥ ६१॥ कुलाल दंड भांडें घेऊनि जाये। पूर्वभवंडीं चक्र भंवत राहे। तेवीं अभिमान गेलिया पाहें। देह वर्तताहे प्रारब्धें॥ ६२॥ त्या देहाचें भरणपोषण। प्रारब्धचि करितें जाण। ज्ञात्यासी प्रपंचाचें भान। सत्यत्वें जाण असेना॥ ६३॥ जैशी मिथ्या छाया देहापाशीं। तैसें देह दिसे सज्ञानासी। यालागीं देहबुद्धि त्यासी। सत्यत्वेंसीं उपजेना॥ ६४॥ छाया सुखासनामाजीं बैसे। कां विष्ठेवरी पडली दिसे। त्या छायेचे अभिमानवशें। सुखदु:ख नसे पुरुषासी॥ ६५॥ तेवीं देहाची ख्यातिविपत्ती। बाधीना सज्ञानाचे स्थितीं। प्रारब्धक्षयाचे अंतीं। विदेह पावती कैवल्य॥ ६६॥ जैशी जळाची लहरी। निश्चळ होय सागरीं। तैसा ज्ञाता मजमाझारीं। विदेह करी समरसें॥ ६७॥ उगम संगम प्रवाहगती। सरितांची नामरूपख्याती। जेवीं प्रळयोदकीं हारपती। तेवीं समरसती मजमाजीं ज्ञाते॥ ६८॥ अपरोक्षसाक्षात्कार संन्यासी। त्याची स्थितिगति स्वधर्मेंसीं। उद्धवासांगितली तुजपाशीं। आतां मुमुक्षु संन्यासी ते ऐक॥ ६९॥
दु:खोदर्केषु कामेषु जातनिर्वेद आत्मवान्।
अजिज्ञासितमद्धर्मो गुरुं मुनिमुपाव्रजेत्॥ ३८॥
शेंडा धरूनि समूळ। ज्याचें उत्तरोत्तर दु:ख फळ। अतिबाधक विषयजाळ। त्यासी केवळ जो अनासक्त॥ २७०॥ माझे प्राप्तीलागीं चित्त। सदा ज्याचें आर्तभूत। स्वधर्मकर्मीं वर्तत। जो वेदशास्त्रार्थ विवंची॥ ७१॥ इहामुत्रभोगीं निश्चित। त्रासलें असे ज्याचें चित्त। ऐसा जो कां नित्य विरक्त। अतिविख्यात मुमुक्षु॥ ७२॥ तेणें साधावया ब्रह्मज्ञान। तेचि साधनीं लावितां मन। स्वकर्म झालिया विलक्षण। आली नागवण प्रत्यवायें॥ ७३॥ तेणें कर्म संन्यासोनि जाण। करावेंसंन्यासग्रहण। सद्गुरूसी रिघावें शरण। तेणें ब्रह्मज्ञानपदप्राप्ती॥ ७४॥ एक केवळ भावार्थीं। नेणे स्वधर्मकर्मगती। नेणे शास्त्रश्रवणव्युत्पत्ती। परी माझी प्रीती अनिवार॥ ७५॥ तेणेंही संन्यासूनि जाण। गुरूसी रिघावें शरण। त्यासीही गुरुकृपा जाण। ब्रह्मज्ञानअवाप्ति॥ ७६॥ गुरु करावा अतिशांत। शास्त्रार्थपरमार्थपारंगत। त्याचे सेवेचा भावार्थ। स्वयें श्रीकृष्णनाथ सांगत॥ ७७॥
तावत्परिचरेद्भक्त: श्रद्धावाननसूयक:।
यावद्ब्रलह्म विजानीयान्मामेव गुरुमादृत:॥ ३९॥
अचळ अमळ अविनाश। परात्परतर परेश। गुरु तो परब्रह्म ईश। हा दृढ विश्वास धरावा॥ ७८॥ त्या विश्वासाच्या पडिपाडीं। नवल गुरुचरणीं आवडी। नित्य नूतन नवी गोडी। चढोवढी भजनार्थ॥ ७९॥ ऐशिया भजनपरवडीं। हृदयीं श्रद्धा उसळे गाढी। गुरुआज्ञेची नुल्लंघी काडी। आळस तोडी समूळ॥ २८०॥ गुरुवाक्याचेनि श्रवणें। विकल्पाचें खत खाणणें। संकल्पासी सूळीं देणें। जीवें घेणें अभिमाना॥ ८१॥ तेथ असूया कैंची उठी। धाकेंचि निमाली उठाउठी। ऐशी गुरुचरणीं श्रद्धा मोठी। परब्रह्मदृष्टीं गुरु पाहे॥ ८२॥ निर्गुण जो निर्विकारु। तोचि मूर्तिमंत माझा गुरु। करूनि अकर्ता ईश्वरु। तोचि हा साचारु गुरु माझा॥ ८३॥ नित्य निर्विकल्प देख। ज्यासी म्हणती समाधिसुख। तें माझ्या गुरूचें चरणोदक। ऐसा भावें नेटक भावार्थी॥ ८४॥ गुरूतें पाहतां ब्रह्मदृष्टीं। शिष्य ब्रह्मत्वें आला पुष्टी। ब्रह्मरूप देखे सृष्टी। निजऐक्यें मिठी गुरुचरणीं॥ ८५॥ ऐसें ब्रह्मरूपीं ऐक्य घडे। तंव गुरुसेवा करणें पडे। ऐक्य झाल्याही पुढें। सेवा न मोडे अखंडत्वें॥ ८६॥ कापूर घातलिया जळीं। स्वयें विरोनि जळ परमळी। तेवीं अहं जाऊनि सेवा सकळी। सर्वीं सर्वकाळीं गुरुचरणीं॥ ८७॥ ऐशी अवस्था न येतां हाता। केवळ मुंडूनियां माथा। संन्यासी म्हणवी पूज्यता। त्याची अनुचितता हरि बोले॥ ८८॥ स्वयें संन्यास अंगीकारी। ब्रह्मसाक्षात्कार जो न करी। त्यालागीं स्वयें श्रीहरी। अतिधिक्कारीं निंदीत॥ ८९॥
यस्त्वसंयतषड्वर्ग: प्रचण्डेन्द्रियसारथि:।
ज्ञानवैराग्यरहितस्त्रिदण्डमुपजीवति॥ ४०॥
सुरानात्मानमात्मस्थं निह्नुते मां च धर्महा।
अविपक्वकषायोऽस्मादमुष्माच्च विहीयते॥ ४१॥
नाहीं वैराग्याची स्थिती। नसतां विषयविरक्ती। देखोदेखीं संन्यास घेती। केवळ वृत्ती अन्नार्थ॥ २९०॥ संन्यास घेतल्या पूर्वदृष्टीं। जें वैराग्य होतें पोटीं। तें संन्यास घेतल्यापाठीं। उठाउठी पळालें॥ ९१॥ ज्ञानेंद्रियें पांच सहावें मन। हेचि अरि षड्वर्ग जाण। यांचें न करितां निर्दळण। संन्यासपण तो विटंबु॥ ९२॥ अवैराग्यें सकाम मन। तेणें विषयाकुलित बुद्धि जाण। नाहीं ज्ञान ध्यान साधन। दंडग्रहण उदरार्थ॥ ९३॥ नुपजेच अनुताप जाण। न करीच श्रवण मनन। आदरें न साधीचि साधन। त्यासी ब्रह्मज्ञान नव्हेचि॥ ९४॥ त्याचा व्यर्थ संन्यास जाण। व्यर्थ त्याचें दंड मुंडण। व्यर्थ काषायवस्त्रग्रहण। जेवीं वेषधारण नटाचें॥ ९५॥ संन्यास घेतलिया पाठीं। काम उचंबळे उठाउठीं। क्रोधलोभांची धुमे आगिटी। चौगुणा पोटीं अभिमान॥ ९६॥ आसक्ति अधिकाधिक उठी। सदा ग्रामणी चावटी। करणें पैशुन्याच्या गोष्टी। दंड कासोटी दंभार्थ॥ ९७॥ अनधिकारीं दंडग्रहण। तेणें संन्यासरूपें जाण। केवळ आली नागवण। आपल्या आपण नाडिलें॥ ९८॥ नाडिले यज्ञाधिकारी सुरगण। नाडिले स्वधाकाराचे पितृगण। नाडिले ऋषिभूतगण। बळिअर्पण ठाकेना॥ ९९॥ जीवरूपें मी परमात्मा आपण। त्या मज हृदयस्था ठकिलें जाण। जीवोद्धारीं जें संन्यासग्रहण। तेंचि दृढबंधन त्यासी झालें॥ ३००॥ संन्यासग्रहणीं दृढबंधन। व्हावया कोण कारण। तेचि विषयींचें निरूपण। स्वयें नारायण बोलिला॥ १॥ पूर्वश्लोकींचे तिनी चरण। तेथील हें निरूपण। श्रोतीं द्यावें अवधान। झणें विलक्षण कोणी म्हणे॥ २॥
‘‘निह्नुते मां च धर्महा। अविपक्वकषायोऽस्मादमुष्माच्च विहीयते॥’’
करोनियां संन्यासग्रहण। न करी ज्ञान ध्यान साधन। न करी प्रणव उच्चारण। अविरक्त जाण विषयार्थी॥ ३॥ तेणें दारादिअभिलाषण। करिती द्रव्याचें संरक्षण। आणि गोदानादि ग्रहण। पचन पाचन करविती॥ ४॥ मठाधिपत्याचिये बुद्धीं। धनधान्यस्नेहसमृद्धी। नाना वाढवितां उपाधी। जीवात्मा त्रिशुद्धी नाडिला॥ ५॥ ऐसें करितां अधर्मपण। जीवासी लागलें दृढ बंधन। जेणें इहलोकपरलोकसाधन। त्या नरदेहासी जाण नाडिलें॥ ६॥ चौऱ्यांशीं लक्ष योनींप्रती। जैं असंख्य फेरे होती। तैं नरदेहाची प्राप्ती। अवचटें पावती सभाग्य॥ ७॥ त्या नरदेहासी येऊनि जाण। स्वयें नागवला आपण। करितां अधर्माचरण। नरक दारुण संन्याशा॥ ८॥ ज्या नांव गा ‘आश्रम चौथा’। ज्यासी देवो वंदी माथां। तेथेंही अधर्म करितां। नरकपाता पावले॥ ९॥ ज्या नरकाचे ठायीं। कोटि वर्षें बुडतां पाहीं। ठावचि न लगे कंहीं। तैसे ठायीं बुडाले॥ ३१०॥ मुख्य चतुर्थाश्रमीं हे स्थिती। तैं इतर आश्रमां कैंची गती। यालागीं आश्रमधर्मयुक्ती। स्वयें श्रीपती सांगत॥ ११॥
भिक्षोर्धर्म: शमोऽहिंसा तप ईक्षा वनौकस:।
गृहिणो भूतरक्षेज्या द्विजस्याचार्यसेवनम्॥ ४२॥
संन्याशासी मुख्य ‘शम’। सबाह्य ‘इंद्रियनेम’। ‘अहिंसा’ त्याचा स्वधर्म। हा परमधर्म संन्याशासी॥ १२॥ वानप्रस्थाचा स्वधर्म। ‘तपप्राधान्य मंत्र होम’। आतां गृहस्थाचा नेम। तिंही आश्रमां विश्रामदाता॥ १३॥ गृहस्था मुख्य ‘अग्निहोत्र’ जाण। संन्यासीब्रह्मचाऱ्यांसी द्यावें अन्न। करावें ‘भूतसंरक्षण’। तेहीं लक्षण अवधारीं॥ १४॥ असिलेनि सामर्थ्यें जाण। अन्न धन वस्त्रजीवन। तृण पर्ण निवासस्थान। देऊनि दीन रक्षावे॥ १५॥ ब्रह्मचाऱ्याचे स्वधर्मीं जाण। श्रद्धायुक्त ‘गुरुसेवन’। एवं आश्रमधर्मलक्षण। मुख्यत्वें हें जाण उद्धवा॥ १६॥ गृहस्थाश्रमीं जो धर्म आहे। तो इतर आश्रमीं करूं नये। इतराश्रमींचा धर्म पाहें। गृहस्थाश्रमीं होये करणीय॥ १७॥
ब्रह्मचर्यं तप: शौचं संतोषो भूतसौहृदम्।
गृहस्थस्याप्यृतौ गन्तु: सर्वेषां मदुपासनम्॥ ४३॥
गृहस्थें व्हावया निष्पाप। ठाके तो करावा जप तप। उभय शौचांचें स्वरूप। अतिसाटोप करावें॥ १८॥ पोटींची सांडूनि कुसमुस। यथालाभें अतिसंतोष। परोपकारीं अतिहव्यास। सुहृद सर्वांस स्वात्मत्वें॥ १९॥ गृहस्थीं ब्रह्मचर्यलक्षण। ऋतुकाळीं स्वदाराभिगमन। मुख्यत्वें करावें माझें भजन। हा स्वधर्म जाण सर्वांचा॥ ३२०॥ सर्व आश्रम सर्व वर्ण। त्यांसी हाचि स्वधर्म जाण। सांडोनि विषयाचें भान। माझें भजन करावें॥ २१॥ करितां स्वधर्में माझी भक्ती। भक्तासी होईजे प्राप्ती। तेचि सांगताहे श्रीपती। उद्धवाप्रती स्वानंदें॥ २२॥
इति मां य: स्वधर्मेण भजेन्नित्यमनन्यभाक्।
सर्वभूतेषु मद्भावो मद्भक्तिं विन्दते दृढाम्॥ ४४॥
सर्व भावें अनन्यगतीं। करितां स्वधर्में माझी भक्ती। माझा भावो सर्वांभूतीं। शीघ्रगती उल्हासे॥ २३॥ मद्भावो जोडल्या सर्व भूतीं। तेणें प्रकटे माझी चौथी भक्ती। जिच्या पायीं चारी मुक्ती। सदा लागती स्वानंदें॥ २४॥ अनिवार अनन्यगती। सर्वस्वें ज्यासी माझी प्रीती। तो लाहेमाझी परमभक्ती। जेथोनि कल्पांतीं च्यवेना॥ २५॥
भक्त्ॺोद्धवानपायिन्या सर्वलोकमहेश्वरम्।
सर्वोत्पत्त्यप्ययं ब्रह्म कारणं मोपयाति स:॥ ४५॥
सकळ सच्चिदानंदस्थिती। जी माजीं सांपडे मी सहजगती। ती नांव माझी ‘परमभक्ती’। जाण निश्चितीं उद्धवा॥ २६॥ विपरीत संसाराचें भान। दिसे दृश्य-विलक्षण। तेथ सदा स्वानंदपूर्ण। ते चौथी जाण भक्ती माझी॥ २७॥ जेथ देव भक्त एक होती। एकपणें भजनस्थिती। ऐशी साधकांसी प्राप्ती। ते ‘परमभक्ती’ उद्धवा॥ २८॥ माझी प्रकटल्या परम भक्ती। पतन नाहीं प्रळयांतीं। साधक मद्रूपा येती। स्वरूपस्थितीं समसाम्यें॥ २९॥ त्या स्वरूपाचें लक्षण। सांगताहे श्रीनारायण। उत्पत्ति-स्थिति-निदान। कारणा कारण जो चिदात्मा॥ ३३०॥ जो सकळ नियंता ईश्वरु। जो विश्वात्मा विश्वंभरु। जो उपनिषदांचें सारु। जो महेश्वरु जगाचा॥ ३१॥ त्या पदाची पदप्राप्ती। भक्त पावले परमभक्तीं। तेंचि पुढती उद्धवाप्रती। स्वानंदें श्रीपति सांगत॥ ३२॥
इति स्वधर्मनिर्णिक्तसत्त्वो निर्ज्ञातमद्गति:।
ज्ञानविज्ञानसम्पन्नो नचिरात्समुपैति माम्॥ ४६॥
ऐशिया पदाची पदप्राप्ती। साधक पावले स्वधर्मस्थितीं। ते स्वधर्मप्रयोजनगती। यथानिगुती सांगत॥ ३३॥ करितां स्वधर्मानुष्ठान। रजतमें नाशती जाण। शुद्धसत्त्व अंत:करण। तेथ माझें ज्ञान प्रकाशे॥ ३४॥ प्रकाशल्या माझें ज्ञान। तेणें उल्हासे माझें भजन। भजनास्तव मन। विकल्पपण पैं त्यागी॥ ३५॥ विकल्पत्यागाचिये गतीं। वैराग्यें उचंबळे विरक्ती। भासे परमात्मा सर्व भूतीं। तेणें ‘परमभक्ती’ उल्हासे॥ ३६॥ उल्हासल्या परमभक्ती। भक्तासी माझी स्वरूपप्राप्ती। तेचि स्वरूपाची स्वरूपस्थिती। यथानिगुतीं सांगत॥ ३७॥ परमात्मा परंज्योती। परब्रह्म परंज्ञप्ती। परात्परतर प्रकृती। वेद बोलती ‘परावर’ जो॥ ३८॥ अज अव्यय अक्षर। अरूप अनाम अगोत्र। अलक्ष्य अतर्क्य अपार। अपरंपारस्वरूप॥ ३९॥ ऐशी निजस्वरूपीं निजप्राप्ती। भक्त पावले स्वधर्मस्थिती। जेथूनि परतलिया श्रुती। नेतिनेतीं निजनिष्ठा॥ ३४०॥ ऐसें मद्रूप पावल्यापाठीं। संसाराची काढिली कांटी। नांवरूपांची बुडाली गोठी। पडली तुटी जन्ममरणां॥ ४१॥ एवं स्वधर्माचेनि धर्मवशें। मीतूंपणाचें नांवचि पुसे। मद्रूपाचेनि सामरस्यें। अनायासें मीचि जाहले॥ ४२॥ ‘पूर्वीं होतों मी जीव। आतां झालों सदाशिव’। हाही बुडाला आठव। ऐसा माझा अनुभव मद्भक्तां॥ ४३॥ शून्य पडिलें संसारस्थिती। तेथ कैंची पुनरावृत्ती। ऐशी मद्भक्तां माझी प्राप्ती। जाण निश्चितीं उद्धवा॥ ४४॥ एवं स्वधर्में मत्प्राप्ति जाण। तया स्वधर्माचें महिमान। स्वयें सांगताहे श्रीकृष्ण। सावधान परियेसा॥ ४५॥
वर्णाश्रमवतां धर्म एष आचारलक्षण:।
स एव मद्भक्तियुतो नि:श्रेयसकर: पर:॥ ४७॥
अनादि जो स्वधर्माचार। जो कां मोक्षकर साचार। तेणें स्वधर्में सकाम नर। लोकांतर वांछिती॥ ४६॥ झालिया लोकांतरप्राप्ती। तेथूनि होय पुनरावृत्ती। न करूनियां माझी भक्ती। स्वधर्म नाशिती सकामें॥ ४७॥ ब्राह्मणा आला भद्रजाती। आम्हां न पोसवे हा निश्चितीं। मग तो देऊनियां घेती। वाहावया पोथी वृद्ध ढोर॥ ४८॥ यापरी स्वधर्म जाण। उपेक्षिती गा ब्राह्मण। मग लोकांतरीं कोरान्न। मागावया कण धांवती॥ ४९॥ घरीं आणोनि दीधली कामधेनु। आम्हां न पोसवे म्हणूनु। ताकासाठीं देती हेळसूनु। आली नागवणु ते नेणे॥ ३५०॥ तेवीं म्यां जाण गायत्रीमंत्र। दिधला ब्राह्मणांसी स्वतंत्र। तो उपेक्षूनियां मंत्रतंत्र। शूद्राचार आचरती॥ ५१॥ सौर शाक्त गाणपत्यादि जाण। नाना मंत्रदीक्षा घेती ब्राह्मण। परी गायत्रीचें अनुष्ठान। एकही जाण न करिती॥ ५२॥ नाहीं गायत्रीचें अनुष्ठान। परी विपरीत झालें आन। गायत्रीचें श्रेय जाण। देती ब्राह्मण द्रव्यार्थ॥ ५३॥ गायत्रीमंत्र असोनि घरीं। तिचा भावार्थ कोणी न धरी। दीक्षेलागीं मूर्खाचे द्वारीं। लोळिजे द्विजवरीं ऐसें झालें॥ ५४॥ शस्त्रास्त्रीं रथ सुदृढू। त्यावरी बैसविला भेडू। सांडूनि पळणें मानी सुरवाडू। न शके विभांडूं रणांगण॥ ५५॥ तेवीं वेदरूप मी नारायण। ब्राह्मणहृदयीं असें जाण। त्याचें नेणोनि महिमान। वेदपारायण विकिती॥ ५६॥ वांछूनियांस्वर्गफळ। नाना याग करिती प्रबळ। कामकल्पना केवळ। स्वधर्म विकळ पाडिती॥ ५७॥ वेदीं प्रतिपाद्य कर्मफळ। तो वेदु मिथ्या नव्हे केवळ। तो वेदवाद समूळ। नेणोनि बरळ हा मानिती॥ ५८॥ घ्यावया वोखदाची वाटी। माता साकर दे चिमुटी। तें मुख्य फळ नव्हे दृष्टीं। जावया पोटींचा महारोगु॥ ५९॥ तेवीं वेद बोले जें फळ। तें प्रवृत्तिरोचना केवळ। स्वधर्मविचारितां समूळ। चित्तमळक्षाळक॥ ३६०॥ स्वधर्म सांडूनि सर्वथा। सकाम कर्में करूं जातां। तेंही शिणल्यावेगळें तत्त्वतां। क्षुद्रकामता फळेना॥ ६१॥ जेणें द्रव्यें अमृत ये हाता। तें वेंचूनि मद्य घेतां। अधर्म आणि उन्मत्तता। पिशाचता जग थुंकी॥ ६२॥ स्वपतीसीं काम भोगितां। परलोक पावे पतिव्रता। तोचि काम परपुरुषीं करितां। अध:पाता नेतसे॥ ६३॥ जिह्वा दुरुक्ती बोलतां। यमप्रहार वाजती माथां। तिणेंचि ‘राम राम’ म्हणतां। हरिभक्तां यम कांपे॥ ६४॥ तेवीं पावोनि उत्तम जन्म। कर्म करूनि सकाम। भोगावें दु:ख परम। मरण जन्म अनिवार॥ ६५॥ तेणेंचि देहें स्वधर्म। करितां निरसे सकळ कर्म। निवारे मरणजन्म। बहुतां हें वर्म कळेना॥ ६६॥ स्वधर्में घडे भगवद्भक्ती। ऐशी अतिगुह्य आहे व्युत्पत्ती। ते मी सांगेन तुजप्रती। यथानिगुतीं उद्धवा॥ ६७॥ स्वधर्म करणें आवश्यक। तेथें सांडणें फळाभिलाख। तेंचि ‘मदर्पण’ चोख। न करितां देख संकल्पु॥ ६८॥ हो कां घरिच्याचि रांजणीं। निघती मुक्ताफळांच्या श्रेणी। तरी कां ताम्रपर्णी। समुद्रमिळणींशोधावी॥ ६९॥ आपुलेच घरींचीं झाडें। फळती कल्पतरूचेनि पाडें। तरी अमरावतीचे चाडें। वृथा वेडे कां शिणती॥ ३७०॥ हो कां सद्गुरूचें तीर्थ घेतां। पाविजे परम पवित्रता। तरी धांवावया नाना तीर्था। विशेषता ते कायी॥ ७१॥ कां ईश्वरत्वें पिता पूजितां। निजमोक्ष लाभे आइता। तरी भजावें देवां देवतां। कोण्या अर्था सज्ञानीं॥ ७२॥ तेवीं स्वकर्मचि करितां। लाभे आपली निष्कर्मता। ते स्वधर्मीं काम कल्पितां। जीव निजस्वार्था नाडले॥ ७३॥ निर्विकल्पें स्वधर्माचरण। त्या नांव माझें ‘शुद्ध भजन’। तेणें भजनें होऊनि प्रसन्न। मी विवेक-वैराग्य-ज्ञान भक्तांसी दें॥ ७४॥ तेणेंचि ज्ञानें होय शुद्ध मती। चित्तशुद्धीमाजीं परमभक्ती। ते भक्तीनें माझी परम प्राप्ती। भक्त पावती उद्धवा॥ ७५॥ यालागीं नैराश्यें जें स्वधर्मकर्म। तेंचि माझें भजन परम। तेणें भजनें भक्तोत्तम। स्वयें पुरुषोत्तम होऊनि ठाकती॥ ७६॥ यापरी स्वधर्मस्थितीं। लाभे आपुली निजमुक्ती। तेचि म्यां तुजप्रती। यथानिगुतीं सांगितली॥ ७७॥
एतत्तेऽभिहितं साधो भवान्पृच्छति यच्च माम्।
यथा स्वधर्मसंयुक्तो भक्तो मां समियात्परम्॥ ४८॥
इति श्रीभागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायामेकादशस्कन्धे अष्टादशोऽध्याय:॥ १८॥
उद्धवा पुसिलें त्वां मजप्रती। स्वधर्में केवीं घडे मुक्ती। भक्तीनें पाविजे निजमुक्ती। तें म्यां तुजप्रती सांगितलें॥ ७८॥ हाता आलिया स्वधर्म। तत्काळ निरसे स्वकर्म। उडोनि जाय भवभ्रम। प्राप्ति परम स्वधर्में॥ ७९॥ माझिया प्राप्तीलागीं स्वकर्म। नैराश्यें आचरावा स्वधर्म। हें ज्यासी कळे वर्म। तया पुरुषोत्तम सदा वश्य॥ ३८०॥ स्वधर्माऐसा स्पर्शमणी। सांपडल्या निर्विकल्पपणीं। तो लावितां दृश्यस्थानीं। चिन्मात्रसुवर्णीं तेज उठी॥ ८१॥ स्वधर्माऐसादिनमणी। नैराश्यें उगवलिया स्वभुवनीं। तो अज्ञाननिशा निरसुनी। स्वप्रकाशपणीं सदा वर्ते॥ ८२॥ स्वधर्माऐसें निजअमृत। जे निर्विकल्पें सेवूं जाणत। त्यांसी जन्ममरणांचा आवर्त। मी श्रीअनंतलागों नेदीं॥ ८३॥ जे कां स्वधर्मीं विमुख। त्यांसी माझी प्राप्ति नाहीं देख। जन्मकोटी परम दु:ख। सकामें मूर्ख भोगिती॥ ८४॥ त्या स्वधर्माची अतर्क्य गोष्टी। न कळे नैष्कर्म्यें निजदृष्टीं। याचिलागीं जन्मकोटी। अतिसंकटीं जीव भोगी॥ ८५॥ स्वधर्में करितां स्वकर्म। जैं नैष्कर्म्यतेचें कळे वर्म। तैं विभांडूनि मरणजन्म। परब्रह्म पावती॥ ८६॥ एवं स्वधर्म यापरी। तारक होय संसारीं। स्वधर्माचे नावेवरी। तरले भवसागरीं निजभक्त॥ ८७॥ संसार तरले हा बोलु कुडा। स्वधर्म करितां माझिया चाडा। होय भवसागर कोरडा। मी सांपडें पुढां निजात्मा॥ ८८॥ ऐशी स्वधर्माची थोरी। निष्कामतेच्या निजकुसरी। देवो सांगे आवडीभरीं। नानापरी प्रबोधें॥ ८९॥ भक्तिप्राधान्य भागवत। मुख्य भक्ति ते स्वधर्मयुक्त। येणें स्वधर्मभजनें समस्त। परम भागवत उद्धरले॥ ३९०॥ त्या स्वधर्मकर्माचा एकान्त। निजभजनभक्तीचा भावार्थ। उद्धवासी श्रीकृष्णनाथ। स्वयें सांगतएकादशीं॥ ९१॥ त्या एकादशाच्या गोष्टी। स्वधर्मकर्माची कसवटी। एका जनार्दनकृपादृष्टीं। टीका मराठी हे केली॥ ९२॥ हे करणी केली जनार्दनें। मज अभंगीं घातलें तेणें। शेखींमीतूंपणाचें ठाणें। येणें निरूपणें उडविलें॥ ९३॥ उडविलें विषयीं विषयपण। उडविलें भेदाचेंभान। उडविलें जीवशिवपण। जनीं जनार्दन तुष्टोनी॥ ९४॥ जनार्दनें जनकें तेणें। आम्हां केलें परब्रह्म खेळणें। यालागीं सकळ क्रिया तेणें होणें। स्वधर्मपणें सहजेंचि॥ ९५॥ सहजीं लागल्या स्वधर्म। कर्मचि होय निष्कर्म। संसार होय परब्रह्म। हे कृपा परम जनार्दनीं॥ ९६॥ यालागीं सांडूनियां एकपण। एका जनार्दन शरण। स्वधर्मकर्माचें निरूपण। झालें संपूर्ण तया कृपा॥ ९७॥
इति श्रीभागवते महापुराणे एकादशस्कंधे श्रीकृष्णोद्धवसंवादे एकाकारटीकायां वानप्रस्थसंन्यासधर्मनिरूपणं नाम अष्टादशोऽध्याय:॥ १८॥ श्रीकृष्णार्पणमस्तु॥ (ओव्या ३९७)॥ श्लोक॥ ४८॥
॥ श्री ॐ तत्सत्-श्रीकृष्ण प्रसन्न॥
अध्याय एकोणिसावा
श्रीगणेशाय नम:॥ श्रीकृष्णाय नम:॥ ॐ नमो सद्गुरु त्र्यंबका। ब्रह्मगिरिनिवासनायका त्रिगुणत्रिपुरभेदका। कामांतका गिरिजेशा॥ १॥ तुझा अनाहताचा डमरु। सर्व शब्दें करी गजरु। वेदानुवादें निरंतरु। त्रिकांडीं थोरु गर्जत॥ २॥ तुझे हातींचें खट्वांग। करी जीवाचा जीवभंग। अनंगेंसीं जाळूनि अंग। अंगसंग तैं देशी॥ ३॥ त्रिनयना त्र्यंबकलिंगा। तुजपासोनि प्रवाहे चिद्गंगा। ते पवित्रपणें उद्धरी जगा। प्रकाशगर्भा शंकरा॥ ४॥ प्रत्यक्ष दिसती दोन्ही लोचन। तिसरा गुप्तज्ञाननयन। यालागीं तूं त्रिलोचन। नयनेंवीण दीसशी॥ ५॥ निजांगें वाहसी बोधचंद्र। यालागीं तूं चंद्रशेखर। चंद्रसूर्यादि चराचर। तुझेनि साचार प्रकाशे॥ ६॥ ‘भव’ या नांवाची ख्याती। भवप्रकाशक तुझी चिच्छक्ती। तूंचि विष्णु प्रजापती। रुद्र तूं अंतीं संहर्ता॥ ७॥ मोडूनियां नामरूपमुद्रा। जीव आणिशी एकाकारा। अत्यंत प्रळयींच्या प्रळयरुद्रा। चित्समुद्रा शिवरूपा॥ ८॥ शिव शिव जी गुरुराया। निजभावें लागतां पायां। तंव गुरुशिष्यत्व गेलें लया। दावूनियां निजरूप॥ ९॥ तें निजरूप देखतां दृष्टीं। कैंचा जीव कैंची सृष्टी। निमाली त्रिगुणेंसीं त्रिपुटी। पडली मिठी स्वानंदीं॥ १०॥ त्या स्वानंदाचे उद्गार। सांवरतां नावरती थोर। त्या स्वानंदाचें निजसार। सत्य साचार एकादश॥ ११॥ त्याहीमाजीं अतिगहन। सुखस्वानंदनिरूपण। तो हा एकुणिसावा अध्याय जाण। परमकारणशास्त्रार्थीं॥ १२॥ जें ऐकतां निरूपण। परमानंद उथळे जाण। एका विनवी जनार्दन। श्रोतां अवधान मज द्यावें॥ १३॥ सत्रावे अठरावे अध्यायांप्रती। स्वधर्मकर्में ब्रह्मप्राप्ती। वर्णाश्रमस्थितिगती। उद्धवाप्रती सांगीतली॥ १४॥ एकुणिसावे अध्यायीं जाण। जेणें ज्ञानें साधिलें निजज्ञान। त्या ज्ञानाचें त्यागलक्षण। स्वयें श्रीकृष्ण सांगत॥ १५॥ कर्म-कर्तव्यता-कारण। जीवन्मुक्तासी नाहींजाण। उद्धवाचे यमादि प्रश्न। हेही श्रीकृष्ण सांगेल॥ १६॥ शास्त्रयुक्त पांडित्यज्ञान। प्रपंचाचेंमिथ्या निरूपण। तें ‘अनुमानिक’ पुस्तकज्ञान। सत्यपण त्या नाहीं॥ १७॥ पूर्वे आहे माझें गमन। हें पूर्वील शुद्ध स्मरण। परी दिग्भ्रम पडिल्या जाण। पश्चिमे आपण पूर्व मानी॥ १८॥ तैसें शाब्दिक शास्त्रज्ञान। बोले आन करी आन। तेणें नव्हे समाधान। सर्वथा जाण साधकां॥ १९॥ जेवीं कां दिग्भ्रम मोडे। तैं पूर्वेचा चाले पूर्वेकडे। तेवीं अपरोक्षज्ञान जैं जोडे। तैं साधक पडे स्वानंदीं॥ २०॥ जें जें ऐके वेदांतश्रवण। तें अंगें होत जाण आपण। हें अपरोक्षाचें लक्षण। सत्यत्वें जाण अतिशुद्ध॥ २१॥ ऐसें नव्हतां अपरोक्षज्ञान। सांडूं नये श्रवणमनन। अवश्य करावें साधन। प्रत्यगावृत्ती जाण अत्यादरें॥ २२॥ झालिया अपरोक्षज्ञान। प्रपंचाचें मिथ्या भान। विषयांसी पडलें शून्य। कल्पना जाण निमाली॥ २३॥ तेणेंचि पुरुषें आपण। त्यागावें गा ज्ञानसाधन। हेंचि निरूपणीं निरूपण। देव संपूर्ण सांगत॥ २४॥
श्रीभगवानुवाच
यो विद्याश्रुतसम्पन्न आत्मवान्नानुमानिक:।
मायामात्रमिदं ज्ञात्वा ज्ञानं च मयि संन्यसेत्॥ १॥
वेदशास्त्रार्थीं परिनिष्ठित। श्रवणमननअभ्यासयुक्त। ज्यासी ब्रह्मविद्या प्राप्त। सुनिश्चित स्वानुभवें॥ २५॥ तोचि अनुभव ऐसा। दोराअंगीं सर्पु जैसा। न मारितां नाशे आपैसा। भवभ्रम तैसा त्या नाहीं॥ २६॥ जेवीं कां नटाची रावो राणी। दोघें खेळती लटिकेपणीं। तेवीं प्रकृतिपुरुष उभवणी। मिथ्यापणीं जो जाणे॥ २७॥ जैशीं भिंतीमाजीं नानाकार। चित्रें लिहिलीं विचित्र। ते भिंतीचि एक साचार। तेवीं ऐक्यें चराचर जो देखे॥ २८॥ स्वप्नींचीं नाना कर्में जाण। त्याचें जागृतीं नव्हे बंधन। तेवीं मिथ्या निजकर्माचरण। जीवित्वेंसीं प्राण जो देखे॥ २९॥ ऐशी साचार ज्याची स्थिती। त्या नांव शुद्ध ‘आत्मप्राप्ती’। ‘निजानुभव’ त्यातें म्हणती। हें जाण निश्चितीं उद्धवा॥ ३०॥ आणिक एक तेथींची खूण। ‘विषयावीण स्वानंद पूर्ण’। हें अनुभवाचें मुख्य लक्षण। सत्य जाण सात्वता॥ ३१॥ ऐसा अनुभव नसतां देख। केवळ ज्ञान जें शाब्दिक। त्यातें म्हणिजे ‘आनुमानिक’। जाणनिष्टंक निजभक्ता॥ ३२॥ ज्याच्या अनुभवा भीतरीं। नाहीं अनुमानासी उरी। जो अपरोक्षसाक्षात्कारीं। निरंतरीं नांदत॥ ३३॥ ऐसा जो पुरुष जाण। तेणें ज्ञानाचें साधन। आणि वृत्तिरूप जें ज्ञान। तेंही आपण त्यागावें॥ ३४॥ तें न त्यागितां लवलाहें। सहजचि त्याचा त्याग होये। जेवीं सूर्योदयीं पाहें। सचंद्र तेज जाये तारागणाचें॥ ३५॥ जेवीं हनुमंत देखोनि येतां। नवचंडी पळे तत्त्वतां। मा राहावया येरां भूतां। उरी सर्वथा उरेना॥ ३६॥ तेवीं माझे साक्षात्कारीं। त्यासी बद्धता नाहीं खरी। मा ज्ञान तियेचे निवृत्तीवरी। कैशापरी राहेल॥ ३७॥ माझिया अनुभवाच्या ठायीं। बंधमोक्ष मिथ्या पाहीं। तेथ साधनज्ञानाचा कांहीं। उपेगु नाहीं उद्धवा॥ ३८॥ परमात्मस्वरूपाच्या ठायीं। बंधमोक्ष मायिक पाहीं। तेथें ज्ञानध्यान जें कांहीं। न त्यागितां पाहीं त्यागिलें॥ ३९॥ त्यागोनियां ज्ञानध्यान। ज्ञानियांसी माझी प्रीति गहन। तेंचि प्रीतीचें लक्षण। स्वयें श्रीकृष्ण सांगत॥ ४०॥
ज्ञानिनस्त्वहमेवेष्ट: स्वार्थो हेतुश्च संमत:।
स्वर्गश्चैवापवर्गश्च नान्योऽर्थो मदृते प्रिय:॥ २॥
जो मी अद्वयानंदस्थिती। त्या माझी ज्ञानियांसी प्रीती। ते प्रीतीची उपपत्ती। ऐक निश्चितीं उद्धवा॥ ४१॥ ज्ञानियांसी अतिवल्लभ। जो मी परमात्मा स्वयंभ। ज्ञानियांचा परम लाभ। मीपद्मनाभ निजधन॥ ४२॥ ज्ञानियांसी जो स्वर्ग चांग। तो मज वेगळा नाहीं मार्ग। ज्ञानियांचा जो मोक्षभाग। तो मी श्रीरंग निजात्मा॥ ४३॥ ज्ञानियांचें स्वधर्मसाधन। तें मी परमात्मा नारायण। मजवेगळें कांहीं आन। ज्ञात्यांसी जाण असेना॥ ४४॥ ज्ञात्यांसी स्वर्गमोक्षसुख। मजवेगळें उरलें नाहीं देख। मी चिदात्मा निजव्यापक। भावें निष्टंक पावले॥ ४५॥ ज्ञात्यांचा अर्थ स्वार्थ परमार्थ। मी पुरुषोत्तम गा समस्त। आद्य अव्यय अनंत। माझें निजसुख प्राप्त त्यां जाहलें॥ ४६॥ ऐशी ज्ञानियांसी माझी प्रीती। तेही तैसेच मज प्रिय होती। तेंचि स्वयें श्रीपती। उद्धवाप्रती सांगत॥ ४७॥
ज्ञानविज्ञानसंसिद्धा: पदं श्रेष्ठं विदुर्मम।
ज्ञानी प्रियतमोऽतो मे ज्ञानेनासौ बिभर्ति माम्॥ ३॥
ज्ञानविज्ञाननिजसंपत्ती। जाहलियावीण माझी प्राप्ती। कोणासी नव्हे स्वरूपस्थिती। मत्पदीं गती ज्ञानविज्ञानें॥ ४८॥ करितां गुरुमुखें शास्त्रशुद्धश्रवण। तेणें जाहलें तें म्हणिजे ‘ज्ञान’। त्याचा अनुभव तेंचि ‘विज्ञान’। ऐक लक्षण त्याचेंही॥ ४९॥ स्वयें स्वयंपाक केला जाण। न जाणे कटु मधुर लवण। जंव चाखिला नाहीं आपण। ते दशा सज्ञान ‘ज्ञान’ म्हणती॥ ५०॥ केलिया रसाचें रसास्वादन। स्वयें गोडी सेवी आपण। ऐशी जे दशा तें ‘विज्ञान’। उद्धवा जाणनिश्चितीं॥ ५१॥ एवं विज्ञानज्ञाननिजसंपत्तीं। माझ्या उत्तमपदाची पदप्राप्ति। माझें वास्तव स्वरूप जे जाणती। त्यांची मज प्रीती अनन्यत्वें॥ ५२॥ वेद-शास्त्र-युक्तिबळें। माझें स्वरूप काइसेनि न कळे। तें ज्यासी वस्तुतां आकळे। मज त्यावेगळें प्रिय नाहीं॥ ५३॥ तेंचि अतिप्रीतीचें लक्षण। त्याच्या पाउलापाउलीं जाण। सर्वांग वोडवीं मी आपण। करीं निंबलोण। सर्वस्वें॥ ५४॥ त्यासी जे वेळे जें लागे। तें मी न मागतां पुरवीं वेगें। त्यासी विरुद्ध ये जेणें मार्गें। तें मी निजांगें निवारीं॥ ५५॥ त्यासी झणीं संसारवारा लागे। यालागीं मीच मी पुढेंमागें। सभंवतां राहें सर्वांगें। अतिप्रीतिपांगें पांगलों॥ ५६॥ जेणें ज्ञानें ज्ञानी प्रिय होती। त्या ज्ञानाची पवित्र कीर्ती। देवो सांगे उद्धवाप्रती। यथार्थस्थिती निजबोधें॥ ५७॥
तपस्तीर्थं जपो दानं पवित्राणीतराणि च।
नालंकुर्वन्ति तां सिद्धिं या ज्ञानकलया कृता॥ ४॥
सकळ साधनां नव्हे जे शुद्धी। ते ज्ञानलेशें होय त्रिशुद्धी। ऐक उद्धवा सुबुद्धी। ते ज्ञानशुद्धीचा महिमा॥ ५८॥ ‘तप’ जें परार्क पंचाग्नी। ‘तीर्थ’ गंगादि सविता त्रिवेणी। ‘जपु’ जे नाना मंत्रश्रेणी। गो-भू-तिल ‘दानीं’ सुवर्णादि॥ ५९॥ आणिकही इतर ‘पवित्रें’। जें ‘स्वधर्मकर्मादि’ स्वाचारें। नाना ‘याग’ अग्निहोत्रें। पवित्रकरें अतिशुद्ध॥ ६०॥ एवं तपादिक जें साधन। या सकळांची शुद्धी गहन। ते ज्ञानलेशासमान। पवित्रपण तुळेना॥ ६१॥ ज्ञाननिष्ठा अर्धक्षणें। जे पवित्रता स्वयें लाहणें। तें तपादि नाना साधनें। नाहीं पावणें कल्पांतीं॥ ६२॥; ऐसें जें ‘पवित्रज्ञान’। तें मुख्यत्वें धरोनि जाण। माझे करावें भजन। तेंचि निरूपण हरि बोले॥ ६३॥
तस्माज्ज्ञानेन सहितं ज्ञात्वा स्वात्मानमुद्धव।
ज्ञानविज्ञानसंपन्नो भज मां भक्तिभावित:॥ ५॥
याकारणें गा उद्धवा। ऐसा पवित्र ज्ञानाचा यावा। तेथ प्रक्षाळूनि निजभावा। जीवु तो वोळखावा परमात्मत्वें॥ ६४॥ जीवु परमात्मा दोनी एक। ऐसें जाणणें तें ‘ज्ञान’ देख। ऐक्यें भोगणें परमात्मसुख। ‘विज्ञान’ सम्यक त्या नांव॥ ६५॥ ऐसा ज्ञानविज्ञानसंपन्न। होऊन करावें माझें भजन। त्या निजभजनाची खूण। ऐक संपूर्ण उद्धवा॥ ६६॥ तेव्हां जेथें देखे जें कांहीं। तें मीवांचूनी आन नाहीं। मग अनन्यभावें तिये ठायीं। भजे पाहीं भावार्थें॥ ६७॥ ऐशिया माझ्या भजनाहातीं। उसंत नाहीं अहोरातीं। जागृति-स्वप्न-सुषुप्तीं। माझी निजभक्ती न मोडे॥ ६८॥ विसरोनि जावें जेथें। तेथेंचि देखे मातें। मरण आलें विस्मरणातें। स्मरणही तेथें हारपलें॥ ६९॥ यापरी ज्ञानविज्ञानसंपन्न। मजवेगळें न देखती आन। तैसेंचि माझें अनन्य भजन। ‘शुद्धभक्ति’ जाण या नांव॥ ७०॥ मागां मुनीश्वरीं याचि गतीं। माझी करोनि अनन्य भक्ती। मज पावले जैशा रीतीं। ऐक तुजप्रती सांगेन॥ ७१॥
ज्ञानविज्ञानयज्ञेन मामिष्ट्वाऽऽत्मानमात्मनि।
सर्वयज्ञपतिं मां वै संसिद्धिं मुनयोऽगमन्॥ ६॥
जे ज्ञानधनें अतिसंपन्न। परम पवित्र विज्ञानें जाण। ऐसे ब्रह्मभूत जे ब्राह्मण। यज्ञद्वारा यजन करिती माझें॥ ७२॥ हृदयाच्या निजभुवनीं। विकल्पाची भूमि खाणोनी। शम-दम-विरक्ती कुंडें तिन्ही। केलीं आवो साधुनी श्रद्धेचा॥ ६३॥ तेथ क्षराक्षर अरणी दोन्ही। गुरुमंत्रें दृढ मंथूनी। काढिला सूक्ष्म निर्धूमाग्नी। कुंडीं स्थापूनी पेटविला॥ ७४॥ शुद्धसत्त्वाचें घृत तेथ। रजतमद्रव्येंसीं मिश्रित। वैराग्यस्रुवेनें आहुती देत। मंत्र तेथ युक्तीचे॥ ७५॥ घेऊनि विद्याशस्त्र लखलखित। संकल्पपशूचा करूनि घात। तेणें यज्ञपति श्रीअनंत। केला तृप्त निजबोधें॥ ७६॥ तेथ पूर्णाहुतीस कारण। घालितां जीवभावाचें अवदान। यज्ञभोक्ता मी श्रीनारायण। परमात्मा जाणसुखी झालों॥ ७७॥ यापरी माझें यजन। करूनियां मुनिगण। निवारूनि जन्ममरण। माझी सिद्धि जाण पावले॥ ७८॥ मुनीश्वरीं साधिली सिद्धी। तेचि उद्धवालागीं त्रिशुद्धी। व्हावया कृष्ण कृपानिधी। प्रपंचनिषेधीं वस्तु सांगे॥ ७९॥
त्वय्युद्धवाश्रयति यस्त्रिविधो विकारो
मायान्तराऽऽपतति नाद्यपवर्गयोर्यत्।
जन्मादयोऽस्य यदमी तव तस्य किं स्यु-
राद्यन्तयोर्यदसतोऽस्ति तदेव मध्ये॥ ७॥
‘मी उद्धव’ ऐसें म्हणतां। तूं कोण आहेसी तत्त्वतां। ऐक त्या स्वरूपाची कथा। तुज मी आतां सांगेन॥ ८०॥ जन्म स्थिति आणि निधन। त्रिविधविकारेंसीं त्रिगुण। त्यांची अधिष्ठात्री माया जाण। तिसी चळण तुझेनी॥ ८१॥ मायादि गुणकार्यां समस्तां। तूं आश्रयो पैं सबाह्यतां। तुझेनि अंगें यासी चपळता। तूं यापरता चिदात्मा॥ ८२॥ ‘माझेनि गुणकर्मा चळणता। तैं प्रपंचासी आली सत्यता’। हें मायामय गा तत्त्वतां। मृगजळता आभासु॥ ८३॥ सकळ प्रपंचाचें जें भान। तें तंव मृगजळासमान। दिसे तेंही मिथ्या दर्शन। वस्तुत्वें जाण सत्य नव्हे॥ ८४॥ तूं जन्ममरणापरता। त्रिगुणांतें नातळता। प्रपंचासी अलिप्तता। तुझी तत्त्वतां तूं ऐक॥ ८५॥ तेचि प्रपंचाची अलिप्त युक्ती। ऐशी आहे परम प्रतीती। उत्पत्तिस्थितिप्रळयांतीं। प्रपंचाची वस्ती सत्यत्वें नाहीं॥ ८६॥ उत्पत्ति आदीं प्रपंच नसे। अंतीं कांहीं उरला न दिसे। मध्यें जो कांहीं आभासे। तो मायावशें मिथ्याभूत॥ ८७॥ प्रपंचाआदीं परब्रह्म। अंतीं तेंचि उरे निरुपम। मध्यें स्थितिकाळीं तेंचि ब्रह्म। मिथ्या भवभ्रम भ्रांतासी॥ ८८॥ सूर्याआदीं मृगजळ नसे। अस्तमानीं उरलें न दिसे। मध्यें जें काहीं आभासे। तेथही नसे जळलेश॥ ८९॥ सर्पाआदीं दोरत्वें दोरु। अंतीं दोर उरे साचारु। मध्यें भ्रमें भासे सर्पाकारु। तोही दोरु दोररूपें॥ ९०॥ यापरी आद्यंतीं विचारिता। वस्तु सत्य प्रपंच मिथ्या। हें उद्धवा जाण तत्त्वतां। वेदशास्त्रार्थां संमत॥ ९१॥ ऐशी या प्रपंचाची घडामोडी। होतां जन्ममरणकोडी। उद्धवा तुज न लागे वोढी। तूं परापरथडीं नित्यमुक्त॥ ९२॥ निर्गुण नि:संग निर्विकार। अज अव्यय अक्षर। ब्रह्म अनंत अपरंपार। तें तूं साचार उद्धवा॥ ९३॥ हे ऐकोनि देवाची गोष्टी। उद्धवें बांधिली शकुनगाठीं। हरिखें आनंदु न जिरे पोटीं। एकला सृष्टीं न समाये॥ ९४॥ ‘तूं ब्रह्म’ म्हणतां यदुराजें। तेणें हरिखाचेनि फुंजें। उद्धव नाचे स्वानंदभोजें। वैकुंठराजे तुष्टले॥ ९५॥ स्वमुखें तुष्टोनि श्रीकृष्ण। मज म्हणे ‘तूं ब्रह्म पूर्ण’। आजि मी सभाग्य धन्य धन्य। धांवोनि श्रीचरण वंदिले॥ ९६॥ ‘तूंचि अंगें परब्रह्म’। ऐसें बोलिला मेघश्याम। तेचि अर्थींचें निजवर्म। उद्धव सप्रेम पूसत॥ ९७॥
उद्धव उवाच
ज्ञानं विशुद्धं विपुलं यथैत-
द्वैराग्यविज्ञानयुतं पुराणम्।
आख्याहि विश्वेश्वर विश्वमूर्ते
त्वद्भक्तियोगं च महद्विमृग्यम्॥ ८॥
विष्वक्सेना विश्वेश्वरा। विश्वमूर्ती विश्वंभरा। जेणें पाविजे ब्रह्मसाक्षात्कारा। त्या ज्ञाननिर्धारामज सांग॥ ९८॥ नुसधें सांगती ज्ञान। ते केवळ मूढ जाण। सांग तूं वैराग्ययुक्ति तीक्ष्ण। जें छेदी बंधन जीवांचें॥ ९९॥ ज्ञानेंवीण वैराग्य आंधळें। तें अरडीदरडी आदळे। वैराग्येंवीण ज्ञान पांगळें। युक्ति देखे परी न चले पुरुषार्थ॥ १००॥ विवेक वैराग्य दोनी। प्रवेशल्या हृदयभुवनीं। तों विषयावस्था निरसूनी। सोहंपणीं जीव वर्तें॥ १॥ जंव ज्ञानासी न भेटे विज्ञान। तंव न निरसे जीवपण। यालागीं सांगावें विज्ञान। जें जीवशिवपण निवारी॥ २॥ असंभावना दोषशून्य। तें बोलिजे ‘शुद्ध ज्ञान’। जें विपरीतभावनेवीण। त्यातें सज्ञान ‘विपुल’ म्हणती॥ ३॥ ऐसें विशुद्ध-विपुल-ज्ञान। तद्युक्त वैराग्य-विज्ञान। त्यां माजींही श्रेष्ठ तुझें भजन। कृपा करून सांगिजे॥ ४॥ ज्ञान-विज्ञान-वैराग्यस्थितीं। जुनाट तुझी भगवद्भक्ती। मज सांगावी सुनिश्चितीं। कृपामूर्तीश्रीकृष्णा॥ ५॥ तुझे उत्तमभक्तिकारणें। साधु पडले गवेषणें। धरणें बैसले जीवेंप्राणें ते भक्ती सांगणें मजलागीं॥ ६॥ तुझी करितां उत्तम भक्ती। त्रिविध ताप क्षया जाती। आपुली लाभे निजमुक्ती। उद्धव ते अर्थीं विनवीत॥ ७॥
तापत्रयेणाभिहतस्य घोरे
सन्तप्यमानस्य भवाध्वनीश।
पश्यामि नान्यच्छरणं तवाङ्घ्रि-
द्वन्द्वातपत्रादमृताभिवर्षात्॥ ९॥
जे त्रिविध तापें तापले। जे कामक्रोधीं जर्जर केले। आशातृष्णा विसंचिले। जे निर्बुजले जन्ममरणें॥ ८॥ संसारमार्ग अतिघोर। दु:खें नुल्लंघवे दुस्तर। ऐसे श्रमले जे नर। त्यांसी निजछत्र हरिपादपद्म॥ ९॥ तुझ्या चरणारविंदापरतें। शरण्य न देखों आणिकांतें। यालागीं कायावाचाचित्तें। शरण भावार्थें तुज आलों॥ ११०॥ छत्र निवारी केवळ ताप। चरणछत्राचें भिन्न रूप। त्रिविध तापेंसीं संताप। निरसोनि निष्पाप करी जन॥ ११॥ एक शरण निजचित्तें। एक वैरें मिसळले तूतें। एक ते भजनभावार्थें। एक ते भयार्तें स्मरले तूतें॥ १२॥ एक ते सुहृदत्वें सगोत्र। एकाचें केवळ स्नेहसूत्र। एका अंगसंग कामतंत्र। एक आज्ञाधारक नेमस्त॥ १३॥ एवं नानापरी विचित्र। जिंहीं ठाकिलें चरणच्छत्र। भवभय जें महाघोर। तें त्यांसमोर हों न शके॥ १४॥ भक्त वैरी आणि सुहृद। अवघ्यां देणें निज ऐक्यपद। बाप उदारता अगाध। तूं स्वानंदबोध सर्वांचा॥ १५॥ होमें जें दीजे अग्नीवरी। तें अग्नी आपुल्या ऐसें करी। मा अवचटें पडिल्यावरी। तेंही करी तैसेंचि॥ १६॥ एवं नानायोगें गोविंदा। जे मीनले तुझिया संबंधा। त्यांची निरसोनि संसारबाधा। समत्वें निजपदा तूं नेसी॥ १७॥ त्या तुझें चरणछत्र येथें। निवारी त्रिविध तापांतें। सदा वर्षे परमामृतें। शरण चरणांतें यालागीं॥ १८॥ ज्या संसारभयाभेण। तुझ्या चरणा आलों शरण। त्या भवभयाचें निरूपण। उद्धव आपण सांगत॥ १९॥
दष्टं जनं संपतितं बिलेऽस्मिन्
कालाहिना क्षुद्रसुखोरुतर्षम्।
समुद्धरैनं कृपयाऽऽपवर्ग्यै-
र्वचोभिरासिञ्च महानुभाव॥ १०॥
संसारकुहरामाजीं जन। गृहदाराकूपीं पडले जाण। त्याहीमाजीं दु:ख गहन। काळसर्पें दारुण डंखिलें॥ १२०॥ त्या काळसर्पाचें विख। क्षणक्षणां चढे देख। अभिमानें भुलले लोक। विषयसुख वांछिती॥ २१॥ नवल काळसर्पाचा पडिपाडु। विषप्राय विषय केले गोडु। गोडांचा गोड परमार्थ दृढु। तो केला कडू जीवेंभावें॥ २२॥ विखाहूनि विषय अधिक। विख एक वेळां मारक। विषयो पुन: पुन: घातक। काळसर्पें लोक भुलविले॥ २३॥ विषय तो केवळ विख। त्यालागीं भुलले मूर्ख। विषयांची तृष्णा देख। अधिकाधिक वाढविती॥ २४॥ ऐसे दु:खनिमग्न जे जन। त्यांचें करावें जी उद्धरण। म्हणशील ‘हे करितील साधन। तैं उद्धरण करीन मी’॥ २५॥ स्वामी तुझी कृपा न होतां। कोटॺानुकोटी साधन तें वृथा। तुझी कृपा जाहलिया अच्युता। भवव्यथा स्पर्शेना॥ २६॥ ऐकें कृपाळुवा श्रीअनंता। तुझ्या मोक्षफळरूप ज्या कथा। तेणें अमृतें शिंपोनि कृष्णनाथा। जनां समस्तां उद्धरीं॥ २७॥ तुझे मुखींचें कथा पीयूख। बिंदुमात्र लाभतां देख। भवसर्पाचें उतरे विख। उपजवी सुख स्वानंदें॥ २८॥ ‘सकळ जनांच्या विषयीं’। म्हणसी आग्रह कां तुझ्या ठायीं। जन मातें प्रार्थीत नाहीं’। देवा ऐसें कांहीं कल्पिसी॥ २९॥ आंधळें अंधकूपीं पडतां। देखणेनीं लावावें सत्पथा। तेवीं ज्ञानांध दु:खी बुडतां। उद्धरावया तत्त्वतां मी प्रार्थितसें॥ १३०॥ जन अंध कां जाहले म्हणसी। संसारसर्पें ग्रासिलें त्यांसी। यालागीं विसरोनि निजसुखासी। विषयसुखासी लोधले॥ ३१॥ ऐशिया दीनांतें श्रीअनंता। कृपेनें उद्धरावें तत्त्वतां। म्हणोनि चरणीं ठेविला माथा। श्रीकृष्णनाथा प्रार्थिलें॥ ३२॥ ऐकोनि भक्ताची विनंती। संतोषला भक्तपती। उत्तम सभेची ज्ञानस्थिती। उद्धवाप्रती सांगेल॥ ३३॥ जे सभेसी मुख्यत्वें हृषीकेशी। देवर्षि आणि ब्रह्मर्षी। तेथ मीनले राजर्षी। तपोराशी ज्ञाननिधी॥ ३४॥ ते सभेचा ज्ञानमथितार्थ। उद्धवासी सांगेल श्रीकृष्णनाथ। श्रोतीं अवधान द्यावें तेथ। एका विनवीत जनार्दनु॥ ३५॥ ज्ञान आणि पुरातन। वक्ता भगवंत आपण। श्रोता उद्धव सावधान। काय श्रीकृष्ण बोलिला॥ ३६॥
श्रीभगवानुवाच
इत्थमेतत्पुरा राजा भीष्मं धर्मभृतां वरम्।
अजातशत्रु: पप्रच्छ सर्वेषां नोऽनुशृण्वताम्॥ ११॥
तुवां पुशिलें जैशा रीतीं। तैसियाचि गा उपपत्तीं। धर्में पुशिलें भीष्माप्रती। देहांतीं शरपंजरीं॥ ३७॥ ऐक त्या धर्माची थोरी। ज्यासी शत्रु नाहीं संसारीं। सत्यवादी निजनिर्धारीं। जो ऋषिमंत्रीं जन्मला॥ ३८॥ करावया पांडवनिर्दळण। वज्रदेही व्हावया आपण। वर्म पुसतां दुर्योधन। धर्मअसत्य वचन न बोले॥ ३९॥ ऐसा राजा युधिष्ठिर। निर्मत्सर परम पवित्र। तेणें करूनि अत्यादर। भीष्म महावीर विनविला॥ १४०॥ जो परम धार्मिक निजनिर्धारीं। जो स्वधर्मनियमें व्रतधारी। जो यावज्जन्म ब्रह्मचारी। जो महाशूरीं वंदिजे॥ ४१॥ न मोडतां गुरुत्वाची पायरी। जो परशुरामेंसीं युद्ध करी। परी काशीश्वराची कुमरी। जो न करीच नोवरी ब्रह्मचर्यें॥ ४२॥ धनुर्विद्येसी गुरु परशुराम। तो रणीं जिंतिला करूनि नेम। तेणें संतोषोनि परम। आपुलें नाम आंकणां घातलें॥ ४३॥ अधिक संतुष्टे परशुराम। माझ्या ब्रह्मचर्याचा व्रतनेम। भीष्मा तुज कदा बाधिना काम। वर परम दीधला॥ ४४॥ जनकसंतोषाकारणें। आपुलें तारुण्य दीधलें जेणें। वार्धक्य घेऊनि आपणें। सुखी करणें शंतनु॥ ४५॥ पित्यानें दीधलें आशीर्वादा। ‘ऐक भीष्मा अतिप्रबुद्धा। वार्धकीं क्षीणशक्तीची आपदा। ते तुज कदा बाधेना’॥ ४६॥ यालागीं जंव जंव म्हातारपण। तंव तंव त्याचा प्रताप गहन। काळाची शक्ति खुंटली जाण। न करवे क्षीण भीष्मासी॥ ४७॥ यालागीं तोडरीं काळ काम। आंकणा रिघाला परशुराम। हाचि धर्मिष्ठीं ‘वरिष्ठधर्म’। हें साजे नाम भीष्मासी॥ ४८॥ ज्याचिये प्रतिज्ञेच्या निर्धारीं। देवासी लावूनियां हारी। नि:शस्त्रा करी शस्त्रधारी। एवढी थोरी प्रतिज्ञेची॥ ४९॥ न मोडतां भजनमर्यादा। युद्धीं मिसळोनि गोविंदा। हारी लावूनियां मुकुंदा। चरणारविंदा लागला॥ १५०॥ आण वाहूनि निर्धारीं। शस्त्रास्त्रें सांडिलीं दूरीं। पुढती बाण भेदितां जिव्हारीं। शस्त्र करीं न धरीच॥ ५१॥ बाणीं खडतरलें जिव्हार। विकळता देखोनि थोर। भीष्में करूनि निजनिर्धार। जाहला तत्पर देहत्यागा॥ ५२॥ हें दक्षिणायन अतिघोर। भीष्में ऐकतां उत्तर। काळासी करूनियां दूर। स्वशरीर राखिलें॥ ५३॥ मग निजात्मनिर्धारीं। भीष्म पहुडे शरपंजरीं। त्यातें युधिष्ठिर प्रश्न करी। महाऋषीश्वरीं परिवारिला॥ ५४॥ आम्हां सकळां देखतां। जाहलायुधिष्ठिर पुसता। तेचि पुरातन कथा। तुज मी आतां सांगेन॥ ५५॥
निवृत्ते भारते युद्धे सुहृन्निधनविह्वल:।
श्रुत्वा धर्मान् बहून्पश्चान्मोक्षधर्मानपृच्छत॥ १२॥
मी संधि करितां श्रीकृष्ण। तें न मानीच दुर्योधन। व्यासें वर्जितां आपण। तरी दृप्तपण युद्धासी॥ ५६॥ एवं दैवबळें कुरुक्षेत्रीं। कौरवपांडवां झुंजारीं। सापत्न दुर्योधनादि वैरी। सपरिवारीं मारिले॥ ५७॥ युद्ध निवर्तल्यापाठीं। धर्म बैसल्या राज्यपटीं। तेणें अभिमान घेतला पोटीं। महादोषी सृष्टीं मी एक॥ ५८॥ मी राज्यीं बैसवितां आपण। म्हणें म्यां मारिला गुरु ब्राह्मण। म्यां मारिला कर्ण दु:शासन। राजा दुर्योधन म्यां मारिला॥ ५९॥ उत्पत्तिस्थितिप्रलयकर्ता। येथ ईश्वरु जाण तत्त्वतां। तें सांडोनियां सर्वथा। ‘अहं कर्ता’ म्हणे धर्म॥ १६०॥ देहाभिमानाचे खटाटोपीं। थोर होऊनियां अनुतापी। गोत्रहंता मी महापापी। ऐसें आरोपी निजमाथां॥ ६१॥ त्यासी द्यावया समाधान। समयो भीष्माचें निर्याण। तेथें म्यां नेउनियां जाण। धर्में केले प्रश्न ते ऐका॥ ६२॥ राजधर्म दानधर्म। पुशिला तेणें आपद्धर्म। मुख्यत्वें पुशिला ‘मोक्षधर्म’। उत्तमोत्तम परियेसीं॥ ६३॥
तानहं तेऽभिधास्यामि देवव्रतमुखाच्छ्रुतान्।
ज्ञानवैराग्यविज्ञानश्रद्धाभक्त्युपबृंहितान्॥ १३॥
ते भीष्ममुखींचे मोक्षधर्म। म्यां परिशिले अतिउत्तम। जे निरसिती भवभ्रम। सकळ कर्मदाहक॥ ६४॥ ज्ञान विज्ञान श्रद्धा भक्ती। अनित्य नासे वैराग्यस्थिती। भीष्में सांगितलीधर्माप्रती। ते मी निश्चितीं सांगेन॥ ६५॥ म्हणणें भीष्मासी ‘देवव्रत’। तेणें देवावरी ठेवूनि चित्त। शरपंजरीं सुनिश्चित। निजात्मयुक्त पहुडला॥ ६६॥ तेणें सांगितला मोक्षधर्म। त्यांत मुख्यत्वें ‘ज्ञान’ प्रथम। तें ज्ञान सांगे पुरुषोत्तम। अतिउत्तम अवधारीं॥ ६७॥
नवैकादश पञ्च त्रीन् भावान् भूतेषु येन वै।
ईक्षेताथैकमप्येषु तज्ज्ञानं मम निश्चितम्॥ १४॥
प्रकृति पुरुष महत्तत्त्व। पंचतन्मात्रा सूक्ष्मस्वभाव। अहंकारासकट ‘नव’। तत्त्ववैभव हे संख्या॥ ६८॥ ‘एकादश’ बोलिजेतें। तें अकराही इंद्रियें येथें। ‘पंच’ ते पंचमहाभूतें। ‘तिनी’ ते निश्चित तीन गुण॥ ६९॥ हे तत्त्वसंख्या उणखूण। गणितां अठ्ठावीस जाण। इयें सर्व भूतीं समसमान। तत्त्वें जाण वर्तती॥ १७०॥ हिरण्यगर्भादि स्थावरांत। तत्त्वें समान गा समस्त। अधिक उणें नाहीं येथ। जाण निश्चित उद्धवा॥ ७१॥ तैसेंचि गा जीवचैतन्य। प्रतिबिंबलेंसे समसमान। जें नाम रूप अभिमान। सर्वांसी जाण प्रकाशक॥ ७२॥ थिल्लरीं विहिरीं सागरीं। चन्द्रमा प्रतिबिंब समचि धरी। तेवीं ब्रह्मादि मशकवरी। जीवत्व शरीरीं समसाम्यें॥ ७३॥ भूतें समसमान चैतन्य। एकात्मता देखणें जाण। या नांव गा ‘शुद्ध ज्ञान’। माझाही जाण हा निश्चय॥ ७४॥ आतां विज्ञानाचें लक्षण। तुज मी सांगेन संपूर्ण। तें श्लोकार्धें निरूपण। स्वयें नारायण सांगत॥ ७५॥
एतदेव हि विज्ञानं न तथैकेन येन यत्॥
पूर्वीं देखतेनी स्वभावें। व्यापक वस्तूनि यें सर्वें। व्यापिलीं असती देहादि तत्त्वें। हें मानी जीवेंभावें निश्चित॥ ७६॥ जेवीं कां घटमात्रास। सबाह्य व्यापक आकाश। तेवीं सकळ प्रपंचास। चिदाभास व्यापक॥ ७७॥ ऐसें जें कां शुद्ध ज्ञान। तें ज्ञेय प्राप्तीचें कारण। ज्ञेय पावलिया ज्ञान। हारपे जाण वृत्तींसीं॥ ७८॥ ज्ञानैकगम्य वस्तु जे। यालागीं त्या ‘ज्ञेय’ म्हणिजे। ज्ञेय पावलिया ज्ञान लाजे। जेवीं कां सूर्यतेजें खद्योत॥ ७९॥ जळीं रिघाल्या लवण। लवणपणा मुके जाण। तेवीं ज्ञेय पावलिया ज्ञान। ज्ञातेपण हारवी॥ १८०॥ ज्ञेय पावलिया सम्यक। स्वरूपीं चिन्मात्रैक एक। तेथ मिथ्या व्याप्यव्यापक। साधक बाधक असेना॥ ८१॥ जेवीं उदेलिया गभस्ती। सतारा लोपे रोहिणीपती। तेवीं जगेंसीं ज्ञानसंपत्ती। ज्ञेयाचे प्राप्तीपुढें लोपे॥ ८२॥ ऐसें अपरोक्ष नव्हतां साङ्ग। देहादि प्रपंचाचें लिंग। आत्म्यावेगळें देखे जग। शब्दें लगबग ब्रह्मज्ञाना॥ ८३॥ शुद्धशाब्दिक जें ब्रह्मज्ञान। तेंही गुणात्मक जाण। वस्तु निराकार निर्गुण। जन्ममरण तिशी नाहीं॥ ८४॥ त्रिगुण तितुकें नाशवंत। येचि विखीं प्रस्तुत। सांगताहे श्रीकृष्णनाथ। अंतवंत साकार॥ ८५॥
(उत्तरार्ध) स्थित्युत्पत्त्यप्ययान्पश्येद्भावानां त्रिगुणात्मनाम्॥ १५॥
जरी नसतें नाशवंत। तरी सगुण मानूं येतें सत्य। उत्पत्तिस्थिति निदानवंत। जाण येथ त्रिगुणचि॥ ८६॥ रजोगुणें होय उत्पत्ति। सत्त्वगुणें कीजे स्थिती। तमोगुण नाशी अंतीं। हा गुणप्रवृत्ती-स्वभावो॥ ८७॥ या गुणांमाजीं वस्तु असे। जिचेनि गुणकर्म प्रकाशे। परी जन्ममरणादि दोषें। अलिप्त वसे अविनाशी॥ ८८॥ जे तिनी गुणां आश्रयभूत। जिचेनि गुणकर्में वर्तत। ती वस्तु त्रिगुणातीत। तेचि सांगत श्रीकृष्ण॥ ८९॥
आदावन्ते च मध्ये च सृज्यात्सृज्यं यदन्वियात्।
पुनस्तत्प्रतिसंक्रामे यच्छिष्येत तदेव सत्॥ १६॥
गुणां आदि-मध्य-अवसानीं। सृष्टिउत्पत्ति-स्थिति-निदानीं। जें असे अविनाशपणीं। तें मी मानीं संतत्वें॥ १९०॥ तेंचि संतत्व गा ऐसें। ज्याचेनि आधारें जग वसे। जें जगा सबाह्य भरलें असे। जग प्रकाशे ज्याचेनी॥ ९१॥ हें जगचि होय जाये। परी तें संचलेंचि राहे। ऐशी जे निजवस्तु आहे। ते तूं पाहे संतत्वें॥ ९२॥ जैसे घटमठ होती जाती। आकाश राहे सहजगती। तेवीं ब्रह्मांडालयोत्पत्ती। वस्तूची स्थिती संचली॥ ९३॥ जेवीं अलंकारापूर्वीं सोनें। अलंकारीं सोनें सोनेंपणें। अलंकारनाशीं नासों नेणे। जेवीं कां सोनें निजस्थिती॥ ९४॥ तेवीं आकळोनि चराचर। वस्तु असे अखंडाकार। होतां जातां आकारविकार। वस्तु अणुमात्र विकारेना॥ ९५॥ ऐशी जे वस्तुअखंडपणें। तिच्या ठायीं चार प्रमाणें। इहीं प्रमाणीं वस्तु जाणणें। प्रपंच देखणें मिथ्यात्वें॥ ९६॥
श्रुति: प्रत्यक्षमैतिह्यमनुमानं चतुष्टयम्।
प्रमाणेष्वनवस्थानाद्विकल्पात्स विरज्यते॥ १७॥
एक अद्वैत ब्रह्म पाहीं। दूसरें आणिक कांहीं नाहीं। प्रपंच मिथ्या वस्तूचे ठायीं। हें प्रमाण पाहीं ‘वेदवाक्य’॥ ९७॥ ‘प्रत्यक्ष’ देखिजे आपण। देहादिकांचें नश्वरपण। हें दुसरें परम प्रमाण। जें क्षणिकत्व जाण प्रपंचा॥ ९८॥ मार्कंडेयो आणि भुशुंडी। इंहीं प्रपंचाची राखोंडी। देखिली गा रोकडी। वेळां कोडी कल्पांतीं॥ ९९॥ महाजनप्रसिद्ध हें श्रवण। प्रपंचासी क्षणिकपण। हें तिसरें गा प्रमाण। उद्धवा जाण ‘ऐतिह्य’॥ २००॥ शास्त्रप्रसिद्धी अनुमान। मिथ्या प्रपंचाचें भान। दिसे मृगजळासमान। वस्तुतां जाण असेना॥ १॥ दोर दोरपणें साचार। भ्रमें भासे नानाकार। काष्ठ सर्प कीं मोत्यांचा हार। ना हे जळधार जळाची॥ २॥ तेवीं वस्तु एक चिद्धन। तेथ भ्रमें मतवाद गहन। हें शून्य किंवा सगुण। कर्मधर्माचरण तें मिथ्या॥ ३॥ यापरी करितां ‘अनुमान’। मिथ्या प्रवृत्तिप्रपंचज्ञान। हें वेदांतमत प्रमाण। सत्य जाण उद्धवा॥ ४॥ तंतू वेगळापट कांहीं। योजेना आणिकिये ठायीं। तेंवी ब्रह्मावेगळा पाहीं। प्रपंचु नाहीं सत्यत्वें॥ ५॥ चहूंप्रमाणीं प्रपंचस्थिती। मिथ्या साधिली निश्चितीं। ते प्रपंचीं विषयासक्ती। सांडूनि विरक्तीधरावी॥ ६॥ येचिविखींचें निरूपण। स्वयें सांगताहे नारायण। उभय लोकीं विषयध्यान। तें मिथ्या जाण अमंगळ॥ ७॥
कर्मणां परिणामित्वादाविरिञ्चादमङ्गलम्।
विपश्चिन्नश्वरं पश्येददृष्टमपि दृष्टवत्॥ १८॥
करूनि कर्मांचें साधन। पाविजे लोक तो नश्वर जाण। आदिकरूनि ब्रह्मसदन। नश्वरत्वें जाण अमंगळ॥ ८॥ जें ते लोकींचें सुख गहन। तें विखें रांधिलें जैसें अन्न। खातां गोड परिपाकें मरण। तेवीं अध:पतन स्वर्गस्था॥ ९॥ जैसा देखिला हा लोक येथ। तैसाचि स्वर्गभोग तेथ। जे दोन्ही जाण अंतवंत। नाश प्राप्त दोंहीसी॥ २१०॥ काळें पांढरें दोनी सुणीं। जेवीं सम अपवित्रपणीं। तेवीं इहपरलोक दोन्ही। नश्वरपणीं समान॥ ११॥ इहामुत्र भोगासक्ती। यांवरी धरावी विरक्ती। या नांव ‘वैराग्यस्थिती’। जाण निश्चितीं उद्धवा॥ १२॥ मागील तुझी प्रश्नस्थिती। पुशिली होती माझीभक्ती। ते मी सांगेन तुजप्रती। यथानिगुतीं निजबोधें॥ १३॥
भक्तियोग: पुरैवोक्त: प्रीयमाणाय तेऽनघ।
पुनश्च कथयिष्यामि मद्भक्ते: कारणं परम्॥ १९॥
पूर्वीं भक्तीची महत्ख्याती। तुज सांगितली निजस्थिती। ते भक्तीची तुज अति प्रीती। तरी मी मागुतीं सांगेन॥ १४॥ ऐक उद्धवा पुण्यमूर्ती। ज्यासी आवडे माझी भक्ती। तो मज पढिया त्रिजगतीं। भजनें परम प्राप्ती मद्भक्तां॥ १५॥ ते भक्तीचें निजलक्षण। प्रथम भूमिका आरंभून। देवो सांगताहे आपण। येथें सावधान व्हावें श्रोतां॥ १६॥
श्रद्धामृतकथायां मे शश्वन्मदनुकीर्तनम्।
परिनिष्ठा च पूजायां स्तुतिभि: स्तवनं मम॥ २०॥
अमृतरूपा ज्या माझ्या कथा। श्रद्धायुक्त श्रवण करितां। फिकें करूनियां अमृता। गोडी भक्तिपंथा तत्काळ लागे॥ १७॥ अमर अमृतपान करिती। तेही शेखीं मरोनि जाती। माझें कथामृत जे सेविती। ते नागवती कळिकाळा॥ १८॥ सेवितां कथासारामृत। अतिशयें जाहले उन्मत्त। मातले मरणातें मारित। धाकें पळे समस्त संसारु॥ १९॥ सेवितां कथामृतसार। मद्भावीं रंगलें अंतर। तैं माझे गुण माझें चरित्र। गाती सादर उल्हासें॥ २२०॥ माझे नाम माझीं पदें। नाना छंदें अद्वैतबोधें। कीर्तनीं गाती स्वानंदें। परमानंदें डुल्लत॥ २१॥ सप्रेम संभ्रमाचे मेळीं। गर्जती नामाच्या कल्लोळीं। नामासरिसी वाजे टाळी। जाहली होळी महापापां॥ २२॥ ऐशिया कीर्तनाचे आवडीं। जाहलीं प्रायश्चित्तें देशधडी। तीर्थें होऊनि ठेलीं बापुडीं। फिटलीं सांकडीं जप तपांचीं॥ २३॥ ऐकोनि कीर्तनाचा गजर। ठेला यमलोकींचा व्यापार। रिकामें यमकिंकर। यमें पाशभार लपविला॥ २४॥ देखोनि कीर्तनाची गोडी। देव धांवे लवडसवडीं। वैकुंठींहूनि घालीं उडी। अतितांतडीं स्वानंदें॥ २५॥ ऐसा कीर्तनाचा गजर। करितां नित्य निरंतर। त्याअधीन मी श्रीधर। भुललों साचार कीर्तनें॥ २६॥ जैसें कीर्तन तैशीच पूजा। आदरें पूजी गरुडध्वजा। पुष्पादिसंभार समाजा। अति वोजा घवघवीत॥ २७॥ अतिनिष्ठा सावधान। यापरी करी माझें पूजन। माझी स्तुति माझें स्तवन। रिकामा अर्ध क्षण जावों नेदी॥ २८॥
आदर: परिचर्यायां सर्वाङ्गैरभिवन्दनम्।
मद्भक्तपूजाभ्यधिका सर्वभूतेषु मन्मति:॥ २१॥
‘इंद्रियें’ वेंचिलीं पूजाविधानें। ‘वाचा’ वेंचली हरिकीर्तनें। ‘हृदय’ वेंचलें माझेनि ध्यानें। ‘अष्टांग’ नमनें वेंचलें॥ २९॥ ऐसा अत्यादरें वाडेंकोडें। सबाह्य वेंचला मजकडे। माझे भक्त देखिल्या पुढें। हरिखें मजकडे येवोंचि विसरे॥ २३०॥ माझे भक्त भाग्यें येती घरा। तैं पर्वकाळ दिवाळी दसरा। तेथें तीर्थें धांवतीं माहेरा। जेवीं सासराहूनि कुमारी॥ ३१॥ पहावया भक्तपूजेची आवडी। सनकादिकांची पडे उडी। नारदप्रल्हादादि भक्तकोडी। चढोवढी धांवती॥ ३२॥ तेथसिद्ध येती गा अलोटें। सुरवरांचें टेक फुटे। महानुभवांचा ढीग दाटे। पितर नेटेंपाटें धांवती॥ ३३॥ वेदांसी रिघावा न घडे। विधि निर्बुजला मागें मुरडे। माझ्या भक्त पूजेचेनि कोडें। दारापुढें थाटदाटे॥ ३४॥ मद्भक्तपूजेचिया उल्हासा। मज टक पडे हृषीकेशा। इतरांचा पाड काइसा। भक्तपूजनीं ऐसा महिमा आहे॥ ३५॥ मागां सांडूनि माझी पूजा। जेणें मद्भक्त पूजिले वोजा। तेणें मज पूजिलें अधोक्षजा। परिवार समाजा समवेत॥ ३६॥ प्रतिमा माझ्या अचेतन व्यक्ती। भक्त माझ्या सचेतन मूर्ति। त्यांसी पूजिल्या मीं श्रीपती। यथानिगुतीं संतोषें॥ ३७॥ जैसा मद्भाव मद्भक्तीं। तोचि भावो सर्वांभूतीं। नानाकार भूताकृती। परी आत्मस्थिती अविकार॥ ३८॥ दिसे देहाकृती मुंडली। तीतें म्हणती हे रांडली। परी आत्म्याची रांड नाहीं जाहली। असे संचली आत्मस्थिति॥ ३९॥ दीर्घ वक्र आणि वर्तुळ। दिसती भिन्न भिन्न इंगळ। परी अग्नि एकचि केवळ। तेवीं भूतें सकळ मद्रूपें॥ २४०॥ चित्रांमाजीं नानाकृती। पाहतां अवघी एकचि भिंती। तेवीं मी चिदात्मा सर्वभूतीं। निजभावें निश्चितीं जाणावा॥ ४१॥ सांडूनि अहंकार दुजा। सर्व भूतीं भावो माझा। हे उत्तमोत्तम माझी पूजा। मज अधोक्षजा पढियंती॥ ४२॥ ऐशी जो माझी पूजा करी। तो मज पढियंता गा भारी। मी सर्वांगें राबें त्याच्या घरीं। तो मजवरी मिराशी॥ ४३॥ त्याच्या चेष्टांची जे गती। तेचि माझी भजनस्थिती। हेंचि स्वमुखें श्रीपती। उद्धवाप्रती सांगत॥ ४४॥
मदर्थेष्वङ्गचेष्टा च वचसा मद्गुणेरणम्।
मय्यर्पणं च मनस: सर्वकामविवर्जनम्॥ २२॥
लौकिक शरीर कर्मगती। तद्वारा निपजे माझी भक्ती। अभिनव माझी भजनस्थिती। सांगों किती उद्धवा॥ ४५॥ बैसोनियां हाटवटीं। सांगतां लौकिकीही गोष्टी। त्यांमाजीं माझें कीर्तन उठी। मद्गुणें गोमटी गर्जे वाचा॥ ४६॥ स्वधर्मकर्मक्रिया करणें। तेही अर्पी मजकारणें। मजवेगळें कांहीं करणें। करूं नेणे अणुमात्र॥ ४७॥ सर्वेंद्रियांचिये स्थितीं। सहजें निपजे माझी भक्ती। माझें नाम माझी कीर्ती। वाचा रिती राहो नेणे॥ ४८॥ मनासी आवडे जें जें कांहीं। ते तें अर्पी मजचि पाहीं। शेखीं आपुलें मन तेंही। माझ्या ठायीं समर्पी॥ ४९॥ माझे स्वरूपाचे ठायीं जाण। केवीं घडे मनाचें अर्पण। तेचि विषयींचें निरूपण। स्वयें श्रीकृष्ण सांगत॥ २५०॥
मदर्थेऽर्थपरित्यागो भोगस्य च सुखस्य च।
इष्टं दत्तं हुतं जप्तं मदर्थं यद्व्रतं तप:॥ २३॥
मी परमात्मा परम स्वार्थ। ऐसा करूनि निश्चितार्थ। वेंचिती धन धान्य सर्वार्थ। निजपरमार्थ साधावया॥ ५१॥ परमार्थ साधावया अव्यंग। साचार पोटींचा विराग। मी भेटावया श्रीरंग। सकळ भोग सांडिती॥ ५२॥ छत्र चामर हस्ती घोडे। त्यागूनि होती गा उघडे। ऐसें वैराग्य धडपुडें। मज रोकडें पावावया॥ ५३॥ माझें पावावया निजसुख। द्रव्यदारापुत्रादिक। त्यागूनि सांडिती नि:शेख। यापरी देख अनुतापी॥ ५४॥ आवडीं करितां माझें भजन। विसरे भोगाची आठवण। माझे प्राप्तीलागीं जाण। रिता क्षण जावों नेदी॥ ५५॥ माझेनि उद्देशें परम। करी श्रौत स्मार्त स्वकर्म। अग्निहोत्रादि याग परम। व्रत नेम मजलागीं॥ ५६॥ माझें ठाकावया चिद्रूप। गायत्र्यादि मंत्रजप। माझें पावावया निजस्वरूप। दुष्कर तप आचरती॥ ५७॥ मी विश्वात्मा विश्वतोमुखी। विश्वंभर होतसें सुखी। यालागीं तो दीनमुखीं। करी आवश्यकीं अन्नदान॥ ५८॥ हृदयीं मी स्वत:सिद्ध जाण। त्या माझें करूनि आवाहन। आपण करी जें भोजन। तेंही मदर्पण तो करी॥ ५९॥ कवळ कवळीं हरिस्मरण। तें अन्नचि होय ब्रह्म पूर्ण। यापरी माझे भक्त जाण। कर्म मदर्पण स्वयें करिती॥ २६०॥ ऐशीं सर्वकर्में कृष्णार्पण। सर्वदा जो करी जाण। त्याचें मन होय मदर्पण। तेंचि निरूपण देवो सांगे॥ ६१॥
एवं धर्मैर्मनुष्याणामुद्धवात्मनिवेदिनाम्।
मयि सञ्जायते भक्ति: कोऽन्योऽर्थोऽस्यावशिष्यते॥ २४॥
सर्व कर्में मदर्पण। करितां शुद्ध होय मन। जेवीं लोह कमावितां जाण। होय दर्पण सोज्ज्वळ॥ ६२॥ पुटीं घालितां सुवर्ण। अधिक तेज चढे जाण। करितां वस्त्राचें क्षाळण। स्वच्छपण धोवटी॥ ६३॥ तैसीं सर्व कर्में मदर्पण। करितां निर्मळ होय मन। ते काळीं मनाचें अर्पण। मद्रूपीं जाण हों लागे॥ ६४॥ पूर दाटलिया सरितांसी। सवेग ठाकती सिंधूसी। तेवीं निर्मळत्वें मनासी। माझ्या स्वरूपासी पावणें॥ ६५॥ माझे स्वरूपीं मनाची स्थिती। तैं आर्त जिज्ञासु अर्थार्थी। हे तीनही ते काळीं हारपती। माझी भक्ती चौथी उल्हासे॥ ६६॥ माझें भांडवल मज एक भक्ती। तेथ दुजी तिजी आणि चौथी। हे साधकांची साधन भ्रांती। बहुता भक्ती मज नाहीं॥ ६७॥ तेचि माझी मुख्य भक्ती। येणें साधनें होय प्राप्ती। जे भक्तीस्तव भक्त म्हणविती। ब्रह्मा उमापति सनकादिक॥ ६८॥ नि:शेष मावळल्या अहंकृती। भूतें निजात्मरूप दिसती। माझ्या स्वरूपाची ‘सहजस्थिती’। ते माझी मुख्य भक्ति उद्धवा॥ ६९॥ ये भक्तीच्या लेशस्थितीं। आर्त जिज्ञासु अर्थार्थी। प्रकाशले गा वर्तती। निजस्वार्थी साधक॥ २७०॥ हेचि आर्ताच्या विषयीं। आर्तीतें प्रकाशी पाहीं। मग ‘आर्त’ ऐसे त्याच्या ठायीं। नांवाची नवायी उपतिष्ठे॥ ७१॥ रोगिया नांव आर्तता। हें व्याख्यान नव्हे परमार्था। भगवत्प्राप्तीची तीव्र व्यथा। ते आर्तता परमार्थी॥ ७२॥ जो भगवंताचे प्राप्तीलागीं। कडां घालूं धांवे वेगीं। कां रिघों पाहे जळते आगीं। तो ‘आर्त’ सवेगीं बोलिजे॥ ७३॥ आर्ताची स्थिति ऐसी। जिज्ञासु निवारी त्यासी। मनुष्यदेह ब्रह्मप्राप्तीसी। तो आत्महत्येसी नको योजूं॥ ७४॥ मागील भक्त कोणें रीतीं। जाणोनि पावले भगवद्भक्ती। जीवेंभावें त्या विवरी युक्ती। ‘जिज्ञासा’ निश्चितीं या नांव॥ ७५॥ मज जाणावयाची ऐशी जे आशा। तीतें म्हणती शुद्ध ‘जिज्ञासा’। तेही प्रकाशक माझ्या प्रकाशा। मी जिज्ञासु ऐसा तेणें जाणें॥ ७६॥ ब्रह्मप्रापक युक्तीचा ठसा। या नांव ‘शुद्ध-जिज्ञासा’। वेदशास्त्रजाणीव वळसा। ‘लौकिक-जिज्ञासा’ त्या नांव॥ ७७॥ सर्वां अर्थीं मीचि अर्थना। शुद्ध ‘अर्थार्थी’ या नांव जाणा। म्हणती अर्थार्थी द्रव्यकामना। ते मंद व्याख्याना प्रवर्तती॥ ७८॥ दृष्टी पडे नाना अर्थीं। जो विवंचोनि लावी परमार्थीं। त्या नांव बोलिजे ‘अर्थार्थी’। त्यातेंही निजभक्ती प्रकाशे माझी॥ ७९॥ एवं आर्त-जिज्ञासु-अर्थार्थी। त्यांतें प्रकाशे माझी ‘सहजभक्ती’। ती तें भक्त चतुर्धा मानिती। अधिकारस्थितिविभागें॥ २८०॥ भक्त कल्पनेचिया भ्रांती। माझी भक्ति चतुर्धा मानिती। ते मिथ्या गा वदंती। माझी निजभक्ती एकली॥ ८१॥ ऐशिये निजभक्तीची प्राप्ती। आत्मनिवेदनाची स्थिती। उद्धवा म्यां तुजप्रती। यथानिगुतीं निरूपिली॥ ८२॥ माझिये निजभक्तीचें सार। भक्त पावले जे साचार। त्यांचे सर्वही व्यापार। मदाकार होऊनि ठाकती॥ ८३॥ तो जेउती वास पाहे। ते दिशाचि मी होऊनि ठायें। तो जेउतें चालवी पाये। ते धरा मी होयें धराधर॥ ८४॥ तो करूं बैसल्या भोजन। षड्रस होय मी आपण। त्यासी करावया प्राशन। निजजीवन मी होयें॥ ८५॥ त्यासी चालतां निजपदीं। बोधें दृश्याची निवारीं मांदी। शांति पायघडॺा घाली आधीं। करी पदोपदीं निंबलोण॥ ८६॥ शम दमआज्ञाधारी। हात जोडूनि उभे द्वारीं। ऋद्धिसिद्धी दासी घरीं। विवेक कामारी घरींचा सदा॥ ८७॥ त्याचा बैसता अवकाश। अंगें मी होय हृषीकेश। तो निजावया सावकाश। समाधि मी त्यास आंथुरीं॥ ८८॥ तो जे कांहीं बोल बोले। ते नि:शब्द ब्रह्म-शब्दा आलें। यालागीं श्रोत्यांसी वहिलें। होय भलें समाधान॥ ८९॥ तो अवलीला बोले वोठीं। शब्दासवें माझी गोठी उठी। श्रोत्यांची तेथ पडे मिठी। स्वभावें गोठी ऐकतां॥ २९०॥ चढतां परेचे उपरी। वैकुंठ कैलास पायरी। उन्मनी घालोनि बाहेरी। सुखशेजारीं तो पहुडे॥ ९१॥ मिळोनियां मुक्ती चारी। पाणीवाहती त्याच्या घरीं। श्रीसहित राबें मी श्रीहरी। येरांची थोरी कोण पुसे॥ ९२॥ अवचटें येत्याच्या मुखासी। म्हणे ज्यासी ‘तूं उद्धरिलासी’। तो माथां वाहें मी हृषीकेशी। शब्दें निजधामासी पाववीं वेगीं॥ ९३॥ जे पावले माझी ‘सहजभक्ती’। त्यांचे लळे पाळीं मी या रीतीं। त्यांची मज अनन्य प्रीती। सांगों किती उद्धवा॥ ९४॥ बहुत बोलीं काय कारण। मी देहो तो आत्मा जाण। तो माझा जीवप्राण। हे जाणती खूण निजभक्त॥ ९५॥ नांदतां ‘सहजभक्ती’ आंत। मी देवो तो माझा भक्त। येरवीं मी सगळा त्याआंत। तो समस्त मजमाजीं॥ ९६॥ निजभक्त मजभीतरीं। मी तया आंतबाहेरी। ऐसे सामरस्यें नांदों भारी। वेगळे बाहेरीं नाममात्र॥ ९७॥ माझिया सायुज्या जे आले। ते मीचि होऊनियां ठेले। परी मी होऊनि मज भजले। ते ‘भक्त’ मानिले म्यां ऐसे॥ ९८॥ सायुज्यापरीस भक्ति गोड। याचि निरूपणाचें कोड। उद्धवा तुझी जाणोनि चाड। विशदनिवाड सांगितला॥ ९९॥ ऐशिया माझ्या निजभक्तांसी। अवशेष अर्थ नुरेचि त्यांसी। मी तुष्टलों गा हृषीकेशी। निज भावासी सर्वस्वें॥ ३००॥ ‘भक्तिप्राधान्य भागवतशास्त्र’। तें निजभक्तीचें निजसार। तुज मी सांगितले साचार। अत्यादरपूर्वक॥ १॥ उद्धवा तुझे प्रीतीचेनि व्याजें। मजगुह्याचें निजगुह्य हें जें। तें भक्तीचें करूनियां खाजें। तुज म्यां वोजें दीधलें॥ २॥ म्यां सांगितलें जैशा रीतीं। तैशी सेवावी माझी निजभक्ती। ऐसें बोलत बोलतां श्रीपती। उद्धवप्रीतीं उचलिला॥ ३॥ मागां टाकूनि पीतांबरें। सांडोनियां शंखचक्रें। उद्धव उचलिला श्रीधरें। तरी प्रेम न सांवरे देवाचें॥ ४॥ हांव न बाणेचि दों करीं। मग चारी भुजा पसरी। उद्धवातें हृदयावरी। प्रीतीं थोरीं आलिंगी॥ ५॥ हृदयीं हृदय एक जाहलें। ये हृदयींचें ते हृदयीं घातिलें। कृष्णें सर्वस्व जें आपुलें। तें हृदयीं सूदलें उद्धवाचे॥ ६॥ देव अवाप्तकाम निचाड। त्यासीही भक्तीची ऐसी चाड। अतिशयें उद्धव लागला गोड। स्वानंदें कोड पुरवी त्याचें॥ ७॥ उद्धव प्रेमाचा लवलाहो। आलिंगन सोडूं विसरे देवो। कृष्णहृदया हृदय जडल्या पहा हो। उद्धवा उद्धवो विसरला॥ ८॥ ऐसे स्वानंदीं वाडाकोडा। दोघेहि मिसळले निचाड चाडा। भक्तिसुखाचा सुरवाडा। उद्धव गाढा मीनला॥ ९॥ कृष्णें सर्वस्व आपुलें। उद्धवाचे हृदयीं सूदलें। हें उद्धवा कळों नाहीं दीधलें। लाघव केलें गोविंदें॥ ३१०॥ हा अर्थ कळल्या उद्धवासी। हा येईल मजसी ऐक्यासी। पुढील कथा सुरस ऐसी। मग कोणापाशीं सांगावी॥ ११॥ उद्धवा मज वाडेंकोडें। अखंड हेंचि बोलों आवडे। परी तैसा श्रोता न जोडे। हें थोर सांकडें मजलागीं॥ १२॥ भक्तिसुखाचा सुरवाड। सांगतां माझें पुरे कोड। ऐसा श्रोता कैंचा गोड। यालागीं उद्धवा आड प्रेम सूये॥ १३॥ सूर्यापासूनि फांकती किरण। तैसें सुटलें आलिंगन। कृष्ण उद्धव जाहले भिन्न। परी अभिन्नपण मोडे ना॥ १४॥ पुढील कथेची संगती। दूर ठेली श्लोकसंगती। श्रोतां विरुद्ध न घ्यावें चित्तीं। समूळार्थ निश्चितीं विचारावा॥ १५॥ मूळींचें पद संकोचित। तेथ उत्तम भक्तिभावार्थ। स्वयें बोलिला श्रीकृष्णनाथ। तोचि म्यां अर्थ विस्तारिला॥ १६॥ नारळांतल्या वस्त्राची घडी। उकलितां थोर वाढे वाढी। तेवीं मूळपदाची घडामोडी। कथाएवढी विस्तारली॥ १७॥ मूळपदाचा पद पदार्थ। श्लोकीं पहावा सावचित्त। श्लोक उत्तरार्धीं भगवंत। ध्वनितार्थ बोलोनि गेला॥ १८॥ त्याचि ध्वनिताचे पोटीं। होती भक्ति रहस्याची पेटी। ते म्यां उघडूनि दाविली दिठीं। वृथा चावटी झणें म्हणाल॥ १९॥ तंव श्रोते म्हणती नवल येथ। मूळींचें पद होतें गुप्त। तें काढिलें भक्तिसारामृत। सुहृदयस्थ हरीचें॥ ३२०॥ तुझे हृदयीं श्रीकृष्णनाथ॥ प्रकटोनि आपुलें हृद्गत। ग्रंथीं असे बोलवित। हें सुनिश्चित कळलें आम्हां॥ २१॥ आम्हा ऐकतां भक्तिसारामृत। चित्तीं चैतन्य उथळत। होशी देखणा सुनिश्चित। ग्रंथ यथार्थ अर्थिला॥ २२॥ हें ऐकोनि संतांचें वचन। हरिखला एकाजनार्दन। मस्तकीं वंदिले श्रीचरण। पुढील निरूपण अवधारा॥ २३॥ निजभक्तीचे दृढीकरण। आदरें करिताहे श्रीकृष्ण। सांगितलेंतेंचि निरूपण। पुढती जाण सांगत॥ २४॥
यदाऽऽत्मन्यर्पितं चित्तं शान्तं सत्त्वोपबृंहितम्।
धर्मं ज्ञानं सवैराग्यमैश्वर्यं चाभिपद्यते॥ २५॥
आपुलें जें कां अंत:करण। तें करितां गा मदर्पण। माझी निजभक्ति उल्हासे जाण। जिचें निरूपण म्यां केलें॥ २५॥ मद्रूपीं अर्पावया मन। सुगम वर्म सांगेन जाण। माझें करितां नामस्मरण। पापनिर्दळण तेणें होय॥ २६॥ सकाम स्मरतां नाम। नाम पुरवी सकळ काम। निर्विकल्पें स्मरतां नाम। करी भस्म पापाचें॥ २७॥ होतां पापाचें क्षालण। रज तम जिणोनि जाण। सहजें वाढे सत्त्वगुण। धर्मपरायण धार्मिक॥ २८॥ स्वधर्मनिष्ठ सत्त्वगुणें। अढळ पडे वैराग्याचें ठाणें। वैराग्यें विषय निर्दळणें। निजज्ञान तेणें प्रकाशे॥ २९॥ वाढल्या सविवेक ज्ञान। लागे स्वरूपाचें अनुसंधान। चढे शांतीचें समाधान। तैं मदर्पण मन होये॥ ३३०॥ मन जाहल्या मदर्पण। निजभक्ति उल्हासे जाण। जिचें गतश्लोकीं निरूपण। म्यां संपूर्ण सांगितलें॥ ३१॥ निजभक्ति पावल्या संपूर्ण। भक्तें न मागतां जाण। अष्ट महासिद्धी आपण। त्याचें आंगण वोळंगती॥ ३२॥ जो सिद्धींकडे कदा न पाहे। त्यासी अवशेष कोण अर्थ राहे। माझी संपूर्ण पदवी लाहे। मदैक्य होये मद्भक्तां॥ ३३॥ ऐशी न जोडतां माझी भक्ती। न लाभतां आत्मस्थिती। वर्तणें जैं विषयासक्तीं। तैं अनर्थप्राप्ती अनिवार॥ ३४॥
यदर्पितं तद्विकल्पे इन्द्रियै: परिधावति।
रजस्वलं चासन्निष्ठं चित्तं विद्धि विपर्ययम्॥ २६॥
जो सत्य न मानी वेदशास्त्रार्थ। साच न म्हणे तो परमार्थ। जो ग्रहदाराद्रव्यासक्त। लोलंगत विषयांसी॥ ३५॥ तेणें अत्यंत समळ मेळें। दारुण रजोगुण खवळे। तेणें चित्त होय ज्ञानांधळें। विपरीत कळे ज्ञानार्थ॥ ३६॥ ज्यासी विषयांच्या युक्ती गहन। त्यासी म्हणती अतिसज्ञान। जो करी युक्तीचें छळण। होय मान्य पंडितपणें॥ ३७॥ ज्यासी प्रपंचाचा अतिविस्तार॥ त्यास म्हणती भाग्य थोर। जो नाना भोगीं पाळी शरीर। सुकृती नर त्या म्हणती॥ ३८॥ जो अनुतापीपरमार्थविखीं। त्यासी म्हणती परम दु:खी। जो नाना विषयांतें पोखी। त्यातें महासुखी मानिती॥ ३९॥ ज्याचेनि बोलें मनुष्य मरे। त्याचें सिद्धत्व मानिती खरें। जो उदास राहटे अनाचारें। मुक्त निर्धारें तो म्हणती॥ ३४०॥ ज्याचा दांभिक आचार। त्यातें म्हणती पवित्र नर। जे स्त्रियादि शूद्रां देती मंत्र। ते ज्ञाते थोर मानिती॥ ४१॥ जो कां अनुतापी वैरागी। त्यातें म्हणती अति अभागी। जो उघड विषयांतें भोगी। जो राजयोगी मानिती॥ ४२॥ स्वयें द्रव्याचा अभिलाखी। द्रव्य वेंची त्यातें मूर्ख लेखी। न वेंची त्यातें म्हणती विवेकी। धर्मज्ञ लोकीं हा एक॥ ४३॥ ज्याचे गांठीं बहुसाल धन। तो सर्वांसी अवश्य मान्य। तोचि पवित्र तोचि सज्ञान। ऐसें विपरीत ज्ञान हों लागे॥ ४४॥ आपण सर्वात्मा सर्वेश। हें विसरोनियां नि:शेष। अधर्मी अकर्मी अनीश। मी अज्ञान पुरुष हें मानी॥ ४५॥ तेथ कैं उपजे माझी भक्ती। कैसेनि होईल माझी प्राप्ती। ऐसेभ्रमले नेणों किती। संसारआवर्ती वर्ततां॥ ४६॥ परमात्मप्राप्तीचीं कारणें। अतिगुह्य चारी लक्षणें पोटांतुल्या कृपागुणें। उद्धवाकारणें हरि सांगे॥ ४७॥ धर्माची भजन भोय। ज्ञान वैराग्य ऐश्वर्य। माझी प्राप्ति अवश्य होय। ते चारि उपाय अवधारीं॥ ४८॥
धर्मो मद्भक्तिकृत्प्रोक्तो ज्ञानं चैकात्म्यदर्शनम्।
गुणेष्वसङ्गो वैराग्यमैश्वर्यं चाणिमादय:॥ २७॥
ऐक उद्धवा निजवर्म। गुह्य सांगेन मी परम। माझी भक्ति जे सप्रेम। उत्तम ‘धर्म’ तो जाण॥ ४९॥ ऐक्यें एकात्मता निजबोध। परतोनि कदा नुपजे भेद। या नांव गा ‘ज्ञान’ शुद्ध। कृष्ण परमानंद सांगत॥ ३५०॥ धनधान्य रत्नांच्या राशी। उर्वशी आल्या शेजारासी। तें अवघें तृणप्राय ज्यासी। ‘वैराग्य’ त्यासी आम्ही म्हणों॥ ५१॥ ऐक उद्धवा सुबुद्धी। माझ्या ज्या अष्ट महासिद्धी। त्या मजवेगळॺा दूरी कधीं। जाण त्रिशुद्धी न ढळती कदा॥ ५२॥ माझे निजभक्तीच्या निर्धारीं। जो माझी पदवी घे ऐक्यें करीं। माझ्या सिद्धी त्याच्या घरीं। होती किंकरी निजदासी॥ ५३॥ सिद्धीसेवा करिती। हेंचि नवल सांगों किती। श्रिये सहित मी श्रीपती। भक्तांची भक्ती सर्वस्वें करीं॥ ५४॥ ‘ऐश्वर्याचें मुख्य लक्षण’। अतिशयेंसीं संपूर्ण। भगवत्पदवी घेणें आपण। अतिसंपन्न ऐश्वर्यें॥ ५५॥ म्यां हे सांगितली जे बोली। ते निजगुह्यभांडाराची किल्ली। येणें उघडूनि स्वानंदखोली। भोगीं आपुली सुखसिद्धी॥ ५६॥ चहूं पदांचीं उत्तरें। वाखाणिलीं अतिगंभीरें। ऐकोनि उद्धव चमत्कारें। अत्यादरें विस्मित॥ ५७॥ धर्मादि चहूं पदांचा अर्थ। अलोलिक सांगे श्रीकृष्णनाथ। तरी यमादिकांचा उत्तमार्थ। देवासी प्रत्यक्ष पुसो पां॥ ५८॥ गुह्यार्थ सांगेल श्रीकृष्ण। यालागीं यमादिकांचे प्रश्न। उद्धव पुसताहे आपण। परमार्थ पूर्ण आकळावया॥ ५९॥ पांच श्लोक पंचतीस प्रश्न। उद्धवें केलें ज्ञानगहन। ज्याचें ऐकतां प्रतिवचन। समाधान जीवशिवां॥ ३६०॥ पहिल्या श्लोकींचे सहा प्रश्न। दुसऱ्यामाजीं नव जाण। तिसरा चौथा आठ आठ पूर्ण। चारी प्रश्न पंचमीं॥ ६१॥
उद्धव उवाच
यम: कतिविध: प्रोक्तो नियमो वारिकर्शन।
क: शम: को दम: कृष्ण का तितिक्षा धृति: प्रभो॥ २८॥
अहं रिपु निर्दळणा श्रीपती। ‘यम’ ‘नियम’ प्रकार किती। ‘शम’ ‘दम’ ‘कोण म्हणिजेती। तितिक्षा’ ‘धृती’ ते कैशी॥ ६२॥
किं दानं किं तप: शौर्यं किं सत्यमृतमुच्यते।
कस्त्याग: किं धनं चेष्टं को यज्ञ: का च दक्षिणा॥ २९॥
कोण ‘दान’ कोण ‘तप’ येथ। ‘शौर्य’ कोण कैसें तें ‘सत्य’। ‘ऋत’ जें कां म्हणिजेत। तेंही निश्चित सांगावें॥ ६३॥ कोणता जी ‘त्याग’ येथें। इष्ट ‘धन’ कोण पुरुषातें। ‘यज्ञ’ कशातें म्हणिजेतें। ‘दक्षिणा’ तेथें ते कायी॥ ६४॥
पुंस: किंस्विद् बलं श्रीमन् भगो लाभश्च केशव।
का विद्या ह्री: परा का श्री: किं सुखं दु:खमेव च॥ ३०॥
पुरुषासी ‘बळाची’ कोण शक्ती। ‘दया’ बोलिजे कोणे स्थितीं। ‘लाभ’ तो कोण गा श्रीपती। सांग कृपामूर्ती केशवा॥ ६५॥ ‘विद्या’ म्हणावें कशातें। ‘लज्जा’ कोणे ठायीं वर्ते। उत्कृष्ट ‘लक्ष्मी’ कोण येथें। तेही अनंतें सांगावी॥ ६६॥ येथील कोण पां कैसें ‘सुख’। मज सांगावें कृपापूर्वक। सुखाचे सांगाती जें ‘दु:ख’। त्याचेंही रूपक सांगावें॥ ६७॥
क: पण्डित: कश्च मूर्ख: क: पन्था उत्पथश्च क:।
क: स्वर्गो नरक: क: स्वित्को बन्धुरुत किं गृहम्॥ ३१॥
‘पंडिताचें’ काय लक्षण। ‘मूर्ख’ म्हणावया कोण गुण। ‘सुमार्ग’ म्हणावया तो कोण। सांगे निरूपण ‘उन्मार्गाचें’॥ ६८॥ ‘स्वर्ग’ कशातें बोलिजे। ‘नरक’ कैसा वोळखिजे। सखा ‘बंधु’ कोण म्हणिजे। ‘गृह’ माझें तें कोण॥ ६९॥
क आढॺ: को दरिद्रो वा कृपण: क: क ईश्वर:।
एतान् प्रश्नान्मम ब्रूहि विपरीतांश्च सत्पते॥ ३२॥
‘आढॺ’ कैसेनि म्हणिजे। ‘दरिद्री’ कैसेनि जाणिजे। ‘कृपण’ कोणातें बोलिजे। ‘ईश्वर’ वोळखिजे तो कैसा॥ ३७०॥ हे माझे प्रश्न जी समस्त। यांचा सांगावा विशदार्थ। जोलौकिकाहूनि विपरीत। उपयुक्त परमार्था॥ ७१॥ लौकिकाहूनि विपरीतार्थ। त्यातें बोलती गा ‘विपरीत’। या अवघियांचा मथितार्थ। परमार्थयुक्त प्रश्न सांगा॥ ७२॥ ज्ञानें सज्ञान संतमूर्ती। त्यांचा स्वामी तूं निश्चितीं। यालागीं तूतें गा ‘सत्पत्ती’। सज्ञान म्हणती शास्त्रार्थें॥ ७३॥ माझ्या प्रश्नांची प्रश्नोक्ती। परमार्थप्राप्तीलागीं श्रीपती। मज सांगावें यथार्थस्थिती। देवासी विनंती उद्धवें केली॥ ७४॥ ऐकोनि भक्ताची विनवण। कृपा द्रवला नारायण। परमार्थरूप त्याचे प्रश्न। स्वयें श्रीकृष्ण सांगेल॥ ७५॥ प्रथम तीं श्लोकीं यम नियम। विशद सांगेल पुरुषोत्तम। इतर प्रश्न अतिउत्तम। सांगे मेघश्याम अध्यायांतीं॥ ७६॥
श्रीभगवानुवाच
अहिंसा सत्यमस्तेयमसङ्गो ह्रीरसञ्चय:।
आस्तिक्यं ब्रह्मचर्यं च मौनं स्थैर्यं क्षमाभयम्॥ ३३॥
प्रथम श्लोकींचा उभारा। यमाचीं लक्षणें बारा। पुशिल्या प्रश्नानुसारा। प्रतिउत्तरा हरि बोले॥ ७७॥ पुढां प्रश्न आहेत फार। यालागीं यमनियमांचें उत्तर। आवरूनि संक्षेपाकार। स्वयें श्रीधर सांगत॥ ७८॥ ‘अहिंसा’ कायावाचामनें। परपीडा त्याग करणें। ‘सत्य’ तें यथार्थ बोलणें। ‘अचौर्य’ लक्षणें तीं ऐक॥ ७९॥ हातें चोरी नाहीं करणें। परी परद्रव्याकारणें। मनीं अभिलाष नाहीं धरणें। ‘अस्तेय’ लक्षण त्या नांव॥ ३८०॥ असतां देहगेहसंगती। ज्याचे पोटीं नाहीं आसक्ती। जेवीं यात्रेमाजीं लोक येती। परी संगासक्ती त्यां नाहीं॥ ८१॥ स्फटिक ठेविला ज्या रंगावरी। त्यासारिखा दिसे बाहेरी। आपण निर्विकार अंतरीं। तेवीं जो शरीरीं ‘असंगता’ ते॥ ८२॥ निंद्य कर्माकारणें। पोटांतूनि कंटाळणें। लौकिकीं निंद्य कर्मा लाजणें। ‘ह्री’ म्हणणें या नांव॥ ८३॥ इहलोकीं संग्रहो करूं नेणें। जाणे दैवाधीन देहाचे जिणें। स्वर्गसुख भोगाकारणें। नाहीं संग्रहणें पुण्यातें॥ ८४॥ पुण्यें स्वर्गभोगप्राप्ती। पुण्यक्षयें होय पुनरावृत्ती। जेणें क्षयो पावे पुण्यसंपत्ती। तें न संचिती निजभक्त॥ ८५॥ या नांव गा ‘असंचयो’। ऐक ‘आस्तिक्याचा’ निर्वाहो। सर्वत्र माझा ब्रह्मभावो। कोठेंही अभावो घेऊं नेणें॥ ८६॥ ‘ब्रह्मचर्य’ ऐसें येथ। जैसें आश्रमप्रयुक्त। बोलिलें शास्त्रीं यथोचित। तेंचि निश्चित करावें॥ ८७॥ ‘मौनीं’ न बोलावें इतुकें जाण। मिथ्यालाप असंभाषण। नित्य करावें वेदपठण। गायत्रीस्मरण कां हरिनाम॥ ८८॥ स्थिरवृत्ति आत्मारामीं। कां असावी निजधर्मीं। भावार्थें संतसमागमीं। ‘स्थिरता’ उपक्रमीं या नांव॥ ८९॥ स्वदेह दंडिलें कां वंदिलें। परी क्षमा सम दोंही काळें। देहाचा भोग तो दैवमेळें। येणें विवेकमेळें क्षमावंत॥ ३९०॥ या नांव ‘क्षमा’ म्हणिजे। अभय तें ऐसें जाणिजे। जें जें पारिखें देखिजे। तें तें होइजे आपणचि॥ ९१॥ आत्मा एक पंचभूतें एक। दुजें पाहतां नाहीं देख। निमालें भयाचें महादु:ख। ‘अभय’ नि:शेख या नांव॥ ९२॥ निमाल्या दुजयाच्या गोठी। वोखदासी भय न मिळे सृष्टीं। अभयाची स्वानंदपुष्टी। निजदृष्टीं ठसावे॥ ९३॥ या नांव गा बाराही ‘यम’। उद्धवा सांगितले सवर्म। आतां जयाचें नाम ‘नेम’। तेंही सुगम अवधारीं॥ ९४॥
शौचं जपस्तपो होम: श्रद्धाऽऽतिथ्यं मदर्चनम्।
तीर्थाटनं परार्थेहा तुष्टिराचार्यसेवनम्॥ ३४॥
शौचाची ऐशी परी। अंतरीं शुचि विवेकेंकरीं। बाह्य तें वेदाज्ञेवरी। ‘शौच’ करीं मृज्जलें॥ ९५॥ परिसें ‘जपाचा’ विचार। ज्यासी जैसा अधिकार। तैसा जपावा नाममंत्र। कां स्वतंत्र गुरुनाम॥ ९६॥ ब्राह्मणाचा जप वेदोच्चार। संन्यासी जपे ओंकार। द्विजन्म्यासी आगममंत्र। कां नाममंत्र सर्वांसी॥ ९७॥ तपाचा जो मुख्य प्रकार। जेणें शुद्ध होय अभ्यंतर। तो स्वधर्मीं गा सादर। अत्यादर करावा॥ ९८॥ शरीरशोषणा नांव तप। हा मूर्खाचा खटाटोप। हृदयीं श्रीहरि चिंतणें सद्रूप। परम ‘तप’ या नांव॥ ९९॥ ऐक होमाचा विचार। देवाचे मुख वैश्वानर। पंचमहायज्ञ अग्निहोत्र। ‘होम’ साचार या नांव॥ ४००॥ भजनाची अतिआवडी। कां धर्माची अधिक गोडी। या नांव ‘श्रद्धा’ रोकडी। जाण धडफुडी उद्धवा॥ १॥ नसतांही अन्नधनें। आतिथ्यें दे समाधानें। मस्तकीं वंदूनियां दीनें। निववी वचनें सुखरूपें॥ २॥ दीन देखोनि तत्त्वतां। अतिनम्र विनीतता। यथाशक्ति अर्पणें अर्था। ‘आतिथ्य’ तत्त्वतां या नांव॥ ३॥ पोटींच्या कळवळेंनि वोजा। अत्यादरें गरुडध्वजा। साङ्ग साजिरी करणें पूजा। श्रद्धा समाजासंभारीं॥ ४॥ मेळवूनि ब्राह्मणसंभार। श्रद्धायुक्त षोडशोपचार। पूजितां संतोषें मी श्रीधर। ‘पूजा’ पवित्र ब्राह्मणांची॥ ५॥ शुद्ध व्हावया अंत:करण। करावें गा तीर्थगमन। तीर्थयात्रीं श्रद्धा गहन। ‘तीर्थाटन’ या नांव॥ ६॥ पदोपदीं माझें नाम। गर्जतां स्मरती माझें कर्म। यात्रा करणें निजनिष्काम। ‘तीर्थयात्रा’ परम या नांव॥ ७॥ परोपकारार्थ पर्वत। जेवीं कां सामग्री वाहत। तेवीं क्रियामात्रें उपकारार्थ। सदा वर्तत उपकारीं॥ ८॥ जेवीं का चंद्राचे किरण। लागतांचि निवविती जाण। तेवीं जयाचें आचरण। ‘उपकारें’ जन सुखी करी॥ ९॥ जें प्राप्त जाहलें अदृष्टीं। तेणें काळ यथासुखें लोटी। कदा समासम नाहीं पोटीं। ‘यथालाभसंतुष्टी’ या नांव॥ ४१०॥ कायावाचामनें धनें। जो विनटला गुरूकारणें। त्याचें उठे संसारधरणें। ‘गुरुसेवा’ म्हणणें या नांव॥ ११॥ उभय शौचाचे दोनी गुण। जपादि येर दशलक्षण। हे बारा ‘नेम’ जाण। देवो आपण बोलिला॥ १२॥
एते यमा: सनियमा उभयोर्द्वादश स्मृता:।
पुंसामुपासितास्तात यथाकामं दुहन्ति हि॥ ३५॥
दोंही श्लोकीं यम नियम। निरूपिले उत्तमोत्तम। बारा बारा यांचें वर्म। गुह्य परम शास्त्रार्थी॥ १३॥ पुरुष यांचें उपासन। जरी करी सकाममन। तैं कामधेनूच्या ऐसें जाण। करिती पूर्ण सकळ काम॥ १४॥ हेचि पैं गा यम नेम। पुरुष उपासी निष्काम। तैं त्यासि माझें निजधाम। अतिसुगम निजप्राप्ती॥ १५॥ आतां शमदमादिक तुझे प्रश्न। जेणें हाता पावे ब्रह्मज्ञान। तें सांगेन गुह्यनिरूपण। सावधान उद्धवा॥ १६॥ प्रश्नोत्तर सांगेल श्रीकृष्ण। तें अवधारितां सावधान। तत्काळ होय ब्रह्मज्ञान। हें परम प्रमाण अतिगुह्य॥ १७॥ तृप्त व्हावया बालकासी। निजकरें माताग्रास दे त्यासी। तेवीं श्रीकृष्ण उद्धवासी। ब्रह्मज्ञानासी देतसे॥ १८॥ जो रसु गोड लागे पित्यासी। तो बळेंचि पाजी बालकासी। तेवीं श्रीकृष्ण उद्धवासी। ब्रह्मरसासी देतसे॥ १९॥ आधींचि तानयाचें प्रेम मोठें। वरी लागतां त्याचें मुखवटें। मग स्वानंदाचेनि नेटें। पान्हा लोटे अनिवार॥ ४२०॥ तेवीं स्वयें श्रीकृष्ण। दाटूनि देतसे ब्रह्मज्ञान। तेथें उद्धवें पुशिले प्रश्न। तेणेंअधिक जाण तुष्टला॥ २१॥ आधींच पर्जन्य खरा। वरी मीनलासे वीजवारा। मग अनिवार वर्षेधारा। खणोनि धरा वाहतसे॥ २२॥ तेवीं द्यावया ब्रह्मज्ञान। मिष उद्धवाचे प्रश्न। स्वानंदें तुष्टला श्रीकृष्ण। ब्रह्म पूर्ण देतसे॥ २३॥ निमोले देतां मिठाचे खडे। चिंतामणी हातीं चढे। कां विटेसाठीं परीस जोडे। न घे तो नाडे निजस्वार्था॥ २४॥ तेवीं उद्धवाचे थोडे प्रश्न। तेणें आतुडे ब्रह्म पूर्ण। एका विनवी जनार्दन। श्रोतां अवधान मज द्यावें॥ २५॥ उद्धवाचे चौतीस प्रश्न। त्यांत यम नियम जाहले जाण। उरले बत्तीस गुण। तेंही विवंचन अवधारा॥ २६॥ प्रश्नीं दयेचें प्रतिउत्तर। न सांगेचि शारंगधर। त्या अर्थीं भावगर्भ सार। षड्गुणैश्वर्य बोलिलें॥ २७॥ एही विखींचें व्याख्यान। पुढें सांगेल श्रीकृष्ण। दयेच्या ठायीं भाग्य संपूर्ण। कोण कारण सांगावया॥ २८॥ एवं उरले एकतीस प्रश्न। आधिक एक सांगेल श्रीकृष्ण। ‘कर्मस्वसंगम शौच’ जाण। कार्यकारणसंबंधा॥ २९॥ ऐसे हे तेहतीस प्रश्न। व्याख्यान सांगेल श्रीकृष्ण। तें करतळीं ब्रह्मज्ञान। उद्धवासी जाण देतसे॥ ४३०॥
शमो मन्निष्ठता बुद्धेर्दम इन्द्रियसंयम:।
तितिक्षा दु:खसंमर्षो जिह्वोपस्थजयो धृति:॥ ३६॥
बुद्धि जे कां विवेकवंती। असार सांडूनि सार धरिती। तिणें मनाच्या सकळ वृत्ती। विवेकस्थिती आवरोनि॥ ३१॥ त्या वृत्तीसमवेत आपण। बुद्धि परमात्मीं मिळे जाण। जेवीं सागरासी लवण। दे आलिंगन भावार्थें॥ ३२॥ समुद्रीं मिळतां लवण। समुद्रचि होय आपण। तेवीं आत्मनिश्चयें बुद्धि पूर्ण। चैतन्यघन स्वयें होय॥ ३३॥ ऐसा बुद्धीचा उपरम। त्यातें म्हणिजे गा ‘शम’। यापूर्वी करावया दम। तोही अनुक्रम अवधारीं॥ ३४॥ शत्रूचें जें दुर्दमन। तो दमु येथें नव्हे जाण। करावें इंद्रियदमन। तेंही लक्षण अवधारीं॥ ३५॥ जेणें सहाय होती शमासी। त्या युक्तीं राखणे इंद्रियांसी। विधीवेगळें नेदी भोगासी। आवरी अहर्निशीं वैराग्यें॥ ३६॥ ऐसें इंद्रियांचें निग्रहण। त्या नांव गा ‘दम’ गुण। आतां तितिक्षेचें लक्षण। ऐक संपूर्ण सांगेन॥ ३७॥ महासुख आलें होये। तें जेणें उल्हासें अंगीं वाहे। तेणेंचि उल्हासें पाहे। दु:खही साहे निजांगीं॥ ३८॥ तेज आणि महा अंधारी। नभ समत्वें अंगीं धरी। तेवीं जो अविकारी। सुखदु:खपरी साहता॥ ३९॥ गोफणेचा सुवर्णपाषाण। लागे तो दु:खी होय पूर्ण। तोचि वोळखिलिया सुवर्ण। दु:ख जाऊन सुख वाटे॥ ४४०॥ तैसें द्वंद्वांचें निजस्वरूप। वोळखिलियासद्रूप। तेव्हां द्वंद्वें होती चिद्रूप। हें मुख्य स्वरूप तितिक्षेचें॥ ४१॥ सांडूनियां देहअहंते। सुखदु:खांहीपरतें। देखणें जें आपणातें। तेचि येथें ‘तितिक्षा’॥ ४२॥ स्वप्नींचे दरिद्र आणि सधनता। जागृतीसी दोन्ही मिथ्या। तेवीं सुखदु:खा परता। देखणें तत्त्वतां ते ‘तितिक्षा’॥ ४३॥ जिव्हा आणि दुसरें शिश्न। यांचा जयो करावा आपण। या नांव ‘धृति’ संपूर्ण। विद्याधारणधृती नव्हे॥ ४४॥ जेवीं कृष्णसर्प धरिजे हातीं। हे दोनी धरिजे तैशिया रीतीं। अळुमाळ ढिलावतां धृती। परतोनि खाती धरि त्यासी॥ ४५॥ ज्यासी द्रव्यदारासक्ती। तेथ कदा न रिगे हे धृती। द्रव्यदारा अनासक्ती। त्याचे घरीं धृती पोषणी सदा॥ ४६॥
दण्डन्यास: परं दानं कामत्यागस्तप: स्मृतम्।
स्वभावविजय: शौर्यं सत्यं च समदर्शनम्॥ ३७॥
सर्व भूतांसी न द्यावें दु:ख। याचे पोटीं आलें सुख। ‘महादान’ तें हेंचि देख। द्यावें सुख सर्वांसी॥ ४७॥ दु:ख निरसूनि भूतांसी। सुख देणें गा सर्वांसी। हेंचि उत्तम दान पृथ्वीसी। आनयासी तुकेना॥ ४८॥ जन्ममरणाचें दु:ख। निरसूनि द्यावें निजसुख। याचि नांवें ‘दान’ देख। अलौकिक उद्धवा॥ ४९॥ या नांव गा ‘परमदान’। उद्धवा निश्चयेंसीं जाण। ऐक तपाचें लक्षण। तुज संपूर्ण सांगेन॥ ४५०॥ करूनियां कामाचा त्याग। तप करणें तें अतिचांग। हृदयीं असतां कामदाघ। तपाचें लिंग शोभेना॥ ५१॥ सकाम वना जाय तपासी। तो वनींही चिंती वनितेसी। तें तपचि बाधक होय त्यासी। काम आंगेंसीं वर्ततां॥ ५२॥ त्यागोनि कामाची कामस्थिती। तैं तपाची उत्तम गती। अखंड लागे माझी स्मृती। ‘शुद्धतप’ प्राप्ती या नांव॥ ५३॥ माझ्या ठायीं अनुताप। त्या नांव गा ‘शुद्ध’ तप। कां हृदयीं चिंतितां चित्स्वरूप। हें ‘परमतप’ तपांमाजीं॥ ५४॥ ऐक शौर्याचा विचार। रणीं मर्दूनि अरिवीर। जिंतिला शत्रूंचा संभार। तो एथ शूर मानेना॥ ५५॥ प्रवाहरूपें अनिवार। जीवभाव लागला थोर। त्यातें जिंके जो महावीर। तो ‘परम शूर’ बोलिजे॥ ५६॥ ‘‘माझा सदाचार निर्वाहो। मी सज्ञान नि:संदेहो। माझा पवित्र ब्राह्मणदेहो’’। हा ‘जीवभावो’ जीवाचा॥ ५७॥ देहाचे माथां वर्णाश्रम। आश्रमाचे माथां कर्म। तो कर्माभिमान ज्यां परम। त्यांसी देहभ्रम अनिवार॥ ५८॥ जिणोनि जीवाचे स्वभाव। चिदानंदाची राणीव। भोगिजे स्वराज्यवैभव। हें परम गौरव शौर्याचें॥ ५९॥ ज्या नांव बोलिजे निजसत्य। तें मी सांगेन निश्चित। सम ब्रह्म देखणें संतत। तें ‘परम सत्य’ उद्धवा॥ ४६०॥ वस्तु न देखतां सर्वसम। जें जें देखणेंगा विषम। तेंचि असत्य अतिदुर्गम। ‘सत्य’ तें ब्रह्म समसाम्य॥ ६१॥ केवळ जें सत्य भाषण। तें निजसत्य नव्हे जाण। तेचि विखींचें निरूपण। स्वयें श्रीकृष्ण सांगत॥ ६२॥
ऋतं च सूनृता वाणी कविभि: परिकीर्तिता।
कर्मस्वसङ्गम: शौचं त्याग: संन्यास उच्यते॥ ३८॥
इतर कवींची वदंती। ‘ऋत’ या नांव सत्य म्हणती। हें सत्य मानावें प्रवृत्तीं। सम ब्रह्म निवृत्तीमाजीं सत्य॥ ६३॥ ऋत म्हणिजे तें ऐसें येथ। सत्य वाचा जें श्रोत्यांचें हित। तेंही दु:खसंबंधरहित। ‘ऋत’ निश्चित या नांव॥ ६४॥ चित्रीं पाहतां दिसे विषम। त्यामाजीं भिंती सदा सम। तेवीं जग देखतां विषम। ज्यां ब्रह्म सम निजबोधें॥ ६५॥ या नांव गा ‘सत्य’ जाण। उद्धवें केला नाहीं जो प्रश्न। त्या शौचाचें निरूपण। देवो आपण सांगत॥ ६६॥ नव्हतां शुद्ध अंत:करण। त्याग संन्यास न घडे जाण। अंतरशुद्धॺर्थ शौच पूर्ण। स्वधर्माचरण हरि सांगे॥ ६७॥ अंतरीं कर्ममळाचें बंधन। त्याचें स्वधर्में करावें क्षालन। कर्में कर्माचें निर्दळण। करूनि आपण निष्कर्म व्हावें॥ ६८॥ ते स्वधर्मीं फळाशा सुटता। कर्मबंधनें तुटती सर्वथा। यालागीं फळनिराशता। अंतरशौचता अतिशीघ्र॥ ६९॥ नैराश्यें स्वधर्माचरण। तेणें अंतरमळाचें क्षालन। या नांव गा शौच जाण। ‘शौच’ संपूर्ण नैराश्यें॥ ४७०॥ ऐसें शौच शुद्धअंत:करणीं। ते भूमिका संन्यासग्रहणीं। यालागीं शौच अप्रश्नीं। सारंगपाणी बोलिला॥ ७१॥ सकळ संकल्पांचा त्याग। हाचि पैं ‘संन्यास’ चांग। ऐसें बोलिला तो श्रीरंग। ‘त्याग’ तो चांग या नांव॥ ७२॥ मी देह हे दृढता जीवीं। संकल्पें तगमग नित्य नवी। बाह्य दंड कमंडलु भगवीं। हे संन्यासपदवी लौकिक॥ ७३॥
धर्म इष्टं धनं नॄणां यज्ञोऽहं भगवत्तम:।
दक्षिणा ज्ञानसन्देश: प्राणायाम: परं बलम्॥ ३९॥
धन धान्य पशु रत्न। हें प्राण्यासी नव्हे इष्ट धन। मोक्षामार्गीं सबळ जाण। इष्ट धन तो धर्म॥ ७४॥ घरीं जें पुरिलें धन। तें घरींच राहे जाण। धर्म तो सवें चालतें धन। अंगा बंधन येवो नेदी॥ ७५॥ धर्मिष्ठायेवढा कृपण। न देखें मी आणिक जाण। मरतांही स्त्रीपुत्रां वंचून। अवघेंचि धन सवें ने॥ ७६॥ धार्मिकीं धर्मार्थ वेंचूनि धन। मी भांडारी केला नारायण। जे समयीं जें जें लागे जाण। तें मी आपण स्वयें पुरवीं॥ ७७॥ यालागीं धर्म तो इष्ट धन। हें सत्य सत्य माझें वचन। ऐक यज्ञाचें व्याख्यान। यथार्थ जाण सांगतों॥ ७८॥ अग्नि तो माझें मुख जाण। यज्ञभोक्ता मी नारायण। अवघा यज्ञचि मी श्रीकृष्ण। परम प्रमाण वेदोक्त॥ ७९॥ तेथें माझेंस्वरूप ब्राह्मण। मद्दीक्षादीक्षित जाण। सद्भावें करूनियां यजन। माझें सुख संपूर्ण पावले॥ ४८०॥ तेथ अधर्मद्रव्याचेनि कोडें। अविधी दांभिक याग घडे। तोही मज मुखींच पडे। परी ते कोरडे खडखडित॥ ८१॥ अविधी जाहले पशुघातकी। तेणें अवदानें मी नव्हें सुखी। दंभें पडले कुंभिपाकीं। महानरकीं रौरवीं॥ ८२॥ सर्व भूतांच्या भूतमुखीं। अर्पी तें पावे यज्ञपुरुखीं। हे दीक्षा नेणोनि याज्ञिकीं। जाहले नारकी हिंसादोषें॥ ८३॥ जे मद्भावें दीक्षित जाण। विश्वतोमुखीं ज्यांचें यजन। तयांचा ‘यज्ञ’ तो मी नारायण। दक्षिणा कोण ते ऐका॥ ८४॥ यज्ञासी मोल नाहीं देख। ज्यासी ज्ञानदक्षिणा अमोलिक। हातां येतांचि याज्ञिक। महासुख पावले॥ ८५॥ दक्षिणा आल्या ज्ञानघन। याज्ञिक होती अतिसंपन्न। कल्पांतीं वेंचेना तें धन। निजीं समाधान जीवशिवां॥ ८६॥ सर्वांमाजीं प्राण सबळ। प्राणबळें बळी सकळ। प्राणयोगें मन चपळ। अतिचंचळ प्राणस्पंदें॥ ८७॥ यापरी गा बळिष्ठ प्राण। प्राणाअधीन सदा मन। तो प्राण जिंकावा आपण। ‘बळवंतपण’ यानांव॥ ८८॥ गज उपडिजे पायीं धरून। घायीं चूर कीजे पंचानन। प्राण न जिंकतां जाण। शूरांचें प्रमाण नव्हे बळ॥ ८९॥ प्राणाअधीन जीव मन। त्या प्राणाचें करूनि दमन। तो स्वयें कीजे गा स्वाधीन। ‘अतिबळ’ जाण या नांव॥ ४९०॥ दृढ प्राणायाम साधिल्यापाठीं। थोरला देवो धांवेभेटी। भेटलिया न सुटे मिठी। ऐसा ‘बळी’ सृष्टीं प्राणायामी॥ ९१॥
भगो म ऐश्वरो भावो लाभो मद्भक्तिरुत्तम:।
विद्याऽऽत्मनि भिदाबाधो जुगुप्सा ह्रीरकर्मसु॥ ४०॥
उद्धवें पुशिला दयेचा प्रश्न। तें न सांगोनि श्रीकृष्ण। परम भाग्याचें निरूपण। स्वयें आपण सांगत॥ ९२॥ केवळ भाग्येंवीण। दया तितुकी वांझ जाण। यालागीं भाग्यनिरूपण। स्वयें श्रीकृष्ण सांगत॥ ९३॥ म्हणसी कृपणाचें भाग्य। तो असतेनि धनें अभाग्य। परम भाग्य त्याचें चांग। जो दयेतें साङ्ग प्रतिपाळी॥ ९४॥ त्या परम भाग्याचें लक्षण। तुज मी सांगेन संपूर्ण। ऐक तेथींची उणखूण। उदारपण भाग्याचें॥ ९५॥ ‘ज्ञान’ आणि ‘वैराग्य’ पूर्ण। ‘लक्ष्मी’ आणि ‘औदार्य’ गुण। ‘ऐश्वर्य’ आणि ‘यश’ गहन। हे षड्गुण जाण महाभाग्य॥ ९६॥ हे षड्गुण माझें भाग्य। भाग्यें पावे जो सभाग्य। तोचि दयेतें पाळी साङ्ग। अतिअव्यंग पूर्णत्वें॥ ९७॥ जो षड्गुणेंशीं संपन्न। तोचि दीनदयाळू जाण। देऊं जाणे दान सन्मान। दरिद्रविच्छिन्न करूं शके॥ ९८॥ ऐशिया सभाग्याची भेटी। होय तें भाग्य पाहिजे ललाटीं। माझ्या भाग्यासम सृष्टीं। आणिक दृष्टीं दिसेना॥ ९९॥ ऐसेनि ऐश्वर्यें संपन्न। तो दयेचें माहेर जाण। तिसी सोहळे करिती आपण। दया संपन्न त्याचेनि॥ ५००॥ यालागीं दयेचे पोटीं। म्यां सांगितली भाग्याचीगोठी। भूतदया जयाच्या पोटीं। तो अभाग्य सृष्टीं कदा नोहे॥ १॥ तुवां पुशिला लाभ तो कोण। ऐक त्याचेंही लक्षण। माझी उत्तम भक्ति जाण। ‘लाभ’ संपूर्ण त्या नांव॥ २॥ माझी करिता उत्तम भक्ती। चारी मुक्ती पायां लागती। सुरवर लोटांगणीं येती। लाभ श्रीपति मी लाभें॥ ३॥ हा लाभ न येतां हातीं। धनादिकांची जे प्राप्ती। तो नाडु जाण निश्चितीं। नरक गतिदायक॥ ४॥ यालागीं परम लाभ माझी भक्ती। जेणें मी लाभें श्रीपती। ऐक विद्येची व्युत्पत्ती। यथानिगुतीं सांगेन॥ ५॥ दृढ वासनेचिया संबंधा। शुद्धास आणी जीवपदा। अभेदीं उपजवी भेदा। ‘अविद्याबाधा’ या नांव॥ ६॥ देहाचे माथां वर्णाश्रम। आश्रमाचे माथां कर्म। त्या कर्माचा अभिमान परम। तो ‘जीवधर्म’ देहबुद्धी॥ ७॥ ते छेदोनि जीवाची बाधा। तो मेळविजे चिदानंदा। ती नांव शुद्ध ‘आत्मविद्या’। येर ते अविद्या सर्वही॥ ८॥ जे निरसी गा अविद्या। ते बोलिजे शुुद्ध विद्या। येरी शास्त्रादि चौदा विद्या। ते जाण अविद्या पाल्हेली॥ ९॥ जे निरसी जीवाची बाधा। ते बोलिजे शुद्ध आत्मविद्या। आइक ह्रीच्या संबंधा। लाजावें सदा निंद्यकर्मी॥ ५१०॥ केवळ अवयव झांकणें। ते लज्जा येथ कोण म्हणे। गेलियाही जीवेंप्राणें। अकर्म न करणें ते ‘लज्जा’॥ ११॥
श्रीर्गुणा नैरपेक्ष्याद्या: सुखं दु:खसुखात्यय:।
दु:खं कामसुखापेक्षा पण्डितो बन्धमोक्षवित्॥ ४१॥
सकळ साम्राज्यवैभवेंसीं। चतुर्दशभुवनविलासेंसीं। अंगीं लक्ष्मी आलिया जयापाशीं। परी थुंकोनि तिसी पाहेना॥ १२॥ ऐशी ज्याची निरपेक्षता। ते उत्कृष्ट ‘श्री’ तत्त्वतां। त्यासी मी श्रीकृष्ण वंदीं माथां। इतरांची कथा कायसी॥ १३॥ ज्यासी लक्ष्मीची निरपेक्षता। त्याची नित्य वस्ती माझे माथां। त्याही होनि पढियंता। आणिक सर्वथा मज नाहीं॥ १४॥ सुख आणि महादु:ख। दोनींतें ग्रासोनियां देख। प्रकटे स्वानंद स्वाभाविक। या नांव ‘सुख’ उद्धवा॥ १५॥ जेथ दुजयाची चाड नाहीं। इंद्रियांचा पांग न पडे कांहीं। विषयावीण आनंद हृदयीं। ‘निजसुख’ पाहीं या नांव॥ १६॥ विसरोनि हें निजसुख। कामापेक्षा करणें देख। याचि नांव गा परम ‘दु:ख’। केवळ ते मूर्ख सेविती॥ १७॥ नित्य होतां कामप्राप्ती। कदा नव्हे कामतृप्ती। कामापेक्षा पाडी दु:खावर्तीं। दु:ख निश्चितीं कामापेक्षा॥ १८॥ हा बंध हा मोक्ष चोख। जाणणें जें अलौकिक। कदा नव्हेआनुमानिक। ‘पंडित’ देख या नांव॥ १९॥ ऐशी न जोडतां अवस्था। आम्ही सज्ञान वेदशास्त्रतां। ऐशी अभिमानी पंडितता। ते न ये सर्वथा उपेगा॥ ५२०॥ ज्यासी शांति आणि समाधान। साचार बंधमोक्षाचें ज्ञान। तो ‘महापंडित’ जाण। ऐसें श्रीकृष्ण बोलिला॥ २१॥
मूर्खो देहाद्यहंबुद्धि: पन्था मन्निगम: स्मृत:।
उत्पथश्चित्तविक्षेप: स्वर्ग: सत्त्वगुणोदय:॥ ४२॥
वेदशास्त्र नेणता एक। त्यासी मूर्ख म्हणती लोक। ते मूर्खता येथें न मने देख। केवळ मूर्ख देहाभिमानी॥ २२॥ केवळ नश्वर देह देख। तो मी म्हणोनि मानी हरिख। देहाभिमानें भोगी नरक। यापरता मूर्ख कोण आहे॥ २३॥ विटाळें देहाचा संभवो। विटाळें देहाचा उद्भवो। विटाळेंचि निधन पहा हो। विटाळासी ठावो देहापाशीं॥ २४॥ देहाचें निजरूप येथ। अस्थि चर्म विष्ठा मूत्र। तो मी म्हणवूनि जो श्लाघत। ‘मूर्ख’ निश्चित तो जाण॥ २५॥ ऐशी जे कां देहअहंता। ती नांव परममूर्खता। चालणें माझ्या वेदपंथा। ‘सन्मार्गता’ ती नांव॥ २६॥ ज्यासी जाहली चित्तविक्षेपता। तो निंदी गुरुदेवता। जो न मानी वेदशास्त्रार्था। तो उत्पथामाजीं पडे॥ २७॥ जो गुरुदोषदर्शी समत्सरता। जो क्रोध करी सुहृदआप्तां। जो धिक्कारी मातापिता। ‘चित्तविक्षेपता’ त्या नांव॥ २८॥ जो सन्मानालागीं पाही। साधुसज्जनांतें करी द्रोही। जो दोष देखे ठायीं ठायीं। ‘चित्तविक्षेप’ पाहीं या नांव॥ २९॥ जो वदे परापवादा। जो करूं रिघे परनिंदा। जो विश्वासे स्त्रियेचे शब्दा। ‘चित्तविक्षेपबाधा’। ती नांव॥ ५३०॥ जो सन्मार्गापासूनि चेवता। पडे अधर्म अकर्म उत्पथा। तेही ‘चित्तविक्षेपता’। जाण तत्त्वतां उद्धवा॥ ३१॥ आपण तत्त्वतां परब्रह्म। जाणणें हा ‘वेदमार्ग’ उत्तम। हें नेणोनि वर्तणें सकाम। तोचि परम ‘उन्मार्ग’॥ ३२॥ स्वर्गशब्दाची व्युत्पत्ती। ते सत्त्वगुणाची उत्पत्ती। जेणें निजसुखाची होय प्राप्ती। परी इंद्रलोकगति तो स्वर्ग नोहे॥ ३३॥ अमरभुवना जे जे गेले। ते परतोनि पतना आले। शुद्धसत्त्वीं जे मिसळले। ते पावले निजसुख॥ ३४॥ ऐसा जो कां सत्त्वगुण। तोचि येथें ‘स्वर्ग’ जाण। आतां नरकाचें लक्षण। तुज संपूर्ण सांगेन॥ ३५॥
नरकस्तमउन्नाहो बंधुर्गुरुरहं सखे।
गृहं शरीरं मानुष्यं गुणाढॺो ह्याढॺ उच्यते॥ ४३॥
कामक्रोधलोभउद्रेक। तेणें खवळे महामोह देख। तो बुडवी सज्ञान विवेक। एकलें एक तम वाढे॥ ३६॥ अरुणोदयीं दाट कुहर। निबिड पडे अंधकार। न कळे दिवसनिशाव्यवहार। सूर्यचंद्र दिसेना॥ ३७॥ यापरी गा निजचित्तीं। अंधतमें वाढे वृत्ती। कर्तव्याकर्तव्यस्थिती। एकही स्फूर्ति स्फुरेना॥ ३८॥ ऐसा तमाचा उन्नाह उद्रेक। त्या नांव जाण ‘महानरक’। परी यमयातना जें दु:ख। तो नरक म्हणों नये॥ ३९॥ यमयातनां पाप झडे। महामोहें पाप वाढे। याम्य नरक ते बापुडे। अतिनरक गाढे महामोहीं॥ ५४०॥ काम क्रोध लोभ देख। हेचि तीनी निरयदायक। तेथ महामोहो आवश्यक। जें होय एक अंधतम॥ ४१॥ इतुका मिळे जेथ समुदावो। त्यातें बोलिजे ‘तमउन्नाहो’। ऐसा जेथ घडे भावो। तो पुरुष पहा हो नरकरूप॥ ४२॥ जो घोरनरकाप्रती जाये। त्याचा तेथूनि उद्धार होये। ‘तमउन्नाह’ ज्या प्राप्त होये। त्याचा निर्गम नोहे महाकल्पांतीं॥ ४३॥ ऐशी तमउन्नाहाची ख्याती। ऐकोनि उद्धव कंटाळे चित्तीं। ऐसे बुडते जीव तमोवृत्तीं। त्यांची उद्धारगति कोण करी॥ ४४॥ ऐसा उद्धवाचा भावो। जाणोनि बोलिला देवाधिदेवो। बुडतयातें उद्धरी पहा हो। गुरुरावो निजसखा॥ ४५॥ ऐसा गुरु तो तूं कोण म्हणशी। मी नित्य लागें ज्याच्या पायांशीं। जो दे चिन्मात्र पूर्णब्रह्मासी। ‘गुरु’ नाम तयासी बोलिजे॥ ४६॥ त्या ब्रह्मापरीस अधिकता। गुरूसी आलीसे तत्त्वतां। ब्रह्म ब्रह्मत्वें हा प्रतिपादिता। येऱ्हवीं ब्रह्माची वार्ता कोण पुसे॥ ४७॥ अज अव्यय अनंत। अच्छेद्य अभेद्य अपरिमित। हे ब्रह्ममहिमा समस्त। सद्गुरूंनीं येथ विस्तारिली॥ ४८॥ ऐशी ऐकतां सद्गुरुकीर्ती। जडजीव उद्धरती। ‘गुरु’ नामाची महाख्याती। ऐकोनि कांपती यमकाळ॥ ४९॥ त्या सद्गुरूचें महिमान। करी बुडत्याचें उद्धरण। निवारी जन्ममरण। शिष्यसमाधान निजदाता॥ ५५०॥ सुहृद आप्त सखा बंधु। शिष्याचे सद्गुरु प्रसिद्धु। निवारूनि नरकसंबंधु। परमानंदु सुखदाता॥ ५१॥ आतां गृहाचें लक्षण। तुज मी सांगेन संपूर्ण। माडॺा गोपुरें धवलारें जाण। गृहप्रमाण तें नव्हे॥ ५२॥ मनुष्यदेह तो गृहाश्रम। जेथें नित्य वसें मी पुरुषोत्तम। तेथील करितां स्वधर्मकर्म। आत्माराम उल्हासे॥ ५३॥ ज्या नरदेहाचिये प्राप्ती। इंद्रादिक देव वांछिती। वेद वानी ज्या देहाची कीर्ति। निजमोक्षप्राप्ती नरदेहीं॥ ५४॥ निज ‘गृह’ जें साचार। तें जाणावें नरशरीर। आतां आढॺपणाचा विचार। तोही प्रकार अवधारीं॥ ५५॥ जो ज्ञानगुणीं अतिसंपन्न। जें कल्पांतींही न वेंचे धन। तोचि ‘आढॺतम’ जाण। येर तें धन नश्वर॥ ५६॥ नश्वर धनाची आढॺता। अवश्य नेत अध:पाता। ज्ञानधने जे आढॺता। तेणें ये हाता परब्रह्म॥ ५७॥
दरिद्रो यस्त्वसंतुष्ट: कृपणो योऽजितेन्द्रिय:।
गुणेष्वसक्तधीरीशो गुणसङ्गो विपर्यय:॥ ४४॥
ऐक दरिद्राचें लक्षण। गांठीं असतां कोटी धन। ज्याचें संतुष्ट नाहीं मन। परम ‘दरिद्री’ जाण या नांव॥ ५८॥ ज्याचे गांठीं नाहीं कांचवटी। परी संतुष्टता नित्य पोटीं। तोचि संपन्न सकळ सृष्टीं। सत्य गोष्टी हे उद्धवा॥ ५९॥ गांठीं असोनियां धन। जो पोटा न खाय आपण। सदा लोलिंगत मन। दरिद्रलक्षण या नांव॥ ५६०॥ यापरी जें कृपणपण। ऐक त्याचेंही लक्षण। जेवीं राजा बांधी सेवकजन। तेवीं इंद्रियांअधीन जो होय॥ ६१॥ निर्धारितां निजरूप जाण। सर्वांचा राजा तो आपण। तें विसरोनि होय दीन। इंद्रियांअधीन होऊनि ठाके॥ ६२॥ मन तयाचें आज्ञाधार। मनाचीं इंद्रियें किंकर। त्यांचाही हा होय डिंगर। अजितेंद्रियें होय थोर ‘कृपणत्व’ ऐसें॥ ६३॥ निज किंकराचीं किंकरें। त्या इंद्रियांचीं हा वोळंगे द्वारें। अजितेंद्रियत्वें अतिखरें। निजांगीं सुभरे कृपणत्व॥ ६४॥ या नांव गा ‘कृपणपण’। तुज म्यां सांगितले जाण। आतां ईश्वराचें सुलक्षण। ऐक संपूर्ण उद्धवा॥ ६५॥ कनक आणि कामिनी। ज्यासी नावडे मनींहुनी। तोचि ‘ईश्वर’ त्रिभुवनीं। सत्य सत्य हे वाणी उद्धवा॥ ६६॥ तुवां जितुके केले प्रश्न। तितुके ज्यासी वोळंगती गुण। त्यांसीही ज्याचें अलिप्तपण। ईश्वरत्व संपूर्ण त्या नांव॥ ६७॥ कनक आणि कामिनी। यांचा पंगिस्त मनींहूनी। तोचि ‘अनीश्वरु’ जनीं। हें सत्य मानीं उद्धवा॥ ६८॥ शमादि सांगितले प्रश्न। त्यांचें जें विपरीत लक्षण। तेंचि अनीश्वरत्व जाण। अशमादि गुण जे ठायीं॥ ६९॥
एत उद्धव ते प्रश्ना: सर्वे साधु निरूपिता:।
किं वर्णितेन बहुना लक्षणं गुणदोषयो:॥ ४५॥
उद्धवा तुझे सकळ प्रश्न। म्यां निरूपिले सुलक्षण। जेणें होईजे ब्रह्मसंपन्न। तैसें व्याख्यान सांगितलें॥ ५७०॥ संसारीं गुणदोषलक्षण। सांगतां अपरिमित जाण। यालागीं धरावें गा मौन। परम कठिण गुणदोष॥ ७१॥ गुणदोष नायकावे कानीं। गुणदोष न देखावे नयनीं। गुणदोष न बोलावे वदनीं। गुणदोष मनीं न धरावे॥ ७२॥ ब्रह्मज्ञानाचें मुख्य लक्षण। तेंही बहुत नाहीं निरूपण। श्लोकार्धें श्रीकृष्ण। स्वमुखें आपण सांगत॥ ७३॥
गुणदोषदृशिर्दोषो गुणस्तूभयवर्जित:॥ ४६॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायामेकादशस्कन्धे एकोनविंशोऽध्याय:॥ १९॥
ब्रह्म एक परिपूर्ण। तेथें कैंचे दोष कैंचे गुण। अविद्या क्षोभली ते जाण। गुणदोषलक्षण वाढवी॥ ७४॥ जो देखों लागे दोषगुण। त्याची अविद्या क्षोभली जाण। जो न देखे गुणदोषभान। तो ‘ब्रह्मसंपन्न’ उद्धवा॥ ७५॥ पराचा देखावा दोषगुण। हाचि दोषांमाजीं महादोष जाण। गुणदोष न देखावा आपण। हा उत्तम गुण सर्वार्थीं॥ ७६॥ ब्रह्मीं नाहींत दोषगुण। हें सर्वार्थीं सत्य जाण। जो देखे गा दोषगुण। ब्रह्मत्व जाण तेथें नाहीं॥ ७७॥ जे गुणदोष देखों लागले। त्यांचें ब्रह्मत्व कैसेनि गेलें। त्यांपाशीं तें वोस जाहलें। कीं रुसूनि गेलें तेथूनी॥ ७८॥ जेवीं रविबिंबा राहु ग्रासी। तैं दिवसा देखिजे नक्षत्रांसी। तेवीं अविद्या ब्रह्मत्व जैं प्राशी। तैं गुणदोषांसी देखिजे॥ ७९॥ आदरें सांगे श्रीकृष्ण। उद्धवा न देखावे दोषगुण। हे माझे जीवींची निजखूण। तुज म्यां संपूर्ण सांगितली॥ ५८०॥ जनीं चौऱ्यांशीं लक्षयोनी। त्यांत गुणदोष एके स्थानीं। न देखावे मनुष्ययोनीं। तूं इतुकेनी नित्यमुक्त॥ ८१॥ म्हणसी स्वाचारपरिपाठीं। गुणदोष देखावे दृष्टीं। उद्धवा हे गोष्टीखोटी। स्वधर्मराहाटी ते भिन्न॥ ८२॥ निजदोष निरसावयाकारणें। स्वधर्मकर्म आचरणें। तेणें गुणदोष देखणें। तैं नागवी धांवणें तैसें जाहलें॥ ८३॥ साळी पिकावया शेतीं। तृण जाळूनि दाढ करिती। तेथ पिकली साळी जैं जाळिती। तैं तोंडीं माती पडली कीं॥ ८४॥ व्हावया दोषनिवृत्ती। वेदें द्योतिली धर्मप्रवृत्ती। तेणें स्वधर्में जैं दोष देखती। तैं निजप्राप्ती नागवले॥ ८५॥ जेवीं कां सोंगें नटनटी। दाविती हावभाव नाना गोठी। परी तो भाव नाहीं त्यांचे पोटीं। स्वधर्म त्या दृष्टीं करावा॥ ८६॥ न देखोनि दोषगुण। स्वधर्म-मर्यादा नोसंडून। करावें गा स्वधर्माचरण। हें मुख्य लक्षण कर्माचें॥ ८७॥ ऐशिया स्वधर्मगती। कर्ममळ नि:शेष जाती। साधकां निजपदप्राप्ती। गुणदोषस्थिती। सांडितां॥ ८८॥ गुणदोष देहाचे ठायीं। आत्मा नित्य विदेही। गुणदोष त्याच्याठायीं। सर्वथा नाहीं उद्धवा॥ ८९॥ साधकें न देखावे दोषगुण। सिद्धासी सहजचि नाहीं जाण। जरी दिसों लागले दोषगुण। तरी आली नागवण दोघांसी॥ ५९०॥ साधकाची प्राप्ती बुडे। सिद्धाची सिद्धि तत्काल उडे। एवं गुणदोषांचें सांकडें। दोंहीकडे उद्धवा॥ ९१॥ गुणदोषीं भरली सृष्टी। तेथ न ठेवावी निज-दृष्टी। हे कळवळोनियां पोटीं। श्रीकृष्णें गोष्टी सांगितली॥ ९२॥ गुणदोष विविधभेद। ऐसे आहेत निषिद्ध। तरी कां पां स्वमुखें श्रीगोविंद। बोलिला प्रसिद्ध वेदानुवादें॥ ९३॥ येचि अर्थींचा प्रश्न। पुढें उद्धव करील जाण। तेंचि व्यासाचें निरूपण। विसावा जाण जीवशिवां॥ ९४॥ तेथ सकाम आणि निष्काम भक्त। यांचे अधिकार अभिव्यक्त। स्वयें सांगेल भगवंत। कथा अद्भुत ते आहे॥ ९५॥ संतीं द्यावें अवधान। श्रोतां व्हावें सावधान। एका विनवी जनार्दन। रसाळ निरूपण पुढें आहे॥ ५९६॥
इति श्रीभागवते महापुराणे एकादशस्कन्धे भगवदुद्धवसंवादे एकाकारटीकायां एकोनविंशोऽध्याय:॥ १९॥ श्रीकृष्णार्पणमस्तु॥ श्लोक॥ ४६॥ ओव्या॥ ५९६॥
॥ श्री ॐ तत्सत्-श्रीकृष्ण प्रसन्न॥
अध्याय विसावा
श्रीगणेशाय नम:॥ श्रीकृष्णाय नम:॥ ॐ नमो सद्गुरु चित्समुद्रा। मुक्तमोतियांचा तुजमाजीं थारा। ज्ञानवैराग्यशुक्तिद्वारा। सभाग्य नरा तूं देशी॥ १॥ तुझी खोली अमर्याद। माजीं चिद्रत्नें अतिविविध। देखोनि निजप्रबोधचांद। भरतें अगाध तुज दाटे॥ २॥ उलथल्या स्वानंदभरत्यासी। गुरुआज्ञा-मर्यादा नुल्लंघिसी। स्वानंदलहरी चढोवढीसीं। तुजमाजीं अहर्निशीं उसळती॥ ३॥ ब्रह्मविद्या महाबंदर। तेथ निजभक्ति हें तारूं थोर। त्यासी वागवितां तूं कर्णधार। प्रेमाचें साचार चढविशी शीड॥ ४॥ तेथ भक्त संत सज्ञान नर। स्वयें पावविशी परपार। त्यांची मागुती येरझार। सत्य साचार खुंटली॥ ५॥ एक लावूनि कासेसी। भवसागरीं वागविशी। बुडण्याचें भय त्यासी। महाकल्पेंसीं बाधीना॥ ६॥ एक बुडाले भक्तिसमरसीं। ते घातले शेषशयनापाशीं। एक बैसविले अढळतेसी। ते ब्रह्मादिकांसी न ढळती॥ ७॥ तुझ्या सागरत्वाची परी। विजातीय तिळभरी। राहों नेदिसी भीतरीं। हे अगाध थोरी पैं तुझी॥ ८॥ अत्यंतप्रळयीं जैं हा चढे। तैं ‘संसार’ हें नांवहि बुडे। वैकुंठ कैलासा वरता वाढे। मागें पुढें हाचि हा॥ ९॥ ऐशिया सद्गुरु समुद्रोदकीं। एका एकपणें हरीतकीं। भीतरीं पडतां आवश्यकीं। अंगीकारीकीं जनार्दन॥ १०॥ तो जनार्दन स्वयें देखा। एकादशाची करी टीका। तेणें अभंगीं घालूनि एका। कवित्व लोकां ऐकवी॥ ११॥ जनार्दना आवडे एक। तो मी एका भेटतांचि देख। निजात्मभावें पडिलें ऐक्य। आपुलें निजसुख भोगवी॥ १२॥ बोलवी निजसुखाची कथा। त्यासी आपणचि होय श्रोता। मग अर्थाच्या यथार्थतां। समाधानता देतसे॥ १३॥ या परी गा जनार्दनें। एकादश मऱ्हाटा करणें। नव्हे माझे युक्तीचें बोलणें। हें स्वयें सज्ञानें जाणिजेल॥ १४॥ त्या एकादशाची गतकथा। एकोणिसावा संपतां। गुणदोषांची कांहीं वार्ता। उद्धवासी तत्त्वतां सांगीतली॥ १५॥ गुणदोष जो देखणें। तोचि महादोष जाणणें। गुणदोष स्वयें न देखणें। तो गुण म्यां श्रीकृष्णें मानिजे॥ १६॥ हें ऐकोनि देवाचें उत्तर। उद्धव चमत्कारला थोर। काय गुणदोषांचा विचार। घरोघर लोकीं केला॥ १७॥ तुम्हींच वेदमुखें आपण। प्रकटिलें गुणदोषलक्षण। तें तुमचें वेदवचन। केवीं अमान्य करावें॥ १८॥ ऐसें विधिनिषेधलक्षण। विचारितां तें वेदवचन। कां पां निषेधी श्रीकृष्ण। उद्धव तो प्रश्न स्वयें पुसे॥ १९॥ विसावे अध्यायीं निरूपण। सांगावया गुणदोषलक्षण। भक्ति ज्ञान कर्म जाण। तिन्ही अधिकार भिन्न सांगेल॥ २०॥ उद्धव म्हणे हे श्रीकृष्ण। तूं वेदरूपें आपण। बोलिलासी दोषगुण। तें परम प्रमाण आम्ही मानूं॥ २१॥ हा विधि हा निषेध। हें दाविताहे तुझा वेद। तो वेदानुवाद विशद। ऐक प्रसिद्ध सांगेन॥ २२॥
उद्धव उवाच
विधिश्च प्रतिषेधश्च निगमो हीश्वरस्य ते।
अवेक्षतेऽरविन्दाक्ष गुणं दोषं च कर्मणाम्॥ १॥
कमलनयना श्रीकृष्णा। विधिनिषेधलक्षणा। दाखवीतसे दोषगुणां। तुझी वेदाज्ञा प्रसिद्ध॥ २३॥ तुझिया वेदाचे वेदविधीं। गुणदोषीं जडली बुद्धी। ते मी सांगेन प्रसिद्धी। कृपानिधी अवधारीं॥ २४॥
वर्णाश्रमविकल्पं च प्रतिलोमानुलोमजम्।
द्रव्यदेशवय:कालान् स्वर्गं नरकमेव च॥ २॥
तुझी जे का वेदवाणी। उघडी गुणदोषांची खाणी। अधममध्यमोत्तम मांडणी। वर्णाश्रमपणीं भेद दावी॥ २५॥ द्रव्य विहित अविहित। हेंही वेद असे दावित। देश पुनित अपुनीत। काळही दावीत सुष्टुदुष्टत्वें॥ २६॥ पूर्ववयीं चित्त निश्चित। तारुण्यीं तेंचि कामासक्त। वार्धक्यीं तें अतिकुश्चित। तेवीं शुद्धीं उपजवित गुणदोष वेदु॥ २७॥ तुझाचि गा वेद देख। सूचिताहे स्वर्ग नरक। तेणें कर्माचें आवश्यक। साधक बाधक तो दावी॥ २८॥ वर्णाश्रमांमाजी गुज। प्रतिलोमानुलोमज। ऐसे नाना भेदें भोज। वेदेंचि सहज नाचविजे॥ २९॥ उत्तम वर्णाची जे नारी। हीन वर्णाचा गर्भ धरी। तेचि संतती संसारीं। अभिधान धरी ‘प्रतिलोमज’॥ ३०॥ तेचि संतती प्रसिद्ध। सूत वैदेह मागध। ऐशिया नामाचें जें पद। तें जाण शुद्ध प्रतिलोमज॥ ३१॥ हीन वर्णाची जे नारी। उत्तम पुरुषाचा गर्भ धरी। ते ‘अनुलोमज’ संसारीं। शास्त्रकारीं बोलिजे॥ ३२॥ अंबष्ट आणि मूर्धावसिक्त। पारशव आणि सात्वत। इत्यादि नांवें जे वर्तत। ते जाण समस्त अनुलोमज*॥ ३३॥ ऐसे नाना भेदप्रकार। अविधिविधींचा विचार। वेद प्रकाशितो साचार। गुणदोषां माहेर वेद तुझा॥ ३४॥
* सूत, वैदेह, मागध, अंबष्ट, मूर्धावसिक्त, पारशव व सात्वत इत्यादि प्रतिलोमज व अनुलोमज ह्याबद्दलचें विस्तृत विवेचन मनुस्मृति अ० १० मध्यें जिज्ञासूनीं पाहून घ्यावें.
गुणदोषभिदादृष्टिमन्तरेण वचस्तव।
नि:श्रेयसं कथं नॄणां निषेधविधिलक्षणम्॥ ३॥
हे गुण आणि हे दोष। उभयतां वैर लावी देख। तुझा वेद गा आवश्यक। होय प्रकाशक गुणदोषां॥ ३५॥ वैर लावूनि वेदवाणी। वाढवी गुणदोषमांडणी। तेथ मोक्ष पाविजे प्राणी। वेदवचनीं घडे केवीं॥ ३६॥ राऊळ बोलिलें आपण। जे न देखावे दोषगुण। तूंचि म्हणसी वेद प्रमाण। तैं दोषगुण देखावे॥ ३७॥ एवं ऐकतां तुझें वचन। उभयतां आली नागवण। वेद प्रमाण कीं अप्रमाण। हें समूळ जाण कळेना॥ ३८॥ तुझ्या वचना विश्वासावें। तैं गुणदोषां न देखावें। तुझें वेदवचन मानावें। तैं देखावें गुणदोषां॥ ३९॥ ऐसे तुझेनि बोलें जाण। संशयीं पडले सज्ञान। मा इतर साधारण जन। त्यांची कथा कोण ये ठायीं॥ ४०॥ (आशंका) माझें वचन वेदवचन। दोनी एकरूपें म्हणसी प्रमाण। तरी गुणदोषदर्शन। कां पां विलक्षण परस्परें॥ ४१॥ माझें वेदाचें विधिविधान। नव्हतां वेदार्थाचें ज्ञान। म्हणशी मोक्ष न घडे जाण। वेद प्रमाण या हेतू॥ ४२॥ त्या मोक्षामाजीं काय कठिण। सकळ कर्में सांडिता जाण। घरा मोक्ष ये आपण। सहजचि जाण न प्रार्थितां॥ ४३॥ म्हणसी वेदार्थ न कळतां। कर्म करितां कां त्यागितां। कदा मोक्ष न ये हाता। जाण तत्त्वतां निश्चित॥ ४४॥ भासला दोराचा सर्प थोर। तेथ जपतां नाना मंत्रभार। करितां वाजंत्र्यांचा गजर। मारितां तिळभर ढळेना॥ ४५॥ तो सादरें निरीक्षितां जाण। होय त्या सर्पाचें निरसन। तेवीं निर्धारितां वेदवचन। भवभय जाण निरसे॥ ४६॥ भवभयाची निर्मुक्तता। त्या नांव ‘मोक्ष’ जाण तत्त्वतां। तो वेदार्थावीण हाता। न ये सर्वथा आणिकें॥ ४७॥ वेदविधान न करितां। कर्म त्यागिलें उद्धततां। तेणें निजमोक्ष न ये हाता। परी पाखंडता अंगीं वाजे॥ ४८॥ विधियुक्त जो कर्मत्यागु। करूनि संन्यास घेतल्या सांगू। तैं म्हणसी न पडे वेदपांगु। हाहीं व्यंगु विचारु॥ ४९॥ श्रवणांग संन्यासग्रहण। तेथही असे विधिविधान। गुरुमुखें जें महावाक्य-श्रवण। तोही जाण वेदार्थ॥ ५०॥ (आशंका)॥ करितां देवांपितरांचें यजन। ते होऊनियां प्रसन्न। मोक्ष देतील आपण। हेंही वेदेंवीण घडेना॥ ५१॥ स्वाहाकारें तृप्त सुर। स्वधाकारें तृप्त पितर। वेदविनियोगेंवीण देवपितर। प्रसन्नाकार कदा नव्हती॥ ५२॥
पितृदेवमनुष्याणां वेदश्चक्षुस्तवेश्वर।
श्रेयस्त्वनुपलब्धेऽर्थे साध्यसाधनयोरपि॥ ४॥
नाथिलेंचि चराचर। देव मनुष्य आणि पितर। वेदें प्रकाशूनि साचार। पूज्यत्वें थोरप्रतिपादी॥ ५३॥ त्याहीमाजीं अतिविषम। उत्तम मध्यम आणि अधम। हा त्रिविध भेदसंभ्रम। वेद उपक्रम करूनि दावी॥ ५४॥ यापरी गुणदोषलक्षण। तुवांचि वाढविलें आपण। या नांव म्हणसी मोक्षसाधन। तरी कां गुणदोष निवारिसी॥ ५५॥ ऐशिया निरूपणघडामोडी। तुझेनि बोलें पडे आडी। तेणें गुणदोषांची परवडी। बाधा रोकडी अंगीं वाजे॥ ५६॥ अवघा संसार काल्पनिक। तेथ एक स्वर्ग एक नरक। हा मोक्ष हा अतिबंधक। येणें वेदवादें लोक भ्रमविले तुवां॥ ५७॥ पूर्वीं पुरुषाचे पोटीं। नव्हती गुणदोषांची गोठी। तुझ्या वेदानुवादपरिपाठीं। गुणदोषीं दृष्टी दृढ झाली॥ ५८॥ एवं तुझेनि बोलें जाण। लोकांसी आली नागवण। भोगावया नरक दारुण। भ्रामक जाण वेदोक्ति तुझी॥ ५९॥
गुणदोषभिदादृष्टिर्निगमात्ते न हि स्वत:।
निगमेनापवादश्च भिदाया इति ह भ्रम:॥ ५॥
एवं नानागुणदोषदृष्टीं। तुझेनि वेदें वाढविली सृष्टी। स्वतां पुरुषाचे पोटीं। गुणदोषदृष्टि असेना॥ ६०॥ तुझ्या वेदानुवादविस्तरें। गुणदोष झाले खरे। ते तुझेनिही बलात्कारें। चित्ताबाहेरें न निघती॥ ६१॥ अनादि वेद प्रमाण। हें तुझें मुख्य वेदवचन। आतां न देखावे दोषगुण। हें नवें वचन मानेना॥ ६२॥ पहिले प्रकाशिले दोषगुण। आतां निवारावया काय कारण। हें न कळतां संपूर्ण। भ्रमित मन होतसे॥ ६३॥ या भ्रमाची भ्रमनिवृत्ती। कृपेनें करावी कृपामूर्ती। ऐकोनि उद्धवाची वचनोक्ती। काय श्रीपती बोलिला॥ ६४॥ ऐकोनि उद्धवाची विंनती। योगत्रयाची उपपत्ती। अधिकारभेदें वेदार्थप्राप्ती। स्वयें श्रीपती सांगत॥ ६५॥
श्रीभगवानुवाच
योगास्त्रयो मया प्रोक्ता नृणां श्रेयोविधित्सया।
ज्ञानं कर्म च भक्तिश्च नोपायोऽन्योऽस्ति कुत्रचित्॥ ६॥
तेथ मेघगंभीरा वाणी। गर्जोनि बोले शार्ङ्गपाणी। माझे परम कृपेवांचूनी माझी वेदवाणी कळेना॥ ६६॥ वेदशास्त्रार्थें अतिसंपन्न। जरी झाले अतिसज्ञान। परी माझ्या अनुग्रहेंवीण। माझा वेदार्थ जाण कळेना॥ ६७॥ ब्रह्मा चहूं मुखीं वेद पढे। त्यासीही वेदार्थाचें चोखडें। वर्म नातुडेचि धडफुडें। मा इतर बापुडे ते किती॥ ६८॥ ब्रह्मा वेदार्थ आकळिता। तैं शंखासुर वेद कां नेता। ब्रह्मा वेदार्थीं लीन होता। तैं नाभिलाषिता सरस्वती॥ ६९॥ माझा वेदाचा वेद्य निर्धार। तुज मी सांगेन साचार। ऐक उद्धवा सादर। वेदविचार तो ऐसा॥ ७०॥ माझ्या वेदासी नाहीं बहु बंड। वृथा न बोले उदंड। ज्ञान-भक्ति-कर्मकांड। वेद त्रिकांड नेमस्त॥ ७१॥ माझिया वेदांची वेदोक्ती। या तिंही योगांतें प्रतिपादिती। या वेगळी उपायस्थिती। नाहीं निश्चितीं उद्धवा॥ ७२॥ कोण ते तिनी योग। कैसे अधिकाराचे भाग। तेही पुसशी जरी चांग। तरी ऐक साङ्ग सांगेन॥ ७३॥
निर्विण्णानां ज्ञानयोगो न्यासिनामिह कर्मसु।
तेष्वनिर्विण्णचित्तानां कर्मयोगस्तु कामिनाम्॥ ७॥
जे कां ब्रह्मभुवनपर्यंत। साचार जीवींहूनि विरक्त। जे विधिपूर्वक संकल्पयुक्त। कर्म त्यागित संन्यासी॥ ७४॥ ऐशिया अधिकाऱ्यांकारणें। म्यां ‘ज्ञानयोग’ प्रकट करणें। जेणें कां निजज्ञानसाधनें। माझी पावणें सायुज्यता॥ ७५॥ आतां जे कां केवळ अविरक्त। विषयालागीं कामासक्त। त्यांलागीं म्यां प्रस्तुत। ‘कर्मयोग’ येथ प्रकाशिला॥ ७६॥ उंच नीच अधिकारी देख। दोनी सांगितले सविशेख। आतां तिसरा अधिकारी अति चोख। अलोलिक अवधारीं॥ ७७॥
यदृच्छया मत्कथादौ जातश्रद्धस्तु य: पुमान्।
न निर्विण्णे नातिसक्तो भक्तियोगोऽस्य सिद्धिद:॥ ८॥
हरिकथा अवघेचि ऐकती। परी माझी श्रद्धा नुपजे चित्तीं। कोणा एका अभिनवगती। श्रद्धाउत्पत्ती श्रवणेंचि होय॥ ७८॥ आईक श्रद्धेचें लक्षण। जें जें करी कथाश्रवण। तें हृदयीं वाढे अनुसंधान। सप्रेम मनन उल्हासे॥ ७९॥ नवल कथेची आवडी। दाटती हरिखाचिया कोडी। हृदयीं स्वानंदाची उभवी गुढी। एवढी गोडी श्रवणार्थीं॥ ८०॥ विषयांचें दोषदर्शन। मुख्यत्वें बाधक स्त्री आणि धन। आवरावीं रसना-शिश्न। हे आठवण अहर्निशीं॥ ८१॥ घायीं आडकलें फळें। तें पानपेना उपचारबळें। तेवीं विषयदोष भोगमेळें। कदाकाळें शमेना॥ ८२॥ येतां देखोनियां मरण। स्वयें होय कंपायमान। तेवीं विषयभोगदर्शन। देखोनि आपण चळीं कांपे॥ ८३॥ एवं विषयीं दोषदर्शन। सर्वदा देखे आपण। परी त्यागालागीं जाण। सामर्थ्य पूर्ण आथीना॥ ८४॥ सेवकीं राजा बंदीं धरिला। तया स्त्रीचंदनादि भोग दीधला। परी तो त्यासी विषप्राय जाहला। भोगीं उबगला अगत्यता॥ ८५॥ एवं भोगितां त्या भोगासी। नित्य पाहे निजनिर्गमासी। तेवीं भोगितां हा विषयासी। अहर्निशीं अनुतापी॥ ८६॥ यापरी जो नव्हे विषयासक्त। ना निधडा नव्हे विरक्त। त्यालागीं माझा भक्तिपंथ। मी बोलिलोंनिश्चित वेदवाक्यें॥ ८७॥ येहींकरितां माझी भक्ती। माझ्या स्वरूपीं लागे प्रीती। सहजें होय विषयविरक्ती। एवं सिद्धिदाती भक्ति हे माझी॥ ८८॥ मी वेदोक्त बोलिलों आपण। ते हे त्रिविध योग संपूर्ण। ज्ञान-कर्म-उपासन। वेदोक्त लक्षणविभाग॥ ८९॥ तेथ कोण देखे दोषगुण। कोणासी दोंहीचें अदर्शन। मध्यम भागें वर्ते कोण। तेंही लक्षण अवधारीं॥ ९०॥ जो आसक्त विषयांवरी। तो कर्ममार्गींचा अधिकारी। त्यासी गुणदोषांहातीं नाही उरी। हें सांगेल श्रीहरि पुढिले अध्यायीं॥ ९१॥ जो कां विरक्त ज्ञानाधिकारी। तो गुणदोषांहूनि बाहेरी। तो पाहतां अवघे संसारीं। न देखे तिळभरी गुणदोष॥ ९२॥ जग अवघें ब्रह्म पूर्ण। तेथ कैंचे दोषगुण। ऐसे कां जे ज्ञानसंपन्न। त्यां दोषदर्शन असेना॥ ९३॥ अति आसक्त ना विरक्त। ऐसे कां जे माझे भक्त। ते पूर्वीं गुणदोष देखत। परी सांडित विवेकें॥ ९४॥ भूतीं भूतात्मा मी परेश। तेथ देखों नये गुणदोष। ऐसे भजननिष्ठ राजहंस। ते गुणदोष सांडिती॥ ९५॥ मी वेदार्थीं बोलिलों दोषगुण। ते दोषत्यागालागीं जाण। पराचे देखावे दोषगुण। हें वेदवचन असेना॥ ९६॥ ऐसे करावें वेदार्थश्रवण। दोष त्यजूनि घ्यावा गुण। परी पुढिलांचे दोषगुण। सर्वथा आपण न देखावे॥ ९७॥ जो ज्याचा गुणदोष पाहे। तो त्याचा पापविभागी होये। जो पुढिलांचे गुणदोषगाये। तो निरया जाये तेणें दोषें॥ ९८॥ आतां कर्माचा अधिकारु। सांगताहे शारंगधरु। तो जाणोनियां विचारु। कर्मादरु करावा॥ ९९॥
तावत्कर्माणि कुर्वीत न निर्विद्येत यावता।
मत्कथाश्रवणादौ वा श्रद्धा यावन्न जायते॥ ९॥
तंवचि करावा कर्मादर। जंव विरक्ति नुपजे साचार। ठाकल्या विरक्तीचें घर। स्वर्ग संसार मळप्राय॥ १००॥ हो कां वमिलिया मिष्टान्ना। परतोनि श्रद्धा न धरी रसना। तेवीं विषयभोगींजाणा। साचार मना चिळशी उपजे॥ १॥ तेथ कर्माची परिपाठी। समूळ खूंटली गा गोठी। कां दैवयोगें उल्हासु पोटीं। माझ्या कथेचा उठी श्रवणादरु॥ २॥ करितां माझी कथा श्रवण। प्रेमें वोसंडे अंत:करण। विसरे देह गेहांची आठवण। तेथें प्रत्यवाय जाण बाधीना॥ ३॥ जैसें माझे कथेचें श्रवण। तैसेंचि माझे हृदयीं स्मरण। तेथें प्रत्यवाय न रिघे जाण। येथून बोळवण त्याची झाली॥ ४॥ करितां मत्कथाश्रवण। लोपल्या कोटिकर्माचरण। प्रत्यवाय न बाधी जाण। हा प्रताप पूर्ण मत्कथेचा॥ ५॥
(संमतिश्लोक) मत्कर्म कुर्वतां पुसां कर्मलोपो भवेद्यदि।
तत्कर्म तेषां कुर्वन्ति तिस्र: कोटॺो महर्षय:॥ १॥
(अर्थ) माझी करितां सप्रेम भक्ती। भक्तांचीं नित्यकर्में जैं राहती। तेतीस कोटी ऋषिमहंतीं। संपूर्ण करिती कर्में त्यांचीं॥ ६॥ एवढें मत्कथेचें महिमान। माझें करितां कीर्तन पूजन। तेथें प्रत्यवायाचें तोंड कोण। संमुख वदन दावूं न शके॥ ७॥ हो कां पूर्ण विरक्त नर। कां माझे सेवेसी जो तत्पर। तेथ कर्म बापुडें किंकर। हें स्वयें श्रीधर बोलिला॥ ८॥ कर्में करितां स्वधर्मस्थितीं। उद्धवा आहे माझी प्राप्ती। ते मी सांगेन तुजप्रती। यथानिगुती अवधारीं॥ ९॥
स्वधर्मस्थो यजन्यज्ञैरनाशी: काम उद्धव।
न याति स्वर्गनरकौ यद्यन्यन्न समाचरेत्॥ १०॥
गृहस्थाश्रमी स्वधर्मस्थिती। जरी विचरेना ‘अन्यगती’। तरी येथेंचि लाहे विरक्ती। सुनिश्चितीं उद्धवा॥ ११०॥ अन्यगतींचें विचरण। तें तूं म्हणशील कोण। ऐक त्याचेंही लक्षण। समूळ खूण सांगेन॥ ११॥ परद्रव्य-परदारा-रती। परापवादाची वंदती। ही नांव गा ‘नारकी गती’। जाणनिश्चितीं उद्धवा॥ १२॥ दिविभोगाचेनि श्रवणें। ज्याच्या मनाचें बैसे धरणें। कर्में तदनुकूल करणें। तैं स्वर्गा भोगणें अलोट॥ १३॥ या जाण दोन्ही ‘अन्यगती’। यांतूनि काढूनियां वृत्ती। यज्ञादिकीं मज यजिती। तैं नैराश्यस्थिती नित्यनैमित्यें॥ १४॥ तैं न पडे स्वर्गीचें पेणें। न घडे नरकासी जाणें। येचि लोकीं विरक्त होणें। तेंचि बोलणें हरि बोले॥ १५॥
अस्मिंल्लोके वर्तमान: स्वधर्मस्थोऽनघ: शुचि:।
ज्ञानं विशुद्धमाप्नोति मद्भक्तिं वा यदृच्छया॥ ११॥
असतां ये लोकीं वर्तमान। ऐसें करितां स्वधर्माचरण। होय पुण्यपापांचें निर्दळण। निर्मळत्वें जाण तो अतिपवित्र॥ १६॥ तेथ निरसोनि भवभान। प्रकाशे माझें शुद्ध ज्ञान। कां सप्रेम माझें भजन। ‘पराभक्ति’ जाण तो लाहे॥ १७॥ जे भक्तीमाजीं मी आपण। सदा होय भक्ताअधीन। तेथ मोक्षासहित ज्ञान। येऊनि आपण पायां लागे॥ १८॥ ऐक ज्ञानाचा परिपाक। संसारा नांव ‘महादु:ख’। मोक्ष तो म्हणे ‘परमसुख’। मद्भक्त देख दोनी न मनी॥ १९॥ सप्रेम करितां माझें भजन। नाठवे भवभयबंधन। तेथ मोक्षासी पुसे कोण। मद्भक्तां भक्तीचा पूर्ण उल्हास॥ १२०॥ ज्यातें म्हणती ‘महादु:ख’। तें भक्तांसी भगवद्रूप देख। ज्यातें म्हणती ‘परमसुख’। तेंही आवश्यक भगवंत॥ २१॥ यापरी भक्त माझ्या भजनीं। विसरला सुखदु:खें दोनी। मी एकु भगवंतू वांचूनी। आन त्रिभुवनीं देखेना॥ २२॥ ऐशी माझी भक्ति पूर्ण। साधूनि आणितां न ये जाण। जैं मी भगवंत होय प्रसन्न। तैं यदृच्छा जाण हे भक्ति लाभे॥ २३॥ मी कैसेनि होय प्रसन्न। ऐसें कल्पील तुझें मन। तेथ नरदेह गा कारण। माझे प्रसन्नपण व्हावया॥ २४॥
स्वर्गिणोऽप्येतमिच्छन्ति लोकं निरयिणस्तथा।
साधकं ज्ञानभक्तिभ्यामुभयं तदसाधकम्॥ १२॥
ज्यांसी स्वर्गभोगाची अति गोडी। जिंहीं अमरत्वाची उभविली गुढी। जे पडले स्वर्गाचे बांदवडीं। ते वांछिती आवडीं नरदेहातें॥ २५॥ नरकयातना महाघोर। जिंहीं भोगिला भोग थोर। ते मनुष्यदेहातें नर। अतिसादर वांछिती॥ २६॥ नरदेह परम पावन। जो भक्तिज्ञानाचें आयतन। जेणें साधे ब्रह्मज्ञान। तो धन्य धन्य नरदेह॥ २७॥ जेणें नरदेहें जाण। नि:शेष खुंटे जन्ममरण। जेणें जीव पावे समाधान। स्वानंदघन स्वयें होय॥ २८॥ ज्या नरदेहाचे संगतीं। होय अविद्येची निवृत्ती। लाभे भगवत्पदप्राप्ती। हे विख्यात ख्याती नरदेहीं॥ २९॥ ज्या नरदेहाची प्राप्ती। प्राणिमात्र वांछिती। प्राणी बापुडे ते किती। स्वयें प्रजापती नरदेह वांछी॥ १३०॥ ऐसें नरदेहाचें श्रेष्ठपण। येथ साधे भक्तिविज्ञान। परी भक्तिज्ञानास्तव जाण। मनुष्यपण साधेना॥ ३१॥
न नर: स्वर्गतिं काङ्क्षेन्नारकीं वा विचक्षण:।
नेमं लोकं च काङ्क्षेत देहावेशात्प्रमाद्यति॥ १३॥
झालिया नरदेहाची प्राप्ती। अधर्में होय नरकगती। कां संचितां पुण्यसंपत्ती। तेणें स्वर्गप्राप्ती अनिवार॥ ३२॥ स्वर्गे होय पुनरावृत्ती। नरकीं घोर दु:खप्राप्ती। म्हणूनि दोंहीचीही प्रीती। नरदेहीं आसक्ती धरूं म्हणती॥ ३३॥ मनुष्यदेहाची आवडी। तेचि देहबुद्धि रोकडी। जेथ कामक्रोधांची जोडी। प्रमाद कोडी क्षणक्षणां॥ ३४॥ स्वर्ग नरक इहलोक। यांची प्रीती सांडूनि देख। साधावें गा आवश्यक। ज्ञान चोख कां निजभक्ती॥ ३५॥ ज्ञान साधावयालागीं जाण। कष्टावें न लगे गा आपण। सप्रेम करितां माझें भजन। दवडितां ज्ञान घर रिघे॥ ३६॥ गव्हांची राशी जोडल्या हातीं। सकळपक्वान्नें त्याचीं होतीं। तेवीं आतुडल्या माझी भक्ती। ज्ञानसंपत्ती घर रिघे॥ ३७॥ द्रव्य झालिया आपुले हातीं। सकळ पदार्थ घरास येती। तेवीं जोडल्या माझी भक्ती। भुक्तिमुक्ति होती दासी॥ ३८॥ म्हणती करितां भगवद्भक्ती। विघ्नें छळावया आड येती। तेथें मी सुदर्शन घेऊन हातीं। राखें अहोरातीं निजभक्तां॥ ३९॥ पक्ष्याचेनि नामोच्चारें। म्यां वेश्या तारिली चमत्कारें। पाडूनि विघ्नांचें दातौरें। म्यां व्यभिचारें उद्धरिली॥ १४०॥ यालागीं नरदेह पावोन। जो करी माझें भजन। तोचि संसारीं धन्यधन्य। उद्धवा जाण त्रिशुद्धी॥ ४१॥ भावें करितां माझे भक्तीसी। भाविका उद्धरीं मी हृषीकेशी। जे चढले ज्ञानाभिमानासी। ते म्यां यमासी निरविले॥ ४२॥ साधितां माझी भक्ति कां ज्ञान। ज्यासी चढे ज्ञानाभिमान। तो म्यां आपुलेनि हातें जाण। दीधला आंदण महादोषां॥ ४३॥ उद्धवा तूं ऐसें म्हणशी। ‘ते कां दीधले यम हातेशी’। तो जाचूनियां महादोषियांसी। ज्ञानाभिमानासी सांडवी॥ ४४॥ यालागीं सांडूनि देहाभिमान। भावें करितां माझें भजन। पूर्वील साधु सज्ञान। नरदेहें जाण मज पावले॥ ४५॥
एतद्विद्वान्पुरा मृत्योरभवाय घटेत स:।
अप्रमत्त इदं ज्ञात्वा मर्त्यमप्यर्थसिद्धिदम्॥ १४॥
केवल अस्थि चर्म मूत्र मळ। पाहतां देहो अतिकश्मळ। परी ब्रह्म परिपूर्ण निश्चळ। हें निर्मळ फळ येणें साधे॥ ४६॥ ऐसे नरदेहाचें कारण। जाणोनि पूर्वील सज्ञान। सांडोनियां देहाभिमान। ब्रह्मसमाधान पावले॥ ४७॥ देह निंद्य म्हणोनि सांडावा। तरी एवढा लाभ हारवावा। वंद्य म्हणोनि प्रतिपाळावा। तैं नेईल रौरवा निश्चित॥ ४८॥ देह सांडावा ना मांडावा। येणें परमार्थचि साधावा। तें सावधान ऐक उद्धवा। गुप्त निजठेवा सांगेन॥ ४९॥ जेणें देहें वाढे भवभावो। तेणेंचि देहेंकरीं पहा हो। होय संसाराचा अभावो। अहंभावो सांडितां॥ १५०॥ सांडावया देहाभिमान। पूर्वील साधु सज्ञान। होऊनि नित्य सावधान। ब्रह्मसंपन्न मद्रूपें॥ ५१॥ नरदेहें ब्रह्मप्राप्ती। ऐसें मानूनि निश्चितीं। म्हणसी विषयभोगांचे अंतीं। ब्रह्मस्थिती साधीन॥ ५२॥ ऐसें विश्वासतां आपण। रोकडी आली नागवण। देहासवें लागलें मरण। हरिहरां जाण टळेना॥ ५३॥ एवं देहाचें अनिवार्य मरण। तें केव्हां येईल न कळे जाण। यालागीं पूर्वीच आपण। निजस्वार्थ जाण साधावा॥ ५४॥ धरितां निजदेहाची गोडी। अवचितां आदळे यमधाडी। बुडे निजस्वार्थाची जोडी। तें निजनिवाडीं हरि सांगे॥ ५५॥
छिद्यमानं यमैरेतै: कृतनीडं वनस्पतिम्।
खग: स्वकेतुमुत्सृज्य क्षेमं याति ह्यलम्पट:॥ १५॥
जेवीं कां वृक्षाचे अग्रीं नीड। पक्षी करूनि वसे अतिगूढ। तळीं त्याचि वृक्षाचें बूड। छेदिती सदृढ निर्दय नर॥ ५६॥ तें देखोनि वृक्षच्छेदन। पक्ष्यें सांडोनि गृहाभिमान। पळाल्या पाविजे कल्याण। राहतां मरण अचूक॥ ५७॥ त्या वृक्षाचिया ऐसें जाण। देहासवें लागलें मरण। तेथें जीवासी राहतां जाण। दु:ख दारुण अनिवार॥ ५८॥
अहोरात्रैश्छिद्यमानं बुद्ध्वाऽऽयुर्भयवेपथु:।
मुक्तसङ्ग: परं बुद्ध्वा निरीह उपशाम्यति॥ १६॥
अहोरात्र आयुष्यभंग। कळिकाळाचा सवेग वेग। हा जाण नीच नवा रोग। अंगीं साङ्ग लागला॥ ५९॥ काळें काळ वयसा खातु। हा देखोनि आयुष्याचा घातु। जाणोनि नरदेहाचा पातु। होय अनासक्तु देहगेहां॥ १६०॥ जाणोनि देहाचें क्षणिकपण। त्यागावया देहाभिमान। साधावया भक्तिज्ञान। अतिसावधान जो होय॥ ६१॥ न सांडितां देहाभिमान। अंगीं आदळे मरण। तेणें भयें कंपायमान। वैराग्य पूर्ण स्वयें धरी॥ ६२॥ वैराग्ययुक्त करितां भक्ती। होय देहाभिमानाची निवृत्ती। तैं घर रिघे ज्ञानसंपत्ती। पायां लागती मुक्ती चारी॥ ६३॥ ऐशी झालिया निजात्मप्राप्ती। सहजेंचि राहे प्रवृत्ती। निवृत्तीसी होय निवृत्ती। संसाराची शांती स्वयें होय॥ ६४॥ ऐसे नरदेहा येऊनि देख। पुरुष पावले ‘परमसुख’। हें न साधिती जे मूर्ख। त्यांसी देवो देख निंदित॥ ६५॥
नृदेहमाद्यं सुलभं सुदुर्लभं
प्लवं सुकल्पं गुरुकर्णधारम्।
मयानुकूलेन नभस्वतेरितं
पुमान् भवाब्धिं न तरेत्स आत्महा॥ १७॥
चौऱ्यांशीं लक्ष जीवयोनी। त्यांत मनुष्यदेहावांचूनी। अधिकारी ब्रह्मज्ञानीं। आन कोणी असेना॥ ६६॥ जेणें देहें होय माझी प्राप्ती। यालागीं ‘आद्य देहो’ यातें म्हणती। याची दुर्लभ गा अवाप्ती। भाग्यें पावती नरदेह॥ ६७॥ ‘सदृढ’ म्हणजे अव्यंग। ‘अविकळ’ म्हणजे सकळ भाग। नव्हे बहिरे मुके अंध पंग। सर्वांगें साङ्ग संपूर्ण॥ ६८॥ भरतखंडीं नरदेहप्राप्ती। हे परमभाग्याची संपत्ती। तेथही विवेकु परमार्थी। त्याचा वशवर्ती मी परमात्मा॥ ६९॥ मी परमात्मा जेथ वशवर्ती। तेथ सुरनरांचा केवा किती। परी हा देह न लभे पुढती। दुर्लभ प्राप्ती नरदेहा॥ १७०॥ जोखितां पुण्यपाप समान। तैं नरदेहाची प्राप्ती जाण। तें पुढती पावावया आपण। जोखूनि कर्माचरण कोणी न करी॥ ७१॥ पुण्य झालिया अधिक। स्वर्ग भोगणें आवश्यक। पापाचें वाढल्या तुक। भोगावे नरक अनिवार॥ ७२॥ ऐशी कर्माची गति गहन। येथ काकतालीन्यायें जाण। अचवटें लाभे माणुसपण। भवाब्धितारण महातारूं॥ ७३॥ ‘सुलभ’ म्हणिजे अविकळ। ‘सुकल्प’ म्हणिजे विवेकशीळ। यासी वागविता केवळ। नावाडा अतिकुशळ गुरु कर्णधार॥ ७४॥ कानीं निजगुज उपदेशिता। यालागीं गुरु ‘कर्णधार’ म्हणती तत्त्वतां। कानीं धरितांचि उद्धरी भक्तां। यालागीं सर्वथा गुरु कर्णधार॥ ७५॥ भवाब्धीमाजीं नरदेह तारूं। तेथ सद्गुरु तोचि कर्णधारु। त्यासी अनुकूल वायु मी श्रीधरु। भवाब्धिपरपारु पावावया॥ ७६॥ कैसा गुरु कर्णधार कुशळ। आवर्त खळाळ आंदोळ। चुकवूनि विकल्पाचे कल्लोळ। साम्यें पाणिढाळ सवेग काढी॥ ७७॥ लावूनि विवेकाचें आवलें। तोडिती कर्माकर्मांचीं जळें। भजनशिडाचेनि बळें। नाव चाले सवेग॥ ७८॥ कामक्रोधादि महामासे। तळपती घ्यावया आमिषें। त्या घालूनि शांतिचेनि पाशें। तारूं उल्हासें चालवी॥ ७९॥ ठाकतां सारूप्यादि बंदरें। तारुवामाजीं अतिगजरें। लागलीं अनुहाताचीं तुरें। जयजयकारें गर्जती॥ १८०॥ नेतां सलोकतेचे पेंठे। तारूं उलथेल अवचटें। लावितां समीपतेचे वाटे। तारूं दाटे दोंही सवां॥ ८१॥ करावें सरूपतेमाजीं स्थिरु। तंव तो दाटणीचा उतारु। ऐसा जाणोनियां निर्धारु। लोटिलें तारूं सायुज्यामाजीं॥ ८२॥ ते धार्मिकाची धर्मपेंठ। नाहीं सुखसारा खटपट। वस्तु अवघीच चोखट। घ्यावी एकवट संवसाटी॥ ८३॥ ऐसें दुर्लभ नरदेहाचें तारूं। जेथ मी श्रीगुरुरूपें कर्णधारु। येणें न तरेच जो संसारु। तो जाणावा नरु आत्महंता॥ ८४॥ नरदेह वेंचिलें विषयांसाठीं। पुढें नरक भोगावया कल्पकोटी। तरी आपुलेनि हातें निजपोटीं। शस्त्र दाटी स्वयें जेवीं॥ ८५॥ परपारा अवश्य आहे जाणें। तेणें नाव फोडूनि भाजिजे चणें। कां पांघरुणें जाळूनि तापणें। हिंवाभेणें सुज्ञांनीं॥ ८६॥ तैसें येथ झाले गा साचार। थित्या नरदेहा नागवले नर। पुढां दु:खाचे डोंगर। अतिदुस्तर वोढवले॥ ८७॥ सकळ योनीं विषयासक्ती। सर्वांसी आहे निश्चितीं। नरदेहीं तैशीच विषयस्थिती। तैं तोंडीं माती पडली कीं॥ ८८॥ पावोनि श्रेष्ठ नरशरीर। जो नुतरेचि संसारपार। तो आत्महत्यारा नर। सत्य साचार उद्धवा॥ ८९॥ कोटी ब्रह्महत्या-गोहत्यांसी। प्रायश्चित्त आहे शास्त्रार्थेंसीं। परी आत्महत्या घडे ज्यासी। प्रायश्चित्त त्यासी असेना॥ १९०॥ जो आत्महत्या करूनि निमाला। तो मरतांचि नरकासी गेला। प्रायश्चित्तासी कोण आहे उरला। मा शास्त्रार्थें बोला बोलावें॥ ९१॥ अमृत विकूनि कांजी प्याला। तैसा नरदेहीं भोगु भोगविला। हा थोर नाड जीवासी झाला। विसरोनि आपुला निजस्वार्थ॥ ९२॥ लाहोनि उत्तम शरीर। व्यर्थ विषयासक्तीं नर। नरकीं बुडाले अपार। हें शार्ङ्गधर बोलिला॥ ९३॥ असोत या मूर्खांचिया गोठी। ऐक उत्तमांची हातवटी। जे वेदार्थपरिपाठीं। निजहितदृष्टी सावध॥ ९४॥ अतिविरक्त जे स्वभावें। तिंहीं काय कर्तव्य करावें। कोणा अर्थातें त्यजावें। तेंचि देवें सांगिजे॥ ९५॥
यदाऽऽरम्भेषु निर्विण्णो विरक्त: संयतेन्द्रिय:।
अभ्यासेनात्मनो योगी धारयेदचलं मन:॥ १८॥
जो कर्मारंभींच विरक्त। फळाशा नातळे ज्याचें चित्त। मज निजमोक्ष व्हावा येथ। हेंही पोटांत स्मरेना॥ ९६॥ खडतर वैराग्याची दृष्टी। इंद्रियांसी विषयांची गोष्टी। करूंचि नेदी महाहटी। धारणा नेहटीं दृढ राखे॥ ९७॥ करूनियां श्रवण मनन। माझ्या स्वरूपाचें अनुसंधान। अखंड करी निदिध्यासन। तिळभरी मन ढळों नेदी॥ ९८॥ धरोनि धारणेचें बळ। स्वरूपीं मन अचंचळ। अणुभरी होऊं नेदी विकळ। राखे निश्चळ निजबोधें॥ ९९॥ एकाकी मन पाहें। स्वरूपीं कैसें निश्चळ होये। त्या अभ्यासाचे उपाये। स्वयें सांगताहे श्रीकृष्ण॥ २००॥
धार्यमाणं मनो यर्हि भ्राम्यदाश्वनवस्थितम्।
अतन्द्रितोऽनुरोधेन मार्गेणात्मवशं नयेत्॥ १९॥
स्वरूपीं लावितां अनुसंधान। जरी निश्चळ नव्हे मन। न सांडी आपुला गुण। चंचळपण स्वभावें॥ १॥ साधक आळसें विकळे। कां आठवी विषयसोहळे। तैं स्वरूपींहूनि मन पळे। निज चंचळें स्वभावें॥ २॥ तेथें नेहटूनि आसन। स्वयें होऊनि सावधान। स्मरोनि सद्गुरूचे चरण। स्वरूपीं मन राखावें॥ ३॥ नेदितां विषयदान। हटावलें क्षोभे मन। तरी न सांडोनि अनुसंधान। द्यावें अन्नपान विधानोक्त॥ ४॥ (आशंका)॥ ‘सर्पा पाजिलें पीयूष। तेंचि परतोनि होय विष। तेवीं मनासी देतां विषयसुख। अधिक देख खवळेल’॥ ५॥ तरी ऐसें द्यावें विषयदान। जेणेंआकळलें राहे मन। तेचि अर्थींचें निरूपण। स्वयें नारायण सांगत॥ ६॥
मनोगतिं न विसृजेज्जितप्राणो जितेन्द्रिय:।
सत्त्वसंपन्नया बुद्धॺा मन आत्मवशं नयेत्॥ २०॥
मोकळें न सोडून मन। न सोडूनि अनुसंधान। करावें अन्नपानशयन। हें विषयदाननिजहिता॥ ७॥ साधकें साधूनि आपण। जरी जिंतिले इंद्रियप्राण। तरी मोकळें सोडूं नये मन। स्वरूपीं नेहटून राखावें॥ ८॥ जो मनासी विश्वासला। तो कामक्रोधीं नागवला। संकल्पविकल्पीं लुटिला। विसंचिला महामोहे॥ ९॥ जाणोनि मनाचें महाबळ। त्यासी विवेक द्यावा मोकळ। तो हालों नेदी केवळ। करी निश्चळ निजांगें॥ २१०॥ मनाविवेकाचे उभयसंधीं। सत्त्वसंपन्न होयबुद्धी। ते विषयांचे कंद छेदी। तोडी उपाधी सविकार॥ ११॥ मन जेथ जेथ पळोनि जाये। तेथतेथ विवेक उभा राहे। मग सत्त्वबुद्धीचेनि साह्यें। मोडी पाये मनाचे॥ १२॥ ऐसें मनाचेंखुंटलिया बळ। मग स्वरूपीं होय निश्चळ। जेवीं जळगार केवळ। ठाके गंगाजळ वस्तीसी॥ १३॥ यापरी स्वरूपीं मन। स्वयें पावे समाधान। तोचि योग परम पावन। समाधान जीवशिवां॥ १४॥ जीवपरमात्म्याची एकात्मता। तोच ‘परमयोग’ तत्त्वतां। येचिविखींची कथा। अश्वदृष्टांता हरि सांगे॥ १५॥
एष वै परमो योगो मनस: संग्रह: स्मृत:।
हृदयज्ञत्वमन्विच्छन् दम्यस्येवार्वतो मुहु:॥ २१॥
जैसा वारु उपलाणी। वश्य करी अश्वसाहणी। मागें तरटांचा कर झणाणी। पुढें राखे नेहटुनी रागबागा॥ १६॥ तेथ जें जें पाऊल वोजा करी। तेथ मान दे जीजीकारीं। जेथ फुटोनि पडे बाहेरी। तेथ तरट मारी सवर्म॥ १७॥ जेथ हटावला न सांडी खोडी। ते ठायीं दे मोकळवाडी। परी नि:शेष पीडी ना सोडी। ऐसा पडिपाडीं राखत॥ १८॥ दमनीं देखोनि अत्यादरु। स्वामीहृदय जाणे वारु। आणि वारुवाचें अभ्यंतरु। कळे साचारु स्वामीसी॥ १९॥ ऐसें उभयहृदय-ऐक्ययोगें। वारू न धरितां रागबागें। अडणें उडणें सांडी वेगें। मग नाचों लागे मोकळा॥ २२०॥ ऐसें वश्य केलिया अश्वातें। मग कर्त्याचिया मनोगतें। वारू नाचे काचेनि सुतें। यापरी मनातें दमावें॥ २१॥ मनोजयो कीजे आपण। तोचि ‘परमयोग’-कारण। हेंचि मागिले श्लोकीं निरूपण। तुज म्यां संपूर्ण सांगितलें॥ २२॥ ‘नृदेहमाद्यम्’ या श्लोकाचे अंतीं। कर्मवैराग्यद्वारा मुक्ती। आतां सांगितली हेस्थिती। उत्तमगतीं अभ्यासें॥ २३॥ मुख्यत: सांख्ययोगें माझी प्राप्ती। तें मी सांगेन तुजप्रती। मिथ्या संसाराची स्फूर्ती। ब्रह्मसंविती साचार॥ २४॥ हें ज्ञानगहन निरूपण। तुज मी सांगेन गुह्य ज्ञान। जें असोनि त्रिगुणीं वर्तमान। अलिप्त जाण गुणकार्या॥ २५॥ ‘तुज मी सांगेन गुह्य ज्ञान’। हें ऐकोनि देवाचें वचन। उद्धव स्वयेंचि झाला कान। अतिसावधान श्रवणार्थीं॥ २६॥ देखोनि उद्धवाचा अत्यादरु। आर्तचित्तचकोरचंद्रु। निजज्ञानगुणसमुद्रु। काय यादवेंद्रु बोलिला॥ २७॥
सांख्येन सर्वभावानां प्रतिलोमानुलोमत:।
भवाप्ययावनुध्यायेन्मनो यावत्प्रसीदति॥ २२॥
जें सृष्टिपूर्वीं अलिप्त। तेंचि सृष्टिउदयीं सृष्टिआंत। महत्तत्त्वादि देहपर्यंत। तत्त्वीं अनुगत तेचि वस्तु॥ २८॥ आणि सृष्टीच्या स्थितिविशेषीं। गुणकार्यातें तेंचि प्रकाशी। शेखीं गुणकार्यातें तेंचि ग्रासी। उरे अवशेषीं ते वस्तु॥ २९॥ नग न घडतां सोनेंचि साचें। नग घडवितां सोनेंपण न वचे। नग मोडितां सोन्याचे। घडामोडीचें भय नाहीं॥ २३०॥ मेघापूर्वीं शुद्ध गगन। मेघा सबाह्य गगन जाण। मेघ विराल्या गगनीं गगन। अलिप्त जाण संचलें॥ ३१॥ तेवीं उत्पत्तिस्थितिप्रळयांतीं। वस्तु संचली अलिप्तस्थितीं। तेहीविखींची उपपत्ती। उद्धवा तुजप्रती सांगेन॥ ३२॥ कुलाल जें जें भांडें घडित। त्यासी मृत्तिका नित्य व्याप्त। तेवीं जें जें तत्त्व उपजत। तें तें व्यापिजेत वस्तूनें॥ ३३॥ सागरीं जे जे उपजे लहरी। तिसी जळचि सबाह्यांतरीं। तेवीं महत्तत्त्वादी देहवरी। सबाह्याभ्यंतरीं चिन्मात्र॥ ३४॥ हो कां जो जो पदार्थ निफजे। तो आकाशें व्यापिजे सहजें। तेवीं जें जें तत्त्व उपजे। तें तें व्यापिजे चैतन्यें॥ ३५॥ अनुलोमें पाहतां यापरी। वस्तूवेगळें तिळभरी। कांहीं न दिसे बाहेरी। निजनिर्धारीं विचारितां॥ ३६॥ पृथ्वीपासूनि प्रकृतीवरी। लयो पाहतां प्रतिलोमेंकरीं। जेवीं जळगारा जळाभीतरीं। तेवीं लयो चिन्मात्रीं तत्त्वांचा॥ ३७॥ प्रकृत्यादि तत्त्वें प्रबळलीं। विकारोनि लया गेलीं। वस्तु अलिप्तपणें संचली। नाहीं माखली अणुमात्र॥ ३८॥ एवं उत्पत्तिस्थितिप्रळयांत। वस्तु अविनाशी अलिप्त। नित्य शुद्ध बुद्ध मुक्त। जाण निश्चित उद्धवा॥ ३९॥ ऐशा वस्तूच्या ठायीं भवजल्प। तो जाण पां मिथ्या आरोप। जेवीं दोराअंगीं सर्प। वृथा भयकंप भ्रांतासी॥ २४०॥ सर्प दवडोनि दोर शुद्ध। करावा ऐसा नाहीं बाध। एकला एक परमानंद। ऐसें गोविंद बोलिला॥ ४१॥ ऐशिये वस्तूच्या ठायीं जाण। मन विसरे मनपण। येणें साधनें पैं जाण। होय ब्रह्म पूर्ण साधकु॥ ४२॥ हें परम अगाध साधन। ज्यासी नाटोपे गा जाण। त्याचें निश्चळव्हावया मन। सुगम साधन देवो सांगे॥ ४३॥
निर्विण्णस्य विरक्तस्य पुरुषस्योक्तवेदिन:।
मनस्त्यजति दौरात्म्यं चिन्तितस्यानुचिन्तया॥ २३॥
जन्ममरणांचें महाआवर्त। भोगितां वैराग्यें अतिसंतप्त। अतएव विषयीं विरक्त। जैसें विषयुक्त परमान्न॥ ४४॥ मघमघीत अमृतफळ। त्यावरी सर्पें घातली गरळ। तेवीं विषयमात्रीं सकळ। देखे केवळ महाबाधा॥ ४५॥ ऐसेनि विवेकें विवेकवंत। श्रद्धापूर्वक गुरुभक्त। गुरूनें सांगितला जो अर्थ। तो हृदयांत विसरेना॥ ४६॥ गुरूनें बोधिला जो अर्थ। तो सदा हृदयीं असे ध्यात। चित्तीं चिंतिलाचि जो अर्थ। तोचि असे चिंतित पुन: पुन:॥ ४७॥ करितां प्रत्यग्वृत्तीं चिंतन। संकल्प विकल्प सांडी मन। त्यजोनियां देहाभिमान। ब्रह्मसंपन्न स्वयें होय॥ ४८॥ झालिया ब्रह्मसंपन्न। स्वरूपीं लीन होय मन। हाही एक उपावो जाण। न ठाके तरी आन अवधारीं॥ ४९॥
यमादिभिर्योगपथैरान्वीक्षिक्या च विद्यया।
ममार्चोपासनाभिर्वा नान्यैर्योग्यं स्मरेन्मन:॥ २४॥
त्यजोनियां सकळ भोग। यमनियमेंसीं योगमार्ग। आसनस्थ होऊनि चांग। दे मुद्रा साङ्ग ‘अधारीं’॥ २५०॥ तेव्हां अपान ऊर्ध्वमुखें वाढे। जों वरता ‘स्वाधिष्ठाना’ चढे। प्राण प्राणायामें अडे। तो मागुता मुरडे नाभिस्थाना॥ ५१॥ सम होतां प्राणापान। पिंडब्रह्मांडाचें शोधन। स्वयें वायु करीगा आपण। मलक्षालन शरीरीं॥ ५२॥ कफ पित्त दोन्ही खाये। नाडींतें शोधीत जाये। जुने संचितमल पाहें। तेही लवलाहें निर्दळी॥ ५३॥ नवल वायूचें प्रबळ बळ। पिंडब्रह्मांडींचे सकळ मळ। धोऊनि करी गा निर्मळ। पवित्रता केवळ महायोगें॥ ५४॥ तेथें प्रगटे रोगाची परवडी। महाविघ्नांची पडे उडी। धांवती विकल्पाच्या कोडी। सिद्धींची रोकडी नागवण पावे॥ ५५॥ इतुकीं अंगीं आदळतां जाण। साधक न सांडी जैं आंगवण। तैं सम होती प्राणापान। सत्य जाण उद्धवा॥ ५६॥ प्राणापानांच्या मिळणीं। शक्ति चेतवे कुंडलिनी। ते प्राणापानांतें घेउनि। सुषुम्नास्थानीं प्रवेशे॥ ५७॥ ते आद्यशक्ति अचाट। चढे पश्चिमेचा महाघाट। तेथें षड्चक्रांचा कडकडाट। पूर्वींच सपाट पवनें केला॥ ५८॥ कुंडलिनी चालतां वाटा। चुकल्या आधिव्याधींच्या लाटा। बुजाल्या विकल्पांच्या वाटा। महाविघ्नांच्या झटा बाधूं न शकती॥ ५९॥ साधितां उल्हाटशक्तीचे उलट। उघडे ब्रह्मरंध्रींचें कपाट। तंव लोटलेसहस्रदळाचे पाट। अतिचोखट चंद्रामृत॥ २६०॥ तें प्राशूनि कुंडलिनी बाळा। संतोषें सांडी गरळा। ते शरीरीं वोतली कळा। तेणें पालटला देहभाव॥ ६१॥ शरीराकारें वोतिली कळा। तेणें देहो दिसे अतिसोज्ज्वळा। ना तो ब्रह्मरसाचा पुतळा। कीं उमलला कळा शांतिसुखाचा॥ ६२॥ जीवाचें जीवन मुसावलें। कीं ब्रह्मविद्येसी फळ आलें। ना ते चैतन्या कोंब निघाले। तैसे शोभले अवयव॥ ६३॥ त्या देहाचेनि लाघवें। जगाच्या डोळां सामावे। जीवामाजीं वावरों पावे। निजस्वभावें सबाह्य॥ ६४॥ तो पवनाची करोनि पायरी। सुखें चाले गगनावरी। या नांव परम ‘खेचरी’। सिद्धेश्वरीं बोलिजे॥ ६५॥ त्याचिया अंगींचिया दीप्ती। खद्योतप्राय गभस्ती। त्याचें चरणामृत वांछिती। अमरपति इंद्रचंद्र॥ ६६॥ क्रमूनि औटपीठ गोल्हाट। भ्रमरगुंफादि शेवट। भेदूनि सोहंहंसाचें पीठ। परमात्मा प्रकट होऊनि ठाके॥ ६७॥ हा योगाभ्यासें योग गहन। अवचटें कोणा साधे जाण। हा मार्ग गा अतिकठिण। स्वयें श्रीकृष्ण बोलिला॥ ६८॥ हेंचि मानतें श्रीकृष्णनाथा। तरी आन साधन न सांगता। हा मूळश्लोकार्थ पाहातां। कळेल तत्त्वतां साधूंसी॥ ६९॥ हा ऐकतां अतिगोड वाटे। परी करितां काळीज फाटे। तरी न साधेचि महाहटें। येथ ठकले लाठे सुरनर॥ २७०॥ असो हें अत्यंत कठिण। तुज मी सांगेन गा आन। ‘आन्वीक्षिकी’ विद्या जाण। त्वंपदशोधन विवेकु॥ ७१॥ तत्पदाहूनि वेगळा। पांचभौतिक तत्त्वांचा गोळा। चुकोनि व्यापका सकळा। कोठें निपजला एकदेशी॥ ७२॥ अनादि मायाप्रवाहयोगें। तन्मात्राविषयसंगें। मनाचेनि संकल्पपांगें। वेगळें सवेगें मानलें॥ ७३॥ मनें मानिला जो भेदु। त्यासी करावा अभेदबोधु। येचि अर्थीं स्वयें गोविंदु। विवेक विशदु दाखवी॥ ७४॥ पांचभौतिक शरीरखरें। तेथ पृथ्वी प्रत्यक्ष जळीं विरे। पृथ्वीचा गंध जळीं भरे। तैं पृथ्वी सरे नि:शेष॥ ७५॥ त्या जळाचा जळरसु। शोधुनि जैं घे हुताशु। तैं जळाचा होय ऱ्हासु। विरे निजनि:शेषु तेजतत्त्वीं॥ ७६॥ त्या तेजाचें कारणरूप। गिळी वायूचा पूर्ण प्रताप। तेव्हां तेजाचें मावळें स्वरूप। वायूची झडप लागतां॥ ७७॥ त्या वायूचा स्पर्शगुण। नेतां गगनें हिरून। तेव्हां वायूचें नुरे भान। राहे मुसावोन गगनचि॥ ७८॥ केवळ गगना नुरे उरी। तें गुणकार्येंसीं रिघे अहंकारीं। अहंकारु रिघे मायेमाझारीं। माया परमेश्वरींमिथ्या होय॥ ७९॥ रात्रि आपुलिया प्रौढीं। आंधारातें वाढवी वाढी। तेथ नक्षत्रें खद्योत कोडी। मिरवती गाढीं निजतेजें॥ २८०॥ ते रात्रि येतां सूर्यापुढें। स्वकार्येंसीं सगळी उडे। पाहों जातां मागेंपुढें। कोणी कडे असेना॥ ८१॥ तेवीं परमेश्वरीं माया। कार्यकारणेंसीं गेली वायां। मिथ्यात्वेंचि न ये आया। नुरेचि दिसावया मागमोसु॥ ८२॥ मायाप्रतिबिंबित चैतन्या। आणी ‘जीव’ या अभिधाना। ते माया गेलिया जाणा। होय जीवपणा ऱ्हासु॥ ८३॥ बुडालें जीवशिवांचें भान। उडालें मनाचें मनपण। कोंदलें चैतन्यघन। परम समाधान साधकां॥ ८४॥ करितां त्वंपदाचें शोधन। होय तत्पदीं समाधान। हे ‘आन्वीक्षिकी विद्या’ जाण। विवेकसंपन्न पावती॥ ८५॥ न करितां योगसाधन। न लगे त्वंपदाचें शोधन। याहोनि सुलभ साधन। तुज मी आन सांगेन॥ ८६॥ जेथ कष्ट करितां तरी थोडे। परीयोगाचे सकळ फळ जोडे। त्वंपदशोधन त्यापुढें। होय बापुडें लाजोनि॥ ८७॥ ते माझी गा निजभक्ति। माझ्या रामकृष्णादि ज्या मूर्ती। पूजितां त्या अतिप्रीतीं। मी श्रीपती संतोषें॥ ८८॥ तेथें माझेंश्रवण माझें कीर्तन। माझें नाम माझें स्मरण। माझें ध्यान माझें भजन। माझें चिंतन सर्वदा॥ ८९॥ हृदयीं माझें सदा ध्यान। मुखीं माझें नाम माझें स्तवन। श्रवणीं माझी कथा माझें कीर्तन। करीं माझें पूजन सर्वदा॥ २९०॥ चरणीं प्रदक्षिणा यात्रागमन। अष्टांगीं सर्वदा माझें नमन। ऐसें अनन्य माझें भजन। विनटलेंपण मद्भक्तीं॥ ९१॥ ऐसे विनटले जे माझे भजनीं। त्यांसी मी विकलों चक्रपाणी। त्यांवेगळें पढियंतें कोणी। आन त्रिभुवनीं मज नाहीं॥ ९२॥ यापरी करितां माझें भजन। न लगे योगादिकांचें स्मरण। मी भक्तिवेगळा श्रीकृष्ण। नातुडें जाण उद्धवा॥ ९३॥ अवचटें दैवगतीं येथ। योगियासी जैं घडे दुरित। तैं त्यासी न लगे कर्मप्रायश्चित्त। तेंचि सांगत श्रीकृष्ण॥ ९४॥
यदि कुर्यात् प्रमादेन योगी कर्म विगर्हितम्।
योगेनैव दहेदंहो नान्यत्तत्र कदाचन॥ २५॥
भक्तासी निंद्य कर्म न घडे। त्यासी मी राखता मागें पुढें। हें आलें गा योग्याकडे। तेथही घडे प्रमादें॥ ९५॥ प्रमादें घडलें जें पाप। त्याचा तीव्र अनुताप। जेवीं दावाग्नीं पोळल्या सर्प। तैसा सकंप पापासी॥ ९६॥ गोमाशी लागतां सिंहासी। तो जेवीं झाडी सर्वांगासी। तेवीं योगी देखोनि पापासी। जो अहर्निशीं अनुतापी॥ ९७॥ तेणें होऊनि सावचित्त। योगबळें निजयोगयुक्त। पाप निर्दाळावें समस्त। हेंचि प्रायश्चित्त योगियासी॥ ९८॥ हे सांडोनियां योगस्थिती। जैं लावूं धांवे शेणमाती। तैं नागवला गा निश्चितीं। नव्हेचि निष्कृती पापाची॥ ९९॥ हृदयीं नाहीं अनुतापवृत्ती। वरिवरी गा शास्त्रोक्तीं। लावूं जातां शेणमाती। नव्हे निवृत्ती पापाची॥ ३००॥ माझें क्षणार्ध अनुसंधान। कोटि कल्मषां करी दहन। तेथ इतरांचा केवा कोण। हें स्वयें श्रीकृष्ण बोलिला॥ १॥ ज्याचे अधिकारीं माझें ध्यान। सांडोनियां जाण। प्रायश्चित्त सांगतां आन। लागे दूषण सांगत्यासी॥ २॥ यालागीं मुख्यत्वें जाण। येथ अधिकारचि प्रमाण। येचिविखींचें निरूपण। श्रीनारायण सांगत॥ ३॥
स्वे स्वेऽधिकारे या निष्ठा स गुण: परिकीर्तित:।
कर्मणां जात्यशुद्धानामनेन नियम: कृत:।
गुणदोषविधानेन सङ्गानां त्याजनेच्छया॥ २६॥
न प्रेरितां शास्त्रें श्रुतीं। विषयीं स्वाभाविक प्रवृत्ती। तिची करावया निवृत्ती। माझी वेदोक्ती प्रवर्तली॥ ४॥ एकाएकीं विषयत्यजन। करावया अशक्त जन। त्यासी वेद दावी दोषगुण। त्यागावया जाण विषयांसी॥ ५॥ हे माता हे सहोदर। येथ करूं नये व्यभिचार। हे वेद न बोलता अधिकार। तैं यथेष्टाचार विषयांचा॥ ६॥ जेथवरी स्त्रीपुरुषव्यक्ती। तेथवरी कामासक्ती। मी नेमितों ना वेदोक्ती। तैं व्यभिचारप्राप्ती अनिवार॥ ७॥ सकळ स्त्रिया सांडून। त्यजूनियां इतर वर्ण। सवर्ण स्त्री वरावी आपण। अष्टवर्षा जाण नेमस्त॥ ८॥ तिचें वेदोक्त पाणिग्रहण। तेथ साक्षी अग्नि आणि ब्राह्मण। इतर स्त्रियांची वाहूनि आण। स्वदारागमन विध्युक्त॥ ९॥ यापरी म्यां सकळ लोक। स्त्रीकामें अतिकामुक। स्वदारागमनें देख। केले एकमुख वेदोक्तीं॥ ३१०॥ याचिपरी म्यां अन्नसंपर्क। वेदवादें नेमिले लोक। येरवीं वर्णसंकर देख। होता आवश्यक वेदेंवीण॥ ११॥ तो चुकवावया वर्णसंकर। वर्णाश्रमांचा प्रकार। वेद बोलिला साचार। विषयसंचार त्यागावया॥ १२॥ विषयांची जे प्रवृत्ती। तेचि ‘अविद्या’ बाधा निश्चितीं। जे विषयांची अतिनिवृत्ती। ती नांव ‘मुक्ति’ उद्धवा॥ १३॥ करावया विषयनिवृत्ती। वेदें द्योतिली कर्मप्रवृत्ती। वर्णाश्रमाचारस्थिती। विषयासक्तीच्छेदक॥ १४॥ नित्य नैमित्तिक कर्मतंत्र। नाना गुणदोषप्रकार। वेदें द्योतिले स्वाधिकार। विरक्त नर व्हावया॥ १५॥ स्वकर्में होय चित्तशुद्धी। तेणें वैराग्य उपजे त्रिशुद्धी। वैराग्य विषयावस्था छेदी। गुणकार्यउपाधी रजतम हे॥ १६॥ तेव्हांउरे शुद्ध-सत्त्वगुण। तेथें प्रकटे गुरुभजन। गुरुभजनास्तव जाण। ज्ञान विज्ञान घर रिघे॥ १७॥ पूर्ण करितां भगवद्भक्ति तैं गुरुभजनीं अधिकारप्राप्ती। सद्गुरुमहिमा सांगों किती। मी आज्ञावर्ती गुरूचा॥ १८॥ गुरु ज्यावरी अनुग्रहो करी। त्यासी मी भगवंत उद्धरीं। आदरें वाऊनियां शिरीं। निजऐश्वर्यावरी बैसवीं॥ १९॥ गुरु परमात्मा परेशु। ऐसा जयाचा विश्वासु। त्याचा अंकिला मी हृषीकेशु। जो जगदीशु जगाचा॥ ३२०॥ जेथ मी अंकित झालों आपण। तेथ समाधीसीं ज्ञानविज्ञान। वोळंगे गुरुभक्ताचें अंगण। तेथ केवा कोण सिद्धींचा॥ २१॥ त्या गुरूचें करूनि हेळण। जो करी माझें भजन। तेणें विखेंसीं मिष्टान्न। मज भोजन घातलें॥ २२॥ तोंडीं घास डोईं टोला। ऐसा भजनार्थ तो झाला। तो जाण सर्वस्वें नागवला। वैरी आपला आपणचि॥ २३॥ येथवरी गुरूचें महिमान। माझेनि वेदें द्योतिलें जाण। करूनि विषयनिर्दळण। स्वाधिकारें जन तरावया॥ २४॥ यालागीं ज्यासी जो अधिकार। तो तेणें नुल्लंघावा अणुमात्र। हा वेदें केला निजनिर्धार। स्वकर्में नर तरावया॥ २५॥ तरी म्हणशी कर्मचि पावन। हेंही सर्वथा न घडे जाण। स्वाधिकारेंवीण कर्माचरण। तें अतिदारुण बाधक॥ २६॥ संन्यास करी गृहस्थधर्म। तें त्यासी वोडवलें अकर्म। गृहस्थ करी करपात्रकर्म। तोचि अधर्म तयासी॥ २७॥ हितासी वोखद घेतां जाण। त्याचें चुकलिया अनुपान। तेंचि अन्यथा होय आपण। पीडी दारुण मरणांत॥ २८॥ तैसें अनधिकारें करितां कर्म। तेंचि बाधक होय परम। हें वेदें जाणोनियां वर्म। स्वधर्म सुगम नेमिले॥ २९॥ स्वाधिकारें स्वधर्मनिष्ठा। हाचि पुरुषाचा गुण मोठा। तेणें फिटे गुणकर्ममळकटा। प्रिय वैकुंठा तो होय॥ ३३०॥ वेदें बोलिला जो गुण। तो अंगीकारावा आपण। वेदें ठेविलें ज्यासी दूषण। तें सर्वथा जाण त्यजावें॥ ३१॥ हेंचि गुणदोषलक्षण। करितां वेदविवंचन। गुंतले गा अतिसज्ञान। माझे कृपेवीण वेदार्थ न कळे॥ ३२॥ निषेधमुखेंकरितां त्यागु। वेद त्यागवी विषयसंगु। हें वर्म जाणोनि जो चांगु। तो होय नि:संगु महायोगी॥ ३३॥ उद्धवा हें वेदतत्त्वसार। तुज म्यां सांगितलें साचार। ज्यालागीं शिणताति सुरनर। ऋषीश्वर तपस्वी॥ ३४॥ परी माझेकृपेवीण सर्वथा। हें न ये कोणाचिये हाता। तें तुज म्यां सांगितलें आतां। तुझे हितार्था निजगुह्य॥ ३५॥ मागें म्यां केलें निरूपण। गुणदोष देखणें तो दोष जाण। त्याचेंही विशदविवेचन। तुज मीं संपूर्ण सांगितलें॥ ३६॥ पराचा देखावा दोषगुण। हें नाहीं नाहीं माझें वेदवचन। दोष त्यजोनियां आपण। घ्यावा गुण हा वेदार्थ॥ ३७॥ त्यजोनि पराचे दोषगुण। स्वयें गुण घ्यावा आपण। हेंही माझे कृपेवीण। नव्हे जाण उद्धवा॥ ३८॥ न देखोनि पराचे दोषगुण। स्वयें होईजे ब्रह्मसंपन्न। म्हणशी ऐशी कृपा परिपूर्ण। केवीं आपण लाहिजे॥ ३९॥ तेचिविखींचें निरूपण। कृपेनें सांगताहे श्रीकृष्ण। माझे कृपेचें आयतन। उद्धवा जाण मद्भक्ती॥ ३४०॥
जातश्रद्धो मत्कथासु निर्विण्ण: सर्वकर्मसु।
वेद दु:खात्मकान् कामान् परित्यागेऽप्यनीश्वर:॥ २७॥
माझे कथेचेनि श्रवणें। उठी संसाराचें धरणें। ऐसा विश्वासु धरिला ज्याणें। जीवेंप्राणें निश्चितीं॥ ४१॥ म्हणे अर्धोदकीं प्राणांतीं। जैं हरिकथा आठवे चित्तीं। तैं उठे जन्ममरणपंक्ती। येथवरी भक्ती मत्कथेची॥ ४२॥ ऐशिया भावार्थाचे स्थिती। अनिवार उपजे विरक्ती। नावडे कर्माची प्रवृत्ती। विषयासक्ती नावडे॥ ४३॥ नावडे इतर कथावदंती। नावडे लौकिकाची प्रीती। परी नि:शेष त्यागाप्रती। सामर्थ्यशक्ती ज्या नाहीं॥ ४४॥ तेणें अनन्यभावें जाण। अत्यादरें करावें भजन। येचिविखींचें निरूपण। स्वमुखे श्रीकृष्ण सांगत॥ ४५॥
ततो भजेत मां प्रीत: श्रद्धालुर्दृढनिश्चय:।
जुषमाणश्च तान्कामान्दु:खोदर्कांश्च गर्हयन्॥ २८॥
त्यागावया नाहीं सामर्थ्यशक्ती। त्यासी विषयभोग जेव्हां येती। ते भोगी ऐशिया रीतीं। जेवीं शृंगारिती सुळीं द्यावया॥ ४६॥ त्यांसी केळें साखर चोखटी। दूधतूप लावितां ओठीं। शूळ भरेल या भोगापाठीं। तो धाक पोटीं धुकधुकी॥ ४७॥ तेवीं विषय भोगितां जाण। पुढें निरय अतिदारुण। मज कां विसरला नारायण। मधुसूदन माधव॥ ४८॥ मी पडिलों विषयबंदिखानीं। वेगीं पावें गरुडावळंघोनी। कृपाळुवा चक्रपाणी। मजलागोनी सोडवीं॥ ४९॥ विषयमहाग्रहाचे तोंडीं। मी सांपडलों बडिशपिंडी। गजेंद्राचेपरी तांतडीं। घालीं उडी मजलागीं॥ ३५०॥ धांव पाव गा गोविंदा। निवारीं माझी विषयबाधा। उपेक्षूं नको मुकुंदा। घेऊनि गदा धांव वेगीं॥ ५१॥ तूं अडलियांचा सहाकारी। भक्तकाजकैवारी। मज बुडतां विषयसागरीं। वेगें उद्धरीं गोविंदा॥ ५२॥ मी पडिलों विषयसागरीं। बुडविलों कामलोभलहरीं। क्रोधें विसंचिलों भारी। अभिमानसुसरीं गिळियेलों॥ ५३॥ तूं दीनदयाळ श्रीहरी। हें आपुलें बिरुद साच करीं। मज दीनातें उद्धरीं। निजबोधकरीं धरोनियां॥ ५४॥ हे विषयबाधा अतिगहन। कां पां न पवे जनार्दन। येणें अट्टहासें जाण। करी स्मरण हरीचें॥ ५५॥ न सुटे विषयवज्रमिठी। पडिलों कामदंष्ट्रांचिये पोटीं। कांहीं केलिया न सुटे मिठी। आतां जगजेठी धांव वेगीं॥ ५६॥ ऐसा निजभक्तांचा धांवा। क्षणही मज न साहवे उद्धवा। माझी कृपा होय तेव्हां। पूर्ण स्वभावा अनुतापें॥ ५७॥ उद्धवा जेथ अनुताप नाहीं। तेथ माझी कृपा नव्हे कहीं। कृपेचें वर्म हेंच पाहीं। जैं अनुताप देहीं अनिवार॥ ५८॥ माझे कृपेवीण निश्चितीं। कदा नुपजे माझी भक्ती। माझी झालिया कृपाप्राप्ती। अनन्यभक्ती तो करी॥ ५९॥ माझे कृपेचें लक्षण। प्राप्त विषय भोगितां जाण। न तुटे माझें अनन्य भजन। ‘पूर्ण कृपा’ जाय या नांव॥ ३६०॥ मग चढत्या वाढत्या प्रीतीं। नीच नवी करी माझी भक्ती। देह गेह स्त्री पुत्र संपत्ती। वेंची माझे प्रीतीं धनधान्य॥ ६१॥ माझे भक्तीलागीं आपण। सर्वस्व वेंची हें नवल कोण। स्वयें वंचीना जीवप्राण। ऐसें अनन्यभजन सर्वदा॥ ६२॥ माझ्या भजनाची अतिप्रीती। स्मरण न सांडी अहोरातीं। माझा विसर न पडे चित्तीं। त्याची फळप्राप्ती हरि सांगे॥ ६३॥
प्रोक्तेन भक्तियोगेन भजतो मासकृन्मुने:।
कामा हृदय्या नश्यन्ति सर्वे मयि हृदि स्थिते॥ २९॥
माझी जे कां निजभक्ती। मागां सांगितली तुजप्रती। त्या हातवटिया मीं श्रीपती। यजिलों अतिप्रीतीं बारंबार॥ ६४॥ पळपळ क्षणक्षण। माझें न विसरत स्मरण। करिती अनन्य भजन। मदर्पण तें मीचि॥ ६५॥ दिवसदिवसां चढोवढी। अनिवार प्रीति वाढे गाढी। लागतां नीच नवीगोडी। भजे आवडीं पुन:पुन:॥ ६६॥ केलीचि भक्ती करितां। उबगु न ये सर्वथा। अधिक हर्षवाटे चित्ता। उल्हासता मद्भजनीं॥ ६७॥ मज आकळूनि आपले मनीं। मनींहोनि प्रीति भजनीं। तेथ सकळ काम जाती नासोनी। जेवीं कां तरणीं खद्योत॥ ६८॥ जेवीं कां केसरी देखोनी। मदगजां होय भंगणी। तेवीं काम जाती हृदयींहूनी। मी चक्रपाणी प्रकटल्या॥ ६९॥ ‘मी प्रकटलों’ ऐसें म्हणतां। लाज लागेल या वचनार्था। मजवीण ठावो नाहीं रिता। ‘प्रकटलों’ आतां म्हणे कोण॥ ३७०॥ उद्धवा जाण तत्त्वतां। मी सदा हृदयीं वसता। भक्तांची भ्रांती जातां। मी स्वभावतां प्रकटचि॥ ७१॥ भक्तीं करूनि माझी भक्ती। नाशिली गा निजभ्रांती। तेथ स्वयंभ मी श्रीपती। सहजस्थितीं प्रकटचि॥ ७२॥ मी हृदयीं प्रकटल्यापुढें। भक्तांसी अलभ्य लाभ जोडे। फिटे संसाराचें सांकडें। ऐक पां फाडोवाडें सांगेन॥ ७३॥
भिद्यते हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशया:।
क्षीयन्ते चास्य कर्माणि मयि दृष्टेऽखिलात्मनि॥ ३०॥
उद्धवा मी ज्यासी हृदयीं भेटें। तो मी हृदयामाजीं न संठें। सर्वात्मा सर्वरूपें प्रकटें। नव्हे धाकुटें स्वरूप माझें॥ ७४॥ ऐसा मी प्रकटलियापाठीं। संसारुचि न पडे दिठीं। मावळे गुणेंसी भेदत्रिपुटी। पळे उठाउठी भवभय॥ ७५॥ लागतां सूर्याचे किरण। घृताचें नासे कठिणपण। तेवीं मी प्रकटल्या नारायण। न फोडितां जाण लिंगदेह नाशे॥ ७६॥ धुई दाटली चहूंकडे। ते चंडवातें तत्काळ उडे। तेवीं माझ्या स्वप्रकाशापुढें। वासनेचें उपडे समूळ जाळ॥ ७७॥ समूळ उपडितां वासनेसी। संशय निमे जीवेंभावेंसीं। तेथ क्षयो झाला कर्मासी। जेवीं रवीपाशीं आंधारें॥ ७८॥ तेवीं गुण नासती स्वकार्येंसीं। अविद्या नासे अज्ञानेंसीं। जीव नासे शिवपणेंसीं। चिदचिद्ग्रंथीसीं अहंकारु॥ ७९॥ तेथ सोहंहंसाची बोळवण। न करितांचि जाहली जाण। भेणें पळालें जन्ममरण। पडलें शून्य संसारा॥ ३८०॥ यापरी भक्तियोगें गहन। माझें करूनियां भजन। भक्त पावले समाधान। ऐसेनि जाण निजभजनें॥ ८१॥ एवं भक्ति-ज्ञान-कर्मयोग। या तिहीं योगांचा विभाग। तुज म्यां सांगितला साङ्ग। हें वर्म चांग मत्प्राप्ती॥ ८२॥ येथ विशेषें माझी भक्ती। न पाहे साह्य सांगाती। नव्हे आणिकांची पंगिस्ती। साधी मत्प्राप्ती अंगोवांगीं॥ ८३॥ न करितां माझें भजन। सर्वथा नुपजे माझें ज्ञान। कर्म न करितां मदर्पण। तेंचि जाण अकर्म॥ ८४॥ यालागीं मुख्य जें निजज्ञान। तें अपेक्षी माझें भजन। तेथ कर्म बापुडें रंक जाण। भजनेंवीण सरेना॥ ८५॥ एवं ज्ञान कर्में परमार्थीं। माझे भक्तीस्तव होती सरतीं। ते भक्तीची निजख्याती। ऐक तुजप्रती सांगेन॥ ८६॥
तस्मान्मद्भक्तियुक्तस्य योगिनो वै मदात्मन:।
न ज्ञानं न च वैराग्यं प्राय: श्रेयो भवेदिह॥ ३१॥
करूं नेणे कर्माचरण। न साधितां वैराग्यज्ञान। भावें करितां माझें भजन। माझ्या स्वरूपीं मन ठेवूनी॥ ८७॥ तेथ ज्ञानकर्मादिकें जाण। मुख्य वैराग्यही आपण। मद्भक्तीसी येती लोटांगण। चरणां शरण पैं येती॥ ८८॥ शरण येणें हें कायशी गोठी। केवळ जन्मती भक्तीच्या पोटीं। मग लडेवाळें घालूनि मिठी। स्वानंदाची गोमटी मागती गोडी॥ ८९॥ एवं भक्ति आपुले अंकीं जाण। करी ज्ञानादिकांचे लालन। परमानंद पाजूनि पूर्ण। करी पालन निजांगें॥ ३९०॥ ते आतुडल्यामाझी भक्ती। ज्ञानादिकें कामारी होती। तेचिविखींची उपपत्ती। स्वयें श्रीपती सांगत॥ ९१॥
यत्कर्मभिर्यत्तपसा ज्ञानवैराग्यतश्च यत्।
योगेन दानधर्मेण श्रेयोभिरितरैरपि॥ ३२॥
सर्वं मद्भक्तियोगेन मद्भक्तो लभतेऽञ्जसा।
स्वर्गापवर्गं मद्धाम कथञ्चिद्यदि वाञ्छति॥ ३३॥
जें पाविजे स्वधर्मकर्मादरें। जें पाविजे निर्बंध तपाचारें। जें सांख्यज्ञानविचारें। पाविजे निर्धारें जें वस्तु॥ ९२॥ जें पाविजे विषयत्यागे। जें पाविजे अष्टांगयोगें। जें वातांबुपर्णाशनभोगें। जें दानप्रसंगें पाविजे॥ ९३॥ जें साधें वेदाध्ययनें। जें साधे सत्यवचनें। जें साधे अनेकीं साधनें। तें मद्भजनें पाविजे॥ ९४॥ हें न सोशितां साधनसांकडें। नुल्लंघितां गिरिकपाट कडे। हीं सकळ फळें येती दारापुढें। जैं माझी आतुडे निजभक्ती॥ ९५॥ उद्धवा तूं म्हणसी जाण। ऐशी ते तुझी भक्ति कोण। ब्रह्मभावें जें गुरुभजन। ते भक्तीचा पूर्ण हा प्रतापु॥ ९६॥ सद्गुरुभजनापरती। साधकांसी नाहीं प्राप्ती। मी भगवंत करीं गुरुभक्ती। इतरांचा किती पवाडु॥ ९७॥ मीही सद्गुरुचेनि धर्में। पावलों एवढिये महिमे। त्या सद्गुरूचे गुरु गरिमे। कोणे उपमे उपमावें॥ ९८॥ जे गुरुब्रह्म-अभेदभक्त। अवचटेंअणुमात्र वांछित। तैं वैकुंठादि समस्त। मी त्यांसी देत स्वर्गापवर्ग॥ ९९॥ हेंही बोलतां अत्यंत थोडें। मी त्यांच्या भजनसुरवाडें। भुललों गा वाडेंकोडें। त्यां मागेंपुढें सदा तिष्ठें॥ ४००॥ मद्भक्त नैराश्यें अतिगाढे। ते मागतील हें कदा न घडे। तेंही लक्षण तुजपुढें। अतिनिवाडें सांगेन॥ १॥
न किञ्चित्साधवो धीरा भक्ता ह्येकान्तिनो मम।
वाञ्छन्त्यपि मया दत्तं कैवल्यमपुनर्भवम्॥ ३४॥
ज्यासी न घेणेंपणाचा प्रबोधु। साचार झाला अतिविशदु। ऐसा निरपेक्ष जो शुद्धु। तो सत्य साधु मज मान्य॥ २॥ ज्याच्या ठायीं निरपेक्षता। धैर्य त्याचे चरण वंदी माथां। ज्याच्या ठायीं अधीरता। तेथ निरपेक्षता असेना॥ ३॥ कोटिजन्में बोधु जोडे। तैं हे निरपेक्षता आतुडे। निरपेक्षतेवरुतें चढे। ऐसें नाहीं फुडें साधन॥ ४॥ ऐशिये निरपेक्षताप्राप्तीं। माझ्या भजनीं अतिप्रीती। ती लाभे माझी चौथी भक्ती। जीसी ‘एकांती’ म्हणे वेदु॥ ५॥ ऐक एकांत भक्तीची मातु। देवाभक्तांसी होय एकांतु। भक्त रिघे देवाआंतु। देव भक्तांतु सबाह्य॥ ६॥ ऐसें अभेद माझें भजन। या नांव ‘एकांतभक्ति’ जाण। मजवेगळें कांहीं भिन्न। न देखे आन जगामाजीं॥ ७॥ त्यांसी चहूं पुरुषार्थेंसीं मुक्ती। मी स्वयें देताहें श्रीपती। ते दुरोनि दृष्टीं न पाहाती। मा धरिती हातीं हें कदा न घडे॥ ८॥ ते स्वमुखें कांहीं मागती। हें न घडे कदा कल्पांतीं। सांडूनि माझी एकांतभक्ती। कैवल्य न घेती ते निजभक्त॥ ९॥ मोक्षही न घ्यावया कोण भावो। त्याचाही मथित अभिप्रावो। स्वयें सांगे देवाधिदेवो। अगम्य पहा हो श्रुतिशास्त्रां॥ ४१०॥
नैरपेक्ष्यं परं प्राहुर्नि:श्रेयसमनल्पकम्।
तस्मान्निराशिषो भक्तिर्निरपेक्षस्य मे भवेत्॥ ३५॥
जो निरपेक्ष निर्विशेष। तो मज पूज्य महापुरुष। मोक्ष त्याचे दृष्टीं भूस। धन्य नैराश्य तिहीं लोकीं॥ ११॥ ऐक निरपेक्षतेचा उत्कृष्ट। तेथ चारी पुरुषार्थ फळकट। वैकुंठकैलासादि श्रेष्ठ। ते पायवाट निरपेक्षा॥ १२॥ निरपेक्षापाशीं जाण। वोळंगे येती सुरगण। तेथ ऋद्धिसिद्धींचा पाडकोण। वोळंगे अंगण कळिकाळ॥ १३॥ स्वयें महादेव आपण। सर्वस्वें करी निंबलोण। श्रियेसहित मी आपण। अंकित जाण तयाचा॥ १४॥ निरपेक्ष जो माझा भक्त। जो मजसमानसमर्थ। हेंही बोलणें अहाच येथ। तो मीचि निश्चित चिद्रूपें॥ १५॥ मी परमात्मा परमानंद। भक्त मद्भजनें शुद्ध स्वानंद। दोघे अभेदें स्वानंदकंद। सच्चिदानंद निजरूपें॥ १६॥ ऐसे मद्भावें भक्त संपन्न। ते न देखती दोषगुण। तेचिविखींचें निरूपण। स्वयें श्रीकृष्ण सांगत॥ १७॥
न मय्येकान्तभक्तानां गुणदोषोद्भवा गुणा:।
साधूनां समचित्तानां बुद्धे: परमुपेयुषाम्॥ ३६॥
जो न देखे विषयभेदु। ज्यासी समत्वाचा निजबोधु। तोचि बोलिजे ‘शुद्ध साधु’। परमानंदु मद्भजनें॥ १८॥ मी एक परमात्मा सर्व भूतीं। न देखे द्वैताची प्रतीती। ऐशी ज्याची भजनस्थिती। ‘एकांतभक्ती’ त्या नांव॥ १९॥ सदा समभावें एकाग्र। माझ्या भजनीं अतितत्पर। ते प्रकृतीचेपरपार। पावले साचार मद्रूपीं॥ ४२०॥ ऐसे मद्भावें भक्त परिपूर्ण। ते न देखती दोषगुण। उद्धवा म्यां हे निजखूण। पूर्वीं तुज जाण सांगितली॥ २१॥ साकरेची साली फेडणें। कीं कापुराचा कोंडा काढणें। रत्नदीपाची काजळी फेडणें। तेवीं गुणदोष देखणें सृष्टीमाजीं॥ २२॥ ज्याचा घ्यावा अवगुण। मुख्य अवगुणी मी आपण। ज्याचा घ्यावा उत्तम गुण। तोही जाण मद्रूप॥ २३॥ यापरी भक्तजगजेठी। मद्रूपें देखे सकळ सृष्टी। त्यासी गुणदोषांची गोष्टी। न पडे दृष्टीं सर्वथा॥ २४॥ गुणदोष न देखावे जाण। हेंचि साधनीं मुख्य साधन। येचि अर्थींचें निरूपण। आदरें श्रीकृष्ण सांगत॥ २५॥
एवमेतान्मयाऽऽदिष्टाननुतिष्ठन्ति मे पथ:।
क्षेमं विन्दन्ति मत्स्थानं यद्ब्रह्म परमं विदु:॥ ३७॥
इति श्रीभागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायामेकादशस्कन्धे विंशोऽध्याय:॥ २०॥
उद्धवा यापरी जाण। म्यां वेदवादें आपण। उपदेशिले गा जन। भक्तिज्ञानकर्मयोगें॥ २६॥ कर्मेंचि कर्में छेदिजेती। ऐशी ‘कर्मयोगाची’ गती। स्वधर्मकर्में माझी प्राप्ती। ते म्यां तुजप्रती सांगितली॥ २७॥ नित्यानित्यविवंचन। करूनि अनित्यनिर्दळण। हें ‘ज्ञानयोगाचें’ लक्षण। तुज म्यां संपूर्ण सांगितलें॥ २८॥ तैशीच करितां ‘माझी भक्ती’। सकळ फळें पायां लागती। भक्तांसी अनायासें माझी प्राप्ती। हेंही तुजप्रती सांगितलें॥ २९॥ अधिकारभेदेंसीं साङ्ग। त्रिकांड त्रिविध वेदमार्ग। माझे प्राप्तीलागीं चांग। विशद विभाग म्यां केले॥ ४३०॥ म्यां सांगितल्याऐसें जाण। जो वेदमार्गें करी अनुष्ठान। तो माझी प्राप्ती पावे संपूर्ण। सगुण निर्गुण यथारुची॥ ३१॥ सगुणसाक्षात्कार जो येथ। तें पंचरात्रागम-मत। वैकुंठचि मुख्य म्हणत। हें मत निश्चित तयांचें॥ ३२॥ सप्तावरणांबाहेरी मायावरणाभीतरीं। वैकुंठ रचिलें श्रीहरीं। हें बोलिजे निर्धारीं वेदांती॥ ३३॥ तेथ आगमाचें मनोगत। माया ते ‘भगवल्लीला’ म्हणत। स्वलीला वैकुंठ रची भगवंत। क्षयो तेथ असेना॥ ३४॥ जेथ लीलाविग्रही मेघश्याम। स्वयें वसे पुरुषोत्तम। तेथ नाहीं गुण काळ कर्म। मायादिभ्रम रिघेना॥ ३५॥ एवं जन्मक्षयातीत। वैकुंठ अक्षयी निज नित्य। तेथ पावले ते नित्यमुक्त। हें ‘आगम-मत’ उद्धवा॥ ३६॥ मंत्रें आराध्यदैवतें प्रसन्नें। हें वेदार्थियांचें बोलणें। तें म्यां तुजप्रती अनुसंधानें। बोलिलों जाणें उद्धवा॥ ३७॥ भावार्थभक्तींचे लक्षण। ते प्रसन्नतेची खूण। हें पूर्वींकेलें निरूपण। निरुतें जाण उद्धवा॥ ३८॥ ते अर्थीं वेदांती म्हणत। अत्यंतप्रळयींचा जो आघात। तो वैकुंठकैलासादि समस्त। साकारवंत निर्दाळी॥ ३९॥ ते काळींचें उर्वरित। केवळ जें गुणातीत। तें पूर्ण ब्रह्म सदोदित। जाण निश्चित उद्धवा॥ ४४०॥ जेथ काळ ना कर्म। जेथ गुण ना धर्म। जेथ माया पावे उपरम। तें परब्रह्म उद्धवा॥ ४१॥ माझें स्थान वैकुंठ जाण। तेथील प्राप्ति सायुज्य-सगुण’। ‘पूर्ण-सायुज्यता’ संपूर्ण। ब्रह्म परिपूर्ण सदोदित॥ ४२॥ पावावया पूर्ण परब्रह्म। साधकांसी कोणे मार्गीं क्षेम। वेदोक्त मद्भक्ति सुगम। उत्तमोत्तम हा मार्ग॥ ४३॥ आणिके मार्गीं जातां जाण। कामलोभादि उठे विघ्न। कां बुडवी ज्ञानाभिमान। ये नागवण प्रत्यवायाची॥ ४४॥ तैसें नाहीं भक्तिपंथीं। सवें नवविध सांगाती। चढता पाउलीं अतिविश्रांती। भजनयुक्ती मद्भावें॥ ४५॥ येथील मुख्यत्वें साधन। गेलियाही जीवप्राण। कदा न देखावे दोषगुण। तैं ब्रह्म परिपूर्ण पाविजे॥ ४६॥ जेथ नाहीं भयभ्रांती। जेथ नाहीं दिवसराती। जेथ नाहीं जीववशिवस्थिती। तें ब्रह्म पावती मद्भक्त॥ ४७॥ जेथ नाहीं रूपनाम। जेथ नाहीं काळकर्म। जेथ नाहीं मरण जन्म। तें परब्रह्म पावती॥ ४८॥ जेथ नाहीं ध्येयध्यान। जेथ नाहीं ज्ञेयज्ञान। जेथ नाहीं मीतूंपण। तें ब्रह्म परिपूर्ण पावती॥ ४९॥ ज्यासी नाहीं मातापिता। जें नव्हे देवोदेवता। जें बहु ना एकुलता। तें ब्रह्म तत्त्वतां पावती॥ ४५०॥ जेथ नाहीं वर्णाश्रम। जेथ नाहीं क्रियाकर्म। जेथ नाहीं मायाभ्रम। तें परब्रह्म पावती॥ ५१॥ जें गुणागुणीं अतीत। जें लक्ष्यलक्षणारहित। जें स्वानंदें सदोदित। ते ब्रह्म प्राप्त मद्भक्तां॥ ५२॥ पूर्णकृपेचा हेलावा। न संठेचि देवाधिदेवा। तो हा एकादशींचा विसावा। तुज म्यां उद्धवा दीधला॥ ५३॥ जेथ ठावो नाहीं देहभावा। जेथ सामरस्य जीवशिवां। तो हा एकादशींचा विसावा। तुज म्यां उद्धवा दीधला॥ ५४॥ जेथ उगाणा होय अहंभावा। जेथ शून्य पडे मायेच्या नांवा। तो हा एकादशींचा विसावा। तुज म्यां उद्धवा दीधला॥ ५५॥ जेथ देवभक्तांचा कालोवा। एकत्र होय आघवा। तो हा एकादशीं विसावा। तुज म्यां उद्धवा दीधला॥ ५६॥ कष्टीं स्वानंद स्वयें जोडावा। त्या स्वानंदाचा आइता ठेवा। तो हा एकादशीं विसावा। तुज म्यां उद्धवा दीधला॥ ५७॥ करोनि भेदाचा नागोवा। होय अभेदाचा रिगावा। तो हा एकादशींचा विसावा। तुज म्यां उद्धवा दीधला॥ ५८॥ काढोनि भावार्थाचा भावो। सोलीव सोलिवांचा सोलावो। गाळुनी गाळिवांचा भक्तिभावो। उद्धवासी देवो देतसे॥ ५९॥ यापरी श्रीकृष्णनाथ। होऊनियां स्वानंदभरित। विसाव्या अध्यायींची मात। हरिखें सांगत उद्धवा॥ ४६०॥ आतां विसाव्याचा विसावा। स्वानंदसुखाचा हेलावा। तो मी सांगेन एकविसावा। ऐक उद्धवा सादर॥ ६१॥ वेदीं शुद्धाशुद्धलक्षण। हें पुढिले अध्यायीं निरूपण। एका विनवी जनार्दन। श्रोतां अवधान मज द्यावें॥ ६२॥
इति श्रीभागवते महापुराणे एकादशस्कन्धे भगवदुद्धवसंवादे एकाकारटीकायां वेदत्रयीविभागयोगो नाम विंशोऽध्याय:॥ २०॥ श्रीकृष्णार्पणमस्तु॥ श्लोक॥ ३७॥ ओव्या॥ ४६२॥
॥ श्री ॐ तत्सत्-श्रीकृष्ण प्रसन्न॥
अध्याय एकविसावा
श्रीगणेशाय नम:॥ श्रीकृष्णाय नम:॥ ॐ नमो सद्गुरु वैकुंठनाथा। स्वानंदवैकुंठीं सदा वसता। तुझें ऐश्वर्य स्वभावतां। न कळे अनंता अव्यया॥ १॥ तुझ्या निजबोधाचा गरुड। कर जोडूनि उभा दृढ। ज्याच्या पाखांचा झडाड। उन्मळी सुदृढ भववृक्षा॥ २॥ तुझें स्वानुभवैकचक्र। लखलखित तेजाकार। द्वैतदळणीं सतेजधार। अतिदुर्धर महामारी॥ ३॥ कैसा पांचजन्य अगाध। नि:शब्दीं उठवी महाशब्द। वेदानुवादें गर्जे शुद्ध। तोचि प्रसिद्ध शंख तुझा॥ ४॥ झळफळित सर्वदा। निजतेजें मिरवे सदा। करी मानाभिमानांचा चेंदा। ते तुझी गदा गंभीर॥ ५॥ अतिमनोहर केवळ। देखतां उपजती सुखकल्लोळ। परमानंदें आमोद बहळ। तें लीलाकमळ झेलिसी॥ ६॥ जीव शिव समसमानी। जय विजय नांवें देउनी। तेचि द्वारपाळ दोनी। आज्ञापूनी स्थापिले॥ ७॥ तुझी निजशक्ति साजिरी। रमारूपें अतिसुंदरी। अखंड चरणसेवा करी। अत्यादरीं सादर॥ ८॥ तुझे लोकींचे निवासी जाण। अवघे तुजचिसमान। तेथ नाहीं मानापमान। देहाभिमान असेना॥ ९॥ तेथ काळाचा रिगमु नाहीं। कर्माचें न चले कांहीं। जन्ममरणाचें भय नाहीं। ऐशिया ठायीं तूं स्वामी॥ १०॥ जेथ कामक्रोधांचा घात। क्षुधेतृषेचा प्रांत। निजानंदें नित्यतृप्त। निजभक्त तुझेनि॥ ११॥ तुझेनि कृपाकटाक्षें। अलक्ष न लक्षितां लक्षे। तुझे चरणसेवापक्षें। नित्य निरपेक्षें नांदविसी॥ १२॥ साम्यतेचें सिंहासन। ऐक्यतेची गादी जाण। त्यावरी तुझें सहजासन। परिपूर्ण स्वभावें॥ १३॥ तन्मयतेचें निजच्छत्र। संतोषाचें आतपत्र। ज्ञानविज्ञानयुग्म चामर। सहजें निरंतर ढळताती॥ १४॥ तेथ चारी वेद तुझे भाट। कीर्ति वर्णिती उद्भट। अठरा मागध अतिश्रेष्ठ। वर्णिती चोखट वंशावळी॥ १५॥ तेथ साही जणां वेवाद। नानाकुसरीं बोलती शब्द। युक्तिप्रयुक्तीं देती बाध। दाविती विनोद जाणीव॥ १६॥ एक भावार्थी तुजलागुनी। स्तुति करिती न बोलुनी। तेणें स्तवनें संतोषोनी। निजासनीं बैसविसी॥ १७॥ ऐसा सद्गुरु महाविष्णु। जो चिद्रूपें सम सहिष्णु। जो भ्राजमानें भ्राजिष्णु। जनीं जनार्दनु तो एक॥ १८॥ जनीं जनार्दनुचि एकला। तेथ एकपणें एका मीनला। तेणें एकपणाचाही ग्रास केला। ऐसा झाला महाबोध॥ १९॥ या महाबोधाचें बोधांजन। हातेंवीण लेववी जनार्दन। तेणें सर्वांगीं निघाले नयन। देखणेंपणसर्वत्र॥ २०॥ परी सर्वत्र देखतां जन। देखणेनि दिसे जनार्दन। ऐंशी पूर्ण कृपा करून। एकपण सांडविलें॥ २१॥ ऐसा तुष्टोनि भगवंत। माझेनि हातें श्रीभागवत। अर्थविलें जी यथार्थ। शेखीं प्राकृत देशभाषा॥ २२॥ श्रीभागवतीं संस्कृत। उपाय असतांही बहुत। काय नेणों आवडलें येथ। करवी प्राकृत प्रबोधें॥ २३॥ म्यां करणें कां न करणें। हेंही हिरूनि नेलें जनार्दनें। आतां ग्रंथार्थनिरूपणें। माझें बोलणें तो बोले॥ २४॥ तेणें बोलोनि निजगौरवा। वेदविभागसद्भावा। तो एकादशीं विसावा। उद्धवासी बरवा निरूपिला॥ २५॥ तेथ भक्त आणि सज्ञान। त्यासी पावली वेदार्थखूण। कर्मठीं देखतां दोषगुण। संशयीं जाण ते पडिले॥ २६॥ त्या संशयाचें निरसन। करावया श्रीकृष्ण। एकविसावा निरूपण। गुणदोषलक्षण स्वयें सांगे॥ २७॥ त्या गुणदोषांचा विभाग। सांगोनिया विषयत्याग। करावया श्रीरंग। निरूपण साङ्ग सांगत॥ २८॥
श्रीभगवानुवाच
य एतान् मत्पथो हित्वा भक्तिज्ञानक्रियात्मकान्।
क्षुद्रान् कामांश्चलै: प्राणैर्जुषन्त: संसरन्ति ते॥ १॥
म्यां सांगितले जे विभाग। भक्तिज्ञानक्रियायोग। हा सांडूनि शुद्ध वेदमार्ग। सकाम भोग जे वांछिती॥ २९॥ क्षणभंगुर देहाचा योग। हें विसरोनियां चांग। सकाम कर्माची लगबग। भवस्वर्गभोग भोगावया॥ ३०॥ चळतेनि प्राणसंगें। देहातें काळ ग्रासूं लागे। येथ नानाकामसंभोगें। मूर्ख तद्योगें मानिती सुख॥ ३१॥ भोगितां कामभोगसोहळे। नेणे आयुष्य ग्रासिलें काळें। मग जन्ममरणमाळें। दु:ख उमाळे भोगिती॥ ३२॥ काम्य आणि नित्यकर्म। आचरतां दिसे सम। तरी फळीं कां पां विषम। सुगम दुर्गम परिपाकु॥ ३३॥ तें कर्मवैचित्र्यविंदान। संकल्पास्तव घडे जाण। तेचि अर्थींचें निरूपण। जाणोनि श्रीकृष्ण सांगत॥ ३४॥
स्वे स्वेऽधिकारे या निष्ठा स गुण: परिकीर्तित:।
विपर्ययस्तु दोष: स्यादुभयोरेष निश्चय:॥ २॥
कर्म विचारितां अवघें एक। परी अधिकार भिन्नाभिन्न देख। ते मी सांगेन आवश्यक। जेणें सुखदु:ख भोगणें घडे॥ ३५॥ मुखाचा व्यापार भोजन। तो नाकें करूं जातां जाण। सुख बुडवूनि दारुण। दु:ख आपण स्वयें भोगी॥ ३६॥ कां पायांचें जें चालणें। पडे जैं डोईं करणें। तैं मार्ग न कंठे तेणें। परी कष्टणें अनिवार॥ ३७॥ तेवीं जें कर्म स्वाधिकारें। सुखातें दे अत्यादरें। तेचि कर्म अनधिकारें। दु:खें दुर्धरें भोगवी॥ ३८॥ गजाचें आभरण। गाढवासी नव्हे भूषण। परी भारें आणी मरण। तेवीं कर्म जाण अनधिकारीं॥ ३९॥ मेघ वर्षे निर्मळ जळ। परी जैसें बीज तैसें फळ। एका भांगी पिके सबळ। एका प्रबळ साळी केळें॥ ४०॥ पाहें पां जैसें दुग्ध चोख। ज्वरितामुखीं कडू विख। तेंचि निरुजां गोड देख। पुष्टिदायक सेवनीं॥ ४१॥ तेवीं सकामीं कर्म घडे। ते बाधक होय गाढें। तेंचि कर्म निष्कामाकडे। मोक्षसुरवाडें सुखावी॥ ४२॥ स्वाधिकारें स्वकर्माचरण। तोचि येथें मुख्यत्वें गुण। अनधिकारीं कर्म जाण। तोचि अवगुण महादोष॥ ४३॥ या रीतीं गा कर्माचरण। उपजवी दोष आणि गुण। हेंचि गुणदोषलक्षण। शास्त्रज्ञ जाण बोलती॥ ४४॥ तेंचि गुणदोषलक्षण। शुद्धॺशुद्धींचें कारण। तेचि अर्थींचें विवंचन। देवो आपण सांगत॥ ४५॥
शुद्धॺशुद्धी विधीयेते समानेष्वपि वस्तुषु।
द्रव्यस्य विचिकित्सार्थं गुणदोषौ शुभाशुभौ॥ ३॥
पंचभूतें समान जाण। वस्तु सर्वत्र समसमान। तेथ गुणदोष अप्रमाण परी। केलें प्रमाण या हेतू॥ ४६॥ न प्रेरितां श्रुतिस्मृती। आविद्यक विषयप्रवृत्ती। अनिवार सकळ भूतीं। सहजस्थितिस्वभावें॥ ४७॥ ऐसी स्वाभाविक विषयस्थिती। तिची करावया उपरती। नाना गुणदोष बोले श्रुती। विषयनिवृत्तीलागुनी॥ ४८॥ हें एक शुद्ध एक अशुद्ध। पैल शुभ हें विरुद्ध। मीचि बोलिलों वेदानुवाद। विषयबाध छेदावया॥ ४९॥ विषयांची जे निवृत्ती। तिची वेदरूपें म्यां केली स्तुति। निंदिली विषयप्रवृत्ती। चिळसी चित्तीं उपजावया॥ ५०॥ चालतां कर्मप्रवृत्ती। हो विषयांची निवृत्ती। ऐशी वेदद्वारें केली युक्ती। ऐक तुजप्रती सांगेन॥ ५१॥
धर्मार्थं व्यवहारार्थं यात्रार्थमिति चानघ।
दर्शितोऽयं मयाऽऽचारो धर्ममुद्वहतां धुरम्॥ ४॥
उद्धवा तूं निष्पाप त्रिशुद्धी। यालागीं तुझी शुद्ध बुद्धी। धर्मादि व्यवहारसिद्धी। ऐक तो विधि सांगेन॥ ५२॥ करितांही धर्माचरण। प्रवृत्तिधर्म तो अप्रमाण। निवृत्तिधर्म तो अतिशुद्ध जाण। हे दोषगुण स्वधर्मीं॥ ५३॥ जो व्यवहार विषयासक्तीं। ते अशुद्ध व्यवहारस्थिती। जे परोपकारप्रवृत्ती। तो व्यवहार वंदिती सुरनर॥ ५४॥ अदृष्टदाता ईश्वर। हें विसरोनि उत्तम नर। द्रव्यलोभें नीचांचे दारोदार। हिंडणें अपवित्र ते यात्रा॥ ५५॥ आळस सांडोनि आपण। करूं जातां श्रवण कीर्तन। कां तीर्थयात्रा साधुदर्शन। पूजार्थ गमन देवालयीं॥ ५६॥ कां अनाथप्रेतसंस्कार। करितां पुण्य जोडे अपार। पदीं कोटियज्ञफळसंभार। जेणें साचार उपजती॥ ५७॥ जेणें पाविजे परपार। तिये नांव यात्रा पवित्र। हा यात्रार्थ संचार। गुणदोषविचार वेदोक्त॥ ५८॥ राजा निजपादुका हटेंसीं। वाहवी ब्राह्मणाचे शिसीं। तो दोष न पवे द्विजासी। स्वयें सदोषी होय राजा॥ ५९॥ जेवीं आपत्काळबळें जाण। पडतां लंघनीं लंघन। तैं घेऊनि नीचाचें धान्य। वांचवितां प्राण दोष नाहीं॥ ६०॥ तेंचि नीचाचें दान। अनापदीं घेतां जाण। जनीं महादोष दारुण। हेंही जाण वेदोक्त॥ ६१॥ जे कर्मधर्मप्रवर्तक शुद्ध। मनुपराशरादि प्रसिद्ध। तिंहीं गुणदोष विविध। शुद्धाशुद्ध बोलिले॥ ६२॥ तेंचि शुद्धाशुद्धनिरूपण। तीं श्लोकीं नारायण। स्वयें सांगताहे आपण। गुणदोषलक्षणविभाग॥ ६३॥
भूम्यम्ब्वग्न्यनिलाकाशा भूतानां पञ्च धातव:।
आब्रह्मस्थावरादीनां शारीरा आत्मसंयुता:॥ ५॥
वेदेन नामरूपाणि विषमाणि समेष्वपि।
धातुषूद्धव कल्प्यन्ते एतेषां स्वार्थसिद्धये॥ ६॥
पृथ्वी आप तेज वायु गगन। ब्रह्मादि स्थावरांत जाण। भूतीं पंचभूतें समान। वस्तुही आपण सम सर्वीं॥ ६४॥ नाहीं नाम रूप गुण कर्म। ऐसें जें केवळ सम। तेथ माझेनि वेदें विषम। केलें रूप नाम हितार्थ॥ ६५॥ तळीं पृथ्वी वरी गगन। पाहतां दोनीही समान। तेथ दश दिशा कल्पिल्या जाण। देशांतरगमनसिद्धॺर्थ॥ ६६॥ तेवीं नाम रूप वर्णाश्रम। समाच्या ठायीं जें विषम। हा माझेनि वेदें केला नेम। स्वधर्मकर्मसिद्धॺर्थ॥ ६७॥ येणेंचि द्वारें सुलक्षण। धर्मार्थकाममोक्षसाधन। पुरुषांच्या हितालागीं जाण। म्यां केलें नियमन वेदाज्ञा॥ ६८॥ रूप नाम आश्रम वर्ण। वेदु नेमिता ना आपण। तैं व्यवहारु न घडता जाण। मोक्षसाधन तैं कैंचें॥ ६९॥ एवं वेदें चालवूनि व्यवहारु। तेथेंचि परमार्थविचारु। दाविला असे चमत्कारु। सभाग्य नरु तोचि जाणे॥ ७०॥ अत्यंत करितां कर्मादरु। तेणें कर्मठचि होय नरु। तेथ परमार्थ नाहीं साचारु। विधिनिषेधीं थोरु पीडिजे॥ ७१॥ केवळ स्वधर्मकर्म सांडितां। अंगीं आदळे पाषंडता। तेणेंही मोक्ष न ये हाता। निजस्वार्था नागवले॥ ७२॥ यालागीं स्वधर्म आचरतां। निजमोक्ष लाभे आइता। हे वेदार्थाची योग्यता। जाणे तो ज्ञाता सज्ञान॥ ७३॥ हे वेदार्थनिजयोग्यता। सहसा न ये कवणाचे हाता। याचिलागीं गा परमार्था। गुरु तत्त्वतां करावा॥ ७४॥ त्या सद्गुरूची पूर्ण कृपा होय। तरीच आतुडे वेदगुह्य। गुरुकृपेवीण जे उपाय। ते अपाय साधकां॥ ७५॥ यालागीं माझा वेद जगद्गुरु। दावी आपातता व्यवहारु। नेमी स्वधर्मकर्मादरु। जनाचा उद्धारु करावया॥ ७६॥ ऐसा माझा वेदु हितकारी। दावूनि गुणदोष नानापरी। जन काढी विषयाबाहेरीं। वेद उपकारी जगाचा॥ ७७॥
देशकालादिभावानां वस्तूनां मम सत्तम।
गुणदोषौ विधीयेते नियमार्थं हि कर्मणाम्॥ ७॥
भक्तांमाजीं भक्तोत्तम। साधुलक्षणीं साधुसम। यालागीं उद्धवासी ‘सत्तम’। म्हणे पुरुषोत्तम अतिप्रीतीं॥ ७८॥ उद्धवा येथ भलता नर। भलता करील कर्मादर। यालागीं वर्णाश्रमविचार। नेमिला साचार वेदांनीं॥ ७९॥ जेथ करूं नये कर्मतंत्र। ऐसा देश जो अपवित्र। आणि काळादिद्रव्य विचित्र। पवित्रापवित्र सांगेन॥ ८०॥
अकृष्णसारो देशानामब्रह्मण्योऽशुचिर्भवेत्।
कृष्णसारोऽप्यसौवीरकीकटासंस्कृतेरिणम्॥ ८॥
कोणे एके पृथ्वीतळीं। मेघ न वर्षतां जळीं। पेरिलीं धान्यें सदा निळीं। वसुधा-जिव्हाळी ते म्हणती॥ ८१॥ तेंचि पाहतां पृथ्वीवरी। एके भागीं गा उखरी। मेघ वर्षतां शरधारीं। अंकुरेना डिरी उखरत्वें॥ ८२॥ तेवीं देशाची शुद्धॺशुद्धी। तुज मी सांगेन यथाविधी। जेथ कर्मीं नोहे कार्यसिद्धी। तेथ कर्म त्रिशुद्धी न करावें॥ ८३॥ कृष्णमृग जेथ नाहीं। ते जाण पां अपवित्र भुयी। कर्मादरु तिये ठायीं। न करावा पाहीं सर्वथा॥ ८४॥ जेथ ब्राह्मणचि नाहीं। तो देश अपवित्र पाहीं। ब्राह्मण अकर्मीं जे ठायीं। भूमी तेही अपवित्र॥ ८५॥ जेथ ब्राह्मणाची अभक्ती। शेखीं हेळूनि निंदिती। तो देश गा कर्माप्रती। जाण निश्चितीं अपवित्र॥ ८६॥ जे देशीं कृष्णमृग असती। परी नाहीं भगवद्भक्ती। तो देश कर्माप्रती। जाण निश्चितीं अपवित्र॥ ८७॥ भक्तिहीन देश प्रसिद्ध। कीकट कलिंग मागध। तेथ स्वधर्म नव्हती शुद्ध। जाण अशुद्ध ते देश॥ ८८॥ नाहीं उपलेप संमार्जन। ते स्वगृहीं भूमी अशुद्ध जाण। कां जेथ वेदबाह्य असज्जन। तेंही स्थान अपवित्र॥ ८९॥ जे भूमी केवळ उखर। ते जाण सदा अपवित्र। आतां काळाचें काळतंत्र। पवित्रापवित्र सांगेन॥ ९०॥
कर्मण्यो गुणवान्कालो द्रव्यत: स्वत एव वा।
यतो निवर्तते कर्म स दोषोऽकर्मक: स्मृत:॥ ९॥
देश काळ द्रव्य पात्र। हे सामग्री होय स्वतंत्र। तोचि काळ अतिपवित्र। वेदशास्त्रसंमत॥ ९१॥ ग्रहणकपिलाषष्ठॺादिद्वारा। तो काळ परम पवित्र खरा। कां संतसज्जन आलिया घरा। काळाचा उभारा अतिपवित्र॥ ९२॥ हो कां संपत्ति आलिया हाता। कां धर्मीं उल्हास जेव्हां चित्ता। तो ‘पुण्यकाळ’ तत्त्वतां। वेदशास्त्रार्था अनुकूल॥ ९३॥ पुरुषासी पर्वकाळ। जन्मांत जोडे एकवेळ। मातापित्यांचा अंतकाळ। ते धर्माची वेळ अतिपवित्र॥ ९४॥ हा पर्वकाळ मागुता। पुरुषासी नातुडे सर्वथा। तेथ श्रद्धेनें धर्म करितां। पवित्रता अक्षय॥ ९५॥ स्वभावें काळाची पवित्रता। तुज मी सांगेन आतां। जो उपकारी सर्वथा। निजस्वार्था साधक॥ ९६॥ ब्राह्म मुहूर्त तत्त्वतां। पवित्र जाण स्वभावतां। जो साधकांच्या निजस्वार्था। होय वाढवितां अनुदिनीं॥ ९७॥ काळाची अकर्मकता। ऐक सांगेन मी आतां। कर्म करूं नये स्वभावतां। निषिद्धता महादोषु॥ ९८॥ जेथ जळस्थळादि सर्वथा। विहित द्रव्य न ये हाता। तो काळ अकर्मकता। जाण तत्त्वतां निश्चित॥ ९९॥ जो काळ सूतकें व्यापिला। कां राष्ट्र-उपप्लवें जो आला। जे काळीं देह परतंत्र झाला। तो काळ बोलिला अकर्मक॥ १००॥ जो काळ दुर्भिक्षासी आला। जो कां ज्वरादिदोषीं दूषिला। जो काळचोराकुलित झाला। तो काळ बोलिला अकर्मक॥ १॥ जे काळीं क्रोध संचरला। जेथ तमोगुण क्षोभला। निद्राआलस्यें व्यापिला। तो काळ बोलिला अकर्मक॥ २॥ अकस्मात सुखसंपदा। कां अभिनव वार्ता एकदा। कां लंघिजे भल्याची मर्यादा। तो काळ सर्वदा अकर्मक॥ ३॥ कां मार्गीं विषमता। पंथ क्रमिजे चालतां। तेथ पडे दुर्धर्षता। तो काळ तत्त्वतां अकर्मक॥ ४॥ जेकाळीं द्रव्यलोभ दारुण। जे काळीं चिंता गहन। केव्हां विकल्पें भरे मन। तो काळ जाण अकर्मक॥ ५॥ ऐशी काळाची अकर्मकता। तुज म्यां सांगितली तत्त्वतां। आतां द्रव्याची शुद्धाशुद्धता। ऐक सर्वथा सांगेन॥ ६॥
द्रव्यस्य शुद्धॺशुद्धी च द्रव्येण वचनेन च।
संस्कारेणाथ कालेन महत्त्वाल्पतयाथवा॥ १०॥
पुरुषें गोमूत्र सेवितां। तत्काळ पावे पवित्रता। तेंचि ताम्रपात्रें घेतां। ये अपवित्रता तत्काळ॥ ७॥ पुरुषें जळ प्रोक्षितां। पुष्पांसी ये पवित्रता। तेंचि पुरुषें अवघ्राणितां। अपवित्रता पुष्पासी॥ ८॥ अग्नीची सेवा करितां। द्विजासी परम पवित्रता। तोचि द्विज अग्निहोत्रें जाळितां। ये अपवित्रता अग्नीसी॥ ९॥ दर्भीं पिंड ठेवितां पवित्र। पिंडस्पर्शें दर्भ अपवित्र। ऐशी शुद्धॺशुद्धी विचित्र। बोले धर्मशास्त्र श्रुत्यर्थें॥ ११०॥ जे वस्तु संशयापन्न। त्याच्या शुद्धीसी ब्राह्मणवचन। ज्याचें वचन प्रमाण। हरिहर जाण मानिती॥ ११॥ घृतसंस्कारें शुद्ध अन्न। होमसंस्कारें नवधान्य। अग्निसंस्कारें लवण। पवित्र जाण शास्त्रार्थें॥ १२॥ राकारापुढें मकार। मांडूनि करितां उच्चार। जिणोनि पापांचा संभार। होय तो नर शुद्धात्मा॥ १३॥ त्याचि मकारापुढें द्यकार। ठेवूनि करितां उच्चार। अंगीं आदळे पाप घोर। तेणें होय नर अतिबद्ध॥ १४॥ रजस्वला शुद्ध चतुर्थाहनीं। मेघोदक शुद्ध तिसरे दिनीं। वृद्धिसूतक दहावे दिनीं। काळ शुद्धपणीं या हेतू॥ १५॥ पूर्व दिवशींचें जें अन्न। तें काळेंचि पावे गा दूषण। ज्यासी आलें शिळेपण। तें अन्न जाण अशुद्ध॥ १६॥ तैसें नव्हे घृतपाचित। तें बहुत काळें तरी पुनीत। जें विटोनि विकारी होत। तें अपुनीत काळेंचि॥ १७॥ जें सांचवणीं अल्प जळ। त्यासी स्पर्शल्या चांडाळ। तें अपवित्र गा सकळ। नये अळुमाळ स्पर्श करूं॥ १८॥ तेंचि निर्झर कां अक्षोभ जळ। तेथ स्पर्शल्याही चांडाळ। त्यासी लागेना तो विटाळ। तें नित्य निर्मळ पवित्र॥ १९॥ अल्प केलिया स्वयंपाक। त्यासी जैं आतळे श्वान काक। तैं तें सांडावें नि:शेख। अपवित्र देख तें अन्न॥ १२०॥ तोचि सहस्रभोजनाचा पाक। त्यासी आतळल्या श्वान कां काक। सांडावें जेथ लागलें मुख। येर अन्न निर्दोख भोजनी॥ २१॥
शक्त्याशक्त्याथवा बुद्धॺा समृद्धॺा च यदात्मने।
अघं कुर्वन्ति हि यथा देशावस्थानुसारत:॥ ११॥
झालिया चंद्रसूर्यग्रहण। शक्तें स्नान न करितां दूषण। बाळक वृद्ध आतुर जन। न करितां स्नान दोष नाहीं॥ २२॥ पुत्र जन्मलिया देख। स्वगोत्रज जे सकळिक। त्यांसी जाण आवश्यक। बाधी सूतक दहा दिवस॥ २३॥ तेंचि स्थळांतरीं पुत्रश्रवण सूतकाअंतीं झाल्या जाण। त्या सूतकाचें बंधन। न बाधी जाण सर्वथा॥ २४॥ पूर्वदिनीं गोत्रज मरे। तें स्वगोत्रीं सूतक भरे। येरे दिवशींदुसरा जैं मरे। तैं सूतकें सूतक उतरे दोहींचेंही॥ २५॥ जेणें घेतलें होय विख। त्यासी सर्पु लाविलिया देख। तेणें विखें उतरे विख। तेवीं सूतकें सूतक निवारे॥ २६॥ जें बुद्धिपूर्वक केलें आपण। तें अवश्य भोगावें पापपुण्य। जें बुद्धीसी नाहीं विद्यमान। तें अहेतुकपणें बाधीना॥ २७॥ आपुलें जें अंत:करण। त्यासी पवित्र करी निजज्ञान। हे ‘बुद्धीची शुद्धि’ जाण। विवेकसंपन्न वैराग्यें॥ २८॥ जो धनवंत अतिसंपन्न। त्यासी जुनें वस्त्र अपावन। शिविलें दंडिलें तेंही जाण। नव्हे पावन समर्था॥ २९॥ तेंचि दुर्बळाप्रति जाण। अतिशयें परम पावन। हे वेदवाद अतिगहन। स्मृतिकारीं जाण प्रकाशिले॥ १३०॥ समर्थासी असाक्षी भोजन। तें जाणावें अशुद्धान्न। दुर्बळासी एकल्या अशन। परम पावन श्रुत्यर्थें॥ ३१॥ स्वयें न करितां पंचयज्ञ। भोजन तें पापभक्षण। सकळ सुकृतासी नागवण। जैं पराङ्मुखपण अतिथीसी॥ ३२॥ स्वग्रामीं सर्वही स्वाचार। ग्रामांतरीं अर्ध आचार। पुरीं पट्टणीं पादमात्र। मार्गीं कर्मादर संगानुसारें॥ ३३॥ विचारोनि देशावस्था। हे धर्ममर्यादा तत्त्वतां। याहूनि अन्यथा करितां। दोष सर्वथा कर्त्यासी॥ ३४॥ पाटव्य असतां स्वदेहासी। कर्म न करी तो महादोषी। रोगें व्यापिल्या शरीरासी। कर्मकर्त्यासी अतिदोष॥ ३५॥ पूर्वीं द्रव्याद्रव्यशुद्धी। सांगितली यथाविधी। तेचि मागुतेनि प्रतिपादी। धर्मशास्त्रसिद्धी वेदोक्त॥ ३६॥
धान्यदार्वस्थितन्तूनां रसतैजसचर्मणाम्।
कालवाय्वग्निमृत्तोयै: पार्थिवानां युतायुतै:॥ १२॥
शूद्रप्रतिग्रहाचें धान्य। एकरात्रीं शुद्ध जाण। स्रुक्स्रुवादिकाष्ठभाजन। जलप्रक्षालनें शुद्धत्व॥ ३७॥ व्याघ्रनख गजदंत। अपवित्र जंव स्नेहयुक्त। जेव्हां होती स्नेहातीत। अतिपुनीत ते काळीं॥ ३८॥ पट्टतंतु स्वयें पुनीतु। वायूनें शुद्ध ऊर्णातंतु। वस्त्रतंतु जळाआंतु। होय पुनीतु प्रक्षाळिल्या॥ ३९॥ गोक्षीर पवित्र कांस्यमृत्पात्रीं। तेंचि अपवित्र ताम्रपात्रीं। ताम्र पवित्र आम्लेंकरीं। आम्ल लवणांतरीं पवित्र॥ १४०॥ घृत पवित्र अग्निसंस्कारीं। अग्नि पवित्र ब्राह्मणमंत्रीं। ब्राह्मण पवित्र स्वाचारीं। पवित्रता आचारीं वेदविधीं॥ ४१॥ वेद पवित्र गुरुमुखें। गुरु पवित्र निजात्मसुखें। आत्मा पवित्र गुरुचरणोदकें। पवित्र उदकें द्विजचरणीं॥ ४२॥ पृथ्वी पवित्र जळसंस्कारीं। जळ पवित्र पृथ्वीवरी। चर्म पवित्र तैलेंकरीं। तैल चर्मपात्रीं पवित्र॥ ४३॥ व्याघ्रादि जें मृगाजिन। इयें स्वभावें पवित्र जाण। अग्निसंस्कारें सुवर्ण। पवित्रपण स्वभावें॥ ४४॥ एवं इत्यादि परस्परीं। शुचित्व बोलिलें स्मृतिशास्त्रीं। आतां मळलिप्त झालियावरी। त्याचेंही अवधारीं शुचित्व॥ ४५॥
अमेध्यलिप्तं यद्येन गन्धं लेपं व्यपोहति।
भजते प्रकृतिं तस्य तच्छौचं तावदिष्यते॥ १३॥
पात्र पीठ कां आसन। अमेध्यलिप्त झाल्या जाण। त्या गंधाचें नि:शेष क्षालन। तेणें पवित्रपण तयासी॥ ४६॥ नाभीखालता ज्याच्या शरीरा। अमेध्यलेप लागल्या खरा। ते ठायींचा गंधु जायपुरा। ऐसें धुतल्या त्या नरा शुचित्व लाभे॥ ४७॥ नाभीवरतें अमेध्यलेपन। अवचटें झालिया जाण। तैं करावें मृत्तिकास्नान। तेणें पावन तो पुरुष॥ ४८॥ मळ धुतल्या तत्काळ जाती। परी त्या गंधाची होय निवृत्ती। प्रकृति पावे जैं निजस्थिती। ‘मळनिष्कृति’ त्या नांव॥ ४९॥ बाह्य पदार्थ निवृत्तिनिष्ठें। वेद बोलिला या खटपटें। आतां कर्त्याचें शुचित्व प्रकटे। ते ऐक गोमटे उपाय॥ १५०॥
स्नानदानतपोऽवस्थावीर्यसंस्कारकर्मभि:।
मत्स्मृत्या चात्मन: शौचं शुद्ध: कर्माचरेद्द्विज:॥ १४॥
गर्भाधानादि अन्नप्राशन। ते बाल्यावस्था संपूर्ण। चौल तें कुमारावस्था जाण। ब्राह्मणपण उपनयनें॥ ५१॥ कर्मभूमिकेलागीं स्नान। द्रव्यशुद्धीलागीं कीजे दान। वैराग्यालागीं तप जाण। कर्माचरण जडत्वत्यागा॥ ५२॥ माझिया भजनीं दृढबुद्धि। त्या नांव जाण ‘वीर्यशुद्धि’। माझेनि स्मरणें ‘चित्तशुद्धि’। जाण त्रिशुद्धि उद्धवा॥ ५३॥ ऐसऐसिया विधीं। ब्राह्मण जे कां सुबुद्धी। सबाह्य पावावया शुद्धी। वेद उपपादी स्वकर्में॥ ५४॥
मन्त्रस्य च परिज्ञानं कर्मशुद्धिर्मदर्पणम्।
धर्म: संपद्यते षड्भिरधर्मस्तु विपर्यय:॥ १५॥
मंत्रशुद्धि मंत्रार्थ ज्ञानें। कर्मशुद्धि ब्रह्मार्पणें। इयें कर्त्याचे शुद्धीकारणें। साही लक्षणें वेदु बोले॥ ५५॥ देश-काळ-द्रव्यसंपन्नता। मंत्र-कर्म-निरुज कर्ता। या साहींच्या शुद्धावस्था। स्वधर्मता फलोन्मुख॥ ५६॥ जें द्रव्य पावे दीनांचे आर्ता। कां माझिया निजभक्तां। या नांव ‘द्रव्यपवित्रता’। जाण तत्त्वतां निश्चित॥ ५७॥ धर्मशास्त्रार्थें शुद्ध धन। कष्टें मिळवूनियां आपण। धनलोभीं ठेविल्या प्राण। अवघेंचि जाण अशुद्ध॥ ५८॥ या नांव ‘द्रव्यशुद्धता’। ऐक मंत्राची पवित्रता। जेणें मंत्रें पाविजे मंत्रार्था। शुद्ध सर्वथा तो मंत्र॥ ५९॥ जेथ केलिया मंत्रग्रहण। अंगीं चढता वाढे अभिमान। कां जेथ जारण-मारण-उच्चाटण। ते मंत्र जाण अपवित्र॥ १६०॥ या नांव ‘मंत्रशुद्धि’ जाण। ऐक कर्माचें लक्षण। जेणें कर्में तुटे कर्मबंधन। तें कर्माचरण अतिशुद्ध॥ ६१॥ स्वयें करितां कर्माचरण। जेणें खवळे देहाभिमान। कर्त्यासी लागे दृढ बंधन। तें कर्म जाण अपवित्र॥ ६२॥ जेणें कर्में होय कर्माचा निरास। तें शुद्ध कर्म सावकाश। जेथ समबुद्धि सदा अविनाश। तो ‘पुण्यदेश’ उद्धवा॥ ६३॥ जरी सुक्षेत्रीं केला वास। आणि पराचे देखे गुणदोष। तो देश जाणावा तामस। अचुक नाश कर्त्यासी॥ ६४॥ अन्य क्षेत्रीं देखिल्या दोष। त्याचा सुक्षेत्रीं होय नाश। सुक्षेत्रीं देखिल्या दोष। तो न सोडी जीवास कल्पांतीं॥ ६५॥ जेथ उपजे साम्यशीळ। तो देश जाणावा निर्मळ। चित्त सुप्रसन्न जे वेळ। तो ‘पुण्यकाळ’ साधकां॥ ६६॥ स्वभावें शुद्ध ब्राह्ममुहूर्त। तेथही क्षोभल्या चित्त। तोही काळ अपुनीत। जाण निश्चित वेदार्थ॥ ६७॥ येथ जो कां कर्मकर्ता। त्याची गेलिया कर्मअहंता। पुढें कर्म चाले स्वभावतां। हे ‘पवित्रता कर्त्याची’॥ ६८॥ येथ जो म्हणे ‘अहं कर्ता’। तो पावे अतिबद्धता। हे कर्त्याची अपवित्रता। देहअहंता अभिमानें॥ ६९॥ धर्माधर्माचे साही प्रकार। हें वेदार्थाचें तत्त्वसार। येही धर्मीं मुक्त होय नर। अधर्मीं अपवित्र अतिबद्ध॥ १७०॥ गुणदोषांचें लक्षण। सांगतां अतिगहन। येथ गुंतले सज्ञान। अतिविचक्षण पंडित॥ ७१॥
क्वचिद्गुणोऽपि दोष: स्याद्दोषोऽपि विधिना गुण:।
गुणदोषार्थनियमस्तद्भिदामेव बाधते॥ १६॥
ज्याचा मानिजे उत्तम गुण। तोचि दोष होय परतोन। एवं कर्मचि कर्मासी जाण। दोष दारुण उपजवी॥ ७२॥ कर्मीं मुख्यत्वें गा आचमन। हें कर्मशुद्धीचें निजकारण। तेंचि दक्षिणाभिमुखेंकेल्या जाण। दोष दारुण उपजवी॥ ७३॥ कानींची जेणें जाय तिडिक। तेंचि मुखीं घालितां देख। होय अत्यंत बाधक। प्राणांतिक अतिबाधा॥ ७४॥ आचमनीं माषमात्र जीवन। घेतल्या होईजे पावन। तेंचि अधिक घेतां जाण। सुरापानसम दोष॥ ७५॥ फणस खातां लागे गोड। तें जैं अधिक खाय तोंड। तैं शूळ उठे प्रचंड। फुटे ब्रह्मांड अतिव्यथा॥ ७६॥ सूर्यपूजनीं पुण्य घडे। तेथ जैं बेलपत्र चढे। तैं पुण्य राहे मागिलीकडे। दोष रोकडे पूजकां॥ ७७॥ ऐसा कर्मीं कर्मविन्यास। गुण तोचि करी दोष। कोठें दोषांचाही विलास। पुण्य बहुवस उपजवी॥ ७८॥ चोराकुलितमार्गीं जाण। ब्राह्मण करितां प्रात:स्नान। तो नेतां कर्म त्यागून। दोषचि परी गुण गंभीर होय॥ ७९॥ सर्पगरळेचें जीवन। ब्राह्मणें करितां प्राशन। तें पात्र घेतां हिरोन। दोषचि परी गुण गंभीर होय॥ १८०॥ गृहस्थासी अग्निहोत्र गुण। तोचि संन्याशासी अवगुण। ब्राह्मणीं विहित वेदमंत्रपठण। शूद्रासी जाण तो दोष॥ ८१॥ विषयनिवृत्तीलागीं सुगम। गुणदोषांचा केला नेम। हें नेणोनि वेदाचें वर्म। विषयभ्रम भ्रांतासी॥ ८२॥ जंव भ्रांति तंव कर्मप्रवृत्ती। तेथ गुणदोषांची थोर ख्याती। जेवीं कां खद्योत लखलखिती। आंधारे रातीं सतेज॥ ८३॥ तेवीं गुणदोषांमाजीं जाण। अवश्य अंगी आदळे पतन। तेचि अर्थींचें निरूपण। स्वयें श्रीकृष्ण सांगत॥ ८४॥
समानकर्माचरणं पतितानां न पातकम्।
औत्पत्तिको गुण: सङ्गो न शयान: पतत्यध:॥ १७॥
स्वकर्में पतित जाहले जाण। डोंब भिल्ल कैवर्तक जन। त्यांसी मद्यपानादि दोषीं जाण। नाहीं पतन पतितांसी॥ ८५॥ जें नीळीमाजीं काळें केलें। त्यासी काय बाधावें काजळें। कां अंधारासी मसीं माखिलें। तेणें काय मळलें तयाचें॥ ८६॥ जो स्वभावें जन्मला चांडाळ। त्यासी कोणाचा बाधी विटाळ। हो कां काळें करवें काजळ। ऐसें नाहीं बळ कीटासी॥ ८७॥ निर्जीवा दीधलें विख। तेणें कोणासी द्यावें दु:ख। तेवीं पतितासी पातक। नव्हे बाधक सर्वथा॥ ८८॥ जो केवळ खालें निजेला। त्यासी पडण्याचा भेवो गेला। तेवीं देहाभिमाना जो आला। तो नीचाचा झाला अतिनीच॥ ८९॥ रजतमादि गुणसंगीं। जो लोलंगत विषयांलागीं। त्यासी तिळगुळादि कामभोगीं। नव्हे नवी आंगीं देहबुद्धी॥ १९०॥ जो कनकबीजें भुलला। तो गाये नाचे हरिखेला। परी संचितार्थ चोरीं नेला। हा नेणेचि आपुला निजस्वार्थ॥ ९१॥ तेवीं देहाभिमानें उन्मत्त। अतिकामें कामासक्त। तो नेणे बुडाला निजस्वार्थ। आपुला अपघात देखेना॥ ९२॥ ज्यासी चढला विखाचा बासटा। त्यासी पाजावी सूकरविष्ठा। तेवीं अतिकामी पापिष्ठा। म्यां स्वदारानिष्ठा नेमिली॥ ९३॥ ज्यासी विख चढलें गहन। त्यासी सूकरविष्ठेचें पान। हें ते काळींचें विधान। स्वयें सज्ञान बोलती॥ ९४॥ तेवीं जेथवरी स्त्रीपुरुषव्यक्ती। तेथवरी स्वेच्छा कामासक्ती। त्याची करावया निवृत्ति। स्वदारास्थिति नेमिली वेदें॥ ९५॥ वेदें निरोप दिधला आपण। तैं दिवारातीं दारागमन। हेंही वेदें नेमिलें जाण। स्वदारागमन ऋतुकाळीं॥ ९६॥ तेथ जन्मलिया पुत्रासी। ‘आत्मा वै पुत्रनामाऽसी’। येणें वेदवचनें पुरुषासी। स्त्रीकामासी निवर्तवी॥ ९७॥ नि:शेषविष उतरल्यावरी। तो सूकरविष्ठा हातीं न धरी। तेवीं विरक्ति उपजल्या अंतरीं। स्वदारा दूरी त्यागिती॥ ९८॥ यापरी विषयनिवृत्ती। माझ्या वेदाची वेदोक्ती। दावूनि गुणदोषांची उक्ती। विषयासक्ती सांडावी॥ ९९॥
यतो यतो निवर्तेत विमुच्येत ततस्तत:।
एष धर्मो नृणां क्षेम: शोकमोहभयापह:॥ १८॥
माझिया वेदाचें मनोगत। विषयीं व्हावें निवृत्त। यालागीं गुणदोष दावित। विषयत्यागार्थ उपावो॥ २००॥ एकाएकीं सकळ विषयांसी। त्याग न करवे प्राण्यासी। यालागीं निषेधें निंदूनि त्यांसी। शनै:शनै: विषयांसी त्यागवी॥ १॥ जों जों विषयांची निवृत्ती। तों तों निजसुखाची प्राप्ती। पूर्ण बाणल्या विरक्ती। साधक होती मद्रूप॥ २॥ मद्रूपतेचिये प्राप्तीं। आडवी असे विषयासक्ती। ते झालिया विषयनिवृत्ती। साधक होती मद्रूप॥ ३॥ जेथ माझिया स्वरूपाची प्राप्ती। तेथ नि:शेष निमे अहंकृती। तेव्हां शोकमोहाची होय शांती। जाय निश्चितीं अविद्या॥ ४॥ अविद्यानाशासवें जाण। नाशती जन्मभाव दारुण। तेव्हां मरणासीच ये मरण। हारपे जीवपण जीवाचें॥ ५॥ अविद्या निमाल्या जीवेंसीं। ठावो नाहीं भवभयासी। जेवीं सबळबळें अंधारेंसीं। नुरेचि निशी दिनोदयीं॥ ६॥ जेवीं कां मृगजळाचा पूर। न साहे दृष्टीचा निर्धार। तेवीं भवभयेंसीं संसार। झाला साचार वाउगा॥ ७॥ प्राणी पावावया कल्याण। हे वेदोक्त स्वधर्माचरण। विषयत्यागालागीं जाण। केलें निरूपण गुणदोषां॥ ८॥ जे साच वेदार्थातें नेणती। ते वेदा प्रवृत्तिपर म्हणती। परी वेदें द्योतिली विरक्ती। विषयासक्तिच्छेदक॥ ९॥ वेदोक्त स्वधर्मस्थितीं। होय विषयांची विरक्ती। प्राणी निजमोक्ष पावती। हे वेदोक्ती पैं माझी॥ २१०॥ हे सांडोनियां वेदस्थिती। केवळ विषयांची आसक्ति। प्राणी अतिदु:ख पावती। ऐक तुजप्रती सांगेन॥ ११॥ प्रवृत्ति तितुकी अनर्थहेतु। येचि अर्थींचा वृत्तांतु। चौं श्लोकीं श्रीभगवंतु। असे सांगतु उद्धवा॥ १२॥
विषयेषु गुणाध्यासात्पुंस: सङ्गस्ततो भवेत्।
सङ्गात्तत्र भवेत्काम: कामादेव कलिर्नृणाम्॥ १९॥
कलेर्दुर्विषह: क्रोधस्तमस्तमनुवर्तते।
तमसा ग्रस्यते पुंसश्चेतना व्यापिनी द्रुतम्॥ २०॥
विषयांचें गोडपण। सदा ध्याय ज्याचें मन। त्यासी विषयासक्ती जाण। अतिगहन उल्हासे॥ १३॥ विषयासक्तीचा संभ्रम। तेणें निर्लज्ज खवळे काम। कामास्तव अतिविषम। सोशी दुर्गम उपाय॥ १४॥ विषयकामार्थ जे उपाय। त्यासी प्रतिपदीं अपाय। जेव्हां विषयकामसिद्धि न होय। तेव्हां महाकलह विवादु॥ १५॥ जेथ अतिजल्पाचा विवाद। तेथ खटाटोपेंसीं सन्नद्ध। खवळला उठी क्रोध। अतिविरुद्ध दुर्धर॥ १६॥ क्रोध खवळल्या दारुण। बुद्धीचें तत्काळ नासे ज्ञान। तेव्हां विवेकाचें प्राशन। करी जाण महामोह॥ १७॥ विवेकाचें लोपल्या भान। स्तब्ध चेतना होय जाण। तेव्हां कार्याकार्यआठवण। हेंही स्मरण बुडालें॥ १८॥
तया विरहित: साधो जन्तु: शून्याय कल्पते।
ततोऽस्य स्वार्थविभ्रंशो मूर्च्छितस्य मृतस्य च॥ २१॥
विवेकशून्य स्तब्धवत। तेथ विषयो ना परमार्थ। न कळे सन्मार्गपंथ। आत्मघात पदोपदीं॥ १९॥ केवळ जड मूढ होऊनी। जेवीं कां मूर्च्छित प्राणी। तैसेपरी स्तब्ध होऊनी। अज्ञानपणींश्रमला॥ २२०॥ यापरी जीत ना मेला। जड मूढ होऊनि ठेला। थित्या निजस्वार्था मुकला। अंगीं वाजला अनर्थु॥ २१॥
विषयाभिनिवेशेन नात्मानं वेद नापरम्।
वृक्षजीविकया जीवन् व्यर्थं भस्त्रेव य: श्वसन॥ २२॥
एवं विषयांचे आसक्तीं। तमोगुणें ग्रासिली वृत्ती। तेव्हां एकीहि स्फुरेना स्फूर्ती। मी कोण हें चित्तीं स्फुरेना॥ २२॥ ऐसा भ्रमें भुलला प्राणी। जैसा उन्मत्त मदिरापानी। त्यासी स्मरणाची विस्मरणी। भ्रमिस्त मनीं पडिला॥ २३॥ कां विषमसंधीज्वरु। तेणें ज्वरें हुंबरे थोरु। त्यासी नावडे आपपरु। वृथा विकारु बडबड करी॥ २४॥ फांटा फुटलियावरी। भलतेंचि स्मरण करी। तया नाठवे कांहीं ते परी। प्राणी अघोरीं पडले जाण॥ २५॥ कां झालिया भूतसंचार। प्राणी हुंबरें हुंहुंकार। पडिला चित्तासी विसर। म्हणे मी कुकर म्हणोनि भुंके॥ २६॥ ऐसें जीविके नेणोनि प्राणी। घाबरे जैसा स्वप्नीं। म्हणे मी पडलों रणीं। ऐसे प्राणी स्वप्नीं भुलले॥ २७॥ तैशी भुली लटकी भुलवणी। काममोहें व्यापिले प्राणी। जडमूढपण ठाकूनी। अंत:करणीं वेडावले॥ २८॥ मुक्यानाकीं भरे मुरकुट। तें फें फें बें बें करी निकृष्ट। न कळे रडे करी हाहाट। ते खटपट वाउगी॥ २९॥ तैसे दु:खबळें प्राणी। परी न कळे उंच करणी। पडिले मोहमदें भुलोनी। मुकेपणीं बेंबात॥ २३०॥ अहंकृतीचा उभारा। शरीरीं भरलासे वारा। तो होऊनि बाधक नरा। पडले आडद्वारा अंधकूपीं॥ ३१॥ कां तेलियाचा ढोर पाहीं। डोळां झांपडी स्वदेहीं। अवघा वेळ चाले परी पाहीं। पंथ कांहीं न ठकेचि॥ ३२॥ भवंता फिरे लागवेगीं। परी पाहतां न लगे आगी। घाणियाचि भोंवतें वेगीं। भोंवंडी अंगीं जिराली॥ ३३॥ तैसे विषय भवंडित भवु। परी नकळेचि विधिमावु। जैसा सर्प भ्रमला लागे धांवूं। तैसे विषय आघवे धांवती॥ ३४॥ अंवसेचें काळें गडद। तैसा जड मूढ झाला स्तब्ध। स्फुरेना आप पर हा बोध। जगदांध्य वोढवलें॥ ३५॥ जेवीं लोहकाराची भाती। तेवीं वृथा श्वासोच्छ्वास होती। वृक्षाची जैसी तटस्थ स्थिती। यापरी जीती जीत ना मेलीं॥ ३६॥ सकामासी स्वर्गप्राप्ती। म्हणसी बोलिली असे वेदोक्ती। तेही प्रलोभाची वदंती। ऐक तुजप्रती सांगेन॥ ३७॥
फलश्रुतिरियं नॄणां न श्रेयो रोचनं परम्।
श्रेयो विवक्षया प्रोक्तं यथा भैषज्यरोचनम्॥ २३॥
निष्काम जे कां कर्मस्थिती। ते मूर्ख सर्वथा न करिती। त्यांसी दावूनियां फलश्रुती। स्वकर्मप्रवृत्तीं लाविले॥ ३८॥ सकाम अथवा निष्काम। कर्मक्रिया दोंहीची सम। येथ वासनाचि विषम। सकामनिष्कामफलहेतू॥ ३९॥ जेवीं कां स्वातीचें जळ। शिंपीमाजीं होय मुक्ताफळ। तेंचि सेवी जैं महाव्याळ। तैं हळाहळ होऊनि ठाके॥ २४०॥ तेवीं आपुली जे कां कल्पना। निष्कामें आणी मुक्तपणा। तेचि सकामत्वें जाणा। दृढबंधना उपजवी॥ ४१॥ वेदु बोलिला जें स्वर्गफल। तें मुख्यत्वें नव्हे केवळ। जेवीं भेषज घ्यावया बाळ। देऊनि गूळ चाळविजे॥ ४२॥ ओखद घेतलियापाठीं। क्षयरोगाची होय तुटी। परी बाळ हातींचा गूळ चाटी। ते नव्हे फळदृष्टी भेषजीं॥ ४३॥ तेवीं वेदाचे मनोगतीं। स्वर्गफळाची अभिव्यक्ती। मूर्खासी द्यावया मुक्ती। स्वधर्मस्थिती लावितु॥ ४४॥ म्हणसी कर्मवादी जे नर। वेद सांगती प्रवृत्तिपर। तो वेदार्थ निवृत्तितत्पर। केवीं साचार मानावा॥ ४५॥ श्रुत्यर्थ जैं प्रवृत्ति धरी। तैं वेदु झाला अनर्थकारी। ते प्रवृत्ति दूषूनि श्रीहरी। दावी निवृत्तिवरी वेदार्थ॥ ४६॥
उत्पत्त्यैव हि कामेषु प्राणेषु स्वजनेषु च।
आसक्तमनसो मर्त्या आत्मनोऽनर्थहेतुषु॥ २४॥
न तानविदुष: स्वार्थं भ्राम्यतो वृजिनाध्वनि।
कथं युञ्ज्यात्पुनस्तेषु तांस्तमो विशतो बुध:॥ २५॥
उपजतांचि प्राणिमात्रासी। देह आवडे सर्वस्वेंसीं। देहात्मवादें विषयांसी। जीवेंप्राणेंसीं लोलुप॥ ४७॥ विषयकामाच्या आसक्तीं। स्त्रीपुत्रांची गोडी चित्तीं। स्वजनधनांची अतिप्रीती। स्वभावस्थिती अनिवार॥ ४८॥ जेणें जाइजे अधोगती। ऐशी जे कां कामासक्ती। ते प्राण्यासी सहजगती। विषयासक्ती स्वभावें॥ ४९॥ तेचि विषयांची प्रवृत्ती। वेद बोले जैं विध्युक्ती। तैं सर्वांचा स्वार्थघाती। झाला अनर्थी वेदवादु॥ २५०॥ मरतया तरटमारु केला। बुडत्याचे डोयीं दगड दीधला। आंधळा अंधकूपीं घातला। तैसा वेदु झाला अनर्थी॥ ५१॥ वेदु जैं विषयीं गोंवी। तैं प्राण्यातें कोण उगवी। राजासर्वस्वें नागवी। तैं कोण सोडवी दीनातें॥ ५२॥ नेणोनि वेदींचा मथितार्थु। स्वयें जो कां विषयासक्तु। तो मानी प्रवृत्तिपर श्रुत्यर्थु अनर्थहेतु बालिशां॥ ५३॥ पुत्र पित्यास पुसे जाण। ग्रहणीं जेवूं परमान्न। येरू म्हणे सुटल्या ग्रहण। उष्ण भोजन स्वगृहीं करूं॥ ५४॥ तैशी माझ्या वेदाची उक्ती। निषेधमुखें दावी प्रवृत्ती। येणें वेदाच्या मनोगतीं। विषयनिवृत्ती मुख्यत्वें॥ ५५॥ विषयीं बुडते जे जन। त्यांचें करावया उद्धरण। माझा वेदवादु जाण। सकामपण त्या नाहीं॥ ५६॥ कोणी एक मंदबुद्धी। केवळ विषयांध त्रिशुद्धी। ते सकाम जल्पती वेदविधी। त्यांची कुबुद्धी हरि सांगे॥ ५७॥
एवं व्यवसितं केचिदविज्ञाय कुबुद्धय:।
फलश्रुतिं कुसुमितां न वेदज्ञा वदन्ति हि॥ २६॥
फलत्यागें स्वधर्मस्थिती। सर्वथा सकाम न करिती। यालागीं वेद बोले फलश्रुती। स्वधर्मप्रवृत्तीलागुनी॥ ५८॥ सैंधव सागरा भेटूं जातां। जेवीं कां हारपे सैंधवता। तेवीं स्वधर्मीं प्रवर्ततां। सकामता उरेना॥ ५९॥ जैशी दों दिव्यांची वाती। एकवट केलिया ज्योती। तेथ न दिसे भेदगती। पाहतां ज्योती एकचि॥ २६०॥ जेवीं अग्नीं कापुर मिळतां। तो अग्नीचि होय तत्त्वतां। तेवीं स्वधर्मकर्मीं प्रवर्ततां। कर्मीं निष्कर्मता स्वयें प्रकटे॥ ६१॥ कर्माकर्मांची वेळुजाळीं। ते स्वधर्माचे कांचणिमेळीं। पडे चित्तशुद्धीची इंगळी। ते करी होळी कर्माकर्मांची॥ ६२॥ सकामता करितां कर्म। स्वधर्म नाशी फळकाम। तेव्हां सकाम आणि निष्काम। दोंहींचें भस्म स्वधर्म करी॥ ६३॥ जेवीं दों काष्ठांच्या घसणी-। माजीं प्रकटे जो कां वन्ही। तो दोंहीतेंही जाळूनी। स्वतेजपणीं प्रकाशे॥ ६४॥ तेवीं माझा वेदवादु। स्वकर्में छेदी कर्मबाधु। हें नेणोनि जो विषयांधु। जडला सुबद्धु फळाशे॥ ६५॥ वेदें प्रवृत्तिरोचनेकारणें। स्वर्गादि नाना फलें बोलणें। त्यांलागीं ज्याचें बैसे धरणें। तेणें नागवणें निजस्वार्था॥ ६६॥ कष्टोनि शेतीं पेरिले चणे। त्यांची उपडोनि भाजी करणें। तो लाभ कीं तेणें नाडणें। तैसें फळ भोगणें सकामीं॥ ६७॥ वोलीं जोंधळियाचीं करबाडें। खातां अत्यंत लागतीं गोडें। त्यालागीं शेत जैं उपडे। तैं लाभु कीं नाडे निजस्वार्था॥ ६८॥ तैशी सकामकामनाउन्मत्तें। जे फळीं फळाशालोलिंगतें। ते नाडलीं स्वधर्मलाभातें। ऐक तूतें सांगेन॥ ६९॥ शेतीं पेरावया आणिले चणे। त्यांचे आदरें करी जो फुटाणे। तो शाहणा कीं मूर्ख म्हणणें। तैसें फळ भोगणें सकामीं॥ २७०॥ घोडा विकोनि पलाण घेणें। लोणी देऊनि ताक मागणें। भात सांडूनि वेळण पिणें। तैसें फळ भोगणें सकामीं॥ ७१॥ ऐसे सकाम अतिदुर्बुद्धी। जे नाडले स्वधर्मसिद्धी। यालागीं देवो म्हणे ‘कुबुद्धी’। ते कुबुद्धीची विधी हरि सांगे॥ ७२॥
कामिन: कृपणा लुब्धा: पुष्पेषु फलबुद्धय:।
अग्निमुग्धा धूमतान्ता: स्वं लोकं न विदन्ति ते॥ २७॥
सकामाची तृष्णा पूर्ण। कदाकाळीं नव्हे जाण। कामेच्छा तो सदा दीन। ‘कृपणपण’ या हेतू॥ ७३॥ जळीं बक धरोनि ध्यान। जेवीं कां टपत राहे मीन। तेवीं सकामा अनुष्ठान। लुब्धोनि जाण कामासी॥ ७४॥ जावया परपुरुषापासीं। लवोठवो दावी निजपतीसी। तेवीं काम धरोनि मानसीं। स्वधर्मकर्मासी आचरे॥ ७५॥ जेवीं कां अज्ञान बाळ। फूल तेंचि म्हणे फळ। तेवीं स्वर्गभोग केवळ। मानी अढळ मूर्खत्वें॥ ७६॥ त्याही स्वर्गभोगासी पाहें। कर्मवैकल्य होय कीं नोहे। हाही संदेह वर्तताहे। तेणेंही होय अतिदीन॥ ७७॥ सकाम तो सदा दीन। दीनत्वें अतिकृपण। कृपणत्वें सलोभपण। लोभास्तव ज्ञान महामोह ग्रासी॥ ७८॥ मोहाचें खवळल्या भान। सविवेक ग्रासी ज्ञान। तेव्हां बुद्धीमाजीं तमोगुण। सबाह्य परिपूर्ण उल्हासे॥ ७९॥ तमें कोंदाटल्या वृत्ती। धूमांकित होय स्थिती। जेवीं कां आंधळॺाचा सांगाती। आंधारे रातीं आडवीं चुके॥ २८०॥ त्या आंधळॺाची जैशी स्थिती। तैशी सकामाची गती। चुकला विवेकाचा सांगाती। आंधळी वृत्ती अतिमुग्ध॥ ८१॥ जैसें कां अज्ञान बाळ। तैसा मुग्ध होय केवळ। कोण कर्म काय तें फळ। नेणे विवळ मुग्धत्वें॥ ८२॥ माझी कोणे लोकीं स्थिती। पुढें कोण आपुली गती। हें कांहींच न स्मरे चित्तीं। धूम्रवृत्ती देहांतु॥ ८३॥
न ते मामङ्ग जानन्ति हृदिस्थं य इदं यत:।
उक्थशस्त्रा ह्यसुतृपो यथा नीहारचक्षुष:॥ २८॥
वेदतात्पर्याचे निजखुणे। तुवां पुसिलें मजकारणें। तीं वेदाचीं गुह्य निरूपणें। तुजकारणें म्यां निरूपिलीं॥ ८४॥ परिसोनि वेदाचे विभाग। उद्धव सुखावला चांग। तेणें संतोषें श्रीरंग। संबोखोनि ‘अंग’ उद्धवासी म्हणे॥ ८५॥ जो मी हृदया माजिले वस्ती। परमात्मा निकटवर्ती। त्या मातें सकाम नेणती। कामासक्तीं नाडले॥ ८६॥ तो मी हृदयामाजीं असें। हें एकादेशित्व मज नसे। जगदाकारें मीचि भासें। जेवीं कल्लोळविलासें सागरु॥ ८७॥ अलंकार झालेपणें। जेवीं असे निखळ सोनें। तेवीं जगदाकारें म्यां श्रीकृष्णें। परिपूर्ण असणें पूर्णत्वें॥ ८८॥ नाम रूप वर्ण विविध। माझेन प्रकाशें जगदुद्बोध। परी नामरूपजातिभेद। मजसी संबंध असेना॥ ८९॥ आकाश जळीं बुडालें दिसे। परी तें न माखे जळरसें। तेवीं मी जगदाकारें असें। जगदादि दोषें अलिप्त॥ २९०॥ ऐसा मी विश्वात्मा विश्वंभरु। विश्वमूर्ति विश्वेश्वरु। त्या मज नेणती अज्ञान नरु। जे कां शिश्नोदरुपोषक॥ ९१॥ ज्यासी आंधारें दाटे गाढें। कां महाकुहरीं जो सांपडे। तो कांहीं न देखे पुढें। अवचिता पडे महागर्तीं॥ ९२॥ तेवीं अति मोहममता भ्रांतें। अज्ञाननिद्रा सबाह्य व्याप्तें। जवळिल्या न देखोनि मातें। पडिले महागर्ते तमामाजीं॥ ९३॥ न कळोनि माझ्या वेदार्थातें। केवळ जीं कां कामासक्तें। तीं पावलीं अध:पातातें। जवळिल्या मातें नेणोनि॥ ९४॥ तो मी जवळी कैसा म्हणसी। तरी सर्वांच्या हृदयदेशीं। वसतसें अहर्निशीं। चेतनेसी चेतविता॥ ९५॥ त्या माझें वेदार्थमत। नेणतीचि कामासक्त। तेचिविखीं श्रीकृष्णनाथ। विशदार्थ स्वयें सांगे॥ ९६॥
ते मे मतमविज्ञाय परोक्षं विषयात्मका:।
हिंसायां यदि राग: स्याद्यज्ञ एव न चोदना॥ २९॥
माझ्या वेदाचा अगम्य भावो। न कळोनि गूढ अभिप्रावो। तेणें सकामासी उत्साहो। स्वर्गातें पहा हो मानिती सत्य॥ ९७॥ ‘रोचनार्थ’ स्वर्ग बोले वेद। तो प्रगटार्थ मानूनि शुद्ध। मग स्वर्गसाधनें विविध। कामलुब्ध आदरती॥ ९८॥ तेथ यज्ञ हें मिषमात्र जाण। स्वयें करावया मांसभक्षण। अविधीं करिती पशुहनन। अतिदृप्त जाण कामार्थीं॥ ९९॥ त्यांसी पैं गा देहांतीं। मारिले पशुमारावया येती। हातीं घेऊनि खड्ग काती। सूड घेती यमद्वारीं॥ ३००॥ तेथ कैंचें स्वर्गसुख। अविधि-साधनें महामूर्ख। पावले गा अघोर नरक। सकामें देख नाडले॥ १॥ यथेष्ट करावया मांसभक्षण। स्वेच्छा जें कां पशुहनन। त्यांसी वेदें केलें निर्बंधन। पशुहनन यज्ञार्थ॥ २॥ तेथही अर्गळा घातली जाण। देश काळ आणि वर्तमान। मंत्र तंत्र विधि विधान। धन संपूर्ण अतिशुद्ध॥ ३॥ शक्त सज्ञान धनवंत। ऐसा कर्ता पाहिजे येथ। मुष्टिघातें करावया पशुघात। पडे प्रायश्चित्त ‘मे’ म्हणतां॥ ४॥ ऐशी वेदाज्ञा नाना अवघड। घातलीं प्रायश्चित्तें अतिगूढ। तरी सकाम जे महामूढ। ते धांवती दृढ पशुहनना॥ ५॥ ऐसें झाल्या पशुहनन। विभागा येईल कवळ प्रमाण। तेंचि करावें भक्षण। दांतांसी जाण न लागतां॥ ६॥ विभाग भक्षितां आपण। जो करी रसास्वादन। त्यासीही प्रायश्चित्त जाण। हेंही निर्बंधन वेदें केलें॥ ७॥ करावें मांसभक्षण। हे वेदाज्ञा नाहीं जाण। त्याचें करावया निराकरण। लाविलें विधान यज्ञाचें॥ ८॥ स्वेच्छा पशु न मारावया जाण। यज्ञीं नेमिलें पशुहनन। न करावया मांसभक्षण। नेमिला प्रमाण यज्ञभाग॥ ९॥ हेंही वेदाचें बोलणें। मूर्खप्रलोभाकारणें। येऱ्हवीं पशुहिंसा न करणें। मांस न भक्षणें हें वेदगुह्य॥ ३१०॥
हिंसाविहारा ह्यालब्धै: पशुभि: स्वसुखेच्छया।
यजन्ते देवता यज्ञै: पितृभूतपतीन् खला:॥ ३०॥
न मानूनि वेदविधानासी। पशुहननीं क्रीडा ज्यांसी। अविधी मारूनि पशूंसी। मिरवितीश्लाघेसी याज्ञिकत्वें॥ ११॥ अविधीं करूनि जीवहनन। तेणें पशूनें करिती यज्ञ। पितृदेवभूतगण। करिती यजन सुखेच्छा॥ १२॥ बाबडें बीज पेरिल्या शेतीं। पिकास नाडले निश्चितीं। शेखींनिजबीजा नागवती। राजे दंडूनि घेती करभार॥ १३॥ तैशी अविधी याज्ञिकांची गती। स्वर्गस्वप्नींही न देखती। थित्या नरदेहा नागवती। शेखीं दु:ख भोगिती यमदंडें॥ १४॥ वृथा पशूंस दु:ख देती। तेणें दु:खें स्वयें दु:खी होती। ऐशी याज्ञिकांची गती। आश्चर्य श्रीपती सांगत॥ १५॥
स्वप्नोपमममुं लोकमसन्तं श्रवणप्रियम्।
आशिषो हृदि सङ्कल्प्य त्यजन्त्यर्थान्यथावणिक्॥ ३१॥
स्वप्नीं दिसे सवेंचि नासे। तेवीं विकल्पेनि जग भासे। येथ सकाम कामनापिसें। स्वर्ग विश्वासें मानिती सत्य॥ १६॥ मुळींच मिथ्या मृगजळ। त्यामाजीं शीतळ जळ। थाया घेऊनि मागे बाळ। तैसे सकाम केवळ स्वर्गालागीं॥ १७॥ ‘पिंपळावरून मार्ग आहे’। ऐकोनि रुखावरी वेंघों जाये। तो जेवीं भ्रमें गुंतोनि राहे। तेवीं स्वर्गश्रवणें होये सकाम॥ १८॥ स्वधर्ममार्गीं चालावया नर। वेदु स्वर्ग बोले अवांतर। ते फांटां भरले अपार। स्वर्गतत्पर सकाम॥ १९॥ वाट पिंपळावरी ऐकोनी। शहाणा चाले मार्ग लक्षोनी। अश्वत्थ सांडी डावलोनी। तो पावे स्वस्थानीं संतोषें॥ ३२०॥ तेवीं स्वधर्माच्या अनुष्ठानीं। जो सांडी स्वर्गफळें उपेक्षूनी। तो चित्तशुद्धीतें पावोनी। ब्रह्मसमाधानीं स्वयें पावे॥ २१॥ या सांडूनि स्वधर्ममार्गासी। श्रवणप्रिय स्वर्गसुखासी। सकाम भुलले त्यासी। जेवीं घंटानादासी मृग लोधे॥ २२॥ तेवीं जन्मोनि कर्मभूमीसी। वेंचूनि धनधान्यसमृद्धीसी। थित्या नाडले नरदेहासी। स्वर्गसुखासी भाळोनी॥ २३॥ जैसा कोणी एक वाणी। जुनी नाव आश्रयोनी। द्वीपांतरींचा लाभ ऐकोनी। न विचारितां मनीं समुद्रीं रिघे॥ २४॥ उन्मत्त कर्णधाराचे संगतीं। फुटकी नाव धरोनि हातीं। घेऊनियां सकळ संपत्ती। रिघे कुमती महार्णवीं॥ २५॥ तो जेवीं समुद्रीं बुडे। तैसेंचि सकामांसी घडे। स्वर्ग वांछितां बापुडे। बुडाले रोकडे भवार्णवीं॥ २६॥ वांछितां स्वर्गसुखफळ। बुडालें स्वधर्मवित्त सकळ। बुडालें चित्तशुद्धीचें मूळ। बुडालें मुद्दल नरदेह॥ २७॥ एव्हडें हानीचें कारण। देवो सांगत आहे आपण। सकामतेसी मूळ गुण। तेंही लक्षण स्वयें सांगे॥ २८॥
रज:सत्त्वतमोनिष्ठा रज:सत्त्वतमोजुष:।
उपासत इन्द्रमुख्यान् देवादीन्न तथैव माम्॥ ३२॥
रजतमाचेनि उन्मत्तें। सत्त्व संकीर्ण होय तेथें। तेव्हां रजाचेनि संमतें। काम चित्तातें व्यापूनि खवळे॥ २९॥ अतिकाम खवळल्या चित्तीं। गुणानुसारें विषयीं प्रीती। तेव्हां सकामाची संगती। धरी निश्चितीं भावार्थें॥ ३३०॥ सकामसंगती साचार। काम्यकर्मीं अत्यादर। स्वर्गभोगीं महातत्पर। यजी देवपितर प्रमथादिक॥ ३१॥ मी सर्वात्मा सर्वेश्वर। त्या माझ्या ठायीं अनादर। कामलंपटत्वें नर। देवतांतर उपासिती॥ ३२॥ म्हणसी देवतांतर जें कांहीं। तें तूंचि पैं गा सर्वही। हाही ऐक्यभावो नाहीं। भेदबुद्धीं पाहीं विनियोग॥ ३३॥ इंद्रादि देवद्वारां जाण। मीचि होय गा प्रसन्न। त्या माझ्या ठायीं नाहीं भजन। सकाम मन स्वर्गार्थी॥ ३४॥ दृढ कामना जडली चित्तीं। सांगतां स्वर्गीं पुनरावृत्ती। तेही हितत्वेंचि मानिती। ऐक निश्चितीं अभिप्रावो॥ ३५॥
इष्ट्वेह देवता यज्ञैर्गत्वा रंस्यामहे दिवि।
तस्यान्त इह भूयास्म महाशाला महाकुला:॥ ३३॥
जे कर्मभूमीसी मनुष्य झाले। ते सहजें मोक्षाधिकारा आले। तेथही कामना नागविले। स्वर्गार्थ भजले देवतांतरा॥ ३६॥ स्वर्गभोगीं ठेवूनि मन। नाना यागीं करिती यजन। तेणें दिविभोग पावेन। हा निश्चय जाण याज्ञिकां॥ ३७॥ काळें भोगक्षयाच्या पतनीं। तेही घेती हितत्वें मानोनी। सवेंचि इहलोकीं जन्मोनी। ब्राह्मणपणीं सुशील॥ ३८॥ वेदवेदांगअध्ययन। धनधान्यें अतिसंपन्न। आम्ही विख्यात गृहस्थ होऊन। क्षीणपुण्य स्वर्गस्थ॥ ३९॥ नेणोनि वेदार्थ निजस्थिती। ऐसऐशिया उपपत्तीं। सकामीं मानिली निश्चिती। ऊंस सांडोनि मागती कणीस त्याचें॥ ३४०॥
एवं पुष्पितया वाचा व्याक्षिप्तमनसां नृणाम्।
मानिनां चातिस्तब्धानां मद्वार्तापि न रोचते॥ ३४॥
फल सांडूनि फुल खाये। तैसा परिपाक याज्ञिकां होये। स्वर्गकामाचेनि उपायें। अपायीं स्वयें पडताती॥ ४१॥ अवघा संसार काल्पनिक। तेथ सत्य कैंचें स्वर्गसुख। परी श्रवणमात्रें देख। भुलले मूर्ख स्वर्गसुखा॥ ४२॥ जैसा नपुंसक वांछी स्त्रीसुख। परी संग तया कैंचा देख। मुळींच नाहीं बीजारोप। मा कैंचा काम साटोप तयासी॥ ४३॥ परी लटिकाचि तडतडां उडे। कष्टोनि व्यर्थचि पहुडे। परी तया नसे भगभोग रोकडे। तैसे स्वर्ग फुडे प्राणिया॥ ४४॥ गव्हांचा जो प्रथम मोड। तोंडीं घालितां लागे गोड। परी जो जाणे पिकाचा निवाड। तो मोड जाण उपडीना॥ ४५॥ पालेयाची चवी घेतां। गव्हांची गोडी न लगे तत्त्वतां। मग पाला पाळूनि स्वभावतां। शेवटीं रडता गव्हांचि कारणें॥ ४६॥ तेवीं वेदु बोलिला स्वर्गफल। तें स्वधर्माचें कोंवळें मूळ। तें उपडूनि खातां तत्काळ। मोक्षफळ अंतरे॥ ४७॥ हें जाणती जे सज्ञान। ते स्वर्गासी नातळती आपण। परी मूर्खाचें सकामपण। अनिवार जाण अतिशयें॥ ४८॥ कामाचिया लोलंगती। सदा सकाम कर्में करिती। तेणें जन्ममरणांचे आवर्तीं। पडले नुगंडती आकल्प॥ ४९॥ त्यांसी हित सांगती साधुजन। ते न मानिती संतवचन। आम्ही वेदार्थीं सज्ञान। हा ज्ञानाभिमान अतिगर्वें॥ ३५०॥ मी भगवंत नियंता सृष्टी। हें वेदें दाविल्या नावडे गोष्टी। निष्कामता कपाळ उठी। सकाम पोटीं सुबुद्ध॥ ५१॥ एवं वेद मानूनि प्रवृत्तिपर। ठकले सकळ सकाम नर। तोचि वेदार्थ ब्रह्मपर। स्वयें श्रीधर सांगत॥ ५२॥
वेदा ब्रह्मात्मविषयास्त्रिकाण्डविषया इमे।
परोक्षवादा ऋषय: परोक्षं मम च प्रियम्॥ ३५॥
कर्मकांड उपासना ज्ञान। इंहीं त्रिकांडीं वेदु आपण। चित्तशुद्धिद्वारा जाण। ब्रह्मसंपन्न जीव करी॥ ५३॥ पारधी लावून बडिशपिंडी। मीनांसी जळाबाहेर काढी। तेवीं दावून स्वर्गसुखगोडी। वेद जीवास ओढी परमार्थीं॥ ५४॥ परोक्षवाद वेदव्युत्पत्तीं। त्यागमुखें गा अन्योक्ती। सांडविली विषयासक्ती। ब्रह्मप्राप्तीलागूनि॥ ५५॥ हें जाणोनि वेदार्थगुह्यज्ञान। जो जीव झाला ब्रह्मसंपन्न। तेथ कर्म-कर्ता मिथ्या जाण। आश्रम-वर्ण मग कैंचे॥ ५६॥ तेथ कैंचें ध्येय-ध्याता-ध्यान। कैंचें ज्ञेय-ज्ञाता-ज्ञान। नाहीं भज्य-भजक-भजन। ब्रह्म परिपूर्ण पूर्णत्वें॥ ५७॥ तेथ कैंचे कर्म-कर्माचरण। कैंचा वेद-वेदाध्ययन। कैंचें साध्य आणि साधन। ब्रह्म परिपूर्ण पूर्णत्वें॥ ५८॥ तेथ कैंचे दोष कैंचे गुण। कैंचें पाप कैंचें पुण्य। कैंचें जन्म कैंचें मरण। ब्रह्म परिपूर्ण पूर्णत्वें॥ ५९॥ तेथ कैंचा भेदु कैंचा बोधु। कैंचा मोक्ष कैंचा बंधु। सदोदित परमानंदु। हा वेदार्थ शुद्धु उद्धवा॥ ३६०॥ या वेदार्थाचें निरूपण। प्रकट करितां आपण। निजस्वार्था नाडती जन। यालागीं जाण म्यां गुप्त केलें॥ ६१॥ हें वेदार्थाचें गुह्य सार। मज गुप्ताचें गुप्त भांडार। तुझा देखोनि अधिकार। म्यां साचार सांगितलें॥ ६२॥ हा गुह्यार्थ करितां प्रकट। सांडोनि कर्ममार्गाची वाट। कर्म ब्रह्म उभयभ्रष्ट। होतील नष्ट अनधिकारी॥ ६३॥ हें जाणोनि ज्ञाते ऋषीश्वरीं। वेदार्थनिरूपणकुसरी। हा मुख्यार्थ झांकोनि निर्धारीं। परोक्षवादावरी व्याख्यान केलें॥ ६४॥ सकळलोकहितार्थ। माझेंही हेंचि मनोगत। परोक्षवाद गोड लागत। लोकसंग्रहार्थ उद्धवा॥ ६५॥ मीही लोकसंग्रहार्थ। अकर्ता कर्में आचरत। वेदाचें जें परोक्ष मत। मी स्वयें राखित लोकहिता॥ ६६॥ वेदाचें स्वरूप गहन। अतर्क्य अलक्ष्य अगम्य जाण। तेचि अर्थींचें निरूपण। स्वयें श्रीकृष्ण सांगत॥ ६७॥
शब्दब्रह्म सुदुर्बोधं प्राणेन्द्रियमनोमयम्।
अनन्तपारं गम्भीरं दुर्विगाह्यं समुद्रवत्॥ ३६॥
माझी वेदरूप जे बोली। शब्दत: अर्थत: अगाध खोली। ब्रह्मादिकां भुली पडली। मर्यादा केली न वचेनि॥ ६८॥ बाहीं न तरवे समुद्र। तेवीं स्वमतीं न कळे वेदपार। येचि अर्थीं नानाऋषीश्वर। युक्तीचे संभार वेंचिले॥ ६९॥ परी एवंविध तत्त्वतां। हे वेदवादाची कथा। न येचि कोणाचेही हाता। अर्थत: शब्दत: दुर्ज्ञेय॥ ३७०॥ ज्याची शब्दवाचकता। स्वरवर्णें शुद्ध न ये हाता। त्याची अर्थावबोधकता। अगम्य सर्वथा सुरनरां॥ ७१॥ पूर्वीं हाचि वेद अनुच्छिष्ट। म्यां ब्रह्मयाहातें करविला पाठ। तेणेंही नेणोनियां स्पष्ट। कर्मीं कर्मठ होऊनि ठेला॥ ७२॥ ते कर्मक्रिया अतिगोमटी। शंखें हरिली उठाउठी। ब्रह्मा विसरला वेदगोठी। पडलें सृष्टीं कर्मांध्य॥ ७३॥ तो करावया वेदोद्धार। म्यां मर्दिला शंखासुर। सकळ श्रुतींचा संभार। ब्रह्मयासी साचार दीधला॥ ७४॥ म्यां वेद ठेविले ब्रह्मयापुढें। तो पूर्व स्मरेना धडफुडें। तेव्हां चाकाटलें बापुडें। केवळ वेडें होऊनि ठेलें॥ ७५॥ त्या वेदभागालागीं जाण। ऋषीं वेंचिलें निजज्ञान। शाखोपशाखीं रावण। वेदविभागन करूं आला॥ ७६॥ परी इत्थंभूत तत्त्वतां। माझ्या वेदविभागाची वार्ता। न येचि कोणाचिया हाता। जाण तत्त्वतां उद्धवा॥ ७७॥ तो मी वेदस्थापक श्रीहरी। लोक राखावया मर्यादेवरी। स्वयें सत्यवतीच्या उदरीं। झालों अवतारधारी श्रीव्यास॥ ७८॥ वेदविभागीं राजहंसु। यालागीं नामें ‘वेदव्यासु’। तेणें म्यां केला श्रुतिविलासु। वेदविशेषु चतुर्धा॥ ७९॥ वेद अर्थत्वें अतिदुर्घट। परी वाचकत्वें झाला प्रगट। त्या चारी वाचा अतिश्रेष्ठ। ऐक स्पष्ट सांगेन॥ ३८०॥ नादाचें प्रथमस्फुरण। घोषमात्र सूक्ष्म प्राण। ती नांव ‘परा’ वाचा जाण। प्रथम लक्षण ॐकारीं॥ ८१॥ तोचि नादयुक्त प्राण। अंत:करणीं होय स्फुरण। ते ‘पश्यंती’ वाचा जाण। विवेकलक्षण तीमाजीं॥ ८२॥ नाभीपासोनी नाभिस्वरीं। जे घुमघुमी कंठवरी। ते ‘मध्यमा’ वाचा खरी। स्वयें श्रीहरी सांगत॥ ८३॥ अकार-उकार-मकार। स्वरवर्णयुक्त उच्चार। जेथ प्रगट होय ओंकार। ते वाचा साचार ‘वैखरी’॥ ८४॥ ते वैखरीच्या ठायीं। शाखोपशाखीं जो कांहीं। वेद अनंतरूप पाहीं। त्यासही नाहीं मर्यादा॥ ८५॥ यापरी वेद अमर्याद। जरी चतुर्धा केला विशद। तरी जनासी अतिदुर्बोध। यालागीं उपवेद विभागिले॥ ८६॥ ऐसेनिही जनासी न कळे वेद। यालागीं वेदावरी पद। श्रीव्यासें केले विशद। तरी वेदार्थ शुद्ध कळेना॥ ८७॥ येचि अर्थी ऋषीश्वर बहुत। सुमंतु जैमिनी भाष्य भारत। पैल सूत्रादि जे समस्त। शिणतां वेदार्थ न कळेचि॥ ८८॥ एवं वाच्यता आणि लक्ष्यता। स्थूलसूक्ष्मत्वें वेदार्थज्ञाता। मजवांचूनि तत्त्वतां। आणिक सर्वथा असेना॥ ८९॥
मयोपबृंहितं भूम्ना ब्रह्मणानन्तशक्तिना।
भूतेषु घोषरूपेण बिसेषूर्णेव लक्ष्यते॥ ३७॥
जो मी अंतर्यामी आपण। ‘भूमा’ म्हणिजे अपरिच्छिन्न। सबाह्य व्यापकत्वें संपूर्ण। ब्रह्मपरिपूर्ण जो कां मी॥ ३९०॥ तेणें म्यां वेद अधिष्ठित। या नांव बोलिजे ‘उपबृंहित’। अधिष्ठाता विकारी होत। जेवीं अभ्रांत चंद्रमा॥ ९१॥ कां अग्नि काष्ठीं अधिष्ठितां। त्यासी तत्काळ ये साकारता। मग प्रबळ आणि शांतता। या विकारावस्था अग्नीसी॥ ९२॥ यापरी विकारी नव्हे जाण। मी अंतर्यामी नारायण। ब्रह्मस्वरूपें परिपूर्ण। विकारनिर्दळण स्वयें कर्ता॥ ९३॥ मीचि विकारांचा कर्ता। करूनि मीचि अकर्ता। त्या मज न ये विकारता। ब्रह्मस्वरूपता स्वभावें॥ ९४॥ ब्रह्म केवळ निर्धर्म। तें केवीं करी विकारी कर्म। ऐसा कांहीं कल्पिसी भ्रम। तेंही सुगम सांगेन॥ ९५॥ माझी योगमाया अनंतशक्ती। जे शंभुस्वयंभूंसी न ये व्यक्ती। तिचेनि योगें मी चिन्मूर्ती। उत्पत्तिस्थितिसंहर्ता॥ ९६॥ एवं योगमाया स्वभावतां। मी सकळ करूनि अकर्ता। त्यामज देशतां काळतां। विकारिता स्पर्शेना॥ ९७॥ जरी सत्य असती भेदता। तरी मज येती विकारिता। माझे निजस्वरूपीं पाहतां। भेदाची वार्ता असेना॥ ९८॥ जेवीं भ्रमें सर्पत्व दोरावरी। परी दोर सर्पत्व कदा न धरी। तेवीं मी परमात्मा श्रीहरी। करूनि अविकारी निजरूपें॥ ९९॥ घोषरूपें अतिसूक्ष्म नादु। तो मी प्रणवरूपें निजवेदु। प्राणिमात्रीं असें स्वत:सिद्धु। परी नेणती बोधु सकामत्वें॥ ४००॥ जेवीं कां विष्ठा भक्षी सूकर। उपेक्षी कस्तुरी कापुर। तेवीं सूक्ष्मवेदाचें निजसार। सकाम नर उपेक्षिती॥ १॥ मी निजानंद हृदयाआंत। त्या मज उपेक्षूनि भ्रांत। कामासक्तीं लोलंगत। द्वारें वोळंगत नीचांचीं॥ २॥ त्या हृदयस्थ देवाचें ध्यान। नित्य योग्यासी निदिध्यासन। सम करोनि प्राणापान। सदा अनुसंधान नादाचें॥ ३॥ माझें वेदतत्त्व जें कां गुप्त। प्रणवरूपें हृदयाआंत। योगी सदा अनुभवित। त्याचें स्वरूप निश्चित अवधारीं॥ ४॥ जैसा कमळमृणाळबिसतंत। तैसा सूक्ष्म नाद अत्यंत। नाभीपासोनि ब्रह्मरंध्रांत। ओंकार स्वरांत लक्षिती॥ ५॥ ऐसा ओंकाराच्या स्वराआंत। नाभीपासोनि ब्रह्मरंध्रांत। सूक्ष्म नादाचा निजतंत। योगधारणा राखत महायोगी॥ ६॥ हाचि नाद पैं प्रस्तुत। लौकिकीं असे भासत। दोंही कर्णीं देतां हात। तोचि घुमघुमित निजनादु॥ ७॥ योगी म्हणती ‘अनाहत शब्द’। वेदांती म्हणती ‘सूक्ष्म नाद’। आम्ही म्हणों हा ‘शुद्धवेद’। असो अनुवाद हा नांवांचा॥ ८॥ ऐशिया स्वत:सिद्ध वेदापाशीं। श्रद्धा नुपजेचि प्राणियांसी। यालागीं सूक्ष्म वेद स्थूलतेसी। म्यां जनहितासी आणिला॥ ९॥ तोचि स्थूलत्वें झाला प्रकट। ते प्रकट होती वेदवाट। दृष्टांतेंकरूनि स्पष्ट। तुज मी चोखट सांगेन॥ ४१०॥ ऐसें बोलिला श्रीनिवास। तेणें उल्हासला हृदयहंस। म्हणे मजकारणें हृषीकेश। अत्यंत सौरस निरूपणीं॥ ११॥ मजवरी बहुत स्नेहाळ। मज उद्धरावया गोपाळ। निरूपणीं सुकाळ। अतिरसाळ अमृतरसु॥ १२॥ ऐसें उद्धवाचें बोलणें ऐकोनी। काय बोलिला सारंगपाणी। म्हणे मी तोचि निरूपणीं। सांगेन तुज लागोनी उद्धवा॥ १३॥
यथोर्णनाभिर्हृदयादूर्णामुद्वमते मुखात्।
आकाशाद्घोषवान्प्राणो मनसा स्पर्शरूपिणा॥ ३८॥
छन्दोमयोऽमृतमय: सहस्रपदवीं प्रभु:।
ऊर्णनाभि म्हणिजे कांतणी। ते जेवीं निजमुखापासूनी। तंतु काढी अतिसूक्ष्मपणीं। तेवीं निर्गुणीं ‘ओंकार’॥ १४॥ तो ओंकार होतां सप्राण। सहजस्वभावें गा जाण। झाला ‘हिरण्यगर्भ’अभिधान। आपणिया आपण वेदाज्ञा॥ १५॥ ‘प्रभु’ म्हणजे ऐश्वर्यख्याति। अचिंत्यानंत त्याची शक्ति। तो छंदोमय वेदमूर्ती। जाण निश्चितीं उद्धवा॥ १६॥ तो अविनाशी वास्तवस्थिती। नित्य सुखमय सुखमूर्ती। तेणें सप्राण नादाभिव्यक्ति। मन:शक्ती चेतवी॥ १७॥ चेतविली जे मन:शक्ती। होय स्पर्श-स्वर-वर्ण कल्पिती। वेदज्ञ ‘बृहती’ म्हणती। जिचा अपरिमिती विस्तार॥ १८॥ ते स्वरवर्णसंवलित मंत्र। हृदयाकाशीं विचित्र। सहस्रशाखीं विस्तार। वाढली अपार वैखरी॥ १९॥ स्वरवर्णादि उच्चारीं। वेदाधिष्ठान वैखरी। ते उपजली जेणेंकरी। तेही परी सांगेन॥ ४२०॥
ओंकाराद्वॺञ्जितस्पर्शस्वरोष्मान्त:स्थभूषिताम्॥ ३९॥
विचित्रभाषाविततां छन्दोभिश्चतुरुत्तरै:।
अनन्तपारां बृहतीं सृजत्याक्षिपते स्वयम्॥ ४०॥
मात्रा त्रय मिळणीं लोक। ओंकार बोलती आवश्यक। हा ओंकार अलोलिक। अतिसूक्ष्म देख देहस्थ॥ २१॥ त्याचि ओंकारासी प्राणसंगती। आधारादि चक्रीं ऊर्ध्वगती। तेथ वाचांची होय अभिव्यक्ती। परा-पश्यंती-मध्यमा॥ २२॥ परावाचेच्या अभ्यंतरीं। जन्मे पश्यंती ज्येष्ठकारी। मध्यमा जन्मे तिच्या उदरीं। एवं परस्परीं जन्मती॥ २३॥ तैशाचि येरीतें येरी। नोसंडोनि क्षणभरी। चालती उपरांउपरी। चक्रींच्या चक्रांतरीं समवेत॥ २४॥ ‘आधारचक्रीं’ परा वाचा। ‘स्वाधिष्ठानीं’ जन्म पश्यंतीचा। ‘मणिपूरीं’ हूनि ‘विशुद्धी’ चा। ठायीं मध्यमेचा रिगुनिगू॥ २५॥ तेथोनियां मुखद्वारीं। वाचा प्रकाशे वैखरी। तैं स्वर-वर्ण-उच्चारीं। नानामंत्रीं गर्जत॥ २६॥ तेचि स्वर आणि वर्ण। सांगेन ‘स्पर्श’ व्यक्तिलक्षण। ‘अंतस्थ’ ‘ऊष्म’ कोण कोण। विभागलक्षण अवधारीं॥ २७॥ केवळ ‘अ क च ट त प’ देख। हे ककारादि पंच पंचक। स्पर्शवर्णाचें रूपक। अक्षरें निष्टंक पंचवीस॥ २८॥ सवर्णें गर्जतां उच्चार। ते अकारादि सोळाही स्वर। ‘य र ल व’यांचा विचार। जाण साचार ‘अंतस्थ’॥ २९॥ ‘श ष स ह’ हे वर्ण चारी। ‘ऊष्म’ बोलिजेशास्त्रकारीं। विसर्गादि अनुस्वारीं। ‘अं अ:’ वरी विभागु॥ ४३०॥ येथ बावन्नावी मातृका एक। केवळ ‘क्ष’ कारु गा देख। यांतु सानुनासिक निरनुनासिक। जाणती लोक शास्त्रज्ञ॥ ३१॥ एवं स्वरवर्णविधिउच्चारीं। लौकिकी वैदिकी भाषावरी। वेदशास्त्रार्थप्रकारीं। वाढली वैखरी शब्दचातुर्यें॥ ३२॥ बोलेंचि गा बोलाप्रती। चाळूनि नाना उपपत्ती। बोलें बोल निगृहिती। युक्तिप्रयुक्ती साधुनी॥ ३३॥ ऐशिया नानाशब्दकुसरीं। अत्यंत विस्तारिली वैखरी। तेचि चौं चौं अक्षरीं। वाढवूनि धरी नाना छंदें॥ ३४॥ वाढतां चतुरक्षरभेदें। उत्तरोत्तर नाना छंदें। वाढविलीं स्वयें वेदें। निजज्ञानबोधें बोलूनि॥ ३५॥ अतएव अनंत अपार। अर्थतां शब्दतां अतिदुस्तर। माझ्या शब्दज्ञानाचा पार। सुरनर नेणती॥ ३६॥ ऐशी वैखरीची अनंतशक्ती। यालागीं म्हणिजे ते ‘बृहती’। इच्या विस्ताराची गती। स्वयें नेणती शिव स्रष्टा॥ ३७॥ हिरण्यगर्भत्वें स्वयें जाण। जीव-शिव-अंतर्यामीलक्षण। माझी वेदाज्ञा प्रकाशी आपण। जिचें नामाभिधान ‘वैखरी’॥ ३८॥ जो मी वेदात्मा श्रीहरी। तो वेदु या रीतीं विस्तारीं। स्वयें विस्तारोनि संहारीं। मर्यादेवरी स्वकाळें॥ ३९॥ मागां बोलिलीं छंदें जाण। त्या छंदांचें निजलक्षण। स्वयें सांगताहे श्रीकृष्ण। जो वेदाचें कारण निजस्वरूप॥ ४४०॥
गायत्र्युष्णिगनुष्टुप् च बृहती पङ्क्तिरेव च।
त्रिष्टुब्जगत्यतिच्छन्दो ह्यत्यष्टॺतिजगद्विराट्॥ ४१॥
सकळ छंदांचें अधिष्ठान। मुख्य गायत्री छंद जाण। त्या गायत्री छंदाचें लक्षण। ऐक संपूर्ण सांगेन॥ ४१॥ आठआठां अक्षरीं त्रिपद। गणितां जेथ यती शुद्ध। त्या नांव ‘गायत्री’ छंद। हें वेदानुवाद निजबीज॥ ४२॥ हें वेदाचें निजजिव्हार। ब्रह्मज्ञानाचें परपार। परमानंदाचें सोलींव सार। जाण साचार गायत्री॥ ४३॥ हें चैतन्याचें जीवन। मज गोप्याचें गुप्तधन। जेथ जीवशिवां समाधान। तें हें छंद जाण गायत्री॥ ४४॥ ये छंदींचें एक एक अक्षर। अक्षराचें निजसार। सच्चिदानंदाचें निजभांडार। जाण साचार गायत्री॥ ४५॥ करितां गायत्रीचें अनुष्ठान। विश्वामित्र झाला ब्राह्मण। मी कृष्ण वंदीं त्याचे चरण। माझाही तो गुरु जाण रामावतारीं॥ ४६॥ यालागीं सकळ छंदीं प्राधान्य। मुख्यत्वें गायत्री छंद जाण। इतर छंद होती पावन। कासे लागोन पैं इच्या॥ ४७॥ गायत्री छंदाचें अंगीकारीं। त्यासी मिळाल्या अक्षरें चारी। ‘उष्णिक्’ छंदाची थोरी। त्याचिवरी ठसावे॥ ४८॥ उष्णिक् छंदाचे अंगीकारीं। त्यासी मिळाल्या अक्षरें चारी। ‘अनुष्टुप्’ छंदाची थोरी। त्याचिवरी ठसावे॥ ४९॥ अनुष्टुप् छंदाचे अंगीकारीं। आणिक मिळाल्या अक्षरें चारी। ‘बृहती’ छंदाची थोरी। त्याचिवरी ठसावे॥ ४५०॥ एवं ‘पंक्ति’ ‘त्रिष्टुप्’ ‘जगती’। ‘अत्यष्टि’ ‘अतिजगती’। चौं चौं अक्षरांचे अधिकप्राप्तीं। छंदें वेदोक्तीं विभाग॥ ५१॥ ऐशिया चतुरक्षरमिळणीं। नाना छंदांचिया श्रेणी। वेदरायाची राजधानी। मंत्रध्वनीं गर्जती॥ ५२॥ तेथ अक्षरमर्यादा न करवे। शाखांची मर्यादा न धरवे। अर्थता वाच्यता नेणवें। वेद वैभवें दुर्ज्ञेय॥ ५३॥
किं विधत्ते किमाचष्टे किमनूद्य विकल्पयेत्।
इत्यस्या हृदयं लोके नान्यो मद्वेद कश्चन॥ ४२॥
कर्मकांडविधिनिषेधीं। कोण अर्थ त्यागार्थ निंदी। कोण तो अर्थ प्रतिपादी। स्वहितबुद्धी साधकां॥ ५४॥ मंत्रकांडें मंत्रमूर्ती। सांगोपांग सायुधस्थिती। उपासना-उपास्ययुक्ती। किमर्थ भक्ती करविली॥ ५५॥ ज्ञानकांड त्रिशुद्धी। कोण पदार्थ निषेधी। कोण्या अर्थातें प्रतिपादी। निजबुद्धी बोधुनी॥ ५६॥ एवं वेदाचें अचळ मूळ। विधिविधानेसीं मुख्य फळ। जाणावया गा केवळ। नाहीं ज्ञानबळ सुरनरां॥ ५७॥ या वेदार्थातें तत्त्वतां। मीचि एक सर्वज्ञ ज्ञाता। माझे कृपेवीण सर्वथा। हें न येचि हाता ब्रह्मादिकां॥ ५८॥ तेथ उद्धवाचें मनोगत। देवो जाणे वेदींचा इत्यर्थ। तरी भक्तकृपाळू श्रीकृष्णनाथ। मजही तो अर्थ दयेनें सांगों॥ ५९॥ हा उद्धवाचा निजभावो। जाणों सरला देवाधिदेवो। तो वेदार्थाचा अभिप्रावो। श्लोकान्वयो पहा हो सांगत॥ ५६०॥
मां विधत्तेऽभिधत्ते मां विकल्प्यापोह्यते त्वहम्*।
एतावान् सर्ववेदार्थ: शब्द आस्थाय मां भिदाम्।
मायामात्रमनूद्यान्ते प्रतिषिद्धॺ प्रसीदति॥ ४३॥
* ह्या चरणापुढें पैठणच्या प्रतींत पुढीलप्रमाणें श्लोक आहेत—‘‘संमतिश्लोक—तत्त्वमस्यादि वाक्यं च तदात्मा प्रतिपादने। लक्ष्यतत्त्वं पदार्थौ द्वौ उपादाय प्रवर्तते॥ १॥ नित्यमुक्त: स्वत: सर्ववेदकृत्सर्ववेदवित् । स्वपरज्ञानदाता च तं वंदे गुरुमीश्वरम्॥ २॥’’
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायामेकादशस्कन्धे एकविंशोऽध्याय:॥ २१॥
माझी पावावया स्वरूपसिद्धी। मलिनाचिया चित्तशुद्धी। वेद स्वधर्म प्रतिपादीं। त्यागवी निषेधीं विषयातें॥ ६१॥ तेथ अग्निहोत्रादि विधान। यज्ञांत कर्माचरण। तें चित्तशुद्धीचें कारण। वैराग्य दारुण उपजवी॥ ६२॥ दारुण वैराग्यउत्पत्ती। इहामुत्रविषयनिवृत्ती। तेव्हां साधकास माझी प्राप्ती। सहजस्थिती स्वभावें॥ ६३॥ एवं कर्मकांडाचिये स्थिती। विधिनिषेध वेदोक्ती। साधकांसी माझी प्राप्ती। जाण निश्चितीं या हेतू॥ ६४॥ विषयीं परम बाधा देखती। परी त्यागीं नाहीं सामर्थ्यशक्ती। ऐशिया साधकांप्रती। वेदें मद्भक्ती द्योतिली॥ ६५॥ येथ मंत्रमूर्ति-उपासन। माझें सगुण अनुष्ठान। तेथ करितां अनन्यभजन। रजतम जाण नासती॥ ६६॥ मग केवळा सत्त्ववृत्तीं। श्रवणकीर्तनीं अतिप्रीती। तेणें मद्भावो सर्वांभूतीं। माझी चौथी भक्ती तेणें होय॥ ६७॥ आतुडल्या माझी चौथी भक्ती। मद्भक्तां नावडे मुक्ती। अद्वैत भजनाचिया प्रीतीं। धिक्कारिती कैवल्य॥ ६८॥ अद्वैतबोधें करितां भजन। मी अनंत अपार चिद्घन। भक्तीमाजीं आकळें जाण। ये मद्रूपपण मद्भक्तां॥ ६९॥ तेव्हां भज्य-भजक-भजन। पूज्य-पूजक-पूजन। साध्य-साधक-साधन। अवघें आपण स्वयें होय॥ ४७०॥ माझी ऐश्वर्य सामर्थ्यशक्ती। तेही ये निजभक्तांच्या हातीं। अद्वैतभजनाचिया प्रीतीं। मत्पदप्राप्ती मद्भक्तां॥ ७१॥ मी देव तो भक्त शुद्ध। हा बाहेरी नांवाचाचि भेद। आंतुवट पाहतां बोध। सच्चिदानंद निजऐक्यें॥ ७२॥ हे उपासनाकांडस्थिती। साधकीं करूनि माझी भक्ती। यापरी पावले माझी प्राप्ती। जाण निश्चितीं उद्धवा॥ ७३॥ ‘मायाप्रतिबिंबित’ चैतन्य। त्वंपदार्थें वाच्य जाण। ज्याच्या अंगीं जीवाभिधान। अविद्या जाण उपजवी॥ ७४॥ जेवीं स्वप्नामाजींआपण। आन असोनि देखे आन। तेवीं आविद्यकत्वें जाण। ‘जीवपण’ एकदेशी॥ ७५॥ जें ‘मायासंवलित’ चैतन्य। जो योगजन्य जगत्कारण। जो सर्वद्रष्टा सर्वज्ञ। सदा संपन्न ऐश्वर्यें॥ ७६॥ जो सकळ कर्मांचा कर्ता। तो कर्ताचि परी अकर्ता। ज्याचे अंगीं स्वभावतां। नित्यमुक्तता स्वयंभ॥ ७७॥ ज्याची अकुंठित सहजसत्ता। जो परमानंदें सदा पुरता। ज्यासी ईश्वरत्वें समर्थता। हे जाण वाचकता तत्पदार्थाची॥ ७८॥ जीवाचें सांडोनियां अज्ञानत्व। शिवाचें सांडूनि सर्वज्ञत्व। दोंहीचें शोधित जें लक्ष्यत्व। ऐक्यें निजतत्त्व साधिती॥ ७९॥ लग्नीं नोवरा निमासुरा। तोचि गेलिया देशावरा। विदेशीं देखिला एकसरा। तारुण्यमदभरा संपन्न॥ ४८०॥ ते काळींची त्यजूनि बाल्यावस्था। आजिची नेघूनि तारुण्यता। पत्नी अनुसरे निजकांता। निजस्वरूपता स्वभावें॥ ८१॥ तेवीं त्वंपद तत्पद वाच्यार्थ। दोंहीचा सांडावा निश्चितार्थ। ऐक्यें अंगीकारावा लक्ष्यार्थ। हा ज्ञानकांडार्थ उद्धवा॥ ८२॥ जीवशिवांचेनि ऐक्यें जाण। माझे चित्स्वरूपीं समाधान। स्वयें पाविजे आपण। हें ज्ञानकांड संपूर्ण बोलिलें वेदें॥ ८३॥ वेदा आदि-मध्य-अवसानीं। मातें लक्षितीं कांडें तीनी। तोचि अर्थ उपसंहारूनी। ग्रंथावसानीं हरि बोले॥ ८४॥ उद्धवा वेदाचें वचन। अर्थगंभीर अतिगहन। तेथ शिणतां ऋषिजन। अर्थावसान अलक्ष्य॥ ८५॥ तें वेदार्थाचें निजसार। माझें गुह्य ज्ञानभांडार। तुज म्यां सांगितलें साचार। पूर्वापर अविरोधें॥ ८६॥ तें ऐकोनि देवाचें उत्तर। उद्धव चमत्कारला थोर। तेंचि वेदाचें निजसार। पुढती श्रीधर सांगो कां॥ ८७॥ पान्हा लागतांचि तोंडीं। दोहक वांसरूं आंखुडी। त्यापरी अतिआवडीं। स्वयें चडफडी उद्धव॥ ८८॥ जेवीं कां पक्षिणीपुढें। चारा घ्यावयाचे चाडें। पिलें पसरी चांचुवडें। तेवीं कृष्णाकडे उद्धवु॥ ८९॥ तें उद्धवाचें मनोगत। जाणोनियां श्रीअनंत। सकळ वेदार्थ संकळित। ग्रंथांतीं सांगत निजसारांश॥ ४९०॥ नानाशाखीं अतिप्रसिद्ध। त्रिकांडीं वाढला जो वेद। तेथील नाना शब्दीं हाचि बोध। जो मी अभेद परमात्मा॥ ९१॥ त्या मातें धरोनि हातीं। त्रिकांडीं चालिल्या श्रुती। त्या श्रुत्यर्थाची उपपत्ती। यथास्थितीं सांगेन॥ ९२॥ मी कर्मादिमध्यअंतीं। मी कर्मकर्ता क्रियाशक्ती। कर्मफळदाता मी श्रीपती। हा इत्यर्थ निश्चितीं ‘कर्मादिकांडीचा’॥ ९३॥ मंत्रमूर्ति आणि मंत्रार्थ। तेही मीचि गा निश्चित। पूज्य पूजक पूजा समस्त। मजव्यतिरिक्त आन नाहीं॥ ९४॥ [‘शिवो भूत्वा शिवं यजेत्’-श्रुति] देवें देवोचि पूजिजे। देव होऊनि देवा भजिजे। हें वेदींचें निजबीज माझें। हेंचि आगमीं बोलिजे मुख्यत्वें॥ ९५॥ मीच देवो मीचि भक्त। पूजोपचार मी समस्त। मीचि मातें पूजित। हे इत्थंभूत ‘उपासना’॥ ९६॥ हें उपासनाकांडींचें निजसार। आगमशास्त्रींचें गुह्य भांडार। माझ्या निजभक्तांचें वस्तीचें घर। ते हे साचार उपासना॥ ९७॥ ‘ज्ञानकांड’ तें अलौलिक। वेद आपला आपण द्योतक। अवघा संसारचि काल्पनिक। तेथ वेद नियामक कोणे अर्थें॥ ९८॥ वोस घरास वस्तीस पहा हो। निर्जीव पाहुणा आला राहों। त्याचा कोण करील वोठवो। तैसा भावो वेदाज्ञे॥ ९९॥ [श्रुति-‘एकमेवाद्वितीयं ब्रह्म, नेह नानास्ति किंचन’] खांबसूत्रावरील पुतळीसी। तीतें बोडिलें जेवीं शिसीं। तेथें नाहीं निघणें पुढारे केंसीं। तेवीं शुद्धीं वेदासी ठाव नाहीं॥ ५००॥ मूळ संसारचि मायिक। तेथ वेद तोही तद्रूप देख। मृगजळीं नाहीं उदक। परी वोलावाहि देख असेना॥ १॥ जेथ मूळीं मुख्य अद्वैतता। तेथ कैंचा वक्ता कैंचा श्रोता। कैंचें कर्म कैंचा कर्ता। वेदवार्ता ते कैंची॥ २॥ नाहीं दृश्य-द्रष्टा-दर्शन। नाहीं ध्येय-ध्याता-ध्यान। नाहीं ज्ञेय-ज्ञाता-ज्ञान। वेदवचन तेथें कैंचें॥ ३॥ जेथ भ्रमाची राणीव। जेथ भेदाची जाणीव। तेथ वेदाची शहाणीव। गोड गाणीव उपनिषदांची॥ ४॥ जंव भेदाची सबल स्थिती। तंव वेदाची थोर ख्याती। भेदु आलिया अद्वैतीं। वेद विराला ‘नेति’ म्हणोनी॥ ५॥ जळगार जळीं विरे। तेवीं वेदु अद्वैतीं मुरे। हें ‘ज्ञानकांड’ साचोकारें। तुज म्यां खरें सांगितलें॥ ६॥ जेथ उपजलास्वयें अग्नी। त्या अरणी जाळूनि शमे वन्ही। तेवीं ज्ञानकांडनिरूपणीं। वेदु निज निर्दळणीं प्रवर्तला॥ ७॥ एक ब्रह्म जें अद्वैत। येणें श्रुतिवाक्यें मिथ्या द्वैत। हें बोलूनि वेद हारपे तेथ। ब्रह्म सदोदित संपूर्ण॥ ८॥ ‘मी ब्रह्म’ हे शुद्धीं स्फुरे स्फूर्ती। तेथचि ॐकाराची उत्पत्ती। तोही ब्रह्मरूप निश्चितीं। त्यासी ‘ब्रह्म’ म्हणती एकाक्षर॥ ९॥ त्या ॐकारापासोनि गहन। श्रुति शाखा स्वर वर्ण। झालें तें ब्रह्मरूप जाण। एवं वेद पूर्ण परब्रह्म॥ ५१०॥ जेवीं सोन्याचे अळंकार। पाहतां सोनेंचि साचार। तेवीं श्रुतिशाखा वेदविस्तार। तो अवघा ॐकार मद्रूपें॥ ११॥ जो वेदप्रतिपाद्य पुरुषोत्तम। जो भक्तकामकल्पद्रुम। तो हें बोलिला मेघश्याम। आत्माराम श्रीकृष्ण॥ १२॥ तिंही कांडी निजसंबंध। पूर्वापर अविरुद्ध। हा वेदार्थ परम शुद्ध। तुज म्यां विशद बोधिला॥ १३॥ या होनियां परता। वेदार्थ नाहीं गा सर्वथा। तो तुज म्यां सांगितला आतां। जाण तत्त्वता उद्धवा॥ १४॥ या वेदार्थाची निजखूण। हृदयीं भोगितां आपण। होय जीवशिवां समाधान। ऐसें श्रीकृष्ण बोलिला॥ १५॥ हें ऐकोनि उद्धव जाण। झाला वेदार्थीं निमग्न। दोनी टंवकारले नयन। स्वानंदीं मन बुडालें॥ १६॥ चित्तचैतन्या मिळणी पाडी। कंठीं बाष्प दृढ अडी। लागतां स्वानंदाची गोडी। उभिली गुढी रोमांची॥ १७॥ शरीरीं स्वेद सकंपता। नयनीं स्वानंदजळ येतां। बोल बुडाला सर्वथा। मूर्च्छा येतयेतां सांवरी॥ १८॥ तंव हृदया आली आठवण। हें भलें नव्हे दुश्चित्तपण। झणीं निजधामा जाईल श्रीकृष्ण। येणें धाकें नयन उघडिले॥ १९॥ तंव घवघवीत घनसांवळा। मुकुट कुंडलें मेखळा। कांसे झळके सोनसळा। आपाद वनमाळा शोभत॥ ५२०॥ अंतरीं भोगी चैतन्यघन। बाहेरी उघडितां नयन। आनंदविग्रही श्रीकृष्ण। मूर्ति संपूर्ण संमुख देखे॥ २१॥ म्हणे श्रीकृष्ण चैतन्यघन। चैतन्यविग्रही श्रीकृष्ण। सगुणनिर्गुणरूपें जाण। ब्रह्म परिपूर्ण श्रीकृष्ण॥ २२॥ बाप भाग्य उद्धवाचें। सगुणनिर्गुण दोंहीचें। सुख भोगीतसे साचें। हें श्रीकृष्णकृपेचें महिमान॥ २३॥ जेथ सद्गुरुकृपा संपूर्ण। तेथ शिष्याची आवडी प्रमाण। तो जैं मागे मूर्ति सगुण। तैं तेचि जाणगुरु देती॥ २४॥ पाहिजे निर्गुण निजप्राप्ति। ऐशी आवडी ज्याचे चित्तीं। तैं निर्गुणाचिये निजस्थितीं। गुरुकृपा निश्चितीं नांदवी॥ २५॥ सगुण निर्गुण स्वरूपें दोनी। भोगावया आवडी ज्याचे मनीं। तेही स्थितीच्या गुरु दानीं। कृपाळुपणीं समर्थ॥ २६॥ सद्गुरूचें अगाध महिमान। जें वेदा न बोलवेचि जाण। त्याची कृपा झालिया पूर्ण। दुर्लभ कोण पदार्थ॥ २७॥ ते कृष्णकृपेस्तव जाण। फिटलें उद्धवाचें दुर्लभपण। सगुण निर्गुण एक कृष्ण। हे खूण संपूर्ण बाणली॥ २८॥ जाणोनि कृष्णाचें पूर्णपण। त्याचे लक्षोनि श्रीचरण। धांवोनि उद्धव आपण। घाली लोटांगण हरिचरणीं॥ २९॥ तेव्हां सांवळा सकंकण। चारी बाह्या पसरी श्रीकृष्ण। उद्धवासी प्रेमें उचलून। दीधलें आलिंगन स्वानंदें॥ ५३०॥ त्या आलिंगनाचें सुख। अनुभवी जाणती देख। जो उद्धवासी झाला हरिख। त्याचा जाणता एक श्रीकृष्ण॥ ३१॥ तो कृष्ण म्हणे उद्धवा। हा विसाव्याचा विसावा। माझ्या वेदाचा निजगुह्यठेवा। तो हा एकविसावा तुज सांगितला॥ ३२॥ जेणें मोडे लिंगदेहाचा यावा। जेणें जीवत्व नाठवे जीवा। तो हा विसाव्याचा विसावा। तुज एकविसावा निरूपिला॥ ३३॥ जेणें मिथ्यात्व ये देहभावा। जेणें शून्य पडे रूपनांवा। तो हा विसाव्याचा विसावा। एकविसावा निरूपिला॥ ३४॥ जेथ अज्ञाना होय नागोवा। जेथ ज्ञान ये अभावा। तो विसाव्याचा विसावा। एकविसावा निरूपिला॥ ३५॥ जेथ वेदुही वेडावला। बोधही लाजोनि बुडाला। अनुभवो स्वयें थोंटावला। तो हा निरूपिला वेदार्थ॥ ३६॥ हें वेदार्थसारनिरूपण। मज विश्वात्म्याचें निजनिधान। तुज म्यां सांगितलें संपूर्ण। हे जीवींची खूण उद्धवा॥ ३७॥ कोटिकोटि साधनें करितां। गुरुकृपेवीण सर्वथा। हे न ये कोणाचे हाता। जाण तत्त्वतां उद्धवा॥ ३८॥ ते गुरुकृपेलागीं जाण। आचरावे स्वधर्म पूर्ण। करावें गा शास्त्रश्रवण। वेदपठण तदर्थ॥ ३९॥ ते कृपेलागीं आपण। व्हावें दीनाचेंही दीन। धरितां संतांचे चरण। स्वामी जनार्दन संतुष्टे॥ ५४०॥ गुरु संतुष्टोनि आपण। करवी भागवतनिरूपण। एका विनवी जनार्दन। कृपा नित्य नूतन करावी॥ ४१॥ पुढील अध्यायीं गोड प्रश्न। उद्धव पुसेल आपण। प्रकृतिपुरुषांचें लक्षण। तत्त्वसंख्या पूर्ण विभाग॥ ४२॥ त्याचें सांगतां उत्तर। जन्ममरणाचा प्रकार। स्वयें सांगेल शार्ङ्गधर। कथा गंभीर परमार्थी॥ ४३॥ जे कथेचें करितां श्रवण। वैराग्य उठे कडकडून। येणें विन्यासें निरूपण। स्वयें श्रीकृष्ण सांगेल॥ ४४॥ घटाकाशें ठाकिजे गगन। तेवीं एका जनार्दना शरण। त्याचे वंदितां श्रीचरण। रसाळ निरूपण स्वयें स्मरे॥ ५४५॥
इति श्रीभागवते महापुराणे भगवदुद्धवसंवादे एकादशस्कंधे एकाकारटीकायां वेदत्रयविभागनिरूपणं नाम एकविंशोऽध्याय॥ २१॥ श्रीकृष्णार्पणमस्तु॥ श्लोक॥ ४३॥ ओव्या॥ ५४५॥
॥ श्री ॐ तत्सत्-श्रीकृष्ण प्रसन्न॥
अध्याय बाविसावा
श्रीगणेशाय नम:॥ श्रीकृष्णाय नम:॥ ॐ नमो सद्गुरु खांबसूत्री। चौऱ्यांशीं लक्ष पुतळॺा यंत्रीं। नाचविशी निजतंत्रीं। प्राचीनदोरीस्वभावें॥ १॥ दोरी धरिली दिसों न देशी। परी पुतळॺा स्वयें नाचविशी। नवल लाघवी कैसा होशी। अलिप्ततेंसीं सर्वदा॥ २॥ तेथ जैशी ज्याची पूर्वगती। तें भूत नाचे तैशा रीतीं। ते नाचविती चेतनाशक्ती। तुझ्या हातीं वीण हस्तें॥ ३॥ जेवीं कां अचेतन लोहातें। चुंबक खेळवी निजसामर्थ्यें। तेवीं तूं सकळ भूतांतें। निजसत्तें नाचविशी॥ ४॥ ऐशीं सदा नाचतीं परतंत्र। तरी अभिमानाचें बळ थोर। सत्य मानोनि देहाकार। आम्ही स्वतंत्र म्हणविती॥ ५॥ आम्ही सज्ञान अतिज्ञाते। आम्ही कर्मकुशल कर्मकर्ते। इतर मूर्खें समस्तें। ऐशा अभिमानातें वाढविती॥ ६॥ एवं देहाभिमानाचेनि हातें। विसरोनि आपुल्या अकर्तृत्वातें। स्वयें पावले कर्मबंधातें। जेवीं स्वप्नावस्थे विषबाधा॥ ७॥ स्वप्नीं अतिशय चढलें विख। आतां उतरलें नि:शेख। तेवीं बंधमोक्ष देख। सत्यत्वें मूर्ख मानिती॥ ८॥ हे तुझे खांबसूत्रींची कळा। मिथ्या सत्यत्वें दाविशी डोळां। हा अतिशयें अगाध सोहळा। तुझी अतर्क्य लीळा तर्केना॥ ९॥ अचेतनीं चेतनधर्म। प्रत्यक्ष दाविशी तूं सुगम। हेंचि तुझें न कळे वर्म। करोनि कर्म अकर्ता॥ १०॥ अकर्ताचि तूं होशी कर्ता। कर्ता होत्साता अकर्ता। हे तुझी खांबसूत्रता। न कळे सर्वथा कोणातें॥ ११॥ तुझी माया पाहों जातां। तोचि मायेनें ग्रासिला तत्त्वतां। असो तुजचि पाहों म्हणतां। तेही सत्त्वावस्था मायेची॥ १२॥ ऐसें तुझें खांबसूत्र। अकळ न कळे गा तुझें चरित्र। देखों नेदितां निजसूत्र। भूतें विचित्र नाचविशी॥ १३॥ तुझेनि जग होय जाये। परी म्यां केलें हें ठावें नोहे। ऐसा तुझा खेळ पाहें। कोणें काये लक्षावा॥ १४॥ यापरी खेळ वाढविशी। सवेंचि विकल्पोनि मोडिशी। विकार महत्तत्त्वीं सांठविशी। हेंही कर्तृत्व अंगासी न लगत गेलें॥ १५॥ याचें मुख्यत्वें मूळ लक्षण। तुझे कृपेवीण न कळे जाण। तुझी कृपा झालिया पूर्ण। जनीं जनार्दन प्रकटे पैं॥ १६॥ जनीं प्रगटल्या जनार्दन। तद्रूप होईजे आपण। हे मूळींची निजखूण। मीतूंपण रिगेना॥ १७॥ मीतूंपणेंवीण प्रसिद्ध। जनीं जनार्दन निजानंद। त्याचे कृपेस्तव विशद। श्रीभागवत शुद्ध वाखाणिलें॥.१८॥ तेथ एकविसाव्याचे अंतीं। वेद त्रिकांड लक्ष्यार्थस्थिती। ब्रह्म एकचि निश्चितीं। अद्वयस्थिती अविनाशी॥ १९॥ हें वेदार्थसारनिरूपण। ऐकतां उद्धवा बाणली खूण। ब्रह्म एकाकी परिपूर्ण। दुजेनवीण संचलें॥ २०॥ वेदवादें ब्रह्म एक। स्वानुभवें तैसेंचि देख। तरी ज्ञाते ऋषिजन लोक। केवीं तत्त्वें अनेक बोलती॥ २१॥ येचि आशंकेलागीं जाण। उद्धवें स्वयें मांडिला प्रश्न। परी पोटांतील भिन्न खूण। उगा श्रीकृष्णा न रहावा॥ २२॥ मी झालों जी ब्रह्मसंपन्न। हें ऐकतां माझें वचन। निजधामा निघेल श्रीकृष्ण। मग हें दर्शन मज कैंचें॥ २३॥ ऐशिया काकुळतीं जाण। संशयेवीण करी प्रश्न। ते आयकोनि श्रीकृष्ण। सुखसमाधान भोगित॥ २४॥ तंव कृष्णाचे मनीं आणिक। उद्धव मी दोघे एक। मिथ्या वियोगाचें दु:ख। हें कळे तंव देख प्रश्न सांगों॥ २५॥ बाविसावे अध्यायीं देख। तत्त्वसंख्या सांगेल आवश्यक। प्रकृतिपुरुषविवेक। जन्ममरणद्योतक प्रकारु॥ २६॥ आत्मा एक कीं अनेक। आणि तत्त्वसंख्याविवेक। हें कळावया निष्टंक। उद्धव देख पूसत॥ २७॥
उद्धव उवाच
कति तत्त्वानि विश्वेश संख्यातान्यृषिभि: प्रभो।
नवैकादश पञ्च त्रीण्यात्थ त्वमिह शुश्रुम॥ १॥
विश्वात्मका विश्वेश्वरा। विश्वधारका विश्वंभरा। विश्वसाक्षी विश्वाकारा। विश्वैकसुंदरा श्रीकृष्णा॥ २८॥ तुज विश्वात्मक म्हणतां। जड मलिन एकदेशिता। आली म्हणशी अज्ञानता। यालागीं प्रभुता उपपादी॥ २९॥ जड मलिन अज्ञानता। हे मायेस्तव होती तत्त्वतां। ते मायेचा तूं नियंता। हे अगाध प्रभुता पैं तुझी॥ ३०॥ ऐशिया संबोधनद्वारा। विनवूनि स्वामी शारंगधरा। तत्त्वसंख्येच्या विचारा। निजनिर्धारा पुसत॥ ३१॥ जे तप:सामर्थ्यें समर्थ थोर। अनागतद्रष्टे ऋषीश्वर। त्यांची तत्त्वसंख्या विचित्र। पृथक्पृथगाकारें बोलती॥ ३२॥ तत्त्वसंख्या इत्थंभूत। एकुणिसाव्या अध्यायांत। तुम्हींच निरूपिला तत्त्वार्थ। तोचि वृत्तांत सांगत॥ ३३॥ (पूर्वश्लोकार्ध-‘‘नवैकादश पंच त्रीन्’’) चौदावे श्लोकींच्या निरूपणीं। हे अठ्ठावीस तत्त्वगणनी। सांगितली शार्ङ्गपाणी। मजलागोनी निश्चित॥ ३४॥ ये तत्त्वसंख्येचा विचार। प्रकृति पुरुष महदहंकार। पंच महाभूतें थोर। हा संख्याप्रकार नवांचा॥ ३५॥ दाही इंद्रियें अकरावें मन। पंच विषय तीन्ही गुण। हें अठ्ठावीस संख्यागणन। स्वमुखें आपण निरूपिलें॥ ३६॥ यापरी गा लक्ष्मीपती। हे मुख्यत्वें तुझी तत्त्वोक्ती। आतां ऋषीश्वरांच्या युक्ती। ऐक तुजप्रती सांगेन॥ ३७॥ ते तूं ऐक गा निश्चित। तुज सांगेन तयाचा अर्थ। म्हणोनियां निरूपित। स्वयें मनोगत उद्धव॥ ३८॥ म्हणे तत्त्वतां अवधारीं। मी सांगेन एक कुसरी। प्रकृतिपुरुषांमाझारीं। विचित्र परी सांगत॥ ३९॥
केचित्षड्विंशतिं प्राहुरपरे पञ्चविंशतिम्।
सप्तैके नव षट् केचिच्चत्वार्येकादशापरे॥ २॥
केचित्सप्तदश प्राहु: षोडशैके त्रयोदश।
एतावत्त्वं हि संख्यानामृषयो यद्विवक्षया।
येथ तत्त्वसंख्या मतवाद। ऋषीश्वरांमाजीं विवाद। त्या विवादाचे शब्द। ऐक विशद सांगेन॥ ४०॥ एक म्हणे तत्त्वें ‘सव्वीस’। दुजा म्हणे उगा बैस। बहु बोलावया नाहीं पैस। तत्त्वें ‘पंचवीस’ नेमस्त॥ ४१॥ तिजा म्हणे तुम्हीं येथ। कैसेनि वाढविलें स्वमत। तत्त्वें नेमस्तचि ‘सात’। कैंचीं बहुत बोलतां॥ ४२॥ एक म्हणे हें अभिनव। बोलतां न लाजती मानव। वृथा बोलाची लवलव। तत्त्वें ‘नव’ नेमस्त॥ ४३॥ तंव हांसोनि बोले एक। सांपे सज्ञान झाले लोक। मिथ्या बहुतत्त्व जल्पक। ‘तत्त्वषट्क’ नेमस्त॥ ४४॥ एक म्हणती परते सरा। नेणा तत्त्वसंख्याविचारा। तत्त्वें नेमिलींच ‘अकरा’। बडबड सैरा न करावी॥ ४५॥ दुजा म्हणे तत्त्वविचारा। नेणोनि धरिसी अहंकारा। पुसोनियां थोरथोरां। तत्त्वें ‘सतरा’ नेमस्त॥ ४६॥ एक म्हणे व्युत्पत्तिबळा। कांव्यर्थ पिटाल कपाळा। न कळे भगवंताची लीळा। तत्त्वें ‘सोळा’ नेमस्त॥ ४७॥ एक म्हणे यागर्वितां पोरां। कोण पुसे तत्त्वविचारा। तत्त्वें नेमस्तचि ‘तेरा’। निजनिर्धारा म्यां केलें॥ ४८॥ एक म्हणे सांडा चातुरी। तत्त्वें नेमस्तचि ‘चारी’। दुजा म्हणे या कायशा कुसरी। तत्त्वें निर्धारीं ‘दोनचि’॥ ४९॥ तिजा म्हणे वाचाट लोक। कोणें धरावें यांचें मुख। निजनिर्धारीं तत्त्व ‘एक’। एकाचा अनेक विस्तार॥ ५०॥ एवं मतपरंपरा नाना मतीं। ऋषीश्वरीं वेंचितां युक्ती। तुझ्या तत्त्ववादाची निश्चिती। कोणें इत्थंभूतीं मानावी॥ ५१॥
गायन्ति पृथगायुष्मन्निदं नो वक्तुमर्हसि॥ ३॥
तूं निजात्मा परमेश्वर। तुज जाणावया ऋषीश्वर। वेंचूनि युक्तीचे संभार। तत्त्वविचार बोलती॥ ५२॥ स्वामीनें सांगितलें तत्त्व एक। ऋषीश्वर बोलती अनेक। येचि विषयींचें निष्टंक। मज आवश्यक सांगावें॥ ५३॥ एवं या तत्त्वनिश्चयासी। मज सांगावया योग्य होसी। ऐसा विनविला हृषीकेशी। तो उद्धवासी तुष्टला॥ ५४॥ जीं जीं ऋषीश्वर बोलती। तीं तीं तत्त्वें सत्य होतीं। हें सर्वज्ञ ज्ञाते जाणती। तेचि अर्थीं हरि बोले॥ ५५॥
श्रीभगवानुवाच
युक्तं च सन्ति सर्वत्र भाषन्ते ब्राह्मणा यथा।
मायां मदीयामुद्गृह्य वदतां किं नु दुर्घटम्॥ ४॥
ज्याचेनि मतें जैसें ज्ञान। तो तैसें करी तत्त्वव्याख्यान। या हेतू बोलती ब्राह्मण। तें सत्य जाण उद्धवा॥ ५६॥ जरी अवघीं मतें प्रमाण। तरी कां करावें मतखंडण। उद्धवा तूं ऐसें न म्हण। ते मी निजखूण सांगेन॥ ५७॥ अघटघटित माझी माया। जे हरिहरां न ये आया। जे नाथिलें वाढवूनियां। लोकत्रया भुलवीत॥ ५८॥ ते माया धरोनियां हातें। ऋषीश्वर निजमतें। जो जो जें जें बोलेल जेथें। तें तें तेथें घडे सत्य॥ ५९॥ केवळ दोराचा सर्पाकार। हा श्वेत कृष्ण कीं रक्तांबर। ज्यासी जैसा भ्रमाकार। त्यासी साचार तो तैसा॥ ६०॥ तेवीं आत्मतत्त्व एकचि जाण। अविकारी निजनिर्गुण। तेथ नाना तत्त्वांचें व्याख्यान। बोलती ब्राह्मण मायायोगें॥ ६१॥ त्या मायेच्या मायिका व्युत्पत्ती। नाना वाग्वाद स्वमतीं। त्याच वादाची वादस्थिती। ऐक तुजप्रती सांगेन॥ ६२॥ ऐसें बोलोनि श्रीकृष्णनाथ। उद्धवाप्रति साङ्ग निरूपित। तत्त्वविचारणा यथार्थ। स्वयें सांगत आपण॥ ६३॥ हें पांचवे श्लोकींचें निरूपण। श्रीकृष्णउद्धवविवरण। सांगितलें तत्त्वव्याख्यान। उद्धवा जाण यथार्थ॥ ६४॥
नैतदेवं यथाऽऽत्थ त्वं यदहं वच्मि तत्तथा।
एवं विवदतां हेतुं शक्तयो मे दुरत्यया:॥ ५॥
माझे मायेचें प्रबळ बळ। तेणें अभिमान अतिसबळ। वाढवूनि युक्तीचें वाग्जाळ। करिती कोल्हाळ वाग्वादी॥ ६५॥ प्रबळ शास्त्रश्रवणाभिमान। तुझें वचन तें अप्रमाण। मी बोलतों हेंचि प्रमाण। पत्रावलंबन केलें असे॥ ६६॥ सत्त्वरजादि गुणोत्पत्ती। माझे मायेच्या अनंत शक्ती। तेणें गुणक्षोभें विवादती। स्वमतव्याप्ती अभिमानें॥ ६७॥
यासां व्यतिकरादासीद्विकल्पो वदतां पदम्।
प्राप्ते शमदमेऽप्येति वादस्तमनुशाम्यति॥ ६॥
कां गुणक्षोभें अभिमान विकल्प उपजवी गहन। विकल्पें युक्तीचें क्षळण। करी आपण अतिवादें॥ ६८॥ सांडितां गुणक्षोभविलास। रजतमांचा होय ऱ्हास। सत्त्ववृत्तीचा निजप्रकाश। अतिउल्हास शमदमांचा॥ ६९॥ शमदमांचे निजवृत्ती। संकल्प-विकल्पेंसीं जाती। वाद अतिवाद उपरमती। जेवीं सूर्याप्रती आंधारें॥ ७०॥ सर्वज्ञ ज्ञाते जे गा होती। ते नाना तत्त्वांच्या तत्त्वोक्ती। स्वयें विवंचूं जाणती। ऐक तुजप्रती सांगेन॥ ७१॥
परस्परानुप्रवेशात्तत्त्वानां पुरुषर्षभ।
पौर्वापर्यप्रसंख्यानं यथा वक्तुर्विवक्षितम्॥ ७॥
गुरूपाशीं शास्त्रपाठा। करूनि साधिली निजनिष्ठा। ऐक उद्धवा पुरुषश्रेष्ठा। प्रियवरिष्ठा प्रियोत्तमा॥ ७२॥ तत्त्वगणनेचे जे जे लेख। एकाचें थोडें एकाचें अधिक। हा ‘अनुप्रवेश’ वोळख। एकामाजीं एक उपजती॥ ७३॥ तत्त्वांपासूनि तत्त्वें होतीं। कारणरूपें कार्याची स्थिती। अंतीं जेथील तेथें प्रवेशती। हे तत्त्वोपपत्ती उद्धवा॥ ७४॥ पूर्वस्थिति जें तें कारण। त्यापासोनि उपजेतें कार्य जाण। हें कार्यकारणांचें लक्षण। तत्त्वविचक्षण बोलती॥ ७५॥ येथ वक्त्याचें जैसें मनोगत। तैशी तत्त्वसंख्या होत। कार्य-कारण एकत्व गणित। तत्त्वसंख्या तेथ थोडीच॥ ७६॥ एकचि कार्य आणि कारण। गणितां आणिती भिन्न-भिन्न। तेथ तत्त्वसंख्या अधिक जाण। होय गणन उद्धवा॥ ७७॥ एवं कार्यकारणें भिन्नभिन्नें। तत्त्वसंख्या थोडी बहुत होणें। हीं तत्त्ववक्त्यांचीं लक्षणें। तुज सुलक्षणें सांगितलीं॥ ७८॥ येचि विषयींची उपपत्ती। स्वयें सांगताहे श्रीपती। कार्यकारणनिजयुक्ती। उद्धवाप्रती निवाडे॥ ७९॥
एकस्मिन्नपि दृश्यन्ते प्रविष्टानीतराणि च।
पूर्वस्मिन्वा परस्मिन्वा तत्त्वे तत्त्वानि सर्वश:॥ ८॥
आकाशापासूनि वायु झाला। तो गगनावेगळा नाही गेला। वायूपासूनि अग्नि झाला। तेथप्रवेशु आला दोंहीचा॥ ८०॥ अग्नीपासून आला जळरस। त्यामाजीं तिंहीचा रहिवास। जळापासून पृथ्वीचा प्रकाश। ती माजीं प्रवेश चहूंचा॥ ८१॥ तैसें कार्य आणि कारण। परस्परें अभिन्न जाण। जेवीं लेणें आणि सुवर्ण। वेगळेंपण एकत्वें॥ ८२॥ जेवीं तंतु आणि पट। दोनी दिसती एकवट। तेवीं कार्यकारण सगट। दिसे स्पष्ट अभिन्न॥ ८३॥ साकरेचीं नारळें केळीं। परी तीं साकरत्वा नाहीं मुकलीं। तेवीं कारणांचीं कार्यें झाली। असतां संचलीं कारणत्वें॥ ८४॥ जेवीं कां पृथ्वीचा मृत्पिंड। मृत्पिंडीं अनेक भांड। होतां गाडगीं उदंड। मृत्तिका अखंड सर्वांमाजीं॥ ८५॥ तेवीं कारणीं कार्यविशेषु। कार्यासी कारणत्वें प्रकाशु। हा परस्परानुप्रवेशु। अनन्य विलासु अखंडत्वें॥ ८६॥ एक कार्य आणि कारण। होय भिन्न आणि अभिन्न। तेणें तत्त्वसंख्यालक्षण। घडे जाण न्यूनाधिक॥ ८७॥
पौर्वापर्यमतोऽमीषां प्रसङ्खॺानमभीप्सताम्।
यथा विविक्तं यद्वक्त्रं गृह्णीमो युक्तिसम्भवात्॥ ९॥
म्या सांगितली तैशी जाण। तत्त्वसंख्या अधिक न्यून। व्हावया हेंचि कारण। वक्त्याची ज्ञानविवक्षा॥ ८८॥ जैसें ज्यासी असे ज्ञान। जैसा ईप्सित मताभिमान। तैसतैसें तत्त्वव्याख्यान। ऋषीश्वर जाण बोलती॥ ८९॥ जो बोले ज्या मतयुक्ती। तें तें घडे त्या मतसंमतीं। हें मी जाणें सर्वज्ञ श्रीपती। यालागीं त्या युक्ती मीही मानीं॥ ९०॥ जें बोलिले ऋषिजन। सव्वीस तत्त्वें विवंचून। उद्धवा तुज मी सांगेन। सावधान अवधारीं॥ ९१॥
अनाद्यविद्यायुक्तस्य पुरुषस्यात्मवेदनम्।
स्वतो न सम्भवादन्यस्तत्त्वज्ञो ज्ञानदो भवेत्॥ १०॥
प्रकृतिपुरुषमहत्तत्त्व येथें। अहंकार आणि महाभूतें। इंद्रियें विषयसमेतें। यें तत्त्वें निश्चितें पंचवीस॥ ९२॥ येथ पुरुषाहोनिया भिन्न। जीव वेगळा करूनि जाण। तत्त्वसंख्यालक्षण। केलीं संपूर्ण सव्वीस॥ ९३॥ जीवाच्या भिन्नत्वाचें कारण। अनादि अविद्येस्तव जाण। घेऊनि ठेला देहाभिमान। कर्मबंधन दृढ झालें॥ ९४॥ अहंकर्तेपणाचा खटाटोप। तेणें अंगीं आदळे पुण्यपाप। विसरला निजरूप। विषयलोलुप्य वाढवितां॥ ९५॥ लागलें बद्धतेचें बंधन। न करवे कर्मपाशच्छेदन। त्याच्या उद्धारालागीं जाण। ज्ञानदाता सर्वज्ञ ईश्वर॥ ९६॥ गुरुद्वारा पाविजे ज्ञान। तेथें ईश्वराचा आभार कोण। येथ ईश्वरकृपेवीण। सद्गुरु जाण भेटेना॥ ९७॥ झालिया सद्गुरुप्राप्ती। ईश्वरकृपेवीण न घडे भक्ती। सद्गुरु तोचि ईश्वरमूर्ती। वेदशास्त्रार्थीं संमत॥ ९८॥ गुरु-ईश्वरां भिन्नपण। ऐसें देखे तो नागवला आपण। एवं ईश्वरानुग्रहें जाण। ज्ञानसंपन्न होय जीवु॥ ९९॥ गुरूंनीं सांगितली ज्ञानस्थिती। ते ईश्वरकृपेवीण चित्तीं। ठसावेना साधकांप्रती। जाण निश्चितीं उद्धवा॥ १००॥ जीव नियम्य ईश्वर नियंता। जीव अज्ञान ईश्वर ज्ञानदाता। जीव परिच्छिन्न एकदेशिता। ईश्वर सर्वथा सर्वगत॥ १॥ जीव हीन दीन अज्ञान। ईश्वर समर्थ सर्वज्ञ। जीवास दृढ कर्मबंधन। ईश्वर तो जाण निष्कर्म॥ २॥ एवं ईश्वरकृपें जाण। जीवासी प्राप्त होय ज्ञान। यालागीं ईश्वराहून। जीव भिन्न या हेतू॥ ३॥ म्हणशी करितां कर्माचरण। जीवासी प्राप्त होईल ज्ञान। हें सर्वथा न घडे जाण। जडत्वपण कर्मासी॥ ४॥ कर्मा जडत्व जाण। त्यासी बहुत अज्ञान। त्या कर्मासी अत्यंत बद्धपण। हें सज्ञान जाणती॥ ५॥ कर्म स्वरूपें जड अचेतन। त्यासी चेतविता ईश्वर जाण। तें न करितां ईश्वरार्पण। ज्ञानदाता कोण कर्मासी॥ ६॥ कर्मासी जडत्वें नाहीं सत्ता। कर्मक्रियेचा ईश्वर ज्ञाता। ईश्वरचि कर्मफळदाता। कर्म चेतविता ईश्वरु॥ ७॥ ज्ञान तोचि ईश्वर। तेणें रचिला हा विस्तार। संहारितां तोचि निर्धार। सत्तामात्र ईश्वर जाणावा॥ ८॥ जीवासी ज्ञानसायुज्यता। कां स्वर्गभोगफळदाता। अथवा इहलोकीं वर्तविता। जीवासी तत्त्वतां ईश्वरु॥ ९॥ यापरी अवश्य जाण। जीव ईश्वर करितां भिन्न। तत्त्वें सव्वीस संपूर्ण। बोलिले ब्राह्मण या हेतू॥ ११०॥ पंचवीस तत्त्वांची कथा। ते जीवेश्वरांची ऐक्यता। तेही सांगेन मी आतां। त्यांच्या मता संमत॥ ११॥
पुरुषेश्वरयोरत्र न वैलक्षण्यमण्वपि।
तदन्यकल्पनापार्था ज्ञानं च प्रकृतेर्गुण:॥ ११॥
जीवेश्वरांची ऐक्यता। सहजचि असे स्वभावतां। तेथ अणुमात्र भेदवार्ता। न रिघे सर्वथा निश्चित॥ १२॥ स्वभावें पाहतां दर्पण। एकाचें देखिजे दोन्हीपण। परी द्विधा नव्हेचि आपण। यापरी जाण जीवशिव॥ १३॥ अज्ञानप्रतिबिंब तें जीव। त्याचा द्रष्टा तो सदाशिव। तरी ऐक्यतेचें जें वैभव। तो निजस्वभाव मोडेना॥ १४॥ जेवीं दर्पणामाजीं आपण। तेवीं जीवरूपें शिवुचि जाण। दोनी चेतनत्वें समान। तेंही लक्षण अवधारीं॥ १५॥ जैशी चेष्टा कीजे आपण। तेचि प्रतिबिंबीं दिसे जाण। तेवीं ईश्वरसत्ता सचेतन। गमनागमन जीवासी॥ १६॥ जेणें स्वरूपें असे आपण। तद्रूप प्रतिबिंबीं दिसे जाण। तेवीं ईश्वरत्व संपूर्ण। असे अविच्छिन्न जीवामाजीं॥ १७॥ जैसा अग्नि राखां झांकोळिला। तरी अग्नि अग्निपणें असे संचला। तेवीं शिवासी जीवभावो आला। परी नाहीं मुकला निजत्वा॥ १८॥ आशंका॥ ‘‘हो कां जीव शिव दोनी एक। तरी एक मलिन एक चोख। तैसे सदोख आणि निर्दोख। हे विशेख कां दिसती’’॥ १९॥ थिल्लरीं प्रतिबिंबला सविता। त्या प्रतिबिंबाअंगीं सर्वथा। थिल्लरींचे मळ पाहतां। दिसती तत्त्वतां लागलेसे॥ १२०॥ तेचि निर्वाळूनि पाहतां वेगीं। बिंबप्रतिबिंबनियोगीं। सर्वथा मळ न लगे अंगीं। उभयभागीं विशुद्ध॥ २१॥ आरशाअंगीं टिकले मळ। सुबद्ध बैसले बहुकाळ। ते प्रतिबिंबाअंगीं केवळ। दिसती प्रबळजडलेसे॥ २२॥ तो मळ जैं पडे फेडावा। तैं आरिसा साहणे तोडावा। परी प्रतिबिंब केव्हां। साहणे धरावा हें बोलूं नये॥ २३॥ तेवीं सदोष आणि निर्दोष। केवळ अविद्याचि हे देख। जीव शिव उभयतां चोख। नित्य निर्दोख निजरूपें॥ २४॥ पाहतां शुद्धत्वें स्फटिक जैसा। जे रंगीं ठेवावा दिसे त्याऐसा। स्वयें अलिप्त जैसातैसा। जीव स्वभावतां तैसाचि॥ २५॥ जीव स्वयें चित्स्वरूप। जे गुणीं मिळे दिसे तद्रूप। परी गुणदोष पुण्यपाप। जीवासी अल्प लागेना॥ २६॥ प्रत्यक्ष प्रतिबिंबीं मिथ्यता। दिसे निजबिंबाचिया सत्ता। तेवीं जीवशिवांसी अभिन्नता। जाण तत्त्वतां निश्चित॥ २७॥ जीवशिवांचें एकपण। तेणें सव्विसांमाजीं जाण। एक तत्त्व होतां न्यून। शेष तेंचि पूर्ण पंचवीस॥ २८॥ आशंका॥ ‘‘जीवशिवांचें एकपण। ऐसें जें जाणणें तें ‘ज्ञान’। तें एक तत्त्व येथें आन। त्यांमाजीं जाण उपजलें॥ २९॥ तें ज्ञानतत्त्व अंगीकारितां। पंचवीस सव्वीस तत्त्वकथा। दोनी मतें होती वृथा’’। ऐसें सर्वथा न म्हणावें॥ १३०॥ येथ मूळींचें निरूपण। श्लोकाचे अंतींचा चरण। ज्ञान तें प्रकृतीचा गुण। त्यासी वेगळेपण असेना॥ ३१॥ गुणकर्मांच्या खटपटा। प्रपंच अज्ञानें अतिलाठा। ज्ञान अज्ञानाचा सत्त्ववांटा। जेवीं कांटेनि कांटा फेडिजे॥ ३२॥ शोधित जो सत्त्वगुण। त्या नांव बोलिजे मुख्य ‘ज्ञान’। तेंही गुणांमाजीं पडे जाण। वेगळेंपण नव्हेचि तत्त्व॥ ३३॥ ज्ञान स्वतंत्र तत्त्व होतें। तरी नासतीं दोनी मतें। तें पडे गुणाआंतौतें। यालागीं दोनी मतें निर्दुष्ट॥ ३४॥ तेचि त्रिगुणांची व्यवस्था। तुज मी सांगेन आतां। ऐक उद्धवा तत्त्वतां। गुण सर्वथा आविद्यक॥ ३५॥
प्रकृतिर्गुणसाम्यं वै प्रकृतेर्नात्मनो गुणा:।
सत्त्वं रजस्तम इति स्थित्युत्पत्त्यन्तहेतव:॥ १२॥
उत्पत्तिस्थितिनिर्दळण। हें त्रिगुणांचें कार्य पूर्ण। ‘गुणसाम्य’ ते प्रकृति जाण। आत्मा‘निर्गुण’ गुणातीत॥ ३६॥ म्हणशी परमात्मा गुणातीत। परी जीवात्मा गुणग्रस्त। हेही गा मिथ्या मात। ऐक वृत्तांत सांगेन॥ ३७॥ चंद्र निश्चळ निजस्वभावें। तो चाले त्या अभ्रासवें। दिसे जेवीं सवेग धांवे। तेवीं गुणस्वभावें जीवात्मा॥ ३८॥ घटामाजीं उदक भरितां। घटाकाश भिजेना सर्वथा। तेवीं जीवात्मा गुणीं वर्ततां। अलिप्तता गुणकर्मीं॥ ३९॥ जीव अहंकर्तेपणीं विख्यात। तो केवीं म्हणावा कर्मातीत। येचि अर्थीं कृष्णनाथ। विशदार्थ सांगत॥ १४०॥
सत्त्वं ज्ञानं रज: कर्म तमोऽज्ञानमिहोच्यते।
गुणव्यतिकर: काल: स्वभाव: सूत्रमेव च॥ १३॥
सत्त्वगुणास्तव ‘ज्ञान’। रजोगुणें ‘कर्म’ जाण। मोह आलस्ययुक्त गहन। तमीं ‘अज्ञान’ नांदत॥ ४१॥ सत्त्वादि जे तिन्ही गुण। केवळ प्रकृतीचे हे जाण। यांसी स्वतंत्रपण। नव्हेचि जाण या हेतू॥ ४२॥ गुणक्षोभक ‘काळ’ देख। तो पुरुषाचा अवलोक। पुरुष काळ हा नामविशेख। स्वरूपें एक हे दोन्ही॥ ४३॥ स्वाभाविक मायेचें स्फुरण। प्रथम कार्य जें निर्माण। त्या नांव ‘महत्तत्त्व’ जाण। ‘सूत्र’ ‘प्रधान’ ज्यासी म्हणती॥ ४४॥ यालागीं प्रकृतीहूनि भिन्न। यासी न ये वेगळेंपण। हे प्रकृति कार्यकारणीं अभिन्न। तत्त्वविचक्षण मानिती॥ ४५॥ अठ्ठावीस तत्त्वें पूर्वोक्त। हें भगवंताचें निज मत। तेंचि अडीचा श्लोकीं सांगत। संख्यातत्त्वार्थ निजबोधें॥ ४६॥
पुरुष: प्रकृतिर्व्यक्तमहङ्कारो नभोऽनिल:।
ज्योतिराप: क्षितिरिति तत्त्वान्युक्तानि मे नव॥ १४॥
प्रकृति पुरुष महत्तत्त्व। महाभूतें अहंभाव। अठ्ठाविसांत हीं तत्त्वें नव। इतर वैभव तें ऐक॥ ४७॥
श्रोत्रं त्वग्दर्शनं घ्राणो जिह्वेति ज्ञानशक्तय:।
वाक्पाण्युपस्थपाय्वङ्घ्रि कर्माण्यङ्गोभयं मन:॥ १५॥
मुख्य ‘ज्ञानेंद्रियें’ पांच जाण। पांच ‘कर्मेंद्रियें’ आन। सर्वेंद्रियें ज्ञानेंद्रियांअधीन। स्वतां गमन त्यां नाहीं॥ ४८॥ आंधळें पायीं चालों जाणे। पांगुळ केवळ देखणें। अंधें पंगू खांदीं घेणें। परी बोलें वर्तणें देखण्याचेनि॥ ४९॥ तेवीं ज्ञानेंद्रियां कर्मेंद्रियांसी। संगती घडली असे तैशी। यालागीं मुख्यत्वें ज्ञानेंद्रियांसी। हृषीकेशी बोलिला॥ १५०॥ उभय इंद्रियां चाळक। तें मनचि गा एकलें एक। येणेंचि अकरा इंद्रियें देख। यदुनायक सांगत॥ ५१॥ इंद्रियविषयनिरूपण। स्वयें सांगताहे नारायण। मुख्यत्वें विषय पांच जाण। तयाचें साधन गत्यादिक॥ ५२॥
शब्द: स्पर्शो रसो गन्धो रूपं चेत्यर्थजातय:।
गत्युक्त्युत्सर्गशिल्पानि कर्मायतनसिद्धय:॥ १६॥
रसस्पर्शादि लक्षण। पांचही विषय हे जाण। गत्यादि क्रियाचरण। तें जाण साधन या विषयांचें॥ ५३॥ दृष्टि रूपातें प्रकाशी। चरण धांवती तयापाशीं। हस्त उद्यत घ्यावयासी। रसस्पर्शसिद्धीसी विषयांचे॥ ५४॥ एवं उभय इंद्रियीं जाण। विषय पांचचि प्रमाण। नव्हे अधिक तत्त्व गणन। स्वयें श्रीकृष्ण सांगत॥ ५५॥ नव एकादश तत्त्वलक्षण। मागां दों श्लोकीं केलें निरूपण। येणें श्लोकें परम प्रमाण। विषय जाण पांचचि॥ ५६॥ केवळ ज्ञानेंद्रियीं भोगु नव्हे। कर्मेंद्रियींही भोग न फावे। उभयसंयोगें भोग पावे। परी विषय आघवे पांचचि॥ ५७॥ इंहीं पांच विषयीं आपण। व्यापिलें चतुर्दश भुवन। सुरासुर भुलविले जाण। यांचें गोडपण मारक॥ ५८॥ जेवीं कां मैंद गोडपणें। संगतीं लागोनि जीव घेणें। तेवीं विषयसंगाचें साजणें। बांधोनि नेणें नरकासी॥ ५९॥ नरकीं निरय भोगिती। तेथही न सोडी विषयासक्ती। या विषयांऐसा विश्वासघाती। आन त्रिजगतीं असेना॥ १६०॥ ते हे पंच विषय प्रमाण। पांचचि परी अतिदारुण। ब्रह्मादिक नाडले जाण। इतरांचा कोण पडिपाडु॥ ६१॥ विषयांचें जें गोडपण। तें विखाहूनि दारुण। विष एकदां आणी मरण। पुन: पुन: मारण विषयांचें॥ ६२॥ पुढती जन्म पुढती मरण। हें विषयास्तव घडे जाण। संसाराचें सबळपण। विषयाधीन उद्धवा॥ ६३॥ जेथ विषयांचा विषयत्यागु। तेथें उन्मळे भवरोगु। त्याचा आंदणा मी श्रीरंगु। ज्यासी विषयभोगु नावडे॥ ६४॥ ते हे पंच विषय गा जाण। तुज म्यां केले निरूपण। आतां त्रिगुणांचें लक्षण। ऐक सावधान सांगतों॥ ६५॥ उत्पत्तिस्थितिनिर्दळण। त्रिगुणांस्तव घडे जाण। यालागीं स्वयें श्रीकृष्ण। तिन्ही गुण अंगीकारी॥ ६६॥ अंगीकारूनि तिन्ही गुण। अठ्ठावीस तत्त्वें केलीं पूर्ण। हें कृष्णसंमत लक्षण। उद्धवा जाण निश्चित॥ ६७॥ त्रिगुणगुणेंवीण प्रकृती। सृष्टिसर्जनीं नाहीं शक्ती। गुणद्वारा उत्पत्तिस्थिती। संहारी अंतीं स्वकार्यें॥ ६८॥ तेचि अर्थींचें निरूपण। स्वयें सांगताहे श्रीकृष्ण। कार्यकारणलक्षण। यथार्थ जाण विभाग॥ ६९॥
सर्गादौ प्रकृतिर्ह्यस्य कार्यकारणरूपिणी।
सत्त्वादिभिर्गुणैर्धत्ते पुरुषोऽव्यक्त ईक्षते॥ १७॥
प्रकृतीपासाव विकारमेळा। त्रिगुणांचिया गुणलीळा। सात कारणें कार्यें सोळा। ऐक वेगळा विभाग॥ १७०॥ महदहंकारमहाभूतें। सातही ‘कारणें’ निश्चितें। अकरा इंद्रियें विषययुक्तें। जाणावीं येथें ‘कार्यें’ सोळा॥ ७१॥ यापरी निजप्रकृती। रजोगुणातें धरोनि हातीं। कार्यकारणांचिया युक्तीं। करी उत्पत्ती सृष्टीची॥ ७२॥ सृजिलिये सृष्टीसी जाण। सत्त्वगुणें करी पालन। तमोगुण निर्दळण। प्रकृति आपण स्वयें करी॥ ७३॥ पुरुषें न करितां ‘ईक्षण’। उत्पत्ति स्थिति निर्दळण। प्रकृतीचेनि नव्हे जाण। तेंही उपलक्षण अवधारीं॥ ७४॥ हात पाय न लावितां जाण। केवळकूर्मीचें अवलोकन। करी पिलियांचें पालन। तैसें ईक्षण पुरुषाचें॥ ७५॥ कां सूर्याचिया निजकिरणीं। जेवीं अग्नीतें स्रवे मणी। तेणें स्वधर्मकर्में ब्राह्मणीं। कीजे यज्ञाचरणीं महायागु॥ ७६॥ तैसें हें जाण चिन्ह। येणें होय कार्य कारण। चाले स्वधर्मआचरण। यापरी जाण उद्धवा॥ ७७॥ ऐसें चालतां प्रकृतिपर। ब्राह्मण करिती स्वाचार। तेणें वृद्धि कर्माचार। परापर उद्धवा॥ ७८॥ तेवीं पुरुषाचें ईक्षण। प्रकृति लाहोनि आपण। उत्पत्ति-स्थिति-निर्दळण। करावया पूर्ण सामर्थ्य पावे॥ ७९॥ छायामंडपींचें विचित्र सैन्य। दिसावया दीपचि कारण। तेवीं प्रकृतिकार्यासी जाण। केवळ ईक्षण पुरुषाचें॥ १८०॥ जगाचें आदिकारण। प्रकृति होय गा आपण। प्रकृति प्रकाशी पुरुष जाण। तो महाकारण या हेतु॥ ८१॥ प्रकृति व्यक्त पुरुष अव्यक्त। हे विकारी तो विकाररहित। हे गुणमयी गुणभरित। तो गुणातीत निजांगें॥ ८२॥ प्रकृति स्वभावें चंचळ। पुरुष अव्ययत्वें अचळ। प्रकृति बद्धत्वें शबळ। पुरुष केवळ बंधातीत॥ ८३॥ प्रकृति स्वभावें सदा शून्य। पुरुष केवळ चैतन्यघन। प्रकृतीस होय अवसान। पुरुष तो जाण अनंत॥ ८४॥ प्रकृति केवळ निरानंद। यालागीं तेथ विषयच्छंद। पुरुष पूर्ण परमानंद। विषयकंदच्छेदक॥ ८५॥ प्रकृतिपुरुषांचें वेगळेंपण। तुज म्यां सांगितलें संपूर्ण। हेचि परमार्थाची निजखूण। पुरुष तो भिन्न प्रकृतीसी॥ ८६॥ तेंचि जाणावया विशद। नाना मतांचे मतवाद। त्या मतांचा मतप्रबोध। तुज मी शुद्ध सांगेन॥ ८७॥
व्यक्तादयो विकुर्वाणा धातव: पुरुषेक्षया।
लब्धवीर्या: सृजन्त्यण्डं संहता: प्रकृतेर्बलात्॥ १८॥
पुरुषेक्षण झालिया प्राप्त। महदहंकारादि पदार्थ। प्रकृतिबळें समस्त। एकत्र होत ब्रह्मांडें॥ ८८॥ पुरुषावलोकें वीर्यप्राप्ती। लाहोनि ब्रह्मांडांतें धरिती। यालागीं यातें ‘धातु’ म्हणती। जाण निश्चितीं उद्धवा॥ ८९॥ हें सामान्यतां निरूपण। तुज म्यां सांगितलें आपण। जे नाना मतवादी जाण। विशेष लक्षण बोलती॥ १९०॥
सप्तैव धातव इति तत्रार्था: पञ्च खादय:।
ज्ञानमात्मोभयाधारस्ततो देहेन्द्रियासव:॥ १९॥
पंचवीस सव्वीस तत्त्वगणन। मागां सांगितलें निरूपण। आतां साता तत्त्वांचें लक्षण। ऐक सुलक्षण सांगेन॥ ९१॥ महाभूतें जीव शिव। हा सातां तत्त्वांचा जाण भाव। प्राणेंद्रियसमुदाव। याचिपासाव पैं होत॥ ९२॥ महाभूतें अचेतन। यांसी चेतविता जीव जाण। त्याचाही द्रष्टा परिपूर्ण। ईश्वर जाण सातवा॥ ९३॥ माया महत्तत्त्व अहं जें येथ। हें सूक्ष्मकारणें निश्चित। यांपासोनि स्थूळ भूतें होत। कारणें कार्यांत सबाह्य॥ ९४॥ मनइंद्रियादि जें कां येथें। तेंही यांत अंतर्भूतें। एवं जाण येणें मतें। पांच महाभूतें नेमिलीं॥ ९५॥ यांसी चेतविता जीव। सर्वनियंता सदाशिव। एवं सप्ततत्त्वसमुदाव। तो हा उगव उद्धवा॥ ९६॥ आतां सहा तत्त्वें ये पक्षीं जाण। तुज मी सांगेन निरूपण। जें बोलिले ऋषिजन। तें विवंचन अवधारीं॥ ९७॥
षडित्यत्रापि भूतानि पञ्च षष्ठ: पर: पुमान्।
तैर्युक्त आत्मसम्भूतै: सृष्ट्वेदं समुपाविशत्॥ २०॥
पाहें पां पंच महाभूतें। पुरुषें सृजिलिया येथें। स्वयें प्रवेशला तेथें। यालागीं त्यातें ‘षट्’ म्हणती॥ ९८॥ ज्यांचेनि मतें तत्त्वें चारी। तयांची ऐक नवलपरी। जो देखे प्रत्यक्षाकारीं तोचि धरी तत्त्वार्थ॥ ९९॥
चत्वार्येवेति तत्रापि तेज आपोऽन्नमात्मन:।
जातानि तैरिदं जातं जन्मावयविन: खलु॥ २१॥
प्रत्यक्ष देखिजेती नयनीं। अग्नि आप आणि अवनी। तींचि सत्यत्वें मानी। मतज्ञानी मतवादी॥ २००॥ या स्थूळातें चेतविता। तो आत्मा घेतला चौथा। या तिहींवीण साकारता। न घडे सर्वथा सृष्टीसी॥ १॥ नाम रूप क्रिया कारण। सृष्टीसी मुख्यत्वें यांचेनि जाण। यालागीं भूतें तीनचि प्रमाण। बोलतें लक्षण तें ऐसें॥ २॥ एवं भूतें तीन, आत्मा चौथा। हे चौं तत्त्वांची व्यवस्था। आतां सतरा तत्त्वांची कथा। ऐक तत्त्वतां सांगेन॥ ३॥
संख्याने सप्तदशके भूतमात्रेन्द्रियाणि च।
पञ्च पञ्चैकमनसा आत्मा सप्तदश: स्मृत:॥ २२॥
पंच विषय पंच भूतें। पांच इंद्रियें घेतलीं येथें। मन आत्मा मेळवूनि तेथें। केलीं निश्चितें सतरा हीं॥ ३॥ यापरी तूं गा जाण। सोळा तत्त्वांचें निरूपण। तेथेंचि त्रयोदशलक्षण। स्वयें नारायण सांगत॥ ४॥
तद्वत् षोडशसंख्याने आत्मैव मन उच्यते।
भूतेन्द्रियाणि पञ्चैव मन आत्मा त्रयोदश॥ २३॥
सतरा तत्त्वांचें निरूपण। तुज सांगीतलें संपूर्ण। त्यांत मन आत्मा एक जाण। तेंही लक्षण अवधारीं॥ ५॥ जेवीं कां कथा सांगतां आपण। स्वभावें हात हाले जाण। तेवीं मनाचें चंचळपण। स्वभावें जाण होतसे॥ ६॥ राजा सिंहासनीं बैसला। तो राजत्वें पूज्य झाला। वसंत खेळतां धांविन्नला। तरी काय मुकला राज्यपदा॥ ७॥ जेवीं काळें क्षोभला अतिथोर। तरी तो बोलिजे सागर। कां निश्चळ राहिलिया नीर। तरी समुद्र समुद्रत्वें॥ ८॥ तेवीं मनपणें अतिचंचळ। कां आत्मत्वें निजनिश्चळ। दोहींपरी अविकळ। जाण केवळ परमात्मा॥ ९॥ यालागीं मनाचें जें मनपण। आत्मसाक्षात्कारेंवीण। कोणासी न कळेचि गा जाण। हें मुख्य लक्षण मनाचें॥ २१०॥ मन आत्म्यांचें उभय ऐक्य। तेंचि सतरांमाजीं उणें एक। उरलीं तीं आवश्यक। सोळा हीं देख निजतत्त्वें॥ ११॥ पांच इंद्रियें पंच महाभूतें। अकरावें मन ठेवूनि तेथें। जीव शिव दोनी घेऊनि येथें। केलीं निश्चितें तेराचि॥ १२॥ आणिकही नाना तत्त्वमतें। मागां पुशिलीं तुवां मातें। तींही सांगेन मी तूतें। सुनिश्चितें उद्धवा॥ १३॥
एकादशत्व आत्मासौ महाभूतेन्द्रियाणि च।
अष्टौ प्रकृतयश्चैव पुरुषश्च नवेत्यथ॥ २४॥
अकरा तत्त्वें बोलिलीं येथें। पांच इंद्रियें पंच महाभूतें। जीव शिव आणि मनातें। एकत्वें येथें गणिलीं देख॥ १४॥ दृति मृदु आणि पिंवळा। एकत्वें जेवीं चांपेकळा। सुवाससुस्वाद सुनीळा। एकत्र मेळा आम्रफळीं॥ १५॥ तेवीं जीव शिव आणि मन। तिन्ही एकरूपचि जाण। जेवीं हेममणी संपूर्ण। हेमसूत्रीं सज्ञान ओंविती॥ १६॥ पंच इंद्रियें पंच महाभूतें। जीव शिव मन एकात्मते। एकादश तत्त्वें येथें। जाण निश्चितें या हेतू॥ १७॥ प्रकृति पुरुष महदहंकार। पंच महाभूतें अविकार। सकळ विकारसंभार। यामाजीं साचार अंतर्भूत॥ १८॥ एवं ऋषिश्वरांच्या व्युत्पत्ती। तत्त्वविवक्षा उपपत्ती। नव तत्त्वसंख्यायुक्ती। जाण या रीतीं उद्धवा॥ १९॥ एक बोलती निजज्ञानी। प्रकृति पुरुष तत्त्वें दोनी। आन पाहतां जनींवनीं। तिसरें नयनीं दिसेना॥ २२०॥ जे निश्चयें अतिनिष्टंक। ते म्हणती तत्त्व एक। एक तेंचि अनेक। अनेकीं एक निश्चित॥ २१॥ जेवीं सुवर्णाचें भूषण। भूषणीं स्वयें सुवर्ण। तेवीं अनेकीं एकपण। एकत्वें जाण निश्चित॥ २२॥ जेवीं उंसाची निजगोडी। गूळसाकरेच्या मोडी। तेचि दिसे चढोवढी। तेवीं तत्त्वपरवडी निजतत्त्वें॥ २३॥ त्या जाणावया निजतत्त्वातें। ऋषीश्वरांचीं बहुत मतें। मी स्वल्पचि बोलिलों येथें। येरवीं अगणितें ग्रंथांतरीं॥ २४॥
इति नानाप्रसंख्यानं तत्त्वानामृषिभि: कृतम्।
सर्वं न्याय्यं युक्तिमत्त्वाद्विदुषां किमशोभनम्॥ २५॥
येथ सर्वज्ञ ज्ञाते होती। ते नाना मतें तत्त्वयुक्ती। विवंचोनियां उपपत्ती। विभागूं जाणती यथार्थें॥ २५॥ निजतत्त्व जाणावया जाण। करितां तत्त्वविवंचन। सर्वथा न लगे दूषण। तत्त्वें अधिकन्यून बोलतां॥ २६॥ वस्तुतां विकारांच्या ठायीं। ज्ञात्यासी बोलावया विशेष नाहीं। विकार ते प्रकृतीच्या ठायीं। आत्मा शुद्ध पाहीं अविकारी॥ २७॥ प्रकृतीहूनि आत्मा भिन्न। यालागीं तो अविकारी जाण। विकार प्रकृतीमाजीं पूर्ण। हें मुख्य लक्षण तत्त्वांचें॥ २८॥ प्रकृतीहूनि वेगळेपण। पुरुषांचें जाणावया आपण। यालागीं उद्धवा जाण। तत्त्वविवंचन साधावें॥ २९॥ हें ऐकोनि कृष्णवचन। उद्धव चमत्कारला जाण। प्रकृतिपुरुषांचें भिन्नपण। देवासी आपण पुसों पां॥ २३०॥
उद्धव उवाच
प्रकृति: पुरुषश्चोभौ यद्यप्यात्मविलक्षणौ।
अन्योन्यापाश्रयात्कृष्ण दृश्यते न भिदा तयो:॥
प्रकृतौ लक्ष्यते ह्यात्मा प्रकृतिश्च तथाऽऽत्मनि॥ २६॥
प्रकृति पुरुष भिन्नभिन्न। येचि अर्थीं उद्धवें जाण। साडेतीन श्लोकीं अगाध प्रश्न। देवासी आपण पुसत॥ ३१॥ प्रकृतीहूनि पुरुष भिन्न। हें ऐकोनि देवाचें वचन। प्रकृतिपुरुषां वेगळा श्रीकृष्ण। हा द्रष्टा संपूर्ण दोहींचा॥ ३२॥ म्हणे ऐक श्रीकृष्णा श्रेष्ठा। हे प्रकृतिपुरुषांची चेष्टा। तूं वेगळेपणें देखणा द्रष्टा। सुरवरिष्ठा श्रीपती॥ ३३॥ प्रकृति पुरुष दोनी भिन्न। एक जड एक चेतन। हें मजही कळतसे जाण। परी वेगळेपण लक्षेना॥ ३४॥ जैसा तप्तलोहाचा गोळ। दिसे अग्नीचि केवळ। तेवीं प्रकृतिपुरुषांचा मेळ। दिसे सबळ एकत्वें॥ ३५॥ जेवीं बीज धरोनियां पोटेंसीं। निकणू कोंडा वाढे कणेंसीं। तेवीं प्रकृति जाण पुरुषेंसीं। अभिन्नतेसीं जडलीसे॥ ३६॥ कां नारळ चोख धरोनि पोटीं। निरस कठिण वाढे नरोटी। तेवीं पुरुषयोगें प्रकृति लाठी। झाली सृष्टी अनिवार॥ ३७॥ कणावेगळा कोंडा न वाढे। तेवीं पुरुषावेगळी प्रकृति नातुडे। हें प्रकृतिपुरुषांचें बिरडें। तुजवेगळें निवाडें निवडेना॥ ३८॥ जेवीं कां शिंपीचे अंगीं। जडली रुपेपणाची झगी। तेवीं पुरुषाच्या संयोगीं। प्रकृति जगीं भासत॥ ३९॥ तीक्ष्ण रविकरसंबंधीं। भासे मृगजळाची महानदी। तेवीं पुरुषाच्या संबंधीं। प्रकृति त्रिशुद्धी आभासे॥ २४०॥ जेवीं कां नभीं नीलिमा। वेगळी न दिसे सांडूनि व्योमा। तेवीं प्रकृति-पुरुषोत्तमां। वेगळीक आम्हां दिसेना॥ ४१॥ मुख्य देहाचें जें देहपण। तेंचि प्रकृतीचें बाधकत्व जाण। या देहाहोनियां भिन्न। पुरुषाचें भान दिसेना॥ ४२॥ अहंप्रत्ययें आत्मा म्हणती। तेही देहाकारें स्फुरे स्फूर्ती। देहावेगळी आत्मप्रतीती। न दिसे निश्चितीं गोविंदा॥ ४३॥ डोळा सांडूनि दृष्टि उरे। वाती वेगळा दीप थारे। तैं देहावेगळा आत्मा स्फुरे। साचोकारें गोविंदा॥ ४४॥ जिव्हेवीण रसस्वादू। श्रोत्रेंवीण ऐकवे शब्दू। तैं देहावेगळा आत्मबोधू। होय विशदू गोविंदा॥ ४५॥ कांटेवीण फणस आतुडे। कां सोपटेंवीण ऊंस वाढे। तैं देहावेगळा आत्मा जोडे। वाडेंकोडें गोविंदा॥ ४६॥ तुम्हींच सांगीतली निजात्मखूण। नरदेह ब्रह्मप्राप्तीचें कारण। शेखीं देहावेगळें आत्मदर्शन। केवीं आपण प्रतिपादां॥ ४७॥ आणि आत्म्यावेगळी प्रकृती। सर्व प्रकारें न ये व्यक्ती। रूपावेगळी छाया केउती। कैशा रीतीं आभासे॥ ४८॥ गोडीवेगळी साकर होये। परिमळा वेगळा कापूर राहे। तैं आत्म्यावेगळी पाहें। प्रकृति लाहे अभिव्यक्ती॥ ४९॥ गगनावेगळा घट राहे। तंतूवेगळा पट होये। तैं आत्म्यावेगळी पाहें। प्रकृति लाहे अभिव्यक्ती॥ २५०॥ गोडीवेगळा वाढे ऊंस। कणेंवीण जैं वाढे भूस। तैं आत्म्यावेगळी रूपस। माया सावकाश व्यक्तीसी ये॥ ५१॥ प्रकृतिलक्षणीं आत्मा लक्षिजे। आत्मेनि प्रकृतीसी प्रकाशिजे। अनादि दोनी इये योग जे। वेगळा लाहिजे बोध केवीं॥ ५२॥ प्रकृतीहूनि आत्मा भिन्न। सर्वथा आम्हां न दिसे जाण। येचि अर्थींची विनवण। उद्धव आपण करीतसे॥ ५३॥
एवं मे पुण्डरीकाक्ष महान्तं संशयं हृदि।
छेत्तुमर्हसि सर्वज्ञ वचोभिर्नयनैपुणै:॥ २७॥
कमलनाभा कमलानना। कमलालया कमलधारणा। कमलाकमली निवासस्थाना। कमलनयना श्रीकृष्णा॥ ५४॥ प्रकृतिपुरुषयोग अवघड। योग्यां न कळे भिन्न निवाड। या संशयाचें अतिजाड। हृदयीं झाड वाढलें॥ ५५॥ हृदयीं संदेहाचीं मूळें। प्रकृतिभूमीं विकल्पजळें। संशयवृक्ष तेणें बळें। वाढला अहंफळें सदा फळित॥ ५६॥ ज्या वृक्षाचीं सदा फळें खातां। जीव न राहे सर्वथा। तेणें संशयाची अधिकता। उसंतू चित्ता पैं नाहीं॥ ५७॥ ऐशिया वृक्षाचें छेदन। कृपेनें करावें आपण। सोडूनि ज्ञान तिख वाग्बाण। करीं निर्दळण निजांगें॥ ५८॥ योगयागशास्त्रपाठें। करितां धर्मकर्म कचाटें। या वृक्षाचें पानही न तुटे। हें कठिणत्व मोठें गोविंदा॥ ५९॥ या वृक्षाचें करितां छेदन। ब्रह्मा झाला संदेहापन्न। तुवां हंसगीत सांगोन। उद्धरिला जाण सुपुत्र॥ २६०॥ मुख्य ब्रह्मयाची ऐशी अवस्था। तेथ इतरांची कोण कथा। या वृक्षाचा छेदिता। तुजवीण सर्वथा आन नाहीं॥ ६१॥ छेद करितां वरिवरी। वासना मुळॺा उरल्या उरी। फांफाईल चौगुण्यापरी। अतिशयें भारी बांबळे॥ ६२॥ याचा समूळ मूळेंसीं कंदू। छेदिता छेदक तूं गोविंदू। तुजवेगळा संशयच्छेदू। भलता प्रबुद्धू करूं न शके॥ ६३॥ म्हणशी संशय हृदयाच्या ठायीं। तेथ शस्त्रांचा रिगमू नाहीं। म्यां छेदावें कैसें कायी। ते अर्थींचे मी पाहीं सांगेन॥ ६४॥ तुझें ज्ञानचक्र अलोलिक। तुझेनि शब्दतेजें अतितिख। समूळ संशयाचें छेदक। तुझें वचन एक गोविंदा॥ ६५॥ ऐसें तुझे ज्ञानवचन। तुवां केलिया कृपावलोकन। समूळ संशयाचें निर्दळण। सहजेंचि जाण होताहे॥ ६६॥ तरी तुवां श्रीमुकुंदा। फेडावी माझी संशयबाधा। तया उद्धवाचिया शब्दा। गोपीराद्धा सांगेन म्हणे॥ ६७॥ असतां बहुसाल सज्ञान। सकळ संशयांचें निर्दळण। मीचि कर्ता हें काय कारण। तेंही लक्षण अवधारीं॥ ६८॥
त्वत्तो ज्ञानं हि जीवानां प्रमोषस्तेऽत्र शक्तित:।
त्वमेव ह्यात्ममायाया गतिं वेत्थ न चापर:॥ २८॥
अतर्क्य तुझी मायाशक्ती। त्या आवरूनि आनंदस्फूर्ती। दृढ लावूनि विषयासक्ती। तेणें जीव होती अज्ञान॥ ६९॥ करितां विषयांचें ध्यान। जीव होय मनाअधीन। त्यास मन करी हीनदीन। अतिकृपण जड मूढ॥ २७०॥ ऐसे केवळ जीव जे अज्ञान। ते तुझ्या कृपाकटाक्षें जाण। झाले गा ज्ञानसंपन्न। हे कृपा पूर्ण पैं तुझी॥ ७१॥ तुझी कृपा झालिया परिपूर्ण। करूनि मायेचें निर्दळण। जीव होती ब्रह्म पूर्ण। तुझेनि जाण श्रीकृष्णा॥ ७२॥ म्हणशी माझे गांठीं जाण। नाहीं ज्ञान ना अज्ञान। तरी तूं ज्ञानदाता आपण। झालासी पूर्ण तें ऐक॥ ७३॥ धातासवितासनत्कुमारांसी। नारदप्रऱ्हादअंबरीषांसी। कालीं उपदेशिलें अर्जुनासी। ऐसा तूं होसी ज्ञानदाता॥ ७४॥ म्हणसी बहुत असती सज्ञान। त्यांसी पुसोनि साधावें ज्ञान। तुजवेगळें मायेचें नियमन। त्यांचेनि जाण कदा नोहे॥ ७५॥ मायेची उत्पत्तिस्थिती। मायानिर्दळणी गती। तूं एक जाणता त्रिजगतीं। यालागीं श्रीपती कृपा करीं॥ ७६॥ यापरी उद्धवें विनंती। करूनि प्रार्थिला श्रीपती। तो प्रकृतिपुरुषविभाग युक्तीं। उद्धवाप्रती सांगेल॥ ७७॥ जेवीं सूर्यापाशीं मृगजळ। कां गगनीं उपजे आभाळ। काचभूमिके दिसे जळ। तैशी प्रकृति सबळ पुरुषापाशीं॥ ७८॥ यापरी स्वयें श्रीकृष्ण। प्रकृतिपुरुषनिरूपण। समूळ सांगताहे आपण। तो म्हणें सावधान उद्धवा॥ ७९॥
श्रीभगवानुवाच
प्रकृति: पुरुषश्चेति विकल्प: पुरुषर्षभ।
एष वैकारिक: सर्गो गुणव्यतिकरात्मक:॥ २९॥
प्रकृति पुरुष हे दोनी। सदा अत्यंत वेगळेपणीं। जैसा दिवस आणि रजनी। एक लोपोनी एक प्रबळे॥ २८०॥ दिवस लोपतांचि जाण। अंधकारेंसीं परिपूर्ण। घेऊनियां ताराग्रहगण। रात्री आपण उल्हासे॥ ८१॥ तेवीं लोपतां पुरुषाचें भान। घेऊनि कार्येंसीं कारणगुण। ज्ञानाज्ञानेंसीं परिपूर्ण। प्रकृति जाण थोरावे॥ ८२॥ येथ मुख्यत्वें जो देहाकार। तेंचि प्रकृतीचें दुर्ग थोर। तेथें ठेविला ठाणेदार। देहअहंकार महायोद्धा॥ ८३॥ जो जिवलग विश्वासाचा। प्रकृतीस विश्वास त्याचा। तो नेटका झुंझार दुर्गींचा। भरभारू तेथींचा तो वाहे॥ ८४॥ तेथ अभिमानें आपण। प्रकृतीस निर्भय देऊनि जाण। घालूनि सामग्री विकारभरण। दुर्ग दारुण बळकाविलें॥ ८५॥ ऐक उद्धवा पुरुषश्रेष्ठा। निजप्रकृतीचिया निष्ठा। देहदुर्गीं अभिमान लाठा। जाहला वरिष्ठा या हेतू॥ ८६॥ देहदुर्गीं गुण अहंकार। दुर्गसामग्रीविकार। अवघी प्रकृतीच साचार। तदाकार भासत॥ ८७॥ गगनीं गंधर्वनगर जाण। माडॺा गोपुरें वन उपवन। तैशी प्रकृति आपण। नानाकारें जाण भासत॥ ८८॥ जैशी मृगजळाची सरिता। दुरोनि दिसे प्रवाहतां। तेवीं प्रकृतीची सर्वथा। नानाकारता आभासे॥ ८९॥ ऐसें प्रकृतिदुर्ग महाथोर। तेथें नाना सामग्रीविकार। जे जे घाली अहंकार। ते ऐक साचार सांगेन॥ २९०॥
ममाङ्ग माया गुणमय्यनेकधा
विकल्पबुद्धीश्च गुणैर्विधत्ते।
वैकारिकस्त्रिविधोऽध्यात्ममेक-
मथाधिदैवमधिभूतमन्यत्॥ ३०॥
माझी माया गा आपण। सर्वांगें जाहली तिनी गुण। तेही अभिमानें आपण। निजसत्ता जाण आवरिले॥ ९१॥ तेचि देहदुर्गाभंवतीं जाण। त्रिगुणांचें आगड पूर्ण। तेथें मांडूनि त्रिपुटीविंदाण। मारा दारुण अभिमान करी॥ ९२॥ त्या दुर्गाचें दृढ रक्षण। मुख्यत्वें त्रिपुटीचि जाण। ते त्रिपुटीचें मूळ लक्षण। तुज मी आपण सांगेन॥ ९३॥ अगा उद्धवा बुद्धिमंता। तुज मी सांगेन ऐक आतां। तेथ असती तिनी वाटा। दोनी अव्हाटा एकी नीट॥ ९४॥ त्या मार्गीची उभारणी। सैन्य रचिलें दाही आरणीं। युद्धकार जो निर्वाणीं। तो तेथूनी निरीक्षी॥ ९५॥ तेही मार्ग धरिले चौपाशीं। राखण बैसले तिनी वाटेशीं। तेथ रिघावया सायासीं। ज्ञानियासी काय काज॥ ९६॥ आतां असो इतुली परी। देहदुर्गाची थोर भरोभरी। म्हणे ऐकें गा यया थोरी। उद्धवातें हरि सांगत॥ ९७॥ कार्य कारण कर्तव्यता। कर्म क्रिया अहंकर्ता। ध्येय ध्यान विषयध्याता। दुर्ग सर्वथा दृढ केलें॥ ९८॥ तेथ भोग्य भोग भोक्ता। कर्म कार्य आणि कर्ता। अभिमान जाहला वसता। प्रकृतिसंमतासंयोगें॥ ९९॥ तेथ चोरद्वाराचिया लक्षीं। उघडूनि कामक्रोध खिडकी। घाला घालितां एकाएकीं। सकळ लोकीं कांपिजे॥ ३००॥ त्यांचा घेऊनिया भेदरा। तापस पळाले सैरा। लंगोटी सांडिल्याही दिगंबरा। क्रोध थरथरा कांपवी॥ १॥ लोभयंत्राचे कडाडे। तम धूम दाटे चहूंकडे। महामोहाचें गडद पडे। मागेंपुढें दिसेना॥ २॥ दुर्गा सभोंवतीं नवद्वारें। नवद्वारीं नवही यंत्रें। तेणें तेणें यंत्रद्वारें। विषय महामारें मारिती॥ ३॥ देहाभिमानाचें चाळक। मुख्यत्वें मनचि एक। तें दुर्धर महामारक। दुर्गअटक तेणें केलें॥ ४॥ माळ चढोनि अवचट। पारके रिघती घडघडाट। ते दशमद्वाराची वाट। देऊनि कपाट दृढ बुजिलें॥ ५॥ यापरी स्वयें मन। दुर्ग पन्नासी आपण। त्यासी सबाह्य राखण। घरटी जाण स्वयें करी॥ ६॥ धरोनि कामाचा हात। मन रिगे पारक्यांत। मुख्य धुरांसी लोळवीत। इतरांचा तेथ कोण पाडू॥ ७॥ ऐसें मनाचें मारकपण। अनिवार अतिकठिण। त्रिविधतापें खोंचूनि जन। हुंबत जाण पाडिले॥ ८॥ देवांपासूनि आधिदैविक। मानस ताप आध्यात्मिक। भूतांपासाव तो भौतिक। या नांव देख त्रिविध ताप॥ ९॥ सत्त्वगुणें देख अंत:करण। रजोगुणेंइंद्रियें जाण। महाभूतें विषयभान। तमोगुणें जाण प्रसवत॥ ३१०॥ त्रिविध विकारीं विकारबहुळ। ते हे प्रकृतीच येथें केवळ। हेचि दुर्गसामग्री प्रबळ। प्रपंच सबळ येणें जाहला॥ ११॥ संकल्प महापर्जन्योदकीं। वासनाजीवनें भरलीं टांकीं। तेणें जीवनें दुर्गाच्या लोकीं। संसारसुख-दु:खीं विचरिजे॥ १२॥ दुर्गनवद्वारीं समस्तें। आधिदैव आणि आधिभूतें। अध्यात्म तें कोण येथें। ऐक निश्चितें सांगेन॥ १३॥ कोणे द्वारीं कोण यंत्र। कोण चेतविता कैसें सूत्र। कैसा होतसे विषयमार। तोही निर्धार तूं ऐक॥ १४॥
दृग् रूपमार्कं वपुरत्र रन्ध्रे
परस्परं सिध्यति य: स्वत: खे।
आत्मा यदेषामपरो य आद्य:
स्वयानुभूत्याखिलसिद्धसिद्धि:।
चक्षु इंद्रिय यंत्र थोर। तेथ कामिनीरूपाचा महामार। घायें भेदिती जिव्हार। पडले सुरनर कोटॺनुकोटी॥ १५॥ चक्षुगोल इंद्रिय शरीरीं। तेथ अधिदेव सूर्य अधिष्ठात्री। देखिल्या रूपाची धारणा धरी। तेंचि निजनिर्धारीं अध्यात्म॥ १६॥ नीलपीतरूपाभरण। दृष्टीं देखिजे दर्शन। तेंचि अधिभूत सत्य जाण। दृश्याचें भान दृष्टीसी॥ १७॥ सूर्य अधिदैव सिद्ध आहे। अधिभूत दृष्टी भरलें पाहें। शरीरीं चक्षुगोळही होये। परी अध्यात्म तेजेंवीण राहे अंधत्व॥ १८॥ अधिदैव अधिभूत असतां पाहीं। अध्यात्म तेज जंव दृष्टीसी नाहीं। तंव देखणें न घडे कांहीं। अंधत्व ते ठायीं ठसावोनि ठाके॥ १९॥ अध्यात्म अधिभूत दोनी आहे। जैं अधिदैव सूर्य अस्ता जाये। तैं दृष्टीचें देखणें ठाये। स्तब्धत्वें राहे तमामाजीं॥ ३२०॥ ते काळीं दृष्टीसी पाहें। स्नेहसूत्र मेळवून लाहे। अग्नि जरी केला साह्ये। तरी प्रकाशू नोहे रवी ऐसा॥ २१॥ तेथ चंद्रोदयो जरी जाहला। तो सूर्यासमान नाहीं आला। निशा निरसूनि दृष्टीं साह्य जाहला। यालागीं सूर्य बोलिला अधिदैव॥ २२॥ अध्यात्म अधिभूतअसतां पाहीं। अधिदैव सूर्य जेथ नाहीं। तेथ दृष्टींचे न चले काहीं। तुज म्यां तेंही सांगीतलें॥ २३॥ अध्यात्म अधिदैव दोनी आहे। अधिभूतें दृश्यदर्शन राहे। तैं सत्य ब्रह्मज्ञान होये। जैं गृरुकृपा पाहे पूर्णांशें॥ २४॥ येथ जें दृश्याचें दर्शन। तेणें देहबुद्धि दृढ जाण। तें दृश्याचें पुशिल्या भान। होय देहेंशीं शून्य संसार॥ २५॥ अधिदैव अध्यात्म अधिभूत। त्रिपुटी बोलिजे हे येथ। तुज म्यां सांगीतली साद्यंत। जाण निश्चित विभाग॥ २६॥ येथूनि त्रिपुटीचें विंदान। दृश्य द्रष्टा आणि दर्शन। कर्म कर्ता क्रियाचरण। ध्येय ध्यान ध्यातृत्व॥ २७॥ त्रिपुटी म्हणावयाचें कारण। परस्परें सापेक्षपण। तें अपेक्षेचें लक्षण। ऐक संपूर्ण सांगेन॥ २८॥ नानाकारें अतिविलास। येथ देखणी दृष्टी डोळस। तेही सूर्येंवीण वोस। हा अनुप्रवेश परस्परें॥ २९॥ सूर्य आहे डोळा नाहीं। तेथ पाहणें न चले पाहीं। हो कां डोळा आहे सूर्य नाहीं। तेथें दृष्टीचें कांहीं चालेना॥ ३३०॥ सूर्य आणि दृष्टी दोनी आहे। परी दृश्य जैं नाहीं होये। तैं दोहींचें सामर्थ्य राहे। देखावें काये दृष्टीनें॥ ३१॥ सूर्य प्रकाशी रूपासी। दृष्टीसी रिघोनियां स्वांशेंसीं। दाखवी नाना आकारांसी। परस्परानुप्रवेशीं बोलिजे सिद्धी॥ ३२॥ इतुकें करोनियां सविता। नभोमंडळीं अलिप्तता। तेवीं जगदाकारें चेतविता। अलिप्त तत्त्वतां चिदात्मा॥ ३३॥ जो जगामाजीं भरला राहे। जगाचा हृदयस्थही होये। जग जरी होये जाये। परी तो आहे जैसा तैसा॥ ३४॥ जेवीं आकाशअभ्यंतरीं। होतां घटाकाश सहस्रवरी। आकाश त्या घटाभीतरीं। प्रत्यक्षाकारीं भरलें दिसे॥ ३५॥ ते घटचि होती जाती। परी आकाश सहजस्थिती। तेवीं उत्पत्तिस्थितिअंतीं। अलिप्त श्रीपती चिदात्मा॥ ३६॥ तो आदीची अनादि आदि। तो बुद्धीची अनादि बुद्धी। तो सिद्धीची अनादि सिद्धी। जाण त्रिशुद्धी परमात्मा॥ ३७॥ हा प्रकाशा प्रकाशक। अर्काचाही आदि अर्क। स्वयें त्रिपुटीचा द्योतक। अलिप्त एक परमात्मा॥ ३८॥ हा विवेकाचाही विवेक। हा सुखाचा सुखदायक। बुद्धीचा जो बोधक। प्रकाशा प्रकाशक परमात्मा॥ ३९॥ त्यासी जाणों जातां जाणपणें। वेदांसी जाहलें लाजिरवाणें। वेडावलीं स्मृतिपुराणें। न कळे शास्त्रपठणें भांडतां॥ ३४०॥ देवो देवी आणि देवता। भोग्य भोग आणि भोक्ता। नाना त्रिपुटींची त्रिगुणता। जाण सर्वथा प्रकृतीचि हे॥ ४१॥ हा आद्य अव्यक्त अतर्क्य। प्रकृतिपर परमात्माएक। यासी जाणावया विवेक। न चले देख आणिकांचा॥ ४२॥ याचेनि हा हृदयीं देखिजे। याचेनि हा इत्थंभूत जाणिजे। यातें धरोनि हा पाविजे। हेंही लाहिजे कृपें याचेनी॥ ४३॥ हा स्वप्रकाश सहज निजें। यासी प्रकाशी ऐसें नाहीं दुजें। याचेनि प्रकाशें हा देखिजे। याचेनि होईजे या ऐसें॥ ४४॥ अधिदैव अध्यात्म अधिभूत। नेत्रद्वारा सांगितलें तेथ। तैसेंच अन्य इंद्रियीं व्यावृत्त। देव सांगत संकलितें॥ ४५॥
एवं त्वगादि श्रवणादि चक्षु-
र्जिह्वादि नासादि च चित्तयुक्तम्॥ ३१॥
योऽसौ गुणक्षोभकृतो विकार:
प्रधानमूलान्महत: प्रसूत:।
प्रधानापासाव महदादिद्वारा। नाना विकारांचा पसारा। गुणक्षोभें क्षोभूनि पुरा। उठिला उभारा त्रिपुटीरूपें॥ ४६॥ जेवीं सूर्यें चक्षुरादि विंदान। तैसेंचि श्रोत्र त्वचा रसना घ्राण। हें ज्ञानेंद्रियपंचक जाण। याचें कर्म समान त्रिपुटीरूपें॥ ४७॥ येथ कर्मेंद्रियें पांच आन। तीं ज्ञानेंद्रियां अधीन। हस्त पाद गुद शिश्न। वाचा जाण पांचवी॥ ४८॥ त्यांसी ज्ञानेंद्रियें प्रेरिती। तैं कर्मेंद्रियें कर्मीं वर्तती। एवं उभयपंचकस्थिती। जाण निश्चितीं दशेंद्रियें॥ ४९॥ चित्तचतुष्टयचमत्कार। मन बुद्धि चित्त अहंकार। हीं एकचि परी भिन्न प्रकार। जैसा व्यापार तैसें नांव॥ ३५०॥ केवळ देहाकारें मीपण। तो सबळ अहंकार जाण। संकल्पविकल्प जे गहन। तेंचि मन उद्धवा॥ ५१॥ गतभोगाचें जें चिंतन। तें चित्ताचें लक्षण। केवळ निश्चयात्मक जाण। बुद्धि संपूर्ण ती नांव॥ ५२॥ हें गुणक्षोभाचें लक्षण। भोगसाधनें भोग्य जाण। त्याहूनि भोक्ता तो भिन्न। तेंही उपलक्षण अवधारीं॥ ५३॥ त्वगिंद्रियीं विषयस्पर्शन। तेथें अधिदैव वायू जाण। त्याहूनि परमात्मा भिन्न। चित्स्वरूपें जाण अविकारी॥ ५४॥ गंधविषयो घ्राणेंद्रियें। तेथ अधिदैव अश्विनौदेव होये। आत्मा त्याहूनि वेगळा पाहें। चित्स्वरूपें राहे अविकारी॥ ५५॥ रसनेंद्रिय अतिगहन। रसविषयो तेथील जाण। वरुण अधिदैवत आपण। आत्मा स्वानंदपूर्ण रसातीत॥ ५६॥ श्रवणेंद्रियीं विषयो शब्द। तेथ दिशा अधिदैव प्रसिद्ध। शब्दीं निजात्मा नि:शब्द। चिदत्वें शुद्ध अविकारी॥ ५७॥ चक्षुरिंद्रियलक्षण। पूर्वीं निरूपिलें जाण। हें ज्ञानेंद्रियविंदान। त्रिपुटी संपूर्ण ऐशा रीतीं॥ ५८॥ चित्त इंद्रिय जें कां येथ। चिंतन विषयो त्यासी प्राप्त। वासुदेव अधिदैवत। आत्मा अलिप्त चित्तेंसीं॥ ५९॥ मनेंद्रिय अतिचपळ। संकल्प विषयो त्याचा प्रबळ। तेथ अधिदैव चंद्र निर्मळ। आत्मा केवळ मनातीत॥ ३६०॥ अहंकार इंद्रिय कठिण। तेथील विषयो मीपण। रुद्र अधिदैवत जाण। परमात्मा भिन्न अहंकारेंसीं॥ ६१॥ बुद्धींद्रिय अतिसज्ञान। बोद्धव्य तेथींचा विषयो जाण। ब्रह्मा अधिदैवत आपण। आत्मा चिद्धन बुद्धॺातीत॥ ६२॥ चित्तचतुष्टय सकारण। त्रिपुटी सांगीतली हे संपूर्ण जाण। आतां कर्मेंद्रियांचें लक्षण। ऐक संपूर्ण सांगेन॥ ६३॥ वागिंद्रियीं वाच्य विषयो। अग्नि अधिदैवत तेथील पहा हो। तेथ सरस्वतीशक्तीचा निर्वाहो। यासी अलिप्त देवो महामौनें॥ ६४॥ पाणींद्रियीं ग्रहण विषयो। इंद्र अधिदैवत तेथील पहा हो। तेथ क्रियाशक्तीचा निर्वाहो। यासी अलिप्त देवो अक्रियत्वें॥ ६५॥ पादेंद्रियीं गति विषयो। तेथें उपेंद्र अधिदैवो। तेथें गमनशक्तीचा निर्वाहो। यासी अलिप्त देवो निश्चलत्वें॥ ६६॥ गुदेंद्रियीं विसर्गविषयो। निर्ऋति आधिदैवत तेथील पहा हो। क्षरशक्तीचा तेथ निर्वाहो। त्यासी अलिप्त देवो अक्षरत्वें॥ ६७॥ शिश्नेंद्रियीं रति विषयो। प्रजापति तेथें अधिदैवो। आनंदशक्तीचा तेथें निर्वाहो। त्यासी अलिप्त देवो परमानंदें॥ ६८॥ ज्ञानकर्मेंद्रियें कर्माचरण। चित्तचतुष्टयाचें लक्षण। हें गुणक्षोभाचें कारण। समूळ जाण मायिक॥ ६९॥ तेंचि गुणक्षोभाचें प्रधान मूळ। प्रकृतिविकारें होय स्थूळ। आत्मा अविकारी निर्मळ। अलिप्त केवळ प्रकृतीसी॥ ३७०॥ जेवीं वृत्तिभूमीसमवेत। गृहीं गृहसामग्री समस्त। अभिमानें उपार्जी गृहस्थ। परी तो त्या अतीत आपण जैसा॥ ७१॥ तेवीं त्रिगुणक्षोभें अभिमान। वाढवी नाना विकारवन। आत्मा वसंत तो भिन्न। तेंचि निरूपण हरि बोले॥ ७२॥
अहं त्रिवृन्मोहविकल्पहेतु-
र्वैकारिकस्तामस ऐन्द्रियश्च॥ ३२॥
आत्मा परिज्ञानमयो विवादो
ह्यस्तीति नास्तीति भिदार्थनिष्ठ:।
अहंअध्यासें संसारप्राप्ती। जीवासी लागली निश्चितीं। त्या अहंकाराचे निवृत्तीं। भवनिर्मुक्ती जीवासी॥ ७३॥ ऐसा बाधकत्वें दुर्धर। कैंचा उठिला अहंकार। हाही पुसों पाहसी विचार। ऐक साचार सांगेन॥ ७४॥ स्वस्वरूपातें विसरून। दृढ जें स्फुरे मीपण। तोचि अहंकार जाण। विकारें त्रिगुणक्षोभक॥ ७५॥ जागृतीचा जो विसरू। तोचि स्वप्नसृष्टीचा विस्तारू। वस्तुविमुख जो अहंकारू। तोचि संसारू त्रिगुणात्मक॥ ७६॥ विकारें क्षोभती तिन्ही गुण। हें विस्मरण मोहाचें लक्षण। तेणें विकारले तीन गुण। ते विभाग भिन्न अवधारीं॥ ७७॥ मूळीं बोलिला वैकारिकू। तो अहंकार जाण सात्त्विकू। तो चित्तचतुष्टयद्योतकू। होय प्रकाशकू अधिदैवें॥ ७८॥ सत्त्वापासोनि उपजे मन। मनापासाव विकार गहन। यालागीं वैकारिक जाण। सत्त्वगुण बोलिजे॥ ७९॥ ज्ञान कर्म उभय पंचक। हा इंद्रियांचा दशक। जाहला रजोगुण द्योतक। यालागीं ऐंद्रियक म्हणिपे त्यासी॥ ३८०॥ तामस गुण जो कां येथें आकाशादि पंचीकृतें। आवरणरूपें महाभूतें। विषयसमवेतें उपजवी॥ ८१॥ महाभूतें विषयपंचक। झाला तमोगुण प्रकाशक। यालागीं भूतादि देख। यासी आवश्यक बोलिजे॥ ८२॥ एवं त्रिगुणगुणविकारें। काम्यकर्मसंस्कारें। सबळ होऊनि अहंकारें। संसारीं संचरे नाना हेतु॥ ८३॥ या प्रकृतिविकारांपासून। आत्मा अतिशयें भिन्न। जेवीं मृगजळातें भरून। अलिप्त भानू नभामाजीं॥ ८४॥ जैसा प्रकाशोनि सर्पाकार। सर्पासी नातळे स्वयें दोर। तेवीं प्रकाशोनि संसार। नि:संग निर्विकार निजात्मा॥ ८५॥ जेवीं कृष्ण पीत रक्त श्वेत। स्फटिक ठेवितां तेथतेथ। जरी तदाकार भासत। तरी तो अलिप्त शुद्धत्वें॥ ८६॥ तैसा गुणसंगें जीवात्मा बद्ध। दिसे तरी तो अतिशुद्ध। हा नेणोनियां निजबोध। करिती विवाद मतवादी॥ ८७॥ एक म्हणती आत्मा देही। एक म्हणती तो विदेही। एक म्हणती आत्म्याच्या ठायीं। हे दोन्ही नाहीं सर्वथा॥ ८८॥ एक म्हणती आत्मा सगुण। एक म्हणती तो गुणविहीन। एक म्हणती ते वेगळी खूण। सगुण निर्गुण परमात्मा॥ ८९॥ एक प्रतिपादिती भेद। एक प्रतिपादिती अभेद। एक म्हणती दोन्ही अबद्ध। आमुचें मत शुद्ध देहात्मवादू॥ ३९०॥ एक म्हणती हें मिथ्याभूत। प्रत्यक्ष दिसताहे जो येथ। तो प्रपंच मानिती सत्य। हेंचि मत एकाचें॥ ९१॥ ऐसे भेदवाद सकळ। विचारितां अज्ञानमूळ। आत्मा चिन्मात्र केवळ। भेदातें समूळ छेदक॥ ९२॥ ‘आत्मा परिज्ञानमय’ शुद्ध। हें श्लोकींचें मूळ पद। तेणें निरसे अज्ञानभेद। आत्मा शुद्ध बुद्ध चिदात्मा॥ ९३॥ जेवीं सनक्षत्र रजनी। निवटीत प्रकटे तरणी। तेवीं सभेद कार्य निरसूनी। प्रकट चित्किरणीं चिद्भानू॥ ९४॥ तेथ गुणेंसी माया उडे। भेदासहित वाद बुडे। मूळासह अज्ञान खुडे। चहूंकडे सच्चिदानंद॥ ९५॥ आत्मा सच्चिदानंद पूर्ण। तेथ सकळ मिथ्या अज्ञान। तें अज्ञाननिरासीं साधन। विवेक सांख्यज्ञान व्यर्थ दिसे॥ ९६॥ तेचि विषयींचें निरूपण। श्लोकार्धें सुलक्षण। स्वयें सांगताहे श्रीकृष्ण। साध्यसाधनविभाग॥ ९७॥
व्यर्थोऽपि नैवोपरमेत पुंसां
मत्त: परावृत्तधियां स्वलोकात्॥ ३३॥
मूळीं समूळ मिथ्या अज्ञान। अज्ञानजन्य विषयभान। तें देखोनि भुलले जन। पडिलें विस्मरण स्वस्वरूपीं॥ ९८॥ मी परमात्मा हृदयस्थ सन्निधी। त्या मजपासोनि उपरमे बुद्धी। मग विषयासक्ति त्रिशुद्धी। आवडे उपाधि देह गेह दारा॥ ९९॥ जें स्वस्वरूपाचें विस्मरण। तें वाढवी तीव्र विषयध्यान। तेणें जीवासी जन्ममरण। अनिवार जाण देहाभिमानें॥ ४००॥ तो नासावया देहाभिमान। वैराग्ययुक्त ज्ञानध्यान। मीचि बोलिलों साधन। समूळ अज्ञानच्छेदक॥ १॥ जंववरी अंगीं देहाभिमान। तंव अवश्य पाहिजे साधन। नि:शेष निरसल्या अज्ञान। वृथा साधन मीही मानीं॥ २॥ म्हणशी तें कोण पां अज्ञान। जें शुद्धासी लावी जीवपण। त्या जीवाअंगीं जन्ममरण। अनिवार जाण वाढवी॥ ३॥ स्वस्वरूप विसरोनि जाण। देहीं स्फुरे जें मीपण। अत्यंत दृढतर अज्ञान। तो देहाभिमान उद्धवा॥ ४॥ गौण नांव त्याचें अज्ञान। येऱ्हवीं मुख्यत्वें देहाभिमान। हें ऐकोनि देवाचें वचन। दचकलें मन उद्धवाचें॥ ५॥ तेचि अर्थींचा प्रश्न। देवासी पुसे आपण। कोण्या युक्तीं देहाभिमान। जन्ममरण भोगवी॥ ६॥
उद्धव उवाच
त्वत्त: परावृत्तधिय: स्वकृतै: कर्मभि: प्रभो।
उच्चावचान् यथा देहान् गृह्णन्ति विसृजन्ति च॥ ३४॥
सर्वत्र सदा संमुख गगन। त्यासी कदा न घडे विमुखपण। तेवीं आत्मा सबाह्य परिपूर्ण। वृत्ति विमुख जाण होय कैसी॥ ७॥ जैं जाळीं बांधवे गगन। तैं अक्रिया लागे कर्मबंधन। वंध्यागर्भ सटवे जाण। तैसें जन्ममरण मुक्तासी॥ ८॥ आत्म्यावेगळें कांहीं। रितें तंव उरलें नाहीं। तरी ये देहींचाते देहीं। गमनसिद्धी पाहीं कैसेनी॥ ९॥ पृथ्वी रुसोनि वोसरां राहे। आकाश पळोनि पऱ्हां जाये। तैं देहींचा देहांतरा पाहें। आत्मा लाहे संसरण॥ ४१०॥ सात समुद्र गिळी मुंगी। तैं आत्मा उंचनीच योनी भोगी। हे अतर्क्य तर्केना मागीं। भुलले योगी ये अर्थीं॥ ११॥
तन्ममाख्याहि गोविन्द दुर्विभाव्यमनात्मभि:।
न ह्येतत्प्रायशो लोके विद्वांस: सन्ति वञ्चिता:॥ ३५॥
अभिनव हे तुझी गती। सर्वथा न कळे श्रीपती। मायामोहित जे चित्तीं। त्यां तुझी स्थिती नेणवे॥ १२॥ तूं आत्मा अद्वितीय अविनाश। तेथ उत्पत्ति स्थिति विनाश। नाथिला दाविसी भवभास। हा अतर्क्य विलास तर्केना॥ १३॥ येथ वेदाची युक्ती ठेली। उपनिषदें वेडावलीं। पुराणें मुकीं झालीं। अतियत्नें लक्षिणी न वचेचि मागी॥ १४॥ तुझे केवळ कृपेवीण। तुझें इत्थंभूत नव्हे ज्ञान। ऐसे जड मूढ हरिकृपाहीन। त्यांसी भवबंधन तुटेना॥ १५॥ तुझे योगमायेची अतर्क्यता। ब्रह्मा भुलविला वत्सें नेतां। शिवू भुलविला मोहिनी देखतां। इतरांची कथा ते कोण॥ १६॥ प्रपंचीं अथवा परमार्थी। तुझेनि चालती इंद्रियवृत्ती। यालागीं गोविंदनामाची ख्याती। त्रिजगतीं वाखाणिली॥ १७॥ सादर कृपापूर्वक आपण। माझा सांगावा अतर्क्य प्रश्न। देहीं देहांतरा संचरण। जीवास जन्ममरण तें कैसें॥ १८॥ ऐकोनि उद्धवाचा प्रश्न। हांसिन्नला मधुसूदन। हें अवघें मायिक जाण। कल्पनाविंदान मनोमय॥ १९॥
श्रीभगवानुवाच
मन: कर्ममयं नॄणामिन्द्रियै: पंचभिर्युतम्।
लोकाल्लोकं प्रयात्यन्य आत्मा तदनुवर्तते॥ ३६॥
अकरा इंद्रियें पंच महाभूतें। हें सोळा कळांचें लिंगदेह येथें। मुख्यत्वें प्राधान्य मनाचें तेथें। नाना विषयांतें कल्पक॥ ४२०॥ येथ लिंगदेह तेंचि मन। मनाआधीन इंद्रियें जाण। मनाचेनि देहासी गमन। तेथ देहाभिमान मनासवें॥ २१॥ मन ज्यातें सोडूनि जाये। तेथ अभिमान उभा न राहे। मनोयोगें अभिमान पाहें। देहाचा वाहे खटाटोप॥ २२॥ जेथ विषयासक्त मन। करी शुभाशुभ कर्माचरण। तेव्हां होऊनि कर्माधीन। देही करी गमन देहांतरा॥ २३॥ आत्मा यासी अलिप्त भिन्न। परी देहासवें दावी गमन। हें अति अतर्क्य विंदान। ऐक लक्षण तयाचें॥ २४॥ घट जेथ जेथ हिंडों बैसे। आकाश त्यासवें जात दिसे। परी ढळणें नाहीं आकाशें। आत्म्याचें तैसें गमन येथें॥ २५॥ घटामाजीं भरिजे अमृत। अथवा घालिजे खातमूत। आकाश दोहींसीं अलिप्त। तेवीं सुखदु:खातीत देहस्थ आत्मा॥ २६॥ घट घायें कीजे शतचूर। परी आकाशीं न निघे चीर। तेवीं नश्वरीं अनश्वर। जाण साचार निजात्मा॥ २७॥ घट फुटोनि जेथ नाशे। तेथ आकाश आकाशीं सहज असे। नवा घट जेथ उपजों बैसे। तों तेथ आकाशें व्यापिजे॥ २८॥ तेवीं देहाचें नश्वरपण। आत्मा अखंडत्वें परिपूर्ण। आत्म्यासी देहांतरगमन। जन्ममरण असेना॥ २९॥ देहीचें देहांतरगमन। वासनायोगें करी मन। तें मनोगमनाचें लक्षण। ऐक संपूर्ण सांगेन॥ ४३०॥
ध्यायन्मनोऽनुविषयान् दृष्टान्वानुश्रुतानथ।
उद्यत्सीदत् कर्मतन्त्रं स्मृतिस्तदनुशाम्यति॥ ३७॥
श्रुतदृष्टविषयांचें ध्यान। निरंतर वाढवी मन। तीव्र धारणा दारुण। अन्य स्फुरण स्फुरेना॥ ३१॥ आवडत्या विषयांचें ध्यान। अंतकाळीं ठसावे जाण। तेव्हां तदाकार होय मन। सर्वभावें आपण तन्निष्ठा॥ ३२॥ तेव्हां भोगक्षयें जाण। मागल्या देहाचा अभिमान। सहजेंचि विसरे मन। पुढील ध्यान एकाग्रतां॥ ३३॥ विषयवासनारूढ मन। निजकर्मतंत्रें जाण। देहांतरीं करी गमन। तेथ सप्राण संचरे॥ ३४॥ मागील सांडिल्या देहातें। सर्वथा स्मरेना चित्तें। पुढें धरिलें आणिकातें। हेंही मनातें स्मरेना॥ ३५॥
विषयाभिनिवेशेन नात्मानं यत्स्मरेत्पुन:।
जन्तोर्वै कस्यचिद्धेतोर्मृत्युरत्यन्तविस्मृति:॥ ३८॥
जन्म त्वात्मतया पुंस: सर्वभावेन भूरिद।
विषयस्वीकृतिं प्राहुर्यथा स्वप्नमनोरथ:॥ ३९॥
विषयाभिनिवेशें मन। ज्या स्वरूपाचें करी ध्यान। तद्रूप होय आपण। पूर्वदेहाचें स्मरण विसरोनियां॥ ३६॥ तेंचि विस्मरण कैसें। निजबालत्व प्रौढवयसें। नि:शेख नाठवे मानसें। पूर्वदेह तैसें विसरोनि जाय॥ ३७॥ ऐसें अत्यंत विस्मरण। त्या नांव देहाचें मरण। त्या विसरासवें जाण। चेतना सप्राण निघोनि जाये॥ ३८॥ जेव्हां चेतना जाय सप्राण। तेव्हां देहासी ये प्रेतपण। त्या नांव उद्धवा मरण। जन्मकथन तें ऐक॥ ३९॥ स्नेहें द्वेषें अथवा भयें। अंतकाळीं जें ध्यान राहे। पुरुष तद्रूपचि होये। जन्मही लाहे तैसेंचि॥ ४४०॥ भरत करितां अनुष्ठान। अंतीं लागलें मृगाचें ध्यान। तो मृगचि झाला आपण। ध्यानानुरूपें मन जन्म पावे॥ ४१॥ भयास्तव भृंगाचें ध्यान। कीटकी करितां जाण। ते तद्रूप होय आपण। ध्यानानुरूपें मन जन्म पावे॥ ४२॥ द्वेषें ध्यातां श्रीकृष्णासी। तद्रूपता झाली पौण्ड्रकासी। जैसें दृढ ध्यान मानसीं। ते गति पुरुषासी त्रिशुद्धी॥ ४३॥ वाढवूनियां संभ्रम। अंतकाळीं आवडे सप्रेम। जेथें ध्यान ठसावे मनोरम। तेंचि जन्म पुरुषासी॥ ४४॥ मग तेणें ध्यानानुभवें। जैसा कांहीं आकारू संभवे। तेथ देहाभिमान पावे। ‘हें मी आघवें’ म्हणोनी॥ ४५॥ येथ मन आणि अभिमान। स्वरूप एक कार्यें भिन्न। हें चित्तचतुष्टयलक्षण। जाणती सज्ञान एकात्मता॥ ४६॥ दैवयोगें त्या देहाचें। बरवें वोखटें घडे साचें। तैं अभिमान घेऊनि नाचे। जन्म पुरुषाचें या नांव॥ ४७॥ परी हें देह नव्हे आन। हेंही स्मरेना तें मन। पूर्वील जो देहाभिमान। तोचि येथ जाण आरोपी॥ ४८॥ येचि अर्थींचा दृष्टांत। स्वयें सांगताहे श्रीकृष्णनाथ। जेवीं स्वप्न आणि मनोरथ। विसरवित निजदेहा॥ ४९॥ स्वगृहीं दरिद्री निद्रित। तो स्वप्नीं होय अमरनाथ। मग उर्वशीप्रमुख अप्सरांत। असे मिरवत ऐरावतीं॥ ४५०॥ तें दरिद्र देह माझें गेलें। हें अमरदेह प्राप्त झालें। ऐसें स्वप्नीं नाहीं आठवलें। तैसें जन्म झालें जनासी॥ ५१॥ मजूर राउळींचें घृत नेतां। तो तुरुंगीं चढे मनोरथा। मन नाचूं लागे उल्हासतां। स्वकल्पिता कल्पना॥ ५२॥ सबळ वारूचें उड्डाण। म्हणूनि उडूं जातां आपण। पडोनि घृतकुुंभ होय भग्न। पुसती जन काय झालें॥ ५३॥ बळें उडाला माझा घोडा। परी स्मरेना तो फुटला घडा। बंदीं पडला रोकडा। नेणे बापुडा मनोरथें॥ ५४॥ येथवरी तीव्र जें विस्मरण। त्या नांव देहाचें मरण। अतिउद्यत जें मनाचेंध्यान। तेंचि जन्म प्राण्यासी॥ ५५॥ एवं आत्म्यासी जन्ममरण। तें केवळ भ्रमाचें लक्षण। तेचि अर्थींचें निरूपण। स्वयें श्रीकृष्ण सांगत॥ ५६॥
स्वप्नं मनोरथं चेत्थं प्राक्तनं न स्मरत्यसौ।
तत्र पूर्वमिवात्मानमपूर्वं चानुपश्यति॥ ४०॥
स्वप्न देखत्या पुरुषासी। विसरोनि निजदेहासी। स्वप्नींच्या देहगेहांसी। साभिमानेंसीं वाढवी॥ ५७॥ जागृतिदेहो राहिला तेथें। स्वप्नदेहो पावलों येथें। एवं पूर्व अपूर्व दोहींतें। न स्मरे चित्तें पुरुष जैसा॥ ५८॥ जागृति आणि देखिलें स्वप्न। या दोहीं देहांसी देखता भिन्न। तेवीं जन्म आणि मरण। जीवासी जाण असेना॥ ५९॥ एवं देहासी जन्म नाश। आत्मा नित्यमुक्त अविनाश। स्वप्नमनोरथविलास। तैसा बहुवस संसार॥ ४६०॥ देहासी जन्म स्थिति मरण। यांसी मनचि गा कारण। मन:कल्पित संसार जाण। तेंचि श्रीकृष्ण सांगत॥ ६१॥
इन्द्रियायनसृष्टॺेदं त्रैविध्यं भाति वस्तुनि।
बहिरन्तर्भिदाहेतुर्जनोऽसज्जनकृद्यथा॥ ४१॥
मनें कल्पिली सकळ सृष्टी। मन:कृत इंद्रियकामाठी। मनें वाढविली त्रिपुटी। कर्मकसवटी विभाग॥ ६२॥ अधिदेव अध्यात्म अधिभूत। हें त्रैविध्य मन:कृत। वस्तु अखंडचि तेथ। त्रिधा भासत कल्पना॥ ६३॥ जैसें भांडें कुंभार करी। तेथ नभ दिसे तदाकारीं। गगन सर्वथा अविकारी। तें दिसे विकारी भांडयोगें॥ ६४॥ तेवीं आत्मा अविकारी नित्य शुद्ध। तेथ मन:कल्पित त्रिविध। नानापरींच्या त्रिपुटी विविध। वाढविला भेद तो ऐक॥ ६५॥ कार्य कर्म आणि कर्ता। ध्येय ध्यान आणि ध्याता। ज्ञेय ज्ञान आणि ज्ञाता। या मन:कल्पिता त्रिविध॥ ६६॥ अहं कोहं सोहं भेद। त्वंपद तत्पद असिपद। सत् चित् आणि आनंद। हेही संबंध मायिक॥ ६७॥ असंताचिये निवृत्ती। संतत्व प्रतिपादी वेदोक्ती। जडाचिये समाप्ती। चिदत्व बोलती वस्तूसी॥ ६८॥ करितां दु:खाचा छेद। वस्तूसी म्हणती परमानंद। एवं सच्चिदानंद। जाण प्रसिद्ध मायिक॥ ६९॥ असंत मिथ्या मायिक पाहीं। तैसें तत्त्व कोण ठेवीं ठायीं। जडासीचि ठाव नाहीं। तेथ चिदत्व कायी संपादे॥ ४७०॥ जेथ नाहीं दु:खसंबंध। तेथ कोण म्हणे आनंद। एवं वस्तूच्या ठायीं सच्चिदानंद। मायिक संबंध या हेतू॥ ७१॥ जेथ जें भासे संसारभान। त्रिगुणत्रिपुटी विंदान। तें सर्व मायिक मन:कृत जाण। आत्मा तो भिन्न गुणातीत॥ ७२॥ आत्मानित्य मुक्त शुद्ध बुद्ध। तेथ भासे जो त्रिविध भेद। तो मन:कृत गुणसंबंध। जाण प्रसिद्ध मायिक॥ ७३॥ पुरुष श्रोत्रिय सदाचार। त्यासी स्त्री करी व्यभिचार। तेणें दोषी म्हणती भ्रतार। तैसा भेद प्रकार आत्म्यासी॥ ७४॥ जेवीं स्वप्नामाजीं नर। एकला होय संसार। तो निद्रायोगें चमत्कार। तैसा भेद प्रकार मायिक ब्रह्मीं॥ ७५॥ जडाजड देहभेद। परिच्छिन्नत्वें जीवभेद। हा स्वप्नप्राय मायिकबोध। आत्मा नित्य शुद्ध अद्वितीय॥ ७६॥ ऐसे मायाविभेदनिष्ठ जन। त्यांसी वैराग्यसिद्धॺर्थ जाण। काळकृत जन्ममरण। तेंचि निरूपण हरि बोले॥ ७७॥
नित्यदा ह्यङ्ग भूतानि भवन्ति न भवन्ति च।
कालेनालक्ष्यवेगेन सूक्ष्मत्वात्तन्न दृश्यते॥ ४२॥
म्हणे ऐक बापा उद्धवा। स्थावरजंगमादि देहभावा। काळाचिया काळप्रभावा। लागला नीच नवा जन्ममृत्यू॥ ७८॥ अतिसूक्ष्म काळगतीसीं। काळ ग्रासीतसे जगासी। या अंगींच्या जन्ममृत्यूंसी। नेणवे जीवासी मायामोहें॥ ७९॥ निजमाता बाळवयासी। प्रकटावयवीं लाडवी पुत्रासी। तेचि माता प्रौढवयसेंसी। होय त्या पुत्रासी सलज्ज॥ ४८०॥ ते बाल्यावस्था काळें नेली। हे प्रौढवयसा नवी आली। यालागीं माता सलज्ज झाली। हे काळें केली घडामोडी॥ ८१॥ ऐसा नित्य नाश नित्यजन्म। भूतांसी करी काळ सूक्ष्म। या जन्ममृत्यूंचें वर्म। नेणती संभ्रम भ्रांत प्राणी॥ ८२॥ जो अवस्थाभाग काळें नेला। त्यासवें तो देहचि गेला। पुढें वयसा नवी पावला। तो काळें आणिला नवा देहो॥ ८३॥ ऐसा संभव आणि असंभवो। नीच नवा काळकृत पहा वो। यालागींत्रिविधविकारीं देहो। स्वयें स्वयमेवो देखिजे॥ ८४॥ अतर्क्य काळाची काळगती। भूतें जन्ममृत्यु पावती। ते अलक्ष्य गतीचे अर्थीं। दृष्टांत श्रीपति दावीत॥ ८५॥
यथार्चिषां स्रोतसां च फलानां वा वनस्पते:।
तथैव सर्वभूतानां वयोऽवस्थादय: कृता:॥ ४३॥
नित्य नूतन दीपज्वाळा। होतां जातां न दिसती डोळां। सवेग वाहतां जळकल्लोळा। यमुनाजळा न देखिजे॥ ८६॥ फळ न सांडितां वृक्षदेंठ। कडवट तुरट आंबट। तेचि गोड होय चोखट। ऐशी अतर्क्य अदृष्ट काळसत्ता॥ ८७॥ तोचि काळ देहासरिसा। नित्य नूतन लागला कैसा। बाल्यतारुण्य वृद्धवयसा। देहदशा पालटी॥ ८८॥ मूढ कुशळ अशक्तता। अवस्था नाशीत ये अवस्था। तेथ ‘मी तोचि’ हें तत्त्वतां। स्फुरे सर्वथा कैसेनी॥ ८९॥ ऐसें कल्पील तुझें मन। ते अर्थींचेंनिरूपण। अखंड स्फूर्तीचें कारण। स्वयें श्रीकृष्ण सांगत॥ ४९०॥
सोऽयं दीपोऽर्चिषां यद्वत् स्रोतसां तदिदं जलम्।
सोऽयं पुमानिति नृणां मृषा गीर्धीर्मृषायुषाम्॥ ४४॥
दिपज्वाळा होती जाती। अग्नि जैसा पूर्वस्थिती। यालागीं तोचि दीपू म्हणती। ऐशा युक्ती उद्धवा॥ ९१॥ प्रवाह वाहती कल्लोळ। परी अखंड एकचि जळ। यालागीं म्हणती सकळ। तेंचि जळ या हेतू॥ ९२॥ तेवीं देहीं वयसा होती जाती। आत्मा अखंड अनुस्यूती। तोचि मी हे स्फुरे स्फूर्ती। या उपपत्ती उद्धवा॥ ९३॥ म्हणसी मीपणें अहंकार रूढ। तोही अज्ञानत्वें जडमूढ। त्यासी प्रकाशक आत्मा दृढ। मीपणें अखंड वस्तुत्वें स्फुरे॥ ९४॥ येथ देहासीचि जन्ममरण। आत्मा अखंडत्वें परिपूर्ण। येथ देहात्मबुद्धीचें जें मीपण। ते वाचा जाण अतिमिथ्या॥ ९५॥ विषयांची विषयसिद्धी। देहीं जे कांहीं देहबुद्धी। तेही मिथ्या जाण त्रिशुद्धी। भवबंधीं स्थापक॥ ९६॥ कर्मभूमीं नरदेहा ऐसें। निधान लाधलें अनायासें। तेथींचेनिही आयुष्यें। जे विषयविलासें विगुंतले॥ ९७॥ तो अमृत विकूनि कांजी प्याला। रत्नें देऊनि कोंडा घेतला। पर्वत फोडूनि टोळ धरिला। गज विकिला इटेसाठीं॥ ९८॥ डोळे फोडोनि काजळ ल्याला। नाक कापूनि शिमगा खेळला। तैसा नरदेहा नाडला। नाश केला आयुष्याचा॥ ९९॥ वेंचितां धन लक्षकोटी। आयुष्यक्षणाची नव्हे भेटी। तेंही वेंचिलें विषयासाठीं। हतायु करंटीं अतिमूढें॥ ५००॥ मुख्य देहोचि काल्पनिक जाण। तेथील काल्पनिक अभिमान। तें हें देहबुद्धीचें मीपण। लावीदृढ बंधन जगासी॥ १॥ तें सांडितां देहाचें मीपण। कैंचें जन्म कैंचें मरण। तेव्हां संसारुचि नाहीं जाण। भवबंधन मग कैंचें॥ २॥ जैसा मिथ्या बागुलाचा भेवो। बाळक सत्य मानिला पहा हो। तैसा मृषा काल्पनिक देहो। सत्यत्वें पहा हो मानिला॥ ३॥ मिथ्या देहो आणि देहबुद्धी। त्यासी पुढें कैसी जन्मसिद्धी। मिथ्याभूतासी नव्हे वृद्धी। ते विखींची विधि हरि बोले॥ ४॥
मा स्वस्य कर्मबीजेन जायते सोऽप्ययं पुमान्।
म्रियते वामरो भ्रान्त्या यथाग्निर्दारुसंयुत:॥ ४५॥
देहात्मवादें देहाभिमान। जनीं वासनाबीज गहन। तेणें स्वसंकल्पें आपण। मानी जन्ममरण नसतेंचि॥ ५॥ तेणें देहाभिमानें आपण। अहं कर्म कर्ता क्रियाचरण। निष्कर्मा कर्मबंधन। अमरा जन्ममरण आरोपी॥ ६॥ थिल्लराचेनि जाहलेपणें। त्यांत सूर्याचें जन्म मानणें। थिल्लरनाशें सूर्याचें जिणें। नासलें म्हणे बाळक॥ ७॥ तेवीं अजन्म्यासी जन्मकर्म। मानिती तो मायिक भ्रम। येचिविषयीं पुरुषोत्तम। दृष्टांत सुगम सांगत॥ ८॥ जैसा अग्नि अजन्मा अव्यक्त। त्यासी काष्ठीं जन्मला म्हणत। दिसे काष्ठाकारें आकारवंत। काष्ठनाशें मानीत नाश त्यासी॥ ९॥ येथ देहासीच जन्मनाश। आत्मा नित्य अविनाश। देहअवस्था नवविलास। स्वयें हृषीकेश सांगत॥ ५१०॥
निषेकगर्भजन्मानि बाल्यकौमारयौवनम्।
वयोमध्यं जरा मृत्युरित्यवस्थास्तनोर्नव॥ ४६॥
देहींच्या अवस्था त्या नव। ऐक तयांचाही स्वभाव। भिन्नविभागवैभव। यथागौरव सांगेन॥ ११॥ पितृदेहीं पावोनि शुक्रत्व। तेथूनि जननीजठर प्राप्त। त्या नांव निषेक बोलिजेत। देहींची हे येथ प्रथमावस्था॥ १२॥ जननीजठरीं रुधिरयुक्त। मुसावोनि खोटी होत। क्षणक्षणां वृद्धि प्राप्त। गर्भ ते येथ दुजी अवस्था॥ १३॥ प्रसूतिवाताच्या आघातीं। उदराबाहेर उत्पत्ती। त्या नांव जन्म बोलती। जाण निश्चितीं तिजी अवस्था॥ १४॥ अतिशयें आवडे स्तनपान। मुख्यत्वें माताचि प्राधान्य। रुदनाचें बळ संपूर्ण। तें चौथी जाण बाल्यावस्था॥ १५॥ मळमूत्रीं लोळे अज्ञान। गूढेंद्रियविवेकशून्य। गोड गोजिरें कलभाषण। पंचहायन बाल्यावस्था॥ १६॥ इंद्रियीं चेतना वाढत। परी पोटीं नाहीं विषयस्वार्थ। खेळावरी आसक्त चित्त। ते पांचवी येथ कुमारावस्था॥ १७॥ याउपरी तरुणपण। इंद्रियसामर्थ्य संपूर्ण। मी शहाणा मी सज्ञान। देहीं देहाभिमान मुसमुशी॥ १८॥ तेथ स्त्रीकाम आवडे चित्तीं। धनकामाची अतिप्रीती। देहगेहांची आसक्ती। नामरूपांची ख्याती लौकिकीं मिरवी॥ १९॥ श्रीमदें गर्वितमानस। स्त्रीपुत्रांचा अतिउल्हास। तृष्णा दुर्धर अतिसोस। कामक्रोधांचा बहुवस वळसा भोंवे॥ ५२०॥ न साहे नोकिलेपण। ‘तूं’ म्हणतां टाकी प्राण। ते सहावी अवस्था जाण। तरुणपण अनर्थ॥ २१॥ पंधरापासोनि पंचवीस। पूर्ण तरुणपणाचा पैस। तेथ नानाविकारी मानस। नांदवी सावकाश देहाभिमान॥ २२॥ चाळिसांपासोनि साठीवरी। देहीं उत्तरवयसा पुरी। झुरडी पडों लागे शरीरीं। इंद्रियशक्ति करी प्राशन काळ॥ २३॥ क्षीणपणाचा सुमुहूर्त। काळआरंभ करी जेथ। ते हे उत्तरावस्था येथ। जाण निश्चित सातवी॥ २४॥ तिची हातधरणी जरा। कांपवीतसे सुभटां नरां। भोग न साहे शरीरा। इंद्रियव्यापारा हारासी॥ २५॥ अस्तव्यस्त केला शरीरवेश। दांताळी पाडिली वोस। भेणें पालटे केश। धाकें सीस कांपत॥ २६॥ शरीर जराकरी क्षीण। तरी विषयावस्था अतिगहन। चिंता अनिवार दारुण। तृष्णा अपूर्ण सर्वदा॥ २७॥ तेज सांडूनि जाय नयना॥ टाळी पडोनि ठाती काना। मुखीं लागे चोर पान्हा। तरी देहाभिमाना वाढवी॥ २८॥ जरा पावलिया निजसंधी। अनिवार येती आधिव्याधी। महामोहें व्यापिजे बुद्धी। विवेक त्रिशुद्धीं बुडाला॥ २९॥ पायां पडे वेंगडी। आधार टेंकण लांकुडी। वाचा लफलफी जडत्वें गाढी। हाले होंटाची जोडी उंदिरप्राय॥ ५३०॥ डोळां चिपडीं तोंड भरे। नाकींची लोळी वोठीं उतरे। मुखींचे लाळेचिया धारें। थिथिबिबिजे उरें चिकटोनी॥ ३१॥ चुंबन मागेना तोंडाप्रती। ती थुंका म्हणोनि दूर पळती। उसंत नाहीं खोकल्या हातीं। श्वास कास उठती अनिवार॥ ३२॥ शरीरीं थरकंप उठी। तरी देहाभिमान दृढ पोटीं। अवघ्याते म्हणे धाकुटीं। सांगे जुनाट गोष्टी मोठमोठॺा॥ ३३॥ अधोवाताचें वावधान। अनिवार सुटे जाण। जीवें जितां विटंबण। हे जरा जाण आठवी अवस्था॥ ३४॥ जेवीं सुईमागें दोरा जाण। तेवीं जरेसवें असे मरण। जरा शरीर पाडीक्षीण। तंव वाजे निशाण मृत्यूचें॥ ३५॥ देहींच्या तुटल्या नाडी। वाचा हों लागे बोबडी। तरी देहाची धरी गोडी। अधिक आवडी स्त्रीपुत्रांची॥ ३६॥ मजमागें हें अनाथें। कोण सांभाळील यांतें। पोटासी धरोनि त्यांतें। रडे बहुतें आक्रोशें॥ ३७॥ द्रव्यलोभ अतिकठिण। अंतीं न वेंची आपण। दूरी करूनि इतर जन। सांगे उणखूण ठेव्याची॥ ३८॥ नवल वासनाविंदान। विसरोन देहाचें स्मरण। सर्वस्वें जे धरिजे आठवण। तेंचि आपण दृढ होय॥ ३९॥ या देहाची नि:शेष आठवण। ते नाठवणें सवेंचि जाण। चेतनासहित जाय प्राण। या नांव मरण देहाचें॥ ५४०॥ एवं गर्भादि मरणांता। या देहींच्या नव अवस्था। येथ आत्म्याची अलिप्तता। स्वभावतां देहासी॥ ४१॥ देहअवस्था विकारवंता। आत्मा अलिप्त अविकारता। म्हणसी देहविकारा जडता। यासी विकारता घडे केवीं॥ ४२॥ सूर्य थापटूनि जन। कदा नुठवी आपण। तो प्रकाशतांचि जाण। सहजें जन चेतवे॥ ४३॥ त्या जनाची कर्मकर्तव्यता। सूर्याअंगीं न लगे सर्वथा। तेवीं प्रकाशोनि विकारता। अलिप्त तत्त्वतां निजात्मा॥ ४४॥ झालिया सूर्यकिरण प्राप्त। जेवीं अग्नि स्रवे सूर्यकांत। तेणें याग कां दाघ होत। त्या कर्मातीत सूर्य जैसा॥ ४५॥ तेवीं चित्प्रकाशें मन। शुभाशुभ कर्में करी जाण। त्या मनोविकारा चिद्भान। अलिप्त जाण निजात्मा॥ ४६॥ येथ मन:कृत विकार पूर्ण। मन:कृत कर्माकर्म जाण। मन:कृत जन्ममरण। स्वर्गनरक गमन मन:कृत॥ ४७॥ मन:कृत लक्ष्यालक्ष्य। मन:कृत बंधमोक्ष। तेंचि निरूपण प्रत्यक्ष। श्रीकृष्ण अध्यक्ष सांगत॥ ४८॥
एता मनोरथमयीर्ह्यन्यस्योच्चावचास्तनू:।
गुणसङ्गादुपादत्ते क्वचित्कश्चिज्जहाति च॥ ४७॥
संसारविकाराचें भान। अभिमानयुक्त करी मन। स्वर्गनरक गमनागमन। देहाभिमान भोगवी॥ ४९॥ आत्मा याहूनि सहजें भिन्न। चिन्मात्रैक चिद्धन। तेथ आतळों न शके मन। शुद्धीं अभिमान असेना॥ ५५०॥ मन अभिमान प्रसवे माया। अभिमानें गुण आणिले आया। गुणीं मायिक केली काया। विकारसामग्रियासमवेत॥ ५१॥ जैशी देहापाशीं छाया। तैशी स्वरूपीं मिथ्या माया। जेथ जन्ममरणेंसीं काया। रिघावया ठावो नाहीं॥ ५२॥ आत्मा शुद्ध काया मलिन। काया जड आत्मा चिद्धन। अज अव्यय आत्मा परिपूर्ण। जन्ममरण देहासी॥ ५३॥ तिनी गुण तिनी अवस्था। कार्य कर्म अहंकर्ता। हें देहाभिमानाचे माथां। आत्मा सर्वथा अलिप्त॥ ५४॥ यापरी विकारांहून। आत्मा चिद्रूपें सहज भिन्न। म्हणशी जीवास देहाभिमान। तेंही कथन अवधारीं॥ ५५॥ जीव अलिप्त मायागुणीं। ऐक सांगेन ते काहाणी। स्फटिक ठेविजे जैशा वर्णीं। तद्रूपपणीं तो भासे॥ ५६॥ हो कां तद्रूपपणेंही दिसतां। स्फटिक अलिप्त निजशुद्धता। तेवीं सत्त्वादि गुणीं क्रीडतां। जीव तत्त्वतां अलिप्त॥ ५७॥ स्फटिक काजळीं दिसे काळा। परी तो काळेपणा वेगळा। तेवीं तमोगुणें जीवू मैळा। दिसोनि निराळा तमेंसीं॥ ५८॥ स्फटिक आरक्तीं आरक्तकिळा। दिसोन आरक्तते वेगळा। तेवीं रजोगुणीं राजसलीळा। भोगूनि वेगळा जीवात्मा॥ ५९॥ स्फटिक श्वेतवर्णीं दिसे श्वेत। परी तो श्वेतपणा अलिप्त। तेवीं सत्त्वीं दिसे ज्ञानवंत। गुणज्ञानातीत जीवात्मा॥ ५६०॥ त्रिगुण गुणेंसीं अलिप्तता। दाविली जीवशिवांची तत्त्वतां। देहीं असोनि नि:संगता। ऐक आतां सांगेन॥ ६१॥ जेवीं घटामाजील जीवन। घटीं चंद्रबिंब आणी जाण। तेवीं शुद्धासी जीवपण। देहाभिमान देहीं देखे॥ ६२॥ घटनिश्चळत्वें बिंब निश्चळ। घटचंचलत्वें तें चंचळ। तेवीं देहाच्या अवस्था सकळ। मानी केवळ जीवात्मा॥ ६३॥ घटीं कालविल्या अंजन। तरी तें काळें होय जीवन। परी बिंबप्रतिबिंबा जाण। काळेपण लागेना॥ ६४॥ तेवीं देहाची सुखदु:खकथा। कां पापपुण्यादि जे वार्ता। नाहीं जीवशिवांच्या माथां। देह अहंता ते भोगी॥ ६५॥ ये घटींचें जळ ते घटीं भरित। चंद्रबिंब असे त्याहीआंत। तेवीं या देहींचा त्या देहीं जात। जीवात्मा म्हणत या हेतू॥ ६६॥ चंद्र गगनीं अलिप्त असे। तो मिथ्या प्रतिबिंबें घटीं भासे। तेवीं वस्तु वस्तुत्वें सावकाशें। जीवू हें पिसें देहात्मता॥ ६७॥ त्रिगुणगुणीं गुणातीत। देही देहसंगा अलिप्त। जीव शिव दोनी येथ। तुज म्यां साद्यंत दाखविले॥ ६८॥ हें नेणोनियां समस्त। देहात्मवादें जाहले भ्रांत। स्वर्गनरकादि आवर्त। योनी भोगवीत अभिमान॥ ६९॥ द्विजदेह आरंभूनि येथ। परमेष्ठिदेहपर्यंत। स्वर्गसुख देहें समस्त। भोगवी निश्चित पुण्याभिमान॥ ५७०॥ याहूनियां अधोमुख येथ। द्विजत्वाहूनि खालते जात। नाना दु:खयोनी भोगवित। जाण निश्चित पापाभिमान॥ ७१॥ येथ पापपुण्यकर्माचरण। तें वाढविताहे जन्ममरण। यांत विरळा सभाग्य जाण। जन्ममरणच्छेदक॥ ७२॥ ज्यांसी निष्काम पुण्याचिया कोडी। जिंहीं स्वधर्म जोडिला जोडी। ज्यांसी भूतदया गाढी। ज्यांची आवडी द्विजभजनीं॥ ७३॥ जे अहिंसेसी अधिवास। ज्यांचें अद्वैतपर मानस। जे सारासारराजहंस। जन्ममरणांचा त्रास घेतला जिंहीं॥ ७४॥ जे उपनिषदर्थचातक। जे जीवजनकाचे शोधक। जे निजात्मतत्त्वसाधक। जे विश्वासुक भावार्थी॥ ७५॥ ज्यांसी संतचरणीं सद्भावो। जे गुरुवचनीं विकले पहा हो। त्यांसी देहीं विदेहभावो। मत्कृपें पहा हो पावती॥ ७६॥ तेही निजबोधें देहाची बेडी। तोडूनि जन्ममरणाची कोडी। उभवूनि सायुज्याची गुडी। परापरथडी पावले॥ ७७॥ त्यांसी संसाराचे आवर्त। सर्वथा गेले न लगत। जेवीं बुडण्याचा संकेत। मृगजळाआंत असेना॥ ७८॥ ऐसे प्राप्तपुरुष येथ। संसारीं नाहींत गा बहुत। हिंडतां अवघ्या जगांत। एकादा कदाचित देखिजे॥ ७९॥ असो देखिल्याही त्यातें। कोण आहे ओळखतें। उद्धवा जाण निश्चितें। आत्मा येथें दिसेना॥ ५८०॥ जरी निकट भेटला ज्ञाता। त्याचा देह देखिजे वर्ततां। परी भीतरील निजात्मता। न दिसे सर्वथा कोणासी॥ ८१॥ आत्मा गेला आला म्हणती। शेखीं येणें जाणें न देखती। तेच विषयींची उपपत्ती। स्वयें श्रीपती सांगत॥ ८२॥
आत्मन: पितृपुत्राभ्यामनुमेयौ भवाप्ययौ।
न भवाप्ययवस्तूनामभिज्ञो द्वयलक्षण:॥ ४८॥
म्हणती पित्याचा आत्मा गेला। यालागीं पितृदेह नासला। परी पैल तो आत्मा गेला। ऐसा नाहीं देखिला कोणींही॥ ८३॥ म्हणती पुत्रजन्में आत्म्यासी जन्म। करितां पुत्राचें जातककर्म। देखिजे देहाचा संभ्रम। आत्मा दुर्गम दिसेना॥ ८४॥ येथ आत्म्यासी येणेंजाणें। सर्वथा नाहीं पूर्णपणें। देहासीचि जन्ममरणें। येणेंजाणें दृष्टांतें॥ ८५॥ प्रत्यक्ष देहासी जन्मनाश। आत्मा साक्षित्वें अविनाश। येचि अर्थीं विशद विलास। स्वयें हृषीकेश सांगत॥ ८६॥
तरोर्बीजविपाकाभ्यां यो विद्वाञ्जन्मसंयमौ।
तरोर्विलक्षणो द्रष्टा एवं द्रष्टा तनो: पृथक्॥ ४९॥
बीजपरिपाकें वाढले वृक्षीं। पर्वत त्या वृक्षाचा साक्षी। तो पर्वत वृक्षच्छेदनें नव्हे दु:खी। तेवीं द्रष्टा साक्षी देहाचा॥ ८७॥ द्रष्टा साक्षी देहमात्रासी। ते देहधर्म न लगती द्रष्टॺासी। तो देहीं असोनि विदेहवासी। भवबंध त्यासी स्पर्शेना॥ ८८॥ हा अर्थ नेणोनि अविवेकी। अतिबद्ध जाहले ये लोकीं। तोचि अर्थ पांच श्लोकीं। श्रीकृष्ण स्वमुखीं सांगत॥ ८९॥
प्रकृतेरेवमात्मानमविविच्याबुध: पुमान्।
तत्त्वेन स्पर्शसम्मूढ: संसारं प्रतिपद्यते॥ ५०॥
कर्माकर्मकर्तेपण। आत्म्यासी सर्वथा नाहीं जाण। येचि अर्थींचें निरूपण। मागां संपूर्ण सांगीतलें॥ ५९०॥ आत्मा नातळे तिन्ही गुण। देही देहातीत जाण। प्रकृतीहून पुरुष भिन्न। हें निजात्मज्ञान जो नेणे॥ ९१॥ तोचि संसाराचा आपण। घरजांवई झाला जाण। देहाभिमानासी संपूर्ण। एकात्मपण मांडिलें॥ ९२॥ विषयभोग तोचि पुरुषार्थ। ऐसें मानूनियां निश्चित। शुभाशुभ कर्मीं येथ। भोगवीत नाना योनी॥ ९३॥ विषयभोग अभिमानें जाण। पुढती जन्म पुढती मरण। नाना योनीं आवर्तन। देहाभिमान भोगवी॥ ९४॥ तें नाना योनीं गर्भदु:ख। देहाभिमानें भोगितीमूर्ख। तेंचि नाना तत्त्वांचें रूपक। यदुनायक सांगत॥ ९५॥
सत्त्वसङ्गादृषीन् देवान् रजसासुरमानुषान्।
तमसा भूततिर्यक्त्वं भ्रामितो याति कर्मभि:॥ ५१॥
देहाभिमानाचिये स्थिती। त्रिगुण गुणांचीं कर्में होती। तेणें त्रिविध संसारप्राप्ती। ऐकनिश्चितीं उद्धवा॥ ९६॥ न करितां कृष्णार्पण। सात्त्विक कर्म कीजे आपण। तेणें क्षोभें सत्त्वगुण। उत्तम देह जाण उपजवी॥ ९७॥ सत्त्वाच्या अति उत्कर्षगतीं। देवऋषि ब्रह्मऋषि होती। सत्त्वाच्या समसाम्यस्थितीं। कल्पायु जन्मती आजानुबाहो॥ ९८॥ सत्त्वगुणें क्रियायुक्त। स्वर्गीं देव होती स्वर्गस्थ। भोगक्षयें अध:पात। या योनीं जनित सत्त्वगुणें॥ ९९॥ आश्रयूनि राजस गुण। करितां राजस कर्माचरण। तेणें क्षोभला रजोगुण। योनि कोण उपजवी॥ ६००॥ राजस कर्म ब्रह्मीं अर्पिती। ते दैत्यही भगवद्भक्त होती। जे रजउत्कर्षें भोग वांछिती। ते असुर होती महायोद्धे॥ १॥ रजोगुणें स्वकर्माचरण। तेणें कर्में जन्मती ब्राह्मण। रजतारतम्यें जाण। चारी वर्ण जन्मती॥ २॥ तामसाचे संगतीं जाण। करितां तमिष्ठ कर्माचरण। तेणें क्षोभला जो तमोगुण। तो नीच योनी दारुण उपजवी॥ ३॥ भूत प्रेत पिशाचक। तिर्यग्योनि असंख्य। वृक्ष पर्वत पाषाण देख। या योनी अनेक भोगवी॥ ४॥ आशंका॥ कर्म त्रिगुणात्मक साचार। परी कर्मफळभोक्ता ईश्वर। हा वेदशास्त्रें विचार। केला निर्धार तुम्हींही॥ ५॥ देहसाक्षित्वें आत्मा निराळा। ऐसा गतश्लोकीं केला निर्वाळा। जैं कर्मफळभोक्ता कर्मावेगळा। तैं कर्मफळा केवीं भोगी॥ ६॥ ऐसें आशंकेचें अंतर। जाणोनियां शार्ङ्गधर। तेचि अर्थींचें उत्तर। विशद साचार सांगत॥ ७॥
नृत्यतो गायत: पश्यन् यथैवानुकरोति तान्।
एवं बुद्धिगुणान्पश्यन्ननीहोऽप्यनुकार्यते॥ ५२॥
कलाकुशल सभानायक। त्यापुढें रंग होता कौतुक। गात्या नाचत्याचे तालथाक। स्वयें देख अनुकरे॥ ८॥ तेंचि अनुकार म्हणशी कैसें। प्रकृति केवळ जडांशें। जाणपण आत्म्यासी असे। येणें विन्यासें भोक्ता म्हणती॥ ९॥ सभेसी बैसल्या निश्चळा। रंगींच्या अनुकरे थाकताळा। तेवीं प्रकृति पुरुष वेगळा। तो प्रकृतीची लीळा अनुकरे॥ ६१०॥ आशंका॥ प्रकृतिच्छंदें अनुकारता। गुणकर्मांचा फळभोक्ता। आत्मा झाला जैं तत्त्वतां। तैं नित्यमुक्तता भंगली॥ ११॥ जो करी कर्मफळस्वादन। त्यासी लागे कर्मबंधन। कर्मास्तव जन्ममरण। आत्म्यासी जाण लागलें॥ १२॥ नित्यमुक्त अविकारी। या गोष्टी राहिल्या दूरी। आत्मा जाहला संसारी। गुणविकारीं अतिबद्ध॥ १३॥ उद्धवा तूं ऐसऐशी। आशंका झणीं धरिशी। आत्मा अलिप्त गुणकर्मांसी। दृष्टांतेंसीं हरि सांगे॥ १४॥
यथाम्भसा प्रचलता तरवोऽपि चला इव।
चक्षुषा भ्राम्यमाणेन दृश्यते भ्रमतीव भू:॥ ५३॥
जेवीं गंगातीरींचा तरू। जळीं वाहतां देखे नरू। तेवीं मायागुणअनुकारू। भासे विकारू आत्मत्वीं॥ १५॥ ज्याचे डोळां भवंडी सबळ। तो भंवतां देखे भूमंडळ। तेवीं मायिक विकारमेळ। मिथ्या केवळ आत्म्यासी॥ १६॥ जो अश्वारूढ होऊनि पाहे। जळीं प्रवाहासंमुख राहे। तो देखे मी जळीं प्रवाहें। ऐसा मिथ्या होये अनुभवू॥ १७॥ तेवीं आत्मा नित्य निर्विकार। तेथ मायावी गुणसंभार। कल्पनायोगें साचार। मानिती नर मनोमय॥ १८॥ आब्रह्मस्तंबपर्यंत। नाना योनी विकारवंत। कर्म क्रिया फळभोग येथ। जाण निश्चित मनोजन्य॥ १९॥ ऐसें सांगतां हरि सांवळा। तेणें उल्हास उद्धव जीवाला। तया आनंदाच्या कल्लोळां। उद्धवचि लीला पोखित॥ ६२०॥ निववावया उद्धवाचा ताप। स्वयें सांगे तो विश्वतोमुख। जेणें उद्धवां बहु हरिख। तेंचि श्रीकृष्ण देख सांगतसे॥ २१॥
यथा मनोरथधियो विषयानुभवो मृषा।
स्वप्नदृष्टाश्च दाशार्ह तथा संसार आत्मन:॥ ५४॥
आत्मा निजमुक्त अविकारी। तो संकल्पें कीजे विकारी। असंसारी परी संसारी। मनोविकारीं मानिजे॥ २२॥ ऐसें दुजयावीण कांहीं। कथा वार्ता सांगतां नाहीं। एक श्रोता दुसरा वक्ता पाहीं। यालागीं येही उपाये॥ २३॥ जेवीं एकटा क्रमेना पंथ। मी राजा करी मनोरथ। परचक्र कल्पूनि तेथ। होय उद्यत युद्धासी॥ २४॥ तो युद्धआवेश कडकडाट। तेणें सत्राणें उडे उद्भट। अडखळूनि आदळे पोट। म्हणे मी घायवट पडिलों कीं॥ २५॥ मिथ्या भ्रमें पडला भुली। चालतां चालतां मृगजळीं। उतरावया पैलतीरीं। बुडी वहिली देतसे॥ २६॥ गंधर्वनगरीं प्रचंड। माडॺा सोपे उदंड। क्षणामाजीं विरस चंड। वितंड करी निर्वाळा॥ २७॥ तेवीं संसार हा काल्पनिक। तेथील सुख आणि दु:ख। मिथ्या केवळ मायिक। जाण निष्टंक निजभक्तां॥ २८॥ दाशार्हवंशीं जन्मलासी। तूं उत्तम दशा पावलासी। यालागीं म्हणे हृषीकेशी। उद्धवासी दाशार्ह॥ २९॥ जेवीं का स्वप्नभोग जाण। स्वप्नीं सत्य मानी आपण। तेवीं संसार हा दीर्घ स्वप्न। मायिक जाण मिथ्यात्वें॥ ६३०॥ जागा झालिया स्वप्न वृथा। निरहंकारीं संसार मिथ्या। हे ब्रह्मज्ञानाची मुख्य कथा। जाण तत्त्वतां उद्धवा॥ ३१॥ संसार तो कल्पनामात्र। आत्मा निर्विकार चिन्मात्र। जेवीं मृगजळ भरी भास्कर। तेवीं संसार करी आत्मा॥ ३२॥ उद्धवा तूं म्हणशी आतां। ऐकतां तुझे मुखींची कथा। संसारमिथ्या तत्त्वतां। तरी साधनावस्था कां सोसावी॥ ३३॥ जेवीं वंध्यापुत्राचें लग्न। करावया कोणीन करी यत्न। कां मृगजळीं बांधोनि धरण। पाट जाण कोणी काढीना॥ ३४॥ तेवीं मिथ्या संसारबंधन। तेथ श्रवण मनन चिंतन। विवेक वैराग्य ज्ञान ध्यान। वृथा कां जन सोशिती॥ ३५॥ उद्धवा बागुलाचें भय खोटें। परी बाळकासी सत्य वाटे। तेवीं मिथ्या संसारकचाटें। जीवींप्रकटे बद्धता॥ ३६॥ तेचि अर्थींचा दृष्टांत। स्वयें श्रीकृष्ण सांगत। मिथ्या सांसारिक येथ। भ्रमें बाधीत भ्रांतासी॥ ३७॥
अर्थे ह्यविद्यमानेऽपि संसृतिर्न निवर्तते।
ध्यायतो विषयानस्य स्वप्नेऽनर्थागमो यथा॥ ५५॥
विचारें पाहतां मिथ्या स्वप्न। तेथील विषयसेवन। सुखदु:खें बाधिती गहन। ऐक लक्षण तयाचें॥ ३८॥ स्वप्नीं पुत्रलाभ राजसन्मान। तेणें सुखें ओसंडे आपण। कां झालिया धनहरण। तेणें दु:खें दारुण आक्रंदे॥ ३९॥ त्यासी जागें न करितां। स्वप्नसुखदु:खबाधकता। निवर्तेना सर्वथा। जाण तत्त्वतां उद्धवा॥ ६४०॥ तेवीं विषयासक्त जन। ज्यांसी अखंड विषयध्यान। ज्यांचें विषयींसदा मन। देहाभिमान गोंवीत॥ ४१॥ तयांसी देखावया उपावो। जयां विषयासक्ति होय वावो। येचि अर्थींचा दृष्टांत पहा वो। स्वयें सांगे देवो उद्धवासी॥ ४२॥ न करितां श्रवण मनन। न साधितां विवेकज्ञान। न धरितां वैराग्य पूर्ण। भवभय जाण तुटेना॥ ४३॥ संसार मिथ्या तोंडें म्हणतां। नतुटे सुखदु:खभयव्यथा। जन्ममरणादि अवस्था। अहंममता सुटेना॥ ४४॥ ऐसे जे अज्ञान जन। तिंहीं अवश्य करावें साधन। विवेकें वैराग्य धरितां पूर्ण। भवबंधन निवारे॥ ४५॥ यालागीं उद्धवा जाण। सकळ साधनांचे कारण। जेणें हाता चढे ब्रह्मज्ञान। तें वैराग्य पूर्ण साधावें॥ ४६॥ ऐक विरक्तीची मागी। जैशी धडधडीत आगी। तैसें वैराग्य व्हावें अंगीं। तैं प्राप्तीलागीं अधिकारू॥ ४७॥ ऐसे मुमुक्षु जे पुरते। परम कृपेचेनि हातें। सद्गुरु थापटोनि ज्यांतें। करी अद्वैतें जागृत॥ ४८॥ ज्यासी देहादिभेदपुष्टी। मिथ्या माया गुणत्रिपुटी। ब्रह्मानंदें कोंदली सृष्टी। स्वप्नवत् दृष्टीं संसारू॥ ४९॥ येव्हडी ही परम प्राप्ती। वैराग्यविवेकें चढे हातीं। तेंचि वैराग्य उद्धवाप्रती। स्वयें श्रीपती सांगत॥ ६५०॥
तस्मादुद्धव मा भुङ्क्ष्व विषयानसदिन्द्रियै:।
आत्माग्रहणनिर्भातं पश्य वैकल्पिकं भ्रमम्॥ ५६॥
विषयांची जे आसक्ती। ते बाधक परमार्थप्राप्ती। विषय सांडीं सांडीं निश्चितीं। परतोनि हातीं नातळें॥ ५१॥ आसक्त वृत्ति इंद्रिययोग। अतिलोलुप्यें विषयभोग। तोचि मुख्यत्वें भवरोग। यालागीं त्याग करावा॥ ५२॥ विखें रांधिलें परमान्न। तें ग्रासमात्र हरी प्राण। विष एकदां मारक जाण। विषय पुन:पुन: मारक॥ ५३॥ म्हणसी प्रारब्धें भोग येती। ते त्यागिले केवीं जाती। विषयत्यागाची युक्ती। वैराग्यस्थिती घडे केवीं॥ ५४॥ प्रारब्धें विषयभोग येती। ते साधका दु:खरूप होती। वणवां मृगें आहाळती। तैशी स्थिती भोगणें॥ ५५॥ व्याघ्रमुखीं सांपडे गाये। तैसा भोगी चरफडीत जाये। ऐसेनि अनुतापें पाहें। वैराग्य होये अनिवार॥ ५६॥ वैराग्य जाहलिया धडफुडें। सद्गुरुकृपा हाता चढे। तेणें गुरुकृपाउजियेडें। संसार उडे द्वंद्वेंसीं॥ ५७॥ झालिया गुरुकृपा सुगम। सर्वत्र ठसावे परब्रह्म। तेथ जन्ममरण कैंचें कर्म। भवभ्रम असेना॥ ५८॥ तेथ वाती लावूनि पाहतां। संसार दिसेना मागुता। जेवीं निभ्रमें पाहों जातां। न लगे हाता रज्जुसर्प॥ ५९॥ भवंडीचेनि वेगवशें। भिंगोरी नीट उभी दिसे। तेवीं भ्रमाचेनि आवेशें। संसार भासे सत्यत्वें॥ ६६०॥ केवळ जो निबिड भ्रम। संसार हें त्याचें नाम। येऱ्हवीं निखिल परब्रह्म। तेथ जन्मकर्म असेना॥ ६१॥ ऐसें जरी झालें ब्रह्मज्ञान। तरी प्रारब्ध भोगावें गा जाण। जेवीं कुलाल भांडें ने आपण। परी चक्रभ्रमण राहेना॥ ६२॥ वृक्ष समूळ उपडल्या जाण। उपडितां न वचे सार्द्रपण। तेवीं होतांचि ब्रह्मज्ञान। प्रारब्ध जाण सोडीना॥ ६३॥ त्या प्रारब्धाचिये गती। विषयभोग जरी येती। तेथ उपावो न करावा निवृत्ती। निजशांती साहावें॥ ६४॥ विषयभोग आलियाही जाण। निजशांति धरोनि संपूर्ण। सुखें वर्तती साधुजन। विवेकसंपन्न क्षमावंत॥ ६५॥ हाता आलिया निजशांती। संसार बापुडा तो किती। तेचि शांतीची स्थिती। स्वयें श्रीपती सांगत॥ ६६॥ जें निजशांतीचें कल्याण। जेणें जीव पावे समाधान। तें अतिगोड निरूपण। दों श्लोकीं श्रीकृष्ण सांगत॥ ६७॥
क्षिप्तोऽवमानितोऽसद्भि: प्रलब्धोऽसूयितोऽथवा।
ताडित: सन्निबद्धो वा वृत्त्या वा परिहापित:॥ ५७॥
निष्ठितो मूत्रितो वाज्ञैर्बहुधैवं प्रकम्पित:।
श्रेयस्काम: कृच्छ्रगत आत्मनाऽऽत्मानमुद्धरेत्॥ ५८॥
देहाभिमानी तामस जन। अतिदुष्ट जे दुर्जन। तिंहीं साधूंसी करितां छळण। शांतीस्तव सज्जन क्रोधी नव्हती॥ ६८॥ अल्पउपद्रवीं जाण। न येती क्रोधा सज्ञान। तैसें नव्हे अतिनिर्वाण। पीडा दारुण करितांही॥ ६९॥ कायिक वाचिक मानसिक। त्रिविध पीडा देतां देख। साधु निजशांतीं नेटक। जाणोनि विवेक ते साहती॥ ६७०॥ उजू बोलतां शुद्ध युक्ती। आक्षेपूनि हेडाविती। झिडकावूनियां निर्भर्त्सिती। अपमानिती सभेसी॥ ७१॥ शब्दीं शब्दाचे करूनि छळ। म्हणती दुष्ट दुर्जन दु:शीळ। अपवित्र अमंगळ। नष्ट चांडाळ हा एक॥ ७२॥ ऐशा दुर्जनांच्या दुष्टोक्ती। साधु साहे निजशांती। ते शांतीची उपपत्ती। विवेकस्थिती अवधारीं॥ ७३॥ पराची जिव्हा वोठ हालती। माझ्या अंगीं ते न रुपती। यालागीं क्रोध न ये चित्तीं। निजशांती ढळेना॥ ७४॥ सभेसी सन्मानें पूजितां। लोटूनि घातला खालता। हाणोनियां चरणघाता। नेला परता अपमानें॥ ७५॥ सन्मानें जेथ पूजूं नेती। तेथ केवळ असे क्षिती। अपमानें जेथ लोटिती। तेथही क्षिती तेचि पैं॥ ७६॥ येथ मान अपमान। कल्पना मनाची जाण। ऐसेनि विवेकें सज्जन। द्वेषी ना जन निजशांती॥ ७७॥ प्रलोभूनि नाना युक्ती। धनें ठकवूनियां निर्भर्त्सिती। धनलोभ केवळ अध:पाती। त्याची निवृत्ति जिंहीं केली॥ ७८॥ त्यांसी निंदितांचि जाण। दोषी होईजे आपण। यालागीं क्रोधा न ये मन। शांति संपूर्ण ढळेना॥ ७९॥ शुद्ध बोलती शास्त्रार्थ। अर्थ तितुका अनर्थ। त्या अनर्था जो करी निवृत्त। त्यातें द्वेषित ते मूर्ख॥ ६८०॥ सद्गुणीं दोष आरोपिती। नानापरी निंदा करिती। तेणें हित मानिती चित्तीं। तारक निश्चितीं हे माझे॥ ८१॥ मातेचे जे करतळ। ते वरिवरी क्षाळिती बाह्य मळ। हे जनक माझे केवळ। सबाह्य मळ सकळ जिव्हाग्रें धुती॥ ८२॥ ऐशियांचें करितां छळण। हितास नाडिजे आपण। कोणाचे न बोले दोषगुण। तेणें शांति जाण थोरावे॥ ८३॥ चाले जेणें जीविकास्थिती। धन्य धन्य क्षेत्र वृत्ती। छळें बळें हिरोनि नेती। तेणेंही चित्तीं क्षोभ नुपजे॥ ८४॥ येथ लाभालाभ दैवाधीन। त्यासी देतें घेतें तेंचि जाण। यालागीं द्वेषीना जन। शांतीचा गुण न सांडी॥ ८५॥ वृत्ति घेऊनि उगे नसती। अन्यायी म्हणोनि बांधिती। एक तोंडावरी थुंकिती। एक माथां मुतती अतिदुष्ट॥ ८६॥ एक ताडिती पाडिती। एक नानापरी गांजिती। तरी अंगींची ढळेना शांती। विवेक सांगाती सज्जना॥ ८७॥ थुंका आणि जें मूत। तें देहाचिमाजीं उपजत। देहींचें देहास लागत। क्षोभ तेथ कोण मानी॥ ८८॥ थुंका आणि जें मूत। जैसें देहीं उपजे देहाचें अपत्य। देहाचें देहावरीखेळत। दु:ख तेथ कोणांचें॥ ८९॥ धरितां मारितां म्हणे देख। देहो तितुका पांचभौतिक। मारिता मारिजता दोनी एक। कोणाचें दु:ख कोणासी॥ ६९०॥ ऐशी सविवेकें ज्यासी शांती। चारी मुक्ती त्याच्या दासी होती। त्याचा अंकिला मी श्रीपती। यावरी प्राप्ती ते कायी॥ ९१॥ तेथ केवळ जो मोक्षार्थी। तेणें सर्वस्वें पाळावी शांती। ते दु:खसागरावर्तीं। होय तारिती सुखरूप॥ ९२॥ वैराग्ययोग ज्ञान ध्यान। त्याचें फळ तें शांति जाण। ते शांति साधूनि संपूर्ण। आपणिया आपण उद्धरिती॥ ९३॥ यालागीं उद्धवा जाण। साहोनि द्वंद्वांचें काठिण्य। शांति साधूनि संपूर्ण। ब्रह्म परिपूर्ण पावावें॥ ९४॥ पूर्ण ब्रह्म पावल्यापाठीं। जन्ममरणाची खुंटे गोठी। परमानंदें पडे मिठी। भवभयाची तुटी तैं होय॥ ९५॥ ऐकोनि श्रीकृष्णाचे बोला। उद्धव अत्यंत चाकाटला। द्वंद्वबाधजो ऐकिला। तो न वचे साहिला आम्हांसी॥ ९६॥ ऐकिल्या नाहीं ये शांतीच्या गोष्टी। माकेवीं देखिजेल दृष्टीं। ऐशी शांति ज्याच्या पोटीं। तो पुरुष सृष्टीं नसेल॥ ९७॥ मागें ऐकिली ना देखिली। ऐशी शांति त्वां कैंची काढिली। हे ऐकतां तुझी बोली। भयें दचकली बुद्धि माझी॥ ९८॥ ऐशी शांति ज्यासी आहे। तो मागें झाला ना पुढें होये। देवो बोलिला निजनिर्वाहें। तें दु:सह होये आम्हांसी॥ ९९॥ ज्या सांगीतलें द्वंद्वांसी। तें अतिदु:सह योगियांसी। केवीं साहवे आम्हांसी। तेंचि देवासी पूसत॥ ७००॥
उद्धव उवाच
यथैवमनुबुद्धॺेयंवद नो वदतां वर।
सुदु:सहमिमं मन्ये आत्मन्यसदतिक्रमम्॥ ५९॥
विदुषामपि विश्वात्मन् प्रकृतिर्हि बलीयसी।
ऋते त्वद्धर्मनिरतान् शान्तांस्ते चरणालयान्॥ ६०॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायामेकादशस्कन्धे द्वाविंशोऽध्याय:॥ २२॥
जे सांगों जाणती वेदशास्त्रार्था। ते वक्ते म्हणिपती तत्त्वतां। त्या वक्त्यांमाजीं तुझी श्रेष्ठता। मुख्य वेदांचा वक्ता तूं होसी॥ १॥ शास्त्रें लाहोनि तुझी युक्ती। तुझी तुज प्रतिपादिती। ते परोक्षवादें थोंटावती। श्रुति ‘नेति नेति’ परतल्या॥ २॥ त्या तुझे मुखींच्या ज्ञानोक्ती। कृपेनें ऐकोनि कृपामूर्ती। श्रवणाचें भाग्य वानूं किती। जे ऐकती ते धन्य॥ ३॥ ऐसऐशिया अतियुक्तीं। उद्धवें प्रार्थिला श्रीपती। हात जोडूनि परम प्रीतीं। म्हणे विनंती अवधारीं॥ ४॥ स्वामी बोलती अतिअगाध। हें बोलणें परम शुद्ध। माझे बुद्धीसी नव्हे बोध। पराचे अपराध कोण साहे॥ ५॥ सोसावे पराचे अपराध। तेंही कठिणत्वें अतिविरुद्ध। हा दु:सह महाबोध। कैसेनी द्वंद्व साहावे॥ ६॥ उत्तमें केलिया अपराधा। कोटींमाजीं साहे एकादा। परी नीचाची विरुद्ध बाधा। कोणीही कदा न साहे॥ ७॥ ज्याचें न व्हावें दर्शन। ज्यासी करूं नये नमन। त्याचे मस्तकीं वाजतां चरण। साहेल कोण गोविंदा॥ ८॥ ज्याचा नि:शेष जाय प्राण। तोचि साहे हें कठिण। जो होय सचेतन। त्यासी सर्वथा जाण न साहवे॥ ९॥ इतरांची कायसी कथा। सज्ञान जे कां तत्त्वतां। तेही अतिक्रमू न साहती अल्पतां। मा अपमानता कोण साहे॥ ७१०॥ क्रोध जाहला कपिलमहामुनीसी। तेणें भस्म केलें सगरांसी। नारदें कुबेरपुत्रांसी। वृक्षत्वासी आणिलें॥ ११॥ दुर्वासाची सांगतां गोठी। त्याची कथा आहे मोठी। कोप आला शृंगीचे पोटीं। मेल्या सर्पासाठीं शापिलें॥ १२॥ मुख्यत्वें शांति सनकादिकांसी। द्वारीं आडकाठी केली त्यांसी। वैकुंठीं क्षोभूनि आवेशीं। जयविजयांसी शापिलें॥ १३॥ सज्ञानाची ऐशी स्थिती। मा इतरांची कोण गणती। परापराधसहनशांती। दुर्लभ त्रिजगतीं गोविंदा॥ १४॥ प्रकृति निजगुणीं सबळ। ते अल्पें क्षोभवीं तत्काळ। साधु सज्जन केवळ। करी विकळ अशांती॥ १५॥ ज्यासी तुझी पूर्ण भक्ति घडे। ज्यासी तुझी पूर्ण कृपा जोडे। जो तुझे चरणीं अखंड जडे। त्यासी घडे हे शांती॥ १६॥ तूं विश्वात्मा त्रिजगतीं। चोरी न चले तुजप्रती। मज हीं द्वंद्वें न साहवती। तूंही श्रीपती जाणसी॥ १७॥ परम पावन निजशांती। अतिनिंद्य ते अशांती। ऐसें व्याख्यान जे ज्ञाते करिती। तेही न साहती द्वंद्वांतें॥ १८॥ द्वंद्वें दु:सह सर्वार्थीं। तेथें माझा पाड किती। एवं द्वंद्वसहिष्णुतेची युक्ती। मज कृपामूर्ति सांगावी॥ १९॥ सकल साधनें वश्य होती। परी हे सहिष्णुता न ये चित्तीं। ते मी लाभें निजशांती। ऐशी कृपा निश्चितीं करावी॥ ७२०॥ मी शांतीचें लाभें कल्याण। ऐशीकृपा करावी परिपूर्ण। म्हणोनि धरिले श्रीचरण। उद्धवें आपण निजभावें॥ २१॥ ऐकोनि उद्धवाची विनंती। संतोषला कृपामूर्ती। जेवीं चातकाचिया तृषार्तीं। गर्जोनि त्रिजगती निववी मेघ॥ २२॥ तेवीं भक्तवचनासरिसा। उल्हासला कृष्ण कैसा। उद्धवाचिया निजमानसा। शांतीचा ठसा घालील॥ २३॥ उद्धवप्रश्नाचें प्रत्युत्तर। उदार सुंदर गुणगंभीर। उघडोनि शांतीचें भांडार। स्वयें शार्ङ्गधर सांगेल॥ २४॥ नवल सांगती ते टेव। युक्तिचातुर्यवैभव। निजशांतीस पडे खेंव। ऐसें अपूर्व सांगेल॥ २५॥ श्रीकृष्णमुखींच्या ज्ञानोक्ती। ऐकतां स्वयंभ प्रकटे शांती। ते ऐकावया उद्धव चित्तीं। जाहला निश्चितीं सावध॥ २६॥ जेवीं गजग्रहणाविखीं पंचानन। साटोप धरी आपण। तेवीं शांति साधावया जाण। सावधान उद्धव॥ २७॥ जळीं तळपतांचि मासा। कवडा झेलूनि ने आकाशा। तेवीं शांतीचिया आमिषा। उद्धव तैसा तळपत॥ २८॥ तें भिक्षुगीतनिरूपण। पुढिले अध्यायीं श्रीकृष्ण। निजशांति बाणे संपूर्ण। तेंचि लक्षण सांगेल॥ २९॥ ज्यांसी परमार्थाची चाड। तिंहीं सांडूनि साधन कवाड। शांतिसाधनीं श्रद्धा वाड। अतिदृढ राखावी॥ ७३०॥ श्रीकृष्ण सांगेल शांति पूर्ण। उद्धव तया अर्थीं सावधान। एका विनवी जनार्दन। श्रोतां अवधान मज द्यावें॥ ७३१॥
इति श्रीभागवते महापुराणे एकादशस्कंधे श्रीकृष्णोद्धवसंवादे एकाकारटीकायां द्वाविंशोऽध्याय:॥ २२॥ श्रीकृष्णार्पणमस्तु॥ श्लोक॥ ६०॥ ओव्या॥ ७३१॥
॥ श्री ॐ तत्सत्-श्रीकृष्ण प्रसन्न॥
अध्याय तेविसावा
श्रीगणेशाय नम:॥ श्रीकृष्णाय नम:॥ ॐ नमो सद्गुरु विश्वरूप। विश्वा सबाह्य तूं चित्स्वरूप। तुझें निर्धारितां रूप। तूं अरूप अव्यय॥ १॥ चराचर जें सावेव। ते तुज अरूपाचे अवेव। जीवशीव हे तुझी माव। अद्वयवैभव पै तुझें॥ २॥ घृतपुतळी दिसे साकार। घृतपणें ते निराकार। तैसा तूं अव्यय अक्षर। जगदाकार भाससी॥ ३॥ ठसावलें जें दिसे जग। निर्धारितां तुझें अंग। अंग पाहतां तूं अनंग। अनंगाचा माग तुजमाजीं नाहीं॥ ४॥ देखिजे तें तूं नव्हसी। नव्हे तें तूंचि होसी। होणें न होणें नाहीं तुजपाशीं। ऐसा तूं जगासी जगद्गुरु॥ ५॥ शब्द तुज होनियां दूरी। तूं शब्दा सबाह्य अंतरीं। बोलका तूं चराचरीं। वेदशास्त्रीं तूं वक्ता॥ ६॥ उंसापासून गोडी दिसे। उंसा सबाह्य गोडीचि असे। गोडियेमाजीं ऊंस नसे। वेदांसी तुज तैसें सौजन्य॥ ७॥ वेदांचा वक्ता तूंचि होसी। वेदीं प्रतिपादिजे तुम्हांसी। शेखीं वेदांसी नाकळसी। नि:शब्दवासी गुरुराया॥ ८॥ जेवीं कां नि:शब्द अनाहतध्वनी। असे ध्वनिमात्रीं मिळूनी। तो अनाहत वाजविजे जनीं। ऐसें नाहीं कोणी वाजंत्र॥ ९॥ तेवीं तूं वेदांचा वक्ता। सकळ शास्त्रां युक्तिदाता। परी वेदशास्त्रार्थसंमता। तुज तत्त्वतां न बोलवे॥ १०॥ म्हणों तूं केवळ नि:शब्द। तंव नि:शब्द आणि सशब्द। हाही मायिक अनुवाद। तूं एवंविध न कळसी॥ ११॥ तूं न कळसीचि तत्त्वतां। ऐशिया युक्तींचा तूंचि विज्ञाता। ज्ञाताचि हें जंव स्थापूं जातां। तंव अज्ञानता असेना॥ १२॥ जेथ अज्ञानता नाहीं। तेथ ज्ञातेपण कैंचें कायी। हो कां मुख्यत्वें नोवरी नाहीं। तैं नोवरी पाहीं म्हणे कोण॥ १३॥ ज्ञाता ना अज्ञाता। तूं बोलता ना न बोलता। तूं बहु ना एकुलता। तुझी अलक्ष्यता लक्षेना॥ १४॥ तूं नि:शब्द निर्विकार। तू निर्गुण निरहंकार। हेंही म्हणतां पडे विचार। तूं जगदाकार जगदात्मा॥ १५॥ जगदाकारें तूं प्रसिद्ध। तेथ कोणाचें कोणा बाधे द्वंद्व। पर नाहीं मा परापराध। अतिविरुद्ध कोणासी॥ १६॥ यापरी सद्गुरुनाथा। तुझे चरणीं द्वंद्वसमता। तेणें समसाम्यें निजकथा। श्रीभागवता चालविसी॥ १७॥ तेंचि श्रीभागवतीं। बाविसावे अध्यायाअंतीं। उद्धवें पुशिलें निजशांती। द्वंद्वसमाप्तिउपावो॥ १८॥ उद्धवें प्रश्न केला वाड। जेणें ब्रह्मज्ञानाची पुरे चाड। तो श्रीशुकासी लागला गोड। तेणें पुरे कोड परीक्षितीचें॥ १९॥ ऐकोनि उद्धवाची प्रश्नोक्ती। शुक सुखावला आनंदस्फूर्ती। तो म्हणे सावध परीक्षिती। तुष्टला श्रीपती उद्धवासी॥ २०॥ ब्रह्मज्ञानाची निर्वाणस्थिती। ते जाण पां मुख्यत्वेंशांती। ते उद्धवें पुशिली अतिप्रीतीं। तेणें श्रीपती संतोषला॥ २१॥ तो शांति आणि निवृत्ती। सांगेल चौं अध्यायोक्ती। ऐक राया परीक्षिती। ते मी तुजप्रती सांगेन॥ २२॥ ऐकें पांडवकुलदीपका। कौरवकुळीं कुलतिलका। तूं शांतीसी अधिकारी निका। निजात्मसुखा साधकू॥ २३॥ साधावया ब्रह्मप्राप्ती। तूं त्यक्तोदक श्रवणार्थीं। यालागीं शांति आणि निवृत्ती। ऐक नृपती हरि सांगे॥ २४॥ तेविसावे अध्यायीं निरूपण। दुर्जनीं क्षोभविलें मन। त्या मनासी ये क्षमा पूर्ण। तेंचि श्रीकृष्ण सांगेल॥ २५॥ भिक्षुगीतसंरक्षण। तें मनोजयाचें लक्षण। प्रकृतिजयाचें निरूपण। सांगेल संपूर्ण चोविसावा॥ २६॥ सांगोनि त्रिविध त्रिगुण। परी लक्षविलें निजनिर्गुण। हें गुणजयाचें निरूपण। सुलक्षण पंचविसावा॥ २७॥ सव्विसावा अध्यावो येथ। तो धडधडीत विरक्त। सांगोनियां ऐलगीत। स्त्रियादि समस्त विषयत्यागू॥ २८॥ गुण विषय प्रकृति मन। या चहूंचें समाधान। चहूं अध्यायीं विशद जाण। स्वमुखें श्रीकृष्ण सांगेल॥ २९॥ यापरी परीक्षितीस जाण। करोनियां सावधान। श्रीशुकयोगींद्र आपण। कथालक्षण निरूपी॥ ३०॥
बादरायणिरुवाच
स एवमाशंसित उद्धवेन
भागवतमुख्येन दाशार्हमुख्य:।
सभाजयन् भृत्यवचो मुकुन्द-
स्तमाबभाषे श्रवणीयवीर्य:॥ १॥
शुक म्हणे परीक्षिती। ऐकोनि उद्धवाची विनंती। वचनें संतोषला श्रीपती। तो उद्धवाप्रती संबोधी॥ ३१॥ कोटि जन्मांतीं केवळ। द्विजत्वें पाविजे सत्कुळ। हें महापुण्याचें निजफळ। तेंचि निष्फळ हरिभक्तीविणें॥ ३२॥ सदा सफळ आंब्याचा रुख। त्यावरी उपजे कांवरुख। तो सफळींही निष्फळ देख। तैसे उत्तम लोक भजनेंवीण॥ ३३॥ ते स्थिति नाहीं उद्धवापासीं। उत्तम जन्म यादववंशीं। सभासदता आल्याही हातासी। श्रीमदासी भुलेचिना॥ ३४॥ झालियाही राज्यसंपत्ती। जो विसंबेना भगवद्भक्ती। भागवतमुख्यत्वाची प्राप्ती। त्यासीच निश्चितीं महाराजा॥ ३५॥ सगुण सुंदर पतिव्रता। अनुकूळ मिळालिया कांता। जो विसंबेना भगवत्पथा। भागवतमुख्यता त्या नांव॥ ३६॥ इंहीं गुणीं अतियुक्त। विवेकेंसीं अतिविरक्त। श्रीकृष्णचरणीं अनुरक्त। मुख्य भागवत उद्धवू॥ ३७॥ वयें धनें जें श्रेष्ठपण। तें श्रेष्ठत्व अतिगौण। भगवत्प्राप्ती ते श्रेष्ठ जाण। तेणें भाग्यें परिपूर्ण उद्धवू॥ ३८॥ जो श्रीकृष्णाचा विश्वासी। श्रीकृष्ण एकांत करी ज्यासी। गुण ज्ञान सांगे ज्यापाशीं। त्याच्या भाग्यासी केवीं वानूं॥ ३९॥ परब्रह्म जें कां साक्षात। जें उद्धवासी झालें हस्तगत। त्याच्या बोलामाजीं वर्तत। भाग्यें भाग्यवंत तो एक॥ ४०॥ उद्धवभाग्य वानित वानित। शुक झाला सद्गदित। स्वानंदें वोसंडला तेथ। ठेला तटस्थ महासुखें॥ ४१॥ उद्धवभाग्याचा उद्रेक। सांगतां वोसंडला श्रीशुक। तें देखोनि कुरुनायक। जाहला आत्यंतिक विस्मित॥ ४२॥ ज्याचें निजभाग्य सांगतां। श्रीशुकासी होतसे अवस्था। उद्धव भाग्याचा तत्त्वतां। मजही सर्वथा मानला॥ ४३॥ तंव शुक म्हणे रायासी। परम भाग्य तें उद्धवासी। तेणें विनवितां हृषीकेशी। वचन मात्रेंसीं तुष्टला॥ ४४॥ उद्धवासी शांतीची चाड। तो प्रश्न श्रीकृष्णांसी झाला गोड। त्याचें पुरवावया कोड। निरूपण वाड सांगेल॥ ४५॥ परम शांतीचा अधिकारी। तूंचि एक निजनिर्धारीं। ऐसें उद्धवप्रेमपुरस्करीं। शांति श्रीहरि सांगत॥ ४६॥
श्रीभगवानुवाच
बार्हस्पत्य स वै नात्र साधुर्वै दुर्जनेरितै:।
दुरुक्तैर्भिन्नमात्मानं य: समाधातुमीश्वर:॥ २॥
उद्धवा तू जें बोलिलासी। मीही सत्य मानीं त्यासी। दुर्जनीं केल्या अपमानासी। सहावया कोणासी शांति नाहीं॥ ४७॥ देव पादुका वाहती शिरसीं। मुख्य इंद्र लागे ज्याच्या पायांसीं। अष्ट महासिद्धि ज्याच्या दासी। ब्रह्मज्ञान ज्यापाशीं वचनांकित॥ ४८॥ ऐसा देवगुरु बृहस्पती। त्याचा शिष्य तूं विवेकमूर्ती। यालागीं शांतीच्या साधक युक्ती। तूंचि निश्चितीं जाणसी॥ ४९॥ शांति आकळावया उद्धवासी। आदरें सत्कारी हृषीकेशी। अनुमोदूनि त्याचे बोलासी। शुद्ध शांतीसी हरि सांगे॥ ५०॥ निंदा अवज्ञा हेळण। दुर्जनीं केलिया अपमान। हें साहे तो ईश्वर जाण। निजबोधें पूर्ण तो मद्रूप॥ ५१॥ ज्यासी सर्वभूतीं निजात्मता। दृढ बाणलीसे तत्त्वतां। तो दुर्जनाचिया आघाता। साहे सर्वथा यथासुखें॥ ५२॥ जो स्वयें होय अवघें जग। त्यासी लागतां उपद्रव अनेग। उठेना क्रोधाची लगबग। साहे अनुद्वेग यथासुखें॥ ५३॥ निजांगीं लागतां निजकर। नुठी क्रोधद्वेषांचा उद्गार। निजात्मता जो देखे चराचर। शांति त्याचें घर स्वयें रिघे॥ ५४॥ उद्धवा ऐसा ज्यासी निजबोधू। त्यासी म्हणिजे सत्य साधू। तोचि साहे पराचा अपराधू। शांतिशुद्ध तो एक॥ ५५॥ नेणोनियां निजबोधातें। इतर जे सज्ञान ज्ञाते। ते न साहती द्वंद्वातें। ऐक तूतें सांगेन॥ ५६॥
न तथा तप्यते विद्ध: पुमान्बाणै: सुमर्मगै:।
यथा तुदन्ति मर्मस्था ह्यसतां परुषेषव:॥ ३॥
तिख्याचे अतितिख बाण। जेणें घायें होती विकळ प्राण। त्याहूनि दुर्जनाचे वाग्बाण। अधिक जाण रुपती॥ ५७॥ लोहाचे बाण जेथ लागती। तेचि अंगें व्यथित होती। परी वाग्बाणांची अधिक शक्ती। घायें भेदिती पूर्वज॥ ५८॥ लोहबाणाचे लागलिया घाये। ते पानपाल्या व्यथा जाये। परी वाग्बाण रुपल्या पाहें। तें शल्य राहे जन्मांत॥ ५९॥ वर्मस्पर्शाचें बासटें जाण। विंधितां निंदेचे वाग्बाण। तेणें भेदितांचि अंत:करण। सर्वांगीं पूर्ण भडका उठी॥ ६०॥ दुर्जनाचिया दुरुक्ती। अपमानाची उद्धती। साहावयालागीं शांती। नव्हे निश्चितीं प्राकृतां॥ ६१॥ ऐशिया रीतीं यथोचित। उद्धवाचें मनोगत। संलक्षूनि श्रीकृष्णनाथ। शांतीचा निश्चितार्थ सांगों पाहे॥ ६२॥ पूर्वीं सांगीतलें निजशांतीसी। वेगीं साधीं म्हणे उद्धवासी। ते अटक वाटेल तयासी। अतिसंकोचासी पावेल॥ ६३॥ होतें उद्धवाचे मानसीं। हे शांति असाध्य सर्वांसी। जाणोनियां हृषीकेशी। सांगे इतिहासेंसीं भिक्षुगीत॥ ६४॥
कथयन्ति महत्पुण्यमितिहासमिहोद्धव।
तमहं वर्णयिष्यामि निबोध सुसमाहित:॥ ४॥
अशांतिक्षोभाचे चित्तमळ। क्षाळावया जी तत्काळ। इतिहासगंगा केवळ। अतिनिर्मळ कृष्णोक्ति॥ ६५॥ श्रीकृष्णवदनब्रह्माद्रीं। श्रीभागवतऔदुंबरीं। जन्मली शांति गोदावरी। निजमूळाकारीं निर्मळ॥ ६६॥ ते गुप्त ओघें नारदगती। उद्धवगंगाद्वारीं व्यासोक्ती। तेचि शुकमुखकुशावर्तीं। प्रकटे अवचितीं पवित्रपणें॥ ६७॥ तया पवित्र ओघाचिये गती। श्रद्धाधृती समरसे भक्ती। त्याचि अरुणा वरुणा सरस्वती। हे संगमप्राप्ती जेथ होय॥ ६८॥ तेणें शांति गंगेची स्थिती। भरूनि उथळे अतिउन्नती। तेथ श्रवणार्थी बुडी देती। ते पवित्र होती निजक्षमा॥ ६९॥ ते शांतिगंगा अतिविख्यात। उद्धव करावया पुनीत। प्रकट करी श्रीकृष्णनाथ। भिक्षुगीतविन्यासें॥ ७०॥
केनचिद्भिक्षुणा गीतं परिभूतेन दुर्जनै:।
स्मरता धृतियुक्तेन विपाकं निजकर्मणाम्॥ ५॥
उद्धवा कोणी एक संन्यासी। दुर्जनीं उपद्रवितां त्यासी। म्हणे क्षयो होय दुष्टकर्मासी। येणें संतोषें मानसीं क्षमावंत॥ ७१॥ आपुले अंगींचे मळ। पुढिलीं क्षाळितां सकळ। जो क्रोधेंसीं करी तळमळ। तो मूर्ख केवळ आत्मघाती॥ ७२॥ लोक म्हणती ज्यासी दुर्जन। संन्यासी म्हणे ते माझे स्वजन। माझे दोषांचें निर्दळण। यांचेनि धर्में जाण होतसे॥ ७३॥ संमुख कोणी निंदा करिती। तेणें अत्यंत सुखावे चित्तीं। म्हणे मज तुष्टला श्रीपती। पापाची निष्कृती सहजें होय॥ ७४॥ ऐसेनि विवेकें तत्त्वतां। शांतीसी ढळों नेदी सर्वथा। चढोनि निजधैर्याचे माथां। गायिली गाथा ते ऐक॥ ७५॥ उद्धवासी म्हणे श्रीकृष्णनाथ। ये अर्थीं होईं सावचित्त। अतिलोभी तो अतिविरक्त। झाला तो वृत्तांत सांगेन॥ ७६॥
अवन्तिषु द्विज: कश्चिदासीदाढॺतम: श्रिया।
वार्तावृत्ति: कदर्यस्तु कामी लुब्धोऽतिकोपन:॥ ६॥
मालवदेशीं अवंतिनगरीं। तेथ ब्राह्मण वसे गृहद्वारीं। कृषिवाणिज्यवृत्तिवरी। जीविका करी निरंतर॥ ७७॥ गांठीं धनधान्यसमृद्धी। अमर्याद द्रव्यसिद्धी। परी अतिशयें कृपणबुद्धी। पोटाही त्रिशुद्धी न खाय॥ ७८॥ पोटा सदा खाय कदन्न। तेंही नाहीं उदरपूर्ण। तेथ स्त्रीपुत्रादि दासीजन। जठर तर्पण न पावती॥ ७९॥ न करी नित्यनैमित्य। स्वप्नीं नेणे धर्मकृत्य। देव ब्राह्मण अतिथी येथ। सदा जात पराङ्मुख॥ ८०॥ कवडी एक लाभू पाहे। तैं मातापित्यांचें श्राद्ध आहे। तें सांडूनि अंत्यजगृहा जाये। न मनी भये स्पर्शाचें॥ ८१॥ मी उत्तम हा हीनवर्ण। हे धनलोभें गिळी आठवण। हाता येतां देखोनि धन। स्वीकारी अन्न पतिताचें॥ ८२॥ धनकामासाठीं देख। न मनी पाप महादोख। कवडीच्या लोभें केला मूर्ख। नाठवे नरकमहापातू॥ ८३॥ यापरी तो कर्मभ्रष्ट। अकर्म करी क्रियानष्ट। अतिवंचक महाशठ। केवळ नष्ट धनलोभी॥ ८४॥ त्या धनलाभाचा अवरोधू। होतां देखोनि खवळे क्रोधू। गोहत्यादि ब्रह्मवधू। करावया सिद्धू स्वयें होय॥ ८५॥ धनकामीं क्रोधाची वस्ती। धनापाशीं पापें असती। धनलोभीं ज्याची स्थिती। कदर्यवृत्ति त्या नांव॥ ८६॥ ऐसें धन सांचिलें फाडोवाडें। त्याचाही व्यय जैं करणें पडे। तैं प्राणांतचि येऊनि घडे। विचार पुढें असेना॥ ८७॥ वानराचे गालींचे चणे। हाता न येती जितां प्राणें। तैसा द्रव्याचा व्ययो करणें। तेंचि मरणें कदर्या॥ ८८॥
ज्ञातयोऽतिथयस्तस्य वाङ्मात्रेणापि नार्चिता:।
शून्यावसथ आत्मापि काले कामैरनर्चित:॥ ७॥
घरींचा भात वेंचेल कांहीं। यालागीं वैश्वदेव करणें नाहीं। तेथ अतिथि आलिया पाहीं। कोणे समयीं कोण पूजी॥ ८९॥ अतिथि आलिया जाण। ऐसे बोल बोले आपण। जे वचनमात्रें जाती प्राण। त्यासी मागे कोण अन्नोदक॥ ९०॥ देखोनि त्याचिया घरासी। ब्रह्मचारी नित्य उदासी। आशा त्यजिली संन्यासीं। जेवीं राजहंसीं गोमय॥ ९१॥ भिकारीं सांडिलें त्याचें द्वार। अतिथीं डावलिलें निरंतर। पाहुणा दूरी पाहे बिढार। निराशी पितर सर्वदा॥ ९२॥ दारा न ये कोरान्नकर। घर सांडूनि गेले उंदिर। काउळीं वोसंडिलें तें घर। चिडियां साचार न मिळे दाणा॥ ९३॥ मुंग्यांसी पडे नित्य लंघन। तिंही धरिलें बिढार आन। पोटा ना खाय जो आपण। तेथ कथा कोण इतरांची॥ ९४॥ अत्यंत भूक लागल्या पोटीं। चणेही न खाय जगजेठी। तेथ कायसी सेवकांची गोठी। कावलीं पोटीं स्त्रीपुत्रें॥ ९५॥ जैं वमन घडे त्यासी। तैं न करी फळाहारासी। अधिक वेंचू कोणसोशी। यालागीं उपवासी स्वयें पडे॥ ९६॥ तेथ कुळगुरूचा सन्मान। कुळधर्म गोत्रभोजन। व्याहीजांवई यांचा मान। धनलोभी जाण कदा न करी॥ ९७॥ ऋतुकाळें फळें येती पूर्ण। त्यांसीं दृष्टिभेटी हाटीं जाण। परी जिव्हेसी आलिंगन। प्राणांतीं आपण हों नेदी॥ ९८॥ मातेचें स्तनपान सेविलें। तेंचि क्षीर रसना चाखिलें। पुढें दूधचि वर्जिलें। व्रत धरिलें धनलोभें॥ ९९॥ रस रसनेचें माहेर। तेणेंवीण ते गादली थोर। धनलोभ अतिनिष्ठुर। करितां करकर भेटों नेदी॥ १००॥ वस्त्रें मळकीं अतिजीर्ण। मस्तक सदा मलिन। मुखीं वास निघती जाण। स्वप्नींही पान न खाय॥ १॥ सण वार दिवाळी दसरा। तैं जुने जोंधळे धाडी घरा। अन्नेंविण पीडी लेंकुरां। कदर्यु खरा या नांव॥ २॥ धनलोभी धर्महीन। देखोनि कदर्युवर्तन। विमुख झाले स्वजन। तेंचि निरूपण हरि सांगे॥ ३॥
दु:शीलस्य कदर्यस्य द्रुह्यन्ते पुत्रबान्धवा:।
दारा दुहितरो भृत्या विषण्णा नाचरन् प्रियम्॥ ८॥
नाहीं स्वधर्मीं निजशीळ। दानधर्म खुडी सकळ। अत्यंत धनलोभी केवळ। त्यासी दु:शीळ बोलिजे॥ ४॥ अन्नआच्छादनेंवीण। कुटुंबेंसहित आपण। जो कदर्थवी निजप्राण। कदर्यु पूर्ण त्या नांव॥ ५॥ कदर्यु नरासी तंव देख। मुख्य स्त्री होय विमुख। स्वजन आणि सेवक। पुत्रही पराङ्मुख होती त्यासी॥ ६॥ आपले जे कां सखे बंधू। तेही करूं लागती विरोधू। द्रव्यविभागाचा संबंधू। कलह सुबद्धू आरंभे॥ ७॥ गांठीं असोनि अमित धन। न करी माहेर सणबोळवण। कन्या क्षोभोनियां जाण। शाप दारुण त्या देती॥ ८॥ गोत्रज सदा चिंतित। हा मरे तैं जेवूं दूधभात। आप्त ते झाले अनाप्त। अवघे अनहित वांछिती॥ ९॥ जयाचिया द्रव्यासी जाण। नाहीं धर्माचें संरक्षण। तें काळेंचि होय क्षीण। तेंचि लक्षण हरि सांगे॥ ११०॥
तस्यैवं यक्षवित्तस्य च्युतस्योभयलोकत:।
धर्मकामविहीनस्य चुक्रुधु: पञ्चभागिन:॥ ९॥
खाय ना जेवी ना लावी हात। ठेव्यापाशीं जैसें भूत। तैंसें याचें यक्षवित्त। असे राखत ग्रहो जैसा॥ ११॥ केवळ धर्मकामरहित। धनलोभी जैसें भूत। त्या नांव बोलिजे यक्षवित्त। जीवाहून आप्त अर्थ मानी॥ १२॥ स्वशरीरीं भोग नाहीं जाण। तेणें इहलोक झाला शून्य। नाहीं स्वधर्मकर्म पंचयज्ञ। परलोक शून्य तेणें झाला॥ १३॥ यज्ञाचे पंच विभागी। यज्ञभाग न पवे त्यांलागीं। ते कोपोनियां पंचविभागीं। वित्तनाशालागीं उद्यत॥ १४॥ पावोनि ब्राह्मणजन्म वरिष्ठ। धनलोभें स्वधर्मनष्ट। तो होय उभय लोकीं भ्रष्ट। पावे कष्ट कृपणत्वें॥ १५॥ करितां अतिआयास। जोडला अर्थ बहुवस। त्यासी अधर्में आला नाश। तोही विलास हरि सांगे॥ १६॥
तदवध्यानविस्रस्तपुण्यस्कन्धस्य भूरिद।
अर्थोऽप्यगच्छन्निधनं बह्वायासपरिश्रम:॥ १०॥
पंचयज्ञदेवता सकळ। येणें उपेक्षिल्या केवळ। तिंहीं द्रव्यलाभाचें मूळ। पुण्यक्षयें तत्काळ छेदिलें॥ १७॥ द्रव्यप्राप्तिपुण्यदिवाकर। अस्तमाना गेला तो भास्कर। मग द्रव्यलाभाचा अंधकार। अधर्में थोर दाटला॥ १८॥ प्रयासें संचिली संपत्ती। तिसी अधर्मअंधाराची ये राती। क्षोभल्या पंचधा यज्ञमूर्ती। पंचधा पावती महानाश॥ १९॥ जो सुखी न करी कुटुंबालागीं। जो निजात्मा निववीना नाना भोगीं। जो द्रव्य न वेंची धर्मालागीं। त्यासी पंचविभागी ऊठती॥ १२०॥ दायाद चोर राजा आगी। अधर्में रोग संचरे अंगीं। हे पांचजण विभागी। द्रव्यनाशालागीं पावती॥ २१॥ नाहीं द्विजपूजा श्रद्धायुक्त। नाहीं लौकिकक्रिया उचित। नाहीं दानादि धर्म वेदोक्त। द्रव्यक्षयो तेथ आवश्यक॥ २२॥ जेथ नाहीं वडिलांसी सन्मान। जेथ नाहीं पंचमहायज्ञ। जेथ गुरूसीं करी अभिमान। तेथ क्षयो जाण उद्धवा॥ २३॥ ज्यांसी परांचा द्वेष सदा। जे बोलती परापवादा। जे चढती धनगर्वमदा। तेथ क्षयो सदा उद्धवा॥ २४॥ त्याच द्रव्यक्षयाचें लक्षण। ग्रंथाधारीं निरूपण। स्वयें सांगताहे श्रीकृष्ण। दयाळू पूर्ण निजभक्तां॥ २५॥
ज्ञातयो जगृहु: किञ्चित् किञ्चिद्दस्यव उद्धव।
दैवत: कालत: किञ्चिद्ब्रह्मबन्धोर्नृपार्थिवात्॥ ११॥
स्त्री पुत्र होऊनि एक। तिंहीं ठेवा नेला कित्येक। गोत्रज मिळोनि सकळिक। बलात्कारें देख वांटा नेला॥ २६॥ चोरीं फोडोनियां घर। काढूनि नेलें भांडार। आगी लागोनियां घर। वस्तु अपार जळाल्या॥ २७॥ हिंसाळॺानें गेलें शेत। प्रवर्त बुडाला जेथींचा तेथ। विश्वासू ठेवा घेऊनि जात। खतखूत हारपलें॥ २८॥ भांडीं ठेविला कापूर उडे। समुद्रामाजीं तारूं बुडे। पातिकरावरी घालापडे। चहूंकडे अपावो॥ २९॥ ठक येऊनि एकांतीं। मुलाम्याचीं नाणीं देती। धनलोभाचे काकुळती। हातींची संपत्ती त्यांसी दे॥ १३०॥ स्वचक्र परचक्र विरोध धाडी। खणती लावूनि घर फोडी। तळघरींचे ठेवे काढी। भरोनि कावडी धन नेती॥ ३१॥ पाणी रिघे पेंवाआंत। तेणें धान्य नासे समस्त। धटू झोंबोनि हरी शेत। दैवहत तो झाला॥ ३२॥ गोठणीं सेणयां रोगू पडे। निमाले गायीम्हशींचे वाडे। उधारें नेले ठाणबंदी घोडे। तो रणीं पडे महायुद्धीं॥ ३३॥ भूमिनिक्षेप जे करूं जाती। ते आपणियाकडे धूळी ओढिती। तेथ घालूनि निजसंपत्ती। तोंडीं माती स्वयें घाली॥ ३४॥ बुद्धिसांगती वाड वाड। येथूनि तोंडीं घाला दगड। ऐसे ठेवे बुजिले दृढ। त्याची चाड धरूं गेला॥ ३५॥ ठेवे ठेविले जे अनेक। ते पृथ्वीनें गिळिले नि:शेख। भाग्य झालें जैं विमुख। झाले अनोळख ते ठाय॥ ३६॥ अधर्में अदृष्ट झालें क्षीण। विपरीत भासे देहींचें चिन्ह। पालटला निजवर्ण। ब्राह्मणपण लक्षेना॥ ३७॥ देखे तो पुसे ज्ञाति कोण। तो सांगे जरी मी ब्राह्मण। ऐक त्याचें न मनी मन। वर्णाग्रपण मावळलें॥ ३८॥ एवं नि:शेष नासलें धन। ब्रह्मवर्चस्व गेलें जाण। म्लानवदन हीनदीन। खेदखिन्न अतिदु:खी॥ ३९॥
स एवं द्रविणे नष्टे धर्मकामविवर्जित:।
उपेक्षितश्च स्वजनैश्चिन्तामाप दुरत्ययाम्॥ १२॥
गेलें शेत निमाली कुळवाडी। घर पाडिलें परचक्रधाडीं। धन नासलें नाहीं कवडी। अधर्माचें जोडी हे दशा॥ १४०॥ नाहीं स्वधर्मकर्म ना दान। विहित भोग न करी आपण। त्या धनलोभ्याचें नासलें धन। जेवीं कां स्वप्न रंकाचें॥ ४१॥ दैव झालें पराङ्मुख। त्या हतभाग्याची दशा देख। स्त्रीपुत्रें झालीं विमुख। तिंहीं नि:शेख दवडिला॥ ४२॥ ऐक धनलोभाच्या ठायीं। इष्ट मित्र पूर्वींचि नाहीं। गोत्रजांसी त्याचें सुख कायी। दवडिला पाहीं उपेक्षितू॥ ४३॥ निंदा प्रत्यक्ष करिती लोक। रांडा पोरें थुंकती देख। खावया नाहीं नि:शेख। मागतां भीक मिळेना॥ ४४॥ भिकेलागीं जेथ जेथ गेला। म्हणती काळमुखा येथें कां आला। होता धनलोभें भुलला। भला नागविला ईश्वरें॥ ४५॥ यापरी धिक्कारिती लोक। धन जाऊनि झाला रंक। चिंतावर्तीं पडला देख। दु:खेंमहादु:ख पावला॥ ४६॥
तस्यैवं ध्यायतो दीर्घं नष्टरायस्तपस्विन:।
खिद्यतो बाष्पकण्ठस्य निर्वेद: सुमहानभूत्॥ १३॥
धनलोभ्याचें गेलें धन। धनासवें न वचेचि आठवण। तें आठवतां फुटताहे मन। तळमळी जाण अतिदु:खें॥ ४७॥ कांटा रुतल्या भुजंग कपाळीं। पुच्छ तुटल्या सापसुरळी। हो कां जळावेगळी मासोळी। तैसा तळमळी अतिदु:खें॥ ४८॥ मनें आठवितांचि धन। हृदयीं चालिलें स्फुंदन। अश्रुधारा स्रवती नयन। मूर्च्छापन्न क्षणक्षणां॥ ४९॥ पोटीं दु:खें अति चरफडे। धाय मोकलूनियां रडे। उठे बैसे पाहे पडे। लोळे गडबडे आरडत॥ १५०॥ मग म्हणे रे कटकटा। झालों एक वेळ करंटा। अहा विधातया दुष्टा। काय अदृष्टा लिहिलेंसी॥ ५१॥ मज ठावो नाहीं कोणीकडे। विचार संभवेना पुढें। अतिदु:ख आलें जी रोकडें। तेणें विचारें रडे महादु:खी॥ ५२॥ हें अल्पदु:ख पावलों येथें। पुढें थोर दु:ख आहे मातें। यम दंडील निष्ठुर घातें। कोण तेथें सोडवी॥ ५३॥ म्यां नाहीं दीधलें दान। मी नाहीं स्मरलों नारायण। मज येती नरक दारुण। तेथ कोण सोडवी॥ ५४॥ म्यां नाहीं केले पंचमहायज्ञ। नाहीं दीधलें अतिथींसी अन्न। नाहीं केलें पितृतर्पण। माझें दु:ख कोणनिवारी॥ ५५॥ म्यां नाहीं केली द्विजपूजा। नाहीं भजलों अधोक्षजा। नाहीं वंदिलें वैष्णवरजा। माझे दु:खसमाजा कोण नाशी॥ ५६॥ मी सर्वथा अकर्मकारी। बुडालों बुडालों अघोरीं। धांवपाव गा श्रीहरी। मज उद्धरीं दीनातें॥ ५७॥ कृष्णा माधवा मुरारी। अच्युता अनंता श्रीहरी। गरुडध्वजा गोवर्धनधारी। मज उद्धरीं दीनातें॥ ५८॥ तुवां रक्षिलें प्रल्हादासी। अंबरीषासी गर्भवासीं। उदरीं राखिलें परीक्षितीसी। तैसें मज दीनासी उद्धरीं॥ ५९॥ तुवां तारिलें अहल्येसी। उद्धरिलें नष्टा अजामिळासी। उडी घातली गजेंद्रासी। तेणें वेगेंसी मज तारीं॥ १६०॥ महादोषांची श्रेणी। नामें तारिली कुंटिणी। तेणें लाघवें चक्रपाणी। मज दुष्टालागोनी उद्धरीं॥ ६१॥ जळो जळो हा धनकाम। गेलें वृथा माझें जन्म। फुकाचें जें रामनाम। तें मी अधम न म्हणेंचि॥ ६२॥ रामनामाच्याप्रतापासाठीं। जळती महापापांच्या कोटी। थोर अधम मी एक सृष्टीं। नाम वाक्पुटीं न म्हणेंचि॥ ६३॥ ऐसा मानोनि अपराध। अनुतापें करितां खेद। उपजला अतिनिर्वेद। तेंचि गोविंद स्वयें सांगे॥ ६४॥
स चाहेदमहो कष्टं वृथाऽऽत्मा मेऽनुतापित:।
न धर्माय न कामाय यस्यार्थायास ईदृश:॥ १४॥
हात चुरूनि म्हणे कटकटा। ब्राह्मणदेहो मोक्षाचा वांटा। तो लाहोनि मी अतिकरंटा। धनलोभचेष्टा नाडलों॥ ६५॥ जेणें देहें लाभे मोक्षसुख। त्या देहासी म्यां दीधलें दु:ख। धनलोभी मी परम मूर्ख। मजऐसा आणिक असेना॥ ६६॥ न वेंचितां धर्मकामासी। अर्थ जोडिला सायासीं। त्या अर्थाची दशा ऐसी। अतिदु:खेंसीं मज फळला॥ ६७॥ बाप धनलोभाचें कवतिक। नाहीं इहलोक ना परलोक। थितें अंतरलें मोक्षसुख। भोगवी नरक अनिवार॥ ६८॥ देखें ज्या नरकाचे ठायीं। आकल्प बुडतां ठावो नाहीं। धनलोभ घाली तैसें ठायीं। तें म्यां नरदेहीं जोडिलें॥ ६९॥ जो जन्मला ब्राह्मणदेहीं। तो पूज्य होय लोकीं तिहीं। मोक्ष लागे त्याच्या पायीं। म्यां अभाग्यें तोही नाशिला॥ १७०॥ लोभें जें धन संचिलें। तें नि:शेष नासोनि गेलें। परी मजलागीं अतिदु:खी केलें। बांधोनि दीधलें महानरका॥ ७१॥ उत्तम देहो झाला प्राप्त। तो धनलोभें केला व्यर्थ। आयुष्य गेलें हातोहात। अतिसंतप्त अनुतापें॥ ७२॥ धनलोभींचे अचाट। वृथा गेले माझे कष्ट। वैराग्य उपजलें उद्भट। अतिचोखट सविवेक॥ ७३॥ धनलोभी जो कां नर। तो सकल दु:खांचें भांडार। धनबद्धक तो पामर। स्वमुखें साचार निंदीत॥ ७४॥
प्रायेणार्था: कदर्याणां न सुखाय कदाचन।
इह चात्मोपतापाय मृतस्य नरकाय च॥ १५॥
प्रायशा जे धनबद्धक। त्यांसी इहलोकीं नाहीं सुख। धनरक्षणीं अतिदु:ख। तें जातां देख प्राणांत॥ ७५॥ धनागमनीं अतिकष्ट। धनरक्षणीं कलह श्रेष्ठ। धननाशें होय हृदयस्फोट। इहलोकीं कष्ट धनलोभ्या॥ ७६॥ यापरी इहलोकीं दु:ख। अधर्में खुंटला परलोक। मरतां उरीं आदळे नरक। आवश्यक धनलोभ्या॥ ७७॥ जो धर्म करी ना स्वयें न खाये। जो मजसारिखा कदर्यु होये। त्यासी चढतें वाढतें दु:ख पाहें। नाहीं सुखसोये कदर्या॥ ७८॥ लोभाची वस्ती जिये ठायीं। तेथ स्वप्नींही सुख नाहीं। लोभ अतिशयें निंद्य पाहीं। तें आपण स्वमुखेंही सांगत॥ ७९॥
यशो यशस्विनां शुद्धं श्लाघ्या ये गुणिनां गुणा:।
लोभ: स्वल्पोऽपि तान् हन्ति श्वित्रो रूपमिवेप्सितम्॥ १६॥
रणीं पडतां मुख्य धुरेसी। जो अंगें विभांडी त्या रणासी। खांदीं वाऊनि आणी रायासी। येवढी कीर्ति ज्यासी जोडली॥ १८०॥ लोभ संचरोनि त्यापाशीं। एक शेत मागवी रायासी। तेचि अपकीर्ति होय त्यासी। जग उपहासी मूर्खत्वा॥ ८१॥ त्यासी न मागतां राजा जाण। करूं पाहे आपणासमान। त्यासी लोभें आणोनि नागवण। मूर्खपण स्थापिलें॥ ८२॥ स्वयें करितां कन्यादान। सकळ कुळ होय पावन। तेथेंही लोभें घेतां धन। अध:पतन धनलोभिया॥ ८३॥ दाता देऊनियां दान। दानप्रसंगें उपार्जी धन। तेंचि दात्यासी दूषण। लोभ लांछन दानासी॥ ८४॥ वेदशास्त्रें करूनि पठण। पंडित झाले अतिसज्ञान। तेही धनलोभें छळिले जाण। ज्ञानाभिमान प्रतिष्ठे॥ ८५॥ देहप्रतिष्ठेचिये सिद्धी। पंडित-पंडितां वादविधी। नाना छळणोक्ती विरोधीं। ठकिले त्रिशुद्धी ज्ञाते लोभें॥ ८६॥ सविवेक सज्ञान ज्ञात्यासी। लोभ आणी निंदास्पदासी। इतरांची गति काइसी। ते लोभाची दासी होऊनि ठाती॥ ८७॥ लोभ शुद्धीसी करी अशुद्ध। लोभ तेथ निंदास्पद। तोचि दृष्टांत विशद। ऐक प्रसिद्ध सांगत॥ ८८॥ कुलशील अतिसुकुमार। रूपें सर्वांगमनोहर। नाकीं श्वेतता अणुमात्र। निंद्य सुंदर तेणें होय॥ ८९॥ तेवीं अल्पही लोभाची जे वस्ती। नाशी गुणौदार्ययश:कीर्ती। लोभाऐसा त्रिजगतीं। कर्ता अपकीर्ती आन नाहीं॥ १९०॥ धनलोभीं सदा विरोधू। धनलोभ तोडी सखे बंधू। धनलोभाऐसा नाहीं बाधू। अतिअशुद्धू आणिक असेना॥ ९१॥
अर्थस्य साधने सिद्धे उत्कर्षे रक्षणे व्यये।
नाशोपभोग आयासस्त्रासश्चिन्ता भ्रमो नृणाम्॥ १७॥
प्रथम शिणावें द्रव्य जोडितां। दुसरें शिणावें तें वाढवितां। द्रव्य जरी झालें उत्कर्षतां। तरी लोभ सर्वथा पुरे न म्हणे॥ ९२॥ द्रव्यालागीं भावार्थतां। जैसे कष्टती सर्वथा। तैसा जरी कष्टे परमार्था। तैं ब्रह्म तत्त्वतां खेळणें होय॥ ९३॥ एवं कष्टीं जोडल्या द्रव्यासी। रक्षणीं अतिचिंता मानसीं। अतिशय लागली जीवासी। अहर्निशीं धुकधुकी॥ ९४॥ स्त्री पुत्र हो माता पिता। त्यांसी पातिजेना सर्वथा। आपणाहूनि परता। विश्वासू अर्था मानेना॥ ९५॥ विसरोनियां निजघाता। चोरापासोनि राखे वित्ता। वित्तरक्षणीं निजचिंता। तिन्ही अवस्था एकाग्र॥ ९६॥ ऐसी एकाग्रता करूनी। जरी लागता भगवद्भजनीं। तरी वश्य होता चक्रपाणी। अर्धक्षणीं साधका॥ ९७॥ उचितानुचित विवाहासी। द्रव्य वेंचितां उदरासी। अतिशय होय कासाविसी। धनव्ययो त्रासासी उपजवी॥ ९८॥ एवं जोडूनि रक्षितां द्रव्यासी। अवचटें नाश होय जैं त्यासी। तै अतिभ्रम चढे मानसीं। होती धनपिशीं बद्धक॥ ९९॥ द्रव्यार्जनीं वसे प्रयास। द्रव्यरक्षणीं चिंतेचा वास। द्रव्यव्ययीं वळसा त्रास। भ्रमाचा रहिवास धननाशीं॥ २००॥ आदिमध्यावसानीं पाहीं। द्रव्य तें समूळ अपायी। तेथ सुखाचा लेश नाहीं। हें ऐसें पाहीं मज जाहलें॥ १॥ आयास-त्रास-चिंतेसहित। धनापाशीं भ्रम नांदत। अर्थ तितुका अनर्थयुक्त। तोचि अर्थ स्वयें सांगे॥ २॥
स्तेयं हिंसानृतं दम्भ: काम: क्रोध: स्मयो मद:।
भेदो वैरमविश्वास: संस्पर्धा व्यसनानि च॥ १८॥
अर्थ सर्वांगें अनर्थभूत। हें माझें वचन त्रिसत्य। पृथ्वीमाजीं जे जे अनर्थ। ते ते अर्थांत उपजती॥ ३॥ पुसाल अर्थींचे अनर्थ। ते सांगतां असंख्य अनंत। संक्षेपें सांगेन येथ। पंधरा अनर्थ अर्थासी॥ ४॥ प्रथम अनर्थ अर्थासी। चोरी वसे अर्थापासीं। अर्थु नाहीं गा जयापाशीं। चोरापासून त्यासी भय नाहीं॥ ५॥ द्रव्य नाहीं ज्याच्या हातीं। त्यातें देखोनि चोर भिती। कांहीं मागेल आम्हांप्रती। म्हणोनि लपती त्या भेणें॥ ६॥ अतर्क्य नेत्रांतरें नेणें। कां धातुवादें सर्वस्व घेणें। परस्व भोळॺांनीं बुडवणें। कां विजनीं हरणें सर्वस्व॥ ७॥ मार्गीं पडलें धन पराचें। स्वयें जाणोनि अमकियाचें। नाहीं देणें त्यासी साचें। हेंही चोरीचें लक्षण॥ ८॥ स्वर्णस्तेयें नरकप्राप्ती। ऐसे विवेकीही चोरी करिती। मा इतरांची कायशी गती। चोरीची वस्ती धनापाशीं॥ ९॥ जगीं महापापिणी चोरी। तीस कोणी बैसों नेदी द्वारीं। ते राहिली सुवर्णामाझारीं। धन तेथ चोरी निश्चित॥ २१०॥ देखतांचि त्या धनासी। विकल्पी होती संन्यासी। इतरांची कथा काइसी। चोरी धनापाशीं स्वयें नांदे॥ ११॥ प्रथम अनर्थलक्षण। धनापाशीं चोरी जाण। धन हिंसेचें आयतन। तेंही निरूपण अवधारीं॥ १२॥ धनालागीं द्वंद्व दारुण। पुत्रपौत्र मारिती जाण। धनालागीं घेती प्राण। सुहृदपण सांडोनी॥ १३॥ धनलोभाचें कवतिक। कन्या बापासी देतसे विख। पितृघाताचें न मानी दु:ख। निष्ठुर देख धनलोभ॥ १४॥ धनलोभी सांडी बापमाये। स्त्री घेऊनि वेगळा राहे। तेथही धनलोभ पाहें। वैर होये स्त्रीपुरुषां॥ १५॥ धनलोभाची नवलपरी। पुत्र पित्यातें जीवें मारी। पिता पुत्रातें संहारी। कठिण भारी धनलोभ॥ १६॥ जे नवमास वाहे उदरांत। जे सदा सोशी नरकमूत। ते मातेचा करी घात। द्रव्यानिमित्त निजपुत्र॥ १७॥ अभिनव धनलोभाची त्राय। नवल तें मी सांगों काय। पोटींचा पुत्र मारी माय। ऐसा अनर्थ होय धनासाठीं॥ १८॥ एवं हिंसा ते हे संपूर्ण। दुसरें अनर्थलक्षण। आतां असत्याचें विंदान। तेंही निरूपण स्वयें सांगे॥ १९॥ असत्य जन्मलें अर्थाच्या पोटीं। अर्थबळें तें दाटुगें सृष्टीं। अर्थासवें असत्य उठी। असत्याची गांठी अर्थेंसीं॥ २२०॥ तो अर्थ असे जयापाशीं। कां अर्थअपेक्षा जयासी। तेथ असत्य वसे कुटुंबेंसीं। धन तें मिरासी मिथ्यात्वीं॥ २१॥ अर्थबळ थोर असत्यासी। मिथ्या बोलवी बापासी। धनलोभें झकवी मातेसी। सत्यत्व धनापाशीं असेना॥ २२॥ क्रयविक्रयीं धनलोभें जाण। मिथ्या बोलती साधारण। परी वेदशास्त्रसंपन्न। धनार्थ सज्ञान बोलती मिथ्या॥ २३॥ वेदींचा आठव न ये पूर्ण। तो संभावनेलागीं जाण। म्हणवी मी वेदसंपन्न। करावया यजन नीचाचें॥ २४॥ भाग देऊनि मध्यस्था। मी चतु:शास्त्रीं विख्याता। ऐसें मिथ्यात्वें छळी पंडिता। राजद्रव्यार्थालागुनी॥ २५॥ विरक्त म्हणविती परमार्थी। तेथही असत्यें घातली वस्ती। नाथिल्या सिद्धि दाविती। अर्थप्राप्तीलागोनी॥ २६॥ अर्थीं असत्याचा बडिवारू। सद्भावें केला जो सद्गुरू। त्यासी मिथ्या नास्तिक विचारू। एकांतीं नरू प्रतिपादी॥ २७॥ अर्थनाहीं जयापाशीं। ना अर्थकल्पना जयासी। असत्य स्पर्शेना तयासी। कदाकाळेंसीं कल्पांतीं॥ २८॥ अर्थापाशीं असत्य जाण। त्याचें सांगीतलें लक्षण। आतां अर्थापाशीं दंभ संपूर्ण। तेही वोळखण अवधारीं॥ २९॥ पोटीं नाहीं परमार्थ। धरोनियां अर्थस्वार्थ। स्वयें म्हणविती हरिभक्त। या नांव निश्चित भजनदंभू॥ २३०॥ धन जोडावयाकारणें। टिळे माळा मुद्रा धारणें। धनेच्छा उपदेश देणें। या नांव जाणणें दीक्षादंभू॥ ३१॥ देखोनि धनवंत थोरू। त्यासी उपदेशीं अत्यादरू। नेमूनि गुरुपुजाकरभारू। सांगे मंत्रू तो दांभिक॥ ३२॥ जयांपासोनि होय अर्थप्राप्ती। ते समर्थ शिष्य आवडती। दीन शिष्यातें उपेक्षिती। हे दांभिकस्थिती गुरुत्वा॥ ३३॥ गुरूसी द्यावें तनु मन धन। ऐसें उपदेशूनि जाण। जो द्रव्य संग्रही आपण। तें दांभिकपण गुरुत्वा॥ ३४॥ जेथ धनलोभ गुरूपाशीं। तो काय तारील शिष्यासी। धनलोभाची जाती ऐसी। करी गुरुत्वासी दांभिक॥ ३५॥ आखाडभूतीऐसा जाण। गुरुपाशील न्यावया धन। उपदेश घे होऊनि दीन। तो दांभिक जाण शठ शिष्य॥ ३६॥ गुरूपदेशें शिकोनि युक्ती। स्वयें ज्ञानाभिमाना येती। गुरूतें मानी प्राकृतस्थिती। तोही निश्चितीं दांभिकू॥ ३७॥ मी एक सधन सज्ञान। ऐसा सूक्ष्मरूप ज्ञानाभिमान। करी गुरुआज्ञेचें हेळण। हेंही लक्षण दंभाचें॥ ३८॥ अहं ब्रह्म हेही स्फूर्ती। न साहे जेथ स्वरूपस्थिती। तेथ मी ज्ञाता हे घोंगडी युक्ती। स्फुरे निश्चितीं सूक्ष्मदंभें॥ ३९॥ जीवासी देहाचें मध्यस्थान। तेथ दंभाचें अधिष्ठान। त्यासी मिळोनियां मन। ज्ञानाभिमान उपजवी॥ २४०॥ नवल दंभाचें कवतिक। आम्ही अग्निहोत्री याज्ञिक। तेचि जीविका करूनि देख। नाडले वेदपाठक धनलोभें॥ ४१॥ सोडोनि परमार्थाची पोथी। ब्रह्मज्ञान सांगे नाना युक्तीं। तेही ज्ञाते दंभें नाडिजेती। द्रव्यासक्ती धनलोभें॥ ४२॥ मंत्रतंत्रांची कथा कोण। मुख्य गायत्री वेंचिती ब्राह्मण। आम्ही स्वधर्मनिष्ठापावन। म्हणती जाण दांभिक॥ ४३॥ दंभें नाडिले संन्यासी। लौकिक राखणें पडे त्यांसी। ज्यालागीं मुंडिले शिसीं। त्या अर्थासी विसरले॥ ४४॥ दृष्टि सूनि अन्नसन्मान। संन्यासी करिती शौच स्नान। शुद्ध न करवेचि निजमन। वादव्याख्यान अतिदंभें॥ ४५॥ घ्यावया परद्रव्य परान्न। कां देहप्रतिष्ठेलागीं जाण। मिथ्या दाखवी सात्त्विकपण। हें दंभलक्षण पैं चौथें॥ ४६॥ द्रव्यापाशीं वसे काम। अतिशयें अतिदुर्गम। द्रव्य तेथ कामसंभ्रम। अतिविषम सांगात॥ ४७॥ द्रव्य नसतां अपेक्षाकाम। तो सबाह्य करवी अतिश्रम। अनेक कष्टांचें विषम। अतिदुर्गम भोगवी॥ ४८॥ धन झालिया उन्मादकाम। करूं लागे अगम्यागम। उपजवी नाना अधर्म। निंद्य कर्म धनवंता॥ ४९॥ कामु जडलासे धनेंसीं। तो सदा छळी धनवंतासी। काम खवळे धनापाशीं। अहर्निशीं मुसमुशित॥ २५०॥ धनापाशीं अति उद्धतू। काम पांचवा अनर्थू। काम तेथ निश्चितू। क्रोध नांदतू सैन्येंसीं॥ ५१॥ कामप्राप्तीसी आडवी काडी। होतां क्रोधाची पडे उडी। खवळला अति कडाडी। तपाच्या कोडी निर्दाळित॥ ५२॥ जप तप निष्ठा नेम। शिणोनि साधलें दुर्गम। क्रोध अति खवळल्या परम। ते करी भस्म क्षणार्धें॥ ५३॥ धनाकडे कोणी दावी बोट। तेथ क्रोध उठी अचाट। वाढवी प्राणांत कचाट। क्रोध अतिदुष्ट धनेंसीं॥ ५४॥ धनागमनीं अवरोधू। कां धनव्ययाचा संबंधू। ते संधीं खवळे क्रोधू। अतिविरोधू उन्मत्त॥ ५५॥ धनापाशीं क्रोध समर्थू। हा सहावा अतिअनर्थू। धनापाशीं गर्व अद्भुतू। तेंचि निश्चितू सांगत॥ ५६॥ धनगर्वाचिये पुष्टी। सखा बाप नाणी दृष्टी। मातेतें म्हणे करंटी। इतरांच्या गोष्टी त्या काय॥ ५७॥ सिद्ध साधक तापसी। त्यांतें देखोनि उपहासी। म्हणे करंटे ते होती संन्यासी। हरिदासासी विटावी॥ ५८॥ अंगीं धनाचें समर्थपण। त्याहीवरी जैं झालें ज्ञान। तैं गर्वाचा ताठा चढे पूर्ण। जेवीं आरें धारणू गिळिला॥ ५९॥ धनज्ञानगर्वाची जाती कैसी। गर्व करी सद्गुरूसी। त्याच्या वचनातें हेळसी। शेखीं धिक्कारेंसीं निर्भर्त्सी॥ २६०॥ धनज्ञानगर्वाचें लक्षण। देखे सद्गुरूचे अवगुण। गुरूसी ठेवी मूर्खपण। मी एक सज्ञान हें मानी॥ ६१॥ जो भ्रांत म्हणे सद्गुरूसी। गुरु मानी त्यातें द्वेषी। बाप गर्वाची जाती कैशी। देखे गुणदोषांसी सर्वांच्या॥ ६२॥ नवल गर्वाची पैं काहणी। गुणूसर्वथा सत्य न मानी। दोष पडतांचि कानीं। सत्य मानी निश्चित॥ ६३॥ सात्त्विक ये गर्वितापुढें। त्यासी सर्वथा मानी कुडें। अतिसात्त्विकता दृष्टी पडे। तरी मानी वेडें अर्बुज॥ ६४॥ अंगीं भवंडी भरे लाठी। तैं भूमी लागे ललाटीं। साष्टांग नमावया सृष्टीं। पात्र गर्वदृष्टीं दिसेना॥ ६५॥ तेथें कोण दे सन्मान श्रेष्ठा। कायसी वृद्धाची प्रतिष्ठा। धनगर्वें चढला ताठा। मी एक मोठा ब्रह्मांडीं॥ ६६॥ एक गुरुसेवाविश्वासकू। निजसेवा झाला वश्यकू। त्यासी गर्व चढे मी सेवकू। तो अतिबाधकू सेवका॥ ६७॥ ऐसा अतिगर्वें उन्नद्ध। हा सातवा गर्वबाध। आतां धनापाशीं महामद। तोही संबंध द्विज सांगे॥ ६८॥ ज्यासी चढे धनमदू। तो उघडे डोळां होय अंधू। कानीं नायके शब्दबोधू। धनमदें स्तब्धू सर्वदा॥ ६९॥ धनमदें अति अहंता। धनमदें उद्धतता। धनमदें अद्वातद्वता। करी सर्वथा अधर्म॥ २७०॥ धनमद अति अपवित्र। तो चढल्या होय अतिदुस्तर। न म्हणे पात्र अपात्र। विचरे विचित्र योनीसी॥ ७१॥ जो धनमदा वश होय। तो न मानी कोणाचेंही भय। न जावें तेथ स्वयें जाय। न खावें तें खाय यथेष्ट॥ ७२॥ न धरावा तो संग धरी। न करावें तें कर्म करी। न बोलावें तें उच्चारी। जनाभीतरीं उद्धतू॥ ७३॥ न देखे आपुलें केलें। परापवाद स्वयें बोले। नायके बापाचें शिकविलें। वेडें केलें धनमदें॥ ७४॥ शिकविलें तें नायके। वारिलें तें करी आवश्यकें। साधुनिंदा निजमुखें। यथासुखें जल्पत॥ ७५॥ न मानी स्वयाती स्वाचारू। न मानी दोष अनाचारू। न मानी वडिलांचा विचारू। धनमदें थोरू मातला॥ ७६॥ आधींच तारुण्यें अतिलाठा। वरी धनमदें चढला ताठा। यापरी मातला मोठा। न चाले वाटा सुपंथीं॥ ७७॥ स्त्रीकामें अतिविव्हळ। न विचारी कुळशीळ। न म्हणे सकाळ सांज वेळ। विचरे केवळ खरू जैसा॥ ७८॥ अभिलाषूनि परनारी। दिवसा विचरे दुपारीं। गताळकाही अंगीकारी। भय न धरी पापाचें॥ ७९॥ जो मातला करूनि मद्यपान। तो मद तत्काळ उतरे जाण। त्याहूनि धनमद दारुण। आल्याही मरण उतरेना॥ २८०॥ अकर्म करितां आपण। तेंचि निजघातें घेईल प्राण। हेही नाठवे आठवण। धनमदें जाण भुलला॥ ८१॥ महाअनर्थी धनमद जाण। हें आठव्या अनर्थाचें लक्षण। आतां धनापाशीं भेदपूर्ण। तेंचि निरूपण द्विज सांगे॥ ८२॥ भेद जन्मला धनाचे कुशीं। धन तेथ भेदाची मिराशी। भेद सपरिवार धनापाशीं। अहर्निशीं जागत॥ ८३॥ हाता आलिया बहु धन। मातेहूनि राखे भिन्न। पित्यासी करी वंचन। स्त्रियेसीही जाण कळों नेदी॥ ८४॥ अर्थ पुत्रासी अतर्क्यता। तेथ इतरांची कोण कथा। भेदू तो अर्थापरता। जगीं सर्वथा असेना॥ ८५॥ माथां साहोनि शस्त्रघात। बंधु बंधूसी रणीं साह्य होत। तेचि बंधू अनाप्त होत। वांटितां अर्थविभाग॥ ८६॥ मित्र मित्रांसी वेंचिती प्राण। तेथें प्रवेशोनियां धन। विकल्पा आणी मित्रपण। भेद दारुण धनापाशीं॥ ८७॥ आपणचि गांठीं बांधिलें धन। तें क्षणक्षणां पाहे आपण। येथवरी धनापाशीं जाण। विकल्प पूर्ण नांदत॥ ८८॥ ऐसा धनापाशीं भेदू जाण। हें नववें अनर्थलक्षण। अतिशयें अतिनिर्वाण। वैर दारुण धनेंसीं॥ ८९॥ धनापाशीं वैर पूर्ण जाण। हें अंगें भोगूनि आपण। सांगे कदर्यु ब्राह्मण। वैरलक्षण धनाचें॥ २९०॥ पित्यापुत्रांमाजीं विरोधू। पाडितो हा द्रव्यसंबंधू। वैरी करी सखे बंधू। तो हा प्रसिद्धू धनलोभ॥ ९१॥ आपुल्या कळवळॺाचे सुहृद। त्यांसी धनलोभ पाडी द्वंद्व। धनास्तव अतिसुबद्ध। वैर विरुद्ध सर्वांसी॥ ९२॥ प्राणाहूनि पढिये मित्रू। त्यांसी धनलोभ करी शत्रू। धनलोभ अति अपवित्रू। वैरी दुस्तरू जगीं हा॥ ९३॥ बंधु कलहें धन वांटितां। अधिक न ये आपुल्या हाता। तैं वांटा करिती जे धर्मतां। त्या साधूंसी तत्त्वतां वैर चाळी॥ ९४॥ जिचे उदरीं जन्मला आपण। जिचें सदा केलें स्तनपान। ते मातेसी धनलोभें जाण। वैर संपूर्ण चालवी॥ ९५॥ आपली जे कां निजजननी। अर्थ तीतें करी वैरिणी। बाहेर घाली घरांतूनी। मुख परतोनी पाहेना॥ ९६॥ ज्याचेनि तुटे भवबंधन। ज्याचेनि बोलें होईजे पावन। त्या सद्गुरूसी अबोला जाण। धनाभिमान धरवित॥ ९७॥ धनाभिमानाचा बडिवार। सद्गुरूमाजीं पाडी वैर। धनाभिमानी अणुमात्र। नव्हे निर्वैर कोणासी॥ ९८॥ जें हें सांगितलें निरूपण। त्या नांव वैर संपूर्ण। हें दहावें अनर्थलक्षण। अविश्वासी धन तें ऐक॥ ९९॥ धनाभिमानाचा विलास। न मानी पित्याचा विश्वास। पूर्ण बंधूचा अविश्वास। केवीं सुहृदांस पातेजे॥ ३००॥ ‘आत्मा वै पुत्रनामासि’। जो साचार धणी सर्वस्वासी। त्या पातेजेना निजपुत्रासी। अतिअविश्वासी धनलोभ॥ १॥ धर्म अर्थ काम संपूर्ण। त्रिसत्य सत्य हें वचन। पूर्वजांची भाक निर्वाण। देऊनि आपण जे परणी॥ २॥ जिणें जीवू प्राण सर्वस्वेंसीं। साचार अर्पिला भ्रतारासी। ऐशियेही धर्मपत्नीसी। अविश्वासी धनलोभ॥ ३॥ जे उदरीं वाहे नवमासीं। जे सर्वदा विष्ठामूत्रसोशी। धनलोभाची जाती कैशी। तेही मातेसी न विश्वासे॥ ४॥ धनाभिमान ये जयापाशीं। तो विश्वासेना सद्गुरूसी। इतरांची कथा कायसी। पूर्ण अविश्वासी धनमानी॥ ५॥ अविश्वासाचें मुख्य कारण। धन आणि दुसरी स्त्री जाण। तेथ मोहावलें ज्याचें मन। तो अतिसंपन्न अविश्वासें॥ ६॥ जो धनमानी आणि स्त्रीजित। त्यासी विमुख होय हृदयस्थ। त्यातें सद्गुरूही उपेक्षित। परम अनर्थ अविश्वासें॥ ७॥ सकळ दोषां मुकुटमणी। अविश्वास बोलिला पुराणीं। जो प्रकटतां अर्धक्षणीं। करी धुळदाणी वृत्तीची॥ ८॥ अविश्वासा अभिमान भेटे। तैं मुक्ताची मुक्तता तुटे। मग विकल्पाचेनि नेटें। घाली उफराटें देहबंदीं॥ ९॥ अविश्वासें कवळिल्या चित्ता। अभिमानें म्हणे मी ज्ञाता। तेव्हां उभउभ्यां पळे आस्तिकता। देखे नास्तिकता सर्वत्र॥ ३१०॥ अविश्वास येतां पहा हो। सकुटुंबपळे सद्भावो। मग लोकत्रयीं अभावो। नांदवी निर्वाहो विकल्पेंकरूनी॥ ११॥ वाडेंकोडें अविश्वासी। विकल्पू नांदे अहर्निशीं। जेथ रिगाव अविश्वासासी। विकल्प त्यासी नागवी॥ १२॥ अंगोवांगीं अविश्वास। परमार्थराष्ट्र पाडी वोस। सद्गुरूचेही दावी दोष। न मनी विश्वास ब्रह्मयाचा॥ १३॥ यालागीं सकळ दोषांचा राजा। अविश्वासाहूनि नाहीं दुजा। तो रिगोनियां निजपैजा। विभांडी वोजा महासिद्धि॥ १४॥ जिकडे अविश्वासें चाली केली। तिकडे परमार्था पळणी झाली। विकल्पाची धाडी आली। ते संधी नागवली बहुतेकें॥ १५॥ सिद्धाचें गेलें सिद्धिभूषण। साधकें सपाई नागवलीं जाण। रानभरी झाले साधारण। श्रद्धेचें उद्यान छेदिलें॥ १६॥ यमनियमांचीं नगरें जाळी। क्रोधू तापसा करी होळी। मोक्षफळें सफळिता केळी। समूळ उन्मळी मोहगजू॥ १७॥ शमदमाचें घरटें। खाणोनि सांडिलें आव्हाटे। वोस विवेकाचे चोहटे। कोणी ते वाटे वागेना॥ १८॥ व्रतोपवास यांचीं साजिरीं। निष्काम उपवनें चौफेरीं। तीं जाळिलीं उपराउपरी। नानापरी विकल्पें॥ १९॥ ऐशिया अविश्वासासी। ज्ञानाभिमानी आले भेटीसी। विकल्पें अभय देऊनि त्यांसी। आपणियापाशीं राहविलें॥ ३२०॥ ऐशिया अविश्वासापुढें। परमार्थ काइसें बापुडें। विकल्पाचें बळ गाढें। तो करी कुडें तत्काळ॥ २१॥ पोटांतून जो अविश्वासी। तो सदा देखे गुणदोषांसी। अखंड द्वेषी परमार्थासी। हा त्यापाशीं स्वभावो॥ २२॥ यापरी अविश्वासी। बद्धवैर पडे परमार्थासी। यालागीं जो पोटींचा अविश्वासी। हांसल्याही त्यापाशीं न वचावें दीनीं॥ २३॥ सकळ दोषांमाजीं समर्थ। सकळ दोषांचें राजत्व प्राप्त। तो हा अकरावा अनर्थ। असे नांदत धनामाजीं॥ २४॥ अकराहीं इंद्रियांसी। पूर्णकरी अविश्वासेंसी। यालागीं अकरावें स्थान यासी। वस्ति अविश्वासासी मनामाजीं॥ २५॥ मुख्यत्वें स्पर्धेचें आयतन। बहुविद्या कां बहुधन। हेंचि स्पर्धेचें जन्मस्थान। येथूनि जाण तें वाढे॥ २६॥ विद्या झालिया संपन्न। पंडित पंडितां हेळण। मुख्य गुरूशीं स्पर्धा करी जाण। हें स्पर्धालक्षण विद्येचें॥ २७॥ गांठीं झालिया धन। स्पर्धा खवळे दारुण। कुबेर परधनें संपन्न। मी स्वसत्ता जाण धनाढॺ॥ २८॥ माझिया निजधनापुढें। गणितां अल्प गंगेचे खडे। माझिये धनाचेनि पडिपाडें। कोण बापुडें उभें राहे॥ २९॥ मग जे जे देखे धनवंत। ते ते हेळूनि सांडी तेथ। यापरी स्पर्धा अद्भुत। धरूनि अर्थ उल्हासे॥ ३३०॥ एवं धरूनियां अर्थ। स्पर्धा बारावा अनर्थ। सदा नांदे धनाआंत। तो हा वृत्तांत सांगीतला॥ ३१॥ आतां तीन अर्थांचा मेळा। एके पदीं झाला गोळा। तोही नांदे धना जवळा। ऐक वेगळा विभाग॥ ३२॥ स्त्री द्यूत आणि मद्यपान। या तिहींतें वाढवी धन। हे तीन अनर्थ दारुण। धनवंता पूर्ण आदळती॥ ३३॥ जो कां पुरुष निर्धन। तो स्त्रियेस चंडिशासमान। देखोनि निर्धनाचें वदन। प्रत्यक्ष जाण स्त्री थुंकी॥ ३४॥ धनहीन पुरुषाचे घरीं। कलहो स्त्री-पुरुषांमाझारीं। निर्भर्त्सूनि नानापरी। दवडी घराबाहेरी पुरुषातें॥ ३५॥ धनवंता पुरुषासी। स्त्री लवोटवो करी कैसी। कुटका देखोनि शुनी जैसी। हालवी पुच्छासी कुंकात॥ ३६॥ त्याधनाची झालिया तुटी। स्त्री वसवसोनि लागे पाठी। आतां नावडती तुमच्या गोठी। रागें उठी फडफडोनी॥ ३७॥ दिवसा पोरांची तडातोडी। रात्रीं न सोसे तुमची वोढी। हातीं नाहीं फुटकी कवडी। जळो गोडी जिण्याची॥ ३८॥ ऐशापरी कडोविकडी। निर्भर्त्सूनि दूरी दवडी। निर्धन पुरुषाची आवडी। न धरी गोडी स्वदारा॥ ३९॥ यापरी निर्धन पुरुषासी। स्वस्त्री वश्य नव्हे त्यासी। स्त्रीबाधा धनवंतासी। अहर्निशीं अनिवार॥ ३४०॥ लक्षूनि धनवंत नर। वेश्या मिरवी शृंगार। हावभाव चमत्कार। त्यासी धनाढॺ थोर भाळले॥ ४१॥ वेश्याकामसंगें जाण। अखंड लांचावलेंमन। तद्योगें मद्यपान। करिती सधन धनमदें॥ ४२॥ मद्यपानें जो उन्मत्त। तो स्वेच्छा खेळे द्यूत। एवं हेही तिन्ही अनर्थ। जाण निश्चित अर्थासी॥ ४३॥ अर्थापाशीं पंधरा अनर्थ। ते सांगीतले इत्थंभूत। सुखाचा लेशु येथ। नाहीं निश्चित धनवंता॥ ४४॥
एते पञ्चदशानर्था ह्यर्थमूला मता नृणाम्।
तस्मादनर्थमर्थाख्यं श्रेयोऽर्थी दूरतस्त्यजेत्॥ १९॥
एवं हे पंधराही अनर्थ। मूर्ख अथवा पंडित। जे अर्थसंग्रह करित। अवश्य हे तेथ उठती॥ ४५॥ त्यासी नाम मात्र हा अर्थ। येऱ्हवीं मूर्तिमंत अनर्थ। यालागीं श्रेयार्थी जे हरिभक्त। तिंहीं निश्चित त्यागावा॥ ४६॥ जेवीं कां बोळ हुंगेना माशी। ढेंकुण न ये तेलापाशीं। वोळंबा न लगे अग्नीसी। तेवीं जो अर्थासी नातळे॥ ४७॥ जेवीं कां अग्नीमाजीं लवण पडे। तें तडफडोनि बाहेर उडे। तेवीं मोक्षाचिये चाडे। जो त्यागी रोकडें निजधन॥ ४८॥ बचनाग मुखीं घालितां आपण। क्षणार्ध दावी गोडपण। तोचि परिपाकीं आणी मरण। तैसा अर्थ जाण अनर्थी॥ ४९॥ यालागीं जो मोक्षार्थी। तेणें अर्थ न धरावा हातीं। काया वाचा चित्तवृत्ती। अर्थ निश्चितीं त्यागावा॥ ३५०॥ अर्थमूळ सकळ भेद। पूर्वीं बोलिला एवंविध। तोचि पुन:पुन: गोविंद। करूनि विशद सांगत॥ ५१॥
भिद्यन्ते भ्रातरो दारा: पितर: सुहृदस्तथा।
एकास्निग्धा: काकिणिना सद्य: सर्वेऽरय: कृता:॥ २०॥
इष्टमित्रांचें मित्रत्व मोडी। बंधुबंधूंचा स्नेह बिघडी। सुहृदांचें सौजन्य तोडी। फुटकी कवडी अर्थाची॥ ५२॥ पित्यापुत्रांमाजीं विरोध। स्त्रीपुत्रांमाजीं द्वंद्व। तो हा जाण अर्थसंबंध। विभांडी हार्द सुहृदांचें॥ ५३॥ काकिणी म्हणजे वीसकवडी। ते आप्तांचा स्नेह तोडी। त्यांतील एक फुटकी कवडी। भेदू पाडी सुहृदांसी॥ ५४॥
अर्थेनाल्पीयसा ह्येते संरब्धा दीप्तमन्यव:।
त्यजन्त्याशु स्पृधो घ्नन्ति सहसोत्सृज्य सौहृदम्॥ २१॥
अतिअल्प अर्थासाठीं। सुहृदता सांडोनि पोटीं। कोपें खवळला उठी। शस्त्रमुठी उद्यत॥ ५५॥ तेथें आप्त होऊनि अनाप्त। परस्परें करिती घात। अर्थ अनर्थी प्राणांत। निजस्वार्थघातकू॥ ५६॥ जितां अर्थ अनर्थ करी। मेल्या ने नरकद्वारीं। उत्तम देहाची बोहरी। अर्थ करी ते ऐक॥ ५७॥
लब्ध्वा जन्मामरप्रार्थ्यं मानुष्यं तद्द्विजाग्र्यताम्।
तदनादृत्य ये स्वार्थं घ्नन्ति यान्त्यशुभां गतिम्॥ २२॥
कोटि जन्माचें शुद्ध सुकृत। तेणें कर्मभूमीं नरदेह प्राप्त। तेथेंही वर्णाग्र्य समर्थ। सत्कुळप्रसूत ब्राह्मणत्वें॥ ५८॥ ऐसें जन्म पावावया येथ। अमरही मरण मागत। इंद्रादि देव जे स्वर्गस्थ। तेही वांछित हें जन्म॥ ५९॥ जे सत्यलोकपर्यंत। ऐश्वर्य पावले अद्भुत। तेही हें जन्म वांछित। उत्कंठित अहर्निशीं॥ ३६०॥ येथ करितां भगवद्भक्ती। पायां लागती चारी मुक्ती। यालागीं हे जन्मप्राप्ती। अमर मागती अहर्निशीं॥ ६१॥ ऐसें उत्तम जन्म पावोनी। अतिअभाग्य मी त्रिभुवनीं। निजस्वार्थातें उपेक्षूनी। भुललों धनीं धनलोभें॥ ६२॥ धनलोभाचिया भ्रांती। कां लोकेषणा लौकिकस्थिती। जो उपेक्षी भगवद्भक्ती। अशुभ गती तयासी॥ ६३॥ तेचि कैशी अशुभ गती। धनलोभ्यां नरकप्राप्ती। चौऱ्यांशीं लक्ष योनींप्रती। गर्भ भोगिती अतिदु:खें॥ ६४॥ जया ब्राह्मणजन्माआंत। स्वर्गमोक्ष सहजें प्राप्त। तेचि अर्थींचा इत्यर्थ। स्वयें सांगत धनलोभी॥ ६५॥
स्वर्गापवर्गयोर्द्वारं प्राप्य लोकमिमं पुमान्।
द्रविणे कोऽनुषज्जेत मर्त्योऽनर्थस्य धामनि॥ २३॥
ब्राह्मणें करितां स्वधर्म। वासना झळंबे स्वर्गकाम। तैं इंद्रचंद्रादिकांचें धाम। पावे द्विजोत्तम सहजचि॥ ६६॥ ज्याचिया याजनस्थिती। इतरांसी होय स्वर्गप्राप्ती। एवं स्वर्ग तो ब्राह्मणांच्या हातीं। त्यांसी ते गती सहजचि॥ ६७॥ सांडूनि ईषणात्रयासी। निष्काम स्वधर्म ज्या द्विजासी। मोक्ष लागे त्याच्या पायांसी। तिष्ठे अहर्निशीं आज्ञाधारी॥ ६८॥ तो अनुग्रही जयांसी। ते पावती निजमोक्षासी। एवढें सामर्थ्य ब्राह्मणापाशीं। अनायासीं सहजचि॥ ६९॥ स्वर्ग जयाची पायरी। मोक्ष ज्याचा आज्ञाधारी। एवढी ब्राह्मणत्वाची थोरी। धनलोभावारी नाशिती॥ ३७०॥ ब्राह्मणजन्म पावल्या जाण। नि:शेष खुंटे जन्ममरण। तेथ मी नाडलों जाण। जोडूनि धन धनलोभें॥ ७१॥ दुर्लभ येथें माणुसपण। त्यामाजीं अतिदुर्लभ ब्राह्मण्य। तेंही पावोनि मी आपण। धनलोभें पूर्ण नागवलों॥ ७२॥ पावोनि ब्राह्मणशरीर। धनें नाडले थोरथोर। अर्थ अनर्थाचें मुख्य घर। दु:ख दुर्धर वाढवी॥ ७३॥ अर्थ अनर्थाचें भाजन। तें नि:शेष त्यागावें धन। वैराग्यें तापला पूर्ण। स्वयें ब्राह्मण बोलत॥ ७४॥॥ आशंका॥ दैवें जोडिलें संपत्तीसी। नेऊनि सांडावें बिदीसी। कां घालावें जळप्रवाहेंसीं। त्याग अर्थासी तो कैसा॥ ७५॥ तें अर्थत्यागनिरूपण। स्वयें सांगताहे ब्राह्मण। जे असतील सधन। तिंहीं सावधान परिसावें॥ ७६॥
देवर्षिपितृभूतानि ज्ञातीन्बन्धूंश्च भागिन:।
असंविभज्य चात्मानं यक्षवित्त: पतत्यध:॥ २४॥
दैवें जोडिलिया धन। आचरावे पंचमहायज्ञ। करावें भगवत्पूजन। उल्हासें जाण महोत्साहें॥ ७७॥ स्वयें करावें पितृतर्पण। षण्णवति श्राद्धें जाण। पितर उद्धरावे आपण। गयावर्जन करोनियां॥ ७८॥ जित्यां पितरां त्रिकाळीं नमन। कदा न करावें हेळण। त्यांची अवज्ञा आपण। प्राणांतीं जाण न करावी॥ ७९॥ त्यांसी गौरवूनि आपण। यथारुचि द्यावें अन्न। यथाशक्ति द्यावें धन। सेवेनें संपूर्ण सुखी करावीं॥ ३८०॥ पिता स्वयमेव नारायण। माता प्रत्यक्ष लक्ष्मीआपण। ऐसें भावें ज्याचें भजन। सुपुत्र जाण तो एक॥ ८१॥ ज्याचे सेवेनें सुखी पितर। तेंचि पितृतर्पण साचार। जितां अवज्ञा तो अनाचार। मेल्या श्राद्धविचार तो लौकिक॥ ८२॥ जो पितृवचन अविश्वासी। तेणें केल्या पापराशी। जो पितृवचन विश्वासी। मोक्ष त्यापाशीं वोळंगणा॥ ८३॥ जितमृतपितृतर्पण। ते सांगीतली उणखूण। या नांव गा पितृभजन। ऋषिपूजनतें ऐक॥ ८४॥ सन्मानें आणूनि ब्राह्मण। श्रद्धा कीजे चरणक्षाळण। चरणतीर्था अभिवंदन। सबाह्य जाण स्वयें कीजे॥ ८५॥ धूपें दीपें यथोक्त पूजन। यथारुचि तृप्ति सदन्न। यथाशक्ति द्यावें धन।
ऋषिपूजन या नांव॥ ८६॥ ब्राह्मण तेचि ऋषीश्वर। ब्राह्मणें तृप्त सनत्कुमार। ब्राह्मणमुखें शार्ङ्गधर। धाला ढेंकर देतसे॥ ८७॥ बंधु स्वगोत्र स्वजन। त्यांची दरिद्रपीडा दारुण। निरसावी देऊनि धन। हा मुख्य धर्म जाण श्रेष्ठत्वें॥ ८८॥ कुटुंब पीडूनि आपण। अन्यत्रां द्यावें अन्नधन। तोचि अधर्म परिपूर्ण। शुद्ध पुण्य तें नव्हे॥ ८९॥ कुटुंबासी यथोचित। सुखी करूनि समस्त। याहूनि उरला जो अर्थ। तो श्रेयार्थ वेंचावा॥ ३९०॥ अतिथि आलिया देख। अन्न द्यावें आवश्यक। तो झालिया पराङ्मुख। पुण्य नि:शेष हरासे॥ ९१॥ सकळ दानांमाजीं जाण। अतिश्रेष्ठ अन्नदान। दीनास देऊनि सन्मान। द्यावें सदन्न अतिश्रद्धा॥ ९२॥ कुटुंब सुखी करी आपण। स्वेच्छा दे दीनभोजन। परी कदर्थवी जो निजप्राण। तोही दारुण अधर्म॥ ९३॥ जैसें कीजे दीनतर्पण। त्यांत आपणही एक दीन। तेथ न करूनि अधिकन्यून। करावें भोजन समभागें॥ ९४॥ पंक्तीमाजीं प्रपंचपण। तें अन्नदानीं अतिविघ्न। यालागीं करावें भोजन। समभागीं आपण सकळांसीं॥ ९५॥ धनाचा सद्वॺयो खरा। द्यावें अनाथप्रेतसंस्कारा। अर्पावें दीनांच्या उद्धारा। धाडावें घरा अयाचितांच्या॥ ९६॥ अंध पंगु मुके दीन। यांसी संरक्षी जो आपण। त्याचेंचि सार्थक धन। शुद्ध पुण्य तयाचें॥ ९७॥ साधुसज्जनां विचंबू अडी। तो विचंबू जो सधन तोडी। त्याच्या निजधर्माची गुडी। उभारे रोकडी वैकुंठीं॥ ९८॥ दुर्बळ जो कां भगवद्भक्त। त्यासी संरक्षी जो धनवंत। तेणें तुष्टला भगवंत। त्यातें उद्धरीत भक्ताआधीं॥ ९९॥ सकळमंगळां मंगळ पूर्ण। सकळ कल्याणांचें कल्याण। ते हे सद्गुरुश्रीचरण। तेथ निजधन जयांचें अर्पे॥ ४००॥ तयांच्या निजधर्माचें निशाण। सत्यलोकीं लागलें जाण। वैकुंठीं कैलासीं संपूर्ण। भेरीनिशाण त्राहाटिलें॥ १॥ स्वधर्में जोडलें निजधन। जो करी सद्गुरूसी अर्पण। तोचि कर्मीं निष्कर्म जाण। परम पावन तो एक॥ २॥ जो चढत्यावाढत्या भगवद्भक्ती। गुरूसी अर्पी निजसंपत्ती। त्यातें अंगीकारूनि लक्ष्मीपती। आपुली निजभक्ती त्यासी दे॥ ३॥ ज्यासी अनन्य गुरुभक्ती। त्याच्या द्वारीं चारी मुक्ती। दासीत्वें उभ्या असती। त्यापासोनि श्रीपती परता नव्हे॥ ४॥ ज्याचें तनु मन धन। गुरुचरणीं अर्पे पूर्ण। त्यासी भवभयाचें भान। कल्पांतीं जाण दिसेना॥ ५॥ दैवें जोडली जे संपत्ती। ते वेंचोनि ऐशा निगुतीं। अर्थें परमार्थप्राप्ती। सभाग्य लाहती निजनिष्ठा॥ ६॥ ऐसें न वेंचोनि धन। स्वयाति कुटुंब पीडी पूर्ण। जो पोटा न खाय आपण। तें यक्षधन संचित॥ ७॥ एवं कदर्थूनि निजप्राण। जें सांचिलें यक्षधन। तें अध:पातासी कारण। दु:ख दारुण धनलोभ्या॥ ८॥ म्हणे मीही याच निष्ठा। यक्षवित्तें झालों करंटा। हातींचा स्वार्थ गेला मोठा। वंचलों कटकटा निजमोक्षा॥ ९॥ सांचोनियां यक्षवित्त। म्यां माझें केलें अनहित। ऐसा तो खेदयुक्त। कष्टें बोलत निजदु:ख॥ ४१०॥
व्यर्थयार्थेहया वित्तं प्रमत्तस्य वयो बलम्।
कुशला येन सिध्यन्ति जरठ: किं नु साधये॥ २५॥
निजभोगविवर्जित। शिणोनि काया वाचा चित्त। कष्टें मिळवावया वित्त। झालों उन्मत्त अविवेकी॥ ११॥ करितां वित्ताचे आयास। गेलें तारुण्य बळ आयुष्य। शरीर क्षीण झालेंनि:शेष। तरी वित्ताचा शोष शमेना॥ १२॥ अर्थें अर्थ वाढवितां। अनिवार वाढली चिंता। तेथें विसरलों निजस्वार्था। अर्थलोभता कदर्यु॥ १३॥ जेणें वित्तें जीवितें साचार। भूतदया परोपकार। करूनियां विवेकी नर। भवाब्धिपरपार पावले॥ १४॥ मज निर्दैवाचें येथ। वृथा वित्त वृथा जीवित। आयुष्यही गेलें व्यर्थ। निजस्वार्थ बुडाला॥ १५॥ म्हणाल असतां जीवें जीत। साधूनि घेऊं निजस्वार्थ। तें आतां न चले येथ। अर्थ सामर्थ्य दोनी गेलीं॥ १६॥ अधर्मास्तव गेलें वित्त। जरेनें गिळिलें सामर्थ्य। केवळ मी जरठ येथ। दैवहत उरलों असें॥ १७॥ कटकटा जोडितां अर्थ। लोक नाडले समस्त। ऐसें जाणोनि प्रस्तुत। स्वयें सांगत कदर्यु॥ १८॥
कस्मात्संक्लिश्यते विद्वान् व्यर्थयार्थेहयासकृत्।
कस्यचिन्मायया नूनं लोकोऽयं सुविमोहित:॥ २६॥
येथ अज्ञानाची कोण गती। जे अर्थ अनर्थी म्हणती। तेही अर्थार्थी होती। ज्ञाते भ्रमती अर्थासी॥ १९॥ ऐसे भ्रमले जे सज्ञान। तेही अर्जावया धन। युक्तायुक्त प्रयत्न। अनुदिनीं जाण स्वयें करिती॥ ४२०॥ सज्ञान भ्रमावया कारण। ईश्वराची माया पूर्ण। अघटघटी जीचें लक्षण। त्या धनी सज्ञान मोहिले॥ २१॥ कृष्णमाया मोहिले पंडित। नव्हे म्हणाल हा इत्यर्थ। जे जोडिताति अर्थ। निजसुखार्थ भोगेच्छा॥ २२॥ भोगांमाजीं जे म्हणती सुख। ते जाणावे केवळ मूर्ख। येथ अर्थींचा विवेक। कदर्यु देख बोलत॥ २३॥
किं धनैर्धनदैर्वा किं कामैर्वा कामदैरुत।
मृत्युना ग्रस्यमानस्य कर्मभिर्वोत जन्मदै:॥ २७॥
कटकटा वर्णाग्र्यें पूज्य पहा हो। त्या द्विजासी भुलवी मायामोहो। भोगीं वाढविजे जो देहो। तोचि पहा हो नश्वर॥ २४॥ त्या देहासी जे नाना भोग। तोच त्यासी क्षयरोग। धन जोडणें अनेग। तोचि मार्ग निर्धनत्वा॥ २५॥ तें धन मिळे अनायासीं। यालागीं धनवंत उपासी। अर्थ जोडोनियां प्रयासीं। भोगितां कामासी सुख काय॥ २६॥ कामसुख कामिनीमेळीं। सुखार्थ स्त्रियेतें प्रतिपाळी। तेचि नानापरी सळी। देतां किंकळी सुटेना॥ २७॥ स्त्रीपुत्रकामभोगादिक। तेणें देहासी द्यावें सुख। तो देहोचि मरणोन्मुख। नित्य अंतक लागला॥ २८॥ जे जे अतिक्रमे घडी। ते ते काळ वयसा तोडी। येथ कोण भोगाची गोडी। धनकामें वेडीं सज्ञानें केलीं॥ २९॥ सर्पमुखीं दुर्दुर जातां। तो दर्दुर होय माशा खाता। तेणें न सुटे सर्पग्रासता। जाण तत्त्वतां जयापरी॥ ४३०॥ तेवीं नानाभोगमेळें। देहींचामृत्यु मागें न टळे। हें जाणोनि आंधळे। धनकामें झाले सज्ञान॥ ३१॥ स्वयें कर्ता तोचि मरणधर्म। त्यासी कोण निववी भोगकाम। हा केवळ मायेचा भ्रम। भ्रमले परम महासिद्ध॥ ३२॥ धनें होईल परलोक। तोही भोगू दु:खदायक। भोगक्षयें कर्ममूर्ख। येती देख अध:पाता॥ ३३॥ करितां भोग्य काम्य कर्म। पुढती मरण पुढती जन्म। भोगणें पडे अविश्रम। हें दु:ख परम धनकामा॥ ३४॥ धनकामासी निजसुख। सर्वात्मना नाहीं देख। मीही ऐसाचि होतों मूर्ख। निजभाग्यें देख धन गेलें॥ ३५॥
नूनं में भगवांस्तुष्ट: सर्वदेवमयो हरि:।
येन नीतो दशामेतां निर्वेदश्चात्मन: प्लव:॥ २८॥
मी पूर्वीं होतों अतिअभाग्य। आतां झालों अतिसभाग्य। मज तुष्टला श्रीरंग। विवेक वैराग्य पावलों॥ ३६॥ माझें संचित जें कां धन। तेंचि माझें मुख्य अज्ञान। तें हरीनें हरोनि आपण। कृपा पूर्ण मज केली॥ ३७॥ भक्तांचें अज्ञान हरी। याचिलागीं नांवें तो ‘हरी’। तेणें कृपा करून पुरी। विवेक अंतरीं उपजविला॥ ३८॥ वैराग्य विवेकावीण आंधळें। विवेक वैराग्यावीण पांगळें। ते माझे हृदयीं जावळीं फळें। एक वेळे उपजविलीं॥ ३९॥ ऐशी हरीनें कृपा करूनी। माझें धनेंसीं अज्ञान हरूनी। विवेक वैराग्य यें दोनी। माझे हृदयभुवनीं प्रकाशिलीं॥ ४४०॥ परी कोणे काळें कोणे देशीं। कोण समयविशेषीं। हरि कृपा करितो कैशी। हें कोणासी कळेना॥ ४१॥ भक्तांचें हरावया चित्त। हरि हरितो त्यांचें वित्त। वित्तत्यागें करूनि सुचित्त। दे विवेकयुक्त वैराग्य॥ ४२॥ ऐसें घेतें देतें विंदान। ब्रह्मादिकां अतर्क्य जाण। यालागीं तो भगवंत पूर्ण। त्यासी साही गुण वशवर्ती॥ ४३॥ त्याचें अचिंत्यानंतरूप। परी मजलागीं झाला सकृप। माझें धनेंसीं निरसूनि पाप। ज्ञानदीप उजळला॥ ४४॥ हो कां कृपा उपजली भगवंता। परी म्यां वंचिल्या यज्ञदेवता। त्या क्षोभल्या करिती घाता। हेंही सर्वथा घडेना॥ ४५॥ करीं चक्र धगधगित। ज्याचा पाठिराखा हरि समर्थ। विघ्नाचा वारा न रिघे तेथ। देव वंदीत तयासी॥ ४६॥ देवीं वंदूनि प्रल्हादासी। शांत करविलें नृसिंहासी। तो पाठिराखा नरहरि ज्यासी। विघ्न त्यापाशीं रिघे केवीं॥ ४७॥ जेणें देवांचिया कोडी। क्षणें सोडविल्या बांदवडी। त्याचे भक्तांची लोंव वांकडी। देवें बापुडीं केवीं करिती॥ ४८॥ जो सकळ देवांचा नियंता। ज्याचे चरण देव वंदिती माथां। तो भगवंत साह्य असतां। विघ्न सर्वथा बाधीना॥ ४९॥ ज्याचेनि बळें वाढले देव। देव जयाचे अवयव। तो हरि तुष्टला स्वयमेव। तेथ विघ्नसंभव कोणाचा॥ ४५०॥ सर्वदेवमय श्रीहरी। इंद्रचंद्ररूपें माझा हरी। ऐशिया मज दीनावरी। विघ्न संसारीं असेना॥ ५१॥ ऐशिये कृपेचें कारण। ये जन्मीं नाहीं साधन। हें माझें पूर्वील जुनें ऋण। देवापाशीं जाण ठेविलें होतें॥ ५२॥ पूर्वीं कोण जन्मीं कोण देशीं। तीर्थक्षेत्रीं कोण वंशीं। कोण आचरलों सत्कर्मासी। तेणें हृषीकेशी तुष्टला॥ ५३॥ मातें अतिदु:खी देखोन। हरि तुष्टला कृपापूर्ण। त्याचे कृपेस्तव जाण। विवेकसंपन्न मी झालों॥ ५४॥ हो कां धनक्षयें झालें दु:ख। तेणें दु:खें पावलों निजसुख। भवाब्धि तरावया देख। वैराग्यविवेक दृढ तारूं॥ ५५॥ हरिखें वोसंडूनि ब्राह्मण। म्हणे उरले आयुष्येनि जाण। वृथा जावों नेदीं अर्धक्षण। करीन निर्दळण सुखदु:खां॥ ५६॥
सोऽहं कालावशेषेण शोषयिष्येऽङ्गमात्मन:।
अप्रमत्तोऽखिलस्वार्थे यदि स्यात्सिद्ध आत्मनि॥ २९॥
काइसा भवभयाचा पाड। घेईन कोटि जन्मांचा सूड। नासल्या आयुष्याचा कैवाड। करीन निवाड येणें देहें॥ ५७॥ देहासी आली वार्धक्यता। परी वृद्धत्व नव्हे माझिया चित्ता। तेणें चित्तें चिंतूनि भगवंता। भवबंध आतां छेदीन॥ ५८॥ उरले आयुष्यें येथ। कळिकाळाचे पाडीन दांत। गर्भदु:खाचें खणोनि खत। मरणाचा घात मी करीन॥ ५९॥ जेणें देहें सत्यानृत। कर्में आचरलों समस्त। तें देह मी शोषीन येथ। विदेहस्थ निजभावें॥ ४६०॥ घालूनि निजबोधाची धाडी। फोडीन देहाची बांदवडी। तोडूनि सुखदु:खांची बेडी। उभवीन गुढी सायुज्याची॥ ६१॥ आजी वैराग्यविवेकयुक्त। मी निजस्वार्थीं सावचित्त। जो जो साधीन परमार्थ। तो तो हस्तगत मज होय॥ ६२॥ मजचि साधे निजस्वार्थ। हाचि नेम नाहीं येथ। जो जो वैराग्यविवेकयुक्त। त्यासी परमार्थ आंदणा॥ ६३॥ वैराग्यविवेकाचें लक्षण। देहगेहस्त्रियादि धन। असतां आसक्त नव्हे मन। वैराग्य पूर्ण यानांव॥ ६४॥ म्यां जो आरंभ केला पहा हो। यासी देवोदेवीसमुदावो। येणेंसहित देवाधिदेवो। मज साह्य होवो हें प्रार्थित॥ ६५॥
तत्र मामनुमोदेरन् देवास्त्रिभुवनेश्वरा:।
मुहूर्तेन ब्रह्मलोकं खट्वाङ्ग: समसाधयत्॥ ३०॥
इंद्रियअधिष्ठात्री देवता। मज साह्य होतू समस्ता। सिद्धि पावावया परमार्था। इंद्रिय जयता मज द्यावी॥ ६६॥ जो त्रिभुवनेश्वर विख्यात। तो साह्य झालिया भगवंत। देवता साह्य होती समस्त। त्या अंतर्भूत हरिरूपीं॥ ६७॥ देवतारूपें भावूनि हरी। सकळ देवांची सेवा करीं। साह्य होऊनि दीनोद्धारीं। मज भवसागरीं तारावें॥ ६८॥ म्हणाल वयसेचा शेवट। केवळ झालासी तूं जरठ। वार्धकीं हे खटपट। वृथा कष्ट कां करिशी॥ ६९॥ ऐसा न मानावा अर्थ। खट्वांगराजा विख्यात। मुहूर्तें साधिला परमार्थ। निजस्वार्थ फावला॥ ४७०॥ त्याहूनि माझें तंव येथ। आयुष्य असेल बहुत। देव साह्य होत समस्त। निमेषें परमार्थ साधीन॥ ७१॥ आजी विवेकवैराग्य जैसें आहे। हें जैं निर्वाहलें राहे। तैं कळिकाळ बापुडें काये। म्यां जिंतिला होये संसार॥ ७२॥ हा पूर्वी कैसा होता येथ। आतां पालटलें याचें वृत्त। झाला विवेकवैराग्ययुक्त। आश्चर्यें सांगत श्रीकृष्ण॥ ७३॥
श्रीभगवानुवाच
इत्यभिप्रेत्य मनसा ह्यावन्त्यो द्विजसत्तम:।
उन्मुच्य हृदयग्रन्थीन् शान्तो भिक्षुरभून्मुनि:॥ ३१॥
ऐसा तो अवंतीचा ब्राह्मण। अतिकदर्यु होता जाण। त्याच्या हातींचें गेलिया धन। वैराग्यचिन्ह पालटले॥ ७४॥ यालागीं वैराग्यविवेक चित्तीं। झाल्या आंदणी ब्रह्मप्राप्ती। कृष्ण सांगे उद्धवाप्रती। निजात्मस्थिती साधावया॥ ७५॥ पूर्वीं होता ब्राह्मणाधम। धनलोभी निंद्यकर्म। तोचि झाला द्विजोत्तम। विवेकें परम वैरागी॥ ७६॥ पूर्वीं केलिया निश्चितार्था। मी साधीन सर्वथा। ऐशिया अति उल्हासता। निजपरमार्था साधक॥ ७७॥ माझिया दु:खाचें कारण। माझा मीचि झालों जाण। धरितां काम लोभ धनाभिमान। दु:ख दारुण मज माझें॥ ७८॥ मज दु:ख देऊनि गेलें धन। धन तें दु:खाचें भाजन। स्त्रीपुत्रार्थ सलोभी आपण। तिंहींच जाण मज दवडिलें॥ ७९॥ धरावा ज्ञातीचा अभिमान। तंव स्वयातीं मी सांडिलों जाण। मजसी विमुख झाले स्वजन। त्यांचा लोभ कोण मज आतां॥ ४८०॥ स्त्री पुत्र स्वजन धन। यांच्या लोभाचें मुख्य कारण। माझा मज देहाभिमान। त्यासी माझें नमन साष्टांग॥ ८१॥ नमन स्त्रीपुत्रादि धनांसी। नमन स्वयातिस्वजनांसी। नमन देहाभिमानासी। संबंध तुम्हां आम्हांसी असेना॥ ८२॥ जेवीं कां जळा आणि चंद्रबिंबासी। एकत्र वास दिसे दोहींसी। परी चंद्र अलिप्त जळेंसीं। तेवीं संबंध तुम्हांसीं मज नाहीं॥ ८३॥ जेवीं कां अखंड अहर्निशीं। छाया जडलीसे रूपासी। तैं रूप न बैसे निजच्छायेसी। तेवीं संबंधू तुम्हांसीं मज नाहीं॥ ८४॥ जेवीं तारुण्य ये देहापाशीं। तेणें तारुण्यें देहो मुसमुशी। शेखीं तारुण्य सांडी देहासी। तेवीं म्यां तुम्हांसी सांडिलें॥ ८५॥ वनीं वसंताचें रिगवणें। वनश्री शोभा मिरवी तेणें। तो वसंतू जेवीं सांडी वनें। तेवीं म्यां सांडणें अहंममता॥ ८६॥ बाप सवैराग्य विवेक। त्याग करविला अलोलिक। देहाभिमाना तिळोदक। दीधलें देख ममतेसी॥ ८७॥ जेवीं भ्रष्टलिया पुत्रासी। पिता घटस्फोटें त्यागी त्यासी। तेवीं त्यागूनि देहाभिमानासी। स्वयें संन्यासी तो झाला॥ ८८॥ जेवीं कां ये फळ परिपाकातें। सांडी जन्मल्या निजदेहातें। देंठ न धरी त्या फळातें। फळ देंठातें धरीना॥ ८९॥ तेवीं हा न धरी अहंतेसी। अहंता लाजिली न ये यापाशीं। हाही देहाभिमानासी। सद्भावेंसीं नातळे॥ ४९०॥ जळीं जेवीं पद्मिनीपान। असोनि जळेंसीं अलिप्त जाण। तेवीं नातळोनि देहाभिमान। संन्यासग्रहण विध्युक्त॥ ९१॥ अन्य संन्यासी करोनि होम। जाळिला म्हणती क्रोधकाम। शेखीं तिळतूप होय भस्म। क्रोधकाम संचले॥ ९२॥ तैशी नव्हेच याची होमस्थिती। जाळिल्या विकल्पाच्या वृत्ती। कामक्रोधांची पूर्णाहुती। केली अहंकृतीसमवेत॥ ९३॥ होमूनि निजस्वभावासी। झाला त्रिदंडी संन्यासी। आज्ञा घेऊनि गुरूपाशीं। सुखें सुखवासी विचरत॥ ९४॥
स चचार महीमेतां संयतात्मेन्द्रियानिल:।
भिक्षार्थं नगर ग्रामानसङ्गोऽलक्षितोऽविशत्॥ ३२॥
जिणोनियां मनपवन। सांडोनिया मानाभिमान। परमानंदें परिपूर्ण। पृथ्वीमाजीं जाण विचरत॥ ९५॥ ज्यासी नावडे देहसंगती। त्यासी कैंचा संगू सांगाती। एकला विचरे क्षिती। आत्मस्थिती निजबोधें॥ ९६॥ अखंड वसे वनांतरीं। भिक्षेलागीं निघे नगरीं। खेट खर्वट ग्रामीं पुरीं। भिक्षा करी यथाप्राप्त॥ ९७॥ मी एक भिक्षेसी येता। हा नेम न करी सर्वथा। अलक्ष्य येवोनि अवचितां। जें आलें हाता तेणें सुखी॥ ९८॥ पंचागार सप्तागार। हाही नेम नाहीं निर्धार। कोणेविखींचा अहंकार। अणुमात्र धरीना॥ ९९॥
तं वै प्रवयसं भिक्षुमवधूतमसज्जना:।
दृष्ट्वा पर्यभवन् भद्र बह्वीभि: परिभूतिभि:॥ ३३॥
न करी देहमळक्षाळण। मुसलवत् करी स्नान। यालागीं तो धूसरवर्ण। अवधूतपण या हेतू॥ ५००॥ ऐसा विचरतां पृथ्वीसी। अवचटें आला अवंतीसी। अतिवृद्ध आणि संन्यासी। अवधूतवेषी देखिला॥ १॥ संन्यास घेतलिया जाण। पूर्वभूमिका अवलोकन। एक वेळां करावी आपण। पद्धतिलेखन आचार्याचें॥ २॥ ते नगरींचे म्हणती जन। अरे हा कदर्यु ब्राह्मण। याचें हारपल्या धन। संन्यासीजाण हा झाला॥ ३॥ हें ऐकोनियां अतिदुर्जन। त्यासभोंवते मीनले जाण। परस्परें दावूनि खूण। विरुद्ध छळण मांडिलें॥ ४॥ त्यासी बहुसाल उपद्रवितां। क्षणार्ध पालट नव्हे चित्ता। क्रोध न येचि सर्वथा। अतिविवेकता महाधीरू॥ ५॥ त्याच्या उपद्रवाची कथा। आणि त्याचि सहनशीलता। तुज मी सांगेन तत्त्वतां। सावधानता अवधारीं॥ ६॥ दृष्टि ठेवूनि येथींच्या अर्था। विवेकें कुशळ होय श्रोता। अर्थ धरी भावार्थता। शांति तत्त्वतां तो लाभे॥ ७॥ विवेकचित्तचकोरचंद्रा। भागवतभाग्यें शुद्धमुद्रा। शांतिसौभाग्यनरेंद्रा। ऐक सुभद्रा उद्धवा॥ ८॥ आकळावया निजशांतीसी। कृष्ण संबोधी उद्धवासी। ऐसें सावध करोनि त्यासी। म्हणे दशा ते ऐसी शांतीची॥ ९॥ अवरोधितां जीविकेसी। सन्मान देतां अपमानेंसीं। जो सर्वथा न ये क्षोभासी। शांति त्यापाशीं तें ऐक॥ ५१०॥
केचित्त्रिवेणुं जगृहुरेके पात्रं कमण्डलुम्।
पीठं चैकेऽक्षसूत्रं च कन्थां चीराणि केचन॥ ३४॥
दुर्जनीं वेढूनि संन्यासी। छळणार्थ लागती पायांसी। तेणें नमनप्रसंगेंसीं। करिती स्पर्शासी अवघेही॥ ११॥ एक म्हणती वृद्ध संन्यासी। एक म्हणती किती चातुर्मासी। एक पुसती संप्रदायासी। कोणे गुरूनें तुम्हांसी मुंडिलें॥ १२॥ एक खुणाविती एकांसी। पूर्वभूमी पुसा यासी। एक म्हणती यापाशीं। धनसंग्रहासी पुसा रे॥ १३॥ एक म्हणती अहो स्वामी। तुमची कवण पूर्वभूमी। तुम्ही व्यापारी कीं उदिमी। कोणे ग्रामीं निवासू॥ १४॥ एक म्हणती कांहीं आहे धन। एक म्हणती आतां निर्धन। एक म्हणती न करा छळण। विरक्त पूर्ण संन्यासी॥ १५॥ ऐसें करितां छळण। संन्यासी अनुद्वेग जाण। नि:शब्दवादें धरिलें मौन। कांहीं वचन न बोले॥ १६॥ एक म्हणती त्रिदंडा कारण। हा पूर्वीं होता अतिसधन। कोरूनि भरिलें असेल धन। हेंचि लक्षण त्रिदंडा॥ १७॥ एक म्हणती सहस्रदोरीं। कंथा केली असे अतिथोरी। एक म्हणती त्यामाझारीं। धन शिरोवेरीं खिळिलेंसे॥ १८॥ एक म्हणती काय पाहतां तोंड। येणें मांडिलेंसे पाखंड। ऐसा निर्भर्त्सिता वितंड। एकें त्रिदंड हरितला॥ १९॥ एकें हरितलें पाणिपात्र। एकें नेलें पीठ पवित्र। एकें नेलें अक्षसूत्र। काषायवस्त्र तें एकें॥ ५२०॥ एक म्हणे हा माझा ऋणायित। भला सांपडला येथ। म्हणोनि कंथेसी घालीहात। कौपीनयुक्त तेणें नेली॥ २१॥ ऐसें करितांही दुर्जन। त्याचें गजबजीना मन। कांहीं न बोले वचन। क्षमेनें पूर्ण निजधैर्य॥ २२॥ तो म्हणे जाणेंयेणें हीं दोनी। केवळ अदृष्टाअधीनी। यालागीं मागण्याची ग्लानी। न करूनि मुनी निघाला॥ २३॥ संन्यासी जातां देखोनी। सभ्य सभ्य शठ येऊनी। साष्टांग नमस्कार करूनी। अतिविनीतपणीं विनवित॥ २४॥ मग म्हणती हरहर। अपराध घडला थोर। मातले हे रांडपोर। पात्रापात्र न म्हणती॥ २५॥ स्वामी कोप न धरावा मनीं। वस्त्रें घ्यावीं कृपा करूनी। परतविला पायां लागूनी। पूर्ण छळणीं छळावया॥ २६॥
प्रदाय च पुनस्तानि दर्शितान्याददुर्मुने:।
संन्यासी आणूनि साधुवृत्ती। दंडकमंडलू पुढें ठेविती। एक वस्त्रें आणोनि देती। एक ते नेती हिरोनी॥ २७॥ एक ते म्हणती वृद्ध संन्यासी। याचीं वस्त्रें द्यावीं यासी। एक म्हणती या शठासी। दंडितां आम्हांसी अतिपुण्य॥ २८॥ वस्त्रें न देती उपहासीं। संन्यासी निघे सावकाशीं। एक परतवूनि त्यासी। देऊनी वस्त्रांसी जा म्हणती॥ २९॥ एक धांवूनि हाणे माथां। वस्त्रें हिरोनि जाय परता। एक म्हणती द्या रे आतां। वृद्ध कां वृथा शिणवाल॥ ५३०॥ यावरी संन्यासी आपण। गेला वस्त्रें वोसंडून। करोनिया संध्यास्नान। भिक्षार्थ जाण निघाला॥ ३१॥
अन्नं च भैक्ष्यसम्पन्नं भुञ्जानस्य सरित्तटे॥ ३५॥
मूत्रयन्ति च पापिष्ठा:ष्ठीवन्त्यस्य च मूर्धनि।
यतवाचं वाचयन्ति ताडयन्ति न वक्ति चेत्॥ ३६॥
भिक्षा मागोनि संपूर्ण। शास्त्रविभागें विभागून। सरितातटीं करितां भोजन। तें देखोनि दुर्जन तेचि आले॥ ३२॥ अरे हा संन्यासी नव्हे साचा। कदर्यु आमुचे गांवींचा। होय नव्हे न बोले वाचा। हा ठकपणाचा उपावो॥ ३३॥ यासी बोलविल्याविण राहे। तो याचाचि दासीपुत्र होये। ऐशी शपथ करूनि पाहें। आले समुदायें तयापाशीं॥ ३४॥ एक म्हणे याचें मौन। उडवीन मी न लागतां क्षण। हा जेणें करी शंखस्फुरण। तो उपावो जाण मी जाणें॥ ३५॥ तो महापापी अतिदुर्मती। जेवितांत्याचे मस्तकीं मुती। तरी क्रोध न ये त्याचे चित्तीं। निजात्मस्थितीं निवाला॥ ३६॥ जरी अंतरींक्रोध आला। तरी तो अशांतचि झाला। बाहेरी न बोलेचि बोला। लोकलाजे भ्याला पोटस्थे॥ ३७॥ तैसा नव्हे हा संन्यासी। धोऊनि सांडिलें निजलाजेसी। निजशांतीची दशा कैशी। क्रोध मानसीं वोळेना॥ ३८॥ आंत एक बाह्य एक। या नांव मुख्य दांभिक। तैसा संन्यासी नव्हे देख। सबाह्यचोख निजशांति॥ ३९॥ तंव ते दुर्जन म्हणती। अरे हा न बोले निश्चितीं। संमुख मुखावरी थुंकिती। अतिनिंदिती नोकूनी॥ ५४०॥ एक हाणिती लाता। एक टोले देती माथां। एक म्हणती न बोलतां। यासी सर्वथा न सोडा॥ ४१॥
तर्जयन्त्यपरे वाग्भि: स्तेनोऽयमिति वादिन:।
बध्नन्ति रज्ज्वा तं केचिद्बध्यतां बध्यतामिति॥ ३७॥
आणिक एक दुरूनि जाण। वर्मीं विंधिती वाग्बाण। याच्या वेषाचें लक्षण। आम्हीं संपूर्ण जाणीतलें॥ ४२॥ याचे वेषाचा विचारू। शठ नष्ट दांभिक थोरू। भिक्षामिसें हिंडे हेरू। धरा चोरू निश्चितीं॥ ४३॥ ऐसे विकल्पवाक्यें गर्जती। एक बांधा बांधा म्हणती। एक दृढदोरीं बांधिती। दोहीं हातीं अधोमुख॥ ४४॥
क्षिपन्त्येकेऽवजानन्त एष धर्मध्वज: शठ:।
क्षीणवित्त इमां वृत्तिमग्रहीत्स्वजनोज्झित:॥ ३८॥
त्याचें पूर्ववृत्त जे जाणती। ते अपमानूनि निंदिती। पूर्वीं कदर्यू याची ख्याती। हा आम्हांप्रती संन्यास मिरवी॥ ४५॥ येणें सूक्तासूक्तीं संचिलें धन। अधर्में वित्त झालें क्षीण। स्वजनीं सांडिला दवडून। पोटासी अन्न मिळेना॥ ४६॥ अन्न मिळावया पोटासी। झाला कपटवेष संन्यासी। लाज नाहीं या निर्लज्जासी। योग्यता आम्हांसी दावितां॥ ४७॥ पूर्वींलागूनि हा वंचकू। आतां झाला संन्यासी दांभिकू। याचें मत नेणे हा भोळा लोकू। महाठकू दृढमौनी॥ ४८॥ हो कां बहुरुप्याचीं सोंगें जैसीं। तेवीं हा उत्तमवेषें संन्यासी। होऊनि ठकूं आला आम्हांसी। मारितां यासी दोष नाहीं॥ ४९॥
अहो एष महासारो धृतिमान् गिरिराडिव।
मौनेन साधयत्यर्थं बकवद्दृढनिश्चय:॥ ३९॥
हा दांभिकांमाजीं महाबळी। धरिल्या वेषातें प्रतिपाळी। आम्हीं पीडितां न डंडळी। जेवीं कां वाहटोळीं महामेरू॥ ५५०॥ याच्या धैर्याचें शहाणपण। साधावया अन्नआच्छादन। बकाच्या ऐसें धरिलें मौन। स्वार्थ पूर्ण लक्षूनी॥ ५१॥ बक गिळावया मासा। मौन धरोनि राहे जैसा। हाही जाणावा तैसा। भोळॺा माणसां नाडील॥ ५२॥ आतां हा धनलोभार्थ जाणा। पूर्वील उपद्रव नाणी मना। तेचि झालीसे दृढ धारणा। उपद्रव गणना या नाहीं॥ ५३॥ एक म्हणती धैर्यमूर्ती। म्हणोनियां लाता हाणिती। एक ते नाकीं काडॺा खुपसिती। याची निजशांती पाहों पां॥ ५४॥ ऐसेऐसे उपद्रवती। नानापरी उपहासिती। तरी द्वेष नुपजे चित्तीं। निजशांती निश्चळू॥ ५५॥ जंव जंव देखती त्याची शांती। तंव तंव दुर्जन क्षोभा येती। नाना उपद्रव त्यासी देती। तेंचि श्रीपती सांगत॥ ५६॥
इत्येके विहसन्त्येनमेके दुर्वातयन्ति च।
तं बबन्धुर्निरुरुधुर्यथा क्रीडनकं द्विजम्॥ ४०॥
कदर्या बाणली पूर्ण शांती। ऐसे एक उपहासिती। एक नाकीं चुना लाविती। एक मुख माखिती काजळें॥ ५७॥ एक अतिशठ साचोकारे। पुढां ठाकोनि पाठिमोरे। शर्धा करिती अधोद्वारें। नाकीं तोंडीं भरे दुर्गंध॥ ५८॥ तरी त्याचिया निजस्थिती। अणुमात्र क्षोभ न ये चित्तीं। तोचि संन्यासी त्रिजगतीं। ज्याची ढळेना शांती क्षोभविल्याही॥ ५९॥ एवं क्षोभेना त्याचें मन। देखोन खवळले दुर्जन। त्यासी गळां शृंखला निरोधून। आणिला बांधून चौबारा॥ ५६०॥ यासी वोळखा रे कोणी तुम्ही। हा धनलोभी जो अकर्मी। तो आजी सांपडविला आम्हीं। अति अधर्मी दांभिक॥ ६१॥ जेवीं गारुडी बांधी माकडा। तेवीं संन्यासी बांधिला गाढा। मिळोनियां चहूंकडा। मागांपुढां वोढिती॥ ६२॥ एक ओढिती पूर्वेसी। एक ओढिती पश्चिमेसी। संन्यासी हांसे निजमानसीं। सुख सर्वांसी होये येणें॥ ६३॥ देह प्रारब्ध भोगी जाण। याचा मजसी संबंध कोण। येणें विवेकें क्षमापूर्ण। कोणाचें मन दुखवीना॥ ६४॥ जेथ स्वगोत्र सोईरे स्वजन। जिंहीं दीधला अतिसन्मान। त्यां देखतां अपमान। अनुद्विग्न जो साहे॥ ६५॥ त्यापाशीं शांति संपूर्ण। उद्धवा निश्चयेंसीं जाण। ज्याचें लोकेषणे लाजे मन। अशांति जाण ते ठायीं॥ ६६॥ ऐसा क्षोभवितां पहा हो। क्षोभा न चढे त्याचा भावो। त्या संन्याशाचा अभिप्रावो। स्वयें देवाधिदेवो सांगत॥ ६७॥
एवं स भौतिकं दु:खं दैविकं दैहिकं च यत्।
भोक्तव्यमात्मनो दिष्टं प्राप्तं प्राप्तमबुध्यत॥ ४१॥
भिक्षु बोले निजविवेक। त्रिविध प्रारब्धें बांधले लोक। तेणें भोगणें पडे आवश्यक। रावो रंक सुटेना॥ ६८॥ भूतांची पीडा ते भौतिक। देवांची पीडा ते दैविक। देहीं उपजती ज्वरादिक। हे पीडा देख दैहिक॥ ६९॥ यापरी त्रिविध दु:ख। प्रारब्ध झालें जनक। तें भोगितां मानी असुख। तो केवळ मूर्ख अतिमंद॥ ५७०॥ जे भोग आले प्रारब्धेंसीं। तेथें साह्य केल्या हरिहरांसी। भोग न चुकती प्राण्यासी। हें जाणोनि संन्यासी क्षमावंत॥ ७१॥ कृष्ण साह्य पांडवांसी। ते भोगिती नष्टचर्यासी। तेथें साह्य केल्या हरिहरांसी। प्रारब्ध कोणासी टळेना॥ ७२॥
परिभूत इमां गाथामगायत नराधमै:।
पातयद्भि: स्वधर्मस्थो धृतिमास्थाय सात्त्विकीम्॥ ४२॥
दुर्जनांच्या उपद्रवाहातीं। निजशांति न सांडीच यती। धरोनियां सात्त्विकी धृती। स्वधर्मस्थिती न ढळेचि॥ ७३॥ तेणें भिक्षूनें गायिली गाथा। ते तुज मी सांगेन आतां। उद्धवा अतिसावधानता। तो बोध तत्त्वतां अवधारीं॥ ७४॥ तो बोधू धरितां चित्तीं। द्वंद्वसाम्या पावे स्थिती। सहजें उल्हासे निजशांति। सायुज्यमुक्ती घर रिघे॥ ७५॥ जगीं उद्धवाचें भाग्य पूर्ण। ज्यासी श्रीकृष्ण करी सावधान। काय बोलिला भिक्षु आपण। तें निरूपण अवधारीं॥ ७६॥
द्विज उवाच
नायं जनो मे सुखदु:खहेतु-
र्न देवताऽऽत्माग्रहकर्मकाला:।
मन: परं कारणमामनन्ति
संसारचक्रं परिवर्तयेद्यत्॥ ४३॥
सुजन दुर्जन साधारण। ऐसे जे त्रिविध जन। माझ्या सुखदु:खांसी कारण। सर्वथा जाण ते नव्हती॥ ७७॥ जन तितुके पांचभौतिक। माझाही देहो तोचि देख। जनांसी मज सहजें ऐक्य। उपजे सुखदु:ख मनापाशीं॥ ७८॥ देवता सुखदु:खदायक। ऐसें म्हणावें आवश्यक। तीं दैवतें मन:काल्पनिक। त्याचें सुखदु:ख मजसी न लगे॥ ७९॥ देवतारूपें मन आपण। मनें कल्पिले देवतागण। ते जैं सुखदु:खें देती जाण। तैं मुख्य कारण मन झालें॥ ५८०॥ जेथ जैसा मनाचा सद्भावो। तेथ तद्रूपें भासे देवी देवो। जेथ मनाचा विकल्प पहा हो। तेथ थिता देवो दिसेना॥ ८१॥ यालागीं सकळ देवता। त्या जाण मन:कल्पिता। त्यांपासाव सुखदु:खव्यथा। ते मनाचे माथां निश्चित॥ ८२॥ आत्मा सुखदु:खांसी कारण। हें समूळ मिथ्यावचन। आत्म्याचे ठायीं द्वैतभान। त्रिशुद्धी जाण असेना॥ ८३॥ मी एक सुखदु:खांचा दाता। हा एक सुखदु:खांचा भोक्ता। हें आत्म्याचे ठायीं तत्त्वतां। जाणसर्वथा असेना॥ ८४॥ जन्मकाळींचे ग्रह दारुण। म्हणों सुखदु:खांसी कारण। ग्रहांचा ग्रहो मन आपण। जन्ममरण भोगवी॥ ८५॥ ग्रहांची ग्रहगती देहांता वरी। मनाची ग्रहगती त्याहूनि थोरी। दु:ख भोगवी नाना प्रकारीं। जन्मजन्मांतरीं सोडीना॥ ८६॥ दुष्ट ग्रह चारी दिवस पीडी। मनाची पीडा जन्मकोडी। दुष्ट ग्रहो भोगूनि सोडी। मन न सोडी कल्पांतीं॥ ८७॥ जैं मन न धरी देहाभिमान। तैं ग्रहांची पीडा मानी कोण। यालागीं सुखदु:खां कारण। मनचि जाण महाग्रहो॥ ८८॥ येथ निजकर्म दु:खदायक। हेंही म्हणतां न ये देख। कर्म कर्मबंधमोचक। तें दु:खदायक घडे केवीं॥ ८९॥ स्वकर्म शुद्ध स्वाभाविक। त्यासी मनें करूनि सकामिक। नानापरी अतिदु:ख। योनि अनेक भोगवी॥ ५९०॥ हो कां कर्माचेनि क्रियायोगें। जैं मन:संकल्प कर्मीं न लगे। तैं सुखदु:खांचीं अनेगें। विभांडी वेगें निजकर्म॥ ९१॥ देह सुखदु:खांसी काय जाणे। आत्मा सुखदु:ख सर्वथानेणे। येथ सुखदु:खांचे गाडे भरणें। मनें भोगवणें निजसत्ता॥ ९२॥ येथ सुखदु:खदायक। मनचि झालें असे एक। मनाअधीन होऊनि लोक। मिथ्या सुखदु:ख भोगिती॥ ९३॥ काळ सुखदु:खांचा दाता। हेंही न घडे गा सर्वथा। मन:संकल्प संकेता। काळाची सत्ता लागली॥ ९४॥ अजरामर असतां आपण। मनें घेतलें मज आहे मरण। तेथचि काळ लागला जाण। क्षणें क्षण निर्दाळित॥ ९५॥ आपुलेनि हातें आपण। पठाडे खोंविलें दाभण। रात्रीं रुततांचि तें जाण। सर्पभयें प्राण सांडिला॥ ९६॥ त्यासी सर्प नाहीं लागला। मा विखें केवीं तो घारला। परी निजशंके स्वयें निमाला। तैसा काळ लागला जनासी॥ ९७॥ एकासी सर्प झोंबला पाठीसी। काय रुतलें म्हणे सांगातियासी। तो म्हणे कांटी लागली होती कैसी। ते म्यां अनायासीं उपडिली॥ ९८॥ तो नव्हे सर्पा साशंक। यालागीं त्यासी न चढेचि विख। निजव्यापारीं देख। यथासुख वर्तत॥ ९९॥ त्यासी सांगोनि बहुकाळें खूण। देतां सर्पाची आठवण। तत्काळ विषें आरंबळोन। आशंका प्राण सांडिला॥ ६००॥ तेवीं निर्विकल्पपुरुखा। उठी संकल्पाची आशंका। ते काळीं काळू देखा। बांधे आवांका निर्दळणीं॥ १॥ नि:शंकपणें साचार। ज्याचें मन म्हणे मी अमर। त्याचें काळ वर्जी घर। काळ दुर्धर मन:शंका॥ २॥ जो निर्विकल्प निजनिवाडें। काळ सर्वथा न ये त्याकडे। नश्वर नाहीं मा तयापुढें। काळ कोणीकडे रिघेल॥ ३॥ यापरी गा काळ देख। नव्हे सुखदु:खदायक। सुखदु:खांचें जनक। मनचि एक निश्चित॥ ४॥ मन:कल्पित संसार जाण। मनें कल्पिलें जन्ममरण। संसारचक्रीं आवर्तन। मनास्तव जाण पुन:पुन:॥ ५॥ हे साही प्रकार जाण। म्हणती सुखदु:खांसी कारण। विचारितां हें अप्रमाण। मनोजन्य सुखदु:खें॥ ६॥ नवल लाघवी कैसें मन। शुद्धि उपजवी मीपण। चिद्रूपा लावूनि जीवपण। सुखदु:खें जाण भोगवी॥ ७॥ डोळींचा कणू अल्प एक। तो शरीरासी दे अतिदु:ख। तेवीं वासनामात्रें मन देख। दारुण सुखदु:ख भोगवी॥ ८॥ म्हणाल येथ अविद्या एक। ते होय सुखदु:खदायक। अविद्या ब्रह्म असतां देख। मनेंवीण सुखदु:ख कदा नुपजे॥ ९॥ अविद्या ब्रह्म असतां पाहीं। मन लीन सुषुप्तीच्या ठायीं। तेव्हां सुखदु:खचि नाहीं। भोग कोणेंही कंहीं देखिजेना॥ ६१०॥ मनदुश्चित जेव्हां पाहीं। तेव्हां जो भोग भोगिजे देहीं। तें सुखदु:ख न पडे ठायीं। स्वयें स्वदेहीं देखिजे॥ ११॥ यालागीं सुखदु:खांचें कारण। मनचि आपण्या आपण। तेणें लावूनि जन्ममरण। भोवंडी दारुण भवचक्रीं॥ १२॥ भवचक्रीं प्रत्यावर्तन। कोणे रीती करवी मन। तेचि अर्थींचें निरूपण। भिक्षु आपण्या आपण निरूपी॥ १३॥
मनो गुणान्वै सृजते बलीय-
स्ततश्च कर्माणि विलक्षणानि।
शुक्लानि कृष्णान्यथ लोहितानि
तेभ्य: सवर्णा: सृतयो भवन्ति॥ ४४॥
मनें कल्पोनि निजसत्तें। उपजवी नाना वृत्तींतें। त्याचि त्रिगुणा होती येथें। गुणविभागातें गुणवृत्ती॥ १४॥ सत्त्वरजतमादि गुणीं। सुरनरतिर्यगादि योनी। मनें त्रिभुवन उभवूनी। संसारभुवनीं स्वयें नांदे॥ १५॥ त्या मनाची प्रौढी गाढी। क्षणें रची क्षणें मोडी। मन ब्रह्मादिकां भुली पाडी। इतर बापुडीं तीं कायी॥ १६॥ मनाचा बलात्कार कैसा। निर्गुणीं पाडी गुणाच्या फांसा। लावूनि जीवपणाचा झांसा। संसारवळसा आवर्तीं॥ १७॥ केवळ विचारितां मन। तें जड मूढ अचेतन। त्याचें केवीं घडे स्रजन। तेंचि निरूपण सांगत॥ १८॥
अनीह आत्मा मनसा समीहता
हिरण्मयो मत्सख उद्विचष्टे।
मन: स्वलिङ्गं परिगृह्य कामान्
जुषन्निबद्धो गुणसङ्गतोऽसौ॥ ४५॥
आत्मा चित्स्वरूप परिपूर्ण। नि:संग निर्विकार निर्गुण। त्यासी संसारबंधन। सर्वथा जाण घडेना॥ १९॥ जो स्वप्रकाशें प्रकाशघन निजतेजें विराजमान। जो परमात्मा परिपूर्ण। त्यासी क्रियाचरण कदा न घडे॥ ६२०॥ विचारितां निजनिवाडें। मनाचें जडत्वचि जोडे। त्यासीही संसार न घडे। भवबंध घडे तो ऐका॥ २१॥ नवल मनाचें विंदान। शुद्धीं उपजवी मीपण। तेचि वस्तूसी जीवपण। सगुणत्वा जाण स्वयें आणी॥ २२॥ मन:संकल्पाचें बळ। शुद्धासी करी शबळ। लावूनि त्रिगुणांची माळ। भवबंधजाळ स्वयें बांधे॥ २३॥ जेवीं घटामाजील घटजळ। आकळी अलिप्त चंद्रमंडळ। तेवीं मन:संकल्पें केवळ। कीजे शबळ चिदात्मा॥ २४॥ घटींचें हालतां जीवन। चंद्रमा करी कंपायमान। तेवीं शुद्धासी जन्ममरण। मनोजन्य सुखदु:खें॥ २५॥ आत्मा स्वप्रकाश चित्स्वरूप। मन जड कल्पनारूप। तें मानूनि आपुलें स्वरूप। त्याचें पुण्यपापस्वयें भोगी॥ २६॥ जीवाचा आप्त आवश्यक। सुहृद सखा परमात्मा एक। तो मना जीवाचा नियामक। द्रष्टा देख साक्षित्वें॥ २७॥ अविद्या प्रतिबिंबे नेटका। जीव जो कां माझा सखा। तो मनोभ्रमें भ्रमोनि देखा। भोगी सुखदु:खां मनोजन्य॥ २८॥ मनाची एकात्मता परम। जीवासी पडला थोर भ्रम। आपण असतांही निष्कर्म। कर्माकर्म स्वयें भोगी॥ २९॥ सूळीं जीव मनाचा नियंता। तोचि मनाच्या एकात्मता। मनाचिया सुखदु:खव्यथा। आपुले माथां नाथिल्या सोशी॥ ६३०॥ जेवीं अति आप्तता प्रधान। रायासी लावी दृढबंधन। मग राजा तो होय दीन। तो भोगवी तें आपण सुखदु:ख भोगी॥ ३१॥ ते दशा झाली जीवासी। मनें संसारी केलें तयासी। मग नाना जन्ममरणें सोशी। अहर्निशीं सुखदु:खें॥ ३२॥ त्या मनासी निग्रहो न करितां। जीवाची न चुके व्यथा। मनाचेनि छंदें नाचतां। साधनें सर्वथा व्यर्थ होती॥ ३३॥
दानं स्वधर्मो नियमो यमश्च
श्रुतं च कर्माणि च सद्व्रतानि।
सर्वे मनोनिग्रहलक्षणान्ता:
परो हि योगो मनस: समाधि:॥ ४६॥
न लक्षितां मनोनियमन। सर्वस्वही दिधल्या दान। एक मी दाता होय अभिमान। तेणें दानें मन दाटुगें होय॥ ३४॥ चुकोनि मनोनिग्रहाचें वर्म। आचरतां वर्णाश्रमधर्म। तेणें उल्हासे मनोधर्म। माझें स्वकर्म अतिश्रेष्ठ॥ ३५॥ मीचि एक तिहीं लोकीं। स्वाचारनिष्ठ स्वयंपाकी। यापरी स्वधर्मादिकीं। मन होय अधिकीं चाविरें॥ ३६॥ मनोनियमनीं नाहीं बुद्धी। तैं यमनियम ते उपाधी। मी एक साधक त्रिशुद्धी। हेंचि प्रतिपादी मनोधर्म॥ ३७॥ करितां वेदशास्त्रश्रवण। गर्वाचें भरतें गहन। पांडित्यीं अतिअभिमान। मनोनियमन तेथें कैंचें॥ ३८॥ करूं जातां निजकर्म। कर्मक्रिया अतिदुर्गम। कर्मठतेचा चढे भ्रम। मनोनियमन घडे केवीं॥ ३९॥ कर्म केवळ देहाचे माथां। आत्मा देहीं असोनि विदेहता। त्यासी कर्मीं कर्मबद्धता। कर्मठ मूर्खतां मानिती॥ ६४०॥ अनंतव्रतें झाले व्रती। तेणें धनधान्य वांछिती। मनोनिग्रहो नाहीं चित्तीं। सद्व्रते जाती सुनाट॥ ४१॥ व्रत दान स्वधर्म सकळ। यांसी मनोनिग्रहो मुख्य फळ। तेणेंवीण अवघीं विकळ। साधनें निष्फळ साधकां॥ ४२॥ दानादिक सप्त पदार्थ। हे ज्ञानाचे अंगभूत। तीं साधनें समस्त। निष्फळ येथ केवीं म्हणा॥ ४३॥ दानादिकें जीं जीं येथें। इहामुत्र फळ ये त्यांतें। तें फळचि निष्फळ येथें। जन्ममरणांतें वाढवी॥ ४४॥ येथ साधक होय सज्ञान। फळाशानि:शेष त्यागून। दानादि स्वधर्माचरण। चित्तशुद्धीसी जाण उपयोगी॥ ४५॥ माझी व्हावी चित्तशुद्धी। ऐशी उपजावया बुद्धी। भगवत्कृपा पाहिजे आधीं। तैं साधनें सिद्धी पावती॥ ४६॥ साधनीं माझीमुख्य भक्ती। त्यांत विशेषें नामकीर्ती। नामें चित्तशुद्धि चित्तीं। स्वरूपस्थिती साधकां॥ ४७॥ नामापरतें साधन। सर्वथा नाहीं आन। नामें भवबंधच्छेदन। सत्य जाण उद्धवा॥ ४८॥ स्वरूपस्थित निश्चळ मन। जेथ लाजोनि जाय साधन। तेथ दानादिकांचें प्रयोजन। सहजचि जाण खुंटलें॥ ४९॥
समाहितं यस्य मन: प्रशान्तं
दानादिभि: किं वद तस्य कृत्यम्।
असंयतं यस्य मनो विनश्यद्
दानादिभिश्चेदपरं किमेभि:॥ ४७॥
येथ ज्या पुरुषाचें मन। ठाकी आपुलें जन्मस्थान। त्यासी दानादिकांचें कोण। प्रयोजन साधनीं॥ ६५०॥ पूर्णतृप्तापाशीं जाण। ओगरलिया सदन्न। तो जेवीं न पाहे हुंगोन। तेवीं साधन अमनस्का॥ ५१॥ गंगा उतरावया महापूरीं। अतिप्रयासीं ताफा करी। तोचि पूर वोहटल्यावरी। ताफा अव्हेरी नि:शेष॥ ५२॥ तेवीं कामक्रोधादिवेगशून्य। ज्याचें निर्विकल्पीं निश्चळ मन। त्यासी दानादिकीं प्रयोजन। नाहीं जाण निश्चित॥ ५३॥ जेवीं सूर्योदय झाल्यापाठीं। उपेगा न ये लक्ष दिवटी। तेवीं निर्विकल्पता मनीं उठी। तैं साधनें कोटी सुनाट॥ ५४॥ एवं समाहित ज्याचें मन। त्यासी दानादि नाना साधन। करावया नाहीं प्रयोजन। कल्पना पूर्ण निमाल्या॥ ५५॥ ज्याचें नेमन मनी चित्त। जें सदा विवेकरहित। जें अनिवार विषयासक्त। त्यासीही अनुपयुक्त साधनें॥ ५६॥ जेवीं मदगजांच्या लोटीं। सैन्य पळे बारा वाटीं। तेवीं विषयासक्तापाठीं। साधनें हिंपुटी होऊनि ठाती॥ ५७॥ जो विषयासक्तमना। तो सर्वथा नातळे साधना। करी तैं तेथेंही जाणा। विषयकल्पना संकल्पीं॥ ५८॥ स्वयें करितां पैं साधना। जें जें फळ वांछी वासना। तें तेंचि फळे जाणा। करी उगाणा दानादिकांचा॥ ५९॥ जेवीं कां पूर्णबळाचा वारू। त्यावरी बैसला निर्बळ नरू। तो त्यासी सर्वथा अनावरू। नव्हे स्थिरू अणुमात्र॥ ६६०॥ तैसें ज्याचें अतिदुर्मन। सदा कामक्रोधीं परिपूर्ण। जो स्वयें झाला मनाचे आधीन। ज्याचा विवेक निमग्न महामोहीं॥ ६१॥ तेथ साधनचि करी कोण। करी तें मोहास्तव जाण। तेणें वाढे तमोगुण। मनोनियमन घडेना॥ ६२॥ श्रवणादि इंद्रियबंधन। करूनि करितां साधन। तेणें वश्य नव्हे मन। मनाअधीन इंद्रियें॥ ६३॥
मनोवशेऽन्ये ह्यभवन् स्म देवा
मनश्च नान्यस्य वशं समेति।
भीष्मो हि देव: सहस: सहीयान्
युञ्ज्याद्वशे तं स हि देवदेव:॥ ४८॥
मनें आकळिलें सर्वांसी। परी मन नाकळे कोणासी। मनें छळिलें देवांसी। तें केवीं इंद्रियांसी आटोपे॥ ६४॥ चंद्र अधिष्ठाता मनासी। मनें छळिलें चंद्रम्यासी। व्यभिचारोनि गुरुपत्नीसी। क्षयरोगी त्यासी मनें केलें॥ ६५॥ ब्रह्मा अधिष्ठाता बुद्धीसी। मन ब्रह्मयाची बुद्धि भ्रंशी। निजपुत्री वारितां त्यासी। स्वकन्येसी अभिलाषी॥ ६६॥ चित्तीं वासुदेवाचें अधिष्ठान। त्यातेंही हळूच ठकी मन। लावूनि वृंदेचें ध्यान। श्मशानीं जाण पाडिला॥ ६७॥ रुद्र अधिष्ठाता अहंकारीं। त्यातेंही मनसिंतरी। अभिलाषितां ऋषिनारी। शापिला ऋषीश्वरीं लिंगपातें॥ ६८॥ ऐसें देवां दुर्जय जें मन। त्यासी आवरी इतर कोण। म्हणाल इंद्रियें नियमितील मन। तरी मनाधीन इंद्रियें॥ ६९॥ जैं इंद्रियें धरोनि हातीं। मन एकाग्र होईजे अर्थीं। तेव्हां इतर इंद्रियाची स्थिती। राहे निश्चितीं सुनाट॥ ६७०॥ इंद्रियविषयां होय संगती। ते काळीं जैं दुश्चिती मनोवृत्ती। तेव्हां न घडे विषयप्राप्ती। इंद्रियां स्फूर्ती स्फुरेना॥ ७१॥ जेव्हां अनासक्त मनोधर्म। तेव्हां इंद्रियांचें न चले काम। मनाअधीन इंद्रियग्राम। इंद्रियां मनोनेम कदा न घडे॥ ७२॥ इंद्रियांचा राजा मन। इंद्रियें न चालती मनेंवीण। पुरुषातेंही मन आपण। वश्य जाण स्वयें करी॥ ७३॥ अतिबळियां बळी मन। तेथ इंद्रियें बापुडीं कोण। मनाचें करावया दमन। नव्हे आंगवण वरिष्ठां॥ ७४॥ काळ निजसत्ता सर्व ग्रासी। परी मनाची लोंव नुपडे त्यासी। करितां उत्पत्तिस्थितिप्रळयांसी। मन काळासी नाटोपे॥ ७५॥ शस्त्रें न तुटे सर्वथा मन। त्यासी विरवूं न शकेचि जीवन। मन जाळूं न शके दहन। मनातें गगन शून्य करूं न शके॥ ७६॥ मनासी लागों न शके व्याधी। मन रोडेजे ऐशी नाहीं आधी। मन आकळावया सिद्धी। पाहतां त्रिशुद्धी दिसेना॥ ७७॥ मन ब्रह्मादिकांच्या रची कोडी। मन ब्रह्मांडें घडी मोडी। मन निजकल्पनाकडाडीं। नाचवी धांदडी त्रैलोक्या॥ ७८॥ मन कळिकाळातें छळी। मन प्रळयानळातें गिळी। मन बळियांमाजीं अतिबळी। मनातें आकळी ऐसा नाहीं॥ ७९॥ मन देवांसी दुर्धर। मन भयंकरां भयंकर। मनें आकळिले हरिहर। मनासमोर कोण राहे॥ ६८०॥ मनाचा अनिवार मार। कोण राहे मनासमोर। मनास परजी ऐसा थोर। सुर नर असुर दिसेना॥ ८१॥ मनासी मेळवी हातोफळी। ऐसा त्रिलोकीं नाहीं बळी। मन कळिकाळातें आकळी। प्रळयरुद्रातें गिळी न माखतां दाढ॥ ८२॥ ऐसा मनाचा अगाध भावो। यालागीं यातें म्हणिजे देवो। मनाचा भयानकां भेवो। यालागीं भीष्मदेवो मनातें म्हणती॥ ८३॥ ऐशी मनाची अनावर स्थिती। यासी आकळावयाची सवर्म युक्ती। साचार सांगेन तुम्हांप्रती। सावधानस्थिती अवधारा॥ ८४॥ जेवीं हिरेनि हिरा चिरिजे। तेवीं मनेंचि मन धरिजे। हेंही तैंचि गा लाहिजे। जैं गुरुकृपा पाविजे संपूर्ण स्वयें॥ ८५॥ मन गुरुकृपेची आंदणी दासी। मन सदा भीतसे सद्गुरूसी। तें ठेवितां गुरुचरणापाशीं। दे साधकांसी संतोष॥ ८६॥ या मनाची एक उत्तम गती। जरी स्वयें लागलें परमार्थीं। तरी दासी करी चारी मुक्ती। दे बांधोनि हातीं परब्रह्म॥ ८७॥ मनचि मनाचें द्योतक। मनचि मनाचें साधक। मनचि मनाचें बाधक। मनचि घातक मनासी॥ ८८॥ जेवीं वेळु वाढवी वेळुजाळी। वेळुवेळुवां कांचणीमेळीं। स्वयें पाडूनि इंगळी। समूळ जाळी आपण्यातें॥ ८९॥ तेवीं मन मनासी चिंती मरण। तैं सद्गुरूसी रिघवी शरण। त्याचे वचनीं विश्वासोन। करवी गुरुभजन निरभिमानें॥ ६९०॥ सद्गुरुकृपा झालिया संपूर्ण। हें मनचि मनासी दावी खूण। तेणें निजसुखें सुखावोन। मनचि प्रसन्न मनासी होय॥ ९१॥ मन मनासी झालिया प्रसन्न। तेव्हां वृत्ति होय निरभिमान। ऐसें साधकां निजसमाधान। मनें आपण साधिजे॥ ९२॥ पावोनि गुरुकृपेची गोडी। मनोविजयाची निजगुढी। मनें उभवूनि लवडसवडी। दीजे रोकडी साधकांहातीं॥ ९३॥ यापरी साधकांसी संपूर्ण। मन आपला विजयो दे आपण। शेखीं सद्गुरुनिजबोधीं पूर्ण। मन होय लीन निजात्मता॥ ९४॥ जेवीं कां सैंधवाचा खडा। रिघोनि सिंधूमाजिवडा। स्वयें विरोनियां रोकडा। सिंधूएवढा तो होय॥ ९५॥ यापरी साधक जाण। होतांच निरभिमान। स्वयें होती ब्रह्म पूर्ण। मीतूंपण गिळोनी॥ ९६॥ मग त्याचिया निजदृष्टी। मीचि एक अवघे सृष्टीं। मावळली द्वंद्वत्रिपुटी। सुखदु:ख पाठीं लागेना॥ ९७॥ तेथें कैंचें सुख कैंचें दु:ख। कैंचा बंध कैंचा मोक्ष। कोण पंडित कोण मूर्ख। ब्रह्म एकएकलें॥ ९८॥ तेथ कोण देव कोण भक्त। कोण शांत कोण अशांत। मावळलें द्वैताद्वैत। वस्तु सदोदित स्वानंदें॥ ९९॥ तेथ उगाणलें क्रियाकर्म। लाजा विराले धर्माधर्म। कैंचें अधम उत्तम मध्यम। परिपूर्ण ब्रह्म कोंदलें॥ ७००॥ तेथ कैंचें शास्त्र कैंचा वेद। कैंची बुद्धि कैंचा बोध। नि:शेष निमाला भेद। परमानंद कोंदला॥ १॥ यापरी मनोविजयें पहा हो। ऐशिया स्थिती पावला भावो। तेंचि स्वयें वदे देवो। ये अर्थीं संदेहो असेना॥ २॥ मनोजयाचा सद्भावो। ब्रह्मादिकां अगम्य पहा हो। जो स्वांगें करी स्वयमेवो। तो देवाधिदेवो निजबोधें॥ ३॥ जो निजमनातें जिंकोनी। जनीं पावला जनार्दनीं। तो धन्य धन्य त्रिभुवनीं। त्याचेनि अवनी पवित्र॥ ४॥ तेणेंचि पूर्वज तारिले। तेणें सकळ कुळ उद्धरिलें। तेणेंचि परब्रह्म आंगविलें। जेणें जिंकिलें मनातें॥ ५॥ मनोजयें जे अतिसमर्थ। शांति सर्वस्वें विकिली तेथ। त्यांसी सुखदु:खांचे आवर्त। गेले न लगत निजात्मता॥ ६॥ ऐशी भिक्षूची निजवाणी। उल्हासें सांगे शार्ङ्गपाणी। उद्धवास म्हणे संतोषोनी। धन्य त्रिभुवनीं मनोजय॥ ७॥ जेणें निजमनातें जिंकिलें। त्यासी मी किती वानूं बोलें। तेणें मज आपुलें पोसणें केलें। कीं विकत घेतलें उखितेंचि॥ ८॥ मज सुखरूपा त्याचेनि सुखप्राप्ती। मज नित्यतृप्ता त्याचेनि तृप्ती। मज अनंता त्यामाजीं वस्ती। मी दाटुगा त्रिजगतीं त्याचेनि॥ ९॥ ‘मी तो’ या शब्दकुसरी। त्याही जाण आम्हांबाहेरी। आंतुवटे निजविचारीं। तोचि मी निर्धारीं निजऐक्यता॥ ७१०॥ मनोजयें हे पदवी प्राप्त। तो मनोजय न करूनि तेथ। प्राकृत रिपुजयें जे गर्वित। त्यातें निर्भर्त्सित स्वयें भिक्षुं॥ ११॥
तं दुर्जयं शत्रुमसह्यवेग-
मरुन्तुदं तं न विजित्य केचित्।
कुर्वन्त्यसद्विग्रहमत्र मर्त्यै-
र्मित्राण्युदासीनरिपून्विमूढा:॥ ४९॥
पार्थिव शत्रु सबळ येती। तेथ सामदानादिकां स्थिती। कारणीं लावोनियां ख्याती। जिंकिले जाती निजांगें॥ १२॥ हे प्रकार मनाच्या ठायीं। करितां न चलती पाहीं। मनासी करावी शिष्टाई। तें कोणाचें कांहीं ऐकेना॥ १३॥ मनासी द्यावें विषयदान। परी विषयीं तृप्त नव्हे मन। तेणें अधिकचि होय दारुण। आवरी कोण तयासी॥ १४॥ न चले शमदमादि प्रकारू। तरी मनासी करावा मारू। तेथ न चले हातियेरू। मारणीं विचारू स्फुरेना॥ १५॥ यापरी हा मनोवैरी। दुर्जयत्वें कठिण भारी। तो सुखदु:खांच्या भरोवरी। सर्वदा मारी जन्ममरणें॥ १६॥ इतर शत्रु नावरती। तरी पळों ये हातोहातीं। रिघोनियां गडदुर्गाप्रती। वांचती गती देखिजे॥ १७॥ परी पळावया मनापुढें। पळतां त्रैलोक्य होय थोडें। जेथ लपावें अवघडें। तेथही रोकडें मन पावे॥ १८॥ मनाचे सेनापति शूर। कामक्रोधादि महावीर। त्यांचा मार अतिदुर्धर। घायीं थोरथोर लोळविती॥ १९॥ बाह्य शत्रुते दूरदेशीं। येतां बहु दिन लागती त्यांसी। मन:शत्रु तो अंगेंसीं। अहर्निशीं जडलासे॥ ७२०॥ आसनीं भोजनीं एकांतीं। जपीं अथवा ध्यानस्थितीं। मनाची उडी पडे अवचितीं। विभांडी सर्वार्थीं वैराकारें॥ २१॥ बाह्य शत्रूचें अल्प दु:ख। मनाची पीडा विशेख। जन्ममरणांचे आवर्त देख। मन आवश्यक भोगवी॥ २२॥ बाह्य शत्रु मरणात्मक। मन मरणासी अटक। हा वैरी न जिंकितां देख। जीवाचें अतिदु:ख टळेना॥ २३॥ मनाचे सवेग वेगासी। न साहवे सुरनरांसी। कष्टीं न जिंकवे कोणासी। यालागीं मनासी दुर्जयत्व॥ २४॥ ऐशिया मनातें न जिंकित। बाह्य शत्रु जिणोनि येथ। जे होती अतिगर्वित। ते निश्चित जाण महामूर्ख॥ २५॥ मनेंचि जिंकावें मनासी। हें गतश्लोकीं तुजपाशीं। सांगीतलें यथार्थेंसीं। मनोजयासी उपावो॥ २६॥ एवं मनातें ऐशियापरी। न साधवेचि करूनि वैरी। तरी मनासी करोनि मैत्री। मन सुखी करी मित्रत्वें॥ २७॥ प्राकृत मित्रांची मैत्री। उपकारीं प्रत्युपकारी। तेही विषयसुखावरी। येरयेर घरीं उचितानुकाळें॥ २८॥ तैशी नव्हे मनाची मैत्री। उपकारेंवीण प्रत्युपकारी। सकळ दु:खातें निवारी। सुखसागरीं नांदवी॥ २९॥ प्राकृतीं अतिमित्रत्व ज्यासी। निजदु:ख सांगतां त्यापाशीं। सर्वथा निवारेना त्यासी। म्हणे हें आम्हांसी असाध्य॥ ७३०॥ तैसें मित्रत्वा नव्हे मन। मना बैसवूनि सावधान। करितां निजदु:ख निवेदन। हरी जन्ममरणमहाबाधा॥ ३१॥ मरणभय असतां चित्तीं। कनककामिनींची आसक्ती। स्त्रिया अतिशयें निर्भर्त्सिती। तरी निर्लज्जवृत्ती लाजेना॥ ३२॥ परदारा परधन। परद्रोहो परनिंदा जाण। लागल्या न सांडितां क्षण। नरक दारुण भोगावया॥ ३३॥ उसंत नाहीं क्षुधेहातीं। द्वंद्वदु:खांची अतिप्राप्ती। नावरे इंद्रियवृत्ती। ऐसें मनाप्रती सांगतां॥ ३४॥ ऐसें ऐकतां स्वयें मन। वैराग्यें खवळेपूर्ण। वेंचूनि विवेकाचें धन। दु:खनिर्दळण करूं पावे॥ ३५॥ चोर भांडारी करित पूर्ण। चोरचोरातें निवारी जाण। तेवीं मनासीं करितां मित्रपण। मनाचे अवगुण मनचि नाशी॥ ३६॥ अधर्मीं प्रवर्ततां आपण। मनचि मनासी निवारी जाण। असत्याची वाचेसी आण। आपण्या आपण मन घाली॥ ३७॥ कैशी मनाची मैत्री परम। नि:शेष जाळावया कर्माकर्म। जोडावया चित्तशुद्धीचें वर्म। स्मरे हरिनाम अहर्निशीं॥ ३८॥ श्रीराम जयराम दों अक्षरीं। महापातका होय बोहरी। नाम न विसंबे क्षणभरी। अखंडाकारीं हरि स्मरे॥ ३९॥ तेव्हां असत्याचें शीस तोडी। अधर्माची साली काढी। कल्पनेचे पाय मोडी। तटका तोडी आशेचा॥ ७४०॥ विकल्पाचा घरठाव मोडी। प्रपंचाचे दांत पाडी। अविश्वासू तीं ठायीं तोडी। विश्वासाची गुढी उभवी मन॥ ४१॥ ऐसेनि परिपक्वविश्वासीं। येऊनि सद्गुरुचरणांपाशीं। तनु मन धन सर्वस्वेंसीं। गुरुवचनासी विश्वासे॥ ४२॥ पूर्ण विश्वासाचें लक्षण। होतां गुरुवाक्यश्रवण। परिसीं लोह पालटे जाण। तैसें अंत:करण पालटे॥ ४३॥ गुरुवचन सांगोन राहे। परी मनींचें मनन न राहे। कीटकी भ्रमरी ऐसा पाहे। तद्रूप होये निदिध्यासें॥ ४४॥ तेव्हां कमनीय कामिनी धन। तें देखे विष्ठेसमान। निंदा द्वेष मानाभिमान। हे मनाचे अवगुण मनचि नाशी॥ ४५॥ धन्य धन्य मनाची मैत्री। विश्वास धरोनि निर्धारीं। जन्ममरण जीवें मारी। जीवातें करी अजरामर॥ ४६॥ ऐशी मनाशीं करितां मैत्री। मन परम उपकारी। जीवातें धरूनि निजकरीं। स्वानंदसागरीं बुडी दे॥ ४७॥ तेथ मनाचें मनपण सरे। जीवाचें जीवपण विरे। बंधमोक्षांची धांव पुरे। समूळ ओसरे भवभय॥ ४८॥ मनाचें मित्रत्व यापरी। आपुलें कुळ स्वयें संहारी। आपणही मरे मित्रोपकारीं। मन मित्राचारीं अवंचक॥ ४९॥ ऐसें मैत्रीसी मन सादर। जवळी असतां निरंतर। त्यातें वोसंडूनि पामर। प्राकृत नर मित्र करिती॥ ७५०॥ वैर करोनि मनचि मारावें। मित्रत्वें मनें मन साधावें। इयें दोनीं जैं न संभवे। तैं उपेक्षावें मनातें॥ ५१॥ मन म्हणेल तें न करावें। मनातें हातीं न धरावें। मनातें कांहीं नातळावें। जीवेंभावें नि:शेष॥ ५२॥ मन म्हणेल जें सुख। तें सांडावें आवश्यक। मन म्हणेल जें दु:ख। तेंही नि:शेख त्यजावें॥ ५३॥ ऐसें उदास मन देख। जो करी आवश्यक। तरी तो झाला अमनस्क। शांति अलोलिक ते ठायीं॥ ५४॥ शत्रु मित्र उदासीन। करूनि वश्य न करी मन। जो धरी देहाभिमान। त्याचें भवभ्रमण सरेना॥ ५५॥
देहं मनोमात्रमिमं गृहीत्वा
ममाहमित्यन्धधियो मनुष्या:।
एषोऽहमन्योऽयमिति भ्रमेण
दुरन्तपारे तमसि भ्रमन्ति॥ ५०॥
आत्मा विदेहो चिद्घन। तेथ मी देही हें मानी मन। त्या देहासवें मी-माझेपण। जन्ममरण सुखदु:खें॥ ५६॥ आत्मा नित्यमुक्त विदेही। तो मनाच्या एकात्मता पाहीं। विदेही तो म्हणवी देही। शेखीं देहाच्या ठायीं आत्मत्व मानी॥ ५७॥ मी देह हें मानी मन। तेणें दृढ होय देहाभिमान। तेव्हां देहचि होय आपण। मी-माझेपण ते ठायीं॥ ५८॥ मी सच्चिदानंद परिपूर्ण। हें आपलें विसरे आपण। मी वैश्य शूद्र क्षत्रिय ब्राह्मण। मूर्ख सज्ञान मी एक॥ ५९॥ मी रोडका बोडका कुब्जकाण। मी धाटामोठा विचक्षण। हे नाथिले घेऊनि देहगुण। माणुसपण स्वयें मिरवी॥ ७६०॥ स्वप्नामाजीं संन्यासी। आपण देखे अंत्यजवंशीं। तो आतळों मी ब्राह्मणासी। जीवास तैसीदशा झाली॥ ६१॥ स्वयें परमात्मा भेदशून्य। तेथ मी माझे स्त्री पुत्र धन। स्वजन दुर्जन उदासीन। त्रिविध भेद पूर्ण सत्यत्वें मानी॥ ६२॥ ऐसी देहात्मभावसिद्धी। सत्य मानितां भेदविधी। जीवाची निजात्मबुद्धी। झाली त्रिशुद्धी आंधळी॥ ६३॥ जैसा स्वप्नींचा मिथ्या वेव्हार। तैसा मन:कल्पित संसार। तो मानितांचि साचार। देहअहंकार दृढ झाला॥ ६४॥ दृढ होतां देहाभिमान। पुढती जन्म पुढती मरण। भवचक्रीं परिभ्रमण। निजभ्रमें जाण जीवासी॥ ६५॥ जेवीं केवळ अग्नीप्रती। घणघाय कदा न लागती। तेचि लोहाचिया संगतीं। घण वरी घेत सुबद्ध॥ ६६॥ तेवीं नित्यमुक्त परिपूर्ण। तेणें धरितां देहाभिमान। अंगीं लागलें जीवपण। जन्ममरण तेथें सोशी॥ ६७॥ जेवीं डोळे बांधोनि व्यापारू। मंवे तेलियाचा ढोरू। तेवीं अहंकारें अंध नरू। परिभ्रमे थोरू भवचक्रीं॥ ६८॥ तेथ सोशितां जन्ममरण। अतिदु:खी होय आपण। तरी न सांडी देहाभिमान। अंधतमीं जाण तो घाली॥ ६९॥ ज्याचे दु:खें न पविजे पार। जो तरवेना अतिदुस्तर। जो भोगभोगवी अघोर। तो संसार मनोजन्य॥ ७७०॥ मनचि सुखदु:खांसी कारण। हें आठवे श्लोकीं निरूपण। भिक्षु बोलोनि आपण। जनादि दु:खकारण मिथ्यात्वें दावी॥ ७१॥
जनस्तु हेतु: सुखदु:खयोश्चेत्
किमात्मनश्चात्र ह भौमयोस्तत्।
जिह्वां क्वचित्संदशति स्वदद्भि-
स्तद्वेदनायां कतमाय कुप्येत्॥ ५१॥
जननीजठरीं ज्यासी जनन। त्या नांव बोलिजेती जन। ते सुखदु:खांसी कारण। सर्वथा जाण मज नव्हती॥ ७२॥ जन जनासी दे दु:खबाधू। तेथ आत्म्यासी काय संबंधू। आत्मा देहातीत शुद्धू। सुखदु:खबाधू त्या न लगे॥ ७३॥ देहें देहासी होईल दु:ख। देहो तितुका पांचभौतिक। त्यांसीपरस्परें असे ऐक्य। सर्वथा सुखदु:ख घडेना॥ ७४॥ जळामाजीं जळ सूतां। जेवीं जळासी नव्हे व्यथा। कां दीपू दीपें एकवटतां। दीपासी सर्वथा दु:ख न बाधी॥ ७५॥ तेवीं पार्थिवें पार्थिवासी। सुखदु:खबाधा न घडे त्यासी। आत्मा नातळे सुखदु:खांसी। तो देहासी स्पर्शेना॥ ७६॥ म्हणाल जीव जो देहाचा अभिमानी। सुखदु:खें होती त्यालागोनी। दु:खभोक्ता दुजेपणीं। पाहतां कोणी दिसेना॥ ७७॥ आपुली जिव्हा आपुले दांतीं। रगडिली होय अवचितीं। तया कोपाची अतिप्राप्ती। कोणाप्रती करावी॥ ७८॥ तेथील कोपाच्या कडाडीं। दांत पाडी कीं जीभ तोडी। तैशी जगीं एकात्मता धडफुडी। कोप यावया सवडी असेना॥ ७९॥ जो पुढिलाचे ढक्यांनीं पडे। तो त्यावरी कोपें वावडे। स्वयें निसरोनि गडबडे। तो लाजिला मागेंपुढें न कोपतां निघे॥ ७८०॥ तेवीं मीचि भूतें मीचि भोक्ता। माझ्या दु:खाचा मी दाता। जगीं मीच मी एकात्मता। कोणावरी आतां कोपावें॥ ८१॥ माझ्या सुखदु:खांसी कारण। यापरी नव्हतीच जन। म्हणाल जरी देवतागण। तेंही प्रमाण घडेना॥ ८२॥
दु:खस्य हेतुर्यदि देवतास्तु
किमात्मनस्तत्र विकारयोस्तत्।
यदङ्गमङ्गेन निहन्यते क्वचित्
क्रुध्येत कस्मै पुरुष: स्वदेहे॥ ५२॥
आतां दुसरें कारण मतीं। देवांपासोनि दु:खप्राप्ती। देवांची देहामाजीं वस्ती। आत्मा निजस्थितीं विदेही॥ ८३॥ देहींच्या इंद्रियविकारीं। देव झाले अधिष्ठात्री। आत्मा अखंड अविकारी। सुखदु:खांमाझारीं अलिप्त॥ ८४॥ भूमि सहजें निर्विकार। तिची भिंती तीवरी सविकार। तेवीं वस्तु नित्य निर्विकार। तेथ भासती सविकार अधिष्ठात्री देव॥ ८५॥ भिंती पडल्या भूमीवरी। ते मेळवी आपण्यामाझारीं। तेवीं निर्गुणनिर्विकारीं। इंद्रियें अधिष्ठात्री येती ऐक्या॥ ८६॥ स्वदेहीं परदेहीं जाण। इंद्रियें अधिष्ठात्रीं समान। इंद्रियांचें सुखदु:ख दारुण। आपुलें आपण भोगिती देव॥ ८७॥ हातें हाणतां तोंडावरी। तेथ इंद्र अग्नि अधिष्ठात्री। तेव्हां इंद्रचि अग्नीतें मारी। आत्मा अविकारी दु:खातीत॥ ८८॥ हो कां मुखें डसल्या हातासी। अग्नीनें घाय केलें इंद्रासी। आत्मा अलिप्त इंद्रादिदेवांसी। सुखदु:ख त्यासी स्पर्शेना॥ ८९॥ परमुखें स्वमुखावरी थुंकिजे। दोहीं मुखी अग्नीनें नांदिजे। तेथ कोणें कोणावरी कोपिजे। आत्मस्वरूपीं दुजें असेना॥ ७९०॥ थुंकआणि जें कां मूत। देहीं उपजे तें देहाचें अपत्य। तें देहींचें देहावरी लोळत। कोपे तेथ कोण कोणा॥ ९१॥ स्वमुखें परमुखा चुंबन दीजे। तेथ अग्नीनें अग्नीसी चुंबिजे। तेणें सुखें कोण फुंजे। आत्मत्वीं दुजें असेना॥ ९२॥ स्वदेहें परदेहा आलिंगन। उभयस्पर्शीं वायूचि जाण। तेणें सुखेंसुखावे कोण। दुजेपण असेना॥ ९३॥ यापरी देवतागण। नव्हे सुखदु:खांसी कारण। आत्म्याचे ठायीं दैवतें जाण। हारपती पूर्ण अभेदत्वें॥ ९४॥ देवीं देहो पीडितां नि:शेख। देहाभिमान्या होईल दु:ख। हें मानिती ते अतिमूर्ख। तेंही देख घडेना॥ ९५॥ पुर म्हणिजे देहो देख। ते पुरी जो पुरनिवासक। तो सकळ देहीं पुरुष एक। तेथ कोणाचें दु:ख कोण मानी॥ ९६॥ जेवीं संभ्रम आवेशवेगीं। निजकर हाणतां निजांगीं। तेथील व्यथेचा भागी। कोपावयालागीं आपआपण्या॥ ९७॥ देखतां आपलें एकपण। कोणाची व्यथा मानी कोण। कोण कोणावरी कोपे जाण। आपण्या आपण एकला॥ ९८॥ तेवीं विश्वात्मा मीचि एक। मीचि दैवतें मीचि लोक। तेथ कोण कोणा दु:खदायक। म्यां कोणावरी देख कोपावें॥ ९९॥ यापरी स्वयें विचारितां। देवांपासाव सुखदु:खता। समूळ न घडे सर्वथा। दैविकी व्यथा असेना॥ ८००॥ आत्मा सुखदु:खांसी कारण। मूळीं मजचि हें अप्रमाण। आत्म्याच्या ठायीं कार्यकारण। सुखदु:ख जाण असेना॥ १॥
आत्मा यदि स्यात्सुखदु:खहेतु:
किमन्यतस्तत्र निजस्वभाव:।
न ह्यात्मनोऽन्यद्यदि तन्मृषा स्यात्
क्रुध्येत कस्मान्न सुखं न दु:खम्॥ ५३॥
आत्मा केवळ एकला एक। तेथ कैंचें सुख कैंचें दु:ख। आत्मा सुखदु:खदायक। म्हणती ते मूर्ख अविवेकी॥ २॥ जेवीं विघुरलें घृत जाण। त्यासी नसे आकार ना वर्ण। तेंचि सहजें थिजोनि जाण। दिसे शुभ्रवर्ण कणिकारूपें॥ ३॥ त्या घृतकणिका मिळतां देख। नाहीं परस्परें सुखदु:ख। तेवीं निजात्मा एकला एक। तोचि अनेक स्वरूपें॥ ४॥ जळीं जळाच्या जळलहरी। आदळतांही परस्परीं। सुखदु:ख नुमटे त्यांमाझारीं। तेवीं चराचरीं परमात्मा॥ ५॥ परमात्मा एकला एक। एकपणेंचि तो अनेक। तेथ विजातीय नाहीं देख। मा सुखदु:ख कोणाचें॥ ६॥ आत्मा सुखरूप अवघा एक। तेथ आभासे जें अनेक। तें मायामय काल्पनिक। स्वप्नप्राय देख मिथ्यात्वें॥ ७॥ मृगजळीं पाहतां दिसे जळ। परी तें कोरडें देख केवळ। तेवीं दिसे जें जगड्वाळ। तें मिथ्या समूळ मायिक॥ ८॥ जेथ मिथ्या द्वैत मायिक। तेथ परमात्मा एकला एक। तेव्हांचि हारपलें सुखदु:ख। कोपावया नि:शेख ठावो नाहीं॥ ९॥ जेथ निजात्मता एकपण। तेथ सुखदु:खें नाहीं जाण। कोणावरी कोपे कोण। आपल्या आपण एकला॥ ८१०॥ जेथ आत्म्याचा निजानुभवो। तेथ द्वैताचा अभावो। सुखदु:खें झाली वावो। कोपासी ठावो असेना॥ ११॥ हे निजात्मता नेणोनि देख। सत्य मानिती जे सुखदु:ख। ते होत कां वेदशास्त्रज्ञ लोक। तयां क्रोध देख विभांडी॥ १२॥ ज्यासी सर्व भूतीं निजात्मता। तेथ कोण कोणा दु:खदाता। कोण कोणावरी कोपता। निजात्मता एकली॥ १३॥ आत्मा सुखदु:खांचा दाता। यापरी नव्हे गा तत्त्वतां। आपण्या आपण व्यथा। मूर्खही सर्वथा न देती॥ १४॥ एथिलेनि चौथे मतें। ग्रह मानावे दु:खदाते। तेंही न घडे गा येथें। ऐक निश्चितें सांगेन॥ १५॥
ग्रहा निमित्तं सुखदु:खयोश्चेत्
किमात्मनोऽजस्य जनस्य ते वै।
ग्रहैर्ग्रहस्यैव वदन्ति पीडां
क्रुध्येत कस्मै पुरुषस्ततोऽन्य:॥ ५४॥
जननीजठरीं जन्मे जाण। त्या देहाचें नांव म्हणती जन। ते जन्मकाळीं जें होय लग्न। त्या जन्मापासून पूर्ण ग्रहगति लागे॥ १६॥ तेथ द्वादशाष्टमजन्मस्थ। शुभाशुभ ग्रह जे येत। ते सुखदु:खांतें देत। आत्मा अलिप्त ग्रहगतीं॥ १७॥ मुळीं आत्म्यासी जन्म नाहीं। मा ग्रह लागती कवणे ठायीं। जेथ शेतचि पेरिलें नाहीं। तेथ उंदिरीं कायी करांडावें॥ १८॥ मुख्यत्वें घर केलें नाहीं। तेथली माडी जळेल कायी। आत्म्यासी तंव जन्मचि नाहीं। मा ग्रहगती काई लागेल॥ १९॥ ग्रहांची ग्रहगती देहापासीं। आत्मा अलिप्त देहभावासी। जेवीं काउळा न चढे कैलासीं। तेवीं ग्रह आत्म्यासी न लागती॥ ८२०॥ जेवीं कां अग्नीतें न चाखे माशी। घारी झडपीना चंद्रम्यासी। तेवीं लागावया आत्म्यासी। सामर्थ्य ग्रहांसी असेना॥ २१॥ आत्मा सर्वांचा अवघा एक। तैं ग्रहांचा आत्मा तोचि देख। तया निजात्म्यासी देतां दु:ख। ग्रह पीडी आवश्यक आपआपण्या॥ २२॥ देह जड मूढ अज्ञान। तें सुखदु:खांचें नेणे ज्ञान। आत्म्यासी सुखदु:ख देतां जाण। तैं आपण्या आपण पीडिती ग्रह॥ २३॥ आपणचि आपणाप्रती। कदा न देववे दु:खप्राप्ती। यालागीं आत्म्यासी ग्रहगती। जाण कल्पांतीं बाधीना॥ २४॥ ग्रहग्रहांमाजीं वैरस्थिती। ग्रह ग्रहांतें पीडा देती। तेही अर्थींची उपपत्ती। यथानिगुती अवधारा॥ २५॥ ज्योतिषशास्त्रसंमती शनि-भौमसूर्या वैरप्राप्ती। गुरु-शुक्र दोनी वैरी होती। बुध-सोमांप्रती महावैर॥ २६॥ तेथ एकांची ते शीघ्रगती। एक ग्रह मंदगामी होती। अतिचार कां वक्रगती। मंडळमेदें येती एकत्र॥ २७॥ वैरी मीनल्या एके राशी। एके चरणीं एकत्रवासी। तैं राहु गिळी सूर्यासी। सूर्य चंद्रासी कुहू करी॥ २८॥ ऐसे ग्रहचि ग्रहांसी जाण। परस्परें पीडिती आपण। मी आत्मा त्यांहूनि भिन्न। सुखदु:ख कोण मज त्यांचें॥ २९॥ अलंकार मोडितां खणाण। सोनें मोडेना आपण। तेवीं ग्रह ग्रहांसी पीडितां जाण। मज आत्म्यासी कोण सुखदु:ख॥ ८३०॥ रणभूमीं युद्धझोटधरणी। होतां घायवट नव्हे धरणी। तेवीं ग्रहपीडेपासूनी। मी अलिप्तपणीं निजात्मा॥ ३१॥ रजस्वला चालतां भूमीसी। तो विटाळ बाधीना पृथ्वीसी। तेवीं ग्रहीं पीडितां ग्रहांसी। मी सुखदु:खांसी अलिप्त॥ ३२॥ एवं ग्रहांनिमित्त जें कांहीं। सुखदु:ख उमटे देहीं। तें मज आत्म्यासी न लगे कंहीं। मग कोणें पाहीं कोणा कोपावें॥ ३३॥ सुखदु:ख नुमटे ज्याच्या ठायीं। त्यासी क्रोधचि न ये कंहीं। एवं ग्रहनिमित्त दु:ख कांहीं। सर्वथा नाहीं या हेतू॥ ३४॥ सुखदु:खदातें निजकर्म। म्हणतां जनांसी पडे भ्रम। आत्मा केवळ निष्कर्म। त्यासी जड कर्म केवीं बाधी॥ ३५॥
कर्मास्तु हेतु: सुखदु:खयोश्चेत्
किमात्मनस्तद्धि जडाजडत्वे।
देहस्त्वचित्पुरुषोऽयं सुपर्ण:
क्रुध्येत कस्मै न हि कर्ममूलम्॥ ५५॥
कर्म जडत्वें अतिबद्ध। आत्मा चिद्रूपें परम शुद्ध। त्यासी कर्माचा कर्मबाध। सर्वथा संबंध धरीना॥ ३६॥ रवीसी अंधारीं लपवे। वणवा तृणामाजीं बांधवे। गोचिडाचेनि मुखलाघवें। जरी लागवे दीपासी॥ ३७॥ चंडवातातें तुष राखे। थिल्लरचिखलें चंद्र माखे। तैं कर्मजन्य सुखदु:खें। आत्मा यथासुखें बद्धता भोगी॥ ३८॥ आत्मा कर्माकर्म संहारी। सुख-दु:खांची होळी करी। तो कर्मफळांचा फळाहारी। मूर्ख गव्हारीं मानिजे॥ ३९॥ स्वप्नींची स्वप्नसंतती। जागृतीं कोणा भेटों येती। तरी कर्माची सुखदु:खप्राप्ती। आत्म्याप्रती बाधक॥ ८४०॥ जेवीं अग्नीवरी मुंगी न चले। तेवीं आत्मा न माखे कर्ममळें। आकाश न खोंचे शस्त्रबळें। तेवीं आत्मा कर्मफळें स्पर्शेना॥ ४१॥ कर्म तितुकें आविद्यक। आत्मा विद्याअविद्यातीत चोख। त्यासी कर्माचें सुखदु:ख। मानिती मूर्ख देहमोहें॥ ४२॥ कर्म अतिजड आत्मा शुद्ध। कर्म परिच्छिन्न आत्मा अगाध। कर्म कर्मठतां नित्यबद्ध। आत्मा चिदानंदस्वरूप॥ ४३॥ कर्म मिथ्याभूत मायिक। आत्मा नित्य अमायिक। कर्मासी ब्रह्मअनोळख। ब्रह्म तेथ देख कर्म नाहीं॥ ४४॥ दोराचे सर्पीं सर्पत्व नाहीं। मा तो डसोनि चढेल कायी। तेवींस्वरूपीं कर्म मिथ्या पाहीं। तें आत्म्यासी कायी बाधील॥ ४५॥ वांझ राणीचा लाडका नातू। राजबळें जगा दंडितू। तेवीं कर्माची सुखदु:खमातू। कर्मठांतू दाटुगी॥ ४६॥ एवं कर्मचि मिथ्याएथें। तें केवीं दे सुखदु:खांतें। हें जाणोनियां निश्चितें। कोणें कोणातें कोपावें॥ ४७॥ कर्मसुखदु:खांचें दातें। यापरी न घडे एथें। म्हणाल काळ दे सुखदु:खांतें। तेंही निश्चितें घडेना॥ ४८॥
कालस्तु हेतु: सुखदु:खयोश्चेत्
किमात्मनस्तत्र तदात्मकोऽसौ।
नाग्नेर्हि तापो न हिमस्य तत् स्यात्
क्रुध्येत कस्मै न परस्य द्वन्द्वम्॥ ५६॥
काळ शीतकाळीं शीतें पीडी। उष्णकाळीं उबारा सोडी। वर्षाकाळीं पर्जन्य धाडी। त्रिमाळिकें पाडी धवळारें॥ ४९॥ बैसवूनि सातवांकडी। अखंडधारा डोळा नुघडी। जीवमात्रा तेणें पीडी। पडे सांकडी अन्नाची॥ ८५०॥ अन्नाचिया चिडाणीं। पीडती पशुपक्षिप्राणी। ते काळीं सुखदु:ख न मानी कोणी। दु:खदाता जनीं निजकाळू॥ ५१॥ अतिताप अतिशीत। सोडूनियां अतिवात। काळ जगातें खात। जग कांपत काळासी॥ ५२॥ ऐकोनि काळाची गोठी। देव कांपती उठाउठी। इतरांची कायसी गोठी। धाके पोटीं विधाता॥ ५३॥ अतिवृष्टि अनावृष्टि। जन पीडी नाना संकटीं। शेखीं प्रळयो करी उठाउठी। दु:खदाता सृष्टीं महाकाळ॥ ५४॥ ऐसें बोलती ज्ञाते लोक। ते ज्ञातेपणें झाले मूर्ख। काळ तोचि ईश्वरू देख। सुखदायक सर्वांसी॥ ५५॥ ईश्वराहूनि काळ भिन्न। म्हणे तो जड मूढ अज्ञान। काळ तोचि ईश्वर जाण। कृपाळू पूर्ण विश्वात्मा॥ ५६॥ काळ स्वकाळीं वर्षोनि जीवन। सुखी करी संतप्त जन। पृथ्वी निववूनियां जाण। नव धान्य वाफवी॥ ५७॥ ते काळीं जैं शीत न वाहे। तैं वाफिलें धान्य राख होये। तेव्हां शीतकण वर्षोनि पाहें। करी लवलाहें सफळित धान्यें॥ ५८॥ तीं आर्द्र धान्यें भूतांसी। उपेगा न येती संग्रहासी। यालागीं उष्ण काळेंसीं। काळ शोषी आर्द्रता॥ ५९॥ यापरी शीतोष्णपर्जन्यांसी। काळ उत्पादी भूतहितासी। तेंचि कठिण वाटे त्यासी। देहभ्रमासी भुलोनी॥ ८६०॥ हिरोनि अतिजीर्ण वस्त्रांसी। नवीं नेसवी जो साक्षेपेंसीं। ऐशिया हितकारिया काळासी। वैरी पिशीं म्हणताती॥ ६१॥ तेवीं जराजर्जरित विकळ। तें देह निर्दळी सकाळें काळ। आणिक नवें दे तत्काळ। ऐसा कृपाळू काळ जनासी॥ ६२॥ जुनें घेऊनि दे नव्यासी। ऐसा उपकारिया काळासी। अपकारी म्हणती पिशीं। देह मोहेंसीं लोभिष्टें॥ ६३॥ जन जैशिया निजभावना। जे जे धरी दृढ वासना। काळ कृपाळू तत्क्षणा। ते ते देह जाणा त्या देत॥ ६४॥ महामहोत्साहें पिता पुत्रासी। सांडवूनि जीर्ण वासांसी। नवीं वस्त्रें दे तयासी। तेवीं जगासी प्रळयकाळू॥ ६५॥ तेवीं प्रळयकाळीं जगासी। काळ जीर्ण देह नाशी। मग नूतन देह सर्वांसी। अतिकृपेंसी गौरवी॥ ६६॥ यापरी काळ कृपाळू। त्यासी वैरी म्हणे जन बरळू। जगाचा निजात्मा स्वयें काळू। तो दु:खाचा सळू कोणासी नेदी॥ ६७॥ जनांचा देहीं दृढ भावो। भाव नानुसारें काळ पहा हो। देहापाठीं उपजवी देहो। जन्ममरणनिर्वाहो तेणें वाढे॥ ६८॥ जो साचार वांछी विदेहभावो। त्याचा काळ निर्दळी अहंभावो। निजानंदें निववूनि स्वयमेवो। जन्ममरणांचा ठावो विभांडी॥ ६९॥ जैशी ज्यासी होय बुद्धी। काळ तैशी दे त्यासी सिद्धी। हें नेणिजे देहमोहांधीं। काळ त्रिशुद्धी कृपाळू॥ ८७०॥ काळ तोचि निजात्मा जनीं। ऐसें जाणे जो निजज्ञानी। तैं कोणाचें दु:ख कोण कां मानी। दुसरें कोणी असेना॥ ७१॥ मी एक एथें दु:खदाता। पैल तो एक दु:खभोक्ता। हेही नाहीं द्वैतकथा। जगासी एकुलता निजात्मा काळ॥ ७२॥ काळ निजात्मा दोनी एक। तैं कोणाचें कोणास होय सुख। कोण कोणाचा मानी शोक। द्वंद्वदु:ख असेना॥ ७३॥ जेवीं नाममात्र मृगजळ। तेथ नाहीं तिळभरी जळ। तेवीं आत्मत्वीं जगड्व्याळ। तो भ्रम केवळ मनाचा॥ ७४॥ आत्मा एकत्वें अभेद। काळनामें तोचि प्रसिद्ध। जीव तदंशें चिदत्वेंशुद्ध। त्यासी काळादि द्वंद्व बाधीना॥ ७५॥ आगीनें काय आगी जळे। कां उन्हाळेनि सूर्य पोळे। सागरू बुडे लहरीबळें। कीं अंधारातें काळें काजळें कीजे॥ ७६॥ कीं हिमाचळ हिमकणें कांपे। तुपासी मोडशी होय तुपें। तैं काळसत्ता खटाटोपें। आत्मा अमूपें द्वंद्वें भोगी॥ ७७॥ आप आपणियां आपदा। कोणा न करवे विरुद्धा। तेवीं आत्म्यासी द्वंद्वबाधा। काळाचेनि कदा करवेना॥ ७८॥ एवं एकात्मता अभेद। तेथ काळाचा न चले बाध। अभेदीं सर्वथा नाहीं द्वंद्व। कोणावरी क्रोध करावा॥ ७९॥ जीव-शिवत्वें मी केवळ। मीचि आत्मा मीचि काळ। मिथ्या द्वंद्वदु:खगोंधळ। क्रोधाचा कल्लोळ कोणावरी करूं॥ ८८०॥ काळ सुखदु:खांचा दाता। यापरी नव्हे विचारितां। सुखदु:खांची बाधकता। आत्म्यासी सर्वथा असेना॥ ८१॥ सुखदु:खादि हेतुषट्क। ‘नायं जनो’ इत्यादिक। याचा करितां निजविवेक। नव्हती बाधक आत्म्यासी॥ ८२॥ यांही वेगळीं बाधकपणें। देशवासें त्रिगुणगुणें। आत्म्यासी बांधावयाकारणें। कोठें कोणी दिसेना॥ ८३॥ निजात्म्यासी बाधकता। कायसेनि नसंभवे सर्वथा। जनासी बाधक देहअहंता। त्याचि निजार्था भिक्षु बोले॥ ८४॥
न केनचित्क्वापि कथञ्चनास्य
द्वन्द्वोपराग: परत: परस्य।
यथाहम: संसृतिरूपिण: स्या-
देवं प्रबुद्धो न बिभेति भूतै:॥ ५७॥
आत्मा गुणातीत शुद्ध। परात्परतर स्वानंद। परिपूर्ण सच्चिदानंद। तेथ द्वंद्वबाध रिघेना॥ ८५॥ द्वंद्व रिघावया आत्मभुवनीं। कैसेनि कायिसेनि कोणाचेनी। कर्मकार्यक्रियाकरणी। बाधकपणीं असेना॥ ८६॥ अभेदा नाहीं द्वंद्वबाध। स्वानंदासी दु:खसंबंध। पूर्णासी कैंचें विरुद्ध। परमानंद एकला॥ ८७॥ आशंका॥ आत्म्यासी न घडे द्वंद्वसंबंध। देहो जडत्वें नेणे द्वंद्व। तरी सुखदु:खांचा महाबाध। कोणासी प्रसिद्ध होतसे॥ ८८॥ सुखदु:खभोगासी जाण। सोसावया जन्ममरण। एथ मुख्यत्वें देहाभिमान। तेंही लक्षण अतर्क्य॥ ८९॥ जेवीं असोनि भर्तारापाशीं। व्यभिचारकरितां अहेवेसी। पोट वाढल्याही परपुरुषीं। तें कोणासी कळेना॥ ८९०॥ तैसें अभिमानाचें विंदान। चित्स्वरूपीं जडोनि जाण। मिथ्या दावूनि जीवपण। सुखदु:खें आपण स्वेच्छाभोगी॥ ९१॥ जेवीं रायापाशील कुडा मंत्री। राजबळें अधर्म करी। प्रजेतें छळी नानापरी। तैसाशरीरीं अभिमान॥ ९२॥ कां अग्निसंगें लोह जाण। अग्निप्राय होय आपण। तया हातीं धरूं शके कोण। पोळी दारुण सर्वांसी॥ ९३॥ तेवीं चिद्रूपाचा अभिमान। देहात्मता खवळोनि पूर्ण। सुखदु:खादि जन्ममरण। वाढवितां कोण आवरी॥ ९४॥ स्वप्नींचा देह केवळ मन। त्याही देहासी असे मनपण। तैसा हाही देहो मनचि जाण। अभिमानें कठिण स्थूळ केला॥ ९५॥ कार्यकारणरूपें जाण। संसारचि मनोभिमान। वाढवूनि सुखदु:ख दारुण। जन्ममरण स्वयें भोगी॥ ९६॥ भोगिलेचि भोग भोगितां। नानापरींची पावे व्यथा। तरी न सांडी अहंता। देहात्मता वाढवी॥ ९७॥ ब्रह्मप्रळय होतां जाण। देहअहंता नव्हे क्षीण। प्रळयीं विरेना अभिमान। सुखदु:ख जाण तो भोगी॥ ९८॥ यामाजीं जीव असे कैसा। जपाकुसुमीं स्फटिक जैसा। दिसोन त्या रंगाऐसा। स्वयें तैसा होयेना॥ ९९॥ आत्मत्वीं सुखदु:ख नाहीं। तें प्रत्यक्ष दिसताहे देहीं। हें अविचाररमणीय पाहीं। कल्पनेच्या ठायीं आभासे॥ ९००॥ तें देह माझें म्हणोनि तत्त्वतां। अभिमानें घेऊनि माथां। जन्ममरणादि आवर्तां। सुखदु:खभोक्ता स्वयें होय॥ १॥ येणेंचि विवेकें निजज्ञानी। प्राप्ततत्त्व गुरुवचनीं। ते वर्ततांही जनींवनीं। देहाभिमानी कदा नव्हती॥ २॥ ऐसे प्रबुद्ध जे आत्मप्रतीतीं। त्यांसी प्रारब्धाचिये निजगती। नाना सुखदु:खें देतां भूतीं। आत्मस्थिती ढळेना॥ ३॥ त्यांसी द्वेष नुपजे भूतीं। कोप सर्वथा न ये चित्तीं। मी एक त्रिजगतीं। जाणोनि निश्चितीं निर्द्वंद्व॥ ४॥ तो देखोनियां विषमासी। भय न धरी मानसीं। पारकें न म्हणे कोणासी। आप्त सर्वांसी निजात्मा॥ ५॥ समविषमभाव ना भेद। ज्ञाता सर्वरूपें अभेद। तो न मानीं कोणाचा भयखेद। सुखस्वानंद सर्वदा॥ ६॥ निंदाउपद्रव अनुद्विग्न। साहोनियां सुखसंपन्न। हें सिद्धाचें मुख्य लक्षण। तेंचि साधन साधकां॥ ७॥
एतां स आस्थाय परात्मनिष्ठा-
मध्यासितां पूर्वतमैर्महर्षिभि:।
अहं तरिष्यामि दुरन्तपारं
तमो मुकुन्दाङ्घ्रिनिषेवयैव॥ ५८॥
माझ्या पूर्वापरभाग्योदयें। अद्वैतात्मनिष्ठा उपजली पाहें। जे निष्ठेचेनि समवायें। नाना दु:खेंसाहें निर्द्वंद्व॥ ८॥ द्वंद्वसुखदु:खसहिष्णुपण। हें सिद्धाचें सहज लक्षण। माझें मुख्यत्वें हेंचि साधन। मनोजयो जाण येणें होये॥ ९॥ हेंचि परमार्थसाधन वरिष्ठा। हेचि महाऋषींची निजनिष्ठा। हेंचि निजभजन वैकुंठा। निजात्मनिष्ठा येणें साधे॥ ९१०॥ येणें न बाधे द्वंद्वदु:ख। येणें पाविजेनित्यसुख। दुस्तर संसारतारक। हा निजविवेक आम्हांसी॥ ११॥ दुस्तर तरावया भवसागरू। हा विवेकू सुकल्प तारूं। एथ सद्गुरू कर्णधारू। परात्परपारू पाववी॥ १२॥ हा विवेक कैसेनि ये हाता। हेही करणें न लगे चिंता। निजभावें एकाग्रता। शरण भगवंता रिघावें॥ १३॥ सांडोनि लौकिकाचे लाजे। सांडोनि अभिमानाचें ओझें। भगवंता शरण रिघिजे। तैं लाहिजे विवेक॥ १४॥ तानें बाळ जेवीं जननीसी। अनन्य शरण सर्वभावेंसीं। ऐशिया अनन्यता अहर्निशीं। शरण हरीसी रिघावें॥ १५॥ हरीसी रिघालिया शरण। मुख न दाखवी जन्ममरण। तेथ बाधूं शके द्वंद्व कोण। हरि रक्षण निजभक्तां॥ १६॥ मोक्षदाता मुकुंद पूर्ण। त्यासी कैसें रिघावें शरण। तो अनंतत्वें निजनिर्गुण। तेथ कोण पावेल॥ १७॥ असो हरिरूप अतिनिर्गुण। त्याची मूर्ति चिंतितां सगुण। ध्यानीं स्थिरावल्या संपूर्ण। द्वंद्वदु:खें जाण हारपती॥ १८॥ ध्यानीं मूर्ति न ये संपूर्ण। तैं दृढ धरावे हरीचे चरण। तेणें उठोनि पळे जन्ममरण। आपभयें आपण पळती द्वंद्वें॥ १९॥ जैं न धरवती दृढ चरण। तैं करावें नामस्मरण। ज्याचेनि नाममात्रें जाण। यम काळ पूर्ण कांपती॥ ९२०॥ जेथ हरिनामाचा नित्य घोख। तेथ मरणा मरण आलें देख। जन्माचें होय काळें मुख। लाजोनि नि:शेख तें पळे॥ २१॥ रामनामाच्या गजरापुढें। काइसें द्वंद्वदु:ख बापुडें। अवघें भवभयचि उडे। नामपवाडे गर्जतां॥ २२॥ अखंड नामें गर्जे वाणी। त्याचे बोलांमाजीं चक्रपाणी। तेथ ऋद्धिसिद्धि वाहे पाणी। मुक्ति आंदणी तयाची॥ २३॥ निर्विकल्प भावार्थें आपण। सगुण निर्गुण कां नामस्मरण। भक्त भावार्थें आदरी जाण। तें तें होय पूर्ण सद्भावेंचि॥ २४॥ भावार्थें जे भगवत्प्रीती। तेचि जाणावी साचार भक्ती। भावें तुष्टला श्रीपती। दे निजशांती साधकां॥ २५॥ ते निजशांतीच्या पोटीं। हरपती द्वंद्वदु:खकोटी। परमानंदें कोंदे सृष्टी। मी तूं दृष्टीं दिसेना॥ २६॥ ऐसेनि अभेदभावें जाण। सेवितां मुकुंद श्रीचरण। मी आपणिया आपण। तारीन जाण निश्चित॥ २७॥ तारीन म्हणतां उधारू। बोलीं दिसताहे उशिरू। जो झाला हरीचा डिंगरू। त्यासी संसारू असेना॥ २८॥ ऐशी भिक्षूनें गाइली गाथा। ते अत्यंत रुचली श्रीकृष्णनाथा। हरिखे ओसंडोनि चित्ता। उद्धवाचा माथा थापटी॥ २९॥ ऐशी जे हे निजशांती। माझ्या उद्धवासी व्हावी प्राप्ती। ऐसा कळवळोनि श्रीपती। काय उद्धवाप्रती बोलिला॥ ९३०॥
श्रीभगवानुवाच
निर्विद्य नष्टद्रविणो गतक्लम:
प्रव्रज्य गां पर्यटमान इत्थम्।
निराकृतोऽसद्भिरपि स्वधर्मा-
दकम्पितोऽमुं मुनिराह गाथाम्॥ ५९॥
ज्याचे नि:श्वासीं जन्मले वेद। ज्याचेनि चरणीं गंगा प्रसिद्ध। ज्याचें नाम छेदी भवबंध। तो उद्धवासी गोविंद स्वमुखें बोले॥ ३१॥ यालागीं उद्धवाचें भाग्य थोर। ज्यासी तुष्टोनि शार्ङ्गधर। दाखवी निजशांतीचें घर। निरंतर वस्तीसी॥ ३२॥ उद्धवा ऐक सावधान। धनलोभ्याचें नासोनि धन। तो धननाशु झाला प्रसन्न। केला विवेकसंपन्न वैरागी॥ ३३॥ जो धनलोभी न खाता। ज्याचें नांव न घेती सर्वथा। तोचि वैराग्यें केला सरता। माझे मुखीं कथा तयाची॥ ३४॥ त्याचें नाम माझे मुखीं जाण। त्याचें कर्म वर्णीं मी आपण। तो मज पढियंता जाण। जो विवेकसंपन्न वैरागी॥ ३५॥ वैराग्यापरतें भाग्य थोर। जगीं नाहीं आन सधर। विवेकवैराग्यें जो साचार। तो माझें जिव्हार उद्धवा॥ ३६॥ जो विवेकवैराग्यें आथिला। तो जाण मजमाजीं आला। मी अधीन त्याचिया बोला। तो मज विकला। सर्वस्वें॥ ३७॥ लोभ्याचें नि:शेष गेलें धन। धनासवें गेले मानाभिमान। अभिमानासवें जाण। गेलें द्वंद्व दारुण सुखदु:ख॥ ३८॥ धन जातां झाली विरक्ती। तेणें नेमस्त झाला यती। भिक्षार्थ हिंडतां क्षितीं। दुर्जनीं दुरुक्तीं निर्भर्त्सिला॥ ३९॥ पीडितां नाना विकारीं। उपद्रवितां नानापरी। न डंडळीच निज निर्धारीं। स्वधर्मधैर्य करी निर्द्वंद्व॥ ९४०॥ संन्याशाचा स्वधर्म पूर्ण। मी देहातीत नारायण। साचार हरविला देहाभिमान। यालागीं जाण न डंडळी॥ ४१॥ जेवीं छायेसी लागतां घावो। पुरुषासी नाहीं भयसंदेहो। तेवीं दुर्जनीं दंडितां देहो। नाहीं दु:खभेवो निरहंकारा॥ ४२॥ देहासी होतां नाना व्यथा। आपुली जे देहातीतता। तेचि भिक्षूनें गायिली गाथा। ते तुज म्यां आतां निरूपिली॥ ४३॥ येथ सुखदु:खांसी कारण। आपला भ्रम आपणा जाण। येचि अर्थींचें निरूपण। स्वयें श्रीकृष्ण सांगत॥ ४४॥
सुखदु:खप्रदो नान्य: पुरुषस्यात्मविभ्रम:।
मित्रोदासीनरिपव: संसारस्तमस: कृत:॥ ६०॥
आविद्यक जें निजअज्ञान। तेथें मनपणें उठी मन। मनें भेद करूनियां पूर्ण। सुखदु:खें जाण भोगवी॥ ४५॥ आत्मा केवळ भेदशून्य। तेथ शत्रु मित्र उदासीन। मनें कल्पूनियां जाण। मन संपूर्ण स्वयें चाळी॥ ४६॥ ऐसें भेदीं ठसावलें मन। तेंचि पुरुषाचें अज्ञान। तेणें द्वंद्वदु:खेंसीं जाण। संसार दारुण सभ्रांता॥ ४७॥ मन सुखदु:खांसी कारण। मन:कल्पित संसार जाण। त्या मनाचें निग्रहण। स्वयें श्रीकृष्ण सांगत॥ ४८॥
तस्मात्सर्वात्मना तात निगृहाण मनो धिया।
मय्यावेशितया युक्त एतावान् योगसंग्रह:॥ ६१॥
जो नासूं पाहे संसारदु:ख। तेणें मन नेमावें आवश्यक। मनावेगळें दु:खदायक। नाहीं आणिक त्रिलोकीं॥ ४९॥ मन अतिशयें चंचळ। तें सहसा नव्हे निश्चळ। त्यासी विवेक द्यावा मोकळ। अभेदशील अहर्निशीं॥ ९५०॥ मन सिंतरील विवेकासी। यालागीं हातकडिया दोहींसी। करूनियां अहर्निशीं। येरयेरांपाशीं राखावीं॥ ५१॥ मन जेथ विकल्पूं धांवे। तेथ महामारी विवेकू पावे। मन जेथ अधर्में संभवे। तेथ विवेक धांवे हांकित॥ ५२॥ मन जाय कामक्रोधांपाशीं। विवेक ओढी धरोनि केशीं। मन रिघतां निंदेपाशीं। विवेक त्यासी बुकाली॥ ५३॥ मन म्हणे विषय सुटी। विवेक हाणे वैराग्यकाठी। मन धांवतां कल्पनेपाठीं। विवेक उठाउठीं झोंटाळी॥ ५४॥ परदारा परधन। अभिलाषू धांवे मन। तेथ विवेक पावोन। रणकंदन आरंभी॥ ५५॥ ऐसा मनां-विवेकांचा झगडा। गाऱ्हाणें आलें सद्गुरूपुढां। तेणें करावया निवाडा। अद्वैतवाडां कोंडिलीं॥ ५६॥ तो दृष्टी देखतांचि ठावो। मनाचा मोडला स्वभावो। देहींचा सांडोनि अहंभावो। विवेकेंसीं पहा हो ऐक्य केलें॥ ५७॥ तेथ मनाचें गेलें मनपण। विवेक विसरला आकळण। जीवाचें विरालें जीवपण। वस्तु संपूर्ण अद्वयें॥ ५८॥ जेवीं सुवर्णाचीं नागभूषणें। फडा पुच्छ मिरवी नागपणें। तें न मोडितां नागत्वाचें लेणें। सोनें सोनेपणें नागत्व विसरे॥ ५९॥ तेवीं जाणोनि वस्तु पूर्ण। न मोडितां जग जाण। जीव विसरला जीवपण। मनत्वा मन मूकलें॥ ९६०॥ ऐशिया विवेकयुक्ती जाण। माझे स्वरूपीं प्रवेशे मन। जेथ मनपणें नुठी मन। मनोनिग्रहण या नांव॥ ६१॥ ऐक चतुरचित्तचिंतामणी। विवेकचक्रवर्तिचूडामणी। उद्धवा भक्तशिरोमणी। मनोनिग्रहणीं प्रवर्त॥ ६२॥ आवडीं भुलला कृष्णनाथ। तो उद्धवासी म्हणे तात। मनोनिग्रही तूंएथ। होईं साक्षेपयुक्त सादर॥ ६३॥ साक्षेपें निग्रहूनि मनासी। जो सांडवी मनोजन्य भेदासी। शांति सांडूं नेणे त्यासी। जेवीं तान्हयासी माउली॥ ६४॥ निजशांति बाणल्या शुद्ध। त्यासी न बाधीकोणी द्वंद्व। हाचि योगसंग्रहो प्रसिद्ध। बोलिले सिद्ध महायोगी॥ ६५॥ सांडूनि संसारस्फूर्ती। चित्स्वरूपीं जडे वृत्ती। जीव शिव एकत्व येती। योगसंग्रहस्थिती या नांव॥ ६६॥ ऐशिया योगसंग्रहशांती। साधकां द्वंद्वें न बाधिती। हें असो जया भिक्षुगीतभक्ती। द्वंद्वनिर्मुक्ती तया लाभे॥ ६७॥
य एतां भिक्षुणा गीतां ब्रह्मनिष्ठां समाहित:।
धारयञ्छ्रावयञ्छृण्वन् द्वन्द्वैर्नैवाभिभूयते॥ ६२॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायामेकादशस्कन्धे त्रयोविंशोऽध्याय:॥ २३॥
साधावया शांतीची प्राप्ती। कोटिसाधनें न लभे शांती। हा भिक्षुगीतार्थ धरितां चित्तीं। शांति आपैती साधकां॥ ६८॥ योगनिष्ठा ब्रह्मज्ञान। तें हें भिक्षुगीतनिरूपण। जो हृदयीं धरी सावधान। शांति आंदण तयाची॥ ६९॥ ये भिक्षुगीतेचा गीतार्थू। जो जीवीं धरी समाहितू। त्यासी द्वंद्वांचा न बाधी घातू। अतिशांतू निजबोधें॥ ९७०॥ भिक्षुगीतार्थें समाधान। हें सांगतां नवल कोण। जो सादरें करी श्रवण। त्यासी द्वंद्वें जाण न बाधिती॥ ७१॥ परदेशा गेला बहुतकाळ भर्ता। त्याचें पत्र सादर ऐके कांता। तैशिया अतिएकाग्रता। भिक्षुगीता ऐकावी॥ ७२॥ निघोनि गेलिया पुत्रासी। त्याची शुद्धि ये मातेपाशीं। ऐकोनियां उणखुणेसी। चरफडी जैसी विव्हळ॥ ७३॥ तीजवळ ज्या सोयऱ्या असती। त्याही स्नेहें कळवळती। परी माता जैसी तळमळी चित्तीं। तें आणिकाप्रती असेना॥ ७४॥ तैसें भिक्षुगीतश्रवण। करितां द्रवे ज्याचें मन। जो सात्त्विकें वोसंडे पूर्ण। तो द्वंद्वांसी जाण नाटोपे॥ ७५॥ असो नव्हे सादरें श्रवण। तरी करितां याचें नित्य पठण। भिक्षुगीतप्रतापेंकरून। द्वंद्वें जाण नातळती॥ ७६॥ पडतां पंचाननाची घाणी। मदगजां होय महापळणी। तेवीं भिक्षुगीतपठणीं। होय भंगणी द्वंद्वांची॥ ७७॥ निर्लोभ होऊनि मानसीं। बैसोनि साधुसज्जनांपाशीं। जो निरूपी भिक्षुगीतासी। द्वंद्वें त्यासी नातळती॥ ७८॥ अर्थें पाठें श्रवण करितां। द्वंद्वें निवारी भिक्षुगीता। हें वर्म कळलेंसे श्रीकृष्णनाथा। तो सांगे हितार्था उद्धवा॥ ७९॥ ज्या भिक्षुगीताची फळश्रुती। स्वमुखें सांगताहे श्रीपती। त्या भिक्षूचें भाग्य वानूं किती। धन्य त्रिजगतीं तो एक॥ ९८०॥ विवेकवैराग्यसमरसीं। जो साहे अतिद्वंद्वांसी। तोचि पढियंता हृषीकेशीं। हें उद्धवासी दाविलें॥ ८१॥ जगासी उद्धवाचा उपकार। गुह्य ज्ञान परात्पर। उघडूनि श्रीकृष्णें भांडार। भिक्षुगीतसार प्रकटिलें॥ ८२॥ उद्धव न पुसता जैं शांती। तैं हें कां सांगता श्रीपती। कृष्णासी उद्धवाची प्रीती। त्यासी नाना उपपत्ती उपदेशी॥ ८३॥ हेंचि जडजीवां उद्धरण। येणें उपायें तरती दीन। जग तारावया जगज्जीवन। उद्धवमिषें श्रीकृष्ण बोलिला॥ ८४॥ श्रीकृष्ण बोलिला भिक्षुगीत। जें वेदशास्त्रार्थमथित। उपनिषदांचें सारभूत। वार्तिकांतर्गत रहस्य॥ ८५॥ येणें आपआपणियां आपण। लागताहे निजात्मलग्न। हें ज्ञानाचेंही गुह्य ज्ञान। भक्तकृपें श्रीकृष्ण बोलिला॥ ८६॥ येणें जीवाचें जीवत्व उडे। शिवाचें शिवत्वही बुडे। द्वंद्वाचें बाधकत्व मोडे। स्वानंदाचें उघडे भांडार॥ ८७॥ वेदें मौन धरिलें जेथ। सशब्द शास्त्रें लाजलीं तेथ। ऐसें अतिरहस्य भिक्षुगीत। तें मी प्राकृत बोलिलों॥ ८८॥ जेवीं जळीं बुडते पाषाण। श्रीरामें तारिले आपण। तेवीं मी जड मूढ अज्ञान। बोलवी ब्रह्मज्ञान जनार्दनकृपा॥ ८९॥ अहल्या जे व्यभिचारिणी। ते लागतां श्रीरामचरणीं। तिचेनि नामें पापा धुणी। प्रात:स्मरणीं पढविली॥ ९९०॥ तेवीं सद्गुरुकृपेची करणी। माझी प्राकृत जड मूढ वाणी। मानिजे साधुसज्ञानीं। तैशीं बोलणीं बोलविलीं॥ ९१॥ सरस्वती ज्यासी वोळे। तो मुकाही वेदशास्त्र बोले। तैसें जनार्दनें आम्हां केलें। भिक्षुगीत बोलविलें प्राकृत॥ ९२॥ राजमुद्रा चढे ज्याचे हातीं। त्यातें समस्त सन्मानिती। तेवीं माझी वाणी सरती। केली निश्चितीं जनार्दनें॥ ९३॥ बाळकाची बोबडी वाणी। ऐकोनि संतोषे निजजननी। तेवीं माझी आरिख वाणी। संतसज्जनीं प्रियकर॥ ९४॥ मी माझें उंच नीच बोलणें। हेंही माथां घ्यावें कोणें। मीपण नेऊनि जनार्दनें। ग्रंथकथनें कथवित॥ ९५॥ आधींच हें श्रीभागवत। त्यामाजीं गूढ एकादशार्थ। त्याहीमाजीं भिक्षुगीत। अतिगुह्यार्थ निर्द्वंद्व॥ ९६॥ त्या भिक्षुगीताची टीका। एकला कर्ता नव्हे एका। तें एकपण हिरोनि देखा। ग्रंथार्थलेखा जनार्दन वदवी॥ ९७॥ तेथ एक ना अनेक। ऐसें जनार्दनें केलें देख। त्यावरी द्वंद्वसाम्य-कवतिक। ग्रंथ सम्यक वाखाणवी॥ ९८॥ एका जनार्दना शरण। जनार्दनू झाला एकपण। ऐसेनि एकत्वें जाण। केलें संपूर्ण भिक्षुगीत॥ ९९॥ माझे निजगुरूचाही गुरू। श्रीदत्त परमगुरू। तो भिक्षुगीतार्थें साचारू। योग्यां योगेश्वरू तुष्टला॥ १०००॥ तेणें तोखलेनि अद्भुतें। आदरें आश्वासूनि मातें। अभय देऊनि निजहस्तें। पूर्ण ग्रंथार्थें डुल्लतू॥ १॥ एका जनार्दना शरण। श्रोतां व्हावें सावधान। पुढील अध्यायीं श्रीकृष्ण। प्रकृतिपुरुषलक्षण सांगेल॥ २॥ ते प्रकृति-पुरुषांची कथा। विवंचूनी हृदयीं धरितां। मी सुखदु:खद्वंद्वांपरता। निजात्मता निजबोधू॥ ३॥ संतसज्जनां साष्टांग नमन। श्रोतेजनांसी लोटांगण। एका विनवी जनार्दन। अतिगोड निरूपण पुढें आहे॥ ४॥
इति श्रीभागवते महापुराणे एकादशस्कन्धे श्रीकृष्णोद्धवसंवादे एकाकारटीकायां भिक्षुगीतनिरूपणं नाम त्रयोविंशोऽध्याय:॥ २३॥ श्रीकृष्णार्पणमस्तु॥ श्लोक॥ ६२॥ ओव्या॥ १००४॥
॥ श्री ॐ तत्सत्-श्रीकृष्ण प्रसन्न॥
अध्याय चोविसावा
श्रीगणेशाय नम:॥ श्रीकृष्णाय नम:॥ ॐनमो जी गुणातीता। व्यक्तिरहिता अव्यक्ता। तुजमाजीं नाहीं द्वैतकथा। अद्वैततारहिवासी॥ १॥ तुझा अद्वैत निजनिर्वाहो। तेथ नाहीं देवी देवो। उदय-अस्तांचा अभावो। रविचंद्रांसी ठावो असेना॥ २॥ तेथ सशब्द हारपला वेदू। बुद्धीसी मिथ्या बोधू। तिळभरी नाहीं भेदू। अद्वयानंदू एकला॥ ३॥ ऐसिया अद्वैतपणीं। प्रकृतिपुरुषांची कहाणी। सांगिजे केवळ अज्ञानीं। ज्ञातेपणीं चातुर्यें॥ ४॥ जेथ मीतूंपणा नाहीं ठावो। तेथ प्रकृतिपुरुषां केवीं निर्वाहो। ज्याचा नाहीं गर्भसंभवो। त्याचें जातक पहा हो वर्तविती॥ ५॥ जें जन्मलेंचि नाहीं। त्याचें श्राद्ध करावें कायी। हें ज्ञात्यासी पुसतां पाहीं। ठेवितां ठायीं ठाकेना॥ ६॥ वांझेच्या पुत्राचा विवाहो। समारंभ चला पहा हो। नेणा साच जाणा वावो। तैसा निर्वाहो प्रकृतिपुरुषां॥ ७॥ ऐसें नसतेंचि नाथिलें। साचाचे परी नांदविलें। एकीं अनेकत्व दाविलें। एकपण संचलें न मोडतां॥ ८॥ ऐसा एकपणें एकुलता। तोचि आपण आपली झाला कांता। आपुले कांतेचा आपण भर्ता। अतिलाघवता अतर्क्य॥ ९॥ जेवीं अर्धनारीनटेश्वरीं। जो पुरुष तोचि नारी। तेवीं प्रकृति पुरुषसंसारीं। एकाकारीं नांदत॥ १०॥ तो पुरुष ते पतिव्रता। दोघां अनन्य प्रीति एकात्मता। येरयेरां वेगळीकता। पाऊल सर्वथा न घालिती॥ ११॥ दोघां एकत्र सदा असणें। दोघांसी एकचि नेसणें। दोघां एके सत्ता बैसणें। दोघे एकचि प्राणें वर्तती॥ १२॥ दोघां एकचि देखणें। दोघां एकचि चाखणें। दोघां एकचि बोलणें। दोघां करणें एकचि॥ १३॥ कैशी दोघां प्रीति अलोलिक। येरयेरांवीण न घेती विख। येरयेरांवीण न चाखिती उदक। येरयेरेंवीण देख आंधळीं॥ १४॥ नवल बाइलेचें करणें। नपुंसका पुरुषत्व इणें देणें। मग तिचेनि अधीनपणें। पुरुषें नांदणें सर्वदा॥ १५॥ मग हा तिचेनि डोळां देखे। मग हा तिचेनि बोले मुखें। तिचेनि भोगी हा सुखदु:खें। बंधमोक्ष चाखे तिचेनि॥ १६॥ तिचेनि म्हणवी मी ब्रह्म। तिचेनि करी हा कर्माकर्म। तिचेनि भोगी हा मरणजन्म। धर्माधर्मविभागें॥ १७॥ तिचेनि यासी पाप घडे। तिचेनि यासी पुण्य जोडे। तिचेनि हा महत्त्वा चढे। तिचेनि पडे अध:पातीं॥ १८॥ एथवरी अतिप्रीतीं। वाढविली निजप्रकृती। प्रकृति पातिव्रत्यस्थिती। वश्य निजपती तियें केला॥ १९॥ नवल दोघांची सोयरिकी। दोघीं भावंडें होतीं सखीं। तो बाप ते त्याची लेंकी। पाहतां विवेकीं तो पुत्र तिचा॥ २०॥ यापरी अगम्यागमन। तिंहीं दोघीं करूनि जाण। वाढविले अनेक जन। तिसरेपण नातळतां॥ २१॥ ऐसा अव्यभिचारी व्यभिचारू। करूनि वाढविला संसारू। तो अतिअतर्क्य अगोचरू। अगम्य दुर्धरू शिवादिकां॥ २२॥ हा निजशक्तिप्रकृतिमेळें। भोगी शिवत्वाचे सोहळे। प्रिया न देखतां तात्काळें। सांडी सगळें शिवत्व॥ २३॥ ज्यासी गांवठाव ना जीवमेळ। रूपनांव ना काळवेळ। ऐसाही प्रकृती केवळ। केला सबळ निजगुणीं॥ २४॥ प्रकृती निजगुणास्तव। निजभर्ता केला सावेव। वर्ण व्यक्ति रूप नांव। नाना वैभवविलासें॥ २५॥ तंव पूर्णत्व लोपोनियां शिवें। अंगावरी वाढविलें शांभवें। येरी पतिव्रता आहेवें। रूपें नांवें शिव पूजी॥ २६॥ दोघांपासूनि झालें जग। परी न दिसे तिसरा भाग। न तुटे अनन्यमिळणीयोग। भिन्न विभाग दाखवितां॥ २७॥ त्रैलोक्य पाहतां सांग। न दिसे तिसरें अंग। दोघीं दुमदुमीत जग। भरलें चांग दुबंधीं॥ २८॥ दोघांची अतिप्रीति ऐशी। अनन्यमिळणीअनन्यासी। दोघें अणूमाजीं सावकाशीं। निजरहिवासी नांदत॥ २९॥ पतीवीण ते पतिव्रता। सगळीचि विरे सर्वथा। प्रियेवीण असतचि नसता। होय कांहीं नव्हतां भर्तारू॥ ३०॥ शिव नि:संग जो पैं सदा। क्रियाकरणेंवीण नुसधा। त्यासीही अतिप्रीतीं निजप्रमदा। सुखदु:खबाधा भोगवी॥ ३१॥ यापरी निज नोवरा। प्रकृती गोंविला घरचारा। मग घरवातेचा थारा। त्याच्याचि शरीरा वरी केला॥ ३२॥ प्रकृति पतिव्रता अवंचक। कर्माकर्मीं शिणोनि अनेक। सुखदु:खांची परवडी देख। अर्पी आवश्यक निजकांता॥ ३३॥ नवल तें मीं सांगावें काये। स्त्री जोडी तें पुरुष खाये। तियेवीण तो पाहें। कंहीं न लाहे कवडाही॥ ३४॥ प्रकृति पतिव्रताशिरोमणी। कांत वश्य करोनि निजगुणीं। वासना सूक्ष्म सेवया अनुदिनीं। भोगवी सुगरणी भर्तारा करवीं॥ ३५॥ तेथ प्रकृतीचेनि गदारोळें। भवाब्धीं जलक्रीडा खेळे। प्रकृति पुरुषातें बुडवी बळें। पुरुष एकें काळें प्रकृति बुडवी॥ ३६॥ ऐशा प्रकृतीच्या संगाआंत। पुरुषास लाविलें पंचभूत। जन्ममरणांच्या बुडॺा देत। अवस्थाभूत होऊनि॥ ३७॥ ऐसा प्रकृतिचिया भिडा। पुरुष केवळ झाला वेडा। निजत्व विसरोनि बापुडा। केला गाढा अतिदीन॥ ३८॥ ऐसा विसरोनि पूर्णत्वासी। जीवशिवद्वंद्वें स्वयें सोशी। त्यासी न्यावया निजत्वासी। गुणिया पूर्णांशीं गुरुरावो॥ ३९॥ ज्याचे वचनमात्रें पहा वो। जीवाचा हारपे जीवभावो। शिवा शिवपदीं ठावो। ज्याचा वचनगौरवो नांदवी॥ ४०॥ ज्याची भावार्थें ऐकतां गोठी। अहंकारू निमे उठाउठी। जन्ममरणांसी पडे तुटी। न दिसे दृष्टीं भवभय॥ ४१॥ ज्याचिया कृपादृष्टिपुढें। जीवशिवांचें फिटे बिरडें। माया मिथ्यात्वें समूळ उडे। पूर्णत्वाचें उघडे भांडार॥ ४२॥ शिवू भुलविला शिवत्वासी। यावया तो निजपदासी। आज्ञा जैं पुसे सद्गुरूसी। तैंचि शिवासी शिवत्व॥ ४३॥ एवढी महिमा सद्गुरूसी। वचनें केवीं वानूं त्यासी। तंव वानिते वाणीनें वानावयासी। वदवी वाचेसी गुरुरावो॥ ४४॥ तेथ एक मी वानिता। हें कोणें घ्यावें आपुले माथां। गुरूनें हरितली अहंता। तेथ मी एक कर्ता घडे केवीं॥ ४५॥ तेथ मीपणें घ्यावी अहंता। तंव गुरूचि मीपणा आंतौता। गुरूवेगळा ठाव नाहीं रिता। मीपणाचे माथां गुरुरावो॥ ४६॥ माझें जें कांमीपण। तें सद्गुरु झाला आपण। तेव्हां रूप एक नांवें भिन्न। एका जनार्दन एकत्वें॥ ४७॥ अवघा जनार्दनचि देखा। तोचि उपनांवें झाला एका। तेणें नामें श्रीभागवत देखा। देशभाखाअर्थवी॥ ४८॥ तेविसावे अध्यायाचे अंतीं। देवो बोलिला उद्धवाप्रती। द्वंद्वभोगांची निजप्राप्ती। साहावी शांती धरोनि॥ ४९॥ ज्यांसी बाणली अढळ शांती। ते मज अजितातें जिंकिती। तेचि साचार परमार्थीं। स्वमुखें श्रीपती बोलिला॥ ५०॥ तें ऐकोन कृष्णवचन। उद्धवाचें दचकलें मन। द्वंद्वसहिष्णुता अतिकठिण। कैसेनि आपण साहावी॥ ५१॥ द्वंद्वसहिष्णुतासाधन। पुसतां उबगेल श्रीकृष्ण। ऐशिया भिडा उद्धव पूर्ण। धरोनि मौन राहिला॥ ५२॥ तो उद्धवाचा अभिप्रावो। जाणोनियां देवाधिदेवो। द्वंद्वसहिष्णुता उपावो। समूळ पहा वो सांगत॥ ५३॥ अद्वयत्वें परिपूर्ण। प्रकृतीहूनि पुरुष भिन्न। हें आकळल्या निजज्ञान। द्वंद्वबंधन बाधीना॥ ५४॥ द्वंद्वें जिणावया पूर्ण। प्रकृतिपुरुषविवंचन। उद्धवें न करितां प्रश्न। स्वयें श्रीकृष्ण सांगत॥ ५५॥ भक्तअंतरींचें जाणता। यालागीं अंतर्यामी तत्त्वतां। तो निजभक्तांचिया स्वार्था। पूर्ण परमार्था सांगत॥ ५६॥ निजभक्तांचें मनोगत। जाणोनियां श्रीकृष्णनाथ। करावया भक्तहित। कृपेनें सांगत कृपाळू॥ ५७॥ जगीं धन्य भाग्य उद्धवाचें। कृष्ण दैवत तिहीं लोकींचें। कृपा वोरसोनियां साचें। प्रकृतिपुरुषांचें निज सांगे॥ ५८॥ आशंकेचें निरूपण। उद्धवें न सांगतांही जाण। तें जाणोनियां श्रीकृष्ण। कृपानिरूपण निरूपी॥ ५९॥ कृष्ण म्हणे ज्यासी तारीन। तो पहिलाचि तरला जाण। करावया जगाचें उद्धरण। कृपें श्रीकृष्ण बोलत॥ ६०॥ धेनु वत्साचेनि लोभें। जेवीं घरापुरतें दुभे। तेवीं उद्धवाचेनि वालभें। जग पद्मनाभें उद्धरिलें॥ ६१॥
श्रीभगवानुवाच
अथ ते संप्रवक्ष्यामि सांख्यं पूर्वैर्विनिश्चितम्।
यद्विज्ञाय पुमान् सद्यो जह्याद्वैकल्पिकं भ्रमम्॥ १॥
जो योगियांचा योगेंद्र। जो ज्ञानियांचा ज्ञानेंद्र। जो भक्तचित्तचकोरचंद्र। जो यादवेंद्र यदुवंशीं॥ ६२॥ जो प्रकृतिपुरुषांहूनि पर। तो स्वयें बोले शार्ङ्गधर। उद्धवा द्वंद्वसहनप्रकार। अतिगुह्य विचार अवधारीं॥ ६३॥ जें ऐकतांचि निरूपण। सुखदु:खातीत आपण। हे संपूर्ण पावे खूण। तें गुह्य ज्ञान अवधारीं॥ ६४॥ मी कपिलरूपें अवतरूनी। प्रकृतिपुरुष विवंचोनी। उपदेशिली निजजननी। ते जुनी कहाणी सांगेन॥ ६५॥ जे परिसतां सावधान। स्वयें होईजे ज्ञानसंपन्न। पुरुषाहूनि प्रकृति भिन्न। सुखदु:ख जाण तीपाशीं॥ ६६॥ सुखदु:खें मायिक पूर्ण। ऐसें ज्यासी कळलें ज्ञान। तेव्हां भवभयभ्रम दारुण। तत्काळ जाण तो सांडी॥ ६७॥ जेवीं मोतियांची कंठमाळा। भ्रमें सर्प भासली डोळां। ते भ्रमांतीं घालिती गळां। न बाधी कंटाळा सर्पभयाचा॥ ६८॥ तेवीं शिवशक्तिविवंचन। तुज मी सांगेन संपूर्ण। जें आकर्णितांसावधान। द्वंद्वें सकारण हारपती॥ ६९॥ ब्रह्म सुखरूप एकलेपणीं। तेथ प्रकृतिपुरुष कैंचीं दोनी। द्वंद्वसुखदु:खें ज्यापासोनी। त्रिभुवनीं न समाती॥ ७०॥ तेचि अर्थींचें निरूपण। स्वयें सांगताहे श्रीकृष्ण। प्रकृतिपुरुषांचें जन्म जाण। तें मुख्य कारण सुखदु:खां॥ ७१॥
आसीज्ज्ञानमथो ह्यर्थ एकमेवाविकल्पितम्।
यदा विवेकनिपुणा आदौ कृतयुगेऽयुगे॥ २॥
जेवीं निजेल्या पुरुषाची छाया। पुरुषातळीं जाय लया। तेवीं सविकार गिळोनि माया। ब्रह्म एकल्या एकाकी॥ ७२॥ ब्रह्म एकाकी परिपूर्ण। हेंही म्हणावया म्हणतें कोण। नाहीं नाम रूप व्यक्ति पूर्ण। ब्रह्मीं ब्रह्मपण स्फुरेना॥ ७३॥ तेथ नाहीं युगसंख्या काळ वेळ। नाहीं दिनमान घटिका पळ। नाहीं शून्यत्वें शून्य मंडळ। ब्रह्म केवळ परिपूर्णत्वें॥ ७४॥ तेथ मी ब्रह्म हें स्फुरे जें स्फुरण। तेंचि मायेचें मुख्य लक्षण। तेंचि प्रकृतिपुरुषांचें जन्मस्थान। जावळीं फळें जाण जन्मलीं॥ ७५॥ जेवीं कां कवळूनियां कण। निकण कोंडा वाढे आपण। तेवीं पुरुषयोगें पूर्ण। प्रकृति जाण थोरावे॥ ७६॥ धरूनि गोडपणाचा सांठा। फणसाअंगीं वाढे कांटा। तेवीं पुरुषयोगें ताठा। चढला मोठा प्रकृतीसी॥ ७७॥ जेवीं कां डोळींचेंचि जळ। गोठोनि डोळां होय पडळ। तेवीं ब्रह्मींमायामळ। करी शबळ शुद्धासी॥ ७८॥ पडळ डोळा मंद करी। माया निजानंद आवरी। वाढोनि त्याची त्याचिवरी। वेडा करी पुरुषातें॥ ७९॥ ऐसें कर्तेनवीण आपसया। कार्यकारण जें आलें आया। त्यातें कृतयुग म्हणावया। वेदू लवलाह्या उदेला॥ ८०॥ अकार-उकार-मकारेंसीं। वेदू उपजे प्रकृतिपुरुषीं। जेवीं उकलल्या बीजासी। प्रथम ये त्यासी तिवणा डिरू॥ ८१॥ ते वेदींचा अभिप्रावो। ब्रह्म सत्य माया वावो। आपुलेनि अभेदें ब्रह्मभावो। विवेकनिपुण पहा वो जाणती॥ ८२॥ ऐसे वेदविवेकें अभेदयोगी। ते कृतादि होत कां कलियुगीं। वर्ततां ते सदा अयुगीं। युग त्यालागीं असेना॥ ८३॥ कृतयुगादि युगपंक्ती। चराचर नाना व्यक्ती। यांसी उपजवी प्रकृती। तिची उत्पत्ती हरि सांगे॥ ८४॥
तन्मायाफलरूपेण केवलं निर्विकल्पितम्।
वाङ्मनोऽगोचरं सत्यं द्विधा समभवद् बृहत्॥ ३॥
तें बृहत् जें परब्रह्म। जेथ न रिगे रूपनाम। जें मनबुद्धीसी अगम्य। जें दुर्गम इंद्रियां॥ ८५॥ जें निर्गुण निराकार। जें सत्यस्वरूप साचार। जें परेहूनि परात्पर। निर्विकार निजवस्तु॥ ८६॥ तेथ अतर्क्य मायाचमत्कार। करी दृश्यद्रष्ट्टत्वें सविकार। तेचि प्रकृति पुरुष साचार। तेणें चराचर वाढवी॥ ८७॥ जेवीं रूपासवें छायेची व्यक्ती। तेवीं ब्रह्मीं मायेची निजस्थिती। तिणें उपजविली शिवशक्ती। पुरुष प्रकृति द्विधा भेदें॥ ८८॥ ब्रह्मांडीं ईश्वरस्वभावो। पिंडीं त्यासीच जीवभावो। ऐसा प्रकृतिपुरुषनिर्वाहो। मायेनें पहा हो द्विधा केला॥ ८९॥ ब्रह्म अच्छेद्य वेदू बोले। तें फाडूनि द्विधा कैसें केलें। जेवीं आरिसां आपणा आपुलें। मुख देखिलें संमुख॥ ९०॥ आपण पूर्वामुख आहे। प्रतिबिंब पूर्वेकडे न होये। आपलें आपणा संमुख होये। हें लाघव पाहें मायेचें॥ ९१॥ प्रतिबिंब दिसतां संमुख। संमुख म्हणतां अतिविमुख। पुरुष पूर्वेकडे देख। प्रतिबिंबाचें मुख पश्चिमेकडे॥ ९२॥ तेवीं आत्मदृष्टि स्वरूपीं पडें। जीवदृष्टि प्रपंचाकडे। येणें संमुखत्व न घडे। विमुखत्व गाढें जीवासी॥ ९३॥ तेवीं ब्रह्मीं जें ब्रह्मस्फुरण। तेंचि मूळमायेचें लक्षण। तेथ ईश्वरत्वें जाण। होय आपण्या आपण संमुख॥ ९४॥ जे अद्वितीय वस्तु शुद्ध। तेथ मिथ्या मायासंबंध। अभेदीं उपजवूनि भेद। केलीं द्विविध शिवशक्ती॥ ९५॥
तयोरेकतरो ह्यर्थ: प्रकृति: सोभयात्मिका।
ज्ञानं त्वन्यतमो भाव: पुरुष: सोऽभिधीयते॥ ४॥
त्या दोहीं भागांमाझारीं। प्रकृतिभाग तो विकारी। पुरुषभाग तो अविकारी। स्वयें श्रीहरी सांगत॥ ९६॥ तेथ आपण आपुली कांता। आपुले कांतेचा आपण भर्ता। एकपणीं दावूनि द्वैता। भिन्नविभागता शिवशक्ती॥ ९७॥ जेवीं आपुलें एक अंग। तेथ बोलती वाम सव्य भाग। तेवीं प्रकृतिपुरुषविभाग। जाणावे सांग मायिक॥ ९८॥ अर्धनारीनटेश्वरीं। जो पुरुष तोचि नारी। प्रकृतिपुरुषीं तैशी परी। एक शरीरीं एकात्मता॥ ९९॥ जैं पुरुषविभाग लपवी। तैं स्वेच्छा प्रकृति नाचवी। प्रकृतिभाग जैं लपवी। तैं पुरुषाची पदवी प्रकट दिसे॥ १००॥ मधील पडदा जैं तोडिती। तैं पुरुष ना प्रकृती। तेव्हां प्रकटे निजात्मस्थिती। स्त्रीपुरुषव्यक्ती समूळ मिथ्या॥ १॥ ऐशी मिथ्या मायिक प्रकृती। तीपासाव गुणोत्पत्ती। गुणास्तव संसारस्थिती। स्वयें श्रीपती सांगत॥ २॥
तमो रज: सत्त्वमिति प्रकृतेरभवन्गुणा:।
मया प्रक्षोभ्यमाणाया: पुरुषानुमतेन च॥ ५॥
प्रकृति गुणमयी पूर्ण। ते लाहोनि पुरुष ईक्षण। प्रकट करी तिन्ही गुण। तेंचि निरूपण हरि सांगे॥ ३॥ जेवीं सूर्यावलोकनमेळीं। कळी विकासे कमळदळीं। ते वेगळवेगळी पांकोळी। होती मूळीं कळिकेमाजीं॥ ४॥ तेवीं पुरुषाच्या ईक्षणीं। गुणमयी झाली गुर्विणी। ते तम-रज-सत्त्वगुणी। प्रसवली तिनी गुणांतें॥ ५॥ जेवीं जळें बीज क्षोभूनी। दोनी दळें उलवूनी। डिरू निघाला त्यांतूनी। तरतरूनी तिवणा पैं॥ ६॥ तेवीं परमात्मा मी आपण। पुरुषत्वातें पावोनि जाण। प्रकृति क्षोभवूनी पूर्ण। तिनी गुण प्रकटविले॥ ७॥ जेवीं कां सूर्याचे किरणीं। सूर्यकांतीं पडे अग्नी। तेवीं पुरुषें प्रकृति भोगुनी। गुण तिनी ते प्रसवे॥ ८॥
तेभ्य: समभवत्सूत्रं महान् सूत्रेण संयुत:।
ततो विकुर्वतो जातोऽहङ्कारो यो विमोहन:॥ ६॥
ते तिनी गुण भिन्न भिन्न। भिन्नपणें वाढी समान। त्या नांव सूत्र प्रधान। क्रियाशक्ति जाण या नांव॥ ९॥ क्रियाशक्तीस जडपण। तेथ चेतनात्मक उपजे ज्ञान। तेंचि महत्तत्त्व नांव जाण। भिन्नाभिधान या हेतू॥ ११०॥ महत्तत्त्व आणि प्रधान। दोहींचें रूप एकचि जाण। तेथ क्रिया आणि स्फुरे ज्ञान। यालागीं नांवें भिन्न दोहींचीं॥ ११॥ क्रियायुक्त जें स्फुरे ज्ञान। तेथ चेतवे अभिमान। त्रिगुणीं अहंकार पूर्ण। ते ठायीं जाण उठावे॥ १२॥ अहं खवळल्या दारुण। शिवासी विसरवी शिवपण। देहात्मवादें भुलवी पूर्ण। जन्ममरण भोगवी॥ १३॥ त्या अहंकाराची मोहक शक्ती। भवभ्रमें पाडी भ्रांती। अहंकाराची विकारउत्पत्ती। स्वयें श्रीपती सांगत॥ १४॥
वैकारिकस्तैजसश्च तामसश्चेत्यहं त्रिवृत्।
तन्मात्रेन्द्रियमनसां कारणं चिदचिन्मय:॥ ७॥
अहंकार अतिदुर्धर। गुणानुसारें त्रिप्रकार। गुण अहंता दृढ संसार। गुणविकार तो ऐसा॥ १५॥ प्रथम अहंभावो सात्त्विक। झाला अंत:करणद्योतक। तोचि देवता विकार जनक। यालागीं वैकारिक बोलिजे त्यासी॥ १६॥ अहंकार जो राजसू। तो ज्ञानकर्मेंद्रियप्रकाशू। वांछी रजतेजविलासू। यालागीं तैजसू बोलिजे॥ १७॥ तामसाहंकाराची सिद्धी। सूक्ष्म भूतांतें उत्पादी। यालागीं म्हणिजे तो भूतादी। जाण त्रिशुद्धी उद्धवा॥ १८॥ नवल अहंकाराची थोरी। सचेतना अचेतन नोवरी। स्वयें लग्न लावी प्रीतीवरी। चिदचिद्ग्रंथी पुरी पाडूनी॥ १९॥ चिन्मात्रस्वरूपता जीवासी। लग्न लावी जड देहेंसीं। ‘ओं पुण्या’ एकात्मतेसी। कर्ता ज्योतिषी अभिमान॥ १२०॥ जीव ज्ञानस्वरूप चोखडा। तो करोनि जड मूढ वेडा। दृढ घाली हाडांचे खोडां। तो हा धडफुडा अहंकारू॥ २१॥ तोचि सात्त्विक आणि राजस। होऊनि तिसरा तामस। त्रिविध विकारीं बहुवस। वाढवी असोस संसारू॥ २२॥
अर्थस्तन्मात्रिकाज्जज्ञे तामसादिन्द्रियाणि च।
तैजसाद्देवता आसन्नेकादश च वैकृतात्॥ ८॥
विषय तेचि महाभूतें। तामस प्रसवला अपंचीकृतें। विषयास्तव प्रकटती भूतें। ऐक तूतें सांगेन॥ २३॥ शब्दा पासाव नभ उद्भवत। स्पर्शा पासाव मारुत। रूपा पासाव तेज होत। रसास्तव येथ आप उपजे॥ २४॥ गंधापासोनि पृथ्वी कठिण। उपजली आपीं आपण। येरयेरांचें अनुस्यूतपण। सर्वथा जाण मोडेना॥ २५॥ शब्द नि:शब्दीं जन्मला। तो आकाशातें प्रसवला। आकाशीं सूक्ष्म स्पर्श झाला। तो स्पर्श व्याला मारुत॥ २६॥ जन्मल्या मारुताआंत। शब्द स्पर्श दोनी नांदत। मारुत रूपातें प्रसवत। त्या रूपांत तेज जन्मलें॥ २७॥ त्या जन्मल्या तेजाआंत। शब्द स्पर्श रूप नांदत। रूप रसातें प्रसवत। आप रसांत जन्मलें॥ २८॥ जन्मले आपीं समरस। शब्द स्पर्श रूप रस। नांदताती सावकाश। विषयीं विषयांस प्रवेशू॥ २९॥ आपामाजीं जन्मे गंध। गंधापासाव पृथ्वी शुद्ध। शब्द स्पर्श रूप रस गंध। पृथ्वी पंचविध विषययुक्त॥ १३०॥ विषययुक्त अपंचीकृतें। पूर्वीं लीन होतीं समस्तें। तींचि स्थूळावलीं येथें। महाभूतें प्रसिद्ध॥ ३१॥ ज्ञान कर्म उभयपंचक। श्रोत्रादि इंद्रियदशक। राजसापासोनि देख। स्वाभाविक जन्मलीं॥ ३२॥ सत्त्वअहंतेचा विकार। चित्तचतुष्टय चमत्कार। मन बुद्धि चित्त अहंकार। अकराही सुरइंद्रियाधिप॥ ३३॥ महाभूतें अतिजडें देख। इंद्रियें तेथें प्रवर्तक। अंत:करण चाळक। देव प्रकाशक कर्माचे॥ ३४॥ त्रिविध अहंकारवृत्ती। गुणक्षोभें क्षोभक शक्ती। यापरी झाली उत्पत्ती। ब्रह्मांडस्थितीलागूनी॥ ३५॥
मया सञ्चोदिता भावा: सर्वे संहत्यकारिण:।
अण्डमुत्पादयामासुर्ममायतनमुत्तमम्॥ ९॥
भूतां परस्परें वैर देख। पृथ्वीतें गिळूं धांवे उदक। उदकातें आवश्यक। तेज देख निर्दळी॥ ३६॥ तेजातें प्राशी पवन। पवनातें ग्रासी गगन। एवं भूतांसी सौजन्य। सर्वथा जाण असेना॥ ३७॥ तेथ अंतर्यामिरूपें मी जाण। स्वयें प्रवेशोनि आपण। भूतें मेळवूनि पूर्ण। करीं संरक्षण मर्यादा॥ ३८॥ माझे मर्यादेची रेखा। पृथ्वी न विरवी उदका। उदकातें तेज देखा। न लववी नखा शोषाचे॥ ३९॥ तेजातें न प्राशी पवन। वायु स्वेच्छा विचरतां जाण। सर्वथा ग्रासीना गगन। गतिबंधन करीना॥ १४०॥ यापरी हीं महाभूतें। एकवटूनि समस्तें। स्रजिलें ब्रह्मांडातें। मज महापुरुषातें वस्तीशीं॥ ४१॥ सप्तावरणेंसीं प्रचंड। आवो साधूनि उदंड। निर्माण केलें ब्रह्मांड। मयूरांड आकारें॥ ४२॥
तस्मिन्नहं समभवमण्डे सलिलसंस्थितौ।
मम नाभ्यामभूत्पद्मं विश्वाख्यं तत्र चात्मभू:॥ १०॥
ऐसें ब्रह्मांड जें विद्यमान। त्यामाजीं मी नारायण। लीलाविग्रही झालों जाण। आपण्या आपण विश्वात्मा॥ ४३॥ त्या माझे नाभीसी नाभिपद्म। विकासलें विश्वधाम। त्याहीमाजीं उत्तमोत्तम। आत्मभू नाम जन्मला ब्रह्मा॥ ४४॥ नाहीं योनिद्वारा उदरगर्भू। मज आत्म्यापासूनि स्वयंभू। उपजला यालागीं आत्मभू। नामाचा शोभू ब्रह्मयासी॥ ४५॥ ब्रह्मांड तो विराट देहो। त्याचा मुख्य भागविग्रहो। माझे नाभिकमळीं पहा हो। ब्रह्मदेवो जन्मला॥ ४६॥ करावया लोकसर्जन। पद्मनाभाचे नाभीसी जाण। स्वयें जन्मला चतुरानन। रजोगुणप्राधान्यें॥ ४७॥
सोऽसृजत्तपसा युक्तो रजसा मदनुग्रहात्।
लोकान् सपालान् विश्वात्मा भूर्भुव:स्वरिति त्रिधा॥ ११॥
ब्रह्म रजोगुणप्रधान। नाभिकमळीं बैसोनि जाण। मी जन्ममूळ जो नारायण। त्यासी तो आपण देखेना॥ ४८॥ स्वयें बैसल्या कमळासी। कमळमूळ न कळे त्यासी। देखे एकार्णव जळासी। रजोगुणेंसीं मोहित॥ ४९॥ तें कमळमूळ पहावया बुडीं। एकार्णवीं घालोनि उडी। बुडतां दिवसांचिया कोडी। त्या मूळाची जोडी न लभेचि ब्रह्मा॥ १५०॥ तेथ निर्बुजला जळभयें। बाहेरी उसासे लवलाहें। कमळावरी बैसोनि पाहें। करावें काये स्मरेना॥ ५१॥ धांव पाव गा अच्युता। निवारीं माझी जगदंधता। तुज वांचूनि सर्वथा। संरक्षिता मज नाहीं॥ ५२॥ ब्रह्मा माझे पोटींचें बाळ। रजें रजांध झालें केवळ। धरोनि ठेला नाभिकमळ। कृपा तत्काळ मज आली॥ ५३॥ मज विश्वात्म्याचें अपत्य। जडत्वें राहिला तटस्थ। म्यां उपदेशिला तेथ। सृष्टिसर्जनार्थ तपोनिष्ठा॥ ५४॥ महाकल्पादींचे मांडणी। माझिया अशरीरी वाणी। तप तप या दों वचनीं। उपदेशिला अग्रगणी चतुरानन॥ ५५॥ यथोक्त तप करितां जाण। वृद्धि पावला सत्त्वगुण। त्याचिया सात्त्विकता पूर्ण। प्रत्यक्ष नारायण मी झालों॥ ५६॥ काळत्रयीं अबाधिक। तूंचि विश्वात्मा निश्चित। हें चतु:श्लोकी भागवत। म्यां त्यासी तेथ उपदेशिलें॥ ५७॥ माझिया उपदेशविधीं। होऊनियां समबुद्धी। कल्पकल्पांचिये अवधी। मोह त्रिशुद्धी बाधीना॥ ५८॥ यापरी ब्रह्मा कल्पादी। पावला परम समाधी। प्रकटोनि निजात्मबुद्धी। सर्जनसिद्धी तेणें केली॥ ५९॥ सुरासुर मानव पन्नगादिक। यांचे वसते तिन्ही लोक। सप्तपाताळ घरें देख। गोपुरें अलोलिक सप्तसंख्या॥ १६०॥ भूशब्दें पाताळलोक। भुव:शब्दें मृत्युलोक। स्व:शब्दें स्वर्गलोक। त्रिलोक देख या नांव॥ ६१॥ चतुर्दश भुवनें सकळ। तेथ वसते लोक लोकपाळ। तेंचि करोनियां विवळ। सांगे प्रांजळ श्रीकृष्ण॥ ६२॥
देवानामोक आसीत्स्वर्भूतानां च भुव: पदम्।
मर्त्यादीनां च भूर्लोक: सिद्धानां त्रितयात्परम्॥ १२॥
अधोऽसुराणां नागानां भूमेरोकोऽसृजत्प्रभु:।
त्रिलोक्यां गतय: सर्वा: कर्मणां त्रिगुणात्मनाम्॥ १३॥
मागील श्लोकाचे अंतीं। भूर्भुव:स्वर इति। यापरी त्रिलोकी श्रीपती। जाण निश्चितीं बोलिला॥ ६३॥ तेंचि पुढील श्लोकार्था। पाताळलोक होय चौथा। तो मृत्युलोक एकात्मता। जाण तत्त्वतां व्याख्यान॥ ६४॥ इंद्रादि सकळ देवांसी। स्वर्ग निजमंदिर त्यांसी। यक्षरक्षभूतगंधर्वांसी। निवासासी अंतरिक्ष॥ ६५॥ जेणें पाविजे निजमोक्षासी। जेथूनि गमन लोकांतरासी। ते कर्मभूमी मनुष्यासी। निजभाग्येंसीं भूर्लोक॥ ६६॥ त्रिलोकीवरतें जाण। सिद्ध वोळंगती आपण। तें सिद्धांचें सिद्धिस्थान। वसतें जाण निरंतर॥ ६७॥ अतळ वितळ सुतळ। रसातळ महातळ। तळातळ आणि पाताळ। अध:संख्या सकळ पाताळा॥ ६८॥ सप्तपाताळीं अधिकारमेळू। अतळीं वसे मयपुत्र बळू। प्रतापें अतिप्रबळू। दैत्यमेळू समुदाय॥ ६९॥ वितळीं वसे हाटकेश्वरू। जो उमाकांत कर्पूरगौरू। जेथिले हाटकनदीचा पूरू। सुवर्णसंभारूप्रवाही॥ १७०॥ सुतळीं महावैष्णव बळी। ज्याचाद्वारपाल वनमाळी। प्रल्हादही त्याचि जवळी। वैष्णवकुळीं नांदत॥ ७१॥ त्रिपुर भेदूनि शंकरू। रसातळीं स्थापिला मयासुरू। तो मायालाघवी महावीरू। सपरिवारू वसताहे॥ ७२॥ महातळीं कद्रूसुत। जे विषधर क्रोधयुक्त। ते सर्प जाण समस्त। तेथ नांदत निजवासें॥ ७३॥ तळातळीं नांदती दानव। निवातकवची वीर सर्व। फणिमुख्य राजगौरव। रचना अपूर्व ते ठायीं॥ ७४॥ सातवे पाताळीं वसती नाग। शतसहस्र फणिगणभोग। वासुकिप्रमुख अनेग। पद्मिनीभोग भोगिती॥ ७५॥ स्वर्गीं रंभा उर्वशी सुंदरी। कां पाताळीं पद्मिणी नारी। त्यांच्या सौंदर्याची थोरी। लोकांतरीं वाखाणे॥ ७६॥ त्या तळीं तीं शतयोजनांवरी। शेष वसे सहस्रशिरी। ज्याच्या निजांगावरी। निद्रा करीं मी भगवंत॥ ७७॥ त्याहूनि तळीं आत्यंतिक। अंधतामिस्रादि महानरक। त्याहीतळीं कूर्म देख। आवरणोदक तयातळीं॥ ७८॥ ज्यांचा स्वर्गभोग होय क्षीण। अधोभोगाचें उरे पुण्य। तेणें पुण्यानुक्रमें जाण। सप्तपाताळीं जन जन्मती॥ ७९॥ ज्याचे गांठीं पाप चोख। तो भोगी नाना नरक। ऐशी त्रिलोकी देख। चतुर्मुख स्वयें रची॥ १८०॥ ज्यांसी निष्कामता नाहीं चित्तीं। जे स्वप्नीं न देखती विरक्ती। त्यांसी त्रिलोकी वरती गती। नाहीं निश्चितीं उद्धवा॥ ८१॥ जे न करितीचि माझी भक्ती। जे नायकतीचि माझी कीर्ती। जे माझें रामनाम नुच्चारिती। भवबंधपंक्तिच्छेदक॥ ८२॥ त्यांसी पुन: पुन: स्वर्गलोक। पुन: पुन: भोगिती नरक। पुन: पाताळ मृत्युलोक। नानायोनीं दु:ख भोगिती॥ ८३॥ जे त्रिगुणगुणी सदा सकाम। जे सर्वदा करिती सकाम कर्म। त्यांसी त्रैलोक्याबाहेरी निर्गम। त्रिगुणधर्म निघों नेदी॥ ८४॥ सांगीतली पाताळ विवंचना। आतां ऐक स्वर्गरचना। लोकीं लोकांतरगणना। समूळ जाणा सांगेन॥ ८५॥ रविचंद्रप्रभा जेथवरी। तेथवरी पृथ्वीची थोरी। तळीं पाताळ स्वर्ग वरी। लोकलोकांतरीं निवास॥ ८६॥ पायीं चालिजे तो भूलोक जोडे। येथूनि सूर्या ऐलीकडे। भुवर्लोकींची थोरी वाढे। तेथ वस्ती घडे यक्षरक्षगंधर्वां॥ ८७॥ भुवर्लोकाहीवरी। सूर्यलोकाची वाढे थोरी। पृथ्वीपासूनि लक्षावरी। जाण निर्धारीं रविलोक॥ ८८॥ वायूपासूनि चक्राकारीं। रविचंद्रतारालोक कुसरी। खेवणोनियां तयावरी। काळ सूत्रधारी भवंडीत॥ ८९॥ त्या काळाहीवरी माझी सत्ता। माझेनि भेणें काळू तत्त्वतां। क्षणलवनिमिषावस्था। अधिकन्यूनता होऊं नेदी॥ १९०॥ नवल काळचक्रगती। मासां रवि चंद्र समान होती। सूर्याआड चंद्रासी गती। जाण निश्चितीं दिनद्वयें॥ ९१॥ ते अमावास्याप्रतिपदेसी। चंद्र चंद्रमंडळीं सावकाशीं। सूर्यसमभागें गमन त्यासी। तें या लोकांसी दिसेना॥ ९२॥ इतुक्यासाठीं ते दिवशीं। जीवें जित्या चंद्राशीं। नष्टत्व स्थापिती ज्योतिषी। तें या लोकांसी सत्य माने॥ ९३॥ रवि चंद्र एकासनीं। सर्वथा नव्हती गमनीं। लक्षांतरें वसती दोन्ही। मंडळसमानीं मासांतीं गती॥ ९४॥ रविआड गती ज्या ग्रहासी। त्याचा अस्त सांगे ज्योतिषी। सत्य माने या लोकांसी। तो ग्रहो दृष्टीसी दिसेना॥ ९५॥ दृष्टिसृष्टीचा जो न्यावो। तो ज्योतिषशास्त्रीं सत्य पहा हो। न दिसे त्याचा अस्तभावो। दिसे तो पहा हो पूजिती॥ ९६॥ अभ्राआड ग्रहण झालें। देखिलें तेथें पर्व फावलें। न दिसे ते देशीं नाहींच झालें। येणेंही बोलें वर्तती॥ ९७॥ रविचंद्रांहूनि आरती। राहुकेतूंची असे वस्ती। ते जैं मंडळाआड येती। तैं ग्रासिलें म्हणती रविचंद्रां॥ ९८॥ राहु सूर्या गिळिता साचें। तैं तोंड जळतेंराहूचें। मंडळीं मंडळ आड ये त्याचें। हें सर्वग्रासांचें संमत॥ ९९॥ सूर्य सूर्यमंडळीं राज्य करी। त्याच्या सर्वग्रासाची थोरी। ज्योतिषी सांगे घरोघरीं। तें देखोनि नरीं महाशब्द कीजे॥ २००॥ सूर्यसर्वग्रासाचिया गोठी। जगीं एक बोंब उठी। शेखीं रवि-राहूंसी नाहीं भेटी। स्पर्शही शेवटीं असेना॥ १॥ ग्रहचक्र वेगें चळतां पाहीं। रविचंद्रादिकां चालणें नाहीं। ते निश्चळ निज राज्याच्या ठायीं। न चालतां पाहीं चालती॥ २॥ रविलोकाहूनि वरी। चंद्रलोक लक्षांतरीं। चंद्रलोकाहूनि दूरी। लक्षांतरीं तारालोक॥ ३॥ तारालोकाहूनि वरी। बुधलोक दों लक्षांतरीं। बुधलोकाहूनि वरी। दों लक्षांतरीं शुक्रलोक॥ ४॥ मिळोनियां दैत्यगण। ज्याच्या चरणां येती शरण। नित्यघालिती लोटांगण। तो शुक्राचार्य जाण दैत्यगुरु॥ ५॥ शुक्रलोकाहूनि दों लक्षांतरीं। भौमलोकवसे अंबरीं। भौमलोकाहूनि दों लक्षांतरीं। देवगुरु करी निजवासू॥ ६॥ ज्याचे चरण वंदिती देख। इंद्रचंद्रवरुणादि अर्क। नित्य येती आवश्यक। तो बृहस्पतिलोक गुरूचा॥ ७॥ त्याहीवरी लक्षदोनी। सूर्यसुत वसे शनी। लक्षांतरें तेथूनी। सप्तऋषिजनीं निवासू॥ ८॥ सप्तऋषींची ऋषिपंक्ती। तेथेंचि वसे अरुंधती। यावरी वसे अमरावती। इंद्रसंपत्तीसमवेत॥ ९॥ जेथ अंगें वसे इंद्र जाण। ऐरावती आरोहण। पार्षदगण मरुद्गण। सुरसेना जाण जयाची॥ २१०॥ उच्चै:श्रवा वारू जाण। कल्पतरूंचें उद्यान। कामधेनूंचें गोधन। नंदनवन क्रीडेसी॥ ११॥ जेथींच्या पायऱ्या चिंतामणी। रंभा उर्वशी विलासिनी। अष्टनायिका नाचणी। ज्याच्या रंगणीं नांदती॥ १२॥ येणें वैभवें अमरावती। इंद्र तेथील अधिपती। येथूनि स्वर्गाची समाप्ती। त्रैलोक्य निश्चितीं या नांव॥ १३॥ आतां त्रैलोक्याबाहेरी। एक लक्ष योजनांवरी। भक्तकृपाळू श्रीहरी। ध्रुवमंडळ करी कृपेने॥ १४॥ त्रिलोकीं होतां प्रलयकाळ। ध्रुवासी कदा नव्हे चळ। तो सर्वदा अचळ। यालागीं अढळ ध्रुवपद॥ १५॥ पृथ्वीपासोनि कोटि योजन। महर्लोक वसे जाण। तेथ वसती कल्पायु जन। तें वसतिस्थान तयांचें॥ १६॥ तेथूनि कोटि योजनें देख। वरुता असे जनोलोक। तेथ वसती सनकादिक। ऊर्ध्वरेते देख महायोगी॥ १७॥ तेथूनि दोन कोटि अधिक। वसताहे तपोलोक। तेथील निवासी आवश्यक। वैराजदेव देख तपस्वी॥ १८॥ तपोलोकाहूनि देख। चौकोटी उंच अधिक। तेथ वसताहे सत्यलोक। तेथील नायक चतुरानन॥ १९॥ तेथ मूर्तिमंत चारी वेद। मूर्तिमंत धर्म प्रसिद्ध। मूर्तिमंत ब्रह्मचर्य शुद्ध। तपही विशद मूर्तिंमंत॥ २२०॥ गायत्री मूर्तिमंत तेथ। वाचा मूर्तिमंत वर्तत। दया मूर्तिमंत नांदत। योग मूर्तिमंत ब्रह्मसदनीं॥ २१॥ तेथ अग्नि तिनी मूर्तिंमंत। ते एकरूपें त्रिधा भासत। सत्य सत्यलोकीं मूर्तिमंत। असत्य तेथ असेना॥ २२॥ ते लोकीं वसते कोण लोक। जे गायत्रीमंत्रजापक। जे ब्राह्मणतीर्थप्राशक। जे याग उपासक निष्काम॥ २३॥ जे ब्राह्मणकार्यीं निमाले। जे गोसंरक्षणीं जीवें गेले। जे परोपकारार्थ वेंचले। ते पावले सत्यलोक॥ २४॥ जे निष्काम द्विजां भजले। जिंहीं निष्काम द्विज पूजिले। जिंहीं निष्काम द्विज भोजिले। ते पावले सत्यलोक॥ २५॥ जे कृपाळू दीनार्थ देख। जे कृपाळू बंधमोचक। जे सत्यवादी सात्त्विक। ते सत्यलोकनिवासी॥ २६॥ जे परापवादीं मूक। परदारानपुंसक। जे परद्रव्या पराङ्मुख। ते सत्यलोकनिवासी॥ २७॥ ऐसी सत्यलोकींची स्थिती। तेथींचा ब्रह्मा अधिपती। ब्रह्मसृष्टि याहीवरती। नाहीं निश्चितीं उद्धवा॥ २८॥ ब्रह्मांडाहूनि वेगळा। कैलास निर्माण करी भोळा। वैकुंठ रची घनसांवळा। हे लोक स्वलीळा निर्मित॥ २९॥ होतां ब्रह्मांडा घडामोडी। वैकुंठ कैलास न लगे वोढी। तेथील वस्तीची अभिनव गोडी। हरिहरभक्त फुडी जाणती॥ २३०॥ तेथ नाहीं काळाचें गमन। नाहीं कर्माचें कर्मबंधन। तेथ नाहीं जन्ममरण। हें भक्त अनन्य पावती॥ ३१॥ वैकुंठ कैलासरचना। सांगतां मन मुके मनपणा। ते लोकींची लोकलक्षणा। ऐक विचक्षणा सांगेन॥ ३२॥ सकळ ब्रह्मांडाबाहेरी। मायाआवरणाभीतरीं। वैकुंठ कैलास हरहरीं। स्वलीलेकरीं निर्मिजे॥ ३३॥ सकळ जीवां सुखकरू। कैलासीं वसे शंकरू। जो कां पार्वतीपरमेश्वरू। जो योगेश्वरू योगियां॥ ३४॥ जटाजूटी गंगाधर। पिनाकपाणी पंचवक्त्र। कर्पूरगौर गोक्षीर। अभयवरदकर निजभक्तां॥ ३५॥ त्रिमात्रातीत त्र्यंबक। त्रिपुटीत्रिपुर त्रिपुरांतक। त्रिविधताप उच्छेदक। तिनी लोक सुखकारी॥ ३६॥ नागभूषणीं शोभे लीला। रुद्राक्षयुक्त रुंडमाळा। नीळकंठ जाश्वनीळा। भस्मोद्धूलिधूसर॥ ३७॥ त्रिशूळडमरांकित कर। त्रिनेत्र व्याघ्राजिन अंबर। रामनामीं अतितत्पर। करी निरंतर जपमाळा॥ ३८॥ सहस्रबाहु बळिपुत्र बाण। शृंगी भृंगी चंडी पार्षद पूर्ण। साठी सहस्र रुद्रगण। का त्या त्रिशूळ जाण झेलती॥ ३९॥ गणेश स्वामिकार्तिक। नंदी पंचमुख षण्मुख। वीरभद्र सेनानायक। जेणें लाविली सीक दक्षासी॥ २४०॥ भूत प्रेत पिशाचक। महाप्रथम ज्याचें सैन्यक। अवघे शिवांकित देख। शिवनामघोष गर्जती॥ ४१॥ शंभु शिव शूली शंकर। उमाकांत कर्पूरगौर। भव भर्ग भवानीवर। कपर्दी ईश्वर महादेव॥ ४२॥ हरहर शंकर नामोच्चारीं। धाकें कळिकाळ पळे दूरी। शिवनामें गर्जे सदा गिरी। गिरीश राज्य करी ते ठायीं॥ ४३॥ जेथ शिवनामाचा उच्चार। तेथ सुखेंसीं तिष्ठे शंकर। भक्त कृपाळू ईश्वर। भोळा निरंतर भावार्थ्यां॥ ४४॥ निजदासांचे त्रिगुण वैरी। छेदावया सदा त्रिशूळ करीं। निजडमरूच्या गजरीं। पापाची उरी उरों नेदी॥ ४५॥ कैलासीं तृण तरु समस्त। पशु पक्षी जे जे तेथ। ते अवघेचि शिवांकित। सर्वरूपें समस्त शिवू नांदे॥ ४६॥ यापरी ब्रह्मांडा बाहेरी। शिवू स्वलीला निर्माण करी। नेमूनियां कैलासगिरि। भवू राज्य करी भवानीशीं॥ ४७॥ आतां वैकुंठींची स्थिती। ऐक सांगेन तुजप्रती। जे ऐकतां चित्तवृत्ती। स्वानंदस्फूर्ती वोसंडे॥ ४८॥ उंस गाळूनि काढिजे सार। त्याची आळूनि कीजे साकर। तिचेही नाना प्रकार। करिती नानाकार अतिकुशळ॥ ४९॥ तेवीं चैतन्यचि निश्चितें। मुसावूनि श्रीभगवंतें। वैकुंठ रचिलें तेथें। निजसामर्थ्यें नांदावया॥ २५०॥ स्वलीला सगुण साकार। सुकुमार अतिसुंदर। घनश्याम मनोहर। मूर्ति चिन्मात्र चोखडी॥ ५१॥ शंख चक्र पद्म गदा। चारी भुजा सायुधा। डोळे लांचावले आनंदा। सगुण गोविंदा देखोनी॥ ५२॥ मुकुट कुंडलें मेखळा। कांसे पिंवळा सोनसळा। कौस्तुभ झळके गळां। आपाद वनमाळा शोभत॥ ५३॥ चरणींची गंगा अतिपुनीत। जे जगातें पवित्र करीत। ते माथां वाहे उमाकांत। निजस्वार्थ देखोनी॥ ५४॥ त्या श्रीहरीचें पदद्वंद्व। वानितां मुका झाला वेद। अगम्य हरीचें निजपद। महिमा अगाधश्रीहरिचरणीं॥ ५५॥ पाहतां मुकुंदाचें श्रीमुख। फिकें झालें जी पीयूख। डोळॺां झालें परम सुख। धन्य श्रीमुख हरीचें॥ ५६॥ ज्याचें निमेषार्ध देखिल्या मुख। हारपे कोटि जन्मांचें दु:ख। त्रिलोकीं न माय हरिख। धन्य श्रीमुख हरीचें॥ ५७॥ ज्याचा देखिलिया वदनेंदू। बाधूं न शके द्वंद्वबाधू। चढता वाढता परमानंदू। स्वानंदकंदू जगाचा॥ ५८॥ जयाची विक्षेपभ्रुकुटी। रची ब्रह्मांडें उठाउठी। ज्याचे रोमकूपीं ब्रह्मांडें कोटी। तो हरि वैकुंठीं नांदत॥ ५९॥ ज्याची झालिया कृपादृष्टी। अहंकाराची विरे गांठी। दुसरें दिसों नेदी सृष्टीं। तो हरि वैकुंठीं नांदत॥ २६०॥ जया दादुल्याचें नाम। निर्दाळी गा मरणजन्म। समूळ उपडी कर्माकर्म। तो पुरुषोत्तम नांदत॥ ६१॥ ते वैकुंठीं पाहतां साचार। अवघे चतुर्भुज नर। घनश्याम पीतांबरधर। शंख चक्र अवघ्यांसी॥ ६२॥ अवघ्यांचें एक स्वरूप। अवघे दिसती एकरूप। जेथ हरि नांदे स्वयें सद्रूप। तेथ कोणी कुरूप दिसेना॥ ६३॥ तेथ नाहीं आधी व्याधी। नाहीं विषयवार्ता उपाधी। स्त्रीपुरुषां समान बुद्धी। जाण त्रिशुद्धी उद्धवा॥ ६४॥ तेथ नाहीं तहानभूक। नाहीं कामक्रोध द्वंद्वदु:ख। नाहीं जन्ममरण नि:शेख। ऐसा वैकुंठलोक नांदत॥ ६५॥ लक्ष्मीनें करावें अवलोकन। यालागीं कष्टती सुरगण। ते लक्ष्मी अंगें आपण। करी संमार्जन वैकुंठीं॥ ६६॥ ते वैकुंठीं जगन्नाथ। उद्धरावया निजभक्त। स्वलीला असे नांदत। दीन कृपायुक्त दयाळू॥ ६७॥ अंतीं नाममात्र घेतल्यासाठीं। उद्धरल्या जीवकोटी। तो स्वामी श्रीविष्णु वैकुंठीं। दीन कृपादृष्टी नांदत॥ ६८॥ जैसा ज्यासी भावार्थ। तैसा पुरवी मनोरथ। पढिये पंचम पुरुषार्थ। तो हरि नांदत वैकुंठीं॥ ६९॥ लोकलोकांतर गणना। ब्रह्मांडसंख्या अवघी जाणा। वैकुंठ कैलासरचना। समूळ विवंचना सांगीतली॥ २७०॥ लोक सांगीतले भिन्न भिन्न। तेथील प्राप्तीचे कोण जन। ऐसें कल्पील तुझें मन। ते अर्थीं निरूपण अवधारीं॥ ७१॥ महर्जनतप:सत्यलोक। वैकुंठरचना अलोलिक। तेथील प्राप्तीचे कोण लोक। ते यदुनायक सांगत॥ ७२॥
योगस्य तपसश्चैव न्यासस्य गतयोऽमला:।
महर्जनस्तप: सत्यं भक्तियोगस्य मद्गति:॥ १४॥
निश्चळ करावया निजचित्ता। साधिली प्राणापानसमता। षट्चक्रें भेदूनि तत्त्वतां। पुढेंनिजात्मता पावावी॥ ७३॥ तंव आयुष्या झालें अस्तमान। निजांगीं आदळे मरण। ऐसे निमाले जे योगीजन। त्यांसी ऊर्ध्व गमन महर्जनादि लोकीं॥ ७४॥ जो गृहस्थाश्रमी ब्रह्मचारी। ब्रह्मचर्य नेमें व्रतधारी। जो स्वप्नींहीं नातळे नारी। जो भिक्षाहारी सर्वदा॥ ७५॥ जो सदा धडधडीत विरक्ती। एक भिक्षा न धरी हातीं। सद्गुरूचिया सेवा करिती। आत्मज्ञानप्राप्ती पावावया॥ ७६॥ जे संधीं व्हावें आत्मज्ञान। ते संधीसी आलें मरण। ऐशा ब्रह्मचारियासी जाण। ऊर्ध्व गमन महर्जनादि लोकीं॥ ७७॥ जे गृहस्थाश्रमीं नेटक। जे अग्निसेवे साग्निक। जे स्वधर्में चित्तशोधक। जे सेवक द्विजदेवां॥ ७८॥ जे भूतदयाळू भाविक। जे सत्यवादी सात्त्विक। जे निजात्मज्ञानसाधक। जे अवंचक गुरुभजनीं॥ ७९॥ गुरुकृपा साधूनि ज्ञान। पावावें ब्रह्म सनातन। तंव वेंचलें आयुष्यधन। अंगीं निधन आदळलें॥ २८०॥ तेणें खोळंबली ब्रह्मप्राप्ती। परी ऊर्ध्वलोकीं होय गती। जैसी उपासना विरक्ती। तेणें तारतम्यें जाती महर्जनादि लोकीं॥ ८१॥ जे वनवासी वानप्रस्थ। जे वैराग्यें अतिविरक्त। जे कंदमूळफळीं तृप्त। जे सदा नेमस्त आश्रमधर्मीं॥ ८२॥ वर्षाकाळीं आसारीं राहे। हेमंतीं जळाशयें। उष्णकाळीं पंचाग्नि साहे। तपश्चर्या वाहे अतिनिष्ठा॥ ८३॥ शरीरशोषणाचें पाहें। सर्वथा न घरी भये। स्वार्थाचेनि लवलाहें। तपोनिष्ठा साहे दारुण॥ ८४॥ वैराग्य साधूनि पूर्ण। करावें संन्यासग्रहण। साधावया ब्रह्मज्ञान। तेचि काळीं मरण वोढवलें॥ ८५॥ ऐसेनि देहांतस्थिती। त्यासी ऊर्ध्वलोकीं होय गती। महर्जनतपोलोकप्राप्ती। तारतम्यस्थिती उपासना॥ ८६॥ जो समूळसंकल्पसंन्यासी। लोकलोकांतर न घडे त्यासी। हें न टकेचि गा जयासी। आणि झाले संन्यासी विधियुक्त॥ ८७॥ जे कां पोटींहून अतिविरक्त। स्वप्नीं धातूंसी न लाविती हात। जे यतिधर्मीं सदा निरत। जे सदा जपत प्रणवातें॥ ८८॥ अंगीकारिले आश्रमविधी। उबगू न मानी जो त्रिशुद्धी। मरणीं डंडळीना बुद्धी। त्या गमनसिद्धी सत्यलोकीं॥ ८९॥ ऐसे सत्यलोकातें पावती। तेथिल्या भोगांची ज्यां विरक्ती। ते ब्रह्म्यासवें मुक्त होती। येर ते येती माघारे॥ २९०॥ ज्यांसी सत्यलोकीं भोगासक्ती। तेही खचोनि माघारे येती। इतर लोकांची कोण गती। पुनरावृत्ती सोडीना॥ ९१॥ जेथवरी भोगासक्ती। तेथवरी पुनरावृत्ती। जेथ भोगाची निवृत्ती। तेथ चारी मुक्ती आंदण्या॥ ९२॥ ज्या लोकीं ज्या भोगविरक्ती। तेथून ते पुढारे जाती। जे लोकीं ज्या भोगासक्ती। ते खचोनि पडती भूलोकीं॥ ९३॥ तैसी नव्हे माझी भक्ती। भक्तां नाहीं इतर प्राप्ती। मद्भक्तां माझी गती। जाण निश्चितीं उद्धवा॥ ९४॥ जे सकाम माझी सेवा करिती। त्यांसी कामनाफळीं पडे वस्ती। ज्यांसी निष्काम माझी भक्ती। त्यांसी माझी प्राप्ती अनन्य॥ ९५॥ सकाम भक्तांचे पुरवूनि काम। त्यांसी मी करीं नित्य निष्काम। निजभक्तांसी निजधाम। मी पुरुषोत्तम पाववीं॥ ९६॥ यालागीं गोपींची कामासक्ती। म्यांचि आणूनि निष्कामस्थिती। त्यांसी दिधली सायुज्यमुक्ती। जाण निश्चितीं उद्धवा॥ ९७॥ म्यां गोपिकांसी कामू केला। कीं नि:शेष कामू त्यांचा हरिला। न विचारितां या बोला। कृष्ण व्यभिचारला मूर्ख म्हणती॥ ९८॥ सलोकता आवडे भक्तांसी। तैं मी करीं वैकुंठवासी। भक्त मागे समीपतेसी। करीं मी तयासी जिवलग॥ ९९॥ हितगुज आळोंच्यासी। हृदयींचें गोड सांगावयासी। उद्धवा तूं जैसा आवडसी। ऐशीच त्यांसीं करीं प्रीति॥ ३००॥ भक्तमागे सरूपता। त्यासी मी दें चतुर्भुजता। शंखचक्रादि सायुधता। घनश्यामता सुरेख॥ १॥ मुकुट कुंडलें मेखळा। कांसे मिरवे सोनसळा। वांकी तोडरू चरणकमळा। कौस्तुभ गळां मत्सम॥ २॥ ठाणमाण गुणलक्षण। वीर्य शौर्य गांभीर्य पूर्ण। रूप रेखा समसमान। दोघेही अनन्य सरूपता॥ ३॥ रमा दोघांसी एकत्र देखे। देवो कोण हें ते नोळखे। पार्षदक्रिया ठकली ठाके। कोणासी सेवकें सेवावें॥ ४॥ छत्रधरू चवके चित्तीं। कोणावरी धरूं छत्री। चवरधरें चवरें हातीं। कोणाप्रती विंजावें॥ ५॥ नमना येती ब्रह्मादि देव। तेही मानिती अतिअपूर्व। दोंमाजीं कोण आदिदेव। त्यांसीही स्वयमेव कळेना॥ ६॥ जेवीं दीपें दीपू लाविला। न कळे वडील कोण धाकुला। तेवीं माझी सरूपता पावला। न वचे ओळखिला आनासी॥ ७॥ जेवीं आरिशाचें प्रतिबिंब। दिसे समरूपें स्वयंभ। तैशी सरूपतेची शोभ। सम विडंब दोहींचा॥ ८॥ देवो होऊनियां प्रसन्न। आपली सरूपता दे संपूर्ण। नेदी हृदयींचा द्विजचरण। श्रीवत्सलांछन अविनाशी॥ ९॥ श्रीवत्स चिन्ह द्यावयासी पाहीं। विष्णु म्हणे मज सामर्थ्य नाहीं। तें असे ब्राह्मणाच्या पायीं। त्याचा चरण हृदयीं धरिल्या लाभे॥ ३१०॥ सरूपतेमाजीं जाण। देवा-भक्तांची हे खूण। ज्याचे हृदयीं श्रीवत्सलांछन। तो स्वामी श्रीविष्णु जाण सर्वांचा॥ ११॥ ऐशी सरूपता जरी झाली प्राप्त। तरी हा देवो मी एक भक्त। हा भिन्नत्वाचा भेद किंचिंत्। त्याआंत उरला असे॥ १२॥ देवभक्तांमाजीं भेदू। भिन्न सरूपतासंवादू। जंव नाहीं अद्वयबोधू। तंव परमानंदू प्रकटेना॥ १३॥ सांडूनि भिन्न भेदवार्ता। भक्त मागे सायुज्यता। ते गोड निरूपणकथा। तेथील स्वादता मी जाणें॥ १४॥ सायुज्याचें गोडपण। माझें मी जाणें आपण। उद्धवा तुज तेंही जाण। सांग संपूर्ण सांगेन॥ १५॥ देह सरूपता सारिखेपण। हृदयीं भिन्न मीतूंपण। ऐशियेही मुक्तीसी जाण। भक्त सज्ञान नातळती॥ १६॥ मी होऊनियां मातें। भजन स्वत:सिद्ध आइतें। तें सांडूनियां भेदातें। निजभक्त चित्तें नातळती॥ १७॥ देवेंसीं भक्त अनादिसिद्ध। ठायीं मूळींहून अभेद। तेथ दाटूनि जो धरी भेद। तो भक्तिमंद मायिक॥ १८॥ आर्त जिज्ञासु आणि अर्थार्थी। हे भेद केले मायिका भक्ती। जे अभेदभावें मज भजती। सायुज्यमुक्ती तयांसी॥ १९॥ ज्यांसी रावो रंक समान। वंद्य निंद्य न मनी मन। जे न धरिती देहाभिमान। सायुज्य जाण तयांसी॥ ३२०॥ जैशी आपुली साउली। मिथ्या आपणासवें लागली। तैशी देहबुद्धि ज्यांसीझाली। त्यांसी फावली सायुज्यता॥ २१॥ जन्मूनि छाया सरिसी वाढे। माझी हे ममता नुठी पुढें। ऐसें देहाचें न बाधी सांकडें। सायुज्य रोकडें तयासी॥ २२॥ सांडूनि देहाची विषयासक्ती। जो करी भावें अभेदभक्ती। त्यासीचि सायुज्यमुक्ती। जाण निश्चितीं उद्धवा॥ २३॥ ज्यासी देहीं नुठी मीपण। भूतमात्रीं न देखे तूंपण। त्यासी सायुज्यमुक्ति जाण। सांग संपूर्ण सांपडे॥ २४॥ जेवढी मज आत्म्याची व्यक्ती। तेवढीच त्याची प्रतीती। त्यासीच सायुज्यता मुक्ती। सहज आपैती उद्धवा॥ २५॥ त्यासी विष्णुस्वरूप व्हावा देहो। हा सर्वथा नुपजे अहंभावो। त्यासी विष्णुसगट स्वदेह वावो। यालागीं सारूप्य पहा हो वांछीना॥ २६॥ निजविवेकें पाहतां ठायीं। देहो तितुका मिथ्या पाहीं। तेथ सारूप्यता कोणें ठायीं। सज्ञानीं कायी मागावी॥ २७॥ सायुज्यता आलिया हाता। वस्तूवीण ठावो नाहीं रिता। सकळ भूतीं एकात्मता। सायुज्य तत्त्वतां या नांव॥ २८॥ सकळ रूपें नांदतें जग। तें जो जाणे आपुलें अंग। आपण सर्वात्मा अभंग। त्यासीच साङ्ग सायुज्य॥ २९॥ मी एक सबाह्याभ्यंतरीं। मी एक जंगमीं स्थावरीं। मीचि आत्मा चराचरीं। जाण त्याचे घरीं सायुज्य नांदे॥ ३३०॥ मीचि एक एकला। एकपणेंचि संचला। ज्यासी द्वैताचा दुष्काळ पडिला। सत्यपावला सायुज्य॥ ३१॥ एवं भावार्थाच्या अतिप्रीतीं। जें जें निजभक्त वांछिती। तें तें मी पुरवींश्रीपती। चारी मुक्ती भक्तांसी॥ ३२॥ यावेगळे माझे प्रिय भक्त। भक्तिप्रतापें प्रतापवंत। भजनशौर्य अतिअद्भुत। निष्काम निरत मद्भजनीं॥ ३३॥ आर्त जिज्ञासु अर्थार्थी। या कल्पना न धरोनि हातीं। नित्य निष्काम अतिप्रीतीं। मज भजती महाभाग॥ ३४॥ नेघती सालोक्य सामीप्य सरूपता। शेखीं न मागती सायुज्यता। निष्काम भजती भगवंता। भक्ति तत्त्वतां या नांव॥ ३५॥ नवल भजनाची परवडी। आवडीतें प्रसवे आवडी। क्षणोक्षण चढोवढी। नित्य नूतन गोडी प्रेमाची॥ ३६॥ माझिया आवडीं तत्त्वतां। सर्वस्वें वेंचित जीविता। कदा पालट नव्हे चित्ता। भावार्थतां विश्वासी॥ ३७॥ मीच एक देवाधिदेवो। सर्वभूतीं माझाचि भावो। विकल्प विकृति संदेहो। घालितां पहा हो उपजेना॥ ३८॥ नवल भावार्थाची थोरी। मद्भावें देखे नरनारी। श्वानसूकरादि आकारीं। नमस्कारी मद्भावें॥ ३९॥ नवल त्याची भजनख्याती। सायुज्यादि चारी मुक्ती। माझ्या नांवावरूनि ओंवाळिती। भक्ति पढियंती येणें पाडें॥ ३४०॥ मांडल्या अतिविघ्न सांकडें। ग्लानी न करिती आणिकांकडे। जाणती रामनामापुढें। विघ्न बापुडें ते कायी॥ ४१॥ गगन पडों पाहे कडाडें। पृथ्वी उलथावया गडबडे। ऐसें मांडलिया सांकडें। नाम पढे श्रीहरीचें॥ ४२॥ ऐशी देखोनि अनन्य प्रीती। मी सर्वस्वें भुललों श्रीपती। मग न पाहतां कुळ जाती। त्याच्या घराप्रती मी धांवें॥ ४३॥ ते न घेती वैकुंठींची वाट। त्यांचें घरचि मी करीं वैकुंठ। तेथें चिन्मात्रें फुटे पाहांट। पिके पेंठ संतांची॥ ४४॥ उपनिषदें येती तयांपाशीं। स्वधर्म ये सुखवस्तीसी। नारदादि सनकादिकांसी। तया घरासी अतिप्रीती॥ ४५॥ गर्जती नामाचे पवाडे। माझी कीर्ति गाती वाडेंकोडें। माझ्या रामनामापुढें। द्वंद्वाचें उडे बाधकत्व॥ ४६॥ ऐशी देखोनि माझी भक्ती। वोरसोनियां निजशांती। धांवोनि ये तयांप्रती। वोळली मागुती जावों विसरे॥ ४७॥ त्यांसी छळों ये जें जें दूषण। तें तें त्यांसी होय भूषण। माझे भक्तीचें प्रसन्नपण। जाण संपूर्ण या नांव॥ ४८॥ तेथ सायुज्यादि चारी मुक्ती। त्यांचे सेवेसी स्वयें येती। ते जेथ विषय सेवूं जाती। तेथ सायुज्यमुक्ती सेवा करी॥ ४९॥ ऋद्धिसिद्धि त्याच्या घरीं। होऊनि राहती कामारी। तरी तो सिद्धींची चाड न धरी। माझे भक्तीवरी निश्चयो॥ ३५०॥ ऐशी देखोनि निश्चयें भक्ती। मीही करीं अनन्य प्रीती। भक्त जेउती वास पाहती। तेउता मी श्रीपती स्वयें प्रकटें॥ ५१॥ भक्त स्वभावें बोलों जाये। त्याचें बोलणें मीचि होयें। त्याचे बोलण्या सबाह्यें। मीचि राहें शब्दार्थें॥ ५२॥ तो कौतुकें खेळे खडे। ते खडेचि मज होणें घडे। तो कृपाळु पाहे जयाकडे। त्याचे छेदीं मी गाढे भवबंध॥ ५३॥ तो वास पाहे जेणें मोहरी। तेउती मी सुखाची सृष्टी करीं। तो म्हणे जयातें उद्धरीं। तो मी स्वपदावरी बैसवीं॥ ५४॥ त्यासी अल्पही विचंबू पावे। तो सर्वांगें मी करूं धांवें। त्याचेंनाम जिंहीं स्मरावें। त्यांसी म्यां तारावें सर्वथा॥ ५५॥ जेवीं तान्हयालागीं माता। तेवीं भक्तांची मज चिंता। त्यांची सेवाही करितां। मी सर्वथा लाजेंना॥ ५६॥ माता बाळकाचें पुरवी कोड। तैसे ते माझे लळेवाड। त्यांचें प्रेमचि मज गोड। उपचार चाड मज नाहीं॥ ५७॥ मी शरीर तो माझा आत्मा। प्रेमळ असे पढिया आम्हां। प्रेमळावरती सीमा। भक्तीचा महिमा चढेना॥ ५८॥ त्यासी झणें काळ संहारी। यालागीं त्या आंतबाहेरी। मी निजांगाचें दुर्ग करीं। ऐशी प्रीति पुरी प्रेमळाची॥ ५९॥ तेथ काळाचेनि हटतटें। लावूनि ब्रह्मस्थितीचे वाटे। माझे भक्त नेटेंपाटें। आपणिया आंतवटें स्वसुखें वसवीं॥ ३६०॥ त्याचें स्वाभाविक कर्म जाण। तें माझे प्रीतीचें पूजन। तो देखे तें माझें दर्शन। त्याची चावटी तें स्तवन खुणेचें माझें॥ ६१॥ तो स्वयें करी आरोगण। तेंचि मज नैवेद्य अर्पण। त्याची निद्रा ते जाण। समाधि संपूर्ण पैं माझी॥ ६२॥ त्याचा निमेषोन्मेषांचा व्यापार। तो मजअत्यंत प्रियकर। त्याचे श्वासाचे परिवार। मज अपार सुखविती॥ ६३॥ भक्तांची शरीर स्वभावस्थिती। तेणें मी सुखावें श्रीपती। ऐसे सप्रेम भक्त आवडती। माझी अनन्यप्रीती मद्भक्तां॥ ६४॥ चारी पुरुषार्थां नातळती। उपेक्षूनि चारी मुक्ती। सप्रेम करिती माझी भक्ती। मजचि पावती मद्भक्त॥ ६५॥ गंगा सागरीं मीनली मिळे। मीनली त्याचीच त्यावरी लोळे। तैसा भक्त मिळोनि भावबळें। माझे भक्तीचे सोहळे मजमाजीं भोगी॥ ६६॥ जेवीं कां भरें तरुणांगी। तरुणपण भोगी सर्वांगीं। तेवींभक्त मिळोनि मजलागीं। माझे भक्तीचें भोगी वैभव॥ ६७॥ कां सतरावीचें गोडपण। चंद्र जाणे आपुलें आपण। तेवीं मी होऊनि माझें भजन। भक्त सज्ञान जाणती॥ ६८॥ जातिस्वभावें उदक एक। तेंचि गंगा यमुना नांवीं देख। प्रयागसंगमीं उद्धरी लोक। तेवीं भक्त भाविक मद्योगें॥ ६९॥ तेवीं माझे भक्त मज मिळून। अनन्य करिती माझे भजन। येथ भाविक सात्त्विक अतिदीन। उद्धरती जाण मद्योगें॥ ३७०॥ पृथ्वी निधानें भरली आहे। परी पायाळेंवीण प्राप्ति नोहे। तेवीं आत्मा स्वत:सिद्ध आहे। गुरुकृपा लाहे तैं प्राप्ती॥ ७१॥ चहूं पुरुषार्थातें त्यागिती। चारी मुक्ति उपेक्षिती। पंचम पुरुषार्थाची भक्ती। मज पढियंती उद्धवा॥ ७२॥ येचि भक्तीचें मज कोड। हेचि भक्त माझे लळेवाड। मज अवाप्तकामा त्यांची चाड। ऐसें प्रेम गोड तयांचें॥ ७३॥ आम्ही प्रेमाचे पाहुणे। भावार्थाचे आंदणे। म्यां अनन्याची सेवा करणें। जीवेंप्राणें सर्वस्वें॥ ७४॥ माझें नाम आत्माराम। मी अवाप्तसकळकाम। परी प्रेमळांलागीं सकाम। ऐसें गोड प्रेम तयांचें॥ ७५॥ मग आपुलिये संवसाटीं। प्रेमळू घें मी उठाउठी। वरीव सुखही दें शेवटीं। मज प्रीति मोठी प्रेमाची॥ ७६॥ प्रेम मजसीं मोलें अधिक। संवसाटी करितां नव्हे देख। यालागीं वरीव देतां सुख। न ये तैं सेवक सेलेचा होय॥ ७७॥ प्रेमाचा जिव्हाळा पूर्ण। भावार्थाची उणखूण। जाणता मी एक श्रीकृष्ण। इतरांसी जाण कळेना॥ ७८॥ मज गोपिकांची कोण गोडी। त्यांच्या प्रेमाची जाति चोखडी। यालागीं मज त्यांची आवडी। अतिगाढी उद्धवा॥ ७९॥ कुब्जा काय सुंदर होती। तिच्या प्रेमाची मज प्रीती। राधा प्रार्थीं मी वनाप्रती। काय विषयासक्तीलागूनी॥ ३८०॥ कोण भक्ती केली गोपाळीं। काय तीं सोंवळीं कीं ओंवळीं। त्यांचे उच्छिष्ट कवळ मी गिळीं। प्रेमसंमेळीं डुल्लत॥ ८१॥ पांडवांच्याबाचें मी काय लागें। त्यांचीं वेवटें सोशीं अनेगें। मी सुदाम्याच्या पायां लागें। काय त्याचेनि पांगें पांगलों॥ ८२॥ मी काय अन्नासी दुकाळलों। तो यज्ञपत्न्यांसीं मागों गेलों। मी भावार्थाचा भुकेलों। प्रेमाच्या पावलों पाहुणेरा॥ ८३॥ माझी काय क्षीण झाली शक्ति। मज गोपिका दावीं बांधिती। त्यांच्या निजप्रेमाची जाती। मी स्वयें श्रीपती पोखितू॥ ८४॥ मी न लागतां कोणाची कवडी। अर्जुनाचीं धूतसे घोडीं। धर्माघरीं उच्छिष्टें काढीं। मज अतिआवडी प्रेमाची॥ ८५॥ मज प्रेमळांची अतिआवडी। ते लोकेषणा लाज दवडी। महत्त्वाच्या विसरवी कोडी। त्यांच्या सेवेची जोडी मजलागीं॥ ८६॥ सकळ अळंकार लेऊनि माता। निजपुत्र मस्तकीं लाडवितां। त्याच्या कंटाळेना थुंकमुता। तेवीं प्रेमळें सर्वथा मजलागीं॥ ८७॥ ऐसा प्रेमाचेनि अतिपांगें। म्यां पंगिस्त होईजे श्रीरंगें। यालागीं तया पुढेंमागें। सदा सर्वांगें तिष्ठत॥ ८८॥ उद्धवा यादव समस्त। असतां माझें बहुत गोत। तूंचि प्रियकर मज जो येथ। माझें प्रेम अद्भुत तुजलागीं॥ ८९॥ हे ऐकोनि देवाची गोठी। उद्धवें पायीं घातली मिठी। देवो सुखावोनि पोटीं। उठाउठी आलिंगी॥ ३९०॥ हृदयीं हृदय जाले संलग्न। देहीं देहा पडिलें आलिंगन। मनेंसीं एक झालें मन। स्वानंद पूर्ण वोसंडे॥ ९१॥ देवोविसरला देवपण। भक्ता नाठवे भक्तपण। दोघांचें उडालें दोनीपण। स्वानंदीं पूर्ण बुडाले॥ ९२॥ सेव्यसेवकता ठेली गोठी। द्वैतभावाची खुंटली दृष्टी। भक्तिसाम्राज्याच्या पाटीं। दोघां झाली भेटी निजात्मता॥ ९३॥ स्थूळ लिंग आणि कारण। इंहीं उपलक्षिजे महाकारण। ते देहचतुष्टयाची आठवण। आठवितें कोण ते ठायीं॥ ९४॥ तेथ निबिड आणि निघोट। सुखस्वरूप घनदाट। नाहीं आदि मध्य शेवट। तें झालें प्रकट स्वयंभ॥ ९५॥ नवल देवाचें पूर्णपण। तेथही लाघव केलें जाण। मोडों नेदीचि उद्धवपण। ऐसा भक्त आन मज मिळेना॥ ९६॥ उद्धवाऐसा मजपाशीं। कोण मिळेल आळोंचासी। माझें निजगोड कोणापाशीं। म्यां सावकाशीं सांगावें॥ ९७॥ मज निजधामा गेलिया जाण। माझें जें नि:सीम निजज्ञान। त्यासी उद्धव शुद्ध सांठवण। यालागीं उद्धवपण राखिलें॥ ९८॥ उद्धव स्वानंदीं निमग्न। त्यासी थापटूनि आपण। सावध करी श्रीकृष्ण। येरा भक्तपण आठवलें॥ ९९॥ म्हणे जय जय श्रीकृष्णनाथा। जें मज सुख दाविलें आतां। तें नित्य निर्वाहे सर्वथा। ऐशी कृपा तत्त्वतां करावी॥ ४००॥ तंव श्रीकृष्ण म्हणे उद्धवा। हा माझा निजगुह्य गोप्य ठेवा। तुज म्यां सांगीतला कणवा। पुरुषार्थ पांचवा या नांव॥ १॥ हें वेदशास्त्रां अगम्य। सकळ देवांसी अतिदुर्गम। जेणें लुब्धें मी पुरुषोत्तम। तें हें भक्त प्रेमरहस्य॥ २॥ मज वश्य करावयाचें वर्म। पोटीं धरावें भक्तिप्रेम। चहूं मुक्तींचा पडे भ्रम। पुरुषार्थकाम वोसरे॥ ३॥ ज्यासी माझी सप्रेम भक्ती। त्याचेनि नांवें विघ्नें पळती। मजवेगळी अन्यथा गती। करावया प्राप्ती कोणाची॥ ४॥ जयासी माझी अनन्य भक्ती। तेथ माझी पूर्ण कृपास्थिती। मद्भक्तां मज वेगळी गती। कदा कल्पांतीं असेना॥ ५॥ वेदविधीं करावा बाधू। तो नि:श्वसित माझा वेदू। जेथ माझा पूर्ण कृपाबोधू। तेथ विधिवादू बाधीना॥ ६॥ जे कां माझे भक्त सकाम। ते फळभोगांतीं होऊनि निष्काम। तेही ठाकिती माझें निजधाम। भक्तां अन्यगमन असेना॥ ७॥ ज्यासी माझें अनन्य भजन। स्वकर्म त्याचे सेवी चरण। विधिवेदू वोळंगे अंगण। त्यासी अन्यथागमन असेना॥ ८॥ जेथ सप्रेम नाहीं माझी भक्ती। तेथ कर्में अवश्य बाधती। कर्मास्तव अन्यथागती। अभक्त पावती उद्धवा॥ ९॥ जेथ माझी साचार भक्ती। तेथ कर्माची न चले गती। मद्भक्तां माझी प्राप्ती। सत्य निश्चितीं या हेतू॥ ४१०॥ भक्तांसी सर्वांभूतीं मद्भावो। तेथ कर्मबंधा कैंचा ठावो। कर्मानुगती खुंटली पहा हो। मत्प्राप्ति स्वयमेवो मद्भक्तां॥ ११॥ भक्त पाऊल ठेवी अवनीं। परी म्यां ठेविलें न धरी मनीं। कर्ता भगवंत सत्य मानी। यालागीं कर्मबंधनीं बांधवेना॥ १२॥ भक्तांस नाहीं अन्यथा गती। मद्भक्तांमाझी अनन्य प्रीती। त्या भक्तभावार्थाच्या युक्ती। विशद श्रीपती स्वयें केल्या॥ १३॥ ‘न मे भक्त: प्रणश्यति’। हें बोलिला अर्जुनाप्रती। तें साचार बिरुद श्रीपती। तो भक्तां अन्यगती घडोंचि नेदी॥ १४॥ भक्तशापाची ऐकतां गोठी। देवो कैवारें सवेग उठी। सुदर्शन लावूनि पाठी। केला हिंपुटी दुर्वासा॥ १५॥ एका अंबरीषाकारणें। दहा गर्भवास सोशिले जेणें। तो अनन्य भक्तांसी उणें। कोण्याही गुणें येवों नेदी॥ १६॥ भक्तकैवारी श्रीकृष्ण। हे भावार्थाची निजखूण। एका जनार्दना शरण। भावो प्रमाण भक्तीसी॥ १७॥ शुद्धभावेंवीण जे भक्ती। तेचि दांभिक जाण निश्चितीं। ते अपक्वचि राहे प्राप्ती। जेवीं कांकड जाती मुगांची॥ १८॥ ‘भक्तियोगस्य मद्गति:’। हे मूळपदींची पदस्थिती। तेंचि वाढविलें किती। ऐसें श्रोतीं न म्हणावें॥ १९॥ ‘मद्गती’ या पदाची व्युत्पत्ती। कोण आहे जाणे किती। हें रहस्य जाणे विरळा क्षितीं। यालागीं क्षमा श्रोतीं करावी॥ ४२०॥ हो कां भक्ति माझी निजजननी। ज्यां प्रेमपान्हां ये वाढवूनी। सरता केलों भगवद्भजनीं। ते म्यां गौण महिमेनीं वानिली॥ २१॥ भगवद्भक्तीचें महिमान। मी केवीं जाणें अज्ञान। जें बोलिलों तें सर्वथा गौण। क्षमा पूर्ण करावी॥ २२॥ भक्ति माझी निज माउली। ते मी आपुल्या बोबडे बोलीं। ग्रंथाधारें गौरविली। सप्रेम भुली भुलोनी॥ २३॥ प्रेमाची निजजाति कैशी। आठवों नेदी आठवणेसी। एवं विसरवूनि हेतूसी। भक्तिरहस्यासी बोलविलें॥ २४॥ जेवीं कां निजबाळकातें। माउली बोल बोलवी त्यातें। तेवीं भक्तीनें मज केलें येथें। म्यां चुकी कोणातें ठेवावी॥ २५॥ माउलीचें लोभाळूपण। प्रकट करी तो मूर्ख जाण। याहीपरी मी अज्ञान। चुकलेपण दिसताहे॥ २६॥ उडिदीं काळें जेथींच्या तेथें। तेवीं चुकलेपण माझें येथें। चुकीचि मानावीनिश्चितें। हेंही गुरुनाथें वारिलें॥ २७॥ चुकलेपणचि मानितां। मी हों पाहें कवि कर्ता। मीपण नावडे गुरुनाथा। तेणें तें तत्त्वतां सांडविलें॥ २८॥ साङ्ग झालिया कथाकथन। तेणें श्लाघें न घ्यावें मीपण। तंव गुरूंनीं दावूनि निजखूण। मीतूंपण उडविलें॥ २९॥ हेही बोल बोलता। मी नव्हें नव्हें गा सर्वथा। मी नव्हें कवि कर्ता। हें गुरूचें तत्त्वतां गुरु जाणे॥ ४३०॥ तंव श्रोते म्हणती चमत्कार। भक्तिसुखाचें सुखसार। भक्ति परमामृत सागर। उघड साचार तुवां केला॥ ३१॥ भागवत मुख्य भक्तिप्रधान। जें भक्तीचें सुख सनातन। तें करतळामळ करूनि जाण। तुवां परिपूर्ण दाविलें॥ ३२॥ तुवां हा थोर केला उपकार। तरावया स्त्रियादि शूद्र। जग व्हावया भजनतत्पर। भागवत निजसार काढिलें॥ ३३॥ भागवतींचें गुप्त पीयूख। तें त्वां प्रकटिलें भक्तिसुख। तेणें संत सुखावले देख। श्रोते सकळिक निवाले॥ ३४॥ तुज संतोषोनि श्रीपती। दीधली आपली निजभक्ती। यालागीं तुवां भक्तीची कीर्ती। यथार्थस्थितीं वर्णिली॥ ३५॥ तुझे भक्तीचा एकेक बोल। ब्रह्मसुखेंसीं सखोल। त्याहीमाजीं प्रेमाची वोल। येताति डोल चित्सुखें॥ ३६॥ तुज वाखाणितां निजभक्ती। प्रेमें वोसंडे चित्तवृत्ती। विसरोनियां ग्रंथस्फूर्ती। भक्तीची कीर्ती वानिशी॥ ३७॥ निजआवडी वाडेंकोडें। वानितां भक्तीचे पवाडे। तुज नाठवे मागेंपुढें। प्रेम गाढें जाणवलें॥ ३८॥ जंव जंव भक्तीचें निरूपण। अधिकाधिक वाढतां जाण। तंव तंव येतसे स्फुरण। तेथ कोण पुरे म्हणेल॥ ३९॥ जंव जंव निरूपणा वाढी। तंव तंव भक्तीची अधिक गोडी। तेणें श्रोत्यांचीही आवडी। चढोवढी वाढली॥ ४४०॥ करितां भक्तिसुखनिरूपण। श्रोते वक्ते लांचावले जाण। होतां अमृताचें आरोगण। पुरे कोण म्हणों शके॥ ४१॥ यापरी गा अतिप्रीतीं। वाढली निरूपणीं भक्ती। ते आवरूनियांस्फूर्ती। पुढील ग्रंथार्थीं प्रवर्तें॥ ४२॥ हें ऐकोनि संतवचन। केलें साष्टांग नमन। भली दीधली आठवण। येरवीं निरूपण नावरतें॥ ४३॥ ‘भक्तियोगस्य मद्गति:’। ये पदाची पदव्युत्पत्ती। निरूपिली भगवद्भक्ती। जेणें भगवत्प्राप्ती अतिसुलभ॥ ४४॥ हे न करितां भगवद्भक्ती। त्रिगुणगुणीं जीवपंक्ती। बांधिल्या संसारीं उन्मज्जती। तेही स्थिती हरि सांगे॥ ४५॥
मया कालात्मना धात्रा कर्मयुक्तमिदं जगत्।
गुणप्रवाह एतस्मिन्नुन्मज्जति निमज्जति॥ १५॥
मुख्य मूळीं मी जगाचा धरिता। स्रष्ट्ट मीचि स्रजिता। विष्णुरूपें मी प्रतिपाळिता। मीचि संहर्ता रुद्ररूपें॥ ४६॥ हे त्रिगुण काळाची काळसत्ता। तो मी निजकाळ तत्त्वतां। स्रजिता पाळिता संहर्ता। गुणावस्थाविभागें॥ ४७॥ जनांचें वासनाकर्म विचित्र। तेचि काळसत्ता निजसूत्र। तेणें रचिला संसार। चराचर गुणबद्ध॥ ४८॥ गुणकर्में स्वर्गा चढे। गुणकर्में नरकीं पडे। नाना योनींचें सांकडें। भोगणें घडे गुणकर्में॥ ४९॥ स्वर्ग भोगूनि वाडेंकोडें। महर्जनतपोलोकांपुढें। सत्यलोकवरी वरता चढे। उन्मज्जन घडे या नांव॥ ४५०॥ पशुपक्षिस्थावरांत। वृक्षपाषाणकृमित्व प्राप्त। महानरकीं अध:पात। निमज्जन एथ त्या नांव॥ ५१॥ उंचीं चढोनि नीचीं पडणें। भोगवी नाना जन्ममरणें। तें प्रकृतिपुरुषांचें साजणें। जीवबंधनें भोगवी॥ ५२॥
अणुर्बृहत्कृश: स्थूलो यो यो भाव: प्रसिध्यति।
सर्वोऽप्युभयसंयुक्त: प्रकृत्या पुरुषेण च॥ १६॥
अणु म्हणिजे अतिसूक्ष्म सान। बृहत् म्हणिजे विशाळ जाण। कृश म्हणिजे किरकोळपण। स्थूळ तें पूर्ण जडावयवीं॥ ५३॥ जें जें दृष्टिगोचर झालें। जें जें नांवरूपा आलें। तें तें उभय योगें केलें। जाण घडलें प्रकृतिपुरुषीं॥ ५४॥ जें उभययोगसंभव। जग ऐसें ज्याचें नांव। तें प्रकृतिपुरुष सावेव। तिसरा भाव असेना॥ ५५॥ या दोहींवेगळें निरवयव। जेथूनि या दोहींचा उद्भव। तेचिसद्वस्तु सर्वीं सर्व। देवाधिदेव सांगत॥ ५६॥
यस्तु यस्यादिरन्तश्च स वै मध्यं च तस्य सन्।
विकारो व्यवहारार्थो यथा तैजसपार्थिवा:॥ १७॥
प्रकृतिपुरुषेंसीं साकार। जें दिसताहे चराचर। त्यासी आद्यंतीं जें अनश्वर। तेंचि साचार मध्येंही॥ ५७॥ लेण्याआधीं कनक एक। लेण्याअंतीं तेंचि आवश्यक। मध्येंही लेणेंरूपें देख। भासे कनक अद्वितीय॥ ५८॥ न करितां मातीचें गोकुळ। पूर्वी मृत्तिकाचि केवळ। गोकुळ मोडल्या सकळ। उरे अविकळ मृत्तिका॥ ५९॥ तेचि गोकुळरूपें असतां। भासे मृत्तिकाचि तत्त्वतां। तेवीं आदिमध्यअवसानतां। भासे चित्सत्ता अनश्वर॥ ४६०॥ त्रिगुणगुणें सविकार। जें जग दिसताहे साकार। तें मायिक गा चराचर। जेवीं व्यवहार स्वप्नींचा॥ ६१॥ सकळ विकारांचें कारण। अंगें अविद्या आपण। ते विकारीं सत्यता स्थापितां जाण। आलें सत्यपण अविद्येसी॥ ६२॥ अविद्या आपुलेनि नांवें जाण। आपुलें नास्तिक्य सांगे आपण। हें वर्म जाणती सज्ञान। नेणोनि अज्ञान मानिती सत्य॥ ६३॥ अविद्या अविद्यकत्वें मिथ्या जाण। वस्तु वस्तुत्वें सदा संपन्न। येचि अर्थींचें निरूपण। स्वयें श्रीकृष्ण सांगत॥ ६४॥
यदुपादाय पूर्वस्तु भावो विकुरुतेऽपरम्।
आदिरन्तो यदा यस्य तत्सत्यमभिधीयते॥ १८॥
प्रकृतिअंगीकारें देख। वस्तूपासाव होती लोक। जेवीं निद्रायोगें एक। होय अनेकनिजस्वप्नीं॥ ६५॥ जेवीं तंतू पासाव कोटि पट। कोटि पटीं तंतु एकवट। पाहतां आदि मध्य शेवट। द्वैताचें बोट रिघेना॥ ६६॥ तेवीं वस्तूपासोनियां लोक। प्रकृतिपुरुषादि सकळिक। आदि-मध्य-अवसानीं एक। द्वैतवार्ता देख असेना॥ ६७॥ तंतु सत्य पट मायिक। वस्तु सत्य अविद्या लटिक। जें आदि-मध्य-अवसानीं एक। तें सत्य निष्टंक उद्धवा॥ ६८॥ जेवीं कां काष्ठाची बाहुली। काष्ठावयवें शोभे आली। तेवीं वस्तु वस्तुत्वें एकली। शोभा पावली जगत्वें॥ ६९॥ जेवीं कां एकलें देह देख। दिसे अवयवरूपीं अनेक। तेवीं वस्तु एकली एक। आभासे अनेकस्वरूपीं॥ ४७०॥ जेवीं कां जळीं क्रीडतां जळा। उपजवी तरंगांच्या माळा। तेवीं वस्तूचिया स्वलीळा। जगदादि मेळा प्रकाशे॥ ७१॥ तरंगा आदि-मध्य-अवसानीं। जेवीं पाणीपणें असे पाणी। तेवीं उत्पत्ति स्थिति-निदानीं। वस्तु वस्तूपणीं अनश्वर॥ ७२॥ ब्रह्म सत्य प्रपंच वावो। हा साधकां साधावया निर्वाहो। कार्यकारण अभिन्नभावो। देवाधिदेवो बोलिला॥ ७३॥ कार्य कारणीं अभिन्न। तैं ब्रह्मीं माया कैंची भिन्न। जगद्रूपें ब्रह्म परिपूर्ण अन्योपदेशें जाण दाविलें॥ ७४॥ ब्रह्म माया काळगती। यें तिन्हीं अनादि म्हणती। तेही न घडे उपपत्ती। येचि अर्थीं हरि बोले॥ ७५॥
प्रकृतिर्ह्यस्योपादानमाधार: पुरुष: पर:।
सतोऽभिव्यञ्जक: कालो ब्रह्म तत् त्रितयं त्वहम्॥ १९॥
ब्रह्मावेगळी माया। सर्वथा न ये आया। ते ब्रह्माधारें वाढोनियां। गुणकार्या वाढवी॥ ७६॥ मायानियंतें ब्रह्म आपण। यालागीं यासी पुरुषपण। पुरुषाची प्रिया माया पूर्ण। प्रकृति अभिधान या हेतू॥ ७७॥ ब्रह्माहून पुरुष भिन्न। हें सर्वथा मिथ्या वचन। ब्रह्म पुरुष नामाभिधान। एकासीचि जाण आलें असे॥ ७८॥ माया प्रकृति अभिधान। दोहीं नांवीं मायाचि पूर्ण। आविद्यक दावी कार्य भिन्न। अविद्या जाण या हेतू॥ ७९॥ माया ब्रह्मींची शक्ति जाण। तेही ब्रह्मेंसीं असे अभिन्न। वेगळी नव्हे अर्धक्षण। सदा सुलीन ब्रह्मेंसीं॥ ४८०॥ जेवीं शूरांची शौर्यशक्ति पूर्ण। शूरांहोनि नव्हे भिन्न। तेवीं ब्रह्मीं मायाशक्ति जाण। असे सुलीन सर्वदा॥ ८१॥ माया ब्रह्मीं असतां जाण। क्षोभेंवीण नव्हे सर्जन। माया क्षोभकू काळ पूर्ण। काळास्तव जन जन्मती॥ ८२॥ ब्रह्मींची सत्ता तो काळ जाण। प्रकृति क्षोभवूनि आपण। दावी उत्पत्ति स्थिति निदान। तो काळही अभिन्न ब्रह्मेंसीं॥ ८३॥ जेवीं रायाच्या राजपुत्रासी। राजाचि दमूं शके त्यासी। तेवीं झालें जें प्रकृतीचे कुशीं। तें निजसत्तेसी निर्दळी॥ ८४॥ विवेकदृष्टीं पाहतां जाण। काळ परमात्मा दोन्ही अभिन्न। प्रकृति पुरुष काळ जाण। तिहींसी एकपण या हेतू॥ ८५॥ ब्रह्ममाया-काळसंबंध। हे तिनी मूळींचि अभेद। दिसे जो व्यावहारिक भेद। तोही अबद्ध मिथ्यात्वें॥ ८६॥ वस्तु एकलीचि आपण। प्रकृति-पुरुष काळरूपें जाण। अखंडत्वें दावितां पूर्ण। तो मी श्रीकृष्ण परमात्मा॥ ८७॥ उत्पत्तीपूर्वीं मी ब्रह्म पूर्ण। उत्पत्तीचें मी ब्रह्म आदिकारण। स्थितिकाळीं मी ब्रह्मरूपें जाण। एकीं अनेकपण स्वयें दावीं॥ ८८॥ स्वलीला सृष्टीचे प्रांतीं जाण। प्रळयीं उरें मी ब्रह्म परिपूर्ण। तेचि अर्थींचें निरूपण। स्वयें श्रीकृष्ण सांगत॥ ८९॥
सर्ग: प्रवर्तते तावत्पौर्वापर्येण नित्यश:।
महान् गुणविसर्गार्थ: स्थित्यन्तो यावदीक्षणम्॥ २०॥
महान् म्हणिजे अतिथोरू। पितृपुत्रप्रवाहें संसारू। अनवच्छिन्न निरंतरू। अतिदुर्धरू वाढला॥ ४९०॥ अतिशयेंसीं दुर्धरू। कैसेनि वाढला संसारू। तेही अर्थींचा विचारू। शार्ङ्गधरू सांगत॥ ९१॥ विषयांचिये आसक्ती। वासनानिष्ठ झाली वृत्ती। ते देहात्मता अतिप्रीतीं। संसारस्थिती वाढवी॥ ९२॥ खवळला जो देहाभिमान। तो शुद्धासी लावी जीवपण। नाना योनीं जन्ममरण। विशेषें जाण वाढवी॥ ९३॥ ऐसेन अतिदुर्धरू। स्रष्टेन सृजिला संसारू। तो ब्रह्मायूपर्यंत स्थिरू। ब्रह्मप्रळयीं संहारू सृष्टीचा॥ ९४॥ एक नित्यप्रळयो लागला आहे। एक दैनंदिन प्रळयो पाहें। कर्मजन्य प्रळयो लाहे। एक तो होये अवांतर प्रळयो॥ ९५॥ सकळ प्रळयांच्या शिरीं। ब्रह्मप्रळयाची थोरी। तो सकळ सृष्टीतें संहारी। कांहीं संसारीं उरों नेदी॥ ९६॥ ब्रह्मप्रळयीं नाश सृष्टीसी। पुढती रचावया कल्पादीसी। उंच नीच नाना योनींसी। नव्या करावयासी कारण काय॥ ९७॥ ब्रह्मप्रळयीं सृष्टीचा ऱ्हासू। परी नि:शेष नव्हेचि नाशू। उरे वासना बीजविलासू। सुलीन रहिवासू अविद्येअंगीं॥ ९८॥ तेचि बीजें कल्पादि जाण। मीचि स्रष्ट्ट रूपें आपण। मज म्यां अनुग्रहूनि पूर्ण। सूक्ष्म कारण लक्षविलें॥ ९९॥ जेवीं वर्षाकाळीं नाना तृणें। वाढूनि शरत्काळीं होती पूर्णें। तींच उष्ण काळीं बीजकणें। होती सुलीनें पृथ्वीसी॥ ५००॥ सुलीन बीजें पूर्ण क्षितीं। परी तीं कोणा व्यक्ती न येती। तेवीं वासनाबीजें प्रळयांतीं। उरे अव्यक्तीं संसारू॥ १॥ जेवीं काळीं वरुषलेनि घनें। बीजें विरूढती सत्राणें। वाढती नाना जातींचीं तृणें। पूर्वलक्षणें यथास्थित॥ २॥ तेवीं उत्पत्तिकाळावरी। सूक्ष्मवासना बीजांकुरीं। नाना योनी चराचरीं। जंगमस्थावरीं जग वाढे॥ ३॥ ब्रह्मयाचे प्रळयाआंतू। नि:शेष सृष्टीचा नव्हे अंतू। यालागीं संसारीं अनंतू। वेदशास्त्रार्थू प्रतिपादी॥ ४॥ ऐसा संसार अनंतू। याचा नि:शेष होय अंतू। तेचि अर्थीं श्रीकृष्णनाथू। श्लोकींचा पदार्थू बोलिला॥ ५॥ ‘स्थित्यन्तो यावदीक्षणम्’। येणें पदें श्रीकृष्ण। अत्यंत प्रळयींचें लक्षण। सूत्रप्राय जाण बोलिला॥ ६॥ ‘ईक्षण’ या पदाचा अर्थ जाण। सद्गुरुकृपादृष्टि पूर्ण। तेंचि माझें कृपावलोकन। जेणें ब्रह्मज्ञान प्रकाशे॥ ७॥ पूर्ण प्रकाशल्या ब्रह्मज्ञान। संसार झाला नाहींच जाण। वस्तु वस्तुत्वें परिपूर्ण। मीतूंपण असेना॥ ८॥ तेथ ध्रुवमंडळाची ठेली मात। वैकुंठ कैलासा झाला प्रांत। शेषशायीचाही अंत। ब्रह्मज्ञानांत होऊं सरला॥ ९॥ हारपलें मीतूंपण। उडालें देव-भक्त भजन। बुडालें साकारतेचें भान। ब्रह्म सनातन सदोदित॥ ५१०॥ प्रपंच एक झाला होता। हे समूळ मिथ्या वार्ता। पुढें होईल मागुता। कदा कल्पांता घडेना॥ ११॥ हें अत्यंत प्रळयाचें लक्षण। भाग्येंवीण न पाविजे जाण। ज्यासी साचार सद्गुरुचरण। ते सभाग्य जन पावती॥ १२॥ अत्यंत प्रळयींची गती। न घडे गा समस्तांप्रती। हे परम निर्वाणगती। जाण निश्चितीं उद्धवा॥ १३॥ ज्याची अहंममता खुंटे। त्याची नि:शेष कल्पना तुटे। अत्यंत प्रळयो त्यासीच भेटे। नेटेंपाटें निजात्मता॥ १४॥ देह पडलिया प्रळयो घडे। हें बोलणेंसर्वथा कुडें। जितांचि हा प्रळयो जोडे। वाडेंकोडें निजनिष्ठा॥ १५॥ जितांचि हा प्रळयो जाण। येणें संसारबीजदहन। आतां ब्रह्मप्रळयलक्षण। ऐक संपूर्ण सांगेन॥ १६॥ ब्रह्मांड-प्रळयाचा अनुक्रम। तेथ अंतीं उरे पूर्ण ब्रह्म। हें उद्धवें जाणावया वर्म। पुरुषोत्तम बोलत॥ १७॥
विराण्मयाऽऽसाद्यमानो लोककल्पविकल्पक:।
पञ्चत्वाय विशेषाय कल्पते भुवनै: सह॥ २१॥
चतुर्दशभुवनेंसीं ब्रह्मांड। काळें कल्पिलें प्रचंड। तें स्थितिकाळीं पाळूनि अंड। अंतीं नाशाचें बंड आदरी काळू॥ १८॥ तो तूं काळ म्हणशी कोण। तरी काळात्मा मीचि जाण। तेणें काळें म्यां प्रळय ईक्षण। केलें जाण सृष्टीसी॥ १९॥ पंचभूतांचे भिन्न भाग। काळसत्ता राखिले विभाग। ते सत्ता म्यां आवरितां सांग। खवळे लगबग पंचत्वासी॥ ५२०॥ जैसा उत्पत्तीचा उपक्रमू। तैसाचि प्रळयाचा अनुक्रमू। भूतीं भूतलयो सुगमू। पुरुषोत्तमू सांगत॥ २१॥
अन्ने प्रलीयते मर्त्यमन्नं धानासु लीयते।
धाना भूमौ प्रलीयन्ते भूमिर्गन्धे प्रलीयते॥ २२॥
म्यां पाहिल्या प्रळयदृष्टीं। पडोनि ठाके अनावृष्टी। तेणें अन्न क्षीण होय सृष्टीं। अन्नापाठींशरीर॥ २२॥ येथ असे ‘अन्नमय प्राण’। हें वचन प्रत्यक्ष प्रमाण। ते अन्न होतांचि क्षीण। अन्नासवें प्राण प्राण्यांचे जाती॥ २३॥ अन्नवृद्धि खुंटल्या धान्य। बीजमात्र राहे आपण। तेंही पृथ्वीसी होय लीन। तत्काळ जाण उद्धवा॥ २४॥ तंव द्वादशादित्यमेळा। एकत्र होय रविमंडळा। तो पीठ करी पर्वतशिळा। तेही तृणसाळा उरों नेदी॥ २५॥ तेणें तापलें सप्तपाताळ। पोळलें शेषाचें कपाळ। तो वमी विषाग्निकल्लोळ। महाज्वाळ धडधडीत॥ २६॥ तो संकर्षण मुखानळ। पार्थिव जाळी सकळ। ब्रह्मांड जाळोनि तत्काळ। पृथ्वी केवळ भस्म करी॥ २७॥ तेव्हां पृथ्वीचें पृथ्वीपण सरे। तें गंधमात्रस्वरूपें उरे। तोही गंधू जळीं विरे। तेंचि शार्ङ्गधरें सांगिजे॥ २८॥
अप्सु प्रलीयते गन्ध आपश्च स्वगुणे रसे।
लीयते ज्योतिषि रसो ज्योती रूपे प्रलीयते॥ २३॥
तेव्हां प्रळयमेघांचा मेळा। शुंडादंडधारा प्रबळा। शत वरुषें वर्षतां जळा। सप्तसमुद्रमेळा एकत्र जाहला॥ २९॥ तेणें जळ कोंडलें सुबद्ध। ते जळीं पृथ्वीचा विरे गंध। तेव्हां जळचि एकवद। प्रळयीं प्रसिद्ध उधवलें पैं॥ ५३०॥ सांवर्तक मेघांचें लक्षण। सिंधु एकत्र करिती पूर्ण। पृथ्वी विरवूनियां जाण। ते जळीं आपण विरोनि जाती॥ ३१॥ ते काळीं अतिदुर्धर। सांवर्ताग्नि खवळे थोर। तो जळ शोषी सर्वत्र। उरे रसमात्र अवशेष॥ ३२॥ रसमात्र जळ उरे तेंही। लीन होय तेजाचे ठायीं। तेव्हां तेजचि दिशा दाही। कोंदोनि पाहीं वोसंडे॥ ३३॥ सांवर्ताग्नीची मातू। जळ शोषूनि राहे निवांतू। जाळिती शक्ति स्वयें जाळितू। या नांव निश्चितू सांवर्तकाग्नी॥ ३४॥ तेणेंचि काळें झंझामारुत। उठी तेजातें शोषित। तें तेज शोषितां समस्त। उरे तेथ रूप मात्र॥ ३५॥
रूपं वायौ स च स्पर्शे लीयते सोऽपि चाम्बरे।
अम्बरं शब्दतन्मात्र इन्द्रियाणि स्वयोनिषु॥ २४॥
तेजाचें जें उरे रूप। तें वायु शोषूनि करी अरूप। तेव्हां वायूचि एकरूप। अति अनूप कोंदाटे॥ ३६॥ कोंदाटल्या वायुसी। गगन जेथींचें तेथें ग्रासी। तेव्हां वायु प्रवेशे स्पर्शी। तो उरे अवशेषीं स्पर्शमात्र॥ ३७॥ उरल्या वायूच्या स्पर्शासी। लयो तत्काळ होय आकाशीं। आकाशप्रवेशे शब्दासी। उरे अवशेषीं शब्दतन्मात्र॥ ३८॥ दशेंद्रियांची मंडळी। राजसापासोनि जन्मली। ते निजगुणीं सामावली। जेवीं पंचांगुळी मुष्टीमाजीं॥ ३९॥
योनिर्वैकारिके सौम्य लीयते मनसीश्वरे।
शब्दो भूतादिमप्येति भूतादिर्महति प्रभु:॥ २५॥
वैकारिक जो सत्त्वगुण। व्याला देवता अंत:करण। प्रळयस्वभावें आपण। मनामाजीं जाण प्रवेशे॥ ५४०॥ सकळ इंद्रियांचा राजा मन। मन:कल्पना जीवशिवपण। श्लोकपदें ‘मनसीश्वर’पूर्ण। मनाशींच जाण हरि बोले॥ ४१॥ मनोदेवता अंत:करण। घेऊनि प्रवेशे सत्त्वगुण। ज्याकार्याचें जें कारण। तेथ तीं जाण प्रवेशती॥ ४२॥ शब्दतन्मात्र उरलें आधीं। तें मीनलें तामसामधीं। कारणीं कार्यासी अवधी। जाण त्रिशुद्धी उद्धवा॥ ४३॥ त्रिविधगुणी अहंकारू। एकवटला महाथोरू। ऐक त्याचा बडिवारू। तोचि दुर्धरू संसारीं॥ ४४॥ जो शिवातें महत्त्वा चढवी। जीवातें देहात्मता गोंवी। अहंममता जग भुलवी। प्रभुत्वपदवी महत्त्वें येणें॥ ४५॥ अहंकारू ऐसा आहे। तो जैं परमार्थीं साह्य होये। तैं सोहंभावाचेनि लवलाहें। विभांडी पाहें संसारू॥ ४६॥ चोर जैं विश्वासू मित्र होये। तैं चोर चोरा निवारी पाहें। तेवीं अभिमानू जैं साह्य होये। तैं भवभय बाधीना॥ ४७॥ याहीपरी अभिमान। सामर्थ्यें अतिगहन। यालागीं प्रभुत्वें जाण। केलें व्याख्यान उद्धवा॥ ४८॥ त्रिगुणगुणीं गुणाभिमान। एकत्र होऊनियां पूर्ण। महत्तत्त्वीं होय लीन। अति सुलीन तद्रूपें॥ ४९॥
स लीयते महान्स्वेषु गुणेषु गुणवत्तम:।
तेऽव्यक्ते संप्रलीयन्ते तत्काले लीयतेऽव्यये॥ २६॥
तेंही महत्तत्त्व येथें। कारणगुणीं लीन होतें। तेंही गुणसाम्यें निश्चितें। पावे लयाते अव्यक्तीं॥ ५५०॥ आकारविकार समस्त। हारपोनि जाती जेथ। उरे बीजमात्र अवशेषित। त्या नांव अव्यक्त बोलिजे॥ ५१॥ वटाचा आकारविकार। ना शेंडा मूळ पुष्प पत्र। उरे अवशेष बीजमात्र। तेवीं संसार अव्यक्तीं॥ ५२॥ वटबीज उरलें येथ। तें दृष्टीसी तर्केना निश्चित। तेवीं भवबीज जें अव्यक्त। तें नव्हे व्यक्त जीवासी॥ ५३॥ नाना तृणजातिबीज गहन। उष्णकाळीं काळ करी लीन। तेवीं भवबीज अव्यक्त जाण। होय सुलीन काळेंसीं॥ ५४॥ पूर्वीं काळें क्षोभोनि अव्यक्त। जगदाकारें केलें व्यक्त। तेचि काळयोगें अव्यक्त। सुलीन होत काळेंसीं॥ ५५॥ या नांव अव्यक्ताचा पहा हो। काळामाजीं बोलती लयो। काळ बोलिजे महाबाहो। त्याचा होय व्ययो पुरुषेंसीं॥ ५६॥
कालो मायामये जीवे जीव आत्मनि मय्यजे।
आत्मा केवल आत्मस्थो विकल्पापायलक्षण:॥ २७॥
पुरुषाची पूर्ण क्षोभकता। तोचि काळ बोलिजे तत्त्वतां। उत्पत्ति-स्थिति-प्रलयांता। तिनी अवस्था काळाच्या॥ ५७॥ तिनी अवस्था लोटल्या ठायीं। काळासी कर्तव्यता नाहीं। तो उपजत व्यापारें पाहीं। जीवाचे ठायीं सामावे॥ ५८॥ अचेतनीं चेतविता। जडातें जो जीवविता। यालागीं जीवू ऐशी वार्ता। जाण तत्त्वतां पुरुषासी॥ ५९॥ प्रकृतीचेनि योगें जाण। शुद्धासी बोलिजे जीवपण। पुरुषू हेंही अभिधान। त्यासीच जाण बोलिजे॥ ५६०॥ करितां प्रकृतिविवंचन। केवळ मृगजळासमान। दिसे परी साचपण। सर्वथा जाण असेना॥ ६१॥ मृगजळामाजीं जो पडे। तेथ जळ नाहीं मा तो कोठें बुडे। तेवीं प्रकृति नसतां जोडे। वाडेंकोडें जीवत्व कोणा॥ ६२॥ जळींबुडालें दिसे व्योम। सत्य मानणें तो मूर्खधर्म। तैसें रूप नाम गुण कर्म। हा मिथ्या भ्रम मायिक॥ ६३॥ प्रकृतिकाळींही जाण। सत्य नाहीं जीवपण। तेही अर्थींची निजखूण। उद्धवा संपूर्ण अवधारीं॥ ६४॥ स्वयें अवलोकितां दर्पण। दर्पणामाजीं दिसे आपण। तरी आपुलें वेगळेपण। स्वयें आपण जाणिजे॥ ६५॥ तेवीं प्रकृतिकर्म करितां। जरी दिसे प्रकृति आंतौता। तरी मी प्रकृतीपरता। जाण तत्त्वतां उद्धवा॥ ६६॥ दिसे व्योम जळीं बुडालें। परी तें नाहीं वोलें झालें। तेवीं प्रकृतिकर्म म्यां केलें। नाहीं माखलें ममांग॥ ६७॥ यापरी करितां निर्वाहो। प्रकृतीचा झाला अभावो। तेव्हां जीवशिव नांवें वावो। जीव तोचि पहा हो परमात्मा॥ ६८॥ जीवाचें गेलिया जीवपण। सहजेंचि उडे शिवपण। दोघेही आत्मत्वें जाण। होती परिपूर्ण पूर्णत्वें॥ ६९॥ जीवासी निजस्वरूपआठवो। या नांव जीवाचा परब्रह्मीं लयो। परमात्मा अज अव्ययो। अविनाश अद्वयो अनंत॥ ५७०॥ ब्रह्मीं स्फुरेना ब्रह्मपण। तेथ ‘मी तूं’ म्हणे कोण। परमानंद परिपूर्ण। उरे जाण उद्धवा॥ ७१॥ ऐसा परमानंद म्हणसी कोण। तो मी अज अव्यय श्रीकृष्ण। आनंदस्वरूप तो मी जाण। मजवेगळें स्थान असेना॥ ७२॥ ज्या स्वानंदा नांव श्रीकृष्ण। तें तुझें स्वरूप उद्धवा जाण। तेथ नाहीं गा मीतूंपण। परम कारण उर्वरित॥ ७३॥ उद्धवा जीवाचा जीव मी श्रीकृष्ण। मज तुज नाहीं वेगळेपण। यालागीं जीवाची हे निजखूण। परम कारण सांगीतले॥ ७४॥ जगाचा आत्मा श्रीकृष्ण। त्या माझा आत्मा तूं उद्धव पूर्ण। हें ऐकोनि श्रीकृष्णवचन। उद्धव जाण गजबजिला॥ ७५॥ कृष्ण मज म्हणे आपुला आत्मा। परी मी नेणें कृष्णमहिमा। अगाध लीला पुरुषोत्तमा। ते केवीं आम्हां आकळे॥ ७६॥ नाथिलेंचि उद्धवपण। माझ्या अंगीं जडलें जाण। कृष्णविवेकें पाहतां पूर्ण। माझें मीपण दिसेना॥ ७७॥ मज उद्धवपण सांडितां। कृष्ण निजधामा जाईल तत्त्वतां। ते न साहवे अवस्था। सखेदता सप्रेम॥ ७८॥ हे उद्धवाची अवस्था। कळों सरली श्रीकृष्णनाथा। तेचि अर्थीची हे कथा। शब्दार्थता निरूपी॥ ७९॥
एवमन्वीक्षमाणस्य कथं वैकल्पिको भ्रम:।
मनसो हृदि तिष्ठेत व्योम्नीवार्कोदये तम:॥ २८॥
प्रकृति-पुरुषविवंचन। आदि मध्य अवसान। तुज म्यां दाविलें एकपण। तेथ कां भिन्नपण कल्पिसी वायां॥ ५८०॥ उत्पत्तिआदि ब्रह्म पूर्ण। उत्पत्तीसी तेंचि कारण। जग जन्मलें जें सगुण। तेंही ब्रह्मरूपें जाण दाविलें तुज॥ ८१॥ आणि प्रळयाच्या अंतीं। ब्रह्मचि उरे निजस्थिती। तेही विखींची प्रतीती। तुज म्यां निश्चितीं दाविली॥ ८२॥ प्रकृतिहूनि पुरुष भिन्न। प्रकृति स्वातंत्र्यें मिथ्या जाण। ऐसें प्रकृतिपुरुष ज्यासी ज्ञान। त्यासी मीतूंपण भासेना॥ ८३॥ जेथ नाहीं मीतूंपण। तेथविकल्प कल्पी कोण। आद्यंतीं वस्तु पूर्ण। हें विवेकज्ञान जयासी॥ ८४॥ जो विवेक पुरुषप्रकृती। सांख्य जागे ज्याचे चित्तीं। त्यासी विकल्पाची प्राप्ती। नव्हे कल्पांतीं उद्धवा॥ ८५॥ सांख्यविवेकगभस्ती। पूर्ण उगवला ज्याचे चित्तीं। तेथ विकल्पाची अंधारी राती। कैशा रीतीं उरेल॥ ८६॥ ज्यासी पटुतर सांख्यज्ञान। विकल्प विसरे त्याचें मन। हृदयीं उगवे चिद्भान। अज्ञाननिशा पूर्ण निरसूनी॥ ८७॥ जेथ निरसलें अज्ञान। तेथ विकल्पाचें कैंचें स्थान। यापरी सांख्यज्ञान। साधकां पूर्ण उपकारी॥ ८८॥ जें साराचें निजसार। जें गुह्यज्ञानभांडार। जें कां विवेकरत्नाकर। तें सांख्य साचार उद्धवा॥ ८९॥
एष सांख्यविधि: प्रोक्त: संशयग्रन्थिभेदन:।
प्रतिलोमानुलोमाभ्यां परावरदृशा मया॥ २९॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायामेकादशस्कन्धे चतुर्विंशोऽध्याय:॥ २४॥
मी विवेकाचा विवेकू। मी अर्काचा आदिअर्कू। मी ज्ञानियांचा ज्ञानतिलकू। त्या माझा परिपाकू तें हें सांख्य॥ ५९०॥ मी वेदांचा आदिवेदू। मी बोधाचा आदिबोधू। मी आनंदाचा निजानंदू। त्या माझा प्रबोधू तें हें सांख्य॥ ९१॥ तेणें म्यां सर्वज्ञें श्रीकृष्णें। निर्धारोनि निजज्ञानें। सांख्ययोगउपलक्षणें। ब्रह्म अव्ययपणें दाविलें॥ ९२॥ जेवीं गरगरीत वाटोळा। करतळीं दिसे आंवळा। तेवीं सांख्ययोगलीळा। ब्रह्म तुज डोळां दाविलें॥ ९३॥ जो ब्रह्म डोळां देखों जाये। तो सर्वांगें देखणा होये। ऐशी सांख्यज्ञाननिजसोये। तुज म्यां पाहें दाविली॥ ९४॥ हा सांख्ययोगअनुक्रम। अन्वयव्यतिरेकें उपक्रम। आलोडितां आकळे वर्म। अखंड ब्रह्म अद्वय॥ ९५॥ उत्पत्ति-स्थिति-प्रळयांत। ब्रह्म अखंड निज नित्य। हेंचि सांख्ययोगें प्राप्त। जाण निश्चित साधकां॥ ९६॥ ज्यांसी ब्रह्मज्ञानाचें कोड। ते सांख्ययोग पुरवी चाड। लिंगदेहाचें सुदृढ झाड। त्याचें समूळ बूड उन्मळी॥ ९७॥ लिंगदेह अत्यंत कठिण। तें सांख्ययोगापुढें जाण। जेवीं अग्नीमाजीं तृण। तेवीं होय संपूर्ण भस्मांत॥ ९८॥ लिंगदेह सैंधवगिरिवर। सांख्य अत्यंत प्रळयसागर। खवळला विरवूनि करी नीर। एकाकार निजात्मता॥ ९९॥ खवळल्या अत्यंत चित्सागरा। नाना संशयजळगारा। उरावयानाहीं थारा। निजनिर्धारा उद्धवा॥ ६००॥ सकळ संशयांचें छेदन। लिंगदेहाचें भेदन। करी तें सांख्ययोगज्ञान। उद्धवा जाण निश्चित॥ १॥ अनुलोम प्रतिलोम। विवंचना वाटेल दुर्गम। हें न करितां सांख्य सुगम। आकळे तें वर्म सांगेन ऐक॥ २॥ सांडूनि आकारविषमता। सर्व भूतीं भगवंतता। जो पाहे सद्भावता। सांख्य त्याचे हाता समूळ आलें॥ ३॥ कां जैसें होईल कर्माचरण। तैसें सुखेंचि हो आपण। मी कर्ता हें तूं न म्हण। इतुकेन ब्रह्म पूर्ण तूं होसी॥ ४॥ याहीवरतीसुगमता। मज दिसेना सर्वथा। उद्धवा तुझे निजहितार्था। जाण तत्त्वतां सांगीतलें॥ ५॥ हेंचि एक माझें वचन। विचारूनियां संपूर्ण। निजहितार्थ आपण। अवश्य जाण करावें॥ ६॥ ऐसें बोलिला देवाधिदेवो। तेथ जडला उद्धवाचा भावो। नि:शेष ‘अहं’ सांडितां पहा हो। ब्रह्म स्वयमेवोसहजचि॥ ७॥ विचारितां सांख्यज्ञान। जगातें गोंवी अहंपण। अहंपाशीं जन्ममरण। दु:ख दारुण अहंभावीं॥ ८॥ ऐसा अहंभावो कठिण। सांडितां न सांडे आपण। येचि गुंतीचें कारण। सर्वथाजाण कळेना॥ ९॥ हें पुसों जावें देवापाशीं। तेणें विशद सांगीतलें सांख्यासी। आतां आपुली गुंती आपल्यापाशीं। तेंचि आम्हासी कळेना॥ ६१०॥ येचि अर्थीं श्रीकृष्ण। पंचविसावे अध्यायीं जाण। सगुण-निर्गुणविभागें पूर्ण। गोड निरूपण सांगेल॥ ११॥ ते सुरस रसाळ मधुर कथा। जेथ श्रीकृष्णाऐसा वक्ता। उद्धव शिरोमणि श्रोता। अनुपम स्वादुता ते ठायीं॥ १२॥ त्या स्वादाचें गोडपण। सांगावया समर्थ श्रीकृष्ण। सेवावया श्रोता अतिसज्ञान। निजभक्त जाण उद्धव॥ १३॥ ते देवभक्तसंवादगोडी। वेदशास्त्रें न जोडे जोडी। आलोडितां ग्रंथकोडी। ते निजगोडी नातुडे॥ १४॥ आतुडावया ते निजगोडी। जैं भाग्यें भावार्थें जोडे जोडी। भावार्थाचे निज आवडीं। जिव्हारींची गोडी देवो दे भक्तां॥ १५॥ एवं भावार्थापरतें कांहीं। देवासी आवडतें नाहीं। तो भावो नाहीं ज्यांचे ठायीं। ते मूर्ख पाहीं बालिश॥ १६॥ त्या बाळकांचा धन्य भावो। खापरें मांडूनि म्हणती देवो। तेथही प्रकटे देवाधिदेवो। धरिल्या नि:संदेहो विश्वास॥ १७॥ बाळकें दूध मागावयासाठीं। भावार्थें लागला देवापाठीं। कां क्षीराब्धि करूनि वाटी। उपमन्यावोठीं लाविली॥ १८॥ एवं भाविकू देवाचा लाहणा। देवो भाविकांचा आंदणा। भावेंवीण देवो जाणा। कधीं कोणा न भेटे॥ १९॥ यालागीं जेथ भावार्थ। तेथचि जोडे सुखस्वार्थ। भावार्थ तेथ परमार्थ। साङ्ग साद्यंत सांपडे॥ ६२०॥ ऐसा वाढिविल्या भावार्थ। तेणें जोडे निर्गुणनिजस्वार्थ। तेचि अर्थींचा वृत्तांत। पुढिल्या अध्यायांत हरि सांगे॥ २१॥ ते कथेचें गोडपण। अमृतास विसरवी जाण। ऐसें रसाळ निरूपण। सादरें श्रीकृष्ण सांगेल॥ २२॥ तें श्रीकृष्णकथापीयूख। श्रोत्याचें पावे श्रवणमुख। एका जनार्दनीं अतिसुख। सकौतुक व्याख्यान॥ २३॥ श्रीभागवत अत्यादरें। श्रीकृष्णकथा सविस्तरें। अहेर विस्तारिले साजिरे। परमार्थअळंकारें साळंकृत॥ २४॥ तेणें संत सज्जन सोयरे। गौरवीन श्रवणादरें। एका जनार्दनकृपाकरें। आविष्करे सामर्थ्य॥ २५॥ गौरविले सोयरे सज्जन। म्हणाल उपेक्षिले इतर जन। जो श्रीभागवतीं सावधान। तो परमार्थें जाण गौरवे॥ २६॥ भावार्थासारिखें गौरवण। एका जनार्दन जाणे जाण। एका जनार्दना शरण। आपण्या आपण गौरवी॥ ६२७॥
इति श्रीभागवते महापुराणे एकादशस्कंधे श्रीकृष्णोद्धवसंवादे एकाकारटीकायां प्रकृतिपुरुषसांख्ययोगो नाम चतुर्विंशोऽध्याय:॥ २४॥ ॥श्रीकृष्णार्पणमस्तु॥ श्लोक॥ २९॥ ओव्या॥ ६२७॥
॥ श्री ॐ तत्सत्-श्रीकृष्ण प्रसन्न॥
अध्याय पंचविसावा
श्रीगणेशाय नम:॥ श्रीकृष्णाय नम:॥ ॐ नमो देव निर्गुण। म्हणों पाहें तंव न देखें गुण। गुणेंवीण निर्गुणपण। सर्वथा जाण घडेना॥ १॥ सर्वथा न घडे निर्गुणपण। तरी घडों नेदिशी सगुणपण। नातळशी गुणागुण। अगुणाचा पूर्ण गुरुराया॥ २॥ अगुणाच्या विपरीत तूं गुणी। करिसी त्रिगुणगुणां झाडणी। पंचभूतांपासूनी। सोडवितां जनीं जनार्दनू॥ ३॥ ज्याचेनि जनांसी अर्दन। ज्याचेनि लिंगदेहा मर्दन। जो जीवासी जीवें मारी पूर्ण। तो कृपाळु जनार्दन घडे केवीं॥ ४॥ जनार्दनाचें कृपाळूपण। सर्वथा नेणती जन। नेणावया हेंचि कारण। जे देहाभिमान न सांडिती॥ ५॥ जननीजठरीं जन्म जाण। त्या जन्मास्तव म्हणती जन। त्या जनजन्मा करी मर्दन। यालागीं जनार्दन नाम त्यासी॥ ६॥ मरण मारूनि वाढवी जिणें। जीव मारूनि जीववणें। देहीं नांदवी विदेहपणें। ऐशी जनार्दनें कृपा कीजे॥ ७॥ निजभावार्थें परिपूर्ण। एकाकी देखूनियां दीन। कृपा करी जनार्दन। कृपाळु पूर्ण दीनांचा॥ ८॥ जे जे भावना भावी जन। ते ते पुरवी जनार्दन। जो मागे परम समाधान। त्याचा देहाभिमान निर्दळी॥ ९॥ हो कां जनार्दनासमोर। कैं आला होता अहंकार। मा तेणें घेऊनियां शस्त्र। करी शतचूर निजांगें॥ १०॥ जेवीं सूर्याचेनि उजियेडें। अंधारेंसीं रात्री उडे। तेवीं जनार्दननामापुढें। अहंकार बापुडें उरे केवी॥ ११॥ ऐकतां गुरुनामाचा गजरू। समूळ विरे अहंकारू। येथ दु:खदायक संसारू। कैसेनि धीरू धरील॥ १२॥ ज्याचें नाम स्मरतां आवडीं। संसारबांदवडी फोडी। जीवाचे जीवबंध सोडी। नामाची गोडी लाजवी मोक्षा॥ १३॥ निजमोक्षाही-वरतें। ज्याचें नाम करी सरतें। त्याच्या कृपाळूपणातें। केवीं म्यां येथें सांगावें॥ १४॥ नामप्रतापान करवे सीमा। त्या सद्गुरूचा निजमहिमा। कैशापरी आकळे आम्हां। काय निरुपमा उपमावें॥ १५॥ अगाध कीर्ति गुरूची गहन। गुण गणितां अनंतगुण। काय घ्यावें त्याचें आपण। नित्य निर्गुण निजांगें॥ १६॥ धांव घेऊनि त्यापें जावों। तंव त्या नाहीं गांवठावो। त्याचे प्राप्तीसी न चले उपावो। एक सद्भावोवांचूनी॥ १७॥ सद्भावें स्मरतां नामासी। गुरु प्रकटे स्मरणापाशीं। जेवीं सागरू सैंधवासी। ये भेटीसी निजांगें॥ १८॥ सागरा देतां आलिंगन। जेवीं सैंधव होय जीवन। तेवींवंदितां सद्गुरुचरण। मीतूंपण हारपे॥ १९॥ सद्गुरुकृपा झालिया पूर्ण। जनचि होय जनार्दन। तेव्हां जन वन विजन। भिन्नभिन्न भासेना॥ २०॥ जन तेंचि जनार्दन। जनार्दनचि सकळ जन। हेंचि उपनिषत्सार पूर्ण। हे निजखूण जनार्दनीं॥ २१॥ येणेंचि अभिन्नार्थें येथ। सांख्य बोलिलाभगवंत। उत्पत्ति-स्थिति-प्रळयांत। वस्तु सदोदित संपूर्ण॥ २२॥ सांख्य ऐकोनियां उद्धवो। विचारी आपुला अभिप्रावो। संसार वाढवी जो अहंभावो। तो अवश्य पहा हो सांडावा॥ २३॥ अहंकार जडला चित्ता। तो सांडितां न वचे सर्वथा। हें पुसों जरी श्रीकृष्णनाथा। तेणें सांख्य या अर्था निरूपिलें॥ २४॥ सकळ प्राप्तीचा अभिप्रावो। सांख्य अनुवादला देवो। अवश्य सांडावा अहंभावो। हेंचि पहा हो दृढ केलें॥ २५॥ माझेनि पराक्रमें तत्त्वतां। माझें मीपण न वचे सर्वथा। लाजिरवाणें कृष्णनाथा। किती आतां पुसावें॥ २६॥ ऐशी उद्धवाची चिंता। कळूं सरली श्रीकृष्णनाथा। बाप कृपाळु निजभक्तां। जेणें निवारे अहंता तें निजवर्म सांगे॥ २७॥ आजि उद्धवाचें भाग्य पूर्ण। जगीं उद्धवचि धन्य धन्य। ज्यासी संतुष्टला श्रीकृष्ण। न करितां प्रश्न निजगुह्य सांगे॥ २८॥ बाळककाय भूक सांगे। मग माता स्तन देऊं लागे। ते कळवळॺाचे पांगें। धांवोनि निजांगें स्तनपाना लावी॥ २९॥ त्याहूनि अतिआगळा। कृष्णीं उद्धवकळवळा। तो स्वभक्तांची भजनकळा। जाणोनि जिव्हाळा पोखित॥ ३०॥ बाळक नेणे आपुली चिंता। परी माता प्रवर्ते त्याच्या हिता। तेवीं उद्धवाचे निजस्वार्था। श्रीकृष्णनाथा कळवळा॥ ३१॥ त्या उद्धवाचें जें जें न्यून। तें तें करावया परिपूर्ण। प्रवर्तलासे श्रीकृष्ण। तो निजनिर्गुण उपदेशी॥ ३२॥ पंचविसावे अध्यायीं जाण। सांगोनि गुण जयो लक्षण। लक्षवील निजनिर्गुण। हेंचि निरूपण निजनिष्ठा॥ ३३॥ प्रकृति-पुरुषविवेक। झालियाही बुद्धिपूर्वक। जंव गुणजयो नाहीं निष्टंक। तंव वाढे सुखदु:ख अहंभावो॥ ३४॥ तिहीं गुणांस्तव देह झाला। देही गुणजयो न वचे केला। मूलउच्छेदू आपुला। न करवे वहिला कोणासी॥ ३५॥ दांडा जन्मला वृक्षजातीसीं। तो मिळोनियां कुऱ्हाडीसीं। समूळ छेदवी वृक्षासी। तेवीं विवेकासीं सत्त्वगुण॥ ३६॥ विवेका मीनल्या सत्त्वगुण। समूळ उच्छेदी तिनी गुण। सहजें प्रकटे निजनिर्गुण। तेव्हां गुणच्छेदन तें मिथ्या॥ ३७॥ समूळ मिथ्या तिनी गुण। नित्य सत्य निजनिर्गुण। येचि अर्थींचें निरूपण। स्वमुखें श्रीकृष्ण सांगत॥ ३८॥
श्रीभगवानुवाच
गुणानामसमिश्राणां पुमान् येन यथा भवेत्।
तन्मे पुरुषवर्येदमुपधारय शंसत:॥ १॥
ज्याचेनि चरणें पवित्र क्षिती। नामें उद्धरे त्रिजगती। ज्याची ऐकतां गुणकीर्ती। क्षयो पावती महापापें॥ ३९॥ ज्याचें मृदु मधुर अविट नाम। उच्चारितां निववी परम। तो उद्धवासी पुरुषोत्तम। आवडीं परम बोलत॥ ४०॥ सत्त्व रज तम तिनी गुण। न मिसळतां भिन्नभिन्न। पुरुषापासीं एकैक गुण। उपजवी चिन्ह तें ऐका॥ ४१॥ नि:संदेह सावधान। निर्विकल्प करूनि मन। ऐकतां माझें वचन। पुरुषोत्तम पूर्ण होईजे स्वयें॥ ४२॥ माझे स्वरूपीं सद्भावता। ते पुरुषाची उत्तमावस्था। माझे वचनीं विश्वासतां। पुरुषोत्तमता घर रिघे॥ ४३॥ ऐशी उत्तमा अतिउत्तम। निर्गुण पदवी निरुपम। तुज मी अर्पितसें पुरुषोत्तम। माझें वचन परम विश्वासल्या॥ ४४॥ भक्तिभावार्थें परम श्रेष्ठ। वचनविश्वासीं अतिवरिष्ठ। यालागीं उद्धवासी पुरुषश्रेष्ठ। स्वमुखें वैकुंठ संबोधी॥ ४५॥ संसारीं योनि अनेग। त्यामाजीं मनुष्यत्व अतिचांग। तेंही अविकळ अव्यंग। संपूर्ण सांग निर्दुष्ट॥ ४६॥ सकळ देहांमाजीं जाण। असे पुरुष देह प्राधान्य। त्याहीमाजीं विवेकसंपन्न। वेदशास्त्रज्ञ मुमुक्षू॥ ४७॥ वेदशास्त्रविवेकसंपन्न। त्याहीमाजीं ज्या माझें भजन। भजत्यांमाजीं अनन्य शरण। सर्वस्वें जाण मजलागीं॥ ४८॥ सर्वस्वें जे अनन्य शरण। तेथ माझी कृपा परिपूर्ण। माझे कृपें माझें ज्ञान। पावोनि संपन्न मद्भजनीं॥ ४९॥ येंहीं गुणीं विचारितां लोक। आथिला दिसे उद्धव एक। त्यालागीं यदुनायक। पुरुषवर्याभिषेक वचनें करी॥ ५०॥ ऐसें संबोधूनि उद्धवासी। त्रिगुणगुणस्वभावांसी। सांगतां प्रथम सत्त्वासी। हृषीकेशी उपपादी॥ ५१॥ उदंड सत्त्वाचीं लक्षणें। त्यांत पंधरा बोलिलीं श्रीकृष्णें। तेंचि ऐका कोणकोणें। निजनिरूपणें हरि सांगे॥ ५२॥
शमो दमस्तितिक्षेक्षा तप: सत्यं दया स्मृति।
तुष्टिस्त्यागोऽस्पृहा श्रद्धा ह्रीर्दयादि: स्वनिर्वृति:॥ २॥
आपुली जे चित्तवृत्ती। सांडूनि बाह्यस्फूर्ती। अखंड राखणें आत्मस्थिती। शम निश्चितीं त्या नांव॥ ५३॥ बाह्य इंद्रियांची चडफड। शमेंसीं करावा गलजोड। निग्रहणें विषयचाड। दमाचें कोड या नांव॥ ५४॥ जेणें हरिखें साहणें सुख। त्याचि वृत्तीं साहणें दु:ख। तितिक्षा या नांव देख। शुद्धसत्त्वात्मक उद्धवा॥ ५५॥ मी कोण कैंचा किमात्मक। निष्कर्म कीं कर्मबद्धक। करणें निजात्मविवेक। ईक्षापरिपाक या नांव॥ ५६॥ जागृतिस्वप्नसुषुप्तीआंत। भगवत्प्राप्तीलागीं चित्त। झुरणीमाजीं पडे नित्य। तप निश्चित या नांव॥ ५७॥ आवडीं जेवीं नेघवे विख। तेवी प्राणांतें न बोले लटिक। साचचि बोलणें निष्टंक। हें सत्य देख सात्त्विका॥ ५८॥ भूतांवरी कठिणपण। जो स्वप्नीं न देखे आपण। भूतदया ते संपूर्ण। उद्धवा जाण निश्चित॥ ५९॥ माझा मुख्य निजस्वार्थ कोण। मी काय करितों कर्माचरण। ऐसें जें पूर्वानुस्मरण। स्मृति जाण या नांव॥ ६०॥ न करितां अति आटाटी। यथालाभें सुखी पोटीं। या नांव गा निजसंतुष्टी। जाण जगजेठी उद्धवा॥ ६१॥ जे मिळाले जीविकाभाग। त्यांतही सत्पात्रीं दानयोग। विषयममता सांडणें सांग। त्या नांव त्याग उद्धवा॥ ६२॥ अर्थस्वार्थीं इच्छा चढे। अर्थ जोडतां अधिक वाढे। ते इच्छा सांडणें निजनिवाडें। निस्पृहता घडे ते ठायीं॥ ६३॥ जेथ निस्पृहता समूळ सांग। त्याचि नांव दृढ वैराग्य। हें परमार्थाचें निजभाग्य। येणें श्रीरंग सांपडे॥ ६४॥ जो गुरुवाक्यविश्वासी। सबाह्य विकला सर्वस्वेंसीं। तोचि भावार्थ द्विजदेवांसी। श्रद्धा त्यापाशीं समूळ नांदे॥ ६५॥ नरदेहीं लाभे परब्रह्म। तदर्थ न करूनि सत्कर्म। विषयार्थ करी धर्माधर्म। ते लज्जा परम अतिनिंद्य॥ ६६॥ जेणें दु:खी होईजे आपणें। तें पुढिलासी नाहीं करणें। दु:ख नेदूनि सुख देणें। हे दया म्यां श्रीकृष्णें वंदिजे॥ ६७॥ पुढिलासी नेदूनि दु:ख। स्वयें भूतमात्रीं देणें सुख। हेचि दया पारमार्थिक। दुसरेनि देख यालागीं सांगे॥ ६८॥ खातां नाबदे पुढें पेंड जैसी। तैसें गौण देखोनि विषयांसी। जो विनटला ब्रह्मसुखासी। स्वनिवृत्ति त्यासी बोलिजे॥ ६९॥ रंक बैसल्या पालखीसी। उपेक्षी पूर्वील सुडक्यासी। तेवीं उपेक्षूनिविषयांसी। जो ब्रह्मसुखासी पकडला॥ ७०॥ कणाची वाढी भुसापाशीं। कण निडारे भुसेंसीं। तो कण यावया हातासी। सांडिती भुसासी पाखडूनी॥ ७१॥ तेवीं ब्रह्मसुखाचिये पाडें। नरदेहाचा पांगडा पडे। तें ब्रह्मसुख जैं हाता चढे। तैं देहींचें नावडे विषयभूस॥ ७२॥ तेवीं सांडूनिविषयप्रीती। ज्यासी ब्रह्मसुखीं सुखप्राप्ती। याचि नांव स्वनिवृत्ती। जाण निश्चितीं उद्धवा॥ ७३॥ या पंधरा लक्षणांची स्थिती। वर्ते तो शुद्ध सत्त्वमूर्ती। शोधितसत्त्वाची सत्त्ववृत्ती। ‘आदि’ शब्दें श्रीपती सांगत॥ ७४॥ सर्व भूतीं अकृत्रिमता। देखे भगवद्भावें तत्त्वतां। या नांव शोधितसत्त्वता। गुणावस्थाछेदक॥ ७५॥ ऐशियापरी सत्त्वगुण। सात्त्विकापासीं वर्ते पूर्ण। आतां रजाचें लक्षण। स्वयें श्रीकृष्ण सांगत॥ ७६॥
काम ईहा मदस्तृष्णा स्तम्भ आशीर्भिदा सुखम्।
मदोत्साहो यश: प्रीतिर्हास्यं वीर्यं बलोद्यम:॥ ३॥
काम म्हणिजे विषयसोसू। जेवीं इंधनीं वाढे हुताशू। तेवीं पुरवितां कामाभिलाषू। काम असोसू पैं वाढे॥ ७७॥ या नांव काम जाण। कामक्रिया ते ईहा पूर्ण। झाले विद्येचा दर्प गहन। मदाचें लक्षण या नांव॥ ७८॥ झालिया अर्थप्राप्ती। वासनेसी नव्हे तृप्ती। चढती वाढती आसक्ती। तृष्णा निश्चितीं या नांव॥ ७९॥ अतिगर्वें जे स्तब्धता। कोणा दृष्टीं नाणी सर्वथा। या नांव स्तंभावस्था। जाण तत्त्वतां उद्धवा॥ ८०॥ अर्थप्राप्तीकारणें। इष्टदेवता प्रार्थणें। प्रापंचिक सुख मागणें। आशा म्हणणें या नांव॥ ८१॥ भिदा म्हणिजे भेद जाण। स्फुरद्रूप प्रपंचभान। माझें तुझें प्रपंच वचन। भिदालक्षण या नांव॥ ८२॥ राजससुखाचा नवलभाग। विषयसुखभोग जो साङ्ग। तेंचि सुख मानिती चांग। सुखप्रयोग या नांव॥ ८३॥ रणीं उत्साह शूरासी। कां पुत्रोत्साह नरासी। विवाहोत्साह सुहृदांसी। महोत्साह त्यासी बोलिजे॥ ८४॥ शास्त्रविवादीं जयो घेणें। कां युद्धींशूर पराभवणें। तेणें ख्याति वाढविणें। यश मिरवणें या नांव॥ ८५॥ बंदिजनांहातीं कीर्ती। स्वयें वाखाणवी दिगंतीं। या नांव यश:प्रीती। जाण निश्चितीं उद्धवा॥ ८६॥ ऐकोनि वचनोक्ति छंदोबद्ध। उपहासीं अतिविनोद। तेथ राजसा हास्य विशद। जाण प्रसिद्ध उद्धवा॥ ८७॥ वीर्य म्हणिजे केवळ। बळाढॺता अतिप्रबळ। दाखवणें शारीरबळ। या नांव शीळ वीर्याचें॥.८८॥ राजबळें उद्यमव्यवहार। आंगदट जो व्यापार। न्याय सांडूनि स्वार्थ फार। बलोद्यमप्रकार या नांव॥ ८९॥ हीं पंधराही लक्षणें। ज्यापें नांदती संपूर्णें। तो राजस वोळखणें। जीवेंप्राणें निश्चित॥ ९०॥ केवळ अविवेक संपत्ती। तामसाची तमोवृत्ती। सोळा लक्षणें त्याची स्थिती। ऐक तुजप्रती सांगेन॥ ९१॥
क्रोधो लोभोऽनृतं हिंसा याञ्चा दम्भ: क्लम: कलि:।
शोकमोहौ विषादार्ती निद्राऽऽशा भीरनुद्यम:॥ ४॥
क्रोध कामाची पूर्णावस्था। लोभ म्हणिजे अतिकृपणता। अनृत म्हणिजे असत्यता। हिंसा ते तत्त्वतां परपीडा॥ ९२॥ याञ्चा म्हणिजे लोलंगता। दंभ म्हणिजे अतिमान्यता। क्लमनामें अतिआयासता। व्यर्थ कलहता कलि जाण॥ ९३॥ शोक म्हणिजे हाहाकारू। मोह म्हणिजे भ्रमाचा पूरू। विषाद म्हणिजे दु:खसंचारू। अभ्यंतरू जेणें पोळे॥ ९४॥ आर्ति म्हणिजे अतिसंताप। निंदा म्हणिजे असदारोप। आशा म्हणिजे अतिलोलुप्य। महाभयकंप भीशब्दीं॥ ९५॥ ऐक निद्रेचें निजवर्म। जें आळसाचें निजधाम। जाडॺता सोलींव परम। ते निद्रा नि:सीम तामसी॥ ९६॥ सांडूनियां सर्व कर्म। स्तब्धता राहे परम। या नांव अनुद्यम। सुखावलें तम ते ठायीं वसे॥ ९७॥ या तमोगुणाच्या सोळा कळा। ज्याचे अंगीं बाणती सकळा। तो तमोरात्रींची चंद्रकळा। अविवेक आंधळा तामसू॥ ९८॥ सत्त्वरजतमोगुण। यांचे ओळखीलागीं जाण। केलें भिन्नभिन्न निरूपण। अतां मिश्रलक्षण तें ऐक॥ ९९॥
सत्त्वस्य रजसश्चैतास्तमसश्चानुपूर्वश:।
वृत्तयो वर्णितप्राया: सन्निपातमथो शृणु॥ ५॥
सांगीतली त्रिगुणस्थिती। त्या एकएकाच्या अनंत वृत्ती। त्याही अनंतप्राय होती। जीवासी गुणगुंती येथेंचि पडे॥ १००॥ मस्तकीं केश चिकटले होती। ते ज्याचे त्या नुगवती। तेवीं त्रिगुणांची गुणगुंती। जीवाहातीं उगवेना॥ १॥ मिळोनि सख्या मायबहिणी। हातीं घेऊनि तेल फणी। उगविती चिकटल्या केशश्रेणी। तेवीं त्रिगुणांची वेणी जीवासी॥ २॥ त्रिगुणांची विभागवृत्ती। जीवसामर्थ्यें जरी होती। तरी शुद्धसत्त्वीं करूनि वस्ती। गुणातीतीं प्रवेशता॥ ३॥ ऐसा निजगुणांचा उगवो। जीवाचेनि नोहे निर्वाहो। यालागीं गुरुचरणीं सद्भावो। सभाग्य पहा वो राखिती॥ ४॥ जे सभाग्य भाग्यवंत जनीं। ज्यांसी सद्गुरु सखी जननी। विवेक-वैराग्य घेऊनि फणी। जो त्रिगुणांची वेणी उगवितू॥ ५॥ ज्यांची उगविली गुणगुंती। पुढती गुंती पडे मागुती। यालागीं ते महामती। मुंडूनि सांडिती संन्यासी॥ ६॥ एकाची नवलगती। उद्भट वैराग्याची स्थिती। गुंती उगवाया न रिघती। मुळींचि मुंडिती समूळ॥ ७॥ विवेकफणीचेनि मेळें। ओढितां वैराग्य बळें। जो अशक्त भावबळें। तो मध्येंचि पळे उठूनी॥ ८॥ अशक्तें पळतां देखोनि दूरी। एकें पळालीं मोहअंधारीं। एकें गुंती राखोनि शिरीं। गुंतीमाझारी रिघालीं॥ ९॥ एकें अत्यंत करंटीं। नव्हेचि गुरुमाउलीसी भेटी। ऐशीं संसारीं पोरें पोरटीं। गुणदु:खकोटी भोगिती॥ ११०॥ द्विपरार्धायु विधाता। त्याचेनि नोहे गुणभागता। मग इतरांची कोण कथा। गुण तत्त्वतां निवडावया॥ ११॥ ऐशिया ज्या त्रिगुणवृत्ती। मजही नि:शेष न निवडती। यालागीं ध्वनितप्राय पदोक्ती। देव श्लोकार्थींबोलिला॥ १२॥ मागिल्या तीं श्लोकार्थीं। सांगीतल्या त्रिगुणस्थिती। त्रिगुणांची मिश्रित गती। सन्निपातवृत्ती ते ऐका॥ १३॥
सन्निपातस्त्वहमिति ममेत्युद्धव या मति:।
व्यवहार: सन्निपातो मनोमात्रेन्द्रियासुभि:॥ ६॥
गुणसन्निपातप्रकारू। एकचि जो कां अहंकारू। तो गुणसंगें त्रिप्रकारू। ऐक विचारू तयाचा॥ १४॥ वर्णाश्रमविहित विलास। वेदाज्ञा पाळणें अवश्य। मी आत्मा जाण चिदंश। हा अहंविलास सात्त्विक॥ १५॥ मी स्वधर्मकर्मकर्ता। मी स्वर्गादि सुखभोक्ता। मज पावती नानावस्था। या नांव अहंता राजस॥ १६॥ मी देहधारी सुभट नर। मीचि कर्ता शत्रुसंहार। मी सर्वार्थीं अतिदुर्धर। हा अहंकार तामस॥ १७॥ गुणानुसारें ममता जाण। त्रिविधरूपें स्फुरण। तेचि अर्थींचें निरूपण। विशद श्रीकृष्ण सांगत॥ १८॥ माझे हृदयींचा भगवंत। तोचि सर्व भूतीं हृदयस्थ। भूतें माझींच समस्त। हे ममता शोधित सत्त्वाची॥ १९॥ भक्त संत साधु सज्जन। तेचि माझे सुहृज्जन। ऐशी जे ममता पूर्ण। उद्धवा जाण सत्त्वस्थ॥ १२०॥ जीवाहून परती। सद्गुरुचरणीं अतिप्रीती। ऐशी ममतेची जे जाती। ते जाण निश्चितीं सात्त्विक॥ २१॥ ज्या देवाची उपासकता। शैवी वैष्णवी दीक्षितता। देवीं धर्मीं पूर्ण ममता। ते जाण सात्त्विकता सत्त्वस्थ॥ २२॥ शैवी वैष्णवी धर्मममता। दंभरहित निष्कामता। ते ते सात्त्विकी ममता। ऐक अवस्था राजसाची॥ २३॥ निवृत्तिमार्ग मानी लटिक। सत्य साचार लौकिक। लोकैषणेची ममता देख। ते आवश्यक राजसी॥ २४॥ प्रवृत्तिशास्त्रीं आवडी। लौकिकाची अतिगोडी। नामरूपांची उभवी गुढी। हे ममता रोकडी राजस॥ २५॥ स्त्रीपुत्रें माझीं आवश्यक। शरीरसंबंधी आप्त लोक। द्रव्याची ममता निष्टंक। हे बुद्धि वोळख राजस॥ २६॥ ज्या देवाची करितां भक्ती। नाम रूप जोडे संपत्ती। तीं तीं दैवतें आवडती। हे ममता निश्चितीं राजस॥ २७॥ काम्य कर्मीं आवडी देख। आप्त मानी सकामकर्मक। सत्य स्वर्गादि विषयसुख। हे ममता निष्टंक राजस॥ २८॥ हे रजोगुणाची ममता। तुज म्यां सांगीतली तत्त्वतां। तमोगुणाची जे अवस्था। ऐक व्यवस्था सांगेन॥ २९॥ आपुल्या देहासी जो हूंतूं करी। कां पूर्वपूर्वजांचा वैरी। त्यांच्या लेंकरांसीं वैर धरी। हे बुद्धि निष्ठुरी तामस॥ १३०॥ पुढें लेंकुरांचे लेंकुरीं। वृत्तिभूमि जीविकेवरी। आडवा येईल स्वगोत्री। त्यासी वैर धरी तामस॥ ३१॥ ऐसे पूर्वापर माझे वैरी। मी निर्दाळीन संसारीं। यालागीं रिघे अभिचारीं। ते ममता खरी तामस॥ ३२॥ अभिचारिकी जे मंत्रज्ञ। ते मानी माझे आप्त स्वजन। शाकिनीडाकिनीउपासन। हे ममता संपूर्ण तामसी॥ ३३॥ असो बहुसाल व्युत्पत्ती। एकेक गुणीं अनंत शक्ती। हे तिन्ही जेथ मिश्र होती। सन्निपातवृत्ती या नांव॥ ३४॥ कफ वात आणि पित्त। तिन्ही एकत्र जेथ होत। तेथ उपजे सन्निपात। तेवीं सन्निपात येथ त्रिगुणांचा॥ ३५॥ संकल्पविकल्पात्मक मन। पंच विषय पंच प्राण। दशेंद्रियीं व्यवहार संपूर्ण। तेथ उपजे त्रिगुणसन्निपात॥ ३६॥ तेंचि सन्निपात निरूपण। त्रिगुणांचें मिश्रलक्षण। स्वयें सांगताहे श्रीकृष्ण। मिश्रगुणसन्निपातू॥ ३७॥
धर्मे चार्थे च कामे च यदासौ परिनिष्ठित:।
गुणानां सन्निकर्षोऽयं श्रद्धारतिधनावह:॥ ७॥
पुरुषाच्या ठायीं क्रियाकर्म। क्षणें स्वधर्म क्षणें काम। क्षणें वाढवी अर्थोद्यम। हा संक्रम त्रिगुणांचा॥ ३८॥ गुणसंक्रमण करी काय। त्रिगुणीं धर्म त्रिविध होय। कामही त्रिविध होऊनि ठाय। अर्थस्वार्थनिर्वाह त्रिगुणात्मक॥ ३९॥ येथ कर्मासी दोष नाहीं। दोष कर्त्याचे बुद्धीच्याठायीं। तो जे कल्पना करील कांहीं। तें फळ पाहीं स्वयें भोगी॥ १४०॥ सोनें वंद्य सोनेपणें। त्याचें स्वयें घडविल्या सुणें। वंद्य तेंचि निंद्य करणें। तेवीं स्वकर्म दूषणें गुणबुद्धी॥ ४१॥ भूमि सहजें शुद्ध आहे। जें पेरिजे तें पीक होये। तेवीं स्वकर्म शुद्ध स्वयें। फलभोगू लाहे गुणवृत्ती॥ ४२॥ वाचा सहज सरळ गोमटी। रामनामें जोडे ब्रह्मपुष्टी। वृथा जाय करितां चावटी। भोगी निंदेपाठीं महापाप॥ ४३॥ तेवीं स्वधर्म श्रद्धायुक्त। पुरुषास करी विरक्त। तेथ त्रिगुणांचा सन्निपात। श्रद्धा छळित तें ऐक॥ ४४॥ स्वधर्मकर्मीं श्रद्धा जोडे। क्षणैकें लागे विरक्तीकडे। क्षणें भोगफळाशावाढे। क्षणैक पडे ममतासंधीं॥ ४५॥ तैशीच कामाचीही रती। क्षणैक निष्कामीं अतिप्रीती। क्षणें स्त्रीभोगआसक्ती। क्षणें कामरती परद्वारीं॥ ४६॥ याचिपरी धनाची जोडी। क्षणैक द्रव्याशा सोडी। क्षणैक अर्थाची अतिगोडी। क्षणैक आसुडी परद्रव्य॥ ४७॥ त्रिविध धर्म त्रिविध कर्म। त्रिविध रूपें धनागम। या गुणवृत्तीस्तव स्वधर्म। सांडूनि अकर्म करी प्राणी॥ ४८॥ एवं धर्मअर्थकामांआंत। गुणसन्निपात अनंत। फोडूनि सांगतां येथ। वाढेल ग्रंथ अनिवार॥ ४९॥ यालागीं गुणसन्निपात। सांगीतला संकलित। तेचि अर्थीं श्रीकृष्णनाथ। असे सांगत संक्षेपें॥ १५०॥
प्रवृत्तिलक्षणे निष्ठा पुमान्यर्हि गृहाश्रमे।
स्वधर्मे चानुतिष्ठेत गुणानां समितिर्हि सा॥ ८॥
पुरुषासी जो गृहाश्रम। तो जाणावा केवळ काम। तेथ नित्यनैमित्तिक कर्म। हा स्वधर्म चित्तशुद्धी॥ ५१॥ गृहाश्रमीं हिंसा पंचसून। यालागीं तमोगुण प्रधान। गृहीं स्त्रीभोग पावे जाण। रजोगुण या हेतू॥ ५२॥ नित्यनैमित्तिक स्वधर्म। हें गृहस्थाचें निजकर्म। हें चित्तशुद्धीचें निजवर्म। सत्त्व सुगम या हेतू॥ ५३॥ गृहाश्रमप्रवृत्ति जाण। सदा मिश्रित तिनी गुण। गुणीं गुणवंत करून। कर्माचरण करविती॥ ५४॥ न रंगतां तेणें रंगें। स्फटिक तद्रूप भासों लागे। तेवीं गुणात्मा गुणसंगें। वर्तों लागे गुणकर्मीं॥ ५५॥ जेवीं कां कसवटी आपण। कसूनि दावी सुवर्णवर्ण। तेवीं पुरुषाची क्रिया जाण। दावी गुणलक्षणविभाग॥ ५६॥
पुरुषं सत्त्वसंयुक्तमनुमीयाच्छमादिभि:।
कामादिभी रजोयुक्तं क्रोधाद्यैस्तमसा युतम्॥ ९॥
इंद्रियनिग्रहो यथोचित। जो शमदमीं सदा क्रीडत। शांति वसे जयाआंत। तो जाण निश्चित सात्त्विक॥ ५७॥ जो सदा फळकामें कामुक। वांछी संसारभोगसुख। द्रव्यार्थीं अतिदांभिक। रजोगुणी लोक तो जाण॥ ५८॥ ज्यासी स्वधर्मीं नाहीं रती। आवडे अधर्मप्रवृत्ती। क्रोधलोभें गिळिली स्फूर्ती। तो जाण निश्चितीं तामसू॥ ५९॥ एवं देखोनि कर्माचरण। लक्षिजे पुरुषलक्षण। या नांव गा अनुमान। विवेकसंपन्न जाणती॥ १६०॥ सामान्यत: तिन्ही गुण। सांगीतलें निरूपण। हें न कळे म्हणेल मन। गुणवृत्ति भिन्न अवधारीं॥ ६१॥
यदा भजति मां भक्त्या निरपेक्ष: स्वकर्मभि:।
तं सत्त्वप्रकृतिं विद्यात्पुरुषं स्त्रियमेव वा॥ १०॥
स्वकर्मीं वांछित फळ। तेंचि मायेचें दृढ पडळ। ते फळाशा सांडोनि केवळ। जे भजनशीळ मद्रूपीं॥ ६१॥ करूनि फळाशेचें शून्य। स्वधर्में करिती माझें भजन। पुरुष अथवा स्त्रिया जाण। ते सत्त्वसंपन्न निश्चित॥ ६३॥ देहावयवलिंगदर्शन। तेणें स्त्रीपुरुषनामाभिधान। परी आत्मा आत्मीं नाहीं जाण। जीवत्व समान स्त्रीपुरुषीं॥ ६४॥ चित्तवृत्तिक्रियाचरण। त्या नांव गा कर्म जाण। तेथ निरपेक्ष तें माझें भजन। स्वधर्म संपूर्ण या नांव॥ ६५॥ ऐशिया स्वधर्मवृत्ती। जेथ प्रगटे माझीभक्ती। ते ते सात्त्विक प्रकृती। जाण निश्चितीं उद्धवा॥ ६६॥ आशंका॥ कर्म करितां फळाशावाढे। तो फळभोग भोगणें पडे। स्वकर्में भक्ति केवीं घडे। कर्म तें कुडें अत्यंत॥ ६७॥ कर्म करितां फळ बाधक। न करितां प्रत्यवाय नरक। कर्में कर्मबद्ध लोक। केले देख संसारीं॥ ६८॥ जीव होता जो स्वतंत्र। तो कर्में केला परतंत्र। एवढें कर्माचें चरित्र। अतिविचित्र बाधक॥ ६९॥ स्वकर्में भगवद्भक्ती। म्हणशी घडे कैशा रीतीं। तेचि अर्थींची उपपत्ती। स्वयें श्रीपती सांगत॥ १७०॥ सर्प धांवोनि धरिल्या तोंडीं। तो सर्वांगीं घाली आढी। तेणें धाकें जो सोडी। तरी तो विभांडी महाविखें॥ ७१॥ ते सर्पबाधेची सांकडी। निवारी मंत्रवादी गारुडी। तेवीं कर्मीं कर्मबाधा गाढी। निवारी रोकडी गुरुरावो॥ ७२॥ रिघतां सद्गुरूसी शरण। कर्म करवी ब्रह्मार्पण। हेंचि निरपेक्षलक्षण। उद्धवा जाण निश्चित॥ ७३॥ ब्रह्म कर्माचें प्रकाशक। कर्म तितुकें ब्रह्मात्मक। हेंचि मदर्पण चोख। माझें भजन देख या रीतीं॥ ७४॥ सर्वेंद्रियीं ज्ञानस्फूर्ती। ते ब्रह्मींची ब्रह्मशक्ती। ऐसेनि निश्चयें कर्मस्थिती। स्वकर्मभक्ति या नांव॥ ७५॥ ऐसेनि स्वकर्में स्वाभाविक। जे मज भजती भाविक। ते ते शुद्ध सात्त्विक लोक। जाण निष्टंक उद्धवा॥ ७६॥ स्वधर्म सर्वथा निष्फळ। म्हणती ते मूर्ख केवळ। स्वधर्म निरसी चित्तमळ। कर्म समूळ निर्दळी॥ ७७॥ एवढी स्वधर्माची जोडी। सांडूनि वांछिती विषयगोडी। तें तें राजसें बापुडीं। केवळ वेडीं विषयार्थीं॥ ७८॥ विषयफळ वांछितां देख। देह धरणें आवश्यक। देहसंभव दु:खदायक। स्वर्ग नरक फळ भोगी॥ ७९॥ यापरी जनीं दु:खदाती। राजसतामसप्रकृती। ऐक त्या दोनी गुणवृत्ती। विशद तुजप्रती सांगेन॥ १८०॥
यदा आशिष आशास्य मां भजेत स्वकर्मभि:।
तं रज:प्रकृतिं विद्याद्धिंसामाशास्य तामसम्॥ ११॥
जो कां आचरोनि स्वधर्म। वांछी नाना फळकाम। तें तें जाण काम्य कर्म। राजस धर्म या नांव॥ ८१॥ जो अभ्यंतरीं अतिसकाम। तो जे जे आचरे कर्मधर्म। ते ते अवघेचि सकाम। फळसंभ्रम निजहेतू॥ ८२॥ स्वरूपीं काम्य कर्म नाहीं। कामना काम्य करी पाहीं। सोनें स्वभावें असे ठायीं। लेणें उपायीं स्वयें कीजे॥ ८३॥ स्वकर्म स्वभावें पवित्र जाण। स्वधर्में माझें शुद्ध भजन। तेथ कामनाफळ कामून। काम्य आपण स्वयें कीजे॥ ८४॥ फळकामें जें माझें यजन। तें केवळ फळाचेंचि भजन। सकामें जें स्वधर्माचरण। ते प्रकृति जाण राजस॥ ८५॥ ऐसऐशिये प्रकृतीचा विलास। स्त्री अथवा हो कां पुरुष। तें तें जाण पां राजस। ऐक तामस गुणवृत्ति॥ ८६॥ क्रोधयुक्त अंत:करण। तेणेंसीं ज्याचें स्वधर्माचरण। फळ वांछी शत्रु मरण। ते प्रकृति जाण तामसी॥ ८७॥ जेथें द्वेषें बांधलें घर। जे ठायीं क्रोध अनिवार। जो भूतमात्रीं निष्ठुर। ज्याची प्रकृति क्रूर सर्वदा॥ ८८॥ ऐशिया स्वभावावरी। नर अथवा हो कां नारी। ते ते तामस संसारीं। निजनिर्धारीं उद्धवा॥ ८९॥ जीव स्वरूपें चैतन्य पहा हो। त्यासी ‘मां भज’ कां म्हणे देवो। जीवासी कां सेवकभावो। सेव्य देवो कैसेनी॥ १९०॥ येच अर्थींचें निरूपण। कृष्ण सांगताहे आपण। सेव्यसेवकलक्षण। मायागुणसंबंधें॥ ९१॥
सत्त्वं रजस्तम इति गुणा जीवस्य नैव मे।
चित्तजा यैस्तु भूतानां सज्जमानो निबध्यते॥ १२॥
बांधोनि नाणितां आया। जेवीं देहाधीन असे छाया। तेवीं भगवंताधीन माया। नातळोनियां वर्तवी॥ ९२॥ माया वर्तविता निवर्तविता। स्वामी भगवंत तत्त्वतां। यालागीं मायाअध्यक्षता। त्यासीचि सर्वथा वेद बोले॥ ९३॥ सूर्य अंधारातें नाशी। परी तो संमुख न ये त्यापाशीं। तेवीं मायानियंता हृषीकेशी। परी माया देवासी दृष्ट नव्हे॥ ९४॥ माझें जें देखणेपण। तेंचि मायेचें मुख्य लक्षण। मजपाशीं माया जाण। गुणाभिमानेंसीं नाहीं॥ ९५॥ मायाबिंबित चैतन्य। त्यासी बोलिजे जीवपण। त्या जीवासी त्रिगुणीं बांधोन। देहाभिमान दृढ केला॥ ९६॥ जीवासी लागतां देहाभिमान। तो झाला मायाधीन। मायानियंता श्रीनारायण। तो स्वामी जाण जीवाचा॥ ९७॥ जीव गुणाभिमानें बद्धक। यालागीं झाला तो सेवक। आत्मा गुणातीत चोख। बंधमोचक जीवाचा॥ ९८॥ यापरी सेव्यसेवकभावो। विभाग दावोनियां पहा हो। त्रिगुणगुणांचा अन्वयो। विशद देवो स्वयें सांगे॥ ९९॥ गुण तिन्ही समसमान। त्यांमाजीं क्षोभोनियां जाण। जो जो वाढे अधिक गुण। तें तें लक्षण हरि सांगे॥ २००॥ ब्रह्म निर्मळत्वें प्रसिद्ध। कर्म शोधकत्वें अतिशुद्ध। येथ कर्मीं उपजे कर्मबाध। तो चित्तसंबंध गुणक्षोभें॥ १॥ कर्मब्रह्मीं दोष नाहीं। दोष चित्तवृत्तीच्या ठायीं। तोही गुणक्षोभें पाहीं। घाली अपायीं पुरुषातें॥ २॥ येचि अर्थींचें निरूपण। सांगीतलें मिश्रलक्षण। आतां वाढल्या एकेक गुण। गुणलक्षण तें ऐक॥ ३॥ जो गुण वाढे अति उन्नतीं। इतर त्यातळीं वर्तती। ते काळींची पुरुषस्थिती। उद्धवाप्रती हरि सांगे॥ ४॥
यदेतरौ जयेत्सत्त्वं भास्वरं विशदं शिवम्।
तदा सुखेन युज्येत धर्मज्ञानादिभि: पुमान्॥ १३॥
समूळ फळाशा त्यागूनी। निर्विकल्प निरभिमानी। जो लागे स्वधर्माचरणीं। तैं रज तम दोनी जिणे सत्त्व॥ ५॥ जैं भाग्याचें भरण उघडे। तैं हरिकथाश्रवण घडे। मुखीं हरिनामकीर्ति आवडे। तेणें सत्त्व वाढे अतिशुद्ध॥ ६॥ कां दैवें जोडिल्या सत्संगती। श्रवणीं श्रवण लांचावती। वाचा लांचावे नामकीर्ती। अतिप्रीतीं अहर्निशीं॥ ७॥ ऐसऐशिया अनुवृत्ती। रज तम दोनी क्षीण होती। सत्त्व वाढे अनुद्वेगवृत्तीं। त्या सत्त्वाची स्थिति समूळ ऐक॥ ८॥ भास्करत्वें प्रकाश बहुळ। विशदत्वें अतिनिर्मळ। शिव म्हणिजे शांत सरळ। हें सत्त्वाचें केवळ स्वरूप मुख्य॥ ९॥ हे सत्त्वाची सत्त्ववृत्ती। आतुडे ज्या साधकाहातीं। ते काळींची पुरुषस्थिती। ऐक तुजप्रती सांगेन॥ २१०॥ तैं विवेकाचें तारूं आतुडे। वैराग्याचें निजगुज जोडे। सर्वेंद्रियीं प्रकाश उघडे। शिगे चढे स्वधर्म॥ ११॥ ते काळीं जन अधर्मता। गर्व अभिमान असत्यता। बलात्कारेंही शिकवितां। न करी सर्वथा अधर्म॥ १२॥ निकट असतां दु:खसाधन। सात्त्विक सदा सुखसंपन्न। बलात्कारें क्षोभवितां मन। सात्त्विक जाण क्षोभेना॥ १३॥ ऐशिया निजसत्त्व दृष्टी। सुख सुखा येतां भेटी। त्यासी स्वानंदेंकोंदे सृष्टीं। शुद्ध सत्त्वपुष्टी या नांव॥ १४॥ ऐसें विशद सत्त्व जयांपाशीं। शमदम सेविती तयांसी। वैराग्य लागे पायांसी। शुद्ध सत्त्वराशी ते उद्धवा॥ १५॥ तैसेंचि सत्त्व तम जिणोन। जैं वाढे गा रजोगुण। तैं राजसाचें लक्षण। ऐक संपूर्ण हरि सांगे॥ १६॥
यदा जयेत्तम: सत्त्वं रज: सङ्गं भिदा चलम्।
तदा दु:खेन युज्येत कर्मणा यशसा श्रिया॥ १४॥
रजोवृद्धीचें कारण। देहीं उपजे ज्ञानाभिमान। पदोपदीं देखे दोषगुण। वांछी सन्मान प्रतिष्ठा॥ १७॥ नवल रजोगुणाची ख्याती। ज्ञातेपणें कामासक्ती। नाना भोग वांछी चित्तीं। तेणें रजाची प्राप्ती अनिवार॥ १८॥ ऐसेनि रजोगुण वाढोनि वाढी। सत्त्वतमांतें तळीं पाडी। त्या रजाची स्वरूपता मोडी। ऐक निरवडी सांगेन॥ १९॥ श्लोकीं त्रैपदीं प्रबळ। रज संगभिदाबळ। बोलिला रजोगुण केवळ। तेंचि विवळ हरि सांगे॥ २२०॥ संग म्हणिजे देहाभिमान। भेद म्हणिजे मी माझेपण। बळ म्हणिजे काम गहन। आग्रहो पूर्ण प्रवृत्तीचा॥ २१॥ देहाभिमानें दु:ख उठी। भेदें भय लागे पाठी। त्या नश्वर देहाचिया पुष्टी। काम्यकामाठी कर्माची मांडी॥ २२॥ ज्या कर्माचेनि कैवाडें। यश श्री उदंड जोडे। तें तें कर्म वाढवी पुढें। हें रजोगुणें घडे आचरण॥ २३॥ मी एक पवित्र त्रिजगतीं। माझीच उत्तम कर्मस्थिती। प्रवृत्ति मान्यता आसक्ती। जे जाणावी स्थिती राजस॥ २४॥ रजाचें बळ उद्भट। कर्म आदरी अचाट। वाढवी कर्मकचाट। तो जाण श्रेष्ठ राजस॥ २५॥ बाहेर दिसे सात्त्विकस्थिती। अंतरीं कर्मवासना द्रव्यासक्ती। ज्यासी प्रिय आवडे चित्तीं। तो जाण निश्चितीं राजसू॥ २६॥ जेव्हां सत्त्व रज दोनी गुण। जिणोनि तम वाढे पूर्ण। ते काळींचें पुरुषलक्षण। स्वयें नारायण सांगत॥ २७॥
यदा जयेद्रज: सत्त्वं तमो मूढं लयं जडम्।
युज्येत शोकमोहाभ्यां निद्रया हिंसयाऽऽशया॥ १५॥
रज सत्त्व करूनि गूढ। जैं तमोगुण होय रूढ। तैं तो पुरुषातें सदृढ। करी जडमूढ अतिस्तब्ध॥ २८॥ विश्वासूनि वाडेंकोडें। जैं परद्रव्य बुडवणें पडे। कां परदारागमन घडे। तैं तेणेंवाढे तमोगुण॥ २९॥ स्वमुखें परापवाद बोलणें। स्वयें साधुनिंदा करणें। संतसज्जनां द्वेषणें। तैं तमाचें ठाणें अनिवार॥ २३०॥ धुईचेनि आलेपणें। पडे सूर्यासी झांकणें। तेवीं विवेकाचें जिणें। तमोगुणें ग्रासिजे॥ ३१॥ सत्त्वगुण प्रकाशक। रज प्रवृत्तिप्रवर्तक। दोनींतें गिळूनि देख। तमाचें आधिक्य अधर्में वाढे॥ ३२॥ करितां पूज्याचें हेळण। साधूचे देखतां दोषगुण। तेणें खवळला तमोगुण। त्याचें स्वरूप पूर्ण तें ऐक॥ ३३॥ तमोगुण वाढल्या प्रौढ। स्फूर्तिमात्र होय मूढ। लयो उपजवोनि दृढ। करी जड जीवातें॥ ३४॥ कार्याकार्यविवेकज्ञान। ते स्फूर्ति अंध होय पूर्ण। या नांव गा मूढपण। ऐक चिन्ह लयाचें॥ ३५॥ जागृतीमाजीं असतां चित्त। अर्थ स्वार्थ परमार्थ। कांहीं स्फुरेना कृत्याकृत्य। लयो निश्चित या नांव॥ ३६॥ समस्ताही इंद्रियवृत्ती। अनुद्यमें स्तब्धगती। नि:शेष लोपे ज्ञानशक्ती। जडत्वप्राप्ती या नांव॥ ३७॥ मूढत्वें पावे शोक दु:ख। जडत्वें मिथ्या मोह देख। मोहास्तव होय पातक। अतिअविवेक अधर्मीं॥ ३८॥ ऐक लयाचें कौतुक। अहोरात्र निद्रा अधिक। निद्रेवेगळें ब्रह्मसुख। नावडे देख तामसा॥ ३९॥ पूर्ण वाढल्या तमोगुण। ऐसें होय पुरुषलक्षण। वाढल्या सत्त्वादि गुण। फळ कोण तें हरि सांगे॥ २४०॥
यदा चित्तं प्रसीदेत इन्द्रियाणां च निर्वृति:।
देहेऽभयं मनोऽसङ्गं तत्सत्त्वं विद्धि मत्पदम्॥ १६॥
वाढलिया सत्त्वगुण। चित्त सदा सुप्रसन्न। कामक्रोधलोभाचें स्फुरण। सर्वथा जाण स्फुरेना॥ ४१॥ जें चित्त वणवणी विषयांलागीं। तें उदास होय विषयभोगीं। विषय आदळतांही अंगीं। तैं विषयसंगीं विगुंतेना॥ ४२॥ जेवीं जळामाजीं जळस्थ। पद्मिणीपत्र जळीं अलिप्त। तेवीं विषयांमाजीं चित्त। विषयातीत मद्बोधें॥ ४३॥ सदा मरणभय देहासी। तें मरण आलिया देहापाशीं। भय नुपजे सात्त्विकासी। भावें मत्पदासी विनटले॥ ४४॥ जंववरी भासे मीतूंपण। तंववरी अवश्य बाधी मरण। सात्त्विक मत्पदीं अभिन्न। यालागीं मरणभय त्या नाहीं॥ ४५॥ सात्त्विक मत्पदीं अनन्य शरण। यालागीं बाधीना जन्ममरण। या स्थितीं वर्तवी सत्त्वगुण। आतां ऐक लक्षण रजाचें॥ ४६॥
विकुर्वन् क्रियया चाधीरनिर्वृत्तिश्च चेतसाम्।
गात्रास्वास्थ्यं मनो भ्रान्तं रज एतैर्निशामय॥ १७॥
खवळलिया रजोगुण। विषयचिंता अतिदारुण। कर्मेंद्रियीं क्रियाभरण। नाना परींचें जाण उपपादी॥ ४७॥ शरीर असतांही स्वस्थ। मन चिंतातुर अतिभ्रांत। वाढवितां विषयस्वार्थ। दु:खी होत सर्वदा॥ ४८॥ असतां पुत्रवित्तसंपत्ती। अधिक स्वार्थ वाढवी चित्तीं। राजसाची चित्तवृत्ती। न मनी निवृत्ती क्षणार्ध॥ ४९॥ नसतां विकाराचें कारण। चित्तीं विकार चिंती आपण। हेंचि राजसाचें लक्षण। मुख्यत्वें जाण उद्धवा॥ २५०॥ रात्री नोहे पैं प्रबळ। ना दिवस नव्हे सोज्ज्वळ। जैसी झांबवली सांजवेळ। तैसा केवळ रजोगुण॥ ५१॥ सत्त्वरजांची उणखूण। तुज दाविली ओळखण। आतां ऐक तमोगुण। जड लक्षण तयाचें॥ ५२॥
सीदच्चित्तं विलीयेत चेतसो ग्रहणेऽक्षमम्।
मनो नष्टं तमो ग्लानिस्तमस्तदुपधारय॥ १८॥
चित्तीं चिंता अतिगहन। ते महामोहीं होय निमग्न। कोणेही अर्थींचें ज्ञान। हृदयीं जाण स्फुरेना॥ ५३॥ सुषुप्ती वेगळें अज्ञान। सदा पळे देखोनि ज्ञान। तेथ नवल कैसें झालें जाण। त्या ज्ञानातें अज्ञान गिळूनि ठाके॥ ५४॥ जागाचि परी निजेला दिसे। कर्म करी स्फुरण नसे। जेवीं कां आभाळांतिले अंवसे। रात्रीं चाले जैसें आंधळें॥ ५५॥ सकळ शरीराचा गोळा। होय आळसाचा मोदळा। हा तमोग्लानीचा सोहळा। पडळ ये डोळां चित्तवृत्ती॥ ५६॥ संकल्प-विकल्पांची ख्याती। उपजवीसदा मनोवृत्ती। त्या मनाची जड होय स्थिती। संकल्पस्फूर्ती स्फुरेना॥ ५७॥ आणिकही नवलस्थिती। चित्तासी नाठवे चित्तस्फूर्ती। एवढी वाढे तमाची ख्याती। मनोवृत्तिविनाशक॥ ५८॥ यापरी तमाचें बळ होय। तैं मनातें अज्ञान खाय। ते काळीं मन नष्टप्राय। मूर्च्छित राहे मूढत्वें॥ ५९॥ मन नि:शेष जैं नासतें। तैं महादु:ख कोण भोगितें। यालागीं तमाचेनि ऐक्यमतें। मन उरे तेथें जडमूढ॥ २६०॥ यापरी जे वर्तती गती। तेचि अत्यंत दु:खदाती। या नांव गा तमाची स्थिती। जाण निश्चितीं उद्धवा॥ ६१॥ वाढवितां गुणवृत्ती। कोणे गुणें कोण वाढती। येचि अर्थींची उपपत्ती। स्वयें श्रीपती सांगत॥ ६२॥
एधमाने गुणे सत्त्वे देवानां बलमेधते।
असुराणां च रजसि तमस्युद्धव रक्षसाम्॥ १९॥
दैवी आसुरी राक्षसी स्थिती। हे त्रिगुण गुणांची संपत्ती। जे जे ब्रह्मांडीं इंद्रियवृत्ती। तेचि स्थिती पिंडींही॥ ६३॥ ब्रह्मांडीं सकळ देव। महापुरुषाचे अवयव। पिंडींही तेचि स्वयमेव। वर्तती सर्व निजऐक्यें॥ ६४॥ उचित स्वधर्मशास्त्रस्थिती। निवृत्तिकर्मीं जे प्रवृत्ती। ऐशी जेथ इंद्रियवृत्ती। ते दैवी संपत्ती सत्त्वस्थ॥ ६५॥ कामाभिलाष दृढ चित्तीं। आणि स्वधर्मीं तरी वर्तती। ऐशी जे इंद्रियस्थिती। जे आसुरी संपत्ती राजसी॥ ६६॥ सलोभमोहें क्रोध चित्तीं। सदा अधर्मीं प्रवृत्ती। ऐशी जे इंद्रियस्थिती। ते राक्षसी संपत्ती तामसी॥ ६७॥ क्षणें सकाम क्षणें निष्काम। ऐसा जेथ वाढे स्वधर्म। तेथ देवां असुरां परम। होय संग्राम वृत्तीसी॥ ६८॥ चित्तीं वाढवूनि मोहभ्रम। अधर्मचि मानी स्वधर्म। तैं राक्षसाचा पराक्रम। देवासुरां परम निर्दाळी॥ ६९॥ सकामनिष्काम मोहभ्रमेंसी। वृत्ती वर्ते गा जयापाशीं। तेथ देवांअसुरांराक्षसांसीं। कलहो अहर्निशीं अनिवार॥ २७०॥ क्षणैक रति परमार्थीं। क्षणैक रति अर्थस्वार्थीं। क्षणैक होय अनर्थीं। परदारारती परद्रव्यें॥ ७१॥ ऐशिये गा चित्तवृत्तीं। कदा नुपजे निजशांती। मा परमार्थाची प्राप्ती। कैशा रीती होईल॥ ७२॥ साधक सर्वदा पुसती। कोण बाधा असे चित्तवृत्ती। ते बाधकत्वाची स्थिती। विशद तुजप्रती सांगीतली॥ ७३॥ एकचि गुण जैं पुरता जोडे। तैं एकविध वृत्ती वाढे। हें तंव सर्वथा न घडे। गुण गुणासी भिडे उपमर्दें॥ ७४॥ एकचि न जोडे गुणावस्था। यालागीं नव्हे एकविधता। तेणें अनिवार भवव्यथा। बाधी भूतां गुणक्षोभें॥ ७५॥ तम अधर्माकडे वाढे। रजोगुण देह कर्माकडे। सत्त्वगुणासी वाढी न घडे। मुक्तता जोडे कैसेनी॥ ७६॥ रजतमउभयसंधीं। सत्त्व अडकलें दोहींमधीं। तें वाढों न शके त्रिशुद्धीं। नैराश्यें वृद्धी सत्त्वगुणा॥ ७७॥ त्रिगुण गुणांची त्रिपुटी। आपण कल्पी आपल्या पोटीं। तेंचि भवभय होऊनियां उठी। लागे पाठीं बाधकत्वें॥ ७८॥ सत्त्वें देवांसी प्रबळ बळ। रजोगुणें दैत्य प्रबळ। तमोगुणें केवळ। आतुर्बळ राक्षसां॥ ७९॥ हे गुणवृत्तींची व्यवस्था। समूळ सांगीतली कथा। आतां त्रिगुणांच्या तीन अवस्था। ऐक तत्त्वतां सांगेन॥ २८०॥
सत्त्वाज्जागरणं विद्याद्रजसा स्वप्नमादिशेत्।
प्रस्वापं तमसा जन्तोस्तुरीयं त्रिषु सन्ततम्॥ २०॥
सत्त्वगुणाचिये स्थिति। नातळे स्वप्न आणि सुषुप्ती। जीवीं सदा नांदे जे जागृती। इंद्रियप्रवृत्ती सावध॥ ८१॥ रजोगुणाचेनि आधिक्यें। चित्तवृत्तीतें स्वप्न जिंके। जागृति सुषुप्ति दूरी ठाके। बैसला देखे स्वप्नचि॥ ८२॥ तमोगुण वाढल्या वाढी। जागृति स्वप्न दूरी दवडी। मग सुषुप्तीची अतिगाढी। आदळे रोकडी जीवाअंगीं॥ ८३॥ त्यासी सभे बैसविल्या पाहे। बोलतां-बोलतां डुलकी जाये। जेवितां जेवितांही पाहे। झोंपीं जाये कडकडां॥ ८४॥ क्षणां जागृति क्षणां सुषुप्ती। क्षणैक स्वप्नाची प्रतीती। हे त्रिगुणांची मिश्रित वृत्ती। जाण निश्चितीं उद्धवा॥ ८५॥ जागृति स्वप्न सुषुप्ती। तिहीं अवस्थांतें प्रकाशिती। यालागीं ते चौथी। तुरीय म्हणती सज्ञान॥ ८६॥ जे जागृतीतें जागवित। जे स्वप्नीं स्वप्नातें नांदवित। जे सुषुप्तीतें निजवित। त्यातें तुरीय म्हणत उद्धवा॥ ८७॥ जे तिहीं अवस्थांआंत। असोनि नव्हे अवस्थाभूत। जे निर्गुण निजनित्य। त्यातेंचि म्हणत तुरीय॥ ८८॥ जेवीं पुत्राचेनि जाहलेपणें। पुरुषें पिता नांव पावणें। तेवीं तिहीं अवस्थागुणें। तुरीय म्हणणें वस्तूसी॥ ८९॥ वस्तूवरी अवस्था भासे। भासली अवस्था सवेंचि नासे। त्या नाशामाजीं वस्तु न नासे। उरे अविनाशें तुरीय॥ २९०॥ तुरीय त्रिकाळीं संतत। यापरी जाणावें एथ। आतां गुणवृद्धिभूमिका प्राप्त। तोही वृत्तांत हरि सांगे॥ ९१॥
उपर्युपरि गच्छन्ति सत्त्वेन ब्राह्मणा जना:।
तमसाधोऽध आमुख्याद्रजसान्तरचारिण:॥ २१॥
सत्त्वगुणाचें आयतन। मुख्यत्वें ब्राह्मण जन। ते न करूनि ब्रह्मार्पण। स्वधर्माचरण जे करिती॥ ९२॥ त्यांसी स्वधर्माच्या कर्मशक्तीं। ऊर्ध्वलोकीं होय गती। लोकलोकांतरप्राप्ती। ब्राह्मण पावती ते ऐक॥ ९३॥ स्वर्गलोक महर्लोक। क्रमूनि पावती जनलोक। उल्लंघोनियां तपोलोक। पावती सात्त्विक सत्यलोक पैं॥ ९४॥ वाढलिया रजोगुण। शूद्रादि चांडाळपण। पुढती जन्म पुढती मरण। अविश्रम जाण भोगवी॥ ९५॥ वाढलिया तमोगुण। पश्वादि योनि पावोन। दंश मशक वृक्ष पाषाण। योनि संपूर्ण भोगवी॥ ९६॥ प्राण्यासी अंतकाळीं जाण। देहांतीं जो वाढे गुण। त्या मरणाचें फळ कोण। तेंही श्रीकृष्ण स्वयें सांगे॥ ९७॥ अनन्य करितां माझी भक्ती। भक्तांसी अंतीं कोण गती। तेही विखींची उपपत्ती। श्लोकार्थीं हरि सांगे॥ ९८॥
सत्त्वे प्रलीना: स्वर्यान्ति नरलोकं रजोलया:।
तमोलयास्तु निरयं यान्ति मामेव निर्गुणा:॥ २२॥
संसारीं मुख्यत्वें त्रिगुण। तेथ वाढोनियां सत्त्वगुण। ज्यासी प्राप्त होय मरण। तो स्वर्गभोगीं जाण दिव्य देह पावे॥ ९९॥ सत्त्वे निमाल्या सात्त्विक। ते पावती स्वर्गलोक। रजोगुणें निमाल्या देख। त्या मनुष्यलोक मानवां॥ ३००॥ अंतीं वाढोनियां तमाधिक्य। तमोगुणें निमाल्या देख। ते भोगितीमहानरक। दु:खदायक दारुण॥ १॥ सप्रेम करितां माझी भक्ती। माझिया भक्तांसी देहांतीं। हृदयीं प्रकटे माझी मूर्ती। घवघविती निजतेजें॥ २॥ शंखचक्रगदादि संपूर्ण। पीतांबरधारी श्रीकृष्ण। ध्यानीं धरूनि पावे मरण। तो वैकुंठीं जाण मी होयें॥ ३॥ सर्वभूतीं मी आत्मा पूर्ण। ऐसें ज्याचें अखंडभजन। ते जितांचि तिन्ही गुण। जिणोनि निर्गुण पावती॥ ४॥ त्यांचे देहासी दैवें आल्या मरण। मजवेगळें नाहीं स्थान। ते निजानंदें परिपूर्ण। निजनिर्गुण स्वयें होती॥ ५॥ माझें स्वरूप निजनिर्गुण। अथवा वैकुंठींचें सगुण। दोन्ही एकचि निश्चयें जाण। सगुण निर्गुण समसाम्य॥ ६॥ स्वर्ग नरक मनुष्यलोक। प्राप्ति पावले निर्गुण चोख। त्यांच्या साधनांचें कौतुक। स्वयें यदुनायक सांगत॥ ७॥
मदर्पणं निष्फलं वा सात्त्विकं निजकर्म तत्।
राजसं फलसंकल्पं हिंसाप्रायादि तामसम्॥ २३॥
सकळ कर्मक्रियाचरण। संकल्पेंवीण आपण। सहजें होय ब्रह्मार्पण। हें निर्गुण साधन शोधितसत्त्वे॥ ८॥ वर्णाश्रमधर्म सकळ। आचरे परी न वांछी फळ। माझे भक्तीचें प्रेम प्रबळ। हें कर्म केवळ सात्त्विक॥ ९॥ माझें भजन हाचि स्वधर्म। याचि नांव गा निजकर्म। ऐसें ज्यासी कळे वर्म। सात्त्विक कर्म या नांव॥ ३१०॥ स्वधर्म आचरोनि सकळ। इंद्रादि देवां यजनशीळ। जो वांछी इहामुत्र फळ। हें कर्म केवळ राजस॥ ११॥ जे कर्मीं प्रकट हिंसा घडे। कां आभिचारिक करणें पडे। स्वरूपें जें कर्म कुडें। तें जाण धडपुडें तामस॥ १२॥ जेथ दांभिक कर्माचारू। जेथ साधूंसी अतिमत्सरू। जेथ निंदेचा प्रबळ भरू। तो कर्मादरू तामस॥ १३॥ आतां त्रिगुण आणि निर्गुण। यांचें चतुर्विध लक्षण। या श्लोकीं श्रीकृष्ण। स्वमुखें आपण सांगत॥ १४॥
कैवल्यं सात्त्विकं ज्ञानं रजो वैकल्पिकं च यत्।
प्राकृतं तामसं ज्ञानं मन्निष्ठं निर्गुणं स्मृतम्॥ २४॥
देहीं असोनि देहातीत। भूतीं भूतात्मा भगवंत। भूतां सबाह्य सभराभरित। हें ज्ञान निश्चित सात्त्विक॥ १५॥ भिन्न खाणी भिन्नाकार। भिन्न नांवें भिन्न व्यापार। तेथ वस्तु देखे अभिन्नाकार। हें ज्ञान साचार सात्त्विक॥ १६॥ करूनि वेदशास्त्रपठन। निर्धारितां निजज्ञान। सवेंचि विकल्पी आपण। विकल्प पूर्ण रजाचे॥ १७॥ करून वार्तिकांत व्युत्पत्ती। अद्वैत-निश्चयो नाहीं चित्तीं। आपण विकल्पी आपुल्या युक्ती। तें ज्ञान निश्चितीं राजस॥ १८॥ करूनि वेदशास्त्रश्रवण। होय शिश्नोदरपरायण। इंद्रियार्थीं श्रद्धा पूर्ण। तो केवळ जाण राजस॥ १९॥ एक निश्चयो नाहीं चित्तीं। विकल्प उपजती नेणो किती। हे रजोगुणाची ज्ञानवृत्ती। ऐक निश्चितीं तमोगुण॥ ३२०॥ महामोहो गिळी ज्ञानस्फूर्ती। मी जड अंध मानी निश्चितीं। नश्वर पदार्थीं आसक्ती। तें ज्ञान निश्चितीं तामस॥ २१॥ आहार निद्रा भय मैथुन। केवळ पशुप्राय जें ज्ञान। तें निश्चयें तामस जाण। ऐक निर्गुणविभाग॥ २२॥ कार्य कर्ता आणि कारण। त्रिपुटी त्रिगुणेंसी करूनि शून्य। केवळ जें चैतन्यघन। तें निर्गुण ज्ञान उद्धवा॥ २३॥ सत्त्वाचेनि निजउल्हासें। सर्वेंद्रियीं ज्ञान प्रकाशे। तें ज्ञानचि मानी वायवसें। मी ज्ञानरूपें असें अनादि॥ २४॥ सिंधुजळें सरिता वाहती। त्या आलिया सिंधूप्रती। तेणें उल्हासेना अपांत ती। तेवीं ज्ञानस्फूर्ती श्लाघेना॥ २५॥ रजोगुणें आलिया सकाम। त्यासी क्षोभूं न शके काम। म्हणे माझेनि चाले काम्य कर्म। शेखीं मी निष्काम निजांगें॥ २६॥ होतां काम्य कर्माचा सोहळा। जेवीं सूर्या न बाधी उन्हाळा। तेवीं काम्य कर्मीं मी जिव्हाळा। माझेनि सोज्ज्वळा काम सवेग॥ २७॥ तमोगुणाच्या झडाडा। पडिला महामोहाचा वेढा। न करितां मोहाचा निझाडा। मोहनिर्णय गाढा आपण पैं जाणे॥ २८॥ सूर्यो न दिसे जिकडे। अंधारू व्यापी तिकडे। तेवीं स्वरूपनिष्ठेपुढें। न बाधी सांकडें मोहाचें॥ २९॥ अंगीं आदळतां तिन्ही गुण। जो गजबजीना आपण। ते निजनिष्ठा निजनिर्गुण। उद्धवा जाण निश्चित॥ ३३०॥ अज्ञानाच्या अवसरीं। ज्ञानाची चाड न धरी। प्रवर्ततां कामाचारीं। निष्कामाचा न करी पांगडा॥ ३१॥ आदळतां मोहाचीं झटें। ज्याचा बोध कदा न पालटे। त्रिगुणीं निर्गुणत्वें राहाटे। माझिया निष्ठें मद्भक्त॥ ३२॥ त्रिगुणांचा त्रिविध वास। निर्गुण निजरहिवास। येचि अर्थीं हृषीकेश। विशद विलास सांगत॥ ३३॥
वनं तु सात्त्विको वासो ग्रामो राजस उच्यते।
तामसं द्यूतसदनं मन्निकेतं तु निर्गुणम्॥ २५॥
पवित्र आणि तीर्थभूत। विजन वन एकांत। ऐशिये वस्तीं सुखावे चित्त। तो वास निश्चित सात्त्विक॥ ३४॥ वस्ती व्यवहारीं व्यापारीं। कां सदा सन्मानें राजद्वारीं। विवाहमंडपामाझारीं। ज्यासी प्रीति भारी वस्तीसी॥ ३५॥ ज्यासी आवडे धनसंपदा। निकटवासें वसती प्रमदा। जो नगरीं ग्रामीं वसे सदा। हे वस्ती संपदा राजस॥ ३६॥ जेथ सन्मान वांछी चित्त। सदा क्षोभे विषयासक्त। ऐसऐसी वस्ती जेथ। ते जाण निश्चित राजस॥ ३७॥ जेथ साधुनिंदा जोडे। जेथ गुणदोषीं दृष्टि वाढे। ऐशिया ठायीं वस्ती आवडे। तें तामसाचें गाढें निवासस्थान॥ ३८॥ जेथ कलहाचें कारण। जेथ अविवेकी होय मन। वेश्या द्यूत मद्यसदन। हें निवासस्थान तामस॥ ३९॥ देवालयीं घवघविती। देखोनि माझी निजमूर्ती। साचार सुखावे चित्तवृत्ती। ते निर्गुण वस्ती उद्धवा॥ ३४०॥ अभेदभक्तांचें निजमंदिर। तें मज निर्गुणाचें निजघर। तेथ सुखत्वें ज्याची वृत्ति स्थिर। ते वस्ती साचार निर्गुण॥ ४१॥ निर्गुणासी घरठावो। हें बोलणें म्हणसी वावो। जेथ उपजे ब्रह्मसद्भावो। ते वस्ती पहा हो निर्गुण॥ ४२॥ विषयातीत निजस्थिती। सुखें सुखरूप राहे वृत्ती। ते निर्गुणाची निजवस्ती। जाण निश्चितीं उद्धवा॥ ४३॥ सांडूनि आकाराचें ज्ञान। निराकारीं सुखसंपन्न। वृत्ति स्थिरावे परिपूर्ण। ते वस्ती निर्गुण जनीं विजनीं॥ ४४॥ त्रिगुणसंगें त्रिविध कर्ता। निर्गुणलक्षणीं लक्षिजे चौथा। चतुर्विध कर्त्यांची व्यवस्था। ऐक आतां सांगेन॥ ४५॥
सात्त्विक: कारकोऽसङ्गी रागान्धो राजस: स्मृत:।
तामस: स्मृतिविभ्रष्टो निर्गुणो मदपाश्रय:॥ २६॥
कांटेनि कांटा फेडितां। जेवीं निवारे निजव्यथा। तेवीं संगें संगातें छेदितां। सात्त्विक कर्ता असंगी॥ ४६॥ सद्गुरुचरण सत्संगें। सकळ संग छेदी विरागें। सात्त्विक कर्ता निजांगें। विषयसंगें असंगी॥ ४७॥ फळाभिलाषेच्या चित्तीं गांठी। तेणें अंध झाली विवेकदृष्टी। राजस कर्ताफळाशेसाठीं। अतिदु:खकोटी स्वयें सोशी॥ ४८॥ नि:शेष हारपे विवेकज्ञान। स्मृति सैरा वळघे रान। नाठवे कार्य कारण। ऐसा कर्ता जाण तामस॥ ४९॥ अनन्य भावें हरीसी शरण। कर्मचाळक श्रीनारायण। कदा न धरी कर्माभिमान। हा कर्ता निर्गुण निश्चयें॥ ३५०॥ त्रिगुणांची श्रद्धा त्रिविध। निर्गुणाची श्रद्धा शुद्ध। येच अर्थींचें विशद। स्वयें गोविंद सांगत॥ ५१॥
सात्त्विक्याध्यात्मिकी श्रद्धा कर्मश्रद्धा तु राजसी।
तामस्यधर्मे या श्रद्धा मत्सेवायां तु निर्गुणा॥ २७॥
देह इंद्रिय चेतना प्राण। येणेंसीं स्फुरे जें मीपण। तेथ विवेक करूनियां पूर्ण। आपुलें मीपण आपण पाहे॥ ५२॥ देह नव्हें मी जडमूढत्वें। इंद्रियें नव्हें मी एकदेशित्वें। प्राण नव्हें मी चपळत्वें। मन चंचळत्वें कदा मी नव्हें॥ ५३॥ चित्त नव्हें मी चिंतकत्वें। बुद्धि नव्हें मी बोधकत्वें। ‘अहं’नव्हें मी बाधकत्वें। मी तों येथें अनादिसिद्ध॥ ५४॥ एवं मीपणाचें निजसार। विवंचूं जाणे बुद्धिचतुर। ते अध्यात्मश्रद्धा उदार। सात्त्विक नर सदा वाहती॥ ५५॥ जें जें मी नव्हें म्हणत जाये। तें मी देखल्या मीचि आहें। माझ्या मीपणाचे वंदिल्या पाये। मीचि मी ठायें कोंदोनी॥ ५६॥ हे अध्यात्मिकी शुद्ध श्रद्धा। सात्त्विकापाशीं वसे सदा। आतां राजसाची श्रद्धा। ऐक प्रबुद्धा सांगेन॥ ५७॥ मी एक येथें वर्णाश्रमी। मी एक येथें आश्रमधर्मीं। मी एक येथें कर्ता कर्मीं। हें मनोधर्मीं दृढ मानी॥ ५८॥ येणें भावार्थें कर्मतत्परू। कुशमृत्तिकेचा अत्यादरू। अतिशयें वाढवी शौचाचारू। विधिनिषेधां थोरू आवर्त भोंवे॥ ५९॥ दोषदृष्टीच्या रंगणीं। मिरवती गुणदोषांच्या श्रेणी। पवित्रपणाच्या अभिमानीं। ब्रह्मयासी न मनी शुचित्वें॥ ३६०॥ देहाभिमान घेऊनि खांदा। सत्य मानणें कर्मबाधा। ते हे राजसाची कर्मश्रद्धा। जाण प्रबुद्धा उद्धवा॥ ६१॥ अधिक अविवेक वाढे। जेणें अकर्म अंगीं घडे। अधर्माची जोडी जोडे। हे श्रद्धा आवडे तामसी॥ ६२॥ जेथ अपेयाचें पान। स्वेच्छा अभक्ष्यभक्षण। अगम्यादि घडे गमन। हे श्रद्धा संपूर्ण तामसी॥ ६३॥ अधर्म तोचि मानी धर्म। हें तामसी श्रद्धेचें वर्म। आतां निर्गुणश्रद्धा परम। उत्तमोत्तम ते ऐक॥ ६४॥ सर्व भूतीं भगवंत। ऐशिये श्रद्धे श्रद्धावंत। अनन्य भावें भूतां भजत। तो भजनभावार्थ निर्गुण॥ ६५॥ स्त्री पुत्र वित्त जीवित। मजलागीं कुरवंडी करित। अनन्य भावें जे मज भजत। ते श्रद्धा निश्चित निर्गुण॥ ६६॥ चारी पुरुषार्थ त्यागिती। उपेक्षूनि चारी मुक्ती। ऐक्यभावें मज भजती। ते श्रद्धासंपत्ती निर्गुण॥ ६७॥ निष्काम नामस्मरण। निर्लोभ हरिकीर्तन। भावार्थें जें जें भजन। ते श्रद्धा निर्गुण उद्धवा॥ ६८॥ त्रिगुणांचा त्रिविध आहारू। स्वयें सांगे शार्ङ्गधरू। निर्गुण आहाराचा प्रकारू। सखोल विचारू हरि सांगे॥ ६९॥
पथ्यं पूतमनायस्तमाहार्यं सात्त्विकं स्मृतम्।
राजसं चेन्द्रियप्रेष्ठं तामसं चार्तिदाशुचि॥ २८॥
पवित्र आणि हळुवार। सत्त्ववृद्धीसी हितकर। अप्रयासीं प्राप्ति साचार। सात्त्विक आहार या नांव॥ ३७०॥ अल्पाहार या नांव पथ्य। पवित्र म्हणिजे धर्मार्जित। तेंही अप्रयासानें प्राप्त। तो जाण निश्चित सात्त्विकाहार॥ ७१॥ गोड खरपूस आंबट। तळींव घोळींव तिखट। चिरींव चोळींव तुरट। वळींव वळिवट आळिलें॥ ७२॥ रसीं रसांतरमिळणी। पन्हीं कालवणीं शिखरिणी। कुडकुडीं निर्पूस सणाणी। आहारभरणी राजस॥ ७३॥ नाना परींच्या आवडी। सडिवा सोलिवा परवडी। रसनासुखाची अतिगोडी। तो आहार निरवडी राजस॥ ७४॥ नाना परींचे आयास। करूनि अतिप्रयास। आहार सेविती राजस। ऐक तामस भोजन॥ ७५॥ सेवितां दुर्गंधि उन्मादक। परिपाकें करी मूर्ख। अशुचि आणि दु:खदायक। हा आहार देख तामस॥ ७६॥ भगवंताचा भुक्तप्रमाद। साधुसज्जनांचें शेषशुद्ध। हा निर्गुण आहार प्रसिद्ध। ‘च’ कारें गोविंद बोलिला॥ ७७॥ ग्रासोग्रासीं गोविंद। येणेंस्मरणें अन्न शुद्ध। हा निर्गुण आहार प्रसिद्ध। ‘च’ कारें गोविंद बोलिला॥ ७८॥ ‘अन्नं ब्रह्म अहं च ब्रह्म’। पंक्तीकर तोही ब्रह्म। ऐसा ज्याचा भोजनानुक्रम। तो आहार परम निर्गुणत्वें॥ ७९॥ त्रिगुणांचें त्रिविध सुख। निर्गुण सुख अलोलिक। त्याही सुखाचा परिपाक। यदुनायक स्वयें सांगे॥ ३८०॥
सात्त्विकं सुखमात्मोत्थं विषयोत्थं तु राजसम्।
तामसं मोहदैन्योत्थं निर्गुणं मदपाश्रयम्॥ २९॥
सांडूनि विषयसुखाची स्फूर्तीं। आत्मसुखें सुखावे चित्तवृत्ती। ऐशिया निजसुखाची प्राप्ती। तें सुख निश्चितीं सात्त्विक॥ ८१॥ गंगापूर भरे उन्नतीं। तेणें अमर्याद वोत भरती। तेवीं आत्मसुखाचिये प्राप्ती। इंद्रियां तृप्ती स्वानंदें॥ ८२॥ नाना विषयांचें कोड। इंद्रियांचा अतिधुमाड। विषयसुख लागे गोड। तें सुख सुदृढ राजस॥ ८३॥ अतिनिंद्य आणि उन्मादी। तेंचि सुख आवडे बुद्धी। तामस सुखाची हे सिद्धी। जाण त्रिशुद्धी उद्धवा॥ ८४॥ हृदयीं प्रकटल्या माझी मूर्ती। विसरे संसाराची स्फूर्ती। त्यावरी जे होय सुखप्राप्ती। तें सुख निश्चितीं निर्गुण॥ ८५॥ सर्व भूतीं वसे भगवंत। तोचि मी हा तात्त्विकार्थ। ऐसेनि मदैक्यें सुखप्राप्त। तो निजसुखार्थ निर्गुण॥ ८६॥ देखिल्या निजात्मसुखस्वरूप। स्वयें होइजे सुखरूप। हे निर्गुणसुखाचे निजदीप। झडल्या पुण्यपाप पाविजे॥ ८७॥ आपण सुखस्वरूप सर्वांगीं। सुखस्वरूप स्वयें भोगी। हे निर्गुण सुखाची मागी। भक्तीं अंतरंगीं भोगिजे॥ ८८॥ कल्पांताचें पूर्ण भरितें। उरों नेदी नदीनदांतें। तेवीं निर्गुण सुख येथें। देहेंद्रियांतें उरो नेदी॥ ८९॥ जेवीं मृगजळीं जळ नाहीं। तेवीं परब्रह्माच्या ठायीं। प्रपंच स्पर्शिलाचि नाहीं। तें सुख निर्वाहीं निर्गुण॥ ३९०॥ ज्या सुखाची मर्यादा। करितां न करवे कदा। सुखें सुखस्वरूप होईजे सदा। हे सुखसंपदा निर्गुण॥ ९१॥ त्रिगुण आणि निर्गुण। यांचें दाविलें भेदलक्षण। आतां त्याचें उपसंहरण। ग्रंथांतीं जाण हरि करी॥ ९२॥
द्रव्यं देश: फलं कालो ज्ञानं कर्म च कारक:।
श्रद्धावस्थाऽऽकृतिर्निष्ठा त्रैगुण्य: सर्व एव हि॥ ३०॥
द्रव्यशब्दें आहार त्रिविध। देशशब्दें वनग्रामभेद। फळशब्दें सुखउद्बोध। सत्त्वसंबंधविभागें॥ ९३॥ काळशब्दें भगवद्भजन। कैवल्यनिष्ठा या नांव ज्ञान। कर्म म्हणिजे मदर्पण। कर्ता तो जाण असंगी॥ ९४॥ श्रद्धाशब्दें अध्यात्मिकी। अवस्थाशब्दें जागरणादिकी। आकृतिशब्दें उपरिलोकीं। देवतादिकीं क्रीडन॥ ९५॥ जो गुण वाढे देहांतीं। जेणें गुणें होय अंत:स्थिती। त्या नांव निष्ठा म्हणती। जाण निश्चतीं उद्धवा॥ ९६॥ भिन्न भिन्न भाग अनेक। किती सांगूं एकेक। अवघें जगचि त्रिगुणात्मक। जाण निष्टंक निजभक्ता॥ ९७॥ संसार समस्त त्रिगुण। यांमाजीं मी अवघा निर्गुण। हे तुज कळावया निजखूण। गुणनिरूपण म्यां केलें॥ ९८॥
सर्वे गुणमया भावा: पुरुषाव्यक्तधिष्ठिता:।
दृष्टं श्रुतमनुध्यातं बुद्धॺा वा पुरुषर्षभ॥ ३१॥
देखिजे अथवा ऐकिजे। कां मनें जें जें चिंतिजे। तें तें अवघेंचि जाणिजे। मायागुणकाजें त्रिगुणात्मक॥ ९९॥ करावया त्रिगुणांचें मर्दन। प्रकृतिनियंता पुरुष भिन्न। तो सर्वदा सर्वांगें निर्गुण। वर्तवी गुण निजसत्ता॥ ४००॥ पुरुषावेगळें समस्त। प्रकृतिकार्य मिथ्याभूत। त्यातें बोलिजे गुणवंत। जाण निश्चित उद्धवा॥ १॥ नरदेह पावोनियां येथ। जे न साधिती गुणातीत। ते नाडले हातोहात। निजस्वार्थ बुडाला॥ २॥ तैसी नव्हे तुझी मती। विनटलासी भगवद्भक्ती। तेव्हांचि तूं गुणातीतीं। जाण निश्चितीं जडलासी॥ ३॥ हरिभक्तांमध्यें वरिष्ठ। यालागीं निजमुखें वैकुंठ। उद्धवासी म्हणे पुरुषश्रेष्ठ। भाग्यें उत्कृष्ट तूं एक॥ ४॥ त्रिगुणगुणीं सविस्तारू। दृढ वाढला संसारतरू। त्याचे छेदाचा कवण प्रकारू। तो शार्ङ्गधरू सांगत॥ ५॥
एता: संसृतय: पुंसो गुणकर्मनिबन्धना:।
येनेमे निर्जिता: सौम्य गुणा जीवेन चित्तजा:।
भक्तियोगेन मन्निष्ठो मद्भावाय प्रपद्यते॥ ३२॥
सत्त्वादि तिन्ही गुण एथ। केवळ आणि मिश्रित। पुरुषातें संसारी करीत। गुणकर्मीं निश्चित बांधोनी॥ ६॥ त्रिगुणकर्मांस्तव जाण। जीवासी झालें दृढ बंधन। जेवीं घटामाजील जीवन। दावी आडकलेपण रविबिंबा॥ ७॥ घटीं भरल्या समळ जळ। त्यामाजीं रवि दिसे समळ। घटींचें डोलतांचि जळ। कांपे चळचळ रविबिंब॥ ८॥ तेवीं त्रिगुणांचें कर्माचरण। शुद्धासी आणी जीवपण। तें छेदावया जीवबंधन। भगवद्भजन साधावें॥ ९॥ जितावया गुणबंधन। रिघावें सद्गुरूसी शरण। तेथ मद्भावें करितां भजन। वाढे सत्त्वगुण अतिशुद्ध॥ ४१०॥ पायीं जडली लोहाची बेडी। ते लोहेंचि लोहार तोडी। तेवीं सत्त्वगुणाचिया वाढी। त्रिगुणांतें तोडी गुरुरावो॥ ११॥ तेथ प्रवेशावया गुणातीतीं। अवश्य करावी गुरुभक्ती। जे गुरुभजनीं विश्वासती। त्यांसी चारी मुक्ती आंदण्या॥ १२॥ ज्यासी गुरुचरणीं भगवद्भावो। त्याचे सेवेसी ये ब्रह्मसद्भावो। तेथ ब्रह्मसद्भावेंसी पहा हो। मी देवाधिदेवो सबाह्य तिष्ठें॥ १३॥ जो गुरुचरणीं अनन्य शरण। तो सहजें होय ब्रह्मसंपन्न। गुरुरूपें करितां माझें भजन। ब्रह्मसमाधान मद्भक्ता॥ १४॥ उद्धवा ऐसें माझें भजन। समूळ जाणशी तूं संपूर्ण। यालागीं ‘सौम्य’ हें विशेषण। स्वमुखें श्रीकृष्ण संबोधी॥ १५॥ भाग्यें नरदेह पावल्या जाण। अवश्य करावें माझें भजन। येचि अर्थींचें निरूपण। स्वमुखें श्रीकृष्ण प्रतिपादी॥ १६॥
तस्माद्देहमिमं लब्ध्वा ज्ञानविज्ञानसम्भवम्।
गुणसङ्गं विनिर्धूय मां भजन्तु विचक्षणा:॥ ३३॥
ज्या नरदेहाकारणें। अमर उत्कंठित मनें। त्या देहाचे जाहलेपणें। ज्ञान पावणें निष्टंक॥ १७॥ नरदेह पावल्या जाण। आपणचि नव्हे ब्रह्मज्ञान। तेथें करावें माझें भजन। देहाभिमान सांडूनी॥ १८॥ करितां माझें अनन्य भजन। सहजें वाढे सत्त्वगुण। सत्त्वगुणास्तव जाण। उपजे ज्ञान सविवेक॥ १९॥ विवेकज्ञानाचिये वृत्ती। रज तम दोनी झडती। शोधितसत्त्वाचिये स्थिती। अभेद भक्ती उल्हासे॥ ४२०॥ करितां माझें अभेद भजन। होय स्वानंदाचें स्वादन। त्या नांव बोलिजे विज्ञान। तेथ तिनी गुण मिथ्यात्वें॥ २१॥ नरदेह जोडलिया हातीं। प्राण्यासी एवढी प्राप्ती। यालागीं मनुष्यदेहीं भक्ती। अवश्य समस्तीं करावी॥ २२॥ हें भागवतींचें अतिगुह्य ज्ञान। मुख्यत्वेंसी भक्तिप्राधान्य। भावें करितां माझें भजन। स्त्रिया शूद्रजन उद्धरती॥ २३॥ नरदेह जोडल्या जाण। माझी भक्ति करिती विचक्षण। भजनें जिणोनि गुणागुण। ब्रह्म परिपूर्ण स्वयें होती॥ २४॥ पूर्ण ब्रह्माचिया प्राप्ती। निरपेक्ष माझी भक्ती। तोचि भजनभाव श्रीपती। पुन: पुन: श्लोकार्थीं दृढ दावी॥ २५॥
नि:सङ्गो मां भजेद्विद्वानप्रमत्तो जितेन्द्रिय:।
रजस्तमश्चाभिजयेत्सत्त्वसंसेवया मुनि:॥ ३४॥
सत्त्वं चाभिजयेद्युक्तो नैरपेक्ष्येण शान्तधी:।
करूनि विषयांची विरक्ती। हृदयीं नापेक्षावी मुक्ती। ऐशी निरपेक्ष माझी भक्ती। वाढत्या प्रीतीं करावी॥ २६॥ तेणें अनिवार सत्त्वशुद्धी। सर्व भूतीं भगवद्बुद्धी। दृढ वाढे गा त्रिशुद्धी। हे भजनसिद्धी साधकां॥ २७॥ ऐसें करितां माझें भजन। विस्मरणासी ये मरण। सर्वेंद्रियीं सावधपण। सहजें जाण ठसावे॥ २८॥ तेव्हां रज तम दोनी गुण। नि:शेष जाती हारपोन। शुद्धसत्त्वाचें स्फुरण। तेणें स्वानंद पूर्ण साधकां॥ २९॥ केवळ उरल्या सत्त्वगुण। साधका ऐसें स्फुरे स्फुरण। जगामाजीं एक पावन। धन्य धन्य मी होयें॥ ४३०॥ मी पावलों शुद्ध बोध। मज प्रकटला परमानंद। ऐसा सुखाचा जो स्फुंद। तो सत्त्वबोध साधकां॥ ३१॥ ऐसा उरला जो सत्त्वगुण। तो निवारावया साधन कोण। मी स्वयें सुखस्वरूप आपण। मज सुखाचें स्फुरण ते माया॥ ३२॥ गूळ गुळा गोडपणें पांगे। कीं दुधा दूध गोड लागे। तैसा सुखरूप मी सर्वांगें। वृथा सुखभोगे कां फुंजें॥ ३३॥ ऐशी साधकीं स्फूर्ति स्फुरे। तंव सत्त्वगुण स्वरूपीं विरे। तेव्हां सुखाचाही फुंद सरे। निजसुख उरे निजशांती॥ ३४॥ ऐसे निवारल्या तिनी गुण। केवळ उरे निर्गुण। तेचि अर्थींचें निरूपण। विशद श्रीकृष्ण सांगत॥ ३५॥
सम्पद्यते गुणैर्मुक्तो जीवो जीवं विहाय माम्॥ ३५॥
जीवो जीवविनिर्मुक्तो गुणैश्चाशयसम्भवै:।
वाढल्या सत्त्वगुणाचा हरिख। त्यातें निर्दळी शुद्ध सत्त्वविवेक। पाठी विवेकेंसीं सत्त्व देख। हारपे नि:शेख निजात्मरूपीं॥ ३६॥ ऐसे निमाल्या तिनी गुण। निमे कार्य कर्म कारण। लिंगदेहनाशे संपूर्ण। जीवासी जीवपण मिथ्या होय॥ ३७॥ तेव्हां कार्य कर्म कर्ता। भोग्य भोग आणि भोक्ता। ज्ञान ज्ञेय मी एक ज्ञाता। याची वार्ता असेना॥ ३८॥ ऐसें हारपल्या जीवपण। स्वयें सहजें निजनिर्गुण। होऊनि ठाके ब्रह्म पूर्ण। अहंसोहंपण सांडूनी॥ ३९॥ यापरी मद्भक्त जाण। ब्रह्म होती परिपूर्ण। तेंचि जाहलेपणाचें लक्षण। श्लोकार्धें श्रीकृष्ण सांगत॥ ४४०॥
मयैव ब्रह्मणा पूर्णो न बहिर्नान्तरश्चरेत्॥ ३६॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायामेकादशस्कन्धे पञ्चविंशोऽध्याय:॥ २५॥
प्रपंच एक पूर्वीं होता। हे समूळ मिथ्या वार्ता। पुढें होईल मागुता। हेंही सर्वथा असेना॥ ४१॥ जैसे आंत बाहेरी भाग। नेणे साखरेचें अंग। तैसें सबाह्याभ्यंतर चांग। ब्रह्म निर्व्यंग निजानंदें॥ ४२॥ ऐसें पावल्या ब्रह्म परिपूर्ण। साधकासी न ये मरण। प्रारब्धें देहीं उरल्या जाण। देहाभिमान बाधीना॥ ४३॥ बाह्य न देखे दृश्यदर्शन। अंतरीं नाहीं विषयस्फुरण। देहींचें न देखे देहपण। जीवन्मुक्तलक्षण या नांव॥ ४४॥ बाह्य देखे दृश्यप्रतीती। अंतरीं विषयांची आसक्ती। या नांव अज्ञानाची स्थिती। अविद्याशक्ती बाधक॥ ४५॥ तें निरसावया अविद्याबंधन। अवश्य करावें माझें भजन। हें जाणोनी साधुसज्जन। भक्तीसी प्राण विकिला॥ ४६॥ माझिये भक्तीपरती। आणिकनाहीं उत्तम गती। तेंही भजन अभेदयुक्तीं। तैं चारी मुक्ती कामाऱ्या॥ ४७॥ हृदयीं विषयाचीविरक्ती। वरी अभेदभावें माझी भक्ती। तें भजन अनन्य प्रीतीं। त्याचा मी श्रीपती आज्ञाधार॥ ४८॥ भक्तिनामाचा इत्यर्थ। माझे स्वरूपीं निजभावार्थ। येणेंचि लाभे परमार्थ। सुफळ शास्त्रार्थ या नांव॥ ४९॥ माझिये भक्तीचेनि नांवें। पशु पक्षी उद्धरावे। मा मानवी भजनभावें। म्यां अवश्यन्यावे निजधामा॥ ४५०॥ यालागीं सांडोनि व्युत्पत्ती। जाणतीं नेणतीं गा समस्तीं। भावें करावी भगवद्भक्ती। तैं निजात्मप्राप्ती अनायासें॥ ५१॥ भावें करितां माझें भजन। स्वयें निर्दळती तिन्हीगुण। सहजें प्रकटे निजनिर्गुण। हें सत्य श्रीकृष्ण बोलिला॥ ५२॥ जेथ उगवली गुणगुंती। तेथ प्रकटे निजशांती। हेंचि ये अध्यायीं श्रीपती। उद्धवाप्रती बोलिला॥ ५३॥ यालागीं जेथ भगवद्भक्ती। तेथ गुणजयो लाभे वृत्ती। सहजें प्रकटे निजशांती। निजात्मप्राप्ती स्वत:सिद्ध॥ ५४॥ ते निजभक्ति माझी जननी। ज्या पैठा केलों जनार्दनीं। एका जनार्दनचरणीं। मिळोनि मिळणीं भजतचि॥ ५५॥ पुढिले अध्यायीं कथा गहन। ऐलउर्वशीउपाख्यान। ज्या अध्यायाचें करितां पठण। अगम्यागमनदोष हरती॥ ५६॥ ज्या पुरूरव्याची विरक्ती। स्वमुखें वर्णील श्रीपती। वैराग्येंनिजात्मप्राप्ती। सभाग्य पावती वैराग्य॥ ५७॥ त्या वैराग्याचें निरूपण। अतिगोड निरूपी श्रीकृष्ण। श्रोतां कृपा करावी पूर्ण। द्यावें अवधान कथेसी॥ ५८॥ जे कथेचेनि अवधानें। दुरितदोषहोती दहनें। ब्रह्मीं ब्रह्मत्व पावणें। होऊनि ठाकणें चिन्मात्र॥ ५९॥ एवढॺा निरूपणाची गोडी। पुढिले अध्यायीं आहे फुडी। एका जनार्दनकृपा गाढी। परापरथडीप्रापक॥ ४६०॥ भावें धरितां जनार्दनचरण। बाधूं न शके बाधकपण। एका जनार्दना शरण। रसाळ निरूपण पुढें आहे॥ ४६१॥
इति श्रीभागवते महापुराणे एकादशस्कंधे श्रीकृष्णोद्धवसंवादे गुणनिर्गुणनिरूपणं नाम पञ्चविंशोऽध्याय:॥ २५॥ ॥ श्रीकृष्णार्पणमस्तु॥ श्लोक॥ ३६॥ ओव्या॥ ४६१॥
॥ श्री ॐ तत्सत्-श्रीकृष्ण प्रसन्न॥
अध्याय सव्विसावा
श्रीगणेशाय नम:॥ श्रीकृष्णाय नम:॥ ॐ नमो देव जगन्मोहन। मोहिनी मोहना आद्यकारण। कार्यकारणातीत चिद्घन। जय जनार्दन जगद्गुरू॥ १॥ जगासी पडे मायामोहन। तें तूं निर्दळिसी ज्ञानघन। जगीं जगद्रूप जनार्दन। कृपाळू पूर्ण दीनांचा॥ २॥ दीनासी देवमाया स्त्रीरूपें। भुलवी हावभावखटाटोपें। तें स्त्रीमोहादि मोहक रूपें। जनार्दनकृपें निर्दळिती॥ ३॥ जेथ वैराग्य वाढे संपूर्ण। तेथ जनार्दनाची कृपा पूर्ण। वैराग्य तेथ ब्रह्मज्ञान। सहजें जाण ठसावे॥ ४॥ जीव सहजें ब्रह्मचि आहे। तो मायागुणें जीवत्व वाहे। जेवीं भद्रीं निजेलेनि रायें। तो स्वप्नींचें लाहे रंकत्व॥ ५॥ त्यासी राजपदा यावया जाण। सेवक करिती थापटण। तेवीं वैराग्य निर्दळी त्रिगुण। जीवा ब्रह्मपण स्वयंभचि॥ ६॥ ऐसें स्वयंभ जोडल्या ब्रह्म पूर्ण। तेव्हां स्त्री पुरुष हें मिथ्या ज्ञान। मृषा दृश्याचें दृश्यभान। भोग्यभोक्तेपण असेना॥ ७॥ असो साधकासी देवमाया। स्त्रीरूपें ये भुलवावया। तेथ स्मरतां भावें गुरुराया। जाय विलया स्त्रीबाधू॥ ८॥ सद्गुरूचें निजनाम एक। निवारी बाधा महादोख। वैराग्य उपजवी अलोलिक। तेणें होय निजसुख साधकां॥ ९॥ निर्विशेष निजसुखदाता। आम्हां सद्गुरूचि तत्त्वतां। त्याचे चरणीं ठेवितां माथा। सुखसंपन्नता साधकां॥ १०॥ संत साधकांची निजमाउली। शांति निजसुखाची साउली। जनार्दन कृपेच्या पाउलीं। कथा चालिली यथार्थ॥ ११॥ हाता आलिया निजनिर्गुण। साधक होती सुखसंपन्न। तदर्थ करावें माझें भजन। हें बोलिला श्रीकृष्ण पंचविसावां॥ १२॥ भावें करितां भगवद्भजन। देव दारारूपें करिती विघ्न। तें निर्दळावया जाण। माझें नामस्मरण करावें॥ १३॥ अच्युत हें स्मरतां नाम। प्रतापें निर्दळी कर्माकर्म। सकळ पातकें करी भस्म। दाटुगें नाम हरीचें॥ १४॥ नामें होईजे विरक्त। नामें निर्मळ होय चित्त। नामें साधे गुणातीत। नामें निर्मुक्त भवपाश॥ १५॥ नामीं लोलिंगत चित्त। भवभय रिघों न शके तेथ। नामीं विश्वास ऐसा जेथ। भगवंत तेथ तुष्टला॥ १६॥ दुष्टसंगें विषयासक्त। जरी झाला लोलिंगत। अनुताप उपजलिया तेथ। होय विरक्त क्षणार्धें॥ १७॥ महादोषासी प्रायश्चित्त। केवळ अनुताप निश्चित। अनुतापेंवीण प्रायश्चित्त। तो जाण एथ विटंबू॥ १८॥ अनुतापाएवढा सखा। जगीं आणिक नाहीं लोकां। धडाडिल्या अनुताप देखा। सकळ पातकां निर्दळी॥ १९॥ अनुतापा चढलिया हात। क्षणार्धें करी विरक्त। येचि अर्थीं ऐलगीत। हरि सांगत उद्धवा॥ २०॥ सव्विसाव्या अध्यायीं येथ। विषयासक्त ज्याचें चित्त। त्यासी व्हावया विरक्त। ऐलगीतप्रस्तावो॥ २१॥
श्रीभगवानुवाच
मल्लक्षणमिमं कायं लब्ध्वा मद्धर्म आस्थित:।
आनन्दं परमात्मानमात्मस्थं समुपैति माम्॥ १॥
ब्रह्म लक्षिजे परिपूर्ण। हेंचि कायेचें मुख्य लक्षण। तें हें मानवी शरीर जाण। परम पावन तिहीं लोकीं॥ २२॥ मनुष्यदेहीं अधर्म। करितां नातुडे परब्रह्म। तेथ करावे भागवतधर्म। जे कां परम पावन॥ २३॥ भागवतधर्में करितां भक्ती। निर्मळ होय चित्तवृत्ती। जीव तोचि ब्रह्म निश्चितीं। ऐशी शुद्ध स्फूर्ती ठसावे॥ २४॥ ठसावल्या ब्रह्मस्फूर्ती। होय स्वानंदाची अवाप्ती। तेणें परमानंदीं लीन होती। हे शुद्धप्राप्ती पैं माझी॥ २५॥ माझिये प्राप्तीचें लक्षण। देहीं असतां वर्तमान। सर्वथा नाहीं विषयस्फुरण। तेंचि निरूपण हरि सांगे॥ २६॥
गुणमय्या जीवयोन्या विमुक्तो ज्ञाननिष्ठया।
गुणेषु मायामात्रेषु दृश्यमानेष्ववस्तुत:।
वर्तमानोऽपि न पुमान् युज्यतेऽवस्तुभिर्गुणै:॥ २॥
जे मूळ अज्ञानाची खाणी। जे संसारप्रवाहाची श्रेणी। जे तिहीं गुणांची जननी। माया राणी अनादि॥ २७॥ मायागुणयोगें पहा हो। सोळा कळांचा संभवो। तो वासनात्मक लिंगदेहो। जीवासी पहा हो दृढ झाला॥ २८॥ ज्या लिंगदेहाचिये प्राप्ती। भोगी नाना सुखदु:खसंपत्ती। पडे स्वर्गनरक आवर्तीं। मिथ्यामरणपंक्ती स्वयें सोशी॥ २९॥ वंध्यापुत्राचा घराचार। तैसा जीवासी संसार। देहाभिमानें केला थोर। अपरंपार अनिवार्य॥ ३०॥ तेथ गुरुवाक्यें ज्ञानानुभवो। पाहतां मायेचा अभावो। लिंगदेह झाला वावो। जीवा जीवभावो तो मिथ्या॥ ३१॥ जेवीं उगवलिया गभस्ती। अंधारेंसीं हारपे राती। तेवीं गुरुवाक्यें ज्ञानप्राप्ती। मायेची स्थिती मावळे॥ ३२॥ एवं नासल्या गुणविकार। जीवन्मुक्त होती नर। जेवीं कां कुलालचक्र। भंवे साचार पूर्वभ्रमणें॥ ३३॥ तेवीं प्रारब्धशेषवृत्तीं। ज्ञाते निजदेहीं वर्तती। वर्ततांही देहस्थिती। देह अहंकृती असेना॥ ३४॥ जेवीं कां छाया आपुली। कोणीं गांजिली ना पूजिली। परी कळवळॺाची न ये भुली। तेवीं देहींची चाली सज्ञाना॥ ३५॥ तो देहाचेनि दैवमेळें। जरी विषयांमाजीं लोळे। परी विकाराचेनि विटाळें। वृत्ति न मैळे अणुमात्र॥ ३६॥ त्यासी विषयांचें दर्शन। समूळत्वें मिथ्या जाण। करितां मृगजळाचें पान। करा वोलेपण बाधीना॥ ३७॥ गगन कमळांचा आमोद। जैं भ्रमर सेवी सुगंध। तैं सज्ञाना विषयसंबंध। निजांगीं बाध लागतां॥ ३८॥ असो अतर्क्य मुक्तांची स्थिती। परी मुमुक्षांलागीं श्रीपती। नियमाची यथानिगुती। निजात्मप्राप्तीलागीं सांगे॥ ३९॥
सङ्गं न कुर्यादसतां शिश्नोदरतृपां क्वचित्।
तस्यानुगस्तमस्यन्धे पतत्यन्धानुगान्धवत्॥ ३॥
शिश्नोदरार्थ आसक्त। स्वधर्मत्यागें अधर्मरत। ऐसे जे विषयासक्त। ते जाण निश्चित असाधू॥ ४०॥ ऐसे जे असाधु जन। त्यांसीं सर्वथा आपण। संगती न करावी जाण। कायावाचामन:पूर्वक॥ ४१॥ वोढाळेचे संगतीं पाहें। क्षणभरी गेलिया धर्म गाये। त्या क्षणासाठीं पाहें। लोढणें वाहे निरंतर॥ ४२॥ यालागीं दुर्जनाची संगती। क्षणार्धें पाडी अनर्थीं। मुमुक्षीं ऐशियाप्रती। अणुमात्र वस्ती न वचावें॥ ४३॥ लोहाराची आगिठी जैसी। सहजें पोळी भलत्यासी। दुर्जनाची संगति तैशी। पाडीं अपभ्रंशीं भाविकां॥ ४४॥ अवचटें असाधु संगती। जोडल्या वाढे विषयासक्ती। तेणें उठी अधर्मरती। विवेक-स्फूर्तिघातक॥ ४५॥ मावळल्या विवेकवृत्ती। अंध होय ज्ञानस्फूर्ती। आपण आपली न देखे गती। जेवीं आभाळीं राती अंवसेची॥ ४६॥ जेवीं अंधें अंध धरिल्या हातीं। दोघां पतन महागर्ती। तेवीं अविवेकाचिया स्थितीं। अंधतमा जाती विषयांध॥ ४७॥ कुसंगाचा जो सांगात। तेणें वोढवे नरकपात। अनुताप सोडविता तेथ। तें ‘ऐलगीत’ हरि सांगे॥ ४८॥
ऐल: सम्राडिमां गाथामगायत बृहच्छ्रवा:।
उर्वशीविरहान्मुह्यन्निर्विण्ण: शोकसंयमे॥ ४॥
समुद्रवलयांकित क्षिती। सकळ रायांचा राजपती। पुरूरवा चक्रवर्ती। ज्याची ख्याती पुराणीं॥ ४९॥ तेज प्रभाव महाशौर्य। उचित वदान्य गांभीर्य। महिमा महती अतिवीर्य। धर्मधैर्य पुरूरवा॥ ५०॥ राजधर्माचिया नीतीं। स्वधर्में प्रतिपाळी क्षिती। ब्राह्मण तितुका ब्रह्ममूर्ती। हा भाव निश्चितीं रायाचा॥ ५१॥ प्राणांतेंही आपण। न करी ब्राह्मणहेळण। गायीलागीं वेंची प्राण। करी संरक्षण दीनाचें॥ ५२॥ ऐसा धार्मिक ऐल-चक्रवर्ती। तोही उर्वशीचे आसक्तीं। भुलोनि ठेला भूपती। निजात्मगती विसरला॥ ५३॥ तेणें अनुतापें गाइली गाथा। ते तुज मी सांगेन आतां। परी त्याची पूर्वकथा। कामासक्तता ते ऐक॥ ५४॥ विसरोनि निज महत्त्वासी। अतिदीन झाला वेश्येसी। काम पिसें लावी मनुष्यासी। तें ऐल-इतिहासीं हरि सांगे॥ ५५॥ ऐल-उर्वशीकामासक्ती। सवेंचि अनुतापें विरक्ती। हे कथा बोलिली वेदोक्तीं। तेचि यदुपति स्वयें सांगे॥ ५६॥ उर्वशीपुरूरव्याचा संबंध। नवम स्कंधीं असे विशद। तेणें जाणोनियां गोविंद। एथ कथाअनुवाद न करीच॥ ५७॥ पूर्वकथासंबंध:। उर्वशी स्वर्गभूषण। नारायणें धाडिली आपण। तो उर्वशीसी गर्व पूर्ण। श्रेष्ठपण मानूनी॥ ५८॥ तया गर्वाचिये स्थिती। ताल चुकली नृत्यगतीं। तेणें ब्रह्मशापाची प्राप्ती। तुज मानवी भोगिती भूतळीं॥ ५९॥ उच्छाप मागतां तिसी। ब्रह्मा सांगे तियेपाशीं। नग्न देखिल्या पुरूरव्यासी। स्वर्गा येसी मेषप्रसंगें॥ ६०॥ ऐशा लाहोनि शापासी। भूतळा आली उर्वशी। देखोनि तिचिया स्वरूपासी। पुरूरवा तिसी भूलला॥ ६१॥ विसरोनि आपुली महती। वश्य झाला वेश्येप्रती। रूपा भुलला भूपती। विचारस्फूर्ती विसरला॥ ६२॥ नग्न देखिलिया रायासी। सांडूनि जावें उर्वशीं। ऐशी भाक देऊनि तिसी। निजभोगासी आणिली॥ ६३॥ तिणें आपुलिया उच्छापासी। आणिलें दोघां एडक्यांसी। पुत्रस्नेहें पाळावें त्यांसी। तेविखीं भाकेसी दिधलें रायें॥ ६४॥ ते उर्वशीच्या कामप्राप्ती। अतिशयें वाढली कामासक्ती। तो नेणे उदयास्त-दिवसराती। ऐशा अमित तिथी लोटल्या॥ ६५॥ भोगितां उर्वशीकाम। विसरला स्वधर्मकर्म। विसरला नित्यनेम। कामसंभ्रम वाढला॥ ६६॥ तेथ मेषरूपें दोघे जण। झाले अश्विनीकुमार आपण। उर्वशीभोगक्षया कारण। इंद्रें जाण पाठविले॥ ६७॥ पुरूरव्याचा भोगप्रांतीं उर्वशी न्यावया स्वर्गाप्रती। दोनी एडके चोर नेती। मध्यरातीं मेमात॥ ६८॥ ऐकोनि मेषांच्या शब्दासी। दु:खें हडबडली उर्वशी। रागें निर्भर्त्सी रायासी। नपुंसक होसी तूं एक॥ ६९॥ वृथा वल्गसी पुरुषबळें। चोरें नेलीं माझीं बाळें। जळो तुझें तोंड काळें। म्हणोनि कपाळें ते पिटी॥ ७०॥ ऐकोनि स्त्रियेचा शोक थोरु। शस्त्र घेऊनि सत्वरु। धांवतां फिटला पीतांबरु। तें नृपवरु स्मरेना॥ ७१॥ पराभवूनि ते चोर। मेष आणितां सत्वर। विद्युल्लता झळकली थोर। तंव नग्न शरीर रायाचें॥ ७२॥ नग्न देखोनि रायासी। सांडूनि निघाली उर्वशी। तिचेनि वियोगें मानसीं। अतिशोकासी पावला॥ ७३॥
त्यक्त्वाऽऽत्मानं व्रजन्तीं तां नग्न उन्मत्तवन्नृप:।
विलपन्नन्वगाज्जाये घोरे तिष्ठेति विक्लव:॥ ५॥
पृथ्वीपरिपालनीं वरिष्ठ। स्वधर्मीं धार्मिक श्रेष्ठ। शत्रुदमनीं अतिसुभट। प्रतापें उद्भट महावीर॥ ७४॥ जाणे वेदशास्त्रविवेक। ज्यासी वंदिती सकळ लोक। तोही वेश्येचा केवळ रंक। झाला देख निजांगें॥ ७५॥ सुरां असुरां न खालवी मान। जो अल्पही न साहे अपमान। तो वेश्येलागीं झाला दीन। निजसन्मान विसरोनी॥ ७६॥ उर्वशी जातां देखोनि दिठीं। नग्न उन्मत्तउठाउठीं। रडत पडत लागे पाठीं। स्फुंदतां पोटीं श्वास न रिघे॥ ७७॥ डोळेभरी पाहूं दे दिठीं। सांगेन जीवींच्या गुह्य गोष्टी। प्राण रिघों पाहे उठाउठी। क्षणभर भेटी न देतां॥ ७८॥ आपुल्या पूर्वजांची आण। कदा नुल्लंघीं तुझें वचन। सत्य मानीं माझें प्रमाण। तुज काय कारण रुसावया॥ ७९॥ तुज चालतां लवलाहीं। झणीं खडे रुततील पायीं। तुज जाणें कोणे ठायीं। तरी सवें मीही येईन॥ ८०॥ जाऊं नको उभी राहें। परतोनी मजकडे पाहें। म्हणोनि धरूं धांवे पाये। तंव ते जाये उपेक्षुनी॥ ८१॥ ज्यासी राजे मुकुटमणी। सदा येती लोटांगणीं। तो लागे वेश्येचे चरणीं। बाप करणी कामाची॥ ८२॥ तुझी मज अति कळवळ। तुजलागीं मन माझें कोमळ। तूं कठिण झालीस केवळ। कोप प्रबळ कां धरिला॥ ८३॥ यापरी रायाचें चित्त। विरहातुर शोकाकुलित। अतिशयें ग्लानियुक्त। ते ग्लानि सांगत श्रीकृष्ण॥ ८४॥
कामानतृप्तोऽनुजुषन् क्षुल्लकान्वर्षयामिनी:।
न वेद यान्तीर्नायान्तीरुर्वश्याकृष्टचेतन:॥ ६॥
उर्वशीकामीं कामासक्त। एकाग्र झालें रायाचें चित्त। नेणे सूर्याचें गतागत। केला भ्रांत कंदर्पें॥ ८५॥ भोगिलीचि कामिनी। भोगितांही अनुदिनीं। अधिक प्रेम वाढलें मनीं। ऐसा तिज लागूनी आसक्त॥ ८६॥ भोगितां उर्वशीकामासी। नेणे दिवसमासवर्षांसी। व्ययो झाला आयुष्यासी। हेंही त्यासी स्मरेना॥ ८७॥ जेवीं अग्निमाजीं घृत पडे। तंव तंव ज्वाळा अधिक वाढे। तेवीं कांता भोगितां वाडेंकोडें। काम पुढें थोरावे॥ ८८॥ विचारितां स्त्रीकामासी। अतितुच्छत्व दिसे त्यासी। तोही भोगितां अहर्निशीं। विरक्ती रायासी नुपजेचि॥ ८९॥ प्रीति गुंतली उर्वशीसीं। अतिग्लानी करितां तिसी। परतोनि न येचि रायापाशीं। निघे वेगेंसीं सांडूनि॥ ९०॥ उर्वशी न देखूनि पुढें। राजा विरहें मूर्च्छित पडे। पाहों धांवे इकडे तिकडे। आक्रोशें रडे अतिदु:खी॥ ९१॥ अटण करितां दाही दिशीं। अवचटें आला कुरुक्षेत्रासी। तंव अंतरिक्षीं उर्वशी। देखे दृष्टीसी नृपनाथ॥ ९२॥ देखोनि म्हणे धांव पाव। मजलागीं दे कां वेगीं खेंव। येरी म्हणे मूढभाव। सांडीं सर्व विषयांधा॥ ९३॥ आम्हां स्त्रियांची आसक्ती। कदा धड नव्हे गा भूपती। सदा स्त्रियांची दुष्ट जाती। जाण निश्चितीं महाराजा॥ ९४॥ विशेषें आम्ही स्वैरिणी। स्वेच्छा परपुरुषगामिनी आमुचा विश्वास मनीं। झणीं न मानीं नृपनाथा॥ ९५॥ आम्हां प्रमदांच्या संगतीं। राया ठकले नेणों किती। आतां सांडूनि आमची आसक्ती। होईं परमार्थीं विरक्त॥ ९६॥ बहु काळ भोगितां माझा भोग। अद्यापि नुपजे तुज विराग। कामासक्ति सांडूनि साङ्ग। साधीं चांग निजस्वार्थ॥ ९७॥ राजा ग्लानि करी अनेग। एकवेळ निजांगें अंग। मज देई अंगसंग। सुखसंभोग भामिनी॥ ९८॥ निलाग देखोनि ग्लानीसी। कृपेनें द्रवली उर्वशी। मग ते आपुल्या पूर्व वृत्तांतासी। रायापाशीं निवेदी॥ ९९॥ मी स्वर्गांगना अतिसुरूप। मज घडला ब्रह्मशाप। तूं महाराजा पुण्यरूप। संगें नि:शाप मी झालें॥ १००॥ तुझेनि संगें मी निर्धूत। शाप निस्तरले समस्त। मज तुज संग न घडे एथ। मी असें जात स्वर्गासी॥ १॥ ऐकोनि उर्वशीचें वचन। राजा विरहेंकरी रुदन। तेव्हां कळवळलें तिचें मन। त्या उपाय पूर्ण दाविला॥ २॥ प्रार्थूनियां गंधर्वांसी। अग्निस्थाली दिधली रायासी। यावरी करूनि यागासी। मज पावसी महाराजा॥ ३॥ उर्वशीवियोगें व्यथाभूत। अग्निस्थाली उपेक्षूनि तेथ। राजा निजमंदिरा येत। शोकाकुलित अतिदु:खी॥ ४॥ उर्वशीची व्यथा रायासी। स्वप्नीं देखिलें तियेसी। त्वरेनें पाहूं आला स्थालीसी। तंव देखे अश्वत्थासी शमीगर्भा॥ ५॥ त्याच्या अरणी करूनि देख। यज्ञाग्नि पाडिला चोख। यजूनि पावला उर्वशीलोक। कामसुखभोगेच्छा॥ ६॥ भोग भोगितां उर्वशीसीं। विरक्ति उपजली रायासी। तो जें बोलिला अनुतापेंसीं। तें ऐक तुजसी सांगेन॥ ७॥ अठरा श्लोकांचें निरूपण। राजा बोलिला आपण। आठे श्लोकीं अनुताप पूर्ण। तेंचि श्रीकृष्ण स्वयें सांगे॥ ८॥
ऐल उवाच
अहो मे मोहविस्तार: कामकश्मलचेतस:।
देव्या गृहीतकण्ठस्य नायु:खण्डा इमे स्मृता:॥ ७॥
ऐलगीताचा अनुताप। नाशी अगम्यागमनपाप। करी श्रोत्यांसी निष्पाप। साधकां कंदर्प बाधीना॥ ९॥ जेवीं मदगज गजीसंगीं। नाना आपत्ति स्वयें भोगी। तेवीं उर्वशीच्या संभोगीं। झाला विरागी पुरूरवा॥ ११०॥ जो उर्वशीलागीं अनुरक्त। तोचि तिसीं झाला विरक्त। तेणें वैराग्यें अनुतापयुक्त। स्वयें बोलत ऐलरावो॥ ११॥ माझ्या मोहाचा विषयविस्तार। कामासक्त कामातुर। कुश्चित कंदर्पाचें घर। म्यांचि साचार सेविलें॥ १२॥ उर्वशीकामें अति आसक्त। कामातुर झालें चित्त। तेणें म्यां जोडिला अनर्थ। थितें केलें व्यर्थ आयुष्य॥ १३॥ उर्वशी कंठसल्लग्न शस्त्र। आयुष्यच्छेदनीं सतेजधार। छेदिलें आयुष्य अपार। तें मी पामर स्मरेना॥ १४॥ कांता आलिंगन विषवल्ली। म्यां कंठीं घातली सकाम भुलीं। तिणें आयुष्याची होळी केली। विवेक समूळीं गिळिला॥ १५॥ कामिनीकामआलिंगनीं। कंठीं पेटविला दावाग्नी। तो धडाडिला आयुष्यवनीं। विवेक अवनी जाळित॥ १६॥ नरदेहींचें उत्तमोत्तम। अमूल्य आयुष्य केलें भस्म। जळो जळो माझें कर्म। निंद्य अधर्म तो एक॥ १७॥ नरदेहींच्या आयुष्यपुष्टी। साधक रिघाले वैकुंठीं। ज्ञाते ब्रह्म होती उठाउठीं। तें म्यां कामासाठीं नाशिलें॥ १८॥
नाहं वेदाभिनिर्मुक्त: सूर्यो वाभ्युदितोऽमुया।
मुषितो वर्षपूगानां बताहानि गतान्युत॥ ८॥
नरदेहाचा आयुष्यक्षण। न मिळे देतां कोटी सुवर्ण। तें म्यां नाशिलें संपूर्ण। आपणया आपण नाडिलें॥ १९॥ साधूंचिया निजस्वार्था। साधूनि द्यावया उगवे सविता। निमेषोन्मेषें परमार्था। साधक तत्त्वतां साधिती॥ १२०॥ तोचि सविता सकामासी। आयुष्य हरी अहर्निशीं। हें न कळे ज्याचें त्यासी। नरक पातासी निजमूळ॥ २१॥ पुढिलांची गोठी ते कायसी। मीच नाडलों उर्वशीपासीं। ऱ्हास झाला आयुष्यासी। हे हानि कोणासी सांगावी॥ २२॥ जनांचिया हितासी वहिला। सूर्यो अनुदिनीं उगवला। तें मी नेणेंचि दादुला। उर्वशीकामें भुलला उन्मत्त॥ २३॥ सूर्याचा उदयो अस्तमान। वर्षेंही लोटल्या नाहीं ज्ञान। करितां उर्वशी-अधरपान। तेणें मदें संपूर्ण मातलों॥ २४॥ मद्यमदु उतरे दिनांतीं। धनमदु जाय निधनस्थितीं। तारुण्यमदु जाय क्षीणशक्ती। स्त्रीमदप्राप्ती कदा नुतरे॥ २५॥ नरदेहीची आयुष्यकथा। पुढती दुर्लभ न लभे हाता। जळो हे उर्वशी देवकांता। इणेंचि तत्त्वत्तां नागविलों॥ २६॥ मी निर्भय रक्षिता सर्वांसी। त्या मज नागविलें उर्वशीं। हे लाज सांगों कोणापाशीं। उकसाबुकसीं स्फुंदत॥ २७॥ माझ्या निजहिताचा चोरू। हे उर्वशी जीवें मारूं। सवेंचि उपजला विचारू। येथ मीचि पामरू अविवेकी॥ २८॥ मग म्हणे कटकटा। सृष्टीमाजीं मी करंटा। आयुष्य नाशिलें कामचेष्टा। अपाव मोठा मज झाला॥ २९॥ मग आक्रंदे अतिगर्जोनी। कामें नागविलों आयुष्य हरोनी। याहीहोनि अधिक हानी। पाहतां ये जनीं असेना॥ १३०॥
अहो मे आत्मसम्मोहो येनात्मा योषितां कृत:।
क्रीडामृगश्चक्रवर्ती नरदेवशिखामणि:॥ ९॥
राजे मुकुटांचे प्रतापी पूर्ण। माझ्या चरणा येती शरण। तो मी वेश्येचे धरीं चरण। हें निर्लज्जपण म्यां केलें॥ ३१॥ मज पुरूरव्याचे आज्ञेंकरीं। राजे नाचती चराचरीं। तो मी वेश्येचे आज्ञेवरी। श्वानाचेपरी वर्तलों॥ ३२॥ जैसें वानर गारुडॺाचें। तैसा स्त्रियेचेनि छंदें नाचें। माझ्या चक्रवर्तीपणाचें। अतिनिंद्य साचें फळ झालें॥ ३३॥ सकळ राजे मज देती सन्मान। भूपति सदा वंदिती चरण। तो मी झालों स्त्रियेआधीन। हीनदीन अतिरंक॥ ३४॥ राखतां स्त्रियेचा रसरंगप्रेम। पायां पडणें हें उचित कर्म। म्हणती ते जळो जन सकाम। हेचि धाडी परम कामाची॥ ३५॥ मी वलयांकित चक्रवर्ती। तोही योषिता घातलों आवर्तीं। त्याचि आवर्ताची स्थिती। स्वमुखें भूपति अनुवादे॥ ३६॥
सपरिच्छदमात्मानं हित्वा तृणमिवेश्वरम्।
यान्तीं स्त्रियं चान्वगमं नग्न उन्मत्तवद्रुदन्॥ १०॥
केवळ साकार मायाभ्रम। यालागीं ‘प्रमदा’ स्त्रीचें नाम। संगें ठकिले उत्तमोत्तम। स्त्रीसंभ्रम वाढवितां॥ ३७॥ प्रमदा अंबरें अलंकार। हें मायेचें सोलीव सार। एथ भुलले थोरथोर। मीही पामर स्त्रीसंगें॥ ३८॥ माझीच मज करणी। दिसतसे दैन्यवाणी। उर्वशी वेश्या कामचारिणी। जे बहुजनीं भोगिली॥ ३९॥ ऐशियेच्या कामासक्तता। मी सर्वस्वें भुललों सर्वथा। ते भुलले पणाची कथा। अनुतापतां स्वयें बोले॥ १४०॥ धर्मपत्नीसीं भोगितां काम। सहसा नासेना स्वधर्म। मज वोढवलें दुष्ट कर्म। वेश्येसी परम भुललों॥ ४१॥ परदारा अभिलाषिती। ते अवश्य नरका जाती। मा स्वदारा-कामासक्ती। तेथही अधोगती सोडीना॥ ४२॥ स्त्रियां भुलविले हरिहर। स्त्रियां भुलविले ऋषीश्वर। स्त्रियां भुलविले थोरथोर। मीही किंकर स्त्रियां केलों॥ ४३॥ राज्य आणि राजवैभव। वेश्येअधीन केलें सर्व। याहीहूनि केलें अपूर्व। तीलागीं जीव अर्पिला॥ ४४॥ मी राजवर्यां मुकुटमणी। तो दास झालों तिचे चरणीं। बाप कंदर्पाची करणी। केलों कामिनी अधीन॥ ४५॥ ऐशिया मज राजेश्वरातें। वेश्येनें हाणोनि लातें। उपेक्षूनियां तृणवतें। निघाली निश्चितें सांडोनी॥ ४६॥ तीसी जातां देखोनियां पुढें। मी नागवा धांवें लवडसवडें। लाज सांडोनियां रडें। तरी ते मजकडे पाहेना॥ ४७॥ जेवीं कां लागलें महद्भूत। नातरी पिशाच जैसें उन्मत्त। तेवीं नागवा धांवें रडत। तरी तिचें चित्त द्रवेना॥ ४८॥ तरी रडत पडत अडखळत। मी निर्लज्ज ती मागें धांवत। माझे मोहाचा अतिअनर्थ। अपमानग्रस्त मज झाला॥ ४९॥
कुतस्तस्यानुभाव: स्यात्तेज ईशत्वमेव वा।
योऽन्वगच्छं स्त्रियं यान्तीं खरवत्पादताडित:॥ ११॥
मी महत्त्वें राजराजेश्वरु। ऐसा गर्व होता अति दुर्धरु। तो मी वेश्येचा अनुचरु। झालों किंकरु निजांगें॥ १५०॥ एवढाही मी राजेश्वरु। मागें धांवें होऊनि किंकरु। तरी ते न करी अंगीकारु। जेवीं वोसंडी खरी जैशी॥ ५१॥ जेवीं खरी देखोनियां खरु। धांवोनि करी अत्यादरु। येरी उपेक्षूनि करीमारु। अतिनिष्ठुरु लातांचा॥ ५२॥ तिच्या लाता लागतां माथां। खरु निघेना मागुता। त्या खराऐशी मूर्खता। माझे अंगीं सर्वथा बाणली॥ ५३॥ स्त्री उदास कामदृष्टीं। मीं आसक्त लागें पाठीं। माझ्या समर्थपणाची गोठी। सांगतां पोटीं मी लाजें॥ ५४॥ ऐसें स्त्रीकामीं ज्याचें मन। त्याचें योग याग अनुष्ठान। अवघेंचि वृथा जाण। तेंचि निरूपण निरूपी॥ ५५॥
किं विद्यया किं तपसा किं त्यागेन श्रुतेन वा।
किं विविक्तेन मौनेन स्त्रीभिर्यस्य मनो हृतम्॥ १२॥
स्त्रीकाममय ज्याचें मन। त्याची वृथा विद्या वृथा श्रवण। वृथा तप वृथा ध्यान। त्याग मुंडण तें वृथा॥ ५६॥ वृथा एकांतसेवन। वृथा जाण त्याचें मौन। राखेमाजीं केलें हवन। तैसें अनुष्ठान स्त्रीकामा॥ ५७॥ कामासक्त ज्याचें चित्त। त्याचे सकळही नेम व्यर्थ। आपुलें पूर्ववृत्त निंदित। अनुतापयुक्त नृप बोले॥ ५८॥
स्वार्थस्याकोविदं धिङ्मां मूर्खं पण्डितमानिनम्।
योऽहमीश्वरतां प्राप्य स्त्रीभिर्गोखरवज्जित:॥ १३॥
चहूं पुरुषार्थांचें अधिष्ठान। नरदेह परम पावन। जेणें देहें करितां भजन। ब्रह्म सनातन पाविजे॥ ५९॥ नरदेहींचा क्षण क्षण। समूळ निर्दळी जन्ममरण। भावें करितां हरिस्मरण। महापापें जाण निर्दळती॥ १६०॥ त्या नरदेहाची लाहोनि प्राप्ती। नरवर्य झालों चक्रवर्ती। त्या माझी जळोजळो स्थिती। जो वेश्येप्रती भुललों॥ ६१॥ मानी श्रेष्ठ मी सज्ञान। परी अज्ञानांहूनि अज्ञान। नेणेंचि निजस्वार्थसाधन। वेश्येआधीन मी झालों॥ ६२॥ लाभोनि नरदेहनिधान। म्यां देहीं धरिला ज्ञानाभिमान। न करींच निजस्वार्थसाधन। हें मूर्खपण पैं माझें॥ ६३॥ जैसा गायीमागें कामयुक्त। धांवतां बैल न मानी अनर्थ। कां खरीमागें खर धांवत। तैसा कामासक्त मी निर्लज्ज॥ ६४॥ खरी खरास हाणी लाताडें। तरी तो धसे पुढें पुढें। तैसाचि मीही वेश्येकडे। काम कैवाडें भुललों॥ ६५॥ ‘कामभोगांतीं विरक्ती’। ऐसें मूर्ख विवेकी बोलती। ते अध:पातीं घालिती। हे मज प्रतीति स्वयें झाली॥ ६६॥
सेवतो वर्षपूगान्मे उर्वश्या अधरासवम्।
न तृप्यत्यात्मभू: कामो वह्निराहुतिभिर्यथा॥ १४॥
सत्ययुगींचें आयुष्य माझें। ऐश्वर्य सार्वभौमराज्यें। उर्वशी स्वर्गमंडन काजें। सर्वभोग समाजें भोगितां॥ ६७॥ भोगितां लोटल्या वर्षकोटी। परी विरक्तीची नाठवे गोठी। मा ‘वैराग्य भोगाचे शेवटीं’। हे मिथ्या चावटी मूर्खांची॥ ६८॥ स्त्रियेचें म्हणती अधरामृत। तेही मूर्ख गा निश्चित। तें उन्मादमद्य यथार्थ। अधिकें चित्तभ्रामक॥ ६९॥ वनिता अधर पानगोडी। त्यापुढें सकळ मद्यें बापुडीं। तत्काळ अनर्थीं पाडी। निजस्वार्थकोडीनाशक॥ १७०॥ घालितां कोटि घृताहुती। अग्नीसी कदा नव्हे तृप्ती। तेवीं वनिताकामासक्ती। कदा विरक्ती उपजेना॥ ७१॥ ऐसा आठ श्लोकीं अनुताप। स्वयें बोलोनियां नृप। हृदयीं उपजला विवेकदीप। जेणें झडे कंदर्प तें स्मरलें॥ ७२॥ सकामासी विषय त्यागितां। वासना न त्यागे सर्वथा। कां आदरें विषय भोगितां। विरक्ति सर्वथा उपजेना॥ ७३॥ ऐशिये अर्थींचा उपावो। विचारोनि बोले रावो। काम त्यागाचा अभिप्रावो। साचार पहा हो संबोधी॥ ७४॥
पुंश्चल्यापहृतं चित्तं को न्वन्यो मोचितुं प्रभु:।
आत्मारामेश्वरमृते भगवन्तमधोक्षजम्॥ १५॥
पुरुष सदा स्त्रीअनुराग। परी सहसा न करवे प्रसंग। त्यासी पुंश्चलीचा घडल्या संग। ते बाधी निलाग हावभावीं॥ ७५॥ पुंश्चलीचे कटाक्ष गुण। तेंचि पुरुषासी दृढ बंधन। स्त्रीकामबंधन सोडवी कोण। एक नारायणावांचूनि॥ ७६॥ कामिनीकामापासूनि निर्मुक्त। कर्ता ईश्वर समर्थ। जो कां आत्माराम भगवंत। तोचि निश्चित सोडविता॥ ७७॥ मायागुणें कामसंचार। अविद्या वाढवी साचार। मायानियंता जो ईश्वर। तो कामकरकर निर्दळी॥ ७८॥ स्वस्वरूपीं रमण आराम। ऐसा जो कां आत्माराम। जो निवारी सकळ काम। करी निर्भ्रम निजात्मता॥ ७९॥ जो भोग भोगूनि अभोक्ता। त्या शरण रिघाल्या अनंता। बाधूं न शके विषयावस्था। स्त्रीसंगीं सोडविता तो एक॥ १८०॥ तो निवारी अधोगती। तो अधोक्षज असतां भक्तपती। त्यासी शरण रिघाल्या निश्चितीं। कामासक्ती निवारी॥ ८१॥ राजा कामासक्तीं अति त्रासला। सबाह्य विषयीं उदास झाला। त्याचा वासनाकाम जो उरला। तो न वचे त्यागिला त्याचेनीं॥ ८२॥ सर्वभावेंसीं संपूर्ण। हरीसि रिघालिया शरण। सकळ कामाचें निर्दळण। सहजें जाण स्वयें होय॥ ८३॥ एकाचा मतवाद निश्चितीं। करितां श्रुतिवाक्य व्युत्पत्ती। यजितां इंद्रादि देवांप्रती। कामनिवृत्ति हृदयस्थ॥ ८४॥ ऐसें बोलती जे सज्ञान। ते सर्वथा गा अज्ञान। हरीसी न रिघतां शरण। कामसंचरण शमेना॥ ८५॥ इंद्रादि देव कामासक्तीं। विटंबले नेणों किती। त्यांचेनि भजनें कामनिवृत्ति। जे म्हणती ते अतिमूर्ख॥ ८६॥
बोधितस्यापि देव्या मे सूक्तवाक्येन दुर्मते:।
मनोगतो महामोहो नापयात्यजितात्मन:॥ १६॥
काम्य कर्मीं होईल सुख। हें बोलणें समूळ लटिक। काम्य कर्मीं अधिक दु:ख। हें नेणतीमूर्ख सकाम॥ ८७॥ प्रत्यक्ष म्यां याग करून। इंद्रादि देवांतें यजून। उर्वशी संभोगा लाधून। अतिदु:खी जाण मी झालों॥ ८८॥ नारायणऊरूसीं जन्मली। यालागीं ‘उर्वशी’ नांव पावली। त्या मज श्रुतिवाक्यें बोधिलीं। निष्काम बोली अतिशुद्ध॥ ८९॥ ऐकतां श्रुति निष्काम बोली। माझी न वचेच सकाम भुली। जंव गोविंदें कृपा नाहीं केली। तंव कामाची चाली खुंटेना॥ १९०॥ भावें हरीसी निघाल्या शरण। हृदयीं प्रकटे नारायण। तेव्हा सर्व काम सहजें जाण। जाती पळोन हृदयस्थ॥ ९१॥ उर्वशीकामसंगें जाण। थोर कष्टलों मी आपण। असो तिचा अपराध कोण। मीचि हरिस्मरण विसरलों॥ ९२॥ जरी मी करितों हरीचें स्मरण। तरी काम बापुडें बाधी कोण। मज माझी असती आठवण। तैं तुच्छ जाण उर्वशी॥ ९३॥
किमेतया नोऽपकृतं रज्ज्वा वा सर्पचेतस:।
रज्जुस्वरूपाविदुषो योऽहं यदजितेन्द्रिय:॥ १७॥
मूढमतीचा प्रबोध। मानी उर्वशीचा अपराध। विवेकें पाहतां शुद्ध। मीच मतिमंद सकाम॥ ९४॥ उर्वशी देखतां दृष्टीं। मी कामासक्त झालों पोटीं। माझिये लंपटतेसाठीं। मज म्या शेवटीं नाडिलें॥ ९५॥ जेवीं सांजवेळे पडिला दोरु। भेडा सर्प भासे थोरु। जंव नाही केला निर्धारु। तंव महाअजगरु भयानक॥ ९६॥ तेणें सर्पभयें लवडसवडीं। पळों जातां पैं तांतडी। दुपावुलीं पडली आढी। त्याची कल्पना नाडी तयासी॥ ९७॥ तेवीं माझिये कामभ्रांतीं। उर्वशी सुंदर युवती। एथ माझिया कामासक्ति। सुरत-रतीं भुललों॥ ९८॥ यापरी मी अविवेकात्मा। भुललों उर्वशीच्या कामा। तीवरी कोपणें जें आम्हां। हेंचि अधर्माचें मूळ॥ ९९॥ दृष्टीं देखतां कामिनी। कामासक्ता ते अतिरमणी। विवेकिया पोहणघाणी। नरकमाथणी ते कांता॥ २००॥ जेवीं सूकरा विष्ठेची प्रीती। तेवीं सकामा कामिनीची रती। विवेकी देखोनि थुंकिती। तेंचि श्लोकार्थीं नृप बोले॥ १॥
क्वायं मलीमस: कायो दौर्गन्ध्याद्यात्मकोऽशुचि:।
क्वगुणा: सौमनस्याद्या ह्यध्यासोऽविद्यया कृत:॥ १८॥
स्त्री-पुरुष नामाभिधान। केवळ देहासीचि जाण। ते स्त्रीदेहीं पाहतां गुण। मलिनपणा अत्यंत॥ २॥ जे नीच नव्या विटाळाची खाणी। जे रजस्वलेची प्रवाह न्हाणी। जे कां दुर्गंधाची पोहणी। जे उतली चिडाणी विष्ठेची॥ ३॥ जे कां दोषांचें जन्मस्थान। जे विकल्पाचें आयतन। जे महादु:खाचें भाजन। अध:पतन जिचेनी॥ ४॥ जे वाढवी अतिउद्वेग। जिचेनी मनासी लागे क्षयरोग। जिचा बाधक अंगसंग। अति निलाग निंद्यत्वें॥ ५॥ जेवीं नीचाचा कांठपरा। गळांअडकल्या मांजरा। तें रिघोनि शुचीचिया घरा। नाना रसपात्रां विटाळी॥ ६॥ तेवीं कामिनीची संगती। गळां पडली न निघे मागुती। कामिनी कामें कामासक्तीं। नेणों किती विटंबिले॥ ७॥ तें मांजर जेथें घाली मुख। तेथ कांठपरा रोधी देख। तेवीं स्त्रीसंगें अतिदु:ख। मानिती सुख सकाम॥ ८॥ मृगजळीं कमळ मनोहर। तैसें अंगनावदन सुंदर। सुस्मित चारु सुकुमार। सकाम नर वानिती॥ ९॥ अंगनावदनाची निजस्थिती। निखळ शेंबुडाची तेथ वस्ती। तें मुख चंद्रेसीं उपमिती। जेवीं अमृत म्हणती विखातें॥ २१०॥ वनिता अधरीं झरे लाळ। ते म्हणती अधरामृत केवळ। बाप अविद्येचें बळ। भुलले सकळ सुरासुर॥ ११॥ स्त्रीपुरुषीं आत्मा एक। स्त्रीरूप तेथ आविद्यक। मिथ्या स्त्रीकामीं भुलले लोक। बाप कवतिक मायेचें॥ १२॥ आत्मा भोक्ता म्हणावा स्त्रीसंभोगीं। तंव तो नित्यमुक्त असंगी। देह भोक्ता म्हणावा स्त्रीसंयोगीं। तंव देहाचेअंगीं जडत्व॥ १३॥ तेथ विषयभोगासी कारण। मुख्यत्वें देहाभिमान त्या देहाभिमानासी जाण। बहुत जण विभागी॥ १४॥
पित्रो: किं स्वं नु भार्याया: स्वामिनोऽग्ने: श्वगृध्रयो:।
किमात्मन: किं सुहृदामिति यो नावसीयते॥ १९॥
गर्भधारण पोषण। स्वयें श्रमोनियां आपण। माता करी परिपालन। तो हा देह जाण ‘मातेचा’॥ १५॥ एकलेपणें माता। स्वप्नीं न देखे पुत्रकथा। जो निजवीर्यनिक्षेपिता। तो हा देहो तत्त्वतां ‘पित्याचा’॥ १६॥ जे अग्नि ब्राह्मण साक्षी करूनी। भार्या आणिली भाक देवोनी। जे जीवित्व समर्पोनी। सेवेलागोनी विनटली॥ १७॥ जीसी याचेनि सुखशृंगार। जीसी याचेनि ऐहिक पर। ऐसा सूक्ष्म करितां विचार। देहो साचार ‘स्त्रियेचा’॥ १८॥ या देहाचीं आवश्यकें। ‘सुहृद बंधू’ जे कां सखे। देहाचेनि सुखावती सुखें। देह एके पाखें त्यांचाही॥ १९॥ स्वयें घेऊनियां वेतन। देहो विकिला आपण। आज्ञेवीण न वचे क्षण। देहो जाण ‘स्वामीचा’॥ २२०॥ ‘श्वानशृंगालगिधांचें’ खाजें। तरी हा देहो त्यांचा म्हणिजे। जीवास्तव देहीं कर्म निफजे। यालागीं देह बोलिजे ‘जीवाचा’॥ २१॥ पिता-माता-स्त्री-पुत्र-स्वजन। देहाचें अवश्य करिती दहन। यालागीं देह ‘अग्नीचा’ पूर्ण। विचक्षण बोलती॥ २२॥ यापरी देहाचे जाण। विभागी असती आठ जण। तेथ ‘मी भोक्ता’ हा अभिमान। तो केवळ जाण मूर्खत्वें॥ २३॥ एथ एक ‘मी’ विशिष्ट भोक्ता। ‘माझा’ देह ऐशी ममता। हेचि जाण तत्त्वतां। अध:पाता नेताती॥ २४॥
तस्मिन्कलेवरेऽमेध्ये तुच्छनिष्ठे विषज्जते।
अहो सुभद्रं सुनसं सुस्मितं च मुखं स्त्रिय:॥ २०॥
देहो तितुका अशुचिकर। त्यांत स्त्रीदेह अति अपवित्र। केवळ विटाळाचें पात्र। निरंतर द्रवरूपें॥ २५॥ स्वयें भोक्ता अतिकुश्चित। ऐसे अविवेकी कामासक्त। कामिनीकामीं लोलंगत। ते मूर्ख वानीत स्त्रियांतें॥ २६॥ अहो हे सुंदर सुरेख। चंद्रवदना अतिसुमुख। सरळ शोभे नासिक। सुभग देख सुकुमार॥ २७॥ ऐशिये सुंदर स्त्रियेतें। पावलों आम्ही सभाग्य एथें। ऐशीं कामासक्तचितें। भुललीं भ्रांतें प्रमदांसी॥ २८॥ स्त्रीदेहाचे विवंचनें। विवंचितां ओकारा ये मनें। जळो स्त्रियेचें निंद्य जिणें। मूर्खीं रमणें ते ठायीं॥ २९॥
त्वङ्मांसरुधिरस्नायुमेदोमज्जास्थिसंहतौ।
विण्मूत्रपूये रमतां कृमीणां कियदन्तरम्॥ २१॥
स्त्रीदेहाचा उभारा। केवळ अस्थींचा पांजरा। त्याचें आवरण तें स्नायु शिरा। बांधोनि खरादृढ केला॥ २३०॥ तेथ रुधिरमांसाचें कालवण। करूनि पांजरा लिंपिला पूर्ण। अस्थीवरील जें वेष्टण। ‘मज्जा’ म्हणती त्या नांव॥ ३१॥ अस्थिमाजील रसबद्ध। त्या नांव बोलिजे ‘मेद’। वरी चर्म मढिलें सुबद्ध। ‘त्वचा’ शुद्ध ती नांव॥ ३२॥ त्या देहामाजीं सांठवण। विष्ठा मूत्र परिपूर्ण। ते स्त्रीदेहीं ज्याचें रमण। ते ‘कृमि’ जाण नररूपें॥ ३३॥ विष्ठेमाजीं कृमि चरती। तैशी स्त्रीदेहीं ज्यां आसक्ती। तेही कृमिप्राय निश्चितीं। संदेह ये अर्थीं असेना॥ ३४॥ वनिता देह यापरी एथ। विचारितां अतिकुश्चित। तो वस्त्रालंकारीं शोभित। करूनि आसक्त नर होती॥ ३५॥ घंटापारधी पाश पसरी। त्यावरी तो मृगांतें धरी। पुरुष स्त्रियेतें शृंगारी। त्या पाशा भीतरीं स्वयें अडके॥ ३६॥ यालागीं स्त्रियांची संगति। कदा न करावी विरक्तीं। गृहस्थीं सांडावी आसक्ती। येचि अर्थीं नृप बोले॥ ३७॥
अथापि नोपसज्जेत स्त्रीषु स्त्रैणेषु चार्थवित्।
विषयेन्द्रियसंयोगान्मन: क्षुभ्यति नान्यथा॥ २२॥
स्त्रीदेह शोभनीय असता। तरी वस्त्रालंकारेंवीण शोभता। तो अतिनिंद्य कुश्चितता। उघडासर्वथा शोभेना॥ ३८॥ यालागीं वस्त्राभरणीं। देह गुंडिती कामिनी। जेवीं मैंद ब्राह्मणपणीं। विश्वासूनी घात कीजे॥ ३९॥ तैशी स्त्रियांची संगती। सेवा लावी नाना युक्तीं। शेखीं संगें पाडी अध:पातीं। तेथ विरक्तीं न वचावें॥ २४०॥ जरी स्त्रियेची विरक्तस्थिती। तरी साधकीं न करावी संगती। अग्निसंगें घृतें द्रवती। तेवीं विकारे वृत्ति स्त्रीसंगें॥ ४१॥ अमृत म्हणोनि खातां विख। अवश्य मरण आणी देख। स्त्री मानूनि सात्त्विक। सेवितां दु:ख भोगवी॥ ४२॥ अग्नीमाजीं घृताची वस्ती। जरी बहुकाळ निर्वाहती। तरी स्त्रीसंगें परमार्थीं। निजात्मस्थिती पावते॥ ४३॥ घृत वेंचल्या वर्षें झालीं साठी। तरी अग्निसंगें द्रव उपजे घटीं। तेवीं प्रमदासंगपरिपाठीं। वार्धकींही उठी अतिकामु॥ ४४॥ जरी कापूर अग्नीआंत। नांदों लाहता न पोळत। तरीच स्त्रीसंगें परमार्थ। पावते समस्त परब्रह्म॥ ४५॥ अग्नी पोळी धरितां हातीं। तैशी स्त्रियांची संगती। संगें वाढवी आसक्ती। पाडी अनर्थीं पुरुषांतें॥ ४६॥ स्त्रियेपरीसही स्त्रैण-। संगती मीनलिया जाण। कोटि अनर्थांचें भाजन। अध:पतन तत्संगें॥ ४७॥ स्त्रैणेंसीं झाल्या भेटी। ब्रह्मानंद स्त्रीसुखाच्या पोटीं। ऐशा विरक्तां प्रबोधी गोठी। करी उठाउठी स्त्रीकाम॥ ४८॥ तेथ स्वदारा आणि परदारा। या करूं नेदी विचारा। प्रवर्तवी स्वेच्छाचारा। स्त्रैण खरा अतिघाती॥ ४९॥ स्त्रैण जेथें प्रवेशला। तेथ अनाचार वेलीं गेला। अधर्म सर्वांगीं फुलला। बाधकत्वें फळला अनर्थफळीं॥ २५०॥ यालागीं जो परमार्थी। तेणें स्त्री आणि स्त्रैणाची संगती। सर्वथा न धरावी हातीं। पाडी अनर्थीं तो संग॥ ५१॥ मुख्य स्त्रैणचि वाळिला आहे। तेथें स्त्रीसंग कोठें राहे। हे संगतीचि पाहें। सेव्य नोहे परमार्था॥ ५२॥ यालागीं साधकीं आपण। स्त्रीनिरीक्षण संभाषण। सर्वथा न करावें जाण। एकांतशील न केव्हांही व्हावें॥ ५३॥ म्हणशी विवेकी जो आहे। त्यासी स्त्रीसंग करील काये। स्त्रीसंगास्तव पाहें। सोशिले अपाये सुज्ञांनीं॥ ५४॥ पराशरासीअर्ध घडी। नावेसी मीनली नावाडी। ते अर्ध घटिकेसाठीं रोकडी। अंगीं परवडी वाजली॥ ५५॥ ऋष्यशृंग अतितापसी। तोही वश झाला वेश्येसी। इतरांची गोठी कायसी। मुख्य महादेवासी भुलविलें॥ ५६॥ विषयइंद्रियांचे संगतीं। अवश्य क्षोभे चित्तवृत्ती। तेथ सज्ञानही बाधिजती। मा कोण गती अज्ञाना॥ ५७॥ हेही असो उपपत्ती। नसतां स्त्रियांची संगती। काम क्षोभे एकांतीं। तेंचि विशदार्थीं नृप बोले॥ ५८॥
अदृष्टादश्रुताद् भावान्न भाव उपजायते।
असम्प्रयुञ्जत: प्राणान् शाम्यति स्तिमितं मन:॥ २३॥
जें देखिलें ऐकिलें नाहीं। ऐशिया विषयांचे ठायीं। पुरुषाचें मन पाहीं। सर्वथा कहीं क्षोभेना॥ ५९॥ जे पूर्वभुक्त विषय असती। तेचि स्मरण झालिया चित्तीं। कामउद्रेकें क्षोभे वृत्ती। नसतां संगती स्त्रियेची॥ २६०॥ एवं पूर्वापार विषयासक्ती। पुरुषासी बाधक निश्चितीं। तो बैसल्याही एकांतीं। वासना संस्कारें वृत्ति सकाम क्षोभे॥ ६१॥ पूर्वदिवशींचीं पक्वान्नें। जीं ठेविलीं अतियत्नें। तीं न करितांही रांधणें। पहांटे भक्षणें स्वयें जेवीं॥ ६२॥ तेवीं वासनासंस्थित काम। पुरुषास करी सकाम। कामक्षोभें पाडी भ्रम। कर्माकर्म स्मरेना॥ ६३॥ एवं वासना कामसंगती। बाधक होय परमार्थीं। यालागीं साधकीं समस्तीं। स्त्रीकामासक्ती त्यागावी॥ ६४॥ मनीं क्षोभल्या कामासक्ती। साधकीं तेथें करावी युक्ती। आवराव्या बाह्य इंद्रियवृत्ती। तैं मनासी शांति हळूहळू होय॥ ६५॥ कर्मेंद्रियीं राखण। दृढ वैराग्य ठेविलिया जाण। मनीं क्षोभल्या काम पूर्ण। आपल्या आपण उपशमे॥ ६६॥ जेणें पडिजे अनर्थीं। ते त्यागावी संगती। संगत्यागाची निजस्थिती। दृढ श्लोकार्थीं नृप बोले॥ ६७॥
तस्मात्सङ्गो न कर्तव्य: स्त्रीषु स्त्रैणेषु चेन्द्रियै:।
विदुषां चाप्यविश्रब्ध: षड्वर्ग: किमु मादृशाम्॥ २४॥
जेणें सज्ञाना उठी छळ। सकाम भुलवी तत्काळ। ऐसा स्त्रीसंग अनर्थशीळ। त्याहूनि प्रबळ स्त्रैणाचा॥ ६८॥ यालागीं कर्मेंद्रियांचे स्थितीं। स्त्री आणि स्त्रैणाची संगती। घडों नेदावी परमार्थीं। जे निजस्वार्थीं साधक॥ ६९॥ जरी विषयीं क्षोभेल मन। तरी इंद्रियें आवरावीं आपण। तरी मनींचा विषयो जाण। मनींचि आपण स्वयें विरे॥ २७०॥ निकट विषय स्त्रीसंगती। मन क्षोभे विषयासक्तीं। क्षणार्ध स्त्रीसंगप्राप्ती। पडले अनर्थीं सज्ञान॥ ७१॥ स्त्रीदर्शनें कामासक्त। देवेंद्र झाला भगांकित। चंद्र कळंकिया एथ। केला निश्चित गुरुपत्न्या॥ ७२॥ सौभरी तपस्वी तपयुक्त। तो मत्स्यमैथुनास्तव एथ। करूनि सांडिला कामासक्त। ऐसा संग अनर्थभूत स्त्रियांचा॥ ७३॥ निजकन्येचिया संगतीं। ब्रह्मा भुलला कामासक्ती। मा इतरांची कोण गती। संग अनर्थीं स्त्रियांचा॥ ७४॥ कामिनीसंग अतिदारुण। शिवासी झालें लिंगपतन। प्रमदांसंगें सज्ञान। ठकले जाण महायोगी॥ ७५॥ नारदें विनोददृष्टीं। कृष्णपत्नी मागितल्यासाठीं। तो नारदी केला गंगातटीं। तेथ जन्मले पोटीं साठी पुत्र॥ ७६॥ कौतुकें स्त्रियांप्रति जातां। सज्ञान पावे बाधकता। मा मजसारिख्या मूर्खाची कथा। कोण वार्ता ते ठायीं॥ ७७॥ क्षणार्ध स्त्रियांची संगती। सज्ञान ठकले ऐशा रीतीं। जे स्त्रीसंगा विश्वासती। ते दु:खी होती मजऐसे॥ ७८॥ यालागीं विश्वासतां स्त्रीसंगासी। इंद्रियषड्वर्ग ठकी सर्वांसी। एथ आवरूनि इंद्रियांसी। सर्वथा स्त्रियांसी त्यागावें॥ ७९॥ त्यागूनि स्त्रियांची संगती। उपरमूनि इंद्रियवृत्ती। राजा पावला परम शांती। तेंचि श्रीपति स्वयें सांगे॥ २८०॥
श्रीभगवानुवाच
एवं प्रगायन् नृपदेवदेव:
स उर्वशीलोकमथो विहाय।
आत्मानमात्मन्यवगम्य मां वै
उपारमज्ज्ञानविधूतमोह:॥ २५॥
जो उर्वशीस्वर्गभोग पावोनी। ज्यासी देव मानिती श्रेष्ठपणीं। जो सकळराजचूडामणी। ज्यासी येती लोटांगणीं भूपाळ॥ ८१॥ ऐसा पुरूरवा चक्रवर्ती। लाहोनि उर्वशीभोगप्राप्ती। स्वर्गभोगीं पावला विरक्ती। सभाग्य नृपति तो एक॥ ८२॥ अप्राप्तविषयें योगी। बहुत देखिले विरागी। परी प्राप्तस्वर्गांगनाभोगीं। धन्य विरागी पुरूरवा॥ ८३॥ पुरूरव्याऐशी विरक्ती। नाहीं देखिली आणिकांप्रती। धन्य पुरूरवा त्रिजगतीं। स्वमुखें श्रीपति वाखाणी॥ ८४॥ तेणें अनुतापाच्या अनुवृत्तीं। निंदोनियां निजात्मस्थिती। क्षाळिली कामिनीकामासक्ती। धुतला निश्चितीं महामोहो॥ ८५॥ अनुतापआगिठीं अभंग। वैराग्यपुट देऊनि चांग। विवेकें दमितां साङ्ग। काममोहाचे डाग क्षाळिले तेणें॥ ८६॥ जेवीं सोनें पुटीं पडे। तुक तुटे वानीं चढे। तेवीं निजात्मप्राप्तिनिवाडें। वृत्ति वाडेंकोडें क्षाळिली॥ ८७॥ ऐशिये अतिशुद्ध निजवृत्तीं। विवेकवैराग्यसंपत्ती। पूर्ण अनुतापाचे स्थितीं। माझी कृपाप्राप्ती पावला॥ ८८॥ माझिया कृपेवीण कांहीं। कदा अनुताप नुपजे देहीं। शुद्ध अनुताप ज्याच्या ठायीं। ते माझी कृपा पाहीं परिपूर्ण॥ ८९॥ माझी कृपा झालिया जाण। जीव होय ब्रह्म पूर्ण। नि:शेष गळे देहाभिमान। मीतूंपण भासेना॥ २९०॥ तेथ कार्य कर्म आणि कर्ता। भोग्य भोग आणि भोक्ता। दृश्य दर्शन द्रष्ट्टता। हे त्रिपुटी सर्वथा असेना॥ ९१॥ त्रिगुणत्रिपुटीचें कारण। मूळभूत निजअज्ञान। तें सद्गुरुकृपेस्तव जाण। गेलें हरपोन मिथ्यात्वें॥ ९२॥ जेवीं दोराचें सापपण। निर्धारितां हारपे पूर्ण। तेवीं गुणेंसीं अविद्या जाण। जाय हारपोन गुरुबोधें॥ ९३॥ सद्गुरुबोधें पाहतां जाण। दिसेना द्वैताचें भान। तेथ उर्वशी भोगी कोण। राजा स्वानंदें पूर्ण निवाला॥ ९४॥ राजा निवाला ब्रह्मरसीं। मग सांडूनियां उर्वशी। त्यजोनियां स्वर्गलोकासी। निजबोधेंसीं निघाला॥ ९५॥ इतर ज्ञाते स्त्रिया त्यागिती। परी त्यागेना कामासक्ती। तैसी नव्हे रायाची स्थिती। परमार्थविरक्ती पावला॥ ९६॥ जे परम विरक्तीचे पोटीं। कामिनीकामवार्ता नुठी। ब्रह्मानंदें कोंदली सृष्टी। स्वानंदपुष्टीं निवाला॥ ९७॥ ऐसा सुखरूपें सहज। मी होऊनि पावला मज। जिणोनि कल्पनाकामकाज। नाचत भोज स्वानंदें॥ ९८॥ ऐसा निश्चयेंसीं निश्चित। माझें निजस्वरूप झाला प्राप्त। तेणें हा इतिहास एथ। निजसुखार्थ गायिला॥ ९९॥ अनुतापआवडीं इतिहास। गातां प्रकटे पूर्ण परेश। तेथ सहजें अविद्येचा नाश। निजसुखें क्षितीश निवाला॥ ३००॥ एवढी पावावया निजप्राप्ती। त्यागावी कामिनीकामासक्ती। मुख्यत्वें धरावी सत्संगती। हेंचि उद्धवाप्रती हरि बोले॥ १॥
ततो दु:सङ्गमुत्सृज्य सत्सु सज्जेत बुद्धिमान्।
सन्त एतस्य छिन्दन्ति मनोव्यासङ्गमुक्तिभि:॥ २६॥
अवश्य त्यागावी दु:संगता। तो दु:संग कोण म्हणशी आतां। तरी स्त्री आणि स्त्रैणावरता। दु:संग सर्वथा असेना॥ २॥ जो मानीना वेदशास्त्रार्था। जो अविश्वासी परमार्था। ज्यामाजीं अतिविकल्पता। तोही तत्त्वतां दु:संग॥ ३॥ जो बोल बोले अतिविरक्त। हृदयीं अधर्मकामरत। कामरोधें द्वेषा येत। तोही निश्चित दु:संग॥ ४॥ कां स्वधर्मकर्मविनीतता। बाह्य दावी सात्त्विकता। हृदयीं दोषदर्शी संतां। हे दु:संगता अतिदुष्ट॥ ५॥ जो मुखें न बोले आपण। परी देखे साधूंचे दोषगुण। तेंचि संवादिया दावी उपलक्षण। तो अतिकठिण दु:संग॥ ६॥ मुख्य आपली जे सकामता। तोचि दु:संग सर्वथा। तो काम समूळ त्यागितां। दु:संगता त्यागिली॥.७॥ कामकल्पनेचा जो मार। तोचि दु:संग दुर्धर। ते कामकल्पना त्यागी जो नर। त्यासी संसारसुखरूप॥ ८॥ कामकल्पना त्यागावया जाण। मुख्य सत्संगचि कारण। संतांचे वंदितां श्रीचरण। कल्पनाकाम जाण उपमर्दे॥ ९॥ संग सर्वथा बाधक। म्हणशी त्यजावा नि:शेख। तरी सत्संग न धरितां देख। केवीं साधक सुटतील॥ ३१०॥ सत्संगेंवीण जें साधन। तेंचि साधकां दृढबंधन। सत्संगेंवीण त्याग जाण। तेंचि संपूर्ण पाषांड॥ ११॥ चित्तविषयांचा संबंध। गांठीं बैसल्या सुबद्ध। त्यांचा करावया छेद। विवेकें विशद निजसाधु॥ १२॥ संतांच्या सहज गोठी। त्याचि उपदेशांच्या कोटी। देहात्मता जीवगांठी। बोलासाठीं छेदिती॥ १३॥ भावें धरिल्या सत्संगती। साधकां भवपाशनिर्मुक्ती। यालागीं अवश्य बुद्धिमंतीं। करावी संगती संतांची॥ १४॥ त्या संतलक्षणांची स्थिती। अतिसाक्षेपें श्रीपती। आदरें सांगे उद्धवाप्रती। यथानिगुती निजबोधें॥ १५॥
सन्तोऽनपेक्षा मच्चित्ता: प्रशान्ता: समदर्शिन:।
निर्ममा निरहङ्कारा निर्द्वन्द्वा निष्परिग्रहा:॥ २७॥
साधूंचे अमित गुण। त्यांत मुख्यत्वें अष्टलक्षण। निवडूनि सांगे श्रीकृष्ण। ते कोण कोण अवधारीं॥ १६॥ प्राप्ताप्राप्त-लाभावस्था। बाधूं न शके साधूंच्या चित्ता। चित्त रातलें भगवंता। ‘निरपेक्षता’ या नांव॥ १७॥ पैल विषयो मज व्हावा। ऐसा आठव नाठवे जीवा। हा साधूचानिरपेक्ष ठेवा। जाण उद्धवा गुण पहिला॥ १८॥ चित्तें चिंतावें चैतन्य। याचि नांवें ‘मच्चित्त’-पण। याचि नांवें निरपेक्ष पूर्ण। इतर चिंतन भवबंधु॥ १९॥ निरपेक्ष व्हावया एथ। जागृति-स्वप्नसुषुप्तीआंत। चिन्मात्रीं जडलें चित्त। या नांव ‘मच्चित्त’ गुण दुजा॥ ३२०॥ देह झालिया लक्ष्मीयुक्त। अथवा हो कां आपद्भूत। चित्त परमानंदीं निश्चित। या नांव ‘मच्चित्त’ उद्धवा॥ २१॥ कामलोभादिदोषरहित। परमानंदीं जडलें चित्त। शांति सुखवासें वसे तेथ। यालागीं ‘प्रशांत’ बोलिजे त्यासी॥ २२॥ जरी प्राणांत केला अपकार। तरी न म्हणे हा ‘दुष्ट’ नर। अपकाऱ्या करी अति उपकार। प्रशांतिप्रकार या नांव॥ २३॥ जरी ठकूनि सर्वस्व नेलें। तरी क्षोभेना दोष बोले। तें जाण ब्रह्मार्पण झालें। येणें अंगा आलें प्रशांतत्व॥ २४॥ ब्रह्मभावेंचि तत्त्वतां। विश्वासणें सर्व भूतां। कदा विकल्प नुपजे चित्ता। हे प्रशांतता गुण तिजा॥ २५॥ ऐसा हा प्रशांत गुण। अंगीं बाणावया हेंचि कारण। जगीं देखे ‘समदर्शन’। ब्रह्मपरिपूर्ण समसाम्यें॥ २६॥ जग पाहतां दिसे विषम। परी विषमीं देखेसम ब्रह्म। तोचि ‘समदर्शी’ परम। हा गुण निरुपम पैं चौथा॥ २७॥ हे समदृष्टी यावया हाता। भावें भजोनि भगवंता। नि:शेष त्यजावी अहंममता। तेही कथा अवधारीं॥ २८॥ देहीं धरितां देहाभिमान। ते अहंता वाढवी ‘मीपण’। मीपणें ‘ममता’ जाण। वाढे संपूर्ण देहसंबंधें॥ २९॥ जे वाढली अहंममता। ते वर्तवी महादु:खावर्ता। तेचि निवारावया निजव्यथा। सद्भावें गुरुनाथाशरण जावें॥ ३३०॥ गुरुकृपा झालिया पूर्ण। माझ्या देहींचें जें मीपण। तें उकलोनि दावितांजाण। जग संपूर्ण मी एक॥ ३१॥ जें जें सान थोर दिसे दृष्टीं। तें तें अवघें मीचि सृष्टीं। माझ्या मीपणाची निजपुष्टी। घोंटीत उठी त्रैलोक्य॥ ३२॥ ऐसा मीपणें परिपूर्ण। तेथ ‘मी’ म्हणावया म्हणतें कोण। नि:शेष निमालें मीतूंपण। ‘निरभिमान’ या नांव॥ ३३॥ ऐसें माझें मीपण पाहतां। समूळ हारपली ममता। हें ‘माझें’ म्हणावया पुरता। ठाव रिता नुरेचि॥ ३४॥ माझ्या मीपणा बाहिरें। जैं ममतास्पद दुजें उरे। तैं तेथ पूर्ण ममता स्फुरे। ते म्यां चिन्मात्रें घोंटिली॥ ३५॥ तेथ मीपणेंसीं मी माझें। नुरेचि तूंपणेंसीं तुझें। ऐसे परब्रह्माचेनि निजें। झाले सहजें ‘निर्मम’॥ ३६॥ निर्मम निरभिमान। तें हें उद्धवा गा संपूर्ण। पांचवें सहावें लक्षण। संताचें जाण निजगुह्य॥ ३७॥ ऐसे निर्मम निरहंकार। जे होऊनि ठेले साचार। त्यांसी द्वंद्वदु:खडोंगर। अणुमात्र न बाधी॥ ३८॥ देह अदृष्टाच्या वांटा। लागतां सुखदु:खांच्या झटा। तो ब्रह्मसुखाचे चोहटा। देहाचा द्रष्टा होऊनि वसे॥ ३९॥ देहासी पदवी आली थोरी। तो श्लाघेना जीवाभीतरीं। देह घोळसितां नरकद्वारीं। तो अणुभरी कुंथेना॥ ३४०॥ देह व्याघ्रमुखीं सांपडे। तेणें दु:खें तो न सांकडे। देह पालखीमाजीं चढे। तैं वाडेंकोडें श्लाघेना॥ ४१॥ छाया विष्ठेवरी पडे। कां पालखीमाजीं चढे। तेणें पुरुषा सुखदु:ख न जोडे। मुक्तासी तेणें पाडें देहभोग॥ ४२॥ त्याचे दृष्टीखालीं एकाएक। दु:खपणा मुके दु:ख। सुखपणा विसरे सुख। ‘निर्द्वंद्व’ देख या हेतू॥ ४३॥ जो निर्मम निरभिमान। त्यासी नाहीं भेदमान। अभेदीं मिथ्या द्वंद्वबंधन। हा सातवा गुण निर्द्वंद्व॥ ४४॥ जो निर्द्वंद्वनिरभिमान पहा हो। त्यासी समूळ मिथ्या निजदेहो। तेथ देहसंबंधें परिग्रहो। उरावया ठावो मग कैंचा॥ ४५॥ स्वजनधनस्त्रीपुत्रांसी। नांदोनि तो नातळे त्यांसी। स्वप्नींची घरवात जागृता जैशी। तैसा साधूसी संसारु॥ ४६॥ एवं परिग्रही असोन। साधु ‘अपरिग्रही’ पूर्ण। हें आठवें मुख्यलक्षण। अतर्क्य जाण जगासी॥ ४७॥ साधु परिग्रही दिसती। परी ते परिग्रही नसती। हेचि संतांची पावावया स्थिती। त्यांची निजभक्ती करावी॥ ४८॥ हें साधूचें अष्टलक्षण। तें ब्रह्मींचें अष्टांग जाण। कीं अष्टमहासिद्धि निर्गुण। ते हे अष्टगुण साधूंचे॥ ४९॥ चैतन्यसरोवरींचें कमळ। विकासलें अष्टदळ। तें हें संतलक्षण केवळ। स्वानंदशीळ साधूंचें॥ ३५०॥ ऐसे हे अष्ट महागुणा। सकळ भूषणां भूषण। ज्यांचे अंगीं बाणले पूर्ण। ते साधु सज्जन अतिशुद्ध॥ ५१॥ इतर संगाचिये प्राप्ती। संग बाधक निश्चितीं। तैशी नव्हे सत्संगती। संगें छेदी आसक्ती देहसंगा॥ ५२॥ तेथ उपदेश नलगे कांहीं। संगेंचि देही करी विदेही। तेचि साते श्लोकीं पाहीं। संतांची नवाई हरि सांगे॥ ५३॥
तेषु नित्यं महाभाग महाभागेषु मत्कथा:।
संभवन्ति हिता नॄणां जुषतां प्रपुनन्त्यघम्॥ २८॥
इंद्रपदादि ब्रह्मसदन। ये प्राप्ती नांव ‘भाग्य’ गहन। तेही सत्संगासमान। कोटॺंशें जाण तुकेना॥ ५४॥ ऐशी जे कां सत्संगती। सभाग्य भाग्याचे पावती। भगवद्भावें साधु वर्तती। माझे कथाकीर्ति-अनुवादें॥ ५५॥ जे कथा अवचटें कानीं। पडतां कलिमलाची धुणी। करूनि सांडीत तत्क्षणीं। जे गंगेहूनी पवित्र॥ ५६॥ जेथ माझी निजकथा गाती। तीर्थें तेथें पवित्र होती। ऐशिया भगवत्कथाकीर्ती। साधु गर्जती सर्वदा॥ ५७॥ स्वयें आपण भागीरथी। सर्वदा ऐसें जीवीं चिंती। कोणी साधु ये जैं मजप्रती। तैं माझीं पापें जाती नि:शेष॥ ५८॥ पार्वतीचा द्वेष मनीं। तें बद्धपाप मजलागुनी। तेंही झडे संतचरणीं। सकळ पापा धुणी सत्संगें॥ ५९॥ कां ज्याचे मुखीं हरिनामकीर्ती। त्याचे पाय जैं मजमाजीं येती। तैं सकळ पापें माझीं जाती। ऐसें भागीरथी स्वयें बोले॥ ३६०॥ ऐसी संतांची संगती। सदा वांछी भागीरथी। अवचटें गेलिया संतांप्रती। पापें पळतीं प्राण्यांचीं॥ ६१॥ ते संतमुखींची माझी कथा। जैं अत्यादरें ऐके श्रोता। तैं त्याचें निजभाग्य तत्त्वतां। मजही सर्वथा न वर्णवे॥ ६२॥ माझे कथेची अतिआवडी। नित्य नूतन नवी गोडी। सादरें ऐकतां पापकोडी। जाळोनि राखोंडी उरवीना॥ ६३॥ माझी कथा कां माझें नाम। सकळ पातकां करी भस्म। हेंचि चित्तशुद्धीचें वर्म। अतिसुगम उद्धवा॥ ६४॥ नाना योग याग वेदाध्ययन। करितां पवित्र नव्हे मन। तें करितां हरिकथाश्रवण। होय अंत:करण पुनीत॥ ६५॥ अबद्ध पढतां वेद। दोष बाधिती सुबद्ध। नाम पढतां अबद्ध। श्रोते होती शुद्ध परमार्थतां॥ ६६॥ नाना योग याग वेदाध्ययन। तेथ अधिकारी द्विज संपूर्ण। कथाश्रवणें चारी वर्ण। होती पावन उद्धवा॥ ६७॥ ऐसा लाभ कथाश्रवणीं। तरी कां नाइकिजे सकळ जनीं। तें भाग्य भगवत्कृपेवांचूनी। सर्वथा कोणी लाहेना॥ ६८॥ भगवत्कृपा पावले साङ्ग। त्यांसी कथाकीर्तनीं अनुराग। तेचि निजभाग्यें महाभाग। स्वमुखें श्रीरंग बोलिला॥ ६९॥ जगातें पवित्र करिती। माझी जाण नामकीर्ती। ऐसा कळवळोनि श्रीपती। उद्धवाप्रती बोलिला॥ ३७०॥ ऐशी भगवत्कृपेची प्राप्ती। केवीं आतुडे आपुले हातीं। तेचि अर्थीं श्रीपती। विशद श्लोकार्थीं सांगत॥ ७१॥
ता ये शृण्वन्ति गायन्ति ह्यनुमोदन्ति चादृता:।
मत्परा: श्रद्दधानाश्च भक्तिं विन्दन्ति ते मयि॥ २९॥
आपुलिया गृहकार्यार्था। विषयव्यापारीं जातां जातां। कानीं पडली हरिकथा। स्वभावतां प्रसंगें॥ ७२॥ कृष्णकीर्तिकथनाक्षरें। रिघतांचि कर्णद्वारें। भीतरील पाप एकसरें। निघे बाहिरें गजबजोनि॥ ७३॥ जेवीं पंचाननाची आरोळी। करी मदगजां रांगोळी। तेवीं हरिकथेच्या मेळीं। होय रंवदळी महापापा॥ ७४॥ ऐसा निघाल्या पापाचा केरु। कथेसी उपजे अत्यादरु। कथावधानीं धरितां धीरु। हर्षें निर्भरु नर होय॥ ७५॥ जंव जंव कथारहस्य जोडे। तंव तंव अनुमोदनीं प्रीति वाढे। वाढले प्रीतीचेनि पाडें। ते कथा कैवाडें स्वयें गाय॥ ७६॥ फेडूनि लोकलाजेचें बिरडें। गातां हरिकीर्तिगुण पवाडे। न पाहे तो कर्माकडे। न सांकडें सुहृदासी॥ ७७॥ निजभावें भगवत्कथा गातां। स्वयंभ उपजे सादरता। तेणें अत्यादरें हरिकथा। होय सांगता अतिश्रद्धा॥ ७८॥ जंवजंव कथा सांगे निवाडें। तंव तंव श्रद्धा अधिक वाढे। प्रेमाचा पूर चढे। त्यामाजीं बुडे निज श्रद्धा॥ ७९॥ कथाकीर्तन अनुकीर्ती। वाढत्या श्रद्धेचिये प्रीतीं। बाधूं न शके विषयासक्ती। तेणें मत्पर स्थिति साधकां॥ ३८०॥ न करितां भगवद्भजन। वेदाध्ययन यज्ञ दान। येणेंचि आम्हीजाऊं तरोन। म्हणती ते जन महामूढ॥ ८१॥ एथ मुख्यत्वें भगवद्भक्ती। हा विश्वास धरितां चित्तीं। भगवत्पर झालिया वृत्ती। सर्व भूतीं मद्भाव॥ ८२॥ ऐसा भाव धरोनि हृदयीं। माझे भक्तीवेगळें कांहीं। सर्वथा स्वयें करणें नाहीं। ‘मत्पर’ पाहीं या रीतीं॥ ८३॥ ऐशिया मत्परा वृत्तीं। सावधान निजस्थिती। तेणें उपजे ‘चौथी भक्ती’। तेंचि श्रीपति स्वयें सांगे॥ ८४॥ तेथ न करितां आठवण। अखंड होय हरीचें स्मरण। क्रियामात्रें भगवद्भजन। सहजें जाण सर्वदा॥ ८५॥ जें जें ‘दृष्टीं’ देख आपण। थोर अथवा सूक्ष्म सान। तें तें होय हरीचें निजदर्शन। सहजें भजन अहेतुक॥ ८६॥ जें जें ‘वाचा’ वदे वचन। तें तें होय हरीचें स्तवन। स्तव्य स्तविता उणखूण। हेही आठवण विसरोनी॥ ८७॥ शब्दीं शब्दातें शब्दवितां। ते शब्दरूपें हरीची सत्ता। शब्द द्योती ज्या शब्दार्था। ते अर्थग्राहकता हरीची॥ ८८॥ यापरी ‘शब्दश्रवण’। श्रवणीं श्रवण होतां जाण। तो शब्दार्थ संपूर्ण। होय ब्रह्मार्पण श्रवणेंसीं॥ ८९॥ ‘गंध’ घ्राणां होतां भेटी। भोक्तेपणें हरीचि उठी। तो घ्रेय घ्राता घ्राण त्रिपुटी। स्वयें घोंटी चिदत्वें॥ ३९०॥ ‘रस’ रसना रसत्वबोध। तेथ निजभोक्ता गोविंद। तो भोग्य भोक्ता भोजनसंबंध। करी परमानंद निजबोधें॥ ९१॥ ‘शीत-उष्ण-मृदु-कठीण’। निजांगीं लागतां जाण। तें अंगेंचि होय आपण। मृदु कठिण मिथ्यात्वें॥ ९२॥ ‘करां’ ची जे कर्तव्यता। तीतें चालवी अकर्तता। यालागीं घेतां देतां। अकर्तात्मतां हरिभजन॥ ९३॥ निश्चळ निजरूपावरी। चपळ पाउलांच्या हारी। चालवी जैशा लहरी। सूर्यकरीं मृगजळाच्या॥ ९४॥ जागृति-स्वप्न-सुषुप्तीं। चिन्मात्रीं जडली वृत्ती। चित्त चित्तत्वाची विसरे स्फूर्ति। या नांव ‘मद्भक्ति’ उद्धवा॥ ९५॥ हे माझी आवडती भक्ती। इचें नांव म्हणिजेत ‘चौथी’। हें भाग्य आतुडे ज्याचे हातीं। तैं चारी मुक्ती निजदासी॥ ९६॥
भक्तिं लब्धवत: साधो: किमन्यदवशिष्यते।
मय्यनन्तगुणे ब्रह्मण्यानन्दानुभवात्मनि॥ ३०॥
अत्यंत माझी पढियंती। ते हे जाण चौथी भक्ती। निजभाग्यें लाधल्या हातीं। चारी मुक्ती तृणप्राय॥ ९७॥ निरपेक्ष जेथ माझी भक्ती। तेथ पायां लागती चारी मुक्ती। त्यांतें भक्त न धरिती हातीं। एथवरी प्रीति मद्भजनीं॥ ९८॥ माझिया निजभजनप्रीतीं। स्वप्नींही बद्धता नेणिजे भक्तीं। बद्धतेवीण मिथ्या मुक्ती। जाणोनि न घेती निजभक्त॥ ९९॥ जेथ बद्धता समूळ कुडी। तेथमुक्ति कायशी बापुडी। माझिया निजभजनआवडीं। स्वानंदकोडी मद्भक्तां॥ ४००॥ निरपेक्ष निजप्रीतीं। भावें करितां अनन्य भक्ती। भक्तांसी स्वानंदाची प्राप्ती। भजनस्थितीमाझारीं॥ १॥ जेवीं गर्भेंसीं वर्ते गुर्विणी। कां तरुणपणेंसीं तरुणी। तेवी स्वानंदाच्या पूर्णपणीं। माझे निजभजनीं मद्भक्त॥ २॥ तेथ सगुण अथवा निर्गुण। उभयरूपें मीचि ब्रह्म पूर्ण। तेथ भावें करितां भजन। ब्रह्मसंपन्न मद्भक्त॥.३॥ भावें करितां माझी भक्ती। भाविकां कोण पां अप्राप्ती। विवेक वैराग्य ज्ञानसंपत्ती। पायां लागती मद्भक्तांच्या॥ ४॥ माझे निजभजनें तुटे भेद। स्वयेंचि प्रकटे अभेदबोध। तेणें वोसंडे परमानंद। स्वानंदकंद स्वयंभ॥ ५॥ माझे स्वरूपा नाहीं अंत। यालागीं नांवें मी ‘अनंत’। बाप भक्तभाव समर्थ। तिहीं मी अनंत आकळिलों॥ ६॥ ऐसें ज्यांचें प्रेम गोड। त्यांचे सेवेचें मजकोड। त्यांचें सोशीं मी सांकड। निचाडा चाड मज त्यांची॥ ७॥ देव सप्रेमें भुलला। म्हणे मी त्यांचाचि अंकिला। जीवेंभावें त्यांसी विकिला। मी त्यांचा जाहला तिहीं लोकीं॥ ८॥ एथवरी भक्तां माझी प्राप्ती। अवचटें झाल्या सत्संगती। मा सद्भावें जे साधु सेविती। त्यांची निजगती मज न बोलवे॥ ९॥ ऐसा संतमहिमा वानितां। धणी न पुरे श्रीकृष्णनाथा। तोचि संतमहिमा मागुता। होय वानिता चौं श्लोकीं॥ ४१०॥
यथोपश्रयमाणस्य भगवन्तं विभावसुम्।
शीतं भयं तमोऽप्येति साधून् संसेवतस्तथा॥ ३१॥
जेवीं वैश्वानर तेजोमूर्ती। त्याची सेवा जे करूं जाणती। त्यांचें शीततमभयनिवृत्ती। तो करी निश्चितीं उद्धवा॥ ११॥ शीत निवारी संनिधी। तम निवारी तेजोवृद्धी। भय निवारी भगवद्बुद्धी। जेवीं त्रिशुद्धी विभावसु॥ १२॥ तैशीच जाण सत्संगती। संगें त्रिविध ताप निवारती। तेचि अर्थींची निजयुक्ती। ऐक उपपत्ती उद्धवा॥ १३॥ शीत म्हणिजे द्वंद्वबाधु। तो समूळ निवारिती साधु। तम म्हणिजे अज्ञानांधु। त्यासी करिती प्रबोधु निजज्ञानें॥ १४॥ भयांमाजीं श्रेष्ठ मरण। भय निवारी साधु विचक्षण। निवारिती जन्ममरण। कृपाळु पूर्ण दीनांचे॥ १५॥ अग्नीसमान म्हणों साधु। हाही बोल अतिअबद्धु। अग्नीहूनि अधिक साधु। तोचि प्रबोधु हरि सांगे॥ १६॥ अग्नीपाशीं प्रबळ धूम। साधु निष्क्रोध निर्धूम। अग्नि पोळी अधमोत्तम। साधु सर्वसम सुखदाते॥ १७॥ साधूंची धन्य संगती। संगें जडजाडॺ तोडिती। कर्माचें कर्मत्व मोडिती। बुडत्या तारिती निजसंगें॥ १८॥
निमज्ज्योन्मज्जतां घोरे भवाब्धौ परमायनम्।
सन्तो ब्रह्मविद: शान्ता नौर्दृढेवाप्सु मज्जताम्॥ ३२॥
प्रतिक्षणीं अधिक वृद्धी। अमर्याद वाढे भवाब्धी। तेथ उबकल्या चुबकल्या त्रिशुद्धी। अधर्मबुद्धि जनासी॥ १९॥ अधर्में निमज्जन नरकांत। स्वधर्में उन्मज्जन स्वर्गांत। ऐसे भोगिती आवर्त। स्वर्गनरकांत संसारी॥ ४२०॥ यापरी संसारी जन। पावतां उन्मज्जन निमज्जन। त्यासी तरावया भवाब्धि जाण। साधु सज्जन दृढ नाव॥ २१॥ पडल्या जळार्णवामाझारीं। जेवीं अच्छिद्र नाव तारी। तेवीं बुडतां भवसागरीं। सुखरूप तारी सज्जननाव॥ २२॥ कामक्रोधरहित शांती। हेचि नावेची अच्छिद्र स्थिती। ब्रह्मज्ञानें सपुरती। सुखरूप निश्चितीं या हेतु॥ २३॥ कामक्रोधादि सावजांसी। बळें घ्यावया आंविसासी। कदा न येववे नावेपाशीं। संगें सकळांसी तारक॥ २४॥ नवल ये नावेची स्थिती। जुनी नव्हे कल्पांतीं। बुडवूं नेणे धारावर्तीं। तारक निश्चितीं निजसंगें॥ २५॥ परी ये नावेची नवल गती। वरी चढले ते बुडती। तळीं राहिले ते तरती। जाण निश्चितीं उद्धवा॥ २६॥ दीनांचा कळवळा पहाहो। हाचि मुख्यत्वें तरणोपावो। त्या कळवळॺाचा अभिप्रावो। स्वयें देवो सांगत॥ २७॥
अन्नं हि प्राणिनां प्राण आर्तानां शरणं त्वहम्।
धर्मो वित्तं नृणां प्रेत्य सन्तोऽर्वाग्बिभ्यतोऽरणम्॥ ३३॥
जेवीं अन्नेवीण प्राण। सर्वथा न वांचती जाण। प्राण्यांचें प्राणपोषण। करावया सामर्थ्यपूर्ण अन्नीं नांदे॥ २८॥ जोडली धर्माची संपत्ती। ते इहलोकीं होय रक्षिती। तेचि धर्मधन देहांतीं। उत्तम गतिदायक॥ २९॥ संसारीं पीडिले दारुण। त्रिविध तापें तापले पूर्ण। ऐशिया शरणागता शरण्य। मी नारायण रक्षिता॥ ४३०॥ माझें करितां नामस्मरण। सहजें निवारे जन्ममरण। त्यामज रिघालिया शरण। बाधी दु:ख कोण बापुडें॥ ३१॥ दु:खभय न पावतां आधीं। जिंहीं साधु सेविले सद्बुद्धीं। त्यांसी भवभयाची आधिव्याधी। जाण त्रिशुद्धी बाधीना॥ ३२॥ प्राणियांसी होतां पतन। भाग्यें भेटल्या सज्जन। निवारूनि अधोगमन। जन्ममरण छेदिती॥ ३३॥ संसार तरावया जाण। सत्संगतीचि प्रमाण। त्यांचे भावें धरितां चरण। दीनोद्धरण त्यांचेनी॥ ३४॥
सन्तो दिशन्ति चक्षूंषि बहिरर्क: समुत्थित:।
देवता बान्धवा: सन्त: सन्त आत्माहमेव च॥ ३४॥
जेवीं आंधारेंसीं सगळी राती। निजतेजें निरसी गभस्ती। तेवीं सत्संगसूर्यप्राप्तीं। अविद्येची निश्चितीं निरसी निशा॥ ३५॥ बाह्य उगवल्या गभस्ती। चोर भयाची होय निवृत्तीं। तेवीं जोडल्या सत्संगती। भवभय कल्पांतीं असेना॥ ३६॥ बाह्य सूर्योदयकाळीं। पक्षी सांडिती आविसाळीं। सत्संगसूर्याचे मेळीं। देहाचीं आविसाळीं सांडिती जीव॥ ३७॥ बाह्य सूर्याच्या किरणीं। हर्षें विकासे कमळिणी। सत्संगसूर्याचे मिळणीं। निर्विकल्प कमळणी विकासे॥ ३८॥ सूर्य उगवलिया गगनीं। चक्रवाकें मिळती मिळणीं। तेवीं सत्संग पावोनि। जीव शिव दोनी एकवटती॥ ३९॥ बाह्य सूर्याचे पहांटेसी। पांथिक चालती स्वग्रामासी। सत्संगसूर्याचे प्रकाशीं। मुमुक्षु निजधामासी पावती॥ ४४०॥ बाह्य सूर्याचे उदयस्थितीं। कर्माची चाले कर्मगती। सत्संगसूर्याचे संगतीं। निष्कर्मप्रवृत्ति प्रवर्ते॥ ४१॥ सूर्यबिंबाचे उदयसंधीं। अर्घ्यदान दीजे वेदविदीं। सत्संगसूर्याचे संबंधीं। दीजे देहबुद्धी तिलांजळी॥ ४२॥ सूर्यउदयाचिया प्राप्ती। याज्ञिक होमातें हविती। तेवीं सत्संगसूर्यस्थिती। अहंता हविती ज्ञानाग्नीं॥ ४३॥ सूर्य उगवूनि आकाशीं। जगाची जड निद्रा निरसी। संत उगवूनि चिदाकाशीं। जीव चित्प्रकाशीं प्रबोधी॥ ४४॥ हो कां साधु सूर्यासमान। हें बोलणें निलाग हीन। सूर्यो पावे अस्तमान। साधु प्रकाशमान सर्वदा॥ ४५॥ सूर्यासी आच्छादी आभाळ। साधु सदा निजनिर्मळ। सूर्यासी सदा भ्रमणकाळ। साधु अचंचळ भ्रमणरहित॥ ४६॥ ग्रहणकाळाचा लवलाहो। पावतां सूर्यातें ग्रासी राहो। साधु ग्रहांचा पुसोनि ठावो। स्वानंदें पहा हो नांदती॥ ४७॥ धुई दाटतां प्रबळ। तेणें आच्छादे रविमंडळ। तम धूम मोहपडळ। साधूंसी अळुमाळ बाधीना॥ ४८॥ सूर्य निजकिरणें सर्वांतें तावी। साधु निजांगें जग निववी। सूर्य सर्वांतें क्षयो दावी। साधु अक्षयी करी निजबोधें॥ ४९॥ सूर्यो साह्य झालिया दृष्टीं। दृश्याकारें उघडेसृष्टी। सत्संग साह्य झालिया दृष्टीं। चिन्मात्रें सृष्टी ठसावे॥ ४५०॥ विवेकें विचारितां देख। सूर्याहूनि साधु अधिक। साधु धरातळीं ज्ञानार्क। भवाब्धितारक निजसंगियां॥ ५१॥ पृथ्वीतळीं देवता साधु। साधु दीनांचे सखे बंधु। साधुरूपें मी परमानंदु। जाण प्रसिद्धु परमात्मा॥ ५२॥ देवां दीजे बळिअवदान। तेव्हां देव होती प्रसन्न। कृपातारक निजसज्जन। दयाळु पूर्ण दीनांचे॥ ५३॥ सुहृद सखे सगोत्र बंधु। द्रव्यलोभें भजनसंबंधु। निर्लोभें कृपाळू साधु। सखे बंधु दीनांचे॥ ५४॥ संतकेवळ कृपेचे दीप। संत ते माझें निजस्वरूप। यालागीं सत्संगें फिटे पाप। होती निष्पापसाधक॥ ५५॥ निष्पाप करूनि साधकांसी। ब्रह्मस्वरूपता देती त्यांसी। ऐसें कृपाळुत्व साधूंपाशीं। जाण निश्चयेंसीं उद्धवा॥ ५६॥ मी निर्गुणत्वें ब्रह्म पूर्ण। साधु चालतें बोलतें ब्रह्म जाण। साधूंसी रिघालिया शरण। तैं जन्ममरण असेना॥ ५७॥ साधूंसी सद्भावें शरण। रिघाल्या नुरे जन्ममरण। साधु शरणागतां शरण्य। सत्य जाण उद्धवा॥ ५८॥ भावें धरिलिया सत्संगती। संसारिया होय निर्मुक्ती। हें प्रतिज्ञापूर्वक श्रीपती। उद्धवाप्रती बोलिला॥ ५९॥ सद्भावेंसीं सत्संगती। धरितां घरा ये ब्रह्मस्थिती। हें निजवर्म उद्धवाप्रती। देवें अध्यायांतीं निरूपिलें॥ ४६०॥ परम विरक्तीचें कारण। तें हें पुरूरवाप्रकरण। उपसंहार श्रीकृष्ण। अध्यायांतीं जाण संपवी॥ ६१॥
वैतसेनस्ततोऽप्येवमुर्वश्या लोकनि:स्पृह:।
मुक्तसङ्गो महीमेतामात्मारामश्चचार ह॥ ३५॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायामेकादशस्कन्धे षड्विंशोऽध्याय:॥ २६॥
पूर्वीं सूर्यवंश प्रसिद्ध। तेथ सोमवंशाचा संबंध। ‘वैतसेन’ श्लोकींचें पद। लावूनि गोविंद बोलिला॥ ६२॥ उमावनीं अतिएकांत। तेथ उमा आणि उमाकांत। विगतवासेंसीं क्रीडत। स्वानंदयुक्त स्वलीला॥ ६३॥ तेथ शिवाचे दर्शनासी। अवचटें आले सप्तऋषी। लज्जा उपजली पार्वतीसी। तिणें त्या वनासी शापिलें॥ ६४॥ ‘जो पुरुष या वनाआंत। येईल तो हो स्त्रीरूप एथ’। ऐसा शाप क्रोधयुक्त। वदली निश्चित जगदंबा॥ ६५॥ तेथ राजा ‘सुद्युम्न’ सूर्यवंशी। नेणोनियां शापप्रभावासी। पारधी आला त्या वनासी। सकळ सेनेसीं सन्नद्ध॥ ६६॥ रिघतांचि त्या वनाआंत। पुरुषत्व पालटलें तेथ। बाप शापाचें सामर्थ्य। झाले समस्त स्त्रीरूप॥ ६७॥ तेथ पुरुषत्वाचीआठवण। नि:शेष विसरलें मन। आपण पूर्वीं होतों कोण। हेंही संपूर्ण विसरले॥ ६८॥ अश्व झाले अश्विनी। हस्ती झाले हस्तिणी। पुरुष झाले कामिनी। तत्क्षणीं त्या वनांत॥ ६९॥ तेथ पुरुषकामें कामासक्ती। अनुकूल पुरुषांप्रती। स्त्रिया गेलिया त्या समस्ती। अतिकामरतीं संभोगा॥ ४७०॥ राजा सुद्युम्न झाला नारी। अतिसुकुमार सुंदरी। तो सोमपुत्र बुधातें वरी। अतिप्रीतीकरींभाळोनि॥ ७१॥ बुधें सुद्युम्न देखोनि नारी। तो भुलला स्त्रीकामेकरीं। एवं अतिप्रीतीं परस्परीं। येरयेरावरी भाळलीं॥ ७२॥ बुध महाराजचूडामणी। तो सुद्युम्नातें स्त्रीत्वें पर्णी। केली पटाची निजराणी। बाप करणी कर्माची॥ ७३॥ सुद्युम्नबुधवीर्येंकरीं। पुरूरवा जन्मे त्यांचे उदरीं। एवं सूर्यवंशामाझारीं। सोमवंश यापरी संचरला॥ ७४॥ हे सोमवंशींची आद्यकथा। एथूनि सोमवंश वाढता। श्रीकृष्ण बोलिला ध्वनितार्था। तेचि म्यां कथा उपलविली॥ ७५॥ सुद्युम्न झाला बुधाची नारी। मागें सूर्यवंशामाझारीं। नाहीं राज्यासी अधिकारी। संकट भारी वोढवलें॥ ७६॥ ते सूर्यवंशींचा कुळगुरु। वसिष्ठ महायोगीश्वरु। तेणें करूनि अत्यादरु। गौरी-हरु प्रार्थिलीं॥ ७७॥ प्रसन्न करूनि पार्वतीसी। मागे सुद्युम्नाच्या उच्छापासी। येरी सांगे महादेवासी। तुम्हीं वसिष्ठासीं बुझवावें॥ ७८॥ जें भवानीचें शापवचन। कदा अन्यथा नव्हे जाण। धरावया वसिष्ठाचें मन। नवलविंदान शिवें केलें॥ ७९॥ शुक्ल पक्षीं सुद्युम्नासी। पुरुषत्व प्राप्त होईल त्यासी। कृष्णपक्षीं बुधापाशीं। स्त्रीभावेंसीं वर्तेल॥ ४८०॥ पक्षें पुरुष पक्षें नारी। ऐशिया उच्छापाची परी। शिवें करूनि कृपेकरीं। केला अधिकारी निजराज्या॥ ८१॥ पुरुषत्व पावल्या सुद्युम्नासी। तें पुरुषत्व नावडे त्यासी। स्त्रीसंभोगें बुधापाशीं। अतिप्रीतीसीं लोधला॥ ८२॥ स्वर्गअप्सरा आलिया पाशीं। त्याही नावडती सुद्युम्नासी। त्याहूनि प्रीति बुधापाशीं। स्त्रीभावेंसीं अनिवार॥ ८३॥ बुधासीही स्वर्गांगना। संभोगीं न येती मना। ऐसी अतिप्रीति सुद्युम्ना। स्त्रीभोगें जाणा विगुंतली॥ ८४॥ पुरुषीं पुरुषत्वाची रती। भोगूं जाणें मी श्रीपती। इतर बापुडीं तीं किती। स्त्रीदेहासक्तीं भुललीं॥ ८५॥ स्त्रीदेहीं जो आत्मा असे। तो भोगिजे म्यां हृषीकेशें। इतरांसी स्त्रीदेहींचें पिसें। विषयावेशें भुलोनी॥ ८६॥ असो हें सांगावें किती। कामीं निष्कामतेची रती। ते मी जाणें रमापती। कां जाणती निजानुभवी॥ ८७॥ पुरुषत्वापरीस कामरती। स्त्रीदेहीं अतिआसक्ती। त्या स्त्रीकामाची निवृत्ती। जाण निश्चितीं सत्संगें॥ ८८॥ वसिष्ठाचिये सत्संगतीं। झाली स्त्रीभावाची निवृत्ती। सुद्युम्न पावला पुरुषत्वप्राप्ती। धन्य त्रिजगतीं सत्संग॥ ८९॥ पुरुषत्व पावोनि सुद्युम्न। निजनगरा येतां जाण। स्त्रीभावें नष्टलें सैन्य। एकला आपण स्वयें आला॥ ४९०॥ एवं नि:शेष विगतसैन्य। यालागीं नांवें ‘वीतसेन’। त्या वीतसेनाचा पुत्र जाण। ‘वैतसेन’ पुरूरवा॥ ९१॥ तेणें निजात्मता अतिविरक्ती। सांडूनि स्वर्गभोगसंपत्ती। त्यजूनि उर्वशीकामासक्ती। आत्मारामस्थिती पावला॥ ९२॥ आत्माराम निजस्थिती। मिथ्या देहसंग सांगाती। निजात्मबोधें त्रिजगतीं। स्वानंदें नृपति विचरत॥ ९३॥ जेथें जेथें पाउलउठी। तेथें तेथें होती सुखाच्या कोटी। स्वानंदें कोंदली सृष्टी। ब्रह्मदृष्टीं विचरतु॥ ९४॥ ब्रह्मींविचरतां ब्रह्मपणें। ब्रह्मरूप झालें जिणें। विसरला जिणेंमरणें। पूर्णीं पूर्णपणें परिपूर्ण॥ ९५॥ हें उर्वशी-पुरूरवोपाख्यान। जो स्वयें ऐके सावधान। तैं दोष जाती अगम्यागमन। विरक्ति संपूर्ण साधकां॥ ९६॥ यापरी वैराग्ययुक्तीं। राजा पावला ब्रह्मप्राप्ती। वैराग्य उपजे सत्संगतीं। सत्संगें विरक्ती मद्भजनें॥ ९७॥ ‘सद्भावें करितां माझी भक्ती। साधकां उपजे विरक्ती’। ऐसें बोलिला श्रीपती। तें उद्धवें चित्तीं दृढ धरिलें॥ ९८॥ ते भजनक्रियेचा प्रश्न। पुढिले अध्यायीं जाण। उद्धव पुसेल आपण। जेणें श्रीकृष्ण संतोषे॥ ९९॥ उद्धव पुसेल गोड गोठी। जेणें श्रीकृष्ण सुखावे पोटीं। तेणें स्वानंदें निजपुष्टी। भजनहातवटी सांगेल॥ ५००॥ उपासनाकांडरहस्य पूर्ण। मुख्य क्रियायोगनिरूपण। समूळ आगमलक्षण। स्वमुखें श्रीकृष्ण सांगेल॥ १॥ ते कथेसी अवधान। श्रोतां द्यावें सावधान। एका तुष्टला जनार्दन। स्वानंदघन निजबोधें॥ ५०२॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे एकादशस्कंधे श्रीकृष्णोद्धवसंवादे एकाकारटीकायां ऐलगीतोपाख्यानं नाम षड्विंशोऽध्याय:॥ २६॥ श्रीकृष्णार्पणमस्तु॥ श्लोक ३५॥ ओव्या ५०२॥
॥ श्री ॐ तत्सत्-श्रीकृष्ण प्रसन्न॥
अध्याय सत्ताविसावा
श्रीगणेशाय नम:॥ श्रीकृष्णाय नम:॥ ॐ नमो देव सहज निज। तूं विश्वात्मा चतुर्भुज। अष्टभुज तूंचि विश्वभुज। गुरुत्वें तुज गौरव॥ १॥ निजशिष्याचिया भावार्था। तूं गुरुनामें अभयदाता। अभय देऊनि तत्त्वतां। भवव्यथा निवारिसी॥ २॥ निवारूनि जन्ममरण। आपण्या भेटसी आपण। तेव्हां गुरुशिष्यनामीं संपूर्ण। तुझें एकपण आभासे॥ ३॥ तें एकपण पाहतां दिठीं। एका जनार्दनीं पडे मिठी। गुरुत्वें कोंदे सकळ सृष्टी। स्वानंदपुष्टी जग नांदे॥ ४॥ तो स्वानंदैकचिद्घन। जगद्गुरु जनार्दन। एका जनार्दना शरण। एकीं एकपण दृढ केलें॥ ५॥ दृढ केलें जें एकपण। तेंही सद्गुरु झाला आपण। तेथें खुंटलें मीतूंपण। एका जनार्दन एकत्वें॥ ६॥ यापरी एकाकी एकला। एका जनार्दनें कवयिता केला। तो एकादशाचा पावला। अतिसखोला एकत्वबोध॥ ७॥ त्या एकत्वाची निजस्थिती। पावला पुरूरवाभूपती। दृढ अनुताप विरक्ती। भगवद्भक्ती सत्संगें॥ ८॥ हें सव्विसावे अध्यायीं जाण। स्वमुखें बोलिला श्रीकृष्ण। सत्संगें भगवद्भजन। तेणें वैराग्य पूर्ण साधकां॥ ९॥ न करितां भगवद्भक्ती। कदा नुपजे विरक्ती। विरक्तीवीण भगवत्प्राप्ती। नव्हे कल्पांतीं साधकां॥ १०॥ ऐसें बोलिला श्रीकृष्ण। तें उद्धवें जीवीं धरूनि पूर्ण। भगवद्भक्ति पूजाविधान। क्रियायोग जाण पुसत॥ ११॥
उद्धव उवाच
क्रियायोगं समाचक्ष्व भवदाराधनं प्रभो।
यस्मात्त्वां ये यथार्चन्ति सात्वता: सात्वतर्षभ॥ १॥
निजभक्तअनुग्रहार्थ। सत्त्वमूर्ति तूं श्रीअनंत। तुझे निजभक्त जे सात्वत। ते तुज पूजित कोणे विधीं॥ १२॥ तें साधूचें आराधन। तुझें क्रियायोगें निजपूजन। कृपा करोनियां आपण। मज संपूर्ण सांगावें॥ १३॥ म्हणसी जरी हें आणिकांतें पुसावें। हें माझेनि जाण सर्वथा नव्हे। तुज सांडू निदूरी जावें। हे लाजही जीवें साहवेना॥ १४॥ मी तुझा दास जीवेंभावें। तुझेनि प्रभुत्व गौरवें। मी कळिकाळा नागवें। कृपाप्रभावें तुझेनी॥ १५॥ तूं कृपाळु कृपायुक्त। कृपेने होसी भक्तांचा भक्त। त्या तुझा मी चरणांकित। सलगीं गुह्यार्थ स्वयें पुसें॥ १६॥ इतका करूनि अत्यादर। कां पुससी पूजाप्रकार। तरी हा श्रेष्ठश्रेष्ठीं केला विचार। तो निजनिर्धार अवधारीं॥ १७॥
एतद्वदन्ति मुनयो मुहुर्नि:श्रेयसं नृणाम्।
नारदो भगवान् व्यास आचार्योऽङ्गिरस: सुत:॥ २॥
पूर्वीं वेदविचारनिष्ठ। सुरवर्य मुनिश्रेष्ठ। हेंचि अनुवादले स्पष्ट। अतिवरिष्ठ विवेकी॥ १८॥ पूजाविधान प्रसिद्ध। बोलिला देवर्षि ‘नारद’। अंगिराचा पुत्र अगाध। ‘देवगुरु’ प्रबुद्ध हेंचि बोले॥ १९॥ जो ‘व्यास’ सत्यवतीसुत। जो कां नारायण मूर्तिमंत। जेणें प्रकट केला वेदार्थ। जो विख्यात महाकवि॥ २०॥ पुराणकविकर्ता तो साङ्ग। यालागीं ‘व्यासोच्छिष्टमिदं जगत्’। तेणेंही भगवत्पूजामार्ग। हा क्रियायोग बोलिजे॥ २१॥ असो इतरांची चावटी। जो पितामह सकळ सृष्टी। जो जन्मला विष्णूच्या पोटीं। तेणेंही या गोष्टी दृढ केल्या॥ २२॥
नि:सृतं ते मुखाम्भोजाद्यदाह भगवानज:।
पुत्रेभ्यो भृगुमुख्येभ्यो देव्यै च भगवान् भव:॥ ३॥
तुवांचि कल्पाचिया आदीं। हेचि पूजाविधानविधी। उपदेशिला पुत्रबुद्धीं। स्वयें त्रिशुद्धी विधाता॥ २३॥ तेणेंही कल्पादीसीं आपण। नाभिकमळासनीं बैसोन। भृगुकश्यपादि पुत्रांसी जाण। हें पूजाविधान उपदेशी॥ २४॥ श्रीमहादेवेंही आपण। हें क्रियायोगविधिविधान। भावें भवानीसी जाण। केलें निरूपण एकांतीं॥ २५॥
एतद्वै सर्ववर्णानामाश्रमाणां च सम्मतम्।
श्रेयसामुत्तमं मन्ये स्त्रीशूद्राणां च मानद॥ ४॥
एवं श्रेष्ठपरंपरा। तुवां प्रकट केली दीनोद्धारा। दीनदयाळु तूं खरा। याही विचारा अवधारीं॥ २६॥ आश्रमधर्मविधिविधान। तेथ अधिकारी द्विजन्मे जन। त्यांसी कर्मबाधा बाधी गहन। गुंतले ब्राह्मण कर्मठत्वें॥ २७॥ तैसें नव्हे तुझें भजन। भजनाधिकारी सर्व वर्ण। दीनोद्धारी भजन पूर्ण। स्त्रिया शूद्रजन उद्धरिले॥ २८॥ कर्मीं गुंतले उत्तमोत्तम। भजनें उद्धरिले अधमाधम। भजनें सर्वांसही सुगम। भजनें स्वधर्म सार्थक॥ २९॥ भजनमहिमा नि:सीम। अधमा पदवी उत्तमोत्तम। भजनहीन जे उत्तम। ते अधमाधम स्वयें होती॥ ३०॥ सर्व वर्ण आणि आश्रम। भगवद्भजनें गति उत्तम। हेंचि भक्तीचें निजवर्म। भक्त निष्काम जाणती॥ ३१॥ करूनियां भगवद्भक्ती। भक्त स्वयें भगवद्रूप होती। यालागीं भक्तांतें श्रीपती। अतिप्रीतीं मानिसी॥ ३२॥ तुझें भजनपूजन करितां। तूं निजभक्तांचा होसी त्राता। तूंचि भक्तांसी सन्मान-दाता। ते भजनकथा मज सांग॥ ३३॥
एतत्कमलपत्राक्ष कर्मबन्धविमोचनम्।
भक्ताय चानुरक्ताय ब्रूहि विश्वेश्वरेश्वर॥ ५॥
कमळनाभि नारायणा। भक्तविश्राम कमळवदना। कमलालया कमलनयना। विनंती श्रीकृष्णा अवधारीं॥ ३४॥ तुवां पाहिल्या कृपादृष्टीं। तत्काल पैं उठाउठीं। सुटती कर्मबंधाच्या गांठी। स्वानंदपुष्टी निजभक्तां॥ ३५॥ जेवीं घृताचें कठिणपण। क्षणें विरवी सूर्यकिरण। तेवीं कर्मबंधा निर्दळण। तुझें कृपावलोकन करी कृष्णा॥ ३६॥ कां सैंधवाचा महागिरी। जेवीं विरे सिंधूमाझारीं। तेवीं कमर्बंधा बोहरी। तुझी कृपा करी श्रीकृष्णा॥ ३७॥ तुझी झालिया कृपादृष्टी। कर्माकर्मांसी पडे तुटी। जेवीं सूर्योदयापाठी। नातुडे भेटीं खद्योता॥ ३८॥ तमीं दाटती खद्योतकोडी। तेवीं अज्ञानीं कर्माची आडाडी। तुझा कृपासूर्य जोडल्या जोडी। कर्में जाती बापुडीं विरोनी॥ ३९॥ ऐशिया निष्कर्मकृपायुक्त। तुझे नांदती निजभक्त। जे कां विषयीं अतिविरक्त। सदा अनुरक्त हरिचरणीं॥ ४०॥ तें पूर्णकृपेचें आयतन। तुझें भजन पूजाविधान। तें मज सांग कृपा करून। मी अतिदिन पैं तुझें॥ ४१॥ म्हणसी तुज हा अधिकार नाहीं। परी मी शरण आलों तुज पाहीं। शरणागताची तुझ्या ठायीं। उपेक्षा नाहीं श्रीकृष्णा॥ ४२॥ तुवां उद्धरिलें पशु-गीध-गजांसी। गणिके तारिलें कुंटणीसी। तेचि कृपा करीं आम्हांसी। हृषीकेशी कृपाळुवा॥ ४३॥ म्हणसी ‘ब्रह्मा शिव असतां सृष्टीं। मजचि पुसायाची श्रद्धा मोठी। कैसेनि पां वाढली पोटीं’। ऐक ते गोठी सांगेन॥ ४४॥ ब्रह्मा जगाचा कर्ता होये। तोही विसरला निजात्मसोये। तो तुझ्या पोटा येऊनि पाहें। निजज्ञान लाहे तुझेनि॥ ४५॥ शिव पायवणी वाहे माथां। तुझें नाम सदा जपतां। तुझे कृपेस्तव तत्त्वतां। तोही निजात्मता पावला॥ ४६॥ यालागीं तूं ईश्वराचा ईश्वर। नियंत्या नियंता सर्वेंश्वर। विश्वीं विश्वात्मा विश्वंभर। विश्वेश्वर तूं कृष्णा॥ ४७॥ यापरी तूं ज्ञाननिधी। पूर्णबोधाचा उदधी। जेणें होय निजात्मसिद्धी। ते पूजाविधी मज सांग॥ ४८॥ ऐसा भक्तवचनें तो संतोषला। पूर्ण निजबोधें द्रवला। निजात्मकृपा कळवळला। काय बोलिला श्रीकृष्ण॥ ४९॥
श्रीभगवानुवाच
नह्यन्तोऽनन्तपारस्य कर्मकाण्डस्य चोद्धव।
संक्षिप्तं वर्णयिष्यामि यथावदनुपूर्वश:॥ ६॥
ज्याचें ऐकतां वचन। वेदवाक्या पडे मौन। ज्याची करितां आठवण। मनपणा मन स्वयें मुके॥ ५०॥ जो वेदार्थप्रकाशक। जो अर्काचा आदि अर्क। तो उद्धवासी यदुनायक। स्वमुखें देख बोलत॥ ५१॥ आगमनिगमोक्तप्रकार। माझी पूजाविधी सविस्तर। सांगतां अनंत अपार। नकळे पार ब्रह्मादिकां॥ ५२॥ उद्धवा ऐक पां तत्त्वतां। मी देवादिदेव झालों वक्ता। तरी पूजाविधान कथा। समूळ सर्वथा न सांगवे॥ ५३॥ जरी झाले अतिसज्ञान। तरी पूजाविधि विधान। सांगावया समर्थपण। सर्वथा जाण असेना॥ ५४॥ एवं पूर्वोक्तप्रकार। आगमनिगमनिजसार। निवडूनि संक्षेपाकार। तुज मी साचार सांगेन॥ ५५॥ पूजाविधि निजसार। त्रिविध विधान त्रिप्रकार। ऐक त्याचाही विचार। विधि उपचार विभागें॥ ५६॥
वैदिकस्तान्त्रिको मिश्र इति मे त्रिविधो मख:।
त्रयाणामीप्सितेनैव विधिना मां समर्चयेत्॥ ७॥
वेदींचे मंत्र वेदींचें अंग। वेदोक्त माझी पूजा साङ्ग। या नांव गा ‘वैदिक’ मार्ग। आगम-प्रयोग तो ऐक॥ ५७॥ आगममंत्र आगमचि अंग। माझी आगमोक्त पूजा साङ्ग। या नांव गा ‘तांत्रिक’ मार्ग। मिश्रप्रसंग तो ऐक॥ ५८॥ वेदींचे मंत्र तंत्रींचें अंग। एवं मिश्रित उभय भाग। माझी पूजा निपजे साङ्ग। ‘मिश्र’ मार्ग या नांव॥ ५९॥ हे त्रिविधविधि पूजा साङ्ग। तो जाण माझा ‘त्रिविध’ याग। येणें मी संतोषें श्रीरंग। पार्श्वदेशीं साङ्ग सपरिवार॥ ६०॥ ऐसें माझें त्रिविध भजन। जेथ ज्याची श्रद्धा पूर्ण। त्या विधीं करितां पूजन। मज तृप्ति समान भावार्थें॥ ६१॥ भावार्थें जें माझें पूजन। तेणें मी संतृप्त जनार्दन। हा आगमोक्त यज्ञ संपूर्ण। त्रिविध लक्षण समसाम्यें॥ ६२॥ वैदिकादि त्रिविध गती। पूजितां तृप्त मी श्रीपती। पूजाधिकाराची स्थिती। ऐक तुजप्रती सांगेन॥ ६३॥
यदा स्वनिगमेनोक्तं द्विजत्वं प्राप्य पूरुष:।
यथा यजेत मां भक्त्या श्रद्धया तन्निबोध मे॥ ८॥
द्विजन्मे जे तिन्ही वर्ण। त्यांचें अधिकारलक्षण। गर्भाष्टमीं उपनयन। तैं अधिकार पूर्ण ब्राह्मणा॥ ६४॥ क्षत्रियांचा अधिकार शुद्ध। बारा वर्षां व्रतबंध। सोळा वर्षां प्रसिद्ध। व्रतबंधवैश्यासी॥ ६५॥ गायत्रीउपदेश पावोन। दुसरें जन्म उपनयन। या लागीं ‘सावित्र’ जन्म जाण। द्विजन्मे त्रिवर्ण वेदोक्तविधी॥ ६६॥ वेदोक्त अधिकारलक्षण। या नांव उद्धवा जाण। आतां माझें पूजाविधिस्थान। ऐक संपूर्ण निजभक्ता॥ ६७॥
अर्चायां स्थण्डिलेऽग्नौ वा सूर्ये वाप्सु हृदि द्विजे।
द्रव्येणा भक्तियुक्तोऽर्चेत् स्वगुरुं माममायया॥ ९॥
माझें पूजाअधिष्ठान। अष्टविध पूजास्थान। त्याचेंही निजलक्षण। ऊणखूण ते ऐक॥ ६८॥ प्रिय ‘प्रतिमा’ पूजास्थान। हें माझें प्रथम अधिष्ठान। कां पृथ्वीतळीं ‘स्थंडिलीं’ जाण। पूजास्थान दुसरें॥ ६९॥ ‘अग्नीचें तेज’ स्वरूप माझें। तें पूजास्थान जाण तिजें। ‘सूर्यमंडळीं’ जे पूजा कीजे। तें चवथें माझें पूजास्थान॥ ७०॥ ‘उदकीं’ जें माझें पूजन। तें पांचवें पूजास्थान। ‘हृदयीं’ जें माझें आवाहन। तें पूजास्थान सहावें॥ ७१॥ शालिग्राम केवळ अचेतन। ‘ब्राह्मण’ माझें स्वरूप सचेतन। तें अखंडत्वें ब्रह्मपूर्ण। पूजासन्मान षोडशोपचारें॥ ७२॥ ब्राह्मणीं ज्याचा ब्रह्मभावो। तो परम भाग्याचा स्वयमेवो। ब्रह्मादिकां पूज्य पहा हो। मी देवाधिदेवो स्वयें वंदीं॥ ७३॥ सकळपूज्यांमाजीं जाण। मुख्यत्वें पूज्य ब्राह्मण। तें सातवें पूजास्थान। उद्धवा जाण अतिश्रेष्ठ॥ ७४॥ सकळ पूज्यां पूज्यत्वें पूजा। जो वरिष्ठां वरिष्ठ वोजा। जो विनटता आत्मा माझा। वंद्य ‘गुरुराजा’ सर्वांसी॥ ७५॥ ज्याचे सद्भावें धरितां चरण। मी सुखावें ब्रह्म पूर्ण। ज्याचें मद्रूपें करितां स्तवन। मी परमात्मा जाण उल्हासें॥ ७६॥ सद्गुरूचें नामस्मरण। निर्दळी भवभय दारुण। निवारोनी जन्ममरण। निववी संपूर्ण निजबोधें॥ ७७॥ तो मी परमात्मा नारायण। गुरुरूपें प्रकटोनि जाण। परब्रह्माचें पूर्णपण। शिष्यद्वारा संपूर्ण प्रकाशक॥ ७८॥ ब्रह्माचें परब्रह्मपण। सद्गुरूचेनि सत्यजाण। एव्हडें अगाध महिमान। अतिगहन गुरूचें॥ ७९॥ एवं ‘सद्गुरु’ ज्ञानघन। जो हरिहरां वंद्यपूर्ण। तो माझें सद्रूप अधिष्ठान। हें पूजास्थान आठवें॥ ८०॥ हें आठवें पूजास्थान। अखंड आठवे आठवण। तेणें आठवें साङ्ग संपूर्ण। उद्धवा जाण मी पूजिलों॥ ८१॥ एवं हीं आठही पूजास्थानें। तुज सांगितलीं सुलक्षणें। तेथलीं पूजेचीं लक्षणें। तेही भिन्नपणें सांगेन॥ ८२॥ सकळ अधिष्ठानां गोडपण। जें पूजनीं होय संपूर्ण। तें पूजेचें मुख्य लक्षण। निजवर्म खूण ते ऐक॥ ८३॥ सांडूनि लोकरंजन व्यापार। त्यजूनि दांभिक उपचार। दवडूनि शठत्वाचा व्यवहार। भजनतत्पर सद्भावें॥ ८४॥ हीं अष्टौ महापूजास्थानें। येथ ‘अमायिक’ जें जें भजन। तें तें अतिगोड पूजन। उद्धवा जाण निश्चित॥ ८५॥ एथ निष्कपट जे जे सेवा। ते ते अतिवल्लभ देवाधिदेवा। आतां पूजाविधि आघवा। ऐक बरवा सांगेन॥ ८६॥
पूर्वं स्नानं प्रकुर्वीत धौतदन्तोऽङ्गशुद्धये।
उभयैरपि च स्नानं मन्त्रैर्मृद्गहणादिना॥ १०॥
मळत्याग दंतधावन। यथाकाळीं करूनि जाण। देहशुद्धॺर्थ करावें स्नान। मृत्तिकाग्रहण-पूर्वक॥ ८७॥ ऐसें झालिया मळत्याग स्नान। मग करावें मंत्रस्नान। वैदिक तांत्रिक विधान। दीक्षाग्रहण यथाविधि॥ ८८॥ जैसा सद्गुरुसंप्रदावो। तैसा चालवावा आम्नावो। त्या विधीं स्नान करूनि पाहा हो। निर्मळ भावो धरावा॥ ८९॥
सन्ध्योपास्त्यादि कर्माणि वेदेनाचोदितानि मे।
पूजां तै: कल्पयेत्सम्यक् सङ्कल्प: कर्मपावनीम्॥ ११॥
वर्णाश्रमनिजविधींसीं। वेदें संध्या बोलिली जैसी। ते ते वर्णाश्रमीं संध्या तैसी। नित्यनैमित्येंसीं करावीं॥ ९०॥ वेदोक्त आचरावें स्वकर्म। नि:शेष त्यागावें निषिद्ध काम्य। या नांव शुद्ध स्वधर्म। उत्तमोत्तम अधिकारू॥ ९१॥ वेदोक्त सांडणें स्वकर्म। हाचि मुख्यत्वें अतिअधर्म। हाता आलिया परब्रह्म। न त्यागितां कर्म स्वयें राहे॥ ९२॥ स्वयें स्वधर्म जो सांडणें। तेंचि अधर्माचें मुख्य ठाणें। स्वधर्में चित्तशुद्धि साधणें। यालागीं त्यागणें अहंता॥ ९३॥ तेथें स्वधर्मकर्म आचरतां। ऐसा भाव उपजे चित्ता। ‘मी नव्हें एथ कर्मकर्ता। फळभोक्ता मी नव्हे’॥ ९४॥ देह जड मूढ अचेतन। त्यासी चेतवी जनीं जनार्दन। तेथ माझें मीपण कर्तेपण। सर्वथा जाण रिघेना॥ ९५॥ या बुद्धीं जें कर्माचरण। तें भावार्थें भावीं ब्रह्मार्पण। यापरी निरभिमान। माझें उपासन साधकां॥ ९६॥ माझी प्रतिमा पूजाविधान। तें प्रथम माझें पूजास्थान। तें प्रतिमाक्रियालक्षण। ऐक संपूर्ण उद्धवा॥ ९७॥
शैली दारुमयी लौही लेप्या लेख्या च सैकती।
मनोमयी मणिमयी प्रतिमाष्टविधा स्मृता॥ १२॥
अष्टधा प्रतिमास्थिती। ज्या पूजितां सद्य:श्रेय देती। ऐशिया प्रतिमांची जाती। ऐक तुजप्रती सांगेन॥ ९८॥ गंडक्यादि ‘शिळामूर्ती’। कां दारु मांदार ब्रह्म ‘काष्ठमूर्ती’। अथवा सुवर्णादि ‘धातुमूर्ती’। सद्य: फळती साधकां॥ ९९॥ मृत्तिका कापडकीटणमूर्ती। या नांव ‘लेप्या’ म्हणिजेती। कां स्थंडिलीं लिहिल्या अतिप्रीतीं। त्या ‘लेख्या’ मूर्ती पूजकां॥ १००॥ वाळुवेची जे केली मूर्ती। ती नांव ‘सिकतामूर्ति’ म्हणती। तेही पूज्य गा निश्चितीं। सुवर्णमूर्तीसमान॥ १॥ मूर्ति ‘रत्नमयी’ सोज्ज्वळ। हिरा मरकत इंद्रनीळ। पद्मराग मुक्ताफळ। या मूर्ति केवळ अतिपूज्य॥ २॥ मूर्तीमाजीं अतिप्राधान्य। ‘मनोमयी’ मूर्ति पावन। जिचें करितां उपासन। समाधान साधकां॥ ३॥ तेंचि प्रतिमा पूजाविधान। स्थावरजंगमलक्षण। तेही अर्थींचें निरूपण। विशद श्रीकृष्ण सांगत॥ ४॥
चलाचलेति द्विविधा प्रतिष्ठा जीवमन्दिरम्।
उद्वासावाहने न स्त: स्थिरायामुद्धवार्चने॥ १३॥
अचेतना चेतन प्रकार। जडातें जीववी साचार। ‘जीव’ शब्दें चिन्मात्र। मुख्य परमेश्वर बोलिजे॥ ५॥ भक्तभावार्थें साचार। त्या जीवाचें निजमंदिर। प्रतिमा जंगम-स्थावर। आगमशास्त्रसंमतें॥ ६॥ तेथें स्थावर मूर्तिपूजन। साधकें करितां आपण। न लगे आवाहनविसर्जन। तेथ अधिष्ठान स्वयंभ॥ ७॥
अस्थिरायां विकल्प: स्यात् स्थण्डिले तु भवेद् द्वयम्।
स्नपनं त्वविलेप्यायामन्यत्र परिमार्जनम्॥ १४॥
जंगम प्रतिमांच्या ठायीं। आवाहन विसर्जन पाहीं। एकीं आहे एकीं नाहीं। ऐक तेही विभाग॥ ८॥ शालग्राममूर्तीसी जाण। स्वयंभ माझें अधिष्ठान। तेथ आवाहन विसर्जन। सर्वथा जाण लागेना॥ ९॥ शालग्रामाचा कुटका। ज्याचे पूजेसी आहे फुटका। तेथ परमात्मा निजसखा। सर्वदा देखा नांदत॥ ११०॥ इतर मूर्ती जंगमा जाण। तेथ आवाहन विसर्जन। साक्षेपें करावें आपण। हें विधिविधान आगमोक्त॥ ११॥ स्थंडिलीं मूर्तिआवाहन। सवेंचि पूजांतीं विसर्जन। हें उभय भावनाविधान। स्थंडिलीं जाण आवश्यक॥ १२॥ आपले हृदयींचा चिद्घन। मूर्तीमाजीं कीजे आवाहन। पूजांतीं करूनि विसर्जन। देव हृदयीं जाण ठेवावा॥ १३॥ एथ आपणचि ब्रह्म परिपूर्ण। हेंचि व्हावया निजस्मरण। आवाहन विसर्जनें जाण। निजात्मआठवण साधका॥ १४॥ हा आगमींचा निजात्मभावो। आपणचि आपला देवो। आपला आपण पूजक पहा हो। हा निजात्म-आठवो निजपूजे॥ १५॥ ‘देव होऊनि देव पूजिजे’। हें निजात्मता गोड खाजें। उपासनाकांड-व्याजें। उद्धवासी दीजे श्रीकृष्णें॥ १६॥ हे निजात्मता निजगोडी। प्रतिपदीं न लभतां रोकडी। उपासना-तडातोडी। कोण कोरडी सोशील॥ १७॥ हें आगमींचें निजगुह्य जाण। प्रतिपदीं सुखसंपन्न। साधक स्वयें होती चिद्धन। तें हें उपासन उद्धवा॥ १८॥ ऐसें ऐकतां कृष्णवचन। उद्धव स्वानंदें झाला पूर्ण। धांवोनि धरिले श्रीकृष्णचरण। म्हणे समूळ निरूपण मज सांग॥ १९॥ तंव देव म्हणे स्थिर राहें। जें हें आगमोक्त गुह्य आहे। तें माझे कृपेंवीण पाहें। प्राप्त नोहे साधकां॥ १२०॥ आगमोक्त गुह्य गहन। असो हें माझें गुप्तधन। तुवां पुशिलें पूजाविधान। ऐक सावधान उद्धवा॥ २१॥ लेप्या लेख्या ज्या मूर्ति जाण। त्यांसीं करावेंना स्नान। इतरां मूर्तीसीस्नपन। यथाविधान करावें॥ २२॥
द्रव्यै: प्रसिद्धैर्मद्याग: प्रतिमादिष्वमायिन:।
भक्तस्य च यथालब्धैर्हृदि भावेन चैव हि॥ १५॥
पूजक सकाम होय चांग। तैं पूजाद्रव्य व्हावें साङ्ग। पूजासाधन झालिया व्यंग। फळ निर्व्यंग उपजेना॥ २३॥ भक्त निष्काम वाडेंकोडें। तैं पूजाद्रव्याचें सांकडें। सर्वथा कांहीं न पडे। भक्तभाव आवडे भगवंता॥ २४॥ तेथ अनायासें जें प्राप्त। तेणें भगवंत होय तृप्त। तोचि पूजायाग यथोक्त। जाण निश्चित उद्धवा॥ २५॥ निष्कामवृत्तीं फल मूल। दूर्वांकुर कां निर्मळ जळ। इतकेन पूजायाग सकळ। होय अविकळ मद्भावें॥ २६॥ जेथ माझा सद्भाव दृढ। तेथ उपचारांचा कोणपाड। भक्तांचा भावचि मज गोड। तेणें सुख सुरवाड मद्भक्तां॥ २७॥ बाह्य उपचार जे कांहीं। ते प्रतिमा मूर्तिपूजेसी पाहीं। मानसपूजेचे तंव ठायीं। वाणी नाहीं उपचारां॥ २८॥ तेथ मनचि होय माझी मूर्ती। मनोमय उपचारसंपत्ती। निर्लोभें जें मज अर्पिती। तेणें मी श्रीपती संतुष्ट॥ २९॥ प्रतिमादि अष्टौ पूजास्थान। यथोक्त पूजेचें विधान। तुज मी साङ्ग सांगेन। ऐक सावधान उद्धवा॥ १३०॥
स्नानालङ्करणं प्रेष्ठमर्चायामेव तूद्धव।
स्थण्डिले तत्त्वविन्यासो वह्नावाज्यप्लुतं हवि:॥ १६॥
सूर्ये चाभ्यर्हणं प्रेष्ठं सलिले सलिलादिभि:।
प्रतिमामूर्ति पूजास्थान। ते मूर्तीस जें महास्नपन। या नांव बोलिजे ‘स्नान’। साङ्ग भूषण मुकुटादी॥ ३१॥ जे लोकीं उत्तम प्रकार। कां आपणासी जे प्रियकर। जे जे अनर्घ्य अळंकार। तेणें श्रद्धा मी श्रीधर पूजावा॥ ३२॥ स्नान भोजन अलंकार। साङ्ग पूजा सपरिकर। हा प्रतिमापूजाप्रकार। ऐक विचार स्थंडिलाचा॥ ३३॥ स्थडिलीं जें पूजास्थान। तेथ तत्त्वांचें धरोनि ध्यान। करावें तत्त्वविन्यास लेखन। पूजाविधान या हेतू॥ ३४॥ आत्मतत्त्वादि तत्त्वविवंच। स्थंडिलीं विवंचूनि साच। हृदय शिर शिखा कवच। नेत्र अस्त्र दिशंच निजपूजा॥ ३५॥ अग्नीचे ठायींजें पूजन। तेथ माझें करूनि ध्यान। आज्यप्लुत हविहवन। हें पूजाविधान अग्नीचें॥ ३६॥ अग्निदेवांचें वदन। येणें विश्वासें संपूर्ण। हविर्द्रव्य करितां हवन। ‘अग्निपूजन’ या हेतू॥ ३७॥ सूर्याच्या ठायीं प्रकाशमान। मंडळात्मा सूर्यनारायण। तेथ सौरमंत्रें उपस्थान। पूजाविधान या हेतू॥ ३८॥ विचारितां श्रुतीचा अर्थ। ‘आपोनारायण’ साक्षात् । येथ पूजाविधान यथोक्त। जळीं जळयुक्त तर्पण॥ ३९॥ ‘हृदयीं’ जें माझें पूजास्थान। तेथें मनें मनाचें अर्चन। मनोमय मूर्ति संपूर्ण। पूजाविधान मानसिक॥ १४०॥ माझें मुख्यत्वें अधिष्ठान। ब्रह्ममूर्ति जे ‘ब्राह्मण’। तेथील जें पूजाविधान। आज्ञापालन दासत्वें॥ ४१॥ ब्रह्मासी ज्याचेनि ब्रह्मपण। तो ‘सद्गुरु’ माझें पूजास्थान। सर्वार्थीं श्रेष्ठ पावन। तेथील पूजन तें ऐसें॥ ४२॥ जीवें सर्वस्वेंसीं आपण। त्यासी रिघावें अनन्य शरण। त्याच्या वचनासी प्राण। निश्चयें जाण विकावा॥ ४३॥ गुरूची नीचसेवा सेवन। आवडीं करणें आपण। हेंचि तेथील पूजाविधान। येणें सुखसंपन्न साधक॥ ४४॥ सद्गुरुसेवा करितां पाहीं। ब्रह्मसायुज्यलागे पायीं। गुरुसेवेपरतें कांहीं। श्रेष्ठ नाहीं साधन॥ ४५॥ सद्गुरुस्वरूप तें जाण। अखंडत्वें ब्रह्म पूर्ण। तेथें आवाहन विसर्जन। सर्वथा आपण न करावें॥ ४६॥ निष्कपटभावें संपूर्ण। सद्गुरूसी जो अनन्य शरण। त्याचे मीही वंदीं चरण। येथवरी जाण तो धन्य॥ ४७॥ निर्लोभभावें सहज। पूजितां तोषे अधोक्षज। त्या भावाचें निजगुज। स्वयें यदुराज सांगत॥ ४८॥
श्रद्धयोपाहृतं प्रेष्ठं भक्तेन मम वार्यपि॥ १७॥
भूर्यप्यभक्तोपहृतं न मे तोषाय कल्पते।
गन्धो धूप: सुमनसो दीपोऽन्नाद्यं च किं पुन:॥ १८॥
माझ्या ठायीं अतिप्रीतीं। श्रद्धायुक्त अनन्य भक्तीं। भक्त ‘भावें’ जळ अर्पिती। तेणें मी श्रीपति सुखावें॥ ४९॥ तो जळबिंदु यथासुखें। म्यां मुखीं झेलिजे आदिपुरुखें। तंव भक्तभावाचेनि हरिखें। मी सुखरूप सुखें सुखावें देख॥ १५०॥ माझें त्रैलोक्यासी सुख। ऐसा मीही सुखरूप देख। त्या मज होय परम संतोख। भाविकांचें उदक सेवितां॥ ५१॥ त्या जळबिंदूचिया साठीं। रमा नावडे गोमटी। ब्रह्मा जन्मला माझे पोटीं। तोही शेवटी नावडे॥ ५२॥ भाविकांचेनि उदकलेखें। मज वैकुंठही झालें फिकें। शेषशयनींचीं निद्रासुखें। त्यांचींही तुकें उतरलीं॥ ५३॥ भाविकांच्या उदकापुढें मज आणिक कांहीं नावडे। तेथही गंधादि पूजा जोडे। नैवेद्य चोखडे रसयुक्त॥ ५४॥ ते पूजेचिये सुखप्राप्ती। उपमा नाहीं त्रिजगतीं। ऐसा भाविकांचिये भक्तीं। मी श्रीपती सुखावें॥ ५५॥ भावें करितां भगवद्भक्ती। ‘मी कृतकृत्य झालों निश्चितीं। ऐशिया निश्चयें जो भावार्थी। त्याचेनि जळें संतृप्ति मज होय॥ ५६॥ येर जो अभक्त दंभस्थितीं। जीवीं द्रव्याशा बाह्य विरक्ती। लौकिक प्रतिष्ठेपुरती। माझी भक्ति जो मिरवी॥ ५७॥ ऐशिया अभक्ताचिया स्थितीं। छत्र चामर गजसंपत्ती। मज अर्पितांही अभक्तीं। सुखलेश चित्तीं उपजेना॥ ५८॥ क्षीरसागर निवडी राजहंस। तेथ निसूं दीधला कापुस। तेवीं अभक्तभजनीं संतोष। मी हृषीकेश पावेना॥ ५९॥ कागाची गायनकळा। जेवीं तोषेना किन्नरशाळा। तेवीं अभक्ताची भजनलीला। माझी चित्कळा तोषेना॥ १६०॥ जेवीं रजस्वलेचें पक्वान्न। उत्तम परी तें अतिहीन। तेवीं अभक्तांचें भजन। कदा जनार्दन स्पर्शेना॥ ६१॥ ज्या भजना नातळे नारायण। ऐसें जें अभक्तांचें भजन। तेणें भजनें जनार्दन। अणुमात्र जाण तोषेना॥ ६२॥ एवं भक्ताभक्तभजनमार्ग। दावूनि अधिकाराचे भाग। आतां समूळ पूजामार्ग। साङ्ग श्रीकृष्ण सांगत॥ ६३॥
शुचि: सम्भृतसम्भार: प्राग्दर्भै: कल्पितासन:।
आसीन: प्रागुदग्वार्चेदर्चायामथ सम्मुख:॥ १९॥
करूनि मलस्नान आपण। वैदिक तांत्रिक मंत्रस्नान। सारूनि नित्यविधान। ‘शुचित्वपण’ या नांव॥ ६४॥ मग देवपूजासंभार। शोधूनि करावे पवित्र। यथास्थानीं पूजाप्रकार। गंधादि उपचार ठेवावे॥ ६५॥ श्वेतकंबल चैलाजिन। पूर्व दर्भाग्रीं आसन। पूर्वामुख बैसावें आपण। अथवा जाण उदङ्मुख॥ ६६॥ स्थावरमूर्ती पूजितां देख। आसन करावें मूर्तिसंमुख। हा आसनविधि निर्दोख। पूजा न्यासादिक हरि सांगे॥ ६७॥
कृतन्यास: कृतन्यासां मदर्चां पाणिना मृजेत्।
कलशं प्रोक्षणीयं च यथावदुपसाधयेत्॥ २०॥
विधियुक्त घालूनि आसन। गुरूसी करावें नमन। परमगुरु-परमेष्ठीसी जाण। करावें अभिवंदन अतिप्रीतीं॥ ६८॥ जो मंत्र प्राप्त आपणांस। त्या मंत्राचे देहीं करावे न्यास। मंत्रमूर्ति आणोनि ध्यानास। पूजा ‘मानस’ करावी॥ ६९॥ जे मूर्ति आली ध्यानासी। तेचि आणावया प्रतिमेसी। हातीं धरोनिया अर्चेसी। करावें न्यासासी प्रतिमाअंगीं॥ १७०॥ कलश आणि प्रोक्षणी जाण। साधावीं यथाविधान। जळें करोनिया पूर्ण। दूर्वादि चंदन द्रव्ययुक्त॥ ७१॥
तदद्भिर्देवयजनं द्रव्याण्यात्मानमेव च।
प्रोक्ष्य पात्राणि त्रीण्यद्भिस्तैस्तैर्द्रव्यैश्च साधयेत्॥ २१॥
तें प्रोक्षणपात्रींचें जळ। नखोदकें न करूनी निर्मळ। तेणें पूजासंभार सकळ। कुशाग्रें केवळ प्रोक्षावा॥ ७२॥ तेणेंचि प्रोक्षावें देवसदन। आपणासी करावें प्रोक्षण। प्रोक्षोनि देवपूजास्थान। पूजाविधान मांडावें॥ ७३॥ पाद्य-अर्घ्य-आचमनीयें। तदर्थ मांडावीं पात्रत्रयें। जळें पूर्ण करूनि पाहें। भिन्न द्रव्य आहे पात्र त्रयासी॥ ७४॥ श्यामाक-दूर्वा-अब्ज-विष्णुक्रांता। ‘पाद्यपात्रीं’ हे द्रव्यशुद्धता। गंध पुष्प फल अक्षता। एवं कुशाग्रता ‘अर्घ्यपात्रीं’॥ ७५॥ एळा वाळा जातीफळ। लवंग कर्पूर कंकोळ। ‘आचमनपात्रीं’ हा देव्यमेळ। शुद्ध जळ समयुक्त॥ ७६॥
पाद्यार्घ्याचमनीयार्थं त्रीणि पात्राणि दैशिक:।
हृदा शीर्ष्णाथ शिखया गायत्र्या चाभिमन्त्रयेत्॥ २२॥
गुरुमंत्रदीक्षा जैसी ज्यासी। तोचि निजमार्ग शिष्यासी। तेणें पाद्यादि तिहीं पात्रांसी। संप्रदायेंसी मांडावें॥ ७७॥ पाद्य द्यावें हृदयमंत्रें। अर्घ्य अर्पावें शिरोमंत्रें। आचमन द्यावें शिखामंत्रें। गुरुसंस्कारें आगमोक्त॥ ७८॥ तेंचि तिनी पात्रें जाण। गायत्रीमंत्रें आपण। अभिमंत्रोनियां पूर्ण। देवार्पण करावीं॥ ७९॥ गुरुसंप्रदाय नेटक। यालागीं त्यातें ‘देशिक’। स्वयें बोलिला यदुनायक। दीक्षा विवेक निजद्रष्टा॥ १८०॥ आगमशास्त्रींचा निजमार्ग। भूतशुद्धि प्राणप्रतिष्ठा योग। तेणेंचि अन्वयें श्रीरंग। श्लोकार्थें साङ्ग सांगत॥ ८१॥
पिण्डे वाय्वग्निसंशुद्धे हृत्पद्मस्थां परां मम।
अण्वीं जीवकलां ध्यायेन्नादांते सिद्धभाविताम्॥ २३॥
वायुबीजें आवाहूनी। पिंगला प्राण पूरूनी। तोचि कुंभकें स्तंभूनि। मात्राधारणीं धरावा॥ ८२॥ वायु जो धारणा धरावा। तो जंव फुटेना अव्हासव्हा। तंवचि वरी निरोधावा। मग रेचावा शनै:शनै:॥ ८३॥ ऐसें करितां प्राणधारण। स्वयें कल्पावें शरीर शोषण। शरीर शोषलें मानूनि जाण। देहदहन मांडावें॥ ८४॥ आधारस्थित जो अग्नी। तो अग्निबीजें चेतवूनी। तोचि देह लावूनि दहनीं। भस्म मानूनी निजदेह॥ ८५॥ देह दहनें अतिसंतप्त। तेथ चंद्रबीजें चंद्रामृत। आणोनि निववावे समस्त। नवा देह तेथ कल्पावा॥ ८६॥ देह कल्पावा जो एथ। पूर्व पाटव्य इंद्रिययुक्त। त्याच्या हृदयपद्माआंत। अण्वी जीवकळा तेथ पहावी माझी॥ ८७॥ माझी जीवकळा परम। सूक्ष्माहूनि अति सूक्ष्म। यालागीं ‘अण्वी’ तिचें नाम। विश्रामधाम जगाचें॥ ८८॥ अकार उकार मकारस्थिती। यांतें प्रकाशे अण्वी जीवज्योती। ते तंव शब्दाहूनि परती। योगीं नादांतीं लक्षिजे॥ ८९॥ ते देहीं सबाह्य परिपूर्ण। असोनि सूक्ष्मत्वें अलक्ष्य जाण। तीतें हृत्पद्मीं योगिजन। लक्षिती आसनप्राणायामें॥ १९०॥ ते अण्वी जीवकळा अव्यक्त। तीतें करोनियां व्यक्त। योगी निजभावनायुक्त। हृदयीं चिंतित महामूर्ती॥ ९१॥ ‘नार’ जीवसमूह जाण। त्यांचें जें आयतनस्थान। ते महामूर्ति श्रीनारायण। हृदयीं सज्जन चिंतिती॥ ९२॥
तयाऽऽत्मभूतया पिण्डे व्याप्ते सम्पूज्य तन्मय:।
आबाह्यार्चादिषु स्थाप्य न्यस्ताङ्गं मां प्रपूजयेत्॥ २४॥
जेवीं गृह प्रकाशी दीपस्थिती। तेवीं देह प्रकाशी जीवज्योती। ते सांगोपांग माझी मूर्ती। हृदयीं चिंतिती साकार॥ ९३॥ जेवीं तूप तूपपणें थिजलें। तेंचि अवर्ण वर्णव्यक्ती आलें। तेवीं चैतन्यमाझें मुसावलें। लीलाविग्रहें झालें साकार॥ ९४॥ ऐशी ते माझी सगुण मूर्ती। चिन्मात्र तेजें हृदयदीप्ती। तिनें व्यापूनि देहाची स्थिती। चित्तीं निजभक्ती उपजवी॥ ९५॥ देह जड मूढ अचेतन। तेथ मूर्ति प्रकटोनि चिद्घन। अचेतना करोनि सचेतन। करवी निजभजन उल्हासें॥ ९६॥ जेवीं हरणुलीचें सोंग जाण। हरिणीरूपें नाचे आपण। तेवीं भक्तभावें नारायण। भजनपूजन स्वयें कर्ता॥ ९७॥ यापरी अभेदभजन। मूर्ति पूजितां चिद्घन। पूज्य पूजक हे आठवण। सहजें जाण मावळे॥ ९८॥ मावळल्या हा भजनभेद। उल्हासे भक्तीचा अभेदबोध। हा गुरुमार्ग अतिशुद्ध। प्रिय प्रसिद्ध मजलागीं॥ ९९॥ जेथ माझी अभेदभक्ती। तेथ मी सर्वस्वें श्रीपती। आतुडलों भक्तांच्या हातीं। स्वानंदप्रीती उल्हासें॥ २००॥ जेवीं कां अफाट मेघजळा। धरण बांधोनि घालिजे तळां। तेवीं मज अनंताचा एकवळा। अभेद भजनाला आतुडे॥ १॥ अडवीं वर्षलें सैरा जळ। तेणें नुपजेचि उत्तम फळ। तेंचि तळां भरलिया प्रबळ। तेणें पिकती केवळ राजागरें॥ २॥ तैसें माझें स्वरूप वाडेंकोडें। अभेदभक्तांमाजीं आतुडे। तैं ब्रह्मानंदें गोंधळ पडे। शीग चढे भक्तीची॥ ३॥ अभेदभक्तांच्या द्वारापाशीं। तीर्थें येती पवित्र व्हावयासी। सुरनर लागती पायांसी। मी हृषीकेशी त्यांमाजीं॥ ४॥ अभेदभक्तांपाशीं देख। सकळ तीर्थें होती निर्दोख। भक्तीचें माहेर तें आवश्यक। मजही सुख त्यांचेनी॥ ५॥ अभेद जे क्रियास्थिती। या नांव माझी उत्तम भक्ती। ऐसा अतिउल्हासें श्रीपती। उद्धवाप्रती बोलत॥ ६॥ अभेदभक्ती वाडेंकोडें। श्रीकृष्ण सांगे उद्धवापुढें। कथा राहिली येरीकडे। तेंही धडफुडें स्मरेना॥ ७॥ देह विसरला निरूपण। तंव उद्धवासी बाणली खूण। तोही विसरला उद्धवपण। कृष्णा कृष्णपण नाठवे॥ ८॥ अभेदभजनाचा हरिख। देव भक्त झाले एक। दोघांपडोनि ठेलें ठक। परम सुख पावले॥ ९॥ उद्धव निजबोधें परिपूर्ण। तरी पूजाविधानप्रश्न। एथ करावया काय कारण। ऐशी आशंका मन कल्पील॥ २१०॥ तरी उद्धवाच्या चित्तीं। उगा राहतांचि श्रीपती। जाईल निजधामाप्रती। यालागीं प्रश्नोक्ती तो पुसे॥ ११॥ उपासनाकांड गुह्यज्ञान। आगमोक्तपूजाविधान। उद्धवमिषें श्रीकृष्ण। वेदार्थ आपण स्वयें बोले॥ १२॥ सकळ वेदार्थ शास्त्रविधी। ग्रंथीं श्रीकृष्ण प्रतिपादी। जैसी श्रद्धा तैसी सिद्धी। व्हावया त्रिशुद्धी साधकां॥ १३॥ असो हे ग्रंथव्युत्पत्ती। ऐकतां अद्वैतभक्ती। उद्धव निवाला निजचित्तीं। तेणें श्रीपति सुखावला॥ १४॥ संतोषें म्हणे श्रीकृष्ण। उद्धवा होईं सावधान। पुढील पूजाविधान। तुज मी सांगेन यथोक्त॥ १५॥ पूज्य पूजक एकात्मता ध्यान। करोनियां दृढ धारण। तेंचि बाह्य पूजेलागीं जाण। करावें आवाहन प्रतिमेमाजीं॥ १६॥ प्रतिमेसंमुख आपण। आवाहनमुद्रा दाखवून। माझी चित्कळा संपूर्ण। प्रतिमेसी जाण भावावी॥ १७॥ तेव्हां मूर्तीचें जडपण। नि:शेष न देखावें आपण। मूर्ति भावावी चैतन्यघन। मुख्य ‘आवाहन’ या नांव॥ १८॥ गुरुमुखें मंत्र निर्दोष। तेणें मंत्रें मूर्तींसी न्यास। करावे सर्वांगीं सावकाश। शास्त्रविन्यास आगमोक्त॥ १९॥ एवं आवाहन संस्थापन। सन्निधि सन्निरोधन। संमुखीकरण स्वायतन। या मुद्रा आपण दावाव्या॥ २२०॥ अवगुंठन संकलीकरण। या अष्टौ मुद्रा दावूनि जाण। मग होऊनि सावधान। पूजाविधान मांडावें॥ २१॥
पाद्योपस्पर्शार्हणादीनुपचारान्प्रकल्पयेत्।
धर्मादिभिश्च नवभि: कल्पयित्वाऽऽसनं मम॥ २५॥
पद्ममष्टदलं तत्र कर्णिकाकेसरोज्ज्वलम्।
उभाभ्यां वेदतन्त्राभ्यां मह्यं तूभयसिद्धये॥ २६॥
स्नानमंडप कल्पूनि जाण। तेथ आणावा देव चिद्धन। पाद्य अर्घ्य आचमन। मधुपर्क-विधान करावें॥ २२॥ अभ्यंग अंगमर्दन। पुरुषसूक्तें यथोक्त स्नान। पीतांबर परिधान। स्नानमंडपीं जाण देवासी॥ २३॥ इतर यथोक्त पूजन। करावें सिंहासनीं संपूर्ण। तें आसन पीठावरण। स्वयें श्रीकृष्ण सांगत॥ २४॥ सिंहासनीं आवरणक्रम। आधारप्रकृति-कूर्म क्षेम। क्षीराब्धि श्वेतद्वीप कल्पद्रुप। मनोरम भावावा॥ २५॥ त्या तळीं रत्नमंडप नेटक। त्यामाजीं विचित्र पर्यंक। त्या मंचकाचा विवेक। यदुनायक सांगत॥ २६॥ धर्म ज्ञान वैराग्य ऐश्वर्य। हेचि माचवे अतिवर्य। अधर्म अज्ञान अनैश्वर्य। अवैराग्येंसीं पाय गातें चारी॥ २७॥ ईश्वरतत्त्व निजसूत। गुणागुणीं वळोनि तेथ। मंचक विणिला अचुंबित। योगयुक्त महामुद्रा॥ २८॥ त्या मंचकावरी शेषपुटी। शोभे अतिशयेंसीं गोमटी। सहस्रफणीं मणितेज उठी। छत्राकार पृष्ठीं झळकत॥ २९॥ शेषपुटीमाजीं निर्मळ। विकासलें रातोत्पळ। सकर्णिक अष्टदळ। शोभे कमळ मनोहर॥ २३०॥ सत् शक्ति कमळकंदमूळ। ज्ञाननाळ त्याचें सरळ। प्रकृति अष्टधा जे सबळ। तेंचि अष्टदळ कमळाचें॥ ३१॥ ऐसें कमळ अतिसुंदर। षड्विकार तेचि केसर। वैराग्यकर्णिका सधर। मघमघी थोर सुवासें॥ ३२॥ पूर्वादि कमळदळींजाणा। देवता न्यासाव्या त्या त्या स्थाना। विमळा उत्कर्षणी आणि ज्ञाना। क्रियाशक्ति जाणा चौथी पैं॥ ३३॥ योगा प्रह्वी सत्या ईशाना। कर्णिका योजिजे मध्यस्थाना। कल्पूनि अनुपम रचना। अनुग्रहा जाणा स्थापावी॥ ३४॥ आत्मा अंतरात्मा परमात्मा। हा संमुखभाग देवोत्तमा। सत्त्व रज आणि मोह तमा। पुरुषोत्तमा पृष्ठिभाग॥ ३५॥ ऐशापरी पीठन्यास। आगमोक्त सावकाश। करूनियां हृषीकेश। सिंहासनास आणावा॥ ३६॥ छत्र आणि युग्म चामर। नाना वाद्यें जयजयकार। दावूनि पीठ मुद्रा सधर। आसनीं श्रीधर बैसवावा॥ ३७॥ मज सर्वगतासी आवाहन। मज अधिष्ठानासी आसन। मज निर्विकारासी जाण। दाविती आपण विकारमुद्रा॥ ३८॥ मज चिद्रूपालागीं लोचन। नि:शब्दा कल्पिती श्रवण। मज विश्वमुखासी वदन। निमासुरें जाण भाविती॥ ३९॥ मी विश्वांघ्री दों पायीं चालत। मज विश्वबाहूसी चारी हात। मज सर्वगतातें एथ। स्थान भावित एकदेशी॥ २४०॥ मज निरुपचारासी उपचार। मज विदेहासी अळंकार। मज सर्वसमाना अरिमित्र। भावना विचित्र भाविती॥ ४१॥ मज अकर्त्या कर्मबंधन। अजासी जन्मनिधन। नित्यतृप्तासी भोजन। निर्गुणा सगुण भाविती॥ ४२॥ या अवघियांचा अभिप्रावो। उपासनाकांडनिर्वाहो। जैसजैसा भजनभावो। तैसा मी देवो तयांसी॥ ४३॥ मी अवाप्त सकळकाम। परी भक्तप्रेमालागीं सकाम। जैसा भक्तांचा मनोधर्म। तैसा पुरुषोत्तम मी तयां॥ ४४॥ भक्त जैसा भावी मातें। मी तैसाचि होयें त्यातें। तो जें जें अर्पी भावार्थे। तें अर्पे मातें सहजचि॥ ४५॥ मी सर्वत्र भरलों असें। तेथ जो जेथ मज उद्देशें। भक्तभावार्थें अर्पुं बैसे। तें अर्पे अनायासें सहजें मज॥ ४६॥ मी सर्वत्र देवाधिदेव। तैसा प्राणियांचा नव्हे भाव। यालागीं भक्तांचा जेथ सद्भाव। तेथ मी देव सहजेंचि॥ ४७॥ यालागीं वाडेंकोडें। भक्तभावार्थ मज आवडे। भक्तभावाहूनि पुढें। वैकुंठ नावडे क्षीराब्धीही॥ ४८॥ भक्तभावार्थाचीं भूषणें। अंगीं बाणावया श्रीकृष्णें। म्यां निर्गुणेंही सगुण होणें। भावार्थगुणें भक्तांच्या॥ ४९॥ यालागीं मी अजन्मा जन्में। अकर्माही करीं कर्में। अनामा मी धरीं नामें। भक्त मनोधर्मेंतरावया॥ २५०॥ निर्गुणीं लागल्या मन। मनचि होय चैतन्यघन। सगुणीं ठसावल्या मन। साधक श्रीकृष्ण स्वयें होती॥ ५१॥ निर्गुणाचा बोध अटक। यालागीं उपासनाविवेक। सगुणमूर्ति भावूनि देख। तरले साधक अनायासें॥ ५२॥ हे आगमोक्त उपासनाविधी। येणें भोगमोक्ष उभयसिद्धी। साधक पावती त्रिशुद्धी। मी कृपानिधि संतुष्टें॥ ५३॥ तेंचि उपासनविधिविधान। मागां सांगतांपूजन। देव सिंहासनीं बैसल्या पूर्ण। पुढें आवरणपूजा ऐक॥ ५४॥
सुदर्शनं पाञ्चजन्यं गदासीषुधनुर्हलान्।
मुसलं कौस्तुभं मालां श्रीवत्सं चानुपूजयेत्॥ २७॥
अण्वी जीवकळेसी ‘देहावरण’। सिंहासनीं ‘शक्त्यावरण’। सुदर्शनादि आयुधावरण’। आपुलीं आपण हरि सांगे॥ ५५॥ सतेज धार सुदर्शन। शंख शोभे पांचजन्य। नंदक तो खड्ग जाण। गदा गहन कौमोदकी॥ ५६॥ शार्ङ्ग-धनुष अतिसबळ। सुवर्णपुंखें बाण सरळ। हल आणि मुसळ। आयुधें प्रबळ पूजावीं॥ ५७॥ या आठही भुजा सायुधा सरळा। कंठीं कौस्तुभ वनमाळा। कांसे कशिला पिंवळा। घनसांवळा शोभत॥ ५८॥ ब्रह्मण्यदेव रमानाथ। ब्राह्मणाचा चरणघात। हृदयीं अलंकार मिरवत। शोभा अद्भुत तेणें शोभे॥ ५९॥ चिद्रत्नांच्या अळंकारीं। गुण काढोनियां बाहेरी। वोविली वैजयंती कुसरी। ते हृदयावरी रुळत॥ २६०॥ यापरी साळंकार सायुध। शंखचक्रपद्मेसीं अगाध। ऐसा शोभला स्वयंबोध। नारदादि संनिध तिष्ठती सदा॥ ६१॥ यापरी साळंकार सायुध। पूज्यपूजोनियां गोविंद। मग पूजावे पार्षद। ऐक विशद सांगेन॥ ६२॥
नन्दं सुनन्दं गरुडं प्रचण्डं चण्डमेव च।
महाबलं बलं चैव कुमुदं कुमुदेक्षणम्॥ २८॥
नंद सुनंद देवापाशीं। गरुड सदा तिष्ठे दृष्टीसी। चंड प्रचंड दोनी बाहींसीं। अहर्निशीं तिष्ठती॥ ६३॥ बळ आणि महाबळ। सुमुख संज्ञें अवधानशीळ। कुमुद कुमुदाक्ष केवळ। पाठीसी प्रबळ बळें उभे॥ ६४॥ गरुड दृष्टीं तिष्ठे आपण। येर नंदादि जे अष्टौ जन। ते अष्टौ दिशांप्रति जाण। पार्षदावरण हरिनिकटीं॥ ६५॥
दुर्गां विनायकं व्यासं विष्वक्सेनं गुरून् सुरान्।
स्वे स्वे स्थाने त्वभिमुखान् पूजयेत्प्रोक्षणादिभि:॥ २९॥
दुर्गा विनायक जाण। व्यास आणि विष्वक्सेन। चहूं कोनीं चारी स्थापून। करावें पूजन देवाभिमुख॥ ६६॥ मूळमूर्तीसी अभिन्नाकारु। गुरु आणि परमगुरु। परमेष्ठिगुरूसी एकाकारु। पूजाप्रकारु करावा॥ ६७॥ इंद्रादि अष्टौ लोकपाळ। आह्वानूनियां सकळ। स्थापूनि अष्टौ दिशा केवळ। तेही तत्काळ पूजावे॥ ६८॥ गुरु-दुर्गादिक लोकपाळ। पूजावे सांगोपांग सकळ। प्रोक्षणपाद्यादि अविकळ। पूजा निश्चळ करावी॥ ६९॥ तेचि पूजेचे पूजोपचार। कोण कोण पैं प्रकार। साही श्लोकीं शार्ङ्गधर। संक्षेपाकार सांगत॥ २७०॥
चन्दनोशीरकर्पूरकुङ्कुमागुरुवासितै:।
सलिलै: स्नापयेन्मन्त्रैर्नित्यदा विभवे सति॥ ३०॥
स्वर्णधर्मानुवाकेन महापुरुषविद्यया।
पौरुषेणापि सूक्तेन सामभीराजनादिभि:॥ ३१॥
एळा वाळा कर्पूर। चंदन कुंकुम केशर। त्यांमाजीं मेळवूनि अगर। धूपिलें नीर स्नपनासी॥ ७१॥ सुवासित सपरिकर। गंगाजळ अतिपवित्र। शंखमुद्रापुरस्कर। शंखीं तें नीर भरावें॥ ७२॥ ऐसें जळ घेऊनि शुद्ध। आपस्तंबशाखेचें प्रसिद्ध। ‘सुवर्णधर्मानुवाक’ पद। तेणें अभिषेक विशद मज करावा॥ ७३॥ अथवा केवळ ‘पुरुषसूक्त’। ‘रुद्राभिषेक’ ‘विष्णुसूक्त’। इंहीं मंत्रीं मंत्रोक्त। देवासीं यथोक्त स्नान द्यावें॥ ७४॥ कां सामवेदींचें गायन। त्यामाजीं सामनीरांजन। तेणेंहीकरूनियां जाण। देवासी स्नान करावें॥ ७५॥ असल्या वैभवसंपन्न। नित्य द्यावें हें महास्नान। नातरी पर्वविशेषें जाण। करावें आपण जयंत्यादिकीं॥ ७६॥ आगमोक्त सुलक्षण। ‘महापुरुषविद्या’ पूर्ण। तेणेंही करूनि आपण। देवासी स्नान करावें॥ ७७॥ देवासी पूर्ण झालिया स्नान। करावें मंगळनीरांजन। मगवस्त्रें अलंकार भूषण। देवासी आपण अर्पावीं॥ ७८॥
वस्त्रोपवीताभरणपत्रस्रग्गन्धलेपनै:।
अलङ्कुर्वीत सप्रेम मद्भक्तो मां यथोचितम्॥ ३२॥
देवो स्वरूपें घनसांवळा। कांसे कसावा सोनसळा। हेमसूत्र अर्पूनि गळां। रत्नमेखळा बाणावी॥ ७९॥ वांकीअंदुवांचा गजर। चरणीं नूपुरांचा झणत्कार। मुकुटकुंडळे मनोहर। हृदयीं गंभीर महापदक॥ २८०॥ जडित मोतिलग पत्रवेली। अतिशोभित दिसे निढळीं। तिलक पिंवळा तयातळीं। कंठीं झळाळी कौस्तुभ॥ ८१॥ बाहीं बाहुवटे वीरकंकणें। करमुद्रिका रत्नखेवणें। पीतांबर झळके कोणें मानें। रविबिंब तेणें लाजविलें॥ ८२॥ सांवळें अंगीं गोमटी। शुभ्र चंदनाची शोभे उटी। सुमनमाळा वीरगुंठीं। होत घरटीं मधुकरां॥ ८३॥ वैजयंती वनमाळा। आपाद रुळे गळां। घवघवीत दिसे डोळां। घनसांवळा शोभत॥ ८४॥ एवं वस्त्रालंकारभूषणीं। स्वयं पूजावा शार्ङ्गपाणी। पूजेहूनियां मनीं। श्रद्धा कोटिगुणीं असावी॥ ८५॥ भक्त असो अतिसंपन्न। अथवा हो कां अतिनिर्धन। जेथ शुद्ध श्रद्धा संपूर्ण। तेथ नारायण संतुष्टे॥ ८६॥ सकळ पूजेचें कारण। मुख्य श्रद्धाचि गा प्रमाण। अत्यंत श्रद्धें जो संपन्न। तो देवाचा पूर्ण पढियंता॥ ८७॥
पाद्यमाचमनीयं च गन्धं सुमनसोऽक्षतान्।
धूपदीपोपहार्याणि दद्यान्मे श्रद्धयार्चक:॥ ३३॥
एवं मूर्ति शृंगारिल्या पूर्ण। द्यावें पाद्य अर्घ्य आचमन। देऊनि मधुपर्कविधान। करावें पूजन श्रद्धायुक्त॥ ८८॥ गंधाक्षता शुद्ध सुमन। धूप दशांग दीपदान। दीपावली नीरांजन। श्रद्धा मदर्चन साधकां॥ ८९॥
गुडपायससर्पींषि शष्कुल्यापूपमोदकान्।
संयावदधिसूपांश्च नैवेद्यं सति कल्पयेत्॥ ३४॥
झाल्या धूप दीप नीरांजन। देवासी वोगरावें भोजन। नानापरीचें पक्वान्न। अन्न सदन्न रसयुक्त॥ २९०॥ मांडा साकरमांडा गुळवरी। शष्कुल्या अमृतफळें क्षीरधारी। दुधामाजीं आळिली क्षिरी। वाढिली परी वळिवट॥ ९१॥ मधुवडा कोरवडा। लाडू तिळवयांचा जोडा। रुची आला अंबवडा। ठायापुढां वाढिंनला॥ ९२॥ पत्रशाकांची प्रभावळी। भात अरुवार जिरे साळी। सूप सोलींव मुगदाळी। गोघृत परिमळी सद्यस्तप्त॥ ९३॥ सांजा सडींव गुळयुक्त। एळा मिरें घालूनि आंत। पाक केला घृतमिश्रित। सेवितां मुखांत अरुवार॥ ९४॥ कथिका तक्राची गोमटी। आम्ररसें भरली वाटी। शिखरणी केळांची वाढिली ताटीं। देखोनि लाळ घोंटी अमरेंद्र॥ ९५॥ दधि दुग्ध साय साकर। नैवेद्या वाढिले परिकर। देव न पाहे उपचार। श्रद्धा श्रीधर तृप्त होय॥ ९६॥ सामर्थ्य असलें करावयासी। तरी हे परवडी प्रतिदिवशीं। नैवेद्य अर्पावे देवासी। ना तरी पर्वविशेषीं अर्पावे॥ ९७॥ उपास्यमूर्ति जे साचार। ते जयंतीस सविस्तर। पर्वविशेषीं उपचार। पूजा अपार हरि सांगे॥ ९८॥
अभ्यङ्गोन्मर्दनादर्शदन्तधावाभिषेचनम्।
अन्नाद्यगीतनृत्यादि पर्वणि स्युरुतान्वहम्॥ ३५॥
पर्वें बोलिलीं आगमोक्तीं। अथवा वार्षिक पर्वें येती। कां निजमूर्तीची जयंती। ते पूजा श्रीपति स्वयें सांगे॥ ९९॥ दंतधावन उद्वर्त्तन। मूर्तीसी द्यावें अभ्यंजन। पंचामृतें करूनि स्नपन। विचित्राभरण पूजावी॥ ३००॥ पूजोनि साळंकृत देवासी। नैवेद्य अर्पावे षड्रसीं। देऊनि करोद्वर्तनासी। मुखवासासी अर्पावें॥ १॥ देव विसरला देवपणासी। तें देवपण भेटे देवासी। ऐशिया दाखवावें आदर्शासी। तेणें देवदेवासी उल्हासु॥ २॥ पर्वविशेषीं जयंतीसी। मेळवूनि संतवैष्णवांसी। करावें गीतनृत्यकीर्तनासी। अतिप्रेमेंसीं अहोरात्र॥ ३॥ आगमोक्त दीक्षा हवन। करितां तत्काळ देव प्रसन्न। त्या होमाचेंविधिविधान। ऐक सावधान उद्धवा॥ ४॥
विधिना विहिते कुण्डे मेखलागर्तवेदिभि:।
अग्निमाधाय परित: समूहेत्पाणिनोदितम्॥ ३६॥
परिस्तीर्याथ पर्युक्षेदन्वाधाय यथाविधि।
प्रोक्षण्याऽऽसाद्य द्रव्याणि प्रोक्ष्याग्नौ भावयेत माम्॥ ३७॥
आगमोक्त कुंडविधान। लांबी रुंदी खोली कोण। गणूनि उंचीचें प्रमाण। कुंड संपूर्ण साधावें॥ ५॥ स्वशाखा जें वेदप्रोक्त। मेखळायुक्त साधावी गर्त। योनीसकट वेदी तेथ। लक्षणोक्त साधावी॥ ६॥ तेथ करूनि अग्न्याधान। प्रतिष्ठिला जो हुताशन। त्यासी करूनि करस्पर्शन। परिसमूहन करावें॥ ७॥ दर्भी करावें परिस्तरण। मग करावें पर्युक्षण। इध्माबर्हिविसर्जन। त्रिसंधान ठेवावें॥ ८॥ करूनि बर्हीचें आस्तरण। करावें आज्यस्थालीस्थापन। व्याहृतीं समिधाहोम जाण। ‘अन्वाधान’ त्या नांव॥ ९॥ प्रोक्षणीपात्रींचें विधान। करूनि भरावें जळ पूर्ण। तेणें कुशाग्रजळें आपण। होमद्रव्यें जाण प्रोक्षावीं॥ १०॥ कुंडीं प्रदीप्त हुताशन। तेथ करावें माझें ध्यान। तें ध्यानमूर्तीचें लक्षण। स्वयें श्रीकृष्ण सांगत॥ ११॥
तप्तजाम्बूनदप्रख्यं शङ्खचक्रगदाम्बुजै:।
लसच्चतुर्भुजं शान्तं पद्मकिञ्जल्कवाससम्॥ ३८॥
स्फुरत्किरीटकटककटिसूत्रवराङ्गदम्।
श्रीवत्सवक्षसं भ्राजत्कौस्तुभं वनमालिनम्॥ ३९॥
जैसा तप्तस्वर्णभा। तैशी मूर्तीची अंगप्रभा। चतुर्भुज साजिरी शोभा। चिन्मात्रगाभा साकार॥ १२॥ शंखचक्रगदाकमळ। कांसे पीतांबर सोज्ज्वळ। लोपूनि अग्निप्रभाज्वाळ। मूर्तिप्रभा प्रबळ प्रकाशे॥ १३॥ मुकुटकुंडलें मेखळा। श्रीवत्स शोभे वक्षस्थळा। आपाद रुळे वनमाळा। झळके गळां कौस्तुभ॥ १४॥
ध्यायन्नभ्यर्च्य दारूणि हविषाभिघृतानि च।
प्रास्याज्यभागावाधारौ दत्त्वा चाज्यप्लुतं हवि:॥ ४०॥
ऐसें साङ्ग माझें ध्यान। अग्नीमाजीं भावूनि जाण। करूनि आवाहन पूजन। विध्युक्त हवन मांडावें॥ १५॥ अग्नि विधियुक्त आव्हानूनी। समिधा होमघृतें अभिघारूनी। आज्यभाग दों अवदानीं। प्रथमहवनीं होमावा॥ १६॥ तेथ तिलाज्य हविर्द्रव्य पूर्ण। घृतप्लुत अवदान। आगमोक्त होमविधान। स्वयें श्रीकृष्ण सांगत॥ १७॥
जुहुयान्मूलमन्त्रेण षोडशर्चावदानत:।
धर्मादिभ्यो यथान्यायं मन्त्रै: स्विष्टकृतं बुध:॥ ४१॥
लक्षूनि मुखबोध देवाचा। मूलमंत्रें होम साधकांचा। कां पुरुषसूक्त सोळा ऋचा। हा होमाचा विधिमार्ग॥ १८॥ धर्मादिक पीठार्चन। इतर देवता आवरण। त्यांसीही एकएक अवदान। नाममंत्रें जाण होमावें॥ १९॥ मग स्विष्टकृताचें अवदान। साधकें द्यावें सविधान। ऐसें हें माझें निजभजन। भक्त सज्ञान जाणती॥ २०॥ होमादि मूर्तिभजनविधी। येणें तत्काळ साधकां सिद्धी। भक्त पावती निजपदीं। जाण त्रिशुद्धी उद्धवा॥ २१॥
अभ्यर्च्याथ नमस्कृत्य पार्षदेभ्यो बलिं हरेत्।
मूलमन्त्रं जपेद्ब्रह्म स्मरन्नारायणात्मकम्॥ ४२॥
यापरी होम विधियुक्त अर्चन। करूनि करावें साष्टांग नमन। मग देवाचे जे पार्षदगण। त्यांसी बळिहरण कल्पावें॥ २२॥ मग बाह्यप्रतिमापूजास्थान। तेथें येवोनियां आपण। मूलमंत्राचें स्मरण। ध्यानयुक्त जाण करावें॥ २३॥ पूज्य-पूजक अभिन्न। परात्पर जो कां नारायण। ते परब्रह्मीं लावूनी मन। घालावें आसन सावधानवृत्तीं॥ २४॥ ध्यानीं जंव स्थिरावे मन। तंव स्थिर राखावें आसन। तेथूनि उपरमल्या मन। पुढें पूजाविधान हरि सांगे॥ २५॥
दत्त्वाऽऽचमनमुच्छेषं विष्वक्सेनाय कल्पयेत्।
मुखवासं सुरभिमत्ताम्बूलाद्यमथार्हयेत्॥ ४३॥
एवं विसर्जिलिया ध्यान। झालें देवाचें भोजन। ऐसें भावूनि आपण। शुद्धाचमन अर्पावें॥ २६॥ अग्नीमाजील मूर्तिध्यान। प्रतिमा पूजिली जे आपण। दोहीं शुद्धाचमन। यथोक्त जाण करावें॥ २७॥ देवाचिया भुक्तशेषासी। भाग द्यावा विष्वक्सेनासी। मग काढूनि उच्छिष्टासी। द्यावें देवासी करोद्वर्तन॥ २८॥ कापुरें घोळिवा सुपारीफोडी। सुवर्णवर्णा पानांची विडी। काथ सुवासिला परवडीं। अभिनव गोडी तांबूला॥ २९॥ एळा लवंगा कंकोळ। अल्प अर्पिलें जातीफळ। सुरंग रंगलें तांबूल। दिसे मुखकमळ साजिरें॥ ३३०॥ चोवा कस्तूरी बुका सधर। अर्पूनि पुष्पांजळीसंभार। जेणें शीघ्र संतोषे श्रीधर। तें प्रेम साचार हरि सांगे॥ ३१॥
उपगायन्गृणन्नृत्यन्कर्माण्यभिनयन्मम।
मत्कथा: श्रावयञ्छृण्वन् मुहूर्तं क्षणिको भवेत्॥ ४४॥
ज्ञान ध्यान उपासकता। हे गौण जाण सर्वथा। देव भावाचा भोक्ता। भावें तत्त्वतां देवभेटे॥ ३२॥ ध्यानीं तुटलिया निजमन। करावें माझें नामस्मरण। कां माझ्या गुणांचें श्रवण। आदरें जाण करावें॥ ३३॥ करितां हरिगुणयशश्रवण। तेणें सुखावे अंत:करण। सुखें सुखावोनि आपण। स्वयें हरिकीर्तन करावें॥ ३४॥ निर्लज्ज नटाचे परी। हरिरंगणीं नृत्य करी। हावभावकटाक्षकुसरी। अभिनयो धरी कर्माचा॥ ३५॥ गोवर्धनउद्धरण। अंगें दावावें आपण। कां मांडूनियां दृढ ठाण। त्र्यंबकभंजन दावावें॥ ३६॥ पूतनाप्राणशोषण। कुवलयाचें निर्दळण। दावूनि मल्लमर्दन। हरिकीर्तन करावें॥ ३७॥ नवल प्रेमाचा उद्बोध गद्यपद्यनामप्रबंध। भुजंगप्रयातादिअगाध। गाती स्वानंद स्तुतिस्तोत्रें॥ ३८॥
स्तवैरुच्चावचै: स्तोत्रै: पौराणै: प्राकृतैरपि।
स्तुत्वा प्रसीद भगवन्निति वन्देत दण्डवत्॥ ४५॥
माझीं स्तुतिस्तोत्रें पुराण। सादरें करावीं श्रवण। श्रोता मिळालिया आपण। कथानिरूपण सांगावें॥ ३९॥ शुद्ध न ये स्तोत्रपठण। करितां अबद्ध गायन। पाठका दोष न लगे जाण। तेणें होय निर्दळण महादोषां॥ ३४०॥ वेदींचें उपनिषत्पठण। कां ऋचामंत्रें हरीचें स्तवन। ये लौकिकीं उच्चावचें जाण। देवासी समान निजभावें॥ ४१॥ पुराणींचें श्रेष्ठ स्तोत्र। अथवा पढतां नाममात्र। अर्थें भावार्थें साचार। समान श्रीधर मी मानीं॥ ४२॥ नेणें वेद शास्त्र पुराण। केवळ भाळाभोळा जाण। तेणें करितां प्राकृत स्तवन। मी जनार्दन संतोषें॥ ४३॥ वेदीं चुकल्या स्वरवर्ण। पाठका दोष बाधी गहन। प्राकृत करितां हरीचें स्तवन। दोषनिर्दळण तेणें होय॥ ४४॥ शास्त्रश्रवण पुराणस्थिती। पाहिजे पंचमीसप्तमीव्युत्पत्ती। प्राकृत अबद्धही नामकीर्ती। भगवत्प्राप्तिप्रापक॥ ४५॥ संस्कृत वाणी देवें केली। प्राकृत चोरापासून झाली। असोत या पक्षाभिमानी बोली। देवाची चाली निरभिमान॥ ४६॥ वेदशास्त्र हो पुराण। कां प्राकृतभाषास्तवन। एथें भावचि श्रेष्ठ जाण। तेणें नारायण संतोषे॥ ४७॥ देवासी प्रेमाचें पढियें कोड। न पाहे व्युत्पत्तीचें काबाड। भाविकांचा भावार्थचि गोड। तेणें भक्तांची भीड नुल्लंघी देवो॥ ४८॥ एवं भावार्थें करितां स्तवन। देव होय भक्ताअधीन। तेणें भावार्थें करूनि नमन। हरिचरण वंदावे॥ ४९॥ मुहूर्त निमेष क्षणेंक्षण। हरिचरणीं सुखावल्या मन। इतर व्यापार तेणें सुखें जाण। सहजें आपण वोसरती॥ ३५०॥ जेणें तुटें माझें अनुसंधान। तें कर्म त्यागावें आपण। जेणें स्वरूपनिष्ठ होय मन। तें समाधान राखावें॥ ५१॥ सप्रेम करितां नमन। नित्य नूतन समाधान। त्या नमनाचें लक्षण। लोटांगण दंडवत॥ ५२॥ सुटल्या दंड सत्राणें। संमुख विमुख पाहों नेणे। तैशीं घालीं लोटांगणें। देहाभिमानें अहेतुक॥ ५३॥ असतां देहाचें अनुसंधान। जो परमार्थें करी नमन। त्या नमस्काराचें लक्षण। स्वयें श्रीकृष्ण सांगत॥ ५४॥
शिरो मत्पादयो: कृत्वा बाहुभ्यां च परस्परम्।
प्रपन्नं पाहि मामीश भीतं मृत्युग्रहार्णवात्॥ ४६॥
मस्तक माझ्या चरणांवरी। उभय बाहु परस्परीं। दोनी चरण दोंही करीं। धरी निर्धारीं भावार्थें॥ ५५॥ संसारसागराच्या पोटीं। मृत्युग्रहें घातली मिठी। चरणीं लागलों उठाउठीं। मजजगजेठी सोडवीं॥ ५६॥ भवभयें भ्यालों दारुण। यालागीं तुज आलों शरण। निवारी माझेंजन्ममरण। भावें श्रीचरण दृढ धरिले॥ ५७॥ तूं स्वामी असतां शिरीं। मज मृत्यु बापुडें केवींमारी। भावें लोटांगण चरणांवरी। कृपा उद्धरीं कृपाळुवा॥ ५८॥ देखोनि साष्टांग नमन। ऐकोनि भयभीतस्तवन। मज तुष्टला नारायण। ऐसें आपण भावावें॥ ५९॥
इति शेषां मया दत्तां शिरस्याधाय सादरम्।
उद्वासयेच्चेदुद्वास्यं ज्योतिर्ज्योतिषि तत्पुन:॥ ४७॥
म्यां दीधला शेषप्रसाद। तो शिरीं धरोनि स्वानंद। स्थावरमूर्ति जेथ प्रसिद्ध। तेथ उद्वाससंबंध न करावा॥ ३६०॥ जंगम जे प्रतिमामूर्ती। तेथ आवाहिली निजात्मज्योती। ते उद्वासुनियां मागुती। निजात्मस्थितीं ठेवावी॥ ६१॥ मूर्तीमाझारील ज्योति। आणोनियां हृदयस्थितीं। मग निजात्मज्योतीसी ज्योती। यथास्थितीं मेळवावी॥ ६२॥ विसर्जनांत पूजास्थिती। ऐकोनि उद्धवाचे चित्तीं। साधकां पूज्य कोण मूर्ती। देव ते अर्थीं स्वयें सांगे॥ ६३॥
अर्चादिषु यदा यत्र श्रद्धा मां तत्र चार्चयेत्।
सर्वभूतेष्वात्मनि च सर्वात्माहमवस्थित:॥ ४८॥
उद्धवा जे मूर्ति ज्या पढियंती। तेचि त्यासी पूज्य मूर्ती। तुवांही अणुमात्र चित्तीं। संदेह येअर्थीं न धरावा॥ ६४॥ विष्णु विरिंचि सविता जाण। शिव शक्ति कां गजवदन। या मूर्तीमाजीं मी आपण। सर्वीं समान सर्वात्मा॥ ६५॥ सर्व प्रतिमांचें पूजन। करितां मज पूजा समान। भक्तांची जेथ प्रीति गहन। तिये अधीन मी परमात्मा॥ ६६॥ जेवीं बाळकाचेनि मेळें। माता तदनुकूल खेळे। तेवीं भक्तप्रेमाचिये लीळें। म्यां चित्कल्लोळें क्रीडिजे॥ ६७॥ या सर्व भूतांच्या ठायीं। आणि अवतारादि लीलादेहीं। मी सर्वांसी समान पाहीं। ये अर्थीं नाहीं संदेहो॥ ६८॥ उद्धवा मी नाहीं ऐसें। कोणीही ठिकाण रितें नसे। परी प्राण्यांचें भाग्य कैसें। त्या मज विश्वासें न भजती॥ ६९॥ जो जेथ मज भजों बैसे। त्या मी तेथ तैसाचि असें। हें उपासनाकांडविशेषें। गुप्त अनायासें प्रकाशिलें॥ ३७०॥ उपासनाकांडींचा निर्वाहो॥ मी सर्वांभूतीं देवाधिदेवो। हा ज्यासी न कळे मुख्य भावो। त्यासी मूर्तिनिर्वाहो द्योतिला॥ ७१॥ हो कां माझी प्रतिमामूर्ती। तेही मी चिदात्मा निश्चितीं। तेथ करितां भावें भक्ती। भक्त उद्धरती उद्धवा॥ ७२॥
एवं क्रियायोगपथै: पुमान्वैदिकतान्त्रिकै:।
अर्चन्नुभयत: सिद्धिं मत्तो विन्दत्यभीप्सिताम्॥ ४९॥
एवं क्रियायोगलक्षण। वैदिक तांत्रिक मिश्र जाण। आगमनिगम विस्तार गहन। तो मुख्यार्थ पूर्ण सांगितला॥ ७३॥ येणें क्रियायोग भजनमार्गें। भक्त जैं भोगमोक्ष मागे। तैं उभय सिद्धी लागवेगें। म्यां श्रीरंगें अर्पिजे॥ ७४॥ भक्त निष्काम अनन्यभक्ती। तैं भोग मोक्षादि संपत्ती। घेऊनियां मी श्रीपती। त्यांच्या द्वाराप्रती सदा तिष्ठें॥ ७५॥
मदर्चां सम्प्रतिष्ठाप्य मन्दिरं कारयेद्दृढम्।
पुष्पोद्यानानि रम्याणि पूजायात्रोत्सवाश्रितान्॥ ५०॥
साङ्ग माझी प्रतिमामूर्ती। करूनि जे प्रतिष्ठा करिती। दृढ देवालया उभारिती। अतिप्रीतीं मद्भावें॥ ७६॥ वन उपवन उद्यान। पुष्पवाटिका लावाव्या पूर्ण। नित्यपूजेचें विधान। उत्साहीं जाण महापूजा॥ ७७॥ यात्रा बहुजनसमाजा। वार्षिक पर्व महापूजा। चालवावया अधोक्षजा। उपायसहजा हरि सांगे॥ ७८॥
पूजादीनां प्रवाहार्थं महापर्वस्वथान्वहम्।
क्षेत्रापणपुरग्रामान् दत्त्वा मत्सार्ष्टितामियात्॥ ५१॥
नित्यपूजा महापूजा। वार्षिक पर्वें चालवावया वोजा। नित्यनिर्वाह करी राजा। ग्रामसमाजा अर्पूनि॥ ७९॥ ‘क्षेत्र’ म्हणिजे शेत गहन। हाटउत्पन्न द्रव्य ‘आपण’। हाटेंविण तो ‘ग्राम’ जाण। ऐक लक्षण पुराचें॥ ३८०॥ हाटयुक्त तें ‘पुर’ पाहीं। जे अर्पिती देवालयीं। ते माझें ऐश्वर्य पाहीं। सर्वां ठायीं पावती॥ ८१॥ मूर्तिप्रतिष्ठा पूजाविधान। देवालयीं केलिया जाण। कर्त्यासी फळ कोण कोण। तेंही श्रीकृष्ण सांगत॥ ८२॥
प्रतिष्ठया सार्वभौमं सद्मना भुवनत्रयम्।
पूजादिना ब्रह्मलोकं त्रिभिर्मत्साम्यतामियात्॥ ५२॥
जो मूर्तिप्रतिष्ठा करूनि ठाये। तो सार्वभौम राज्य लाहे। जो देवालय करी स्वयें। तो स्वामी होये तिहीं लोकीं॥ ८३॥ जो करी पूजाविधान। तो पावे ब्रह्मसदन। ये तीनी जो करी आपण। तो मजसमान ऐश्वर्य पावे॥ ८४॥ ऐसे हे तिघे साधक। पोटींहूनि सकामुक। कामने सारखे लोक। ते आवश्यक पावती॥ ८५॥ ज्यासी माझें निष्काम भजन। त्याचे प्राप्तीचें निजलक्षण। तें अत्यादरें श्रीकृष्ण। स्वानंदें पूर्ण सांगत॥ ८६॥
मामेव नैरपेक्ष्येण भक्तियोगेन विन्दति।
भक्तियोगं स लभते एवं य: पूजयेत माम्॥ ५३॥
मज मुख्यत्वें जीवीं धरून। ज्यासी माझें निष्काम भजन। निष्कामता जे अनन्य। ते पुरुष जाण मी होती॥ ८७॥ तो वर्तमानदेहीं असतां। माझें निजरूप होय तत्त्वतां। त्या आम्हां आंतौता। भेद सर्वथा असेना॥ ८८॥ करितां निष्काम भजन। भक्त झाला मजसमान। ‘समान’ म्हणावया जाण। वेगळेपण असेना॥ ८९॥ एवं भक्त तो मजभीतरीं। मी भक्ताआंतबाहेरी। ऐसे मिळाले परस्परीं। निजभक्तजनावरी नांदत॥ ३९०॥ गूळ जेवीं गोडियेसी। कां कल्लोळ जैसा सागरासी। ऐशिया निजभक्तीपाशीं। आम्हां तयांसी रहिवासु॥ ९१॥ ऐशी निष्काम जो भक्ति करी। तो धन्य धन्य चराचरीं। जो देवाद्विजांची वृत्ति हरी। तो पचे अघोरीं तें ऐक॥ ९२॥
य: स्वदत्तां परैर्दत्तां हरेत सुरविप्रयो:।
वृत्तिं स जायते विड्भुग्वर्षाणामयुतायुतम्॥ ५४॥
कर्तुश्च सारथेर्हेतोरनुमोदितुरेव च।
कर्मणां भागिन: प्रेत्य भूयो भूयसि तत्फलम्॥ ५५॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे एकादशस्कन्धे श्रीकृष्णोद्धवसंवादे सप्तविंशोऽध्याय:॥ २७॥
जो देवालयाची वृत्ति हरी। जो ब्राह्मणवृत्तीचा लोप करी। तो अयुतायुतवर्षसहस्रीं। योनी सूकरी विष्ठा भोगी॥ ९३॥ जो द्विजदेवांची वृत्ति हरी। त्यासी जो होय साहकारी। कां जो अनुमोदन करी। ते तिघे अघोरीं पचिजेती॥ ९४॥ ते जन्ममरणांच्या आवर्तीं। तेंचि फळ पुढतपुढतीं। मरमरोनि गा भोगिती। जाण निश्चितीं उद्धवा॥ ९५॥ माझे प्राप्तीची चाड चित्ता। तरी नातळावी अधर्मता। अधर्मवंताची कथा। स्वभावें सर्वथा न करावी॥ ९६॥ न देखावें दोषदर्शन। न बोलावें मर्मस्पर्शन। भूतमात्रांचा द्वेष जाण। सर्वथा आपण न करावा॥ ९७॥ नायकावी परनिंदा। न बोलावें परापवादा। अधर्माचिया संवादा। कोणासी कदा न मिळावें॥ ९८॥ त्रिलोकींचें पाप असकें। ज्यास घेणें असेल आवश्यकें। तैं साधुनिंदा निजमुखें। यथासुखें करावी॥ ९९॥ सकळ दु:खांचिया राशी। अवश्य याव्या मजपाशीं। ऐसी आवडी ज्याचे मानसीं। तेणें ब्रह्मद्वेषासी करावें॥ ४००॥ सकळ काळ वृथा जावा। ऐसें आवडे ज्याचे जीवा। तेणें सारिपाटादि आघवा। खेळ मांडावा अहर्निशीं॥ १॥ मी हृदयस्थ आत्माराम। स्वत:सिद्ध परब्रह्म। तो मी व्हावया दुर्गम। अधर्म कर्म जगासी॥ २॥ तें निर्दाळावया कर्माकर्म। वर्म आहे गा अतिसुगम। अखंड स्मरावें रामनाम। पुरुषोत्तम अच्युत॥ ३॥ जेथें हरिनामाचा गजर। तेथ कर्माकर्मांचे संभार। जाळूनि नुरवीं भस्मसार। ऐसें नाम पवित्र हरीचें॥ ४॥ नाम निर्दळी पाप समस्त। हें सकळशास्त्रसंमत। जो विकल्प मानी एथ। तो जाण निश्चित वज्रपापी॥ ५॥ वज्रपापाचे पर्वत। निर्दळी श्रीमहाभागवत। तें जनार्दनकृपा एथ। झालें प्राप्त अनायासें॥ ६॥ ते भागवतींचा पाहतां अर्थ। हरीचें नाम अतिसमर्थ। वर्णिलेंसे परमाद्भुत। स्वमुखें अच्युत बोलिला॥ ७॥ एथही जो विकल्प धरी। तो अतिअभाग्य संसारीं। महादु:खदोषसागरीं। विकल्पेंकरीं बुडाला॥ ८॥ संकल्पविकल्पेंकरीं जाण। जनांसी झालें दृढ बंधन। त्या भवबंधाचें छेदन। जनार्दन निजनाम॥ ९॥ जनार्दनाचें निजनाम। निर्दळी भवभय परम। तें नाम स्मरे जो सप्रेम। तो पुरुषोत्तम स्वयें होय॥ ४१०॥ स्वयें होणें ब्रह्म पूर्ण। ये अर्थींचें गोड निरूपण। अठ्ठाविसावे अध्यायीं जाण। उद्धवा श्रीकृष्ण सांगेल॥ ११॥ ते कथा जैं श्रवणीं पडे। तैं जीवीं स्वयंभ सुख वाढे। मग आंतबाहेर दोंहीकडे। करी वाडेंकोडें समसाम्य॥ १२॥ जे कथेचें गोडपण। जीव गेल्या न सोडी जाण। ऐसें रसाळ निरूपण। उद्धवासी श्रीकृष्ण सांगेल॥ १३॥ श्रवणें उपजे ब्रह्मभावो। तो हा अठ्ठाविसावा अध्यावो। उद्धवासी देवाधिदेवो। निजकृपें पहा हो सांगेल॥ १४॥ अक्षरें भरोनि अक्षररसीं। देव सांगेल उद्धवासी। तें निरूपण अठ्ठाविसाव्यासी। ब्रह्मसुखेंसीं लगडेल॥ १५॥ ब्रह्मसुखाची सांठवण। तो हा अठ्ठाविसावा जाण। ते उघडूनियां उणखूण। उद्धवासी श्रीकृष्ण सांगेल॥ १६॥ तें कृष्णउद्धवनिजज्ञान। एका विनवी जनार्दन। तुमचे कृपेंकरूनि पूर्ण। श्रोतां अवधान मज द्यावें॥ १७॥ श्रोतां दीधल्या अवधान। ग्रंथीं उल्हासे निरूपण। एका जनार्दना शरण। शिरीं श्रीचरण वंदिले॥ ४१८॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे एकादशस्कंधे श्रीकृष्णोद्धवसंवादे, एकाकारटीकायां सप्तविंशोऽध्याय:॥ २७॥ ॥ श्रीकृष्णार्पणमस्तु॥श्लोक॥ ५५॥ ओव्या॥ ४१८॥
॥ श्री ॐ तत्सत् -श्रीकृष्ण प्रसन्न॥
अध्याय अठ्ठाविसावा
श्रीगणेशाय नम:॥ श्रीकृष्णाय नम:॥ जय जय सद्गुरु परम। जय जय सद्गुरु पुरुषोत्तम। जय जय सद्गुरु परब्रह्म। ब्रह्मा ब्रह्मनाम तुझेनी॥ १॥ जय जय सद्गुरु चिदैक्यस्फूर्तीं। जय जय सद्गुरु चिदात्मज्योति। जय जय सद्गुरु चिन्मूर्ती। मूर्तामूर्ती चिद्रूप॥ २॥ जय जय सद्गुरु सत्क्षेत्रा। जय जय सद्गुरु सत्पात्रा। जय जय सद्गुरु सन्मात्रा। सदैकाक्षरा सद्रूपा॥ ३॥ जय जय सद्गुरु स्वानंदमान। जय जय सद्गुरु स्वानंदपूर्ण। जय जय सद्गुरु स्वानंदघन। आनंदा गोडपण तुझेनी॥ ४॥ जय जय सद्गुरु देवअग्रणी। जय जय देवशिरोमणी। सकळ देव लागती चरणीं। देवचूडामणी गुरुराया॥ ५॥ जय जय जीवादिजीवा। जय जय शिवादिशिवा। जय जय देवादिदेवा। जय जय अभिनवा गुरुराया॥ ६॥ जय जय सद्गुरु सुखसंपन्ना। जय जय सद्गुरु सुखनिधाना। जय जय सद्गुरु सुखैकघना। सुखा सुखपणा तुझेनि॥ ७॥ तुझेनि सुखा निजसुख घडे। तुझेनि बोधा निजबोध आतुडे। तुझेनि ब्रह्मा ब्रह्मत्व जोडे। तुझेनि पडिपाडें तूं एकु॥ ८॥ ऐसा श्रीगुरु तूं अनंत। तुझ्या स्वरूपासी नाहीं अंत। तो तूं होऊनि कृपायुक्त। निजस्वरूप बोधित निजभक्तां॥ ९॥ आपुलें निजरूप बोधून। नुरविशी देवभक्तपण। त्याहीवरी निजभजन। अद्वयें पूर्ण करविशी॥ १०॥ गंगा मिळोनि सागरीं। मीनली तळपे तयावरी। तेवीं भक्त मिळोनि तुजमाझारीं। तुझें भजन करी तुझेनि॥ ११॥ अद्वय करितां तुझी भक्ती। तूं संतोषसी यथानिगुती। संतोषोनि शिष्याहातीं। निजात्मसंपत्ती अर्पिशी॥ १२॥ अर्पूनि निजात्मभरभार। शिष्य गुरुत्वें करिशी थोर। हा अतिलाघवी चमत्कार। अतर्क्य विचार तर्केना॥ १३॥ जें अतर्क्य वेदशास्त्रांसी। ज्यालागीं वेद विवादिती अहर्निशीं। तें तूं क्षणार्धें बोधिसी। सच्छिष्यासी निजबोधें॥ १४॥ तुझ्या निजबोधाची हातवटी। पढतां वेदवेदांतकोटी। तरी अलक्ष्य लक्षेना दृष्टीं। सर्वार्थीं गोष्टी अगम्य॥ १५॥ बहुत कळलें कळलें म्हणती। नानापरीच्या युक्ति चाळिती। परी तेन कळोनि वोसणती। जेवीं शुक बोलती सुभाषितें॥ १६॥ यालागीं तुझी बोधकशक्ती। अगम्य सर्वांशीं सर्वार्थीं। तुझी लाधल्या कृपायुक्ती। अगम्य पावती सुगमत्वें॥ १७॥ जें अगम्य श्रीभागवत त्याहीमाजीं एकादशार्थ। प्राकृत करविला यथार्थ। बाप समर्थ कृपाळू॥ १८॥ दधि मंथूनी समस्त। जेवीं माता काढी नवनीत। ते आयितें बाळकाहातीं देत। तैसें केलें येथ जनार्दनें॥ १९॥ वेदशास्त्रांचें निजमथित। व्यासें काढिलें श्रीभागवत। त्या भागवताचा मथितार्थ। जाण निश्चित एकादश॥ २०॥ त्या एकादशाचें गोडपण। सर्वथा नेणें मी आपण। तें जनार्दनें करूनि मथन। सारांश पूर्ण मज दीधला॥ २१॥ तो स्वभावें घालितां तोंडीं। लागली एकादशाची गोडी। त्या गोडपणाच्या आवडीं। टीका चढोवढीं चालिली॥ २२॥ यालागीं एकादशाची टीका। एकला कर्ता नव्हे एका। एकीं एक मिळोनि देखा। ग्रंथ नेटका निर्वाळिला॥ २३॥ मागेंपुढें एक एका। हें एकादशाचें रूप देखा। तेणें एकपणें चालिली टीका। साह्य निजसखा जनार्दन॥ २४॥ जनार्दनें पैं आपुलें। एकीं एकपण दृढ केलें। तेचि एकादशाचे अर्था आलें। एकीं मीनलें एकत्व॥ २५॥ जेवीं जेवणीं गोड घांस। तेवीं भागवतीं एकादश। त्याहीमाजीं अष्टाविंश। अतिसुरस साजिरा॥ २६॥ सर्वांगीं शिर प्रधान। तैसा अठ्ठाविसावा जाण। तेथील जें कां निरूपण। तो स्वानंद जाण सोलींव॥ २७॥ तो हा अठ्ठाविसावा अध्यावो। ब्रह्मसुखाचा निजनिर्वाहो। उद्धवें न पुसतां पहा हो। स्वयें देवाधिदेवो सांगत॥ २८॥ उद्धवें न करितां प्रश्न। कां सांगताहे श्रीकृष्ण। येचि अर्थींचें निरूपण। सावधान परिसावें॥ २९॥ उद्धव कृष्णोक्तीं निजज्ञान। पावोनि झाला ज्ञानसंपन्न। तेणें येऊं पाहे ज्ञानाभिमान। जाणपण अनिवार॥ ३०॥ जग मूर्ख मी एक ज्ञाता। ऐशी वाढती जे अहंता। ते गुणदोषांची कथा। दावील सर्वथा सर्वत्र॥ ३१॥ जेथ गुणदोषांचें दर्शन। तेथ नि:शेष मावळे ज्ञान। येथवरी ज्ञानाभिमान। बाधक जाण साधकां॥ ३२॥ अभिमान बाधी सदाशिवा। तोही आणिलाजीवभावा। तेथमनुष्याचा कोण केवा। अहंत्वें जीवा मुक्तता कैंची॥ ३३॥ गुणदोषांचें दर्शन। जैं ईश्वर देखे आपण। तोही नाडूं पावे जाण। इतरांचा कोण पडिपाडु॥ ३४॥ यापरी गुणदोषदर्शन। साधकां बाधक होय पूर्ण। यालागीं त्याचें निवारण। न करितां प्रश्न हरि सांगे॥ ३५॥ बाळक नेणे निजहिता। तेथ साक्षेपें प्रवर्ते माता। तेवीं उद्धवाचे निजस्वार्था। श्रीकृष्णनाथा कळवळा॥ ३६॥ ज्ञानाभिमानाचें बाधकपण। सर्वथा साधकां न कळे जाण। यालागीं न करितांही प्रश्न। त्याचें निराकरण हरि सांगे॥ ३७॥ उद्धव जन्मला यादववंशीं। यादव निमती ब्रह्मशापेंसीं। तेथ वांचवावया उद्धवासी। संपूर्ण ब्रह्मज्ञानासी हरि सांगे॥ ३८॥ जेथ देहातीत आत्मज्ञान। तेथ न बाधी शापबंधन। हें जाणोनियां श्रीकृष्ण। पूर्ण ब्रह्मज्ञान उपदेशी॥ ३९॥ जेवीं साकरेवरी माशी। तेवीं श्रीकृष्णमूर्तीपाशीं। प्रीति जडली उद्धवासी। भाव एकदेशी दृढ झाला॥ ४०॥ कृष्णापासूनि दुरी जातां। उद्धव प्राण सांडील तत्त्वतां। ते मोडावया एकदेशी अवस्था। ब्रह्मसमता हरि सांगे॥ ४१॥ एकदेशी झाला भावो। तो श्रीकृष्ण नावडे पहा हो। यालागीं देवाधिदेवो। ब्रह्मसमन्वयो स्वयें सांगे॥ ४२॥ उद्धव असतां कृष्णाजवळी। ब्रह्मशापें होईल होळी। यालागीं त्यासी वनमाळी। सर्वब्रह्मसुकाळीं घालूं पाहे॥ ४३॥ कृष्णावेगळा उद्धव जातां। वियोग बाधीना त्याचिया चित्ता। ऐशी पावाया सर्वगतता। उद्धव सर्वथा हरि बोधी॥ ४४॥
श्रीभगवानुवाच
परस्वभावकर्माणि न प्रशंसेन्न गर्हयेत्।
विश्वमेकात्मकं पश्यन्प्रकृत्या पुरुषेण च॥ १॥
जो नि:शब्दाचा सोलींव शब्द। ज्याचे निश्वासें जन्मले वेद। उद्धवहितार्थ गोविंद। ज्ञान विशुद्ध स्वयें सांगे॥ ४५॥ संसारीं मुख्य तिन्ही गुण। त्रिगुणांस्तव त्रिविध जन। त्यांचें स्वाभाविक कर्म जाण। शांत दारुण आणि मिश्र॥ ४६॥ त्या कर्मांचें निंदास्तवन। सर्वथा न करावें आपण। एकाचें वानितां भलेपण। इतरां कुडेपण तेणेंचि बोलें॥ ४७॥ पांचांमाजीं भलेपण। एकाचें वानितां आपण। इतर जे चौघेजण। ते सहजें जाण निंदिले॥ ४८॥ वामसव्य उभय भाग। दों नांवीं एकचि अंग। तेवीं प्रकृतिपुरुषात्मक जग। चिद्रूपें चांग एकत्वें॥ ४९॥ जग ब्रह्मरूप परिपूर्ण। यालागींनिंदा आणि स्तवन। भूतमात्राचें आपण। कदाही काळीं जाण न करावें॥ ५०॥ सर्व भूतांच्याठायीं। आत्माराम असे पाहीं। यालागीं निंदास्तुति कांहीं। प्राणांतीं पाहीं न करावी॥ ५१॥ उद्धवा निंदास्तुतीची कथा। सांडी सांडीं गा सर्वथा। तरीच पावशी परमार्था। निजस्वार्थानिजबोधें॥ ५२॥ सर्वभूतीं भगवद्भाव। हा ब्रह्मस्थितीचा निज निर्वाह। यासी कदा नव्हे अपाव। ऐक तो भाव उद्धवा॥ ५३॥ जेथूनि येवूं पाहे अपाव। तेथें दृढ वाढल्या भगवद्भाव। तेव्हां अपावचि होय उपाव। विघ्नासी ठाव असेना॥ ५४॥ हे स्थिती सांडूनियां दूरी। मी ज्ञाता हा गर्व धरी। निंदास्तुतीच्या भरोवरी। तो अनर्थामाझारीं निमग्न॥ ५५॥
परस्वभावकर्माणि य: प्रशंसति निन्दति।
स आशु भ्रश्यते स्वार्थादसत्यभिनिवेशत:॥ २॥
मी एक सर्वज्ञाता पूर्ण। ऐसा धरोनि ज्ञानाभिमान। जगाचे देखे दोषगुण। निंदी ब्राह्मण मुख्यत्वें॥ ५६॥ पराचें स्वाभाविक कर्म। स्वयें निंदणें हा अधर्म। हनुमंत ज्ञाता परम। त्यास वानरी कर्म सोडीना॥ ५७॥ नारद ज्ञातेपणें मोठा। सत्य मानला श्रेष्ठश्रेष्ठां। तोही कळिलावा कळिकांटा। स्वभावचेष्टा अनिवार॥ ५८॥ गरुड देवाचें वाहन। सदा तिष्ठे हात जोडून। तोही करी सर्पभक्षण। ऐसें कर्म जाण स्वाभाविक॥ ५९॥ विचारतां जग त्रिगुण। गुणानुसारें कर्माचरण। तेथ पाहतां दोषगुण। दोषी जाण पाहे तो॥ ६०॥ जगीं पहावी एकात्मता। हे ब्रह्मस्थिति गा सर्वथा। सांडूनि गुणदोष पाहतां। तो निजात्मघाता प्रवर्ते॥ ६१॥ स्वभावें भेटल्या सज्जन। शोधूनि पाहे दोषगुण। यापरी ज्ञानाभिमान। निंदास्तवन उपजवी॥ ६२॥ अभिमानाची जाती कैशी। अधिक खवळे सज्ञानापाशी। तो दाखवी गुणदोषांसी। निंदास्तवनासी उपजवी॥ ६३॥ आपुले वृत्तीसी जो समान। त्याचें अळुमाळ करी स्तवन। न मने आपणासी ज्याचा गुण। त्यासी निंदी आपण यथेष्ट॥ ६४॥ निंदास्तुति उपजे जेथ। भेद क्षोभला उठे तेथ। नि:शेष निर्दाळी परमार्थ। महा अनर्थ अंगीं वाजे॥ ६५॥ निंदेपाठीं अनर्थ। उधार लागों नेदी तेथ। रोकडा अंगीं आदळत। निजस्वार्थघातक॥ ६६॥ भेद समूळ मिथ्या येथ। येचि अर्थींचा स्वप्नदृष्टांत। स्वयें सांगे श्रीकृष्णनाथ। दृढ परमार्थ साधावया॥ ६७॥
तैजसे निद्रयाऽऽपन्ने पिण्डस्थो नष्टचेतन:।
मायां प्राप्नोति मृत्युं वा तद्वन्नानार्थदृक् पुमान्॥ ३॥
इंद्रियें जन्मलीं रजोगुणीं। तन्मात्रा विषयो तमोगुणीं। तीं इंद्रियें विषय सेवुनी। ठेलीं निद्रास्थानीं निश्चळ॥ ६८॥ जागृतीं ‘विश्व’ अभिमानी। दोनी जाती मावळोनी। तेव्हां मिथ्या प्रपंच स्वप्नीं। ‘तैजस’ अभिमानी विस्तारी॥ ६९॥ स्थूल देह असे निश्चळ। स्वप्नीं मनचि केवळ। विस्तारी गा भवजाळ। लोक सकळ त्रिलोकीं॥ ७०॥ त्या स्वप्नामाजिले सृष्टीसी जाण। उत्पत्ति स्थिति आणि निदान। स्वयें देखतांही आपण। जन्ममरण तें मिथ्या॥ ७१॥ तेवीं हे अविद्या दीर्घ स्वप्न। वृथा विस्तारी अभिमान। तेथील मिथ्या जन्ममरण। तूं ब्रह्म परिपूर्ण पूर्णत्वें॥ ७२॥ तुझ्यानिजस्वरूपाच्या ठायीं। भेदाची तंव वार्ताही नाहीं। तेथील शुभाशुभ कांहीं। तुज सर्वथा पाहीं स्पर्शेना॥ ७३॥
किं भद्रं किमभद्रं वा द्वैतस्यावस्तुन: कियत्।
वाचोदितं तदनृतं मनसा ध्यातमेव च॥ ४॥
जें जन्मलेंचि नाहीं। तें काळें गोरें सांगूं कायी। ग्रहणेवीण कांहीं। खग्रास पाहीं दिसेना॥ ७४॥ उखरीं भासलें मृगजळ। तें खोल किंवा उथळ। मधुर कीं क्षार केवळ। सांगतां विकळ विवेक॥ ७५॥ तेवीं मिथ्या प्रपंचाचें भान। तेथील दोष आणि गुण। निवडिती जे सज्ञान। ते जाण निमग्न अज्ञानामाजीं॥ ७६॥ जेवीं आंवसेचिये रातीं। अंधारा जोखूं आंधळे येती। त्यांसी जोखितां दोंही हातीं। एकही रती तुकेना॥ ७७॥ तेवीं प्रपंच मिथ्यापणें। तेथ कानीं जें ऐकणें। कां डोळां जें देखणें। रसना जें चाखणें स्पर्शणें अंगें॥ ७८॥ हाताचें घेणेंदेणें। पायांचें जें चालणें। वाचेचें जें बोलणें। कल्पणें मनें तें मिथ्या॥ ७९॥ अहंकाराचा बडिवार। चित्ताचा चिंतनप्रकार। बुद्धीचा विवेकविचार। हा समूळ व्यवहार मिथ्या तेथ॥ ८०॥ चित्रीं जळ आणि हुताशन। अंत्यज आणि ब्राह्मण। व्याघ्र आणि हरिण। भासतांही जाण भिंतीचि भासे॥ ८१॥ तेवीं हा प्रपंच द्वैतयुक्त। भासतां भासे वस्तु अद्वैत। शुभाशुभ कैचें तेथ। ब्रह्म सदोदित परिपूर्ण॥ ८२॥ केळीचा दिंड उकलितां। जो जो पदर तो तो रिता। तेवीं देहादि प्रपंच विवंचितां। मिथ्या तत्त्वतां मायिक॥ ८३॥ मिथ्या प्रपंचाच्या ठायीं। शुभाशुभ तें लटिकें पाहीं। सत्य वस्तु ठायींच्या ठायीं। शुभाशुभ नाहीं अणुमात्र॥ ८४॥ जो शुभाशुभ म्हणे आहे। त्याची कल्पना त्यासंमुख होये। निजकल्पना महाभयें। जन्ममरण वाहे लटिकेंचि॥ ८५॥
छाया प्रत्याह्वयाभासा ह्यसन्तोऽप्यर्थकारिण:।
एवं देहादयो भावा यच्छन्त्यामृत्युतो भयम्॥ ५॥
जळीं प्रतिबिंब साच नसे। जो पाहे तो बिंबला दिसे। मिथ्या प्रपंचाचें रूप तैसें। निजकल्पनावशें भासत॥ ८६॥ तें प्रतिबिंब पाहोनि डोळां। मी म्हणोनि लाविजे टिळा। तेवीं देहाभिमानाचा सोहळा। जीवाच्या कपाळा आदळे॥ ८७॥ कां आपुलींचि उत्तरें। पडिसादें होतीं प्रत्युत्तरें। तें मिथ्याचि परी साचोकारें। श्रवणीं अक्षरें उमटती॥ ८८॥ निश्चळ दोराचें निजरूप। भ्रमें भासला प्रचंड सर्प। तो मिथ्या परी भयकंप। महाखटाटोप उपजवी॥ ८९॥ यापरी असंत देहादिक। देहाभिमानें जीवासी देख। जन्ममरणावर्त अनेक। आकल्प दु:ख भोगवी॥ ९०॥ ‘आत्म्यापासोनि देहादि भेद। उपजला हें बोलें वेद। वेदरूपें तूं प्रसिद्ध। मिथ्या वेदवाद घडे केवीं’॥ ९१॥ ऐसा उद्धवाचा आवांका। वेदवादाची आशंका। समूळ कळली यदुनायका। तेंचि उत्तर देखा देतसे॥ ९२॥
आत्मैव तदिदं विश्वं सृज्यते सृजति प्रभु:।
त्रायते त्राति विश्वात्मा ह्रियते हरतीश्वर:॥ ६॥
तस्मान्नह्यात्मनोऽन्यस्मादन्यो भावो निरूपित:।
निरूपितेयं त्रिविधा निर्मूला भातिरात्मनि।
प्रपंच प्रत्यक्ष विद्यमान। तेणें भेदयुक्त झालें मन। तेथ बोधी माझें वेदवचन। प्रपंच अभिन्न निजात्मता॥ ९३॥ मूळीं ऊंसचि बीजीं विरूढे। तो ऊंस ऊंसपणें कांडा चढे। तेवीं प्रपंच वस्तुयोगें वाढे। वाडेंकोडें तद्रूप॥ ९४॥ जैसें सोनियाचें झालें लेणें। तें वर्ततां वर्त्ते सोनेपणें। लेणें मोडलियाही सोनें। सोनेंपणें स्वत:सिद्ध॥ ९५॥ तिळाची पुतळी केली। ते तिळावयवीं शोभे आली। ते मोडितां न मोडितां भली। असे संचली तिळरूप॥ ९६॥ तेवीं उत्पत्ति स्थिति निदान। प्रपंचासी होता जाण। तेथ आदि मध्य अवसान। वस्तु परिपूर्ण संचली॥ ९७॥ जें एथ भासलें चराचर। तें मी आत्माचि साचार। मजवेगळा जगासी थार। अणुमात्र असेना॥ ९८॥ एवं सृज्य आणि सृजिता। पाल्य आणि प्रतिपाळिता। संहार आणि संहर्ता। मी एकात्मता भगवंत॥ ९९॥ एथ उत्पत्ति स्थिति निधन। त्रिविधरूपें प्रपंच भिन्न। या सर्वांसी मी अधिष्ठान। मजवेगळें जाण असेना॥ १००॥ प्रपंच मजवरी आभासे। परी मी प्रपंचामाजीं नसें। जेवीं मृगजळाचेनि रसें। सूर्य काळवशें भिजेना॥ १॥ त्रिविध प्रपंचाचें जाळ। मजवरी दिसे हें निर्मूळ। जेवीं गगन भासे सुनीळ। परी तेथ अळुमाळ नीळिमा नाहीं॥ २॥ ‘जग प्रत्यक्ष डोळां दिसे। तें तूं निर्मूळ म्हणसी कैसें’। हे आशंका मानिसी मानसें। ऐक अनायासें तो बोध॥ ३॥
इदं गुणमयं विद्धि त्रिविधं मायया कृतम्॥ ७॥
एतद्विद्वान्मदुदितं ज्ञानविज्ञाननैपुणम्।
न निन्दति न च स्तौति लोके चरति सूर्यवत्॥ ८॥
अध्यात्म अधिदैव अधिभूत। हें त्रिविध जग मायाकृत। नसतें मजमाजीं आभासत। जाण निश्चित त्रिगुणात्मक॥ ४॥ उद्धवा मिथ्या म्हणोनि तूं एथ। झणें होशी उपेक्षायुक्त। येणें मद्वाक्यें साधुसंत। ज्ञानविज्ञानार्थ पावले॥ ५॥ प्रपंचाचें मिथ्या भान। तेंचि ज्ञानाचें मुख्य ज्ञान। येणें ज्ञानें जो सज्ञान। तोचि समान सर्वांभूतीं॥ ६॥ यालागीं भूतांचे गुणागुण। कदा न वदे निंदास्तवन। सूर्याचे परी जाण। विचरे आपण समसाम्यें॥ ७॥ बदरिकाश्रम उत्तरदेशीं। सेतुबंध दक्षिणेसी। सूर्य संमुख सर्वांसी। विमुखता त्यासी असेना॥ ८॥ सूर्य संमुख पूर्वेच्यांसी। तोचि विमुख पश्चिमेच्यांसी। नाहीं तेवीं मी सर्वत्र सर्वांसी। विमुखता मजसी असेना॥ ९॥ सामर्थ्यें तम दवडूनि जाण। भूतांसी सूर्य भेटे आपण। तेविं जगाचे दवडूनि दोषगुण। साधुसज्जन विचरती॥ ११०॥ जें हें बोलिलें ज्ञानलक्षण। तेंचि सिद्धांचें पूर्णपण। मुमुक्षीं हें अनुसंधान। सावधान साधावें॥ ११॥ हेंचि पाविजे निजज्ञान। तेचि अर्थींचें साधन। उद्धवालागीं श्रीकृष्ण। स्वमुखें आपण सांगत॥ १२॥
प्रत्यक्षेणानुमानेन निगमेनात्मसंविदा।
आद्यन्तवदसज्ज्ञात्वा नि:सङ्गो विचरेदिह॥ ९॥
जे जन्मोनि नाशवंत। ते सर्वही जाण असंत। आसक्ति सांडोनियां तेथ। उदास विरक्त वर्तावें॥ १३॥ सटवल्याचें बारसें। कोणी न करिती उल्हासें। नश्वर देह वाढतां तैसें। मूर्ख मानसें सुखावती॥ १४॥ उत्पत्तिविनाशलक्षण। त्याचें देव सांगतो प्रमाण। नित्य भूतांचें जन्ममरण। देखिजे आपण ‘प्रत्यक्ष’॥ १५॥ ‘अनुमान’ करितां साचार। जें जें देखिजे साकार। मेरु पृथ्व्यादि आकार। होती नश्वर प्रळयांतीं॥ १६॥ येचि अर्थीं वेदोक्ती। नाशवंत अष्टधा प्रकृती। जीवभाव नासे गा प्रांतीं। गर्जती श्रुती येणें अर्थें॥ १७॥ एथ आपुलाही अनुभव असे। जड विकारी तें तें नासे। हें कळत असे गा आपैसें। जग अनायासें नश्वर॥ १८॥ वडील निमाले देखती। पुत्रपौत्र स्वयें संस्कारिती। तरी स्वमृत्यूची चिंता न करिती। पडली भ्रांती देह लोभें॥ १९॥ पुत्रपितरां पिंडदान देती। उत्तम गति त्यांची चिंतिती। आपुली गति न विचारितीं। नश्वर आसक्ती देह लोभें॥ १२०॥ आत्मा केवल प्रकाशघन। प्रपंच जड मूढ अज्ञान। हें ऐकोनि उद्धवें आपण। देवासी प्रश्न पूसतु॥ २१॥
उद्धव उवाच
नैवात्मनो न देहस्य संसृतिर्द्रष्टृदृश्ययो:।
अनात्मस्वदृशोरीश कस्य स्यादुपलभ्यते॥ १०॥
आत्मा नित्यमुक्त चिद्घन। त्यासी न घडे भवबंधन। देह जड मूढ अज्ञान। त्यासी संसार जाण घडेना॥ २२॥ एथ भवबंधन हृषीकेशी। सांग पां बाधक कोणासी। जरी तूं संसार नाहीं म्हणसी। तो प्रत्यक्ष जगासी जडलासे॥ २३॥ आत्म्यासी विचारितां जाण। भवबंधा न दिसे स्थान। येचि अर्थींचें न घडतेपण। उद्धव आपण सांगत॥ २४॥
आत्माव्ययोऽगुण: शुद्ध: स्वयंज्योतिरनावृत:।
अग्निवद्दारुवदचिद्देह: कस्येह संसृति:॥ ११॥
आत्मा चिद्रूप अविनाशी। गुण निर्गुण नातळे ज्यासी। कर्माकर्म पापपुण्यासी। ठाव त्यापाशीं असेना॥ २५॥ परादि वाचा नव्हे उच्चार। यालागीं म्हणिपें ‘परात्पर’। प्रकृतिगुणीं अविकार। प्रकृतिपर परमात्मा॥ २६॥ जयाच्या स्वप्रकाशदीप्तीं। रविचंद्रादि प्रकाशती। प्रकाशें प्रकाशेत्रिजगती। तेजोमूर्ती परमात्मा॥ २७॥ ऐशिया आत्म्याच्या ठायीं। भवबंधन न लगे कांहीं। सूर्यबुडे मृगजळाच्या डोहीं। तैं आत्म्यासी पाहीं भवबंध॥ २८॥ खद्योततेजें सूर्य जळे। बागुलाभेणेंकाळ पळे। मुंगीचेनि पांखबळें। जैं उडे सगळें आकाश॥ २९॥ वारा आडखुळीला आडीं पडे। जैं थिल्लरामाजीं मेरु बुडे। तरी भवबंध आत्म्याकडे। सर्वथा न घडे गोविंदा॥ १३०॥ देहाकडे भवबंधन। मूर्खही न मानिती जाण। देह जड मूढ अज्ञान। त्यासी भवबंधन कदा न घडे॥ ३१॥ जैं दगडाचें पोट दुखे। कोरडें काष्ठ चरफडी भुकें। तैं देहाकडे यथासुखें। भवबंध हरिखे लागता॥ ३२॥ जैं डोंगरासी तरळ भरे। मृत्तिका नाहाणालागीं झुरे। कोळसेनि काळें होय अंधारें। तैं भवबंधभारें देह दाटे॥ ३३॥ म्हणसी देहात्मसंगतीं। घडे भवबंधाची प्राप्ती। विचारितां तेही अर्थीं। न घडे श्रीपति तें ऐक॥ ३४॥ आत्मास्वप्रकाश महावन्ही। देह तो जड मूढ काष्ठस्थानीं। तो मिळतां आत्ममिळणीं। सांडी जाळूनि तत्काळ॥ ३५॥ जैं अग्निमाजीं संवादें। कापूर आठ प्रहर नांदे। तैं देहात्मनिजसंबंधें। देह भवबंधें नांदता॥ ३६॥ म्हणसी काष्ठामाजीं अग्नि असे। परी तो काष्ठचि होऊनि नसे। मथूनि काढिल्या निजप्रकाशें। जाळी अनायासें काष्ठातें॥ ३७॥ तेवीं आत्मा देहामाजीं असे। परी तो देहचि होऊनि नसे। देहप्रकाशक चिदंशें। भवबंधपिसें त्या न घडे॥ ३८॥ आशंका॥ म्हणशी ‘आत्म्याचे निजसंगतीं। जैं जळोनि जाय भूतव्यक्ती। तैं भूतांची वर्तती स्थिती। कैशा रीतीं’ तें ऐक॥ ३९॥ छायामंडपीं दीप प्रकाशी। नाचवी कागदांच्या बाहुल्यासी। तेच लावितां दीपासी। जाळी अनायासीं त्या व्यक्तीं॥ १४०॥ तेवीं आत्म्याचे स्वसत्ताशक्तीं। भूतें दैवयोगें वर्तती। स्वयंभू झाल्या आत्मस्थिती। भूतव्यक्ती उरेना॥ ४१॥ करितां आत्म्याचें अनुसंधान। संसाराचें नुरे भान। तेथ भूताकृति भिन्न-भिन्न। कैंच्या जाण अतिबद्ध॥ ४२॥ यापरी भवबंधन। मज पाहतां मिथ्या जाण। भवबंधालागीं स्थान। नेमस्त जाण असेना॥ ४३॥ आत्म्याच्या ठायीं ना देहीं। उभयसंबंधींही नाहीं। भवबंध मिथ्या पाहीं। त्यासी ठावो कोठेंही असेना॥ ४४॥ कोपों नको श्रीकृष्णनाथा। माझेनि निजनिर्धारें पाहतां। भवबंध मिथ्या तत्त्वतां। निश्चयें चित्ता मानलें॥ ४५॥ ऐकोनि उद्धवाचें वचन। हरिखें वोसंडला श्रीकृष्ण। माझा उद्धव झाला सज्ञान। निजात्मखूण पावला॥ ४६॥ सत्य मिथ्या भवबंधन। ऐकोनि उद्धवाचें वचन। परमानंदें डोले श्रीकृष्ण। जीवें निंबलोण करूं पाहे॥ ४७॥ आत्म्यास भवबंध नाहीं। शेखीं न दिसे देहाच्या ठायीं। हा विवेक नेणिजे जिंहीं। त्यासी भवबंध पाहीं हरि सांगे॥ ४८॥
श्रीभगवानुवाच
यावद्देहेन्द्रियप्राणैरात्मन: सन्निकर्षणम्।
संसार: फलवांस्तावदपार्थोऽप्यविवेकिन:॥ १२॥
जो वर्णाश्रमांही परता। जो बंधमोक्षां अलिप्तता। जो देह द्वंद्वा नातळता। तो उद्धव हितार्था हरि बोले॥ ४९॥ मी कृश स्थूळ गौर श्याम। हे देहाचे ‘देहधर्म’। मी काणा मुका बहिरा परम। हे ‘इंद्रियधर्म’ इंद्रियांचे॥ १५०॥ क्षुधातृषादि अनुक्रम। हा प्रणांचा ‘प्राणधर्म’। कामक्रोधलोभादि संभ्रम। हा ‘मनोधर्म’ मनाचा॥ ५१॥ सत्त्वगुणाची ‘जागृती’। रजोगुणें ‘स्वप्नस्फूर्ती’। तमोगुणें जाडॺ ‘सुषुप्ती’। जाण निश्चितीं देहयोगें॥ ५२॥ देहासी येतां मरण। ‘मी मेलों’ म्हणे तो आपण। देहासी जन्म होतां जाण। जन्मलेपण स्वयें मानीं॥ ५३॥ इंद्रियें विषयो सेविती। ते म्यां सेविले मानी निश्चितीं। स्वर्गनरकभोगप्राप्ती। सत्य मानिती देहात्मता॥ ५४॥ अन्न आकांक्षी प्राण। त्यातें भक्षी हुताशन। तत्साक्षी चिदात्मा आपण। म्हणे म्यां अन्न भक्षिलें॥ ५५॥ हे अवघे माझे धर्म। ऐसा आत्म्यासी जंव दृढ भ्रम। तंव मिथ्याचि अतिदुर्गम। संसार विषम भ्रमें भोगी॥ ५६॥ त्या भोगाचें फळ गहन। अविश्रम जन्ममरण। स्वर्गनरक पापपुण्य। भ्रमें आपण सत्य मानी॥ ५७॥ संसार मूळीं निमूळ। तोही भ्रमफळें सदाफळ। जो कां अविवेक्यां अतिप्रबळ। सर्वकाळफळलासे॥ ५८॥ जेथ सत्य अर्थ नाहीं। तो ‘अनर्थ’ म्हणिजे पाहीं। त्याचा फळभोग तोही। बाळ बागुल न्यायीं भोगावा॥ ५९॥ ॥ आशंका॥ ‘गगनकमळांची माळा। जैं वंध्यापुत्र घाली गळां। तैं संसारभोगाचा सोहळा। आत्म्याच्या जवळां देखिजे॥ १६०॥ ऐसें न घडतें केवीं घडे’। तेचि अर्थींचें वाडेंकोडें। श्रीकृष्ण उद्धवापुढें। निजनिवाडें सांगत॥ ६१॥
अर्थे ह्यविद्यमानेऽपि संसृतिर्न निवर्तते।
ध्यायतो विषयानस्य स्वप्नेऽनर्थागमो यथा॥ १३॥
सत्यार्थ नसतांही संसार। निवर्तेना अतिदुर्धर। येचि अर्थींचा विचार। निजनिर्धार अवधारीं॥ ६२॥ वंध्यापुत्राचिया ऐसें। संसारा सत्यपण नसे। सत्य म्हणों तरी हा नासे। काळवशें सहजेंचि॥ ६३॥ संसार जैं सत्य होता। तैं ब्रह्मज्ञानेंही न नासता। हा संतासंत नये म्हणतां। अनिर्वाच्य कथा पैं याची॥ ६४॥ अविचारितां याचें कोड। अविवेकें हा अतिगोड। विषयध्यानें वाढे रूढ। संकल्प सदृढ मूळ याचें॥ ६५॥ हा नसता चि परी आभासे। निद्रिता स्वप्नीं अनर्थ पिसें। तेवीं संसार मायावशें। विषय आभासें भोगवी॥ ६६॥ जंव जंव विषय सेवन। तंव तंव वाढे विषयध्यान। विषयध्यासें भवबंधन। सदृढ जाण उद्धवा॥ ६७॥ विषय सेवनें भवबंधन। जीवासी झालें दृढ पूर्ण। तैं जीवन्मुक्तासी विषयभान। दैवयोगें जाण दिसताहे॥ ६८॥ ‘जीवन्मुक्तासी विषयप्राप्ती। तेणें बुडाली त्याची मुक्ती’। ऐशी आशंका न धरीं चित्तीं। तेंचि श्रीपति विशद सांगे॥ ६९॥
यथा ह्यप्रतिबुद्धस्य प्रस्वापो बह्वनर्थभृत्।
स एव प्रतिबुद्धस्य न वै मोहाय कल्पते॥ १४॥
सज्ञान आणि अज्ञान। यांसी जें विषयसेवन। त्यांचा अनुभव भिन्न-भिन्न। तेंही लक्षण अवधारीं॥ १७०॥ जेवीं स्वप्नींची विषयप्राप्ती। स्वप्नस्थ साचचि मानती। तेचि विषय जागृतीं स्फुरती। परी सत्यप्रतीति त्यां नाहीं॥ ७१॥ तेवीं अज्ञानां विषयसेवन। तेणें विषयासक्त होय मन। तेंचि मुक्तांप्रति विषय जाण। मिथ्या दर्शन विषयांचें॥ ७२॥ नटनाटॺ-लोकाचारीं। संपादी स्त्रीपुरुषव्यवहारीं। मुक्तासी तैशी परी। गृहदारीं नांदतां॥ ७३॥ कां लेंकरांच्या खेळाप्रती। तुळसीदळें घेऊनि हातीं। वडे मांडे क्षीर तूप म्हणती। एकीं कल्पिती अनेकत्व॥ ७४॥ तेवीं जीवन्मुक्तांसी देख। जगीं विषयो अवघा एक। त्यासी नानात्वें भाविती लोक। परी तो अनेक देखेना॥ ७५॥ दृढ धरोनि देहाभिमान। ‘मी माझें’ जें विषयस्फुरण। तेंच भवबंधाचें कारण। विशद श्रीकृष्ण सांगत॥ ७६॥
शोकहर्षभयक्रोधलोभमोहस्पृहादय:।
अहङ्कारस्य दृश्यन्ते जन्म मृत्युश्च नात्मन:॥ १५॥
देहाभिमानाचें पोटीं। अनेक दु:खांचिया कोटी। त्यांची संकळितें गुणगोठी। कृष्ण जगजेठी सांगत॥ ७७॥ देहाभिमानाचें कार्य एथ। अद्वैतीं वाढवी द्वैत। इष्टानिष्टीं समस्त। जग व्याप्त तेणें कीजे॥ ७८॥ नश्वरा इष्टाचा नाश देख। तेणें देहअहंता मानी दु:ख। या नांव गा ‘शोक’। सकळही लोक मानिती॥ ७९॥ नश्वर विषयांची प्राप्ती। तेथें आल्हाद उपजे चित्तीं। त्या नांव ‘हर्ष’ म्हणती। जाण निश्चितीं उद्धवा॥ १८०॥ बळी मिळोनि समर्थ। आप्त विषयो विभांडूं पाहात। तेणे कासावीस होय चित्त। ‘भय’ निश्चित या नांव॥ ८१॥ आप्तकामाचें अवरोधन। ज्याचेनि अणुमात्र होय जाण। त्याचें करूं धांवे हनन। ‘क्रोध’ संपूर्ण त्या नांव॥ ८२॥ गांठी झाल्याही धनकोडी। कवडी वेंचितां प्राण सोडी। या नांव ‘लोभाची’ बेडी। कृपण-परवडी पुरुषाची॥ ८३॥ कर्माकर्म हिताहित। इष्टानिष्ट नाठवी चित्त। विवेकशून्य स्तब्धता प्राप्त। ‘मोह’ निश्चित या नांव॥ ८४॥ नित्य करितां विषयसेवन। मनीं विषयइच्छा गहन। अखंड विषयांचें ध्यान। ‘स्पृहा’ जाण ती नांव॥ ८५॥ इत्यादि हे नाना गुण। अथवा कां जन्ममरण। आत्म्यासी संबंध नाहीं जाण। हें देहाभिमान स्वयें भोगी॥ ८६॥ जागृति आणि देखिजे स्वप्न। तेथ वसे देहाभिमान। ते ठायीं हे दिसती गुण। सुषुप्तीस जाण गुण नाहीं॥ ८७॥ जेथ वृत्ति निरभिमान। तेथ जन्ममरणादि हे गुण। सर्वथा नुठती जाण। गुणासी कारण अभिमान॥ ८८॥ जळीं स्थळीं वायु झगटी। जळीं तरंग स्थळीं नुठी। तैं तरंगता जळाचे पोटीं। तेवीं शोकादि गुणकोटी अहंतेमाजीं॥ ८९॥ बद्धता झाली अहंकारासी। म्हणसी मुक्ति व्हावी त्यासी। ते अहंता लागली जीवासी। तेंचि हृषीकेशी सांगत॥ १९०॥ अंत्यजाचा विटाळ ज्यासी। गंगास्नानें शुद्धत्व त्यासी। तें गंगास्नान अंत्यजासी। शुद्धत्वासी अनुपयोगी॥ ९१॥ तेवीं अहंता जडली जीवासी। ते त्यागितां मुक्तत्व त्यासी। परी मुक्तत्व अहंकारासी। कल्पांतेंसी घडेना॥ ९२॥
देहेन्द्रियप्राणमनोऽभिमानो
जीवोऽन्तरात्मा गुणकर्ममूर्ति:।
सूत्रं महानित्युरुधेव गीत:
संसार आधावति कालतन्त्र:॥ १६॥
अनंत अपार ज्ञानघन। मायातीत आत्मा पूर्ण। तोचि झाला मायेचें अधिष्ठान। ‘अंतरात्मा’ जाण यालागीं म्हणापे॥ ९३॥ माया व्यापूनि अपार। यालागीं बोलिजे ‘परमेश्वर’। मायानियंता साचार। यालागीं ‘ईश्वर’ म्हणिपे तो॥ ९४॥ तोचि अविद्येमाजीं प्रतिबिंबला। यालागीं ‘जीव’ हें नाम पावला। तोचि देहाध्यासें प्रबळला। ‘अहंकार’ झाला या हेतू॥ ९५॥ तो संकल्पविकल्पउपाधीनें। स्वयें होऊनि ठेला ‘मन’। त्यासी मनासी करावया गमन। ‘दशेंद्रियें’ जाण तोचि झाला॥ ९६॥ त्या इंद्रियांचा आधार। सुखदु:खभोगांचा निकर। पापपुण्याचा चमत्कार। ‘देहाचा आकार’ तोचि झाला॥ ९७॥ त्या देहाचें जें कारण। ‘सत्त्व-रजतमोगुण’। ते तीन्ही गुण जाण। तोचि आपण स्वयें झाला॥ ९८॥ गुणक्षोभाचें निजवर्म। झाला ‘पंचविषय’ परम। विषयभोगादि क्रिया कर्म। स्वयें ‘स्वधर्म’ होऊनि ठेला॥ ९९॥ तिनी गुणांचें जन्मकारण। झाला ‘महत्तत्त्व-सूत्रप्रधान’। एवं संसार अवघा जाण। ईश्वर आपण स्वयें झाला॥ २००॥ त्या संसाराची आधावती। गुणसाम्यें तोचि ‘प्रकृती’। तेथ उत्पत्तिस्थिति-प्रळयार्थी। क्षोभिकाशक्ति ‘काळ’ तो झाला॥ १॥ तो काळ आपल्या सत्ताशक्तीं। उपजवी पाळी संहारी अंतीं। ऐशा पुन:पुन: आवृत्ती। नेणों किती करवीत॥ २॥ एवं संसार तो ब्रह्मस्फूर्ती। लीलाविग्रहें साकारस्थिती। मी विश्वेश्वर विश्वमूर्ती। बहुधा व्यक्ती मी एक॥ ३॥ यालागीं जो जो पदार्थ दिसे। तेणें तेणें रूपें आत्मा भासे। मज वेगळा पदार्थ नसें। हें मानी विश्वासें तो धन्य॥ ४॥ मीचि एक बहुधा व्यक्ती। वेदही साक्षी येचि अर्थीं। ‘विश्वतश्चक्षु’ या वेदोक्तीं। श्रुति मज गाती सर्वदा॥ ५॥ ऐसें असतां नवल कैसें। जीव भुलला कल्पनावशें। अहंता वाढवी देहाध्यासें। तो म्हणे देव न दिसे तिहीं लोकीं॥ ६॥ सत्य मानूनि भेदभान। जीव झाला अतिअज्ञान। भुलला आपण्या आपण। देहाभिमान दृढ झाला॥ ७॥ देहाभिमानाचें दृढपण। तेंचि ‘बद्धतेचें लक्षण’। देहाभिमानाचें निरसन। ‘मुक्तता’ जाण ती नांव॥ ८॥ समूळ मिथ्या देहाभिमान। मिथ्या भेदाचें भवभान। त्याचें आद्यंत निर्दळण। होतें लक्षण हरि सांगे॥ ९॥
अमूलमेतद् बहुरूपरूपितं
मनोवच:प्राणशरीरकर्म।
ज्ञानासिनोपासनया शितेन-
च्छित्त्वा मुनिर्गां विचरत्यतृष्ण:॥ १७॥
भेदरूपें भवभान। मनसा वाचा कर्म प्राण। देहद्वयाचें जें स्फुरण। तें निर्मूळ जाण उद्धवा॥ २१०॥ भेदें बहुरूप भव पटळ। विचारितां तें निर्मूळ। विचित्र भासावया भवजाळ। आत्म्यावेगळें स्थळ असेना॥ ११॥ आत्म्याहूनि संसार भिन्न। म्हणती ते केवळ अज्ञान। त्यांसी बहुरूपें भवभान। देहाभिमान वाढवी॥ १२॥ त्या देहाभिमानाचे पोटीं। कर्माकर्मांची आटाटी। जन्ममरणांचिया कोटी। दु:ख संकटीं जीव भोगी॥ १३॥ ऐसा दु:खदाता देहाभिमान। समूळ जाणोनियां आपण। त्याचें करावया निर्दळण। अनुतापी पूर्ण जो स्वयें होय॥ १४॥ तेणें आचार्य उपास्ती। लाहोनि ज्ञानखड्गाची प्राप्ती। गुरुवाक्यसाहणेप्रती। सतेजद्युती खड्ग केलें॥ १५॥ भववृक्षाचा समूळ कंद। देहाभिमान अतिसुबद्ध। अद्वैतसाधनें साधक शुद्ध। तेणें समूळ छेद करावा॥ १६॥ एवं छेदूनि देहाभिमान। उरलेनि आयुष्यें जाण। मही विचरती सज्जन। निरभिमान निजनिष्ठा॥ १७॥ तेथ इच्छा निंदा द्वेष तृष्णा। सर्वथा नातळे पैं जाणा। मनचि मुकलें मनपणा। इच्छादि तृष्णा तेथ कैंची॥ १८॥ ॥आशंका॥ समूळ संसार निर्दळण। करी ऐसें तें ज्ञान कोण। त्या ज्ञानासी कोण साधन। साधल्या ज्ञान फल काय॥ १९॥ याचें समूळ श्रवण। उद्धवाचें वांछी मन। तें जाणोनियां श्रीकृष्ण। स्वयें निरूपण सांगत॥ २२०॥
ज्ञानं विवेको निगमस्तपश्च
प्रत्यक्षमैतिह्यमथानुमानम्।
आद्यन्तयोरस्य यदेव केवलं
कालश्च हेतुश्च तदेव मध्ये॥ १८॥
नित्यानित्यविवेक। या नांव ‘ज्ञान’ चोख। देह द्वयाचा प्रकाशक। आत्मा सम्यक जाणती ज्ञाते॥ २१॥ सेवावया स्वादरस-नव्हाळी। प्रथम उंसाचीं पानें साळी। मग ऊंस तोही बळें पिळी। तोही रस आळी तैं शर्करा लाभे॥ २२॥ तेही शर्करा परिपाकबळें। तैं साखरचि केवळें। केळें आणि नारेळें। करिती नाना फळें मूळींच्या गोडॺा॥ २३॥ तेवीं स्थूळाचें निराकरण। लिंगदेहाचें उपमर्दन। अहंकाराचें निर्दळण। करूनि पूर्ण ब्रह्म पावती ज्ञाते॥ २४॥ तें ब्रह्म निर्गुण निराकार। तद्रूपें देखती चराचर। यापरी विवेकचतुर। वस्तूचा निर्धार जाणती॥ २५॥ यापरी गा विचक्षण। जाणती वस्तूचें लक्षण। या नांव पैं ‘विवेकज्ञान’। उद्धवा जाण निश्चित॥ २६॥ वस्तु नि:शब्द निर्गुण। तेथ जें श्रुतीचें स्फुरण। इत्थंभूत शब्दज्ञान। वेद तो जाण निगम माझा॥ २७॥ तो मी वेदरूप नारायण। यालागीं वेदवचन प्रमाण। श्रुत्यर्थ शब्दज्ञान। करी पावन पाठकां॥ २८॥ जाणावया निजात्मस्वरूप। देहादि विषयांचा अनुताप। जेणें साधक होती निष्पाप। या नांव ‘तप’ उद्धवा॥ २९॥ अनुतापें दमितां मन। होय पापाचें क्षालन। तेव्हां श्रुत्यर्थें आपण। कल्पी ‘अनुमान’ वस्तूचें॥ २३०॥ देह जड मूढ अचेतन। तेथ चेतनात्मक नारायण। देहाचें मानूनि मिथ्यापण। अद्वैतीं मन मुसावे॥ ३१॥ तें अद्वैतप्राप्तीचें लक्षण। अनन्यभावें आपण। सद्गुरूसी रिघावें शरण। निरभिमान भावार्थें॥ ३२॥ सद्भावें अनन्यशरण। तो गुरुकृपा पावे आपण। पाहोनि अधिकार लक्षण। गुरु गुह्यज्ञान उपदेशी॥ ३३॥ ‘सर्वही निष्टंक परब्रह्म’। हें श्रुतिगुह्य उत्तमोत्तम। एथ भाग्यें जो सभाग्य परम। त्यासचि सुगम ठसावे॥ ३४॥ गुरुवचन पडतां कानीं। वृत्ति निजात्म समाधानीं। विनटोनि ठेली चिद्घनीं। सुखसमाधानीं स्वानंदें॥ ३५॥ तयासी पुढतीं साधन। अथवा कर्माचें कर्माचरण। तेथ बोलों शके कोण। वेदीं मौन घेतलें॥ ३६॥ जेथ द्वंद्वाची निमाली स्फूर्ती। सकळ दु:खांची समाप्ती। देहीं विदेह वस्तु प्राप्ती। ‘प्रत्यक्ष’ म्हणती या नांव॥ ३७॥ पुसूनियां विसराचा ठावो। आठवेंवीण नित्य आठवो। अखंड स्वरूपानुभवो। ‘प्रत्यक्ष’ पहा हो या नांव॥ ३८॥ मी आत्मा स्वानंदकंद। ऐसा अखंडत्वें परमानंद। ‘प्रत्यक्ष’ पदाचा हा निजबोध। स्वयें गोविंद बोलिला॥ ३९॥ हाचि बोध सभाग्याकडे। श्रवणमात्रें त्या आतुडे। एका मननें जोडे। एका सांपडे निदिध्यासें॥ २४०॥ एकासी तो प्रत्यगावृत्तीं। हा बोध ठसावे चित्तीं। एका माझिया अद्वैतभक्तीं। मी सगळा श्रीपति आतुडें॥ ४१॥ निजबोध साधावया पूर्ण। उद्धवा हें तों मुख्य साधन। एवंसाधलिया निजज्ञान। फळ कोण तें ऐक॥ ४२॥ जो मी सृष्टिआदि अनंतु। नित्यमुक्तत्वें अहेतु। तो मी भवमूळा मूळहेतु। सृष्टिसृजिता अच्युतु स्वलीला॥ ४३॥ तेथ रजोगुणाचिये स्थिती। स्रष्ट्ट रूपें मीचि पुढतीं। अद्वैतीं दावीं अनेक व्यक्ती। सृष्टि उत्पत्ति कर्ता तो मी॥ ४४॥ जैसें मूळेंविण सफळ झाड। वाढविलें निजांगीं गोड। तेवीं सृष्टिसंरक्षणीं कोड। मज निचाडा चाड प्रतिपालनीं॥ ४५॥ बुद्धिबळें एका काष्ठाचे पोटीं। तेथ राजा प्रधान पशु प्यादा उठी। त्यांसी पूर्वकर्म नाहीं गांठीं। तेवीं निष्कर्में सृष्टिप्रकाशिता तो मी॥ ४६॥ निष्कर्में जग समस्त। सृजिता मीमांसकमत। ठकोनि ठेलें निश्चित। जग सदोदित निष्कर्मब्रह्म॥ ४७॥ जेवीं बुद्धिबळांचा खेळ। अचेतनीं युद्ध प्रबळ। तेवीं लोकरक्षणीं कळवळ। सृष्टिप्रतिपाळ मी कर्ता॥ ४८॥ प्रकृतीच्या जडमूढ सारी। पुरुषाचेनि सचेतन निर्धारीं। काळफांसे घेऊनि करीं। खेळविता चराचरीं मी एक विष्णु॥ ४९॥ तेथ अचेतना झुंजारीं। न मरत्या महामारीं। एका जैत एक हारी। उभयपक्षांतरीं खेळविता मी॥ २५०॥ सोंगटीं निमालियापाठीं। कवण पुण्यात्मा चढे वैकुंठीं। कोण पडे नरक संकटीं। तैसा जाण सृष्टीं बंधमोक्ष॥ ५१॥ तेवीं न मोडतां एकलेपण। त्या खेळाच्या ऐसें जाण। जगाचें करीं मी पालन। दुजेंपण नातळतां॥ ५२॥ दोराचा सर्पाकार। सबळ बळें मारी वीर। तैसा सृष्टीसी संहार। मी प्रळयरुद्र पैं कर्ता॥ ५३॥ स्वप्नीं भासलें जग संपूर्ण। तेथूनि जागा होतां आपण। स्वप्न निर्दळितां कष्ट कोण। तैसा मी जाण प्रळयकर्ता॥ ५४॥ सृष्टीसी उत्पत्ति स्थिति निदान। आत्मा आत्मत्वें अखंड पूर्ण। तेंचि स्वरूप सज्ञान। स्वानुभवें आपण होऊनि ठेलें॥ ५५॥ तें निजरूप झालों म्हणणें। हेंही बोलणें लाजिरवाणें। तें स्वयंभ असतां ब्रह्मपणें। होणें न होणें भ्रममात्र॥ ५६॥ मिथ्या दोराचा सर्पाकार। भासतां तो असे दोर। निवर्तल्या सर्पभरभार। दोर तो दोर दोररूपें॥ ५७॥ तेवीं सृष्टीसी उत्पत्ति होतां। आत्मा जन्मेना तत्त्वतां। सृष्टीचा प्रतिपाळकर्ता। आत्मा सर्वथा वाढेना॥ ५८॥ सृष्टीसी महाप्रळय होतां। आत्मा नायके प्रळयवार्ता। उत्पत्तिस्थितिनिदानता। आत्मा तत्त्वतां अविकारी॥ ५९॥ एवं साधनीं साधूनि ज्ञान। साधक झाले सज्ञान। तें अबाधित ब्रह्म पूर्ण। स्वयें आपण होऊनि ठेले॥ २६०॥ अज अव्यय स्वानंदघन। साधक झाले ब्रह्म पूर्ण। हें ज्ञानाचें फळ संपूर्ण। उद्धवा जाण निश्चित॥ ६१॥ हें ज्ञानफळ आलिया हाता। उत्पत्ति स्थिति प्रळय होतां। अखंड परिपूर्ण निजात्मता। ते सदृष्टांता हरि सांगे॥ ६२॥
यथा हिरण्यं स्वकृतं पुरस्तात्
पश्चाच्च सर्वस्य हिरण्मयस्य।
तदेव मध्ये व्यवहार्यमाणं
नानापदेशैरहमस्य तद्वत्॥ १९॥
मुकुट कुंडलें कर कंकणें। न घडितां सोनें सोनेपणें। त्याचीं करितां नाना भूषणें। लेणेंपणें उणें नव्हेचि हेम॥ ६३॥ ते न मोडतां अळंकार ठसे। सोनें अविकार संचलें असे। तेवीं उत्पत्तिस्थितिविनाशें। माझें स्वरूप चिदंशें अविनाशी॥ ६४॥ माझें स्वरूप शुद्ध परब्रह्म। तेथ नाना रूप नाना नाम। भासतांही जग विषम। ब्रह्मसम समसाम्यें॥ ६५॥ जेवीं सूर्याचे किरण। सूर्यावेगळे नव्हती जाण। तेवीं जग मजशीं अभिन्न। तेंचि निरूपण हरि सांगे॥ ६६॥
विज्ञानमेतत्त्रियवस्थमङ्ग
गुणत्रयं कारणकार्यकर्तृ।
समन्वयेन व्यतिरेकतश्च
येनैव तुर्येण तदेव सत्यम्॥ २०॥
सत्त्वगुणें जागरण। रजोगुणें दिसे स्वप्न। तमोगुणें सुषुप्ति जाण। लागे संपूर्ण गाढ मूढ॥ ६७॥ ऐसें तिहीं अवस्थायुक्त मन। कार्य कर्तृत्व कारण। त्रिविध जग भासे संपूर्ण। ब्रह्म समन्वयें जाण सदोदित॥ ६८॥ मृत्तिके वेगळा घट न दिसे। तंतू वेगळा पट न प्रकाशे। तेवीं मज वेगळें जग नसें। जें जें भासे तें मद्रूप॥ ६९॥ जो मी तिनी गुणांतें नातळता। अवस्थात्रयातें नाकळता। तिंहीअवस्थांतें प्रकाशिता। तो मी चवथा जाण ‘तुरीय’॥ २७०॥ तिन्ही अवस्था तिन्ही गुण। दृश्य द्रष्टा आणि दर्शन। त्रिपुटीप्रकाशिता पूर्ण। ती मी चवथा जाण ‘तुरीय’॥ ७१॥ जो मी तुरीय सच्चिद्घन। त्या माझ्या ठायीं अवस्थागुण। नभीं नीळिमा मिथ्या भान। तैसे नसते जाण भासती॥ ७२॥॥ आशंका॥ ‘तिंही अवस्थांचें ज्ञान पाहीं। देखिजे समस्तांच्या ठायीं। चवथें ज्ञान ‘तुरीय’ कांहीं। ऐकिलें नाहीं गोविंदा’॥ ७३॥ चौथें ज्ञान तुरीयावस्था। मिथ्या म्हणसी न विचारतां। तेचिविखीं विशदार्था। श्रीकृष्ण तत्त्वतां सांगत॥ ७४॥॥ ‘व्यतिरेकतश्च’॥ देहादिप्रपंचव्यतिरेकता। भूतीं भूतांचा लयो पाहतां। लीन झालिया गुणावस्था। उरे मी चवथा ‘तुरीय’॥ ७५॥ तें एवंविध बोलों जातां। वेदीं मूग आरोगिले सर्वथा। हें अनुभवैकवेद्य तत्त्वतां। शब्दप्रगल्भता सरेना॥ ७६॥ एथ न चले युक्तिप्रयुक्ती। न चले जाणिवेची व्युत्पत्ती। न चले लक्ष्यलक्षणस्थिति। गुरुकृपाप्राप्ती ‘तुरीय’॥ ७७॥ जागृत्यादि सर्वही सत्ता। सुषुप्ति सर्वही असतां। याचा ‘तुरीय’ मी प्रकाशिता। मजविण सर्वथा त्या भासती केवीं॥ ७८॥ जो सुषुप्तीं साक्षित्व पावता। तो मी ‘तुरीय’ जाण पां चौथा। त्या मज सत्यस्वरूपता। केला निश्चितार्था निश्चयो वेदें॥ ७९॥ त्या स्वरूपावेगळें एथ। जें भासे तें मिथ्याभूत। तेचि अर्थीं श्रीकृष्णनाथ। असे सांगत निजबोधें॥ २८०॥
न यत् पुरस्तादुत यन्न पश्चा-
न्मध्ये च तन्न व्यपदेशमात्रम्।
भूतं प्रसिद्धं च परेण यद् यत्
तदेव तत् स्यादिति मे मनीषा॥ २१॥
जागृतीमाजीं जें जें दिसे। तें तें जागृतीसवें नासे। स्वप्नीं जें जें आभासे। तें स्वप्नासरिसें मावळे॥ ८१॥ जागृती स्वप्न निकार्येंसीं। दोनी हारपती सुषुप्तीपाशीं। सुषुप्ति हारपे जागृतीसीं। यापरी प्रपंचासी सत्यत्व नाहीं॥ ८२॥ प्रपंच सृष्टीपूर्वीं नाहीं। प्रळयानंतर नुरेचि कांहीं। मध्येंचि आभासे जें कांहीं। तें मिथ्या पाहीं असंत॥ ८३॥ प्रपंचाचें वोडंबर। नामरूपाचे उभारी भार। तें प्रत्यक्ष देखों नश्वर। गंधर्वनगर तत्प्राय॥ ८४॥ पित्यादेखतां पुत्र मरे। पुत्रादेखतां पिता झुरे। काळें काळ अवघेंचि सरे। कोणीही नुरे क्रियेसी॥ ८५॥ सागरीं जे लहरी उसासे। उसासली ते स्वयेंचि नासे। तेवीं नामरूपा आलें दिसे। तें अनायासें नश्वर॥ ८६॥ प्रपंच हें नाममात्र। येरवीं परमात्मा मी स्वतंत्र। एवं संसाराचें जन्मपत्र। नेणोनि दुस्तर मानिती जीव॥ ८७॥ प्रपंच ज्यापासूनि झाला। जेणें सर्वार्थीं प्रकाशिला। अंतीं ज्यामाजीं सामावला। तो तद्रूप संचला निजात्मा॥ ८८॥ शुक्तिकारजतन्यायें जाण। प्रपंच ब्रह्मेंसीं अभिन्न। जें प्रपंचाचें स्फुरे स्फुरण। तें ब्रह्मचि पूर्ण उद्धवा॥ ८९॥ त्या माझेनि सत्य श्रुतिस्मृती। तो मी सत्यप्रतिज्ञ श्रीपती। त्रिसत्य सत्य तुजप्रती। सांगितला निश्चितीं निजभावार्थ॥ २९०॥ ऐकोन देवाचें वचन। उद्धव आशंकी आपण। एकाचेनि मतें जाण। प्रपंच भिन्न मानिती॥ ९१॥ प्रपंचासी देवो कांहीं। निजांगीं आतळता नाहीं। ऐसें तूं कल्पिसी कांहीं। ऐक ते विषयीं सांगेन॥ ९२॥
अविद्यमानोऽप्यवभासते यो
वैकारिको राजससर्ग एष:।
ब्रह्म स्वयंज्योतिरतो विभाति
ब्रह्मेन्द्रियार्थात्मविकारचित्रम्॥ २२॥
मुख्यत्वें मन विकारी पूर्ण। त्यासी मिळूनि तिनी गुण। नसताचि संसार जाण। विचित्रा भरण दाखवी॥ ९३॥ मन बुद्धि चित्त अहंकार। आणि अधिष्ठाते सुरवर। हे सत्त्वगुणाचे विकार। जाण साचार उद्धवा॥ ९४॥ रजोगुणाचीं दशेंद्रियें। पंचभूतें पंचविषये। तमोगुणिया जन्म होये। ते जनासी पाहें भुलविती॥ ९५॥ जेवीं वोडंबरियाचा खेळ। नसताचि भासे प्रबळ। तेवीं त्रिगुणांचें विचित्र जाळ। मिथ्या निर्मूळ आभासे॥ ९६॥ ब्रह्म स्वयें अकारण। स्वप्रकाशें प्रकाशमान। तेंचि प्रपंचाचें महाकारण। प्रकाशक जाण स्वयें झालें॥ ९७॥ जेवीं छायामंडपींच्या नाना व्यक्ती। तद्रूप भासे दीपदीप्तीं। तेवीं जगदाकारें स्वयंज्योती। भासें मी चिन्मूर्ति परमात्मा॥ ९८॥ एवं प्रपंचाचें जें स्फुरण। तें स्वप्रकाश ब्रह्म पूर्ण। हें हातवसूनि ब्रह्मज्ञान। विकल्पच्छेदन हरि सांगे॥ ९९॥
एवं स्फुटं ब्रह्म विवेकहेतुभि:
परापवादेन विशारदेन।
छित्त्वाऽऽत्मसन्देहमुपारमेत
स्वानन्दतुष्टोऽखिलकामुकेभ्य:॥ २३॥
पूर्वीं बोलिलों यथानिगुती। ब्रह्मज्ञान नानायुक्तीं। ते करतलामलकस्थिती। प्रकट प्रतीती प्रमाण॥ ३००॥ वेद-विवेक-अनुमान। ब्रह्मउपदेशाचें लक्षण। ज्ञानाज्ञानाचें फळ पूर्ण। तुज म्यां संपूर्ण सांगितलें॥ १॥ तेथें देहेंद्रियांचें मिथ्यापण। देहात्मभावाचें निराकरण। ब्रह्म अद्वयत्वें परिपूर्ण। तेंही गुह्य ज्ञान प्रकाशिलें॥ २॥ म्यां प्रकाशिलें पूर्ण ज्ञान। जें दुर्लभ दुर्गम दुष्प्राप्यजाण। हेंचि सिद्धांचें समाधान। हेंचि साधन साधकां॥ ३॥ जें म्यां सांगितलें ब्रह्मज्ञान। हेंचि उपदेशशस्त्र तीक्ष्ण। साधक साधूनियां पूर्ण। संशय जाण छेदिती॥ ४॥ म्यां सांगितलें ब्रह्मज्ञान। तेथ संदेह मानी मन। तेणें संदेहेंसीं देहाभिमान। येणें शस्त्रें जाण छेदिती॥ ५॥ यापरी संदेहच्छेदन। करूनि द्वैताची बोळवण। निर्दाळूनियां मीतूंपण। स्वानंदीं निमग्न साधक॥ ६॥ वर्णाश्रम कुळ जाती। जीवशिवादि पदस्थिती। यांची स्फुरेना अहंकृती। या नांव ‘उपरति’ उद्धवा॥ ७॥ इहामूत्रादि फळें समस्तें। कोण कामी त्या कामातें। विषय विषयी विषयभोगातें। सर्वथा तेथें असेना॥ ८॥ यापरी नित्य निष्काम। साधक झाले ‘आत्माराम’। परमानंदीं निमग्न परम। पावले ‘उपरम’ येणें योगें॥ ९॥ देहेंद्रियें असतां प्राण। कैसेनि गेला देहाभिमान। उद्धवा ऐसें कल्पील मन। तेंचि निरूपण हरि सांगे॥ ३१०॥
नात्मा वपु: पार्थिवमिन्द्रियाणि देवा ह्यसुर्वायुजलं हुताश:।
मनोऽन्नमात्रं धिषणा च सत्त्व-
महङ्कृति: खं क्षितिरर्थसाम्यम्॥ २४॥
देह आत्मा नव्हे पार्थिवपणें। इंद्रियें आत्मा नव्हतीं येणें गुणें। तीं तंव देहाचीं उपकरणें। एकदेशीपणें व्यापार॥ ११॥ इंद्रिय अधिष्ठाते देव। तेही आत्मा नव्हती सर्व। त्यांसी इंद्रियांचा अहंभाव। आत्मपदीं ठाव त्यां कैंचा॥ १२॥ देह चाळिता जो प्राण। तोही आत्मा नव्हे जाण। प्राण केवळ अज्ञान। करी गमनागमन देहवशें॥ १३॥ प्राण जरी आत्मा होता। तरी तो देहासवें न वचता। यालागीं प्राणासी निजात्मता। जाण सर्वथा घडेना॥ १४॥ आत्मा पृथ्वी नव्हे जडपणें। जळ नव्हे द्रवत्वगुणें। अग्नि नव्हे दाहकपणें। चंचळपणें नव्हे वायु॥ १५॥ आत्मा नभ नव्हे शून्यपणें। मन नव्हे संकल्पगुणें। अंत:करण नव्हे नश्वर लक्षणें। चित्त चिंतनें नव्हे आत्मा॥ १६॥ आत्मा नव्हे अभिमान। त्यासी सुखदु:खांचें बंधन। बुद्धि आत्मा नव्हे जाण। बोधकपण ती माजीं॥ १७॥ आत्मा नव्हे तिनी गुण। गुणांमाजीं विकार पूर्ण। महत्तत्त्व गुणांचें कारण। तें आत्मा आपण कदा नव्हे॥ १८॥ प्रकृति जे गुणसाम्यावस्था। तेही आत्मा नव्हे तत्त्वतां। आत्मदृष्टीं प्रकृति पाहतां। मिथ्या तत्त्वतां ते होय॥ १९॥ जेथ मूळप्रकृतिच वावो। तेथ प्रकृतिकार्यां कैंचा ठावो। यापरी आत्मानुभवो। नि:संदेहो भोगिती॥ ३२०॥ यापरी साधूनियां ज्ञान। साधकीं छेदिला देहाभिमान। ऐसे होऊनियां निरभिमान। सदा सुखसंपन्न साधक॥ २१॥ एवं जे नित्य निरभिमान। त्यांसी प्रारब्धें विषयसेवन। करितां न बाधी दोषगुण। तेंचि निरूपण हरि सांगे॥ २२॥
समाहितै: क: करणैर्गुणात्मभि-
र्गुणो भवेन्मत्सुविविक्तधाम्न:।
विक्षिप्यमाणैरुत किं न दूषणं
घनैरुपेतैर्विगतै रवे: किम्॥ २५॥
देहेंद्रियावेगळा पाहीं। अपरोक्ष आत्मा जाणितला जिंहीं। त्यांसी इंद्रियनेमें लाभ कायी। विक्षेपें नाहीं हानी त्यांसी॥ २३॥ दोराचा साप खिळोनि मंत्रीं। मंत्रवादी नि:शंक धरी। नखिळितां जो धरी करीं। त्यासीही न करी बाधा तो॥ २४॥ जो मृगजळीं पोहोनि गेला। तो दैवाचा कडे पडिला। पोहेचि ना तो नाहीं बुडाला। कोरडा आला ऐलतीरा॥ २५॥ तेवीं देहेंद्रियांचें मिथ्याभान। जाणोनि झाले ते सज्ञान। त्यांसी इंद्रियांचें बंधन। सर्वथा जाण अनुपेगी॥ २६॥ जयासी माझें अपरोक्ष ज्ञान। तेणें घालोनियां आसन। अखंड धरितां ध्यान। अधिक उपेग जाण असेना॥ २७॥ जेवीं मी लीलाविग्रहधारी। तेवीं तेही वर्ततां शरीरीं। ते इंद्रियकर्मावारीं। भवसागरीं न बुडती॥ २८॥ अथवा तो इंद्रियसंगतीं। दैवें अनेक विषयप्राप्ती। भोगितांही अहोरातीं। ब्रह्मस्थिति भंगेना॥ २९॥ स्थिति न भंगावया हेंचि कारण। माझें स्वप्रकाश स्वानंदघन। पावले निजधाम ब्रह्म पूर्ण। तेथ विषयस्फुरण बाधीना॥ ३३०॥ जेवीं सूर्य उगवोनि गगनीं। लोक सोडवी निद्रेपासूनी। ते लोक कर्मीं प्रवर्तवोनी। अलिप्त दिनमणि जनकर्मा॥ ३१॥ तेवीं मी परमात्मा स्वयंज्योती। प्रभा प्रकाशीं त्रिजगतीं। त्या जनकर्मांच्या क्रियाशक्ती। मी अलिप्त निश्चितीं निजात्मा॥ ३२॥ मुक्तासी स्त्रीपुत्रगृहसंग। तेणें वेष्टला दिसे चांग। म्हणसी केवीं मानूं नि:संग। तें सांगे श्रीरंग रविदृष्टांतें॥ ३३॥
घनैरुपेतैर्विगतै रवे: किम्॥
उंच लक्षयोजनें रविमंडळ। बारा योजनें मेघपडळ। तेणें सूर्य झांकोळिला केवळ। लोकसकळ मानिती॥ ३४॥ परी सूर्य आणि आभाळासी। भेटी नाहीं कल्पांतेंसीं। तेवीं इंद्रियकर्म सज्ञानासी। कदाकाळेंसीं स्पर्शेना॥ ३५॥ अभ्र आच्छादी जगाचे डोळे। जग म्हणे सूर्य आच्छादिला आभाळें। ऐसेंचि विपरीत ज्ञान कळे। मायामेळें भ्रांतासी॥ ३६॥ तें अभ्र आल्या गेल्यापाठीं। सूर्यासी न पडे आठीवेठी। तेवीं गृहदारा संगासाठीं। न पडे संकटीं सज्ञान॥ ३७॥ जेवीं सूर्यातें नातळे आभाळ। तेवीं ज्ञात्यासी संग सकळ। इंद्रियकर्मांचा विटाळ। ज्ञात्यासी अळुमाळ लागेना॥ ३८॥ ऐक त्या ज्ञात्याचें रूप परम। तो देहीं असोनि परब्रह्म। यालागीं त्यासी इंद्रियकर्म। समविषम बाधीना॥ ३९॥ ज्ञाता सर्वार्थीं अलिप्त। तेंचि करावया सुनिश्चित। आकाश दृष्टांतें श्रीकृष्णनाथ। स्वयें सांगत साक्षेपें॥ ३४०॥
यथा नभो वाय्वनलाम्बुभूगुणै-
र्गतागतैर्वर्तुगुणैर्न सज्जाते।
तथाक्षरं सत्त्वरजस्तमोमलै-
रहंमते: संसृतिहेतुभि: परम्॥ २६॥
पृथ्वी जळ अनळ अनिळ। त्यांसी नभ व्यापक सकळ। परी पृथ्व्यादिकांचा मळ। नभासी अळुमाळ लागेना॥ ४१॥ नभ पृथ्वीरजें कदा न मैळे। धुरकटेना धूमकल्लोळें। अग्नीचेनि महाज्वाळें। कदाकाळें जळेना॥ ४२॥ वायूचेनि अतिझडाडें। आकाश कदाकाळें न उडे। उदकाचेनि अतिचढें। आकाश न बुडे सर्वथा॥ ४३॥ कां सूर्याचे निदाघकिरणीं। नभ घामेजेना उन्हाळेनी। अथवा हिमाचिया हिमकणीं। नभ कांकडोनी हिंवेना॥ ४४॥ पर्जन्य वर्षतां प्रबळ। नभ वोलें नव्हे अळुमाळ। यापरी नभ निर्मळ। लावितांही मळ लागेना॥ ४५॥ त्या आकाशासी अलिप्त। जें क्षराक्षराही अतीत। तें अक्षर परब्रह्म सदोदित। त्रिगुणातीत चिन्मात्र॥ ४६॥ जें अजरामर अविनाशी। जें प्रकाशमान स्वप्रकाशीं। ऐसिये वस्तूची प्राप्ती ज्यासी। अद्वयत्वेंसी फावली॥ ४७॥ जेवीं न मोडितां लागवेगें। सोनटका सोनें झाला सर्वांगें। तेवीं करणीवीण येणें योगें। जे झाले निजांगें परब्रह्म॥ ४८॥ त्यांसी गुणांची त्रिगुण मागी। लावितांही न लगे अंगीं। विषयी करितां विषयभोगीं। ते विषयसंगीं नि:संग॥ ४९॥ घटी चंद्रबिंब दिसे। तें घटासी स्पर्शेलें नसे॥ ओलें नव्हे जळरसें। देहीं जीव असे अलिप्त तैसा॥ ३५०॥ ते घटी कालविल्या शेण। बिंबप्रतिबिंबां नातळे जाण। तेवीं देहींचें पापाचरण। जीवशिवस्थान ठाकीना॥ ५१॥ घटीं कालविल्या कस्तूरी। बिंबप्रतिबिंब सुवास न धरी। तेवीं देहींच्या पापपुण्याची थोरी। जीवशिवावरी पावेना॥ ५२॥ आकाश जळावयालागीं। घृतें पेटविली महाआगी। आकाश असतां अग्निसंगीं। दाहो अंगीं लागेना॥ ५३॥ आकाश असोनि अग्निमेळें। अग्निज्वाळे कदा न जळे। तेवीं ज्ञाता विषयकल्लोळें। कदा काळें विषयी नव्हे॥ ५४॥ गुणांचेनि देहसंगें। योगी वर्ततां येणें योगें। ते भोगतांही विषयभोगें। अलिप्त सर्वांगें सर्वदा॥ ५५॥ हे कळलें ज्यां भोगवर्म। ते देहीं असोन परब्रह्म। त्यांसी बाधीना भोगभ्रम। अक्षर परम स्वयें झाले॥ ५६॥ ते अक्षर झाले आतां। याही बोलासी ये लघुता। जन ज्ञानीं अज्ञानीं वर्ततां। अक्षरता अभंग॥ ५७॥ ते विसरोनि ब्रह्मरूपता। मी देही म्हणवी देह अहंता। तेथें वाढली विषयावस्था। दृढ बद्धता तेणें झाली॥ ५८॥ ते निवारावया बद्धता। त्यजावी विषयलोलुपता। विषयत्यागेंवीण सर्वथा। नित्यमुक्तता घडे ना॥ ५९॥ न जोडतां नित्यमुक्तता। साधक जरी झाला ज्ञाता। तरी तेणें ज्ञातेपणें सर्वथा। विषयासक्तता न करावी॥ ३६०॥
तथापि सङ्ग: परिवर्जनीयो
गुणेषु मायारचितेषु तावत्।
मद्भक्तियोगेन दृढेन यावद्
रजो निरस्येत मन:कषाय:॥ २७॥
स्वरवर्णयुक्त संपूर्ण। चहूं वेदीं झाला निपुण। तेणें बळें विषयाचरण। करितां दारुण बाधक॥ ६१॥ सकळ शास्त्रांचें श्रवण। करतळामलक झाल्या पूर्ण। शब्दज्ञानाचें जें मुक्तपण। तेणेंही विषयाचरण बाधक॥ ६२॥ प्राणापानांचिया समता॥ जरी काळवंचना आली हाता। तरी विषयांची विषयावस्था। जाण सर्वथा बाधक॥ ६३॥ शापानुग्रहसमर्थ नर। आम्ही ज्ञाते मानूनि थोर। त्यांसही विषयसंचार। होय अपार बाधक॥ ६४॥ आसन उडविती योगबळें। दाविती नाना सिद्धींचे सोहळे। त्यांसही विषयांचे भोगलळे। होती निजबळें बाधक॥ ६५॥ इतरांची कोण कथा। मंत्रें मंत्रमूर्ति प्रसन्न असतां। त्यासीही विषयावस्था। जाण सर्वथा बाधक॥ ६६॥ किंचित् झाल्या स्वरूपप्राप्ती। ‘मी मुक्त’ हे स्फुरे स्फूर्ती। तथापि विषयांची संगती। त्यासीही निश्चितीं बाधक॥ ६७॥ अभिमानाचें निर्दळण। स्वयें करूनियां आपण। नित्यमुक्त नव्हतां जाण। विषयाचरण बाधक॥ ६८॥ जेवीं चकमकेची आगी। जाळूं न शके नाटेलागीं। तेवीं ब्रह्मप्राप्ती प्रथमरंगीं। प्रपंचसंगीं विनाशे॥ ६९॥ विषय मिथ्या मायिक। ते भोगीं जंव भासे हरिख। तंववरी विषय बाधक। जाण निष्टंक उद्धवा॥ ३७०॥ तें त्यागावया विषयसेवन। निर्दाळावा देहाभिमान। याचिया लागीं माझें भजन। साक्षेपें जाण करावें॥ ७१॥ व्रत तप तीर्थ दान। करितां योग याग यजन। वेदशास्त्र पुराणश्रवण। तेणें देहाभिमान ढळेना॥ ७२॥ भावें करितां माझें भजन। समूळ सुटे देहाभिमान। भक्ति उत्तमोत्तम साधन। भक्ती आधीन परब्रह्म॥ ७३॥ ज्ञान वैराग्य निवृत्ती। धृति शांति ब्रह्मस्थिती। यांची जननी माझी भक्ती। जाण निश्चितीं उद्धवा॥ ७४॥ चहूं मुक्तींहूनि वरती। उल्हासें नांदे माझी भक्ती। माझे भक्तीची अनिवार शक्ती। तिसी मी निश्चितीं आकळलों॥ ७५॥ माझें स्वरूप अनंत अपार। तो मी भक्तीनें आकळलों साचार। यालागीं निजभक्तांचें द्वार। मी निरंतर सेवितसें॥ ७६॥ भक्तीनें आकळलों जाण। यालागीं मी भक्ताअधीन। माझिये भक्तीचें महिमान। मजही संपूर्ण कळेना॥ ७७॥ बहुतीं करूनि माझी भक्ती। मज ते मोक्षचि मागती। उपेक्षूनि चारी मुक्ती। करी मद्भक्ती तो धन्य॥ ७८॥ ऐशी जेथ माझी भक्ती। तेथ पायां लागती चारी मुक्ती। त्यासी सर्वस्वें मी श्रीपती। विकिलों निश्चितीं भावार्थें॥ ७९॥ ते भक्तीच मुख्य ज्यास साधन। यालागीं मी त्या भक्ताअधीन। त्याचें कदाकाळें वचन। मी अणुप्रमाण नुल्लंघीं॥ ३८०॥ ते मज म्हणती होईं सगुण। तैं मी सिंह सूकर होय आपण। त्यांलागीं मी विदेही जाण। होय संपूर्ण देहधारी॥ ८१॥ एका अंबरीषाकारणें। दहा जन्म म्यां सोसणें। अजत्वाचा भंग साहणें। परी भक्तांसी उणें येऊं नेदीं॥ ८२॥ द्रौपदी नग्न करितां तांतडी। तिळभरी हों नेदींच उघडी। झालों नेसविता वस्त्रें कोडी। भक्त सांकडीं मी निवारीं॥ ८३॥ तो मी भक्त साहाकारी। अजन्मा त्यांचेनि जन्म धरीं। समही वर्तें अरिमित्रीं। भक्तकैवारी होऊनियां॥ ८४॥ जो माझिया भक्तां हितकारी। तो मज परम मित्र संसारीं। जो माझ्या भक्तांसी वैर करी। तो मी नानापरी निर्दळीं॥ ८५॥ ऐसा मी भक्तसाह्य श्रीकृष्ण। त्या माझें निजभजन। न करूनियां अभाग्य जन। अध:पतन पावती॥ ८६॥ म्हणशी ‘पाप असतां शरीरीं। तुझें भजन घडे कैशा परी’। सकळ पापांची बोहरी। माझें नाम करी निमेषार्धें॥ ८७॥ ऐकोनि नामाचा गजर। पळे महापातकांचा संभार। नामापाशीं महापापासी थार। अणुमात्र असेना॥ ८८॥ माझिया निजनामापुढें। सकळ पाप तत्काळ उडे। तें पाप नामस्मरत्याकडे। केवीं बापुडें येऊं शके॥ ८९॥ अवचटें सूर्य अंधारीं बुडे। तरी पाप न ये भक्तांकडे। भक्तचरणरेणु जेथ पडे। तेथ समूळ उडे पापराशी॥ ३९०॥ माझें नाम ब्रह्मास्त्र जगीं। महापाप तें बापुडें मुंगी। नामापुढें उरावयालागीं। कस त्याचे अंगीं असेना॥ ९१॥ माझे नामाचा प्रताप ऐसा। मा माझे भक्तीची कोण दशा। पडलिया मद्भक्तीचा ठसा। तो नागवे सहसा कळिकाळा॥ ९२॥ यालागीं माझें भजन। निर्दळी देहाभिमान। माझे निजभजनेंवीण जाण। देहाभिमान तुटेना॥ ९३॥ जेणें तुटे देहाभिमान। तें कैसें म्हणशी तुझें भजन। अभेदभावें भक्ति पूर्ण। तेणें देहाभिमान निर्दळे॥ ९४॥ भगवद्भाव सर्वांभूतीं। या नांव गा ‘अभेदभक्ती’। हे आकळल्या भजनस्थिती। अहंकृती उरेना॥ ९५॥ माझें नाम ज्याचे वदनीं। माझी कीर्ति ज्याचे श्रवणीं। माझा भाव ज्याचे मनीं। ज्याचे करादिचरणीं क्रियामाझी॥ ९६॥ जो जागृतीमाजीं पाहे मातें। जो स्वप्नीं देखे मज एकातें। जो मजवेगळें चित्त रितें। न राखे निश्चितें निजनिष्ठा॥ ९७॥ यापरी भजनस्थितीं। त्रिगुण विकार मावळती। तेणें अहंकाराची निवृत्ती। विषयासक्ति निर्दळे॥ ९८॥ भक्तांसी विषयसेवन। सर्वथा बाधक नव्हे जाण। तो विषय करी मदर्पण। तेणें बाधकपण नव्हे त्यासी॥ ९९॥ नाना साधनें विषयो त्यागिती। त्यागितां परम दु:खी होती। भक्त विषयो भगवंतीं अर्पिती। तेणें होती नित्यमुक्त॥ ४००॥ ग्रासोग्रासीं हरिस्मरण। तैं अन्नचि होय परब्रह्म पूर्ण। त्यासी नाहीं बाधकपण। ब्रह्मार्पण सहजेंचि॥ १॥ भक्तांची भजनस्थिती। विषयीं मद्रूपता भाविती। तेणें मावळे विषयस्फूर्ती। नव्हे ती या रीतीं बाधक॥ २॥ यापरी माझें भजन। करी मनोमळ क्षाळण। विकारेंसीं तिन्ही गुण। करी निर्दळण देहाभिमान॥ ३॥ ऐशी न करितां माझी भक्ती। न निर्दाळितां अहंकृती। करणें जे विषयासक्ती। ते जाण निश्चितीं बाधक॥ ४॥ नातुडतां अकर्तात्मबोध। आदरूं नये विषयसंबंध। विषयांचा विषय उद्बोध। अतिअशुद्ध बाधक॥ ५॥ जरी विषय मिथ्या मायिक। तरी साधकां अतिबाधक। येचि अर्थीं यदुनायक। विशदार्थें देख सांगत॥ ६॥
यथाऽऽमयोऽसाधुचिकित्सितो नृणां
पुन: पुन: सन्तुदति प्ररोहन्।
एवं मनोऽपक्वकषायकर्म
कुयोगिनं विध्यति सर्वसङ्गम्॥ २८॥
वैद्य नेणे रोगाचें लक्षण। नेणे धातुपुष्ट कीं क्षीण। नेणे पथ्य ना अनुपान। नाडीज्ञान कळेना॥ ७॥ त्यापासाव वोखद घेतां। पुन: पुन: वाढे व्यथा। तेवीं अवैराग्यें त्याग करितां। साधकां बाधकता अनिवार॥ ८॥ हृदयीं नाहीं विषयनिवृत्ति। बाह्य त्यागें वाढवी विरक्ती। ऐशी जे बहिर्मुद्रास्थिती। ते जाण निश्चितीं ‘कुयोग’॥ ९॥ सांडोनियां भगवद्भजन। वेदविधि मार्गविहीन। ऐसें जें कां त्यागलक्षण। ‘कुयोग’ संपूर्ण त्या नांव॥ ४१०॥ द्रव्यदाराविषयासक्ती। दृढ वासना असतां चित्तीं। बाह्य त्याग मिथ्या विरक्ती। ‘कुयोग’ निश्चितीं या नांव॥ ११॥ आम्ही राजयोगी अतिश्रेष्ठ। म्हणोनि विषय भोगी यथेष्ट। वोस पडली वैराग्यपेंठ। ‘कुयोग’ चोखट या नांव॥ १२॥ आपली चोरूनि विषयासक्ती। बाह्य मिरवी मिथ्या विरक्ती। हेचि ‘कुयोगाची’ स्थिती। जाण निश्चितीं उद्धवा॥ १३॥ ऐशिया कुयोगियां जाण। पुढतीं जन्म पुढतीं मरण। दु:खावर्तीं पडिलेपूर्ण। सोडवी कोण तयांसी॥ १४॥ नव्हेचि इहलोकींचा विषयभोग। नव्हेचि परमार्थीं शुद्ध त्याग। अंतरला उभय प्रयोग। दु:खभाग कुयोग्या॥ १५॥ परमार्थें त्यागसाधन। करितां अंतराय आलें विघ्न। तयासी अवगती नव्हे जाण। जरी अनुताप पूर्ण स्वयें उपजे॥ १६॥
कुयोगिनो ये विहितान्तरायै-
र्मनुष्यभूतैस्त्रिदशोपसृष्टै:।
ते प्राक्तनाभ्यासबलेन भूयो
युञ्जन्ति योगं न तु कर्मतन्त्रम्॥ २९॥
ब्रह्मज्ञानार्थ केला त्याग। अभ्यासही मांडिला साङ्ग। मध्येंचि वोढवला उपसर्ग। विघ्नें अनेग साधकां॥ १७॥ उपजे कामाचा अतिवेग। खवळे क्रोधाची लगबग। शिष्यसुहृदांचे उद्वेग। मनीं उबग स्वहिताचा॥ १८॥ दारारूपें उपसर्ग। देव देती पैं अनेग। ऐसा अंतरायीं योगभंग। होतां अनुराग उद्धरी॥ १९॥ अभ्यास करितां अतिनिगुती। दैवें अंतराय योगा येती। तेथ निर्वेद उपजल्या चित्तीं। तोचि अभ्यास पुढतीं करी योगी॥ ४२०॥ निजयोग अभ्यासबळें। जाळी अंतरायदोष समूळें। परी कर्माचीं कर्मठ जाळें। योगी कदाकाळें स्पर्शेना॥ २१॥ अंतरायीं योग छळितां जाण। जरी योगी पावला मरण। तरी तो नव्हे कर्माधीन। हें श्लोकार्धे श्रीकृष्ण बोलिला स्वयें॥ २२॥ पूर्वीं करितां योगसाधन। अदृष्टगतीं अंतराय जाण। योगी पावल्याही मरण। गती कोण तयासी॥ २३॥ अंतरायपरतंत्र। झाल्या योगी पावे जन्ममात्र। तेथही नादरी कर्मतंत्र। पूर्वाभ्यासें स्वतंत्र प्रवर्ते योगी॥ २४॥ मार्गस्था मार्गीं गुंती। पडोनियां लागली वस्ती। तो येरे दिवसीं तेचि पंथीं। लागे निश्चितीं निजमार्गा॥ २५॥ यापरी योगिया आपण। प्राक्तनसंस्कारें जाण। योगाभ्यास करी पूर्ण। परी कर्माधीन कदा नव्हे॥ २६॥ साधनीं असतां माझी भक्ती। तैं अणुमात्र न पडे गुंती। मी भक्तकैवारी श्रीपती। राखें अहोरातीं निजभक्ता॥ २७॥ जेथ माझे भक्तीची आवडी। तेथ विघ्नें केवीं रिघतीं बापुडीं। महाविघ्नांचियाकोडी। माझें नाम विभांडी उद्धवा॥ २८॥ भजनहीन योगीश्वर। अंतरायें पावे जन्मांतर। तरी तो कर्मीं कर्मपर। नव्हे साचार पूर्वसंस्कारें॥ २९॥ ‘जे पावले जीव जीवन्मुक्ती। तेही प्रारब्धकर्में वर्तती। मा योगभ्रष्ट कर्म त्यागिती। घडे कैशा रीतीं’ म्हणशील॥ ४३०॥ मुक्ताचें जें मोक्षस्थान। तेंचि साधकाचें मुख्य साधन। यालागीं त्या दोघांही जाण। कर्मबंधन बाधीना॥ ३१॥ मी एक कर्मकर्ता। ऐशी ज्यास नुपजे अहंता। त्यासीही जाण सर्वथा। कर्मबंधकता स्पर्शेना॥ ३२॥
करोति कर्म क्रियते च जन्तु:
केनाप्यसौ चोदित आनिपातात्।
न तत्र विद्वान् प्रकृतौ स्थितोऽपि
निवृत्ततृष्ण: स्वसुखानुभूत्या॥ ३०॥
जन्मापासूनि मरणांत। प्राणी जें जें कर्म करित। तें तें कोणी एक प्राचीन एथ। असे वर्तवीत निजसत्ता॥ ३३॥ तेथ सज्ञान आणि अज्ञान। प्राचीन कर्में कर्माधीन। अज्ञानासी अहंकर्तेपण। ज्ञाते निरभिमान वर्तती कर्मीं॥ ३४॥ म्हणसी देहीं असतां प्राण। केवीं नुठी देहाभिमान। ज्ञाता स्वसुखानुभवें पूर्ण। अहंकर्तेपण त्या स्फुरेना॥ ३५॥ दोराचे सर्पाचा महाधाक। दोर जाणितल्या नुपजे देख। तेवीं अनुभविल्या ब्रह्मसुख। अहंता बाधक स्फुरेना॥ ३६॥ ऐक योगभ्रष्टाचें लक्षण। त्याचा प्राचीनसंस्कार जाण। उपजों नेदी देहाभिमान। योग संपूर्ण सिद्धॺर्थ॥ ३७॥ जें देहीं नित्य निरभिमान। तेचि ब्रह्मसुखें सदा संपन्न। त्यांसी देहींचें कर्माचरण। सर्वथा जाण बाधीना॥ ३८॥ ज्ञाता देहकर्मासी अलिप्त। हेंही अपूर्व नव्हे एथ। तो देही असोनि देहातीत। तेंचि श्रीकृष्णनाथ स्वयें सांगे॥ ३९॥
तिष्ठन्तमासीनमुत व्रजन्तं
शयानमुक्षन्तमदन्तमन्नम्।
स्वभावमन्यत् किमपीहमान-
मात्मानमात्मस्थमतिर्न वेद॥ ३१॥
देह उभें असतां जाण। ज्ञाता न देखे उभेंपण। मा बैसल्या बैसलेंपण। मानी कोण देहाचें॥ ४४०॥ परिपूर्ण ब्रह्माच्या ठायीं। उठणें बैसणें दोनी नाहीं। ज्ञाता तेंचि झाला पाहीं। उठबैस कांही जाणेना॥ ४१॥ दोराचा सर्प उपजला। भोग भोगूनि स्वयें निमाला। सत्यत्व नाहीं या बोला। तैसा देहो झाला मुक्तासी॥ ४२॥ देह दैवें असे एकदेशी। ज्ञाता सर्वीं देखे आपणासी। देह जातां परदेशासी। ज्ञाता गमन मानसीं देखेना॥ ४३॥ वस्तु वस्तुत्वें परिपूर्णपणें। तेथ कैंचें असे येणें जाणें। ज्ञाता सदा तद्रूपपणें। राहणें जाणें स्पर्शेना॥ ४४॥ ज्ञाता स्वयें रिघे शयनीं। परी शेजबाज न देखे अवनीं। मी निजेलों हेंही न मनी। निजीं निजरूपपणीं सर्वदा॥ ४५॥ ज्ञाता जेवूं बैसे निजसुखें। परी मी भुकेलों हें न देखे। रसने नेणतां सर्व रस चाखे। जेवी येणें सुखें निजगोडीं॥ ४६॥ दिसे यावत्तृप्त जेविला। परी तो धाला ना भुकेला। तो उच्छिष्टही नाहीं झाला। शेखीं आंचवला संसारा॥ ४७॥ जरी तो स्वभावें सांगे गोष्टी। तरी अबोलणें घाली शब्दापोटीं। बोलीं अतिरसाळगोडी उठी। तरी न सुटे मिठी मौनाची॥ ४८॥ मी एक चतुर बोलका। हाही नुठी त्या आवांका। बोल बोलों नेणो फिका। बोलोनि नेटका अबोलणा॥ ४९॥ ज्ञाता पाहे निजात्मसुखें। माझें तुझें हेंही वोळखे। परी तो डोळांचि न देखे। देखे आपणया सारिखें त्रैलोक्य॥ ४५०॥ तो जों दृश्य पाहों बैसे। तों दृश्याचा ठावोचि पुसे। जें देखे तें आपणया ऐसें। निजात्मसौरसें जग देखे॥ ५१॥ करूनि डोळॺांचा अंत। ज्ञाता देखणेपणें पाहत। त्या देखण्याचा निजस्वार्थ। न चढे हात वेदशास्त्रां॥ ५२॥ जाणे शब्दींचें शब्दज्ञान। मी श्रोता हे नुठी आठवण। उपेक्षूनियां देहींचे कान। करी श्रवण सर्वांगें॥ ५३॥ यापरी स्वयें सज्ञान। होऊनियां सावधान। सोलूनियां शब्दज्ञान। करी श्रवण स्वभावें॥ ५४॥ जाणे सुवास दुर्वास। भोगीं न धरी नाकाची आस। सुमना सबाह्य जो सुवास। तो भोगी सावकाश सर्वदा॥ ५५॥ मृदुकठिणादि स्पर्श जाणे। परी मी जाणतों हें स्फुरों नेणे। अंगा लागे तें निजांग करणें। हा स्पर्श भोगणें सज्ञानीं॥ ५६॥ ज्ञाता चालता दिसे चरणीं। परीतो चालतां स्वयें अचरणी। स्वेच्छा हिंडतांही अवनीं। तो ठायाहूनी ढळेना॥ ५७॥ हस्त व्यापारीं देतां दान। मी दाता ही नुठी आठवण। देतें घेतें दान होय आपण। यापरी सज्ञान वर्तवी करा॥ ५८॥ कायिक वाचिक मानसिक। कर्म निफजतां स्वाभाविक। ज्ञाता ब्रह्मरूपें निर्दोख। देहासी देख स्पर्शेना॥ ५९॥ अकर्तात्मनिजसत्ता। ज्ञाता सर्व कर्मीं वर्ततां। न देखे कर्म-क्रिया-कर्तव्यता। निजीं निजात्मता निजबोधें॥ ४६०॥ ज्ञाता नित्य निजात्मसुखें। देहीं असोनि देह न देखे। तो देहकर्मीं केवीं आडके। पूर्ण परमात्मसुखें संतुष्ट॥ ६१॥ जगासी लागलें कर्मबंधन। तेथें खातां जेवितां सज्ञान। केवीं न पवे कर्मबंधन। तेंचि निरूपण हरि सांगे॥ ६२॥
यदि स्म पश्यत्यसदिन्द्रियार्थं
नानानुमानेन विरुद्धमन्यत्।
न मन्यते वस्तुतया मनीषी
स्वाप्नं यथोत्थाय तिरोदधानम्॥ ३२॥
हो कां लौकिकाचे परी। ज्ञाता वर्ते लोकाचारीं। तोही प्रपंचामाझारीं। कर्में करी लौकिकें॥ ६३॥ परी कार्य-कर्म-कर्तव्यता। हे ज्ञात्यासी नाहीं अहंता। तेणें प्रपंचामाजीं निजात्मता। निश्चयें तत्त्वतां वश्य केली॥ ६४॥ विषयादि प्रपंचभान। सत्य मानिती अज्ञान। तो प्रपंच देखती सज्ञान। ब्रह्मपूर्ण पूर्णत्वें॥ ६५॥ साकरेचा इंद्रावणघडू। जाणा गोड नेणा कडू। तैसा प्रपंचाचा पडिपाडू। लाभ आणि नाडू ज्ञानाज्ञानें॥ ६६॥ सुवर्णाची खोटी। मूर्ख मानिती केवळ गोटी। ज्ञाते घालूनियां मिठी। घेती ज्ञानदृष्टीं बहुमोलें॥ ६७॥ तेवीं सांसारिक क्रियाकर्म। मूर्खा मूर्खपणें भासे विषम। तेंचि ज्ञात्यासी परब्रह्म। स्वानंदें आराम सर्वदा॥ ६८॥ प्रपंच खाणोनि सांडावा। मग ब्रह्मभाव मांडावा। हेंही न लगे त्या सदैवा। उखिताचि आघवा परब्रह्म॥ ६९॥ मिथ्या दोराचा सर्पाकार। तेथ मिळोनि अज्ञान नर। नाना अनुमानीं भयंकर। सत्य साचार मानिती॥ ४७०॥ तेवीं मिथ्या प्रपंचाचें भान। बाधक मानिती अज्ञान। तेंचि स्वानुभवें सज्ञान। जाणती पूर्ण परब्रह्म॥ ७१॥ जेवीं स्वप्न साच निद्रिताप्रती। तेवीं प्रपंच साच निज भ्रांती। तोचि निजात्मजागृताप्रती। मिथ्या निश्चितीं निजबोधें॥ ७२॥ मिथ्या प्रपंचाचें भान। जाणोनि झाले जे सज्ञान। त्यांसी सर्व कर्मीं वर्ततां जाण। देहाभिमान कदा नुपजे॥ ७३॥ साधकांचा साधावया स्वार्थ। पूर्वीं सर्वस्वरूपें भगवंत। बोलिला तेणें विकारवंत। झाला निश्चित म्हणशील॥ ७४॥ वस्तु नव्हे विकारवंत। ते निजसाम्यें सदोदित। तेचि अर्थीं श्रीकृष्णनाथ। असे सांगत निजबोधें॥ ७५॥
पूर्वं गृहीतं गुणकर्मचित्र-
मज्ञानमात्मन्यविविक्तमङ्ग।
निवर्तते तत्पुनरीक्षयैव
न गृह्यते नापि विसृज्य आत्मा॥ ३३॥
संसार तो पूर्वदशे। अति अतर्क्य मायावशें। शुद्ध वस्तु बहुधा भासे। गुणकर्मविन्यासें बहुरूप॥ ७६॥ नाम रूप व्यक्ति वर्ण। कुळ गोत्र क्रियाचरण। यापरी प्रपंच भिन्न। सत्य अज्ञान मानिती॥ ७७॥ प्रपंच वस्तूच्या ठायीं अध्यस्त। यालागीं वस्तु तद्रूप भासत। स्फटिक नानारंगीं अलिप्त। परी संबंधें भासत तद्रूप॥ ७८॥ जग पाहतां यापरी। भिन्न भासे अज्ञानेंकरीं। तेणें आत्मा म्हणती विकारी। नर अविचारी अज्ञानें॥ ७९॥ त्या अज्ञानाची होय निवृत्ती। तैं साधकां माझी सुलभ प्राप्ती। यालागीं माझी निजभक्ती। म्यां यथानिगुतीं प्रकाशिली॥ ४८०॥ साधकांचा निजस्वार्थ। जेणें शीघ्र होय हस्तगत। यालागीं सर्वभूतीं भगवंत। हा म्यां निजगुह्यार्थप्रबोधिला॥ ८१॥ हें धरोनियां अनुसंधान। भावें करितां माझें भजन। तेथ मावळे मीतूंपण। अविद्येसीं अज्ञान समूळ मिथ्या॥ ८२॥ तेथ दृश्य-द्रष्टा-दर्शन। त्रिगुणेंसीं कार्यकारण। नुरेचि प्रपंचाचें भान। ब्रह्म परिपूर्ण पूर्णत्वें॥ ८३॥ तेथ नाम रूप गुण जाती। नाहीं महाभूतें भूतव्यक्ती। चैतन्य पूर्ण सहजस्थिती। ब्रह्मीं ब्रह्मस्फूर्तीं असेना॥ ८४॥ तें उंच ना ठेंगणें। मोठें ना रोड होणें। उजू ना वांकुडेपणें। असों नेणे विकारी॥ ८५॥ तेथ शीत ना उष्ण। मृदु ना कठिण। कडू ना गोडपण। सुखदु:खेंवीण निर्द्वंद्व॥ ८६॥ तेथ भेद ना अभेद। बोलतें ना नि:शब्द। शाहणें ना मुग्ध। देखणें ना अंध चिद्रूपपणें॥ ८७॥ तें एथें ना तेथें। येतें ना जातें। जवळी ना परतें। सदोदित स्वत:सिद्ध॥ ८८॥ तें खातें ना न खातें। तें घेतें ना देतें। जीतें ना मरतें। परादिपर तें परात्पर॥ ८९॥ तें बद्ध ना मुक्त। नित्य ना अनित्य। क्षोभे ना प्रसन्न होत। वस्तु सदोदित सद्रूपत्वें॥ ४९०॥ तेथ पाप ना पुण्य। आकार ना शून्य। सगुण ना निर्गुण। स्वानंदें पूर्ण सुखरूप॥ ९१॥ सर्वभूतीं भगवद्भजन। करूनि माझे भक्तजन। माझें निजरूप परिपूर्ण। स्वयें आपण होऊनि ठेले॥ ९२॥ त्यांसी संत म्हणोनि कांहीं घेणें। अथवा असंत म्हणोनि सांडणें। हें नुरेचि त्यांसी वेगळेपणें। ब्रह्मीं ब्रह्मपणें परिपूर्ण॥ ९३॥ बद्धकाळीं बद्धता। आत्मेनि घेतली नाहीं तत्त्वतां। अथवा मुक्तकाळींची मुक्तता। आत्मा सर्वथा स्पर्शेना॥ ९४॥ आत्मा अविकारी पाहीं। येणें निरूपणें पडे ठायीं। जरी म्हणशी कळलें नाहीं। ऐक तेंही सांगेन॥ ९५॥ आत्मा सर्वदा नित्य पाहीं। यालागीं त्यासी उत्पत्ति नाहीं। ‘उत्पत्ति’ न लगे ज्याचे ठायीं। तो गर्भासी कंहीं स्पर्शेना॥ ९६॥ गर्भजन्म ज्यासी नाहीं। त्यासी देहाचा अभाव पाहीं। देहेंवीण ‘वृद्धि’ कंहीं। त्याचे ठायीं स्पर्शेना॥ ९७॥ जो सर्वदा विदेही। कर्म न रिघे त्याच्या ठायीं। कर्मेंवीण बद्धता पाहीं। आत्म्यासी कंहीं लागेना॥ ९८॥ जो निरवयव साचार। त्यासी एकही न घडे संस्कार। ज्यासी नाहीं आकार। त्यासी विकार स्पर्शेना॥ ९९॥ जो गर्भजन्माअतीत। मरण रिघों न शके तेथ। काळाचाही न लगे घात। क्षयातीत परमात्मा॥ ५००॥ न लगे जन्म कर्म मरण। त्यासी विकारी करी कोण। वस्तु अविकारी परिपूर्ण। यापरी जाण उद्धवा॥ १॥ निबिड दाटल्या अज्ञान। आत्मा नाहीं न करवे जाण। प्रखर झालियाही ज्ञान। आत्मा नवा जाण नुपजवे॥ २॥ ज्ञानाज्ञानीं अलिप्त। आत्मा निर्विकार नित्य। येचि अर्थीं सदृष्टांत। असे सांगत श्रीकृष्ण॥ ३॥
यथा हि भानोरुदयो नृचक्षुषां
तमो निहन्यान्न तु सद्विधत्ते।
एवं समीक्षा निपुणा सती मे
हन्यात्तमिस्रं पुरुषस्य बुद्धे:॥ ३४॥
डोळां नांदते दृष्टीसी। तम अवरोधी तियेसी। सूर्य उगवूनि तमातें निरसी। परी नवे दृष्टीसी नुपजवी॥ ४॥ तेवीं अविद्या क्षोभूनि सबळ। आत्मा नाहीं न करवेच केवळ। पुरुषबुद्धीस आणोनि पडळ। मिथ्या द्वैतजाळ दाखवी॥ ५॥ तेथ पावल्या शुद्ध ज्ञानासी। अविद्या मळ मात्र निरसी। परी नवें उपजवावया आत्म्यासी। सामर्थ्य ज्ञानासी असेना॥ ६॥ आत्मा निजप्रकाशेंसीं। ज्ञानाज्ञानातें प्रकाशी। तें ज्ञानाज्ञान परमात्म्यासी। कदाकाळेंसीं स्पर्शेना॥ ७॥ ज्ञानाज्ञानविकार। अविद्यांत:पाती साचार। आत्मा अविद्येहूनि पर। नित्य निर्विकार या हेतू॥ ८॥ रात्रि नाहीं सूर्यासी। मा दिवसुकाय आहे त्यासी। तेवीं ज्ञानाज्ञान आत्म्यासी। कदाकाळेंसीं स्पर्शेना॥ ९॥ आत्मा निर्विकार स्वयंज्योती। अलिप्त ज्ञानाज्ञानस्थिती। त्या स्वरूपाची सहज प्राप्ती। उद्धवाप्रति हरि सांगे॥ ५१०॥
एष स्वयंज्योतिरजोऽप्रमेयो
महानुभूति: सकलानुभूति:।
एकोऽद्वितीयो वचसां विरामे
येनेषिता वागसवश्चरन्ति॥ ३५॥
‘एष स्वयंज्योती’ चें व्याख्यान। परमात्मा स्वप्रकाशघन। साधक तद्रूप आपण। अभिन्नत्वें जाण सर्वदा॥ ११॥ आत्मा परिपूर्ण निजपूर्णता। त्यासी वेगळीं कैंचीं मातापिता। यालागीं आत्म्यासी जन्मकथा। जाण सर्वथा असेना॥ १२॥ त्रिगुणांचे त्रिविध मळ। हे मिथ्या मायिक समूळ। आत्म्यासी न लागती अळुमाळ। यालागीं ‘निर्मळ’ निजात्मा॥ १३॥ ‘अप्रमेय’ म्हणिपे तें ऐका। ऐसा तैसा इतुका तितुका। पैल तो अमका तमका। प्रमाण देखा कदा नव्हे॥ १४॥ काळा गोरा सांवळा। निळा धवळा पिंवळा। एक तेथ दूरी जवळा। या प्रमाणां वेगळा परमात्मा॥ १५॥ ‘महानुभूति’ पदव्याख्यान। आत्मा अखंड दंडायमान। निजीं निजरूपें समसमान। स्वानंदघन सर्वदा॥ १६॥ तेथ देश काळ वर्तमान। ध्येय ध्याता अथवा ध्यान। ज्ञेय ज्ञाता आणि ज्ञान। हेंही जाण असेना॥ १७॥ नाम-रूप-जात-गोत। क्रियाकर्मासी अलिप्त। जन्ममरण कैंचें तेथ। वस्तु सदोदित स्वानंदें॥ १८॥ तेथ वृद्धि आणि ऱ्हास। आदिमध्यांतविलास। परिपाकादि विन्यास। यांचाही प्रवेश असेना॥ १९॥ म्हणशी पूर्वोक्त धर्मस्थिती। तेथ न रिघे कैशा रीतीं। ‘सकळानुभूति’ या पदोक्तीं। वस्तु सर्वार्थीं अलिप्त॥ ५२०॥ या रीतीं धर्म आणि अधर्म। सकळ भूतांचें क्रियाकर्म। प्रकाशक मी आत्माराम। यासी अलिप्त परम परमात्मा॥ २१॥ गंगाजळा आणि मद्यासी। आकाश व्याप्त असोनि त्यांसी। परी तें अलिप्त दोंहीसीं। तेवीं ज्ञानाज्ञानासी परमात्मा॥ २२॥ जेथ ज्ञानाज्ञानाचा अभावो। तेथ कर्माकर्मा कैंचा ठावो। ‘सकळानुभूति’ या नांव पहा हो। अभेदान्वयो स्वानंदें॥ २३॥ ऐसा परमात्मा परमानंद। सजातीय-विजातीय-स्वगतभेद। नसोनियां वस्तु शुद्ध। जाण प्रसिद्ध निजबोधें॥ २४॥ ‘विजातीय भेद’ मी देह म्हणणें। ‘सजातीय भेद’ मी जीवपणें। ‘स्वगत भेद’ मी ब्रह्म स्फुरणें। हे तिनी नेणें परमात्मा॥ २५॥ तेथ ऊणखूण लक्ष्यलक्षण। युक्तिप्रयुक्ति प्रमाण। हेंही सर्वथा न रिघे जाण। ब्रह्म परिपूर्ण एकाकी॥ २६॥ ऐसें एकाकी परब्रह्म। निजगुह्याचें गुह्य उत्तम। हें जाणे तो सभाग्य परम। त्यासी भवभ्रम न बाधी॥ २७॥ तो देहीं असतांचि जाण। त्यासी न बाधी देहगुण। कदा न बाधी कर्माचरण। जन्ममरण बाधीना॥ २८॥ ऐकोनि ऐशिया ज्ञानासी। तें स्वरूप स्पष्ट सांग म्हणसी। तरी तेथ रिगमु नाहीं वाचेसी। श्रुति शब्देंसीं परतल्या॥ २९॥ जेथ अतिविवेकसंपन्न। बुद्धि प्रवेशेना आपण। सवेगपणें न पवे मन। ते वस्तु वाचे अधीन सर्वथा नव्हे॥ ५३०॥ खुंटली शास्त्रांची व्युत्पत्ती। दर्शनें अद्यापि विवादती। श्रुति परतल्या ‘नेति नेति’। तेथ वचनोक्तीविरामु॥ ३१॥ धरोनि जाणिवेची हांव। शब्दज्ञानें घेतली धांव। परी वस्तूचें एकही नांव। घ्यावया जाणीव न सरेचि॥ ३२॥ एवं विचारितां साचार। परादि वाचा नव्हे उच्चार। यालागीं वस्तु ‘परात्पर’ क्षराक्षराअतीत॥ ३३॥ जे सर्वावयवीं सर्वदा शून्य। शेखीं शून्यही नव्हे आपण। शून्यप्रकाश चिद्घन। वस्तु परिपूर्ण एकत्वें॥ ३४॥ तेथ रिघावया वचनोक्तीं। शब्दें साधिल्या नाना युक्ती। त्या चिदाकाशीं मावळती। जेवीं कां उगवतां गभस्ती खद्योत॥ ३५॥ खद्योत सूर्यासी खेंव देता। तैं वस्तु येतीवचनाचे हाता। वस्तूपाशीं शब्दाच्या कथा। जाण तत्त्वतां हारपती॥ ३६॥ सूर्योदय झालिया पाहीं। खद्योत शोधितां न पडे ठायीं। तेवीं वस्तुप्राप्ति पाविजे जिंहीं। तैं मागमोस नाहीं शब्दांचा॥ ३७॥ हो कां आंधारिये रातीं। ज्यांची दीपें चाले क्रियास्थिती। तेथ झालिया सूर्योदयप्राप्ती। तेचि उपेक्षिती दीपातें॥ ३८॥ तेवीं शाब्दिका ज्ञानयुक्तीं। अनुतापें ब्रह्म विवंचिती। ज्यांसी झाली ब्रह्मप्राप्ती। तेचि उपेक्षिती शब्दातें॥ ३९॥ जंव जंव शब्दाचा अभिमान। तंवतव दूरी ब्रह्मज्ञान। येचि अर्थींचें उपलक्षण। ऐक निजखूण उद्धवा॥ ५४०॥ कन्या द्यावया वरासी। माता पिता बन्धु ज्योतिषी। मेळवूनियां सुहृदांसी। कन्या वरासी अर्पिती॥ ४१॥ तेथ भर्तार संभोग सेजे पाशीं। जवळी मातापिता सुहृदेंसीं। असणें हाचि अवरोध तिसी। पतिसुखासी प्रतिबंध॥ ४२॥ तेवीं योग्यता चातुर्य जाण। शब्दज्ञानें ज्ञातेपण। जवळी असतां ब्रह्मज्ञान। सर्वथा जाण हों न शके॥ ४३॥ जेवीं डोळां अल्प कण न समाये। तेवीं ब्रह्मीं कल्पना न साहे। यालागीं निर्विकल्पें पाहें। ब्रह्मज्ञान होये सुटंक॥ ४४॥ समस्त ज्ञानाचा उपरम। सकळ वचनांचा विराम। तैंचि पाविजे परब्रह्म। ऐसें पुरुषोत्तम बोलिला॥ ४५॥ जें नाकळे बुद्धीच्या ठायीं। जें मनासी नातुडे कंहीं। जें वचनासी विषयो नव्हे पाहीं। प्रमाणाचे पायीं पावलें न वचे॥ ४६॥ यापरी वस्तु न पडे ठायीं। तरी ते वस्तुचि म्हणशी नाहीं। ऐसें उद्धवा कल्पिसी कांहीं। ऐक ते विषयीं सांगेन॥ ४७॥
(मूळ श्लोकींचें पद) ‘येनेषिता वागसवश्चरन्ति॥’
येथें देहेंद्रियप्राण। हे जड मूढ अचेतन। त्यांसी चेतवी आत्मा चिद्घन। तेंही उपलक्षण अवधारीं॥ ४८॥ आत्मप्रभा ‘दृष्टि’ प्रकाशे। परी आत्मा दृष्टीसी न स्पर्शे। आत्मा दृष्टीसबाह्य असे। परी दृष्टीसी न दिसे अदृश्यत्वें॥ ४९॥ आत्मसत्ता ऐकती ‘श्रवण’। श्रवणांसी आत्मा नातळे जाण। श्रवणां सबाह्य असोनि पूर्ण। श्रवणविषय जाण नव्हेचि आत्मा॥ ५५०॥ ‘वाचा’ आत्मसत्ता उठी। आत्मा नातळे वाचिका गोठी। वस्तु शब्दाचे पाठीं पोटीं। तो शब्द शेवटीं नेणें वस्तु॥ ५१॥ ‘मन’ आत्मसत्तें चपळ। मना सबाह्य आत्मा केवळ। तो मनासी नातळे अळुमाळ। मनासी अकळ निजात्मा॥ ५२॥ ‘चित्त’ चेतवी चिद्घन। चित्सत्ता चित्तासी चिंतन। चित्ता सबाह्य चैतन्य पूर्ण। तरी चित्तासी चैतन्य कळेना॥ ५३॥ आत्मसंयोगें ‘अहं’ उल्हासे। अहंता आत्माकदा न स्पर्शे। अहंतासबाह्य आत्मा असे। परी तो आत्मा न दिसे अहंकारें॥ ५४॥ आत्मप्रभाप्रकाशविधीं। प्रकाशिली ‘विवेकबुद्धी’। बुद्धी आत्मा नेणे त्रिशुद्धी। आत्मा बुद्धी-सबाह्य॥ ५५॥ आत्मप्रभा ‘प्राण’ चळे। परी प्राणासी आत्मा नातळे। प्राण-सबाह्य आत्ममेळें। तरी प्राणासी न कळे परमात्मा॥ ५६॥ उद्धवा तूं यापरी पाहें। जड जयाचेनि वर्तताहे। तो आत्मा स्वत:सिद्ध आहे। नाहीं नोहे कल्पांतीं॥ ५७॥ यापरी आत्मा स्वत:सिद्ध। भेद नांदवूनि अभेद। द्वंद्व प्रकाशोनि निर्द्वंद्व। हा निजात्मबोध दृढ केला॥ ५८॥ एवं आत्मा निर्द्वंद्व अद्वैतें। तो आहे नाहीं म्हणावया येथें। कोणी नुरेचि गा म्हणतें। आत्मा निजात्मते परिपूर्ण॥ ५९॥ आत्मा निजात्मता सदोदित। संसार तेथ आरोपित। येचि अर्थीं श्रीकृष्णनाथ। असे सांगत श्लोकार्थें॥ ५६०॥
एतावानात्मसम्मोहो यद्विकल्पस्तु केवले।
आत्मन्नृते स्वमात्मानमवलम्बो न यस्य हि॥ ३६॥
आत्मा केवळ नित्यमुक्त। त्रिगुण गुणांसी अतीत। नभाहूनि अतिअलिप्त। सदोदित पूर्णत्वें॥ ६१॥ ब्रह्म अखंडदंडायमान। सर्वदा स्वानंदघन। ऐसें अलिप्तीं प्रपंचभान। तो मिथ्याजाण आरोपु॥ ६२॥ आरोपासी अधिष्ठान। स्वयें परमात्मा आपण। यालागीं प्रपंचाचें भान। तेथेंचि जाण आभासे॥ ६३॥ परमात्म्याहूनि भिन्न। प्रपंचासी नाहीं स्थान। यालागीं उत्पत्ति स्थिति निदान। तेथेंचि जाण आभासे॥ ६४॥ जेवीं दोराचा सर्प पाहीं। दोरा वेगळा न दिसे कंहीं। दोर सर्प झालाचि नाहीं। तरी त्याच्या ठायीं आभासे॥ ६५॥ तेवीं निर्विकल्प पूर्ण ब्रह्म। नातळे रूप नाम गुण कर्म। तरी त्याच्या ठायीं मनोभ्रम। प्रपंच विषम परिकल्पी॥ ६६॥ जेवीं दोरीं भासे मिथ्या सर्प। तेवीं ब्रह्मीं मिथ्या भवारोप। तेथ सुखदु:ख भयकंप। तोही खटाटोप मायिक॥ ६७॥ एवं प्रपंचाचें मिथ्या भान। वस्तु शुद्धत्वें स्वानंदघन। हें निर्दुष्ट केलें निरूपण। ब्रह्म परिपूर्ण अद्वय॥ ६८॥ एवं नाना युक्तीं सुनिश्चित। ब्रह्म साधिलें अबाधित। हें न मानिती जे पंडित। तें मत खंडित श्रीकृष्ण॥ ६९॥
यन्नामाकृतिभिर्ग्राह्यं पञ्चवर्णमबाधितम्।
व्यर्थेनाप्यर्थवादोऽयं द्वयं पण्डितमानिनाम्॥ ३७॥
वेदवेदांप्रतिपाद्य एथ। सकळ शास्त्रार्थाचें निजमथित। ब्रह्म अद्वय सदोदित। म्यां सुनिश्चत नेमिलें॥ ५७०॥ तें हें माझें निजमत। उपेक्षूनियां जे पंडित। ज्ञातेपणें अतिउन्मत्त। अभिमानयुक्त पांडित्यें॥ ७१॥ त्या पंडितांचें पांडित्यमत। प्रपंच प्रत्यक्ष अनुभूत। तो मिथ्या मानोनियां एथ। कैंचें अद्वैत काढिलें॥ ७२॥ अद्वैतासी नाहीं गांवो। जेथ तेथ जरी पाहों जावों। अद्वैता नाहीं नेमस्त ठावो। यालागीं पहा हो तें मिथ्या॥ ७३॥ रूप नाम गुण कर्म। पंचभूतें भौतिकें विषम। चतुर्वर्ण चारी आश्रम। सत्य परम मानिती॥ ७४॥ सत्य मानावया हेंचि कारण मनोभ्रमें भ्रमले जाण। ज्ञानाभिमानें छळिले पूर्ण। आपण्या आपण विसरले॥ ७५॥ मुख्य मानिती विषयसुख। विषयार्थ पुण्य करावें चोख। स्वर्ग भोगावा आवश्यक। हें सत्य देख मानिती॥ ७६॥ विषय सत्य मानिती परम। हें देहाभिमानाचें निजवर्म। तेणें सज्ञान केले अधम। मरणजन्म भोगवी॥ ७७॥ पुढती स्वर्ग पुढती नरक। पुढती जननीजठर देख। यापरी पंडित लोक। केले ज्ञानमूर्ख अहंममता॥ ७८॥ त्यांचें ज्ञान तें वेदबाह्य। सर्वथा नव्हे तें ग्राह्य। जैसें अंत्यजाचें अन्न अग्राह्य। तैसे तें होय अति त्याज्य॥ ७९॥ ज्ञानाभिमानियाचा विचार। तें अज्ञानाचें सोलींव सार। तयाचा जो निजनिर्धार। तो जाण साचार महामोहो॥ ५८०॥ तयाचा जो निजविवेक। इंद्रावणफळाऐसा देख। वरी साजिरें आंत विख। तैसा परिपाक ज्ञानाभिमानियांचा॥ ८१॥ नामरूपात्मक प्रपंच। मिथ्या मायिकत्वें आहाच। ज्ञानाभिमानी मानूनि साच। वृथा कचकच वाढविती॥ ८२॥ प्रपंचरचनेची कुसरी। आपण जैं मानावी खरी। तैं देहबुद्धि वाजली शिरीं। दु:खदरिद्रीं निमग्न॥ ८३॥ त्यांची योग्यता पाहतां जाण। गायत्रीतुल्य वेदपठण। सकळ शास्त्रेंजाणे पूर्ण। श्रुति पुराण इतिहास॥ ८४॥ अतिनि:सीम वक्तेपण। समयींचें समयीं स्फुरे स्फुरण। तेणें वाढला देहाभिमान। पंडितंमन्य अतिगर्वीं॥ ८५॥ नेणे अद्वैत समाधान। तरी योग्यतागर्व गहन। निजमताचा मताभिमान। प्राणांतें जाण सांडीना॥ ८६॥ पंडितंमन्यांचे बोलणें। अवचटें नायकावें दीनें। जे नागवले देहाभिमानें। त्यांचेनि सौजन्यें अध:पात॥ ८७॥ विषभक्षित्याचा पांतीकर। अत्याग्रहें झाला जो नर। त्यासी अप्रार्थितां मरणादर। अतिदुर्धर जीवीं वाजे॥ ८८॥ यालागीं न धरावी ते संगती। त्यांसी न करावी वदंती। कदा नव जावें त्यांप्रती। ते त्याज्य निश्चितींजीवेंभावें॥ ८९॥ त्यांचे न लागावें बोलीं। त्यांचे न चालावें चालीं। जे ज्ञानाभिमानभुली। मुकले आपुली हितवार्ता॥ ५९०॥ ते नाणावे निजमंदिरा। स्वयें न वचावें त्यांच्या द्वारा। त्यांसी न पुसावें विचारा। जे अभिमानद्वारा नाडले॥ ९१॥ त्यांसी न व्हावी हाटभेटी। कदा न देखावे निजदृष्टीं। ते त्याज्य गा उठाउठीं। जेवीं धर्मिष्ठीं परनिंदा॥ ९२॥ वेदशास्त्रांचा मथितार्थ। जो कां अद्वैत परमार्थ। तो ज्यांसी नावडे निजस्वार्थ। चाविरा अनर्थ त्यांपाशीं॥ ९३॥ यालागीं त्यांची संगती। साक्षेपें सांडावी निश्चितीं। साधकाचे योगस्थिति। अंतराय निवृत्ती हरि सांगे॥ ९४॥
योगिनोऽपक्वयोगस्य युञ्जत: काय उत्थितै:।
उपसर्गैर्विहन्येत तत्रायं विहितो विधि:॥ ३८॥
योगी प्रवर्तल्या योगाभ्यासीं। योग संपूर्ण नव्हतां त्यासी। उपसर्ग येती छळावयासी। तेंचि हृषीकेशी सांगत॥ ९५॥ शरीरीं एखादा उठे रोग। कां खवळे विषयाची लगबग। अथवा सभ्रांत उपसर्ग। कां योगभंग विकल्पें॥ ९६॥ ज्ञानाभिमान सबळ उठी। तेणें गुणदोषीं बैसे दिठी। परापवादाची चावटी। त्याची एकांतगोष्टी निजगुज॥ ९७॥ देहीं शीतळता उभडे। कां उष्णता अत्यंत चढे। किंवा वायु अव्हाटीं पडे। कां क्षुधा वाढे अनिवार॥ ९८॥ विक्षेप कषाय वोढवती। परदारापरद्रव्यासक्ती। इत्यादि उपसर्ग येती। उपाय श्रीपति तदर्थ सांगे॥ ९९॥
योगधारणया कांश्चिदासनैर्धारणान्वितै:।
तपोमन्त्रौषधै: कांश्चिदुपसर्गान्विनिर्दहेत्॥ ३९॥
देहीं शीतळता वाढल्या जाण। तीस निवारी अग्निधारण। देहीं उष्मा चढल्या पूर्ण। सोमधारण उच्छेदी॥ ६००॥ वायु अव्हाटल्या अवचितां। तैं देहीं वायु भरावा पुरता। वायु मेळवुनि वायुआंतौता। अणिती निजपंथा अभ्यासबळें॥ १॥ वायु क्षोभोनि सकोप। जैं जठरावरी पडे झडप। तैं क्षुधाखवळे अमूप। तृप्तीचें रूप उठीना॥ २॥ तेथ मोकळा सांडूनि प्राण। अपान वाढवावा आपण। तो जठरा आलिया जाण। तेथ क्षोभला प्राण सहजिचि ये॥ ३॥ तेथ प्राणापानऐक्यता। सहजें ये साधकांच्या हाता। मग षट्चक्रें भेदितां। क्षणही सर्वथा लागेना॥ ४॥ तेव्हां सतरावियेचें अमृतपान। साधकांसी फावे संपूर्ण। यापरी क्षुधानिर्दळण। येणें योगें जाण साधिती॥ ५॥ परदारा परद्रव्यासक्ती। हे पापकर्माची फळप्राप्ती। याची करावया निवृत्ती। तपश्चर्या निश्चितीं उद्धवा॥ ६॥ भावें करितां मंत्रानुष्ठान। तेणे वैराग्य उपजे जाण। वैराग्यें विषयनिर्दळण। सहजें जाण साधकां॥ ७॥ शुद्ध मंत्राचें पुरश्चरण। करी विघ्नांचें निर्दळण। तेथ पिशाचबाधासंचरण। घेऊनि प्राण स्वयें पळे॥ ८॥ शरीरीं संचरल्या व्याधी। त्यातें निर्दळी दिव्य औषधी। मनाचा छेदावया आधी। योग त्रिशुद्धीं साधावा॥ ९॥ तेथ साधल्या योगसिद्धी। समूळ निर्दळी आधिव्याधी। सकळ विघ्नांतेंही छेदी। जाण त्रिशुद्धी उद्धवा॥ ६१०॥ हें किती सांगूं भिन्न भिन्न। भावें करितां माझें ध्यान। सकळ उपसर्गां निर्दळण। तेंचि निरूपण हरि सांगे॥ ११॥
कांश्चिन्ममानुध्यानेन नामसङ्कीर्तनादिभि:।
योगेश्वरानुवृत्त्या वा हन्यादशुभदाञ्छनै:॥ ४०॥
आधिव्याधींसीं सकळ विघ्न। विकल्प विकर्म देहाभिमान। ज्ञानाभिमानेंसीं दहन। करी ध्यानक्षण उद्धवा॥ १२॥ माझिया ध्यानाचे परिपाठीं। उपसर्ग पळती उठाउठी। शोधितां विघ्न न पडे दृष्टी। निर्द्वंद्व सृष्टी साधकां॥ १३॥ माझा लागल्या ध्यानभावो। उपसर्गाचा नुरेचि ठावो। सकळ विघ्नांचा अभावो। विकल्प वावो स्वयें होती॥ १४॥ म्हणशी ‘घालोनि आसन। एकाग्र करोनियां मन। कैं ठसावेल तुझें ध्यान। तैं साधकां विघ्न बाधीना’॥ १५॥ असो न टके माझें ध्यान। तैं सोपाउपाव आहे आन। माझें करितां नामकीर्तन। विघ्ननिर्दळण हरिनामें॥ १६॥ जेथ नामाचा घडघडाट। तेथ उपसर्गा न चले वाट। महाविघ्नांचा कडकडाट। करी सपाट हरिनामें॥ १७॥ अखंड माझी नामकीर्ती। ज्याच्या मुखास आली वस्ती। त्या देखोनि विघ्नें पळती। उपसर्गां शांती नि:शेष॥ १८॥ माझ्या नामाचा निजगजर। पळवी महापापसंभार। उपसर्गां नुरवी थार। नाम सधर हरीचें॥ १९॥ अवचटें घेतां माझें नाम। सकळ पातकां करी भस्म। जेथ अखंड माझें गुणनामकर्म। तेथ विघ्नसंभ्रम स्पर्शेना॥ ६२०॥ माझे नामकीर्तीचे पवाडे। ज्याची वाचा अखंड पढे। विघ्नें न येती तयाकडे। जेवीं सूर्यापुढें आंधार॥ २१॥ माझे नामकीर्तीवीण येथें। ज्याचें तोंड न राहे रितें। तो नागवे महाविघ्नांतें। जेवीं पतंगातें हुताशु॥ २२॥ नामकीर्ती दाटुगी होये। हें विश्वासें मानलें आहे। ते नाम सुखीं केवीं राहे। करावें काये म्हणशील॥ २३॥ मुखीं नामनिर्वाह व्हावा। यालागीं करावी साधुसेवा। संतसेवनीं सद्भावो जीवा। तेथ नव्हे रिघावा विघ्नांसी॥ २४॥ सद्भावें धरिल्या सत्संगती। त्या संगाचिये निजस्थिती। मुखीं ठसावे नामकीर्ती। विकल्प चित्तीं स्फुरेना॥ २५॥ मुखीं हरिनामाचीगोडी। संतसेवेची अतिआवडी। तयाची गा प्रतापप्रौढी। उपसर्गकोडी निर्दळी॥ २६॥ साधकांसी पाठिराखा। संत झालिया निजसखा। तैं महाविघ्नांचिया मुखा। विभांडी देखा क्षणार्धें॥ २७॥ सेवितां साधूचें चरणोदक। अतिशुद्ध होती साधक। तेणें शुद्धत्वें महादोख। समूळ देख निर्दळी॥ २८॥ साधूंच्या चरणतीर्थापाशीं। सकळ तीर्थें येती शुद्धत्वासी। भावें सेविती त्या तीर्थासी। ते उपसर्गांसी नागवती॥ २९॥ वंदितां साधु चरणरज। साधकांचें सिद्ध होय काज। निर्दळूनि विघ्नांचें बीज। स्वानंद निज स्वयें भोगिती॥ ६३०॥ निजभाग्यगतीं अवचितां। संतचरणरेणु पडल्या माथां। तो कळिकाळातें हाणे लाथा। तेथ विघ्नांची कथा ते कोण॥ ३१॥ निधडा शूरनिजबळेंसीं। धुरां निजशस्त्र देऊनि त्यासी। युद्धीं थापटिलिया पाठीसी। तो विभांडी परांसी तेणें उल्हासें॥ ३२॥ तेवीं सद्भावें सत्संगती। मुखीं अखंड नामकीर्ती। भावें करितां संतांची भक्ती। महाबाधा निर्दळिती साधक॥ ३३॥ कीर्ति भक्ति सत्संगती। हे त्रिवेणी लाभे ज्याप्रती। त्यासी उपसर्ग नातळती। पावन त्रिजगती त्याचेनी॥ ३४॥ माझी भक्ति आणि नामकीर्ती। यांची जननी सत्संगती। तो सत्संग जोडल्या हातीं। विघ्नें न बाधिती साधकां॥ ३५॥ योग याग आसनध्यान। तप मंत्र औषधी जाण। साधितां न तुटे देहाभिमान। तो सत्संग जाण निर्दळी॥ ३६॥ योगादि सर्व उपायीं जाण। निवारिती अल्पविघ्न। विघ्नांचा राजा देहाभिमान। तो त्यांचेनि जाणढळेना॥ ३७॥ तो दुर्धर देहाभिमान। ज्ञातेपणीं अतिदारुण। याचें समूळ निर्दहण। सत्संग जाण स्वयेंकरी॥ ३८॥ नेणपणाचा अभिमान। तत्काळ जाय निघोन। तैसा नव्हे ज्ञानाभिमान। चाविरा जाण जाणिवा॥ ३९॥ त्याही अभिमानाचें निर्दळण। सत्संग निजांगें करी आपण। यालागीं सत्संगा समान। आन साधन असेना॥ ६४०॥ एकाचेनि निजमतें। अजरामर करावें देहातें। तेही योगादि साधनांतें। मूर्खमतें साधिती॥ ४१॥
केचिद्देहमिमं धीरा: सुकल्पं वयसि स्थिरम्।
विधाय विविधोपायैरथ युञ्जन्ति सिद्धये॥ ४१॥
देहो तितुका प्रारब्धाधीन। त्यासी प्रारब्धें जन्ममरण। त्या देहासी अजरामरपण। पामर जन करूं पाहती॥ ४२॥ त्या प्रारब्धाचें सूत्र पूर्ण। सर्वदा असे काळाधीन। यालागीं काळकृत जन्ममरण। सर्वांसी जाण सर्वदा॥ ४३॥ चौदा कल्प आयुष्य जोडी। त्या मार्कंडेयासी काळ झोडी। युगांतींलोम झडे परवडी। त्या लोमहर्षाची नरडी मुरडिजे काळें॥ ४४॥ चतुर्युगसहस्र संख्येसी। तो दिवस गणिजे ब्रह्मयासी। जो स्रजिता सकळ सृष्टीसी। त्यासी काळ ग्रासी स्वबळें॥ ४५॥ स्रजित्या ब्रह्मयासी काळ पिळी। पाळित्या विष्णूतें काळ गिळी। प्रलयरुद्राचीही होळी। काळ महाबळी स्वयें करी॥ ४६॥ यापरी काळ अति दुर्धर। नेणोनि अविवेकी नर। वांछिती काळ जयो पामर। देह अजरामर करावया॥ ४७॥ जें जें दिसे तें ते नासे। हे काळसत्ता जगासी भासे। तरी अजरामरत्वाचें पिसें। मूर्ख अतिप्रयासें वांछिती॥ ४८॥ थिल्लरींचा तरंग जाण। वांच्छी अजरामरपण। तंवथिल्लरासचि ये मरण। तेथ वांचवी कोण तरंगा॥ ४९॥ तेवीं संसारचि नश्वर। त्यांतील देह अजरामर। करूं वांछिती पामर। उपायीं अपार शिणोनी॥ ६५०॥ देह जाईल तरी जावो। परी जीव हा चिरंजीव राहो। तदर्थ कीजे उपावो। तैसें अमरत्व पहा हो नरदेहा॥ ५१॥ देह केवळ नश्वर। त्यातें अविवेकी महाधीर। करूं म्हणती अजरामर। उपायीं अपार शिणोनी॥ ५२॥ केवळ काळाचें खाजें देहो। तो अमर करावया पहा हो। जो जो कीजे उपावो। तो तो अपावो साधकां॥ ५३॥ एवं मूढतेचे भागीं। देहाच्या अमरत्वालागीं। शिणोनि उपायीं अनेगीं। हठयोगी नागवले॥ ५४॥ परकाया प्रवेशार्थ जाण। शिणले साधितां प्राणधारण। एवं धरितां देहाभिमान। योगीजन नाडले॥ ५५॥ देहाचें नश्वरपण। जाणोनियां जे सज्ञान। ते न धरिती देहाभिमान। तेंचि निरूपण हरि सांगे॥ ५६॥
न हि तत्कुशलादृत्यं तदायासो ह्यपार्थक:।
अन्तवत्त्वाच्छरीरस्य फलस्येव वनस्पते:॥ ४२॥
विचारिता हा संसार। समूळ अवघा नश्वर। तेथ देहाचा अजरामर। ज्ञाते आदर न करिती॥ ५७॥ देह अजरामरविधीं। ज्ञाता सर्वथा न घाली बुद्धी। देहीं साधिल्या ज्या सिद्धी। त्याही त्रिशुद्धी बाधिका॥ ५८॥ देह तापल्या ज्वरादि तापें। तदर्थ मरणभयें कांपे। तेथ शीतळ आणिल्याही साक्षेपें। तेणेंही रूपें मरणचि॥ ५९॥ मिथ्या देहींचा देहाभिमान। सदा भोगवी जन्ममरण। तो अजरामर करितां जाण। देहबंधन दृढ झालें॥ ६६०॥ साधोनियां योगसाधन। दृढ केलें देहबंधन। देहींच्या सिद्धी भोगितां जाण। अध:पतन चुकेना॥ ६१॥ हो कां ज्ञानार्थ योग साधितां। प्रसंगें सिद्धी आलिया हाता। त्याही त्यागाव्या तत्त्वतां। निजस्वार्था लागूनी॥ ६२॥ ज्याची चाल रायापाशीं। लांच हाता ये तयासी। तेणेंचि पावे अपमानासी। तेवीं साधकासी घातकासिद्धी॥ ६३॥ वृक्षासी मोडूनि आलिया फळें। त्या फळासी वृक्ष नातळे। तेवीं आलिया सिद्धीचे सोहळे। वैराग्यबळें त्यागावे॥ ६४॥ कोरडेनि वैराग्यबळें। त्याग कीजे तो आडखळे। त्याग विवेक वैराग्य मेळें। तैं सिद्धीचे सोहळे तृणप्राय॥ ६५॥ आंधळें हातिरूं मातले। पतन न देखे आपुले। तेवीं अविवेकें त्याग केले। ते ते गेले अध:पाता॥ ६६॥ मूळीं देहचि नश्वर एथ। तेथींच्या सिद्धी काय शाश्वत। ऐसे विवेक वैराग्ययुक्त। होती अलिप्त देह भोगा॥ ६७॥ एथ देह तितुका अनित्य। आत्मा एक नित्य सत्य। हें जाणोनि विवेकयुक्त। जडले निश्चित आत्माभ्यासीं॥ ६८॥
योगं निषेवतो नित्यं कायश्चेत्कल्पतामियात्।
तच्छ्रद्दध्यान्न मतिमान्योगमुत्सृज्य मत्पर:॥ ४३॥
योग साधितां परमार्था। सिद्धी वश्य झालिया हाता। त्या त्यागाव्या तत्त्वतां। निजहितार्था-लागूनी॥ ६९॥ सिद्धी त्यागितां न वचती। भोगबळें गळां पडती। तरी ते सांडूनि योगस्थिती। माझे भजनपंथीं लागावें॥ ६७०॥ माझिये भक्तीच्या निजमार्गीं। रिगमु नाहीं विघ्नांलागीं। मी भक्तांच्या प्रेमभागीं। रंगलों रंगीं श्रीरंग॥ ७१॥ सद्भावें करितां माझी भक्ती। भक्तांसी नव्हे विघ्नप्राप्ती। भक्त-सबाह्य मी श्रीपती। अहोरातीं संरक्षीं॥ ७२॥ करितां भगवद्भजन। भक्तांसी बाधीना विघ्न। ते भक्तीचें महिमान। स्वयें श्रीकृष्ण सांगत॥ ७३॥
योगचर्यामिमां योगी विचरन् मदपाश्रय:।
नान्तरायैर्विहन्येत निस्पृह: स्वसुखानुभू:॥ ४४॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायामेकादशस्कन्धे अष्टाविंशोऽध्याय:॥ २८॥
अनन्यप्रीतीं मज शरण। सर्वभूतीं मद्भावन। अभेदबुद्धीं माझें भजन। त्यासी सर्वथा विघ्न बाधीना॥ ७४॥ माझ्या भक्ताचे उपसर्ग। सकळ निर्दळीं मी श्रीरंग। ज्यासी अनन्य भजनयोग। त्यासी माझें निजांग वस्तीसी॥ ७५॥ जेथ विघ्न धांवे भक्तांकडे। तेथ तत्काळ माझी उडी पडे। निवारीं निजभक्तांचें सांकडें। तीं लळिवाडें पैं माझीं॥ ७६॥ तीं लळिवाडें म्हणशी कैसीं। त्यांचे सांकडें मी सदा सोशीं। राजा दंडितां प्रल्हादासी। म्यां सर्वथा त्यासी रक्षिलें॥ ७७॥ संकट मांडिलें अंबरीषासी। तैं म्यां अपमानिलें दुर्वासासीं। दाही गर्भवास मी स्वयें सोशीं। उणें भक्तांसी येऊं नेदीं॥ ७८॥ बाधा होतां गजेंद्रासी। म्यां हातीं वसवूनि सुदर्शनासी। उडी घालूनि त्यापाशीं। निमिषार्धेंसीं सोडविला॥ ७९॥ द्रौपदीचिये अति सांकडीं। सभेसी करितां ते उघडी। म्यां निजांगें घालूनि उडी। वस्त्रांच्या कोडी पुरविल्या॥ ६८०॥ द्रौपदीचिया हातीं देतां घडी। नेसतां नेसतां दिसेल ते उघडी। यालागीं मी लवडसवडीं। नेसतीं लुगडीं स्वयें झालों॥ ८१॥ दावाग्नीं पीडितां गोपाळ। निजमुखीं म्यां गिळिली ज्वाळ। एथवरी भक्तांची कळवळ। मज सर्वकाळ उद्धवा॥ ८२॥ द्रौण्यस्त्राचे बाधेहातीं। म्यां गर्भीं रक्षिला परीक्षिती। गोकुळ पीडितां सुरपती। म्यां धरिला हातीं गोवर्धन॥ ८३॥ वांचवावया अर्जुनासी। दिवसा लपविलें सूर्यासी। हारी पतकरूनि रणभूमीसी। सत्य भीष्मासी म्यां केलें॥ ८४॥ ऐसा मी भक्तसहाकारी। नित्यअसतां शिरावरी। भक्तांसी विघ्न कोण करी। मी श्रीहरि रक्षिता॥ ८५॥ जे अनुसरले मद्भक्तीसी। मी विघ्न लागों नेदीं त्या भक्तांसी। निजांग अर्पोनियां त्यांसी। निजीं निजसुखेंसीं नांदवीं॥ ८६॥ भावें करितां माझी भक्ती। साधकां स्वसुखाची प्राप्ती। तेथें इच्छेंसीं कामलोभ जाती। माझी सुखस्थिति मद्भक्तां॥ ८७॥ म्हणसी भक्तांसी देहांतीं। होईल निजसुखाची प्राप्ती। तैशी नव्हे चौथी भक्ती। देहीं वर्तती स्थिति सुखरूप॥ ८८॥ देह राहो अथवा जावो। परी सुखासी नाहीं अभावो। यापरी मद्भक्त पहा हो। सुखें सुखनिर्वाहो भोगिती॥ ८९॥ भक्त वर्ततां दिसती देहीं। परी ते वर्तती माझ्या ठायीं। मी अवघाचि त्यांच्या हृदयीं। सर्वदा पाहीं नांदत॥ ६९०॥ भक्त निजबोधें मजभीतरी। मी निजांगें त्यां आंतबाहेरी। एवं निजसुखाच्या माजघरीं। परस्परीं नांदत॥ ९१॥ मी देव तो एक भक्त। हेही बाहेर सवडी मात। विचारितां आंतुवटा अर्थ। मी आणि भक्त एकचि॥ ९२॥ तूप थिजलें विघुरलें देख। तेवीं मी आणि भक्त दोनी एक। मज भक्तासी वेगळिक। कल्पांतीं देख असेना॥ ९३॥ मी तो एकचि एथें। हेंही म्हणावया नाहीं म्हणतें। यापरी मिळोनि मातें। भक्त निजसुखातें पावले॥ ९४॥ तो हा ब्रह्मज्ञानाचा कळसु। अध्याय जाण अठ्ठाविसु। बाप विंदानी हृषीकेशु। तेणें देउळासी कळसु मेळविला॥ ९५॥ जेवीं अळंकारीं मुकुटमणी। तेवीं अठ्ठाविसावा ब्रह्मज्ञानीं। श्रीकृष्ण भक्तांची निजजननी। तो उद्धवालागोनी शृंगारी॥ ९६॥ माता उत्तम अलंकारकोडीं। अपत्य शृंगारी अति आवडीं। तेवीं उत्तमोत्तम ज्ञान निरवडीं। उद्धव कडोविकडीं शृंगारिला॥ ९७॥ मातेसी आवडे निपटणें। तेवीं उद्धव वृद्धपणींचें तानें। श्रीकृष्ण त्याकारणें। गुह्यज्ञानें शृंगारी॥ ९८॥ माता बाळकातें शृंगारी। तें लेणें मागुतें उतरी। उद्धव शृंगारिला श्रीहरी। तें अंगाबाहेरी निघेना॥ ९९॥ अंगीं लेणें जडलें अलोलिक। तेणें उद्धव झाला अमोलिक। पायां लागती तिनी लोक। ब्रह्मादिक पूजिती॥ ७००॥ निजात्मअळंकारें श्रीपती। उद्धव शृंगारिला ब्रह्मस्थितीं। तेणें वंद्य झाला त्रिजगतीं। त्यातें पुराणीं पढती महाकवी॥ १॥ गोडीमाजीं श्रेष्ठ अमृत। तेंही फिकें करूनि एथ। उद्धवालागीं परमामृत। श्रीकृष्णें निश्चित पाजिलें॥ २॥ अमर अमृतपान करिती। तेही मरणार्णवीं बुडती। उद्धव अक्षयी केला श्रीपती। कथामृतीं निववूनि॥ ३॥ तेणें तो सर्वांगीं निवाला। परमानंदीं तृप्त झाला। तेणें उद्धवत्वा विसरला। डोलों लागला स्वानंदें॥ ४॥ तेव्हां स्वानंदउन्मत्तता। दुजें निर्दळी देखतां। संसार हाणोनि लाता। चढे माथा देवांच्या॥ ५॥ चढोनि देवांचिया माथां। शेखीं गिळी देवभक्तता। मम सच्चिदानंदस्वानंदता। निजात्मता स्वयें झाला॥ ६॥ तेथ सत्-चित्-आनंद। हाही नाहीं त्रिविध भेद। सदोदित परमानंद। स्वानंद शुद्ध कोंदला॥ ७॥ नश्वर त्यागाचिये स्थिती। अनश्वरातें ‘संत’ म्हणती। जडाची करितां निवृत्ति। ‘चिद्रूप’ म्हणती वस्तुतें॥ ८॥ जेथ दु:खाचा नाहीं बाधु। त्यातें म्हणती ‘आनंदु’। एवं सच्चिदानंद शब्दु। ज्ञानसंबंधु मायिक॥ ९॥ वस्तु संत ना असंत। चित् नव्हे अचित्। ते सुखदु:खातीत। जाण निश्चित सन्मात्र॥ ७१०॥ हा अठ्ठाविशींचा निजबोध। उद्धवासी तुष्टोनि गोविंद। देता झाला स्वानंदकंद। भाग्यें अगाध तो एक॥ ११॥ सांडोनि निजधामा जाणें। स्वयें श्रीकृष्ण ज्याकारणें। देता झाला निजगुह्य ठेवणें। त्याचें भाग्य वानणें तें किती॥ १२॥ जें नेदीच पित्या वसुदेवासी। जें नेदीच बंधु बळभद्रासी। जें नेदीच पुत्रा प्रद्युम्नासी। तें उद्धवासी दीधलें॥ १३॥ जें नेदीच देवकीमातेसी। जें नेदीच कुंती आतेसी। शेखीं नेदीच यशोदेसी। तें उद्धवासी दीधलें॥ १४॥ म्हणाल सांगितलें अर्जुनासी। तोही अत्यंत पढियंता त्यासी। त्याहातीं उतरावया धराभारासी। युद्धीं त्वरेंसी उपदेशिला॥ १५॥ तैसें नव्हे उद्धवाकडे। सावकाश निजनिवाडे। गुप्त ठेवणेंफाडोवाडें। अवघें त्यापुढें अर्पिलें॥ १६॥ पित्याचिया निजधनासी। स्वामित्व लाभे निजपुत्रासी। तेवीं श्रीकृष्णाचिया गुह्यज्ञानासी। झाला मिराशी उद्धव॥ १७॥ पांडवांमाजीं धन्य अर्जुन। यादवांमाजीं उद्धव धन्य। या दोघांच्या भाग्यासमान। न दिसे आन त्रिजगतीं॥ १८॥ सकळसाराचा निजसारांश। तो हा एकादशीं अठ्ठावीस। जेवीं यतींमाजीं परमहंस। तेवीं अष्टाविंश भागवतीं॥ १९॥ जेवीं क्षीराब्धीमाजीं शेषशयन। त्यावरी जैसा नारायण। तेवीं भागवतामाजीं जाण। ब्रह्मपरिपूर्ण अष्टाविंश॥ ७२०॥ जेवीं वैकुंठ परम पावन। त्यावरी विराजे श्रीभगवान। तेवीं भागवतामाजीं जाण। विराजमान अष्टाविंश॥ २१॥ एवढॺा महत्त्वाचें वैभव। कृष्णकृपेनें पावला उद्धव। बाप निजभाग्याची धांव। ब्रह्म स्वयमेव स्वयें झाला॥ २२॥ उद्धव झाला ब्रह्मपूर्ण। त्यासी कृष्णकृपा प्रमाण। तें मी वाखाणीं अज्ञान। देशभाषेने प्राकृत॥ २३॥ अंधासी सूर्य प्रसन्न। झालिया देखे तो निधान। तेवीं प्रकटोनि जनार्दन। हें गुह्यज्ञान बोलवी॥ २४॥ जनार्दन प्रकटला आतां। हें बोलणें माझी मूर्खता। तो स्वत:सिद्ध सदा असतां। हेंही झालों मी जाणता त्याचिया कृपा॥ २५॥ त्याचिया कृपें ऐसें केलें। माझें मीपण नि:शेष नेलें। नेलेंपण देखों नाहीं दीधलें। जेवीं सूर्यें केलें अंधारा॥ २६॥ मज कृपा करील जनार्दन। हेंही नेणें मी अज्ञान। तेणें दयाळुवें कृपा करून। हें गुह्यज्ञान बोलविलें॥ २७॥ निकट असतां जनार्दन। मी नेणें त्याचें महिमान। तेणें आपला महिमा आपण। मज मुखें जाण बोलविला॥ २८॥ मी जें म्हणे माझें मुख। तेंही जनार्दन झाला देख। तेणें मुखें निजात्मसुख। बोलवी निष्टंक निजात्मसत्ता॥ २९॥ एवं माझेनि नांवें कविता। परी जनार्दनचि झाला वक्ता। तेणें वक्तेपणें तत्त्वतां। रसाळ कथा चालविली॥ ७३०॥ ब्रह्मरसें रसाळ कथा। निरूपिलें श्रीभागवता। त्यामाजीं ब्रह्मतल्लीनता। जाण तत्त्वतां अष्टाविंश॥ ३१॥ अठ्ठाविसाव्याचें निरूपण। तें तत्त्वतां ब्रह्म परिपूर्ण। श्रद्धेनें करितां श्रवण। उद्धव संपूर्ण निवाला॥ ३२॥ उद्धव निवोनियां आपण। स्वयें विचारिता झाला जाण। म्हणे हें शुद्ध आत्मज्ञान। परी प्राप्ति कठिण अबळांसी॥ ३३॥ या चित्स्वरूपाची प्राप्ती। सुगम होय साधकांप्रती। पुढील अध्यायीं येचि अर्थीं। उद्धव विनंती करील॥ ३४॥ कडा फोडोनि मार्ग कीजे। कां उंचीं फरस बांधिजे। तेवीं सुगमें निर्गुण पाविजे। तो उपाव पुसिजे उद्धवें॥ ३५॥ ब्रह्मप्राप्तीचा सुगम उपावो। स्वयें सांगेल देवाधिदेवो। तो सुरस पुढील अध्यावो। साधकां पहा हो परमार्थसिद्धि॥ ३६॥ पव्हणिया परिस पायउतारा। अबळीं उतरिजे भवसागरा। तैसा साधकांलागीं सोपारा। उपाव पुढारा हरि सांगे॥ ३७॥ सीतेचेनि कृपा पडिभारें। सेतु बांधिजे रामचंद्रें। तेथ समुद्र तरतीं वानरें। जीं वनचरें अतिमंदें॥ ३८॥ तेवीं उद्धवप्रश्नप्रीतीसीं। भवाब्धिसेतु हृषीकेशीं। बांधिला निजभक्तिउपायेंसीं। तेथ तरती आपैसीं भाविकें अबळें॥ ३९॥ कृष्णभक्ति सेतुद्वारें। तरलीं जड मूढ पामरें। ते भक्ती सांगिजेल यादवेंद्रें। श्रोतां सादरें परिसावी॥ ७४०॥ एका जनार्दना शरण। तेणें श्रोते सुप्रसन्न। पुढील अध्यायाचें कथन। तेणें साधक जन तरतील॥ ४१॥ सांडूनियां एकपण। एका जनार्दना शरण। सुगम साधे आत्मज्ञान। तें भक्तिसाधन हरि सांगे॥ ७४२॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे एकादशस्कंधे भगवदुद्धवसंवादे परमहंससंहितायां एकाकारटीकायां ‘परमार्थनिर्णयो’ नाम अष्टाविंशोऽध्याय:॥ २८॥ श्रीकृष्णार्पणमस्तु॥ श्लोक॥ ४४॥ ओव्या॥ ७४२॥
॥ श्री ॐ तत्सत्-श्रीकृष्ण प्रसन्न॥
अध्याय एकोणतिसावा
श्रीगणेशाय नम:॥ श्रीकृष्णाय नम:॥ ॐ नमो सद्गुरुदयार्णव। तुझे कृपेसी नाहीं थांव। कृपेनें तारिसी जीव। जीवभाव सांडवूनि॥ १॥ सांडवूनि देहबुद्धी। निरसोनि जीवोपाधी। भक्त तारिसी भवाब्धीं। कृपानिधी कृपाळुवा॥ २॥ तुझें पाहतां कृपाळूपण। जीवासी जीवें मारिसीपूर्ण। नामा रूपा घालिसी शून्य। जातिगोत संपूर्ण निर्दळिसी॥ ३॥ निर्दळूनि आपपरां। निसंतान करिसी संसारा। तो तूं जिवलग सोयरा। कृपाळू खरा घडे केवीं॥ ४॥ जेवीं आंधारीं नांदते दृष्टी। भासतीं नक्षत्रें खद्योत कोटी। ते आंधारेंसीं सूर्य घोंटी। तेवीं तुझी भेटी साधकां॥ ५॥ तुझी जेथ साचार भेटी। तुवां केलिया कृपादृष्टी। संसारभेदाची त्रिपुटी। त्रिगुणेंसी सृष्टी दिसेना॥ ६॥ न दाखवूनि गुणादि सृष्टी। दाविसी अद्वय ब्रह्म दृष्टीं। तुझी झालिया भेटी। भेटीसी तुटी कदा न पडे॥ ७॥ ‘जो कदा न देखिजे दृष्टीं। त्यासी केवीं होय भेटी। भेटीसी कदा न पडे तुटी। हेही गोष्टी घडे केवीं’॥ ८॥ जैसा गर्भ मातेच्या पोटीं। असोनि माउली न देखे दृष्टीं। तरी तिचे भेटीसी नव्हे तुटी। तेवीं तुझे पोटीं साधक॥ ९॥ माता कळवळोनि पाळी तान्हें। शेखीं तें माउलितें नेणे। तेवीं तुजमाजीं अज्ञानें। तुवां प्रतिपाळणें निजलोभें॥ १०॥ जन्मल्या बाळाकारणें। माता वाढवी शहाणपणें। तेवीं तुझेनि निजज्ञानें। सज्ञान होणें साधकीं॥ ११॥ साधकीं लाधतां तुझें ज्ञान। थितें नाठवे मीतूंपण। जीव विसरला जीवपण। अद्वय पूर्ण परमात्मा॥ १२॥ असोत या बहुतागोष्टी। नव्हतां सद्गुरुकृपादृष्टी। करितां उपायांच्या कोटी। नव्हे भेटी परमार्था॥ १३॥ जाहलिया सद्गुरुकृपादृष्टी। साधनें पळतीं उठाउठीं। ब्रह्मानंदें कोंदे सृष्टी। स्वानंदपुष्टी साधकां॥ १४॥ जाहलिया सद्गुरुकृपा प्राप्त। उपनिषदांचा मथितार्थ। साधकांचा चढे हात। कृपा समर्थ श्रीगुरूची॥ १५॥ सद्गुरुकृपा समर्थ। तेणें कृपें श्रीभागवत। वाखाणिलें जी प्राकृत। शुद्ध मथितार्थ सोलींव॥ १६॥ श्रीजनार्दनकृपादृष्टीं। माझ्या मराठॺा आरुष गोष्टी। रिघाल्या एकादशाचे पोटीं। स्वानंदतुष्टी निजबोधें॥ १७॥ संस्कृत प्राकृत परवडी। सज्ञान सेविती स्वानंदगोडी। गाय काळी आणि तांबडी। परी दुधीं वांकुडी चवी नाहीं॥ १८॥ तेवीं संस्कृतप्राकृत भाखा। ब्रह्मासी पालट नाहीं देखा। उभय अभेदें वदला एका। साह्य निजसखा जनार्दन॥ १९॥ जनार्दनकृपेस्तव जाण। अष्टाविशाचें निरूपण। गुह्य गंभीर स्वानंदघन। तेंही केलें व्याख्यान अतिशुद्ध॥ २०॥ तेथें नानाविधा उपपत्ती। निजबोधें साधूनि युक्ती। स्वयें बोलिला श्रीपती। ब्रह्मस्थिती निष्टंक॥ २१॥ ब्रह्म अद्वयत्वें परिपूर्ण। तेथ हेतु-मातु-अनुमान। न रिघे बुद्धीयुक्तीसीं मन। अगम्यजाण सर्वार्थीं॥ २२॥ नाहीं दृश्य-द्रष्टा-दर्शन। नाहीं ध्येय-ध्याता-ध्यान। कर्म-कर्ता कारण मी-तूंपण असेना॥ २३॥
युक्तीनें सांडिला प्राण। दृष्टांतीं वाहिली आण। प्रमाणें जाहलीं अप्रमाण। बोधेंसी क्षीण विवेक जहाला॥ २४॥ तेथ बोलणें ना मौन। आकार ना शून्य। गुण आणि निर्गुण। समूळ जाण असेना॥ २५॥ ऐसी ब्रह्माची निजस्थिति। कृष्णकृपा उद्धवासी प्राप्ती। अबळांसी अगम्य निश्चितीं। जन कैशा रीतीं तरतील॥ २६॥ ब्रह्मस्थिति अतिदुर्गम। हें उद्धवासी कळलें वर्म। साधकांचें साधावया काम। उपावो सुगम पूसत॥ २७॥ कृष्ण निजधामा जाईल आतां। मग ब्रह्मप्राप्ति न ये हाता। साधक गुंतती सर्वथा। उपाय तत्त्वतां कोण सांगे॥ २८॥ एवं साधकांचिया हिता। उद्धव कळवळोनि तत्त्वतां। सुगमत्वें ब्रह्मप्राप्ती ये हाता। तो उपाय अच्युता पूसत॥ २९॥ एकुणतिसावा निरूपण। ब्रह्मप्राप्तीचें सुगम साधन। सप्रेम भगवद्भजन। तें भक्तिलक्षण हरि सांगे॥ ३०॥ सुगम साधनें ब्रह्मप्राप्ती। अबळांसी लाभे जैशा रीतीं। सहा श्लोकीं देवासी विनंती। उद्धव तदर्थीं करितसे॥ ३१॥
उद्धव उवाच
सुदुश्चरामिमां मन्ये योगचर्यामनात्मन:।
यथाञ्जसा पुमान् सिद्धॺेत्तन्मे ब्रूह्यञ्जसाच्युत॥ १॥
पूर्वाध्यायीं ब्रह्मस्थिती। सांगितली ते दुर्गम गती। भोळॺा भाविकां अबळांप्रती। हे ब्रह्मप्राप्ती साधेना॥ ३२॥ वस्तु व्यक्त ना अव्यक्त। शेखीं प्रकट ना नव्हे गुप्त। न कळे मूर्त कीं अमूर्त। केवीं साधकां तेथ प्रवेशु॥ ३३॥ जें स्थूल ना सूक्ष्म होये। जें आहे नाहीं हा शब्द न साहे। जेथ पाहतें पाहणें दोनी जाये। तें साधकां होये केवीं साध्य॥ ३४॥ जें दिसें तें ब्रह्म म्हणावें। तंव ते माया रूपें नांवें। आतां नाहींचि म्हणोनि सांडावें। तेणेंही नाडावें साधकीं॥ ३५॥ जें आकार ना नव्हे शून्य। जेथें न रिघे ध्येय ध्यान। ज्यासी लाजे ज्ञेय ज्ञान। ज्यातें साधन स्पर्शेंना॥ ३६॥ जें न चढे शब्दांचे हात। जें नातुडे मौना आंत। आंत बाहेर नाहीं जेथ। काय साधकीं तेथ धरावें॥ ३७॥ नाहीं आंतबाहेर विचारा। तेथ काय धरावें निर्धारा। जेथ निर्धारुही पुरा। धरावया धीरा धीर नव्हे॥ ३८॥ साधकीं स्थिर करावया मन। कांहीं न दिसे अवलंबन। तेथें अनात्मे अज्ञान जन। त्यांसी दुस्तर जाण हा योगु॥ ३९॥ यापरी निजात्मप्राप्ती। कदा न चढे अबळांहातीं। मज तंव मानलें निश्चितीं। हे आत्मस्थिति दुस्तुरु॥ ४०॥ ऐशिया ब्रह्माची प्राप्ती। अज्ञान अप्रयासें पावती। तैशी सुगम साधनस्थिती। सांग श्रीपती कृपाळुवा॥ ४१॥ तुवां निजधामा प्रयाण। मांडिलेसें अति त्वरेन। एथ तरावया अज्ञान। सुगम साधन सांगिजे॥ ४२॥ म्हणोनि घातलें लोटांगण। धांवोनि धरिले श्रीकृष्णचरण। तुज गेलिया अज्ञान जन। तरावया साधन सुगम सांगें॥ ४३॥ पव्हणियापरिस पायउतारा। स्त्रियां बाळां अतिसोपारा। तैशिया उपायप्रकारा। शार्ङ्गधरा सांगिजे॥ ४४॥ तुझ्या ठायी सद्भाव पूर्ण। आणि नेणती शब्दज्ञान। ऐसे जे अज्ञान जन। त्यासी तरावया साधन सुगम सांगें॥ ४५॥ मनोनिग्रहो अतिकठिण। साधकां नेमवेना संपूर्ण। तेचि अर्थींचें निरूपण। उद्धव आपण सांगत॥ ४६॥
प्रायश: पुण्डरीकाक्ष युञ्जन्तो योगिनो मन:।
विषीदन्त्यसमाधानान्मनोनिग्रहकर्शिता:॥ २॥
ऐकें कृष्णा कमलनयना। शिणतां साधक साधना। कदा नाकळवे मना। तेही विवंचना अवधारीं॥ ४७॥ निग्रहावया निजमन। साधक साधिती प्राणापान। त्यांसीही छळोनियां मन। जाय निघोन तत्काळ॥ ४८॥ घालूनियां एकांतीं आसन। मनोनिग्रहीं जे सावधान। त्यांसीही ठकूनियां मन। जाय निघोन चपलत्वें॥ ४९॥ मनोनिग्रहीं आम्ही हटी। म्हणोनि रिघाले गिरिकपाटीं। त्यांसीही ठकूनि मन शेवटीं। जाय उठाउठीं चपळत्वें॥ ५०॥ एकीं आकळावया मन। त्यजूनि बैसले अन्न। तंव मनें केलें आनेआन। जागृति स्वप्न अन्नमय॥ ५१॥ मनोनिग्रहकरितां देख। मन खवळे अधिकाधिक। मनो नेमीं सज्ञान लोक। शिणले साधक साधनीं॥ ५२॥ वारा बांधवेल मोटें। अग्नि प्राशवेल अवचटें। समुद्र घोंटवेल घोटें। परी आत्मनिष्ठे मन न ये॥ ५३॥ आकाश करवेल चौघडी। महामेरु बांधवेल पुडीं। शून्याची मुरडवेल नरडी। परी या मनाच्यावोढी अनिवार॥ ५४॥ काळ जिंकवेल तत्त्वतां। त्रिभुवनींची लाभेल सत्ता। परी मनोनिग्रहाचीवार्ता। तुजवीण अच्युता घडे केवीं॥ ५५॥ मन तापसां तत्काळ छळी। मन नेमस्तांचा नेम टाळी। मन बळियांमाजीं महाबळी। करी रांगोळी धैर्याची॥ ५६॥ मन इंद्रातें तळीं पाडी। मन ब्रह्म्यातेंहटेंचि नाडी। ऐशी मनाची वोखटी खोडी। आपल्या प्रौढीं नावरे॥ ५७॥ साधनीं साधक शिणतां। मनोजयो न येचि हाता। तुजवांचूनि अच्युता। मना सर्वथा नावरे॥ ५८॥ अत्यंत साधूनि निरवडी। मनोजयो आणितां जोडी। तंव सिद्धींची दाटे आडाडी। तेणेंही मन नाडी साधकां॥ ५९॥ तुझी कृपा नव्हतां जाण। साधकां कदा नावरे मन। तूं तुष्टल्या जनार्दन। मनपणा मन स्वयें विसरे॥ ६०॥ सर्वभावें न रिघतां शरण। साधकां कदा नावरे मन। मनोनिग्रहार्थ जाण। तुझेचरणा शरण रिघावें॥ ६१॥
अथात आनन्ददुघं पदाम्बुजं
हंसा: श्रयेरन्नरविन्दलोचन।
सुखं नु विश्वेश्वर योगकर्मभि-
स्त्वन्माययामी विहता न मानिन:॥ ३॥
कमलापति कमलवदना। कमलालया कमलनयना। नाभिकमळीं कमलासना। तुवां ब्रह्मज्ञाना अर्पिलें॥ ६२॥ त्या तुझ्या चरणींचें चरणामृत। तुझ्या कृपा ज्यास होय प्राप्त। मनोजय त्याचा अंकित। तो होय विरक्त भवभावा॥ ६३॥ तुझ्या चरणामृताची गोडी। मनोजयातें तत्काळ जोडी। आधिव्याधि भवपाश तोडी। स्वानंदकोडी साधकां॥ ६४॥ सकळ साधनांचें निजसार। सांख्ययोगविवेक सधर। त्या साराचेंही निजसार। तुझी भक्ति साचार श्रीकृष्णा॥ ६५॥ जाणोनि भक्तीचें रहस्य। भजनप्रेमा लोभलें मानस। तेंचि विज्ञान राजहंस। भजनसारांश सेविती॥ ६६॥ काया वाचा आणि मन। सद्भावें सदा संपन्न। ऐशिया भक्तां तुझे चरण। स्वानंदें पूर्ण दुभती॥ ६७॥ धर्मअर्थकाममोक्षांसी। साङ्ग साधनें सिद्धी त्यांसी। विकळ जाहलिया साधनांसी। ये साधकांसी अपावो॥ ६८॥ तैशी तंव तुझी भक्ति नव्हे। तुज भजतां जीवें भावें। भजकां विघ्न कदा न पावे। शेखीं भक्त नागवे विघ्नासी॥ ६९॥ जैं सूर्य आणि खद्योतासी। भेटी होय सावकाशीं। तरी विघ्नें भक्तांपाशीं। धीरु यावयासी न धरिती॥ ७०॥ पडतां पंचाननाची घाणी। होय मदगजा भंगणी। तेवीं तुझ्या भावार्थभजनीं। होय धूळधाणी विघ्नांची॥ ७१॥ येणेंचि निश्चयें निजसंपन्न। तुझ्या चरणा अनन्यशरण। त्यांसी नातळे जन्ममरण। मा इतर विघ्न तें कैंचें॥ ७२॥ येणें भावें जे अनन्यशरण। त्यांसी तुझे निजचरण। स्वानंदें सदा करिती पूर्ण। जेवीं कामधेनु जाण निजवत्सा॥ ७३॥ भक्तिसरोवरीं निर्मळ। नवविध रसें रसिक जळ। तेथ तुझे चरणकमळ। विकासत केवळ भावार्थसूर्यें॥ ७४॥ तेथ स्वानुभविक भ्रमर। झेंपावोनियां अरुवार। कुचंबों नेदितां केसर। आमोदसुखसार सेविती॥ ७५॥ तेथ विवेक-परमहंस। ते सरोवरींचे राजहंस। चरणकमळीं करूनि वास। आमोद सुरस सेविती॥ ७६॥ हो कां आर्त जिज्ञासु अर्थार्थी। हेही ते सरोवरीं असती। परी कमळामोद नेणती। ते क्रीडती कमळातळीं॥ ७७॥ ऐसिया भोळॺाभक्तांसी। तूं तारिसी हृषीकेशी। एवं जे जे लागले भक्तीसी। अपावो त्यांसी असेना॥ ७८॥ भावें करितां तुझें भजन। तूं भावार्थें होशी प्रसन्न। तुझ्या प्रसन्नता तुझे चरण। स्वानंद पूर्ण वर्षती॥ ७९॥ तू विश्वमूर्ती विश्वेश्वरु। तूं ब्रह्मादिकांचा ईश्वरु। तुझा जाहलिया अभय करु। भक्तां भवभारु स्पर्शेना॥ ८०॥ तुझी भक्ति तें त्यांचें सत्कर्म। तुझा भाव तो त्यांचा स्वधर्म। तुज नैवेद्य अर्पणें उत्तम। तोचि याग परम भक्तांचा॥ ८१॥ नित्य स्मरणें तुझें नाम। हाचि भक्तांचा जपसंभ्रम। तुझें कीर्तन मनोरम। ते समाधि परम भक्तांची॥ ८२॥ एवं भक्त करिती जें जें कर्म। तें तें तूं होसी पुरुषोत्तम। ज्यासी तूं तुष्टसी मेघश्याम। त्यासी भवभ्रम स्पर्शेना॥ ८३॥ यापरी भजनमुखें। भक्त तारिसी निजात्मसुखें। तेणें सुखाचेनि हरिखें। अतिसंतोखें डुल्लसी॥ ८४॥ एवं अनपेक्षित भक्तजन। तूं निजसुखें करिसी पूर्ण। तुज न रिघती जे शरण। ते मायेनें जाण मोहिले॥ ८५॥ जे तुझ्या चरणांसी विमुख। ते स्वप्नींही न देखती सुख। चढतें वाढतें भोगिती दु:ख। मायेनें मूर्ख ते केले॥ ८६॥ त्यजूनि तुझें चरणध्यान। करितां योगयागक्रिया साधन। तें तें साधकां होय बंधन। खवळे अभिमान ज्ञातृत्वें॥ ८७॥
(पूर्वश्लोकाचा चरण) ‘त्वन्माययामी विहता न मानिन:’
हाचि श्लोकींचा अंतींचा चरण। उपक्रमोनियां आपण। पंडितांचा ज्ञानाभिमान। अभक्तपण प्रकाशी॥ ८८॥ आम्ही ज्ञाते आम्ही योगी। आम्ही प्रवर्तक कर्ममार्गीं। आम्ही श्रोत्रिय पवित्र जगीं। आमुची मागी अतिशुद्ध॥ ८९॥ लोक केवळ अज्ञान। तैसे आम्ही नव्हों आपण। आमचें वचन प्रमाण। सर्वार्थीं जाण सर्वांशीं॥ ९०॥ आम्ही ज्ञाते हें मानूनि दृढ। ज्ञानाभिमानें केले मूढ। पांडित्यें होऊनि गर्वारूढ। दु:ख दुर्वाड भोगिती॥ ९१॥ अभिमानाऐसा वैरी। आन नाहीं संसारीं। तो हा ज्ञानाभिमानेंकरीं। घाली दुस्तरीं सज्ञाना॥ ९२॥ असो हे अभक्तांची कथा। जे चुकले भक्तिपंथा। यालागीं नानापरींच्या व्यथा। देह अहंता सोसिती॥ ९३॥ जिंही भक्तीसीविकूनि चित्त। जाहले अनन्यशरणागत। त्यांसी तारिता तूं जगन्नाथ। निजसुखें निजभक्त नांदविसी॥ ९४॥ तुझे जे कां भक्तजन। जिंहीं भक्तीसी विकिला प्राण। त्यासी न मागतां ब्रह्मज्ञान। सहजें जाण ठसावे॥ ९५॥ तुझें करितां निजभजन। भक्तांसी कदा न बाधी विघ्न। सुखें होती सुखसंपन्न। हें नवल कोण गोविंदा॥ ९६॥ जे तुज अनन्यशरण। तूं सर्वदा त्यांअधीन। तेचि अर्थींचें निरूपण। उद्धव आपण सांगत॥ ९७॥
किं चित्रमच्युत तवैतदशेषबन्धो
दासेष्वनन्यशरणेषु यदात्मसात्त्वम्।
योऽरोचयत् सहमृगै: स्वयमीश्वराणां
श्रीमत्किरीटतटपीडितपादपीठ:॥ ४॥
विघ्न न बाधी तुझ्या भक्तांसी। हें नवल नव्हे हृषीकेशी। तूं भुलोनि भक्तप्रेमासी। भक्ताधीन होसी सर्वदा॥ ९८॥ होऊनि निजदासाधीन। मध्यरात्रीं पुरविसी अन्न। शेखीं तुज न मिळे भोजन। भुकेल्या पान भाजीचें॥ ९९॥ उभय सेनेचे देव्हडीं। शस्त्रें सुटतां अति कडाडीं। तेथ सोसिसी रथाची वोढी। शेखीं रथींचीं घोडीं तूं धुशी॥ १००॥ तुझा मुकुट नाकळे वेदासी। तेथ भक्तांचा चाबुक खोंविसी। देखतां सकळिकां रायासी। रणीं घोडे धुसी निजांगें॥ १॥ वागोरे धरोनि दांतीं। चारी घोडे चहूं हातीं। धुतां न लाजसी श्रीपती। भक्ताधीन निश्चितीं तूं ऐसा॥ २॥ बंदीहुनी सोडविलें ज्यासी। तो उग्रसेन स्वामी करिसी। उच्छिष्टें धर्माघरींचीं काढिसी। शेखीं गायी राखिसी नंदाच्या॥ ३॥ असो ते थोरांची थोर मात। तूंचि मिळोनि गोवळाआंत। उभउभ्यां खासी त्यांचा भात। छंदें नाचत त्यांचेनी॥ ४॥ न म्हणसी सोवळें ओवळें। प्रत्यक्ष केवळ गोवळे। त्यांचेनि उच्छिष्टकवळें। स्वानंदमेळें डुल्लसी॥ ५॥ द्रौपदीचिये अतिसांकडीं। नेसतीं जाहलासि तूं लुगडीं। गोपिकांचिया निजआवडीं। तूं कडोविकडी नाचसी॥ ६॥ पूर्णकलश नेतां पाहीं। कांटा मोडला गोपीचे पायीं। तो पाय धरूनि हातीं दोंही। तूं कांटा लवलाहीं काढिसी॥ ७॥ खांदीं वाहिलें दुर्वासासी। द्वारपाळ तूं बळीपाशीं। ऐसा भक्ताधीन तूं होसी। वचनें वर्तसीदासांच्या॥ ८॥ देवा तूं ऐसें म्हणसी। ‘गोवळत्व सत्य मानिसी’। तें तुज न घडे हृषीकेशी। तूंपूज्य होसी सुरनरां॥ ९॥
(पूर्वश्लोकींचें पद) ‘श्रीमत्किरीटतटपीडितपादपीठ:॥’
इंद्र चंद्र आणि महेंद्र। ब्रह्मा बृहस्पति आणि शंकर। ऐसे पूज्य जे कां ईश्वर। तेही तुझे किंकर श्रीकृष्णा॥ ११०॥ तुझे आसनाचे पादपीठीं। त्यांच्या मुकुटमणियांच्या कोटी। घर्षणीं झणत्कार उठी। नमस्कारा दाटी सुरवरां॥ ११॥ तुझी आज्ञा न मानितां। ब्रह्मादिकांचिया माथां। साटु वाजे जी सर्वथा। मा इतरांची कथा ते कोण॥ १२॥ तुझे आज्ञेभेणें जाण। वायु वागवी नेमस्त प्राण। सूर्य चालवी दिनमान। तुझे आज्ञेभेण गोविंदा॥ १३॥ तुझे आज्ञेचे भयभागीं। समुद्र मर्यादा नुल्लंघी। तुझ्या आज्ञेच्या नियोगी। वर्षिजे मेघीं जळ काळीं॥ १४॥ तुझे आज्ञेची अगाध थोरी। स्वयें मृत्यु वंदी शिरीं। तोही स्वकाळें प्रळयो करी। आज्ञेबाहेरी कदा न निघे॥ १५॥ आशंका॥ ‘मी तंव नंदाचा खिल्लारी। उग्रसेनाची सेवा करीं। माझी हे एवढी थोरी। मिथ्या’ मुरारी म्हणशील॥ १६॥ तुवां पाडूनि काळाचे दांत। गुरुपुत्र आणिला एथ। इंद्र केला मानहत। गोकुळीं अद्भुत वर्षतां॥ १७॥ इतरांची गोठी कायशी। होऊनि वत्सें वत्सपांसीं। वेड लाविलें विधात्यासी। शेखीं गोवळ होसी नंदाचा॥ १८॥ बाण कैवारालागुनी। शिव आला अति कोपोनी। तो त्वां जिंकिला अर्धक्षणी। शार्ङ्गपाणी ईश्वरेश्वरा॥ १९॥ तुझी भेटी घ्यावयाकारणें। उत्कंठा वाहिजे नारायणें। ब्राह्मण अपत्यद्वारा तेणें। तुझी भेटी वांछिणें सर्वदा॥ १२०॥ तूं भक्तकाजपंचानन। सत्य करावया अर्जुन। क्षीरसागरीं रिघोनि जाण। कृष्णनारायण भेटले॥ २१॥ दोहींचे भेटीची परवडी। संत जाणती निजआवडीं। दोघां मिठी पडली गाढी। निजात्मगोडी अभिन्न॥ २२॥ कृष्णीं विराला नारायण। कीं नारायणामाजीं श्रीकृष्ण। दोघां नाहीं दोनीपण। स्वरूप परिपूर्ण एकत्वें॥ २३॥ तेथ अर्जुनासी जाहली व्यथा। थित्या अंतरलों कृष्णनाथा। तंव शेषशयनीं होय देखता। नारायणता श्रीकृष्णीं॥ २४॥ तो तूं भक्तकाजकैवारी। लीलाविग्रही अवतारधारी। अवतार धरिसी नानापरी। दीनोद्धारी श्रीकृष्णा॥ २५॥ यापरी गा हृषीकेशी। अगाध महिमा तुझेपाशीं। येचि अवतारीं आम्हांसी। प्रतीती निश्चयेंसी पैं आली॥ २६॥ अखंड ऐश्वर्याची स्थिती। अनावृत्त ज्ञानस्फूर्ती। अद्वयानंदा नाहीं च्युती। ‘अच्युत’ निश्चितीं या नांव॥ २७॥ ऐसा तूं अनंत अपरंपार। नियंत्या ईश्वराचा ईश्वर। तरी तूं भक्तकरुणाकर। तोही प्रकार अवधारीं॥ २८॥
(पूर्वश्लोकींचा चरण) ‘योऽरोचयत् सहमृगै: स्वयमीश्वराणाम्॥’
देवां दुर्लभ जो नमस्कारा। तो तू रिसां आणि वानरां। खेंव देसी रामचंद्रा। लीलावताराचेनि नटनाटॺें॥ २९॥ तुवां बोलावें कृपा करूनी। यालागीं वेद तिष्ठे सावधानीं। तो तूं वानारांच्या कानीं। गुज आळोंचूनी सांगशी॥ १३०॥ तुझें ज्ञान न कळे वेदशास्त्रां। तो तूं विचार पुससी वानरां। अनुसरोनि त्यांच्या मंत्रा। उपायद्वारा वर्तसी॥ ३१॥ यज्ञींचीं अवदानें प्रांजळें। कदा न घेसी यज्ञकाळें। तो तूं वानरांचीं वनफळें। खासी कृपाबळें सप्रेम॥ ३२॥ ऐसें भक्तांचें निजप्रेम। तूं प्रतिपाळिसी मेघश्याम। त्या तुजमाजीं नाहीं विषम। तूं आत्माराम जगाचा॥ ३३॥
‘एतदशेषबन्धो’
तूं अंतर्यामीं निजसखा। परमात्मा हृदयस्थ देखा। तुजमाजीं भूतां भौतिकां। भिन्न आवांका असेना॥ ३४॥ तूं जडातें चेतविता। मूढातें ज्ञानदाता। सकळ जीवां आनंदविता। तुझिया चित्सत्ता जग नांदे॥ ३५॥ मातापित्यांचें सख्यत्व देखा। तो प्रपंचयुक्त आवांका। तूं हृदयस्थ निजसखा। सकळ लोकां सुखदाता॥ ३६॥ ऐसा तूं सर्वांचा हृदयस्थ। सर्ववंद्यत्वें अतिसमर्थ। जाणसी हृदयींचा वृत्तांत। स्वामी कृपावंत दीनांचा॥ ३७॥ यापरी गा हृषीकेशी। दीनदयाळू निजभक्तांसी। ऐशिया सांडूनि स्वामीसी। कोण धनांधासी भजेल॥ ३८॥
तं त्वाखिलात्मदयितेश्वरमाश्रितानां
सर्वार्थदं स्वकृतविद्विसृजेत को नु।
को वा भजेत् किमपि विस्मृतयेऽनु भूत्यै
किं वा भवेन्न तव पादरजोजुषां न:॥ ५॥
विधाता आणि हरि हर। हे मायागुणीं गुणावतार। तूं मायानियंता ईश्वर। भक्तकरुणाकर सुखदाता॥ ३९॥ त्या तुझी करितां नि भक्ती। चारी पुरुषार्थ चारी मुक्ती। भक्तांसी लोटांगणीं येती। एवढी अर्थप्राप्ती निजभक्तां॥ १४०॥ निजभक्तांचें मनोगत। तूं सर्वज्ञ जाणता भगवंत। भक्तहृदयींचें हृद्गत। जाणोनि सर्वार्थ तूं देसी॥ ४१॥ भावार्थाचें भोक्तेपण। जाणता तूं एक श्रीकृष्ण। तुज वेगळें हें लक्षण। आणिका जाण कळेना॥ ४२॥ ऐसा स्वामी तूं उत्तमोत्तम। तुझेनि साधकां सुख परम। आणिक नाहीं तुजसम। तूं स्वामी पुरुषोत्तम सर्वांचा॥ ४३॥ तूं सर्वांचा स्वामी होसी। परी कृपाळु निजभक्तांसी। अग्निविषादि नानाबाधेंसीं। तुवां ‘प्रल्हादासी’ रक्षिलें॥ ४४॥ तुज भक्तांची कृपा प्रबळ। उत्तानचरणाचें तानें बाळ। करोनियां वैराग्यशीळ। ‘ध्रुवासी’ अढळ तुवां केलें॥ ४५॥ शत्रुबंधु ‘विभीषण’। तुज झाला अनन्यशरण। त्याचे कृपेस्तव जाण। सकुळीं रावण उद्धरिला॥ ४६॥ छळूनि बांधिलें ‘बळीसी’। शेखीं कृपा उपजली कैसी। त्याचे द्वारीं द्वारपाळ होसी। निजलाजेसी सांडूनि॥ ४७॥ ऐशी भक्तकृपा तुजपाशीं। भक्तहृद्गत तूं जाणसी। ऐशा सांडूनि निजस्वामीसी। कोण धनांधांसी सेवील॥ ४८॥ देहेंद्रियां जें सुख भासे। तें तुझेनि सुखलेशें। तो तूं सकळ सुख समावेशें। प्रसन्न अनायासें निजभक्तां॥ ४९॥ साधु जाणती तुझा महिमा। तूं ज्ञानियांचा अभेद आत्मा। भक्तप्रिय पुरुषोत्तमा। तुझा सुखाचा प्रेमा अप्रमेय॥ १५०॥ तुझे सेवेचिया संतोखें। भक्त सुखावले निजसुखें। त्यांसी देहद्वंद्वजन्मदु:खें। स्वप्नींही संमुखें कदा नव्हती॥ ५१॥ तुझ्या भजनसुखें तुझे भक्त। विषयीं होऊनि विरक्त। ते राज्य समुद्रवलयांकित। थुंकोनि सांडित तुच्छत्वें॥ ५२॥ सकळभोगवैभवेंसीं। स्वर्ग आलिया भक्तांपाशीं। ते उपेक्षिती तयासी। जेवीं राजहंसीं थिल्लर॥ ५३॥ जे विनटले भजनाच्या ठायीं। ते तूं सुखरूप करिसी पाहीं। देहीं असतांचि विदेही। सर्वा ठायीं समसाम्यें॥ ५४॥ ऐसा स्वामी तूं हृषीकेशी। सदा संतुष्ट निजभक्तांसीं। कठिणत्व नाहीं सेवेसी। कैसें म्हणसी तें ऐक॥ ५५॥ जाणें न लगे परदेशासी। आणि अनवसरु नाहीं सेवेसी। भक्तांनिकट अहर्निशीं। तूं हृदयनिवासी निजात्मा॥ ५६॥ सेवेलागीं न लगे धन। शरीर कष्ट न लगती जाण। तुझ्या चरणीं ठेविल्या मन। तूं स्वानंदघन तुष्टसी॥ ५७॥ तूं तुष्टोनि करिशी ऐसें। सांडविसी प्रपंचाचें पिसें। त्रिगुणेंसीं त्रिपुटी नासे। अनायासें मिथ्यात्वें॥ ५८॥ ऐसा तूं सुसेव्य आणि कृपाळू। निजस्वामी तूं दीनदयाळू। तुझी सेवा सांडी तो बरळू। मूर्ख केवळू अतिमंद॥ ५९॥ निमेषोन्मेषांचे व्यापार। तुझेनि चालती साचार। तुझे सेवेसी विमुख नर। ते परमपामर अभाग्य॥ १६०॥ तुझी सेवा सुखरूप केवळ। तीस उपेक्षूनियां बरळ। विषयांचे विषकल्लोळ। जे सर्वकाळ वांछिती॥ ६१॥ ज्या विषयांचा विषलेश। थित्या निजसुखा करी नाश। जन्ममरणांचा विलास। दु:ख असोस भोगवी॥ ६२॥ त्या विषयांचे विषयदाते। इंद्र-महींद्र कृपणचित्तें। त्यांसी भजती जे विषयस्वार्थें। तेही निश्चितें अभाग्य॥ ६३॥ तुझिया कृपा तुझे भक्त। सुखसंपन्न अतिसमर्थ। संसारी असोनि विरक्त। हें नवल एथ नव्हे देवा॥ ६४॥ तुझें चरणरज जे सेविती। पृथुजनकादि नृपती। त्यासी इंद्रादिक वंदिती। पायां लागती ऋद्धिसिद्धी॥ ६५॥ आकल्प करितां तप:स्थिति। ज्या सिद्धींची नव्हे प्राप्ती। त्या सिद्धी भक्तांशरण येती। ऐसी श्रेष्ठ भक्ति पैं तुझी॥ ६६॥ आणिक साधनें न करितां। तुझे भजनीं ठेविल्या चित्ता। सर्व सिद्धी होती शरणागता। स्वभावतां भक्तांसी॥ ६७॥ यापरी तुझे उपकार। भक्तांप्रति घडले अपार। त्यासी तैंचि घडे प्रत्युपकार। हरिचरणीं साचार जैं स्वयें विरे॥ ६८॥ तेंचि विरालेंपण ऐसें। जेवीं प्रतिंबिंब बिंबीं प्रवेशे। कां घटाकाशींचेनि आकाशें। होईजे जैसें महदाकाश॥ ६९॥ ऐसें तुजमाजीं न विरतां। प्रत्युपकार न ये हाता। जो पुरवी सर्व स्वार्था। त्यासी विसरतां अध:पातु॥ १७०॥
नैवोपयन्त्यपचितिं कवयस्तवेश
ब्रह्मायुषापि कृतमृद्धमुद: स्मरन्त:।
योऽन्तर्बहिस्तनुभृतामशुभं विधुन्व-
न्नाचार्यचैत्यवपुषा स्वगतिं व्यनक्ति॥ ६॥
तुजमाजीं न विरतां साचार। ब्रह्मायु होऊनियां नर। योगयागें शिणतां अपार। प्रत्युपकार कदा न घडे॥ ७१॥ असो सज्ञान ज्ञाते जन। करितां नानाविध साधन। तुझिया उपकारा उत्तीर्ण। अणुप्रमाण कदा नव्हती॥ ७२॥ तो उपकार कोण म्हणसी। निजभक्तांच्या कल्मषांसी। सबाह्याभ्यंतर निर्दळिसी। उभयरूपेंसीं कृपाळुवा॥ ७३॥ अंतरीं अंतर्यामीरूपें। बाह्य सद्गुरुस्वरूपें। भक्तांचीं सबाह्य पापें। सहित संकल्पें निर्दळिसी॥ ७४॥ अंतर्यामी आणि सद्गुरु। उभयरूपें तूं करुणाकरु। निरसूनि भक्तभवभारु। निजनिर्धारु धरविसी॥ ७५॥ निजनिर्धाराचें लक्षण। सहजें हारपे मीतूंपण। स्वयें विरे देहाभिमान। जन्मजरामरण मावळे॥ ७६॥ गेलिया जन्मजरामरण। सहजें होती आनंदघन। ऐसे तुझिया कृपें जाण। उपकारें पूर्ण निजभक्त॥ ७७॥ ऐसी आपुली स्वरूपस्थिती। भक्तां अर्पिसी कृपामूर्ती। तो तूं निजस्वामी श्रीपती। पूज्य त्रिजगतीं त्रिदशांसी॥ ७८॥ ऐसे तुझेनि निजप्रसादें। भक्त सुखी जाहले स्वानंदें। ते उरलेनि प्रारब्धें। सदा स्वानंदबोधें वर्तती॥ ७९॥ ते देहीं असोनि विदेही। कर्म करूनि अकर्ते पाहीं। ऐसे उपकार भक्तांच्या ठायीं। ते कैसेनि उतरायी होतील॥ १८०॥ तुज केवीं होईजे उत्तीर्ण। तुझेनि मनासी मनपण। तुझेनि बुद्धीसी निश्चयो जाण। इंद्रियां स्फुरण तुझेनी॥ ८१॥ निमेषोन्मेषांचे व्यापार। तुझेनि चालती साचार। नीत नवे तुझे उपकार। उत्तीर्णनर कदा नव्हती॥ ८२॥ जें जें करावें साधन। तें सिद्धी पावे तुझे कृपेन। त्या तुज उत्तीर्णपण। सर्वथा जाण असेना॥ ८३॥ यापरी करूनि उपकार। तुवां उद्धरिले थोरथोर। आतां सुगमोपायें भवसागर। तरती भोळे नर तें सांग॥ ८४॥ सुगमोपायें स्वरूपप्राप्ती। भाळेभोळे जन पावती। तैसा उपाय श्रीपती। कृपामूर्ति सांगावा॥ ८५॥ तूं गेलिया निजधामा। दीन तरावया मेघश्यामा। सुगम उपायाचा महिमा। पुरुषोत्तमा मज सांग॥ ८६॥ म्हणोनि घातिलें लोटांगण। मस्तकीं धरिले श्रीचरण। तरावया दीन जन। सुगम साधन सांगिजे॥ ८७॥ उद्धवें प्रार्थिला श्रीपती। अबळें उद्धरावया निश्चितीं। त्याचेनि धर्में त्रिजगती। त्यासी कृपामूर्ति तुष्टला॥ ८८॥ उद्धवें प्रार्थिला श्रीपती। तेणें सुखावला शुकही चित्तीं। उल्लासोनि स्वानंदस्थिती। म्हणे परीक्षिती सावध॥ ८९॥ सुगम उपायस्थितीं। तरावया त्रिजगती। उद्धवें विनविला श्रीपती। त्यासी कृपामूर्ति तुष्टला॥ १९०॥ संसारतरणोपायबीज। ब्रह्मप्राप्तीचें ब्रह्मगुज। सुगमें साधे सहज निज। तें अधोक्षज सांगेल॥ ९१॥ अबळें उद्धरावया निश्चितीं। उद्धवें प्रार्थिला श्रीपती। त्याचेनि धर्मे त्रिजगती। सुगमस्थितीं तरेल॥ ९२॥ निजधामा गेलिया श्रीकृष्णनाथ। दीनें तरावया समस्त। उद्धवें सेतु बांधिला एथ। ब्रह्मप्राप्त्यर्थ प्रश्नोक्तीं॥ ९३॥ उद्धवें प्रार्थूनि श्रीकृष्ण। उद्धरावया दीन जन। ब्रह्मप्राप्तीची पव्हे जाण। सुगम संपूर्ण घातली॥ ९४॥ एवं उद्धवप्रश्नस्थितीं। शुक सुखावे वचनोक्तीं। तेंचि परीक्षितीप्रती। सुनिश्चितीं सांगत॥ ९५॥
श्रीशुक उवाच
इत्युद्धवेनात्यनुरक्तचेतसा
पृष्टो जगत्क्रीडनक: स्वशक्तिभि:।
गृहीतमूर्तित्रय ईश्वरेश्वरो
जगाद सप्रेममनोहरस्मित:॥ ७॥
जो ज्ञानियांचा शिरोमणी। जो ब्रह्मचाऱ्यां मुकुटमणी। जो योगियांमाजीं अग्रगणी। जो सिद्धासनीं वंदिजे॥ ९६॥ जो ब्रह्मज्ञानाचा निजनिधी। जो स्वानंदबोधाचा उदधी। जो भूतदयेचा क्षीराब्धी। तो शुक स्वबोधीं बोलत॥ ९७॥ पांडवकुळीं उदारकीर्ती। कौरवकुळीं तुझेनि भक्ती। धर्मस्थापक त्रिजगतीं। ऐक परीक्षिति सभाग्या॥ ९८॥ जग जें भासे विचित्रपणें। तें जयाचें लीला खेळणें। खेळणेंही स्वयें होणें। शेखीं अलिप्तपणें खेळवी॥ ९९॥ विचित्र भासे जग जाण। ज्याचेनि अंगें क्रीडे संपूर्ण। जग ज्याचें क्रीडास्थान। जगा जगपण ज्याचेनि॥ २००॥ ऐसा ‘जगत्क्रीडनक’ श्रीकृष्ण। जो ईश्वराचा ईश्वर आपण। मायादि तिन्ही गुण। ज्याचेनि पूर्ण प्रकाशती॥ १॥ मायागुणीं गुणावतार। जे उत्पत्तिस्थितिक्षयकर। ब्रह्मा आणि हरि हर। तेही आज्ञाधर जयाचे॥ २॥ ऐशिया श्रीकृष्णाप्रती। उद्धवें सप्रेम विनंती। केली अतिविनीतस्थितीं। तेणें श्रीपति तुष्टला॥ ३॥ बहुतीं प्रार्थिला श्रीकृष्ण। तो आपुलाल्या कार्यार्थ जाण। उद्धवें केला विनीत प्रश्न। जगदुद्धरण उपकारी॥ ४॥ उद्धवाचिया प्रश्नोक्तीं। तोषोनि तुष्टला श्रीपती। सुगमोपायें ब्रह्मप्राप्ती। ते साधनस्थिती सांगेल॥ ५॥ भाळेभोळे सात्त्विक जन। सवेग पावती समाधान। तो उद्धवप्रश्नें श्रीकृष्ण। सोपें ब्रह्मज्ञान सांगत॥ ६॥ ज्ञानमार्गींचे कापडी। जीवें सर्वस्वें घालूनि उडी। उद्धवप्रश्नाचे आवडीं। ब्रह्म जोडे जोडी सुगमत्वें॥ ७॥ लेऊनियां मोह ममतेची बेडी। जे पडिले अभिमानबांदवडीं। त्यांचीही सुटका धडफुडी। उद्धवें गाढी चिंतिली॥ ८॥ उद्धवाचें भाग्य थोर। प्रश्न केला जगदुपकार। तेणें तुष्टला शार्ङ्गधर। अतिसादर बोलत॥ ९॥ दीनोद्धाराचा प्रश्न। उद्धवें केला अतिगहन। तेणें संतोषोनि श्रीकृष्ण। हास्यवदन बोलत॥ २१०॥ कृष्णवदन अतिसुंदर। तेंही हास्ययुक्त मनोहर। अति उल्हासें शार्ङ्गधर। गिरा गंभीर बोलत॥ ११॥
श्रीभगवानुवाच
हन्त ते कथयिष्यामि मम धर्मान् सुमङ्गलान्।
याञ्छ्रद्धयाऽऽचरन्मर्त्यो मृत्युं जयति दुर्जयम्॥ ८॥
जो प्रणवाचें सोलींव सार। जो ज्ञानाचें निजजिव्हार। जो चैतन्याचा चमत्कार। जो परात्पर परादिकां॥ १२॥ तो मेघगंभीर गर्जोनी। स्वानंदें बोले शार्ङ्गपाणी। म्हणे उद्धवा तुझी धन्य धन्य वाणी। तुझ्या प्रश्नीं मी निवालों॥ १३॥ बाळॺाभोळॺा ब्रह्मप्राप्ती। पावावया सुगमस्थितीं। ये अर्थीं दाटुगी माझी भक्ती। तिसी मी श्रीपती सदा वश्य॥ १४॥ माझें करितां अनन्य भजन। मी सर्वथा भक्ताधीन। तेथ जाती गोत ज्ञातेपण। उंच नीच वर्ण मी न म्हणें॥ १५॥ जेणें घडे भजन परम। ते सांगेन भागवतधर्म। जेणें निरसे कर्माकर्म। मरणजन्मच्छेदक॥ १६॥ जे धर्म स्वयें आचरितां। समूळ उन्मळी भवव्यथा। ज्या धर्मांच्या स्वभावतां। सुखसंपन्नता साधकां॥ १७॥ जे स्वयें धर्म स्तवितां। निरसी असत्यादि दोषकथा। जे धर्म सादरें ऐकतां। विषयावस्था निर्दळी॥ १८॥ माझे धर्म अतिसुमंगळ। दोषदाहक कलिमळ। मंगळांचेंही परम मंगळ। भजन केवळ पैं माझें॥ १९॥ श्रद्धेनें आचरतां माझे धर्म। माझ्या निजरूपीं उपजे प्रेम। तेणें हारपे भवभ्रम। मरणजन्म असेना॥ २२०॥ जो मृत्यु ब्रह्मयाचा ग्रास करी। हरिहरांतें मृत्यु मारी। मृत्यु दुर्जय संसारीं। सुरासुरीं कांपिजे॥ २१॥ त्या मृत्यूचें खणोनि खत। पाडूनि कळिकाळाचे दांत। अद्वयभजनें माझे भक्त। सुखें नांदत संसारीं॥ २२॥ जेणें निवारे दुर्जय मरण। ऐसें भजन म्हणसी कोण। ऐक त्याचेंही लक्षण। तुज मी संपूर्ण सांगेन॥ २३॥ उद्धवा तूं माझा निजसखा। यालागीं निजभजन आवांका। आरंभूनि पूर्वपीठिका। संक्षेपें देखा सांगेन॥ २४॥ कोटिशस्त्रें रुपल्या पाहें। तरी शूर वांचला राहे। तोचि वर्मींचेनि एके घायें। मरण लाहे तत्काळ॥ २५॥ तेवीं करितां नानासाधन। अनिवार्य जन्म मरण। त्यासी माझें हें संक्षेपभजन। समूळ जाण निर्दळी॥ २६॥ कृष्ण घनश्याम महाघन। उद्धवचातकालागीं जाण। वर्षला स्वानंदजीवन। तेणें त्रिभुवन सुखी होये॥ २७॥ लोटलिया वर्षाकाळ। शारदीचें निर्मळ जळ। तेवीं सुखाचे सुखकल्लोळ। भजनें प्रबळ एकुणतिसावा॥ २८॥ एकादशाचिया अंतीं। सुगमत्वें ब्रह्मप्राप्ती। तदर्थीं उत्तमोत्तम भक्ति। स्वमुखें श्रीपति सांगत॥ २९॥
कुर्यात्सर्वाणि कर्माणि मदर्थं शनकै: स्मरन्।
मय्यर्पितमनश्चित्तो मद्धर्मात्ममनोरति:॥ ९॥
देशाचारें कुलाचारें प्राप्त। वृद्धाचारादि जें एथ। जें कां वेदोक्त नित्यनैमित्य। ‘कर्में’ समस्त या नांव॥ २३०॥ माझेनि उद्देशें कर्म जें एथ। या नांव ‘साधारण-मदर्थ’। कर्मा सबाह्य जे मज देखत। ‘मुख्यत्वें मदर्थ’ आयास न करितां॥ ३१॥ सकळ कर्म माझेनि प्रकाशे। कर्मक्रिया माझेनि भासे। ऐसें समूळ कर्म जेथ दिसे। तें ‘अनायासें मदर्थ’॥ ३२॥ कर्माआदि मी कर्मकर्ता। कर्मीं कर्मसिद्धीचा मी दाता। कर्मीं कर्माचा मी फळभोक्ता। या नांव ‘कृष्णार्पणता’ कर्माची॥ ३३॥ सहसा ऐसें नव्हे मन। तैं हें शनै:शनै: अनुसंधान। अखंड करितां आपण। स्वरूपीं प्रवीण मन होय॥ ३४॥ मनासी नावडे अनुसंधान। तैं करावे माझें स्मरण। माझेनि स्मरणें मन जाण। धरी अनुसंधान मद्भजनीं॥ ३५॥ भजनअभ्यासपरवडी। मनासी लागे निजात्मगोडी। तेथें बुद्धि निश्चयेंसीं दे बुडी। देह अहंता सोडी अभिमान॥ ३६॥ माझ्या स्वरूपावेगळें कांहीं। मनासी निघावया वाडी नाहीं। ऐसें मन जडे माझ्या ठायीं। ‘मदर्पण’ पाहीं या नांव॥ ३७॥ ऐसें मद्रूपीं निमग्न मन। तरी आवडे माझें भजन। माझिया भक्तीस्तव जाण। परम पावन मद्भक्त॥ ३८॥ म्हणसी विषयनिष्ठ मन। कदा न धरी अनुसंधान। तेचि अर्थींचा उपाय पूर्ण। स्वयें श्रीकृष्ण सांगत॥ ३९॥
देशान्पुण्यानाश्रयेत मद्भक्तै: साधुभि: श्रितान्।
देवासुरमनुष्येषु मद्भक्ताचरितानि च॥ १०॥
देश पावन कुरुक्षेत्र। अयोध्या देश अतिपवित्र। गंगायमुनेचें उभयतीर। पवित्र अपार अर्बुदाचळ॥ २४०॥ कलापग्राम नंदिग्राम। पावन देश बदरिकाश्रम। पंचवटी श्रीरामाश्रम। पावन परम गौतमीतट॥ ४१॥ जेथ लागले श्रीरामचरण। पावन देश दण्डकारण्य। मथुरा गोकुळ वृंदावन। परम पावन ब्रह्मगिरी॥ ४२॥ पावन पांडुरंगक्षिती। जे कां दक्षिणद्वारावती। जेथ विराजे विठ्ठलमूर्ती। नामें गर्जती पंढरी॥ ४३॥ निर्दळी सकळ पापासी। पंचक्रोशी जे कां काशी। पुण्य देश वाराणसी। साधकांसी अतिसाह्य॥ ४४॥ पुण्य सरिता जेथ वाहती। तेही साधकां पावन क्षिती। गंगा यमुना सरस्वती। साबरमती वैतरणी॥ ४५॥ गंडकी नर्मदा तपती। गोदावरी भीमरथी। कृष्णा वेण्यातुंगा गोमती। पावन क्षिती श्रीशैल॥ ४६॥ कावेरीचें उभय तीर। पवित्र क्षिती चिदंबर। सरिताप्रतीची पवित्र। जिचेनि जळें नर पावन॥ ४७॥ कृतमाला पयस्विनी। अतिपवित्र ताम्रपर्णी। पवित्र क्षिती नैमिषारण्यीं। साधकांलागोनि सुसेव्य॥ ४८॥ असो हें पवित्रतेचें महिमान। पावना पावन आहे आन। जेथें वसले भक्त सज्जन। तो देश पावन सर्वार्थीं॥ ४९॥ जे गांवीं वसती माझे भक्त। तत्संगें तो गांव पुनीत। जे देशीं वसले साधुसंत। तो देश पुनीत त्यांचेनी॥ २५०॥ भक्तांचा वारा लागे जिकडे। अतिपवित्रता होय तिकडे। ते सत्संगती ज्यांसी घडे। पवित्रता जोडे तयांसी॥ ५१॥ चंदनाचे संगतीवरी। सुवास होती आरीबोरी। त्यांतें देवद्विज वंदिती शिरीं। तेवीं साधकां करी सत्संग॥ ५२॥ जें केवळ काष्ठ कोरडें। संगें मोल पावलें गाढें। त्याची श्रीमंतां चाड पडे। मस्तकीं चढे हरिहरांच्या॥ ५३॥ जैं निजभाग्याची संपत्ती। तैंचि जोडे संत्सगती। सत्संगें पावन होती। जाण निश्चितीं साधक॥ ५४॥ माझे स्वरूपीं ज्यांचें चित्त। अखंड जडलें भजनयुक्त। त्यांसीच बोलिजे ‘मद्भक्त’। तेचि संत सज्जन॥ ५५॥ माझे भक्तांचें आचरित। सुर नर असुर वंदित। साधकींही तेंचि एथ। स्वयें निश्चित साधावें॥ ५६॥ श्रेष्ठ विनटले जे भक्तीसी। नारद प्रह्राद अंबरीषी। तेचि भक्ति अहर्निशीं। साधकीं सद्भावेंसी साधावी॥ ५७॥
पृथक् सत्रेण वा मह्यं पर्वयात्रामहोत्सवान्।
कारयेद्गीतनृत्याद्यैर्महाराजविभूतिभि:॥ ११॥
वार्षिकी यात्रा पर्वपूजा। भावें अर्पावी अधोक्षजा। छत्रचामरादि वोजा। गरुडध्वजांकित चिह्नीं॥ ५८॥ ऐशिया महराजविभूती। देवासी अर्पाव्या श्रद्धास्थितीं। भजनालागीं अहोरातीं। उल्हास चित्तीं अनिवार॥ ५९॥ अश्वगजादिआरोहण। शेषशयन गरुडासन। महा-महोत्सव नरयान। रथोत्सव जाण करावा॥ २६०॥ टाळ घोळ निशाण भेरी। शंख मृदंग मंगल तुरीं। नाद न समाय अंबरीं। जयजयकारीं गर्जावें॥ ६१॥ तेथ गीतनृत्यपवाडे। कीर्तन करावें वाडेंकोडें। हुंबरीं आखरीं बागडें। देवापुढें करावें॥ ६२॥ तोंड करूनि वांकुडें। वांकुली दावावी देवाकडे। वर्णावे देवाचे पवाडे। रंगापुढें गर्जत॥ ६३॥ गोपाळकाल्याचा विन्यास। रासक्रीडेचा उल्हास। गोपाळवेषाचा विलास। मनोहर वेष दावावा॥ ६४॥ दावावी मालखडॺांची परी। झोंबी घ्यावी नानाकुसरी। दंडीं मुडपीं उरीं शिरीं। परस्परीं हाणत॥ ६५॥ मल्लविद्येच्या आसुडीं। थडक हाणोनियां गाढी। माळमर्दना परवडी। रंगीं गुढी उभवावी॥ ६६॥ कुवलयापीड उन्मत्त। त्याचे उपटोनि गजदंत। गोपाळवेषें डुल्लत। रंगाआंत मिरवावें॥ ६७॥ वानावी देवाची वाढीव। करावी देवाची भाटीव। ऐसे दावूनि हावभाव। महामहोत्सव करावा॥ ६८॥ असल्या सामर्थ्यवैभव। स्वयें करावे सकळ उत्सव। ना तरी मिळोनियां सर्व। महामहोत्सव करावे॥ ६९॥ ऐशिया अनन्य आवडीं। भजन करितां चढोवढी। माझिया भक्तीची लागली गोडी। जोडिलें जोडी हरिप्रेम॥ २७०॥ सप्रेम भक्ती करितां जाण। तेणें मी भक्तांसी तुष्टमान। माझें अंतरंगभजन। मद्भक्त आपण स्वयें लाहे॥ ७१॥ ‘अंतरंगभक्ति’ म्हणसी कोण। तें भक्तीचें निजलक्षण। उद्धवाप्रति श्रीकृष्ण। स्वमुखें आपण सांगत॥ ७२॥
मामेव सर्वभूतेषु बहिरन्तरपावृतम्।
ईक्षेतात्मनि चात्मानं यथा खममलाशय:॥ १२॥
भावें करितां माझी भक्ती। शुद्ध होय चित्तवृत्ती। तेणें आत्मदृष्टीची स्थिति। गुरुकृपा पावती मद्भक्त॥ ७३॥ पाहतां निजात्मदृष्टीवरी। मीचि सर्व भूतांच्या अंतरीं। अंतरींचा हा निर्धार धरी। तंव भूताबाहेरीही मजचि देखे॥ ७४॥ जो परावरादि अनंत। तो मी भूतां सबाह्य भगवंत। मी तोचि होय माझा भक्त। मिळोनि मनआंत मद्रूपें॥ ७५॥ जैसजैशी माझी व्याप्ती। तैसतैशी भक्तांची स्थिती। जें जें देखे भूतव्यक्ती। तेथ सबाह्य प्रतीती मद्रूपें॥ ७६॥ जेवीं घटामाजीं घटाकाश। तेंचि घटासबाह्य महदाकाश। तेवीं भूतांसबाह्य मी चिद्विलास। माझा रहिवास निजरूपें॥ ७७॥ निश्चयेंसीं निजप्रतीती। भगवद्भाव सर्वांभूतीं। तेचि भक्तांची भजती स्थिती। यथानिगुती हरि सांगे॥ ७८॥
इति सर्वाणि भूतानि मद्भावेन महाद्युते।
सभाजयन्मन्यमानो ज्ञानं केवलमाश्रित:॥ १३॥
उद्धवा तुझें भाग्य अनूप। तूं ज्ञाननिधि कैवल्यदीप। सर्व भूतीं माझें रूप। चित्स्वरूप सबाह्य॥ ७९॥ यापरी गा सर्वभूतीं। माझ्या स्वरूपाची अनुस्यूती। लक्षोनि जो करी भक्ती। नानाव्यक्ती समभावें॥ २८०॥ भिन्न रूप भिन्न नाम। भिन्न स्थिति भिन्न कर्म। जग देखतांही विषम। मद्भक्ता सम मद्भावो॥ ८१॥ भूतें देखतांही भिन्न। भिन्नत्वा न ये ज्याचें ज्ञान। मद्भावें भजे समान। त्यासी सुप्रसन्न भक्ति माझी॥ ८२॥ ज्यासी प्रसन्न माझी भक्ति। त्याचा आज्ञाधारक मी श्रीपती। जो भगवद्भावें सर्व भूतीं। सुनिश्चितीं उपासक॥ ८३॥ आशंका॥ ‘तुझी वेदाज्ञा तंव प्रमाण। अतिशयें पूज्य ब्राह्मण। उपेक्षावे असुरजन। चांडाळ जाण अतिनिंद्य॥ ८४॥ कर्मभ्रष्ट जे जे लोक। त्यांचें पाहों नये मुख। हे वेदमर्यादा देख। तुवांचि निष्टंक नेमिली॥ ८५॥ तेथ सर्व भूतीं समान। केवीं घडे भगवद्भजन’। ऐसा विकल्प धरील मन। तरी ऐक महिमान भक्तीचें॥ ८६॥ जंव अंधारासीं सबळ राती। तंवचि प्रतिष्ठा दीपस्थिती। तेथें उगवल्या गभस्ती। दीपाची दीप्ती असतांचि नाहीं॥ ८७॥ तेवीं जंववरी दृढ अज्ञान। तंवचिवरी वेदाज्ञा प्रमाण। ज्यासी माझें अभेदभजन। तयासी वेद आपण स्वयें वंदी॥ ८८॥ वेद बापुडा तो किती। ज्यासी माझी अभेदभक्ती। त्यासी मी वंदी श्रीपती। सदा वशवर्ती तयाचा॥ ८९॥ अभेदभक्ति जेथ पुरी। मी नाटिकारु त्याचे घरीं। त्याचा संसार माझे शिरीं। योगक्षेम करीं मी त्याचा॥ २९०॥ अभेदभक्तीचें महिमान। तिच्या पायां लागे आत्मज्ञान। तेथ वंद्यनिंद्य समसमान। विषमींही जाण विकारेना॥ ९१॥
ब्राह्मणे पुल्कसे स्तेने ब्रह्मण्येऽर्के स्फुलिङ्गके।
अक्रूरे क्रूरके चैव समदृक्पण्डितो मत:॥ १४॥
ज्यांचे वंदितां पदरज जाण। पवित्र होईजे आपण। ऐसे पुण्यपूज्य जे ब्राह्मण। ज्यांचा हृदयीं चरण हरि वाहे॥ ९२॥ ऐसे अतिवंद्य जे ब्राह्मण। आणि चांडाळांमाजीं निंद्य हीन। तो ‘पुल्कस’ द्विजवरांसमान। हरिरूपें जाण भक्त देखे॥ ९३॥ सुवर्णविष्णु सुवर्णश्वान। एक पूज्य एक हीन। विकूं जातां मोल समान। वंद्यनिंद्य जाण आत्मत्वीं तैसें॥ ९४॥ पुल्कस आणि ब्राह्मण। जातिभेदें विषमपण। आत्मदृष्टीं पाहतां जाण। दोघे समान चिद्रूपें॥ ९५॥ जो बळेंचि ब्रह्मस्व चोरी। जो ब्राह्मणा अतिउपकारी। दोघे निजात्मनिर्धारीं। सद्रूपेंकरीं समसाम्य भक्तां॥ ९६॥ जेवीं डावा उजवा दोनी हात। एक नरकीं एक पुण्यार्थ। हा कर्माकर्म विपरीतार्थ। समान निश्चित ज्याचे त्यासी॥ ९७॥ तेवीं सर्वस्वें ब्राह्मणांचा दाता। कां जो ब्राह्मणांचा अर्थहरिता। दोंहीसी कर्माची विषमता। निजात्मता समान॥ ९८॥ सूर्य आणि खद्योत। तेजविशेषें भेद भासत। निजात्मतेजें पाहतां तेथ। समसाम्य होत दोहोंसी॥ ९९॥ दावाग्नि आणि दिवा। भेद भासे तेज वैभवा। निजतेजें समानभावा। तेवीं तेजप्रभावा आत्मत्वें समान॥ ३००॥ कर्पूराग्नि सोज्वळ कुंडीं। परी राईसंगें तो तडफडी। तेवीं सत्त्वतमपरवडी। शांति आणि गाढी क्रोधावस्था॥ १॥ एक सत्त्ववृत्ति अतिशांत। कां जो क्रूर तामस क्रोधयुक्त। गुणवैषम्यें भेद भासत। आत्मत्वें निश्चित समसाम्य भक्तां॥ २॥ एक आपत्काळीं सर्वसत्ता। होय एकाचा प्राणरक्षिता। एक प्राणदात्याच्या घाता। प्रवर्ते क्रूरताकृतघ्न जो॥ ३॥ हे पुण्यपापविषमता जाण। ऐसेही ठायीं भक्त सज्ञान। वस्तु देखती समसमान। उभयतां जाण निजात्मबोधें॥ ४॥ वृक्षासी जो प्रतिपाळी। कां जो घाव घाली मूळीं। दोघांहीसमान पुष्पीं फळीं। तेवीं आत्ममेळीं घातका घातीं॥ ५॥ द्विजाचें सोंवळें धोत्र। कां मद्यपियाचें मलीन वस्त्र। सूत्रसृष्टी समान सूत्र। मशक सृष्टिकर आत्मत्वीं तैसे॥ ६॥ मशक आणि सृष्टिकर्ता। भजनीं समान मद्भक्तां। हे चौथे भक्तीची अवस्था। अपावो सर्वथा रिघों न शके॥ ७॥ जेथूनि रिघों पाहे अपावो। तेथेंचि देखती भगवद्भावो। तेव्हां अपाव तोचि उपावो। मद्भक्तां पहा हो मद्भजनीं॥ ८॥ ईश्वर आणि पाषाण। भजनीं मद्भक्तां समान। हें भक्तीचें मूख्य लक्षण। ‘चौथी भक्ति’ जाण या नांव॥ ९॥ स्वकर्मधर्मवर्णाचार। करितांही निज व्यवहार। ज्यासी सर्वभूतीं मदाकार। तो भक्त साचार प्रिय माझा॥ ३१०॥ ज्यासी सर्वभूतीं बुद्धि समान। तेचि भक्ति तेंचि ज्ञान। तेंचि स्वानंदसमाधान। सत्य सज्ञान मानिती॥ ११॥ असो सज्ञानाची कथा। ज्यासी सर्व भूतीं समता। तो मजही मानला तत्त्वतां। मोक्षही सर्वथा वंदी त्यातें॥ १२॥ सर्वांभूतीं आत्माराम। ऐसें कळलें ज्या नि:सीम। तेचि भक्ति उत्तमोत्तम। ज्ञानियें परम मद्रूपें॥ १३॥ योग याग ज्ञान ध्यान। सकळ साधनांमाजीं जाण। मुख्यत्वें हेंचि साधन। तेंचि निरूपण हरि सांगे॥ १४॥
नरेष्वभीक्ष्णं मद्भावं पुंसो भावयतोऽचिरात्।
स्पर्धासूयातिरस्कारा: साहङ्कारा वियन्ति हि॥ १५॥
जो श्रोत्रिय सदाचार उत्तम। कां जो जातिस्वभावें अधम। कां अनाचारें अकर्म। येथें सद्भावें सम देखे जो वस्तु॥ १५॥ चराचरीं भगवद्भावो। देखणें हा शुद्ध स्वभावो। तरी नराच्याच ठायीं देवो। साक्षेपें पहा हो कृष्ण कां सांगे॥ १६॥ मनुष्यांच्या ठायीं जाण। प्रकट दिसती दोषगुण। तेथ साक्षेपें आपण। ब्रह्म परिपूर्ण पहावें॥ १७॥ चौऱ्यांयशीं लक्ष योनी अपार। त्यांत त्र्यायशींलक्ष नव्याण्णव सहस्त्र। नवशें नव्याण्णव योनी साचार। मुक्त निरंतर गुणदोषार्थीं॥ १८॥ परी मनुष्ययोनीच्या ठायीं। दोष न देखे जो पाहीं। तोचि देहीं विदेही। अन्यथा नाहीं ये अर्थीं॥ १९॥ मनुष्यदेहीं ब्रह्मभावो। देखे तो सभाग्य पहा हो। चहूं मुक्तींचा तोचि रावो। जगीं नि:संदेहो तो एक॥ ३२०॥ सर्व भूतीं भगवद्भजन। ऐसें ज्यासी अखंड साधन। त्या नराचा देहाभिमान। क्षणार्धें जाण स्वयें जाये॥ २१॥ जातां देहींचा अहंकार। निघे सकुटुंब सपरिवार। स्पर्धा असूया तिरस्कार। येणेंसीं सत्वर समूळ निघे॥ २२॥ देहीं ममता तोचि ‘अभिमान’। आपल्या ज्ञानेंसीं समान। त्याचें निर्भर्त्सणें जें ज्ञान। ‘स्पर्धा’ जाण या नांव॥ २३॥ आपणाहूनि अधिक ज्ञान। ऐसें जाणोनि आपण। त्याचे गुणीं दोषारोपण। करणें ते जाण ‘असूया’॥ २४॥ भाविक जे साधक जन। त्यांचें छळून सांडी साधन। धिक्कारूनि निर्भर्त्सी पूर्ण। ‘तिरस्कार’ जाण या नांव॥ २५॥ इत्यादि दोषसमुदावो। घेऊनि पळे अहंभावो। सर्वां भूतीं भगवद्भावो। देखतांच पहा हो तत्काळ॥ २६॥ सर्व भूतीं समत्वें भजतां। हेंचि श्रेष्ठ साधन तत्त्वतां। येणें पूर्णब्रह्म लाभे हाता। हे साधे अवस्था नरदेहीं॥ २७॥ सांडावें ममतेचें काज। सांडावें योग्यतेचें भोज। सांडावी लौकिकाची लाज। ब्रह्मसायुज्य तैं लाभे॥ २८॥ सांडावी देहगर्वता। सांडावी सन्मानअहंता। सांडावी श्रेष्ठत्वपूज्यता। ब्रह्मसायुज्यता तैं लाभे॥ २९॥ तत्काळ होईजे ब्रह्म पूर्ण। या प्राप्तीचें सुगम साधन। कोणा हीन करवे जाण। लोकेषणा दारुण जनासी॥ ३३०॥ सांडावा वर्णाभिमान। स्वयें सांडूनि जाणपण। अणुरेणूंसीही लोटांगण। घालितां पूर्ण ब्रह्मप्राप्ती॥ ३१॥ जो सांडी लोकेषणेची लाज। त्याचें तत्काळ होय काज। तेचि विखींचें निजगुज। स्वयें अधोक्षज सांगत॥ ३२॥
विसृज्य स्मयमानान् स्वान् दृशं व्रीडां च दैहिकीम्।
प्रणमेद्दण्डवद्भूमावाश्वचाण्डालगोखरम्॥ १६॥
सुहृदां देखतां लोटांगण। घालतां हांसतील संपूर्ण। यालागीं विदेशीं आपण। घालावें लोटांगण गो-खर-श्वानां॥ ३३॥ ऐशी लौकिकाची लाज। धरितां सिद्धी न पवे काज। लोटांगणाचें निजभोज। नाचावें निर्लज्ज सुहृदांपाशीं॥ ३४॥ सासु सासरा जांवयी। इष्ट मित्र व्याही भाई। ज्यांसी देखतांचि पाहीं। विरजे देहीं लाजोनी॥ ३५॥ त्यांसि देखतां आपण। लाज सांडोनियां जाण। चांडाळादिहीन जन। गो खर श्वान वंदावीं॥ ३६॥ तेंहीं ऐसें गा वंदन। दंडाचे परी आपण। सर्व भूतां लोटांगण। भगवद्भावें जाण घालावें॥ ३७॥ तेथ ब्रह्मवेत्ते ब्राह्मण। कां अंत्यजादि हीन जन। यांच्या ठायीं लोटांगण। सारिखें जाण सद्भावें॥ ३८॥ गाय गाढव सूकर श्वान। यांच्याही ठायीं आपण। दंडवत लोटांगण। सद्भावें संपूर्ण घालावें॥ ३९॥ साधावया निजकार्य पूर्ण। लोकलाज सांडावी खणोन। माशी मुंगी मुरकूट जाण। त्यांसीही लोटांगण दंडप्राय॥ ३४०॥ भावें वंदितां गो-खर-रज। प्रकटे भगवद्भजनतेज। त्यजूनि स्वजनांची लाज। वंदीं निजभोज लोटांगणेंसीं॥ ४१॥ त्यजूनि संदेहविषमता। लोकलज्जे हाणोनि लाता। भगवद्बुद्धीं सर्वभूतां। घालावें तत्त्वतां लोटांगण॥ ४२॥ म्हणसी ऐसें हें साधन। कोठवरी करावें आपण। तेंचि मर्यादानिरूपण। स्वयें श्रीकृष्ण सांगत॥ ४३॥
यावत्सर्वेषु भूतेषु मद्भावो नोपजायते।
तावदेवमुपासीत वाङ्मन:कायवृत्तिभि:॥ १७॥
आपुला देह घालोनि पूढें। जें जें भूत दृष्टीं आतुडे। तेथ भगवद्भावें ठसा पडे। वाडेंकोडें निश्चित॥ ४४॥ दृष्टीं पाहतां जें जें भासे। दृष्टीं नातुडतां जें जें दिसे। तें तें ज्यासी अनायासें। भासे आपैसें चिद्रूप॥ ४५॥ मनाचे कल्पने जें जें आलें। कां कल्पनातीत जें जें ठेलें। तें तें ज्यासी अनुभवा आलें। स्वरूप आपुलें मद्रूपत्वें॥ ४६॥ कायिक कर्माचार। वैदिक लौकिक व्यापार। ते ज्यासी दिसती मदाकार। चराचर मद्रूपें॥ ४७॥ जागृतिस्वप्नसुषुप्तीसीं। देखिजे भोगिजे ज्या सुखासी। तें तें मद्रूप ज्यासी। निश्चयेंसीं ठसावे॥ ४८॥ स्वाभाविक जे व्यापार। देहीं निफजती अपार। ज्यासी मद्रूपें साचार। निश्चयें निर्धार ढळेना॥ ४९॥ ऐशी न जोडतां अवस्था। सर्व भूतीं भगवद्भावता। भजावें गा तत्त्वतां। निजस्वार्थालागूनी॥ ३५०॥ हे सांडूनि भजनावस्था। नाना साधनीं प्रयास करितां। माझ्या अनुभवाची वार्ता। न चढे हाता कल्पांतीं॥ ५१॥ ऐसें जाणूनियां आपण। सर्व भूतीं भगवद्भजन। करावें निश्चयेंसीं जाण। हे आज्ञा संपूर्ण पैं माझी॥ ५२॥ सांडोनि युक्तीची व्युत्पत्ती। धरितां भगवद्भाव सर्वभूतीं। येणेंचि माझी सुगम प्राप्ती। जाण निश्चितीं उद्धवा॥ ५३॥ माझिये प्राप्तीचें सुगम साधन। उद्धवा तुवां पुशिलें जाण। तरीसर्व भूतीं भगवद्भजन। तदर्थ जाण सांगितलें॥ ५४॥ हा ब्रह्मप्राप्तीचा उपाव पूर्ण। माझे जिव्हारींची निजखूण। सुगमप्राप्तीलागीं जाण। उत्तम साधन सांगितलें॥ ५५॥ येणें सुगम ज्ञानस्थिती। येणें सुगम माझी भक्ती। येणें सुगम माझी प्राप्ती। जाण निश्चितीं उद्धवा॥ ५६॥ सर्व भूतीं ब्रह्मस्थिती। ज्यासी निश्चयें जाहली प्राप्ती। त्याची उपरमे भजनवृत्ती। तेंचि श्रीपती सांगत॥ ५७॥
सर्वं ब्रह्मात्मकं तस्य विद्ययाऽऽत्ममनीषया।
परिपश्यन्नुपरमेत् सर्वतो मुक्तसंशय:॥ १८॥
काया वाचा आणि चित्तें। सर्व भूतीं भजले मातें। त्यासी भगवद्रूप सर्व भूतें। सुनिश्चितें ठसावतीं॥ ५८॥ तेव्हां मी एक एथें। भगवद्रूप पाहें सर्व भूतें। हेही वृत्ति हारपे तेथें। देखे सभोंवतें परब्रह्म॥ ५९॥ परब्रह्म देखती वृत्ती। तेही विरे ब्रह्माआंतौती। जेवीं घृतकणिका घृतीं। होय सुनिश्चितीं घृतरूप॥ ३६०॥ तेव्हां ब्रह्मचि परिपूर्ण। हेही स्फूर्ति नुरे जाण। गिळूनियां मीतूंपण। ब्रह्मीं ब्रह्मपण अहेतुक॥ ६१॥ तेथें हेतु मातु दृष्टांतु। खुंटला वेदेंसीं शास्त्रार्थु। हारपला देवभक्तु। अखंड वस्तु अद्वयत्वें॥ ६२॥ गेलिया दोराचें सापपण। दोर दोररूपें परिपूर्ण। हो कां भासतांही सापपण। दोरीं दोरपण अनसुट॥ ६३॥ तेवीं प्रपंच सकारण। गेलिया ब्रह्मचि परिपूर्ण। कां दिसतांही प्रपंचाचें भान। ब्रह्मीं ब्रह्मपण अनुच्छिष्ट॥ ६४॥ याचिलागीं सर्व भूतीं। करितां माझी भगवद्भक्ती। एवढी साधकांसी प्राप्ती। जाण निश्चितीं उद्धवा॥ ६५॥ तत्काळ पावावया ब्रह्म पूर्ण। सांडूनियां दोषगुण। सर्व भूतीं भगवद्भजन। हेंचि साधन मुख्यत्वें॥ ६६॥ याही साधनावरतें। आणिक साधन नाहीं सरतें। हेंचि परम साधन येथें। मजही निश्चितें मानलें॥ ६७॥
अयं हि सर्वकल्पानां सध्रीचीनो मतो मम।
मद्भाव: सर्वभूतेषु मनोवाक्कायवृत्तिभि:॥ १९॥
सर्व भूतीं भगवद्दृष्टी। हेंचि भांडवल माझे गांठीं। येणें भांडवलें कल्पकोटी। करोनि सृष्टीं मी अकर्ता॥ ६८॥ मज पाहतां निजात्मपुष्टी। सर्वभूतीं भगवद्दृष्टी। हेचि भक्ति माझी गोमटी। ब्रह्मांड कोटी तारक॥ ६९॥ हेचि भक्ति म्यां कल्पादी। सर्वभूतीं भगवद्बुद्धी। नाभिकमळीं त्रिशुद्धी। ब्रह्मा या विधीं उपदेशिला॥ ३७०॥ व्रत तप करितां दान। योगयाग करितां ध्यान। वेदशास्त्रार्थें साधितां ज्ञान। माझ्या भक्तीसमान ते नव्हती॥ ७१॥ नाना साधनांचिया कोटी। साधकीं साधितां आटाटी। माझ्या प्रेमाची नातुडे गोठी। मद्भक्तभेटीवांचूनी॥ ७२॥ माझिया भक्तांचिये संगतीं। साधकां लाभे माझी भक्ति। अभेदभजनें माझी प्राप्ति। जाण निश्चितीं उद्धवा॥ ७३॥ सर्वभूतीं भगवद्भजन। करितें ऐक पां लक्षण। विषमें भूतें देखतां जाण। मनीं भाव परिपूर्ण ब्रह्मत्वें॥ ७४॥ दुष्ट दुरात्मा अनोळख। नष्ट चांडाळ अनामिक। तेथही ब्रह्मभाव चोख। हें ‘मानसिक’ निजभजन॥ ७५॥ भूतीं भगवंत परिपूर्ण। ऐसें जाणोनि आपण। भूतांसी लागे दारुण। तें कठिण वचन बोलेना॥ ७६॥ तेथें जातांही निजप्राण। भूतांचे न बोले दोषगुण। या नांव गा ‘वाचिक’ भजन। उद्धवा जाण निश्चित॥ ७७॥ जेणें भूतांसी होय उपकार। ते ते करी देहव्यापार। भेदितांही निजजिव्हार। जो अपकारा कर उचलीना॥ ७८॥ स्वयें साहूनियां अपकार। जो अपकारियां करी उपकार। ऐसा ज्याचा शरीरव्यापार। तें भजन साचार ‘कायिक’॥ ७९॥ यापरी काया-वाचा-मनें। सर्वभूतीं भगवद्भजन। हेंचि मुख्यत्वें श्रेष्ठ साधन। भक्त सज्ञान जाणती॥ ३८०॥ ब्रह्मप्राप्तीचें परम कारण। हेंचि एक सुगम साधन। मजही निश्चयें मानलें जाण। देवकीची आण उद्धवा॥ ८१॥ हा भजनधर्म अतिशुद्ध। येथें विघ्नांचा संबंध। अल्पही रिघों न शके बाध। तेंचि विशद हरि सांगे॥ ८२॥
न ह्यङ्गोपक्रमे ध्वंसो मद्धर्मस्योद्धवाण्वपि।
मया व्यवसित: सम्यङ्निर्गुणत्वादनाशिष:॥ २०॥
अनेक धर्म नाना शास्त्रार्थी। मन्वादि मुखें बोलिले बहुतीं। परी सर्वभूतीं भगवद्भक्ती। श्रेष्ठ सर्वार्थीं साधकां॥ ८३॥ ये भक्तीचें हेंचि श्रेष्ठपण। इचे पूर्वारंभीं जाण। साधकांपाशीं अल्पहीविघ्न। बाधकपण धरूं न शके॥ ८४॥ ये भक्तीचें निजलक्षण। पूर्वारंभीं हे निर्गुण। एथ रिघावया विघ्न। दाटुगेंपण धरीना॥ ८५॥ जेवीं गरुडाचे झडपेतळीं। होती सर्पाच्या चिरफाळी। तेवीं ये भक्तीजवळी। विघ्नांची होळी स्वयें होये॥ ८६॥ माझिया नामापुढें। विघ्न राहों न शके बापुडें। तें माझे भक्तीकडे। कोणते तोंडें येईल॥ ८७॥ यापरी हे भक्ति सधर। उद्धवा तुझें भाग्य थोर। म्यां फोडूनि निजजिव्हार। साराचें सार सांगितलें॥ ८८॥ निष्काम जे माझी भक्ती। तेथ विघ्नांची न पडे गुंती। परब्रह्माची ब्रह्मस्थिती। सुलभत्वें प्राप्ती साधकां॥ ८९॥ हेतुक अहेतुक कर्माचरण। तेंही करी जो कृष्णार्पण। ते उत्तम माझी भक्ती जाण। तेंचि निरूपण हरि सांगे॥ ३९०॥
यो यो मयि परे धर्म: कल्प्यते निष्फलाय चेत्।
तदायासो निरर्थ: स्याद्भयादेरिव सत्तम॥ २१॥
व्यवहारार्थ जो प्रयास केला। जो न फळतां व्यर्थ गेला। तोही जैं परब्रह्मीं अर्पिला। तैं मद्भजनीं लागला सद्भावें॥ ९१॥ शिमगियाचा महासण। तेथ खेळ खेळला जो आपण। तोही केल्या कृष्णार्पण। तेही भक्ति जाण मज अर्पे॥ ९२॥ चोराभेणें लपतां वनीं। निधान आतुडे ज्यालागूनी। तेवीं व्यर्थ कर्मही मदर्पणीं। करितां मद्भजनीं महालाभ॥ ९३॥ नासलें तें सांडितां क्षितीं। तेंही लागे माझे भक्तीं। जरी ब्रह्मार्पण चित्तीं। साधक निश्चितीं दृढ मानी॥ ९४॥ कडू भोंपळॺाची खिरी। उपेगा न ये श्वानसूकरीं। ते उल्हासें कृष्णार्पण करी। तेही निर्धारीं ब्रह्मीं अर्पे॥ ९५॥ जें हारपलें न दिसे। जें सहजें उडे काळवशें। तेंही लाविल्या मदुद्देशें। होय अनायासें मदर्पण॥ ९६॥ सकळ सारांचें सार पूर्ण। कर्ममात्र कृष्णार्पण। साक्षेपें करावें आपण। ‘सद्बुद्धि’ संपूर्ण या नांव॥ ९७॥
एषा बुद्धिमतां बुद्धिर्मनीषा च मनीषिणाम्।
यत्सत्यमनृतेनेह मर्त्येनाप्नोति मामृतम्॥ २२॥
अंतरीं विषयांची आसक्ती। वरीवरी ब्रह्मार्पण म्हणती। ते ठकिले बहुतां अर्थी। तेंचि श्रीपति सांगत॥ ९८॥ एक बुद्धिमंत होती। ते निजबुद्धी घेऊन हातीं। शेखीं लागले विषयस्वार्थीं। ते ठकिले निश्चितीं देहममता॥ ९९॥ एकाची बुद्धि अतिचोखडी। वेदशास्त्रार्थीं व्युत्पत्ति गाढी। ते अभिमानें कडोविकडी। ठकिले पडिपाडीं ज्ञानगर्वें॥ ४००॥ बुद्धिमंत अभ्यासी जन। अभ्यासें साधिती प्राणापान। ते योगदुर्गीं रिघतां जाण। ठकिले संपूर्ण भोगसिद्धीं॥ १॥ एक मानिती कर्म श्रेष्ठ। वाढविती कर्मकचाट। विधिनिषेधीं रुंधिली वाट। बुडाले कर्मठ कर्मामाजीं॥ २॥ यापरी नानाव्युत्पत्ती। करितां ठकले नेणों किती। तैसी नव्हे माझी भक्ती। सभाग्य पावती निजभाग्यें॥ ३॥ माझें सर्वभूतीं ज्यासीं भजन। त्याचे बुद्धीची बुद्धी मी आपण। ते तूं बुद्धी म्हणसी कोण। कर्म ब्रह्मार्पण ‘महाबुद्धी’॥ ४॥ सर्वभूतीं माझें भजन। सर्व कर्म मदर्पण। हे बुद्धीचि ‘महाबुद्धि’ जाण। येणें ब्रह्म परिपूर्ण स्वयें होती॥ ५॥ चतुरांचें चातुर्य गहन। या नांव बोलिजे गा आपण। मिथ्या देहें करूनि भजन। ब्रह्म सनातन स्वयें होती॥ ६॥ आधीं मायाचि तंव वावो। मायाकल्पित मिथ्या देहो। तें देहकर्म मज अर्पितां पहा हो। ब्रह्म स्वयमेवो स्वयें होती॥ ७॥ मिथ्या देहाचेनि भजनें। सत्य परब्रह्म स्वयें होणें। जेवीं कोंडा देऊनि आपणें। कणांची घेणें महाराशी॥ ८॥ देतां फुटकी कांचवटी। चिंतामणी जोडे गांठीं। कां इटेच्या साटोवाटीं। जोडे उठाउठीं अव्हाशंख॥ ९॥ तेवीं मिथ्या देहींचें कर्माचरण। जेणें जीवासी दृढ बंधन। तें कर्म करितां मदर्पण। ब्रह्म परिपूर्ण स्वयें होती॥ ४१०॥ अनित्य देहाचियासाठीं। नित्यवस्तूसी पडे मिठी। हेचि बुद्धिमंतीं बुद्धि मोठी। ‘ज्ञानाची संतुष्टी’ या नांव म्हणिपे॥ ११॥ निष्टंकित परमार्थ। स्वमुखें बोलिला श्रीकृष्णनाथ। तो कळसा आणोनियां ग्रंथ। उपसंहारार्थ सांगतु॥ १२॥
एष तेऽभिहित: कृत्स्नो ब्रह्मवादस्य सङ्ग्रह:।
समासव्यासविधिना देवानामपि दुर्गम:॥ २३॥
संक्षेपें आणि सविस्तरें। सांडूनि नाना मतांतरें। म्यां सांगितलें निजनिर्धारें। ब्रह्मज्ञान खरें अतिशुद्ध॥ १३॥ तुज सांगितलें करून सुगम। परी हें ब्रह्मादि देवां दुर्गम। जे आलोडिती आगमनिगम। त्यांसीही परम दुस्तर॥ १४॥ तेथें नाना शास्त्रशब्दबोध। वस्तु नेणोनि करिती विवाद। जेथ वेदांचा ब्रह्मवाद। होय नि:शब्द ‘नेति’ शब्दें॥ १५॥ तें हें आत्मज्ञानाचें निजसार। परमार्थाचें गुह्य भांडार। मज परमात्म्याचें जिव्हार। फोडूनि साचार सांगितलें॥ १६॥
अभीक्ष्णशस्ते गदितं ज्ञानं विस्पष्टयुक्तिमत्।
एतद्विज्ञाय मुच्येत पुरुषो नष्टसंशय:॥ २४॥
जेथ वेदशास्त्रांसी कुवाडें। जें बोलीं बोलतां नातुडे। तेंचि ज्ञान म्यां तुजपुढें। निजनिवाडें सांगितलें॥ १७॥ जें सांगितलें शुद्ध ज्ञान। तें नाना युक्तींकरूनि जाण। दृढतेलागीं निरूपण। पुन: पुन: जाण म्यां केलें॥ १८॥ बहुत न लावितां खटपट। तुज न वाटतांही कष्ट। ज्ञान सांगितलें विस्पष्ट। जेणें होती सपाट संशय सर्व॥ १९॥ हें जाणितलिया ज्ञान। सर्व संशय होती दहन। साधक होय ब्रह्मसंपन्न। स्वानंदपूर्ण सर्वदा॥ ४२०॥ म्यां सांगितलें गुह्यज्ञान। एकादशाचें निरूपण। याचें श्रवण पठण मनन। करी तो धन्य उद्धवा॥ २१॥
सुविविक्तं तव प्रश्नं मयैतदपि धारयेत्।
सनातनं ब्रह्म गुह्यं परं ब्रह्माधिगच्छति॥ २५॥
ज्ञाते तरती हें नवल कोण। परी भाळेभोळे जे अज्ञान। त्यांसी उद्धरावया जाण। उद्धवा तुवां प्रश्न पुशिला॥ २२॥ त्या प्रश्नानुसारें जाण। म्यां संतोषोनि आपण। सांगितलें गुह्य ज्ञान। परम कारण परब्रह्म॥ २३॥ जेवीं वत्साचे हुंकारें। धेनु स्रवत चाले क्षीरें। तेवीं तुझेनि प्रश्नादरें। मी स्वानंदभरें तुष्टलों॥ २४॥ तेथ न करितांही प्रश्न। होतां तानयाचें अवलोकन। कूर्मी नेत्रद्वारां आपण। अमृतपान करवीत॥ २५॥ तेवीं उद्धवा तुझें अवलोकन। होतां माझें हृदयींचें ब्रह्मज्ञान। तें वोसंडलें गा परिपूर्ण। तें हें निरूपण म्यां केलें॥ २६॥ येणें निरूपणमिसें। परमामृत सावकाशें। तुज म्यां पाजिलें अनायासें। स्वानंदरसें निजबोधु॥ २७॥ सिंधु मेघा जळपान करवी। तेणें जळें मेघ जगातें निववी। तेवीं उद्धवाचिये ब्रह्मपदवीं। जडमूढजीवीं उद्धरिजे॥ २८॥ जेवीं वत्साचेनि प्रेमभरें। गाय दुभे तें घरासी पुरे। तेवीं उद्धवप्रश्नादरे। जग उद्धरे अनायासें॥ २९॥ तो हा प्रश्नोत्तरकथानुवाद। माझा तुझा ब्रह्मसंवाद। निरूपणीं एकादशस्कंध। हा अर्थावबोध जो राखे॥ ४३०॥ अथवा हें निरूपण। सार्थकें जो कां करीश्रवण। तैं श्रोते वक्ते उभय जाण। ब्रह्म सनातन स्वयें होती॥ ३१॥ जगीं ब्रह्म असतां परिपूर्ण। मनबुद्धिइंद्रियां न दिसे जाण। जेथें वेदांसी पडिलें मौन। तें गुह्यज्ञान पावती॥ ३२॥ ज्ञान पावलिया पुढती। कदा काळें नव्हे च्युती। हा एकादशार्थ धरितां चित्तीं। पदप्राप्तीअच्युत॥ ३३॥ श्रोते वक्ते एकादशार्थी। एवढी पदवी पावती। मा मद्भक्तांसी अतिप्रीतीं। जे उपदेशिती हें ज्ञान॥ ३४॥ त्यांच्या फळाची फलप्राप्ती। ज्ञानोपदेशाची शुद्ध स्थिती। उद्धवालागीं अतिप्रीतीं। स्वमुखें श्रीपती सांगत॥ ३५॥
य एतन्मम भक्तेषु सम्प्रदद्यात् सुपुष्कलम्।
तस्याहं ब्रह्मदायस्य ददाम्यात्मानमात्मना॥ २६॥
काया वाचा आणि चित्त। ग्रह दारा वित्त जीवित। निष्कामता मज अर्पित। अनन्य भक्त ते माझे॥ ३६॥ ऐशिया भक्तांच्या ठायीं जाण। अवश्य उपदेशावें हें ज्ञान। त्याही उपदेशाचें लक्षण। पक्व परिपूर्ण तें ऐसें॥ ३७॥ जेथ जेथ जाय साधकाचें मन। तेथ तेथ ब्रह्म परिपूर्ण। मन निघावया तेथून। रितें स्थान असेना॥ ३८॥ ऐसें करितां अनुसंधान। चैतन्यीं समरसे मन। त्यातें म्हणिजे ‘पुष्कल ज्ञान’। उपदेश पूर्ण या नांव॥ ३९॥ ऐसें समूळ ब्रह्मज्ञान। मद्भक्तांसी जो करी दान। त्याचा ब्रह्मऋणिया मी जाण। होय संपूर्ण उद्धवा॥ ४४०॥ त्याचिया उत्तीर्णत्वासी। गांठीं कांहीं नाहीं मजपाशीं। मी निजरूप अर्पीं त्यासी। अहर्निशीं मी त्याजवळी॥ ४१॥ जो शिष्यांसी दे ब्रह्मज्ञान। मी परमात्मा त्या अधीन। ब्रह्मदात्याच्या बोलें जाण। स्त्रियादि शूद्रजन मी उद्धरीं॥ ४२॥ देऊनियां परब्रह्म। जो मद्भक्तांसी करी निष्कर्म। त्याचा अंकित मी पुरुषोत्तम। तो प्रिय परम मजलागीं॥ ४३॥ जो ब्रह्मज्ञान दे मद्भक्तां। त्याहूनि आणिक परता। मज आन नाहीं गा पढियंता। जाण तत्त्वतां उद्धवा॥ ४४॥ तो आत्मा मी शरीर जाण। त्याचा देह मी होय आपण। त्याचें जें जें कर्माचरण। तें तें संपूर्ण मीचि होय॥ ४५॥ जैसा मी अवतारधारी। तैसाचि तोही अवतारी। त्या आणि मजमाझारीं। नाहीं तिळभरी अंतर॥ ४६॥ जो या ब्रह्मज्ञानाचें करी दान। त्यासी यापरी मी आपण। करीं निजात्म अर्पण। तरी उत्तीर्ण नव्हेचि॥ ४७॥ यालागीं वर्ततांही शरीरीं। मी अखंड त्याची सेवा करीं। निजात्म अर्पण प्रीतीवारी। मी त्याच्या घरीं सर्वदा॥ ४८॥ त्यातें जें जें जडभारी। तेंही मी वाहें आपुले शिरीं। माझी चैतन्यसाम्राज्यश्री। नांदें त्याचे घरीं सर्वदा॥ ४९॥ एकादशाचें ब्रह्मज्ञान। बोधूनि मद्भक्तां जो करी दान। त्यासी मी यापरी जाण। आत्मार्पण स्वयें करीं॥ ४५०॥ असो न साधवे ब्रह्मज्ञान। तरी या ग्रंथाचेंचि पठण। जो सर्वदाकरी सावधान। तो परम पावन उद्धवा॥ ५१॥
य एतत्समधीयीत पवित्रं परमं शुचि।
स पूयेताहरहर्मां ज्ञानदीपेन दर्शयन्॥ २७॥
निखळ जें कां ब्रह्मज्ञान। तो हा माझा तुझा संवाद जाण। जो सादरें करी पठण। सावधान श्रद्धाळू॥ ५२॥ चढत्यावाढत्या परवडी। शुद्ध सात्त्विकी श्रद्धा गाढी। पदोपदीं नीच नवी गोडी। अद्भुत आवडी पठणाची॥ ५३॥ वाचेचिया टवळॺांप्रती। श्रद्धास्नेहाची संपत्ति। निजजिव्हा करूनि वाती। जो हें ज्ञानदीप्ती प्रकाशी॥ ५४॥ एकादशाचे ज्ञानदीप्ती। एकादश इंद्रियांच्या वाती। उजळूनि जे मज वोंवाळिती। ते पवित्र किती मी सांगूं॥ ५५॥ यापरी जें ग्रंथपठण। तें माझें ज्ञान-निरांजन। तेणें ज्ञानदीपें जो जाण। माझें स्वरूप पूर्ण प्रकाशी॥ ५६॥ त्याचे लागले जे संगती। त्यांतें ब्रह्मादिक वंदिती। त्यांचेनि पावन त्रिजगती। जाण निश्चितीं उद्धवा॥ ५७॥ असो ज्यांसी न टके पठण। तिंहीं श्रद्धेनें करितां श्रवण। त्यांसी न बाधी भवबंधन। तेंही निरूपण हरि सांगे॥ ५८॥
य एतच्छ्रद्धया नित्यमव्यग्र: शृणुयान्नर:।
मयि भक्तिं परां कुर्वन् कर्मभिर्न स बध्यते॥ २८॥
असो न करवे अध्ययन। तरी श्रद्धायुक्त सावधान। करितां एकादशाचें श्रवण। कर्मबंधन बाधीना॥ ५९॥ अति श्रद्धेनें केलें श्रवण। त्याहूनि दृढ व्हावें मनन। मननेंवीण तें नपुंसक जाण। ब्रह्मप्राप्ति पूर्ण फळेना॥ ४६०॥ संपलिया कथाश्रवण। मनींचें संपावें ना मनन। जैसें लोभियाचें धन। हृदयीं आठवण सर्वदा॥ ६१॥ जैसें जैसें कीजे श्रवण। तैसें तैसें लागे मनन। मननानुसारें भजन। ‘पराभक्ती’ जाण उद्बोधे॥ ६२॥ आर्त जिज्ञासु अर्थार्थी। यांची सांडोनिया स्थिती। उल्हासे माझी चौथी भक्ती। जितें ‘परा’ म्हणती सज्ञान॥ ६३॥ पराभक्तीचें माझें भजन। क्रियामात्रें निजात्मदर्शन। यालागीं मद्भक्तांसी जाण। कर्मबंधन बाधीना॥ ६४॥ हें असो अतिगुह्य बोलणें। येणें एकादशाचेनि श्रवणें। ‘मी तरेन’ हा विश्वास जेणें। अंत:करणें दृढ केला॥ ६५॥ दृढ विश्वास मानूनि पाहीं। जो लोधला श्रवणविषयीं। माझी भक्ती त्याच्या ठायीं। दवडितां पाहीं घर रिघे॥ ६६॥ घर रिघोन भक्ति निष्काम। भक्तांचें निर्दळी सकळ कर्म। या नांव ‘पराभक्ति’ परम। विश्रामधाम श्रवणार्थ्यां॥ ६७॥ एकादशाचें श्रद्धाश्रवण। करितां एवढा लाभ पूर्ण। श्रवणें उपजे माझें भजन। भजनें भक्तजन निर्मुक्त॥ ६८॥ असो पां इतरांची वार्ता। म्यां तुज निरूपिली जे ज्ञानकथा। ते तुझिया निश्चितार्था। काय तत्त्वतां प्रतिबोधली॥ ६९॥
अप्युद्धव त्वया ब्रह्म सखे समवधारितम्।
अपि ते विगतो मोह: शोकश्चासौ मनोभव:॥ २९॥
उद्धवा तुझें देखोनि प्रेम। गुह्य ज्ञान अति उत्तम। तुज म्यां निरूपिलें परब्रह्म। साङ्ग सुगम अतिशुद्ध॥ ४७०॥ हें ज्ञानाचें सोलींव ज्ञान। हें वेदांचें विसावतें स्थान। हेचि अविद्येची बोळवण। समाधान जिवशिवां॥ ७१॥ ऐसें हें जें गुह्यज्ञान। मन बुद्धि वाचेसी अगम्य जाण। तें म्यां तुज केलें निरूपण। श्रद्धा संपूर्ण देखोनि॥ ७२॥ जेवीं सखा सख्याप्रती। आपुली वोपी निजसंपत्ती। तेवीं म्यां हे ब्रह्मस्थिती। तुझ्या हातीं वोपिली॥ ७३॥ जैसें दिधलें श्रवणाच्या हातीं। तैसें प्रविष्ट जाहलें तुझिया चित्तीं। कीं माझारीं पडली कांहीं गुंती। विकल्पवस्ती विक्षेप॥ ७४॥ म्यां निरूपिलें सार परम। तें तुज कळलें परब्रह्म। नसेल तरी हाचि उपक्रम। पुढती सुगम सांगेन॥ ७५॥ चैतन्य ठसावोनि चित्तीं। जेथ आकळिली ब्रह्मस्थिती। तेथ मोह ममतेची वस्ती। समूळ निश्चितीं नसावी॥ ७६॥ आकळलें ब्रह्मज्ञान। त्याची हेचि वोळखण। संकल्पविकल्पविंदान। पुढती जाण उपजेना॥ ७७॥ उपजेना मीतूंपण। उपजेना ध्येय ध्याता ध्यान। नुपजे त्यासी कर्मठपण। ब्रह्म परिपूर्ण जाणितल्या॥ ७८॥ जेणें जाणितलें ब्रह्मज्ञान। त्यासी बाधीना कर्मबंधन। कर्माचें जें कर्माचरण। तें जाण आपण मायिक॥ ७९॥ जेवीं छाया चळे पुरुषाचेनी। परी तियेचा लोभ पुरुष न मानी। तेवीं काया चाळी ब्रह्मज्ञानी। देहाभिमानी तो नव्हे॥ ४८०॥ जेवीं सूर्यापुढें आंधार। अर्ध क्षण न धरी धीर। तेवीं ब्रह्मज्ञानी कर्मादर। अणुमात्र उरेना॥ ८१॥ कर्माचें जें कर्मबंधन। तो मनोजन्य संकल्प जाण। जेथें मनाचें मोडे मनपण। तेथें कर्माचरण निर्बीज॥ ८२॥ वस्तु नित्य निर्विकल्प। तेथें नाहीं संकल्पविकल्प। हें परब्रह्माचें निजस्वरूप। हेंचि रूप स्वानुभवासी॥ ८३॥ ऐसें ब्रह्म पावल्या स्वयमेवो। मी एक उद्धव होतों पहा हो। त्या उद्धवपणासी नाहीं ठावो। मा शोकमोहो तेथ कैंचा॥ ८४॥ उद्धवपणाचिये वस्ती। शोकमोहांची उत्पत्ती। तें उद्धवपण नाठवे चित्तीं। जरी ब्रह्मप्राप्ति तुज जाहली॥ ८५॥ ऐसें ऐकतां देवाचें वचन। उडालें उद्धवाचें उद्धवपण। जाहला स्वानंदी निमग्न। बोलतेपण बुडालें॥ ८६॥ पावतां आपुली निजात्मता। उडाली उद्धवत्वाची अवस्था॥ बुडाली स्वदेह अहंता। निजनिमग्नता स्वानंदीं॥ ८७॥ तेथें देवें पुशिला जो प्रश्न। त्याचें कोण दे प्रतिवचन। कृष्णेंसहित उद्धवपण। गिळोनि परिपूर्ण वस्तु जाहला॥ ८८॥ देखोनि उद्धवाची अवस्था। हा ब्रह्म पावला निजात्मता। हें कळों सरलें श्रीकृष्णनाथा। हृदयस्था काय न कळे॥ ८९॥ शिष्य साचार अनुभव लाहे। तेणें सद्गुरु सुखाचा मेरु होये। जेवीं तानयाचे धणींमाये। सुखावली राहे स्वानंदें॥ ४९०॥ सेवक विभांडितां परचक्र। तेणें रायासी संतोष थोर। गुढी उभारूनि साचार। करी निजगजर स्वानंदें॥ ९१॥ तानयाचे लळे पुरविणें। हे व्यालीची वेदना जाणे। कां शिष्यासी स्वानुभव देणें। हें स्वयें जाणे सद्गुरु॥ ९२॥ निजपुत्रें लाधल्या निधान। पिता संतोषे आपण। तेवीं उद्धवाचेनि अनुभवें जाण। स्वयें श्रीकृष्ण संतोषे॥ ९३॥ कृष्णसुखें सुखरूप नित्यतां। तोही शिष्यानुभवें सर्वथा। लाहे सुखाची परमावस्था। हे गुरुगम्यता अगम्य॥ ९४॥ शिष्यासी बोध करितां। गुरूसि नसती सुखावस्था। तरी उपदेश परंपरता। नव्हती तत्त्वतां इये लोकीं॥ ९५॥ गुरु सांगे जैं उबगले साठीं। तैं ते शिष्यासी बोधेना गोष्टी। मा निजानुभवाची भेटी। केवीं निजदृष्टीं देखेल॥ ९६॥ जेवीं बाळासी लेणें लेववितां। तें नेणें परी सुखावे माता। तेवीं शिष्यासी अनुभव होतां। सुखावे तत्त्वतां सद्गुरुरावो॥ ९७॥ तैसा उद्धवाचा ब्रह्मभावो। देखोनि सुखावे कृष्णदेवो। माझा उद्धव जाहला नि:संदेहो। यासी ब्रह्मानुभवो आकळिला॥ ९८॥ उद्धवाची ब्रह्मनिष्ठता। अनुभवा आली निजात्मता। हें कळों सरलें श्रीकृष्णनाथा। परोपदेशार्था शिकवीत॥ ९९॥ तूं पावल्या ब्रह्मज्ञान। तेथ शिष्योपदेशलक्षण। पात्रशुद्धीचें कारण। तेही वोळखण हरि सांगे॥ ५००॥
नैतत्त्वया दाम्भिकाय नास्तिकाय शठाय च।
अशुश्रूषोरभक्ताय दुर्विनीताय दीयताम्॥ ३०॥
शठ नास्तिक दंभयुक्त। अशुश्रूषु आणि अभक्त। ज्यांची स्थिति दुर्विनीत। ते शिष्य निश्चित त्यागावे॥ १॥ जेणें लोकरूढी होय गहन। तें तें बाह्य कर्माचरण। विपुल धन आणि सन्मान। तदर्थीं जाण अतितृष्णा॥ २॥ ऐसें ज्याचें दांभिक भजन। त्यासी हें एकादशींचें ज्ञान। वोसणतां गा आपण। स्वप्नींही जाण नेदावें॥ ३॥ मोहममतेचें आधिक्य। तेणें निर्दळिलें निजआस्तिक्य। वेदीं शास्त्रीं दृढ नास्तिक्य। देवचि मुख्य नाहीं म्हणती॥ ४॥ नास्तिक्यवादाचिया बंडा। या ज्ञानाचा ढोरकोंडा। लागों नेदी त्यांचिया तोंडा। ज्यांचा भाव कोरडा नास्तिक्यें केला॥ ५॥ नास्तिक्यवादापुढें। ज्ञान कायसें बापुडें। अनीश्वरवादाचें बंड गाढें। ते त्यागावे रोकडे नास्तिक्यवादी॥ ६॥ अनन्यभावें न रिघे शरण। मिथ्या लावूनि गोडपण। धूर्तवादें घेवों पाहे ज्ञान। तेही शठ जाण त्यागावे॥ ७॥ शठाची ऐशी निजमती। पुढिलांची ठकूनि घे युक्ती। परी जे आपुली व्युत्पत्ती। ते पुढिलांप्रती सांगेना॥ ८॥ काया वाचा मन धन। जो गुरूसीं करी वंचन। जो गुरूचे देखे दोषगुण। तोही शठ पूर्ण त्यागावा॥ ९॥ माझें अतिथोर महिमान। गुरुसेवा केवीं करूं आपण। सेवा न करी महिमेभेण। तोही शिष्य जाण त्यागावा॥ ५१०॥ आपण श्रेष्ठासनीं बैसोनि बरवा। सेवकाहातीं करवी गुरुसेवा। तो दांभिक शिष्य जाणावा। तोही त्यागावा ये ग्रंथी॥ ११॥ सद्गुरूपाशीं समर्थपण। जो आपली मिरवी जाणीव जाण। जो सेवा न करी गर्वें पूर्ण। तो शिष्य जाण त्यागावा॥ १२॥ मी धनदानी अतिसमर्थ। नीचसेवेसी न लावीं हात। ऐसाही जो गर्वयुक्त। तोही निश्चित त्यागावा॥ १३॥ जो लौकिक लाजेभेण। गुरुसेवा न करी आपण। ज्यासी लौकिकाचा अतिअभिमान। तोही शिष्य जाण त्यागावा॥ १४॥ जो गुरुगृहींचें नीच कृत्य। न करी मानूनि मी समर्थ। तो मान्यता अभिमानयुक्त। जाण निश्चित त्यागावा॥ १५॥ न करी गुरुसेवा नीचवृत्ती। आम्हां अखंड ध्यान हेचि गुरुभक्ती। ऐशी सेवावंचक ज्याची युक्ती। तोही निश्चितीं त्यागावा॥ १६॥ नीच सेवा न करी आपण। म्हणे मागाल तें देईन धन। ऐसा धनगर्वी शिष्य आपण। सर्वथा जाण न करावा॥ १७॥ धरूनि धनाची आस। गुरु शिष्यासी देत उपदेश। तैं ब्रह्मज्ञान पडलें वोस। वाढला असोस धनलोभ॥ १८॥ अथवा वेंचूनिया धन। जो घेईन म्हणे ब्रह्मज्ञान। ऐसा धनाभिमानी शिष्य जाण। सर्वथा आपण न करावा॥ १९॥ यथाकाळें जाहली प्राप्त। गुरुसेवा जे कालोचित। न करी तो ‘अशुश्रूषु’ म्हणत। तोही निश्चित त्यागावा॥ ५२०॥ करितां सद्गुरूची भक्ती। मी उद्धरेन निश्चितीं’। ऐसा भाव नसे ज्याचे चित्तीं। तो शिष्य हातीं न धरावा॥ २१॥ सद्गुरु तोचि ब्रह्ममूर्ती। ऐसा भाव नाहीं ज्याच्या चित्तीं। मूळींच विकल्पाची वस्ती। तोही शिष्य हातीं न धरावा॥ २२॥ गुरुहोनि ब्रह्म भिन्न। ऐसें ज्याचें निश्चित ज्ञान। तो निश्चयेंसीं ‘अभक्त’ जाण। त्यासी शिष्य आपण न करावें॥ २३॥ मनुष्य मानूनि सद्गुरूसी। जो उल्लंघी गुरुवचनासी। तो जाण पडला अपभ्रंशीं। त्या शिष्यासी त्यागावें॥ २४॥ सद्गुरूहोनि अधिकता। शिष्य आपुली मानी पवित्रता। तो अभक्तांमाजीं पूर्ण सरता। त्यासी तत्त्वतां त्यागावें॥ २५॥ गुरूच्या ठायीं ब्रह्मस्थिती। ज्यासी श्रद्धा संपूर्ण नाहीं चित्तीं। याचि नांव गा ‘अभक्ती’। जाण निश्चितीं उद्धवा॥ २६॥ कां ये ग्रंथींचें ब्रह्मज्ञान। ज्यासी निश्चयें नमने जाण। त्यासी केव्हांही आपण। झणें विसरोन शिष्य करिसी॥ २७॥ ये ग्रंथींची ब्रह्मस्थिती। वक्ता जो मी परब्रह्ममूर्ती। त्या माझ्या ठायीं नाहीं ज्याची भक्ती। तो शिष्य निश्चितीं त्यागावा॥ २८॥ ये ग्रंथींचें आवडे ज्ञान। गुरूच्या ठायीं श्रद्धा संपूर्ण। परी ज्याचें उद्धत वर्तन। तो शिष्य जाण त्यागावा॥ २९॥ माझ्या निजमूर्ति संत सज्जन। माझे भक्त माझे जीवप्राण। त्यांचें जो करी हेळण। ‘दुर्विनीतपण’ या नांव॥ ५३०॥ माझ्या भक्तांमाजील रंक जाण। त्याचे सर्वस्वें वंदावे चरण। हें ज्यासी नावडे संपूर्ण। ‘दुर्विनीतपण’ या नांव॥ ३१॥ साधुसज्जनां भेटों जाये। शठनम्रता वंदी पाये। त्याचे गिवसोनि दोषगुण पाहे। ‘दुर्विनीतता’ राहे ते ठायीं॥ ३२॥ दुष्टबुद्धीची जे विनीतता। ती नांव बोलिजे ‘दुर्विनीतता’। ऐशी ज्या शिष्याची अवस्था। तो जाण तत्त्वतां त्यागावा॥ ३३॥ ऐसें हें ऐकोनि निरूपण। म्हणसी ‘मी शिष्य न करीं जाण’। तरी जो सच्छिष्यासी उपदेशी ब्रह्मज्ञान। तो आत्मा जाण पैं माझा॥ ३४॥ जो उपदेशीं सत्पात्र पूर्ण। त्या सच्छिष्याचें लक्षण। तुज मी सांगेन निरूपण। ऐक सावधान उद्धवा॥ ३५॥
एतैर्दोषैर्विहीनाय ब्रह्मण्याय प्रियाय च।
साधवे शुचये ब्रूयाद्भक्ति: स्याच्छूद्रयोषिताम्॥ ३१॥
उपदेशीं मुख्य अधिकारपण। धडधडीत वैराग्य पूर्ण। तेंही पिशाचवैराग्य नव्हे जाण। विवेकसंपन्न शास्त्रोक्त॥ ३६॥ दिवस चारी वैराग्य केलें। सवेंचि विषयार्थीं लागले। तेथ जें जें उपदेशिलें। तें सर्पासि पाजिलें दुग्ध जैसें॥ ३७॥ जेथ वैराग्य निघोनि जाये। तेथ ज्ञानाभिमानउरला राहे। तेणें अभिमानें करी काये। गुणदोष पाहे श्रेष्ठांचे॥ ३८॥ नीच निंदी हेळसून। श्रेष्ठांचे पाहे दोषगुण। जेथ वैराग्य होय क्षीण। तेथें ज्ञानाभिमान चढे ऐसा॥ ३९॥ उद्धवा जगीं दोनीअवस्था। वैराग्य कां विषयासक्तता। तिसरे अवस्थेची कथा। जाण सर्वथा असेना॥ ५४०॥ जेथ विवेकें विषयो होय क्षीण। तेथ वैराग्य प्रबळे परिपूर्ण। जेथ विवेकेंसीं वैराग्य क्षीण। तेथविषयाचरण ज्ञानाभिमानें॥ ४१॥ यालागीं होय जंव ब्रह्मज्ञान। तंव जो वैराग्य राखे पूर्ण। वैराग्यें गुरूसी अनन्यशरण। तें ‘अधिकारीरत्न’ उपदेशा॥ ४२॥ गत श्लोकींचें दोषनिरूपण। आतां बोलिलों वैराग्यार्थ जाण। इहीं दोषीं ज्यासी रहितपण। तो ‘अधिकारी’ पूर्ण सच्छिष्य॥ ४३॥ ज्यासीब्रह्मत्वें ब्राह्मणभक्ती। अनन्यभावें भजे भूतीं। त्याची आंदणी भक्ती विरक्ती। तो जाण निश्चितीं ‘अधिकारी’॥ ४४॥ गुरूचा पढियंताही पूर्ण। त्यापासीं असल्या अभक्तपण। त्यासी नव्हे ब्रह्मज्ञान। अनन्य भजन जंव न करी॥ ४५॥ प्रिय आणि भजनशीळ। दोषरहित निर्मळ। त्यासी विरक्त करूनि अढळ। उपदेशावें प्रांजळ हें गुह्य ज्ञान॥ ४६॥ स्वदारा आणि स्वधन। यांचा लोभ ज्यासी संपूर्ण। त्यासी स्वर्ग ना मुक्तपण। जन्ममरण अनिवार॥ ४७॥ परदारा परधन। सर्वथा नातळे ज्याचे मन। ऐसें ज्यापाशीं पवित्रपण। त्यासी हें ज्ञान उपदेशावें॥ ४८॥ जो वैराग्याचा वोतिला। विवेकें पूर्ण वोसंडला। सद्गुरुसेवेसी जीवें विकला। चरणीं विनटला अनन्यत्वें॥ ४९॥ सांडूनि निजमहिमान। श्रीगुरुसेवेलागीं आपण। ज्यासी आवडे रंकपण। ऐसा सेवेसी पूर्ण सद्भाव॥ ५५०॥ अमरश्रेष्ठजे सुरवर। ते मानी सद्गुरूचे किंकर। सद्गुरूहूनियां थोर। हरिहर मानीना॥ ५१॥ ज्यासी नाहीं गर्व मद। ज्यासी नाहीं कामक्रोध। ज्यासी नावडे विकल्पभेद। तो शिष्य शुद्ध परमार्थी॥ ५२॥ काया वाचा मन धन। सांडूनि समर्थता महिमान। जो सद्गुरूसी अनन्यशरण। तो सच्छिष्य जाण साधुत्वें॥ ५३॥ सांडूनि लज्जा लौकिक। जो ब्रह्मज्ञानाचा याचक। सद्गुरुवचनार्थीं चातक। तो आवश्यक उपदेशीं॥ ५४॥ जे कां द्विजन्म्यांहूनि बाहेरी। वेदें वाळूनि सांडिले दूरीं। जे कां मंत्रार्थीं अमंत्री। जे अनधिकारी श्रवणासी॥ ५५॥ ज्यांसी नाहीं आश्रमधर्म। ज्यांसी नाहीं श्रौतकर्म। ज्यांसी नाहीं जप होम। जे वर्णाधम अतिनीच॥ ५६॥ ऐसे जे कां शूद्रजन। ऐकोनि ये ग्रंथींचें ज्ञान। निवाराया जन्ममरण। उपजे दारुण विरक्ती॥ ५७॥ उखितांच एकसरें चित्तें। मनींहूनि विटे विषयांतें। मग चित्तें वित्तें जीवितें। रिघे सद्गुरूतें अनन्यशरण॥ ५८॥ गुरूसी पुसों नेणे प्रश्न। म्हणे निवारीं जन्ममरण। भावार्थें घाली लोटांगण। शुद्ध श्रद्धा संपूर्ण परमार्थीं॥ ५९॥ ते होत कां शूद्रजन। त्यांसी उपदेशिता ब्रह्मज्ञान। उद्धवा कदा न लागे दूषण। हें सत्यवचन पैं माझें॥ ५६०॥ जे कां अपेक्षोनियां वित्त। चतुर्वर्णा उपदेशित। ते धनलोभें लोलुप एथ। नाहीं घेइजेत गुरुत्वें॥ ६१॥ जेथ गुरूशींच सलोभता। तेथ शिष्याची बुडे विरक्तता। ऐशिये ठायीं उपदेश घेतां। परमार्थतां अपघातु॥ ६२॥ निर्लोभत्वें कृपेनें पूर्ण। सद्गुरु उपदेशी शूद्रजन। ऐसेनि करी जो दीनोद्धरण। तेथ न लगे दूषण। उपदेशा॥ ६३॥ जेणें तडफडूनि जाण। वैराग्याशी ये मरण। जेणें ज्ञात्यासी लागे दूषण। तो स्त्रीसंग आपण न करावा॥ ६४॥ स्त्री देखतांचि अवचितीं। तत्काल पाडी अध:-पातीं। तिची जाहलिया संगती। कैंची धडगती सज्ञाना॥ ६५॥ प्रमादीं पाडी सर्वार्थीं। हे ‘प्रमदा’ नामाची निजख्याती। तिची जाहलिया नित्य संगती। केवीं परमार्थीं तरतील॥ ६६॥ जिचें देखतांचि वदन। काम मोकली कटाक्षबाण। तेथ कायसा उपदेश जाण। आली नागवण परमार्था॥ ६७॥ उद्धवा तुज हेंचि मागतों जाण। नको स्त्रियांशीं संभाषण। नको स्त्रियांचें अवलोकन। नको स्त्रीवचन कानीं घेऊं॥ ६८॥ नको नको स्त्रियांशीं मात। नको नको स्त्रियांशीं एकांत। नको नको स्त्रियांशीं संगत। निंद्य लोकांत सर्वार्थीं॥ ६९॥ नको नको स्त्रियांचा अनुवाद। नको नको स्त्रियांचा संवाद। नको नको स्त्रियांसी करूं बोध। मिथ्या प्रवाद अंगीं वाजे॥ ५७०॥ स्वभावें सात्त्विक वनिता। गोष्टी सांगों आली परमार्था। तोचि विकल्प तत्त्वतां। सुहृदां समस्तां परिकल्पे॥ ७१॥ यालागीं प्रमदा जन। सर्वथा त्यागावा आपण। प्रमदासंगतीं ब्रह्मज्ञान। सर्वथाजाण वाढेना॥ ७२॥ आशंका॥ उपदेशीं त्याज्य स्त्रिया जरी। तरी मागिलीं थोरथोरीं। उपदेशिल्या कैशापरी। तें ऐक निर्धारीं सांगेन॥ ७३॥ श्रेष्ठ याज्ञवल्क्य पाहीं। तेणें उपनिषदांच्या ठायीं। उपदेशिली मैत्रेयी। नानायुक्तीं पाहीं प्रबोधूनि॥ ७४॥ स्वयें नारद महामुनी। प्रह्रादाची निजजननि। इंद्रापासूनी सोडवूनी। ब्रह्मज्ञानीं उपदेशी॥ ७५॥ अवतरोनि कपिलमुनी। बैसोनियां सिद्धासनीं। देवहूतीलागोनी। ब्रह्मज्ञानीं प्रबोधी॥ ७६॥ जो योगियांचा मुकुटमणी। कैलासपति शूळपाणी। भव उपदेशी भवानी। ब्रह्मज्ञानी निजबोधें॥ ७७॥ इतरांची गोठी कायशी। तुवांचि गा हृषीकेशी। उपदेशिलें यज्ञपत्न्यांसी। ऐसें म्हणसी उद्धवा॥ ७८॥ असो देखोनियां सद्भावा। उपदेश करूं म्हणशी कणवा। तरी तो अधिकार ओळखावा। ऐक उद्धवा सांगेन॥ ७९॥ ऐक उद्धवा निश्चित। वाचाळ स्त्री ते अनुचित। तेथें उपदेश करणें तें व्यर्थ। लागे अपघात गुरुत्वा॥ ५८०॥ जेथें स्त्रीस अति बडबड। ब्रह्मज्ञानें गर्जे तोंड। जेथें विषयाचा धुमाड। परमार्थ गोड परपुरुषीं॥ ८१॥ जे स्त्री ब्रह्मज्ञानीं धीट। मुखीं अत्यंत वटवट। तिसी उपदेश करूं नये स्पष्ट। अपवादाचें बोट जेणें लागे॥ ८२॥ तेथें म्यां ही केली विनंति। श्रीजनार्दन स्वामीप्रति। स्त्रिया शूद्र उपदेशार्थ येती। काय निश्चितीं सांगावें॥ ८३॥ गुरुवेगळा मार्ग नाहीं। म्हणोनि येती लवलाही। त्यांसी उपदेशावें काई। हें माझ्या हृदयीं स्मरेना॥ ८४॥ हें ऐकोनियां वचन। संतोषले श्रीजनार्दन। जेणें होय चित्ताचेंशोधन। तें ‘नाम’ जाण उपदेशी॥ ८५॥ चित्तशुद्धि झालिया जाण। वोरसोनि येतें आपण। अनन्य भावें मग शरण। आल्या ज्ञान उपदेशी॥ ८६॥ स्त्रीपुरुष-अवलोकन। जयाचे दृष्टीं समसमान। ऐसेनि अनुभवें जो परिपूर्ण। तोचि स्त्रियांसी जाण उपदेशी॥ ८७॥ तोही अधिकार न पाहतां। उपदेश न करीं सर्वथा। त्याही उपदेशाची कथा। ऐक तत्त्वतां सांगेन॥ ८८॥ म्यां ज्या कां निंदिल्या वनिता। त्यांमाजीं सभाग्या सात्त्विकता। सांडोनियां विषयावस्था। जे परमार्था उद्यत॥ ८९॥ त्यजूनियां प्रपंचाची हाव। नावडे विषयांचें नांव। वैराग्यें उठला सद्भाव। घेऊनि धांव परमार्थीं॥ ५९०॥ अतिथि आणि पतिपुत्रांसी। भोजनीं समता नित्य जिसी। धनलोभ नाहीं मानसीं। परमार्थीं तिसी अधिकारु॥ ९२॥ जन्ममरणनिवारणीं। जीवामनाची नित्य काचणी। माझे भवपाशच्छेदनीं। धर्मदाता कोणी मिळता का॥ ९२॥ सद्गुरुप्राप्तीची अतिआर्त। काया वाचा वित्त जीवित। कुरवंडी करूनि सांडित। परमार्थार्थ सद्भावें॥ ९३॥ यापरी निजपरमार्था। सद्भावें जे विनटे वनिता। उद्धवा तिसी हें उपदेशितां। दोष सर्वथा लागेना॥ ९४॥ क्षत्रिय वैश्य स्त्री शूद्रजन। यांची सच्छ्रद्धा दृढ पाहून। उपदेशितां ब्रह्मज्ञान। दोषनिर्दळण शिष्यांचे॥ ९५॥ उपदेशितां ब्रह्मज्ञान। जैं गुरुसीच लागे दूषण। तैं शिष्यासी उद्धरी कोण। हें व्याख्यान अबद्ध॥ ९६॥ पहावया पात्रशुद्धता। मी बोलिलों दोषवार्ता। वांचूनि ब्रह्मज्ञान उपदेशितां। दोष सर्वथा असेना॥ ९७॥ हें ज्ञान जाणितल्यापाठीं। जाणणेंचि सरे सृष्टीं। संसारासी पडे तुटी। तेथ दोषाची गोठी असेना॥ ९८॥
नैतद्विज्ञाय जिज्ञासोर्ज्ञातव्यमवशिष्यते।
पीत्वा पीयूषममृतं पातव्यं नावशिष्यते॥ ३२॥
ये ग्रंथींचें जाणितल्या ज्ञान। मुमुक्षु जे साधक जन। त्यांसी जाणावया आन। जाणतेपण उरेना॥ ९९॥ जेवीं केलिया अमृतपान। पुढें प्राशनासी नुरे आन। तेवीं जाणितल्या हें ज्ञान। ज्ञातव्य ज्ञातेपण समूळ नुरे॥ ६००॥ आशंका॥ धर्मार्थकाममोक्षांप्रती। साधने असतीं नेणों किती। तुवां हें एकचि श्रीपती। कैशा रीतीं प्रतिपादिलें॥ १॥ उद्धवा साधनें जीं आनान। ते अभक्त सोशिती आपण। माझ्या भक्तांसी गा जाण। मीच साधन सर्वार्थीं॥ २॥
ज्ञाने कर्मणि योगे च वार्तायां दण्डधारणे।
यावानर्थो नृणां तात तावांस्तेऽहं चतुर्विध:॥ ३३॥
मोक्षालागीं ‘ज्ञान’ साधन। धर्मालागीं ‘स्वधर्माचरण’। स्वामित्वालागीं ‘दंडधारण’। ‘अर्थोद्यम’ जाण जीविकावृत्तीं॥ ३॥ इहामुत्र कामभोग। तदर्थ करिती ‘योगयाग’। चहूं पुरुषार्थीं हा चांग। साधनप्रयोग अभक्तां॥ ४॥ ऐसें सोशितां साधन। सहसा सिद्धी न पवे जाण। अनेक विकळता दूषण। माजीं छळी विघ्न देवांचें॥ ५॥ तैसें मद्भक्तांसी नव्हे जाण। माझें करितां अनन्यभजन। चारी पुरुषार्थ येती शरण। पायां सुरगण लागती॥ ६॥ उद्धवा जे मज अनन्यशरण। त्यांचा धर्म अर्थ मीचि पूर्ण। त्यांचा काम तोही मीचि जाण। मोक्षही संपूर्ण मी त्यांचा॥ ७॥ अभक्तां भोगक्षयें पुनरावृत्ती। भक्तांसी भोग भोगितां नित्यमुक्ती। एवढी माझ्या भक्तीची ख्याती। जाण निश्चितीं उद्धवा॥ ८॥ ऐशी ऐकतां देवाची मात। उद्धव प्रेमें वोसंडला अद्भुत। तेणें प्रेमें लोधला कृष्णनाथ। हर्षें बोलत तेणेंसी॥ ९॥ उद्धवा तुझे चारी पुरुषार्थ। तो मी प्रत्यक्ष भगवंत। ऐसें बोलोनि हर्षयुक्त। हृदयाआंत आलिंगी॥ ६१०॥ हर्षें देतां आलिंगन। कृष्ण विसरला कृष्णपण। उद्धव स्वानंदीं निमग्न। उद्धवपण विसरला॥ ११॥ कैसें अभिनव आलिंगन। दोघांचें गेलें दोनीपण। पूर्ण चैतन्य स्वानंदघन। परिपूर्ण स्वयें झाले॥ १२॥ तेथ विरोनि गेला हेतु। वेदेंसहित बुडाली मातु। एकवटला देवीं भक्तु। एकीं एकांतु एकत्वें॥ १३॥ तेथ मावळले धर्माधर्म। क्रियेसहित उडालें कर्म। भ्रम आणि निर्भ्रम। या दोंहीचें नाम असेना॥ १४॥ भेद घेऊनि गेला अभेदा। बोध घेऊनि गेला निजबोधा। आनंद लाजला आनंदा। ऐशिया निजपदा उद्धव पावे॥ १५॥ मी जाहलों परब्रह्म। हाही मुख्यत्वें जेथ भ्रम। कृष्णालिंगनाचा हा धर्म। जाहला निरुपम निजवस्तु॥ १६॥ यावरी कृष्ण सर्वज्ञ। सोडोनियां आलिंगन। ऐक्यबोधें उद्धवासी जाण। निजभक्तपण प्रबोधी॥ १७॥ तेव्हां उद्धव चमत्कारला। अतिशयें चाकाटला। परम विस्मयें दाटला। तटस्थ ठेला ते काळीं॥ १८॥ मग म्हणे हे निजात्मता। स्वत:सिद्ध जवळी असतां। जनासी न कळे सर्वथा। साधकांच्या हाता चढे केवीं॥ १९॥ तें उद्धवाचें मनोगत। जाणोनियां श्रीकृष्णनाथ। तदर्थींचा सुनिश्चित। असे सांगत उपाय॥ ६२०॥
मर्त्यो यदा त्यक्तसमस्तकर्मा
निवेदितात्मा विचिकीर्षितो मे।
तदामृतत्वं प्रतिपद्यमानो
मयाऽऽत्मभूयाय च कल्पते वै॥ ३४॥
जें बोलिलीं धर्मार्थकाममोक्षार्थ। तें साधनें सांडूनि समस्त। जे अनन्यभावें मज भजत। विश्वासयुक्त निजभावें॥ २१॥ त्यांसी हे स्वरूपस्थिती। जे त्वां भोगिली आत्मप्रतीती। ते तत्काळ होय प्राप्ती। जाण निश्चितीं उद्धवा॥ २२॥ धर्मार्थकामवासना। असोनि लागल्या मद्भजना। तरी तेही पुरवूनियां जाणा। सायुज्यसदना मी आणीं॥ २३॥ भक्तांसी स्वधर्मकर्मावस्था। तेही लाविल्या भजनपंथा। स्वधर्मकर्मीं अकर्मात्मता। माझिया निजभक्तां उद्बोधीं मी॥ २४॥ भक्त वांछी भोगकाम। भोग भोगोनि होय निष्काम। ऐशिया निजबोधाचें वर्म। मी आत्माराम उद्बोधीं॥ २५॥ भक्त मागे अर्थसंपन्नता। त्याचे गांठीं धन नसतां। माझी षड्गुणैश्वर्यसमर्थता। वोळंगे तत्त्वतां त्यापाशीं॥ २६॥ सर्व भूतीं माझी भक्ती। भक्त भजे अनन्यप्रीतीं। तैं चारी मुक्ती शरण येती। मद्भक्तां मुक्ती स्वत:सिद्ध॥ २७॥ वैद्य धडफुडा पंचानन। नाना रोगियांची वासना पोखून। मागे तें तें देऊनि अन्न। वांचवी रसज्ञ रसप्रयोगें॥ २८॥ तेवीं धर्मअर्थकामवासना। भक्तांच्या पोखूनियां जाणा। मी आणीं सायुज्यसदना। तेही विवंचना सांगितली॥ २९॥ नाना साधनाभिमान। सांडूनियां जो ये मज शरण। त्यासीही स्वरूपप्राप्ति पूर्ण। उद्धवा जाण सुनिश्चित॥ ६३०॥ भक्त सकाम जरी चित्तीं। तो जैं करी अनन्यभक्ती। तैं काम पुरवूनि मी दें मुक्ती। भक्तां अधोगती कदा न घडे॥ ३१॥ बाळकें थाया घेऊनि कांहीं। मिठी घातल्या मातेच्या पायीं। धन वेंचोनि अर्पी तेंही। परी जीवें कांहीं मारीना॥ ३२॥ तेवीं माझी करितां अनन्यभक्ती। जो जो कामभक्त वांछी चित्तीं। तो तो पुरवूनि मी दें मुक्ती। परी अधोगती जावों नेदीं॥ ३३॥ देखोनि बाळकाची व्यथा। जेवीं सर्वस्वें कळवळी माता। तेवीं निजभक्तांची अवस्था। मजही सर्वथा सहावेना॥ ३४॥ काम पुरवूनि द्यावया मुक्ती। काय माझे गांठीं नाहीं शक्ती। मी भक्तकैवारी श्रीपती। त्यासी अधोगती कदा न घडे॥ ३५॥ माझें नाम अवचटें आल्या अंतीं। रंक लाहे सायुज्यमुक्ती। मा माझी करितां अनन्यभक्ती। भक्तां अवगती मग कैंची॥ ३६॥ माझा भक्त जयाकडे कृपें पाहे। तोही माझी भक्ति लाहे। मा मद्भक्ता अवगती होये। हा बोल न साहे मजलागीं॥ ३७॥ सोसूनियां गर्भवासासी। म्यां मुक्त केला अंबर्षी। विदारूनि हिरण्यकशिपूसी। प्रल्हादासी रक्षिलें॥ ३८॥ चक्र घेऊनियां हातीं। म्यां गर्भीं रक्षिला परीक्षिती। तो मी भक्तांसी अधोगती। कदा कल्पांतीं होऊं नेदीं॥ ३९॥ माझिये भक्ताचेनि नांवें। तृण तेंही म्यां उद्धरावें। भक्तां केवीं अवगती पावे। जे जीवेंभावें मज भजले॥ ६४०॥ काया वाचा मन धन। अवंचूनि अनन्यशरण। त्यांचा योगक्षेम जाण। मी श्रीकृष्ण स्वयें सोशीं॥ ४१॥ ऐसा अनन्यभक्तीचा महिमा। सांगतां उत्साह पुरुषोत्तमा। तेणें उद्धवासी लोटला प्रेमा। स्वेद रोमां रवरवित॥ ४२॥ ऐकोनि भक्तीचें महिमान। देखोनि उद्धवाचें प्रेम पूर्ण। श्रीशुक सुखावला आपण। स्वानंदपूर्ण डोलत॥ ४३॥ हरिखें म्हणे परीक्षिती। धन्य हरिभक्त त्रिजगतीं। ज्यांसी सर्वार्थीं मुक्ती। स्वमुखें श्रीपती बोलिला॥ ४४॥ जैसें भक्तीचें महिमान। तैसेंचि उद्धवाचें प्रेम गहन। हें उद्धवाचें प्रेमलक्षण। श्रीशुक आपण सांगत॥ ४५॥
श्रीशुक उवाच
स एवमादर्शितयोगमार्ग-
स्तदोत्तमश्लोकवचो निशम्य।
बद्धाञ्जलि: प्रीत्युपरुद्धकण्ठो
न किञ्चिदूचेऽश्रुपरिप्लुताक्ष:॥ ३५॥
विष्टभ्य चित्तं प्रणयावघूर्णं
धैर्येण राजन् बहु मन्यमान:।
कृताञ्जलि: प्राह यदुप्रवीरं
शीर्ष्णा स्पृशंस्तच्चरणारविन्दम्॥ ३६॥
जो ज्ञानियांचा ज्ञाननिधी। जो निजबोधाचा उदधी। जो आनंदाचा क्षीराब्धी। तो श्रीशुक स्वानंदीं तोषला बोले॥ ४६॥ ऐक बापा परीक्षिती। श्रवण सौभाग्य चक्रवर्ती। ज्यातें सुर नर असुर वानिती। ज्याची कीजे स्तुती महासिद्धीं॥ ४७॥ ज्यातें वेद नित्य गाती। योगिवृंदी वानिजे कीर्ती। तेणें श्रीकृष्णें स्तविली भक्ती। परम प्रीतीं अचुंबित॥ ४८॥ अनन्यभक्तिपरतें सुख। आन नाहींच विशेख। सर्व सारांचें सार देख। मद्भक्ति चोख सुरवरादिकां॥ ४९॥ भक्तियोगाचा योगमार्ग। समूळ सप्रेम शुद्ध साङ्ग। स्वमुखें बोलिला श्रीरंग। तें उद्धवें चांग अवधारिलें॥ ६५०॥ ऐकतां भक्तीचें निरूपण। उद्धवाचें द्रवलें मन। नयनीं अश्रु आले पूर्ण। स्वानंदजीवन लोटलें॥ ५१॥ शरीर जाहलें रोमांचित। चित्त जाहलें हर्षयुक्त। तेणें कंठीं बाष्प दाटत। स्वेदकण येत सर्वांगीं॥ ५२॥ प्राण पांगुळला जेथींचा तेथ। शरीर मंदमंद कांपत। नयन पुंजाळले निश्चित। अर्धोन्मीलित ते जाहले॥ ५३॥ औत्सुक्याचे अतिप्रीतीं। स्वानंदीं समरसे चित्तवृत्ती। उद्धवदेहाची विरतां स्थिती। प्रारब्धें निश्चितीं तें राखिलें॥ ५४॥ जळीं नांव उलथतां पूर्ण। जेवीं दोर राखे आवरून। तेवी मावळतां उद्धवपण। प्रारब्धें जाण राखिलें॥ ५५॥ धैर्याचेनि अतिसामर्थ्यें। आवरूनि प्रेमाचें भरितें। मी कृतकृत्य जाहलों एथें। हेंही निश्चितें मानिलें॥ ५६॥ श्रीकृष्णें उद्धरिलें मातें। ऐशिया मानूनि उपकारातें। काय उतरायी होऊं मी यातें। ऐसे निजचित्तें विचारी॥ ५७॥ गुरूसी चिंतामणि देवों आतां। तो चिंता वाढवी चिंतिलें देतां। गुरूंनीं दिधलें अचिंत्यार्था। तेणें उत्तीर्णता कदा न घडे॥ ५८॥ गुरूसी कल्पतरु देवों जातां। तो कल्पना वाढवी कल्पिलें देतां। गुरूनें दिधली निर्विकल्पता। त्यासी उत्तीर्णता तेणें नव्हिजे॥ ५९॥ गुरूसी देवों स्पर्शमणी। तो स्पर्शें धातु करी सुवर्णी। ब्रह्मत्व गुरूचरणस्पर्शनीं। त्यासी नव्हे उत्तीर्णी परीसही देतां॥ ६६०॥ गुरूसी कामधेनु देऊं आणोनी। ते कामना वाढवी अर्थ देऊनी। गुरु निष्काम निर्गुणदानी। त्याचे उत्तीर्णी कामधेनु नव्हे॥ ६१॥ त्रिभुवनींची संपत्ति चोख। गुरूसी देतां ते मायिक। जेणें दिधली वस्तु अमायिक। त्यासी कैसेनि लोक उतरायी होती॥ ६२॥ देहें उतरायी होऊं गुरूसी। तंव नश्वरपण या देहासी। नश्वरें अनश्वरासी। उत्तीर्णत्वासी कदा न घडे॥ ६३॥ जेणें अव्हाशंख दीधला आवडीं। त्यासी देऊनि फुटकी कवडी। उत्तीर्णत्वाची वाढवी गोडी। तैशी परवडी देहभावा॥ ६४॥ जीवें उतरायी होऊं गुरूसी। तंव जीवत्वचि मिथ्या त्यासी। जेणें दिधलें सत्य वस्तूसी। मिथ्या देतां त्यासी लाजचि कीं॥ ६५॥ जेणें दिधलें अनर्घ्य रत्नासी। वंध्यापुुत्र देवों केला त्यासी। तेवीं मिथ्यत्व जीवभावासी। उत्तीर्णत्वासी कदा न घडे॥ ६६॥ काया वाचा मन धन। गुरूसी अर्पितां जीवप्राण। तरी कदा नव्हिजे उत्तीर्ण। हें उद्धवें संपूर्ण जाणितलें॥ ६७॥ जेथें अणुमात्र नाहीं दु:ख। ऐसें दिधलें निजसुख। त्या गुरूसी उतरायी देख। न होवें नि:शेख शिष्यांसी॥ ६८॥ यालागीं मौनेंचि जाण। उद्धवें घातलें लोटांगण। श्रीकृष्णाचे श्रीचरण। मस्तकीं संपूर्ण वंदिले॥ ६९॥ मागां श्रीकृष्णें पुशिलें पहा हो। उद्धवा तुझा गेला कीं शोक मोहो। तेणें उद्धवासी जाहला विस्मयो। उत्तर द्यावया ठावो न घडेचि॥ ६७०॥ आतां वंदोनि श्रीचरण। कृतांजली धरोनि जाण। उत्तर द्यावया आपण। श्रीकृष्णवदन अवलोकी॥ ७१॥ जेवीं सेवितां चंद्रकर। चकोर तृप्तीचे दे ढेंकर। तेवीं उद्धव कृष्णसुखें अतिनिर्भर। काय प्रत्युत्तर बोलत॥ ७२॥
उद्धव उवाच
विद्रावितो मोहमहान्धकारो
य आश्रितो मे तव सन्निधानात्।
विभावसो: किं नु समीपगस्य
शीतं तमो भी: प्रभवन्त्यजाद्य॥ ३७॥
जो सकळदेवचूडामणी। जो यादवांमाजीं अग्रगणी। जो अविद्यारात्रीचा तरणी। जो शिरोमणी ब्रह्मवेत्त्यां॥ ७३॥ ऐशिया श्रीकृष्णाप्रती। स्वानंदाचिये निजस्फूर्तीं। उद्धवें सांगतां निजस्थिती। त्यामाजीं करी स्तुती आद्यत्वें हरीची॥ ७४॥ मज तंव विचारितां। ब्रह्मा सर्वांचा आदिकर्ता। तोही नारायणनाभीं तत्त्वतां। होय जन्मता ‘अज’ नामें॥ ७५॥ तो तूं कमळनाभि नारायण। माया संवलित ब्रह्म जाण। ते मायेचें तूं आद्यकारण। आद्यत्व पूर्ण तुज साजे॥ ७६॥ अविद्येच्या महारात्रीं। अडकलों होतों मोहअंधारीं। तेथूनि काढावया बाहेरीं। आणिकांची थोरी चालेना॥ ७७॥ तेथ तुझेनि वचनभास्करें। नासोनि शोक मोह अंधारें। मज काढिलें जी बाहेरें। चमत्कारें संनिधीं तुझ्या॥ ७८॥ तुझिये संनिधीपाशीं। ठाव नाहीं अविद्येसी। तेथ मोह ममता कैसी ग्रासी। हृषीकेशी तुज असतां॥ ७९॥ अंधारी राती अतिगहन। तेथ शीतें पीडिला जो संपूर्ण। त्यासी आतुडलिया हुताशन। शीत तम जाण तत्काळ पळे॥ ६८०॥ तो अग्नि सेवितां स्वयें सदा। शीत तमांची भयबाधा। पुढती बाधों न शके कदा। तेवीं गोविंदा संनिधीं तुझ्या॥ ८१॥ तेवीं शोक मोह ममतेशीं। माया जन बांधे भवपाशीं। ते तुझिये संनिधी पाशीं। जाती आपैसीं हारपोनी॥ ८२॥ मरणजन्मां अपाये। मागां अनेक सोशिले स्वयें। ज्यासी तुझी संनिधि होये। त्यासी तें भवभये समूळ मिथ्या॥ ८३॥ तुझे संनिधीपाशीं जाण। समूळ मायेचें निर्दळण। तेचि अर्थीचें निरूपण। उद्धव आपण सांगत॥ ८४॥
प्रत्यर्पितो मे भवतानुकम्पिना
भृत्याय विज्ञानमय: प्रदीप:।
हित्वा कृतज्ञस्तव पादमूलं
कोऽन्यत्समीयाच्छरणं त्वदीयम्॥ ३८॥
तुझी संनिधिमात्र देख। समूळ अज्ञानासी घातक। हेंचि मुख्यत्वें आवश्यक। भक्त सात्त्विक जाणती॥ ८५॥ असो इतरांची गोष्टी। म्यांही अनुभविलें निजदृष्टीं। अविद्या निरसावया सृष्टीं। सत्संगती लाठी सर्वार्थीं॥ ८६॥ सत्संगाहीमाजीं जाण। तुझी संगती अतिपावन। तुवां उद्धरावया दीनजन। हें निजात्मज्ञान प्रकाशिलें॥ ८७॥ माझें निमित्त करूनि जाण। उद्धरावया दीन जन। त्यांचें निरसावया अज्ञान घन। ज्ञानदीप पूर्ण प्रज्वाळिला॥ ८८॥ उपदेशार्थ श्रद्धास्थिती। हेचि टवळें पैं निश्चितीं। तेथें बोधिका ज्या निजात्मयुक्ती। तेंचि टवळॺांप्रती स्नेह पूर्ण॥ ८९॥ विवेकवैराग्यधारण। हेंचि तेथील वाती जाण। तेथ प्रज्वळिला ज्ञानघन। चित्प्रभापूर्ण महादीप॥ ६९०॥ नैराश्य तेंचि वैराग्यधारण। तेथें प्रज्वळे ज्ञानदीप पूर्ण। आशा तेंचि माल्हवण। गडद संपूर्ण पडे तेथें॥ ९१॥ तो दीप कर्णद्वारीं ठेविला। तंव सबाह्य प्रकाश जाहला। अज्ञान अंधार निर्दाळिला। स्वयें प्रबळला सद्रूपें॥ ९२॥ तेणें सबाह्य सत्प्रकाशें। तुझी पदवी प्रकट दिसे। ऐसें निजरूप हृषीकेशें। अनायासें मज अर्पिलें॥ ९३॥ तुवां अंतर्यामित्वें आपुलें। स्वरूप पूर्वींच मम अर्पिलें। तें तुवांच माझारीं आच्छादिलें। भजन आपुलें प्रकटावया॥ ९४॥ तुझ्या निजभजनाचें लक्षण। सर्वभूतीं भगवद्भजन। तेणें तूं साचार संतोषोन। अर्पिलेंचि ज्ञान अर्पिसी पुढती॥ ९५॥ वाढवूनि निजभजन। माझें मज अर्पिसी ज्ञान। या नांव ‘प्रत्यर्पण’। साधु सज्ञान बोलती॥ ९६॥ वाढवूनि आपुली भक्ती। माझें ज्ञान दिधलें माझे हातीं। दिधलें तेथ माया पुढती। विकल्पवृत्ती स्पर्शेना॥ ९७॥ जे दिधली स्वरूपस्थिती। ते आच्छादेना कदा कल्पांतीं। यापरी गा श्रीपती। कृपा निश्चितीं तुवां केली॥ ९८॥ यापरी तूं अतिकृपाळू। निजदासांलागीं दयाळू। त्या तुज सांडूनियां बरळू। आनासी गोवळू भजों धांवे॥ ९९॥ त्यजूनि स्वामी हृषीकेशु। आना भजेल तो केवळ पशु। पशूंहीमाजीं तो रासभेशु। ज्यासी नाहीं विश्वासु हरिभजनीं॥ ७००॥ तुवां जनासी केला उपकारु। इंद्रियां पाटव्य ज्ञानाधिकारु। तो उपकार विसरे जो नरु। तो जाण साचारु कृतघ्न॥ १॥ जे जाणती तुझ्या उपकारातें। ते काया वाचा चित्तें वित्तें। कदा न भजती आनातें। मज निश्चितें मानिलें॥ २॥ मज निमित्त करुनियां जाण। जें त्वां प्रकाशिलें निजात्मज्ञान। तेणें जगाचें उद्धरण। श्रवणमननकीर्तनें॥ ३॥ यापरी तूं कृपाळु पूर्ण। माझें छेदिलें भवबंधन। तेचि अर्थींचें निरूपण। उद्धव आपण स्वयें सांगे॥ ४॥
वृक्णश्च मे सुदृढ: स्नेहपाशो
दाशार्हवृष्ण्यन्धकसात्वतेषु।
प्रसारित: सृष्टिविवृद्धये त्वया
स्वमायया ह्यात्मसुबोधहेतिना॥ ३९॥
तुवां मायेनें सृजिले जन। ते सृष्टि व्हावया वर्धमान। स्त्री पुत्र सुहृद सज्जन। हा स्नेह संपूर्ण वाढविला॥ ५॥ मी जन्मलों यादवकुळांत। तेथ वृष्णि-अंधक-सात्वत। इत्यादि सुहृद समस्त। अतिस्नेहयुक्त आप्तत्वें॥ ६॥ तें सुहृदस्त्रीपुत्रस्नेहबंधन। त्या स्नेहपाशाचें छेदन। माझे बाळपणीं त्वां केलें जाण। जें खेळतां तुझें ध्यान मज लागलें॥ ७॥ जेवीं वोडंबरी खेळतां खेळ। मोहिनी विद्या प्रेरी प्रबळ। ते विद्येचें आवरावया बळ। शक्त केवळ खेळ खेळविता॥ ८॥ तेवीं तुझी स्वमाया जाण। जे कां सदा तुज अधीन। तिचे स्नेहपाश दारुण। तेणें बांधोनि जन अतिबद्ध केले॥ ९॥ ते माझे स्नेहपाश जाण। त्वां पूर्वींच छेदिले आपण। जैं मज होतें बाळपण। तैंचि कृपा पूर्णमज केली॥ ७१०॥ तें भवबंधछेदितें जें शस्त्र। तुवां निजयुक्तीं फोडोनि धार। सतेज करूनियां खडतर। मजलागीं स्वतंत्र अर्पिलें॥ ११॥ येणें शस्त्रबळें मी जाण। छेदूं शकें जगाचें बंधन। एवढी मजवरी कृपा पूर्ण। केली आपण दयालुत्वें॥ १२॥ संसार दु:खरूप जो का एथें। तोचि सुखरूप जाहला मातें। ऐशिये कृपेचेनि हातें। मज निश्चितें उद्धरिलें॥ १३॥ मी कृतकृत्य जाहलों एथें। परी कांहींएक मागेन तूतें। ते कृपा करावीं श्रीकृष्णनाथें। म्हणोनि चरणातें लागला॥ १४॥
नमोऽस्तु ते महायोगिन् प्रपन्नमनुशाधि माम्।
यथा त्वच्चरणाम्भोजे रति: स्यादनपायिनी॥ ४०॥
न घडतें घडविसी आपण। नाथिलें दाविसी विंदान। जित्या मेल्या लावूनि लग्न। नांदविसी संपूर्ण निजमाया॥ १५॥ जे योगियांसी अतिदुस्तर। जिणें नाडिले स्रष्टा शंकर। ते माया तुझी किंकर। तूं परात्पर महायोगी॥ १६॥ त्या तुझ्या कृपेस्तव जाण। मी कृतकृत्य जाहलों आपण। न देखें भवभयादि दु:खभान। स्वानंदीं निमग्न सर्वदा॥ १७॥ दृश्य द्रष्टा दर्शन। नाहीं त्रिपुटी ना त्रिगुण। हारपलें मीतूंपण। स्वानंदपूर्ण निजबोधें॥ १८॥ निजबोधें स्वानंदपूर्ण। हेही बोल मायिक जाण। परादिवाचां पडिलें शून्य। यालागीं मौन वेदवादा॥ १९॥ कार्य कारण कर्तव्यता। मज उरली नाहीं सर्वथा। तरी कांहींएक श्रीकृष्णनाथा। तुज मी आतां मागेन॥ ७२०॥ जेवीं कां बाळकाचा थाया। कळवळोनि पुरवी माया। तेवीं माझिया वचना यया। श्रीकृष्णराया अवधारीं॥ २१॥ हें अंतींचें माझें मागतेपण। देवें अवधारावें सावधान। वंदूनियां श्रीकृष्णचरण। अगम्य विंदान मागत॥ २२॥ मज थोर भ्रम होता चित्तीं। गोड असेल जीवन्मुक्ती। तेथ न देखें तुझी भक्ती। कोरडी मुक्ती मज न लगे॥ २३॥ सद्गुरुकृपावचनोक्तीं। शिष्य तत्काळ लाहे मुक्ती। ज्यांत सद्गुरूची नाहीं भक्ती। जळो ती मुक्ती मज न लगे॥ २४॥ यालागीं तुज शरण। मागुतेन मी आलों जाण। सायुज्याहीवरी पूर्ण। तुझें गुरुभजन मज देईं॥ २५॥ मागां बहुतीं केली भक्ती। म्हणसी त्यांसी म्यां दिधली मुक्ती। परी मुक्तीवरती भक्ती। नाहीं मजप्रती मागितली॥ २६॥ मागां जिंहीं जिंहीं केली भक्ती। त्यासीं त्वां ठकिलें देऊनि मुक्ती। तें ठकडेपण श्रीपती। न चले मजप्रती सर्वथा॥ २७॥ ज्यांची अहंकारशून्य वृत्ती। जाहले आत्माराम सहजगतीं। तेही अहेतुक भक्ती करिती। ऐशी स्वरूपस्थिती पैं तुझी॥ २८॥
(संमतश्लोक)—आत्मारामाश्च मुनयो निर्ग्रन्था अप्युरुक्रमे।
कुर्वन्त्यहैतुकीं भक्तिमित्थम्भूतगुणो हरि:॥
तेथ त्यजोनियां तुझी गुरुभक्ती। मुक्ती मागणें हेचि भ्रांती। असो तुझी न लगे मुक्ती। माझी गुरुभक्ती मज देईं॥ २९॥ ज्यासी आकळली निजमुक्तता। म्हणसी त्यासी भक्ती नेदवे आतां। हे मजसी बोलों नको कथा। तुझी समर्थता मी जाणें॥ ७३०॥ तूं न घडे तें घडविसी। न चळे तेंचाळविसी। नव्हे तें तूं होय करिसी। नाहीं सामर्थ्याची मर्यादा॥ ३१॥ अगम्य सामर्थ्याची गणना। बुडत्या तारूनि पाषाणां। त्यावरी तारिसी वानरसेना। सेतुबंधना श्रीरामा॥ ३२॥ केवळ जे कां वनचर। पालेखाईर वानर। चारी मुक्ती त्यांच्या किंकर। त्यांसी सुरवर वंदिती स्वयें॥ ३३॥ केवळ ज्या कां व्यभिचारिणी। शेखीं ज्या घुरटा गौळणी। मोक्ष लागे त्यांच्या चरणीं। ये ब्रह्मा लोटांगणीं चरणरजासी॥ ३४॥ तूं परमात्मा परमेश्वर। हें नेणती गौळणी वानर। तरी तुझें त्यांसी भजनमात्र। फळलें साचार परब्रह्मत्वें॥ ३५॥ ऐसें अगाध तुझें भजन। अगम्य भजनाचें महिमान। भक्तीअधीन तुझें देवपण। मा मोक्षासी कोण अधिकाई॥ ३६॥ भक्तीच्या पोटीं जन्मली मुक्ती। वाढली मुक्ती भक्तीतें घाती। ऐसी जे कां मुक्ती मातृहंती। तिसी मी सर्वार्थी नातळें॥ ३७॥ फिटे मुक्तीचें दूषण। जेणें ते होय अतिपावन। तें मीं सांगेन विंदान। ऐक सावधान श्रीकृष्णा॥ ३८॥ जोडल्याही मुक्तपण। मज द्यावें तुझें गुरुभजन। तेणें मुक्तीही होय पावन। म्हणोनि लोटांगण घातलें॥ ३९॥ मस्तकींधरिले श्रीचरण। उद्धव सर्वथा न सोडी जाण। तेणें टकच जाहला श्रीकृष्ण। त्यासी संपूर्ण तुष्टला॥ ७४०॥ जाणोनि आपलें मुक्तपण। मी न सांडी तुझें निजभजन। ऐशी कृपा करीं पूर्ण। म्हणोनि श्रीचरण न सोडी॥ ४१॥ मुक्तता मानल्या संपूर्ण। तैं राहों शके सद्गुरुभजन। हेंही बाधों न शके विघ्न। तैशी भक्ति निर्विघ्न मज सांग॥ ४२॥ कोटिजन्में शिणतां जाण। म्हणसी नातुडे मुक्तपण। त्या मोक्षा नांव ठेविसी ‘विघ्न’। मूर्ख संपूर्ण मज म्हणसी॥ ४३॥ जेणें सुटे तुझें सद्गुरुभजन। तें मी मानीं परम विघ्न। तुझे भक्तिवीण मुक्तपण। अलवणी मज जाण गोविंदा॥ ४४॥ माझी न मोडे नित्यमुक्तता। अहेतुक चालवीं भक्तिपंथा। ऐसी कृपा करीं श्रीकृष्णनाथा। झणीं संकोचता मानिसी॥ ४५॥ म्हणसी म्यां दिधली नित्यमुक्ती। ते माझी मजपाशीं सिद्ध होती। ‘दिधली’ म्हणणें हे मिथ्या वदंती। वाऊगी ख्याती दातृत्वाची॥ ४६॥ माझी स्वत:सिद्ध नित्यमुक्तता। त्यावरी भक्ति मी मागें आतां। ते देशील तरी तूं साचार दाता। उदारता या नांव॥ ४७॥ ते संतोषोनि भक्ति देतां। उल्हास न देखों तुझ्या चित्ता। थोर मांडली कृपणता। कृष्णनाथा मजलागीं॥ ४८॥ जे सांडवी सद्गुरुभक्ती। आम्हां न लगे तुझिया जीवन्मुक्ती। मुक्ति म्हणणें हेही भ्रांती। ऐक श्रीपती सांगेन॥ ४९॥ मुळीं मुख्यत्वें नाहीं बद्धता। तेथ कैंची काढिली मुक्तता। मिथ्या मुक्ति मी नातळे सर्वथा। माझी गुरुभक्तिता मज देईं॥ ७५०॥ मागें ज्यांसी त्वां दिधली मुक्ति। ते ठकिले याच रीतीं। तैसें चाळवूं नको श्रीपती। मोक्षावरील भक्ती मज देईं॥ ५१॥ म्हणोनि घातलें लोटांगण। धांवोनि धरिले दोनी चरण। प्रेमें वोसंडला श्रीकृष्ण। उद्धवासी संपूर्ण तुष्टला॥ ५२॥ मोक्षाही वरील गुरुभक्ती। उद्धवें मागितली नाना युक्तीं। जे जे चालली उपपत्ती। तेणें सुखें श्रीपती सुखावला॥ ५३॥ सुखें सुखावली श्रीकृष्णमूर्ती। डोलों लागला स्वानंदस्थितीं। तेणें संतोषें भक्तिमुक्ती। उद्धवाहातीं अर्पिली॥ ५४॥ जगीं उद्धवाचें शुद्ध पुण्य। जगीं उद्धवचि धन्य धन्य। ज्यालागीं सर्वस्वें श्रीकृष्ण। मोक्षावरील गुरुभजन स्वानंदें देत॥ ५५॥ गुरु ब्रह्म दोनी अभिन्न। हेंही सद्गुरु प्रबोधी पूर्ण। यालागीं मोक्षावरील गुरुभजन। नव्हे दूषण सच्छिष्या॥ ५६॥ मागिलां निजभक्ताप्रती। स्वानंदें तुष्टला श्रीपती। तिहीं मागितली निजमुक्ती। त्यांसी हे स्थिती अतर्क्य॥ ५७॥ उद्धवें थोर केली ख्याती। मुक्तीचे माथां वाइली भक्ती। अगम्य मागितली स्थिती। तेही श्रीपती अर्पित॥ ५८॥ उद्धवा मुक्तीवरील जे भक्ती। ते मज अवतारांची अवतारशक्ती। येणें उत्पत्ति-स्थिति-प्रलय अंतीं। करूनि श्रीपती मी अलिप्त॥ ५९॥ येणेंचि बळें मी तत्त्वतां। कर्में करूनि अकर्ता। भोग भोगोनि अभोक्ता। जाण सर्वथा येणेंचि योगें॥ ७६०॥ हा योग न कळे ज्यासी। दु:खरूप संसार त्यासी। हा अखंड योग मजपाशीं। मीं संसारेंसीं सुखरूप॥ ६१॥ हा योग सदाशिव जाणे। का म्यां जाणिजे नारायणें। इतरांचें जें जाणणें। तें अगम्यपणें रिघेना॥ ६२॥ ऐसी श्रीकृष्ण सांगे गुह्य गोष्टी। ते स्थिति बाणली उद्धवाचे पोटीं। दोघां निजबोधें एकगांठी। भजनकसवटी कळों सरली॥ ६३॥ मुक्तीसी भक्तीची हातवटी। ते उद्धवासी कळली गोष्टी। तो उल्हास न माये पोटीं। स्वानंदपुष्टीं कोंदला॥ ६४॥ जेवीं बाळकाच्या थायाकारणें। माता लेववी निजभूषणें। तेवीं उद्धवालागीं श्रीकृष्णें। अवतारस्थितिदेणें निश्चित॥ ६५॥ मनाचें नाइकती कान। बुद्धीचें न देखती नयन। शेखीं गगनातेंही चोरून। उद्धवासी श्रीकृष्ण निजस्थिति अर्पी॥ ६६॥ जे ब्रह्मवेत्त्यांसी नकळे। जे वेदानुवादा नाकळे। तेस्थिति उद्धवासी गोपाळें। कृपाबळें अर्पिली॥ ६७॥ पूर्वीं श्रीकृष्णें पुसतां पहा हो। ‘उद्धरलों’ म्हणे उद्धवो। आतां मागें भजनभावो। हा गूढाभिप्रावो हरि जाणे॥ ६८॥ मुक्तीवरील मागतां भक्ती। श्रीकृष्णाची अवतारशक्ती। मायानियंतृत्वाची पूर्ण स्थिति। उद्धवाचे हातीं स्वयें आली॥ ६९॥ जाणोनि मायेचें मिथ्यात्वपूर्ण। तिचें प्रेरण आणि आवरण। हें मायानियंतृत्वलक्षण। उद्धवासी श्रीकृष्ण स्वयें अर्पी॥ ७७०॥ जसें बुद्धिबळाचे पोटीं। पूर्व कर्म नसतां गांठीं। राजा प्रधान पशुप्यादा उठी। निर्धारितां दृष्टीं काष्ठ एक॥ ७१॥ एकचि काष्ठ दोंही भारीं। तेथ कोण कोणाचा वैरी। वैर नसतांही झुंजारी। मारामारी अचेतनां॥ ७२॥ म्हणती हस्ती घोडा प्रधान मेला। तेथ काय त्यांचा प्राण गेला। प्यादा होता तो प्रधान जाहला। तो काय पावला गजांतलक्ष्मी॥ ७३॥ जीव नसतांही निर्धारीं। मारिलें म्हणती निज गजरीं। एका जीत एका हारी। तें ज्ञान सारीं नेणतीं॥ ७४॥ सारीं निमाल्या पाठीं। कोण धर्मात्मा चढे वैकुंठीं। कोण पडे नरकसंकटीं। तेवीं बद्धमुक्त गोठी समूळ मिथ्या॥ ७५॥ एवं बुद्धिबळाचिये परी। ज्याची निजदृष्टि संसारीं। तोचि अवतारांचा अवतारी। जाण तो निर्धारीं भगवंत॥ ७६॥ समूळ मिथ्या जाणे वेदोक्ती। समूळ मिथ्या जाणे बंधमुक्ती। हें जाणोनि आचरे जो वेदविहितीं। तेचि निजभक्ती मुक्तीवरिल॥ ७७॥ करूनि संसारनिवृत्ती। बहुत पावले नित्यमुक्ती। त्यांसि हे दुर्गमभक्ती। अतर्क्य स्थिती तर्केना॥ ७८॥ ऐशी ज्यापाशीं माझी स्थिती। तोचि मोक्षावरील करी भक्ती। इतरांसी हे अतर्क्य गती। जाण निश्चितीं उद्धवा॥ ७९॥ उद्धव पावला अगाध गती। त्यासी सर्वलोकोपकारार्थी। वांचवावया ब्रह्मशापाहातीं। उपाय श्रीपती स्वयें योजी॥ ७८०॥ नारदासी ब्रह्मज्ञान। त्यासीही दक्षशापबंधन। एके ठायीं न राहे जाण। करी परिभ्रमण शापास्तव॥ ८१॥ झालियाही ब्रह्मज्ञान। ब्रह्मशाप अतिदारुण। हें जाणोनियां श्रीकृष्ण। उद्धवाजाण दूरी दवडी॥ ८२॥ उद्धव जन्मला यादववंशीं। यादव निमती ब्रह्मशापेंशीं। तेथ वांचवावया उद्धवासी। बदरिकाश्रमासी स्वयें धाडी॥ ८३॥ ब्रह्मशापाचेनि आघातें। यादव निमती स्वगोत्रघातें। उद्धव वांचवावया तेथें। बदरिकाश्रमातें हरि प्रेरी॥ ८४॥ उद्धवासी जें झालें ज्ञान। त्याहूनिबदरिकाश्रम पावन। हें सर्वथा न घडे जाण। ब्रह्मशापाभेण पळवीत॥ ८५॥ उद्धवा ऐसें अनर्घ्यरत्न। ज्यासी बाणली स्थिति पूर्ण। त्यासी वांचवावया श्रीकृष्ण। पाठवी आपण बदरिकाश्रमा॥ ८६॥
श्रीभगवानुवाच
गच्छोद्धव मयाऽऽदिष्टो बदर्याख्यं ममाश्रमम्।
तत्र मत्पादतीर्थोदे स्नानोपस्पर्शनै: शुचि:॥ ४१॥
गंभीरगिरा बोले श्रीकृष्ण। उद्धवा तुज जाहलें ब्रह्मज्ञान। तुटलें स्नेहपाशबंधन। तरी ममाज्ञाकरीं गमन बदरिकाश्रमा॥ ८७॥ त्या बदरिकाश्रमाचें महिमान। लोकसंग्रहार्थ संपूर्ण। तरावया जडमूढ जन। स्वमुखें श्रीकृष्ण सांगत॥ ८८॥ तो बदरिकाश्रम माझें स्थान। तेथ नित्य माझें अनुष्ठान। तया स्थानाचें दूरदर्शन। करी निर्दळण कलिकल्मषा॥ ८९॥ ज्या पर्वताचें स्पर्शन। मानवां करी परम पावन। जें बदरीचें नामस्मरण। विभांडी दारुण महादोषां॥ ७९०॥ तेथेंही माझें पादोदक। अलकनंदा पवित्र देख। जिचेनि स्पर्शमात्रें लोक। होती अलौकिक पावन॥ ९१॥ जेथ श्रद्धायुक्त करितां स्नान। जीवाचें तुटे भवबंधन। ज्यासी घडे आचमन। तो उद्धरे जाण पितरेंसीं॥ ९२॥ ऐसें बदरिकाश्रम माझें जाण। अतिशयें परम पावन। म्हणसी कैं केलें त्वां तें स्थान। तरी ऐकतें कथन उद्धवा॥ ९३॥ रजोगुणें सृजिले जन। ते जाहले भोगकर्मीं प्रवीण। भोगासक्तीं बुडतांपूर्ण। दों रूपीं जाण मी अवतरलों॥ ९४॥ तम निरसी रविचंद्र पूर्ण। तैसा मी जाहलों नरनारायण। बदरिकाचलामाजीं जाण। केला संपूर्ण नित्योदयो॥ ९५॥ भज्यपूज्यत्वें मी नारायण। नररूपें मीचि भक्त जाण। तेथ भक्ति वैराग्य ज्ञान। म्यां आचरोन प्रकाशिलें॥ ९६॥ तो बदरिकाश्रम माझें स्थान। तेथें सर्वदा मी आपण। अद्यापि करितों अनुष्ठान। भक्तिज्ञानवैराग्यें॥ ९७॥ नरनारायणस्थितीं। मी अवतरलों जे पर्वतीं। तेथ तोडिले बोरीऐशी मागुती। माझी निजभक्ति फांपाइली॥.९८॥ यालागीं ‘बदरिकाश्रम’। त्या स्थळासी म्यां ठेविलें नाम। तेथें फिटे भवभ्रम। यापरी परम पावन तें स्थळ॥ ९९॥ त्या बदरिकाश्रमाप्रती। तुवां जावें गा निश्चितीं। ऐसें उद्धवा कल्पिसी चित्तीं। मजकाय तीर्थीं विवंचू॥ ८००॥ मोक्षाहीवरील भक्ती। तुवां अर्पिली माझे हातीं। तेणें मी जाहलों कृतकृत्यार्थी। म्हणसी मज तीर्थीं चाड नाहीं॥ १॥ तुज माझी आज्ञा प्रमाण। अवश्य तेथें करावें गमन। मग उद्धवें धरोनियां मौन। मस्तकीं वचन वंदिलें॥.२॥ सद्भावें करूनि नमन। घेतां बदरिकाश्रमदर्शन। तो नर होय नारायण। एवढें महिमान त्या स्थळाचें॥ ३॥ उद्धवा तुझ्या ठायींपूर्ण ज्ञान। ज्ञान असोनि माझें भजन। तुझेनि चरणस्पर्शें जाण। होईल पावन बदरिकाश्रम॥ ४॥ ऐसें ऐकोनि श्रीकृष्णवचन। उद्धवासी आलें रुदन। धांवोनि वंदिले श्रीचरण। सर्वथा गमन करीन आतां॥ ५॥ ब्रह्मशापाचें निर्दळण। उद्धवाचें चुकवावया जाण। श्रीकृष्णें प्रबोधोनि पूर्ण। करवी गमन बदरिकाश्रमा॥ ६॥ उद्धव ज्ञानियाचें ज्ञानरत्न। त्यासी वांचवूनि श्रीकृष्ण। विस्तारावया निजज्ञान। करवी गमन बदरिकाश्रमा॥ ७॥ चुकवावया ब्रह्मशाप दारुण। उद्धवासी ‘विशाळीं’ गमन। अन्यथा जाहलिया ब्रह्मज्ञान। कृष्ण तीर्थाटन नेमीना॥ ८॥ उद्धवासी भवबंधन। बाळपणींचि नाहीं जाण। हें जाणोनियां श्रीकृष्ण। ब्रह्मशापाभेण तीर्था धाडी॥.९॥ तीर्थयात्रेचा अभिप्रावो। हाचि निश्चितें निजभावो। जाणोनि देवाधिदेवो। मोकली उद्धवो बदरिकाश्रमा॥ ८१०॥ उद्धवातुज गेलिया तेथ। थोर लोकोपकार होईल सत्य। तुझेनि धर्में निश्चित। दीन समस्त उद्धरती॥ ११॥ म्हणसी पावल्या तें तीर्थ। म्यां कैसें वसावें तेथ। तेही अर्थीं लोकहितार्थ। तुज इत्यर्थ सांगेन॥ १२॥ उद्धवा तुझें जें आचरण। तोचि जनांसी उपदेश जाण। यालागीं वैराग्य-भक्ति-ज्ञान। स्वधर्माचरण सांडूं नको॥ १३॥ त्रिभुवनामाजीं सर्वथा। उद्धवा मज नाहीं कर्तव्यता। तोही मी लोकसंग्रहार्था। होय वर्तता निजधर्मीं॥ १४॥ तूं ऐसें म्हणसी आतां। ‘त्रैलोक्य असे तुझ्या माथां। यालागीं लोकसंग्रहार्था। तूं होसी वर्तता स्वधर्मकर्मीं’॥ १५॥ मी निजधामा जातों आपण। यालागीं माझी स्थिती पूर्ण। ते पूर्णता तुज म्यां अर्पिली जाण। लोकसंग्रहार्थ पूर्ण तूं विरक्त होईं॥ १६॥ अभेदभक्ती वैराग्य ज्ञान। स्वयें आचरोनि आपण। देखीं लावावे इतर जन। ‘लोकसंग्रह’ जाण या नांव॥ १७॥
(संमतश्लोक-भगवद्गीता) न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्मसङ्गिनाम्।
जोषयेत्सर्वकर्माणि विद्वान्युक्त: समाचरन्॥
(अ.३ श्लोक २६)*
उद्धवा माझिये ज्ञानप्राप्ती। तूं वंद्य जाहलासी त्रिजगतीं। तुझी जे आचरती स्थिती। तेचि लोकीं समस्तीं करिजेल॥ १८॥ आतां तुझेनि मिसें जाण। साडेतींन श्लोकींचें निरूपण। लोकसंग्रहार्थ सांगेन। तैसेंचि वर्तन करावें तुवां॥ १९॥ तुज पावलिया बदरिकाश्रमातें। तेथ विद्यमान बहुत तीर्थें। परी अलकनंदा मुख्य तेथें। जे नाशी दोषांतें दर्शनमात्रें॥ ८२०॥
* हा श्लोक पैठणच्या प्रतींत असून ह्याच्या टीकेची ओंवी नाहीं.
ईक्षयालकनन्दाया विधूताशेषकल्मष:।
वसानो वल्कलान्यङ्ग वन्यभुक् सुखनि:स्पृह:॥ ४२॥
करूनि अलकनंदेचें स्नान। करावें विध्युक्त तीर्थविधान। मग तेथें वसावें आपण। वसतें लक्षण तें एक॥ २१॥ त्यजूनि वस्त्रें आपण। करावीं वल्कलें परिधान। करूनि वनफलें भोजन। रहावें आपण अनुद्वेग॥ २२॥ आपुली पूर्ण नि:स्पृहता। दावावी लोकसंग्रहार्था। निजसुखें तुज तेथें असतां। द्वंद्वसहिष्णुता दावावी॥ २३॥
तितिक्षुर्द्वन्द्वमात्राणां सुशील: संयतेन्द्रिय:।
शान्त: समाहितधिया ज्ञानविज्ञानसंयुत:॥ ४३॥
तूं ज्ञानविज्ञानसंपन्न। तुज द्वंद्वबाधा न बाधी जाण। तरी द्वंद्वसहिष्णुता पूर्ण। दावावी आपण लोकहितार्था॥ २४॥ तुज नाहीं विषयासक्तता। तरी नेमावें इंद्रियार्था। प्रकट करावी सुशीलता। निजशांतता दावावी॥ २५॥ निजबुद्धीचें समाधान। सहजें प्रकटवावें आपण। मजपासूनि जें प्राप्त ज्ञान। त्याचें अनुसंधान दावावें॥ २६॥
मत्तोऽनुशिक्षितं यत्ते विविक्तमनुभावयन्।
मय्यावेशितवाक्चित्तो मद्धर्मनिरतो भव।
या स्थितीं तुज असतां जाण। बहुसाल तुज येतील शरण। तूं पावलासि माझें ज्ञान। हें सर्वही जन जाणती॥ २७॥ पावोनियां ब्रह्मज्ञान। स्वयें उद्धरला आपण। न करीचि दीनोद्धारण। हें भेडपण ज्ञात्याचें॥ २८॥ एक पावोनि ब्रह्मज्ञान। शिष्य उपदेशी आपण। बोध न करवे परिपूर्ण। ते निष्ठा हीन निर्वीर्य॥ २९॥ शिष्य बोधेंवीण चरफडी। गुरु गुरुपणें बडबडी। घरींच्या घरीं चुकामुकी गाढी। हे बोधपरवडी अबद्ध॥ ८३०॥ परचित्त प्रबोधकवृत्ती। हे सामान्य नव्हे स्थिती। ब्रह्मज्ञानाची पूर्ण निष्पत्ती। या नांव निश्चितीं उद्धवा॥ ३१॥ स्वयें तरोनि जनां तारी। हे ज्ञानाची अगाध थोरी। ते म्यां दिधली तुझ्या करीं। जन उद्धरीं उद्धवा॥ ३२॥ शिष्यसुक्षेत्रीं ब्रह्मज्ञान। ज्याचें नव्हे वर्धमान। तंववरी नाहीं पूर्णपण। उद्धवा जाण निश्चित॥ ३३॥ जेवीं पिकलिया वृक्षाप्रती। पक्षी तुटले स्वयें येती। तेवीं निडारली ब्रह्मस्थिती। तेथ शिष्य पावती स्वानंद॥ ३४॥ बोलें उपदेशिती ब्रह्मज्ञान। बोध नव्हे तें निर्वीर्य जाण। तें तूं म्हणसी कायसेन। ऐक सांगेन उद्धवा॥ ३५॥ अनुभवा आलें ब्रह्मज्ञान। तेणें अंगीं ये जाणपण। तेथ संचरे ज्ञानाभिमान। तेणेंवीर्य क्षीण ज्ञानाचें॥ ३६॥ जंव जंव ज्ञाता निरहंकार। तंव तंव ज्ञानासी वीर्य थोर। त्याची होतां कृपामात्र। बोध साचार सच्छिष्यासी॥ ३७॥ तुज फावलें माझें ज्ञान। उपदेशिसी शिष्यजन। ते तुज देतील सन्मान। तरी तूं ज्ञानाभिमान धरूं नको॥ ३८॥ शिष्य देतील सन्मान। तो ‘नेघे’ म्हणतां अपक्वपण। घेतां आला ज्ञानाभिमान। हेंही विघ्न ज्ञात्यासी॥ ३९॥ शिष्य देतील सन्मान। तो अनुद्वेगें घ्यावा आपण। परी न धरावा ज्ञानाभिमान। हें मुख्य लक्षण ज्ञात्याचें॥ ८४०॥ तुज माझ्या ज्ञानाची पूर्ण प्राप्ती। तेचि एकांतीं लोकांतीं। नित्य निरभिमानस्थिती। स्वानंदस्फूर्ती सर्वदा॥ ४१॥ तेचि निरभिमान स्थिती। उपदेशीं शिष्यांप्रती। निरभिमानापरती। दशा त्रिजगतीं असेना॥ ४२॥ तेंचि उपदेशलक्षण। वाचेसी माझें नामकीर्तन। शरीरीं माझें नित्य भजन। मद्रूपींमन निमग्न सदा॥ ४३॥ ज्ञाता म्हणतां न धरी श्लाघ। मूर्ख म्हणतां न यावा राग। स्वयें रहावें अनुद्वेग। हे दशा चांग ज्ञात्याची॥ ४४॥ एवं नित्य निरभिमान। भक्तियुक्त वैराग्य ज्ञान। स्वयें आचरोनि आपण। शिष्यसज्जन उपदेशिजे॥ ४५॥ तुज जे शिष्य येती शरण। ते नीच न म्हणावे आपण। हें गुरुत्वाचें पूर्णपण। शिष्यही पूर्ण पूज्यत्वें देखें॥ ४६॥ सद्गुरूसी सर्वां भूतीं। सर्वदा ब्रह्मप्रतीती। तेथ शिष्याचिये भूतव्यक्तीं। काय ब्रह्मस्थिती पळाली॥ ४७॥ यालागीं शिष्यीं नीचपण। सर्वथा न देखावें आपण। शिष्य देखावा ब्रह्म पूर्ण। हें मुख्य लक्षण गुरुत्वाचें॥ ४८॥ जेवीं तानयालागीं माता। तेवीं शिष्याचिया निजस्वार्था। गुरूसी कळवळा तत्त्वतां। शुद्ध ‘सद्गुरुता’ या नांव॥ ४९॥ शिष्यलक्षणप्रकार। मागां सांगितला विचार। तो जेथ देखसी अधिकार। तेथसाचार उपदेशीं॥ ८५०॥ तुज जें शिकविलें प्रस्तुत। तें शिष्योपदेशसंग्रहार्थ। तूं ठायींचा गुणातीत। तुज हें समस्त स्पर्शेना॥ ५१॥
अतिव्रज्य गतीस्तिस्रो मामेष्यसि तत: परम्॥ ४४॥
यापरी ज्ञान उपदेशितां। तुझी न मोडे गुणातीतता। ज्यांसी उपदेशिसी तत्त्वतां। तेही त्रिगुणावस्था जिंकिती॥ ५२॥ पूर्वोक्त उपदेशयुक्तीं। जे शिष्य सर्वदा वर्तती। ते त्रिगुणांची त्रिविध वृत्ती। अतिक्रमिती गुरुकृपां॥ ५३॥ त्रिगुणांचें त्रिविधपण। दृश्य द्रष्टा आणि दर्शन। जागृति सुषुप्ति आणि स्वप्न। ज्ञेय ज्ञाता ज्ञान साक्षेपें॥ ५४॥ कार्य कारण आणि कर्ता। भोज्य भोजन आणि भोक्ता। शत्रु मित्र उदासीनता। या त्रिगुणावस्था बाधक॥ ५५॥ तेथ येणें उपदेशें जाण। सच्छिष्य करूनि माझें भजन। त्रिगुणत्रिपुटी निर्दळून। माझें स्वरूप पूर्ण स्वयें होती॥ ५६॥ माझिया स्वरूपाप्रती। नाहीं गुण ना गुणवृत्ती। भक्त मद्भावें गुणातीतीं। सहज पावती स्वानंद॥ ५७॥ ऐसा आज्ञापिला उद्धवो। त्याचे अवस्थेचा अभिप्रावो। परीक्षितीप्रती पहा हो। स्वयें शुकदेवो सांगत॥ ५८॥
श्रीशुक उवाच
स एवमुक्तो हरिमेधसोद्धव:
प्रदक्षिणं तं परिसृत्य पादयो:।
शिरो निधायाश्रुकलाभिरार्द्रधी-
र्न्यषिञ्चदद्वन्द्वपरोऽप्यपक्रमे॥ ४५॥
जो निजमोक्षें नित्य निष्काम। जेणें अनुभविलें परब्रह्म। त्या श्रीशुकासी अतिसंभ्रम। उद्धवाचें प्रेम वर्णावया॥ ५९॥ तो शुक म्हणे परीक्षिती। उद्धव आज्ञापिला श्रीपती। त्याच्या प्रेमाची अद्भुत स्थिती। ते मी तुजप्रती सांगेन॥ ८६०॥ उद्धव जरी जाहला गुणातीत। तरी गुरुचरणीं प्रेम अद्भुत। ज्यासी सद्गुरु श्रीकृष्णनाथ। मूर्तिमंत परब्रह्म॥ ६१॥ त्यजूं न शके हरिपदा। हरीचे ठायीं पूर्ण श्रद्धा। यालागीं जाण ‘हरिमेधा’। बोलिजे प्रबुद्धा उद्धवातें॥ ६२॥ जो आवडीं करी हरीचें ध्यान। त्याचे ध्यानेंसीं हरि हरी मन। जो विवंची श्रीकृष्ण समाधान। त्याचे बुद्धीचें हरण हरि करी॥ ६३॥ जो करी हरिचिंतन। त्याचे चित्ताचें हरि करी हरण। जो करी हरीचें स्मरण। त्याचा संसार संपूर्ण हरि हरी॥ ६४॥ ऐशिया हरीच्या ठायीं सर्वदा। पावलियाही मुक्तिपदा। उद्धवाची सप्रेम श्रद्धा। यालागीं ‘हरिमेधा’ त्यासी म्हणती॥ ६५॥ जे पावले गुणातीतीं। त्यांसीही आवडे ज्याची भक्ती। तेणें श्रीकृष्णें उद्धवाप्रती। प्रयाण निश्चितीं नेमिलें॥ ६६॥ दूरीप्रयाण बदरिकाश्रम। मागुता न भेटे पुरुषोत्तम। तो प्रयाणकाळ उपक्रम। जाहला सप्रेम उद्धवासी॥ ६७॥ सर्वदा सुखदु:खातीत। उद्धव जाहलासे निश्चित। तोही प्रयाणकाळीं प्रेमयुक्त। प्रदक्षिणा करीत श्रीकृष्णासी॥ ६८॥ चरणीं मस्तक ठेवितां जाण। आनंदाश्रु लोटले नयन। तेणें श्रीकृष्णाचें चरणक्षाळण। जाहलें संपूर्ण पदद्वया॥ ६९॥
सुदुस्त्यजस्नेहवियोगकातरो
न शक्नुवंस्तं परिहातुमातुर:।
कृच्छ्रं ययौ मूर्धनि भर्तृपादुके
बिभ्रन्नमस्कृत्य ययौ पुन: पुन:॥ ४६॥
आणिकांचा स्नेह अतिबाधक। त्यातें सांडवी वेदविवेक। तैसा कृष्णस्नेह नव्हे देख। तो सुखदायक स्नेहाळू॥ ८७०॥ उद्धवासी स्वाभाविक। गुरु परब्रह्म दोनी एक। इतरांसी भावनात्मक। उद्धवासी देख स्वत:सिद्ध॥ ७१॥ ऐसा श्रीकृष्णस्नेहो आवश्यक। उद्धवासी सुखदायक। त्या श्रीकृष्णासी सांडितां देख। आत्यंतिक विव्हळ॥ ७२॥ नि:शेष निमाली विषयावस्था। जरी वृद्ध जाहली पतिव्रता। तरी त्यागावा निजभर्ता। हें तिशीं सर्वथा नावडे॥ ७३॥ तेवीं अनुभवूनि परमार्था। उद्धव पावला जीवन्मुक्तता। तरी सद्गुरु श्रीकृष्ण त्यागितां। अतिविव्हळता गुरुप्रेमें॥ ७४॥ स्नेहें द्वेषें सकामेंसीं। जे जे वेधले श्रीकृष्णासी। ते ते पावले परमानंदासी। त्या श्रीकृष्णासी त्यजी कोण॥ ७५॥
(संमत श्लोक) कामं क्रोधं भयं स्नेहमैक्यं सौहृदमेव च।
नित्यं हरौ विदधतो यान्ति तन्मयतां हि ते॥
(दशमस्कंधपूर्वार्ध, अ०२९ श्लो०१५)
अविधीं रातलीं श्रीकृष्णासी। तीं वंद्य जाहलीं ब्रह्मादिकांसी। मा उद्धव विकला गुरुप्रेमांसी। केवीं श्रीकृष्णासी त्यजील॥ ७६॥ ज्यासी परब्रह्मत्वें गुरुभक्ती। त्यासी तृणप्राय जीवन्मुक्ती। जाहलीही मुक्ती उपेक्षिती। विकिले गुरुभक्तीं अनन्यत्वें॥ ७७॥ उल्लंघूं नये सद्गुरुवचन। करावें बदरिकाश्रमीं गमन। श्रीकृष्णप्रेमा पढिये पूर्ण। तो सर्वथा जाण निघों नेदी॥ ७८॥ ऐसें उभयतां अतिसंकट। उद्धवासी वोढवलें दुर्घट। श्रीकृष्णप्रेमें उतटे पोट। न देखे वाट बदरीची॥ ७९॥ त्यागोनि जावें जरी कृष्णनाथा। तरी हा निजधामा जाईल आतां। मग मी न देखें मागुता। यालागीं अवस्था अनावर॥ ८८०॥ नवजलदघनतनु। श्याम राजीवलोचनु। आनंदविग्रही श्रीकृष्णु। ब्रह्मपरिपूर्णु पूर्णत्वें॥ ८१॥ मुकुट कुंडलें मेखळा। तिलक रेखिला पिंवळा। पदक एकावळी गळां। कंठीं तेजागळा कौस्तुभ॥ ८२॥ वांकी अंदुवांचा गजर। चरणीं गर्जत तोडर। विद्युत्प्राय पीतांबर। तेणें शार्ङ्गधर शोभत॥ ८३॥ कांसे विराजे सोनसळा। आपाद रुळे वनमाळा। घवघवीत घनसांवळा। देखतां डोळां मन निवे॥ ८४॥ ऐसें श्रीकृष्णदर्शन। पुढती न देखें मी आपण। यालागीं उद्धवजाण। प्रेमें संपूर्ण विव्हळ॥ ८५॥ उद्धव पावला ब्रह्म पूर्ण। त्यासी सगुणाची अवस्था कोण। तरी श्रीकृष्णप्रभा प्रकाशे चिद्धन। आत्मवस्तु संपूर्ण श्रीकृष्ण॥ ८६॥ घृत थिजलें कां विघुरलें। परी घृतपणा नाहीं मुकलें। तेवीं सगुणनिर्गुणत्वें मुसावलें। परब्रह्म संचलें श्रीकृष्ण॥ ८७॥ त्याज्य सगुण पूज्य निर्गुण। हेही दशा आरती जाण। ज्यासी ब्रह्मरूप तृणपाषाण। त्यासी त्याज्य सगुण कदा नव्हे॥ ८८॥ एवं सगुण आणि निर्गुण। उद्धवासी समसमान। गुरुत्वें कृष्णीं प्रेम गहन। तो त्यागितां पूर्ण विव्हळता॥ ८९॥ परी आज्ञा नुल्लंघवे सर्वथा। म्हणोनि निघावें बदरीतीर्था। तंव श्रीकृष्णासी सांडूनि जातां। परमावस्था उद्धवीं॥ ८९०॥ उद्धव प्रयाणअवसरीं। लोळणी घाली पायांवरी। चरण आलिंगुनी हृदयीं धरी। तरी जावया दूरी धीर नव्हे॥ ९१॥ मज एथोनि गेलिया आतां। मागुती न देखें श्रीकृष्णनाथा। तेणें अनिवार अवस्था। पाऊल सर्वथा न घालवे॥ ९२॥ मी निवालों कृष्णचरणामृतीं। मज चाड नाहीं महातीर्थीं। त्याही मज अदृष्टगतीं। अंतीं श्रीपति त्यागवी॥ ९३॥ सप्रेम चळचळां कांपत। कंठ जाहला सद्गदित। बाष्पें क्षणक्षणां स्फुंदत। स्वेदरोमांचित उद्धव॥ ९४॥ गमनालागीं अतिउद्यत। पायां लागोनि पऱ्हा जात। सवेंचि येऊनि पायां लागत। विगुंतलें चित्त हरिप्रेमीं॥ ९५॥ पुढती नमन पुढती गमन। पुढती घाली लोटांगण। पुढती वंदी श्रीकृष्णचरण। सर्वथा जाण निघवेना॥ ९६॥ देखोनि उद्धवाचा भावो। परमांनदें तुष्टला देवो। यासी माझ्या ठायीं अतिस्नेहो। गुरुत्वें पहा हो अनन्य॥ ९७॥ कृपा उपजली यदुनायका। आपुले चरणींच्या पादुका। उद्धवासी दिधल्या देखा। तेणें निजमस्तका ठेविल्या॥ ९८॥ पादुका ठेवितांचि शिरीं। मी जातों कृष्णापासूनि दूरी। हें नाठवे उद्धवा अंतरीं। ऐशियापरी प्रबोधिला॥ ९९॥ पादुका ठेवितांचि माथां। स्वयें उपशमे अवस्था। नमस्कारोनि श्रीकृष्णनाथा। होय निघता तदाज्ञा॥ ९००॥ त्रिवार करोनि प्रदक्षिणा। अवलोकूनि श्रीकृष्णवदना। नमस्कारोनि श्रीचरणा। उद्धव कृष्णाज्ञा निघाला॥ १॥ तृतीयस्कंधींचे निरूपण। उद्धवासी विदुरदर्शन। दोघां पडिलें आलिंगन। कुशल संपूर्ण पूशिलें॥ २॥ तेथ सांगतां कृष्णनिधन। उद्धव नव्हेचि दीनवदन। तें विदुरासी कळलें चिह्न। हा ब्रह्मज्ञान पावला॥ ३॥ मरता गुरु रडता चेला। दोंहीचा बोध वायां गेला। साच मानी जो या बोला। तोही ठकला निश्चित॥ ४॥ यासी तुष्टली श्रीकृष्णकृपामूर्तीं। निमाली मोह ममता वृत्ती। पावला परमांनदप्राप्ती। स्वानंदस्थितीं डुल्लत॥ ५॥ शब्दा नातळोनि बोल बोले। पृथ्वी नातळोनि सहजें चाले। असोनि नामरूपमेळें। नामरूपा नातळे हा एक॥ ६॥ हा रसनेवीण सुरस चाखे। डोळॺांवीण आपणपैं देखे। इंद्रियावीण सोलींव सुखें। निजात्मतोखें हा भोगी॥ ७॥ निर्विकल्पनिजबोधेंसीं। त्यावरी भक्तिज्ञानवैराग्येंसीं। स्थिती देखोनि उद्धवापाशीं। विदुर मानसीं निवाला॥ ८॥ मग तो विनवी उद्धवासी। तुज तुष्टला हृषीकेशी। तूं पावलासि ब्रह्मज्ञानासी। तें मज उपदेशीं सभाग्या॥ ९॥ उद्धव म्हणे तुझें भाग्य धन्य। तुज अंतीं स्मरला श्रीकृष्ण। तुज सांगावया ब्रह्मज्ञान। मैत्रेयासी जाण आज्ञापिलें॥ ९१०॥ कृष्ण मज जरी आज्ञा देता। तरी मी तत्काळ बोध करितों तत्त्वतां। तुज सद्गुरु परमार्था। जाण सर्वथा मैत्रेय॥ ११॥ ऐकतां उद्धवाचें वचन। विदुर प्रेमें गहिंवरला पूर्ण। काय बोलिला आपण। सावधान अवधारा॥ १२॥ हें तृतीयस्कंधींचें निरूपण। प्रसंगें एथें आलें जाण। विदुर बोलिला अतिगहन। तेंचि वचन अवधारा॥ १३॥
(संमत श्लोक)—क्वाहं कीटकवत्तुच्छ: क्व च कारुण्यवारिधि:।
तेनाहं स्मारितोऽस्म्यद्य मुमुर्षु: केशवं यथा॥ १॥
विदुर म्हणे मी मशक। रंकांमाजीं अतिरंक। त्या मज स्मरे यदुनायक। कृपा अलोलिक दासांची॥ १४॥ नाठवीच देवकी वसुदेवांसी। नाठवीच बळिभद्र पांडवांसी। ते आठवी मज दासीपुत्रासी। हृषीकेशी कृपाळू॥ १५॥ जेवीं मरता स्मरे नारायण। तेवीं अंतीं मज स्मरला कृष्ण। यापरी भक्तप्रतिपाळू जाण। कृपासिंधु पूर्ण श्रीकृष्ण॥ १६॥ आशंका॥ द्वारकेसी असतां श्रीकृष्ण। तैंचि उद्धवें केलें गमन। त्यासी प्रभासींचें कृष्णनिधन। म्हणाल संपूर्ण अदृश्य॥ १७॥ तरी उद्धवविदुरसंवादखूण। येचि अर्थींचें निरूपण। समूळ सांगेन कथन। तें सावधान अवधारा॥ १८॥ उद्धव जाता मार्गी आपण। अवचितीं जाहली आठवण। न पाहतां कृष्णनिधन। मी कां गमन करितों हें॥ १९॥ श्रीकृष्णचरित्र अतिगोड। तें सांडूनि तीर्थीं काय चाड। ऐसा विचार करूनिदृढ। श्रद्धेनें प्रौढ श्रद्धाळू॥ ९२०॥ परतोनि कृष्णापाशीं जातां। तो मज राहों नेदी सर्वथा। कृष्णामागें कळों नेदितां। आला मागुता प्रभासेंसी॥ २१॥ तेथेंही राहोनियां गुप्त। पाहों लागला श्रीकृष्णचरित। तंव यादवकुळाचा घात। देखिला समस्त उद्धवें॥ २२॥ कुळ निर्दळूनि एकला। कृष्ण अश्वत्थातळीं बैसला। तेथ जराव्याधें बाण विंधिला। चरणीं लागला मृगशंका॥ २३॥ चरणीं लागतांचि घावो। थोर सुखें सुखावला देवो। कृतकार्य जाहलें नि:संदेहो। निजधामा पहा हो जावया॥ २४॥ बाण लागतां भलतेयांसी। घायें होती कासाविशी। ते दशा नाहीं श्रीकृष्णासी। देहत्व त्यासी अतिमिथ्या॥ २५॥ जेवीं घाय लागतां छायेसी। पुरुष नव्हे कासाविशी। तेवीं व्याधें विंधितां बाणेंसी। ग्लानी कृष्णासी असेना॥ २६॥ ते संधीं मैत्रेय आला। त्यासी ज्ञानोपदेश केला। ते काळीं विदुर आठवला। कृपा कळवळला श्रीकृष्ण॥ २७॥ आजी येथें विदुर असता। तरी मी ब्रह्मज्ञान उपदेशितों सर्वथा। मैत्रेया तुज सांगतों आतां। त्यासी तूं तत्त्वतां उपदेशीं॥ २८॥ पावोनि कृष्णगुह्यज्ञान। मैत्रेयासी परम समाधान। म्हणे कलियुग धन्य धन्य। ब्रह्मवादी जन बहुसाल होती॥ २९॥
‘‘सर्वे ब्रह्म वदिष्यन्ति सम्प्राप्ते च कलौ युगे।
नैव तिष्ठन्ति मैत्रेय शिश्नोदरपरायणा:’’॥ २॥
वादकत्वें कलियुगाप्रती। बहुसाल ब्रह्मवादी होती। परी न राहती ब्रह्मस्थितीं। जाण निश्चितीं मैत्रेया॥ ९३०॥ वदूनियां ब्रह्मज्ञान। होती शिश्नोदरपरायण। जिह्वा शिश्न जो आवरी संपूर्ण। त्यासीच ब्रह्मज्ञान कलियुगीं॥ ३१॥ ऐकोनि मैत्रेयसंवादासी। उद्धव आला श्रीकृष्णापाशीं। प्रदक्षिणा करूनि त्यासी। मग पायांसी लागला॥ ३२॥ ऐकून मैत्रेयाचें ज्ञान। देखोनि कृष्णाचें निर्याण। उद्धव निघाला आपण। तें ऐक लक्षण परीक्षिती॥ ३३॥
ततस्तमन्तर्हृदि सन्निवेश्य
गतो महाभागवतो विशालाम्।
यथोपदिष्टां जगदेकबन्धुना
तप: समास्थाय हरेरगाद् गतिम्॥ ४७॥
जगाचें विश्रामधाम। जो पुरुषांमाजीं पुरुषोत्तम। तो हृदयीं धरोनि आत्माराम। उद्धव सप्रेम निघाला॥ ३४॥ कृष्णाची पूर्णस्थिती। हृदयीं धरोनि सुनिश्चितीं। उद्धव विशालतीर्थाप्रती। स्वानंदस्थितीं निघाला॥ ३५॥ उद्धव स्वानंदस्थितिपूर्ण। जेथें जेथें करी गमन। ते ते लोक होती पावन। भक्तिज्ञानवैराग्यें॥ ३६॥ जैसजैसी विवेकविरक्ती। तैसतैसी बोधकशक्ती। उपदेशित ज्ञानभक्ती। चालिला त्रिजगती उद्धरित॥ ३७॥ ज्यांसी उद्धवासी जाहली भेटी। त्यांसी हरिभजनीं पडे मिठी। भवभय पडों नेदी दृष्टीं। बोधक जगजेठी उद्धव॥ ३८॥ जे जे भगवद्भक्ति करित। ते ते ‘भागवत’ म्हणिजेत। मुक्तीहीवरी भजनयुक्त। महाभागवत उद्धव॥ ३९॥ उद्धवें आदरिली जे भक्ती। तिची किंकर नित्यमुक्ती। यालागीं ‘महाभागवत’ स्थिती। बोलिजे निश्चितीं उद्धवा॥ ९४०॥ निजशांतता अतिनिर्मळ। आत्मानुभवें अतिप्रांजळ। मोक्षाहीवरी भजनशीळ। भक्त विशाळ उद्धव॥ ४१॥ ऐशी उद्धवाची विशाळता। तोही पावला विशालतीर्था। ‘विशाल’ म्हणावयाची कथा। ऐक आतां सांगेन॥ ४२॥ जेथ श्रद्धामात्रें चित्तशुद्धी। स्मरणमात्रें निर्विकल्प बुद्धी। ‘नारायण’ नामें मोक्षसिद्धी। ‘विशाल’ या विधीं बदरिकाश्रम॥ ४३॥ जेथ जनहितार्थ नारायण। अद्यापि करितो अनुष्ठान। मोक्षमार्गीं कृपा पूर्ण। यापरी विशाळपण बदरिकाश्रमातें॥ ४४॥ जेथ अल्प तपें फळ प्रबळ। अल्पध्यानें आकळे सकळ। अल्प विरक्तीं मोक्ष केवळ। ऐसा फळोनि विशाळ बदरिकाश्रम॥ ४५॥ जो अंतर्यामीं गोविंदु। जो जगाचा सुहृद बंधु। जो आत्माराम प्रसिद्धु। ज्याचेनि निजबोधु उद्धवा॥ ४६॥ जैसा कृष्णें केला उपदेशु। तैसा बदरिकाश्रमीं रहिवासु। उद्धवें केला निजवासु। तोचि जनांसी विश्वासु परमार्थनिष्ठे॥ ४७॥ जैसी उद्धवाची स्थिती गती। जैशी उद्धवाची ज्ञानभक्ती। जैशी उद्धवाची विरक्ती। तोचि जनांप्रती उपदेश॥ ४८॥ जेथें गुरूसी विषयासक्ती। तेथें शिष्यासी कैंची विरक्ती। जेथ गुरूसी अधर्मप्रवृत्ती। तेथ शिष्यासी निवृत्ति कदा न घडे॥ ४९॥ यालागीं उद्धवाचें आचरित। तेंचि आचरती जन समस्त। एवं परोपकारार्थ। उद्धव विरक्त बदरिकाश्रमीं॥ ९५०॥ जैसें शिकवूनि गेला श्रीकृष्णनाथ। तैसेंचि उद्धव आचरत। त्याचेनि धर्में जन समस्त। जाहले विरक्त परमार्थीं॥ ५१॥ परब्रह्माची निजप्राप्ती। दृढ करूनि गेला श्रीपती। तेचि उद्धवासी ब्रह्मस्थिती। अहोरातीं अखंड॥ ५२॥ बैसतां घालूनि आसन। का करितां गमनागमन। उद्धवाचें ब्रह्मपण। सर्वथा जाण मोडेना॥ ५३॥ विरक्ती आणि भोगासक्ती। दोनी देहावरी दिसती। या दोंहीहूनि परती। परब्रह्मस्थिती उद्धवीं॥ ५४॥ विरक्तीमाजीं नव्हे विरक्त। भोगीं नव्हे भोगासक्त। या दोंहीहून अतीत। ब्रह्म सदोदित उद्धव॥ ५५॥ तेथ प्रारब्धक्षयें जाण। त्या देहासी येतां मरण। उद्धव ब्रह्मीं ब्रह्म पूर्ण। जन्ममरण तो नेणे॥ ५६॥ देहींचा देहात्मभावो। निर्दळूनि नि:संदेहो। उद्धवासी ब्रह्मानुभवो। श्रीकृष्णें पहा हो दृढ केला॥ ५७॥ ऐशिया उद्धवासी देहांतीं। ‘विदेहकैवल्या’ ची प्राप्ती। म्हणणें हें परीक्षिती। दृढ भ्रांती वक्त्याची॥ ५८॥ घडितां मोडितां कांकण। घडमोडी नेणे सुवर्ण। तेवीं देहासीच जन्ममरण। उद्धव परिपूर्ण परब्रह्म॥ ५९॥ उद्धवासी देहीं वर्ततां। तो नित्य मुक्त विदेहता। त्यासी देहांतीं विदेहकैवल्यता। हे समूळ वार्ता लौकिक॥ ९६०॥ देह राहो अथवा जावो। हा ज्ञात्यासी नाहीं संदेहो। त्यासी निजात्मता ब्रह्मभावो। अखंड पहा हो अनुस्यूत॥ ६१॥ देहासी दैव वर्तवी जाण। देहासी दैव आणी मरण। ज्ञाता ब्रह्मींब्रह्म पूर्ण। जन्म मरण तो नेणे॥ ६२॥ देह असो किंवा जावो। आम्ही परब्रह्मचि आहों। दोरींसापपण वावो। दोरेंचि पहा हो जेवीं होय॥ ६३॥ जेथ मृगजळ आटलें। तेथें म्हणावें कोरडें जाहलें। जेव्हां होतें पूर्ण भरलें। तेव्हांही ओलें असेना॥ ६४॥ तेवीं देहाची वर्तती स्थिती। समूळ मिथ्याप्रतीती। त्या देहाचे देहांतीं। विदेहकैवल्यप्राप्ती नवी न घडे॥ ६५॥ यापरी बदरिकाश्रमाप्रती। उद्धवें बहुकाळ करूनि वस्ती। त्याचि निजदेहाचे अंतीं। भगवद्गती पावला॥ ६६॥ ‘पावला’ हेही वदंती। लौकिक जाण परीक्षिती। तो परब्रह्मचि आद्यंतीं। सहज स्थिती पावला॥ ६७॥ उद्धवाची भगवद्भक्ती। आणि निदानींची निजस्थिती। तेणें शुक सुखावला चित्तीं। कृष्णकृपा निश्चितीं वर्णित॥ ६८॥
य एतदानन्दसमुद्रसम्भृतं
ज्ञानामृतं भागवताय भाषितम्।
कृष्णेन योगेश्वरसेविताङ्घ्रिणा
सच्छ्रद्धयाऽऽसेव्य जगद्विमुच्यते॥ ४८॥
जे योगेश्वर योगस्थिती। जे पावले जीवन्मुक्ती। तेही कृष्णचरण सेविती। ऐशी पूज्य मूर्ती श्रीकृष्णाची॥ ६९॥ पदीं रंगले सनकादिक। संत सज्जन अनेक। ब्रह्मादिक तेथें रंक। ऐसा श्रेष्ठ देख श्रीकृष्ण॥ ९७०॥ तेणें श्रीकृष्णें स्वानंदस्थिती। प्रगट केली निजभक्ती। अतिकृपा उद्धवाप्रती। स्वमुखें श्रीपती बोलिला॥ ७१॥ भगवद्भक्ति महासागर। तेथें निजधैर्य तोचि मंदर। गुरुशिष्ययुक्ति सुरासुर। मथनतत्पर साटोपें॥ ७२॥ भाव विश्वास दोनी मांजरीं। बोध रविदोर दृढ धरी। प्रत्यगावृत्ति अभ्यासेंकरीं। मंथन निर्धारीं मांडिलें॥ ७३॥ तेथ मथनीं प्रथमदृष्टीं। ‘अहं ज्ञाता’ हें हालाहल उठी। तें विवेकशिवें धरिलें कंठीं। पुढती अहं नुठी गिळिलें तैसें॥ ७४॥ निरभिमानें मथूनि मथित। काढिलें भक्तिसारामृत। तें उद्धवालागीं श्रीकृष्णनाथ। कृपेनें निश्चित अर्पिलें॥ ७५॥ धर्म अर्थ काम मुक्ती। चहूं पुरुषार्थाही वरती। श्रीकृष्णें सारामृत-निजभक्ती। उद्धवाहातीं अर्पिली॥ ७६॥ निजबोधाचें पात्र जाण। निजानुभवें आसाऊन। तेथें हें सारामृत भरोन। करविलें प्राशन उद्धवासी॥ ७७॥ तेणें उद्धव निवाला। त्रिविधतापें सांडवला। परम सुखें सुखावला। परब्रह्मीं जडला ब्रह्मत्वें॥ ७८॥ भक्तिसारामृतप्राशन। उद्धवें करोनियां जाण। पावला परम समाधान। ऐसा कृपाळु श्रीकृष्ण निजभक्तां॥ ७९॥ कृष्णउद्धवसंवाद पूर्ण। भक्तिसारामृत गुह्यज्ञान। याचें जो करी सेवन। श्रवणमनननिदिध्यासें॥ ९८०॥ ऐसें जो करी कथासेवन। त्याभेणें पळे भवबंधन। स्वप्नीं न देखे जन्ममरण। हाही नव्हे जाण नवलावो॥ ८१॥ जे लागोनि त्याचे संगती। दृढावले ये कथेचे भक्तीं। त्यांसी भवभयाची प्राप्ती। न बाधी कल्पांतीं कुरुराया॥ ८२॥ ज्यासी या कथेची श्रद्धा पूर्ण। ज्यासी या कथेचें अनुसंधान। ज्यासी ये कथेचे अनुष्ठान। तो उद्धरी जाण जगातें॥ ८३॥ जो सूर्याचे घरीं राहिला। त्यासी रात्रीचा यावा ठेला। मा जो त्याचे गांवींच वसला। तोही मुकला रात्रीसी॥ ८४॥ सूर्यासी रात्री नाहीं। मा दिवस उगवे कंहीं। तेवीं स्वरूपाच्या ठायीं। बंधमोक्ष पाहीं अति मिथ्या॥ ८५॥ तेवीं ये कथेचें अनुसंधान। न घडोनि ज्यासी घडे श्रवण। त्यासीही भवबंधन। सर्वथा जाण बाधेना॥ ८६॥ असो न घडे कथाश्रवण। जो हें आवडीं करी पठण। त्याच्या दु:खदोषाचें अति दहन। श्लोकश्लोकीं जाण होतसे॥ ८७॥ नव्हे श्रवण पठण आटाटी। तरी या ग्रंथींच्या निरूपण गोष्टी। जेणें बांधल्या जीवाच्या गांठीं। तो वंद्य सृष्टीं सुरनरां॥ ८८॥ ये कथेची ज्यांसी प्रीती। ये कथेची ज्यांसी भक्ती। त्याची आवडे ज्यासी संगती। त्यांतें वंदिती यमकाळ॥ ८९॥ ये कथेची ज्यासी श्रद्धा पूर्ण। येचि कथेचें मुख्य सेवन। जो श्रद्धेनें करी श्रवण मनन। त्यापासूनि श्रीकृष्ण परता नव्हे॥ ९९०॥ भाळॺाभोळॺा ऐकतां गोष्टी। ज्यासी या कथेची श्रद्धा उठी। कृष्ण प्रकटोनि त्याच्या पोटीं। छेदी उठाउठी भवपाश॥ ९१॥ यापरी श्रद्धाळुवां जाण। कृपाळू स्वामी श्रीकृष्ण। यालागीं श्रीशुक आपण। करी नमन अतिश्रद्धा॥ ९२॥
भवभयमपहन्तुं ज्ञानविज्ञानसारं
निगमकृदुपजह्रे भृङ्गवद्वेदसारम्।
अमृतमुदधितश्चापाययद् भृत्यवर्गान्
पुरुषमृषभमाद्यं कृष्णसंज्ञं नतोऽस्मि॥ ४९॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायामेकादशस्कंधे एकोनत्रिंशोऽध्याय:॥ २९॥
संसारभयें अति त्रासले। जे कृष्णासी शरण आले। त्यांचें भवभय हरावया वहिलें। जेणेंमथन केलें वेदार्थाचें॥ ९३॥ मथूनि उपनिषद्भार। काढिलें ज्ञानविज्ञानसार। ज्यालागीं शिणले ज्ञाते नर। तयांसी पैल मेर ठाकेना॥ ९४॥ म्हणशी निगम मथितां। वेदासी जाहली परम व्यथा। कृष्ण वेदांचा आदिकर्ता। तो दु:ख सर्वथा हों नेदी॥ ९५॥ जेवीं स्वयें वांसरूं गाय दुहितां। बाहला न लगे सर्वथा। तेवीं श्रीकृष्ण वेद मथितां। वेदासी व्यथा बाधीना॥ ९६॥ जो सर्वज्ञ हृषीकेश। वेदार्थसार-राजहंस। तेणें नेदितां दु:खलेश। वेदसारांश काढिला॥ ९७॥ एवं वेदार्थ निजमथित। ज्ञानविज्ञानसारामृत। कृष्णें काढूनि इत्थंभूत। भृत्यहितार्थ कृपा अर्पी॥ ९८॥ जेवीं हळुवारपणें षट्पद। काढी सुमनमकरंद। तेवीं मथूनियां वेद। श्रीकृष्णें सार शुद्ध काढिलें॥ ९९॥ यापरी श्रीकृष्णनाथ। भक्तकृपाळू कृपावंत। काढूनि वेदसारामृत। निजभृत्या देत निर्भय॥ १०००॥ ऐसें वेदसारामृत पूर्ण। भृत्यासी पाजूनि श्रीकृष्ण। निजभक्ताचें जन्ममरण। निर्दळी संपूर्ण भवभय॥ १॥ जगाचें माया मुख्य कारण। कृष्ण मायेचेंही निजकारण। जें स्वरूप सच्चिदानंदघन। त्यासी संज्ञा ‘श्रीकृष्ण’ नामाची॥ २॥ घेऊनि माया मनुष्यनट। पुरुषांमाजीं पुरुषश्रेष्ठ। पूर्ण ज्ञानें ज्ञाननिष्ठ। वंद्य वरिष्ठ श्रीकृष्ण॥ ३॥ त्यासी कायावाचा आणि मन। सर्वार्थीं अनन्यशरण। यापरी श्रीशुक आपण। करी मनें नमन श्रीकृष्णा॥ ४॥ ऐसें श्रीशुकें केलें नमन। तेणें परीक्षिती सप्रेम पूर्ण। भक्तकृपाळू एक श्रीकृष्ण। दुसरा जाण असेना॥ ५॥ उद्धव पावला परम निर्वाण। सरलें ज्ञानकथानिरूपण। जगीं श्रेष्ठ भगवद्भजन। भक्तांअधीन श्रीकृष्ण॥ ६॥ जें जें भक्तांचें मनोगत। तें तें पुरवी श्रीकृष्णनाथ। शेखीं निजपदही देत। कृपा समर्थ भक्तांची॥ ७॥ निजधामा निघतां श्रीकृष्ण। जरी उद्धव न करितां प्रश्न। तरी हें परमामृतकथन। सर्वथा श्रीकृष्ण न बोलता॥ ८॥ यालागीं उद्धवाचा महाथोर। जगासी जाहला उपकार। भक्तिज्ञानवैराग्यसार। ज्याचेनि शार्ङ्गधर स्वयें वदला॥ ९॥ उद्धवाचेनि धर्में जाण। भवाब्धि तरे त्रिभुवन। ऐसे बोलविलें गुह्यज्ञान। सप्रेम भजन तद्युक्त॥ १०१०॥ उपेक्षून चारी मुक्ती। उद्धवें थोराविली हरिभक्ति। एवढी उद्धवें केली ख्याती। त्रिजगती तरावया॥ ११॥ एकादशाचेनि नांवें। घातली भक्तिमुक्तीची पव्हे। एवढी कीर्ति केली उद्धवें। जडजीवें तरावया॥ १२॥ धेनूच्याठायीं क्षीर पूर्ण। परी हाता न ये वत्सेंवीण। तेवीं श्रीकृष्णाचें पूर्ण ज्ञान। उद्धवें जाण प्रगटकेलें॥ १३॥ कृष्णोद्धवसंवादकथन। तें अतिशयें ज्ञान गहन। तेथ मी अपुरतें दीन। केवीं व्याख्यान करवलें॥ १४॥ कृष्णोद्धवज्ञान गहन। त्याचें करावया व्याख्यान। साह्य जाहला जनार्दन। जो सर्वीं सर्वज्ञ सर्वार्थीं॥ १५॥ पदपदार्थसंगतीं। ज्ञानाची परिपाकस्थिती। वैराग्ययुक्त भक्तिमुक्ती। हेहीव्युत्पत्ती मी नेणें॥ १६॥ माझें जें कां मीपण। तेंही जाहला जनार्दन। तेव्हां पदपदार्थव्याख्यान। कर्ता जाण तो एक॥ १७॥ तो एका एकपणाचेनि भावें। ऐक्यता फावली स्वभावें। ‘एकाजनार्दन’ येणें नांवें। हा ग्रंथ देवें विस्तारिला॥ १८॥ माझे बुद्धीचीही बुद्धी। जनार्दन जाहला अर्थावबोधीं। कवित्वयुक्ति-पदबंधीं। वदता त्रिशुद्धी जनार्दन॥ १९॥ माझें नामरूप कर्म गुण। मूळीं पाहतांमिथ्या जाण। परी तेंही जाहला जनार्दन। ऐसें एकपण पढियंतें॥ १०२०॥ नांवे भावें एकपण। यालागीं तुष्टला जनार्दन। तेणें माझ्या नांवा ऐसें जाण। जगीं एकपण प्रकाशिलें॥ २१॥ ‘एका’ या नामाचें कौतुक। पढिये जनार्दनासी आत्यंतिक। तेणें तो मजशीं जाहला एक। ‘मी तूं’ देख म्हणतांही॥ २२॥ ‘एका’ या नांवाचें कौतुक। जनार्दनासी ऐसें देख। एकत्वीं प्रकाशी अनेक। अनेकीं एक अविकारी॥ २३॥ नांवें एक भावें एक। त्यासी देवाचें सर्वदा ऐक्य। मग देखतां एकानेक। भिन्नत्व देख असेना॥ २४॥ हें एकत्व जंव न ये हाता। तंव न लाभे देवाची प्रसन्नता। एकत्वावांचूनि सर्वथा। अकर्तात्मता कळेना॥ २५॥ जंव कर्तव्याचा अहंभावो। तंव सर्वथा न भेटे देवो। अहंपाशीं बद्धतेशी ठावो। मुक्तता पहा हो तत्त्यागें॥ २६॥ नामरूपा एकपण। हेंचि माझें अनुष्ठान। तेणें तुष्टला जनार्दन। माझें मीपण तोचि जाहला॥ २७॥ जेवीं बाहुल्यांचें खेळणें। तेथ रुसणें आणि संतोषणें। हें खेळवित्याचें करणें। बाहुली नेणे तो अर्थ॥ २८॥ तेवीं माझेनि नांवें कविता। करून जनार्दन जाहला वक्ता। यालागीं हे ग्रंथकथा। साधुसंतां पढियंती॥ २९॥ देह अहंता ग्रंथ करितां। एकही वोवी न ये हाता। येथ जनार्दन जाहला वक्ता। ग्रंथ ग्रंथार्था तेणें आला॥ १०३०॥ देखोनि मराठी गोठी। न म्हणावी वृथा चावटी। पहावी निजबोध कसवटी। निजात्मदृष्टीं सज्जनीं॥ ३१॥ संस्कृत वंद्य प्राकृत निंद्य। हे बोल काय होती शुद्ध। हाही अभिमानवाद। अहंता बंध परमार्थीं॥ ३२॥ मोलें भूमि खणितां वैरागरीं। अवचटें अनर्घ्यरत्न लाभे करीं। तें रत्न सांपडल्या केरीं। काय चतुरीं उपेक्षा॥ ३३॥ तेवीं संस्कृत आटाटी। करितां परमार्थीं नव्हे भेटी। तेचि जोडल्या मराठीसाठीं। तेथ घालिती मिठी सज्ञान॥ ३४॥ चकोरां चंद्रामृतप्राशन। वायसां तेथें पडे लंघन। तेवीं हा महाराष्ट्र ग्रंथ जाण। फळाफळपण ज्ञानाज्ञानें॥ ३५॥ देवासी नाहीं भाषाभिमान। संस्कृत प्राकृत दोनी समान। ज्या भाषा केलें ब्रह्मकथन। त्या भाषां श्रीकृष्ण संतोषे॥ ३६॥ साजुक आणि सुकलीं। सुवर्णसुमनीं नाहीं चाली। तेवीं संस्कृत प्राकृत बोली। ब्रह्मकथेनें आली समत्वा॥ ३७॥ संस्कृत भाषा निंदा केली। तरी ते काय पावन जाहली। प्राकृत भाषा हरिकथा केली। ते वृथा गेली म्हणवेना॥ ३८॥ जंव जंव दृढ भाषा अभिमान। तंव तंव वक्त्यासी बाधक पूर्ण। ज्या भाषा केलें ब्रह्मकथन। ते होय पावन हरिचरणीं॥ ३९॥ माझी मराठी भाषा उघडी। परी परब्रह्मेंसीं फळली गाढी। जे जनार्दनें लाविली गोडी। ते चवी न सोडी ग्रंथार्थ॥ १०४०॥ हे जनार्दनकवितावाडी। ब्रह्मरसें रसाळ गाढी। संतसज्जन जाणती गोडी। यालागीं जोडी जोडिला ग्रंथ॥ ४१॥ उद्धवव्याजें स्वयें श्रीकृष्ण। वदला पूर्ण ब्रह्मज्ञान। येणें छेदूनि भवबंधन। दीनजन तरावया॥ ४२॥ तो हा एकादशाऐसा ग्रंथ। जेथ ठाकठोक परमार्थ। येणें महाकवि समस्त। निजहितार्थ पावले॥ ४३॥ पक्व फळीं शुक झेंपावे। तेथ मुंगीही जाऊनि पावे। तेवीं महाकवींचे घेऊनि मागोवे। मीही पावें प्राकृत॥ ४४॥ महारायाच्या ताटापाशीं। रिगमु नाहीं समर्थांसी। तेथें सुखें बैसे माशी। तेवीं हा आम्हांसी प्राकृत ग्रंथ॥ ४५॥ भोजनीं धरोनि बापाचा हात। गोड तें आधीं बाळक खात। तेवींहा महाकवींच्या अनुभवांत। प्राकृतें परमार्थ मीही लाभें॥ ४६॥ मी लाधलों सद्गुरुचरण। तेणें हें चालिलें निरूपण। बाप कृपाळु जनार्दन। ग्रंथ संपूर्ण तेणें केला॥ ४७॥ म्हणाल पूर्ण जाहलापरमार्थ। पुढें आहे महाअनर्थ। तैसा नव्हे गुह्यज्ञानार्थ। स्वयें श्रीकृष्णनाथ दावील॥ ४८॥ माता पिता स्त्री पुत्र जन। जाती गोत सुहृद सज्जन। सकळ कुळासी येतां मरण। ममता श्रीकृष्ण कदा न धरी॥ ४९॥ कृष्णआज्ञा काळ वंदी माथां। एवढी हातीं असतां सत्ता। तरी कुळरक्षणाची ममता। श्रीकृष्णनाथा असेना॥ १०५०॥ ज्यासी देहीं निरभिमानता। ज्यासी बाधीना कुळाची ममता। ते देहींची निरहंकारता। श्रीकृष्ण आतां स्वांगें दावी॥ ५१॥ तें ज्ञानपरिपाकनिर्वाण। अतिगोडीचें निरूपण। पुढिले दों अध्यायीं जाण। श्रीशुक आपण सांगेल॥ ५२॥ ते ज्ञानगुह्य निजकथा। जनार्दनकृपा तत्त्वतां। एका जनार्दन वक्ता। अवधान श्रोतां मज द्यावें॥ ५३॥ जेथ संत अवधान देती। ते कथा वोढवे परमार्थीं। एका जनार्दनीं विनंती। अवधान ग्रंथार्थीं मज द्यावें॥ १०५४॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे एकादशस्कंधे भगवदुद्धवसंवादे एकाकारटीकायां परमार्थप्राप्तिसुगमोपाय-कथनोद्धवबदरिकाश्रमप्रवेशो नाम एकोनत्रिंशोऽध्याय:॥ २९॥ श्रीकृष्णार्पणमस्तु॥ (श्लोक ४९, संमत श्लोक २,ओव्या १०५४)
॥ श्री ॐ तत्सत्-श्रीकृष्ण प्रसन्न॥
अध्याय तिसावा
श्रीगणेशाय नम:॥श्रीकृष्णाय नम:॥ जय जय सद्गुरु अनादी। जय जय सद्गुरु सर्वादी। जय जय सद्गुरु सर्वसिद्धी। जय जय कृपानिधि कृपाळुवा॥ १॥ जय जय वेदवाचका। जय जय वेदार्थप्रकाशका। जय जय वेदप्रतिपालका। जय जय वेदात्मका वेदज्ञा॥ २॥ जय जयविश्वप्रकाशका। जय जय विश्वप्रतिपाळका। जय जय विश्वनिवासका। अकर्तात्मका अव्यया॥ ३॥ तुझी अव्यय अक्षर स्थिती। नाहीं नाम रूप वर्ण व्यक्ती। तो तूं नांदसी जाति गोतीं। लोकस्थितीव्यवहारें॥ ४॥ तुज जगीं नाहीं दुसरें। तो तूं गृहस्थ घरदारें। तूं पुरुष ना नपुंसक साचोकारें। कीं स्त्रीपुत्रें नांदसी॥ ५॥ अज आणि वंदिसी पिता। अजन्मा तो नमिसी माता। जगीं तुझी सर्वसमता। शेखीं अरिमित्रता चाळिसी॥ ६॥ तूं जगन्नाथ जग चाळक। कीं एकाचा होसी सेवक। तूं परिपूर्ण पूर्णात्मक। कीं मागसी भीक रंकत्वें॥ ७॥ तूं नैष्ठिक ब्रह्मचारी। कीं व्यभिचारें तारिसी नारी। तूं सर्वज्ञ कीं गुरूच्या द्वारीं। तृणकाष्ठें शिरीं वाहसी स्वयें॥ ८॥ जो तूं कळिकाळातें ग्रासिसी। तो तूं बागुलाभेणें लपसी। तूं मायानियंता हृषीकेशी। शेखीं माया बांधिजशी उखळीं॥ ९॥ तूं आत्माराम नित्यतृप्त। शेखीं गोवळांचा खाशी भात। तुझा ब्रह्मादिकां न कळे अंत। ते तूं उभा रडत यशोदेपाशीं॥ १०॥ त्रैलोक्य दाविसी उदरीं। तो तूं गोपिकांचे कडियेवरी। तूं जगाचा चाळक श्रीहरी। त्या तुज लेंकुरीं शिकविजे चालूं॥ ११॥ जो तूं सर्ववंद्य सर्वेश्वर। तो तूं होसी पांढरा डुकर। एवं करितां तुझा निर्धार। वेदांसी विचार कळेना॥ १२॥ वेदीं घेतलें महामौन। ज्ञाते झाले नेणकोण। योगी वळंघले रान। तुझें महिमान कळेना॥ १३॥ मुख्यत्वें जन्म नाहीं ज्यासी जाण। तो कृष्ण कैसें दावी मरण। तें ऐकावया निरूपण। परीक्षिती पूर्ण श्रद्धाळू॥ १४॥ प्रथमाध्यायीं वैराग्यार्थ। मुसळ बोलिलें शापयुक्त। तेंचि ग्रंथावसानीं एथ। असे पुसत परीक्षिती॥ १५॥
राजोवाच
ततो महाभागवत उद्धवे निर्गते वनम्।
द्वारवत्यां किमकरोद्भगवान् भूतभावन:॥ १॥
जो पांडवकुळीं कुळरत्न। कीं कौरवकुळीं कुळभूषण। जो धर्माचें निजरक्षण। कलीचें निग्रहण जेणें केलें॥ १६॥ ऐसा राजा परीक्षिती। धैर्य वीर्य उदार कीर्ति। तेणें स्वमुखें श्रीशुकाप्रती। केली विनंती अतिश्रद्धा॥ १७॥ उद्धव पावोनि पूर्ण ज्ञान। तो बदरिकाश्रमा गेलिया जाण। मागें द्वारकेसी श्रीकृष्ण। काय आपण करिता झाला॥ १८॥ उत्त्पत्तिस्थितिनिदान। जो इच्छामात्रें करी जाण। तो स्वदेहाचें विसर्जन। कैसेनि श्रीकृष्ण करिता झाला॥ १९॥
ब्रह्मशापोपसंसृष्टे स्वकुले यादवर्षभ:।
प्रेयसीं सर्वनेत्राणां तनुं स कथमत्यजत्॥ २॥
ब्रह्मशापें श्रीकृष्णनाथ। नि:शेष निजकुळासी घात। कैसेनि करविला एथ। हें सुनिश्चित सांगावें॥ २०॥ जन नयना आल्हादकर। कृष्णतनु अतिसुंदर। जीसी देखतांचि त्रिनेत्र। हर्षें निर्भर स्वानंदें॥ २१॥ ऐशी आल्हादकारक तनु। कैसेनि सांडी श्रीकृष्णु। ब्रह्मशापासी भिऊनु। तो कां निजतनु सांडिता झाला॥ २२॥ कृष्ण परब्रह्म परिपूर्ण। त्यासी बाधीना शापबंधन। तोही सत्य करी ब्रह्म वचन। यादववंशीं तनु सांडूनी॥ २३॥ दृष्टीं देखतां श्रीकृष्ण। सुखें सुखावे जीवप्राण। त्याच्या सौंदर्याचें निरूपण। राजा आपण सांगत॥ २४॥
प्रत्याक्रष्टुं नयनमबला यत्रलग्नं न शेकु: कर्णाविष्टं न सरति ततो यत्सतामात्मलग्नम्॥
यच्छ्रीर्वाचां जनयति रतिं किं नु मानं कवीनां दृष्ट्वा जिष्णोर्युधि रथगतं यच्च तत्साम्यमीयु:॥ ३॥
ज्याची अकराही इंद्रियां सदा गोडी। भोगिजे तंव तंव प्रीती गाढी। कदा वीट नुपजे अनावडी। अवीट गोडी कृष्णाची॥ २५॥ बाळा प्रौढा मुग्धा प्रगल्भा व्यक्ती। ऐशी चतुर्विधा स्त्रियांचीजाती। तिंहीं देखिल्या श्रीकृष्णमूर्ती। दृष्टी मागुती परतेना॥ २६॥ ज्या धार्मिका धैर्यवृत्ती। ज्या पतिव्रता महासती। तिंहीं देखिल्या कृष्णमूर्ती। दृष्टि मागुती परतेना॥ २७॥ ज्या का अबळा अभुक्त कामा। ज्या अतिवृद्धा अतिनिष्कामा। तिंहीं देखिल्या मेघश्यामा। नयन सकामा हरिरूपीं॥ २८॥ जेवीं लवणजळा भेटी। तेवीं श्रीकृष्णीं स्त्रियांची दिठी। मिसळलिया उठाउठी। परतोनि मिठी सुटेना॥ २९॥ एवं देखिलिया श्रीकृष्णमूर्ती। स्त्रियांचिया निजात्मशक्ती। दृष्टि परतेना मागुती। ऐशी नयनां प्रीती हरिरूपीं॥ ३०॥ स्त्रिया बापुडॺा त्या किती। जे का संत विरक्त परमार्थी। त्यांचे श्रवणीं पडतां कीर्ती। चित्तीं श्रीकृष्णमूर्ती ठसावे॥ ३१॥ चित्तीं ठसावोनि श्रीकृष्णमूर्ती। चित्तचि आणी कृष्णस्थितीं। ऐशी कृष्णाची कृष्णकीर्ती। चित्तवृत्ती आकर्षी॥ ३२॥ संतांची आकर्षी चित्तवृत्ती। हें नवल नव्हे कृष्णकीर्ती। कीर्ती ऐकतां असंतीं। तेही होती तद्रूप॥ ३३॥ लागतां चंदनाचा पवन। खैर धामोडे होती चंदन। तेवीं कृष्णकीर्तिश्रवण। दे समाधान समसाम्यें॥ ३४॥ भावें ऐकतां श्रीकृष्णकीर्ती। असंतही संतत्वा येती। मग संतासंत दोनी स्थिती। हारपती समसाम्यें॥ ३५॥ महाकवि वर्णितां श्रीकृष्णकीर्ती। पावले परम सौभाग्यस्थिती। ते कृष्णकीर्ती जे वर्णिती। तेही पावती ते शोभा॥ ३६॥ कवीश्वरां नव रसिकु। नवरंगडा श्रीकृष्ण एकु। जो जो वर्णिजे रसविशेखु। तो तो यदुनायकु स्वयें होय॥ ३७॥ महाकवि आदिकरूनी। कवीश्वरांची कीर्तिजननी। जे विनटले हरिकीर्तनीं। वंद्य वाणी तयांची॥ ३८॥ श्रीकृष्ण कीर्ति पवाडे। ज्याची वाणी अबद्धही पढे। ते वाचा वंदिजे चंद्रचूडें। त्याच्या पायां पडे यमकाळ॥ ३९॥ जेथें श्रीकृष्ण कीर्ति कीर्तन। तेथें कर्माकर्मांची उजवण। होय संसाराची बोळवण। जन्ममरण समवेत॥ ४०॥ यापरी कीर्तीचें महिमान। सर्वार्थीं अगाध जाण। श्रीकृष्ण कीर्ति कविता जाण। परम पावन तिंही लोकीं॥ ४१॥ कवीश्वरांची श्रीकृष्णकीर्ति। ऐकतां वाढे श्रद्धा प्रीती। तेणें थोरावे कृष्णभक्ती। हें कविताशक्ती अगाध॥ ४२॥ ऐशी अगाध श्रीकृष्णकीर्ती। मा त्या कृष्णाची कृष्णमूर्ती। जे अखंड ध्यानीं देखती। ते ते होती तद्रूप॥ ४३॥ ज्यांसी अखंड ध्यानीं श्रीकृष्णमूर्तीं। ते ते तद्रूप पावती। हें नवल नव्हे कृष्णस्थिती। जे द्वेषें देखती तेही मुक्त॥ ४४॥ ज्याचे रथीं मेघश्याम। सारथी झाला पुरुषोत्तम। यालागीं पार्थाचा पराक्रम। मिरवी नाम विजयत्वें॥ ४५॥ सदा जयशील संपूर्णु। यालागीं अर्जुना नाम ‘जिष्णु’। ज्याचे युद्धींचा कठिण पणु। सिद्धी श्रीकृष्णु पाववी॥ ४६॥ तो बैसोनि अर्जुनाचे रथीं। विचरतां युद्धक्षिती। जे जे देखती श्रीकृष्णमूर्ती। ते ते कृष्णस्थिती पावले॥ ४७॥ जेथ कृष्णाचा पडे पदरेणु। तेथें चहूं मुक्तींसी होय सणु। ऐशी पावन कृष्णतनु। कैसेनि श्रीकृष्णु सांडिता झाला॥ ४८॥ म्हणाल ब्रह्मशापाभेण। शरीर सांडी श्रीकृष्ण। हा बोलचि अप्रमाण। कृष्ण ब्रह्म पूर्ण परमात्मा॥ ४९॥ हेळण छळण दुर्वचन। द्विजा न करावा अपमान। त्यांचा वाढवावया पूर्ण सन्मान। तनुत्यागें श्रीकृष्ण द्विजशाप पाळी॥ ५०॥ कृष्ण परमात्मा परिपूर्ण। तेणेंही निजकुळ निर्दळून। सत्य करी ब्राह्मणवचन। विप्रशापें आपण निजतनु त्यागी॥ ५१॥ तो तनुत्याग प्रकार। साङ्ग समूळ सविस्तर। सांगताहे शुक योगींद्र। परिसे नरेंद्र त्यक्तोदक॥ ५२॥ पांडवकुळीं कुळदीपक। जन्मला परीक्षितीच एक। जो होऊनि त्यक्तोदक। भागवत परिपाक सेवित॥ ५३॥ ब्रह्मानारदव्यासपर्यंत। भागवत-उपदेश गुह्य गुप्त। तो परीक्षितीनें जगाआंत। केला प्रकटार्थ दीनोद्धारा॥ ५४॥ धर्मवंशीं अतिधार्मिक। जन्मला परीक्षितीच एक। भागवतरसीं अतिरसिक। अति नेटक श्रवणार्थी॥ ५५॥ ऐसा जो कां परीक्षिती। तेणें अत्यादरें केली विनंती। शुक सुखावोनि चित्तीं। काय त्याप्रती बोलिला॥ ५६॥
ऋषिरुवाच
दिवि भुव्यन्तरिक्षे च महोत्पातान् समुत्थितान्।
दृष्ट्वाऽऽसीनान् सुधर्मायां कृष्ण: प्राह यदूनिदम्॥ ४॥
शुक म्हणे परीक्षिती। उद्धव गेलिया वनाप्रती। मागें विघ्नभूत द्वारावती। त्रिविध उत्पातीं अतिव्याप्त॥ ५७॥ दिवि-भुवि-अंतरिक्षगत। उठिले गा महोत्पात। दिवसा उल्कापात होत। भूतें खाखात अंतरिक्षीं॥ ५८॥ गगनीं उगवले त्रिविध केतु। दंडकेतु धूमकेतु। शिखाकेतु अति अद्भुतु। दिवसाही दिसतु सर्वांसी॥ ५९॥ धरा कांपोनि अतिगजरीं। भूस्फोट झाला नगरद्वारीं। भूकंप तीन दिवसवरी। घरोघरीं आंदोळ॥ ६०॥ वारा सुटला अति झडाडें। समूळ उन्मळतीं झाडें। द्वारकेमाजीं धुळी उडे। डोळा नुघडे जनांचा॥ ६१॥ अंतरिक्षीं नग्न भूतें। धांवती खाखातें खिंखातें। रुधिरवृष्टि होय तेथें। अकस्मातें निरभ्रीं॥ ६२॥ रविचंद्रांचें मंडळ। खळें करीत सर्वकाळ। ग्रह भेदिती ग्रहमंडळ। क्रूरग्रहमेळ शत्रुसदनीं॥ ६३॥ सन्मुख आकाशाचे पोटीं। दिग्दाह देखती दृष्टीं। अभ्रेंवीण कडकडाटी। पडती वितंडीं महाविजा॥ ६४॥ घारी झडपिती सत्राणें। जेवितां पुढील नेती भाणें। दिवसा दिवाभीत घुंगाणे। राजद्वारीं श्वानें सैंघ रडती॥ ६५॥ बैसल्या सुधर्मासभेप्रती। संकल्पविकल्पांची निवृत्ती। ते सभेसी वीर वोसणती। मारीं मारीं म्हणती परस्परें॥ ६६॥ तें ऐकतांचि उत्तर। दचकती महाशूर। सुधर्मासभेसी चिंतातुर। यादववीर समस्त॥ ६७॥ यादव बैसले सभेसी। छाया देखती वीणशिसीं। सुधर्मासभेपाशीं। अरिष्टें ऐशीं उठतीं॥ ६८॥ ऐशीं अरिष्टें अनिवार। दु:खसूचकें दुस्तर। देखोनि यादव थोरथोर। विघ्नविचार विवंचिती॥ ६९॥ द्वारकेचें विघ्ननिर्दळण। करूं ठेविलेंसे सुदर्शन। ते द्वारकेमाजीं महाविघ्न। काय कारण उठावया॥ ७०॥ जंव पातया पातें लवे। तंव चक्रएकवीस वेळा भंवे। ते द्वारकेसी विघ्न संभवे। देखोनि आघवे अतिचकित॥ ७१॥ सर्व विघ्नांचें आकर्षण। करी या नांव म्हणिपे ‘कृष्ण’। तो कृष्ण येथें असतां जाण। उत्पात दारुण कां उठती॥ ७२॥ एवं विचारारूढ यादवांसी। चिंतातुर देखोनियां त्यांसी। बुद्धि सांगावया त्यांपाशीं। काय हृषीकेशी बोलत॥ ७३॥
एते घोरा महोत्पाता द्वार्वत्यां यमकेतव:।
मुहूर्तमपि न स्थेयमत्र नो यदुपुङ्गवा:॥ ५॥
जो जगाचा सूत्रधारी। जो मायायंत्रींचा यंत्रकारी। तो यादवांप्रती श्रीहरी। आलोच करी विघ्नांचा॥ ७४॥ यादवकुळासी आला प्रांत। हें जाणे श्रीकृष्णनाथ। यांचा द्वारकेसी होऊं नये घात। यालागीं समस्त प्रभासा धाडी॥ ७५॥ द्वारावती सातवी पुरी। येथील मरण मोक्षोपकारी। यादव समस्त देवाधिकारी। यालागीं ते बाहेरी श्रीकृष्ण काढी॥ ७६॥ कुळनाशाचें मूळ देखा। प्रभासीं निघालीसे एरिका। हाचि कृष्णाचाही आवांका। तो धाडी सकळिकां प्रभासासी॥ ७७॥ यादवांसी ब्रह्मशाप। घडलासे घोररूप। यालागीं द्वारकेमाजीं संताप। उत्पातरूप उठती॥ ७८॥ उत्पात उठले अनेक। हे अनिवार अरिष्टसूचक। अविलंबें तत्काळिक। परम दु:ख पावाल॥ ७९॥ यालागीं तुम्हीं आवश्यक। येथें न राहावें मुहूर्त एक। स्त्रिया पुत्र सुहृद लोक। तात्काळिक निघावें॥ ८०॥ म्हणाल यादववीर उद्भट। आम्हांसी काय करील अरिष्ट। येणें गर्वें अति अनिष्ट। परम कष्ट पावाल॥ ८१॥ ब्राह्मणाचे शापापुढें। कायसें शौर्य बापुडें। तुम्हीं न विचारितां मागेंपुढें। आतांचि रोकडें निघावें॥ ८२॥ द्वारकेमाजीं आजि कोणी। सर्वथा पिऊं नये पाणी। स्त्री पुत्र सुहृद जनीं। परिवारोनि निघावें॥ ८३॥ कुळासी घडला ब्रह्मशाप। तेणें द्वारकेसी उठिला संताप। तें फेडावया कुळाचें पाप। क्षेत्र पुण्यरूप प्रभास॥ ८४॥
स्त्रियो बालाश्च वृद्धाश्च शङ्खोद्धारं व्रजन्त्वित:।
वयं प्रभासं यास्यामो यत्र प्रत्यक् सरस्वती॥ ६॥
वस्तीसी अतिगूढ शंखोद्धार। तेथें ठेवावीं स्त्रीवृद्धकुमार। आम्हीं समस्त यादववीर। निघावें सत्वर प्रभासेसी॥ ८५॥ जेथें प्राची सरस्वती। मिळाली असे सागराप्रती। तेथें जाऊनि समस्तीं। करावें विध्युक्तीं तीर्थविधान॥ ८६॥
तत्राभिषिच्य शुचय उपोष्य सुसमाहिता:।
देवता: पूजयिष्याम: स्नपनालेपनार्हणै:॥ ७॥
तेथें वेदोक्तविधान। करावें तीर्थीं तीर्थस्नान। तीर्थविध्युक्त उपोषण। करावें आपण निराहार॥ ८७॥ तेथें सद्भावें शुचिर्भूत। राहोनियां समस्त। तीर्थ देवता विध्युक्त। नि:शापार्थ पूजावी॥ ८८॥ स्नान वस्त्रें अलंकार। चंदनादि पूजासंभार। समर्पूनि पूजा षोडशोपचार। श्रद्धा हरिहर पूजावे॥ ८९॥
ब्राह्मणांस्तु महाभागान् कृतस्वस्त्ययना वयम्।
गोभूहिरण्यवासोभिर्गजाश्वरथवेश्मभि:॥ ८॥
वेदवेदांगपारंगत। शमदमादितपयुक्त। ब्राह्मण जे स्वधर्मनिरत। विघ्नशांत्यर्थ पूजावे॥ ९०॥ व्हावया अरिष्टनिरसन। करिती शांत्यर्थ स्वस्तिवाचन। त्या ब्राह्मणांसी आपण। द्यावें दान श्रद्धायुक्त॥ ९१॥ गोदान भूदान गजदान। अश्वदान सुवर्णदान। तिळदान वस्त्रदान। द्यावें गृहदान अतिश्रद्धा॥ ९२॥ रथीं संजोगोनि अश्ववर। दान द्यावें रहंवर। द्विज सुखी होती अपार। तो तो प्रकार करावा॥ ९३॥ जें जें ब्राह्मणा अपेक्षित। तें तें द्यावें श्रद्धायुक्त। ब्राह्मण तुष्टमान जेथ। अरिष्ट तेथ रिघेना॥ ९४॥
विधिरेष ह्यरिष्टघ्नो मङ्गलायनमुत्तमम्।
देवद्विजगवां पूजा भूतेषु परमो भव:॥ ९॥
जेथ हरीचें देवतार्चन। जेथ शालग्रामशिलार्चन। जेथ साधुसंतां सन्मान। ते अरिष्टनाशन महापूजा॥ ९५॥ जेथ सद्भावें द्विजपूजन। जेथ भावार्थें गोशुश्रूषण। जेथ भूतदया संपूर्ण। तेथें कदा विघ्न रिघेना॥ ९६॥ अंध पंगु अशक्त जन॥ जेथ पावती अवश्य अन्न। जेथ सुखी होती दीन। तेथ कदा विघ्न बाधीना॥ ९७॥ जेथें भूतदया अलोलिक। ते सकळ अरिष्टच्छेदक। परम मंगळ प्रकाशक। सुखदायक सर्वार्थीं॥ ९८॥
इति सर्वे समाकर्ण्य यदुवृद्धा मधुद्विष:।
तथेति नौभिरुत्तीर्य प्रभासं प्रययू रथै:॥ १०॥
जो मधुकैटभमर्दन। जो मुरारी मधुसूदन। जो परमात्मा श्रीकृष्ण। तो करी प्रेरण प्रभासा॥ ९९॥ यादवांमाजीं वृद्ध सज्ञान। पुत्र मित्र सुहृद स्वजन। तिहीं श्रीकृष्णाचें वचन। बहुसन्मानें वंदिलें॥ १००॥ सकळ समृद्धिसंभारा। स्त्रीवृद्धादि बाळकुमारा। नावा भरोनियां समग्रा। शंखोद्धारा न्या म्हणती॥ १॥ पालाणोनि रथ कुंजर। चतुरंग सेना संभार। कृष्णसहित यादववीर। निघाले समग्र प्रभासासी॥ २॥
तस्मिन् भगवताऽऽदिष्टं यदुदेवेन यादवा:।
चक्रु: परमया भक्त्या सर्वश्रेयोपबृंहितम्॥ ११॥
यादव प्रभासा पावोन। जैसें होतें श्रीकृष्णवचन। त्याहूनि विशेष जाण। स्नानदान तिंहीं केलें॥ ३॥ यादव समस्त मिळोन। केलें पारणा विधिभोजन। मग महामद्य आणूनि जाण। मद्यपान मांडिलें॥ ४॥
ततस्तस्मिन्महापानं पपुर्मैरेयकं मधु।
दिष्टविभ्रंशितधियो यद्द्रवैर्भ्रश्यते मति:॥ १२॥
करूनियां तीर्थविधान। करावें अरिष्टनिरसन। बाप अदृष्टाचें विंदान। तेथें मद्यपान मांडिलें॥ ५॥ ज्याची गोडपणें पडे मिठी। उन्मादता अतिशयें उठी। तें मद्यपान उठाउठी। वडिलींधाकुटीं मांडिलें॥ ६॥ ज्याचा वास येतांचि घ्राणीं। उन्माद चढे तत्क्षणीं। तैशिया मद्याचे मद्यपानीं। वीरश्रेणी बैसल्या॥ ७॥ ‘मैरेयक’ मद्याची थोरी। मधुरता अतिशयें भारी। लागतांचि जिव्हेवरी। भ्रांत करी सज्ञाना॥ ८॥ तें मद्यपान यादववीरीं। आदरिलें स्वेच्छाचारीं। आग्रह करूनि परस्परीं। लहानथोरीं मांडिलें॥ ९॥
महापानाभिमत्तानां वीराणां दृप्तचेतसाम्।
कृष्णमायाविमूढानां सङ्घर्ष: सुमहानभूत्॥ १३॥
पूर्वीं अतिमित्रत्व पोटांत। ते महापानें झाले मत्त। वीर मातले अतिदृप्त। नोकूनि बोलत परस्परें॥ ११०॥ कृष्णमाया हरिला बोध। अवघे झाले बुद्धिमंद। सांडूनि सुहृदसंबंध। निर्वाणयुद्ध मांडिलें॥ ११॥ नोकूनि बोलतां विरुद्ध। अतिशयें चढला क्रोध। शस्त्रें घेऊनि सन्नद्ध। सुहृदीं युद्ध मांडिलें॥ १२॥
युयुधु: क्रोधसंरब्धा वेलायामाततायिन:।
धनुर्भिरसिभिर्भल्लैर्गदाभिस्तोमरर्ष्टिभि:॥ १४॥
क्रोधें नेत्र रक्तांबर। वेगें वोढूनि हातियेर। समुद्रतीरीं महावीर। युद्ध घोरांदर ते करिती॥ १३॥ धनुष्यें वाऊनियां जाणा। बाण सोडिती सणसणां। खड्गें हाणिती खणखणां। सुहृदांच्या प्राणां घ्यावया॥ १४॥ एकीं उचलोनियां भाले। परस्परें हाणिते झाले। एकीं गदा उचलोनि बळें। वीरकलेवरें पाडिती॥ १५॥ एक तोमरें लवलाहीं। राणीं खवळले भिडती पाहीं। एक टोणप्याच्या घायीं। वीर ठायीं पाडिती॥ १६॥ यापरी चतुरंगसेना। मिसळली रणकंदना। आपुलालिया अंगवणा। गज रथ रणा आणिती॥ १७॥
पतत्पताकै रथकुञ्जरादिभि:
खरोष्ट्रगोभिर्महिषैर्नरैरपि।
मिथ: समेत्याश्वतरै: सुदुर्मदा
न्यहञ्छरैर्दद्भिरिव द्विपा वने॥ १५॥
पताकांसीं रथ कुंजर। रणीं पाडिले अपार। पाखरांसीं असिवार। मारिले खरोष्ट्र रणामाजीं॥ १८॥ म्हैसे मारूनियां रणीं। पाडिलिया वीरश्रेणी। जैसे उन्मत्त गज वनीं। दंतीं खणाणी भीडत॥ १९॥ यापरी यादववीर। रणीं मातले महाशूर। घाय मारोनि निष्ठुर। रणीं अपार पाडिले॥ १२०॥ कृष्णमाया केले भ्रांत। युद्धीं न देखतां स्वार्थ। परस्परें प्राणघात। व्यर्थ करित सुहृदांचा॥ २१॥ रणीं पाडिलें अपार। तंव खवळले कृष्णकुमर। ज्यां ज्यां माजीं प्रीति थोर। ते युद्धातुर चालिले॥ २२॥
प्रद्युम्नसाम्बौ युधिरूढमत्सरा-
वक्रूरभोजावनिरुद्धसात्यकी।
सुभद्रसङ्ग्रामजितौ सुदारुणौ
गदौ सुमित्रासुरथौ समीयतु:॥ १६॥
ज्यां ज्यां माजीं अतिप्रीती। ते ते निर्वाणयुद्ध करिती। बाप संहारक काळगती। सखे मारिती सख्यांतें॥ २३॥ प्रद्युम्न सांब अतिमित्र। त्यासीं युद्ध मांडलें घोरांदर। अक्रूर भोज दोन्ही वीर। युद्धीं सत्वर मिसळले॥ २४॥ अनिरुद्ध आणि सात्यकी। उठावले क्रोध तवकीं। बाणीं वर्षोनि अनेकीं। एकमेकीं भीडती॥ २५॥ सुभद्र संग्रामजित दोनी। खवळले रणांगणीं। वर्षोनियां तीक्ष्ण बाणीं। उन्मत्त रणीं मातले॥ २६॥ कृष्णपुत्र कृष्णबंधु। दोंहीचेंही नाम गदु। त्यांसी समत्सर क्रोधु। युद्धसंबंधु परस्परें॥ २७॥ सुमित्र आणि सुरथ। या दोंहीसीं द्वेष अद्भुत। परस्परें करावया घात। युद्धाआंत मिसळले॥ २८॥
अन्ये च ये वै निशठोल्मुकादय:
सहस्रजिच्छतजिद्भानुमुख्या:।
अन्योन्यमासाद्य मदान्धकारिता
जघ्नुर्मुकुन्देन विमोहिता भृशम्॥ १७॥
यादवकुळीं बळें अधिक। निशठादि उल्मुकादिक। शतजित्सहस्रजिद्भानुमुख्य। हेही युद्धींदेख खवळले॥ २९॥ मद्यपानें अतिगर्वित। कृष्णमाया हरिलें चित्त। महामोहें केले भ्रांत। सुहृदांघात स्वयें करिती॥ १३०॥ ब्रह्मशापाची केवढी ख्याती। बंधु बंधूतें जीव घेती। कृष्णमाया पाडिले भ्रांतीं। युद्ध स्वयाती माझारीं॥ ३१॥
दाशार्हवृष्ण्यन्धक भोजसात्वता
मध्वर्बुदा माथुरशूरसेना:।
विसर्जना: कुकुरा: कुन्तयश्च
मिथस्ततस्तेऽथ विसृज्य सौहृदम्॥ १८॥
यादवांची एक जाती। तेचि बारा नामीं नामांकिती। त्या बाराही ज्ञाती युद्धी भिडती। ऐक परीक्षिती तीं नामें॥ ३२॥ दाशार्ह सात्वक अंधक जाण। अर्बुद माथुर शूरसेन। कुंती कुकुर विसर्जन। मधु भोज वृष्ण्य बारा नामें॥ ३३॥ पूर्वील यादवांचें साजणें। ज्ञातीचें अल्पही ऐकतां उणें। जीवेंसीं सर्वस्व वेंचणें। परी वांचवणें स्वयाती॥ ३४॥ तेचि यादव पैं गा आतां। सांडोनियां सुहृदता। ज्याचे चरणीं ठेविजे माथा। त्याच्या जीवघाता पेटले॥ ३५॥
पुत्रा अयुध्यन्पितृभिर्भ्रातृभिश्च
स्वस्रीयदौहित्रपितृव्यमातुलै:।
मित्राणि मित्रै: सुहृद: सुहृद्भि-
र्ज्ञातींस्त्वहञ् ज्ञातय एव मूढा:॥ १९॥
कृष्णमाया आकळिलें चित्त। अवघे झाले परम भ्रांत। न कळे आप्त अनाप्त। रणीं उन्मत्त मातले॥ ३६॥ ज्याचे चरण वंदिजे भावार्था। श्रद्धा घेईजे चरणतीर्था। त्या निज पित्याचिया माथां। पुत्र शस्त्रघाता प्रवर्तले॥ ३७॥ बंधु शिरकल्या रणांगणीं। बंधु बंधूंतें सोडवी निर्वाणीं। तेचि बंधु बंधूंतें रणीं। निर्वाण बाणीं खोंचिती॥ ३८॥ जो लळे पुरवूनि खेळविता। जैसा बाप तैसा चुलता। त्यासी पुतण्या प्रवर्ते घाता। शस्त्रें माथां हाणोनी॥ ३९॥ कन्येचा सुत दौहित्र। ज्यासी श्राद्धी अधिकार। तो आज्यासी करी मार। घाय निष्ठुर हाणोनी॥ १४०॥ मामाभाचे परस्परीं। प्रवर्तले महामारीं। सुहृद सुहृदांच्या शिरीं। सतेज शस्त्रीं हाणिती॥ ४१॥ मित्र मित्रांच्या मित्रतां। वेंचितीअर्था जीविता। ते मित्र मित्रांच्या जीवघाता। सक्रोधता उठिले॥ ४२॥ आयुष्य सरलें नि:शेख। चढलें काळसर्पाचें विख। अवघे होऊनियां मूर्ख। ज्ञातीसी ज्ञाति देख वधिते झाले॥ ४३॥
शरेषु क्षीयमाणेषु भज्यमानेषु धन्वसु।
शस्त्रेषु क्षीयमाणेषु मुष्टिभिर्जह्रेरेरका:॥ २०॥
युद्ध मांडिलें घोरांदर। सरले भातडींचे शर। धनुष्यदंडें येरायेर। घायें निष्ठुर हाणिती॥ ४४॥ घाय हाणितां अतिबळें। धनुष्यें मोडलीं तत्काळें। क्षीण झालीं शस्त्रें सकळें। हतियेर-बळें खुंटलीं॥ ४५॥ ब्रह्मशापाची एरिका। तीरीं निघाली होती देखा। ते मुष्टीं घेऊनि क्रोध तवका। एकमेकां हाणिती॥ ४६॥
ता वज्रकल्पा ह्यभवन् परिघा मुष्टिना भृता:।
जघ्नुर्द्विषस्तै: कृष्णेन वार्यमाणास्तु तं च ते॥ २१॥
ते एरिका घेतांचि हातीं। झाली वज्रप्राय धगधगिती। अतितीक्ष्ण परिघाकृती। तेणें हाणिती परस्परें॥ ४७॥ नाना शस्त्रें लागतां पाहीं। यादव न डंडळती कंहीं। तेही एरिकेच्या घायीं। पडती ठायीं अचेतन॥ ४८॥ एरिकेच्या निजघायीं। यादवांसी उरी नाहीं। दुधड तोडूनियां पाहीं। पडती ठायीं परस्परें॥ ४९॥ रणीं पाडूनियां इतर। यादव उरले महाशूर। जे कां नेटके जुंझार। निधडे वीर निज योद्धे॥ १५०॥ यादव उरले भद्रजाती। हे आणिकासि नाटोपती। त्यां निर्दळावया निश्चितीं। निवारणार्थीं हरि धांवे॥ ५१॥ तो म्हणे ब्रह्मशापाची एरिका। ही सर्वथा हातीं धरूं नका। सांडा युद्धाचा आवांका। शिकविले ऐका तुम्ही माझें॥ ५२॥ धर्मतां निवारी श्रीकृष्ण। त्यासीही मारूं धांवले जाण। हें कृष्णमायेचें विंदान। न चुकत मरण पैं आलें॥ ५३॥ एक म्हणती श्रीकृष्णासी। आधीं झोडोनि पाडा यासी। ठकूं आला आम्हांसी। म्हणोनि एरिकेसीं धांविन्नले॥ ५४॥ एक म्हणती धरा केशीं। एक म्हणती भीड कायसी। एक म्हणे मी श्रीकृष्णासी। एका घायेंसीं लोळवीन॥ ५५॥
प्रत्यनीकं मन्यमाना बलभद्रं च मोहिता:।
हन्तुं कृतधियो राजन्नापन्ना आततायिन:॥ २२॥
पैल पैल तो बळिभद्रु। हाचि आमुचा मुख्य शत्रु। यासी चला आधी मारूं। यादवभारु लोटला॥ ५६॥ मदमोहें अतिदुर्मती। वज्रप्राय एरिका हातीं। घेऊनि बळिभद्रावरी येती। तेणें तोही निश्चितीं क्षोभला॥ ५७॥
अथ तावपि सङ्क्रुद्धावुद्यम्य कुरुनन्दन।
एरकामुष्टिपरिघौ चरन्तौ जघ्नतुर्युधि॥ २३॥
शुक म्हणे कुरुनंदना। यादव टेंकले आत्ममरणा। ते मारावया रामकृष्णा। आततायी जाणा लोटले॥ ५८॥ यादव उठले हननासी। देखोनि राम-हृषीकेशी। अतिक्रोध चढला त्यांसी। तेही युद्धासी मिसळले॥ ५९॥ एरका जे कां परिघाकृती। वज्रप्राय धगधगिती। दोघीं जणीं घेऊनि हातीं। यादवां ख्यातीं लाविली॥ १६०॥ रामकृष्णांच्या निजघातीं। यादवांची जाती व्यक्ती। अवघेचि रणा येती। कृष्ण काळशक्तीं क्षोभला॥ ६१॥ निजकुळाचें निधन। देखोनियां श्रीकृष्ण। कर्तव्यार्थ झाला पूर्ण। ऐसें संपूर्ण मानिलें॥ ६२॥
ब्रह्मशापोपसृष्टानां कृष्णमायावृतात्मनाम्।
स्पर्धाक्रोध: क्षयं निन्ये वैणवोऽग्निर्यथा वनम्॥ २४॥
ब्रह्मशापें छळिलें विधीं। कृष्णमाया ठकली बुद्धी। मद्यपान उन्माद मदीं। क्रोधें त्रिशुद्धी क्षया नेले॥ ६३॥ वेळुवाच्या वेळुजाळीं। जेवीं कांचणीं पडे इंगळी। तेणें वनाची होय होळी। तेवीं यदुकुळीं कुलक्षयो॥ ६४॥
एवं नष्टेषु सर्वेषु कुलेषु स्वेषु केशव:।
अवतारितो भुवो भार इति मेनेऽवशेषित:॥ २५॥
स्वकुळ नाशूनि श्रीधर। अवशेष धराभार। उतरला मानी चक्रधर। तेणें सुखें थोर सुखावे॥ ६५॥ जेवीं कां आलें पेरी माळी। निज जीवनें प्रतिपाळी॥ शेखीं तोचि खणे समूळीं। तेवीं यदुकुळीं श्रीकृष्ण॥ ६६॥ यादव निजबळें प्रतिपाळी। त्यातें स्वयें निजांगें निर्दळी। हें दाखवितां वनमाळी। ममतामेळीं अलिप्त॥ ६७॥ कृष्ण पाळी यादवां समस्तां। त्यांची दाविली अतिममता। शेखीं करूनि कुळाचे घाता। निरभिमानता हरि दावी॥ ६८॥ स्त्रीपुत्रेंसीं निजजीविता। सकळ कुळाच्या होतां घाता। ज्ञात्यासी नुपजे ममता। ते ‘नित्यमुक्तता’ हरि दावी॥ ६९॥ ज्ञात्यासी नाहीं अहंममता। तेचि दावावया तत्त्वतां। कुळेंसीं होतां पुत्रघाता। स्वप्नींही ज्ञाता ग्लानि नेणे॥ १७०॥ ब्राह्मणाचा शाप दारुण। अन्यथा हों नेदी श्रीकृष्ण। निजकुळ निर्दळी आपण। विप्रवचन सत्यत्वा॥ ७१॥ करूनि कुळक्षयाचें काम। सुख मानी पुरुषोत्तम। तें देखोनि म्हणे बळराम। अवतारकर्म संपलें॥ ७२॥
राम: समुद्रवेलायां योगमास्थाय पौरुषम्।
तत्त्याज लोकं मानुष्यं संयोज्यात्मानमात्मनि॥ २६॥
मग बळिभद्रें आपण। समुद्रतीरीं योगासन। दृढ घालोनियां जाण। निर्वाणध्यान मांडिलें॥ ७३॥ आकर्षूनि देहींचा प्राण। नि:शेष सांडिला देहाभिमान। मग परमपुरुषध्यान। करितांचि आपण तद्रूप झाला॥ ७४॥ जेवीं घटामाजील गगन। सहजें महदाकाश पूर्ण। तेवीं सांडितां देहाभिमान। झाला संकर्षण बळराम॥ ७५॥ होतें मनुष्यनाटॺ अवलंबिलें। तें देह नि:शेष त्यागिलें। जे कां पूर्वरूप आपुलें। तें होऊनि ठेलें बळिराम॥ ७६॥ समुद्रतीरीं योगासन। तें देह ठेविलें अचेतन। हें रामनिर्याण देखोन। स्वयें श्रीकृष्ण सरसावला॥ ७७॥
रामनिर्याणमालोक्य भगवान् देवकीसुत:।
निषसाद धरोपस्थे तूष्णीमासाद्य पिप्पलम्॥ २७॥
बळभद्र झाला देहातीत। हें देखोनि देवकीसुत। भगवान् श्रीकृष्णनाथ। स्वयें इच्छित निजधाम॥ ७८॥ तेव्हां धरातळीं धराधर। मौनें अश्वत्थातळीं स्थिर। वीरासनीं शार्ङ्गधर। श्यामसुंदर बैसला॥ ७९॥ ज्याच्या स्वरूपाचे आवडीं। शिवविरिंच्यादि झालीं वेडीं। ज्याच्या दर्शनाची गोडी। दृष्टी नोसंडी क्षणार्ध॥ १८०॥ दृष्टीनें चवी चाखिली गाढी। तंव तंव रसना चरफडी। तिणें कीर्तनरसें रसगोडी। चवी चोखडी चाखिली॥ ८१॥ प्राशनेंवीण कृष्णरस। रसना सेवी अति सुरस। तेव्हां विषयरस तो विरस। होय निरस संसार॥ ८२॥ श्रवणीं पडतां श्रीकृष्णकीर्ती। त्रिविध तापां उपशांती। ज्याची वर्णितां गुणनामकीर्ती। चारी मुक्ती कामाऱ्या॥ ८३॥ चरणकमलम करंद। तुळशीमिश्रित आमोद। सेवितां घ्राणीं परमानंद। इतर गंध ते तुच्छ॥ ८४॥ ज्याचा लागतां अंगसंग। देहबुद्धीसी होय भंग। स्वानंदविग्रही श्रीरंग। अंगप्रत्यंगसुखकारी॥ ८५॥ ज्याचें आवडीं वंदितां पाये। समाधि लाजिली मागें ठाये। तो अश्वत्थातळीं पाहें। बैसला आहे निजशोभा॥ ८६॥ तें अंतकाळींचें कृष्णध्यान। शुकासी आवडलें संपूर्ण। तोही स्वानंदें वोसंडून। श्रीकृष्णध्यान वर्णित॥ ८७॥
बिभ्रच्चतुर्भुजं रूपं भ्राजिष्णु प्रभया स्वया।
दिशो वितिमिरा: कुर्वन् विधूम इव पावक:॥ २८॥
प्रांतींचें श्रीकृष्णध्यान। पांचां श्लोकीं निरूपण। श्रोता परीक्षिती सावधान। वक्ता ज्ञानघन शुकयोगींद्र॥ ८८॥ पिंपळातळीं प्रकाशघन। ते काळींची मूर्ति जाण। निजतेजें देदीप्यमान। दिशा परिपूर्ण तेणें तेजें॥ ८९॥ ना धूम ना इंगळ। आरक्ततेवीण अग्निज्वाळ। तैशी कृष्णमूर्ती तेजाळ। प्रकाश प्रबळ अतिदीप्त॥ १९०॥ कृष्णमूर्तीचे निजप्रभा। लोपली रविचंद्राची शोभा। शून्यत्वें ठाव नाहीं नभा। सच्चिदानंदगाभा साकार॥ ९१॥ चैतन्यतेजें तनु मुसावली शांतिरसाची वोतिली। चतुर्भुजत्वें रूपा आली। तेणें दिशांची गेली काळिमा॥ ९२॥
श्रीवत्साङ्कं घनश्यामं तप्तहाटकवर्चसम्।
कौशेयाम्बरयुग्मेन परिवीतं सुमङ्गलम्॥ २९॥
सुन्दरस्मितवक्त्राब्जं नीलकुन्तलमण्डितम्।
पुण्डरीकाभिरामाक्षं स्फुरन्मकरकुण्डलम्॥ ३०॥
कृष्णमूर्ति स्वच्छ स्वयंभ। अंगीं प्रत्यंगीं बिंबलें नभ। तेणें घनश्यामता-शोभ। अतिसप्रभ साजिरी॥ ९३॥ आधींच नेटका श्रीकृष्ण। वरी घनश्यामता बाणली पूर्ण। तेणें मुसावलें बरवेंपण। लागलें ध्यान नरनारी॥ ९४॥ नरनारी बापुडॺा किती। संन्यासी भुलोनि ठाती। विरक्त वेधले परमार्थी। देखोनि मूर्ती कृष्णाची॥ ९५॥ देखतां श्रीकृष्णदर्शन। शिवासी लागलें नित्यध्यान। पार्वत्याही निजमन। कृष्णार्पण स्वयें केलें॥ ९६॥ ऐसें अंगींचे बरवेंपण। त्याहीवरी हास्यवदन। साजिरें राजीवलोचन। आकर्ण पूर्ण आरक्त॥ ९७॥ मस्तकींचे नीलालक। सुगंधसुमनीं गुंफिले चोख। कृष्णीं कृष्णरूप मधुक। कृष्णकेशीं देख विगुंतले॥ ९८॥ स्फुरत्कुंडलें मकराकार। ऐसें वर्णिती कविवर। परी तीं आकारीं निर्विकार। श्रवणें विकार मावळती॥ ९९॥ फावलिया कृष्णश्रवण। आकारविकारां बोळवण। ते श्रीकृष्णश्रवणीं पूर्ण। देदीप्यमान कुंडलें॥ २००॥ तप्त सुवर्णासमान। उभय पीतांबर जाण। एक कासे विराजमान। दुजा प्रावरण शोभत॥ १॥ ब्रह्मण्यदेवो श्रीकृष्ण। लक्ष्मी डावलूनि पूर्ण। दक्षिणांगीं विप्रचरण। श्रीवत्सलांच्छन गोविंद॥ २॥
कटिसूत्रब्रह्मसूत्रकिरीटकटकाङ्गदै:।
हारनूपुरमुद्राभि: कौस्तुभेन विराजितम्॥ ३१॥
वनमालापरीताङ्गं मूर्तिमद्भिर्निजायुधै:।
कृत्वोरौ दक्षिणे पादमासीनं पङ्कजारुणम्॥ ३२॥
कंठीं कौस्तुभ सोज्वळा। कटीं मिरवे रत्नमेखळा। ब्रह्मसूत्र रुळे गळा। आपाद वनमाळा शोभत॥ ३॥ माथां मुकुटाचें खेवणें। लखलखीत अनर्घ्य रत्नें। कीर्तिमुखें बाहुभूषणें। वीरकंकणें विचित्रें॥ ४॥ यंत्रउपास्ती उपासका। तैशा कराग्रीं करमुद्रिका। त्रिकोण षट्कोण कर्णिका। जडितमाणिका शास्त्रोक्त॥ ५॥ वैजयंतीचा सोहळा। पदक एकावळी गळां। नाना रत्नें हार मुक्ताफळा। तुळशीमाळा सुगंधा॥ ६॥ दोनी मोतीलग पदर। रत्नें जडित पीतांबर। किंकिणी क्षुद्रघंटिका विचित्र। मनोहर शोभती॥ ७॥ वांकी अंदुवांचा गजर। चरणीं नूपुरांचा झणत्कार। रुळे बिरुदांचा तोडर। मनोहर हरिचरणीं॥ ८॥ रातोत्पलां कठिणपण। त्यांहूनि सुकुमार चरण। घवघवीत श्रीकृष्ण। शोभा संपूर्ण शोभत॥ ९॥ शंख चक्र गदा कमळ। मूर्तिमंत आयुधें सकळ। आश्रऊनि पिंपळ। बैसला केवळ वीरासनीं॥ २१०॥ तया वीरासनाचें लक्षण। तळीं सूनि दक्षिण चरण। त्याचि मांडीवरी जाण। वामचरण आलोहित॥ ११॥ लाजवूनि संध्यारागासी। उणे आणोनि बाळसूर्यासी। चरणशोभा हृषीकेशीं। अतिदीप्तीसीं आरक्त॥ १२॥
मुसलावशेषाय:खण्डकृतेषुर्लुब्धको जरा।
मृगास्याकारं तच्चरणं विव्याध मृगशङ्कया॥ ३३॥
करूनि निजकुळाची होळी। सरस्वतीतीरीं वनमाळी। टेंकोनि बैसला पिंपळातळीं। चरण नवाळी आरक्त॥ १३॥ आरक्त श्रीकृष्णचरण। भावूनि मृगमुखासमान। जराव्याधें विंधिला बाण। अतिसत्राण भेदिला॥ १४॥ ब्रह्मशापाचें मुसल घन। यादवीं पिष्ट करितां जाण। उरला अवशेष लोहकण। तो समुद्रीं जाण टाकिला॥ १५॥ तो पडतांचि समुद्रजळीं। त्यातें मीन सगळेंचि गिळी। त्या मीनातें जराव्याध गळीं। जाळॺामेळीं आकळित॥ १६॥ व्याध करी मीनविदारण। तंव निघाला तो लोहकण। त्याचा जराव्याधें केला बाण। तेणें कृष्ण चरण विंधिला॥ १७॥ मत्स्योदरींचा लोहघन। त्याचा केलिया दृढ बाण। थोर पारधी साधे संपूर्ण। व्याधें जाणोनि बाण तो केला॥ १८॥ भेदावया कृष्णचरण। मुळीं ब्रह्मशापचि कारण। यालागीं जराव्याधाचा बाण। कृष्णचरणीं पूर्ण खडतरला॥ १९॥ व्याधें अवचितें विंधिला। परी कृष्ण नाहीं दचकला। बाणसत्राणें खडतरला। तेणें सुखी झाला श्रीकृष्ण॥ २२०॥
चतुर्भुजं तं पुरुषं दृष्ट्वा स कृतकिल्बिष:।
भीत: पपात शिरसा पादयोरसुरद्विष:॥ ३४॥
बाण श्रीकृष्णचरणीं पूर्ण भेदला। जराव्याधाचा हात निवाला। म्हणे म्यां मोठा मृग विंधिला। म्हणोनि धांवला धरावया॥ २१॥ देखोनि चतुर्भुज पुरुषासी। भय सुटलें जराव्याधासी। म्हणे मज घडल्या महापापराशी। परमपुरुषासी विंधिलें॥ २२॥ म्हणे कटकटा रे अदृष्टा। आचरविलें कर्मा दुष्टा। ऐशिया मज महापापिष्ठा। दु:खदुर्घटा कोण वारी॥ २३॥ जगाचा परमात्मा श्रीहरी। तो म्यां विंधिला बाणेंकरीं। माझ्या पापासमान थोरी। नाहीं संसारीं अनासी॥ २४॥ भयें सुटला थोर कंप। मज घडलें महापाप। जगाचें जें ध्येय स्वरूप। त्यासी संताप म्यां दिधला॥ २५॥ ज्याचे अमर वंदिती चरण। ज्यासी संत येती लोटांगण। त्या श्रीकृष्णासी विंधिला बाण। पाप संपूर्ण मज घडलें॥ २६॥ अवचटें आत्महत्या घडे। तें पाप कदा न झडे। जगाचा आत्मा कृष्ण वाडेंकोडें। ते आत्महत्या पडे मस्तकीं माझे॥ २७॥ जगाचें आत्महनन। कर्ता मी एक पापी पूर्ण। त्या पापाचें पुरश्चरण। सर्वथा जाण दिसेना॥ २८॥ प्रमादें ब्रह्महत्या घडे। तेणें पापें तो समूळ बुडे। तें पूर्णब्रह्म म्यां मूढें। बाणें सदृढें विंधिलें॥ २९॥ पापकर्मा मी व्याधरूप। तेणें म्यां जोडलें पाप अमूप। कृष्ण परमात्मा चित्स्वरूप। त्यासीही संताप दिधला म्यां॥ २३०॥ येणें अनुतापें तप्त पूर्ण। धांवोनि घाली लोटांगण। श्रीकृष्णाचे श्रीचरण। मस्तकीं जाण दृढ धरिले॥ ३१॥ मर्दी दैत्यांचा अभिमान। मधुद्वेष्टा जो मधुसूदन। त्याचे दृढ धरूनि चरण। करी रुदन अट्टहासें॥ ३२॥ चरणीं घातली परम मिठी। उठवितां कदा नुठी। मज क्षमा करीं कृपादृष्टीं। कृपाळू सृष्टीं तूंचि एक॥ ३३॥
अजानता कृतमिदं पापेन मधुसूदन।
क्षन्तुमर्हसि पापस्य उत्तमश्लोक मेऽनघ॥ ३५॥
अतिभीत जराव्याध। म्हणे मी पापात्मा अतिअशुद्ध। नेणतां घडला हा अपराध। लिंगभेद मज घडला॥ ३४॥ जो ईश्वरप्रतिमा उच्छेदी। तो महापापी लिंगभेदी। त्या तुज ईश्वरासी म्यां दुर्बुद्धीं। अदृष्टविधीं विंधिलें॥ ३५॥ ऐसा मी पापी पापकर्मा। महापापी पापात्मा। माझा अपराध करावा क्षमा। पुरुषोत्तमा कृपाळुवा॥ ३६॥ तूं कृपाळु त्रिजगतीं। गर्भीं राखिला परीक्षिती। गजेंद्राचें अतिआकांतीं। उडी कृपामृर्ती घातली॥ ३७॥ पांडव जळतां जोहरीं। तुवां काढिले विवरद्वारीं। शेखीं अर्जुनाचा कैवारी। घेशी जुंझारी भीष्मासीं॥ ३८॥ द्रौपदीचे अतिसांकडीं। धांवलासी लवडसवडीं। तिळभरी न दिसतां उघडी। नेसतीं लुगडीं तूं होसी॥ ३९॥ ऐसी कृपाळुत्वाची ख्याती। श्रुतिपुराणें वाखाणिती। तुझी उत्तम श्लोककीर्ती। ऋषि वर्णिती महासिद्ध॥ २४०॥ नेणतां आचरलों दुष्कर्मा। तें मज करावया क्षमा। तूं कृपाळु परमात्मा। पुरुषोत्तमा क्षमाशीळ॥ ४१॥ अजामिळ दुराचारी। पुत्रलोभें नाम उच्चारी। त्याचे पापाची झाली बोहरी। ऐशी निष्पाप थोरी नामाची॥ ४२॥ नामें निष्पाप दुर्मती। नामें निष्पाप पितृघाती। नामें दुराचारी तरती। हे निष्पाप ख्याती नामाची॥ ४३॥
यस्यानुस्मरणं नॄणामज्ञानध्वान्तनाशनम्।
वदन्ति तस्य ते विष्णो मयासाधु कृतं प्रभो॥ ३६॥
ज्या विष्णूचें नामस्मरण। कोटिजन्मांचें घन अज्ञान। नराचें निर्दाळी पूर्ण। सकळ- कल्याणदायक॥ ४४॥ ऐसें ज्याचे नामस्मरण। त्याचे स्वरूपासी म्यां जाण। निजबळें विंधिला निर्वाण बाण। अपराध पूर्ण हा माझा॥ ४५॥ ज्याचें अगाध महिमान। सदा वर्णिती साधु सज्जन। जो स्वरूपें सच्चिद्धन। स्वामी श्रीकृष्ण जगाचा॥ ४६॥ जगाचें जीवन श्रीकृष्ण। त्या कृष्णासही मी आपण। विंधिला निर्वाणींचा बाण। हा अपराध पूर्ण पैं माझा॥ ४७॥ त्रैलोक्यराजा कृष्ण समर्थ। तो म्यां केला राजघात। जगाचा आत्मा श्रीकृष्णनाथ। तो आत्मघात म्यां केला॥ ४८॥ श्रीकृष्ण जगाचा जनिता। त्या म्यां केलें पितृघाता। जगप्रतिपाळणीं श्रीकृष्णमाता। त्या मातृघाता म्यां केलें॥ ४९॥ श्रीकृष्ण ब्राह्मण ब्रह्मबोध। तो म्यां केला ब्रह्मवध। याहीहोनि अगाध। जगीं अपराध असेना॥ २५०॥ राजघात आत्मघात। मातृपितृ-ब्रह्मघात। मजचि घडला समस्त। जे म्यां श्रीकृष्णनाथ विंधिला॥ ५१॥
तन्माऽऽशु जहि वैकुण्ठ पाप्मानं मृगलुब्धकम्।
यथा पुनरहं त्वेवं न कुर्यां सदतिक्रमम्॥ ३७॥
ऐशिया मज पापरूपासी। कृपा करावी हृषीकेशी। निष्कृती होय पापासी। त्या उपायासी करीं वेगीं॥ ५२॥ कोरडिये कृपेचा संबंध। तेणें न फिटे दोषबाध। माझा जेव्हां तूं करिसी वध। तेव्हां मी शुद्ध होईन॥ ५३॥ मी लुब्धक पापबुद्धी। मृगलोभी पशुपारधी। त्या मज तूं निजहस्तें वधीं। तैं मी त्रिशुद्धी उद्धरलों॥ ५४॥ जेणें देहें केलें पापकर्मा। तो देह निवटीं पुरुषोत्तमा। पुढती ऐशिया असत्कर्मा। न करीं अधर्मा तें करीं॥ ५५॥ बाण विंधिला तुझिया पायां। हें अगाध पाप केलें काया। तीसी शीघ्र वधावें यदुराया। तैं महापापा या होय निस्तारु॥ ५६॥ जेणें देहें केलें पापाचरण। त्याचें प्रायश्चित्त हेंचि पूर्ण। करीं निजहस्तें देहदंडण। म्हणोनि चरण दृढ धरिले॥ ५७॥ देहें केलें पापाचरण। देहलोभी तो पापी पूर्ण। स्थूल लिंग आणि कारण। यांचें करीं छेदन निजतेजचक्रें॥ ५८॥
यस्यात्मयोगरचितं न विदुर्विरिञ्चो
रुद्रादयोऽस्य तनया: पतयो गिरां ये।
त्वन्मायया पिहितदृष्टय एतदञ्ज:
किं तस्य ते वयमसद्गतयो गृणीम:॥ ३८॥
देहसंभवाचें मूळ जाण। स्थूल सूक्ष्म आणि कारण। यासी नातळतां तूं श्रीकृष्ण। चतुर्भुजसंपूर्ण देह धरिसी॥ ५९॥ स्थूल-सूक्ष्म-कारणता। ये तिन्ही त्रिगुणेसीं नातळतां। तूं योगमायेचिया सत्ता। नाना अवतारता देह धरिसी॥ २६०॥ नवल तुझा लीलाविग्रहो। मत्स्य कूर्म श्वेतवराहो। होतां न धरिसी संदेहो। जन्मभयो तुज नाहीं॥ ६१॥ वोडवल्या जन्म एक। ब्रह्मादिक होती रंक। तो तूं अवतार अनेक। धरिसी नि:शंक जितात्मतां॥ ६२॥ अदृष्टाचिये निजगतीं। देहासी नाना भोग होती। तूं अदृष्टेंवीण श्रीपती। नाना भोगसंपत्ती भोगिसी॥ ६३॥ आयुष्य तंववरी देहधारण। वेदें नेमस्त केलें जाण। नवल तुझें लीलाविंदान। आयुष्येंवीण देह धरिसी॥ ६४॥ काळसत्ता दुर्धर पूर्ण। ब्रह्मादिकां अलोट मरण। तुज काळ वेळ नसतां जाण। स्वलीला मरण दाविसी॥ ६५॥ तुझे योगमायेची योगगती। लीलाविग्रहें देहस्थिती। अतर्क्य सर्वांसी सर्वार्थीं। तेही उपपत्ती निर्धारीं॥ ६६॥ ब्रह्मा जगाचा आदिकर्ता। त्यासही न कळे तुझी सत्ता। तूं नाना अवतारीं देह धरिता। त्याचा कर्ता नव्हे ब्रह्मा॥ ६७॥ तूं स्वलीला देह कैसा धरिसी। अवतार चरित्रें कैसीं करिसी। कैसेनि तो देहो सांडिसी। हें ब्रह्मादिकांसी कळेना॥ ६८॥ ज्यासी तूं मानिसी अतिसन्मानीं। सदाशिव जो कां त्रिकाळज्ञानी। त्यासीही अतर्क्य तुझी करणी। शार्ङ्गपाणी श्रीकृष्णा॥ ६९॥ सदाशिवाचे निजवचनीं। तूं दुजेन झालासी मोहिनी। ते शिवासी न कळे तुझी करणी। तत्क्षणीं तो भुलला॥ २७०॥ जाणोनि योग ज्ञान दोनी। सनकादिक ब्रह्मज्ञानी। जिंहीं मायापडळ छेदूनी। स्वानंदभुवनीं सुखरूप॥ ७१॥ त्यांसीही तुझी स्वलीलाशक्ती। सर्वथा न कळेचि श्रीपती। ते जयविजयां शाप देती। सकोपस्थितीं वैकुंठी॥ ७२॥ पारंगत वेदशास्त्रार्थीं। बृहस्पत्यादि वाचस्पती। त्यांसीही लीलाविग्रहस्थिती। न कळे निश्चितीं श्रीकृष्णा॥ ७३॥ जे सज्ञान ज्ञाते परमार्थी। त्यांसीही अतर्क्य अवतारशक्ती। मा इंद्रादि देवांसी ते स्थिती। कैशा रीतीं कळेल॥ ७४॥ इंद्रादि देवां दिविभोगनिष्ठीं। माया आच्छादी तयांच्या दृष्टी। त्यांसी तुझे लीलेची गोष्टी। न कळे जगजेठी निश्चित॥ ७५॥ तेथ मायावी देहवंता। उद्बोध नव्हे पैं सर्वथा। तुझी लीला श्रीकृष्णनाथा। अतर्क्य सर्वथा सर्वांसी॥ ७६॥ सुखें होईल ब्रह्मज्ञान। परी तुझें स्वलीलादेहधारण। याचें नेणती पर्यवसान। अतिसज्ञान साकल्यें॥ ७७॥ तेथ मी तंव अधम जन। असद्गतीचें भाजन। त्या मज तुझें लीलावर्णन। सर्वथा जाण अतर्क्य॥ ७८॥ आतां असो हें निरूपण। बहु बोलाचें काय कारण। माझ्या पापाचें पुरश्चरण। देहदंडण करीं कृष्णा॥ ७९॥ तुझेनि हस्तें देहदंडण। तेणें सकळ पापांचें निर्दळण। मज उद्धरावया जाण। हे कृपा पूर्ण करावी॥ २८०॥ म्हणोनि घातलें लोटांगण। धांवोनि धरिले दोनी चरण। ऐकोनि व्याधाचें स्तवन। कृपा श्रीकृष्ण तुष्टला॥ ८१॥
श्रीभगवानुवाच
मा भैर्जरे त्वमुत्तिष्ठ काम एष कृतो हि मे।
याहि त्वं मदनुज्ञात: स्वर्गं सुकृतिनां पदम्॥ ३९॥
जो वेदार्थाचा मथित बोध। जो जगदादि-आनंदकंद। जो स्वरूपें स्वानंद शुद्ध। तो व्याधेंसीं गोविंद सकृप बोले॥ ८२॥ तूं जीवघातक पारधी। भय मानिसी ममापराधीं। तुज अभय गा त्रिशुद्धीं। माझी कार्यसिद्धी त्वां केली॥ ८३॥ कुमारीं सांब केला स्त्रीरूप। कपटें ब्राह्मणां आला कोप। कुळासी झाला ब्रह्मशाप। हा त्रिविध संकल्प माझाचि॥ ८४॥ शापावशेष लोह जाण। त्याचा तुवां करोनि बाण। मृगलोभें विंधिला चरण। यासही कारण संकल्प माझा॥ ८५॥ मी बुद्धीची अनादि बुद्धी। मी क्रियेची क्रिया त्रिशुद्धी। तेथें अहंकर्तृत्वाचे विधी। तूं वृथा अपराधी म्हणविसी॥ ८६॥ मिथ्या धरूनि देहाभिमान। म्हणसी घडलें मज पाप पूर्ण। त्याही पापासी पुरश्चरण। माझें दर्शन मुख्यत्वें॥ ८७॥ माझिया नामा एकासाठीं। जळती महापातकांच्या कोटी। त्या मज तुवां देखिलेंदृष्टीं। परम भाग्यें भेटी घडली तुज॥ ८८॥ माझी घ्यावया क्षणार्ध भेटी। एक रिघाले गिरिकपाटीं। एक योगयागसंकटीं। झाले महाहटी नेमस्त॥ ८९॥ एवं नाना नेम आटाटी। शिणतांही कल्पकोटी। स्वप्नींही न लभे माझी भेटी। त्या मज त्वां दृष्टीं देखिलें॥ २९०॥ माझें होतांचि दर्शन। सकळपातकां निर्दळण। तूं तंव पुण्यात्मा परिपूर्ण। पापाभिमान धरूं नको॥ ९१॥ पापाभिमानें अधोगती। पुण्याभिमानें स्वर्गा जाती। निरभिमानें माझी प्राप्ती। सत्य वचनोक्ती पैं माझी॥ ९२॥ तूं ऐसें मानिसी आपण। परब्रह्म परमात्मा श्रीकृष्ण। त्यासी विंधिला निर्वाणबाण। हें पाप दारुण अनिवार॥ ९३॥ लोह परिसा आलिंगन। तेणें लोह होय सुवर्ण। त्यासी फोडूं आल्या लोहघण। आघातें सुवर्ण तो होय॥ ९४॥ तेवीं भक्तीं घेतल्या माझी भेटी। पातकें जातीं उठाउठी। का द्वेषे देखिल्या मज दृष्टीं। पातकां तुटी तत्काळ॥ ९५॥ हो कां इतरांच्या अपराधतां। प्राणी पावे अध:पाता। तोचि अपराध माझा करितां। नित्यमुक्तता अपराध्यां॥ ९६॥ ममापराधें नरक पावे। तैं माझें सामर्थ्य बुडालें आघवें। माझेनि अपराधें सुख पावे। मुक्ति वैभवें भयनिर्मुक्त॥ ९७॥ विष म्हणोनि अमृतपान। केल्या अमरत्व न चुके जाण। तेवीं द्वेषेंही माझें दर्शन। करी पावन प्राण्यासी॥ ९८॥ जाणोनि अग्नि लाविला घरीं। तो जाळूनि सर्वही भस्म करी। मा नेणतांही ठेविला वळचणी वरी। तोही करी तैसेंचि॥ ९९॥ तेवीं भावें अथवा द्वेषें पूर्ण। ज्यासी घडे माझें दर्शन। तो होय परम पावन। हें सत्य जाण जराव्याधा॥ ३००॥ मज ठाकावया निजधाम। त्वां सिद्ध केलें माझें काम। तेणें तुष्टलों मी आत्माराम। तूं पावन परम तिंहीं लोकीं॥ १॥ ज्या नांव म्हणसी ‘पाप’ पूर्ण। जेणें देहें मज विंधिला बाण। तेणेंचि देहें तूं आपण। होसी स्वर्गभूषण सुरवंद्य॥ २॥ याग करूनि याज्ञिक। पावती सुख पतनात्मक। तैसें तुज न घडे देख। तूं अक्षय सुख पावसी॥ ३॥ माझिया दर्शनाचें पुण्य। दिविभोगें नव्हे क्षीण। यालागीं अक्षय सुख संपूर्ण। तूं सर्वथा जाण पावसी॥ ४॥ तूं विकल्प सांडोनियां पोटीं। जराव्याधा सवेग उठीं। मिथ्या नव्हती माझ्या गोष्टी। तूं अक्षय्य तुष्टी पावसी॥ ५॥ तूं ऐसें जीवीं कल्पिसी। आपण निघालां निजधामासी। मागें अक्षय सुखासी। कोणापाशीं मागावें॥ ६॥ जैसें बोलती इतर लोक। ममाज्ञा तैशी नव्हे देख। ठाक ठोक आतांचि रोख। अक्षय सुख पावसी॥ ७॥ माझे आज्ञेचें लाहोनि बळ। ध्रुव अद्यापि झाला अढळ। माझी आज्ञा वंदी कळिकाळ। कोणेपरी विकळ करूं न शके॥ ८॥ ऐसें श्रीमुखें आपण। जंव बोलों नपुरे श्रीकृष्ण। तंव घवघवीत विमान। व्याधासी जाण उतरलें॥ ९॥
इत्यादिष्टो भगवता कृष्णेनेच्छाशरीरिणा।
त्रि: परिक्रम्य तं नत्वा विमानेन दिवं ययौ॥ ४०॥
जो सदा पूजिजे सुरासुरीं। जो परमात्मा चराचरीं। जो लीलाविग्रहदेहधारी। जो योगीश्वरीं वंदिजे॥ ३१०॥ ऐसा अतिवरिष्ठ श्रीकृष्ण। तेणें जराव्याध आज्ञापून। कृष्णइच्छामात्रें विमान। देदिप्ययान जें आलें॥ ११॥ व्याधें देखोनि विमाना। हर्षें निर्भर झाला मना। तीन प्रदक्षिणा करूनि कृष्णा। नमूनि विमाना आरूढे॥ १२॥ व्याध आरूढोनि विमाना। क्रमूनि इंद्रचंद्रग्रहगणा। अक्षय सुख स्वर्गभुवना। कृष्णकृपें जाणा तो पावला॥ १३॥ जेणें अपकार केला पूर्ण। त्यासी उपकार करावा आपण। हें निज शांतिज्ञानलक्षण। स्वांगें श्रीकृष्ण स्वयें दावी॥ १४॥ ब्रह्मज्ञानाचे बोल बोलती। तैसें नाहीं कृष्णनाथी। अंगीं दावूनियां स्थिती। व्याध निश्चितीं उद्धरिला॥ १५॥ सकळ कुळाचें निर्दळण। झाल्याही मोह न धरी श्रीकृष्ण। जेणें निजांगें विंधिला बाण। तो व्याधही जाण सुखी केला॥ १६॥ समुद्रतीरीं घेऊनि रथ। दारुक उभा होता तेथ। तेणें न देखतां श्रीकृष्णनाथ। गवेषणार्थ निघाला॥ १७॥
दारुक: कृष्णपदवीमन्विच्छन्नधिगम्यताम्।
वायुं तुलसिकामोदमाघ्रायाभिमुखं ययौ॥ ४१॥
कृष्ण न देखतां दारुक। कासावीस झाला देख। शोधीत श्रीकृष्णपदांक। पृथ्वी सम्यक् अवलोकी॥ १८॥ तंव कृष्णकंठींच्या तुळसीमाळा। त्यांचा आमोद दारुका आला। तेणें गंधाभिमुखें निघाला। तंव देखता झाला महातेज॥ १९॥
तं तत्र तिग्मद्युभिरायुधैर्वृतं
ह्यश्वत्थमूले कृतकेतनं पतिम्।
स्नेहप्लुतात्मा निपपात पादयो
रथादवप्लुत्य सबाष्पलोचन:॥ ४२॥
तंव धगधगीत तेजागळा। दिव्य आयुधांचा मेळा। त्यांमाजीं घनसांवळा। श्रीकृष्ण डोळां देखिला॥ ३२०॥ अश्वत्थातळीं धरूनि स्थान। घालूनियां वीरासन। निजतेजें विराजमान। दारुकें श्रीकृष्ण देखिला स्वयें॥ २१॥ कृष्ण देखतां लवड सवडीं। रथाखालीं घालूनि उडी। पोटींच्या सप्रेम आवडीं। धरिले तांतडीं हरिचरण॥ २२॥ नेत्री अश्रूचिया धारा। अंग कांपे थरथरा। तुज वेगळें शार्ङ्गधरा। अंधतम नेत्रा दृढ दाटे॥ २३॥
अपश्यतस्त्वच्चरणाम्बुजं प्रभो
दृष्टि: प्रनष्टा तमसि प्रविष्टा।
दिशो न जाने न लभे च शान्तिं
यथा निशायामुडुपे प्रनष्टे॥ ४३॥
ऐके स्वामी श्रीकृष्णा। न देखतां तुझिया श्रीचरणां। जगदांध्य पडे नयनां। दिशांची गणना गणी कोण॥ २४॥ ज्ञानेंसीं मावळला विवेक। अणुमात्र न लभे सुख। तुज न देखतां मी देख। जड मूढ मूर्ख होऊनि ठेलों॥ २५॥ जेवीं नष्टचंद्राचिये रात्रीं। निबिड अंवसेचिये आंधारीं। तेवीं तुजवीण श्रीहरी। दृढ दाटे संसारीं अंधतम॥ २६॥ तुझे देखतांचि श्रीचरण। अंधतमा निर्दळण। जेवीं प्रकटतां रविकिरण। अंधारेंसीं जाण निशा नासे॥ २७॥
इति ब्रुवति सूते वै रथो गरुडलाञ्छन:।
खमुत्पपात राजेन्द्र साश्वध्वज उदीक्षत:॥ ४४॥
ऐसें विनवी जंव दारुक। तंव परमाश्चर्य कांहींएक। देखतां झाला अलोलिक। पाखेंवीणदेख उडाला रथु॥ २८॥ चहूं वारुवांसंयुक्त। गरुडध्वजेंसीं श्रीकृष्णरथ। ऊर्ध्वगतीं गगनाआंत। दारुका देखत उडाला॥ २९॥ शुक म्हणे परीक्षिती। निजधामा जातां श्रीपती। आपुली ऐश्वर्य संपत्ती। स्वेच्छ ऊर्ध्वगती स्वयें नेत॥ ३३०॥ इहलोकीं ठेवूनि कीर्ती। निजवैभव विलास संपत्ती। आवरूनियां निजशक्ती। स्वयें ऊर्ध्वगती स्वसत्ता नेत॥ ३१॥
तमन्वगच्छन् दिव्यानि विष्णुप्रहरणानि च।
तेनातिविस्मितात्मानं सूतमाह जनार्दन:॥ ४५॥
रथ जातां ऊर्ध्वमंडळ। शंख चक्र गदा कमळ। तदनुलक्षित तत्काळ। दिव्यायुधें सकळ निघालीं॥ ३२॥ ऊर्ध्वमंडळीं उडाला रथ। दिव्यायुधेंही समस्त। तें देखोनि अतिविस्मित। ठेला तटस्थ दारुक॥ ३३॥ धुरे बैसोनियां नित्य। मी वागवीं श्रीकृष्णरथ। तो रथ ऊर्ध्वगतीं कृष्ण नेत। मज कां एथ सांडिलें॥ ३४॥ मज सांडूनियां गोविंदें। नेलीं आपुलीं दिव्यायुधें। मी अभाग्य भाग्यमदें। त्यजिलों मुकुंदें निश्चित॥ ३५॥ म्यां उडी घातली रथाखालती। हेचि माझी मंदमती। येरवीं मीही जातों ऊर्ध्वगती। कां श्रीपती रुसला॥ ३६॥ जेणें चरणीं विंधिला बाण। तो व्याधही उद्धरिला जाण। मी भाग्यें अभागी पूर्ण। यालागीं श्रीकृष्ण मज त्यागी॥ ३७॥ नित्य कृष्ण दृष्टीं पुढें। धुरे बैसोनि वागवीं घोडे। तो मी कृष्णावेगळा पडें। भाग्य कुडें पैं माझें॥ ३८॥ मी श्रीकृष्णाचा सारथी। ऐशी त्रिलोकीं झाली ख्याती। तो मी वेगळा पडें अंतीं। कां श्रीपती रुसला॥ ३९॥ यावज्जन्म भोगिलें कृष्णसुख। त्या मज वोडवलें वियोगदु:ख। कृष्णा कां झालासी विमुख। मी दीन रंक पैं तुझें॥ ३४०॥ माझा बोल अणुभरी। नाहीं अव्हेरिला हरी। त्या मज तूं श्रीहरी। अंतीं दुर्धरीं दुराविशी कां॥ ४१॥ अपराधिया तारिलें व्याधासी। अश्व-ध्वजेंसीं रथ नेसी। तो तूं मज उद्धरावयासी। कां उबगलासी गोविंदा॥ ४२॥ ऐसा अवस्थाभूत पूर्ण। पाहतां श्रीकृष्णाचें वदन। दारुकासी आलें रुदन। आसुवीं नयन लोटले॥ ४३॥ दीर्घस्वरें देऊनि हांक। दारुक रडे अधोमुख। अंतीं श्रीकृष्ण झाला विमुख। हें अतिदु:ख मजलागीं॥ ४४॥ दु:खें चरफडीत मोठा। करें पिटीत ललाटा। मर मर विधातया नष्टा। वोखटें अदृष्टा काय लिहिलें॥ ४५॥ मग म्हणे श्रीकृष्णनाथा। तुजपुढें बापुडें विधाता। तुजवेगळा मी राहतां। अतिदीनता पावेन॥ ४६॥ तुझेनि बळें श्रीकृष्णा। म्यां कळिकाळा घातला आंकणा। तो मी काळाचा वोळंगणा। कां करिसी पोसणा जगाचा॥ ४७॥ ऐसें ऐकोनियां वचन। ‘ना भीं ना भीं’ म्हणे जनार्दन। मग आश्वासून पूर्ण। गुह्य आलोचन सांगत॥ ४८॥ आजिच्या काळाचे काळगतीं। तूं एक उरलासी निकटवर्ती। तुज म्यां राखिलें निजकार्यार्थीं। वेगीं द्वारावतीं तूं जाईं॥ ४९॥
गच्छ द्वारवतीं सूत ज्ञातीनां निधनं मिथ:।
सङ्कर्षणस्य निर्याणं बन्धुभ्यो ब्रूहि मद्दशाम्॥ ४६॥
द्वारकायां च न स्थेयं भवद्भिश्च स्वबन्धुभि:।
मया त्यक्तां यदुपुरीं समुद्र: प्लावयिष्यति॥ ४७॥
स्वं स्वं परिग्रहं सर्वे आदाय पितरौ च न:।
अर्जुनेनाविता: सर्व इन्द्रप्रस्थं गमिष्यथ॥ ४८॥
तूं जाऊनि द्वारकेआंत। यादवांचा निधनवृत्तांत। परस्परें कलहयुक्त। निमाले समस्त हें सांग॥ ३५०॥ बळिभद्रें निजात्मस्थितीं। देहो त्यजिला योगगतीं। माझीही दशा समस्तांप्रती। यथानिगुती सांगावी॥ ५१॥ तुवां जाऊनियां त्यांपाशीं। शीघ्र सांगावें समस्तांशी। कोणीं न रहावें द्वारकेसी। निघावें वेगेंसीं ममाज्ञा॥ ५२॥ द्वारका त्यागावयाचें कारण। तुज मी सांगेन आपण। दारुका तूं अतिसज्ञान। विश्वास पूर्ण मज तुझा॥ ५३॥ यालागीं तुज राहवूनि एथ। अंतकाळींचें गुज सांगत। तुवां जाऊनि द्वारकेंत। बाहेर समस्त काढावे॥ ५४॥ बाहेर काढावयाचें कारण। म्यां द्वारका त्यागिल्या जाण। समुद्र येऊनि आपण। नगर संपूर्ण बुडवील॥ ५५॥ ठाव मागूनि समुद्रां पाशीं। म्यां वसविलें द्वारकेसी। मज गेलिया निजधामासी तो अश्वयेंसीं बुडवील॥ ५६॥ यालागीं सत्वर गमन। शीघ्र करावें आपण। माझीं माता पिता समस्त जन। द्वारकेहून काढावीं॥ ५७॥ जंव समुद्र बुडविना तो ठावो। तंव आपुलाला समुदावो। घेऊनि सकळ परिग्रहो। शीघ्रतर पहा हो निघावें॥ ५८॥ झालिया राज्यलोट। चोराकुळित होईल वाट। कोणीं नव जावें एकट। अवघीं एकवट करावीं॥ ५९॥ अर्जुनाचेनि सांगातें। एकत्र मिळूनि समस्तें। शीघ्र जावें इंद्रप्रस्थातें। तो मार्गीं त्यांतें रक्षील॥ ३६०॥ ऐसें ऐकतां श्रीकृष्णवचन। दारुकासी आलें रुदन। न वचे सांडूं पाहे प्राण। जळेंवीण मीन जैसा॥ ६१॥ निजकुळासी करूनि घात। गेला गेला रे श्रीकृष्णनाथ। मी काळमुखा द्वारकेआंत। जावों हा वृत्तांत सांगावया॥ ६२॥ गिळूनि श्रीकृष्णनिजसुखा। म्हणती हा आला काळमुखा। सकळ जगाचिया दु:खा। सूचक देखा मी होईन॥ ६३॥ ऐकतां माझिया वचनासी। प्राणांत होईल सर्वांसी। एवढॺा द्यावया महादु:खासी। न वचें हृषीकेशी मी तेथें॥ ६४॥ ज्यासी म्यां सांगावी हे वार्ता। त्यांच्या करावें जीवघाता। एवढी घोर निष्ठुरता। नव्हे कृष्णनाथा माझेनीं॥ ६५॥ बहुतां मुंग्यांच्या विवरासी। जेवीं आगी लावावी हृषीकेशी। तेवीं हे वार्ता द्वारकेसी। म्यां सुहृदांपाशीं सांगावी॥ ६६॥ जेवींफळते फुलते वनीं। भडकोनि लावावा दावाग्नी। तैसा भडका हा सुहृदांचे कानीं। कृष्णनिधनाग्नी कोण लावी॥ ६७॥ जेवीं बुडतयाचे माथां। पाषाण न देववे सर्वथा। तेवीं कृष्णसहित कुळाच्या घाता। मी नव्हें सांगता सुहृदांसी॥ ६८॥ सुख द्यावें सुहृदांसी। तें राहिलें हृषीकेशी। घेऊनियां महादु:खांचिया राशी। सुहृदांपाशीं मी न वचें॥ ६९॥ आशंका॥ म्हणसी जन्मवरी अवज्ञा। तुवां नाहीं केली अतिप्रज्ञा। तो तूं अंतकाळींच्या वचना। कां अवज्ञा करितोसी॥ ३७०॥ कृष्णाअंतकाळींचें तुझें श्रीमुख। पाहतां मज अत्यंत सुख। तें सांडूनि जनांसी दु:ख। द्यावया देख मी न वचें॥ ७१॥ कुळनिधनाचें घोर दु:ख। कृष्णनिधनें संतापक। माझे वचनमात्रें हें विख। जगासी देख न देववे॥ ७२॥ तुझे आज्ञेकरितां देख। जगासी द्यावें महादु:ख। तुझे अवज्ञेचा उल्लेख। नरकदायक मज होय॥ ७३॥ मा आपणचि घेऊनि विख। तुजपुढें मरतां देख। उत्तम गति अलोलिक। मी निजनिष्टंक पावेन॥ ७४॥ ऐसें म्हणोनि आपण। दारुकें घातलें लोटांगण। मस्तकीं धरिले श्रीचरण। सर्वथा जाण सोडीना॥ ७५॥ देखोनि दारुकाचा भावो। कृपें द्रवला देवाधिदेवो। जेणें निर्दळे शोकमोहो। तें वर्म पहा हो सांगत॥ ७६॥
त्वं तु मद्धर्ममास्थाय ज्ञाननिष्ठ उपेक्षक:।
मन्मायारचनामेतां विज्ञायोपशमं व्रज॥ ४९॥
माझ्या धर्माचें निजलक्षण। दृढ आश्रयितां आपण। पावोनि माझें ज्ञान विज्ञान। तूं ब्रह्मसंपन्न स्वयें होसी॥ ७७॥ माझें धर्माचें निजलक्षण। तूं म्हणसी तें कोण कोण। ऐक दारुका सावधान। मद्धर्म पूर्ण ते ऐसे॥ ७८॥ हृदयीं नित्य माझें ध्यान। मुखीं माझें नामकीर्तन। श्रवणीं माझें कथाश्रवण। करें मदर्चन सर्वदा॥ ७९॥ नयनीं मम मूर्तिदर्शन। चरणीं मदालया गमन। रसनें मम तीर्थप्राशन। मत्प्रसादभोजन अत्यादरें॥ ३८०॥ साष्टांगें मजचि नमन। आल्हादें मद्भक्तां आलिंगन। सप्रेम माझे सेवेवीण। रिता अर्धक्षण जाऊं नेदी॥ ८१॥ ऐसी सेवा करितां पहा हो। सर्वभूतीं देखें मद्भावो। हा सर्वधर्मांमाजीं रावो। तेथें अपावो कदा न रिघे॥ ८२॥ सर्वभूतीं माझें दर्शन। तेव्हां ‘वैराग्य’ वोसंडे संपूर्ण। तेथ सहजें होय शुद्ध ज्ञान। देहाभिमानच्छेदक॥ ८३॥ देहाभिमान होतां क्षीण। अपेक्षेसी पडे शून्य। तेव्हां ‘निरपेक्षता’ पूर्ण। सहजें जाण ठसावे॥ ८४॥ निरपेक्षतेची दशा कैशी। विषय भेटलिया इंद्रियांसी। उपेक्षा करी त्यांसी। जेवीं मृगजळासी सज्ञान॥ ८५॥ या दृष्टीं पाहतां चराचर। समूळ मिथ्या व्यवहार। जेवीं दोराचा सर्पाकार। तेवीं भ्रमें संसार भासत॥ ८६॥ केवळ दोराचा सर्पाकार। तो श्वेत कृष्ण कीं रक्तांबर। तेवीं विषयीं विषयव्यवहार। मिथ्या संसार मायिक॥ ८७॥ जेवीं शुक्तिकेचा रजताकार। न घडे एकही अलंकार। तेवीं हा आभासे संसार। मिथ्या व्यवहार मायिक॥ ८८॥ मूळीं मिथ्या भवभान। त्याचें भ्रांतासीच बंधन। तेथील जें मुक्तपण। तोही भ्रम जाण सोलींव॥ ८९॥ आम्हीं सज्ञान पूर्ण। निर्दळूनि भवबंधन। दृढ साधिलें मुक्तपण। हेंही जल्पन मायिक॥ ३९०॥ संसार मायिक रचना। हें सत्यत्वें कळलें ज्याच्या मना। तैं मनचि लाजे मनपणा। ‘विज्ञान’ जाणा त्या नांव॥ ९१॥ जागृति सुषुप्ति आणि स्वप्न। संसाराचें मिथ्या ज्ञान। हें ज्यासी ठसावलें संपूर्ण। ‘विज्ञान’ जाण त्या नांव॥ ९२॥ मुख्य विज्ञानाचें लक्षण। साधक होय ब्रह्म पूर्ण। जगीं न देखे मीतूंपण। ‘उपशम’ जाण या नांव॥ ९३॥ ऐसा उपशम ज्यासी पूर्ण। त्यासी मजसीं नाहीं भिन्नपण। दारुकें ऐकतां निरूपण। हृदयीं ते खूण चमत्कारली॥ ९४॥ अलंकार सोनें पाहूं गेला। तंव तोचि सोनें होऊनि ठेला। तेवीं मी तंव कृष्णरसें वोतला। वियोग नाथिला देहलोभें॥ ९५॥ मी कृष्णरूप आपण। मज कृष्णेंसीं नाहीं भिन्नपण। ऐशी चमत्कारली खूण। मी ब्रह्म परिपूर्ण पूर्णत्वें॥ ९६॥
इत्युक्तस्तं परिक्रम्य नमस्कृत्य पुन: पुन:।
तत्पादौ शीर्ष्ण्युपाधाय दुर्मना: प्रययौ पुरीम्॥ ५०॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायामेकादशस्कन्धे त्रिंशोऽध्याय:॥ ३०॥
ऐसें ऐकोनि श्रीकृष्णवचना। शिरीं वंदूनि श्रीकृष्णाज्ञा। खेद सांडोनियां मना। कृष्णचरणां लागला॥ ९७॥ करूनि त्रिवार प्रदक्षिणा। पुन: पुन: लागोनि चरणां। चरणीं माथा ठेवूनि जाणा। घेऊनि कृष्णाज्ञा निघाला॥ ९८॥ ब्रह्म सर्वत्र परिपूर्ण। त्याचा बोधक श्रीकृष्ण। तो निजधामा गेला आपण। तेणें दुर्मन दारुक॥ ९९॥ पुढती श्रीकृष्णदर्शन। सर्वथा न लभे आपण। यालागीं अतिदुर्मन। करी गमन द्वारकेसी॥ ४००॥ दारुक धाडिला द्वारकेसी। तंव मैत्रेय आला कृष्णापाशीं। तेचि काळीं हृषीकेशी। ब्रह्मज्ञान त्यासी उपदेशी॥ १॥ तो ब्रह्मज्ञानउपदेशविधि। शुक बोलिला तृतीयस्कंधीं। म्हणोनि तें निरूपण ये संधीं। न प्रतिपादीं पुनरुक्त॥ २॥ पाहावया कृष्णनिर्याण। उद्धव गुप्त होता आपण। तेणें ऐकोनि ज्ञाननिरूपण। संतोषें नमन करी कृष्णा॥ ३॥ तेचि काळीं मैत्रेयासी। स्वमुखें बोलिला हृषीकेशी। विदुर येईल तुजपाशीं। त्यासी तूं उपदेशीं गुह्यज्ञान॥ ४॥ उपदेशूनि मैत्रेयासी। देवें धाडिला तो स्वाश्रमासी। उद्धवेंही नमूनि हृषीकेशी। तोही बदरीसी निघाला॥ ५॥ दारुक धाडिला द्वारकेसी। मैत्रेय धाडिला स्वाश्रमासी। उद्धव धाडिला बदरीसी। व्याध अधमासी धाडिलें स्वर्गा॥ ६॥ निजरथसहित घोडे। निजायुधेंसीं धाडिलें पुढें। आतां आपणही वाडेंकोडें। निजधामाकडे निघेल॥ ७॥ निजधामा निघतां श्रीपती। समस्त देव पाहों येती। ते सुरस कथासंगती। पुढिले अध्यायार्थी अतिगोड॥ ८॥ अजन्मा तो जन्म मिरवी। विदेहाअंगीं देहपदवी। स्वयें अक्षयी तो मरण दावी। अतिलाघवी श्रीकृष्ण॥ ९॥ ज्याचें निजधामगमन। शिवविरिंच्यादिकां अतर्क्य खूण। त्याचें सांगेन उपलक्षण। श्रोता अवधान मज द्यावें॥ ४१०॥ एकादशाचा कळस जाण। श्रीकृष्णाचें निजनिर्याण। जेथ नाहीं देहाभिमान। तें ब्रह्म पूर्ण परिपक्व॥ ११॥ भय नाहीं जन्म धरितां। भय नाहीं देहीं वर्ततां। भय नाहीं देह त्यागितां। ‘हे ब्रह्म-परिपूर्णता’ हरि दावी॥ १२॥ एका जनार्दना शरण। पुढें अचुंबित निरूपण। संतीं मज द्यावें अवधान। सांगेन व्याख्यान सद्गुरुकृपा॥ ४१३॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे परमहंससंहितायां एकादशस्कंधे एकाकारटीकायां ‘स्वकुलनिर्दळणं’ नाम त्रिंशोऽध्याय:॥ ३०॥ श्रीकृष्णार्पणमस्तु॥ श्लोक ५०॥ ओंव्या॥ ४१३॥
॥ श्री ॐ तत्सत्-श्रीकृष्ण प्रसन्न॥
अध्याय एकतिसावा
श्रीगणेशाय नम:॥ श्रीकृष्णाय नम:॥ ॐ नमो श्रीसद्गुरु अच्युता। तूं देहीं असोनि देहातीता। गुणीं निर्गुणत्वें वर्तता। देहममता तुज नाहीं॥ १॥ देहममता नाहीं नि:शेख। तानेपणीं प्यालासी विख। पूतना शोषिली प्रत्यक्ष। दावाग्नि देख प्राशिला॥ २॥ जो तूं वैकुंठपीठ विराजमान। त्या तुज नाहीं देहाभिमान। होऊनि गोवळांसमान। हुंबरी जाण घालिशी स्वयें॥ ३॥ तुज पावावया कर्मबळें। सदा सोशिती सोंवळें ओंवळें। तो तूं मेळवूनि गोवळे। जेवणें खेळेंमेळें स्वयें करिसी॥ ४॥ ज्यातें म्हणती दुराचार। तो तुवां करूनि व्यभिचार। केला गोपिकांचा उद्धार हें अगम्य चरित्र वेदशास्त्रां॥ ५॥ घरीं सोळा सहस्र नारी। नांदसी एकलक्ष साठी सहस्र कुमरीं। तरी तूं बाळब्रह्मचारी। तुज सनत्कुमारीं वंदिजे॥ ६॥ तुझे ब्रह्मचर्याची थोरी। शुक नारद वंदिती शिरीं। हनुमंत लोळे पायांवरी। तूं ब्रह्मचारी नैष्ठिक॥ ७॥ व्रतबंध नव्हतां आधीं। तुवां भोगिलीं गोवळीं पेंधीं। तो तूं उर्ध्वरेता त्रिशुद्धीं। तुज भीष्म वंदी सर्वदा॥ ८॥ नवलक्ष गोकंठपाशीं। तुज बांधवेना हृषीकेशी। तो तूं भावार्थें बांधिलासी। रासक्रीडेसी गोपिकीं॥ ९॥ जैसे जैसे त्यांचे मनोरथ। तैसतैसा तूं क्रीडा करित। सामास रात्रि करूनि तेथ। तत्प्रेमयुक्त विचरसी॥ १०॥ तो तूं कामासी नातळत। कामिनीकाम पूर्ण करित। लाजवूनि विधिवेदार्थ। गोपिका समस्त तारिल्या॥ ११॥ गोपी तारिल्या प्रेमाद्भुतें। गायी तारिल्या वेणुगीतें। गौळिये तारिले समस्तें। श्रीकृष्णनाथें निजयोगें॥ १२॥ कंस तारिला दुष्टबुद्धी। व्याध तारिला अपराधी। ऐसा कृपाळु तूं त्रिशुद्धी। संसार अवधी श्रीकृष्णा॥ १३॥ नुल्लंघवे श्रीकृष्णाच्या बोला। यमें गुरुपुत्र आणूनि दिधला। तो श्रीकृष्ण निजतनु त्यागिता जाहला। जो नव्हे अंकिलाकळिकाळा॥ १४॥ भागवतीं कळसाध्यावो। जेथें निजधामा जाईल देवो। तो अतिगहन अभिप्रावो। सांगे शुकदेवो परीक्षितीसी॥ १५॥ कळसावरतें न चढे काम। तेवीं देवें ठाकिल्या निजधाम। राहिला निरूपणसंभ्रम। ‘कळसोपक्रम’ या हेतु॥ १६॥ वेदशास्त्रार्थनिजनिर्वाहो। देहीं नुपजे अहंभावो। तो हा एकतिसावा अध्यावो। जेथ निजधामा देवो स्वेच्छा निघे॥ १७॥ श्रीकृष्णाचें निजधामगमन। ब्रह्मादिकां अतर्क्य जाण। एका जनार्दनकृपा पूर्ण। विशद व्याख्यान सांगेन॥ १८॥ दारुकें द्वारका प्रयाण। केलिया निजधामा निघे श्रीकृष्ण। तें निर्याणकाळींचें दर्शन। पाहों देवगण स्वयें आले॥ १९॥ तेचि अर्थींचें निरूपण। श्रीशुक सांगे आपण। श्रोता परीक्षिती सावधान। श्रीकृष्णनिर्याणश्रवणार्थी॥ २०॥
श्रीशुक उवाच
अथ तत्रागमद्ब्रलह्मा भवान्या च समं भव:।
महेन्द्रप्रमुखा देवा मुनय: सप्रजेश्वरा:॥ १॥
पितर:सिद्धगन्धर्वा विद्याधरमहोरगा:।
चारणा यक्षरक्षांसि किन्नराप्सरसो द्विजा:॥ २॥
जो व्यासाचें निजजीवन। जो योगियांचें चूडारत्न। तो श्रीशुक स्वयें आपण। श्रीकृष्णनिर्याण निरूपी॥ २१॥ शुक म्हणे परीक्षिती। निजधामा निघतां श्रीपती। सकळ देव दर्शनार्थ येती। विमानपंक्तीं सवेग॥ २२॥ ब्रह्मा सत्वर आला तेथ। भव भवानी समवेत। इंद्रमुख्य देव समस्त। स्वगणयुक्त ते आले॥ २३॥ सनकादिक मुनिपंक्ती। आले दक्षादि प्रजापती। अर्यमादि पितर येती। कपिलादि धांवती महासिद्ध॥ २४॥ आले गंधर्व विद्याधर। यक्ष चारण किन्नर। बिभीषणादि राक्षस थोर। वेगीं श्रीधर पाहों येती॥ २५॥ पहावया श्रीरंग। आले पाताळींचे पन्नग। ज्यांतें म्हणती महोरग। तेही सवेग पैं आले॥ २६॥ द्विज आले दत्तात्रेयादिक। नारद पाहों आला कौतुक। द्विज-पक्षी गरुडप्रमुख। सत्वर देख ते आले॥ २७॥ रंभा उर्वशी मेनका। अप्सरा ज्या अष्टनायिका। श्रीकृष्णदर्शना आवांका। धरोनि देखा त्या आल्या॥ २८॥ श्रीकृष्णस्वरूप पहावया। नयनीं थोर घेतला थाया। यालागीं देवसमुदाया। येणें लवलाह्यां जाहलें एथें॥ २९॥
द्रष्टुकामा भगवतो निर्याणं परमोत्सुका:।
गायन्तश्च गृणन्तश्च शौरे: कर्माणि जन्म च॥ ३॥
कृष्ण पाहावया आवडीं। दृष्टी धांवे लवडसवडी। होत डोळॺां आडाडी। अभिनव गोडी कृष्णाची॥ ३०॥ श्रीकृष्णनिर्याणदर्शन। पाहावया उत्साहपूर्ण। सत्वर आले सुरगण। पुढती श्रीकृष्णदर्शन आम्हां कैंचें॥ ३१॥ सौंदर्याची निजसीमा। घनश्याम सुंदर प्रतिमा। तो कृष्ण गेलिया निजधामा। दर्शन आम्हां मग कैंचें॥ ३२॥ श्रीकृष्णदर्शनाची गोडी। सुरगणां लागलीसे गाढी। यालागी तें अति तांतडी। आले आवडीं दर्शनार्थ॥ ३३॥ श्रीकृष्णकर्में स्वयें वर्णित। कृष्णचरित्रें गीतीं गात। मिळोनि सुरवर समस्त। आले दर्शनार्थ सत्वर॥ ३४॥
ववृर्षु: पुष्पवर्षाणि विमानावलिभिर्नभ:।
कुर्वन्त: सङ्कुलं राजन् भक्त्या परमया युता:॥ ४॥
विमानश्रेणी आकाशीं। तेथ दाटलिया चौपाशीं। संमुख देखोनि हृषीकेशी। जयजयकारासी तिंहीं केलें॥ ३५॥ देखोनि श्रीकृष्णनाथ। भक्ति उद्रेक जाहलें चित्त। दिव्य सुमनांतें वर्षत। मिळूनि समस्त समकाळें॥ ३६॥ दिव्य सुमनांचा रोळा। कृष्णा-चौपाशीं विखुरला। तेणें श्रीकृष्ण शोभला त्या काळां। घनश्यामलीळा साजिरी॥ ३७॥
भगवान् पितामहं वीक्ष्य विभूतीरात्मनो विभु:।
संयोज्यात्मनि चात्मानं पद्मनेत्रे न्यमीलयत्॥ ५॥
देव पावले शीघ्रगतीं। ब्रह्मा देखिला संमुखस्थिती। सदाशिवसम विभूती। त्यांतेंही श्रीपती देखता जाहला॥ ३८॥ इंद्रादिक निजविभूती। त्यांतें देखोनि श्रीपती। स्वनेत्र पद्मदलाकृती। ते सहजस्थितीं झांकिले॥ ३९॥ झांकिले अथवा उघडे नयन। परी स्थिति नाहीं अधिक न्यून। तो आत्मा आत्मत्वें परिपूर्ण। तरी कां श्रीकृष्ण नयन झांकी॥ ४०॥ देखोनि देव समुदावो। कांहीं न बोलतां देवो। नेत्र झांकावया कोण भावो। तो अभिप्रावो अवधारा॥ ४१॥ द्वारके असतां श्रीकृष्णनाथ। सुरवर प्रार्थूं आले तेथ। तिहीं विनविला देवकीसुत। दास समस्त कृपा पाही॥ ४२॥ स्वर्लोकादि लोकपाळ। आम्ही तुझे दास सकळ। निजधामा जातां एक वेळ। आश्रम सकळ पुनीत कीजे॥ ४३॥ त्या समस्त देवांप्रती। स्वमुखें बोलिला श्रीपती। यदुकुळक्षयाचे अंतीं। येईन निश्चितीं तेणें मार्गें॥ ४४॥ ऐकोनि श्रीकृष्णवदंती। सुरवर संतोषले चित्तीं। आम्हांसी वश्य जाहला श्रीपती। वचनोक्ती नुल्लंघी॥ ४५॥ ते संधीचा ठाकून ठावो। आला सुरवर समुदावो। त्यांचा छळावया अहंभावो। निजनेत्र पहा हो हरि झांकी॥ ४६॥ देवांचा बहु समुदावो। तेथ मी कोठकोठें जावों। त्यांसी ठकावया पहा हो। नेत्र झांकोनि देवो समाधि दावी॥ ४७॥ नाहीं समाधि आणि व्युत्थान। कृष्ण परब्रह्म परिपूर्ण। तोही निजनेत्र झांकून। समाधिलक्षण मृषा दावी॥ ४८॥ स्वच्छंद मृत्यु योगियांसी। ते स्थिति नाहीं श्रीकृष्णापाशीं। अतर्क्यगति शिवादिकांसी। ते परीक्षितीसी शुक सांगे॥ ४९॥
लोकाभिरामां स्वतनुं धारणाध्यानमङ्गलम्।
योगधारणयाऽऽग्नेय्यादग्ध्वा धामाविशत्स्वकम्॥ ६॥
कळिकाळ जिणोनि जाण। स्वच्छंद मृत्यु योगीजन। ते अग्निधारणा करूनि पूर्ण। स्वदेह जाळून स्वरूप होती॥ ५०॥ घृत थिजलें तें विघुरलें। तैसें सगुण निर्गुणत्वा आलें। या नांव योगाग्निधारण बोलिलें। श्रीकृष्णें देह दाहिलें हें कदा न घडे॥ ५१॥ कृष्णस्वरूप परिपूर्ण। तो कां करील योगधारण। त्याचा लीलाविग्रही देह जाण। करावें दहन कशाचें॥ ५२॥ देखतां डोळॺां लागे ध्यान। संपूर्ण जेथें विगुंते मन। एवढें श्रीकृष्णसौंदर्य संपूर्ण। निजमोहन जगाचें॥ ५३॥ ज्याचें देखतां बरवेंपण। मदन पोटा आला आपण। लक्ष्मी भुलली देखोन चरण। चैतन्यघन श्रीकृष्ण॥ ५४॥ ज्याचें योगियां सदा ध्यान। शिवादिकां नित्य चिंतन। सकल मंगलाचें आयतन। चैतन्यघन श्रीकृष्ण॥ ५५॥ श्रीकृष्ण स्वयें आत्माराम। यालागीं तो जगाचा आराम। लीलाविग्रही घनश्याम। ध्यानगम्य चिद्रूप॥ ५६॥ जैशी घृताची पुतळी। थिजोनि जाहली एके काळीं। तैसी चैतन्याची मुसावली। स्वलीला जाहली श्रीकृष्णमूर्ती॥ ५७॥ दावाग्नि प्राशिला प्रत्यक्ष। न चढेचि काळियाचें विख। तो देहचि नव्हे देख। मा मरणात्मक तेथ कैंचें॥ ५८॥ कृष्ण प्रकटे ज्याचे हृदयीं। तो देहींच होय विदेही। मा त्या कृष्णाच्या ठायीं। देहत्व कायी असेल॥ ५९॥ कृष्णदेहो नाहीं निमाला। तो आभासचि सहजत्वा आला। जैसा दर्पणींचा लोपला। प्रतिबिंब आपुला आपुले ठायीं॥ ६०॥ ज्याचें करितां नामस्मरण। भक्तांचें निरसे जन्म मरण। तो कृष्ण पावे जैं निधन। तैं भक्तांसी कोण उद्धरी॥ ६१॥ आत्ममायेचे स्वलीला। कृष्ण कृष्णरूपें प्रगट जाहला। ते लीला त्यागोनि संचला। निजरूपीं ठेला निजत्वें॥ ६२॥ कृष्णें देहो नेला ना त्यागिला। तो लीलाविग्रहें संचला। भक्तध्यानीं प्रतिष्ठिला। स्वयें गेला निजधामा॥ ६३॥ जैसजैसा भक्ताचा भावो। तैसातैसा होय देवो। तो भक्तध्यानीं स्थापूनि देहो। निजधामा पहा हो न वचोनि गेला॥ ६४॥ हो कां कृष्णमूर्ति जरी सगुण। तरी देहा दाह न घडे जाण। कृष्णाश्रयें जग संपूर्ण। तेव्हां होईल दहन जगाचें॥ ६५॥ जेणें मायेसी निजपोटीं। दाविल्या ब्रह्मांडांच्या कोटी। त्या श्रीकृष्णदेहदाहापाठीं। जगाची गोठी नुरावी॥ ६६॥ ऐशियाही युक्ति विचारितां। अतिस्थूळ ते योग्यता। श्रीकृष्णदेहचि विदेहता। तेथ दाहकता ते कैची॥ ६७॥ कृष्णाचें असणें जाणें। हेंही श्रीकृष्णचि स्वयें जाणे। तेथ वेदांचेंही बोलणें। जाणपणें सरेना॥ ६८॥ हे कृष्णाची अगम्य गती। शिवविरिंच्यादि नेणती। त्यांची कल्पना ऐशी चित्तीं। आम्हांसवें श्रीपती येईल॥ ६९॥ ऐसेनि अभिप्रायें पूर्ण। आनंदले सुरगण। अवघे होऊनि सावधान। उल्हास पूर्ण मांडिला॥ ७०॥
दिवि दुन्दुभयो नेदु: पेतु: सुमनसश्च खात्।
सत्यं धर्मो धृतिर्भूमे: कीर्ति: श्रीश्चानु तं ययु:॥ ७॥
उल्हासले सुरगण। दिवि दुंदुभि त्राहाटिल्या जाण। दिव्य सुमनें गगनींहून। वर्षले पूर्ण श्रीकृष्णावरी॥ ७१॥ वैकुंठादि स्वर्ग संपत्ती। भूलोका आणिल्या श्रीपतीं। तो येतां निजधामाप्रति। आमुच्या आम्हां हातीं देईल वेगीं॥ ७२॥ ऐसेनि देव उल्हासोनि। पुन: पुन: वर्षती सुमनीं। शिवादि पाहती सावधानीं। अतर्क्य गमनीं हरि गेला॥ ७३॥ आम्ही सकळ मायेचे नियंते। आम्ही सर्वद्रष्टे सर्वज्ञाते। ऐसा अभिमान होता देवांतें। त्यासी श्रीकृष्णनाथें लाजविलें॥ ७४॥ अलक्ष्य श्रीकृष्णाची निजगती। शंभु स्वयंभू स्वयें नेणती। तेणें विस्मित ते होती। आश्चर्य मानिती सुरवर॥ ७५॥ देव परमाश्चर्य जंव मानिती। तंव सत्य-धर्म-श्री-धृति-कीर्ती। श्रीये समवेत निघती। सांडूनि क्षिती कृष्णलक्षीं॥ ७६॥ सत्य-धर्म-श्री-धृति-कीर्ती। यांची श्रीकृष्णचरणीं नित्य वस्ती। यालागीं कृष्णासवें त्याही निघती। सांडोनि क्षिती तत्काळ॥ ७७॥ तूं ऐसें मानिशी परीक्षिती। जे सत्य धर्म श्री धृति कीर्ती। नि:शेष सोडूनि गेलीं क्षिती। ऐक ते अर्थीं विचार॥ ७८॥ मज पाहतां श्रीकृष्णमूर्तीं। स्थिरावली ज्याचे चित्तीं। तेथ सत्य धर्म श्री धृति कीर्ती। साम्राज्यें वसती कुरुराया॥ ७९॥ केवळ भक्तानुग्रही। कृष्ण स्वयें लीलाविग्रही। त्या कृष्णाची गती पाहीं। न पडे ठायीं ब्रह्मादिकां॥ ८०॥
देवादयो ब्रह्ममुख्या न विशन्तं स्वधामनि।
अविज्ञातगतिं कृष्णं ददृशुश्चातिविस्मिता:॥ ८॥
इंद्र बृहस्पती मुख्यत्वें ब्रह्मा। देव पाडूनि परम भ्रमा। श्रीकृष्ण प्रवेशला निजधामा। अतर्क्य महिमा हरीचा ८१॥ अतर्क्य श्रीकृष्णाची गती। देवांसी लक्षेना निजशक्तीं। अतिविस्मय पावोनि चित्तीं। स्वधामाप्रती निघाले॥ ८२॥ देव जातां स्वधामाप्रती। क्षणक्षणा आश्चर्य करिती। अलक्ष्य लक्षेना कृष्णगती। अतर्क्य स्थिती शिवादिकां॥ ८३॥ तेचि श्रीकृष्णाची अतर्क्य गती। देवांसी लक्षेना दैवी शक्तीं। तेचि विशद दृष्टांतीं। परीक्षितीप्रती शुक सांगे॥ ८४॥
सौदामन्या यथाऽऽकाशे यान्त्या हित्वाभ्रमण्डलम्।
गतिर्न लक्ष्यते मर्त्यैस्तथा कृष्णस्य दैवतै:॥ ९॥
वीज तळपे अभ्रमंडळीं। ते कोठोनि आली कोठें गेली। गति नरां न लक्षे भूतळीं। तैशी श्रीकृष्णगति जाहली दुर्गम देवां॥ ८५॥ वीज सकळ मनुष्यें देखती। परी न कळे येती जाती गती। तेवीं श्रीकृष्णाची अवतारशक्ती। न कळे निश्चितीं देवांसी॥ ८६॥ तेथूनिया येथें येणें। कां येथूनिया तेथें जाणें। हें नाहीं श्रीकृष्णास करणें। तो सर्वत्र पूर्णपणें परिपूर्ण सदा॥ ८७॥ द्यावया आकाशासी बिढार। सर्वथा रितें न मिळे घर। तेवीं श्रीकृष्ण परमात्मा सर्वत्र। गत्यंतर त्या नाहीं॥ ८८॥ ऐसा श्रीकृष्ण गेला निजधामा। परमाद्भुत ज्याचा महिमा। अलक्ष्य लक्षेना कृष्णगरिमा। जाणोनि स्वाश्रमा निघाले देव॥ ८९॥
ब्रह्मरुद्रादयस्ते तु दृष्ट्वा योगगतिं हरे:।
विस्मितास्तां प्रशंसन्त: स्वं स्वं लोकं ययुस्तदा॥ १०॥
आम्ही माया नियंते निजशक्तीं। आम्ही जाणों दुर्गमा योग गती। आम्ही सर्वद्रष्टे त्रिजगतीं। हा अभिमान चित्तीं देवांसीं॥ ९०॥ तिंहीं देखोनि कृष्णगती। गळाली जाणिवेची वृत्ती। लाजें पळाली अभिमानस्थिती। तिंहीं मांडिली स्तुती श्रीकृष्णाची॥ ९१॥ रुद्र पंचमुखीं करी स्तुती। ब्रह्मा चहूंमुखीं वर्णी कीर्ती। देव विस्मयातें पावती। अगाध गती श्रीकृष्णाची॥ ९२॥ करितां श्रीकृष्णाची स्तुती। देवांसी न बाणे तृप्ती। वर्णित श्रीकृष्णकीर्ति। स्वलोकाप्रती सुर गेले॥ ९३॥ पूर्वीं सांगितली कृष्णगती। तेचि सांगावया विशद स्थिती। परतोनि परीक्षितीप्रती। अतिप्रीतीं शुक सांगे॥ ९४॥
राजन्परस्य तनुभृज्जननाप्ययेहा
मायाविडम्बनमवेहि यथा नटस्य।
सृष्ट्वाऽऽत्मनेदमनुविश्य विहृत्य चान्ते
संहृत्य चात्ममहिमोपरत: स आस्ते॥ ११॥
ऐके राया परीक्षिती। सकळ कारणां कारण श्रीपती। मायेचीही चेतनाशक्ती। जाण निश्चितीं श्रीकृष्ण॥ ९५॥ ज्यासी नाहीं व्यक्ति वर्ण। ज्यासी नाहीं रूप गुण। तो स्वलीला श्रीकृष्ण। यदुवंशीं जाण अवतरला॥ ९६॥ जो सकळवंश वंशज जाण। जो सकळ गोत्र गोत्रज पूर्ण। जो सकळ जातींची जाती जाण। स्वयें श्रीकृष्ण सर्वादि॥ ९७॥ त्यासी यदुवंशीं जें जन्म। गोवर्धनोद्धारणादि कर्म। कुलक्षयो निधनधर्म। हें स्वलीलाकर्म योगमाया॥ ९८॥ योगमायेचिया सत्ता। मत्स्यकूर्मादि अवतारता। शेखीं धरी श्वेतवराहता। ते अतर्क्य योग्यता कृष्णाची॥ ९९॥ श्रीकृष्ण नव्हे नव्हे अवतार। हा अवतारी पूर्ण चिन्मात्र। त्याचें अति अतर्क्य चरित्र। ब्रह्मादि रुद्र नेणती॥ १००॥ जैसे आरिसां प्रतिबिंब बिंबलें। तैसें यदुवंशीं कृष्णजन्म जाहलें। आरिसां हावभाव पाहिले। तैसें कर्मकेलें श्रीकृष्णें॥ १॥ तो आरिसा हातींचा त्यागितां। हारपे पुढील प्रतिबिंबता। त्या नांवकृष्णनिधनता। मिथ्या वार्ता मायिक॥ २॥ जैसा नट धरी नाना वेष। सवेंचि सांडी त्या वेषांस। परी नटासी नाहीं नाश। तैसा मी हृषीकेश अवतारी॥ ३॥ यदुवंशीं श्रीकृष्णनाथ। सर्व कर्मीं सदा अलिप्त। सृष्टिस्थित्यंतीं नित्यमुक्त। त्यासी परमाद्भुत तें कायी॥ ४॥ न मेळवितां साह्य संगें। कृष्ण सृष्टी सृजी निजांगें। ते प्रतिपाळूनि यथाभागें। संहारूनि वेगें स्वयें उरे॥ ५॥ श्रीकृष्ण सृजी पाळी संहारी। हे प्रत्यक्ष जगीं दिसे थोरी। कर्में करूनि तो अविकारी। कदा विकारी नव्हे कृष्ण॥ ६॥ श्रीकृष्ण अंतर्यामी सर्व भूतां। जगकर्मांचा कृष्ण कर्ता। कर्म करूनि तो अकर्ता। विदेहता निजरूपें॥ ७॥ ऐसा अगाध श्रीकृष्णमहिमा। मर्यादा न पवे शिव शक्र ब्रह्मा। त्याचा देहचि विदेहात्मा। गेला निजधामा तेणें योगें॥ ८॥ येचि अवतारीं श्रीकृष्णनाथें। देहीं दाविलें विदेह कर्मातें। तें मागें परिसविलें तूतें। ऐक मागुतें सांगेन॥ ९॥ सात दिवस गोवर्धन। निजकरीं धरूनि जाण। इंद्राचा हरिला मान। विदेही पूर्ण श्रीकृष्ण॥ ११०॥ दावाग्नि प्राशूनि आपण। लाजविला हुताशन। रासक्रीडा करूनि जाण। हरिला मान मदनाचा॥ ११॥ समुद्र सारूनि माघारां। वसविलें निजनगरा। निद्रा न मोडितां मथुरा। द्वारकापुरा आणिली॥ १२॥ सेवूनि भाजीचें पान। तृप्त केले ऋषिजन। श्रीकृष्ण अंतर्यामी आपण। हें निजलक्षण दाविलें॥ १३॥ येणेंचि देहें श्रीकृष्णनाथ। जाहला वत्सें वत्सप समस्त। ब्रह्मा लाजवूनि तेथ। गर्वहत तो केला॥ १४॥
मर्त्येन यो गुरुसुतं यमलोकनीतं
त्वां चानयच्छरणद: परमास्त्रदग्धम्।
जिग्येऽन्तकान्तकमपीशमसावनीश:
किं स्वावने स्वरनयन्मृगयुं सदेहम्॥ १२॥
श्रीकृष्णें येणेंचि देहेसीं। जाऊनियां यमलोकासी। निग्रहूनि यमकाळासी। निमाल्या गुरुसुतासी आणिलें॥ १५॥ उत्तरेचिये गर्भस्थितीं। जळतां ब्रह्मास्त्रमहाशक्तीं। तुज राखिलें आकांतीं। स्वचक्र श्रीपती प्रेरोनी॥ १६॥ तुज राखावया हेंचि कारण। तुझी माता रिघाली शरण। श्रीकृष्ण शरणागतां शरण्य। संकटहरण निजभक्तां॥ १७॥ यादवां देखतां द्वारकापुरीं। द्विजसुत राखितांसटीचे रात्रीं। अर्जुन नेमेंसीं प्रतिज्ञा करी। तंव तो सशरीरीं हारपला॥ १८॥ ब्राह्मणें निर्भर्त्सिलें त्यासी। थोर लाज जाहली अर्जुनासी। तेणें कळवळला हृषीकेशी। भक्तसाह्यासी पावला॥ १९॥ अर्जुनासहित हृषीकेशी। रथेंसीं रिघे क्षीरसागरासी। द्विजसुत होते नारायणापाशीं। ते द्वारकेसी आणिले॥ १२०॥ एवं भक्तसंकटनिवारण। निजांगें करी श्रीकृष्ण। कृष्णप्रतापाचें महिमान। ऐक सांगेन अलौकिक॥ २१॥ बाणासुराचा कैवारु। करूं आला महारुद्रु। सवें नंदी भृंगी वीरभद्रु। स्वामिकार्तिकेंसीं हरु जिंतिला कृष्णें॥ २२॥ उग्रासीही अतिउग्र। भयंकराही भयंकर। तो जिणोनि काळाग्निरुद्र। बाणभुजाभार छेदिला॥ २३॥ श्रीकृष्णवचन अति अगाध। जेणें केला अपराध। तो स्वदेहेंसीं जराव्याध। स्वर्गा प्रसिद्ध धाडिला॥ २४॥ एवढें सामर्थ्य श्रीकृष्णापाशीं। तो काय राखूं न शके स्वदेहासी। देहीं देहत्व नाहीं त्यासी। गेला निजधामासी निजात्मता॥ २५॥ एवढें सामर्थ्य श्रीकृष्णापाशीं। तरी कां गेला निजधामासी। ये लोकीं तेणें देहेंसीं। राहतां त्यासी भय काय॥ २६॥ ऐसा पोटींचा आवांका। धरुन धरिशी आशंका। लोकाभिमान नाहीं यदुनायका। स्वेच्छा देखा स्थिति त्याची॥ २७॥
तथाप्यशेषस्थितिसम्भवाप्यये-
ष्वनन्यहेतुर्यदशेषशक्तिधृक् ।
नैच्छत्प्रणेतुं वपुरत्र शेषितं
मर्त्येन किं स्वस्थगतिं प्रदर्शयन्॥ १३॥
मायादि तीन्ही गुण। इत्यादि कारणां कारण। निजांगें श्रीकृष्ण आपण। स्वयें अकारण अनादित्वें॥ २८॥ ब्रह्मांडें कोटी अनंत। उत्पत्तिस्थितिप्रलयावर्त। करूनि श्रीकृष्णु अलिप्त। सामर्थ्यें अद्भुत श्रीकृष्णीं॥ २९॥ अशेषांही परम शक्ति। श्रीकृष्णलेशें सामर्थ्यवंती। कृष्णुदेह तो विदेहस्थिती। स्वेच्छाशक्तीं स्वधामा गेला॥ १३०॥ इहलोकींची आसक्ती। श्रीकृष्णासी नाहीं चित्तीं। निजधामाची अतिप्रीती। तेही निश्चितीं असेना॥ ३१॥ निज देहेंही इहलोकीं वस्ती। स्वेच्छा न मानीच श्रीपती। माझ्या देहाची अगम्य गती। तेणें साधकस्थिती भ्रंशेल॥ ३२॥ माझा देह चैतन्यघन। तेथें बाधीना विषयसेवन। हें देखोनि साधक जन। देहसाधन मांडिती॥ ३३॥ वायो साधूनियां पूर्ण। दृढ करूनि देहधारण। माझ्या ऐसें विषयसेवन। करावया अभिमान वाढेल॥ ३४॥ ऐसा वाढल्या देहाभिमान। माझें मावळेल निजात्मज्ञान। यालागीं विदेह श्रीकृष्ण। गेला निघोन निजधामा॥ ३५॥ माझें नाकळतां निजात्मज्ञान। परी माझ्याऐसें विषयसेवन। करूं लागती योगी जन। यालागीं श्रीकृष्ण निजधामा गेला॥ ३६॥ माझ्या देहाची स्थिति गती। शंभु स्वयंभू कदा नेणती। मा इतरांसीं ते गती। कैशा रीतीं कळेल॥ ३७॥ परी माझे ऐसा देहाभिमान। वाढवितील योगी जन। हें जाणोनियां श्रीकृष्ण। विदेहें आपण निजधामा गेला॥ ३८॥ ज्याचे देहाचें दर्शन। देखतां सबाह्य निवे मन। त्याही देहाचें मिथ्यात्व पूर्ण। दावूनि श्रीकृष्ण निजधामा गेला॥ ३९॥ एवं त्यागावया देहाभिमान। कृष्ण निजधामा करी गमन। तरावया साधक जन। कृपाळु पूर्ण दीक्षा दावी॥ १४०॥ एथवरी वैराग्यदृढस्थिती। देहाभिमानाच्या विरक्तीं। साधावी निजात्मप्राप्ती। हे दीक्षा श्रीपती दावूनि गेला॥ ४१॥ जेणें देहें स्वयें श्रीकृष्ण। आचरला अनेक विंदान। परी ज्ञात्यासी न लगे दूषण। हें पूर्णत्व पूर्ण प्रकाशलें॥ ४२॥ जैत अथवा आल्या हारी। ज्ञान मैळेना दोंहीपरी। ज्यासी मिथ्या भास नरनारी। तो सदा ब्रह्मचारी व्यभिचारामाजीं॥ ४३॥ स्त्रीपुत्रादि गृहवासी। असोनि नित्य संन्यासी। हेंही लक्षण हृषीकेशीं। येणें अवतारेंसीं दाविलें॥ ४४॥ अंगीं बाणलें गोवळेपण। सवेंचि स्वामित्व आलें पूर्ण। शेखीं सेवकही जाहला आपण। तरी पूर्णपण मैळेना॥ ४५॥ एकाचे घरीं उच्छिष्टें काढी। एकाचीं अंगें धूतसे घोडीं। तरी पूर्णत्वाचिये जोडी। उणी कवडी नव्हेचि॥ ४६॥ एकाचीं निमालीं आणिलीं बाळें। एकाचीं समूळ निर्दाळिलीं कुळें। इंहीं दोंही परी ज्ञान न मैळे। हेंही प्रांजळेंप्रकाशिलें॥ ४७॥ एकाचा पूर्ण जाहला कैवारी। एकाचा जाहला पूर्ण वैरी। परी एकात्मता चराचरीं। अणुभरी ढळेना॥ ४८॥ एकीं उद्धरिलीं चरणीं लागतां। तोही एकाचे चरणीं ठेवी माथा। बापज्ञानाची उदारता। न्यून पूर्णता तरी न घडे॥ ४९॥ इतर ज्ञाते ज्ञानस्थिती। बोल बोलोनि दाविती। तैशी नव्हे श्रीकृष्णमूर्ति। आचरोनि स्थिती दाविली अंगें॥ १५०॥ अतिगुह्य ज्ञानलक्षणें। आचरोनि दाविलीं श्रीकृष्णें। परी अणुमात्रही उणें। नेदीच पूर्णपणें अंगीं लागों॥ ५१॥ एवढी ज्या देहाची ख्याती। जेणें देहें दीन उद्धरती। ज्या देहातें सुरवर वंदिती। ज्या देहाची कीर्ती त्रैलोक्यवर्णी॥ ५२॥ त्या देहाची अहंकृती। नि:शेष सांडूनि श्रीपती। गेला निजधामाप्रती। ठेवूनि निजमूर्ति स्वभक्त ध्यानीं॥ ५३॥ श्रीकृष्णें देह नेला ना त्यागिला। तो लीलाविग्रहें संचला। निजभक्त ध्यानीं प्रतिष्ठिला। स्वयें निजधामा गेला निजात्मयोगें॥ ५४॥
य एतां प्रातरुत्थाय कृष्णस्य पदवीं पराम्।
प्रयत: कीर्तयेद्भक्त्या तामेवाप्नोत्यनुत्तमाम्॥ १४॥
श्रीकृष्ण अवताराचे अंतीं। कृष्णाची जे परम गती। अति उत्कृष्ट योगस्थिती। अतर्क्य निश्चितीं सुरश्रेष्ठां॥ ५५॥ जे गतीहूनि वरती। चढेना अधिक गती। तीतें ‘परा पदवी’ म्हणती। वेदशास्त्रोक्तीं सज्ञान॥ ५६॥ हे ‘श्रीकृष्णपरमपदवी’। जो कोणी भक्तियुक्त सद्भावीं। नित्य नेमस्त धरूनि जीवीं। पढे निजभावीं प्रात:काळीं॥ ५७॥ भक्तियुक्त हृदयकमळीं। या चौदा श्लोकांची जपमाळी। जिह्वाग्रें अनुदिनीं चाळी। नित्य प्रात:काळीं नेमस्त॥ ५८॥ केलिया या नेमासी। सांडणें नाहीं प्राणांतेंसीं। ऐशी निष्ठा जयापाशीं। उत्तमत्वासी तो पावें॥ ५९॥ श्रीकृष्णपदवी गातां गीतीं। पाया लागती चारी मुक्ती। त्यांचीही उपेक्षूनि स्थिती। कृष्णपदवी निश्चितीं स्वयें पावे॥ १६०॥ हे चौदाही श्लोक जाण। चौदा विद्यांचें जन्मस्थान। जो प्रात:काळीं करी पठण। कृष्णपदवी पूर्ण तो पावे॥ ६१॥ हे चौदाही श्लोक जाण। चौदा भुवनांचें निज जीवन। कृष्णपदवी पाविजे पूर्ण। नेमस्त पठण केलिया॥ ६२॥ हे चौदाही श्लोक जाण। चौदा पदें गयावर्जन। पदीं पिंडा समाधान। नेमस्त पठण केलिया॥ ६३॥ हे चौदाही श्लोक जाण। चौदा इंद्रांच्या जीवां जीवन। इंद्रांचा इंद्र होईजे आपण। नेमस्त पठण केलिया॥ ६४॥ हे चौदाही श्लोक जाण। चौदा कांडें वेद संपूर्ण। वेदवादां समाधान। नेमस्त पठण केलिया॥ ६५॥ हे चौदाही श्लोक जाण। संसाराचे गुणकर्मवर्ण। मोडूनि करी ब्रह्म पूर्ण। नेमस्त पठण केलिया॥ ६६॥ प्रात:काळीं नेमस्त पठण। करितां पाविजे ब्रह्म परिपूर्ण। मा त्रिकाळीं जो करी पठण। तो स्वदेहें श्रीकृष्ण स्वयें होय॥ ६७॥ एथ पढोनि जो अर्थ पाहे। तो स्वयें स्वयंभ श्रीकृष्ण होये। श्रीकृष्णाची पूर्ण पदवी पाहे। आंदणी होये तयाची॥ ६८॥ श्रीकृष्णपदवी निजनिर्याण। श्रवणें पठणें अर्थें जाण। साधकां करी ब्रह्म परिपूर्ण। हें गुह्य निरूपण परमार्थसिद्धीं॥ ६९॥ एथ न करितां अतिसाधन। अनायासें ब्रह्मज्ञान। कृष्णपदवी पाविजे पूर्ण। श्रद्धायुक्त पठण नेमस्त करितां॥ १७०॥ तक्षक भयाची निवृत्ती। देहीं पावावया विदेहप्राप्ती। हे सुगमोपायस्थिती। कृपो नें परीक्षितीप्रती शुक सांगे॥ ७१॥ हे कृष्णपदवी निजनिर्याण। श्रद्धायुक्त नेमस्त पठण। करितां पाविजे ब्रह्म पूर्ण। हे प्रतिज्ञा पूर्ण श्रीशुकाची॥ ७२॥ ऐशी हे सुगम परी। असतां जो श्रद्धा न धरी। तो बुडाला संसार सागरीं। अविद्येघरीं घरजांवयी तो॥ ७३॥ तोचि अविद्येचा पोसणा। विषयीं प्रतिपाळिला सुणा। अहंथारोळां बैसणा। सर्वदा जाणा वसवसित॥ ७४॥ असोत या मूढ गोष्टी। रचल्या सुखा पडेल तुटी। या श्लोकपठणासाठीं। होय भेटी परब्रह्मीं॥ ७५॥ कृष्णनिजपदवीव्याख्यान। करावया मी अपुरतें दीन। जनार्दनें कृपा करून। हें निरूपणबोलविलें॥ ७६॥ एका जनार्दना शरण। श्रीकृष्णपदवीनिरूपण। तो हा ‘एकादशाचा कळस’ पूर्ण। व्यासें जाणोन वायिला॥ ७७॥ श्रीकृष्णपदवीपरतें। निरूपण न चढे एथें। तो हा ‘कळस’ एकादशातें। व्यासें निश्चितें निर्वाळिला॥ ७८॥ निर्वाळिलें निरूपण। हे जनार्दनकृपा पूर्ण। एका जनार्दना शरण। यापरी श्रीकृष्ण निजधामा गेला॥ ७९॥ येरीकडे द्वारकेसी। दारुक पावला विव्हळतेसीं। तेथील वर्तले कथेसी। परीक्षितीसी शुक सांगे॥ १८०॥
दारुको द्वारकामेत्य वसुदेवोग्रसेनयो:।
पतित्वा चरणावस्त्रैर्न्यषिञ्चत्कृष्णविच्युत:॥ १५॥
दारुक द्वारका देखत। जैसें का प्राणेंवीण प्रेत। का राजा जैसा दैवहत। तैशी दिसत कळाहीन॥ ८१॥ जेवीं का वनिता पतिवीण। सर्वार्थीं दिसे दीन। तैशी द्वारावती जाण। कळाहीन आभासे॥ ८२॥ रस पिळिल्या जैसा ऊंस। कणेवीण फळकट भूस। तैशी श्रीकृष्णेवीण उद्वस। दिसे चौपास द्वारका॥ ८३॥ दारुक प्रवेशे राजभुवन। देखोनि वसुदेव उग्रसेन। अश्रुधारा स्रवती नयन। आक्रंदोनि चरण धरिले त्यांचे॥ ८४॥ कृष्णवियोगें तापला पूर्ण। जैसें अतिसंतप्त जीवन। तैसे अश्रुधारा स्रवती नयन। तेणें पोळती चरण वसुदेवाचे॥ ८५॥ उकसाबुकसीं फुंदे पोट। दु:खें होऊं पाहे हृदयस्फोट। जिव्हेसी बोबडी वाळले ओंठ। सद्गदें कंठ दाटला॥ ८६॥ बोल न बोलवे सर्वथा। देखोनि दारुकाची व्यथा। द्वारकेच्या जनां समस्तां। अतिव्याकुलता वोढवली॥ ८७॥ देवकी आणि रोहिणी। आल्या अत्यंत हडबडोनी। अतिव्याकुलता देखोनि। कृष्णपत्नी तेथें आल्या॥ ८८॥ राणीवसाचिया नरनारी। धांवल्या सभामंडपाभीतरीं। तंव दारुकाची अवस्था भारी। देखोनि जिव्हारीं दचकल्या॥ ८९॥ स्फुंदतां उकसाबुकसीं। श्वास परतेना दारुकासी। सांगतां कृष्णवियोगासी। मूर्च्छा त्यासी पैं आली॥ १९०॥ तेथें वसुदेव उग्रसेन। करूनि त्याचें सांत्वन। वृत्तांत पुसतां सावधान। काय तो वचन बोलिला॥ ९१॥
कथयामास निधनं वृष्णीनां कृत्स्नशो नृप।
तच्छ्रुत्वोद्विग्नहृदया जना: शोकविमूर्च्छिता:॥ १६॥
दारुक म्हणे तुम्ही समस्त। पळा पळा अर्जुना समवेत। अर्ध क्षण न रहावें एथ। यादव समस्त निमाले॥ ९२॥ यादवीं जाऊनि प्रभासासी। केला तीर्थविधि विधानेंसीं। दान भोजनें देऊनि द्विजांसी। मद्यपानासी मांडिलें॥ ९३॥ चढला मद्याचा उन्मादु। यादव सखे सगोत्र बंधु। परस्परें युद्ध संबंधु। गोत्रवधु तेथ घडला॥ ९४॥ शस्त्रेंकरूनि स्वयमेव। कोणी न मरतीच यादव। तेथ घडलें एक अपूर्व। एरिकेनें सर्व निमाले॥ ९५॥ बळिभद्रें त्यागिलें देहासी। श्रीकृष्णही गेला निजधामासी। मज धाडिलें तुम्हांपाशीं। क्षण द्वारकेसी न रहावें॥ ९६॥ हरीनें त्यागिलें द्वारकेसी। समुद्र बुडवील शीघ्रतेशीं। हें कृष्णें सांगितलें तुम्हांसी। एथूनि त्वरेंसीं निघावें॥ ९७॥ ऐकूनि दारुकाची गोठी। द्वारकेसी एक बोंब उठी। उग्रसेन कपाळ पिटी। मस्तक आपटी वसुदेव॥ ९८॥ एक कुस्करिती दोनी हात। एक अत्यंत चरफडत। एक आक्रोशें आक्रंदत। एकें मूर्च्छित पैं पडली॥ ९९॥ एका रडतां शोषले कंठ। एकाचे दोनी फुटले ओंठ। एकाचा होऊं पाहे हृदयस्फोट। दु:ख अचाट सर्वांसी॥ २००॥ एक स्फुंदती उकसाबुकशीं। एक पीटिती हृदयासी। एक तोडिती कान-केशीं। एकें दु:खें पिशीं पैं जाहलीं॥ १॥ एक देती दीर्घ हाक। एकें पडलीं अधोमुख। एके मानीच्या ऐसें देख। अत्यंतिक तळमळती॥ २॥ बोंबं सुटली नरनारी। शंख करिती घरोघरीं। कोण कोणातें निवारी। समस्तां सरी समदु:ख॥ ३॥ देवकी आणि रोहिणी। मूर्च्छित पडल्याधरणीं। सवेंचि उठती आक्रंदोनी। दीर्घस्वरीं विलपती॥ ४॥ कृष्णा विसाविया निजाचिया। वेगीं भेटी देईं कां रे कान्हया। कां रुसलासी रे तान्हया। तुझिया पायां लागेन॥ ५॥ श्रीकृष्ण तूं माझा कैवारी। श्रीकृष्ण तूं माझा साहाकारी। शेखीं मज सांडोनि दुरंधरी। तूं दूरचे दूरी गेलासी॥ ६॥ जिणोनि कंस केशियातें। बंदीं सोडविलें आमुतें। शेखीं तुवां सांडिलें एथें। निष्ठुरचित्तें झालासी॥ ७॥ आणूनि निमाल्या पुत्रांतें। तुवां मज सुखी केलें येथें। अंतीं ठकिलें ठकिलें मातें। श्रीकृष्णनाथें नाडिलें॥ ८॥ कृष्णा निरसूनि माझें दु:ख। तुवा दिधलें परम सुख। तो तूं निष्ठुर जाहलासी देख। अंतीं नि:शेख सांडिलें॥ ९॥ माझिया पुत्रा कृष्णराया वेगीं ये का रे कान्हया। माझ्या नाहीं प्राशिलें पान्हया। म्हणोनि तान्हया रुसलासी॥ २१०॥ जिचें केलें स्तनपान। ते यशोदाही जाहली दीन। तुझें न देखतां वदन। कैसेनि प्राण राहतील॥ ११॥ कृष्णा ये रे ये रे धांवोन। चौभुजीं मज दे आलिंगन। तुझें चुंबीन रे वदन। मी अतिदीन तुजलागीं॥ १२॥ माझिया श्यामसुंदरा। राजीवलोचना सुकुमारा। चतुर्भुजा शार्ङ्गधरा। ये का रे उदारा श्रीकृष्णा॥ १३॥ तुझे पद्मांकित पाये। मज आठवती पाहें। तेणें हृदय फुटताहे। करूं मी काये श्रीकृष्णा॥ १४॥ कृष्णा तुजहूनि वेगळी। मी जाहलें रे आंधळी। माझी धरावया आंगोळी। धांव वनमाळी श्रीकृष्णा॥ १५॥ मज अंधाची कृष्ण काठी। कोणें घातली गे वैकुंठीं। आतां मी मार्ग केवीं कंठीं। पाव जगजेठी श्रीकृष्णा॥ १६॥ पुत्र नातू वंशावळी। एके वेळीं जाहली होळी। कोणी नुरेचि यदुकुळीं। वक्ष:स्थळीं पिटिती॥ १७॥ यादव पडले रे केउते। तुज कोठूनि धाडिलें कृष्णनाथें। वेगीं न्या रे मज तेथें। पाहीन समस्तें तानुलीं॥ १८॥ ऐकोनि देवकीचें रुदन। वसुदेवादि उग्रसेन। आक्रंदोनि सकळ जन। प्रभासासी जाण निघाले॥ १९॥
तत्र स्म त्वरिता जग्मु: कृष्णविश्लेषविह्वला:।
व्यसव: शेरते यत्र ज्ञातयो घ्नन्त आननम्॥ १७॥
स्त्रिया पुरुष सुहृज्जन। मिळोनि स्वगोत्रस्वजन। शीघ्र प्रभासा गमन। करीत रुदन निघाले॥ २२०॥ हाकाबोबांचे बंबाळ। स्त्रिया करिती कोल्हाळ। कृष्णवियोगें सकळ। दु:खविव्हळ निघालीं॥ २१॥ रणीं पडिले यादव। प्राणरहित निर्जीव। तेथ पावलीं ते सर्व। बोंबारव खंती करिती॥ २२॥
देवकी रोहिणी चैव वसुदेवस्तथा सुतौ।
कृष्णरामावपश्यन्त: शोकार्ता विजहु: स्मृतिम्॥ १८॥
प्राणांश्च विजहुस्तत्र भगवद्विरहातुरा:।
उपगुह्य पतींस्तात चितामारुरुहु: स्त्रिय:॥ १९॥
देवकी आणि रोहिणी। वसुदेव उग्रसेन दोनी। यादव निमाले रणांगणीं। ते स्थानीं पाहों येती॥ २३॥ दीर्घशयनें युद्धधरणीं। पडिल्या यादव वीरश्रेणी। तेथें राम कृष्ण पुत्र दोनी। पाहतां नयनीं न देखती॥ २४॥ कृष्णविरहें शोकाकुलित। दु:ख न संठेचि अतिअद्भुत। चौघें जणें आक्रंदत। पडिलीं मूर्च्छित अतिदु:खें॥ २५॥ निमाल्या रामकृष्णांचें मुख। आम्ही न देखों नि:शेख। तेणें उथळलें परम दु:ख। दु:खासवें देख निमाला प्राण॥ २६॥ प्राणें करावें उत्क्रमण। त्यांसीही श्रीकृष्णदु:ख दारुण। दु:खें निमाले स्वयें प्राण। वांचवी कोण रडत्यांसी॥ २७॥ न देखतां राम कृष्ण। ते मूर्च्छे सवेंचि जाण। चौघीं जणीं त्यजिले प्राण। अर्ध क्षण न लागतां॥ २८॥ समस्त यादवांच्या स्त्रिया। धरूनि आपुलाले प्रिया। अग्निप्रवेश करावया। चढल्या लवलाह्यां चितेमाजीं॥ २९॥ यादवांचिया स्त्रिया बहुतीं। कोण प्रवेशल्या कैशा रीतीं। तेही अग्निप्रवेशाची स्थिती। परीक्षितीप्रती शुक सांगे॥ २३०॥
रामपत्न्यश्च तद्देहमुपगुह्याग्निमाविशन्।
वसुदेवपत्न्यस्तद्गात्रं प्रद्युम्नादीन् हरे: स्नुषा:।
कृष्णपत्न्योऽविशन्नग्निं रुक्मिण्याद्यास्तदात्मिका:॥ २०॥
बळरामाचिया पत्नी। रेवत्यादि मुख्य करूनी। स्वपतीचा देह मनीं धरूनी। प्रवेशल्या अग्नीं तद्धॺानयुक्त॥ ३१॥ निमाल्या देवकी रोहिणी। इतरा ज्या वसुदेवपत्नी। त्याही प्रवेशल्या अग्नीं। देह धरूनी स्वपतीचा॥ ३२॥ प्रद्युम्नासवें रती। प्रवेशली महासती। सांबासवें रूपवती। प्रवेशे निश्चितीं दुर्योधनकन्या॥ ३३॥ अनिरुद्धासवें देखा। प्रवेशे रोचना आणि उखा। एवं कृष्णसुना सकळिका। यादवनायिका प्रवेशल्या अग्नीं॥ ३४॥ अग्निप्रवेश श्रीकृष्णपत्नी। त्यांची अलोलिक करणी। त्यांमाजीं मुख्य रुक्मिणी। सत्यांशिरोमणी जगन्माता॥ ३५॥ कृष्णनिर्याणें रुक्मिणी। तद्रूप जाहली तत्क्षणीं। जेवीं ज्वाळा मिळे वन्हीं। तेवीं कृष्णपणीं तदात्मक॥ ३६॥ कृष्ण गेला जाणोनि रुक्मिणी। तटस्थ ठेली ते तत्क्षणीं। सांडूनि देहाची गवसणी। कृष्णस्वरूपमिळणीं तदात्मक झाली॥ ३७॥ रुक्मिणीचा देह दहन। करावया नुरेचि प्रेतपण। कृष्ण पूर्णत्वें स्वयंभ पूर्ण। गति समान दोहींची॥ ३८॥ येरी पट्ट-मुख्या सातजणी। आणि सोळासहस्र कामिनी। सवें प्रवेशल्या अग्नीं। श्रीकृष्णचरणीं तदात्मक॥ ३९॥ जिंहीं भोगिलें कृष्णसुरतसुख। त्यांसी गति न्यूनाधिक। बोलतां वाचेसी लागे देख। जाहल्या तदात्मक कृष्णसंगें॥ २४०॥ जो वाचे स्मरे ‘कृष्ण कृष्ण’। तो तदात्मता पावे पूर्ण। मा जिंहीं स्वयें भोगिला श्रीकृष्ण। त्यांची दशा न्यून कदा न घडे॥ ४१॥ ज्यासी लागे कृष्णाचा अंगसंग। त्याच्या लिंगदेहा होय भंग। त्यासी पूर्ण पदवी अभंग। भोगितां भोग तादात्म्य नित्य॥ ४२॥ ज्याच्या ध्यानीं वसे श्रीकृष्णमूर्ती। त्यासी चारी मुक्ति वंदिती। माजिंहीं स्वयें भोगिला श्रीपती। त्यांसी अन्यगती असेना॥ ४३॥ ज्यांसी इहलोकीं श्रीकृष्णसंगती। त्यांसी परलोकीं अन्य गती। बोलतां सज्ञान कोपती। त्यांसी पूर्ण प्राप्ती पूर्णत्वें॥ ४४॥ जो अडखळोनि गंगेसी पडे। त्याचें पातक तत्काळ उडे। मा ज्यासी विध्युक्त स्नान घडे। त्याचें पाप न झडे मग कैसेनी॥ ४५॥ तेवीं कृष्णव्यभिचारसंगती। गोपी उद्धरल्या नेणों किती। त्याच्या निजपत्न्यासी अन्य गती। कैशा रीतीं घडेल॥ ४६॥ तृण वल्ली मृग पाषाण। गायी गोपिका गौळीजन। कृष्णसंगें तरले पूर्ण। त्याच्या स्त्रियांसी अन्य गति कैशी॥ ४७॥ यालागीं कृष्णसंगती। ज्यांसी घडे भलत्या रीतीं। ते उद्धरले गा निश्चितीं। जाण परीक्षिती कुरुराया॥ ४८॥
अर्जुन: प्रेयस: सख्यु: कृष्णस्य विरहातुर:।
आत्मानं सान्त्वयामास कृष्णगीतै: सदुक्तिभि:॥ २१॥
ज्याचा रथ वागवी आपण। ज्याचा सारथी श्रीकृष्ण। ऐसा प्रियसखा अर्जुन। कृष्णविरहेंपूर्ण उद्विग्न जाहला॥ ४९॥ तंव कृष्णगीता सदुक्ती। आठवल्या त्याच्या चित्तीं। मग आपणआपणाप्रती। बोलिला उपपत्ती त्या ऐका॥ २५०॥ कृष्ण माझ्या मनाचें ‘मन’। कृष्ण ‘बुद्धीचें’ आयतन। कृष्णप्रभा हें प्रकाशे ‘ज्ञान’। तेथ भिन्नपण मज कैंचें॥ ५१॥ कृष्णप्रभा ‘दृष्टी’ देखे। कृष्णअवधानें ‘श्रवण’ ऐके। कृष्णानुवादें ‘बोल’ बोलके। तेथें ‘मी’ वेगळिकें वृथामानीं॥ ५२॥ कृष्ण हृदयस्थ ‘आत्मा’ अव्यंग। कृष्ण माझ्या अंगाचें अंग। त्या कृष्णासीं मज वियोग। हा मिथ्या प्रयोग मायिक॥ ५३॥ कृष्ण माझया जीवाचें जीवन। कृष्ण सबाह्यपरिपूर्ण। कृष्णवियोग मानी जें मीपण। तेंही निमग्न श्रीकृष्णीं॥ ५४॥ भिन्न भिन्न भूताकृती। त्यामाजीं अभिन्न कृष्णस्थिती। विषमीं समान श्रीपती। त्यासी वियोग प्राप्ती कदा न घडे॥ ५५॥ घट मृत्तिकेसी नव्हे भिन्न। पट न निवडे तंतु त्यागून। तैसा श्रीकृष्णवेगळा अर्जुन। माझें मीपण निवडेना॥ ५६॥ कृष्णवियोग मी मानीं जेथ। तेथेंही असे श्रीकृष्णनाथ। वियोग मानिती जे सत्य। ते केवळ भ्रांत अतिमूर्ख॥ ५७॥ नित्य सर्वगत परिपूर्ण। कृष्ण अखंड दंडायमान। त्यासीं मजसीं वेगळेपण। सर्वथा जाण असेना॥ ५८॥ ‘न जायते म्रियते’ हें वचन। स्वमुखें बोलिला श्रीकृष्ण। त्या कृष्णासी जन्ममरण। मूर्खजन मानिती॥ ५९॥ ‘अक्षरं ब्रह्म परमं’। स्वयें बोलिला पुरुषोत्तम। त्या कृष्णासी मरणजन्म। मूर्ख मनोधर्म कल्पिती॥ २६०॥ जो ‘क्षराक्षरातीत’। ‘उत्तमपुरुष’ श्रीकृष्णनाथ। त्यासी जन्ममरणादि आवर्त। कल्पिती भ्रांत मनोधर्में॥ ६१॥ त्या कृष्णासीं मज वेगळेपण। कल्पांतींही नाहीं जाण। करितां गीतार्थाचें स्मरण। आपुलें आपण पूर्णत्व देखे॥ ६२॥ मी अज आद्य अचळ। मी निज नित्य निर्मळ। माझ्या स्वरूपा नाहीं चळ। त्रैलोक्य खेळ पैं माझा॥ ६३॥ जगातें नेमिता वेद। तो नि:श्वसित माझा बोध। मी आनंदा परमानंद। स्वानंदकंद निजांगें॥ ६४॥ मी आपरूपें आप। मी प्रकृतिपुरुषांचा बाप। मी अवतारी अवतरें कृष्णरूप। हा सत्यसंकल्प पैं माझा॥ ६५॥ धरोनियां माझ्या स्वरूपाचा आधार। मीचि कृष्णीं कृष्णरूप अवतार। करूनि स्वलीला नाना चरित्र। अंतीं सामावें साचार मजमाजीं मीच॥ ६६॥ माझ्या निजस्वरूपाचेनि बळें। मीच कृष्णरूपें खेळ खेळें। अंतीं मजमाजीं मी मिळें। निजात्ममेळें निजनिष्ठा॥ ६७॥ एक नर एक नारायण। परस्परें तें जाण अभिन्न। यालागीं पूर्णत्वें अर्जुन। आपण्या आपण स्वयें देखे॥ ६८॥ बाप कृपाळु कृपानिधि। उपदेशिला युद्धसंधीं। परी लाविली जे समाधी। ते न मोडे त्रिशुद्धी कल्पांतकाळीं॥ ६९॥ नाहीं स्थानशुद्धी चोखट। सैंघ रथांचे घडघडाट। सुटतां शस्त्रांचे कडकडाट। लाविली निर्दुष्ट परमार्थनिष्ठा॥ २७०॥ कैशी लाविली समाधी। जी न मोडेच महायुद्धीं। शेखीं कृष्णावसान अवधीं। तोचि बोध उद्बोधी परिपूर्णत्वें॥ ७१॥ ज्यासी गीता उपदेशी श्रीकृष्ण। त्यासी न बाणे पूर्णपण। ऐसें बोलतां वचन। परम दूषण वाचेसी॥ ७२॥ ते वाचा गलितकुष्ठें झडे। तीसी विकल्पाचे पडती किडे। ते वाचाचि समूळ उडे। ‘कृष्णोक्तीं न घडे बोध’ म्हणतां॥ ७३॥ ‘गीताउपदेशें पूर्णपण। नव्हे’ ऐसें म्हणतां जाण। वाग्देवता कांपे आपण। इतरांचा कोण पडिपाडू॥ ७४॥ गीता ऐके पाहे पढे। ज्यासी गीतास्मरण घडे। त्यासी परिपूर्णत्व स्वयें जोडे। मा उपदेशें नातुडे परिपूर्णत्व कैसें॥ ७५॥ गीतार्थाचें पूर्णपण। वक्ता जाणे श्रीकृष्ण। कां श्रोता जाणे अर्जुन। त्यासी ते खूण बाणली॥ ७६॥ सारांश काढूनि वेदार्था। श्रीकृष्णें प्रकट केली गीता। जेथील अभिप्रायो पाहतां। जोडे आइता निजमोक्ष॥ ७७॥ परदेशी जाहला होता वेदान्त। त्यासी सहाय जाहला गीतार्थ। तेणें बळें मतें समस्त। जिणोनि समर्थ तो झाला॥ ७८॥ कृष्णनि:श्वासीं जन्मले वेद। गीता श्रीकृष्णमुखें प्रगटली शुद्ध। यालागीं गीतार्थ अगाध। धडौते वेद तेणें जाहले॥ ७९॥ वेदें आप्त केले तिनी वर्ण। दुरावले स्त्रीशूद्रादि जन। न शिवेचि त्यांचे कान। हें वेदांसी न्यूनपण पैं आलें॥ २८०॥ तें वेदाचें फेडावया उणें। गीता प्रगट केली श्रीकृष्णें। गीतेचेनि श्रवणें पठणें। उद्धरणें समस्तीं॥ ८१॥ अर्जुनाचे प्रीतीकारणें। गीतार्थ प्रकाशिला श्रीकृष्णें। ते गीतेचेनि श्रवणें पठणें। उद्धरणें जडजीवीं॥ ८२॥ असो अगाध गीतामहिमान। तेणें गीतार्थें तो अर्जुन। करूनि आपुलें सांत्वन। जाहला सावधान प्रकृतिस्थ॥ ८३॥
बन्धूनां नष्टगोत्राणामर्जुन: साम्परायिकम्।
हतानां कारयामास यथावदनुपूर्वश:॥ २॥
यादव निमाले कुळवंशेंसीं। गोत्रज नाहीं कर्मांतरासी। वज्र राहिला द्वारकेसी। ते विधी अर्जुनासी करणें पडली॥ ८४॥ ‘मी पावलों निष्कर्म ब्रह्म। तो मी न करीं अंत्येष्टीकर्म’। ऐसा ज्ञानगर्वोप्रक्रम। तोही सूक्ष्म भ्रम अर्जुनीं नाहीं॥ ८५॥ ‘कर्मण्यकर्म य: पश्येत्’। हा अर्जुनास बाणला पूर्णदंश। तेणें तो अंत्येष्टीकर्मास। स्वयें सावकाश करिता जाहला॥ ८६॥ प्रथम ज्येष्ठांचें दहन। पाठीं कनिष्ठांचें जाण। तैसेंचि करी पिंडदान। तिळतर्पण सर्वांचें॥ ८७॥ उत्तरक्रिया करूनि संपूर्ण। द्वारकेसी आला अर्जुन। तेथेंही वर्तलें आने आन। समुद्र दारुण क्षोभला॥ ८८॥
द्वारकां हरिणा त्यक्तां समुद्रोऽप्लावयत्क्षणात्।
वर्जयित्वा महाराज श्रीमद्भगवदालयम्॥ २३॥
नित्यं सन्निहितस्तत्र भगवान् मधुसूदन:।
स्मृत्याशेषाशुभहरं सर्वमङ्गलमङ्गलम्॥ २४॥
द्वारका सांडूनि गेला श्रीकृष्ण। तेथें समुद्र येऊनि आपण। बुडविली न लागतां क्षण। पळाले जन हाहाभूत॥ ८९॥ द्वारका बुडविली संपूर्ण। राखिलें भगवंताचें स्थान। जो आला पाताळींहून। कुशनिर्दळण करावया॥ २९०॥ तें भगवंताचें स्थान। समुद्र न करीचि निमग्न। तेथें हरीचें सन्निधान। नित्य जाण स्फुरद्रूप॥ ९१॥ ज्याचें करितांचि स्मरण। महापातकां निर्दळण। सकळ मंगळाचेंआयतन। तें हरीचें स्थान उरलें असे॥ ९२॥ ते द्वारकेमाजीं नित्यपूजा। अद्यापि होतसे गरुडध्वजा। ऐक परीक्षिती महाराजा। तें अधोक्षजाचें स्थान॥ ९३॥
स्त्रीबालवृद्धानादाय हतशेषान् धनञ्जय:।
इन्द्रप्रस्थं समावेश्य वज्रं तत्राभ्यषेचयत्॥ २५॥
एवं द्वारका जालिया निमग्न। उरले बाल वृद्ध स्त्रीजन। त्यांसी घेऊनियां अर्जुन। निघाला आपण इंद्रप्रस्था॥ ९४॥ यादव प्रभासापर्यंत। गेले ते निमाले समस्त। उरले जे द्वारकेआंत। वज्रादिकां समवेत अर्जुन निघे॥ ९५॥ एवं घेऊनियां समस्तांसी। पार्थ आला इंद्रप्रस्थासी। राज्यधर यादववंशीं। तेथ वज्रासी अभिषेकी॥ ९६॥ अनिरुद्धाचा पुत्र वज्र। यादववंशीं राज्यधर। अभिषेकूनि अर्जुनवीर। निघे सत्वर धर्माप्रती॥ ९७॥
श्रुत्वा सुहृद्वधं राजन्नर्जुनात्ते पितामहा:।
त्वां तु वंशधरं कृत्वा जग्मु: सर्वे महापथम्॥ २६॥
निजधामा गेला श्रीपती। अर्जुनें सांगतां धर्माप्रती। तुज राज्य देऊनि परीक्षिती। लागले महापंथीं तत्काळचि॥ ९८॥ निजधामा गेला श्रीकृष्ण। ऐकतां कुंत्या वनीं सांडिला प्राण। द्रौपदीसहितपांचही जण। महांपथीं जाण निघाले॥ ९९॥
य एतद्देवदेवस्य विष्णो: कर्माणि जन्म च।
कीर्तयेच्छ्रद्धया मर्त्य: सर्वपापै: प्रमुच्यते॥ २७॥
देवाधिदेव सर्वेश्वर। त्याचे मत्स्यकूर्मादि अवतार। जन्मकर्मादि नाना चरित्र। गाती ते पवित्र पुण्यराशी॥ ३००॥ तेंचि चरित्र तत्त्वतां। श्रद्धायुक्त गीतीं गातां। प्रयागादि समस्त तीर्थां। होय पवित्रता त्याचेनि॥ १॥ श्रद्धायुक्त हरिकीर्तन। त्याचे पवित्रतेसमान। आन नाहीं गा पावन। तुझी आण गा परीक्षिती॥ २॥ ते तूं ‘श्रद्धा’ कोण म्हणसी। जेवीं धनलोभी धनासी। गुळीं आवडी माकोडॺांसी। तैसी कीर्तनासी निज आवडी॥ ३॥ जेवीं शिणतां काळे बहुतें। वंध्या प्रसवे एकोलतें। ते कळवळी जैशी त्यातें। तेवीं कीर्तनातें अतिप्रीती॥ ४॥ जो कीर्तनाचेनि वैभवें। हरिचरित्र गावया सद्भावें। पतंगाच्या परी ऐसें व्हावें। ‘श्रद्धा’ त्या नांवें कुरुराया॥ ५॥ ऐशिया श्रद्धासंपत्तीं। वर्णितां भगवद्गुणकीर्ती। श्रद्धाळुवा परम प्राप्ती। जाण निश्चितीं नृपनाथा॥ ६॥ जरी आपण परमेश्वर। स्वलीला धरी नानावतार। तरी श्रीरामकृष्णचरित्र। अति गंभीर पावनत्वें॥ ७॥ श्रीकृष्णाची चोरी गीतीं गातां। सुवर्णस्तेया पावनता। कृष्णव्यभिचार वर्णितां। गुरुतल्पगता हरी दोष॥ ८॥ पूतनापय:पानशोषण। हें चरित्र करितां पठण। सुरापानादि दोष दारुण। हरती संपूर्ण विश्वासकांचे॥ ९॥ राक्षसकुळींचा रावण। परी तो जातीचा शुद्ध ब्राह्मण। नित्यकरी वेदपठण। ब्रह्मयाचा जाण तो पणतू॥ ३१०॥ त्याचें सकुळ निर्दळण। श्रीराम करी आपण। तें चरित्र करितां पठण। ब्रह्महत्या जाण नासती॥ ११॥ धर्मसाह्यकारी श्रीकृष्ण। केलें पांडवांचें रक्षण। त्या भारताचेनि श्रवणें जाण। निमाले ब्राह्मण वांचविले॥ १२॥ अठरा ब्रह्महत्या जनमेजयासी। अठरा पर्वें सांगोनि त्यासी। निमाल्या उठविलें द्विजांसी। कृष्णकीर्ति ऐसी पावन॥ १३॥ ऐकतां श्रीरामकृष्णकीर्ती। महापातकें बापुडीं किती। पायां लागती चारी मुक्ती। श्रद्धासंपत्ती कीर्ती गातां॥ १४॥ श्रद्धेचिया अति संपत्ती। आवडीं गातां श्रीकृष्णकीर्ती। सहजें सायुज्यता पावती। देहस्थिती असतांही॥ १५॥ हरिकीर्ति कीर्तन ज्याच्या ठायीं। तोही वर्ततां दिसे देहीं। परी देहीं ना तो हरीच्या ठायीं। हरि त्याचे हृदयीं अवघाचि॥ १६॥ तोही अवघा हरी भीतरीं। हरि त्या सबाह्य अभ्यंतरीं। परीक्षिती ऐशियापरी। कीर्तिवंत संसारीं नांदती॥ १७॥ यालागीं हरिकीर्तनापरतें। सुगम साधन नाहीं एथें। जे विनटले हरिकीर्तनातें। ते देहबंधातें नातळती॥ १८॥ कृष्णकीर्तनें उजळली स्थिती। ते मैळेना कदा कल्पांतीं। जरी देहकर्में करिती। तरी जाहली स्थिती मैळेना॥ १९॥ आकाश पर्जन्यें नव्हे वोलें। कां रविबिंब थिल्लरजळें। असोनियां तेणें मेळें। कदाकाळें तिंबेना॥ ३२०॥ तेवीं हरिकीर्ति कीर्तन कल्लोळें। जयाची निष्कामदशा उजळे। ते वर्ततां देह कर्ममेळें। देहविटाळें अलिप्त॥ २१॥ निजभक्तांचें शरीरकर्म। स्वयें चालवी पुरुषोत्तम। यालागीं भक्तांसी कर्मभ्रम। अधमोत्तम बाधीना॥ २२॥ भक्तांअभक्तांची कर्मगती। भगवंत चालवी निश्चितीं। तेथ भक्तांची कां अलिप्तस्थिती। अभक्त कां होती अतिबद्ध॥ २३॥ करितां श्रीकृष्णकीर्तिकीर्तन। भक्तांचा निरसे देहाभिमान। यालागीं ते अलिप्त जाण। अभक्तां बंधन अहंभावें॥ २४॥ हे दशा मागितल्या पावती। ऐसें न घडे गा परीक्षिती। आवडीं गातां कृष्णकीर्ती। सहजें हे स्थिति ठसावे॥ २५॥ श्रीकृष्णकीर्तिकीर्तनें। बहुतांचें संसारधरणें। उठविलें स्वयें श्रीकृष्णें। चरित्रपठणें तुष्टोनी॥ २६॥ कृष्णकीर्तिकीर्तनगोडी। अहंकाराची बांदवडी फोडी। जीवाचें जीवबंधन तोडी। नि:सीम आवडीं कीर्ति गातां॥ २७॥ एवं कृष्णकीर्तिकीर्तनें। भक्तीं ‘कृष्णपदवी’ स्वयें घेणें। जग उद्धरावयाकारणें। कीर्ति श्रीकृष्णें विस्तारिली॥ २८॥ जन्मापासूनि अंतपर्यंत। श्रीकृष्णचरित्र परमाद्भुत। तुज म्यां सांगितलें साद्यंत। परमामृत निजसार॥ २९॥
इत्थं हरेर्भगवतो रुचिरावतार-
वीर्याणि बालचरितानि च शन्तमानि।
अन्यत्र चेह च श्रुतानि गृणन्मनुष्यो
भक्तिं परां परमहंसगतौ लभेत॥ २८॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे वैयासिक्यामष्टादशसाहस्र्यां पारमहंस्यां संहितायामेकादशस्कंधेएकत्रिंशोऽध्याय:॥ ३१॥ समाप्त एकादशस्कंध:॥
जन्मापासून ज्ञानघन। श्रीकृष्णचरित्र अतिपावन। ज्याचे संगतीं गोवळे जाण। अज्ञान जन उद्धरिले॥ ३३०॥ ज्याचिया व्यभिचारसंगतीं। गोपी उद्धरल्या नेणों किती। कृष्ण श्यामसुंदरमूर्ती। अभिलाष चित्तीं दृढ धरितां॥ ३१॥ देखोनि सुंदर कृष्ण मूर्ती। गायी वेधल्या तटस्थ ठाती। पशु उद्धरले कृष्णसंगतीं। मा गोपी नुद्धरती कैसेनि॥ ३२॥ गायीगोपिकांचें नवल कोण। वृंदावनींचे तृण तरु पाषाण। कृष्णसंगें तरले जाण। ऐसा ज्ञानघन श्रीकृष्ण॥ ३३॥ विषें भरोनियां निजस्तना। पूतना घेऊं आली प्राणा। तेही कृष्णसंगें जाणा। त्याच क्षणा उद्धरली॥ ३४॥ कंसशिशुपाळादिकांसी। द्वेषेंचि तारी हृषीकेशी। चंदन लावितां अंगासी। अंगसंगें कुब्जेसी तारिलें॥ ३५॥ उन्मत्त मदें अतिमूढ। मारूं आला कुवलयापीड। त्यासी मोक्षाचा सुरवाड। उद्धरिला सदृढ कृष्णाभिघातें॥ ३६॥ अरिष्ट करूं आला श्रीकृष्णालागीं। तो अरिष्ट तारिला धरूनि शिंगीं। अघासुरें गिळितां वेगीं। चिरोनि दो भागीं उद्धरी कृष्ण॥ ३७॥ कृष्णलक्षें लावूनि टाळी। बक ध्यानस्थ यमुनाजळीं। तोही श्रीकृष्णा सवेग गिळी। करूनि दोन फाळी तारिला कृष्णें॥ ३८॥ उडवूं आला तृणावर्त। त्यासी कृष्णें भवंडिला आवर्त। अंगसंगेंचि कृष्णनाथ। कृपावंत वैरियां॥ ३९॥ गोपाळ नेले चोरचोरूं। ठकूं आला व्योमासुरु। त्याचाही केला उद्धारु। मोक्षें उदारु श्रीकृष्ण॥ ३४०॥ केशिया कंसाचा घोडा। श्रीकृष्णें मारूनि तारिला फुडा। मल्ल मर्दूनिमालखडां। मोक्षाचा उघडा सुकाळ केळा॥ ४१॥ काळिया नाथिला विखारु। वृक्षीं उपाडिला वत्सासुरु। भवाब्धीमाजीं श्रीकृष्ण तारूं। संगें उद्धारु जडमूढां॥ ४२॥ जिंहीं खेळविला चक्रपाणी। ज्यांचे घरींचें प्याला पाणी। ज्यांचें चोरूनि खादलें लोणी। त्याही गौळणी उद्धरिल्या॥ ४३॥ रुक्मया तारिला विटंबोनी। बाण तारिला भुजा छेदोनी। कुश तारिला निर्दळूनी। मोक्षदानी श्रीकृष्ण॥ ४४॥ जे जे मिनले सोयरिके। जे कां पाहूं आले कौतुके। ते ते तारियेले यदुनायकें। दर्शनसुखें निववूनि॥ ४५॥ पांडव तारिले पक्षपातें। वैरी तारिले शस्त्रघातें। यापरी श्रीकृष्णनाथें। उद्धरिलीं बहुतें निजसंगें॥ ४६॥ वैरी तारिले द्वेषभावें। भक्त पावले भजनभावें। गोपी तारिल्या संगानुभवें। ज्या जीवें भावें अनुसरल्या॥ ४७॥ गायी तारिल्या संरक्षणेंसीं। मयूर तारिले मोरविशीं। वृक्ष तारिले तुरंबोनि घोसीं। तारक हृषीकेशी पूर्णब्रह्मत्वें॥ ४८॥ पूर्ण ब्रह्म श्रीकृष्णावतार। ज्ञानप्राधान्य लीला विचित्र। त्यांत परम पावन बाळचरित्र। वंद्य सर्वत्र सज्ञानां॥ ४९॥ घेऊनि षड्गुणैश्वर्यसंपत्ती। अवतरली श्रीकृष्णमूर्ती। यश-श्री-औदार्य-कीर्ती। ज्ञान-वैराग्यस्थितीअभंग॥ ३५०॥ इतर अवतारीं अवतरण। तेथें गुप्त केले साही गुण। कृष्णावतार ब्रह्म परिपूर्ण। पूर्ण षड्गुण प्रकाशिले॥ ५१॥ यालागीं श्रीकृष्णावतारी जाण। अनवच्छिन्न साही गुण। त्याचेनि अंगसंगें उद्धरण सर्वांसी जाण सर्वदा॥ ५२॥ उद्धरले श्रीकृष्णसंगतीं। अथवा कृष्णाचिया अतिप्रीतीं। तरले देखतां श्रीकृष्णमूर्ती। हें नवल निश्चितीं नव्हे एथें॥ ५३॥ हेचि पैं गा श्रीकृष्णकीर्ती। अत्यावडीं गातां गीतीं। उद्धरले नेणों किती। अद्यापि उद्धरती श्रद्धाळू॥ ५४॥ आवडीं गातां श्रीकृष्णकीर्तीं कीर्तिमंतां लाभे परम भक्ती। जीतें ‘परा’ ऐसें म्हणती। ते चौथीभक्ती घर रिघे॥ ५५॥ आर्तजिज्ञासु-अर्थार्थी। त्यांची सहजें राहे स्थिती। अखंड प्रकटे चौथीभक्ती। श्रीकृष्णकीर्ती स्वयें गातां॥ ५६॥ आवडीं गातां श्रीकृष्णकीर्ती। सहजें होय विषयविरक्ती। शमदमादि संपत्ती। पायां लागती सहजेंचि॥ ५७॥ श्रीकृष्णकीर्तीची जपमाळी। जो अखंडजपे जिव्हामूळीं। श्रीकृष्ण सर्वकाळीं। त्याजवळी सर्वदा॥ ५८॥ आदरें जपतां श्रीकृष्णकीर्ती। श्रीकृष्ण प्रकटे सर्वभूतीं। सहजें ठसावे चौथी भक्ती। परमात्मस्थिती समवेत॥ ५९॥ जे भक्तीमाजीं जाण। पूज्य पूजक होय श्रीकृष्ण। मग पूजाविधिविधान। देवोचि आपण स्वयें होये॥ ३६०॥ ‘अत्र गंध धूप दीप’ जाण। अवघेंचि होय श्रीकृष्ण। हें चौथे भक्तीचें लक्षण। आपणा आपण स्वयें भजे॥ ६१॥ चौथे भक्तीचें विंदान। भोग्य भोक्ता होय श्रीकृष्ण। कृष्णेंसीं वेगळेपण। भक्तां अर्धक्षण असेना॥ ६२॥ ते काळीं भक्तांसी जाण। देह गेह होय श्रीकृष्ण। जात गोत श्रीकृष्णचि आपण। संसार संपूर्ण श्रीकृष्ण होये॥ ६३॥ ऐशी लाहोनि चौथी भक्ती। परमहंसाची श्रीकृष्णगती। ते कृष्णस्वरूप स्वयें होती। श्रीकृष्णकीर्ती वर्णितां॥ ६४॥ जे स्वरूपीं नाहीं च्युती। तें कृष्णस्वरूप निश्चितीं। भक्त तद्रूप स्वयें होती। श्रीकृष्णकीर्ती वर्णितां॥ ६५॥ श्रीकृष्णकीर्तीचें एकेक अक्षर। चहूं वेदांचें निजजिव्हार। सकळ शास्त्रांचें परम सार। श्रीकृष्णचरित्र कुरुराया॥ ६६॥ जे वेदांचें जन्मस्थान। सकळ शास्त्रांचें समाधान। षड्दर्शनां बुझावण। तो आठवा श्रीकृष्ण पूर्णावतार॥ ६७॥ अनंत अवतार झाले जाण। परी श्रीकृष्णावतार ज्ञानघन। त्याचें चरित्र अतिपावन। भवबंधनच्छेदक॥ ६८॥ त्या श्रीकृष्णाची कृष्णकीर्ती। आदरें आठवितां चित्तीं। होय भवबंधनाची समाप्ती। जाण निश्चितीं नृपनाथा॥ ६९॥ वैभव श्रीकृष्णकीर्तीसी। वैराग्य श्रीकृष्णकीर्तीपासीं। श्रीकृष्णकीर्ती वसे ज्यां मानसीं। ते कळिकाळासी नागवती॥ ३७०॥ आळसें स्मरतां कृष्णकीर्ति। सकळ पातकें भस्म होती। ते श्रीकृष्णकीर्ति जे सदा गाती। त्यांसी चारी मुक्ती आंदण्या॥ ७१॥ श्रीकृष्णकीर्तीचें एकेक अक्षर। निर्दळी महापातकसंभार। मोक्ष देऊनि अतिउदार। जगदुद्धारकारक॥ ७२॥ बहु अवतारीं अवतरे देवो। परी ये अवतारींचा नवलावो। ज्ञानप्राधान्य लीला पहा हो। अगम्य अभिप्रावो ब्रह्मादि देवां॥ ७३॥ जन्मापासूनजो जो देहाडा। तो तो नीच नवा पवाडा। ब्रह्मसुखाचा उघडा। केला रोकडा सुकाळ॥ ७४॥ अवतारांमाजीं श्रीकृष्ण। निजनिष्टंक ब्रह्म पूर्ण। त्याचें चरित्र ज्ञानघन। पठणें पावन जनहोती॥ ७५॥ ऐशी पावन कृष्णकीर्ती। पढतां वाचक उद्धरती। श्रद्धेनें जे श्रवण करिती। तेहीतरती भवसिंधु॥ ७६॥ कलियुगीं जन मंदमती। त्यांसी तरावया सुगमस्थितीं। श्रीकृष्ण पावन कीर्ती। कृपेनें निश्चितीं विस्तारली॥ ७७॥ ऐसी पावन भगवत्कीर्ती। विस्तारली श्रीभागवतीं। त्यांत दशमस्कंधाप्रती। श्रीकृष्णकीर्ती अतिगोड॥ ७८॥ उपजल्या दिवसापासूनी। चढोवढी प्रतिदिनीं। कीर्ती विस्तारी चक्रपाणी। दीनजनीं तरावया॥ ७९॥ धरूनी नर-नटाचा वेष। अवतरला हृषीकेश। तेथें नानाचरित्रविलास। दिवसेंदिवस विस्तारी॥ ३८०॥ त्याहीमाजीं बाळचरित्र। मधुर सुंदर अतिपवित्र। मालखडां जें केलें क्षात्र। परम पवित्र पावनत्वें॥ ८१॥ जरासंध पराभवून। काळयवनातें निर्दाळून। तें अतिविचित्र विंदान। लाघवी श्रीकृष्ण स्वयें दावी॥ ८२॥ रुक्मया रणीं विटंबून॥ शिशुपाळादि वीर गांजून। कृष्ण करी भीमकीहरण। ते परम पावन हरिलीला॥ ८३॥ पट्टमहिषींचें वरण। भौमासुराचें निर्दळण। पारिजाताचें हरण। पाणिग्रहण सोळासहस्रांचें॥ ८४॥ समुद्रीं वसवूनि द्वारावती। निद्रा न मोडतां निश्चितीं। मथुरा आणिली रातोरातीं। हे अभिनव कीर्ती कृष्णाची॥ ८५॥ वत्सें वत्सप होऊनि आपण। आपुलें दावी पूर्णपण। ब्रह्मादिकां न कळे जाण। अवतारी श्रीकृष्ण पूर्णांशें॥ ८६॥ खाऊनि भाजीचें पान। तृप्त केले ऋषिजन। ऐसीं चरित्रें ज्ञानप्राधान्य। परम पावन आचरला॥ ८७॥ ऐसीश्रीकृष्णलीला परमाद्भुत। पाठकां करी परम पुनीत। ते दशमामाजीं समस्त। कथा साद्यंत सांगितली॥ ८८॥ एकादशाची नवल स्थिति। मूळापासूनि परम प्राप्ती। ज्ञान-वैराग्य-भक्ती-मुक्ती। स्वमुखें श्रीपती संवादला॥ ८९॥ प्रथमाध्यायीं वैराग्य पूर्ण। मुख्य अधिकाराचें लक्षण। नारदवसुदेवसंवाद जाण। भूमिशोधन साधकां॥ ३९०॥ तेथें निमिजायंतसंवादन। निर्भयाचें कोण स्थान। उत्तम भागवत ते कोण। मायातरण कर्म ब्रह्म॥ ९१॥ इत्यादि विदेहाचे नव* प्रश्न। नवांचीं नवही उत्तरेंपूर्ण। तेचि नव नांगरण। क्षेत्रकर्षण अतिशुद्ध॥ ९२॥ ते पंचाध्यायींच्या अंतीं। देवीं प्रार्थिला श्रीपती। कृष्ण कुलक्षयाच्या प्रांतीं। निजधामाप्रती निघेल॥ ९३॥ हें उद्धवें जाणोनि आपण। निर्वेद केला जो संपूर्ण। तेचि कल्प नाकाशाचें निर्दळण। पालव्या छेदन विकल्पांच्या॥ ९४॥ कामलोभांचे गुप्त खुंट। आडवूं लागले उद्भट। ते समूळ केले सपाट। अतितिखट अनुतापें॥ ९५॥ क्रोधाचिया अतिजाडी। समूळ उपडिल्या महापेडी। शांति निवडक चोखडी। समूळ उपडी मूळेंसीं॥ ९६॥ उद्धवचातकआर्तिहरण। वोळला श्रीकृष्ण कृपा-घन। क्षेत्र वोल्हावलें सबाह्यपूर्ण। लागली संपूर्ण निजबोध वाफ॥ ९७॥ तेथें पूर्णब्रह्म निजबीज। चाडें तंतु सर्व परित्यज्य। श्रवणनळें अधोक्षज। पेरिलेंचि सहज स्वयें पेरी॥ ९८॥ यदुअवधूतसंवादस्थिती। चोविसां गुरूंची उपपत्ती। आगडु खणविला क्षेत्राप्रती। वोढाल पुढती रिघों न शके॥ ९९॥ चिकभरित जाहल्या पिकातें। भोरडॺा वोरबडिती तेथें। ते दशमाध्यायीं श्रीअनंतें। उडविलीं मतें भजन गोफणा॥ ४००॥
* भागवतधर्म भगवद्भक्त। माया कैसी असे नांदत। तिचा तरणोपाय येथ। केवीं पावत अज्ञानी॥ येथें कैसें असे परब्रह्म। कासया नाम म्हणित्रे कर्म। अवतारचरित्रसंख्या परम। अभक्तां अधम गति कैसी॥ कोणे युगीं कैसा धर्म। सांगावा जी उत्तमोत्तम। ऐसे नव प्रश्न परम। जनकें सवर्म पुशिले॥’—(अ०२, ओं० २७३—७५)
अकरावे अध्यायीं जाणा। हुरडा ओंब्या आणि घोळाणा। तिळगुळेंसीं चाखविलें सुजाणां। मुक्तलक्षणांचेनि हातें॥ १॥ ते श्रियेचे भोक्ते एथ। सत्संगतीं भगवद्भक्त। ते बारावे अध्यायीं साद्यंत। कृपायुक्त सांगितले॥ २॥ विषयांची विषयावस्था। बाधक नोहे साधकांच्या चित्ता। तेचि त्रयोदशीं कथा। जाण तत्त्वतां सांगितली॥ ३॥ एवं तेराव्या अध्यायाप्रती। जाहली पिकाची पूर्ण निष्पत्ती। तेचि हंसगीत उपपत्ती। समाधि श्रीपती सांगोनि गेला॥ ४॥ समाधीं सांठवलें जें पीक। तें कैसेनि पावती साधक। तदर्थीं भजनपूर्वक। चौदावा देख निरूपिला॥ ५॥ पीक चढतचढतां हातीं। माझारीं ऋद्धिसिद्धी झडपोनि नेतीं। ते सिद्धि त्यागाची उपपत्ती। पंधराव्याप्रती दाविली॥ ६॥ पीक न माये त्रिजगतीं। तरी त्याच्या सांठवणा किती। त्या षोडशाध्यायीं विभूती। उद्देशें श्रीपती दावूनि गेला॥ ७॥ क्षेत्र अधिकारी एथें जाण। चारी आश्रम चारी वर्ण। सतरावा अठरावा निरूपण। वांटे संपूर्ण विभागिले॥ ८॥ एकूणिसाव्या अध्यायीं जाण। करूनि पिकाची संवगण। जेणें कोंडेनि वाढले कण। तो कोंडा सांडूनि जाड कण घ्यावे॥ ९॥ ऐसे निवडिले जो शुद्ध कण। तेथें प्राप्ताप्राप्तीचें लक्षण। त्रिविध विभाग निरूपण। विसावा जाण निरूपिला॥ ४१०॥ जे भागा आले शुद्ध कण। ते राखावे आपले आपण। गुणदोषांचे चोरटे जाण। खळें फोडून कण नेती॥ ११॥ सर्वांच्या भागा येताती कण। परी खावों न लाहती चोरा भेण। थोर थोर नागविले जाण। यालागीं संरक्षण दृढ कीजे॥ १२॥ गुणदोषांची नवलकथा। मिळणीं मिळोनि आप्तता। ठकूनि नेती सर्वस्वतां। दाणाही हातां नेदिती येवों॥ १३॥ गुणदोष आतुर्बळी। सज्ञानातें तत्काळ छळी। जो गुणदोषांतें निर्दळी। तो महाबळी तिहीं लोकीं॥ १४॥ हे शिवकण उद्धवें ऐकतां। तो म्हणे चोरांचा प्रतिपाळिता। तुझा वेदचि गा तत्त्वतां। गुणदोष प्रबळता त्याचेनि अंगें॥ १५॥ मुख्यचोरांचा कुरुठा। तुझा वेदचि महाखाटा। त्यामाजीं गुणदोषाचा घरटा। नाना चेष्टा तो शिकवी॥ १६॥ एवं प्रतिपाळोनि गुणदोषांसी। वेद नागवी समस्तांसी। एवं उद्धवें वेदांच्या शिसीं। कुडेपणासी स्थापिलें॥ १७॥ तो वेदानुवाद नव्हे कुडा। ऐसा प्रतिपदीं दिधला झाडा। ते निरूपणीं अति चोखडा। अध्याय रोकडा एकविसावा॥ १८॥ चोर कोणे मार्गें येती। पिकलें पीक ज्या वाटां नेती। तो मार्ग बुजावया निश्चितीं। तत्त्वसंख्या उपपत्ती बाविसावा॥ १९॥ मुख्यत्वें ज्ञानाचें संरक्षण। दृढ शांतीचें कारण। तें भिक्षुगीतनिरूपण। स्वयें श्रीकृष्ण सांगोनि गेला॥ ४२०॥ मुख्य चोरांचें चोरटेपण। मनापाशीं असे जाण। ते मनोजयाचें लक्षण। भिक्षुगीत निरूपण तेविसावा॥ २१॥ चोर जन्मती जिचे पोटीं। ते मुख्यत्वें प्रकृति खोटी। पिकल्या पिका करूनि लुटी। लपती शेवटीं तीमाजीं॥ २२॥ आदीं निर्गुण अंतीं निर्गुण। मध्यें मिथ्या प्रकृतीसीं त्रिगुण। हें मुख्य पिकाचें संरक्षण। केलें निरूपण चोविसावा॥ २३॥ मोकळें पीक असतां शेतीं। पशु पक्षी चोर रिघों ने शकती। ते सहज संरक्षणउपपत्ती। निर्गुणोक्तीं पंचविसावा॥ २४॥ स्त्रीकामाची धाडी जाण। सकळ पिकासी नागवण। पुरूरवा नागवला आपण। इतरांचा कोण पडिपाडू॥ २५॥ कामासक्ति करितां जाण। प्रमदाबंदीं पडिले पूर्ण। त्यांसी अनुताप करी सोडवण। हें केलें निरूपण सव्विसावां॥ २६॥ निकोप पीक लागल्या हातीं। त्याची करावया निष्पत्ती। क्रियायोगाची निजस्थिती। सत्ताविसाव्याप्रती प्रकाशिली॥ २७॥ एवं पीक भोगिलें सकळ। त्याचा परिपाकपक्वान्न सबल। अठ्ठाविसावा अमृतफळ। अतिरसाळ निजगोडॺा॥ २८॥ मृदु मधुर अतिअरुवार। तेणें वासेंचि निवे जेवणार। त्याचा सेवितां ग्रासमात्र। सबाह्यअभ्यंतर नित्यतृप्ती॥ २९॥ आकांक्षेसी निवाली भूक। सुखावरी लोळे तृप्तिसुख। तो हा अठ्ठाविसावा देख। अलोकिक निजगोडॺा॥ ४३०॥ अठ्ठाविसाव्याची निजगोडी। चाखाया अतिआवडीं। ब्रह्मादिकां अवस्था गाढी। चवी चोखडी अनुपम॥ ३१॥ हें जीव्हेवीण जेवण। रसनेवीण गोडपण। अदंताचे दांत पाडूनि पूर्ण। आपुली आपण चवी चाखे॥ ३२॥ श्रीकृष्णें परवडी ऐशी। ताट केलें उद्धवासी। एका जनार्दन चरणींची माशी। सुखें त्या रसासी स्वयें सेवी॥ ३३॥ जेथ रिगमु नाहीं थोरथोरांसी। तेथें सुखेंचि रिघे माशी। एवं धाकुटे जे होती सर्वांशीं। कृष्णरस त्यांसी सुसेव्य॥ ३४॥ अगम्य योगें योगभांडार। गुह्यज्ञानें ज्ञानगंभीर। परम सुखाचें सुखसार। अतिगंभीर अठ्ठाविसावा॥ ३५॥ या जेवणीं जे धाले नर। त्यांचे तृप्तीचे सुखोद्गार। तो एकूणतिसावा सधर। अतिविचित्र निरूपण॥ ३६॥ एकूणतिसाव्याची स्थिती। दृढ आकळली होय हातीं। तैं सकळ भागवताची गती। ये धांवती तयापाशीं॥ ३७॥ एकूणतिसावा अध्यावो। साध्यसाधना एकात्मभावो। निर्दळोनि अहंभावो। परमानंदें पहा हो उद्गार देत॥ ३८॥ सकळ भोजनां मंडण। तांबूल आणि चंदन। तो तिसावा एकतिसावा जाण। श्रीकृष्णनिर्याण निजबोधु॥ ३९॥ येणें भोजनें जे नित्य तृप्त। त्यांसी ममताबाध नव्हे प्राप्त। सकळ कुळ निर्दळूनि एथ। निजधामा निश्चित हरि गेला॥ ४४०॥ पूर्ण ब्रह्मानुभव ज्यासी। एथवरी ममता नसावी त्यासी। हें स्वांगें दावूनि हृषीकेशी। निजधामासी स्वयें गेला॥ ४१॥ श्रीभागवत महाक्षेत्र। तेथें ब्रह्मा मुख्य बीजधर। नारद तेथें मिरासीकर। पेरणी विचित्र तेणें केली॥ ४२॥ तेथें श्रीव्यासें अतिशुद्ध। बांधारे घातले दशविध। पीक पिकलें अगाध। स्वानंदबोध निडारे॥ ४३॥ तेथ शुक बैसला सोंकारा। तेणें फोडिला हरिकथा पागोरा। पापपक्ष्यांचा थारा। उडविला पुरा नि:शेष॥ ४४॥ त्याची एकादशीं जाण। उद्धवें केली संवगण। काढिले निडाराचे कण। अतिसघन कृष्णोक्तीं॥ ४५॥ तेथ नानायुक्ति पडिपाडीं। उत्तमोत्तम प्रश्नपरवडी। केलीं पक्वान्नें चोखडीं। त्यांची नीच नवी गोडी अविनाशी॥ ४६॥ ते अविनाशी निजगोडी। पदोपदीं अतिचोखडी। एकादशामाजीं रोकडी। उद्धवाचिये जोडी उपकार जगा॥ ४७॥ त्या उद्धवाचे मागिले पंक्तीं। त्यक्तोदक श्रवणार्थी। शुकमुखें परीक्षिती। निजात्मतृप्तीं निमाला॥ ४८॥ त्या समर्थाचिये पंक्तीं। भावार्थदीपिका धरोनि हातीं। श्रीधरें दावितां पदपदार्थीं। निजात्मस्थितीं निवाला॥ ४९॥ तेथ देशभाषा-पदपक्षेंसीं। एका जनार्दन कृपेची माशी। तृप्त होय अवघ्या सरशीं। निषेध तिशी असेना॥ ४५०॥ एका-जनार्दनी मांजर वेडें। भावार्थदीपिका उजियेडें। हे रस देखोनि चोखडे। ताटापुढें पैं आलें॥ ५१॥ ‘मीयोंमीयों’ करितां स्मरण। कृपेनें तुष्टले सज्जन। शेष प्रसाद देऊनि जाण। संतृप्त पूर्ण मज केलें॥ ५२॥ एका जनार्दनाचें पोसणें। मी मांजर जाहलों नीचपणें। चाटितां संतांचें शेषभाणें। म्यां तृप्ती पावणें परिपूर्ण॥ ५३॥ हो कां त्या समर्थांच्या ताटीं। ब्रह्मरसें पूर्ण भरली वाटी। ते मी अत्यंत प्रेमें चाटीं। स्वानंदपुष्टीं संतोषें॥ ५४॥ जो काया मनें आणि वाचा। सद्भावें विनीत होय नीचा। तोचि अधिकारी एकादशाचा। हा जनार्दनाचा उपदेश॥ ५५॥ जंव जंव देहीं ज्ञानाभिमान। जंव जंव योग्यता सन्मान। तंव तंव एकादशाचें ज्ञान। सर्वथा जाण अनोळख॥ ५६॥ सर्वभूतीं भगवद्भजन। सद्भावें जंव नुपजे पूर्ण। तंववरी एकादशाचें ज्ञान। सर्वथा जाण कळेना॥ ५७॥ यापरी श्रीभागवतक्षेत्र। पीक पिकलें परम पवित्र। तेथें सुखी होती साधक नर। ज्यांसी अत्यादर सर्वभूतीं॥ ५८॥ एकादश क्षेत्र नव्हे जाण। हा चित्समुद्र परिपूर्ण। येथें जो जैसा होय निमग्न। तो तैसाचि आपण रत्नें लाभे॥ ५९॥ हा एकादश नव्हे निर्धारीं। जीव गजेंद्राच्या उद्धारीं। सवेगवेगें पावला श्रीहरी। ज्ञानचक्र करीं घेऊनी॥ ४६०॥ हेही नव्हे एकादशाची थोरी। अहं—हिरण्यकशिपू विदारी। तो हा प्रकटला नरहरी। भक्तकैवारी कृपापूर्ण॥ ६१॥ गंगा यमुना दोनी साङ्ग। कृष्ण उद्धव उत्तम चांग। गुप्त सरस्वती ज्ञानबोध। त्रिवेणी-प्रयाग एकादश॥ ६२॥ तेथ वैराग्य-माघमासीं जाण। श्रद्धाअरुणोदयीं नित्य स्नान। करितां होऊनि पावन। कृष्णपदवीपूर्ण पावती॥ ६३॥ हेही एकादशाची नव्हे कोटी। कृष्णउद्धवांची गुह्य गोष्टी। हे बहुकल्प कपिलाषष्ठी। पर्वणी गोमटी निजसाधकां॥ ६४॥ ते पर्वकाळीं जे निमग्न। ते तत्काळ पावती कल्याण। बाधूं न शके जन्ममरण। ब्रह्म परिपूर्ण स्वयें होती॥ ६५॥ हा एकादश नव्हे जाण। एकतिसां खाणांचें वृंदावन। एथ नित्य वसे श्रीकृष्ण। स्वानंदपूर्ण निजसत्ता॥ ६६॥ एथपंध्राशतें श्लोक। तेचि पानें अत्यंत चोख। माजीं ज्ञानमंजरीचे घोख। अतिसुरेख शोभती॥ ६७॥ तेथ जे घालिती निजजीवन। ते होती परम पावन। स्वयें ठाकती कृष्णसदन। ब्रह्म परिपूर्णस्वानंदें॥ ६८॥ जे वंदिती मुळींच्या उदका। जे लाविती मूळमृत्तिका। ते वंद्य होती तिहीं लोकां। नित्य निजसखा श्रीकृष्ण जोडे॥ ६९॥ जे पठणरूपें जाणा। प्र्रत्यगावृत्ति प्रदक्षिणा। सद्भावेंकरिती सुजाणा। ते श्रीकृष्णचरणां विनटती॥ ४७०॥ ये कथेच्या विचित्र लीला। जे नित्यघालिती रंगमाळा। ते नागवती कळिकाळा। सदा त्यांजवळा श्रीकृष्ण॥ ७१॥ हें एकादशाचें वृंदावन। जो श्रवणें करी नित्य पूजन। त्यासी प्रसन्न होऊनि श्रीकृष्ण। देहाभिमान निर्दळी॥ ७२॥ तेथ मननाची पुष्पांजळी। जो अनुदिनीं अर्पी त्रिकाळीं। तोही पावे हरिजवळी। निजात्ममेळीं निजनिष्ठा॥ ७३॥ हें श्रीभागवत-वृंदावन। मेळवूनि संत सज्जन। ये कथेचें करी जो व्याख्यान। ते महापूजन निरपेक्ष॥ ७४॥ हें देखूनि महापूजन। संतोषे श्रीजनार्दन। श्रोते वक्ते जे सावधान। त्यांसी निजात्मज्ञान स्वयें देत॥ ७५॥ श्रवणें पठणें मननें। अर्थावबोधव्याख्यानें। एकादशें समान देणें। जाणें तानें त्या नाहीं॥ ७६॥ श्रवण मनन नव्हे पठण। तरी एकादशाचें पुस्तक जाण। ब्राह्मणासी द्यावें दान। विवेकज्ञान तेणें उपजे॥ ७७॥ एकादश द्यावें दान। करावें एकादशाचेंपूजन। करितां एकादशाचें स्मरण। पाप संपूर्ण निर्दळे॥ ७८॥ एकादशसंग्रह जो करी। श्रीकृष्ण तिष्ठे त्याचे घरीं। जो एकादशाची श्रद्धा धरी। ज्ञान त्यामाझारीं स्वयें रिघे॥ ७९॥ श्लोक श्लोकार्ध पादमात्र। नित्य स्मरे ज्याचें वक्त्र। तोही होय परम पवित्र। अतिउदार एकादश॥ ४८०॥ अवचटें जातां कार्यांतरीं। दृष्टी पडे एकादशावरी। तैं पातकां होय रानभरी। आपधाकें दूरी तीं पळती॥ ८१॥ तो एकादश ज्याचे करीं। देव वंदिती त्यातें शिरीं। तो निजांगें जग उद्धरी। एवढी थोरी एकादशा॥ ८२॥ सकळ पुराणांमाझारीं। हा एकादश वनकेसरी। भवगजातें विदारी। क्षणामाझारीं श्लोकार्धें॥ ८३॥ ‘मामेकमेव शरणम्’। याचि श्लोकाचें करितां पठण। मायेचागळा धरोनि जाण। आपधाकें पूर्ण संसार निमे॥ ८४॥ ‘निरपेक्षं मुनिं शान्तम्’। हा श्लोकचढे जैं हात। तैं सेवकां सेवी श्रीकृष्णनाथ। भवभय तेथ उरे कैंचें॥ ८५॥ एकादशाचा एकेक श्लोक। होय भवबंधच्छेदक। जेथ वक्ता यदुनायक। तेथ हा विशेख म्हणों नये॥ ८६॥ श्रीभागवतामाजीं जाण। एकादश मोक्षाचें स्थान। यालागीं श्लोकार्धमात्रें परिपूर्ण। भवबंधन निर्दळी॥ ८७॥ श्रीकृष्ण वेदांचें जन्मस्थान। त्याचे मुखींचें हें निरूपण। तेथें सकळ वेदार्थ जाण। माहेरा आपण स्वयें येती॥ ८८॥ यालागीं एकादशीं वेदार्थ। माहेरीं सुखावले समस्त। ते साधकासी परमार्थ। स्वानंद देत संपूर्ण॥ ८९॥ मंथोनि वेदशास्त्रार्थ। व्यासें केलें महाभारत। त्या भारताचा मथितार्थ। श्रीभागवत-हरिलीला॥ ४९०॥ त्या भागवताचा सारांश। तो हा जाण एकादश। तेथ वक्ता स्वयें हृषीकेश। परब्रह्मरस प्रबोधी॥ ९१॥ भागवतामाजीं एकादश। जैसा यतींमाजीं परमहंस। का देवांमाजीं जगन्निवास। तैसा एकादश अति वंद्य॥ ९२॥ पक्ष्यांमाजीं राजहंस। रसांमाजीं सिद्धरस। तैसा भागवतामाजीं एकादश। परम सुरस स्वानंदें॥ ९३॥ तीर्थ क्षेत्र वाराणसी। पावनत्वें गंगा जैशी। जीवोद्धारीं एकादशी। महिमा तैसी अनिर्वाच्य॥ ९४॥ त्या एकादशाची टीका। जनार्दनकृपा करी एका। तो एकत्वाच्या निजसुखा। फळे भाविका सद्भावें॥ ९५॥ धरोनि बालकाचा हातु। बाप अक्षरें स्वयें लिहिवितु। तैसा एकादशांचा अर्थु। बोलविला परमार्थु जनार्दनें॥ ९६॥ कैसा चालवावा ग्रंथ। केवीं राखावा पदपदार्थ। ये व्युत्पत्तीची नेणें मी मात। बोलवी समर्थ जनार्दन॥ ९७॥ जनार्दनें नवल केलें। मज मूर्खाहातीं ज्ञान बोलविलें। ग्रंथीं परमार्थरूप आणिलें। वाखाणविलें एकादशा॥ ९८॥ एकादशाचा पदपदार्थ। शास्त्रवक्त्यां अतिगूढार्थ। तोही वाखाणविला परमार्थ। कृपाळु समर्थ जी जनार्दन॥ ९९॥ जनार्दनें ऐसें केलें। माझें मीपण नि:शेष नेलें। मग परमार्था अर्थविलें। बोलवूनि बोलें निजसत्ता॥ ५००॥ खांबसूत्राचीं बाहुलीं। सूत्रधार नाचवी भलीं। तेवीं ग्रंथार्थाची बोली बोलविली श्रीजनार्दनें॥ १॥ अवघा श्रीजनार्दनचि देखा। तोचि आडनांवें जाहला ‘एका’। तेणेंनांवें ग्रंथ नेटका। अर्थूनि तात्त्विकां तत्त्वार्थ दावी॥ २॥ कवित्वीं घातलें माझें नांव। शेखीं नांवाचा नुरवी ठाव। ऐसें जनार्दन वैभव। अति अभिनव अलोलिक॥ ३॥ ग्रंथ देखोनियां सज्ञान। म्हणती ज्ञाता एका जनार्दन। जवळीं जाहलिया दर्शन। मूर्ख संपूर्ण मानिती॥ ४॥ एका जनार्दनाचा वृत्तांत। एक म्हणती ‘भला भक्त। एक म्हणती जीवन्मुक्त। प्रपंची निश्चित मानिती एक॥ ५॥ अहो हा एका जनार्दन। नाहीं आसन न देखे ध्यान। मंत्र मुद्रा माळा जपन। उपासकलक्षण या नाहीं॥ ६॥ कोण मंत्र असे यासी। काय उपदेशी शिष्यांसी। हें कळों नेदी कोणासी। भुललीं भाविकें त्यासी अतिभावार्थे॥ ७॥ नुसत्या हरिनामाचे घोष। लावूनि भुलविले येणें लोक’। ऐसे नाना विकल्प अनेक। जनार्दन देख उपजवी स्वयें॥ ८॥ मी जेथ झाडा देऊं जायें। तें बोलणें जनार्दनचि होये। युक्तिप्रयुक्तीचें पाहें। मीपण न राहे मजमाजीं॥ ९॥ एवं माझें मीपण समूळीं। श्रीजनार्दन स्वयें गिळी। आतां माझी हाले जे अंगुळी। ते ते क्रिया चाळी श्रीजनार्दन॥ ५१०॥ निमेषोन्मेषांचे संचार। श्वासोच्छ्वासांचें परिचार। सकळ इंद्रियांचा व्यापार। चाळिता साचार श्रीजनार्दन॥ ११॥ जेथ मी म्हणों जाये कविता। ते जनार्दनचि होय तत्त्वतां। माझें मीपण धरावया पुरता। ठाव रिता नुरेचि॥ १२॥ माझें जें कां मीपण। जनार्दन जाहला आपण। एका जनार्दना शरण। ग्रंथ संपूर्ण तेणें केला॥ १३॥ हेही बोल बोलतां जाण। खुणावारी जनार्दन। झाडा सूचितां संपूर्ण। वेगळेंपण अंगीं लागे॥ १४॥ आतां वेगळा अथवा एक। अवघा जनार्दन स्वयें देख। तेणें ग्रंथार्थाचे लेख। अत्यंत चोख विस्तारिले॥ १५॥ ग्रंथ देशभाषा व्युत्पत्ती। म्हणोनि नुपेक्षावा पंडितीं। अर्थ पहावा यथार्थीं। परमात्मस्थिती निजनिष्ठा॥ १६॥ जरी संस्कृत ग्रंथ पूर्ण। तरी देशभाषाव्याख्यान। मा हें आयतें निरूपण। साधक सज्ञान नुपेक्षिती॥ १७॥ जे या ग्रंथा आदर करिती। अथवा जे कां उपेक्षिती। केवळ जे कोणी निंदिती। तेही आम्हांब्रह्ममूर्ति सद्गुरुरूपें॥ १८॥ हेंचि शिकविलें जनार्दनें। सर्व भूतीं मजचि पाहणें। प्रकृतिगुणांची लक्षणें। सर्वथा आपणें न मानावीं॥ १९॥ शिष्याचे क्षोभ न साहवती। निंदकांची निंदा न जिरे चित्तीं। तैं तो कोरडाचि परमार्थीं। क्षोभें निश्चितीं नागविला॥ ५२०॥ एवं पराचे प्रकृतिगुण। पाहतां सर्वथा क्षोभे मन। ते न पहावे आपण। सर्वभूतीं चैतन्य समत्वें पहावें॥ २१॥ येचि उपदेशीं अत्यादर। जनार्दनें केला थोर। यावेगाळा भवाब्धिपार। सज्ञान नर पावों न शके॥ २२॥ येणें निर्धारें गुरु तो गुरु। आम्हां शिष्य तोही संवादगुरु। निंदक तो परम गुरु। निरापराधसद्गुरु जनार्दनकृपा॥ २३॥ जनार्दनकृपा एथें। गुरूवेगळें नुरेचि रितें। मीपणासहित सकळ भूतें। गुरुत्वा निश्चितें आणिली तेणें॥ २४॥ तेणेंचि हे ग्रंथकथा। सिद्धी पावविली परमार्था। माझे गांठीची नव्हे योग्यता। हें जाणितलें श्रोतां ग्रंथारंभीं॥ २५॥ ग्रंथारंभ प्रतिष्ठानीं। तेथ पंचाध्यायी संपादूनी। उत्तर ग्रंथाची करणी। आनंदवनीं विस्तारिली॥ २६॥ ‘अविमुक्त’ ‘महाश्मशान’। ‘वाराणसी’ ‘आनंदवन’। एकासीचि नांवें जाण। ऐका लक्षण त्याचेंही॥ २७॥ अतिशयें जेथें मुक्ती। अधमोत्तमां एकचि गति। पुढती नाहीं पुनरावृत्ती। ‘अविमुक्त’ म्हणती या हेतू॥ २८॥ जे श्मशानीं सांडिल्या प्राण। प्राणी पुढें न देखे मसण। यालागीं हें ‘महाश्मशान’। अंती ब्रह्मज्ञान शिव सांगे॥ २९॥ मर्यादा श्वेत ‘वरुणा’ ‘अशी’। मध्यें नांदे पंचक्रोशी। रिगम नाहीं पातकांसी। यालागीं ‘वाराणसी’ म्हणिपें इतें॥ ५३०॥ ‘वरुणा’ पातकांतें वारी। ‘अशी महादोष संहारी। मध्यें विश्वेश्वराची नगरी। ‘वाराणसी’ खरी या हेतु॥ ३१॥ जें विश्वेश्वराचें क्रीडास्थान। जेथ स्वानंदें शिव क्रीडे आपण। यालागीं तें आनंदवन। ज्यालागीं मरण अमर वांछिती॥ ३२॥ जेथें जितां सदन्नें भुक्ती। मेल्यामागें अचुक मुक्ती। यालागीं ‘आनंदवन’ म्हणती। पार्वतीप्रती सदाशिव सांगे॥ ३३॥ तया वाराणसी मुक्तिक्षेत्रीं। मणिकर्णिकामहातीरीं। पंचमुद्रापीठामाझारीं। एकादशावरी टीका केली॥ ३४॥ ऐकतां संतोषले सज्जन। स्वानंदें तुष्टला जनार्दन। पंचाध्यायी संपतां जाण॥ स्वमुखें आपण वरद वदला॥ ३५॥ ग्रंथ सिद्धी पावेल यथार्थीं। येणें सज्ञानहीं सुखी होती। मुमुक्षु परमार्थ पावती। साधक तरती भवसिंधु॥ ३६॥ भाळेभोळे विषयी जन। याचें करितां श्रवण पठण। ते हरिभक्त होती जाण। सन्मार्गी पूर्ण बहुत होती॥ ३७॥ ‘हे टीका तरी मराठी। परी ज्ञानदानें होईल लाठी’। ऐसी निजमुखीं बोलोन गोठी। कृपादृष्टीं पाहिलें॥ ३८॥ तेथ म्यां ही केली विनंती। ‘जे ये ग्रंथीं अर्थार्थी होती। त्यांसी ब्रह्मभावें ब्राह्मणीं भक्ती। नामीं प्रीती अखंड द्यावी॥ ३९॥ ते न व्हावे ब्रह्मद्वेषी। निंदा नातळावी त्यांसी। समूळ क्षय ब्रह्मद्वेषेंसीं। निंदेपासीं सकळ पापें’॥ ५४०॥ ऐसी ऐकतां विनवण। कृपेनें तुष्टला श्रीजनार्दन। जें जें मागितलें तें तें संपूर्ण। वरद आपण स्वयें वदला॥ ४१॥ ये ग्रंथीं ज्या अत्यंतभक्ती। निंदाद्वेष न रिघे त्याचे चित्तीं। श्रीरामनामीं अतिप्रीती। सुनिश्चितीं वाढेल॥ ४२॥ अविद्य सुविद्य व्युत्पत्ती। न करितां ब्राह्मणजातीं। ब्रह्मभावें होईल भक्ती। तेणें ब्रह्मप्राप्ती अचूक॥ ४३॥ नामापरता साधकां सद्भावो। नाहीं ब्राह्मणापरता आन देवो। तो ये ग्रंथीं भजनभावो। नीच नवा पहा हो वाढेल॥ ४४॥ ऐसें देवोनि वरदान। हृदयीं आलिंगी जनार्दन। म्हणे ये ग्रंथीं जया भजन। त्याचें भवबंधन मी छेदीं॥ ४५॥ हेही अलंकारपदवी। स्वयें जनार्दनचि वदवी। एवं कृपा केली जनार्दन देवीं। हे ठेवाठेवी मी नेणें॥ ४६॥ थोर भाग्यें मी पुरता। पूर्ण कृपा केली समस्त श्रोतां। समूळ सांभाळिले ग्रंथार्था। अर्थपरमार्था समसाम्यें॥ ४७॥ पुढें या ग्रंथाचें व्याख्यान। जेथ होईल कथाकथन। तेथ द्यावें अवधान। हें प्रार्थन दीनाचें॥ ४८॥ हे ऐकोनि प्रार्थन। संतोषले श्रोतेसज्जन। हे कथा आमुचें निजजीवन। जेथ व्याख्यान तेथ आम्ही॥ ४९॥ ऐसे संतुष्टले श्रोतेजन। वरदें तुष्टला श्रीजनार्दन। एका जनार्दन शरण। ग्रंथ संपूर्ण तेणें जाहला॥ ५५०॥ वाराणसीमहामुक्तिक्षेत्र। विक्रम शक ‘वृष’ संवत्सर। शके सोळाशें तीसोत्तर। टीका एकाकारजनार्दनकृपा॥ ५१॥ महामंगळ कार्तिकमासीं। शुक्ल पक्ष पौर्णिमेसी। सोमवारशिवयोगेंसी। टीका एकादशी समाप्त केली॥ ५२॥ स्वदेशींचा शक संवत्सर। दंडकारण्य श्रीरामक्षेत्र। प्रतिष्ठान गोदातीर। तेथील उच्चार तो ऐका॥ ५३॥ शालिवाहनशकवैभव। संख्या चौदाशें पंचाण्णव। ‘श्रीमुख’ संवत्सराचें नांव। टीका अपूर्व तैं जाहली॥ ५४॥ एवं एकादशाची टीका। जनार्दनकृपा करी एका। ते हे उभयदेशआवांका। लिहिला नेटका शक संवत्सर॥ ५५॥ पंध्राशतें श्लोक सुरस। एकतीस अध्याय ज्ञानरहस्य। स्वमुखें बोलिला हृषीकेश। एकाकी एकादश दुजेनिवीण॥ ५६॥ एकादश म्हणजे एक एक। तेथ दुजेपणाचा न रिघे अंक। तेंचि एकादश इंद्रियीं सुख। एकत्वीं अलोलिक निडारलें पूर्ण॥ ५७॥ त्या एकादशाची टीका। एकरसें करी एका। त्या एकत्वाच्या निजमुखा। फळेल साधकां जनार्दनकृपा॥ ५८॥ हा ज्ञानग्रंथ चिद्रत्न। यथार्थ अर्थिला संपूर्ण। माझेनि नांवें श्रीजनार्दन। ग्रंथकर्ता आपण स्वयें जाहला॥ ५९॥ एका जनार्दना शरण। जनार्दना पढियें एकपण। जेवीं कां सूर्याचे किरण। सूर्यतेजें पूर्ण निरसी तम॥ ५६०॥ तेवीं श्रीजनार्दन तेजें जाण। प्रकाशलें एकपण। तेणें प्रकाशें ग्रंथ संपूर्ण। जनार्दनार्पण एकपणेंसीं॥ ६१॥ ‘जन जनार्दन एक’। जाणे तो सुटला नि:शेख। हेंचि नेणोनियां लोक। गुंतले अनेक निजात्मभ्रमें॥ ५६२॥
इति श्रीभागवते महापुराणे परमहंससंहितायां एकादशस्कंधे श्रीकृष्णउद्धवसंवादे एकाकारटीकायां ‘मौसलोपाख्यानम्’ नाम एकत्रिंशोऽध्याय:॥ ३१॥ श्रीकृष्णार्पणमस्तु॥ श्लोक २८॥ ओंव्या ५६२॥*
* (पैठणचे नाथाचे वंशज नारायणबुवा गोसावी पालखीवाले ह्यांच्याकडील हस्तलिखित प्रतींत, मागील पानावरील आपली ५५० वी ओवी ‘ऐसे संतुष्टले श्रोतेजन। ...ग्रंथ संपूर्ण तेणें झाला॥’ ही संपतांच ह्या ओवीच्या पुढें ‘इति श्रीभागवते महापुराणे एकादशस्कंधे परमहंससंहितायां एकाकारटीकायां ‘निजधामागमनोन्नाम’ एकत्रिंशोध्याय:॥ ३१॥ श्रीकृष्णार्पणमस्तु॥ श्लो० २८॥ ओ० ५४८॥ राम राम॥ एवं ५७६॥ असे असून, त्यापुढें ‘वाराणसी महाक्षेत्रे०’ ही ओवी सुरू करून, वरील आपल्या ५६२ व्या ओवीपर्यंत लिहून त्यांना १ पासून १२ अंक घालून त्यापूढें १८ पर्यंत लिहिलेल्या ओंव्या खालीं दिल्या आहेत. ह्या त्या पोथीच्या शेवटच्या पानावर स्वतंत्रच लिहिल्या आहेत!)
‘सिद्ध असोनिया जवळी। आप आपणिया विसरलीं। विषयसुखें नागवलीं। जैसे का जाळीं गुंफती मीन॥ १३॥ नेणती आत्मनिष्ठा साचार। स्वरूपानुभवें एकाकार। दृष्टीं दाटे प्रेम अपार। जें सुख साचार योगाचें॥ १४॥ जेणें रुपेंसकळ भासे। अणुमात्रहि तेणें दिसे। विषय नव्हे अनारिसे। चैतन्यरूपसे वर्तत॥ १५॥ पाहों जातां जीवाभीतरी। वेगळें नव्हे तिळभरी। ऐसियासी जो नाहींच करी। असतांचि दुरी पडलेति॥ १६॥ पाहतां दृष्टीं चहूंकडे। तेंचि तंव अखंडित उघडें। प्रत्यक्ष असोनि डोळियापुढें। जीं जडमूढें नेणतीं॥ १७॥ निरंतर दंडायमान। सर्वसाक्षित्वाची खूण। जेणें होय चळणवळण। त्याची खूण विसरले॥ १८॥’
॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय॥
श्रीएकनाथकृत चिरंजीवपद
(साधकांस धोक्याची सूचना)
(ओव्या) चिरंजीवपद पावावयासी। आन उपाय नाहीं साधकांसी। किंचित् बोलो निश्चयेंसी। कळावयासी साधकां॥ १॥ येथें मुख्य पाहिजे अनुताप। त्या अनुतापाचें कैसें रूप। नित्य मृत्यु लागला समीप। न मानी अल्प देहसुख॥ २॥ म्हणे नरदेह किमर्थ निर्मिला। तो मीं विषयस्वार्थीं लाविला। थिता परमार्थ हातींचा गेला। करी वहिला विचार हा॥ ३॥ ऐसा अनुताप लाहता। तंव वैराग्य ये तयाच्या हाता। त्या वैराग्याची कथा। ऐक आतां सांगेन॥ ४॥ तें वैराग्य बहुतां परी। आगे गा हें अवधारीं। सात्त्विक-राजस-तामस त्रिप्रकारीं। योगीश्वरीं बोलिजे॥ ५॥ नाहीं वेदविधि विचार। नेणे सत्कर्म साचार। कर्मधर्मीं भ्रष्टाकार। तो अपवित्र ‘तामस’॥ ६॥ त्याग केला पूज्यतेकारणें। सत्संग सोडूनि पूजा घेणें। शिष्यममता धरोनि राहणें। तें जाणणें ‘राजस’॥ ७॥ वैराग्य राजस तामस। तें न मानेच संतांस। तेणें न भेटे कृष्णपरेश। अनर्थास मूळ तें॥ ८॥ आतां वैराग्य शुद्ध ‘सात्त्विक’। जें मी जगद्वंद्य मानी यदुनायक। तें तूं सविस्तर ऐक। मनीं निष्टंक बैसावया॥ ९॥ भोगेच्छाविषयक। ते तो सांडी सकळिक। प्रारब्धें प्राप्त होतां देख। तेथोनि निष्टंक अंग काढी॥ १०॥ कां जे विषय पांच आहेती। ते अवश्य साधकां नाडिती। म्हणोनि लागोंनेदी प्रीती। कवणे रीतीं एक पां॥ ११॥ जेणें धरिला शुद्ध परमार्थ। त्यासी जनमान हा करी अनर्थ। तेणें वाढे विषयस्वार्थ। ऐक नेमस्त विचार हा॥ १२॥ वैराग्य पुरुष देखोनी। त्याची स्तुति करिती जनीं। एक सन्मानें करोनी। पूजेलागोनि पैं नेती॥ १३॥ त्याचें वैराग्य कोमळ कंटक। नेट न धरीच निष्टंक। देखोनि मानस्तुति अलोलिक। भुलला देख पैं तेथें॥ १४॥ जनस्तुति लागे मधुर। म्हणती उद्धरावया हा हरीचा अवतार। आम्हांलागीं जाहला स्थिर। तेणें धरी फार ‘शब्दगोडी’॥ १५॥ हा पांच विषयांमाजीं प्रथम। ‘शब्द’ विषयसंभ्रम। ‘स्पर्श’ विषय सुगम। उपक्रम तो ऐसा॥ १६॥ नाना मृदु आसनें घालिती। विचित्र पर्यंक निद्रेप्रती। नरनारी शुश्रूषाकरिती। तेणें धरी प्रीती स्पर्शगोडी॥ १७॥ ‘रूप’ विषय कैसा गोंवीं। वस्त्रें भूषणें देती बरवीं। सौंदर्य करी जीवीं। देहीं भावी श्लाघ्यता॥ १८॥ रूप विषय ऐसा जडला। ‘रस’ विषय कैसा झोंबला। जें जें आवडे ते ते याला। गोड गोड अर्पिती॥ १९॥ ते रसगोडीकरितां। घडी न विसंबे धरी ममता। मग ‘गंध’ विषय ओढिता। होय तत्त्वतां त्या कैसा॥ २०॥ आवडे सुमनचंदन। बुक्का केशर विलेपन। ऐसे पांचही विषय जाण। जडले संपूर्ण सन्मानें॥ २१॥ मग जे जे जन वंदिती। तेचि त्याची निंदा करिती। परी अनुताप नुपजे चित्तीं। ममता निश्चितीं पूजकांची॥ २२॥ म्हणाल ‘विवेकी जो आहे। त्यासी जनमान करील काये’। हें बोलणें मूर्खाचें पाहें। जया चाड आहे मानाची॥ २३॥ ज्ञात्यांसी प्रारब्धगतीं। मान झाला तरी नेघों म्हणती। परी तेथेंचि गुंतोनि न राहती। उदास होती तत्काळ॥ २४॥ यापरी साधकाच्या चित्ता। मानगोडी न संडे सर्वथा। जरी कृपा उपजेल भगवंता। तरी होय मागुता विरक्त॥ २५॥ तो विरक्त कैसा म्हणाल। जो मानलें सांडी स्थळ। सत्संगीं राहे निश्चळ। न करी तळमळ मानाची॥ २६॥ मांडीना स्वतंत्र फड। अंगा येईल अहंता वाड। न धरी जीविकेची चाड। न बोले गोड मनधरणीं॥ २७॥ नावडे प्रपंचीं बैसणें। नावडे कोणासी बोलणें। नावडे योग्यता मिरवणें। बरवें खाणें नावडे॥ २८॥ नावडे लौकीक परवडी। नावडती लेणीं लुगडीं। नावडे परान्नगोडी। द्रव्यजोडी नावडे॥ २९॥ नावडे स्त्रियांत बैसणें। नावडे स्त्रियांचे रगडणें। नावडे स्त्रियांते पाहणें। त्यांचें बोलणें नावडे॥ ३०॥ नको नको स्त्रियांचा सांगात। नको नको स्त्रियांचा एकांत। नको नको स्त्रियांचा परमार्थ। करिती आघात पुरुषासी॥ ३१॥ म्हणाल ‘गृहस्थ साधकें। स्त्रीयां सोडोन जावें कें’। येच अर्थीं उत्तर निकें। ऐक आतां सांगेन॥ ३२॥ तरी स्वस्त्रियेवांचोनी। नातळावी अन्य कामिनी। कोणे स्त्रियेसी संनिधवाणी। आश्रयो झणीं न द्यावा॥ ३३॥ स्वस्त्रीसही कार्यापुरतें। बोलावें स्पर्शावें निरुतें। परी आसक्त होऊनियां तेथें। सर्वथा चित्तें नसावें॥ ३४॥ नरनारी शुश्रूषा करिती। भक्ति ममता उपजविती। परी शुद्ध जो परमार्थीं। तो स्त्रियांचे संगतीं न बैसे॥ ३५॥ अखंड एकांतीं बैसणें। प्रमदासंगें न राहणें। जो नि:संग निरभिमानें। त्यापें बैसणें सर्वदा॥ ३६॥ कुटुंब-आहाराकारणें। अकल्पित न मिळे तरी कोरान्न करणें। ऐसे स्थितीं जे वर्तणें। तें जाणणें शुद्ध वैराग्य॥ ३७॥ ऐसी स्थिती नाहीं ज्यासी। तंव कृष्णप्राप्ती कैंची त्यासी। यालागीं कृष्णभक्तांसी। ऐसी स्थिती असावी॥ ३८॥ या स्थितीवेगळा जाण। कृष्णीं मिळूं पाहे तो अज्ञान। तो सकळ मूर्खांचें अधिष्ठान। लटिकें तरी आण देवाची॥ ३९॥ हें बोलणें माझिये मतीचें। नव्हे नव्हेचि गा साचें। कृष्णें सांगितलें उद्धवा हिताचें। तें मी साचें बोलिलों॥ ४०॥ साच न मानी ज्याचें मन। तो विकल्पें न पावे कृष्णचरण। माझें काय जाईल जाण। मी तों बोलोन उतराई॥ ४१॥ साधावया वैराग्य ज्ञान। मनुष्यदेहीं करावा प्रयत्न। सांगे एका जनार्दन। आणीक यत्न असेना॥ ४२॥
॥ ॐ तत्सत्-श्रीगोपाळकृष्णार्पणमस्तु॥
आरती एकनाथांची
(१)
आरती एकनाथा। महाराजा समर्था॥
त्रिभुवनिं तूंचि थोर। जगद्गुरु जगन्नाथा॥ ध्रु०॥
‘एकनाथ’ नाम सार। वेदशास्त्रांचें गूज॥
संसारदु:ख नासे। महामंत्राचें बीज॥ आरती०॥ १॥
‘एकनाथ’ नाम घेतां। सुख वाटलें चित्ता॥
अनंतगोपाळदासा। धणी न पुरे गुण गातां॥
आरती एकनाथा०॥ २॥
शेवटचं पान